चुनाव चर्चा : आजम खान की बयानबाजी से समाजवादी पार्टी को यूपी में होगी मुश्किल

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव अब चंद महीनों की बात रह गये हैं। यूपी में अगली सरकार किस दल की बनेगी यह जनता ही तय करेगी । परंतु इस सच्चाई से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि तमाम राजनैतिक दल सूबे की सत्ता पर काबिज होने के लिये अपने-अपने तरीके से मतदाताओं का ब्रेनवॉश करने में लगे हैं। पिछले 27 वर्षो से कांग्रेस सत्ता से बाहर है और 14 वर्षो से बीजेपी वनवास झेल रही हैं। घूम फिर के समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ही अपनी-अपनी सरकार बन रहे र्हैं। पिछले दो विधान सभा चुनावों को छोड़ दिया जाये तो प्रदेश की जनता कई वर्षो से  किसी भी दल को भी पूर्ण बहुमत नहीं दे रही थी। 2017 में भी पिछले दो विधान सभा चुनावों का इतिहास दोहराया जायेगा इसकी संभावना जानकारों को कम लगती है जो हालात नजर आ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि यूपी में फिर खिचड़ी सरकार बन सकती है। इस बात से तमाम राजनैतिक दल बेचैन हैं, वहीं उन छोटे-छोटे दलों की लाटरी लग सकती है जो चंद सीटों पर बड़े दलों से मोलभाव करने की ताकत रखते हैं।

राजनैतिक पंडित अगले विधान सभा चुनाव में बीजेपी-बीएसपी की स्थिति मजबूत होने और सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की स्थिति कमजोर होने का दावा कर रहे हैं। वहीं बीजेपी और बीएसपी दोंनो को ही लगता है कि अगली सरकार उनकी ही बनेगी। कांग्रेसियों को भी अपनी सियासी ताकत में भी थोड़ी-बहुत सुधार की संभावना दिखाई दे रहीं है। कांग्रेस को उम्मीद है कि 27 वर्षो से जारी उसका ‘सूखा’ 2017 में  समाप्त हो जायेगा। सभी दलों के नेता अपनी-अपनी जीत के दावे कर रहे हैं तो इसकी वजह भी है। बीएसी के पास मायावती हैं तो बीजेपी को मोदी पर भरोसा है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को लगता है कि पिछले 27 वर्षो में वह और उनके धुरंधर जो करिश्मा नहीं कर पाये, उसे 2017 में उनके रणनीतिकार प्रशांत किशोर पूरा करेंगे। समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव को अपने कामकाज पर भरोसा तो है, लेकिन प्रदेश की लचर कानून व्यवस्था उनके लिये अभिशाप बनती जा रही है। यूपी में पिछले कई चुनाव चतुकोणीय हुए थे, अबकी से नीतीश कुमार का महागठबंधन इसमें पांचवा कोण बनना चाह रहा है। नीतीश को लगता है कि बिहार में महागठबंधन मोदी का विजय रथ रोक सकता है तो यूपी में इस इतिहास को क्यों नहीं दोहराया जा सकता है। यूपी के चुनावों को लेकर नीतीश कुमार काफी गंभीर हैं, मगर समस्या यह है कि उनके अलावा प्रदेश में कोई भी सियासी दल नीतीश कुमार के महागठबंधन को गंभीरता से नहीं ले रहा है।

नीतीश को लगता है कि बिहार में शराब बंदी जैसे कानून बनाने का फायदा उन्हें यूपी के चुनावों में मिल सकता है। परंतु कहा यह भी जा रहा है कि महागठबंधन के हिस्सेदार लालू यादव को यह बात हजम नहीं हो रही है। वह नहीं चाहते हैं कि अखिलेश सरकार को उखाड़ने में नीतीश की मदद करके वह अपने समधी मुलायम सिंह यादव को नाराज करें। वैसे भी नीतीश जिस तेजी से उड़ान भर रहे हैं वह लालू की टीम को रास नहीं आ रहा है। मगर इन सब बातों से बेफिक्र नीतीश कुमार अपने कदम पीछे खींचने को तैयार नहीं हैं। चर्चा तो यह भी  है कि अगले वर्ष होने वाले  विधान सभा चुनाव के बहाने नीतीश कुमार यूपी में दस्तक देना चाहते हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की पैठ बढ़ाने के लिये वह मोदी की राह पर चलते हुए यूपी में किसी दमदार सीट से चुनाव भी लड़ सकते हैं। इसके लिये उन्हें बिहार से सटा पूर्वी उत्तर प्रदेश काफी रास आ रहा है। इसी हफ्ते उनका कार्यक्रम भी है। 12 मई को  नीतीश कुमार बनारस की यात्रा पर होंगे। बनारस जिले के पिंडरा में उत्तर प्रदेश जनता दल युनाइटेड (जदयू) का कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित है। बनारस और जौनपुर के बीच स्थित इस सम्मेलन के मुख्य वक्ता नीतीश कुमार होंगे। माना जा रहा है कि पिंडरा के राजनीतिक सम्मेलन से नीतीश कुमार अपनी ऑपरेशन यूपी की शुरुआत करेंगे। अगले दिन वह बनारस में गंगा किनारे सप्त आरती कार्यक्रम में भी हिस्सा लेंगे। तीन दिन बाद जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की सभा 15 मई को लखनऊ में आयोजित है। यहां बिहार में शराब बंदी को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नागरिक अभिनंदन का कार्यक्रम रखा है। इस सभा में नीतीश कुमार बिहार की शराबबंदी के निर्णय के सहारे यूपी सरकार को घेरने की कोशिश करेंगे। नीतीश को अभी तक राष्ट्रीय लोकदल सहित कुछ क्षेत्रीय क्षत्रपों का ही सहारा मिल पाया है।

बहरहाल, बात बीएसपी की कि जाये तो उसकी सुप्रीमों मायावती दलित-मुस्लिम गठजोड़ के सहारे यूपी में वापसी की उम्मीद लगाये बैठी हैं। इसीलिये वह बार-बार दोहराती रहती हैं कि मुलायम और बीजेपी वाले मिले हुए हैं। माया की नजर अगड़ी जाति के मतदाताओं पर भी है। इस लिये वह अगड़ी जाति के गरीब परिवारों के लिये आरक्षण की वकालत कर रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार अपना पुराना वोट बैंक फिर से हासिल करना चाहते है। इसलिये वह ब्राहमणों-ठाकुरों और अपने परम्परागत मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिये बड़ा दांव लगा रही है। बीजेपी को अक्सर बनियों की पार्टी की उपमा दी जाती है। बीजेपी की नजर बनिया वोटरों पर तो है कि इसके अलावा अन्य अगड़ी जातियों को भी वह लुभा रही है। अगड़ों के साथ दलितों पर भी डोरे डाले जा रहे हैं। लोकसभा चुनाव के समय बड़ी संख्या में दलित वोटरों के बीजेपी के पक्ष में पाल बदलने का ही परिणाम था जो बीजेपी 71 सीटें जीत गई थी। मोदी अपने आप को पिछड़ा वर्ग से जोड़कर इस वोट बैंक को भी लुभाने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है। बात समाजवादी पार्टी की कि जाये तो सपा को अपनी सरकार के कामकाज पर भरोसा है, परंतु प्रदेश की बिगड़ी कानून व्यवस्था और  अकलियत का सपा से मोह भंग होना, समाजवादी पाटी के लिये नुकसानदायक साबित हो सकता है। आजम खान की विवादास्पद बयानबाजी भी समाजवादी पार्टी के लिये मुश्किल का सबब बन सकती है। वह लगातार हिन्दुओं और साधू-संतो के लिये अनाप-शनाप बोलते रहते हैं और उन पर कोई रोक लगाने वाला भी नहीं है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.



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