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सुख-दुख

सुब्रत रॉय पर ‘सहाराश्री’ नाम से फ़िल्म बना रहे ‘द केरल स्टोरी’ के निर्देशक सुदीप्तो सेन!

अमिताभ श्रीवास्तव-

द केरल स्टोरी फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन अब सहारा समूह के सर्वेसर्वा सुब्रत राय सहारा पर सहाराश्री नाम से फिल्म बनाने जा रहे हैं। फिल्म में गुलजार के गाने और ए आर रहमान का संगीत होगा। इस फिल्म के ओपेनिंग सीक्वेंस में सहारा समूह के निवेशकों की ओर से गुलजार का लिखा गाना अगर बैकग्राउंड में बजाया जाए तो बहुत सटीक बैठेगा- ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, मेरा सामान लौटा दो।’

गिरिजेश वशिष्ठ-

प्रोमोशनल फिल्म से ज्यादा की उम्मीद न करें, गुलजार और रहमान का नाम आते ही सहारा प्रमुख की सोच पता चल जाती है. जो करो बड़ा करो. इस फिल्म में कंपनी डूबने का प्रसंग आया तो सेबी को जिम्मेदार ठहराया जाएगा.

दयाशंकर राय-

पहले से ही बता दूं कि यह एक विवादित फ़िल्म होगी..! सुब्रत रॉय को जानने के लिए जहाँ पहुंचना चाहिए वहाँ पहुंचना बहुत मुश्किल है..!

सरफराज़ असलम-

अगर अच्छे से बनी होगी तो देखने लायक होगी एक स्कूटर से अपना सफ़र शुरू कर के आसमान की ऊंचाइयों तक पहुँचने वाले सहारा श्री की मायावी कथा !

सुनील यादव-

काश इस फिल्म मैं छोटे शहरों के उन हाथ ठेलो वालो सहित उन सभी के जीवन के बारे मै बताया जाए, जिन्होंने उम्मीद कर पैसा जमा किया जो वर्षो बाद आज भी तक किस्तों मैं मिल रहा है ब्याज तो दूर मूलधन मिल जाए वही बहुत है। इस फिल्म मैं सुदीप्तो सेन फैल हो जायेगे, क्योंकि केरला का सभी ने सुना था की ऐसा होता है, ये सबने देखा है की ऐसा हुआ है।

जय नारायण प्रसाद-

इसी को कहते हैं ‘प्रचार’ फिल्म ! प्रोपेगेंडा फिल्मों का ‘खेल’ बहुत तेजी से बढ़ रहा है। इसका यह मतलब नहीं है कि संजय लीला भंसाली और अनुराग कश्यप सिनेमा की नई परिभाषा/जुबान गढ़ रहे हैं। इन दिनों ने भारतीय सिनेमा को ‘भव्य’ की शक्ल में तब्दील किया है, जिसे अंग्रेजी में ‘ग्लैमराइज्ड’ करना कहते हैं। अभी पिछले हफ्ते बीबीसी (हिंदी) ने अनुराग कश्यप पर एक स्टोरी की है, जिसमें लिखा है अनुराग कश्यप ने सिनेमा की नई परिभाषा गढ़ी है। मुझे समझ में नहीं आता अनुराग कश्यप ने सिनेमा की कौन-सी नई परिभाषा गढ़ी है ! यह भी एक तरह का ‘प्रचार’ (प्रोपेगेंडा) है ! सिर्फ ‘केरला स्टोरी’ और ‘कश्मीर फाइल्स’ ही ‘प्रचार’ नहीं होता – अनुराग कश्यप और संजय लीला भंसाली भी ‘प्रचार’ के दायरे में आते हैं। अनुराग कश्यप और संजय लीला भंसाली का ‘प्रचार’ दूसरे ढंग का होता है ‘थोड़ा भव्य’, ‘थोड़ा अनुशासित’, ‘कहीं-कहीं जैंटलमैन’ जैसा, लेकिन है यह बेवकूफ बनाने वाला ही ! ‘केरला स्टोरी’ और ‘कश्मीर फाइल्स’ आसानी से पकड़ में आते हैं, भंसाली और कश्यप ‘भव्यता’ की आड़ में पूरा खेल खेलते हैं। इसे सिनेमा की जुबान में ‘ग्लैमराइज्ड’ करना कहते हैं। मेरा मानना है अब समय आ गया है भंसाली और कश्यप के सिनेमा की मनोवैज्ञानिक/सामाजिक पड़ताल होनी चाहिए। मैं खुद वर्षों से समानांतर/गंभीर सिनेमा पर लेखन से जुड़ा हूं। अभी सत्यजित राय पर मेरी एक किताब आई है। इन दिनों मैं ऋत्विक घटक पर डॉटाबेस काम कर रहा हूं। सिनेमा को पढ़ते/लिखते हुए अब महसूस होता है संजय लीला भंसाली और अनुराग कश्यप बेहतरीन सिनेमा की आड़ में भारतीय सिनेमा को ‘ग्लैमराइज्ड’ कर सिनेमा का कारोबार कर रहे हैं। यह भी एक तरह का गोरखधंधा है, लेकिन थोड़ा लीगल। ये‌ (लोग) ‘सिक्का का दूसरा पहलू’ है। सिक्का का ‘पहला पहलू’ ‘केरला स्टोरी’ है। सिनेमा की नई जुबान/परिभाषा गढ़ने के ‘तथाकथित प्रचार’ में भारतीय मीडिया घनघोर तौर पर इन दोनों की सहायक की भूमिका में है। पड़ताल इसकी भी होनी चाहिए। नहीं क्या ?

अरविंद वरुण-

जिस सहारा प्रमुख के कारण देश में सैकड़ों लोग सुसाइड कर चुके हैं। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन से संबंधित लोगों के लिए ये फ़िल्म अच्छी सीढ़ी है। व्यापार का जमाना है भाई। कुछ भी बेंच सकते हैं, मार्केट बनाना पड़ता है।

Bibhas kumar Shrivastav-

मैं जब गुलज़ार की आलोचना करता हूँ तो सब मेरे ऊपर कूद पड़ते हैं। गुलज़ार ग़ालिब आदि के लिखे को उड़ा कर लिखा। वो एक घटिया गीतकार हैं। और जब भारत रत्न सचिन इतना ग़रीब है कि उसे विज्ञापन करना पड़ रहा है तो ए आर रहमान की क्या औक़ात! ए आर रहमान का संगीत उत्तर भारत के संगीत के उपयुक्त नहीं है।

ख़ुशदीप सहगल-

सुदीप्तो सेन की ‘द केरल स्टोरी’ पर लहालोट होने वालों के लिए खुशखबरी…सेन अब सुब्रत रॉय पर बनने वाली फिल्म ‘सहाराश्री’ के साथ ‘सहारा प्रणाम’ करने जा रहे हैं… ‘द केरल स्टोरी’ के लिए सिनेमा हॉल्स की टिकट थोक में बुक कराने वाले अब उन छोटे निवेशकों को ‘सहाराश्री’ दिखाने ले जाएं जो अपनी ख़ून पसीने की कमाई डूबने से बे-सहारा हुए… सुदीप्तो सेन तो ठीक मुझे हैरानी ए आर रहमान और गुलज़ार के इस प्रोजेक्ट से जुड़ने पर है…. बीजेपी के महान नेता दिलीप सिंह जूदेव दुनिया को अलविदा कहने से पहले क्या ख़ूब कह गए…पैसा ख़ुदा तो नहीं पर ख़ुदा की कसम ख़ुदा से कम भी नहीं…

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