मोदी के नाम के साथ गाली लिखने का मामला : सावधान रहें, मीडिया के कंधे पर साजिश की बंदूक चलाई जा सकती है…

Naved Shikoh : मोदी विरोध की सुपारी! कुंठा और साजिश… फंस जायेगा मीडिया का मालिक… गोदी मीडिया के बाद अब विरोधी मीडिया सक्रिय है। इतनी बड़ी न्यूज एजेंसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली लिखने का मामला ऐसे ही नहीं हुआ है। इसमें एक बड़ी साजिश की बू आ रही है। नरेंद्र मोदी नाम के साथ जो गाली लिखी गयी है, ‘बकचोद’, उसका मोटा अर्थ है- खूब झूठ और बे सिर पैर की बातें बोलने वाला। Continue reading

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पत्रकारों की ब्लैकमेलिंग से परेशान है हर आम-ओ-खास!

ब्लैकमेलिंग के खिलाफ कोई भी पत्रकार संगठन कभी नहीं बोला! अब नौबत यहां तक आ गई है कि सरकार और गैर सरकारी व्यवसायिक संस्थायें ब्लैकमेलिंग वाली पत्रकारिता से बचने की तरकीबों पर काम करने लगे हैं। पत्रकारिता के बलात्कार के इस तमाशे के दौरान ईमानदार पत्रकार और इनके संगठन अभी भी आंख, कान और मुंह बंद किये हैं। दूसरी के स्याह-सफेद में झांकने के प्रोफेशन पत्रकारिता में सक्रिय ये जिम्मेदार पत्रकार अपने घर में घुसे बहुरूपियों को खदेड़ने की जिम्मेदारी नहीं निभाते। Continue reading

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लखनऊ वाले गांधी और हरिद्वार वाले बाबा के आगे मीडिया क्यों लाचार है…

Naved Shikoh

लखनऊ में सीएमएस वाले गांधी और देशभर में बाबा रामदेव के आगे मीडिया के हाथ क्यों बंधे हैं! सुना है देशभर के कार्पोरेट घरानों के लिए काम करने वाली पीआर कंपनियां गांधी और रामदेव के मीडिया मैनेजमेंट पर रिसर्च कर रही हैं। कई इंस्टीट्यूट मास कम्युनिकेशन के पीआर क्लासेस के लिए रामदेव और गांधी को अतिथि प्रवक्ता के तौर पर आमंत्रित करने पर विचार कर रहे हैं। ताकि इनसे मीडिया मैनेजमेंट के गुण सीखकर बच्चे पत्रकारिता का शोक़ त्यागें और पत्रकारों को उंगलियों पर नचाने का हुनर सीख सकें। Continue reading

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अमीश देवगन जैसे स्टार एंकर से मज़बूत तो साप्ताहिक झपट्टा टाइम्स का पत्रकार है!

Naved Shikoh : छोटे अखबार के पत्रकार को ‘भड़वा’ तो दूर कोई ‘कड़वा’ बोल दे तो विरोध की आंधी आ जाये… चकाचौंध वाले देश के टॉप क्लास बड़े-बड़े न्यूज चैनल्स के नामी-गिरामी स्टार मीडिया कर्मियों से कहीं ज्यादा ताकतवर और एकजुट हैं हम। हमारे लखनऊ के छोटे से छोटे पत्रकार की फटफटिया के हैंडिल पर ट्राफिक पुलिस का सिपाही हाथ भी रख देता है तो हम लोग सिपाही को निलंबित करने का ज्ञापन लेकर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह या प्रमुख सचिव सूचना के कमरे में धावा बोल देते हैं। Continue reading

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योगी सरकार के करोड़ों के इस विज्ञापन में कार्यक्रम स्थल का नाम ही नहीं है

सिस्टम को टीबी का सुबूत… जगाने का काम करने वाले सोते हुए कर रहे हैं काम… करोड़ों के बजट वाले इस विज्ञापन में पूरी रामकथा है। लेकिन रामकथा में राम जी का ही नाम नहीं है। कार्यक्रम की पूरी जानकारी है पर ये लिखना भूल गये कि कहां है कार्यक्रम।

उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के सभी बड़े अखबारों में आज ये फुल पेज विज्ञापन छपा है। इस विज्ञापन में सरकार ने करोड़ों रूपये खर्च किये हैं।  खैर जब सिस्टम को ही टीबी हो गयी है तो टीबी को खत्म करने की जागरूकता भी टीबी का शिकार हो जाये तो ताज्जुब की बात नहीं।

लखनऊ के पत्रकार नवेद शिकोह की एफबी वॉल से.

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पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

यशवंत सिंह जी ने बिना संसाधनों और बिना किसी सपोर्ट के खुद के बूते पर भड़ास फोर मीडिया जैसा देश का पहला और एकमात्र प्लेटफार्म शुरु किया। जहां से पत्रकारों के हक़ की आवाज बुलंद होती है। जहां पत्रकारों का शोषण करने और उनका हक मारने वालों का कच्चा चिट्ठा खोला जाता है। यशवंत के भड़ास ने ना जाने कितने मीडिया समूहों की तानाशाही पर लगाम लगाई। शोषण की दास्तानों को देश-दुनिया तक फैलाकर दबाव बनाया। नतीजतन सैकड़ों मीडिया कर्मियों को यशवंत के भड़ास ने न्याय दिलवाया। मीडिया कर्मियों का वाजिब हक दिलवाया। देश में सैकड़ों बड़े-बड़े पत्रकार संगठन है। इनमें से ज्यादातर को आपने सत्ता और मीडिया समूहों के मालिकों की दलाली करते तो देखा होगा, लेकिन जरा बताइये, कितने संगठन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ लड़ते हैं? दिल्ली सहित देशभर के छोटे-बड़े प्रेस क्लबों में क्या हो रहा है आपको बताने की जरुरत नहीं।

मैं 24 बरस से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरन्तर संघर्ष कर रहा हूँ। आधा दर्जन से अधिक छोटे-बड़े मीडिया ग्रुप्स में काम किया है। मैंने देखा है किस तरह सरकारों और अखबार- चैनलों के मालिकों के काले कारनामों की कालक एक ईमानदार पत्रकार को किस तरह अपने चेहरे पर पोतनी पड़ती है। नैतिकता-निष्पक्षता-निर्भीकता और पत्रकारिता के सिद्धांतों-संस्कारों की बात करने वाले ईमानदार पत्रकार के चूतड़ पर चार लातें मार के भगा दिया जाता है। आज के माहौल ने मिशन वाली पत्रकारिता को तेल लेने भेज दिया है। ये तेल शायद मिशन की पत्रकारिता करने की चाहत रखने वाले भूखे पत्रकारों की मज़ार पर चराग के काम आ जाये।

कार्पोरेट और हुकूमतों की मोहताज बन चुकी पत्रकारिता को तवायफ का कोठा बना देने की साजिशों चल रही हैं। पत्रकार का कलम गुलाम हो गया है। अपने विवेक से एक शब्द नहीं लिख सकता। वैश्या जैसा मजबूर हो गया पत्रकार। पैसे देने वाला सबकुछ तय करेगा। पत्रकारिता को कोठे पर बिठाने वालों ने कोठे के दलालों की तरह सत्ता की दलाली करने वालों के चेहरे पर पत्रकार का मुखौटा लगा दिया है। इस माहौल के खिलाफ लड़ रहे हैं यशवंत सिंह और उनका भड़ास। साथ ही यशवंत का व्यक्तित्व और कार्यशैली इस बात का संदेश भी देता है कि कार्पोरेट घराने या हुकूमतें के इशारे पर यदि आपसे पत्रकारिता का बलात्कार करवाया जा रहा है तो ऐसा मत करें। अपना और अपने पेशे का ज़मीर मत बेचो। इसके खिलाफ आवाज उठाओ। नौकरी छोड़ दो। बहुत ही कम खर्च वाले वेब मीडिया के सहारे सच्ची पत्रकारिता के पेशे को बरकरार रख सकते हैं।

कितना लिखूं , बहुत सारे अहसान हैं। जब हमअपने मालिकों/मैनेजमेंट की प्रताड़ना का शिकार होते हैं। अपने हक की तनख्वाह के लिए सटपटा रहे होते हैं। बिना कारण के निकाल दिये जाते हैं। तो हम लेबर कोर्ट नहीं जाते। पत्रकारों की यूनियन के पास भी फरियाद के लिए नहीं जाते। मालुम है लेबर कोर्ट जाने से कुछ हासिल नहीं होता। पत्रकार संगठनों के पत्रकार नेताओं से दुखड़ा रोने से कोई नतीजा नहीं निकलता। प्रेस क्लबों में दारू – बिरयानी और राजनीति के सिवा कुछ नहीं होता। पीड़ित का एक ही आसरा होता है- यशवंत का भड़ास। इस प्लेटफार्म से मालिक भी डरता है- मैनेजमेंट भी और सरकारें भी। पत्रकारिता के जीवन की छठी से लेकर तेहरवीं का सहारा बने भड़ास में नौकरी जाने की भड़ास ही नहीं निकलती, नौकरी ढूंढने की संभावना भी पत्रकारों के लिए मददगार साबित होती हैं।

वेबमीडिया की शैशव अवस्था में ही पत्रकारों का मददगार भड़ास पोर्टल शुरु करके नायाब कॉन्सेप्ट लाने वाला क्या दिल्ली प्रेस क्लब की सूरत नहीं बदल सकता है। आगामी 25 नवंबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव के लिए लखनऊ के एक पत्रकार की गुज़ारिश पर ग़ौर फरमाएं :- दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में मैंनेजिंग कमेटी के सदस्य के लिए क्रान्तिकारी पत्रकार यशवंत सिंह को अपना बहुमूल्य वोट ज़रूर दीजिएगा। यशवंत सिंह का बैलेट नंबर 33 है।

नवेद शिकोह
पत्रकार ‘लखनऊ
वरिष्ठ सदस्य
उ. प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
8090180256 9918223245
Navedshikoh@rediffmail.com

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इन्टरनेट के इस दौर में कलमकार भूखा नहीं मरेगा

Naved Shikoh : अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं… RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में बड़े अखबारों को छोड़कर किसी अन्य को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा! यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं।

जुमलेबाजी की जादूगरी से सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने का हुनर रखने वाले कलमकारों की मांग बढ़ गयी है। प्रत्याशियों को प्रचारित करते हुए कलमकारों का हुनर मुफ्त के प्लेटफार्म सोशल मीडिया पर मुखरित होगा। पत्रकार खबर इन्टरव्यू/फर्जी सर्वै/फीचर का हुनर दिखायेगा। कवि-शायर तुकबंदी के जादू से पैसा कमा सकेगा। लेकिन पत्रकारों के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन मृत्यु शय्या पर पड़े इनके रोजगार की संजीवनी साबित होगा।

देशभर के ज्यादातर अखबारों के बंद हो जाने के पूरे आसार है। बेरोजगारी के खतरों के बीच पत्रकार सोशल मीडिया पर पेड न्यूज में अपनी रोजी-रोटी तलाशने लगा है। इन्टरनेट का जदीद दौर पुराने दौर में भी लिए जा रहा है जहां कलमकार का दर्जा किसी अखबार के मालिक से ऊंचा होता था। लेकिन आज लाइजनिंग, सियासत और मीडिया संचालकों के मोहताज होते जा रहे थे कलमकार। वक्त ने करवट ले ली है। इन्टरनेट (सोशल मीडिया /वेबसाइट) के जरिए कलमकार अब किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा। जिसमें लिखने की कला है वो बेरोजगारी की इस आंधी में भी भूखा नहीं रहेगा। एक हाथ से लिखेगा और दूसरे हाथ से पैसा लेगा।

-नवेद शिकोह
पत्रकार, लखनऊ
9918223245

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लखनऊ के पत्रकारों को दीपावली पर प्रदेश सरकार ने नहीं भेजी मिठाई

कल्याण सिंह की परम्परा योगी ने तोड़ी…  पत्रकारों की सरकारी मिठाई खटाई में पड़ी… वरिष्ठ पत्रकार के घर दीपावली मिलने गया। लंच का वक्त था। दोपहर के खाने का इंतजाम था। खाने के बाद मैंने खुद बेगैरती से कुछ मीठा खाने की जिद करते हुए कहा कि आज दीपावली है मिठाई तो खिलाना ही पड़ेगी। वरिष्ठ पत्रकार महोदय बोले अभी तक आई नहीं। शाम तक आना शायद आ जाये। मैंने कहा किस नौकरानी से मिठाई मंगवाई है जो शाम को मिठाई लायेगी। निकाल बाहर करिये उसे। आप जैसे पत्रकार सरकारें भगा देते हैं नौकरानी नहीं भगा सकते। 

बोले- कोई नौकरानी-वौकरानी मिठाई लेने नहीं गयी है। मुझे कल से इंतजार है कि हर साल की तरह घर पर दीपावली की सरकारी मिठाई आयेगी।

आगे ठंडी सांस लेकर बोले- अब शायद ना आये। आना होती तो हर बार की तरह धनतेरस के दिन ही आ जाती।कल्याण सिंह की परम्परा शायद योगी जी ने तोड़ दी। खैर ठीक ही किया। बीस-तीस वर्षों से पिछली सरकारों की मिठाई खा रहे पत्रकार भी बहुत मीठे हो गये थे। अब बस नमक ही खायें ताकि नमकहरामी ना कर सकें। इतने में केशव भाई की मिठाई आ गयी….

लखनऊ से वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह की रिपोर्ट. संपर्क : 8090180256, navedshikoh84@rediffmail.com

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मकान खाली कराने का डंडा इमानदारी से भरा है, इसे रोकने में हम क्यों साथ दें?

-नवेद शिकोह-

मुसीबत में लखनऊ के पत्रकार, फिर भी आपस में तकरार… केंद्र सरकार ने अखबारों पर तलवार चलायी तो हजारों पत्रकारों की नौकरी पर बन आयी। पत्रकारों ने मदद की गुहार लगाई तो स्वतंत्र पत्रकार की प्रेस मान्यता वाले दिग्गज / रिटायर्ड / प्रभावशाली पत्रकारों ने कहा कि हम इमानदारी की तलवार को रोकने की कोशिश क्यों करें? अच्छा है, फर्जी अखबार और उनसे जुड़े फर्जी पत्रकार खत्म हों। इसी बीच यूपी की प्रदेश सरकार ने बड़े पत्रकारों से बड़े-बड़े सरकारी मकान खाली कराने का डंडा चलाया। बड़ों ने एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए छोटों का समर्थन जुटाने का प्रयास किया। छोटों को बदला लेने का मौका मिल गया।  बोले- मकान खाली करने का डंडा इमानदारी का डंडा है। इसे रोकने में हम क्यों साथ दें। अच्छा है- करोड़ों के निजी मकानों के मालिकों को सरकारी मकानों से बाहर करना ईमानदारी का फैसला है।

किसी न किसी तरीके से सरकारों से परेशान लखनवी पत्रकार मुसीबतों के इस दौर में भी आपस मे ही उलझे हैं। और पत्रकारों की एकता की कोशिश तेल लेने चली गयी है। लखनऊ के तुर्रमखां पत्रकारों से न सिर्फ सरकारी मकान छिनेंगे बल्कि ये जेल की हवा भी खा सकते हैं। बरसों से वीवीआईपी कालोनियों में रह रहे ये दिग्गज पत्रकार अब उस नियमावली की गिरफ्तार में आ गये हैं जिसके तहत जिनके निजि मकान या भूखंड है उन्हें सरकारी मकान में रहने का हक नही है। निजी मकान होने के कारण ये राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा मांगे गये निजी मकान न होने का हलफनामा नहीं दे रहे हैँ। इसलिए इनके सरकारी मकानों को दूसरों (गैर पत्रकारों) के नाम आवंटित करने का सिलसिला शुरू होने वाला है। जिन्होंने निजी मकान होने के बाद भी मकान न होने का झूठा हलफनामा दे दिया है उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरु होगी। इन सबसे कई वर्षों का कामर्शियल किराया भी लिया जा सकता है।

इन खतरों के बावजूद भी करोड़ों की सम्पत्ति वाले कुछ पत्रकार सरकारी मकान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ये लोग सरकार के इस रुख से लड़ने के लिए एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वो 95%पत्रकार जिन्हें कभी सरकारी मकान का लाभ नहीं मिला वो इनके साथ आना तो दूर सरकार के इस फैसले का मूक समर्थन कर रहे हैं।  इस माहौल में पत्रकारों के दो गुटों में तकरार बढ़ती जा रही है। आम पत्रकारों के बड़े गुट का कहना है कि अखबारों को खत्म करने की नीतियों के खिलाफ ये दिग्गज पत्रकार कभी हमारे दुख-दर्द में साथ नहीं आये।

बीस-तीस लीडिंग ब्रान्डेड मीडिया घरानों से जुड़े पत्रकारों को छोड़कर देश के 95/ पत्रकारों की रोजी-रोटी दांव पर है। लेकिन लखनऊ के पत्रकारों की हालत कुछ ज्यादा ही पतली हो गई है। यहाँ फाइल कापी अखबारों के पत्रकारों की सबसे अधिक तकरीबन तीन सौ राज्य मुख्यालय की मान्यतायें हैं। लखनऊ सहित यूपी के सौ-सवा सौ मंझौले अखबारों से लगभग दो सौ पत्रकारों की राज्य मुख्यालय की मान्यता है। इसके अतिरिक्त बड़े अखबारों और छोटे-बड़े न्यूज चैनलों/एजेंसियों से तीन सौ से अधिक पत्रकार/कैमरा पर्सन मान्यता प्राप्त हैं। बाकी रिटायर्ड पत्रकार बतौर स्वतंत्र पत्रकार /वरिष्ठ पत्रकार मान्यता का लाभ ले रहे हैं।

डीएवीपी की सख्त नीतियों ने अभी हाल ही में देश के 90%अखबारों(फाइल कापी और मंझोले) को कहीं का नहीं छोड़ा। प्रसार की जांच में ज्यादातर नप गये।  अखबारों को मजबूरी में एनुअल रिटर्न में 70%तक प्रसार कम दिखाना पड़ा। इस दौरान इन मुसीबत के मारों पर मुसीबत का सबसे बड़ा पहाड़ ये टूटा कि न्यूज प्रिंट पर भी GST लागू हो गया। इन सबका सीधा असर देश भर के 80% पत्रकारों के रोजगार पर पड़ा। लखनऊ के छोटे/कम संसाधन वाले संघर्षशील/फाइल कापी वाले/मझोले यानी सैकेंड लाइन के अखबारों के पत्रकार बिलबिला रहे थे। वो चाहते थे कि बड़े/वरिष्ठ /प्रभावशाली पत्रकार/पत्रकार नेता/पत्रकार संगठन डीएवीपी की नीतियों और न्यूज प्रिंट पर GST का विरोध करें। लेकिन कोई बड़ा विरोध के लिए सामने नहीं आया। क्योंकि इनकी प्रेस मान्यता स्वतंत्र पत्रकार की है इसलिए ये अपने को महफूज मान रहे थे।

लखनऊ में ऐसे रिटायर्ड और प्रभावशाली पत्रकारों की बड़ी जमात है जो सरकारों के बेहद करीब रहते है। इनमें से ज्यादातर पत्रकार संगठन चलाकर सरकारों से अपना उल्लू सीधा करते है। इन पत्रकारों को इस बात की भी कुंठा थी कि पिछली सरकार ने थोक के हिसाब से नये लोगों को राज्य मुख्यालय की मान्यता क्यों दे दी। इन कथित मठाधीशों का ये भी आरोप है कि जिनका पत्रकारिता की दुनिया से दूर-दूर तक कोई भी लेना देना नहीं था ऐसे सैकड़ों लोगों ने फाइल कापी के अखबारों का रैकेट शुरु किया। फर्जी कागजों के झूठे दावों और घूस के दम पर फाइल कापी के अखबारों का प्रसार 25 से 65 हजार तक Davp से एप्रूव करा लिया। इन अखबारों से सीधे फर्जी तौर पर राज्य मुख्यालय की मान्यता करायी और लाखों-करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन का अनैतिक लाभ लिया।

अपनी इस थिंकिंग के होते ही ये डीएवीपी की सख्त पालिसी और न्यूज प्रिंट पर GST की मुखालफत में आगे आना तो दूर बल्कि मूक समर्थन करते दिखे। अब सरकारी मकानों को खाली करने और जांच के घेरे में आ गये तो अलग-थलग पड़ गये हैं। पत्रकारों की मैजौरिटी इनका साथ देने को तैयार नहीं है। चौतरफा मुसीबतों की इस घड़ी में जिसको साथ होना चाहिए था वो बेचारी पत्रकारों के अधिकारों के जनाजों पर चराग जलाने के लिए तेल लेने गयी है। हालांकि इस बेचारी एकता (पत्रकारों की एकता) को बुलाने की कोशिश भी जारी है। 

लेखक नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh@rediffmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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यूपी के बड़े पत्रकार नेताओं से कुछ बड़े सवाल

साहब, कुछ तो बोलना पड़ेगा तुम्हें। बुजुर्ग पत्रकार राजेन्द्र प्रसाद मीमांसा को लखनऊ RTO आफिस में पीटा गया। जिन्हें तुम फट्टर कहते हो, ऐसे बीस-तीस लोग पीड़ित के हक की लड़ाई लड़ते रहे। डीएम से लेकर सीएम से मिले। ये फट्टर हैं, तुम लोग ब्रांड हो.. स्थापित हो.. बड़ी पहचान वाले हो… समय-समय पर पत्रकारों ने तुम्हें नेतृत्व के लिये चुना है। अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी दी है। सरकारें भी तुम लोगों को ही पत्रकारों का असली नेता मानतीं हैं। पत्रकारों के डेरे के तुम ही राम हो और तुम ही रहीम भी। तो फिर मीमांसा जैसे तमाम मामलों में क्यों खामोश रहते हो.. क्यों नहीँ सामने आते.. क्यों ऐसे मौकों पर अज्ञातवास में चले जाते हो.. क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करते हो।

अगर तुम मीमांसा जैसों को फर्जी पत्रकार मानते हो तो इनका वोट क्यों लेते हो? इनके वोट से जीता नेता भी तो फर्जी पत्रकार नेता हुआ। छोटे.. संघर्षशील और कमजोर की मदद करना तो तुम्हारा पहला फर्ज है। और, यदि तुम इनकी मदद इसलिए नही करते.. तुम इनके मामले में इसलिए नहीँ पड़ते, क्योंकि तुम इन्हें पत्रकार ही नहीं मानते। यदि तुम इन्हें पत्रकार के भेष में ब्लैकमेलर मानते हो.. दलाल मानते हो.. डग्गामार मानते हो.. बर्फ वाला.. पंचर वाला.. फर्जी पत्रकार मानते हो, फिर तो तुम ज्यादा बड़े गुनाहगार हो। पत्रकार बिरादरी के दोषी हो।

क्या पत्रकारों ने तुम्हें हमेशा इसीलिए नेता चुना कि तुम्हारे होते हुए पत्रकारों की फील्ड में पत्रकार के भेष में ब्लैकमेलर और दलाल घुस आयें और तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहो.. तुम खामोश रहो.. तुम कैसे पत्रकार नेता हो यार? तुम कैसे पहरेदार हो? तुम कैसे अपने घर में घुसपैठियों को घुसने दे रहे हो? साफ-साफ बताओ अपनी खामोशी का राज। निम्न में क्या सच है :-

1- ये छोटे यानी संघर्षरत-संघर्षशील.. गरीब.. छोटे अखबारों के पत्रकार हैं इसलिए इनके हक की लड़ाई नहीँ लड़ते।

2- इनके हक की लड़ाई के चक्कर में सरकार से बुरे नही बनना चाहते। इनके लिए लड़ेंगे तो सरकार बुरा मान जायेगी। सरकार नाराज हो गयी तो मकान-दुकान बंद हो जायेगी। निजि काम नहीँ हो सकेगें।

3- इन्हें पत्रकार ही नहीं स्वीकारते। ये फर्जी पत्रकार हैं। दलाल हैं। ब्लैकमेलर हैं। इन्हें लिखना तक नही आता। इन्होंने कभी किसी अखबार में काम ही नहीं किया। जुगाड़ से मान्यता करा ली है। ये पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं।

4- तीसरा बिन्दु सही है लेकिन हम नेता लोग गंदी राजनीति और निजी स्वार्थ के तहत इस सच्चाई पर वोटों की खातिर मुंह बंद रखना बेहतर समझते हैं।

खुद का घर शीशे का है इसलिए इनके घर पत्थर नहीं फेंकना चाहते।

नवेद शिकोह “लंकेश”

लखनऊ

9918223245

Navedshikoh84@rediffmail. com

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‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

एक ने कहा- ‘बड़े-बड़ों की फटी पड़ी है लेकिन इस यशवंत के सुर-लय में कोई फर्क नहीं आया’। एक मीडिया समूह के मालिक का चमचा और मैनेजमेंट का आदमी लगा रहा था, बोला- ‘हम लोगों ने तो आफिस के हर सिस्टम से भड़ास ब्लॉक करवा दिया है’। एक बेवड़ा कहने लगा कि हिम्मत तो देखो यशवंत की, बेलगाम इतना है कि नीता अंबानी तक के बारे मे भी लिखने से नहीं डरता। एक मोटा आसामी बोला- ‘बड़ा वाला लंकेश है यशवंत, इसे तो जान से मारना चाहिए था।’

ये हैं दोनों हमलावर…

इनकी बातें सुनकर लगा कि सच लिखने वाले निर्भीक पत्रकारों की आवाज बंद करने के लिए न सिर्फ अंबानी-अडानी के चैनल इस्तेमाल हो रहे हैं बल्कि टुच्चे और दलाल किस्म के पत्रकारों को भी निडर पत्रकारों को डराने धमकाने के लिए मारने-पीटने की सुपारी दी जा रही है। सरकार के भोपू चैनल हों या भुप्पी जैसे टुच्चे और दलाल पत्रकार, इन्हें कहीं न कहीं से सच लिखने वाले यशवंत सिंह जैसे पत्रकारों को डरा कर खामोश करने की सुपारी दी जा रही है।

उधर, लखनऊ के कई पत्रकार संगठनो ने बैठक की। उत्तर प्रदेश जिला मान्यता प्राप्त पत्रकार एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस बैठक में आधा दर्जन पत्रकार संगठनों के सैकड़ों पत्रकारों ने शिरकत की। पत्रकारों ने यशवंत सिंह के हमलावरों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किये जाने की मांग की।

नवेद शिकोह लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 9918223245 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मुसलमानों, तुम राम मंदिर बनवा देते तो भाजपा की हुकुमते नहीं, कब्र बन चुकी होती

अरे भाई, अब तो राम मंदिर निर्माण में अपनी सहमति और सहयोग दे दो मुसलमानो, नहीं तो ..ऽऽऽ###ऽऽऽऽऽ  ####ऽऽऽ##….ऽऽऽऽऽ…##ऽऽऽ##…ऽऽऽ… अगर मंदिर बनवा दिया तो तम्हेँ भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक और सहयोगी मान लिया जायेगा। तुम खुद और तुम्हारे चहीते धर्मनिरपेक्ष दल ही तो कहते हैं कि भाजपा राम मंदिर के मुद्दे को भुनाती रही है। राम मंदिर का मुद्दा ना होता तो भाजपा की हैसियत तीन-चार सीटों से ज्यादा नहीं होती। केन्द्र और प्रदेशों की सत्ता तो बहुत दूर की बात है। मुसलमानों, भाजपा पर तुम्हारे इल्जाम बराबर से तुम्हें भी घेरते हैं। राम मंदिर के मुद्दे को भुनाने में तुम (मुस्लिम कौम) भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी / मददगार हो। अगर ऐसा ना होता तो तुम राम जन्म भूमि पर राम मंदिर बनने की सहमति और सहयोग दे चुके होते। और भाजपा खुद-ब-खुद आगे नहीं बढ़ पाती।

तुम्हारे पास क्या मस्जिदों की कोई कमी है? दुनिया का पहला ऐसा मुल्क है हिन्दुस्तान जहाँ सबसे ज्यादा मस्जिदेँ हैं। इस्लामिक मुल्कों में भी मुसलमानों को इतनी मजहबी आजादी नहीं जितनी मजहबी आजादी भारत में भारतीय मुसलमानों को है। मुसलमानों से इस तरह के सवाल और राम मंदिर बनावाने की सहमति की गुजारिश करना आजकल मेरा शगल (दिनचर्या) बन गया है। अयोध्या मसले पर अदालत ने दोनों समदाओँ से मिल-बैठ कर सुलह-समझौते की जब से सलाह दी है तब से मैं इस कोशिश में हूँ कि मुसलमान अपनी मर्जी  से राम मंदिर से अपना दावा छोड़ कर राम मंदिर निर्माण में अपनी सहमति और सहयोग देँ।

प्रतीकात्मक रायशुमारी से ये पता चला कि 60 फीसद मुसलमान राम जन्म भूमि पर राम मंदिर निर्माण के पक्षधर हैं जबकि बाकी अदालत के अंतिम फैसले पर इस मसले को छोड़ने की बात करते हैं।  लेकिन इस बात से किसी को इन्कार नहीं कि मुसलमानों ने राम जन्म भूमि से दावा छोड़ दिया होता तो भाजपा ना इस मद्दे को भुना पाती और ना ही गंगा-जमुनी तहजीब वाली भारतीय समाज में किसी किस्म की दरार पैदा होती। राम मंदिर निर्माण पर समझौते को राजी होने को तैयार मुसलमानों को इस बात का पछतावा है कि उनकी कौम को उस दौर में राम मंदिर पर सहमत हो जाना चाहिये था जब केन्द्र और यूपी में भाजपा की सरकार नहीं हो।

और, यदि अब मुसलमान राम मंदिर निर्माण पर राजी हो जाते हैं तो इसका क्रेडिट (श्रेय) भाजपा ना ले जाये। ये ना समझा जाये कि भाजपा की सरकारों के दबाव और डर से मुसलमानों को अयोध्या मसले पर झुकना पड़ा। एक मुस्लिम इदारे ने अपनी राय रखी कि मुसलमानों को इन्तेजार करना चाहिये है कि जिस दौर में केन्द्र और यूपी में भाजपा की सरकारे नहीं रहें तब मुसलमानों को राम मंदिर निर्माण पर अपनी सहमति दे देँ। एक मुस्लिम धार्मिक नेता ने ये कहा कि राम मंदिर पर सहमति देने के लिये ये शर्त रखी जाये कि भाजपा सत्ता छोड़ दे तो मुसलमान राम जन्म भूमि पर राम मंदिर के लिये राजी हो जायेँगे।

नवेद शिकोह
Navedshikoh84@gmail.Com
08090180256

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सैल्यूट सत्येन्द्र मुरली

अरनब, सुधीर और रजत जैसे अपना जमीर और अरबों-खरबो का झूठ बेचकर भी जो नाम नही कमा सके उससे ज्यादा नाम तुमने अपनी हिम्मत से एक सच बयाँ करके कमा लिया। इतने बड़े नाम वाले पत्रकार…इतने बड़े नाम वाले मीडिया समूह… इतनी बड़ी बोली मे बिकने वाले न्यूज चैनल.. इतने बड़े वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इतना बड़ा झूठ कैसे दिखाते! अगर आप जैसे सच्चे और हिम्मत वाले ये हिम्मत न करते..ये सच बयाँ न करते तो झूठ के महल के नीचे दबा रहता सच का अमृत।

हर दौर हर जमाने में सरकारी भोंपू कहे जाने वाले दूरदर्शन का सरकारी दबाव में काम करना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन नाम का असर कभी न कभी काम जरूर करता है। नरेंद्र मोदी के झूठ का सच बयाँ करने में सत्येन्द्र मुरली ने ना सिर्फ अपने नाम का असर दिखाया है बल्कि दूरदर्शन कर्मी होने के नाते उन्होने दूरदर्शन के लोगो ‘सत्मय जयते’ की लाज रख ली।

आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का दूरदर्शन पर लाइव सन्देश चला कि आज के बाद पाँच सौ और एक हजार ने नोट चलन से बाहर हो जायेंगे।दरअसल नोटबंदी की घोषणा वाला ये संदेश सजीव नही बल्कि रिकार्डेड था। दूरदर्शन में कार्यरत पत्रकार सत्येंद्र मुरली ने पत्रकारों को पूरे विश्वास और सुबूतो के साथ बताया कि आठ नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दूरदर्शन पर नोटबंदी की जो घोषणा की थी वो सीधा प्रसारण नही था बल्कि इसे पहले ही रिकॉर्ड करके भेज जा चुका था। देश मे खलबली मचा देने वाली प्रधानमंत्री द्वारा नोटबंदी की घोषणा वाली ये खबर देशभर के चैनलों ने दूरदर्शन लाइव के साथ चलायी थी।

दूरदर्शन मे बतौर पत्रकार काम करने वाले सत्येन्द्र मुरली ने बाकायदा नई दिल्ली स्थिति प्रेस क्लब आफ इन्डिया मे देश की मीडिया के सामने प्रधानमंत्री के झूठ की सच्चाई का खुलासा किया। उन्होने एक प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की जिसका मौजू था-  मैं बतौर दूरदर्शन समाचार में कार्यरत पत्रकार सत्येन्द्र मुरली जिम्मेदारीपूर्वक दावा कर रहा हूं कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश लाइव नहीं था, बल्कि पहले से रिकॉर्डेड और एडिट किया हुआ था दरअसल मोदी सरकार के फरेब के पीछे की सच्चाई ये है कि आठ नवम्बर शाम 6 बजे रिजर्व बैंक आप इन्डिया से प्रस्ताव मँगवा लेने के बाद महज दुनियाँ को दिखाने के लिये कैबिनेट की बैठक का दिखावा किया गया।

अस्ल बात ये है कि आरबीआई का प्रस्ताव और शाम सात बजे कैबिनेट की बैठक से कई दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिये राष्ट्र के नाम संदेश तैयार किया जा चुका था।

नवेद शिकोह
NAVEDSHIKOH84@REDIFFMAIL.COM
8090180256

मूल खबर….

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सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी चैनल को खत्म करो!

गले में बाँधे रहते थे, अब मुँह पर पट्टा बाँधे हैं,
पालतू हैं हम मोदी के, इस बात का गंडा बाँधे हैं।
सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी को खत्म करो,
झूठ के भोपू वाले हैं, हम झूठ का दामन थामे हैं।

ये पंक्तियाँ उन चंद तथाकथित बिकाऊ पत्रकारों की भावनाओं की कल्पना है जिन्हें कोई अंध भक्त कहता है, कोई सरकार के झूठ का भोंपू तो कोई मोदी का पालतू। आजाद पत्रकारिता और निष्पक्ष कलम जब सरकार की गलत नीतियों का बखान करने लगता है तो पालतू गला फाड़-फाड़ कर भोंकते हैं। सरकार की मुखालिफत पर ये अक्सर काट भी लेते हैं। लेकिन इनके काटने से पीड़ितों को ना इन्जेक्शन लगवाना पड़ता है और न ही जान का खतरा महसूस होता है। मेडिकल साइंस कहती है कि काटने वाला जब तक जीवित है तब तक पीड़ित खतरे से बाहर है। अभी तीन साल तक इन्हे चंद टुकड़ों की ताकत जिन्दा रखेगी और सत्ता की ताकत इन्हेँ झूठ का साथ देने की आब-ए-हयात देती रहेगी। झूठ की हिफाजत के लिये निष्पक्ष पत्रकारिता पर जो भौकते रहते है उनका मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों पर खामोश रहना स्वाभाविक भी है।

9 नवंबर को एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध के खिलाफ बुलंद आवाजो मे खामोशी इख्तियार करने वाले पत्रकारों/पत्रकार संगठनों को तानाशाही मोदी सरकार का पालतू करार दिया जा रहा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नई दमनकारी विज्ञापन नीति के बाद एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध को केन्द्र सरकार के आगे नतमस्तक हो जाने की अप्रत्यक्ष चेतावनी माना जा रहा है। हिन्दुस्तानी मीडिया की आजादी को दौलत की जंजीरो मे बाँधकर कैद करने वाली नीतियों के खिलाफ पत्रकारों का गुस्सा उन पत्रकारों के खिलाफ ज्यादा मुखर हो गया है जो मोदी भक्ति मे मीडिया के खिलाफ केन्द्र सरकार के दमनकारी फैसलो पर खामोश है।

देशभर के पत्रकारों और मीडिया संगठनो मे एनडीटीवी पर एक दिन के लिये बैन को लेकर गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सबसे बड़े संगठन-  एडिटर्स गिल्ड आफ इन्डिया,  प्रेस क्लब आफ इन्डिया के अतिरिक्त देशभर के दर्जनों पत्रकार संगठन एनडीटीवी के समर्थन मे आकर केन्द्र सरकार के खिलाफ आन्दोलन की रूपरेखा तैयार कर रहे है। वहीं इस मामले पर यूपी सहित देश के चंद पत्रकार संगठनों की खामोशी इन्हें कटघरे में खड़ा कर रही है। इन संगठनो ने मीडिया को गुलामी की जंजीरो मे बाँधने वाली मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अब तक एक बयान तक भी नही दिया। यही नहीं, पत्रकारों और पत्रकारिता की आजादी के हक की बातेँ करने वाले इस तरह के कई मोदीपरस्त पत्रकार संगठन  एनडीटीवी पर बैन के तानाशाही कदम पर खामोशी इख्तियार किये हैं। इस खामोशी से ये शक और आरोप और भी उभरने लगे ही कि बड़े मीडिया समूहों को ही नही संगठनों की दुकान चलाने वाले कथित पत्रकारों को भी मोदी समर्थन की सुपारी के टुकड़े दिये जाते हैं।

लेखक नवेद शिकोह लखनऊ के पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 08090180256 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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मोदी भक्तों और मुखालिफ पत्रकारों में खिचीं तलवारें

पत्रकारों की टूटी दोस्ती, आपसी मधुर रिश्तों मे पड़ी फूट, मोदी विरोध में कई पत्रकारो की गयी नौकरियाँ, दो खेमों में बंटे पत्रकार, लखनऊ के दो नामी पत्रकार दोस्तों की दोस्ती का हुआ कत्ल.. : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के भक्तों और विरोधी पत्रकारों मे इन दिनों तलवारें खिंची हैं। सोशल मीडिया का बढ़ता रिवाज ऐसे विवादों में आग में घी का काम कर रहा है। भाजपाई और गैर भाजपाई पत्रकारों के दो गुट तैयार हो गये हैं। जो गाहे-बगाहे कभी किसी मुद्दे पर तो कभी किसी मसले पर आपस मे भिड़ जाते हैं।

मोदी भक्ति और विरोध में होती तकरारों मेँ कई नामीगिरामी पत्रकारों की दोस्ती में दरार आ गयी है। ऐसा ही कोई विवाद दारू के जाम लड़ने के साथ लड़ाई की शक्ल पैदा कर देता है तो कभी सोशल मीडिया पर माँ-बहन की गालियो की नौबत आ जाती है। प्रेस क्लब, मीडिया सेन्टर और पत्रकारों के whats app ग्रुप्स आये दिन मोदी समर्थन और विरोध का अखाड़ा बन जाते हैं। कल लखनऊ में ऐसा ही जबरदस्त वाकिया हुआ। दो नामीगिरामी वरिष्ठ पत्रकार आपस मे भिड़ गये। एक अंग्रेजी अखबार से जुड़े हैं, क्षत्रिय पत्रकारों की शान हैं। बड़े संगठनों में चुने हुए पत्रकार नेता भी रहे हैं। ये काफी समय तक दैनिक जागरण लखनऊ में भी रहे हैं। दूसरे मियाँ भाई हैं। प्रदेश के बड़े पत्रकारों मे शुमार हैं इनका नाम। ये भी एक बड़े पत्रकार संगठन में अध्यक्ष चुने जा चुके हैं। काँग्रेस के बड़े नेताओं से बहुत ही करीबी रिश्ते हैं इनके। ये लम्बे अरसे से एक उर्दू अखबार निकाल रहे हैं।

ये दोनों दिग्गज पत्रकारों का दोस्ताना रिश्ता रहा है लेकिन मोदी समर्थन और मुखालिफत के टकराव में कल इन दोनों पत्रकारों की दोस्ती का कत्ल हो गया। कल रात का ये झगड़ा लखनऊ के पत्रकारों की चर्चा का विषय बना हुआ है। इस लड़ाई पर वरिष्ठ पत्रकारों को नसीहत देने वाली नज्म भी मौका-ए-झगड़े पर लिख दी गयी :-

न मोदी काम आयेँगे, न राहुल आयेँगे
अपने ही काम आते हैं, अपने ही काम आयेँगे।
तुम दफन होगे तो क्या राहुल भी वहाँ आयेँगे !
जब जलोगे आप तो मोदी भी कहाँ आयेँगे !
जो हैं हमपेशा, हमारे दोस्त अपने जाँनशीँ।
मेरे मरने पर हमारे साथ ये ही जायेँगे।
न कबुतर न बटेरे न मुर्गे लड़वायेँगे,
ये सियासी लोग हैं आपस मे ही भिड़वायेँगे।

रहेगा ‘राज न यारो के बहादुर किस्से,
फुजूल बातो में रिश्ते  खत्म करायेँगे।
सियासी खेल हैं मुद्दे ‘जदीद मरकज’ के
तुम्हारा जज्बा हो कमजोर तो भड़कायेँगे।

जो टूट जायेँगे रिश्ते तो कौन देगा “हिसाब”
हुकुमते जो चलाते हैं मस्कुरायेँगे।।

नवेद शिकोह
पत्रकार
लखनऊ
Navedshikoh84@gmail.com
08090180256

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मिलीभगत का खेल तो नहीं बसपा-भाजपा का टकराव!

सोशल इन्जीनियरिँग का खेल खत्म समझो… जब जुल्म हमें कामयाबी का जायका दे और अपमान हमारे सम्मान के रास्ते खोले तब सुरक्षा और सम्मान किस काम का? आप ठीक कह रहे थे.. चुनावी तैयारियों की गहमागहमी में बसपा खामोश जरूर है, पर निष्क्रिय नहीं है। अंडरकरंट सब कुछ चल रहा है। सुरक्षा और सम्मान का पर्व नजदीक आ गया। गिफ्ट तो बनता है न! नरेंद्र मोदी जी के सबसे अहम सूबों यूपी और गुजरात की घटनाएँ बसपा के लिये रामबाण बन गयी है।

कहीं सुरक्षा को लेकर तो कहीं सम्मान को लेकर दो-दो हाथ करने जा रही बसपा के पास इससे माकूल मौका क्या होगा चुनावी बिगुल फूँकने का। लोकसभा चुनाव में सब धोखा खा चुके हैं। अब कोई प्रयोग नहीं होने वाला। किसी की कोई सोशल इन्जीनियरिँग अब नहीं चलने वाली। अपने-अपने परम्परागत वोट बैंकों को साधो और उन्हें रिझाओ। लगता है इस बात के समझौते के रूप मे ये दो घटनाएँ सामने आयी हैं।

चलो जो भी हो, अब इन गाली-गलौज के बाद यूपी में भाजपा सरकार या भाजपा समर्थित सरकार बनने की जो दस-बीस प्रतिशत उम्मीद थी वो लगभग खत्म हो गयी। यही बात यूपी में भाजपा के बहुमत से जीतने की उम्मीद की, तो भईया ये तो मुँगेरी लाल के हसीन सपने नहीं, मुँगेरी लाल के बाप के हंसीन सपने होंगे। देखना है तो देखो भईया, हम कौन होते हैं जो भक्तों को सपने देखने से रोकें। भक्ति में ही तो शक्ति है।               

लखनऊ से नवेद शिकोह की रिपोर्ट. संपर्क : navedshikoh84@gmail.com

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यूपी की चुनावी तैयारियों का हिस्सा न बन जायें isis के हरामखोर!

ये तो नही पता कि isis के लोगों का धर्म क्या है… किसी को तो छोड़ दो isis के हरामखोरों…

हाँलाकि उनके संगठन के नाम में ‘इस्लाम’ नाम का शब्द जुड़ा है, जैसा कि मथुरा के कंस रामवृक्ष ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस जी की आजाद हिन्द फौज के नाम से दहशतगर्दो का कुनबा तैयार करने की गुस्ताखी की थी। पर हाँ इस बात में कोई दो राय नही है कि इन्सानियत के दुश्मन इन वहशी दरिन्दों ने अब तक सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। आकड़े बताते है कि इन हरामखोरों (Isis) ने  ईसाइयों, यहूदियो, कुर्दों, यजीदियों इत्यादि से ज्यादा जान-माल का नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। यही नहीं, मुसलमानो के धार्मिक स्थल (मुख्य तीर्थ स्थल भी) तोड़ना isis का मुख्य लक्ष्य है।

भारतीय मुसलमानों शुक्र करो कि तुम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी और महात्मा बुद्ध के संस्कारों वाले देश भारत मे महफूज हो। तुम आजादी और सहयोग के साथ अपने धार्मिक फरीजे अदा करते हो और इस देश मे तम्हारे करोड़ों धार्मिक स्थल ( औसतन हर दो किलो मीटर के दायरे मे एक मस्जिद या दूसरे धार्मिक स्थल) है। यहाँ कोई Isis तुम पर जुल्म नहीं ढा सकता।

और हाँ, एक बात ध्यान से सुन लो मुसलमान भाईयो।

आत्म रक्षा के लिये…युद्ध कौशल मे दक्ष होने के लिये ..हथियार चलाना सीखने के लिये जो कभी-कभी प्रशिक्षण शिविर लगते है, उस पर तुम लोग आइन्दा कभी ऐतराज का हल्ला मत मचाना। तुम्हारे ये भाई ही isis को कुत्तों की मौत मारेंगे और उनसे तम्हारी जान बचायेंगे।

वैसे इन सुअरो (Isis) की मजाल नहीं है कि वो हमारे देश भारत की तरफ नजर उठाकर भी देखें।

लेकिन हाँ, हम बहुत मुतमईन (निश्चित) होकर भी नहीं बैठना चाहिए है।

यूपी का चुनाव नजदीक है। अपनी हारी हुई बाजी जीतने के प्रयासों में हो सकता है उनका यहाँ छोटा-मोटा टूर लगवाने के लिये कोई TA-DA भिजवा दे।

इन दरिन्दो के अमानवीय कृत्यों से जिनका लाभ होता होगा वैसी तमाम शैतानी शक्तियाँ ही इन शैतानों की आर्थिक सहायता करती ही होगी। तबाही मचाने की सुपारी से ही तो ये वित्त पोषित होते होगे।

आप सब तो समझदार हो.. जानते हो.. इस किस्म की. अमानवीय नापाक हरकतों वाली घटनाओं के माहौल में कहाँ-कहाँ, किसका-किसका, कब-कब और किस मौके पर किस किस्म का  फायदा होता है।

लेखक नवेद शिकोगह लखनऊ के युवा और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क उनकी मेल आईडी Navedshikoh84@gmail.com या उनके मोबाइल नंबर 08090180256 / 09369670660 से किया जा सकता है.

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हे लखनऊ वालों, आप खामोश दर्शक बनकर पत्रकारिता की इज्जत लुटते हुए देखिये

मैं मुखालिफत करुँ तो कहिए- भुखरादी कर रहा है.. एक ही मसले पर एक ही संगठन के दो पत्रकार गुटो ने लखनऊ मे नितीश कुमार को ज्ञापन देकर पत्रकारों की खिल्ली उड़वायी…

1- राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कहा जाने वाला पत्रकार संगठन ifwj
2- इस संगठन से लम्बे समय से जुड़े हुए वरिष्ठ और नामी-गिरामी पत्रकार नेता।
3- देश मे लगातार पत्रकारों पर हो रहे हमलो की गंभीर समस्या।
4- एक बड़े प्रदेश बिहार के मुख्यमंत्री और बहुत बड़े कद के नेता नितिश कुमार
      
स्थान- वीवीआईपी गैस्ट हाउस

पत्रकारों की एक गंभीर समस्या को एक गंभीर पत्रकार संगठन एक गंभीर राजनेता/मुख्यमंत्री के सामने कैसे रख रहा है :-

मुलाहिजा फरमाइये :-

एक ही समस्या और एक ही संगठन का ज्ञापन एक ही समय पर एक ही व्यक्ति को दिया जाता है। पर सब कुछ एक होने के बाद भी एक ही संगठन  और एक ही समस्या के  दो ज्ञापन दो गुटो द्वारा एक ही राजनेता को दिये जाना कितना शर्मनाक और कितना बड़ा खिडवाल है, इस बात का अंदाजा लगाया आपने ! तो क्या खाक कोई सरकार पत्रकारों की समस्याओं को गंभीरता से लेगी। तो क्या खाक हम ये समझे कि ये पत्रकार नेता पत्रकारों के हितो की नियत से ज्ञापन सौप रहे है।

ये सब देखकर भी हमसे अपेक्षा की जाये कि हम ये न कहे कि नेताओं/अधिकारियों के साथ फोटो खिचवाने की होड़/हवस /दिखावे और निजी स्वार्थ से भरी सियासत की जा रही है। हम ये न कहे कि वो बड़े जो पत्रकारों के हर मंच पर कब्जा करके पत्रकार हितो की बड़ी-बडी   बाते करते है उनका मकसद सिर्फ पत्रकार राजनीति के नाम पर धंधेबाजी करना है। अपनी-अपनी दुकानें चलानी है और इस अंधी-दौड़ मे कुत्ते-बिल्लियो की तरह लड़ कर पत्रकारिता जगत को बदनाम करना है।

पत्रकारों का एक बड़ा तपका ये सब कर रहा है और दूसरा तबका पत्रकारिता की इज्जत का बलात्कार होते खामोशी से देख रहा है।  इन कृत्यों के खिलाफ विरोध स्वरूप किसी भी कलमकार के कलम से एक अल्फाज भी नहीं लिखा जाता।

हम लिखते हैं तो कहा जाता है :- भुखरादी कर रहा है…. नेतागीरी कर रहा है … गंदी राजनीति कर रहा है…..मैं फलाँ का आदमी हूँ…..फलाँ की वकालत कर रहा हूँ….     वरिष्ठों का अपमान कर रहा है…..राजनेताओं और नौकरशाहो तक हमारे बीच के झगड़े पहुँच रहे है…

तो ठीक है कुछ भी कहो, मैं लिखता रहूँगा। आप पत्रकारिता के नाम पर धंधेबाजी करते रहो…..इस धंधेबाजी के लिये आपस मे लड़ते मरते रहो… और आप लोग खामोश दर्शक बनकर पत्रकारिता की इज्जत का बलात्कार होते हुए देखो। और मै इसकी सिर्फ कलम से मुखालिफत करुँ, तो कहो भुखरादी कर रहा है साला ……।

नवेद शिकोह
वाट्सअप नंबर-08090180256 
मेल navedshikoh84

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हे विक्रम राव, फ्रांस की बातें बाद में कर लेना, पहले आत्महत्या करने वाले बुजुर्ग पत्रकार त्रिपाठी जी की सुध तो ले लो

पता चला है कि मई दिवस पर IFWJ की रैली में जुटेंगे 1200 श्रमजीवी पत्रकार और के. विक्रम राव होंगे मुख्य वक्ता…. इनसे मेरा कहना है कि पहले मलिहाबाद तो जाओ, फिर कर लेना फ्रांस की बातें… लखनऊ में नाका थाना क्षेत्र में आर्थिक तंगी के चलते वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर त्रिपाठी (74) ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. श्री त्रिपाठी नव जीवन अख़बार में काम करते थे उसके बंद होने के बाद से इनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. लेकिन इन पत्रकार नेताओं को कभी फुर्सत नहीं मिली कि वे ऐसे पीड़ित और गरीब पत्रकारों की सुध लेते.

दिवंगत बुजुर्ग / वरिष्ठ पत्रकार के घर या घाट पर पांच पत्रकार भी नजर नहीं आये. कहने को लखनऊ में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार संगठन और पत्रकार नेता खूब सक्रिय हैं. पत्रकारों के हितों की आवाज उठाने के लिये दुनियाभर में भव्य कार्यक्रम कराते हैं. अब एक मई को सुनिएगा बड़ी-बड़ी बातें. इन दिनों सत्ताधारियों को इकट्ठा करने का कार्य प्रगति पर है. कोई पत्रकार आर्थिक तंगी से मरे या भूखा मर जाये, हमारी बला से. हम तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं. खुदा ना खास्ता किसी बड़े न्यूज चैनल / अखबार के नामी गिरामी / संपन्न पत्रकार का देहांत होता तो लाइन लग जाती. क्योंकि वहाँ बड़े नेताओं / अधिकारियों के पहुँचने की उम्मीद होती, इनसे मिलन हो जाता, चेहरा दिखा देते, हाथ मिला लेते. लेकिन त्रिपाठी जी जैसे गरीब पत्रकार के आत्महत्या करने पर कोई पत्रकार घर या घाट पर नहीं जाएगा… लखनऊ के पत्रकार भाई लोग बहुत आगे की सोचते हो… यही है लखनऊ की दलाल पत्रकारिता का सच…

त्रिपाठी जी जैसे पत्रकारों को आत्महत्या इसलिए करना पड़ता है क्योंकि उनको दी जाने वाली सुविधाओं का हक पत्रकार नेता लोग हजम कर जाते हैं… जिस लखनऊ के पत्रकार संगठन / पत्रकार नेता दुनियाभर मे पत्रकारों के हितों के लिये भव्य आयोजन / सम्मेलन कर रहे हैं, बतौर पत्रकार नेता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियो से मिलने की होड है, आपस में मारामारी हो रही है, उसी शहर के असली / वरिष्ठ / बुजुर्ग पत्रकार भूखों मर रहे हैं, आर्थिक तंगी और तमाम परेशानियों से परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं लेकिन कोई पत्रकार नेता / पत्रकार संगठन इसका संज्ञान नहीं ले रहा है… ऐसे दर्जनों मामले सामने आ चुके हैं।

नवेद शिकोह 
वाट्सअप- 8090180256
मोबाइल- 9369670660 
Navedshikoh84@Gmail.Com

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upsacc की तरह ifwj के भी दो टुकड़े हो गये!

पत्रकारों के बटवारे का दर्द

-नवेद शिकोह-

पत्रकारों के बंटवारे के ‘जिन्नाओ’, कितने टुकड़े करोगे हमारे! फिल्म ‘जिस्म’ ने अच्छा बिजनेस दिया तो ‘जिस्म-टू’ बन गयी। इसी तरह नागिन-वन के बाद नागिन-टू, आशिकी के बाद आशिकी टू बनी। व्यवसायिक फिल्मों की व्यवसायिक सोच ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ये ट्रेन्ड शुरु किया था। भारत की आजादी के फौरन बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ। नफा-नुकसान की व्यवसायिक सोच के साथ भारत की आजादी की लड़ाई मे मोहम्मद अली जिन्ना का शामिल होना कितना महंगा पड़ा था। जिन्ना की व्यवसायिक सोच की गन्दी सियासत ने भारत का बटवारा करके हमारे देश के टुकड़े कर दिये।

पत्रकार साथियों,  आप लोग जिन्ना को नायक मानते हो या खलनायक! जब ऐसे व्यक्ति को हम सब खलनायक मानते है तो फिर स्वार्थ से भरी व्यवसायिक सोच वाले उन पत्रकारों का साथ क्यों देते हो जो संवाददाता समिति-1,  संवाददाता समिति-2,  ifwj-1, Ifwj-2 जैसे तमाशे करके पत्रकारों का बटवारा कर रहे है। यकीन मानिये इनके खुद के हाथ इतने कमजोर हैं कि ये आप जैसे भोले-भालो के कंधो के बिना बंटवारे के दंगे मे बंदूके चला ही नहीं सकते हैं। आप कब तक और कितने हिस्सों में बटोगे? आप ‘इनके आदमी’ और ‘उनके समर्थक’ के रूप में अपने खुद के अस्तित्व की हत्या क्यों कर रहे है? आपमें से ज्यादातर लोग मेरी बातो से सहमत होगे। और वो किसी भी गुटबाजी से सहमत भी नही है। वो खुद भी किसी गुट में नहीं हैं। लेकिन आप लोग गुटबाजी और पत्रकारों के बटवारे के विरोध मे सामने क्यो नही आते?

विरोध का मतलब तलवारे चलाना नहीं। किसी का अपमान करना भी नहीं। न्यायालय जाना भी नहीं। जिन्दाबाद- मुर्दाबाद के नारे लगाना, धरना-प्रदर्शन या अनशन पर बैठ जाना ही नहीं। सियासत करना या किसी का नेतृत्व स्वीकार करना भी नहीं। आप कलमकार है। पत्रकारों का बटवारा करने और उन्हें बाटने की गन्दी सियासत करने वालों के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध रूपी दो शब्द भी आप अपने कलम से नही लिख सकते! आप कब तक किसी बाजीराव, मनोज तिवारी, हिमांशु मिश्र, हिसाब सिद्दीकी या रुपेश बहादुर सिंह (लखनऊ के पत्रकारों के बदले हुए नाम) के आदमी बने रहेगे। क्यों ना हम-आप इनके-उनके आदमी बनने के बजाय मर्द बनकर पत्रकारों के बटवारे के खिलाफ आवाज उठाये और गंदी सियासत का खातमा करें।

आज वाट्सअप पर दिल्ली के एक कार्यक्रम की तस्वीरे देखकर दिली अफसोस हुआ। पता चला कि Upsacc की तरह ifwj जैसी  इतनी पुरानी पत्रकारों की ट्रेड यूनियन के भी दो टुकड़े हो गये। Ifwj के बटवारे पर गम-ओ-गुस्से के साथ मुनव्वर राना साहब के एक शेर का एक मिसरा और बात खत्म :- ”…सियासत एकता की जड़ में मठ्ठा डाल देती है”

नवेद शिकोह

लखनऊ मे पत्रकारों के बटवारे की गन्दी सियासत से त्रस्त एक मामूली पत्रकार

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लखनऊ में धरना देते समय विक्रम राव और कामरान में हुई तकरार, देखें वीडियो

जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकारों / इन्साफ पसंद पत्रकार नेताओं से एक पत्रकार की गुजारिश

नीचे दिए गए वीडियो को ध्यान से देखिये। ये मौका था दिल्ली मे पत्रकारों के साथ बदसलूकी के खिलाफ हजरतगंज स्थित गाँधी प्रतिमा के नीचे विरोध प्रदर्शन का। इस तरह का मुजाहिरा पत्रकार एकता और एकजुटता की दलील भी देता है। लेकिन यहाँ का मंजर तो मकसद से विपरीत पत्रकारों के मतभेद, खंडित होने और बिखराव के साथ पत्रकार खुद बदसलूकी का शिकार होता दिखाई दिया। दो के बीच जमकर हुयी तकरार में एक वरिष्ठ था और एक उनसे काफी कनिष्ठ। एक युवा और एक बुजुर्ग। बुजुर्ग महोदय सम्मानित, जाने-पहचाने और राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। दो पीढ़ियों के पत्रकारों के हुजूम के बीचो-बीच दो पीढ़ियों के इन दो पत्रकारों की तकरार मे दोनों मे कोई एक गलत और कोई एक सही होगा।

मोहम्मद कामरान ifwj के राष्ट्रीय पार्षद चुने गये हैं। उन्होने दर्जनों बार ifwj के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव और upwju के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी से यूनियन के संविधान की जानकारी के लिये इन लोगों से यूनियन के कार्यालय में सम्पर्क किया। कई बार ई-मेल के जरिये संविधान माँगा। ये महत्वपूर्ण सवाल किया कि यूनियन के चुनाव बिना वोटरों / सदस्यों को किसी भी प्रकार की सूचना दिये बिना कैसे हो जाते हैं? अगर सूचना दी जाती है तो किस माध्यम से दी जाती है?  जब इन सवालों का जवाब नहीं मिला तब कामरान ने सार्वजनिक तौर पर पत्रकारों के समक्ष सवाल पूछने की कोशिश की।

राव साहब कह रहे हैं कि सबकुछ ifwj की website मे मौजूद है। यदि कामरान जी के सवालो का हर जवाब ifwj की website में मौजूद है तो आपको कामरान को गलत ठहराना पड़ेगा और उसे बेवजह परेशान किये जाने और नाहक सियासत करने का दोषी माना जाना चाहिये। यदि website मे ऐसी कोई जानकारी नही है तो आपको ifwj / upwju की कार्यशैली के खिलाफ खुल कर सामने आना होगा। बीच का कोई रास्ता नहीं बचता। आपको बताना ही होगा क्या किसी भी पत्रकार यूनियन से जुड़ा व्यक्तित्व या बाहरी पत्रकार भी यूनियन के बारे मे या उसकी कार्यशैली से जुड़ा सवाल नहीं पूछ सकता है? क्या किसी भी elected body की transparency नहीं होनी चाहिये? अगर ifwj की website पर यूनियन की सारी बाते हैं और चुनाव की सूचना यूनियन सदस्यों को दी गयी थी, फिर भी कामरान ऐसे सवाल बेवजह कर रहे तो कामरान को गलत ठहराया जाना चाहिए लेकिन यदि ifwj वोटरो/सदस्यो को बिना सूचना दिये चुनाव करवाता है तो क्या इन चुनावों को अवैध / असंवैधानिक / नाजायज माना जाना चाहिए। 

कामरान जी द्वारा ifwj के संविधान की जानकारी कई बार माँगने के बाद भी नही दी गयी। जब एक विरोध प्रदर्शन में पत्रकारों के बीच संविधान की जानकारी माँगने का आग्रह किया तो राव साहब ने कामरान को डाट-डपट के सबके सामने कहा कि सारी जानकारी ifwj की website पर है। यदि website पर ऐसी कोई जानकारी नहीं तो क्या जिम्मेदार पत्रकारों को ifwj के अध्यक्ष श्री के विक्रम राव जी और उनकी यूनियन को गलत नहीं ठहराना चाहिये? तकरार का ये वाकिया जिन पत्रकारों के बीच हुआ था वहाँ बहुत सारे पत्रकारों में वरिष्ठ पत्रकार, ifwj के राष्ट्रीय पार्षद, प्रेस क्लब एवं Upsacc के पूर्व पदाधिकारी सुरेश बहादुर सिंह, Upsacc के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र और फोटो ज्रर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष एसएम पारी के अतिरिक्त कई जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकार मौजूद थे। इन पत्रकार नेताओं से निवेदन है कि सम्पूर्ण मामले पर अपनी राय और अपना फैसला सुनाते हुए पत्रकारों को अवश्य अवगत कराये कि पूरे वाकिये में सही कौन है और कौन गलत है? 

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=wKMWlBWoUlQ

शुक्रिया
नवेद शिकोह   
लखनऊ
09369670660
navedshikoh84@gmail.com

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उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र के नाम नवेद शिकोह का खुला पत्र

…. आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम

भाई प्रांशु मिश्र

आपको पत्र लिखते वक्त मुझे अपनी एक गजल की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी :-

चाँद-तारों को जमी पर कैसे ला पाओगे तुम,
जुगनुओ को रौशनी में कैसे चमकाओगे तुम।
या हया अपनाओ या फिय बेहया हो जाओ तुम,
आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम?

इसका आशय ये है कि आप सच या झूठ, सही या गलत, दोस्ती या दुश्मनी, बेईमानी या ईमानदारी, विरोध या समर्थन, दो में से किसी एक को ही अपना सकते हैं। यदि आप तानाशाही और भ्रष्टाचार की व्यवस्था का हिस्सा बन जाते है तो फिर आपको इसका विरोध करने का हक कहा रह जायेगा। फिर तो आप ऐसी व्यवस्था के समर्थक ही कहे जाओगे।

आमतौर से जब कोई चुनाव जीतता है तो उसके चाहने वालों को खुशी होती है। पर आपको ifwj में निर्विरोध राष्ट्रीय पार्षद चुने जाने से आपके चाहने वाले दुखी हैं।

बच्चा-बच्चा जानता है कि ये चुनाव पूरी तरह से अवैध था। असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक था। क्या आप IFWJ की काजल की कोठरी मे रहकर अपनी बेदाग छवि बचा पायेगे ? या फिर इस पद को अस्वीकार कर यहाँ की अनियमितताओ के खिलाफ जंग छेड़कर पत्रकारों के बीच बने भरोसे को कायम रखेंगे ? बीच का कोई रास्ता नहीं है। आपको कोई एक रुख अपनाना होगा।

उतर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव में बहुत उम्मीद के साथ सैकड़ों पत्रकारों ने आपको अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी थी। पत्रकार संगठनो और उसके नेताओ की तानाशाही आपका चुनावी मुद्दा था । आप साफ-सुथरी छवि वाले नयी पीढ़ी के जिन्दा पत्रकार है।

( जिन्दा पत्रकार का आशय है-ऐसा वर्किग जर्नलिस्टस जिसकी मीडिया में एक ग्राउंड हो, जिसके बैनर को लोग जानते हो,, देखते हो/ पढते हो। जो अपनी खबरों के जरिये हजारो- लाखो या करोड़ों लोगों से जुड़ा हो। जबकि पत्रकारों की राजनीति/ संगठनों में ऐसे 90% मुर्दा पत्रकार शामिल होते है जिनकी पत्रकारिता की कोई बैक ग्राउंड ही नहीं। न वो लिखते हैं और न ही पढ़ते है और उनका फर्जी मीङिया बैनर महज कागजो की खानापूर्ति और भ्रष्टाचार पर आधारित होते है। या फिर वो जिन्होंने तीस- पैतीस साल पहले भले ही तीन-चार साल ही पत्रकारिता की हो, पर तीस-बत्तीस साल से अति सीनियर पत्रकार के तौर पर सिर्फ पत्रकारों की राजनीतिक ही से ही अपनी रोजी-रोटी चलाते है। ऐसे पत्रकारो को भी मै मुर्दा पत्रकार कहता हूँ। )

पत्रकार संगठनों के नाम पर पत्रकारिता की छवि धूमिल करने वालों को बेनकाब करने करने की चुनौती आपके चुनावी मुद्दों में शामिल थी। चुनाव के समय GBM में पत्रकारों ने बरसो से चली आ रही upwju/ प्रेस क्लब की अनियमितताओ और इसमें सुधार लाने का मुद्दा उठाया था। upwju/ प्रेस क्लब से आहत पत्रकारों को भरोसा था कि आप उनी उम्मीदो पर खरे उतरेगे । चुनाव जीतने के बाद upwju की अनियमितताओ को लेकर यहाँ के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी साहब को आपने खुला पत्र भी लिखा। ये पत्र खूब चर्चा मे रहा। हर पत्रकार तक पहुँचा। लोग खुश थे- चलो अब बरसों-बरस की – पीढियो पुरानी इस समस्या/ तानाशाही/ कब्जा/ भ्रष्टाचार के खिलाफ पहली बार किसी युवा पत्रकार नेता ने शंखनाद कर दिया। पत्रकारों की इस उम्मीद की रौशनी का ये चिराग ठीक से रौशन भी नही हुआ था कि आपकी किसी ख्वाहिश की हवा से बुझता हुआ दिखाई देने लगा। पीढ़ियों की कुव्यवस्था, तानाशाही, झूठ-फरेब और लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुलेआम मजाक बनाने वाले चुनाव में आप निर्विरोध चुन लिये गये। आप जाने-पहचाने पत्रकार और राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के नेता है। upwju के अध्यक्ष हसीब सिद्दीकी साहब को लिखे गये पत्र से ज्ञात हुआ था कि आप upwju और प्रेस क्लब के कारनामो से भी भलीभाँति अवगत है। फिर भी आपको ये तक नहीं पता चला कि जिस चुनाव में आपको निर्विरोध चुना गया है वो चुनाव असंवैधानिक है, अलोकतांत्रिक हैं, लोकतांत्रिक व्यवस्था का मजाक है। झूठ है, छल है, धोखाधड़ी है, फरेब है, आँखों में धूल झोकना जैसा है। ये कैसे हो सकता है कि आपको ये सब पता न हो। और अगर मालुम था तो ऐसे चुनावो का विरोध करने के बजाय सत्य की लड़ायी लड़ने वाला, ईमानदार और साफसुथरी छवि वाला कोई पत्रकार कथित तौर पर किसी निर्विरोध पद को क्यों और कैसे स्वीकार कर सकता है।

क्या दुनिया का कोई ऐसा चुनाव हो सकता है जिसमे वोटरो/ नामांकन करने की इच्छा रखने वालों ( upwju के सदस्यों ) को चुनाव की कोई खबर ही नही दी गयी।

जायज और संवैधानिक चुनाव के लिये अति आवश्यक नियमो के तहत क्या चुनाव से पहले कोई अधिसूचना चस्पा की गयी ? क्या ये अवगत कराया गया कि ifwj का कौन सदस्य चुनाव मे सम्मिलित हो सकता है और कौन नही। देर से फीस जमा करने वाले वोट नही दे सकते थे। चुनाव नही लड़ सकते थे। किसी प्रत्याशी के प्रस्तावक भी नही बन सकते थे। ये अति आवश्यक बाते आम सदस्यो से क्यो छिपायी गयी ? क्या आप बता सकते है कि ifwj के चुनाव के लिये upwju के सदस्यो को किस माध्यम से ( ई मेल, वाट्सअप, फोन, एस एम एस, चिट्ठी, मौखिक, डू टू डोर या डुगडुगी के माध्यम से ) चुनाव होने की सूचना दी गयी थी। मेरी जानकारी मे तो किसी को किसी रूप से भी कोई भी जानकारी नही दी गयी। अपने गोल के लोगो ने ही मिलजुल कर फर्जी चुनाव का नतीजा घोषित कर दिया।

चंद लोग ही जो इनके गोल के नही है इन्हे अन्दर से किसी तरह चुनाव की खबर मिल गयी तो वे पर्चा भर पाये।

मैने करीब 90% upwju के सदस्यो ( वोटरो ) से बात की।सबका कहना था कि उनको किसी प्रकार से भी किसी चुनाव की कोई भी सूचना नही दी गयी। यहाँ तक कि प्रेस क्लब मे ऐसी कोई सूचना चस्पा तक नही की गयी।

अब आप ही बताइये। क्या बिना-दूल्हा दुल्हन को बताये हम उनकी शादी रचा सकते है।

क्या ऐसा संभव है कि पिता को पता न हो और संतान पैदा हो जाये?

क्या किसी मारुफ अखबार ने आईएफडब्लूजे के कथित चुनाव की खबर छापी ? इतने बड़े संगठन का यूपी के बड़े शहरों आगरा कानपुर इलाहाबाद गोरखपुर मेरठ में नामलेवा तक क्यो नहीं?

चुनाव न हो इसलिए लखनऊ में ९ का कोटा था मगर १८ पार्षद चुन डाले। यूपी के तमाम जिले से एक भी नहीं।

यह कैसे हो सकता है कि बीते २६ साल से अध्यक्ष पद के लिए कोई नामांकन ही नही करता है?

क्या ३० सालों में यूपी के आधे से भी कम यानी ३० जिलों में इतने सदस्य भी न बना पाए कि हर जिले से दो दो राष्ट्रीय पार्षद चुन कर आ सकें। क्या यही नेतृत्व की काबिलियत है।

सबसे अहम बात यह कि क्या हसीब साहेब के नेतृत्व वाली यूपीडब्लूजे कानपुर ट्रेड यूनियन कार्यालय से पंजीकृत हैं। अगर है तो उसके कागज सार्वजनिक किए जाएं। वरना दुकान बंद की जाए।

कभी पता किया कि कितने सदस्यों को श्रमजीवी पत्रिका मिलती है?

चुनाव के ये नियम कब और किसकी सहमति से बनाए गए। क्या इन नियमों को वर्किंग कमेटी ने पारित किया था। कौन चुनाव अधिकारी है और क्या वर्किंग कमेटी ने उसे बहुमत से नियुक्त किया था।अगर किया था तो वह मिनट सार्वजनिक किए जाएं। चुनाव अधिकारी कब संगठन का सदस्य बना और उसे किस आधार पर किसकी मरज़ी से इतना बड़ा काम सौपा गया।

प्रांशु भाई आप अक्सर दिखाई देते है। आपसे मुलाकात भी होती है। आप मिलनसार हैं, व्यवहारिक है। पत्रकारों के दुख- दर्द और समस्याओं पर नजर आते है आप। ये तमाम बातें और सवाल आप से मिलकर भी कर सकता था। लेकिन ये शिकायतें/सवाल/जिज्ञासाये/ फरियादे सिर्फ मेरी नही सैकड़ों पत्रकारों की हैं। ये सिर्फ मेरा पत्र नही पूरे पत्रकार बिरादरी के मन की बाते है। इसलिये इन बातो को पत्रकारों के वाट्सअप ग्रुपस और फेसबुक के माध्यम से आपको प्रेषित कर रहा हूं। ताकि पत्रकारों के बीच पारदर्शिता बनी रहे। और तमाम पत्रकार इस गुफ्तुगु के गवाह बने।

जवाब जरूर दीजियेगा। सैकड़ों पत्रकार आपके जवाब और आपके फैसले का इन्तजार करेंगे।

धन्यवाद आपका
नवेद शिकोह
(सिर्फ एक साधारण पत्रकार)
लखनऊ

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