आज का दिन यशवंत के लिए क्यों रहा बेहद उदास करने वाला, पढ़ें

Yashwant Singh

भड़ास पर किसी किसी दिन खबरें लगाते, संपादित करते, रीराइट करते, हेडिंग सोचते, कंटेंट में डूबते हुए अक्सर कुछ क्षण के लिए लगता है जैसे मेरा अस्तित्व खत्म हो गया है. खुद को खुद के होने का एहसास ही नहीं रहता. आज का दिन ऐसा ही रहा. दिल दुखी कर देने वाली खबरों में गोता लगाए रहा. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारों पर हमले होते रहना लोकतंत्र के खतरे में पड़ने का संकेत!

पत्रकारों पर आये दिन हो रहे हमले इस देश को शायद गर्त की तरफ धकेलने का काम कर रहे हैं. इस बात को हम झुठला नहीं सकते कि अगर ऐसे ही पत्रकारों पर हमले होते रहे तो एक दिन लोकतंत्र खतरे में होगा. साथ ही अत्याचार और भ्रष्टाचार बहुत आसानी से फल फूल रहा होगा और ये देश उस वक्त मूक दर्शक बन के सब कुछ चुप चाप देख रहा होगा. आखिर ये लोग कौन हैं इनके हौसले इतने बुलंद कैसे हैं कि ये लोग हर आवाज उठाने वाले लोगों को मार देते हैं. सवाल यह भी उठता है कि बिना किसी सह के ये लोग ऐसा अंजाम कभी नही दे सकते. दरअसल पत्रकारों पर हमले वही लोग करते या करवाते हैं जो इन बुराइयों में डूबे हुये हैं. ऐसे लोग दोहरा चरित्र जीते है वजह साफ होती है कि ऐसे लोग मीडिया पर हमला क्यों करते हैं, वजह है अपना फायदा या अपनी भड़ास निकालने के लिए..

हाल ही में पत्रकार गौरी लंकेश को गोलियों से भून दिया गया देश के बुध्दिजीवियों ने तरह तरह की बातें की. नेताओं के भी बयान सामने आये लेकिन परिणाम शून्य रहा. खैर सच हमेसा कड़वा होता है सच लिखने के एवज में ही गौरी लंकेश को अपनी जान गंवानी पड़ी. जब गौरी लंकेश के हत्या का विरोध करने के लिए पत्रकारों का समूह प्रेस क्लब दिल्ली पहुंचा तो वहां एक घटना और घटी वो दु:खद थी वहां दो पत्रकारों ने मिलकर साथी पत्रकार भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के साथ मारपीट की. जिसमें वह घायल हो गये.. इतना हो जाने के बावजूद भी यशवंत सिंह ने हिंसा करना उचित नहीं समझा यहां भी उन्होने कलम से ही जवाब देना उचित समझा और वही किया.

अब आप को हमला करने वाले इन पत्रकारों (गुण्डो) के बारे में अवगत करा दूं, एक है भूपेन्द्र सिंह भुप्पी और दूसरा है अनुराग त्रिपाठी. इन दोनों ने पहले प्रेस क्लब के अन्दर यशवंत सिंह से बातचीत की फिर बाहर निकलते ही उन पर हमला कर दिया. हमले में यशवंत सिंह को काफी चोटें आयी और उनका चश्मा भी टूट गया. आप को बता दें कि ये दोनो हमलावर अपनी ऐसी ही करतूतों की वजह से ही मीडिया जगत में नहीं टिक पाये हैं. इन दोनों का उल्टे सीधे काम करना ही पेशा बन गया है जो ये पत्रकारिता के जरिए अंजाम दे रहें है. इनकी पत्रकारिता को तत्काल प्रभाव से रद्द कर देना चाहिए ताकि आगे से यह ऐसी करतूत ना कर सकें.

अब आप को यशवंत सिंह के बारे में बताते हैं.. पेशे से पत्रकार हैं, पिछले कई वर्षो से भड़ास4मीडिया नामक बेवसाइट चलाते हैं. जहां मीडिया राजनीति और समाज से जुड़ी बुराइयों के बारे में लिखते हैं. यहां सवाल एक बार फिर यही उठ रहा है कि आखिर सच्चाई लिखने वाले पत्रकारों को क्यों मारा पीटा जाता है. क्या हमारे देश का चौथा स्तम्भ अब सुरक्षित नहीं रहा. हर बार दिखावे के तौर पर रिपोर्ट तो दर्ज की जाती है मगर उसका असर देखने को नहीं मिलता है. आखिर इसकी जवाबदेही कौन देगा कि जब भी पत्रकार प्रभावशाली लोगों के खिलाफ मुहिम छेड़ते हैं तो उन्हे उसकी कीमत जान देकर क्यों चुकानी पड़ती है.

यशवंत सिंह पर हमला हुआ लेकिन उसमें पुलिस प्रशासन ने अपनी क्या भूमिका निभाई… इसकी जवाबदेही कौन देगा… जब पत्रकारों की सुनवाई नहीं है तो आम जनता तो बहुत दूर की बात हो गयी. पुलिस प्रशासन क्या अब इसकी जिम्मेदारी लेगा कि अब यशवंत सिंह पूरी तरह से सुरक्षित हैं.. वन्दन करता हूं यशवंत जी आपका कि आज भी आपने अहिंसा को जिन्दा रखा है. आज गांधी जी की वो बात फिर याद आ गयी “अहिंसा परमों धर्म:”

लेखक हर्षित हर्ष शुक्ला युवा पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

इन खबरों के कारण भड़ास संपादक यशवंत पर हमला किया भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने!

साढ़े छह साल पुरानी ये वो खबरें है जिसको छापे जाने की पुरानी खुन्नस में शराब के नशे में डूबे आपराधिक मानसिकता वाले भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी ने किया था भड़ास संपादक यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला… इसमें सबसे आखिरी खबर में दूसरे हमलावर अनुराग त्रिपाठी द्वारा स्ट्रिंगरों को भेजे गए पत्र का स्क्रीनशाट है जिसके आखिर में उसका खुद का हस्ताक्षर है… ये दोनों महुआ में साथ-साथ थे और इनकी कारस्तानियों की खबरें भड़ास में छपा करती थीं… बाद में दोनों को निकाल दिया गया था…

इन दोनों से भड़ास एडिटर यशवंत की कभी कोई मुलाकात नहीं हुई थी, सिवाय कभी किसी कार्यक्रम या किसी जगह देखा-देखी के अलावा. इनके मन में इस बात की खुन्नस थी कि वैसे तो ये खुद को तीसमारखां पत्रकार समझते थे लेकिन इनका असली चेहरा सबके सामने लाया गया तो इन्हें चक्कर आने लगे. इनकी सारी दलाली-लायजनिंग की पोलपट्टी भड़ास पर लगातार खुलती रही जिसके चलते इनका पत्रकार का आवरण धारण कर दलाली करने का असली करतब दुनिया के सामने उदघाटित हो गया. इससे इनके लिए मुंह दिखाना मुश्किल हो गया होगा…

सोचिए, मीडिया के लोग वैसे तो पूरे देश समाज सत्ता की पोल खोलने के लिए जाने जाते हैं लेकिन जब इनकी पोल खुलती है तो ये कैसे पागल होकर हिंसक हो उठते हैं… जिसका पेशा कलम के जरिए दूसरों की पोल खोलना और आलोचना करना हो, वह खुद की सही-सही आलोचना छापे जाने से तिलमिलाकर कलम छोड़ बाहुबल पर उतर जाता हो, उसे क्या कहेंगे? पत्रकार के वेश में अपराधी या पत्रकार के वेश में पशु या पत्रकार के वेश में लंपट?

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत का कहना है कि ऐसे हमलों, पुलिस-थानों, मुकदमों और जेल से वे लोग डरने वाले नहीं… मीडिया के अंदरखाने का असल सच सामने लाते रहेंगे, चाहें इसके लिए जो भी कुर्बानी देनी पड़े… भुप्पी और अनुराग से संबंधित कुछ प्रमुख खबरों का लिंक, जो भड़ास पर साढ़े छह साल पहले छपीं, नीचे दिया जा रहा है… इन  खबरों पर एक-एक कर क्लिक करें और पढ़ें…


आजतक के ब्यूरो चीफ का हुआ स्टिंग?
http://old.bhadas4media.com/tv/8998-2011-02-03-04-47-10.html

xxx

आजतक प्रबंधन ने अपने ब्यूरो चीफ को बर्खास्त किया?
http://old.bhadas4media.com/buzz/9130-2011-02-08-16-14-47.html

xxx

ब्लैकमेलिंग के आरोपों में आजतक न्यूज चैनल से निकाले गए भुप्पी
http://old.bhadas4media.com/tv/9172-2011-02-10-19-01-06.html

xxx

महुआ न्यूज चैनल के हिस्से हो गए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी!
http://old.bhadas4media.com/edhar-udhar/10121-2011-03-27-13-50-04.html

xxx

आजतक से हटाए गए भुप्पी अब तिवारी जी की सेवा में जुटे
http://old.bhadas4media.com/tv/10769-2011-04-26-07-15-30.html

xxx

महुआ न्यूज़ से भी विदाई हुई भूपेंद्र नारायण भुप्पी की
http://old1.bhadas4media.com/edhar-udhar/6062-bhuppi-out-from-mahua.html

xxx

पैसे की जगह स्ट्रिंगरों को धमकी भरा पत्र भेज रहे हैं महुआ वाले
http://old1.bhadas4media.com/print/4507-2012-05-19-18-21-08.html


पूरे प्रकरण का अपनी तरफ से पटाक्षेप करते हुए यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वह इस प्रकार है-

”मेरे पर हमला करने वाले भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी को लेकर ये मेरी लास्ट पोस्ट है. इसमें उन खबरों का जिक्र और लिंक है जिसके कारण इन दोनों के मन में हिंसक भड़ास भरी पड़ी थी और उसका प्राकट्य प्रेस क्लब आफ इंडिया में इनने किया. मैंने अपनी तरफ से रिएक्ट नहीं किया या यूं कहें कि धोखे से इनके द्वारा किए गए वार से उपजे अप्रत्याशित हालात से मैं भौचक था क्योंकि मुझे कभी अंदेशा न था कि कलम धारण करने वाला कोई शख्स बाहुबल के माध्यम से रिएक्ट करेगा. मैं शायद अवाक था, अचंभित था, किंकर्त्व्यविमूढ़ था. इस स्थिति के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं था. अंदर प्रेस क्लब में तारीफ और बाहर गेट पर हमला, इस उलटबांसी, इस धोखेबाजी से सन्न हो गया था शायद. आज के दिन मैं मानता हूं कि जो हुआ अच्छा हुआ.  हर चीज में कई सबक होते हैं. मैंने इस घटनाक्रम से भी बहुत कुछ लर्न किया. मेरे मन में इनके प्रति कोई द्वेष या दुश्मनी नहीं है. मैं जिस तरह का काम एक दशक से कर रहा हूं, वह ऐसी स्थितियां ला खड़ा कर देता है जिसमें हम लोगों को जेल से लेकर पुलिस, थाना, कचहरी तक देखना पड़ता है. एक हमला होना बाकी था, ये भी हो गया. अब शायद आगे मर्डर वाला ही एक काम बाकी रह गया है, जिसे कौन कराता है, यह देखने के लिए शायद मैं न रहूं 🙂

मैंने अपने इन दोनों हमलावरों को माफ कर दिया है क्योंकि मैं खुद की उर्जा इनसे लड़ने में नहीं लगाना चाहता. दूसरा, अगर इनकी तरह मैं भी बाहुबल पर उतर गया तो फिर इनमें और मेरे में फर्क क्या रहा?  मैं इन्हें अपना दुश्मन नहीं मानता. मेरा काम मीडिया जगत के अंदर के स्याह-सफेद को बाहर लाना है, वो एक दशक से हम लोग कर रहे हैं और करते रहेंगे. ऐसे हमले और जेल-मुकदमें हम लोगों का हौसला तोड़ने के लिए आते-जाते रहते हैं, पर हम लोग पहले से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं. लोग मुझसे भले ही दुश्मनी मानते-पालते हों पर मेरा कोई निजी दुश्मन नहीं है. मैं एक सिस्टम को ज्यादा पारदर्शी, ज्यादा लोकतांत्रिक और ज्यादा सरोकारी बनाने के लिए लड़ रहा हूं और लड़ता रहूंगा. मैं पहले भी सहज था, आज भी हूं और कल भी रहूंगा. हां, इन घटनाओं से ये जरूर पता चल जाता है कि मुश्किल वक्त में कौन साथ देता है और कौन नहीं. पर इसका भी कोई मतलब नहीं क्योंकि चार पुराने परिचित साथ छोड़ देते हैं तो इसी दरम्यान दस नए लोग जुड़ जाते हैं और परिचित बन जाते हैं. बदलाव हर ओर है, हर पल है, इसे महसूस करने वाला कर लेता है.  मैं नेचर / सुपर पावर / अदृश्य नियंता पर भरोसा करता हूं, बहुत शिद्दत के साथ, इसलिए मुझे कतई एहसास है कि हर कोई अपनी सजाएं, अपनी मौज हासिल करता रहता है. इसलिए मैं अपने हमलावर साथियों को यही कहूंगा कि उनने जो किया उसका फल उन्हें ये नेचर देगा जिसके दरम्यान उनका अस्तित्व है. जैजै”


पूरे मामले को समझने के लिए इन खबरों / टिप्पणियों / आलेखों को भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हमलावरों भुप्पी और अनुराग के घर का एड्रेस चाहिए ताकि उन्हें ‘गेट वेल सून’ कहते हुए फूल सौंप सकें!

Yashwant Singh : मुझे यकीन है वे पश्चाताप करेंगे, अपराधबोध से ग्रस्त होंगे, सुधरेंगे, बदलेंगे, यही ठीक भी है. बहुत सारे साथी बदला लेने, ईंट का जवाब पत्थर से देने की बात कर रहे हैं. आठ साल पहले का दौर होता तो शायद मैं भी यही सोचता और ऐसा ही कुछ करता. लेकिन इस वक्त सोचता हूं कि अगले दस बीस तीस साल का जीवन देखिए, कौन कहां, मैं कहां, आप कहां. किसी एक घटना के प्रतिशोध में जीवन की उदात्तता और सहजता को न्योछावर कर दिया जाए, ये ठीक नहीं. हां, गांधीगिरी करेंगे हम सब. उन्हें कलम के जरिए जवाब दिया जाएगा. ध्यान रखें वे कलम की ताकत यानि खबरों के कारण गुस्साए थे और उसी प्रतिशोध में हमला किया. यानि तय है कि कलम ज्यादा ताकतवर है.

इस लोकतंत्र में लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से जो कुछ संभव है, वह किया जाएगा. लेकिन प्लीज, ये बदला और प्रतिशोध की बातें न करें. यह आदिम स्वभाव, यह मध्ययुगीन तरीका, यह आंख के बदले आंख वाला फार्मूला मनुष्यता को कहीं का न छोड़ेगा. गल्तियां हर कोई करता है. ज्यादातर लोग गल्तियों से सबक लेते हैं, प्रायश्चित करते हैं और उसे फिर न रिपीट करने की ठानते हैं. जीवन में मैंने भी दर्जनों गल्तियां की होगीं. हम मनुष्य हैं तो गल्ती करेंगे, अच्छाई करेंगे. पत्थर होते तो कुछ न करते, चुपचाप समाधिस्थ होते. सो, मौका उनको दिया जाना चाहिए. पर उन्हें बिलकुल निरापद भी नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए.

जीवन को लेकर मेरी अपनी प्रियारटीज हैं. उसे कुछ पागलों की हरकतों के कारण नहीं बदलना चाहूंगा. तब तक नहीं बदलना चाहूंगा जब तक जीना दुश्वार न हो जाए. मैं अहिंसक या हिंसक, किसी पक्ष का आदमी नहीं हूं. जीवन की उदात्तता में अहिंसा और हिंसा के सवाल बहुत ही मामूली होते हैं. इसलिए अहिंसा या हिंसा, दोनों का पुजारी नहीं हूं. जैसे, सच या झूठ, दोनों मल्टीडायमेंशनल चीजें होती हैं, इनकी कोई एक परत नहीं होती. आपका सच मेरे लिए झूठ हो सकता है और मेरा सच आपके लिए झूठ. किसी फकीर का सच किसी सेठ के लिए झूठ हो सकता है और किसी धनवान का सच किसी फकीर के लिए बेहद झूठा.

इसलिए मैं अपने सभी जानने चाहने वाले साथियों से कहूंगा कि भूल जाएं कि मेरे पर कोई हमला हुआ था. याद रखना चाहें तो ये याद रखें कि एक रोज हम सब एक एक गुलाब का फूल लेकर हमलावर साथियों के घर चलेंगे और उनके गेट पर खड़े होकर गेट वेल सून कहेंगे. उनकी पत्नी और बच्चों से उनके पति-पिता की शिकायत करेंगे. इसलिए मेरी मदद यूं करें कि हमलावर साथियों का फोन नंबर और उनके घर का एड्रेस मालूम कर इनबाक्स करें. तारीख और समय की घोषणा जल्द की जाएगी.

जो जानकारी फिलहाल उपलब्ध है उसके मुताबिक भूपेंद्र नारायण भुप्पी गाजीपुर का रहने वाला है और नोएडा व चंडीगढ़ में इन दिनों रहता है. अनुराग त्रिपाठी लखनऊ का रहने वाला है और नोएडा में इन दिनों रहता है, न्यूजलांड्री नामक कंपनी में नौकरी करता है.

फोन नंबर इसलिए कि इन्हें हम लोग एडवांस में सूचित करके, फोन करके, डेट-समय बता कर इनके घर पर गुलाब का फूल लेकर पहुंचेंगे.

जैजै.

दोनों हमलावरों की तस्वीर ये है…

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या ‘भड़ास टास्क फोर्स’ बनाने का वक्त आ गया है?

भड़ास संपादक यशवंत पर पत्रकार कहे जाने वाले दो हमलावरों भूपेंद्र नारायण भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी ने प्रेस क्लब आफ इंडिया के गेट पर हमला किया था. उस हमले से उबरने के बाद यशवंत ने अपने भविष्य की योजनाओं को लेकर काफी कुछ खुलासा किया है. इसमें एक भड़ास टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव भी शामिल है.

इस बाबत यशवंत ने फेसबुक पर जो लिखा है, वो इस प्रकार है…

यशवंत ने अपनी पूरी बात इस वीडियो में कही है…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशवंत हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं, भगवान उन्हें दीर्घायु दें

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर हमले की खबर पढ़कर मन बहुत व्यथित हुआ। साथ ही इससे बहुत खिन्नता भी उपजी, आज के पत्रकारिता जगत के स्वरूप को लेकर। यशवंत सिंह पर हमला करने वाले निश्चित रूप से मानसिक रूप से दिवालिया हैं। यह बात भी तय है कि वे तर्क और सोचविहीन हैं।

निश्चित तौर पर वे पत्रकारिता जगत के लिए बदनुमा दाग हैं। उन्हें यह नहीं पता है कि यशवंत सिंह कितना बड़ा योगदान पत्रकारिता जगत के मूल्यों को समाज में बचाए रखने के लिए कर रहे हैं। यशवंत वो काम कर रहे हैं जिसे मीडिया जगत में बड़े नाम के रूप में स्थापित समूह भी नहीं कर सकते हैं। वे हजारों पीड़ितों को स्वर दे रहे हैं। भगवान उन्हें दीर्घायु दें।

उमेश शुक्ल
सीनियर जर्नलिस्ट
झांसी
umeshsukul@gmail.com

ये हैं दोनों हमलावर…

इसे भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार कहे जाने वालों का यशवंत जैसे एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है : अविकल थपलियाल

Avikal Thapliyal : कोहरा घना है… बेबाक और निडर पत्रकारों पर हमले का अंदेशा जिंदगी भर बना रहता है। भाई यशवंत को भी एक दिन ऐसे घृणित हमले का शिकार होना ही था। बीते वर्षों में हुई मुलाकात के दौरान मैंने यशवंत का ध्यान इस ओर खींचा भी था। लेकिन मुझे ऐसा लगता था कि कई बार फकीराना अंदाज में सभी को गरियाने वाले यशवंत किसी अपराधी या फिर विशेष विचारधारा से ताल्लुक रखने वाले हिंसक लोगों के कोप का भाजन बनेंगे। लेकिन पत्रकार कहलाये जाने वाले ही अपने बिरादर भाई यशवंत की नाक पर दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर देंगे, यह नहीं सोचा था।

यशवंत ने अपने पोर्टल के जरिये हिंदुस्तान के मीडिया जगत की खबरों के अलावा कई रचनात्मक प्रयोग किये, जिसकी प्रशंसा सभी करते हैं। साथ ही बतौर पत्रकार अपने को भी गरियाने में यशवंत कोई कोर कसर नही छोड़ते। जेल जाने पर ‘जानेमन जेल’ किताब लिख मारी। वह किताब भी एक जेल याफ्ता पत्रकार की स्वीकारोक्ति स्वागत योग्य थी। बहरहाल, यशवंत पर हुए हमले की निंदा की जानी चाहिए और हमले के आरोपी को सजा मिलनी चाहिए। पत्रकार कहे जाने वालों का एक निर्भीक पत्रकार पर हमला बेहद शोचनीय है। यशवंत की धाकड़ लेखनी सच उगलती रहे, और ये घना कोहरा छंटे…. आमीन!

उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल की एफबी वॉल से.

xxxx

विकास सिंह डागर : कई दिनों पहले भड़ास वाले यशवंत जी पर दो मानसिक दिवालिया तथाकथित पत्रकारों ने दिल्ली प्रेस क्लब में हमला कर दिया था।  हमला तो अकेले यशवंत जी पर हुआ लेकिन उसकी चोट शायद उन तमाम पत्रकारों को लगी जो मेहनत और ईमानदारी से अपने पेट का गुजारा कर रहे हैं। लेकिन इस घटना पर दुःख जताने वाले कम हैं, दिवाली मनाने वाले ज्यादा। कारण है यशवंत सिंह की कलम, जो आये दिन मीडिया में बैठे दलालों पर वार करती रहती है। किसी बड़े चैनल का सम्पादक हो, कोई जिले का उगाहीबाज स्टिंगर हो या रात दिन मेहनत करने वाले पत्रकारों की तनख्वाह मारने वाले मालिक। यशवंत लगातार ऐसे लोगों की पोल भड़ास डॉट कॉम के जरिये खोलते रहे हैंं और यही कारण है कुछेक पत्रकारों को छोड़कर बाकी सभी इस शर्मनाक कांड पर चुप्पी साधे हुए हैं।

मौजूदा समय मे पत्रकारिता में कुछेक ही लोग हैं जो अपने ही पेशे में फैल रही कुरूतियों के खिलाफ लिखते बोलते हैं। अगर ऐसे में सबसे बड़े भड़ासी और भड़ासियों की आवाज़ यशवंत जी पर हमला होता है तो कहीं ना कहीं हम जैसे लोग जो अपने घर की कुरूतियो से लड़ रहे हैं, उन्हें झटका लगना लाजमी है। ऐसे समय में यशवंत सिंह का साथ देना और आरोपियों का बहिष्कार कर उन्हें सजा दिलवाना हमारा कर्तव्य है। साथ ही मैं उन लोगों को सलाह दूँगा जो इस कायराना काँड पर खुशी जता रहे हैं कि यशवंत सिंह की दुश्मनी आप लोगों से नहीं थी, उन्होंने आपकी कुरूतियों को उजागर किया, जिसकी खुन्नस तुम लोग दिमाग मे लिए बैठे हो।

लेखक विकास सिंह डागर एक टीवी चैनल के रिपोर्टर हैं.

ये हैं दोनों हमलावर…

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

Anoop Gupta : पत्रकार यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो लिख कर कीजिये, बोल कर कीजिए, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरूरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरूरत है।

यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं।

ये हैं दोनों हमलावर…

हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है… देश के सभी बागी पत्रकारों से मेरी अपील है की यशवंत सिंह पर हुए हमले के विरोध में दिल्ली के प्रेस क्लब पर सब लोग एक साथ आये और हमलावरों के खिलाफ मोर्चा खोले जिससे कभी कोई और यशवंत सिंह पर हमला करने की जुर्रत ना कर सके. में अनूप गुप्ता संपादक दृष्टान्त लखनऊ हर तरह से यशवंत सिंह के साथ थे, है और रहेंगे.

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ से प्रकाशित चर्चित मैग्जीन दृष्टांत के प्रधान संपादक हैं.

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हे ईश्वर, हमलावर भुप्पी और अनुराग को क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं..

Shrikant Asthana : प्रेस क्लब आफ इंडिया परिसर में यशवंत पर हमला हुए कई दिन बीत चुके हैं। अपराधियों की पहचान भी सबके सामने है। फिर भी न पुलिस कार्रवाई का कुछ पता है, न ही इनके संस्थानों की ओर से। क्या हम बड़ी दुर्घटनाओं पर ही चेतेंगे? कौन लोग इन अपराधियों को बचा रहे हैं? वैसे भी, कथित मेनस्ट्रीम मीडिया के बहुत सारे कर्ता-धर्ता तो चाहते ही हैं कि वे यशवंत की चटनी बना कर चाट जाएं। इस श्रेणी से ऊपर के मित्रों-शुभचिंतकों से जरूर आग्रह किया जा सकता है कि वे उचित कार्रवाई के लिए दबाव बनाएं। अपनी फक्कड़ी में यशवंत किसी को अनावश्यक भाव देता नहीं। लगभग ‘कबीर’ हो जाना उसे यह भी नहीं समझने देता कि यह 15वीं-16वीं शती का भारत नहीं है। First hand account of attack on Yashwant Singh : https://www.youtube.com/watch?v=MgGks6Tv2W4 I’m very thankful to friends who have shown deep concern about the incident and are likely to help create due pressure.

Surendra Grover : पत्रकारों के साथ आये दिन होने वाली #मारपीट और उनकी हत्याओं से कई दिनों से सदमे की स्थिति में हूँ.. पिछले दिनों तो गज़ब हुआ जब पत्रकारिता का लबादा ओढ़े दो लोगों ने छोटे छोटे पत्रकारों की तकलीफ सबके सामने रखने वाले पत्रकार Yashwant Singh पर हमला कर दिया.. यानी कि अब पत्रकारिता लायजनिंग से होते हुए गुण्डागर्दी तक पहुंच गई है.. हे ईश्वर, उन्हें क्षमा करना, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं…

ये हैं दोनों हमलावर…

Sanjay Yadav : कलम के धनी Yashwant Singh भाई साहब पर हमला हुए कई दिन हो गए. यशवंत भाई को पिछले दो साल से पढ रहा हूँ और देख ऱहा हूँ. उनका संघर्ष अपनी पत्रकार बिरादरी के लिए है. मैं कोई पत्रकार नहीं हूँ. दिल्ली में अकेला रहकर नौकरी करता हूँ और yashwant भाई साहब से कभी मिला नहीं. पर मुझे पता नही क्यों ये लगता है कि कभी जरूरत पड़ी तो ये बंदा आधी रात को भी मेरे साथ खडा होगा. जबसे भाई साहब पर हमला हुआ, मैं बहुत परेशान था. अच्छा लगा कि लोग इनके साथ खडे हैं. पर कुछ लोग लिखते हैं कि yashwant की विचारधारा अलग है. ज़हां तक मैँ यशवंत भाई को समझा हूँ, इनकी एक ही विचारधारा है, और वो है इंसानियत. यशवंत भाई यारों के यार हैं. जब ये किसी के साथ खडे होते हैं तो ना तो उसकी विचारधारा देखते हैं और ना ही उसका कद-पद.

चन्द्रहाश कुमार शर्मा : यशवंत सिंह किसी राजनीतिक पार्टी का चोला पहने होते, तो न आवाज़ बुलंद होती? साथियों, आज मैं बात कर रहा हूं एक ऐसे निडर, निर्भीक व धारदार कलम के धनी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से निकले देश के नामी पत्रकार जो देश के हरएक नागरिक, यहाँ तक की मीडियाकर्मियों पर भी जब-जब जुल्म होते हैं, वह बड़ी प्रमुखता से अपने लोकप्रिय न्यूज़ पोर्टल भड़ास फ़ॉर मीडिया में प्रकाशित करते हैं। हुआ कुछ यूं कि… एक सप्ताह पहले वह प्रेस क्लब ऑफ इंडिया पहुंचे। वहां दो संकीर्ण विचारधारा के पत्रकार भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी उनकी तारीफ में पुल बांधें। जब यशवंत बाहर निकलने लगे, तब उसी भुप्पी और त्रिपाठी ने उन पर हमला बोल दिया। यशवंत सिंह काफी चोटिल हुए। जब सोशल मीडिया पर उन्होंने अपना दर्द बयां किया, तो सभी हिल गए। इस घटना के इतने दिन बीत जाने के बाद भी न सरकार सख्त है, न पत्रकार। यशवंत सर में एक खूबी रही है कि वह किसी राजनीतिक पार्टी को सपोर्ट नहीं करते और न ही उनके एहसान तले दबते हैं। यदि वह ऐसा किये होते तो लगातार टीवी पर खबरें चलती और यह मामला तूल पकड़ लिया होता। (चंद्रहाश कुमार शर्मा, यूपी व बिहार प्रभारी- भोजपुरिया बयार न्यूज़ पोर्टल)

वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत अस्थाना, सुरेंद्र ग्रोवर, संजय यादव और चंद्रहाश कुमार शर्मा की एफबी वॉल से.

ये भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

एक ने कहा- ‘बड़े-बड़ों की फटी पड़ी है लेकिन इस यशवंत के सुर-लय में कोई फर्क नहीं आया’। एक मीडिया समूह के मालिक का चमचा और मैनेजमेंट का आदमी लगा रहा था, बोला- ‘हम लोगों ने तो आफिस के हर सिस्टम से भड़ास ब्लॉक करवा दिया है’। एक बेवड़ा कहने लगा कि हिम्मत तो देखो यशवंत की, बेलगाम इतना है कि नीता अंबानी तक के बारे मे भी लिखने से नहीं डरता। एक मोटा आसामी बोला- ‘बड़ा वाला लंकेश है यशवंत, इसे तो जान से मारना चाहिए था।’

ये हैं दोनों हमलावर…

इनकी बातें सुनकर लगा कि सच लिखने वाले निर्भीक पत्रकारों की आवाज बंद करने के लिए न सिर्फ अंबानी-अडानी के चैनल इस्तेमाल हो रहे हैं बल्कि टुच्चे और दलाल किस्म के पत्रकारों को भी निडर पत्रकारों को डराने धमकाने के लिए मारने-पीटने की सुपारी दी जा रही है। सरकार के भोपू चैनल हों या भुप्पी जैसे टुच्चे और दलाल पत्रकार, इन्हें कहीं न कहीं से सच लिखने वाले यशवंत सिंह जैसे पत्रकारों को डरा कर खामोश करने की सुपारी दी जा रही है।

उधर, लखनऊ के कई पत्रकार संगठनो ने बैठक की। उत्तर प्रदेश जिला मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में आधा दर्जन पत्रकार संगठनों के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत की। पत्रकारों ने यशवंत सिंह के हमलावरों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किये जाने की मांग की।

नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकारिता में ‘सुपारी किलर’ और ‘शार्प शूटर’ घुस आए हैं, इनकी रोकथाम न हुई तो सबके चश्मे टूटेंगे!

Rajiv Nayan Bahuguna : दिल्ली प्रेस क्लब ऑफ इंडिया परिसर में एक उद्दाम पत्रकार यशवंत सिंह को दो “पत्रकारों” द्वारा पीटा जाना कर्नाटक में पत्रकार मेध से कम चिंताजनक और भयावह नहीं है। दरअसल जब से पत्रकारिता में लिखने, पढ़ने और गुनने की अनिवार्यता समाप्त हुई है, तबसे तरह तरह के सुपारी किलर और शार्प शूटर इस पेशे में घुस आए हैं। वह न सिर्फ अपने कम्प्यूटर, मोबाइल और कैमरे से अपने शिकार को निशाना बनाते हैं, बल्कि हाथ, लात, चाकू और तमंचे का भी बेहिचक इस्तेमाल करते हैं।

इस पेशे में इनकी उपस्थिति वास्तविक श्रम जीवी पत्रकारों के लिए राजनैतिक और आर्थिक धन पशुओं से अधिक भयावह है। इनकी रोकथाम न हुई, तो बारी बारी सबके हाथ, पाँव चश्मे तथा नाक तोड़ेंगे, जैसे यशवंत की तोड़ी है। इनका मुक़ाबला लिख कर, बोल कर तथा जूतिया कर करना अपरिहार्य है।

उत्तराखंड के वरिष्ठ और चर्चित पत्रकार राजीव नयन बहुगुणा की एफबी वॉल से.

भड़ास संपादक यशवंत पर हमले को लेकर धीरेंद्र गिरी, पंकज कुमार झा और शैलेंद्र शुक्ला की प्रतिक्रियाएं कुछ यूं हैं…

Dhirendra Giri : बेबाक शख्सियत है Yashwant Singh जी…. फ़र्ज़ी लोग इस वज़न को सह नही पाते… खैर उन्होंने कई दफा टुच्चो को सहा है। आगे भी वह हमेशा की तरह मज़बूत ही दिखाई देंगे । इस आक्रमण की घोर निंदा पढ़ने लिखने और चिंतन करने वाली पूरी बिरादरी को करनी चाहिए।

पंकज कुमार झा : मीडिया के एजेंडा आक्रमण के हमलोग भी ऐसे शिकार हो जाते हैं कि कोई घोषित अपराधी की हत्या पर पिल पड़ते हैं जबकि अपने निजी सम्पर्क के लोगों, मित्रों तक के साथ हुए किसी आक्रमण तक पर ध्यान नही जाता. गौरी लंकेश की हत्या पर होते वाम दुकानदारी के बीच ही मित्र Yashwant Singh पर प्रेस क्लब में आक्रमण की ख़बर आयी. कोई भुप्पी और किसी त्रिपाठी ने दारू के नशे में इस करतूत को अंजाम दिया. दोनों शायद किसी ख़बर के भड़ास पर छापे जाने से नाराज़ थे. आइए इस हरकत की भर्त्सना करें और अगर कर पायें तो दोषियों को दंडित कराने की कोशिश हो. सभ्य समाज में ऐसा कोई कृत्य बिल्कुल भी सहन करने लायक नही होनी चाहिए.

ये हैं दोनों हमलावर…

Shailendra Shukla : यशवंत भाई पर हमला यानी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के चौथे स्तम्भ पर हमला..  भारत वर्ष में ऐसा माना जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। अगर ये सही है तो यशवंत भाई और भड़ास चौथे स्तम्भ के स्तम्भ है। भाई के ऊपर कुछ तथाकथित पत्रकारों ने हमला किया और वह भी भरोसे में लेकर। यशवंत भाई… यानी अगर मीडिया आपके साथ गलत कर रहा है तो उसके खिलाफ खड़ा होने वाला एकमात्र इंसान… कुछ छुटभैये किश्म के तथाकथित फर्जी पत्रकारों ने उनके साथ जो गुस्ताखी की है उसकी सजा उन्हें कानून पता नहीं कब देगा लेकिन अगर मुझे भविष्य में ऐसा अवसर मिलता है जिसमें उन सज्जनों से मुलाकात होती है तो उनकी खातिरदारी मैं जरूर करूँगा… उसके बदले इस देश का कानून जो भी सजा मेरे लिए तय करेगा मैं उसे सत्य नारायण भगवान का प्रसाद समझकर ग्रहण कर लूंगा। अब बात यशवंत भाई और उन तथाकथित पापी किश्म के पत्रकारों की… अगर उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई को धोखा दिया तो वे गलत हैं… उन्हें लग रहा है कि उन्होंने यशवंत भाई पर हमला किया तो भी वो गलत हैं … किसी दीवार पर मैंने लिखा हुआ एक वाक्य पढ़ा था ….

“अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाते हो तो ये आपकी जीत नहीं है… बल्कि ये सोचो सामने वाले को आप पर कितना भरोसा था जिसे आपने तोड़ दिया”

खैर यशवंत भाई से बात की मैन भावुक होकर बदले की भावना प्रकट की और मैं आज नहीं तो कल उस चूहे तक जरूर पहुँच जाऊंगा… लेकिन भैया हो सकता है आप राम हो पर मैं नहीं…. मैंने लक्ष्मण जी की एक बात बिलकुल गाँठ बांध रखी है….

“जो ज्यादा मीठा होता है.. वह अपना नाश कराता है।
देखो तो मीठे गन्ने को.. कोल्हू में पेरा जाता है।।”

मैं यशवंत भाई पर हुए हमले की निंदा नहीं करूंगा… भर्तसना नहीं करूँगा… लेकिन अगर मौका मिला तो “जैसे को तैसा” वाला मुहावरा हमलावरों के साथ जरूर चरित्रार्थ करूँगा। अगर मेरे फेसबुक वॉल या किसी अन्य माध्यम से ये मैसेज उन दुर्जनों तक पहुचता है तो वो खुलकर मेरे सामने आ सकते है। वह इस बात का विशेष ध्यान रखें कि अगर वो धूर्त हैं… ठग हैं… मीठी मीठी बातों में मुझे फंसा लेंगे जैसे यशवंत भाई के साथ उन्होंने किया तो ऐसे मत सोचें… क्योंकि मैं वाकई में महाधूर्त… हूँ खासकर उन दुर्जनों से तो ज्यादा… पता नहीं मेरे इस पत्र को भड़ास अपने पास जगह देगा कि नहीं लेकिन अगर देता है तो अच्छा लगेगा… मेरा मैसेज दुर्जनों तक जल्दी पहुचेंगे.…. क्योंकि सफाई कर्मचारी से लेकर मुख्य संपादक तक सब भड़ास पढ़ते हैं… अगर हमलावर जरा सा भी मीडिया से जुड़े होंगे तो भड़ास जरूर पढ़ते होंगे…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘4पीएम’ में छपी भड़ास संपादक यशवंत सिंह के हमलावरों की गिरफ्तारी न होने की खबर

धोखे से यशवंत पर किया गया हमला, हमलावर भी पेशे से पत्रकार, खुलेआम घूम रहे हैं हमलावर
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर हमला होने के एक सप्ताह बाद भी हमलावर पुलिस की गिरफ्त से दूर हैं। हमलावर खुलेआम घूम रहे हैं और पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है। वहीं हमलावरों की गिरफ्तारी न होने से पत्रकारों में रोष है। पत्रकारों का कहना है कि जब प्रेस क्लब जैसी जगह पर पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं तो और जगहों पर उनकी सुरक्षा भगवान भरोसे ही होगी। पत्रकारों ने हमलावरों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी की मांग की है।

प्रेस क्लब में यशवंत सिंह शाम के समय बैठे हुए थे। दोनों हमलावर भूपेंद्र और अनुराग त्रिपाठी भी अलग टेबल पर मौजूद थे। प्रेस क्लब के भीतर ये दोनों यशवंत को देखने के बाद अपनी टेबल से उठकर उनकी टेबल पर आ गए। वहां बैठकर यशवंत की तारीफें किए जा रहे थे, उनसे गले मिल रहे थे। इसके कुछ ही देर बाद प्रेस क्लब से बाहर निकलने पर दोनों आरोपियों ने यशवंत पर धोखे से हमला कर दिया। इस हमले में यशवंत को काफी चोटें आयी है।

बताया जा रहा है कि यशवंत ने कुछ साल पहले भूपेन्द्र और अनुराग के कुछ कारनामों की पोल भड़ास पर खोली थी। वे दोनों इसी बात से नाराज थे। वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्ल ने फेसबुक पर इस हमले की निंदा की है। उन्होंने लिखा है कि यशवंत सिंह पर हुए हमले पर पत्रकार जगत चुप है। असहिष्णुता को लेकर हल्ला-गुल्ला करने वालों ने भी एक शब्द नहीं कहा, जबकि यशवंत पर हमला सही मायने में एक जमीनी पत्रकार पर हमला है।

ये हैं दोनों हमलावर…

पत्रकारों की अपनी रोजी-रोटी और उसकी अपनी अभिव्यक्ति के लिए सिर्फ यशवंत सिंह ही लड़ रहे हैं। उन्होंने मीडिया हाउसेज और सत्ता की साठगांठ की परतें उजागर की हैं, लेकिन अब न तो वामपंथी न दक्षिणपंथी कोई भी संगठन उनके साथ खड़ा हो रहा है। बहरहाल कोई हो न हो लेकिन मैं इस साहसी और कर्मठ पत्रकार यशवंत सिंह पर हुए हमले की कड़ी भत्र्सना करता हूं। मैं फेसबुक के अन्य साथियों से भी अपील करूंगा कि वे साथी यशवंत पर हुए हमले की निंदा करें और सरकार पर दबाव डालें कि वह हमलावरों के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई करे।

वरिष्ठ पत्रकार अंबरीष कुमार ने भी यशवंत पर हमले की निंदा की है। उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के उपाध्यक्ष संजय शर्मा ने भी हमले की निंदा करते हुए हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग की है। ऐसे ही तमाम पत्रकारों ने इस हमले की निंदा करतेहुए हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग की है।

साभार : 4पीएम, सांध्य दैनिक, लखनऊ

इन्हें भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशवंत की गुरिल्ला छापामार पत्रकारिता और प्रेस क्लब में दो दलाल/भक्तनुमा पत्रकारों का हमला करना…

Anil Jain : गौरी लंकेश की हत्या के विरोध में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित सभा में कुछ वामपंथी नेताओं के आ जाने पर कुछ ‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार मित्रों के पेट में काफी दर्द हुआ, जिसका इजहार करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि प्रेस क्लब वामपंथियों और नक्सलियों का अड्डा बनता जा रहा है। लेकिन उसी सभा के दो दिन पहले प्रेस क्लब में न्यूज पोर्टल भडास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर हुए हमले को लेकर प्रेस क्लब के पदाधिकारियों सहित किसी ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की। प्रेस क्लब के ‘नक्सलियों का अड्डा’ बन जाने की काल्पनिक चिंता में दुबले हुए पत्रकार मित्रों की संवेदना भी पता नहीं कहां चली गई दक्ष-आरम और ध्वज प्रणाम करने!

सब जानते हैं कि यशवंत सिंह गुरिल्ला छापामार की तरह काम करते हुए अपने पोर्टल के माध्यम से दुर्दांत मीडिया घरानों के मालिकों और उनके पाले हुए दलालनुमा संपादकों तथा पत्रकारों की गुंडागर्दी को आक्रामक तरीके से जब-तब उजागर करते रहते हैं। इसीलिए कई बार उन पर हिंसक हमले हो चुके हैं और एक बार तो वे लंबी जेल यात्रा भी कर चुके हैं। पिछले दिनों प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में भी दो दलाल और भक्तनुमा पत्रकारों ने यशवंत पर उनकी लिखी किसी पुरानी खबर को लेकर उनके साथ मारपीट की जिसमें उन्हें गंभीर चोंटे आईं और उनका चश्मा भी टूट गया।

ये हैं दोनों हमलावर…

हालांकि इस घटना के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रेस क्लब भक्तनुमा पत्रकारों या शाखा बटुकों का अड्डा बन गया है लेकिन ऐसी घटनाओं की निंदा तो होनी ही चाहिए। मैं घटना का चश्मदीद नहीं हूँ। कुछ लोग इस घटना में दोनों पक्षों की गलती बता रहे हैं। अगर ऐसा है तो प्रेस क्लब को अपने स्तर पर इस घटना की जांच करके जो भी दोषी हो उसके खिलाफ कार्रवाई करना चाहिए।

पत्रकार अब दलाल ही नहीं बल्कि कातिल भी हो गए हैं….

Chaman Mishra : भड़ास4मीडिया के संपादक Yashwant Singh सर, पर दिल्ली में हमला हुआ। ये हमला किसी और ने नहीं पत्रकारों ने ही किया। अब भी आपको लगता है, कि पत्रकार ‘दलाल’ हैं, नहीं अब वो ‘क़ातिल’ भी हैं। पूरी हिंदी न्यूज़ इंडस्ट्री में ऐसा कौन है जो भड़ास को नहीं पढ़ता। बड़े से बड़ा, छोटे से छोटा और अदना पत्रकार या फिर पत्रकार बनने की प्रक्रिया में जो हैं, वो भी भड़ास को पढ़ते हैं, और हर दिन पढ़ते हैं। फिर भी मीडिया इंडस्ट्री भड़ास के संपादक के साथ उस तरह नहीं खड़ी है जैसे होना चाहिए। कोई नहीं ‘जेल जानेमन’ ऐसे ही गर्दिश के दिनों की उपलब्धि थी। हमें कुछ और रचानात्मक मिलेगा। लेकिन मैं तो कहता हूं, सर उन हमलावर गधों को जेल में जरूर डलवाइए, और उनका जेल वाला फ़ोटो भड़ास पर लगाइए। उसे Sponser भी कराइए।
इससे पहले-
गौरी लंकेश को मार दिया।
पंकज मिश्रा पर गोली चला दी।
इंडिया टीवी के रिपोर्टर सुनील को खूब पीटा।
फिर भी सब-सरकारें चुप्प हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल जैन और युवा पत्रकार चमन मिश्रा की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पढ़िए, यशवंत पर हमले को लेकर गीतकार नीलेश मिश्रा ने क्या कहा

इंटोलरेंस किसी एक विचारधारा में थोड़े है, आपकी और मेरी रगों में है : नीलेश

Neelesh Misra : प्रेस क्लब के गेट पर हुए वरिष्ठ पत्रकार Yashwant Singh पर हुआ हमला बेहद निंदनीय है। ऐसा कल आपके, हमारे, किसी के साथ हो सकता है। किसी की बात से इत्तेफ़ाक न रखना तो उसे शारीरिक चोट पहुँचाना, या चोट पहुँचे ऐसी इच्छा जताना, ये एक आम बात बन गयी है।

कड़वी सच्चाई ये है कि इंटोलरेंस किसी एक विचारधारा में थोड़े है, आपकी और मेरी रगों में है चाहे आपकी सोच कुछ भी हो। हम वो बदतमीज़ियाँ करने में दो बार नहीं सोचते जो शायद कुछ वर्षों पहले तक अकल्पनीय थीं। यशवंत, उम्मीद है आपकी एफ़आइआर दर्ज की गयी होगी और उम्मीद है उस पर दिल्ली पुलिस कोई कार्यवाही करेगी।

जाने-माने गीतकार, स्टोरी टेलर और पत्रकार नीलेश मिश्रा की एफबी वॉल से.

ये हैं दोनों हमलावर…

इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

खबर छापे जाने की नाराजगी में फिर एक पत्रकार हुआ जानलेवा हमले का शिकार

हमले के शिकार लखनऊ के पत्रकार राजेंद्र.

लखनऊ से जानकारी मिली है कि खबर छापने की कीमत एक वरिष्ठ पत्रकार को चुकाना पड़ा है. आरटीओ आफिस में करप्शन की खबर छापे जाने से नाराज़ आरटीओ कर्मियों ने वरिष्ठ पत्रकार पर लाठी, डंडों और ईंट से जानलेवा हमला कर दिया. पीड़ित पत्रकार हैं राजेन्द्र राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं. उन पर आरटीओ कार्यालय परिसर में हुआ हमला. पत्रकार राजेंद्र गंभीर रूप से घायल हैं. थाना सरोजनीनगर इलाके में है आरटीओ कार्यालय.

ज्ञात हो कि दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडिया में भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह पर हमला दो उन लोगों ने किया जो खुद के बारे में भड़ास पर छपी पोलखोल खबरों से नाराज थे. ये दोनों हमलावर पहले पत्रकार थे लेकिन इनकी दलाली-ब्लैकमेलिंग की घटनाओं के भड़ास पर खुलासे के बाद उन्हें अब काफी समय से नौकरी नहीं मिल रही है.

मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के उपाघ्यक्ष संजय शर्मा ने कहा- ”हमको उम्मीद है एफआईआर होने के बाद पत्रकार पर हमला करने वाले आरटीओ को सरकार तत्काल गिरफ़्तार करायेगी और उनको मुख्यालय से अटैच करेगी”।

उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय के मान्यता प्राप्त पत्रकार राजेंद्र पर आरटीओ कार्यालय में हुए हमले की निंदा करते हुए उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार सुधीर कुमार सिंह ने आरोपी कर्मचारियों को बर्खास्त किए जाने की मांग की. साथ ही पत्रकार की सुरक्षा के साथ हमलावर कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्यवाही किए जाने की मांग की है.

बिहार प्रेस मेंस यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष एस.एन.श्याम ने कहा- ”लखनऊ में पत्रकार राजेंद्र पर प्राणघातक हमला. हमलावरों के पीछे पड़िए योगी सरकार. मोदी जी, बनाइये पत्रकार सुरक्षा कानून. कब तक बहेगा पत्रकारों का खून”.

फेसबुक पर Shashank Srivastava लिखते हैं : ”योगी जी जरा ध्यान इधर भी। रामराज में पत्रकार को अधिकारी बना रहे है अपना शिकार। क्या भाजपा सरकार में अब सच लिखने का ये परिणाम होगा। राजधानी में सच लिखना एक और वरिष्ठ पत्रकार को पड़ा भारी। सत्ता के मद में चूर आरटीओ ने खबर लिखने वाले प्रहरी मीमांसा के संपादक राजेंद्र पर अपने गुर्गों द्वारा करवाया हमला। लोकतंत्र में अब सच कहने की यही कीमत चुकानी होगी क्या।”

युवा पत्रकार Nishant Chaurasiya फेसबुक पर लिखते हैं : ”फिर मारा गया पत्रकार… राजधानी लखनऊ में… शुक्र है जान से नहीं गया… खून बहा और हड्डी टूटी… अब साबित कर दो दल्लों कि दलाली करने गए थे वहां पर, क्योंकि पत्रकारों को डर गुंडों बदमाशों से ज्यादा मठाधीशों से है! लेखनी से अपनी पहचान बना चुके राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार राजेन्द्र (प्रहरी मीमांसा) पर आज RTO कार्यालय में भ्रष्टाचार की खबर लिखने पर जान लेवा हमला हुआ… मामला सरोजिनी नगर थाना क्षेत्र का है…. थाने से मेडिकल करवाने पहुचे राजेंद्र जी… फोन से बात करने के बाद पता चला कि सर पर काफी चोट आई है! राजेन्द्र जी से संपर्क 9415054807 के जरिए किया जा सकता है.”

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

शैतानी ताकतों के हमले में चश्मा टूटा… ये लो नया बनवा लिया… तुम तोड़ोगे, हम जोड़ेंगे.. : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : चश्मा नया बनवा लिया। दो लम्पट और आपराधिक मानसिकता वाले कथित पत्रकारों भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी द्वारा धोखे से किए गए हमले में चश्मा शहीद हो गया था, पर मैं ज़िंदा बच गया। सो, नया चश्मा लेना लाजिमी था। वो फिर तोड़ेंगे, हम फिर जोड़ेंगे। वे शैतानी ताकतों के कारकून हैं, हम दुवाओं के दूत। ये ज़ंग भड़ास के जरिए साढ़े नौ साल से चल रही है। वे रूप बदल बदल कर आए, नए नए छल धोखे दिखलाए, पर हौसले तोड़ न पाए।

न जाने क्या मंजूर है नियति को, न जाने क्या योजना है नेचर की। मैं सिर्फ निमित्त मात्र हूं। जेल, मुकदमे, हमले, धमकी, पुलिस, कोर्ट कचहरी, आर्थिक तंगी… पर इरादे हैं कि दिन ब दिन चट्टानी होते गए। हमने सबको क्षमा किया। मेरा निजी बैर किसी से नहीं। पर सच की मशाल तो जलती रहेगी, सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी, कुकर्मों का भाँडा तो फूटेगा। आप सभी साथियों का प्यार और समर्थन मेरे साथ है। वैसे नया वाला चश्मा कैसा है, बताएं तो जरा आप लोग 🙂

भड़ास संपादक यशवंत के उपरोक्त स्टेटस पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Arsh Vats Are Yashwant Singh sir g u r bravo aapke bhi 1 crore anuyayi h aang laga denge aang
Yashwant Singh आग नहीं, प्रेम लगाएंगे हर ओर 🙂

Jyoti Singh सर नया चश्मा मुबारक हो। और एक सलाह आगे से कोई चश्मे पे अटैक करे तो आप उसके दांत तोड़ देना।
Yashwant Singh तोड़ने का काम प्रकृति के हवाले। अपन तो कलम से लड़ेंगे और कलम से तोड़ेंगे 🙂

Vinay Maurya Sinner हम तोहरे साथ हई भईया। ई अउर बात हव की छोट भाईयन के भूल गईला …संजय शर्मा भईया के तरे
Yashwant Singh दिल मे हउआ भाय। कहा त करेजवा फाड़ के देखायीं 🙂

प्रवीण श्रीवास्तव उ दूनो भुप्पी और भुप्पा की तस्वीर हो तो देखाईये… देखल जाए शकल दुनहुँन क
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास समर्थकों पर छोड़ता हूं।

Vikash Rishi बढ़िया चेहरे पर गंभीरता दिख रही है कुछ ठोस करना होगा।
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Brijendra Singh दाढ़ी तो तभी बनेगी जब…
Yashwant Singh अरे नहीं। कुछ चीजें प्रकृति पर भी छोड़ देनी चाहिए। हम लोग कलम वाले हैं। उनके जैसे आपराधिक मानसिकता वाले नहीं। क्षमा किए जाने योग्य हैं वो ताकि खुद आत्म मंथन कर सकें वो। 🙂

Soban Singh चश्मा अच्छा है. आपकी फिक्र रही दो दिन. थोड़ा दाढ़ी साड़ी भी बन जाती तो भुप्पी और त्रिपाठी का कुछ और भला हो जाता।

Rajeev Tewari इस चश्मे में ज्यादा प्रबुद्ध दिखे हैं। सरोकार की पत्रकारिता तो होकर रहेगी। बहुत बधाई, shubhkamnayen

Vivek Dutt Mathuria भाई ज़म रहे हो और जमे रहो! आपके साथ पूरा कारवां है!

Rehan Ashraf Warsi विचारों का मतभेद यहाँ तक आ पहुँचा, दुःखद है। ये सब कहाँ ले जाएगा, और कब रुकेगा।

Nirupma Pandey वो फिर तोड़ेगें, हम फिर जोड़ेगें

Yuvneet Rai Chaudary Desh badh raha hai …..apke patrkar mitra Kuch jyda aage badh gye

Bhoopendra Singh आपने ऐतिहासिक काम किया है। पीढ़ियां ज़रूर याद करेंगी

Aditya Singh Bhardwaj चश्मा आप गांधीवादी रखिये 🙂

Ansh Sumit Sharma जबरदस्त चश्मा है भैया जी।

Nivedita Patnaik Never mind… change your glasses but never the visions…. thru which you made people to see what is what.

Gandhi Mishra ‘Gagan’ चश्मा क्या खरीदे पिछले चार दिनों की खोयी आंख मिल गयी.. अब उसकी खाट खड़ी करने से इन्हें कौन रोक सकता। इतनी बड़ी हमदर्दों व समर्थकों की टीम जो ठहरी… उठाओ ठाकुर साहब कलम और रगड़कर मटियामेट कर दो उन्हें जो अंधा बनाकर देश को कई महत्वपूर्ण सूचनाओं से दूर रखना चाह रहे थे जिससे उनकी भविष्य की मंशा पुनः होश नहीं संभाल पाए।

Mohanraj Purohit नया वाला भी अच्छा हैं, लेक़िन पुराने वाले शहीद वाले को भी संभाल कर रखें, भुप्पी और अनुराग को याद रखने के लिए।

Anand Kumar तेरे वजह से चश्मा बदला, अफसोश नजरिया ना बदल सका, ऐ भुप्पी और अनुराग तू तो ताकत दे गया…

Arvind Tripathi दुष्टों के चिन्हांकन की दृष्टि साफ़ बनी रहनी चाहिए, बाक़ी सब ठीक है।

Deepak Srivastava गांधी जी का रूप तो आपके लेख में दिखा… किंतु भगत सिंह, आज़ाद जी , बोस , बिस्मिल जी की प्रतिक्रिया भी देखनी है

Maruf Khan Journalist Bhadas ne media ke ander ke haal btaye. jo sach me hota hai.

अनिल अबूझ सरोकारों के साथ-साथ खुद का भी खयाल भी रखिए सर! पत्रकारों की हालत देख रहे हैं? आपका जीना जरूरी है..बल्कि हर उस शख्स का जीना जरूरी है जो सच कहता है..सच लिखता है| हौसले को नमन करता हूँ|

Tahir Khan इस चश्मे से उन लोगों के कुकृत्य भी दिखेंगे जो अभी मीडिया का चोला ओढ़े किसी बिल में छिपे बैठे हैं…शानदार ..जय हिंद।

Rajnish Tara Bahute hi gazab hai bhaiya…. lage rahiye mission sachchai ke liye…

Majid Qureshi निडर और बिना डिगे पत्रकारिता के होंसले को सलाम। वैसे भी ये किस्म कम ही रह गई है। वरना तो ऐसा होने पर क़लम तोड़ देते है लोग।

Keshav Kumar अगर आप सही हो तो आपको कुछ साबित करने की जरूरत नहीं होती है। केवल आपको अपनी सच्चाई पर टिके रहना होता है, गवाही वक्त खुद देता है।

Sudhir Jagdale बिना लक्ष्य के जीने वाले इंसानों की जिंदगी कहाँ अमीर होती है, जब मिल जाती है सफलता तो नाम ही सबसे बड़ी जागीर होती है।

सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’ chashma bahut achchha hai . aap bhi bahut achchhe ho . sankalp bada hai to dikkat to rhengee

Shailesh Tiwari पुराना टूटता है तभी नया बनता है । उन दोनों को भगवान सद्बुद्धि दे यही प्रार्थना है। वैसे यह चस्मा चेहरे पर जम तो रहा है गुरु… इस हेतु उन दोनों शैतानी ताकतों के कारकुनों का आभार की एक नए चश्मे को लेने का बहाना बनने में उनका योगदान था..

Nitin Thakur चश्मा कातिल है Yashwant जी.

Amit Ahluwalia और चूंकि काले फ्रेम का है तो चश्मे कातिल से भी बचाएगा

Manvinder Bhimber ऐतिहासिक काम करते हो

Rajpal Parwa चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Sarvesh Singh आपके बेमिसाल व्यक्तित्व को प्रणाम

Rahul Amrit Raj शानदार, जानदार, जबरदस्त, भड़ास जिंदाबाद

Hitesh Tiwari चीता हो आप। और चश्मा मस्त है।

Sanjay Swadesh डरे, सहमे, बुजदिल ही ऐसी हिंसात्मक हरकत पत्रकारों के साथ करते हैं

Mafatlal Agrawal हर जोर जुल्म की टक्कर मे संघर्ष हमारा नारा है।

Madan Tiwary पहले यह बताये उन हरामियों की ठुकाई कीजियेगा या नहीं।

Ziaur Rahman आप हजारों-लाखों मीडिया कर्मियों की आवाज हो, उन सभी का प्यार, सहयोग और दुआ आपके साथ है।

Mukesh Singh बच्चे अक्सर कुछ ना कुछ तोड़ते ही रहते हैं। वैसे नया चश्मा व्यक्तित्व को और घना बना रहा है।

Narendra M Chaturvedi थोड़ा टेड़ा है…वैसे ऊपर से नीचे तक टेड़े की नगरी रहकर सब टेड़ा ही दिखता है…?

Satya Prakash Chashma mein DRISHTI ki dhaar tez ho gayee hai

Golesh Swami Very nice, god bless you. Keep it up.

अजित सिंह तोमर चश्मा और आप दोनों ही दमदार हैं सर

Ashok Anurag ये आपका बड़प्पन है यशवंत भाई, फिर भी जो हुआ वो माफ़ी योग्य नहीं था

Purushottam Asnora गुण्डे कहीं भी हो सकते हैं, पत्रकारिता में भी

Sunil Negi himate marda mardade khuda

Sushovit Sinha नए चश्मे से दुनिया बेहतर दिखेगी सर!

Rakesh Punj चश्मा सुंदर है। आप सेहतमंद रहें ईश्वर से ये दुआ है।

Santosh Singh उन लोगो को खोजा कैसे जाए

मुकुन्द हरि शुक्ल तनिक अपनी कुंडली की ग्रहदशा की विवेचना भी कर लीजिएगा।

Sadique Zaman हम सब साथ हैं दादा, लड़ेंगे

Virendra Rai लल्लनटाप बाटई

Madhvendra Kumar चश्मा आपका टूटा दिल उन दोनों का,शानदार है ये वाला चश्मा।

Narendera Kumar गजबे लुक है

Dinker Srivastava चेहरे पे एक सबक चढ़ा हुआ दिख रहा और क्या…

Ashok Aggarwal चश्में के साथ साथ हौसला भी बढिया है ।

Sudhendu Patel आपही की तरह पारदर्शी गुरू .

Dilip Clerk इंकलाब जिन्दाबाद …धन्य है आप

Rahul Chouksey चश्मा बहाना है। नज़र और नज़रिया वही रहेगा।

Syed Shakeel आप और आपका चश्मा दोनों बिंदास है दादा

Hemant Shukla … पर सच की मसाल तो जलती रहेगी … बहुत सुंदर विचार ।

Kuldeep Singh Gyani दुवाओं के दूत के साथ साथ आप युवाओं के दूत भी हैं…

Sambhrant Mishra ये चश्मा तो और जोरदार है।

Nitesh Tripathi नया चस्मा स्मार्ट बना रहा है और

Pawan Kumar Upreti शानदार चश्मा। ताकतवर व्यक्तित्व

Manoj Anuragi अच्छा है सावधान रहो

Arshad Ali Khan आप जैसे क्रांतिकारी पत्रकार के लिए यह आम बात है….

Govind Badone आपके होंसले को सलाम

Farhan Quraishi कलम में बहुत ताकत है

Nurul Islam गजब सर, ख़्याल रखिए अपना

Mahendra Singh दूसरे गांधी बनने के रास्ते पर है आप

Veernarayan Mudagl पत्रकार जगत में जलवा कायम है सर आपका

Pramod Singh सलाम है यशवंत भाई! आपके बड़प्पन को.

Vindhya Singh भइया ! तनी उन्हन लोगन के फोटू शेयर कइल जा, के हवे जानलअ जरूरी बा… बड़का भूपति बनता लोग
Yashwant Singh आप लोग ही खोजिए। मैं इन इग्नोर किए जाने लायक लोगों पर टाइम नहीं खर्च करता। ये काम भड़ास के साथियों पर छोड़ता हूं।

Sharvan Panchal अच्छा लग रहा ह ,,,,,,,आप ऐसे धूर्त लोगो के लिए पत्रकार जैसा शब्द क्यू इस्तेमाल करते ह सर
Yashwant Singh ‘कथित पत्रकार’ लिखा हूं भाई

Vipin Shrivastava ये चश्मा पहले से ज्यादा साफ दिख रहा है , यकीनन वो जितने चश्में तोड़ेंगे , नए चश्में और बेहतर क्वालिटी के क्लियर होते जाएंगे

Man Mohan Singh Achche ensan pe sab achcha lagta hai !

Avinash Singh आपके निर्भीकता और आपके व्यक्तित्व को सलाम, आपकी लेखनी , निडरता, और व्यक्तिव से बहुत कुछ सीखने को मिलता है ,

Syed Quasim चश्मा 40 + होने यानी लौंडियाहुज जो हमारे रुदौली में बचपन को कहते हैं खत्म होने की निशानी है.. इसी लिए तो मुस्कुरा कर मार देते हैं बड़े से बड़े दुश्मन को

Pawan Dubey हे क़लम के पुजारी आपकी बेबाक़ और निर्भीक अभिव्यक्ति को प्रणाम। क्षमा बड़े साहस का आभूषण है। आप को कमज़ोर लोग कमज़ोर नही कर पाएँगे।

Om Prakash Pathak आप स्वस्थ्य हो गए उसके लिए भगवान का शुक्रिया। ऐसे कमजोर लोग हमेशा टकराएंगे यह भी सही है। ऐसे चश्मा अच्छा लगा।

Shishubh Bhargava जय हो, क्रिज़ोल है या थोड़ा सामान्य कुछ भी हो आखिर आँखों पर चस्मा लगाए थोड़ी न बैठे लड़ते रहिये यशवंत जी सत्य आपके साथ है

कुंदन वत्स अब मारक बदला लीजिये

Humaira Zafar Allah aapko salamat rakhe.Aameen

Chandan Sharma चश्मा का तो ठीक है लेकिन एक नया संकल्प दिख रहा है। बनाये रखिये। 🙂

Rajendra Mishra सच साहस सरोकार! जय हो

यशवंत पर हमला करने वालों की ये है तस्वीर… याद रखें, ध्यान रखें…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दो बददिमाग और विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा यशवंत पर हमले के बाद हमारी बिरादरी को सांप क्यों सूंघ गया?

Padampati Sharma : क्या किसी पत्रकार के समर्थन में मोमबत्ती दिखाने या विरोध ज्ञापित करने के लिए उसका वामपंथी या प्रगतिशील होना जरूरी है? यदि ऐसा नहीं है तो सिर्फ पत्रकार हित के लिए दिन रात एक करने वाले यशवंत सिंह पर दो बददिमाग मानसिक रूप से विक्षिप्त कथित पत्रकारों द्वारा किये गए हमले पर हमारी बिरादरी को क्यों सांप सूंघ गया? यशवंत के बहाने पत्रकारों की आवाज दबाने का कुत्सित प्रयास करने वाले की मैं घोर निंदा करता हूं.

सच तो यह है कि उन अपराधियों के अंत्राशय पर इतने प्रहार किए जाते कि वे महीनों न सो पाते और न बैठ पाते. मगर हम जिस बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं वहां कलम ही तलवार है और मेरी ओर से सजा यही कि अगर वे दोनो शख्स मेरी फ्रेंड लिस्ट में हुए तो न सिर्फ उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दूंगा वरन ब्लाक भी करूंगा. यशवंत! डटे रहना भाई. आ गया है सोशल मीडिया का दौर. मुख्य धारा के मीडिया का यही हाल जारी रहा तो उसकी दुकान बंद होने में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा. तब यशवंत जैसे जाबांज पत्रकारों का ही वर्चस्व होगा. जुझारू पत्रकार Yashwant Singh पर हमले की निंदा करता हूँ। शायद कुछ लोग शर्म से सर झुका सकें।

(कई अखबारों और न्यूज चैनलों में खेल संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार पदमपति शर्मा की एफबी वॉल से.)

फेसबुक पर आईं कुछ अन्य प्रमुख प्रतिक्रियाएं यूं हैं…

Surendra Pratap Singh : जिस दिन यशवंत पर हमले वाली घटना घटित हुई थी उसी दिन किसी ने इस पर पोस्ट लगाई थी लेकिन किसी पत्रकार ने कोई नोटिस नहीं लिया… और, तभी लंकेश वाली वारदात हुई और लंका में लगी आग मचा हाहाकार… सभी पत्रकार बंधु अपनी अपनी बाल्टी का पानी लेकर उधर ही दौड़ लगाने लगे… फिर क्या, यशवंत जी समाचारों से गायब। धन्य हो।

Sarvesh Singh : पिछले दिनों भड़ास 4मीडिया के संपादक Yashwant Singh सर पर हमला हुआ।हमला किसी और ने नहीं बल्कि पत्रकारिता को कलंकित करने वाले दो दिमागी दिवालियों ने किया। उस हमले से जुड़ा एक वीडियो यशवंत सर ने फेसबुक पर साझा किया। इसमें उन्होंने साफ तौर पर उन दोनों को माफ़ करने की बात कही। पीत पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों और सरकार की गोद में झूलने वाले मीडिया समूह की काली करतूतों को देश के सामने निष्पक्षता और निडरता से रखने वाले यशवंत सर के प्रति मेरे मन में अनन्त सम्मान बढ़ गया है। उन्होंने उन पर हमला करने वालों को माफ किया। और कुछ ऐसी बातों का जिक्र किया जो मेरे मानस पटल पर सदैव सदैव के लिए अंकित हो गया।

ये हैं दोनों हमलावर…

यशवंत ने भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी को माफ करते हुए कहा कि “मेरे पास कलम की ताकत है सच्चे पत्रकार के लिए कलम ही सब कुछ है।कलम ही तोप होती है, कलम ही बंदूक होती है, बशर्ते उसे कलम का इस्तेमाल करने आता हो”।”प्रकृति न्याय करती है। हम कौन होते हैं न्याय करने वाले”। आपके इस वाले वीडियो को देखकर आपकी बातों को सुनकर मैं बहुत भावुक हुआ। बड़ी आसानी से आपने उन दोनों सनकी और तथाकथित पत्रकारों को माफ कर दिया। शायद यह आप जैसा बड़े और महान व्यक्तित्व वाला ही कर सकता है। एक बात तो तय है कि उन दोनों पागलों का न्याय प्रकृति ही करेगी।आप के सच्चे व निडर व्यक्तित्व का मैं हमेशा से कायल रहा हूं। पर आप की सहजता, सहनशीलता, विशाल हृदयता वाले आपके इस महान व्यक्तित्व को मैं हजार बार सलाम करता हूं। और, हां सर! चश्मा तो निर्जीव वस्तु है वह टूटेगा भी और जुड़ेगा भी। पर आप के अदम्य साहस, बेबाक सच्चाई, साफगोई को भूपेंद्र सिंह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी जैसे हजारों आसूरी प्रवृत्ति के लोग कभी दबा नहीं पाएंगे।

Dhananjay Singh : ”थोड़ा मारने दो इसे,बहुत खबरें छापता है” कहते हुए दिल्ली के प्रेस क्लब में भड़ास वाले Yashwant भाई को दो पत्रकारों ने ही पीट दिया…. जाहिर है इस घटना के गवाह भी कई एक रहे ही होंगे… निर्भीक पत्रकारिता पर खुद पत्रकारों की तरफ से हुए इस हमले की मैं निंदा करता हूँ….खम्भों की यह लड़ाई निंदनीय है… आप भी छापिये न भाई… असहमति है तो किसी को पीट देंगे? ऐसे ही कमजोर पलों में निहायत ही कमजोर लोग पिस्टल भी निकाल लेते हैं और परिणाम अत्यंत भयानक होता है… आशा है देश की राजधानी के प्रेस क्लब में हुई इस घटना के विरोध में तमाम एक्टिविस्ट्स से लगायत प्रधानमंत्री भी संज्ञान लेंगे.. ऐसी हरकत निंदनीय है, अभी निंदा करिए, सिर्फ देखिए और इंतजार करिए की रणनीति पर न चलिए…

पूरे मामले को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ सकते हैं….

 

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशवंत किसी विचारधारा-गिरोहबाजी के आधार पर किसी को रियायत नहीं देते, इसलिए गिरोहबाजों ने चुप्पी साध रखी है!

Vivek Satya Mitram : प्रेस क्लब में हाल ही में जमा हुए पत्रकारों! इस मामले पर कहां जुटान है? इसका भी खुलासा हो जाए। वैसे भी ये हमला तो प्रेस क्लब के बाहर ही हुआ। एक वरिष्ठ पत्रकार पर कुछ ‘गुंडा छाप’ पत्रकारों द्वारा। फिर भी ना तो प्रेस क्लब के पदाधिकारियों को फर्क पड़ा ना ही साथी पत्रकारों को। Yashwant Singh को करीब से जानने वाले जानते होंगे कि वो पिछले एक दशक से गौरी जैसी ही निर्भीक पत्रकारिता कर रहे हैं। महज़ इसलिए कि वो इस हमले में ज़िंदा बच गए, पत्रकारों को उनके लिए न्याय नहीं चाहिए?

वाह रे क्रांतिकारी पत्रकारगण! अबे खुलके कहो ना कि तुम गौरी के लिए नहीं, किसी पत्रकार के लिए नहीं, किसी दमन के ख़िलाफ़ नहीं, राजनीति करने के लिए जमा हुए थे। और, यशवंत जैसा पत्रकार जो किसी को भी विचारधारा और गिरोहबाजी के आधार पर कोई रियायत नहीं देता उस पर हमला तुम्हारे लिए कोई महत्व नहीं रखता। सुनो, तुम्हारे सेलेक्टिव, दिखावे की क्रांति लोग समझते हैं, इसलिए सोशल मीडिया पर अपनी एक ख़ास किस्म की ब्रांडिंग करते हुए ये भी याद रखा करो कि लोग कभी तो हिसाब मांग सकते हैं तुम्हारे ढ़ोंग का। बाई द वे, मैं जानता हूं तुम पत्रकार नहीं हो!

(आजतक समेत कई न्यूज चैनलों में कार्यरत रहे और अब एक सफल उद्यमी के तौर पर स्थापित विवेक सत्य मित्रम की एफबी वॉल से.)

Praveen Jha : पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश कौन सा है? मैं टुकड़ों में ‘विश्व मीडीया विमर्श’ नामक किताब पढ़ता रहा हूँ, जिसमें पूरे विश्व के अलग-अलग देशों की मीडिया पर लिखा है। स्कैंडिनैविया के सभी देश सालों से ‘प्रेस फ्रीडम’ में टॉप 5 पर हैं। यहाँ कोई पत्रकार कभी मारा-पीटा अब तक नहीं गया। कई रिपोर्ट के अनुसार ईरीट्रिया और चीन में पत्रकारों की हालत खस्ता है। तुर्की और रूस पर भी इल्जाम लगते रहे हैं। पर वो अलोकतांत्रिक देश है।

एक लोकतंत्र में पत्रकार अमूमन सुरक्षित होता है। पर पिछले साल की CPJ की रिपोर्ट पढ़ रहा था, उसमें पत्रकारों के लिए विश्व के दस सबसे खतरनाक (डेडलिएस्ट) देशों में भारत का भी नाम है। यह पढ़ कर अजीब लगा। यह अकेला लोकतांत्रिक देश है जहाँ पत्रकारों पर हमला हो रहा है, और मृत्यु भी होती है। एक और अजीब बात है कि यह मामले अन्य हत्याओं की अपेक्षा ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। छिट-पुट मार-पीट तो दब ही जाते हैं। कई बार आपस में सुलझ जाते हैं, या ‘पार्ट ऑफ जॉब’ मान लिया जाता है।

यह कैसा ‘पार्ट ऑफ जॉब’ है? डॉक्टर पिट रहे हैं, पत्रकार पिट रहे हैं, और नेता वगैरा तो खैर पिटते ही रहे हैं। पार्ट ऑफ जॉब? मैं जब-जब इन रिपोर्ट को गलत मानता हूँ, किसी पत्रकार पर हिंसा की खबर आ जाती है। वजह जो भी हो, हिंसा को आप कैसे सही मान सकते हैं? कलम का जवाब कलम से ही दिया जा सकता है। हम रूस या चीन नहीं हैं, और कभी होंगें भी नहीं। मित्र Yashwant Singh जी पर हुए हमले के पोस्ट कुछ दिनों से देख रहा हूँ। हत्याओं पर तो काफी कुछ लिखा ही जा चुका। यह बात गले से उतर ही नहीं रही कि हमारा देश कभी पत्रकारों के लिए खतरनाक देशों में गिना जाएगा। बल्कि भारत प्रेस स्वतंत्रता के शिखर पर पहुँचे, यही कामना है।

(नार्वे में मेडिकल फील्ड में कार्यरत और सोशल मीडिया पर अपने लेखन के कारण चर्चित प्रवीण झा की एफबी वॉल से.)

प्रवीण श्रीवास्तव : कहीं किसी से सुना था कि … यशवंत सिंह जब वाराणसी संस्करण से प्रकाशित एक बड़े अखबार में थे.. उनका बाघा बॉर्डर जाना हुआ… लौटे तो “निगाहों- निगाहों में होती हैं बातें” नामक शीर्षक की ख़बर लिख डाली… कि दोनों देशों के सैनिक कैसे करते हैं बातें … उस यात्रा वृतांत में क्या था ये तो हमें नही पता… लेकिन जिसने ये बात छेड़ी थी उसके बातों से लग रहा था कि उस वृतांत के शब्दों ने कई पत्रकारों को हिला दिया था। लोग सोचने पर मजबूर हो गए कि हम भी बाघा बॉर्डर घूम आये लेकिन ऐसा भी लिखा जा सकता है दिमाग में क्यों नही आया। फिर क्या था लोग जलते गए… कारवां शिखर की तरफ बढ़ता गया… गाजीपुर का वह युवा यशवंत सिंह भड़ासी बन गया…
फिर क्या था.. संघर्षों और जीवन के उतार चढ़ाव ने भड़ासी बाबा की कलम मजबूत कर दी।

ये तो होना ही था… एक रोल मॉडल तैयार हो गया पत्रकारिता के छात्रों के लिए .. हम भी उन्हीं छात्रों में से थे… 2010 की बात है… हम पत्रकार बनने की लालसा लिए भोपाल पहुंचे… माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में दाखिला लिया.. वहां पहुंचने के बाद भड़ासी बाबा यशवंत सिंह के बारे में पता चला… हमें पूर्वांचल के होने के नाते इतना पता था कि पत्रकार होना अपने आप में भौकाली होता है…. उसपर भौकालियों की भौकाल पर नकेल कसने वाला इंसान कितना भौकाली होगा… वहीं से यशवंत सिंह से मिलने की लालसा जगी… खुशी तो तब और बढ़ गयी जब पता चला यशवंत जी हमारे पड़ोसी जिले गाजीपुर के हैं…. तमन्ना पूरी हुई कुछ सालों बाद गाज़ीपुर में पत्रकारों के एक कार्यक्रम में यशवंत जी मुख्य अतिथि थे… उनके साथ पिछले दिनों हुए वाकये के बाद भी उनकी उदार सोच ने युवा पत्रकारों में फिर से ऊर्जा भरी…

इस एक छोटी सी कथा को उन्होंने चरितार्थ किया.. कथा यूं है… “एक ब्राह्मण हर रोज मंदिर की 50 सीढियां चढ़कर पूजन को जाते थे… जैसे ही वह 25वीं सीढ़ी पर पहुंचते एक बिच्छु उन्हें डंक मार देता और वह उसे उठाकर किनारे रख देते और मंदिर में चले जाते, हर रोज ऐसा ही होता, लोगों ने एक दिन उनसे कहा बाबा आपको वो बिच्छु हर रोज काटता है और आप उसे मारने के बाजाय किनारे क्यों रख देते हैं.. इसपर ब्राह्मण ने जवाब दिया ” वो अपना धर्म निभा रहा है और मैं अपना” बिच्छु का धर्म है काटना सो वो मुझे काटता है…

(पूर्वी उत्तर प्रदेश के युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार प्रवीण श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

भड़ास संपादक यशवंत पर प्रेस क्लब आफ इंडिया में हमला करने वाले ये दो हमलावर हैं.. इन्हें जान लीजिए, पहचान लीजिए…

पूरे मामले को समझने के लिए ये भी पढ़ें….

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हमलावर नंबर एक भुप्पी भी मिल गया फेसबुक पर, देखें-जानें इसकी हकीकत

Yashwant Singh : फेसबुक पर मिल गया हमलावर नम्बर एक भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी। हमलावर नंबर दो अनुराग त्रिपाठी की तरह इसने भी मुझे फेसबुक और ट्विटर पर ब्लॉक कर रखा है ताकि खोजने पर ये न मिले। हमले के अगले ही दिन दोनों ने मुझे सोशल मीडिया पर ब्लाक कर दिया। क्यों? शायद उस डर से कि उन लोगों को खोजा न जा सके और उनकी करनी जगजाहिर न की जा सके। मुझे वाकई सोशल मीडिया पर खोजते हुए भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी नहीं मिले। फिर मैंने दोस्तों को टास्क दिया। इसके बाद पहले अनुराग त्रिपाठी की कुंडली मिली। अब भुप्पी का भी पता चल गया है।

इस भुप्पी के बारे में फिलहाल थोड़ा-सा बता दूं। यह आजतक न्यूज चैनल से ब्लेकमेलिंग के आरोपों में निकाला गया था। चार पांच साल पहले की घटना है। तब उसकी खबर भड़ास पर विस्तार से छपी थी। उसके बाद भुप्पी ने महुआ न्यूज चैनल में दलाली परवान चढ़ाने के लिए कदम रखा। इसकी और अनुराग की हरकतों के कारण इन दोनों को न सिर्फ महुआ न्यूज से जाना पड़ा बल्कि महुआ न्यूज को बंद हो जाना पड़ा। बताया जा रहा है कि ये भुप्पी फिलहाल किसी करेस्पांडेंट टीवी नामक एक वेबसाइट को चलाता है और इसी नाम से कोई पत्रिका प्रकाशित करता है, चंडीगढ़ से। फिलहाल इस डरपोक तक संदेश भेजकर इसको गेट वेल सून कहने का अभियान शुरू किया जाए।

इसका फेसबुक पता ये है https://www.facebook.com/bhupendranarayan.singh.54

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें..

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

भड़ास वाले यशवंत पर हमला दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता नहीं : देवेंद्र सुरजन

Devendra Surjan : बेबाक निडर और साहसी पत्रकार Yashwant Singh पर हमला होना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन चौंकाता बिलकुल नहीं. इस असंवेदनशील युग में जिसकी भी आप निडरता से आलोचना करोगे, वह आपका दुश्मन हो जाएगा. यशवंत भाई इसी इंस्टेंट दुश्मनी के शिकार हुए हैं लेकिन उन्हें अपनी भड़ास निकालना नहीं छोड़ना चाहिए. गौरी और उस जैसे दस और पत्रकारों ने इसी निडरता की कीमत अपने जीवन की आहुति देकर चुकाई है. अगला नम्बर किसी का भी हो सकता है. यशवंत सिंह जी जो करें, अपने जीवन को सुरक्षित रखते हुए करें क्योंकि उन जैसों की ही आज देश और समाज को जरूरत है.

देशबंधु अखबार समूह के निदेशक देवेंद्र सुरजन की एफबी वॉल से.

ये हैं दोनों हमलावर…

प्रेस क्लब आफ इंडिया में यशवंत पर हमला करने की निंदा का दौर जारी है… कुछ चुनिंदा प्रतिक्रियाएं पढ़िेए….

Nadim S. Akhter : पत्रकार और bhadas4media के संस्थापक Yashwant Singh पर हुए हमले की मैं घोर भर्त्सना करता हूँ। उनके ऊपर दिल्ली में प्रेस क्लब के बाहर हमला हुआ था। यशवंत भाई से यही कहूंगा कि जो लोग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं, उन्हें कानून के दायरे में ज़रूर लाएं। हां, अगर वे कानूनी रूप से अपना जुर्म कुबूल करके सार्वजनिक माफी मांगें, तो उन्हें क्षमा किया जा सकता है। साथ ही अपनी निजी सुरक्षा का भी ख्याल रखें । बाकी भड़ास पर शब्द छापते रहें। कागद कारे, कागद कारे।

Vinay Dwivedi : पत्रकार Yashwant Singh पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो कीजिये, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरुरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरुरत है।

Sunil Kumar Suman : Bhadas4media के संचालक और युवा साहसी पत्रकार Yashwant Singh पर किया गया हमला निंदनीय है। यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं। हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

वेद प्रकाश पाठक गोरखपुर : मीडिया में बैठे गुंडों के खिलाफ यूं ही लड़ते रहिये Yashwant Singh भाई. बड़ा कठिन और साहसिक काम है मीडिया का लिबास ओढ़ कर बैठे गुंडों से निपटना। वह भी तब जबकि आप खुद कलमकार हों। मीडिया से जुड़ी खबरों के एकमात्र सर्वाधिक लोकप्रिय न्यूज वेबसाइट bhadas4media.com के संपादक आदरणीय यशवंत सिंह भाई यह काम अर्से से बखूबी कर रहे हैं। भ्रष्ट मीडिया घरानों ने आपको जेल में भी डलवाया लेकिन आप टूटे नहीं। आप मजबूती से लड़ते रहे। जेल में भी कलम चलती रही। हाल ही में अपनी लेखनी के कारण दो गुंडा और कथित पत्रकारों ने उनको फिर निशाना बनाया। प्रेस क्लब आफ इंडिया के बाहर उन पर हमला किया गया। यशवंत भाई पर हमले से उन पत्रकारों में खासा गुस्सा है जो कलम पर विश्वास रखते हैं। वे पत्रकार दुखी हैं, जिन्हें गुंडई की बजाय कलम पर आस्था है। यशवंत जी भी सक्षम हैं और उनके साथ इतना समर्थन है कि दोनों गुंडों का जवाब उन्हीं की भाषा में दिया जा सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करेंगे। क्योंकि यशवंत सिंह उस शख्सियत का नाम है जो कलम से जवाब देते हैं। आपकी लेखनी में वह धार है जो गुंडई का माकूल उत्तर देने में सक्षम है। और वह समय-समय पर इस बात का आभास भी कराते रहते हैं। हम सभी आपकी लड़ाई में साथ हैं और अपने इस साथी से बस इतनी दरख्वास्त है कि यह लड़ाई हर हाल में जारी रहनी चाहिये।

Nirala Bidesia : दो दिनों पहले ही खबर को पढ़ा कि Yashwant भाई पर हमला हुआ है. पढ़कर अजीब लगा.घटना के बारे में जानकर तो और भी अजीब. क्या फालतू और बकवास टाइप की हरकतें पत्रकार करने लगे हैं. यशवंत भाई से मेरी आमने—सामने की कभी मुलाकात नहीं. ऐसा भी नहीं कि हर कुछ दिनों पर बात हो. पिछले करीब दस सालों से हम एक दूसरे को जानते हैं लेकिन कुल जमा दस बार भी चैट से बात नहीं हुई होगी. फोन से तो एक दूसरे की आवाज अब तक सुने नहीं हैं. लेकिन यह एक पक्ष है. असली वाला पक्ष यह है कि हम एक दशक से उन्हें जानते हैं, क्लोजली फॉलो करते हैं. इन दस सालों में यह हमेशा लगा है कि बहुत करीबी हैं यशवंत भाई.भड़ास की जब शुरुआत उन्होंने की तो पहले कुछ दिन लगा कि यह क्या बकवासबाजी है. लेकिन ऐसा कुछ ही दिनों तक लगा. फिर देखा कि कई संस्थान दे दनादन भड़ास को फॉलो करने लगे. उसी ट्रेंड पर वेबसाइट बनाने लगे. अब आज जबकि नये वेंचर का आइडिया मांगा जा रहा है और लोग दे रहे हैं तो उस लिहाज से भड़ास को एक फ्रेश और इनोवेटिव आइडिया माना जाना चाहिए. एक ऐसा आइडिया, जिसने देश भर के पत्रकारों को परोक्ष तौर पर एक दूसरे से जोड़ दिया. मीडिया के अंदर की खबर बाहर आने लगी तो न जाने कितने नंगे होने लगे, संस्थानों की परत दर परत पोल खुलने लगी. यह करिश्मा, चालबाजी कम थी, एक नये किस्म की बदलाव की आहट ज्यादा. भड़ास के बाद न जाने कितने लोगों ने कितने तरह के आरोप लगाये यशवंत पर. तरह—तरह के आरोप. मैं नहीं जानता कि उन आरोपों में कितना दम था. हो सकता है कि बहुत कुछ सच हो, संभव है कि बहुत कुछ मनगढ़ंत. ब्लैकमेलर, दारूबाज और भी न जाने क्या—क्या कहते थे. लेकिन इतने तरीके से व्यक्तिगत हमले, सार्वजनिक जीवन में चरित्र हनन के बावजूद ऐसा कभी नहीं सुना कि यशवंत ने किसी के साथ गुंडई की, हमला किया, करवाया. कायरों की तरह, बुजदिलों की तरह मतभेद—मनभेद वाले दुश्मनों से निपटा. दो दिनों पहले जब यशवंत भाई पर हमले की बात सुना तो लगा कि कितने कमजोर लोग हैं. सत्ता—सल्तनत टूट रही है तो यशवंत के मुकाबले कुछ नया कीजिए. परास्त कीजिए. अप्रासंगिक बनाइये भड़ास को. तर्कों और तथ्यों के साथ यशवंत को खड़ा कीजिए ताकि सार्वजनिक जीवन से वे तौबा कर लें. भड़ास और यशवंत के बारे एफबी पर लिखिए, कोई रोक थोड़े हैं. आपका लिखना सही होगा, भड़ास गलत होगा, यशवंत गलत होंगे तो वे तर्क देेंगे, कुतर्क करेंगे, जवाब देंगे या निरूत्तर हो जायेंगे. लेकिन इस तरह से हमला करना, मारना, मारने की कोशिश करना तो यही साबित करता है कि अभी भड़ास का भूत पीछा छोड़ नहीं रहा. उसका असर अब भी रगों में दौड़कर दिमाग को चैन से नहीं रहने दे रहा.यशवंत भाई पर हुए हमले का सिर्फ विरोध नहीं है बल्कि यह भी मानना हे कि हिंसा का सहारा लेनवाला कोई भी व्यक्ति चाहे कुछ और हो, वह पत्रकार तो नहीं होगा, नहीं हो सकता

Manoj Bhawuk : मैं Yashwant भाई को बहुत नजदीक से जानता हूँ। मुँहफट है, दिलेर हैं। बुजदिलों की तरह कभी नहीं लड़ते। चुप्पी के साथ मदद भी करते हैं और कमजोर के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, बिना किसी रिश्ते-नाते के भी। हमला करने वाले लोग बहुत हीं घटिया और बुजदिल हैं।

Ravi Kumar Singh : वरिष्ठ पत्रकार लंकेश की हत्या के दुसरे दिन ही बड़ी संख्या में प्रेस क्लब में पत्रकारों का जमावड़ा लगा था, अंग्रेजी और हिंदी दोनोंं भाषाओं में बतियाते हुए समझदार लोग एक स्वर में निंदा कर रहे थे,किसी के हाथों में तख्तियां थी तो किसी के आंखों में गुस्सा, कातिल का पता नहीं फिर भी लोग दोषी को सख्त सजा दिलवाने की मांग कर रहे थे, लेकिन उसी राजधानी में भड़ास के संपादक Yashwant Singh जी पर हमला हुआ वो भी पत्रकारों के द्वारा जिनमें उन्हें चोट भी लगी, उन्होंने बकायदा इसकी जानकारी फेसबुक पर शेयर किया, फोटो में चेहरे पर लगा चोट साफ दिख रहा था हमलावर के नाम भी सामने थे,और ये राजधानी का ही मामला था, लेकिन यहां पर “वी वांट जस्टिस” करने वाले लोग नदारद हो गये, जैसे कुछ हुआ ही न हो, ये दावे के साथ कह सकता हूं कि पत्रकार लंकेश से कहीं ज्यादा भड़ास संपादक यशवंत सिंह जी ने पत्रकारों के लिए आवाज उठायी, बड़े बड़े मीडिया घरानों से टकराने की क्षमता इन्हीं में दिखी, बिना कोई लोभ लालच के ये भड़ास को कई सालों से चलाते आ रहे हैं जिसमें पत्रकारों के लिए हर बार आवाज उठायी जाती है, लेकिन आज वही बिरादरी अपने इस संपादक पर हुए हमले पर खामोश है, इससे बुरा हमारे लिए और क्या हो सकता है, खैर पहले राजनेता लाशों पर राजनीति करते थे लेकिन अब पत्रकार भी इस दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं, जहां उन्हें स्वार्थ दिखता है वहीं वह मुंह खोलते हैं, यकिन से कह सकते हैं पत्रकारिता का सबसे बुरा दौर चल रहा है…..

अजित सिंह तोमर : वरिष्ठ पत्रकार Yashwant Singh पर हाल ही में प्रेस क्लब,दिल्ली के बाहर दो ‘कथित’ पत्रकारों हमला किया और उनके साथ अभद्रता की। यशवंत जी की चोटिल तस्वीरें हमनें फेसबुक पर देखी। मैं उसी दिन से यह सोच रहा हूँ कि मीडिया की अंदरूनी दुनिया के शोषण और पत्रकारों की समस्याओं पर लिखने बोलने और अभियान चलाकर शोषित पत्रकारों के साथ खड़े होने वाले भाई यशवंत सिंह यदि ऐसी हिंसा के शिकार हो गए है तो इससे पता चलता है पत्रकारों की अंदरूनी दुनिया वास्तव ने कितनी अकेली और विचित्र किस्म की कुत्सओं से भरी है। मैं यशवंत जी को एक दशक से अधिक समय से जानता हूँ जितना स्पेस उन्होंने भड़ास फ़ॉर मीडिया पर विपक्ष को दिया है इतना कोई नही देता है वो गजब के लोकतांत्रिक सोच के व्यक्ति है। इस घटना के बाद उनकी प्रतिक्रिया में उदात्तमना होना ही मुखर होकर सामने आया उनका एक वीडियो मैनें देखा जिसमे वो क्षमा और नेचर की जस्टिस की बात कर रहे। मैं सोच रहा था ये आदमी किस मिट्टी का बना है यदि उनकी जगह मैं होता तो निसन्देह इतना उदार होकर कतई पेश नही आता। मीडिया के अंदर यदि पत्रकार (?) ऐसी गुंडई करेंगे तो हम उस मीडिया से संविधान सम्मत होने की अपेक्षा कैसे रख सकेंगे? निसन्देह भूप्पी और अनुराग त्रिपाठी पत्रकार तो नही है। बतौर जर्नलिज़्म टीचर मुझे यह बात भी खराब लगी कि एक वरिष्ठ पत्रकार के साथ जो अभद्रता हुई उस पर जैसा विरोध मीडिया के अंदर होना चाहिए था वैसे नही हुआ। खैर! हमनें यशवंत जी का जेल प्रकरण भी देखा था तब भी कमोबेश ऐसे ही लोग चुप्पी लगा गए थे। मैं यह पोस्ट यशंवत जी के लिए नैतिक समर्थन या न्याय के लिए नही लिख रहा हूँ उनका अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व है और उनके चाहने वाले भी कम नही है मगर पत्रकारों के सुख-दुःख में मीडिया घरानों से लड़ने वाले पत्रकार के साथ हुई ऐसी हिंसा और अभद्रता देखकर मेरा मन खिन्न जरुर है। उम्मीद करता हूँ उन दोनों पत्रकारों के संस्थान इस निंदनीय कृत्य के लिए जरुर सख्त कार्यवाही उन पर करेंगे।

Apoorva Pratap Singh : अभी 3 दिन पहले पत्रकार Yashwant Singh पर हमला हुआ, कारण उनके पोर्टल पर उन दोनों व्यक्तियों (पत्रकार नहीं कहूंगी) के पिछले काले कारनामों की पोल खोली गई थी । अचंभा यह है कि रेगुलर मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों की चुप्पी। दिवगंत गौरी जी और उनसे पहले वाले पत्रकारों जिनकी हत्याएं हुईं उन पर अगर सही समय ध्यान दिया गया होता, हाइलाइट किया होता तो हो सकता है कि यह सब नहीं होता। हम सब लोग सांप गुजरने के बाद लाठी पीटने वालों में से हैं । दुर्घटनाओं के बाद शोक सभाएं करने से बेहतर है कि मुद्दों को सही समय उठाया जाए। एक और कड़वी बात यह कि अपने मुद्दों, दिक्कतों को हाइलाइट या खुद की शोक सभा भी अगर ऑर्गनाइज करनी हो तो पहले एक गुट बनाइये या जॉइन करिये, तभी सम्भव है कि मसले को trp मिले, वरना लोग पीड़ित के ही सौ गुनाह गिनाने को तैयार हैं।

प्रेमी चन्द्रहाश कुमार शर्मा : पिछले दिनों पूर्वांचल के रहने वाले और दिल्ली में रहकर पूरे देश की मीडिया की खबर लेने वाले तेज-तर्रार पत्रकार भड़ास फॉर मीडिया के संपादक यशवंत कुमार सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के गेट पर जानलेवा हमला हुआ, जिसकी मैं कड़ी निंदा करता हूं। क्या कहूँ, मुझे दुख इस बात की है, कि धारदार कलम के धनी यशवंत सिंह अपनी कलम को ही अपना तोप व हथियार समझतें हैं, यह मेरे जैसे नवोदित पत्रकार का भी यही तोप व हथियार है। भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी और अनुराग त्रिपाठी जैसे पत्रकार यशवंत सर पर हमला कर इस पेशे को कलंकित कर बैठे हैं। कई नामचीन प्रिंट मीडिया दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों में अपनी लेखनी का लोहा मनवाने वाले पूर्वांचल के गाजीपुर जिले से ताल्लुक रखने वाले यशवंत सिंह एक लोकप्रिय हिंदी न्यूज़ पोर्टल भड़ास फ़ॉर मीडिया के संस्थापक व प्रधान सम्पादक हैं। उनकी लेखनी का मैं भी कायल हूँ। घटना के एक सप्ताह बाद भी इस प्रकरण पर शासन-प्रशासन का तनिक भी ध्यान नहीं है। खैर, जो हुआ उसका परिणाम तो भुप्पी और त्रिपाठी को भुगतना ही है, पर… जो हुआ गलत हुआ। यह घटना लोकतंत्र पर ”लोकतंत्र” का हमला है।

Prakash Asthana : सच तो यह है कि यशवंत ने कई मीडिया घरानों से पंगा लिया हुआ है..वहां जो पत्रकार काम कर रहे हैं, वे भले ही दिल से यशवंत के साथ हों, लेकिन संपादक या मालिक के खिलाफ जाकर वे उसकी खबर तक नहीं बना सकते..उन्हें भी नौकरी करनी है…अब पहले वाली पत्रकारिता तो रही नहीं, अलबत्ता मीडिया संगठन जरूर कुछ कर सकते हैं

Azeem Mirza : सत्य कड़वा होता है लेकिन हकीकत यही है कि न जाने कौन सी लालच, प्रभाव या दबाव में मीडिया का बड़ा वर्ग काम कर रहा है, संस्थान में बड़े ओहदों पर बैठे मीडिया मैनेजर अपने अधिनस्तो का शोषण कर रहे हैं, ऐसे लोगों में यशवन्त जी के समर्थन में बोलने की हिम्मत ही नहीं है, मैं यशवन्त जी के साथ हूँ।

Virendra Dubey : सर जी बात तो सही है। सभी को सांप सूघ गया है। इस मुद्दे पर कोई बात ही नहीं करना चाहते है। रवीश भाई भी इस मुद्दे पर चुप है। वे क्या यशवंत भाई को पत्रकार नहीं मानते है या फिर अभी तक उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं हो पायी। पत्रकारों की असली लड़ाई तो यशवंत जी ही लड़ रहे हैं।

Nirmal Kumar : जिस तरह की पत्रकारिता यशवंत सिंह जी करते हैं, मुझे पहले से अंदेशा था कि ऐसा होगा। आज की तारीख में ईमानदार को कोई देखना नहीं चाहता। ईमानदारी एक ऐसी रौशनी की तरह हो गयी है जो चहुँ ओर व्याप्त बेईमानी और भ्रष्टाचार के अँधेरे को चीरती है इसलिए इन धतकर्मों में लिप्त लोग रौशनी के स्त्रोत को ही बंद करने में लगे हैं काली कोठरी के रोशनदान को बंद करने में लगे हैं। धिक्कार है डरपोक सियासतदानों पर।

सौजन्य : फेसबुक

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: