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सुख-दुख

जो ऑक्सीजन सिलेंडर आपके पापा को लगाया गया उसमें तो आक्सीजन था ही नहीं!

राजेश अग्रवाल-

तो इस तरह से जान ली गई हमारे कार्टूनिस्ट भाई प्रदीप की… सुनिए उनके बच्चे की ज़ुबानी..,.

अंकल, तीन चार दिन से पापा को सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। हमने उनको प्रेस जाने से मना कर दिया था। मैं ऑक्सीजन का छोटा यूनिट लेकर घर आ गई। पर डर था, कब कैपिसिटी खत्म हो जाये।

सिम्स लेकर आये। ऑक्सीजन सिलेंडर में लिया गया। कुछ देर बाद पता चला कि सिलेंडर का लेवल गिर रहा है। डॉक्टर आयें तो बात करें। बात कोई सुनने वाला नहीं था। फिर पता किया, किसी प्राइवेट अस्पताल में कोई ऑक्सीजन बेड खाली नहीं है। एक स्टाफ ने बताया, आरबी हॉस्पिटल में अभी-अभी एक ऑक्सीजन बेड खाली हुई है, ले जाओ।

दूसरा ऑक्सीजन इक्विपमेंट वहां था ही नहीं। नीचे एम्बुलेंस खड़ी थी। मैं घर से जो पोर्टेबल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर ले आई थी, उसे तीसरे माले से पापा पर लगाकर नीचे उतरी। पापा बुरी तरह हांफ रहे थे। बस उम्मीद थी, जल्दी से जल्दी एम्बुलेंस आरबी हॉस्पिटल पहुंचें, ऑक्सीजन मिले और पापा को बचा लें।

आर बी में एम्बुलेंस रुकते ही व्हील चेयर आ गई। ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ। मैंने अपनी यूनिट हटाई। उन्होंने अपनी ऑक्सीजन यूनिट लगाई। पर, उनका हांफना बंद नहीं हुआ। स्टाफ से पूछा तो बताया कि बस दो चार मिनट में काम करने लगेगा। पापा को ऑक्सीजन मिलने लगेगा।

उसी हाल में पापा को आर बी के ऊपर बने कोविड हॉस्पिटल में मैं खुद रोते-रोते ले गई। आईसीयू में पापा पहुंच गये। आईसीयू में पहुंच गये थे, पर बस दो चार मिनट तक राहत महसूस कर सकी। उनका तड़पना बंद नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया। मैं भागे-भागे नीचे आई। जिन नर्सों ने एम्बुलेंस अटैंड किया था, उनसे बात बताना चाह रही थी। मगर उन तीन में से दो मोबाइल फोन पर व्यस्त थीं। तीसरी मेरी ओर बड़ी उपेक्षा से देख रही थी।

मुझे समझ में आ गया कि इन्हें किसी के जान की परवाह बिल्कुल नहीं है। मुझे करंट सा लगा- जब एक ब्वाय ने बताया कि जो ऑक्सीजन सिलेंडर आपके पापा को यहां आने पर लगाया गया उसमें ऑक्सीजन तो था ही नहीं। वह तो खाली है। ये नौटंकी तो आपको संतुष्ट करने के लिये की गई।

मैं ऊपर भागी, अपने साथ लाये हुए आक्सीजन कंस्ट्रेटर को लेकर। दरवाजे पर पहुंची। रोका गया। बताया गया- तुम्हारे पापा अब नहीं रहे।

अंकल, मेरी ही गलती थी। न तो उनको अस्पताल ले जाती, न उनकी मौत होती।

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