संगम पांडेय-
बाबर पर उपलब्ध किसी भी ऑथेंटिक लेखन में उसकी उस वसीयत का जिक्र नहीं है जिसमें उसने कथित रूप से हुमायूँ को गोकशी रोकने, हिंदू और मुसलमान रियाया को एक ही निगाह से देखने और हिंदुओं के मंदिर न तोड़ने की सलाह दी है। क्यों नहीं है? क्योंकि अपनी मौत से पहले तक रही उसकी मजहबी नीति से इस सलाह का कोई मेल नहीं है।
मौत से दो साल पहले मालवा में हुई चंदेरी की लड़ाई को लेकर वो अपनी आत्मकथा बाबरनामा में लिखता है- “मैंने 934 हिजरी (सन 1528) में चंदेरी पर चढ़ाई की और अल्लाह की मौज, कुछ ही घड़ियों में राणा सांगा के बड़े भरोसे के नौकर मेदिनीराव के चार-पाँच हजार काफिरों से शहर छीन लिया और तलवार के घाट उतारकर बरसों के दारुल हर्ब को दारुल इस्लाम बना दिया।” चंदेरी में मंदिर भी तोड़े गए। इससे पहले उसकी सरपरस्ती में ग्वालियर में जैन मूर्तियाँ तोड़ी गईं और संभल में एक मंदिर को मस्जिद में बदला गया।
दूसरी बात, मरते हुए बाबर ने हुमायूँ को जो सलाह दी वह उसकी बेटी गुलबदन के हवाले से यह थी, जो बाबरनामा के साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हिंदी संस्करण में दर्ज है- “अल्लाह, यह अपने सभी लोगों के साथ नेकी, भलाई और अच्छाई से पेश आता रहे और सबसे निभा ले जाए। और हुमायूँ, तुझे तेरे भाइयों, अपने सभी अपनों और तेरे और अपने सभी लोगों को अल्लाह पर छोड़कर मैं तेरे हाथों में सौंपता हूँ।”
जिस वसीयत के दस्तावेज के हवाले से कुछ फ्राड लोग फ्राड किस्म का भाईचारा फैला रहे हैं वह आज से 80-85 साल पहले प्रकट हुआ था और तभी इतिहासकार श्रीराम शर्मा ने 1940 में लिखी अपनी पुस्तक ‘रिलीजस पॉलिसी ऑफ द मुगल एंपेरर्स ’ में लिखा था- “कुछ समय पहले भोपाल सरकार द्वारा बाबर की वसीयत बताया गया एक दस्तावेज स्कॉलर्स के संज्ञान में लाया गया। इसे इंडियन हिस्टारिकल रेकॉर्ड कमीशन की एक बैठक में दिखाया गया। लेकिन मूल दस्तावेज की जाँच की सभी कोशिशें व्यर्थ हुईं क्योंकि तब के भोपाल के शासक ने इस दस्तावेज को दिखाने से इनकार कर दिया। नेशनल आर्काइव ऑफ इंडिया इसके ‘मूल’ की एक फोटोस्टेट कॉपी हासिल करने में कामयाब रही। सरसरी तौर पर ही दस्तावेज को पढ़ने से साबित हो जाता है कि यह जाली है और वो भी निहायत भोंड़े ढंग का जाली। जो वर्तनी की अशुद्धियाँ दस्तावेज को भोंड़ा बनाती हैं वो कोई शाही कलमनवीस नहीं कर सकता, भले ही कितना भी लापरवाह हो। यहाँ तक कि दस्तावेज पर लगाई गई ‘शाही सील’ में ग़ाज़ी जैसा जाना-पहचाना शब्द भी गलत लिखा हुआ है। दिलचस्प यह है कि यह शब्द खुद दस्तावेज में भी गलत लिखा हुआ है। इस गोपनीय दस्तावेज में बताए गए तथ्य भी गलत हैं। दस्तावेज पर 21 जनवरी 1530 की तारीख है, लेकिन यह कहता है- ‘अल्लाह ने हुमायूँ को बादशाही प्रदान की’; जबकि बाबर अभी जिंदा था। जनवरी 1530 में बाबर अच्छा-खासा सेहतमंद था और कोई वजह नहीं थी कि वो अपनी अंतिम वसीयत लिखता। और दस्तावेज के बाद के शब्द तो सबसे ज्यादा बकवास तर्क प्रस्तुत करते हैं। हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता बरतने की सलाह देने के बाद हुमायूँ से यहाँ अब यह कहा गया है कि वो प्रशासनिक मामलों को मजबूती देने के लिए अमीर तैमूर के कामों को ध्यान में रखे।”
लेकिन जो लोग जीवन को गप समझते हैं उन्हें क्या फर्क पड़ता है! वे अपनी ढपोरशंखी भलमनसाहत का स्वांग करके दूसरों को रिझाते हैं। इस स्वांग के जरिए वे जब चाहे तब अशोक को विलेन और बाबर को हीरो बना सकते हैं। लेकिन इतिहासकार ऐसा नहीं मानते। इतिहास की दुर्दशा करने वाले इतिहासकार भी कम से कम इतना अवश्य करते हैं कि झूठे तथ्यों के जरिए नहीं बल्कि झूठी व्याख्याओं के जरिए अपना मनोरथ सिद्ध करते हैं।



