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सुख-दुख

क्या ब्लैक एनर्जी, भूत-प्रेत पितर होते हैं?

अजय तिवारी-

ब्लैक एनर्जी के अस्तित्व को समझने के लिए पाश्चात्य जगत में भी अब उत्सुकता जगी है। सन् १७७६ में पोप पायस षष्ठ ने भूत-प्रेतों के अस्तित्व की जाँच के लिए एक कमीशन का गठन किया था। कमीशन ने अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए बताया था कि प्रेतात्माओं का अस्तित्व स्वीकार करने योग्य है।

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उनका मत था कि इस प्रक्रिया की पुष्टि करने का उद्देश्य जनसाधारण को भयभीत करना नहीं है, वरन उस परोक्ष जगत की सत्ता को स्वीकार करने के लिए उन्हें सहमत करना है, जिसे प्रायः बुद्धिजीवी वर्ग को नकारते देखा जाता है।

अमेरिका जैसे संपन्न एवं विकसित देशों में वैज्ञानिक प्रगति यद्यपि अपनी चरम सीमा पर है, फिर भी भूत-प्रेतजन्य व्याधियों से अधिक परेशान उन्हें ही देखा जाता है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जोसेफ ब्रेहन के अनुसार, ऐसी व्याधियों में नब्बे प्रतिशत तो मानसिक विकारों से पीड़ित पाए जाते हैं, केवल दस प्रतिशत ही प्रेत-बाधाओं से ग्रस्त कहे जा सकते हैं।

इस संदर्भ में आज अनेकानेक अनुसंधानपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। अतींद्रिय क्षमतासंपन्न सुप्रसिद्ध लेखिका सेन्ड्रा गिब्सन ने अपनी कृति ‘बियोन्ड दि माइंड’ में कहा है कि परोक्ष जगत के अस्तित्व को नकारने के कारण ही अनेक प्रकार के मनोविकारों का सही निदान नहीं हो पाता है। डॉ० बर्ट गिब्सन अग्रणी मनोवेत्ता हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी सेन्ड्रा गिब्सन के साथ मिलकर ‘प्राण फाउन्डेशन’ नामक संस्थान की स्थापना की है। भारतीय तत्त्वज्ञान से प्रभावित होकर पुनर्जन्म व कर्मफल सिद्धांत आदि तथ्यों का उपयोग वे अपने परामर्श में करते हैं।

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सेन्ड्रा गिब्सन मूर्छित अवस्था में, उच्चस्तरीय पितरों से संबंध स्थापित करने में सक्षम हैं। डॉ० गिब्सन शुभचिंतक एवं सहायक पितरों से वार्तालाप करते थे। इन वार्तालापों का सार उन्होंने अपनी कृति में लिपिबद्ध किया है। जब उन्होंने पूछा कि क्या मरने के बाद भी जीवन का अस्तित्व बना रहता है तो उन्हें पितरों द्वारा उत्तर मिला कि हाँ, यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि शरीर की मृत्यु के बाद भी आत्म-चेतना का अस्तित्व सूक्ष्मरूप से विद्यमान रहता है। जैसे धरती पर विभिन्न प्रकार के लोग होते हैं, इसी तरह केवल भूतकाल का चिंतन करने वाले भूत, दुष्कृत्यों का चिंतन करने वाले प्रेत, केवल अनिष्ट में व्यस्त रहने वाले पिशाच और सत्प्रवृत्ति का चिंतन करने वाले एवं सत्कर्मों में निरत रहने वाले विभिन्न प्रकार के पितर भी होते हैं। अधिकांश मृतात्मा मूर्छित या खोए हुए होते हैं।

इनमें से कुछ स्थान विशेष में, जैसे जहाँ पीड़ित हुए थे, उन पर जहाँ निर्मम अत्याचार किया गया था अथवा जहाँ पर वे नशा, अनाचार आदि किया करते थे, आबद्ध हो जाते हैं। असंतुलित मनोबल वाले कई बार इनकी पकड़ में आ जाया करते हैं। प्रतिशोध लेने पर उतारू कई प्रेतात्माएँ ऐसी होती हैं, जो शंकालु मनःस्थितिवालों, अनीतिजन्य कृत्यों की कीचड़ में सने व्यक्तियों को अवश्य परेशान करती हैं एवं उस स्थान को, जो उनके क्रियाकृत्यों का साक्षी होता है, उसे अभिशप्त कर देती हैं।

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अब प्रश्न यह उठता है कि भूतबाधा में फँसे हुए व्यक्ति के प्राण बचाने के लिए क्या किया जाए? इसके लिए सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि यह संकट केवल इसलिए उपस्थित होता है; क्योंकि निषेधात्मक विचारों से ग्रसित एवं भयग्रस्त व्यक्ति ही इन सत्त्वों अर्थात प्रेत-पिशाचों के लिए अपना द्वार खोलता है। जिनके द्वार विधेयात्मक और अभय आदि के विचारों से बंद हैं, उनको वे कभी भी आक्रांत नहीं कर सकते।

इन बाधाओं में फँसे हुए व्यक्ति को छुड़ाने के लिए सरल उपाय है-“काँटे से काँटा निकाला जाए”। इस संबंध में सेन्ड्रा गिब्सन को एक दिन अंतःप्रेरणा हुई कि इन सत्त्वों-मृतात्माओं के बारे में विस्तृत जानकारी अपने अदृश्य सहायकों से स्वतः प्राप्त की जाए। इसलिए कुछ प्रश्नों की सूची बनाकर आत्मविस्मृति की स्थिति में टाइपराइटर के पास ऑटोमेटिक टाइपिंग के लिए बैठ गईं, ताकि उनकी उँगलियों के माध्यम से अदृश्य सहायक उत्तर टाइप कर सके।

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एक प्रश्न यह था कि दूसरों को परेशान करने वाली प्रेतात्माओं के साथ काम करते समय क्या हम बाहरी वास्तविक सत्त्वों के साथ व्यवहार करते हैं अथवा अपने भीतर की किसी शक्ति के साथ व्यवहार करते हैं। उत्तर के रूप में टाइपराइटर पर जो छप रहा था, उसको द्विभागीकरण का संकेत उभरा, जिसका तात्पर्य था कि एक बाहर से आता हुआ दिखाई देता है और दूसरा भीतर से, जिसकी अनुभूति होती दिखाई देती है। यह मनुष्यकृत वैयक्तिक बात है। वैश्विक दृष्टि से इसमें कोई भेद नहीं है। वस्तुतः प्रत्येक वस्तु का निर्माण भी भीतर से ही होता है। भौतिक स्तर पर बाह्य जगत का अस्तित्व इसलिए है कि आपने ही इसका निर्माण किया है। यह अपने ही भीतरी विचारों, भावनाओं, प्रेरणाओं की ही अभिव्यक्ति है। भौतिक दृश्य जगत में परिवर्तन लाने के लिए पहले स्वयं को बदलना होगा।

अतींद्रिय क्षमताओं, संप्रेषणों का आधार अपना अंतर्मन ही है। बाहरी सहायक या प्रेतात्माएँ तभी हम तक पहुँच सकती हैं, जब हमारा अंतर्मन उनको स्वीकृति देता है। यदि इन तत्त्वों के साथ संपर्क की आवश्यकता नहीं है तो उचित परिवर्तन अपनी अंतःमनःस्थिति में ही करना होगा। अतींद्रिय क्षमताओं की अभिव्यक्ति के लिए बाह्य संपर्क की कदाचित् ही आवश्यकता होती है। डॉ०- गिब्सन के अनुसार, जिस प्रकार अदृश्य एवं सूक्ष्म जीवाणुओं-विषाणुओं के कारण अनेक प्रकार की व्याधियाँ उत्पन्न हुआ करती हैं और इनका प्रमुख कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता की न्यूनता होती है, ठीक उसी प्रकार मानसिक जगत में निषेधात्मक ऊर्जा हुआ करती है, जिसे ‘ब्लैक एनर्जी’ कहते हैं।

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इसकी तुलना इन विषाणुओं से की जा सकती है। इस प्रकार की ऊर्जा बाहर और भीतर, सब जगहों में है। जो व्यक्ति मानसिक दृष्टि से विधेयात्मक विचारों से परिपुष्ट है, वह इस प्रकार की निषेधात्मक ऊर्जा से दुष्प्रभावित नहीं होगा।
जो व्यक्ति निराशा, हताशा आदि कारणों से मानसिक दृष्टि से दुर्बल है, वह निषेधात्मक ऊर्जा के लिए अपने द्वार खोलता है।

जिस प्रकार से शारीरिक रोगों के लिए, जो विषाणुजन्य होते हैं, ऐंटीबॉयोटिक दवाइयाँ दी जाती हैं और तब उनसे छुटकारा मिलता है, ठीक इसी प्रकार निषेधात्मक ऊर्जा से ग्रस्त मन को ठीक करने के लिए मन को प्रसन्न करने वाले विधेयात्मक विचारों एवं चिंतन से भर कर नकारात्मकता को मार भगाना चाहिए।
नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा से बार-बार परिवृत्त करते रहना चाहिए। इसके लिए विधेयात्मक विचारों के पोषक सृजनात्मक साहित्य का स्वाध्याय, स्वाध्याय के साथ महापुरुषों का सत्संग, प्रेरणाप्रद संगीत, प्राकृतिक नैसर्गिक साहचर्य, प्राकृतिक जीवन का अनुसरण, नशीले पदार्थ एवं नशीली दवाओं से परहेज, विधेयात्मक वातावरण, पौष्टिक एवं सात्त्विक आहार, प्राणि एवं वनस्पति जगत से सखा भाव आदि बातों का जितना संभव हो, अधिक से अधिक अनुपालन करने से निषेधात्मक विचारों एवं सत्त्वों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से परिपुष्ट एवं समुन्नत व्यक्ति ही संसार पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में सफल होते हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Ramchandra Prasad

    July 26, 2023 at 7:56 pm

    अति उत्तम आलेख।

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