बहनजी हार का कारण खुद को बतातीं तो समर्थक टूट जाते, इसलिए EVM को दुश्मन बनाया!

मायावती के निशाने पर ईवीएम के मायने… राजनीति में अक्सर ईवीएम को मोहरा बना दिया जाता है…  बीएसपी की हार से नाखुश दिख रहे दलित हितों को प्रमुखता से उठाने वाले एक संपादक ने मुझसे निजी बातचीत में बहन मायावती जी रवैये पर खासी नाराजगी जाहिर की. कहा, हार के कारणों की सही से समीक्षा नहीं होगी, तो ईवीएम को गलत ठहराने से बहुजन समाज पार्टी का कुछ भी भला नहीं होगा. बहन जी से मिलकर सबको सही बात बतानी चाहिए, भले ही उसमें अपना घाटा ही क्यों ना हो जाये. मैंने अपने संपादक मित्र से इस मामले पर एक घटना का जिक्र किया. जिसे आपके लिए भी लिख रहा हूं.

कांग्रेस ने 13वीं लोकसभा चुनाव (1999) में मिली हार की समीक्षा के लिए बैठक बुलाई. सोनिया गांधी जी चर्चा में तमाम दिग्गज कांग्रेसियों की राय ले रही थी. बात आगे बढ़े, उससे पहले बता दिया देना उचित होगा कि पहली बार लोकसभा चुनाव में ईवीएम को आंशिक तौर पर 1999 में इस्तेमाल शुरू किया गया था. उस समय विदेशी मूल का मुद्दा 12वीं लोकसभा में एक मत से गिरी अटल सरकार के वरदान साबित हुआ. जिसके कारण ही अटल सरकार या कहें पहली गैर-कांग्रेसी सरकार अपने 5 साल पूरा करने में कामयाब रही.

मंच में कांग्रेस के तमाम ऊंची जाति के नेता कांग्रेस की हार समीक्षा में अपनी ऊर्जा इस तरह खपा रहे थे कि कहीं भी हार का ठीकरा सोनिया गांधी पर नहीं फूटे. किसी ने हार का कारण चुनाव में गलत टिकट बटवारे को बताया, किसी में संगठन में अनुशासनहीनता को जिम्मेदार ठहराया, तो किसी चुनाव में युवाओं की भागीदारी की कमी को लेकर भी सवाल खड़ा किया. इसी बीच सोनिया जी ने पूर्वांचल के दिग्गज कांग्रेसी दलित नेता महावीर प्रसाद जी से पूछा कि आपकी राय में कांग्रेस की हार के लिए कौन जिम्मेदार है.

महावीर प्रसाद जी ने कहा कि हार का एकमात्र कारण ईवीएम है. जिसमें वोट डालने पर बीजेपी को एक की जगह दो वोट मिलते थे. दलित नेता की बेतुकी बात सुनकर तमाम दिग्गज और ऊंची जाति के कांग्रेसी नेता व्यंग्य से हंसे और हार के कारणों को जानने के लिए लिए दूसरे नेता की बारी आ गई. ऊंची जाति के नेताओं की व्यंग्यात्मक हंसी महावीर प्रसाद जी के एक समर्थक को काफी खली. चर्चा खत्म होने के बाद जैसे ही महावीर प्रसाद जी बाहर निकले, करीबी समर्थक ने बिलखकर बोला, बाबूजी आप भी गजब करते हैं, आपकी राय को तमाम दिग्गज नेता उपहास में उड़ा दिये. ऐसी राय आपको नहीं जतानी चाहिए थी.

इतना सुनते ही टोपी वाले नेता और बाबूजी के नाम से प्रसिद्ध महावीर प्रसाद जी गुस्से में बोले, मुझे राजनीति मत सिखाओ. हार का कारण क्या है, किसको नहीं मालूम है… सबको मालूम है कि हार का कारण सोनिया जी ही हैं. उनके विदेशी मूल का मुद्दा ही बड़ा कारण है. लेकिन बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन. मैं फिर कहता हूं कि ईवीएम ही हार की जिम्मेदार है.

अब समर्थक सन्न. उसने महावीर प्रसाद जी के सामने श्रद्धा से हाथ जोड़ लिये.

दिवंगत महावीर प्रसाद जी की तरह बहन मायावती जी को भी अच्छी तरह मालूम है कि 2017 यूपी विधानसभा चुनाव में किस कारण से बहुजन समाज पार्टी चुनाव हारी. लेकिन हार की जिम्मेदारी बहन जी के खुद लेने से क्या करोड़ों बीएसपी के वोटरों का मनोबल नहीं गिरेगा? इस सवाल जवाब के बाद मेरे साथी संपादक के चेहरे शांति भाव से खिल गया. जय भीम के नारे संग वो अगली रणनीति को सफल बनाने के लिए बढ़ चले.

नोट : इस लेख का मकसद ईवीएम मशीन को क्लीनचिट देना बिल्कुल नहीं है.

लेखक प्रसून शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई न्यूज चैनलों के एडिटर इन चीफ रह चुके हैं. उनसे संपर्क prasoon001shukla@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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इस सीट पर ईवीएम से छेड़छाड़ न कर सके तो हार गई भाजपा!

Ashwini Kumar Srivastava : यह है मेरठ की उसी सीट से जुड़ी खबर, जिस पर भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी इस भयंकर मोदी तूफ़ान में भी हार गए थे। ईवीएम के साथ वीवीपीएटी की चाक चौबंद व्यवस्था में यहाँ 11 फ़रवरी को मतदान हुआ। इसके बाद जहाँ ईवीएम मशीन रखी गयी, वहां हर समय मौजूद रहने वाले व्यक्ति की लाश गटर में मिली। यानी इस बात की पूरी सम्भावना है कि मतदान के बाद यहाँ रखी ईवीएम से छेड़छाड़ की कोशिश की गयी, जिसे इस व्यक्ति ने देख लिया और इसी के चलते यह हत्या हो गयी।

यह भी तो हो सकता है कि मारे गए इसी व्यक्ति के प्रतिरोध के चलते अंततः यहाँ की ईवीएम में छेड़छाड़ ही न हो पायी हो और वास्तविक नतीजे मिलने के चलते वाजपेयी हार गये हों। अगर ईवीएम में छेड़छाड़ हो जाती तो शायद मेरठ का विधायक आज कोई और ही होता।

जिस व्यक्ति की हत्या हुई, उसकी तैनाती यूपी की बहुचर्चित आईएएस और मेरठ की डीएम बी चंद्रकला ने की थी। तैनात व्यक्ति लंगूर का मालिक था। डीएम ने ईवीएम को रखे जाने वाले स्ट्रांग रूम में बंदरों के उत्पात को देखते हुए अचानक लंगूर को रखवाने का फैसला किया था। चूँकि लंगूर को रखवाने का फैसला अचानक ही लिया गया था इसलिए सम्भव है कि ईवीएम से छेड़छाड़ करने की कोशिश करने वालों को ईवीएम स्थल पर लंगूर मालिक की मौजूदगी का पता ही न चला हो। फिर अप्रत्याशित रूप से लंगूर मालिक का सामना होने पर उन्हें लंगूर मालिक की हत्या करके फरार हो जाना पड़ा हो।

लखनऊ के पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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प्रशांत किशोर की उस्तादी खतरे में, धंधा बंद होने की कगार पर

-निरंजन परिहार-

देश के राजनीतिक पटल पर चुनाव प्रबंधन के उस्ताद के रूप में अचानक प्रकट हुए प्रशांत किशोर की उस्तादी खतरे में है। उनके चुनावी फंडे फालतू साबित हुए और खाट बिछाने के बावजूद कांग्रेस की खटिया खड़ी खड़ी हो गई। आनेवाले दिन प्रशांत किशोर के लिए भारी संकट से भरे होंगे। कांग्रेस की करारी हार के बाद अब चुनावों में उन्हें कोई काम मिल जाए, तो उनकी किस्मत। 

यूपी के चुनाव ने प्रशांत किशोर के पराभव की पटकथा लिख दी है। चुनाव के शर्मनाक नतीजों के बाद कांग्रेस तो क्या किसी भी राजनीतिक दल में अब उनके लिए कोई इज्जतदार जगह नहीं बची है। भविष्य में किसी राजनीतिक दल का कोई छोटा – मोटा काम मिल गया, तो उनके लिए बहुत बड़ी बात होगी। प्रियंका गांधी ने चलते चुनाव में ही उनसे किनारा कर लिया था, और सोनिया गांधी ने तो शुरू से ही उन्हें कोई भाव नहीं दिया। कांग्रेस के बड़े नेता अपने परंपरागत सेटअप में सैंध लगाने के कारण प्रशांत किशोर से पहले से ही दूरी बनाए हुए थे, मगर अब हार के बाद उनके सारे पैसे अटक गए हैं। कांग्रेस पर प्रशांत किशोर का बहुत बड़ा बिल बाकी है। चुनाव से पहले ही वे इसकी वसूली चाहते थे। लेकिन कांग्रेस मुख्यालय से मामला आगे सरकाया जाता रहा कि चुनाव हो जाने दीजिए, फिर कर लेंगे। मगर, अब उनका धंधा बंद होने की कगार पर है। कांग्रेस को अब समझ में आ रहा है कि राजनीति सिर्फ राजनीतिक तरीकों के जरिए ही साधी जा सकती है, नए नए फंडों से नहीं। और, चुनाव रणनीतिक कौशल से जीते जाते हैं, इवेंट मेनेजमेंट से नहीं।  

राहुल गांधी को खाट सभाएं करने का नया फंडा पेश करनेवाले प्रशांत किशोर कांग्रेस की खटिया खड़ी करवानेवाले साबित हुए। कांग्रेस के सारे दिग्गज नेता तो पहले से ही कह रहे थे कि उनको जमीनी राजनीति की कोई समझ नहीं है, इसलिए उन पर बहुत भरोसा करने की जरूरत नहीं है। लेकिन राहुल गांधी को प्रशांत किशोर ने विश्वास में ले लिया था, सो उन्होंने अपने किसी भी नेता की नहीं सुनी। राहुल ने उन्हें को सर आंखों पर बिठा लिया था और जैसा प्रशांत किशोर कहते रहे, वैसा ही वे करते रहे। सो, अब भुगत भी रहे हैं। देश देख रहा है कि प्रशांत किशोर ने राहुल गांधी की राजनीति का सत्यानाश कर दिया, कांग्रेसियों का भट्टा बिठा दिया और यूपी में कांग्रेस को इतिहास की तस्वीरों में दर्ज होने के गर्त में धकेल दिया।

यूपी में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के बाद राजनीतिक दलों को अब समझ में आ जाना चाहिए कि विश्लेषण और सर्वेक्षण वगैरह करवाने तक तो प्रोफेशनल एजेंसियों से भले ही काम लिया जाना चाहिए। लेकिन पार्टी के अंदरूनी मामलों में उनका दखल कतई नहीं हो। प्रशांत किशोर ने सबसे बड़ी गलती यही की कि पार्टी की रणनीति बनाने से लेकर समाजवादी पार्टी से समझौता कराने और रैलियों की तारीख, जगह और वक्त तक तय करने का काम भी उन्होंने अपने हाथ में ले लिया। यहां तक कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा, नेताओं के दौरे, भाषण के मुद्दे, रोड़ शो के रास्ते और टिकट बांटने तक में उन्होंने दखल देकर कई बड़े नेताओं को नाराज भी किया। यूपी के एक बड़े नेता ने तो चलते चुनाव में ही राहुल गांधी को यहां तक साफ साफ कह दिया था कि दशकों तक पार्टी की सेवा करनेवालों को भी अब क्या बाहरी लोगों के निर्देश पर ही चुनाव में हर काम करना होगा ?

चुनाव जितानेवाले उस्ताद के रूप में खुद को प्रचारित करने के बावजूद प्रशांत किशोर यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस को दिलासा देने लायक बहुमत तक नहीं दिला पाए। यूपी में कभी राज करनेवाली कांग्रेस के पास पिछली विधानसभा में 28 सीटें थीं। मगर उनकी सलाह पर रुपया पानी की तरह बहाने के बावजूद 403 में से कांग्रेस सिर्फ 7 विधायकों पर संतोष करने को मजबूर है। कुल 500 करोड़ में सिर्फ 7 विधायक। उधर, उत्तराखंड में भी केवल 15 विधायक जीते और खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत की दो जगहों से हार भी वे नहीं बचा पाए। चुनाव तो पंजाब में भी थे, जहां कांग्रेस को भारी बहुमत मिला। मगर, वहां कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रशांत किशोर तो पहले से ही अपने से बहुत दूर रखा था, और दिल्ली दरबार के बड़े से बड़े कांग्रेसी नेता का दखल भी नहीं स्वीकारा।

यह साफ हो गया है कि सिर्फ एक चुनाव जीतती हुई मजबूत पार्टी में ही प्रशांत किशोर के चुनावी फंडे काम आ सकते हैं। कमजोर और हारती हुई पार्टी को जिताने के लिए वे कुछ नहीं कर सकते। प्रशांत किशोर अपने बारे में 2014 के लोकसभा चुनाव और बिहार का उदाहरण रखते हैं। लेकिन उस लोकसभा चुनाव में देश में मोदी लहर थी और उसके बाद बिहार में भी नीतीश कुमार जब लालू यादव को अपने साथ लाए, तो बहुत मजबूत स्थिति में उभरे थे। दरअसल, लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने प्रशांत किशोर के ‘स्ट्रेटेजी बेस्ड पॉलिटिकल इवेंट्स सिस्टम’ का चुनावी उपयोग इसीलिए किया, क्योंकि ये इवेंट्स उनके विचारों, उनके कार्यक्रमों और उनकी प्रतिभा को प्रसारित और प्रचारित करने के लिए सहायक थे। लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत का सेहरा प्रशांत किशोर ने अपने माथे बांधा था। पर, उस चुनाव में मोदी के मंसूबे बहुत ऊंचे थे, सो कौन क्या श्रेय ले रहा है, इसकी उनको कोई खास परवाह भी नहीं थी। और बीजेपी के किसी नेता ने तो विरोध इसलिए नहीं किया, क्योंकि तब प्रशांत किशोर तब सीधे मोदी के आदमी थे। मगर, केंद्र में सरकार बनते ही बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने प्रशांत किशोर को दरवाजा दिखा दिया। तो बिहार का बेटा होने की दुहाई देकर प्रशांत किशोर नीतीश कुमार के साथ हो लिए। लेकिन अब उनसे यह सवाल क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि बिहार में भी यूपी की तरह लालू यादव, नीतीश कुमार, कांग्रेस, और बीजेपी सारे अलग अलग चुनाव लड़ रहे होते, तो भी क्या वे नीतीश को बिहार में जिता पाते ? यूपी और उत्तराखंड में कांग्रेस की शर्मनाक हार ने यह साबित कर दिया कि पेशेवर सलाहकारों की सलाहों पर किसी राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतना संभव नहीं है। अब तक के इतिहास की सबसे शर्मनाक हार से कांग्रेस को तो फिर से खड़ा होने में सालों लगेंगे ही, प्रशांत किशोर की दुकान भी बंद हो जाएगी। न हो तो कहना।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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क्या विस चुनावों के बाद मीडिया के लिए बुरे दिन आएंगे?

यूपी चुनाव खत्म होने के बाद मीडिया में छाई गंदगी का सफाया तेजी से हो सकता है। बताया जाता है कि यूपी चुनाव में भाजपा बहुमत की उम्मीद कर रही थी लेकिन लाख कोशिशों के बाद त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है। और इसका ठीकरा न्यूज़ चैनलों पर फोड़ा जा सकता है। कभी दो नंबर की पायदान बनाए रखने वाले न्यूज चैनल को बंद होने की भविष्यवाणी मोदी भक्त अभी से कर रहे हैं।

एनडीटीवी के मनोरंजन चैनल का लाइसेंस रद्द किया जा चुका है। विभिन्न संस्थानों में कार्यरत एक पत्रकार जो अब न्यूज़ चैनल के मालिक हैं उनके चैनल पर खुफिया विभाग पहले से ही आंखे ततेरे हुए है। बताया जाता है कि इसमें एक कांग्रेसी नेता और दाऊद का पैसा लगा हुआ है। मतलब साफ है कि काला कारोबार करने वाले कुछ लोग मीडिया का लोचा पहनकर उपदेश दे रहे हैं, देश की दशा तय कर रहे हैं, चर्चा का विषय तय कर रहे हैं और यह बात कुछ राजनेताओं को बिल्कुल पसंद नहीं।

प्रिंट मीडिया का भी यही हाल
यही हाल प्रिंट मीडिया का है, डीएव्हीपी को इतना जटिल बना दिया गया है कि इसका फायदा सिर्फ ब्रांडेड संस्थानों और भाजपा समर्थित पुराने मीडिया संस्थानों को ही मिलेगा। वहीं मजीठिया वेतनमान ना देकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार की शक्तियों को चुनौती देने प्रेस मालिकों से सरकार परेशान है। इससे भारत की छवि विश्व स्तर पर धूमिल हुई है कि भारत में मीडिया मालिक काफी सशक्त हैं। उनके सामने सरकार, न्यायपालिका लाचार है। इसलिए बड़े प्रेस मालिकों को इसके लिए राजी करने का प्रयास किया जा रहा है कि वे पूरा ना सही पर इतना वेतनमान तो दें जिससे सरकार और न्यायपालिका की लॉज बची रहे।

पत्रकार क्या करें?
मीडिया पर सरकार का सफाई अभियान चलेगा तो कुलमिलाकर प्रभावित पत्रकार ही होंगे। और इसमें कब किसका नंबर आ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में पत्रकारों की जिम्मेदारी बनती है कि जाते-जाते ही सही देश को राजनीतिक चर्चा से ऊबार कर सभी के लिए रोजगार के अधिकार, किसानों के सभी फसलों की सरकारी खरीद हो। स्वच्छ न्यायपालिका, कार्यपालिका के लिए पूरा काम-काज आनलाइन करने जैसे मांगों पर चर्चा करने की जरूरत है। इसके लिए समाचार प्रकाशित करने, लेख लिखने और बहस करने की जरूरत है। एक पत्रकार होने के नाते हमारा दायित्व बनता है कि लोगों की विचारधारा को सही दिशा दें।

2014 के एक लेख ‘वर्तमान समय पत्रकारों के लिए अघोषित आपातकाल” के लेख में मोदी का विकास कार्य, युद्ध की ओर बढ़ती सरकार और मोदी सरकार के काम का असर 2017 में दिखेगी जैसी बातों की संभावना पहले ही थी। सपना सच्चाई से मिलता तो है वास्तविक दर्द और सपने के दर्द में अंतर होता है।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र

पत्रकार

maheshwari_mishra@yahoo.com


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भुलक्कड़ नितिन गडकरी (देखें वीडियो)

BALLIA में नितिन गडकरी भाजपा प्रत्याशी उपेंद्र तिवारी की सभा में प्रत्याशी का नाम बार बार वीरेंद्र तिवारी लेते रहे। और, देखिए, भाषण के आखिर में कितना हवाई टाइप का वादा करते हैं गड़करी। इसी को कहते हैं चुनावी भाषण। कुछ भी बोल जाइए, कुछ भी पेल जाइए।

बीजेपी उम्मीदवार उपेंद्र तिवारी के समर्थन में आज केंद्रीय मंत्री भारत सरकार नितिन गडकरी फेफना विधानसभा के बलिया के गड़वार क्षेत्र में पहुंचे। यहाँ उन्होंने अपने बीजेपी उम्मीदवार उपेंद्र तिवारी के लिए विशाल जनसभा की। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी अपने बीजेपी उम्मीदवार का नाम बार बार भूलते नजर आये। उपेंद्र तिवारी की जगह बार बार विरेंद्र तिवारी संबोधित कर रहे थे। मंत्री जी एक ही बार नहीं बल्कि कई बार अपने उम्मीदवार का नाम सही नहीं ले पाये। मैदान में बैठी जनता भी काफी आश्चर्य चकित थी।

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://youtu.be/qbeaqlx4fS0

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.


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पूरे भाषण में आलू आलू करते रहे लेकिन आलू का भाव नहीं बता पाए नितिन गडकरी, देखें वीडियो : https://youtu.be/-qI6pSh9sEE

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भाजपा का मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम पर आकर क्यों अटक जाता है?

…आखिर कब तक काटोगे नफरत की राजनीति की फसल? उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान चल रहा है। वैसे तो कई संगठन चुनावी समर में हैं पर असली मुकाबला सपा-कांग्रेस गठबंधन, बसपा और भाजपा के बीच है। बसपा भापजा पर निशाना साधते हुए कानून व्यवस्था पर उंगली उठा रही है तो सपा सरकार की उपलब्धियां गिना रही है और कांग्रेस केंद्र सरकार की खामियां गिनाकर अपने को साबित कर रही है। इन सबके बीच भाजपा केंद्र में ढाई साल से ऊपर हो जाने के बावजूद भावनाओं का सहारा लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का खेल खेल रही है।

चुनावी शुरुआत में भले ही भाजपा प्रचारकों ने कानून व्यवस्था पर उंगली उठाई हो पर हर चुनाव की तरह ही इन चुनाव में भी उसका एकसूत्रीय एजेंडा हिन्दू वोटों का ध्रुर्वीकरण करना है। जहां भाजपा अध्यक्ष  अमित शाह ने कांग्रेस, सपा व बसपा को ‘कसाब’ की संज्ञा दे दी वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कब्रिस्तान और श्मशान के लिए आवंटित जमीन पर हिन्दू वाटबैंक को रिझाने की कोशिश की वहीं और ईद व दीवाली पर लाइट को लेकर वोटों का ध्रुर्वीकरण करने का प्रयास किया। यहां तक कि अब ट्रेन हादसे को लेकर एक विशेष वर्ग पर हमला बोला।

इसमें दो राय नहीं कि चुनाव के समय वोटों के ध्रुर्वीकरण को लेकर तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं पर क्या हर चुनाव में भाजपा के पास बस भावनात्मक मुद्दे ही हैं। किसी देश का प्रधानमंत्री किसी प्रदेश की सरकार की नीतियों पर उंगली उठाए तो उससे उसका कद गिराता है। यदि किसी प्रदेश में कहीं गलत हो रहा है तो आप तो केंद्र में बैठे हैं। आप सब कुछ कर सकते हैं, तो क्यों नहीं करते। अमित शाह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार में उनकी सरकार बनते ही बूचड़खाने बंद करा दिये जाएंगे। गो हत्या नहीं होगी। प्रधानमंत्री कहते हैं किसानों का कर्जा माफ कर दिया जाएगा।

मेरी समझ में तो यह नहीं आता कि जब ये लोग केंद्र में सरकार चला रहे हैं तो केंद्र की उपलब्धि पर वोट क्यों नहीं मांगते? वैसे भी जनता ने मोदी जी को प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनाया है। जहां तक कर्जा माफ करने की बात है तो आप तो पूरे देश के किसानों का कर्जा माफ कर सकते हैं। गो हत्या की बात है तो देश के आधे प्रदेशों में तो आपकी ही सरकरा चल रही है तो इतने बड़े स्तर पर मांस का निर्यात कैसे हो रहा है। बात गो हत्या की ही क्यों पशु हत्या की क्यों नहीं करते ? भैंसा, भैंस, बकरी, बकरा, सूअर क्या जीव नहीं हैं क्या?

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगरा एक्सप्रेस, लखनऊ मेट्रो, पेंशन आदि उपलब्धियां गिना तो रहे हैं पर भाजपा का मुद्दा तो बस हिन्दू मुस्लिम पर आकर अटक जाता है। बेरोजगारी की बात नहीं करेंगे। भ्रष्टाचार की बात नहीं करेंगे। शिक्षा में सुधार की बात नहीं करेंगे।  किसान आत्महत्या की बात नहीं करेंगे ? महंगाई की बात नहीं करेंगे ? नोटबंदी के चलते हुई परेशानी की बात नहीं करेंगे? भाईचारे की बात नहीं करेंगे। देश व प्रदेश को कैसे विकास के रास्ते पर ले जाएंंगे, यह नहीं बताएंगे। बस समाज में जातिवाद, धर्मवाद, हिन्दू-मुस्लिम, तेरा-मेरा का जहर खोलकर सत्ता हासिल करनी है।

देश के बंटवारे के समय गांधी जी ने मुस्लिमों को रोकते हुए यही तो कहा था कि हम देश को विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न जातियों व विभिन्न धर्मों का ऐसा धर्मनिरपेक्ष देश बनाएंगे जो दूसरे देशों के लिए मिसाल होगा तो फिर यह बांटने की नीति क्यों? नफरत की नीति क्यों? हमारे समाज में तो बड़ा छोटों के प्रति त्याग व बलिदान की भावना रखता है। करना आपको हिन्दुओं के लिए भी कुछ नहीं है। बस राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं। यदि करना है तो बताओ विवादित ढांचे के ध्वस्त होने में मरे युवाओं के लिए आपने क्या किया? मुजफ्फरनगर दंगे में मरे लोगों के लिए आपने क्या किया? किसी गरीब हिन्दू की बेटी की शादी में दो रुपए का कन्या भिजवाया।

किसी गरीब हिन्दू बच्चे की पढ़ाई में दो पैसे का  योगदान दिया। किसी गरीब बेसहाय परिवार की मदद की? आप तो भूमि अधिग्रहण कानून लागू कर किसानों की जमीन हड़पना चाहते थे। श्रम कानून में संशोधन कर मजदूर की मजदूरी गिरवी रखना चाहते थे। तो आप कैसे हुए किसान व मजदूर के हितैषी? आपको तो बस समाज को बांटने की राजनीति करनी है। कब तक काटोगे नफरत की राजनीति पर खड़ी की गई इस वोटबैंक की फसल को। इस देश को आपस में मिलकर विकास के रास्ते पर ले जाने की जरूरत है। मिलजुल कर भाईचारा कायम करने की जरूरत है।

लेखक चरण सिंह राजपूत कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं और मीडियाकर्मियों की हक की लड़ाई के लिए सक्रिय रहते हैं.

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नारद राय ने बसपा की रैली में सपा को जिताने की अपील कर दी (देखें वीडियो)

राय साहब अपने पुराने घर को नहीं भूल पा रहे हैं… बलिया में बसपा की रैली में सपा को जिताने की अपील कर दी. नारद राय हाल में ही सपा को छोड़कर बसपा में शामिल हुए. वे बसपा की चुनावी रैली में मंच से बोल गए कि सपा को जिताएं.

जुबान फिसलने की चर्चा यूं रही कि लोग नए नए दलबदलू की इस हरकत पर मौज-मजा लेते दिखे. देखें वीडियो..

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इंडिया टीवी वाले शर्मा साहेब अखिलेश जी के पक्ष में पहला शब्द कब बोलेंगे?

Dilip Mandal : सपा के दोस्तों, इंडिया टीवी वाले जिस शर्मा साहेब को अखिलेश जी ने 11 लाख रुपए और 50,000 रुपए मासिक पेंशन वाली यश भारती दी, उनसे पूछिए कि वे अखिलेश के पक्ष में पहला शब्द कब बोलेंगे। ऐसे सैकड़ों उपकृत लोग हैं, उनसे बात कीजिए। दैनिक जागरण के मालिक को राज्यसभा भेजा था, उनसे पूछिए। विनीत जैन को नोएडा में 104 एकड़ ज़मीन दी है, टाइम्स ऑफ इंडिया से पूछिए। लखनऊ में जिन पत्रकारों को ज़मीन दी है, उनसे बात कीजिए।

Zee न्यूज के मालिक पर आपके इतने उपकार हैं, मुलायम परिवार की शादी की पार्टी उनके फ़ार्म हाउस में होती है, उनको बोलिए कि आपके लिए गाएँ। उनमें लगभग सारे बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। मैं क्यों? मैं किसी सरकार या पार्टी का उपकार नहीं लेता। अपने मन की लिखता हूँ। मुझसे मेरी मर्ज़ी के खिलाफ आप एक शब्द नहीं लिखवा सकते। वैसे भी मेरा क्या है? मैं तो आपका दैनिक इतिहास लेखक हूँ। डाटा पैक भी अपना है। रोज़नामचा लिखता हूँ। सही लगा तो कल फिर आपकी तारीफ कर दूँगा। मेरा डाटा पैक, मेरी मर्ज़ी। मैंने आपका पेंशन नहीं खाया है। आपके नमक का एक दाना नहीं खाया है। पेंशनहरामी करने वालों को पकड़िए।

हर चैनल और अखबार या तो BSP को कमज़ोर दिखा रहे हैं या नहीं दिखा रहे हैं। उनका ईश्वर न करे, अगर बीएसपी पाँचवीं बार सत्ता में आ गई तो वे बेचारे क्या करेंगे? क्या करेंगे? कटोरा लेकर सरकारी विज्ञापन के लिए सरकार के दरवाज़े पर खड़े हो जाएँगे। और क्या?

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से 

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एक्जिट पोल छाप कर दैनिक जागरण फंसा, आयोग ने कहा- FIR दर्ज करो

भारत के चुनाव आयुक्त ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के 15 जिले के चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे दैनिक जागरण के खिलाफ चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में संपादकीय विभाग के मीडिया हेड के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज करायें।

दैनिक जागरण पर आरोप है कि उसने चुनाव के पहले ही एक्जिट पोल का प्रकाशन कर चुनाव आयोग के नियमों का उलंघन किया है। यह एफआईआर दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक और अन्य अथोरिटी के अलावा रिसोर्स डेवलपमेंट इंटरनेशनल (आई) प्राईवेट लिमिटेड के खिलाफ कराने का निर्देश दिया गया है। दैनिक जागरण के प्रबंध निदेशक के साथ साथ इसी अखबार के प्रबंध संपादक, मुख्य संपादक, संपादक के खिलाफ भी चुनाव आयोग ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है।

चुनाव आयुक्त ने जिला अधिकारियों को इस मामले में एफआईआर कराने के बाद पूरी रिपोर्ट भी देने का निर्देश दिया है। देश के सभी मीडिया हाउस को चुनाव से पहले उस एक्जिट पोल का प्रकाशन या प्रसारण करना मना है जिसके प्रकाशन या प्रसारण से मतदाताओं पर असर पड़े। दैनिक जागरण पर आरोप लगा है कि इस अखबार ने धारा 126 ए और बी का उलंघन किया है। दैनिक जागरण पर आरोप है कि उसने ओपनियन पोल में दिखाया था कि भारतीय जनता पार्टी पहले चरण में हुये चुनाव में सबसे आगे है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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फ़ैज़ाबाद में दैनिक जागरण ने आज बीएसपी की कोई ख़बर नहीं छापी!

Dilip Mandal : एक लाख का इनाम आप भी जीत सकते हैं! अभी। अनिल कुमार पटेल बता रहे हैं कि फ़ैज़ाबाद में दैनिक जागरण ने आज बीएसपी की कोई ख़बर नहीं छापी है। बीएसपी की बुराई की ख़बर भी नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ, बुख़ारी और पर्सनल लॉ बोर्ड के कमाल फारुखी द्वारा बीएसपी को कल समर्थन दिया गया। ये ख़बरें होनी चाहिए। नहीं है। कुछ नहीं है।

जिस पार्टी की राज्य में चार बार सरकारें बनी हों, जिसे आख़िरी चुनाव में 20% वोट मिला हो, जो वोट शेयर के हिसाब से देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी हो, उसे मीडिया मार डालना क्यों चाहता है। चर्चा से बाहर कर देना हत्या के समान है। हालाँकि सोशल मीडिया है, फिर भी गाँव तक पहुँच के मामले में अखबार आगे हैं।

यह हाल तमाम अख़बारों और चैनलों का है। कोई कम तो कोई ज़्यादा। कम पढ़े लिखे लोग तो पूरी तरह अखबार और टीवी पर निर्भर हैं। वे बेचारे क्या करें? बहरहाल अनिल पटेल की घोषणा है कि उनके शहर के आज के दैनिक जागरण में अगर बीएसपी की कोई भी ख़बर अगर आप ढूँढ देंगे, तो वे आपको एक लाख रुपए देंगे।

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अख़बारों को ऐसे पढ़ें या फिर न पढ़ें! अमर उजाला यूपी में दूसरा सबसे ज़्यादा बिकने वाला अखबार है। जागरण के मुकाबले संतुलित है। आज दिल्ली दफ्तर में उसका नोएडा संस्करण देख रहा हूँ, जहाँ कल वोट पड़ेंगे। इस अखबार में आज चुनाव से संबंधित कुल 26 तस्वीरें हैं। इनमें पार्टियों का हिसाब यह है:

बीजेपी – 15
सपा+कांग्रेस – 8
बीएसपी – 2
आरएलडी – 1

एक कॉलम से बड़ी 6 तस्वीरें हैं। सभी बीजेपी की हैं। पहले पेज पर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का इंटरव्यू है कि “जाटों के लिए बीजेपी से बेहतर विकल्प नहीं”। प्रेस कौंसिल और चुनाव आयोग दोनों को जाटों वाली ख़बर का संज्ञान लेना चाहिए। मतदान से एक दिन पहले एक संतुलित अखबार का यह हाल है।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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कांग्रेस का ये साथ, मुसलमानों के साथ घात

राजीव गांधी द्वारा जन्मभूमि का ताला खुलवाने से कांग्रेस से बिदके थे मुसलमान

अजय कुमार, लखनऊ
 

उत्तर प्रदेश की सियासत में भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या से जुड़ी तीन बातों ने पिछले 30 वर्षों में खूब सुर्खिंया बटोरी हैं। इन तीन बातों ने प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया तो कहीं न कहीं समाज को बांटने का भी काम किया। तीनों ही बातें भगवान राम की नगरी अयोध्या से ताल्लुक रखती हैं और इन तीनों बातों के पीछे तीन राजनैतिक दलों ने ही मुख्य किरदार निभाया। यह तीन बातें चुनावी मौसम में हमेशा ही सुर्खिंयों की वजह बन जाती हैं, जैसा कि इस बार भी देखने को मिल रहा है। इन बातों को क्रमशः समझा जाये तो कहा जा सकता है कि 1986 में रामजन्म भूमि स्थान का ताला खुलवाने में जहां कांग्रेस का अहम किरदार रहा थो तो अस्सी-नब्बे के दशक में समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बीजेपी की सोच के विपरीत अपनी सियासी गोटियां सेंकने के लिये अयोध्या मसले को खूब हवा दी।

जब भी बीजेपी वाले और हिन्दूवादी संगठन कहते कि ”राम लला हम आयेंगे और मंदिर वहीं बनवायेंगे” तो मुलायम कहने लगते कि बीजेपी वालों का आना तो दूर जन्म स्थल पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। फिर भी 1992 में बीजेपी और हिन्दूवादी दलों की मौजूदगी में विवादित बाबरी मस्जिद ढांचा गिरा दिया गया जो अयोध्या सियासत की एक अहम और दुखद घटना थी। अयोध्या का इतिहास उठाकर देखा जाये तो रामजन्म भूमि/बाबरी मस्जिद विवाद करीब पांच सौ वर्ष पुराना है, लेकिन इस मसले ने पहली बार सियासी शक्ल तब अख्तियार की जब 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया।

राजीव गांधी का यह आदेश सोची-समझी सियासी रणनीति का हिस्सा था। अतीत पर नजर दौड़ाई जाये तो याद आता है कि इससे पूर्व 1984 से, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) मंदिर के ताले खुलवाने के लिए बड़े पैमाने पर आंदोलन चला रहा था। इसी बीच फैजाबाद के जिला दंडाधिकारी ने 01 फरवरी, 1986 को श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के द्वार पर लगा ताला खोलने का आदेश पारित कर दिया। उस समय उत्तर प्रदेश और केन्द्र दोंनो ही जगह कांग्रेस की सरकारें थीं। यूपी के मुख्यमंत्री थे श्री वीर बहादुर सिंह और देश के प्रधानमंत्री थे श्री राजीव गांधी थे। जिला अदालत के फैसले के खिलाफ दोंनो ही सरकारों ने ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाना जरूरी नहीं समझा। 1986 में राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का ताला खोल देने का आदेश दिया।

कांग्रेस ने रामजन्म स्थान का ताला खुलवाया तो सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों को चुभने वाली यह बात कभी भूलने नहीं दी कि कांग्रेस ने ताला खुलवाया था। इसी वजह से मुसलमान 1986 के बाद कभी कांग्रेस के साथ पूरे मन से नहीं खड़ा हो पाया। इसके अलावा भी मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिये मुलायम वह सब कुछ करते रहे जो उन्हें अपनी सियासत चमकाने के लिये करना जरूरी था। एक समय तो मुसलमानों को खुश करने के लिये उन्होंने कारसेवकों पर गोली भी चलवा दी जिसमें 16 कारसेवक मारे गये थे। यह कारसेवक विश्व हिन्दू परिषद और भारतीय जनता पार्टी द्वारा चलाये जा रहे उस आंदोलन का हिस्सा थे, जो मंदिर निर्माण के लिये चलाया जा रहा था, जिसमें नारे लगते थे, ‘राम लला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनवायेंगे।’

अयोध्या विवाद को हवा देकर मुलायम ने मुस्लिम वोटरों के सौदागर बन गये तो बीजेपी के पीछे राम भक्त खड़े थे। मुलायम को जो भी सियासी मजबूती मिली थी, वह उन्होंने कांग्रेस को ‘रौंद’ कर हासिल की थी।  यह लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक और संसद से लेकर अदालत तक में लड़ी जा रही थी। हिन्दुस्तान की सियासत का पूरा तानाबाना रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद विवाद के बीच थम सा गया था। कांग्रेस पूरे खेल में असहाय नजर आ रही थी और बीजेपी हिन्दुओं के बीच पकड़ बनाती जा रही थी। बीजेपी को कमजोर करने के लिये जनता दल के नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल की सियासत खेल दी। मंडल यानी मंडल आयोग जिसने कुछ जातियों को पिछड़ा मान कर उन्हें दलितों के 22.5 प्रतिशत के अतिरिक्त 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कही गई थी।

मंडल आयोग ने 1931 के जनगणना को अपनी रिपोर्ट का आधार बनाया और इसमें दलितों के अलावा कुछ अन्य जातियों को पिछड़ा वर्ग का दर्जा देते हुए उन्हें अतिरिक्त तौर पर 27 आरक्षण देने की बात कहीं थी जिसे वीपी सिंह सरकार ने मंजूरी दे दी। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होते ही हिन्दुओं में बिखराव पैदा हो गया। जगह-जगह आंदोलन होने लगे।ऐसे में जब  बीजेपी को अपनी सियासत डगमगाती दिखी  तो उसने कंमडल राग छेड़ मतलब रामजन्म भूमि विवाद को हवा दे दी। “वीपी का मंडल” “बीजेपी के कमंडल” के सामने फेल हो गया। मंडल-कमंडल के फेर में वीपी सिंह की सरकार चली गई।

इस पूरे खेल में मुलायम ने जो भी बढ़त बनाई उसके लिये कांग्रेस ने ही उन्हें मौके उपलब्ध कराये थे। मुलायम बार-बार मुसलमानों के सामने कांग्रेस की नियत पर सवाल खड़ा करते और पूछते आखिर राजीव गांधी ने क्यों विवादित स्थल का ताला खुलवाया। इसीलिये आज भी जब  राहुल-अखिलेश की दोस्ती(गठबंधन) पर उनकी राय पूछी गई तो उन्होंने जो बातें कहीं उसका सार यही निकला कि विवादित स्थल का ताला खुलवाने वाली कांग्रेस से दोस्ती करके अखिलेश मुसलमानों के बीच कैसे अपनी विश्वसनीयता बचा पायेंगे। मुलायम को इस बात का भी अंदेशा है कि इसका अखिलेश की भविष्य की राजनीति पर काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है।  मुलायम ने साफ कर दिया है कि वो सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए चुनाव प्रचार नहीं करेंगे। कांग्रेस के साथ गठबंधन से नाखुश मुलायम सिंह यादव का कड़ा रुख समाजवादी पार्टी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है।

मुलायम कहते है कि इस गठबंधन से हमारी पार्टी के नेताओं को नुकसान होगा। हमारे जो नेता क्षेत्र में काम कर रहे थे, उनके टिकट कट गए तो अब वह क्या करेंगे? उन्होंने तो अगले पांच साल के लिए मौका गंवा दिया। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि समाजवादी पार्टी यूपी में अकेले चुनाव लड़ने और जीतने में सक्षम है। इसलिए पार्टी को किसी के साथ गठबंधन की कोई जरूरत नहीं थी। मैंने पहले भी प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ा और बहुमत के साथ सरकार बनाई है। नेता जी राहुल गांधी और अखिलेश की साझा प्रेस कांफ्रेंस के बाद संयुक्त रोड शो निकालने से भी नाखुश दिखे। उन्होंने कहा कि मैं इस गठबंधन के पूरी तरह खिलाफ हूं। समाजवादी पार्टी ने हमेशा कांग्रेस का विरोध किया है, क्योंकि कांग्रेस ने अपने 70 साल के शासन में देश को पीछे ले जाने का ही काम किया है। लिहाजा वे इस गठबंधन के समर्थन में कहीं भी प्रचार करने नहीं जाएंगे।

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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किसने किया है मुलायम को नजरबंद!

अजय कुमार, लखनऊ
समाजवादी पार्टी में पिछले कुछ महीनों में जिस तरह का घटनाक्रम चला उसके बारे में सब जानते-समझते हैं। पारिवार की लड़ाई थी। सड़क पर आई तो कुछ लोगों ने इस पर दुख जताया तो ऐसे लोगों की कमी भी नहीं थी जो अखिलेश के पक्ष में माहौल बनाते घूम रहे थे। परिवार की लड़ाई में कभी अखिलेश पक्ष तो कभी मुलायम खेमा भारी पड़ता दिखा, परंतु जीत का स्वाद अखिलेश पक्ष ने ही चखा। फिर भी ‘पिटे मोहरे’ की तरह एक बाप का फर्ज निभाते हुए नेताजी अपने सीएम बेटे को लगातार रिश्तों की अहमियत और जातिपात के सियासी समीकरण समझाते रहे।

वह यह भी कह रहे थे अखिलेश अपने पीछे खड़ी भीड़ को लेकर ज्यादा गंभीर न हो। नेताजी का कहना था सत्ता होती है तो काफी लोग जुड़ जाते हैं, लेकिन सत्ता जाते ही लोग किनारा करने में देरी नहीं लगाते है। मुलायम अपने अनुभव के आधार पर अखिलेश को सभी बातें समझा रहे थे, मगर अखिलेश युवा जोश से लबरेज थे। उन्होंने न तो पिता नेताजी की सुनी और न चचा शिवपाल यादव की बातों को गंभीरता से लिया।

इसके उलट अखिलश पक्ष की तरफ से कहा यह गया कि नेताजी को कुछ लोग गुमराह कर रहे हैं। इसलिये उनके सहारे अब समाजवादी सियासत को परवान नहीं चढ़ाया जा सकता है। अखिलेश गलत भी नहीं थे। शिवपाल और अमर सिंह जिस तरह से नेताजी के साथ उनकी छाया बनकर चल रहे थे, उससे अखिलेश की सोच को बल मिलता था, लेकिन अब हालात बदल गये हैं। कल तक जो शिवपाल सपा के कर्णधार थे, वह अब हाशिये पर चले गये हैं। उनके पास गुस्सा निकालने के अलावा कुछ नहीं बचा है। नेताजी से अब उनका मेल-मिलाप भी बहुत ज्यादा नहीं होता है।

आखिर अब चर्चा के लिये भी तो कुछ खास नहीं है। परंतु इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता है कि नेताजी ने भाई शिवपाल को अपने दिल से निकाल दिया है। वह आज भी शिवपाल की पार्टी के लिये दी गई कुर्बानी को भूले नहीं हैं। बेटे से अधिक भाई को तरजीह देते हैं। मुलायम कोे इस बात का भी दुख है कि सब कुछ ठीकठाक हो जाने के बाद भी अखिलेश द्वारा उनके करीबियों को अपमानित किया जा रहा है। टिकट नहीं दिया जा रहा है। इसीलिये जब अंबिका चौधरी ने बसपा की सदस्यता ग्रहण की तो मुलायम का दर्द मीडिया के सामने आ ही गया कि अंबिका ने पार्टी के लिये काफी कुछ किया था।

खैर, अब सपा पर अखिलेश का वर्चस्व हो चुका है, लेकिन क्या अखिलेश पक्ष को इतने भर से संतोष नहीं है। कहीं जाने-अनजाने सत्ता के खेल में अखिलेश मर्यादाओं को तिलांजलि तो नहीं दे रहे हैं? ऐसा इसलिये कहा जा रहा है क्योंकि आजकल सत्ता के गलियारों में एक चर्चा आम होती जा रही है कि मुलायम को उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया है ताकि वह जनता या मीडिया के बीच जाकर कुछ ऐसा न बोल दें जिससे अखिलेश के मिशन 2017 पर ग्रहण लग जाये।

इस चर्चा को हाल ही में उस समय और बल मिला, जब मुलायम सिंह के करीबी और लोकदल के अध्यक्ष सुनील सिंह ने अखिलेश पर आरोप लगाया कि उन्होंने मुलायम सिंह को घर में नजरबंद (कैद) कर रखा है। इतना ही नहीं, अखिलेश पर एक और गंभीर आरोप यह भी लग रहा है कि उन्होंने मुलायम के करीबी पूर्व राज्यमंत्री मधुकर जेटली को भी धमकी दी है। लोकदल अध्यक्ष सुनील ने इस बारे में चुनाव आयोग को चिट्ठी लिखकर मुलायम की सुरक्षा की भी मांग की है। 

विरोधी इस तरह की अफवाह फैलाते तो समझ में आता, लेकिन वह लोग ही जब मुलायम की नजरबंदी की बात कह रहे हों जो मुलायम के करीबी हैं तो सवाल तो खड़ा होगा ही। इन बातों को इसलिये और भी बल मिल रहा है क्योंकि जिनका सियासत से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है, वह भी ऐसे ही सवाल खड़े कर रहे हैं। दरअसल, अखिलेश डरे हुए हैं कि नेताजी फिर वैसा ही कोई बयान न दे दें जैसा हाल ही में उन्होंने (मुलायम) दिया था।

गौरतलब हो, मुलायम ने कहा था कि अखिलेश मुस्लिमों के हितैषी नहीं हैं, वह जावेद अहमद को डीजीपी नहीं बनाना चाह रहे थे, मेरे कहने पर ही जावेद डीजीपी बन पाये थे। सोशल मीडिया पर भी इस तरह की बिना प्रमाणित ट्वीट आ रहे हैं, ‘जैसा धोखा मुलायम ने चौधरी चरण सिंह, वी. पी. सिंह व चन्द्रशेखर को दिया था, वैसा ही खुद मुलायम को बेटे अखिलेश व भाई रामगोपाल के हाथों भुगतना पड़ रहा है। मुलायम सिंह के घर के बाहर बैरीकेडिंग लगाकर लोगों को उनके पास जाने से रोका जा रहा है। टीपू-ए-औरंगजेब की हुड़दंगई सेना ने पुलिस की मदद से शाहजहाँ-ए-मुलायम को एक तरह से नजर बंद कर दिया है।’

बहरहाल, इस तरह की चर्चाओं पर विराम नहीं लगा तो चुनावी समर में समाजवादी पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। ताज्जुब इस बात की भी है कि अखिलेश पक्ष ऐसा कोई भी कदम नहीं उठा रहा है, जिससे जनता के बीच यह मैसेजे जाये कि इस तरह की खबरों का सच्चाई से कोई सरोकार नहीं है। हकीकत तो यही है इस तरह की चर्चाओं को नेताजी मुलायम सिंह यादव ही विराम लगा सकते हैं, लेकिन इसके लिये उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहनी होगी। प्रेस नोट जारी करके या कुछ तस्वीरों के सहारे इस तरह की चर्चाएं थमने वाली नहीं है। बसपा की तरफ से भी इस तरह की चर्चाओं को बल दिया जा रहा है।

यहां बताते चलें कि आज जैसे मुलायम को नजरबंद किये जाने की चर्चा चल रही है, ठीक वैसी ही चर्चा कुछ वर्षों पूर्व बसपा के संस्थापक मान्यवर काशीराम को लेकर भी चली थी। तब कहा जाता था कि तत्कालीन बसपा महासचिव मायावती ने काशीराम को नजरबंद कर रखा है। काशीराम के घर वालों ने भी इस तरह के आरोप लगाये थे। उस समय सपाई चटकारे लेकर इस तरह की खबरों को प्रचारित-प्रसारित किया करते थे। हो सकता हो बसपाई मुलायम के बहाने हिसाब बराबर कर रहे हों।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क ajaimayanews@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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समाजवादी पार्टी की हार, मेरा इंतजार…

दोस्तों, मैं आपसे ये नहीं कहूंगा कि इस पोस्ट पर ज्यादा-से-ज्यादा कमेंट या लाइक करें। बस आपसे एक छोटी सी गुजारिश करूँगा कि आप इस पोस्ट को ज्यादा-से-ज्यादा SHARE करें और इतना share करें कि ये messege Samajwadi Party तक पहुँच जाये, ताकि उन मायूस बच्चों को आपकी मदद से लैपटॉप मिल सके और शायद उनकी जुबान से निकलती बद्दुआएं, दुआयों में बदल जाये।

अगर 2017 में फिर अखिलेश सरकार बन गयी और उन छात्रों को लैपटॉप नहीं मिला तो आने वाले पांच साल तक वो छात्र प्रदेश सरकार को कोसते रहेंगे। अगर सरकार नहीं बनी तो उन छात्रों को कम-से-कम ये सुकून तो रहेगा कि जिस सरकार ने लैपटॉप बाँटे थे अब तो वो रही नहीं, तो किससे मांगे लैपटॉप। चलो अच्छा हुआ सरकार भी नहीं रही और हमारा इंतज़ार भी। दोस्तों लगभग 4 साल पहले लिखी रचना आज आपके साथ साँझा कर रहा हूँ। इसे रचना कहेंगे या मायूस छात्रों की दास्ताँ, पता नहीं। आप इसे पढ़ने के बाद फैसला कीजिएगा।

पूरे होते वादे रह गए अधूरे… न लैपटॉप मिला न तसल्ली। मैं देव मोहन पैरा मेडिकल महाविद्यालय का विधार्थी हूँ। जोकि सादाबाद के निकट लालगढ़ी गाँव में स्थित है। जिस दिन से लैपटॉप वितरण योजना शुरू हुई है उस दिन से बस यही सुनता आया हूँ कि मुझे भी लैपटॉप मिलेगा, पर कब मिलेगा यह कोई नहीं जानता। कॉलेज वालों से पूछो तो उनका हमेशा एक ही जवाब रहता है सरकार ने अभी आपके नाम के लैपटॉप भेजे नहीं हैं, सरकारी दफ्तरों में लैपटॉप के लिए जाए तो कैसे जाएं। वहाँ के आला अधिकारी कॉलेज का नाम सुनते ही बरस पड़ते हैं । लैपटॉप कैसे दे दें आपको, आपके कॉलेज पर तो मान्यता ही नहीं है। इस बात को मैं मान भी लेता अगर मैं बी. ए. सेकण्ड ईयर का छात्र न होता। लैपटॉप कब मिलेगा ये जानने के लिए मैं अकेला नहीं भटक रहा। लगभग 200 मेरे कॉलेज के साथी इस भटकने के अभियान में शामिल हैं।

तो दोस्तों ये थी उन छात्रों की कहानी जिन्हें सन् 2012 में इंटर करने के बावजूद लैपटॉप नहीं मिला। जो लोग समाजवादी पार्टी से संबंध रखते होंगे और वो इस लेख को पढ़ रहे होंगे तो उन्हें ये सब पढ़ के ज़रा भी अच्छा नहीं लगेगा । Samajwadi Party के लिए ऐसे शब्द लिखकर मैंने जरूर कुछ लोगों का दिल दुखाया है जिसके लिए मैं उनसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूँ पर क्या करूँ अपने जज़्बातों पर क़ाबू न सका और ये सब लिखने पर मजबूर हो गया।

ऐसा नहीं है कि मैंने Samajwadi Party के लिए कुछ अच्छा नहीं लिखा। प्रदेश के मुख्य मंत्री मान्यनीय श्री अखिलेश यादव जी ने जब घोषणा की थी कि जिन छात्र-छात्राओं ने सन् 2012-2013 में इंटर पास किया है उन्हें लैपटॉप दिए जायेंगे । उसी वक़्त मैं प्रदेश सरकार के लिए बहुत कुछ लिखा था। मैंने सोचा था कि जब मुझे लैपटॉप मिलेगा तब मैं अपनी लिखी रचना उन्हें बतौर तोहफा दूँगा जो मुझे अपने हाथों से लैपटॉप देंगे पर शायद वक़्त को ये मंजूर नहीं था न मुझे लैपटॉप मिला न मेरी रचना सरकार तक पहुँची. जिसमें मैंने प्रदेश सरकार का शुक्रिया-अदा एक कहानी के रूप में किया था। उस कहानी में मैंने बताया था कि लैपटॉप पाकर एक गरीब बच्चा भी दुनिया से बराबरी कर सकता है।

Note- अगर आप समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता हैं और आप चाहते हैं कि हम यानि मैं और मेरे साथी जिन्हें लैपटॉप नहीं मिला, उन्हें लैपटॉप मिल जाए तो कृपया करके हमें लैपटॉप दिलाने का कष्ट करें।

शुक्रिया

Dev kumar
dk3217821@gmail.com

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बिहार में भाजपा को मोहन भागवत खा गए, यूपी में मनमोहन वैद्य ने वही काम कर दिया!

Vikas Mishra : जो काम बिहार विधानसभा चुनावों से पहले मोहन भागवत ने किया था। वही काम अब मनमोहन वैद्य ने कर दिखाया। बिहार चुनावों से ठीक पहले मोहन भागवत ने आरक्षण के खिलाफ बयान देकर बीजेपी का बेड़ा गर्क कर दिया था। लालू यादव ने भागवत के बयान को चुनावों में खूब भुनाया और बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी। अब उसी तर्ज पर जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में संघ के प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने आरक्षण के खिलाफ आवाज उठा दी। उन्होंने हालांकि बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का हवाला दिया, लेकिन बात तो आरक्षण के खिलाफ ही की। इसके साथ ही बैठे-ठाले नई मुसीबत बीजेपी के गले पड़ गई। अब उत्तर प्रदेश में आरएसएस के इस सेल्फ गोल से बीजेपी कैसे उबरेगी..?

Dayanand Pandey : भाजपा अब चाहे जितने शीर्षासन कर ले उत्तर प्रदेश का सत्ता ही नहीं चुनाव भी उस के हाथ से फिसल गया है। आरक्षण विरोध की चिंगारी से बिहार खा गए थे संघ प्रमुख मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश खा गए संघ प्रवक्ता मनमोहन वैद्य। अखिलेश मायावती को पहले ही वाक ओवर दे चुके थे, अब संघ ने मायावती को राजपथ खुल्लमखुल्ला दे दिया है। नरेंद्र मोदी निश्चित रुप से संघ को किसी मुद्दे पर बहुत ज़्यादा नाराज कर चुके हैं, जिस का बदला संघ उन से इस तरह से चुका रहा है और निरंतर।

Virendra Yadav : आरक्षण संबंधी आरएसएस के मनमोहन वैद्य के बयान से भाजपा को उत्तर प्रदेश के चुनाव में कोई नुकसान नहीं होने वाला है. कारण यह कि जो सवर्ण ज़ाति के वोट सपा और बसपा को मिल सकते थे वे भी अब भाजपा को मिलेंगे क्योंकि इन जातियों में आरक्षण का विरोध एक बडा मुद्दा है. मनमोहन वैद्य के बयान ने सवर्ण जातियों को यह आश्वस्ति दी है कि भाजपा ही उनकी स्वाभाविक पार्टी है. बिहार में भी सवर्ण मत का ध्रुवीकरण भाजपा के ही पक्ष में हुआ था. लेकिन नितीश-लालू के गठबंधन ने उसे निष्प्रभावी कर दिया. उप्र में सपा और बसपा के अलग होने के कारण सवर्ण मतों का ध्रुवीकरण भाजपा को लाभ पहुचायेगा.

Dilip Mandal : मनमोहन वैद्य से ठीक पहले उनके पापा एम. जी. वैद्य RSS के प्रवक्ता थे। RSS ने 1925 में स्थापना के बाद से आज तक यह पद किसी नीच अब्राह्मण को नहीं दिया। एक जाति का 100% आरक्षण। पहले यह आरक्षण ख़त्म हो। बाबा साहेब का पूरा लेखन और भाषण ऑनलाइन है। किताबों में भी है। RSS कह रहा है कि बाबा साहेब ने नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण की समय सीमा तय की थी। RSS झूठ बोल रहा है। वह भी इंटरनेट के ज़माने में। कहाँ कहा है महाराज? किस पेज पर? किस वॉल्यूम में? इंटरनेट के ज़माने में झूठ बोलते हो! शर्म आनी चाहिए।

पत्रकार विकास मिश्र, दयानंद पांडेय, वीरेद्र यादव और दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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अखिलेश यादव पितृ हंता मुगल शासकों सरीखे! (देखें वीडियो)

आगरा में भाजपा प्रत्याशी का नामांकन कराने कलेक्ट्रेट आए सांसद राम शंकर कठेरिया ने यूपी के सीएम अखिलेश यादव की तुलना पिता के हत्यारे मुगल शासकों से कर दी. सांसद कठेरिया ने मुगल शासकों को उदाहरण देते हुए हुए बोले कि मुगल काल में शासक लोग सत्ता पाने के लिए अपने पिता तक की हत्या कर देते थे और राजपाठ पर कब्जा कर लेते थे. ठीक इसी तरह सीएम अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह को अपमानित करते हुए उनकी राजनीतिक हत्या कर पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद हथिया लिया.

देखें वीडियो >>

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वरिष्ठ वकील प्रतीक राय ने साइकिल ट्रैक पर साइकिल चिन्ह हटाने के लिए चुनाव आयोग को पत्र लिखा

Lucknow . Senior advocate Mr Prateek Rai has written to election commission of India to consider covering or dismantlling cycle signs on cycle tracks built by Akhilesh Yadav govt. He said that one can see hundreds of cycle signs erected in Lucknow, Noida, Etawa and other cities. Now cycle is election symbol of Samajvadi Party. Thus this is against model code of conduct.

Mr Rai has cited example of 2012 election when election commission orderd covering statues of elephants and Mayavati. Because elephant was election symbol of BSP and it violated code of conduct. Mr Rai’s letter and links given to ECI are as follows…

Mr Election Commissioner

Govt of India, Delhi

Subject: regarding influencing UP elections and violating Code of Conduct issued by ECI

Dear Sir

I want to draw your attention towards huge cycle tracks recently built by Uttar Pradesh Government of Akhilesh Yadav. It was inaugurated by him before election schedule was announced. On this cycle track  hundreds of sign boards were erected showing Cycle and Chief Minister. Every person knows that this cycle is election symbol of samajwadi party, one of the political parties now in elections. This track was built knowingly to take advantage during elections. No doubt it will do, if it stands as it is.

Each and every citizen is aware about an order passed during 2012 UP elections when on the instance of Honourable High Court election commission passed an order to cover statues of elephants and Mayawati, the BSP leader. It was thought then that elephants will influence the elections. Today history is on the same path. Cycle is Akhilesh’s election symbol. We saw all the posters and banners were torn out after election was announced by ECI  but Cycles under SP’s flag colours erected on hundreds of places on roads and highways in Lucknow, Noida, Etawa and other cities are still doing samajwadi party’s job. This is against order of High Court and Eci code of Conduct also.

Please order to either dismantle it or cover it throughout Uttar Pradesh in order to defend your earlier order and show the people that law is the same for everyone. If you act on this matter I will be grateful to you.

Yours
Prateek Rai
ADVOCATE, Allahabad High Court
D-1/109, Viraj Khand, Gomatinagar
Lucknow–226010
Mo. 9454090273

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यूपी में उज्जवला योजना का कनेक्शन भी बंद कराएं, यह भी आचार संहिता का उल्लंघन है

सेवा में,
मुख्य चुनाव आयुक्त,
उत्तर प्रदेश
लखनऊ

विषय : उज्जवला योजना का कनेक्शन उत्तर प्रदेश में बंद कराये जाने के सम्बन्ध में |

महोदय,

जिस प्रकार आप द्वारा समाजवादी पार्टी का स्मार्ट फ़ोन पंजीकरण बंद करा दिया, ठीक उसी प्रकार आप बीजेपी के मुफ्त “उज्जवला योजना” का गैस कनेक्शन का फार्म भरवाना और कनेक्शन जारी कराना तुरंत बंद कराएँ, यह भी तो आचार संहिता का उल्लंघन है.

फिर क्यों इस योजना को बंद नहीं कराया जा रहा है? वाराणसी के तमाम वितरक अभी भी फार्म भरवा रहे हैं और कनेक्शन भी जारी कर रहे हैं. बड़े मजे की बात यह है कि किसी भी मीडिया ने इस बात को मुद्दा नहीं बनाया, एसा लगता है कि मीडिया भी बीजेपी के साथ है.

सादर | Regards
अनिल कुमार मौर्य | अध्यक्ष | जन अधिकार मंच
Anil Kumar Maurya | President | People’s Right Forum
दूरभाष: +91-9125040585
Phone: +91-9125040585
पता: एस-8/45 पुरानी चुंगी, शिवपुर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश-221003
Address: S-8/45 Purani Chungi, Shivpur, Varanasi, Uttar Pradesh-221003

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