मोदी के नाम के साथ गाली लिखने का मामला : सावधान रहें, मीडिया के कंधे पर साजिश की बंदूक चलाई जा सकती है…

Naved Shikoh : मोदी विरोध की सुपारी! कुंठा और साजिश… फंस जायेगा मीडिया का मालिक… गोदी मीडिया के बाद अब विरोधी मीडिया सक्रिय है। इतनी बड़ी न्यूज एजेंसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली लिखने का मामला ऐसे ही नहीं हुआ है। इसमें एक बड़ी साजिश की बू आ रही है। नरेंद्र मोदी नाम के …

पत्रकारों की ब्लैकमेलिंग से परेशान है हर आम-ओ-खास!

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में कुशीनगर महोत्सव के दौरान समाज के तमाम गणमान्य जनों, मंत्रीगण और साहित्य से जुड़ी  हस्तियों की उपस्थिति में लेखक पारस जायसवाल को उत्तर प्रदेश रत्न से सम्मानित किया गया। ७५ से ज्यादा धारावाहिकों के लेखक पारस जायसवाल ने सिर्फ दूरदर्शन के लिए ही पैंतालीस सीरियल लिखे हैं। निर्माता निर्देशकों के पसंदीदा लेखक रहे पारस को हर विषय की पकड़ है। इसमें कॉमेडी भी है, थ्रिलर भी है, साइन्स फिक्शन भी है, मैथोलॉजी और हिस्टोरिकल सीरियल भी हैं। हर तरह के विषय पर उन्होंने कलम चलाई है और उस विषय के साथ न्याय किया है।

लखनऊ वाले गांधी और हरिद्वार वाले बाबा के आगे मीडिया क्यों लाचार है…

Naved Shikoh लखनऊ में सीएमएस वाले गांधी और देशभर में बाबा रामदेव के आगे मीडिया के हाथ क्यों बंधे हैं! सुना है देशभर के कार्पोरेट घरानों के लिए काम करने वाली पीआर कंपनियां गांधी और रामदेव के मीडिया मैनेजमेंट पर रिसर्च कर रही हैं। कई इंस्टीट्यूट मास कम्युनिकेशन के पीआर क्लासेस के लिए रामदेव और …

अमीश देवगन जैसे स्टार एंकर से मज़बूत तो साप्ताहिक झपट्टा टाइम्स का पत्रकार है!

Naved Shikoh : छोटे अखबार के पत्रकार को ‘भड़वा’ तो दूर कोई ‘कड़वा’ बोल दे तो विरोध की आंधी आ जाये… चकाचौंध वाले देश के टॉप क्लास बड़े-बड़े न्यूज चैनल्स के नामी-गिरामी स्टार मीडिया कर्मियों से कहीं ज्यादा ताकतवर और एकजुट हैं हम। हमारे लखनऊ के छोटे से छोटे पत्रकार की फटफटिया के हैंडिल पर …

योगी सरकार के करोड़ों के इस विज्ञापन में कार्यक्रम स्थल का नाम ही नहीं है

सिस्टम को टीबी का सुबूत… जगाने का काम करने वाले सोते हुए कर रहे हैं काम… करोड़ों के बजट वाले इस विज्ञापन में पूरी रामकथा है। लेकिन रामकथा में राम जी का ही नाम नहीं है। कार्यक्रम की पूरी जानकारी है पर ये लिखना भूल गये कि कहां है कार्यक्रम।

पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

इन्टरनेट के इस दौर में कलमकार भूखा नहीं मरेगा

Naved Shikoh : अब कलम बिकेगा, अखबार नहीं… RNI और DAVP में दर्ज यूपी के 97% पत्र-पत्रिकाओं का वास्तविक सर्कुलेशन 0 से 1000 तक ही है। सोशल मीडिया पर कोई भी अपनी बात या अपना विज्ञापन फ्री में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। ऐसे में बड़े अखबारों को छोड़कर किसी अन्य को चुनावी विज्ञापन क्या खाक मिलेगा! यही कारण है कि सोशल मीडिया पर लिखने की कला का बाजार सजने लगा है। सुना है यूपी के निकाय चुनाव के चुनावी दावेदार सोशल मीडिया को प्रचार का सबसे बड़ा-आसान और सस्ता माध्यम बनाने जा रहे हैं।

लखनऊ के पत्रकारों को दीपावली पर प्रदेश सरकार ने नहीं भेजी मिठाई

कल्याण सिंह की परम्परा योगी ने तोड़ी…  पत्रकारों की सरकारी मिठाई खटाई में पड़ी… वरिष्ठ पत्रकार के घर दीपावली मिलने गया। लंच का वक्त था। दोपहर के खाने का इंतजाम था। खाने के बाद मैंने खुद बेगैरती से कुछ मीठा खाने की जिद करते हुए कहा कि आज दीपावली है मिठाई तो खिलाना ही पड़ेगी। वरिष्ठ पत्रकार महोदय बोले अभी तक आई नहीं। शाम तक आना शायद आ जाये। मैंने कहा किस नौकरानी से मिठाई मंगवाई है जो शाम को मिठाई लायेगी। निकाल बाहर करिये उसे। आप जैसे पत्रकार सरकारें भगा देते हैं नौकरानी नहीं भगा सकते। 

मकान खाली कराने का डंडा इमानदारी से भरा है, इसे रोकने में हम क्यों साथ दें?

-नवेद शिकोह-

मुसीबत में लखनऊ के पत्रकार, फिर भी आपस में तकरार… केंद्र सरकार ने अखबारों पर तलवार चलायी तो हजारों पत्रकारों की नौकरी पर बन आयी। पत्रकारों ने मदद की गुहार लगाई तो स्वतंत्र पत्रकार की प्रेस मान्यता वाले दिग्गज / रिटायर्ड / प्रभावशाली पत्रकारों ने कहा कि हम इमानदारी की तलवार को रोकने की कोशिश क्यों करें? अच्छा है, फर्जी अखबार और उनसे जुड़े फर्जी पत्रकार खत्म हों। इसी बीच यूपी की प्रदेश सरकार ने बड़े पत्रकारों से बड़े-बड़े सरकारी मकान खाली कराने का डंडा चलाया। बड़ों ने एकजुट होकर सरकार पर दबाव बनाने के लिए छोटों का समर्थन जुटाने का प्रयास किया। छोटों को बदला लेने का मौका मिल गया।  बोले- मकान खाली करने का डंडा इमानदारी का डंडा है। इसे रोकने में हम क्यों साथ दें। अच्छा है- करोड़ों के निजी मकानों के मालिकों को सरकारी मकानों से बाहर करना ईमानदारी का फैसला है।

यूपी के बड़े पत्रकार नेताओं से कुछ बड़े सवाल

साहब, कुछ तो बोलना पड़ेगा तुम्हें। बुजुर्ग पत्रकार राजेन्द्र प्रसाद मीमांसा को लखनऊ RTO आफिस में पीटा गया। जिन्हें तुम फट्टर कहते हो, ऐसे बीस-तीस लोग पीड़ित के हक की लड़ाई लड़ते रहे। डीएम से लेकर सीएम से मिले। ये फट्टर हैं, तुम लोग ब्रांड हो.. स्थापित हो.. बड़ी पहचान वाले हो… समय-समय पर पत्रकारों ने तुम्हें नेतृत्व के लिये चुना है। अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी दी है। सरकारें भी तुम लोगों को ही पत्रकारों का असली नेता मानतीं हैं। पत्रकारों के डेरे के तुम ही राम हो और तुम ही रहीम भी। तो फिर मीमांसा जैसे तमाम मामलों में क्यों खामोश रहते हो.. क्यों नहीँ सामने आते.. क्यों ऐसे मौकों पर अज्ञातवास में चले जाते हो.. क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करते हो।

‘यशवंत बड़ा वाला लंकेश है, इसे जान से मारना चाहिए था!’

Naved Shikoh : दिल्ली प्रेस क्लब में यशवंत भाई पर होता हमला तो मैंने नहीं देखा लेकिन लखनऊ के प्रेस क्लब में कुछ भाई लोगों को इस घटना पर जश्न मनाते जरूर देखा। पुराने दक्षिण पंथी और नये भक्तों के साथ फ्री की दारु की बोतलें भी इकट्ठा हो गयीं थी। आरोह-अवरोह शुरू हुआ तो गौरी लंकेश की हत्या से बात शुरु हुई और यशवंत पर हमले से बात खत्म हुई। कॉकटेल जरूर हो गयी थी लेकिन वामपंथियों को गरियाने के रिदम का होश बरकरार था।

मुसलमानों, तुम राम मंदिर बनवा देते तो भाजपा की हुकुमते नहीं, कब्र बन चुकी होती

अरे भाई, अब तो राम मंदिर निर्माण में अपनी सहमति और सहयोग दे दो मुसलमानो, नहीं तो ..ऽऽऽ###ऽऽऽऽऽ  ####ऽऽऽ##….ऽऽऽऽऽ…##ऽऽऽ##…ऽऽऽ… अगर मंदिर बनवा दिया तो तम्हेँ भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक और सहयोगी मान लिया जायेगा। तुम खुद और तुम्हारे चहीते धर्मनिरपेक्ष दल ही तो कहते हैं कि भाजपा राम मंदिर के मुद्दे को भुनाती रही है। राम मंदिर का मुद्दा ना होता तो भाजपा की हैसियत तीन-चार सीटों से ज्यादा नहीं होती। केन्द्र और प्रदेशों की सत्ता तो बहुत दूर की बात है। मुसलमानों, भाजपा पर तुम्हारे इल्जाम बराबर से तुम्हें भी घेरते हैं। राम मंदिर के मुद्दे को भुनाने में तुम (मुस्लिम कौम) भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी / मददगार हो। अगर ऐसा ना होता तो तुम राम जन्म भूमि पर राम मंदिर बनने की सहमति और सहयोग दे चुके होते। और भाजपा खुद-ब-खुद आगे नहीं बढ़ पाती।

सैल्यूट सत्येन्द्र मुरली

अरनब, सुधीर और रजत जैसे अपना जमीर और अरबों-खरबो का झूठ बेचकर भी जो नाम नही कमा सके उससे ज्यादा नाम तुमने अपनी हिम्मत से एक सच बयाँ करके कमा लिया। इतने बड़े नाम वाले पत्रकार…इतने बड़े नाम वाले मीडिया समूह… इतनी बड़ी बोली मे बिकने वाले न्यूज चैनल.. इतने बड़े वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इतना बड़ा झूठ कैसे दिखाते! अगर आप जैसे सच्चे और हिम्मत वाले ये हिम्मत न करते..ये सच बयाँ न करते तो झूठ के महल के नीचे दबा रहता सच का अमृत।

सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी चैनल को खत्म करो!

गले में बाँधे रहते थे, अब मुँह पर पट्टा बाँधे हैं,
पालतू हैं हम मोदी के, इस बात का गंडा बाँधे हैं।
सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी को खत्म करो,
झूठ के भोपू वाले हैं, हम झूठ का दामन थामे हैं।

ये पंक्तियाँ उन चंद तथाकथित बिकाऊ पत्रकारों की भावनाओं की कल्पना है जिन्हें कोई अंध भक्त कहता है, कोई सरकार के झूठ का भोंपू तो कोई मोदी का पालतू। आजाद पत्रकारिता और निष्पक्ष कलम जब सरकार की गलत नीतियों का बखान करने लगता है तो पालतू गला फाड़-फाड़ कर भोंकते हैं। सरकार की मुखालिफत पर ये अक्सर काट भी लेते हैं। लेकिन इनके काटने से पीड़ितों को ना इन्जेक्शन लगवाना पड़ता है और न ही जान का खतरा महसूस होता है। मेडिकल साइंस कहती है कि काटने वाला जब तक जीवित है तब तक पीड़ित खतरे से बाहर है। अभी तीन साल तक इन्हे चंद टुकड़ों की ताकत जिन्दा रखेगी और सत्ता की ताकत इन्हेँ झूठ का साथ देने की आब-ए-हयात देती रहेगी। झूठ की हिफाजत के लिये निष्पक्ष पत्रकारिता पर जो भौकते रहते है उनका मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों पर खामोश रहना स्वाभाविक भी है।

मोदी भक्तों और मुखालिफ पत्रकारों में खिचीं तलवारें

पत्रकारों की टूटी दोस्ती, आपसी मधुर रिश्तों मे पड़ी फूट, मोदी विरोध में कई पत्रकारो की गयी नौकरियाँ, दो खेमों में बंटे पत्रकार, लखनऊ के दो नामी पत्रकार दोस्तों की दोस्ती का हुआ कत्ल.. : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के भक्तों और विरोधी पत्रकारों मे इन दिनों तलवारें खिंची हैं। सोशल मीडिया का बढ़ता रिवाज ऐसे विवादों में आग में घी का काम कर रहा है। भाजपाई और गैर भाजपाई पत्रकारों के दो गुट तैयार हो गये हैं। जो गाहे-बगाहे कभी किसी मुद्दे पर तो कभी किसी मसले पर आपस मे भिड़ जाते हैं।

मिलीभगत का खेल तो नहीं बसपा-भाजपा का टकराव!

सोशल इन्जीनियरिँग का खेल खत्म समझो… जब जुल्म हमें कामयाबी का जायका दे और अपमान हमारे सम्मान के रास्ते खोले तब सुरक्षा और सम्मान किस काम का? आप ठीक कह रहे थे.. चुनावी तैयारियों की गहमागहमी में बसपा खामोश जरूर है, पर निष्क्रिय नहीं है। अंडरकरंट सब कुछ चल रहा है। सुरक्षा और सम्मान का पर्व नजदीक आ गया। गिफ्ट तो बनता है न! नरेंद्र मोदी जी के सबसे अहम सूबों यूपी और गुजरात की घटनाएँ बसपा के लिये रामबाण बन गयी है।

यूपी की चुनावी तैयारियों का हिस्सा न बन जायें isis के हरामखोर!

ये तो नही पता कि isis के लोगों का धर्म क्या है… किसी को तो छोड़ दो isis के हरामखोरों…

हाँलाकि उनके संगठन के नाम में ‘इस्लाम’ नाम का शब्द जुड़ा है, जैसा कि मथुरा के कंस रामवृक्ष ने नेता जी सुभाषचंद्र बोस जी की आजाद हिन्द फौज के नाम से दहशतगर्दो का कुनबा तैयार करने की गुस्ताखी की थी। पर हाँ इस बात में कोई दो राय नही है कि इन्सानियत के दुश्मन इन वहशी दरिन्दों ने अब तक सबसे ज्यादा नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। आकड़े बताते है कि इन हरामखोरों (Isis) ने  ईसाइयों, यहूदियो, कुर्दों, यजीदियों इत्यादि से ज्यादा जान-माल का नुकसान मुसलमानों को ही पहुँचाया है। यही नहीं, मुसलमानो के धार्मिक स्थल (मुख्य तीर्थ स्थल भी) तोड़ना isis का मुख्य लक्ष्य है।

हे लखनऊ वालों, आप खामोश दर्शक बनकर पत्रकारिता की इज्जत लुटते हुए देखिये

मैं मुखालिफत करुँ तो कहिए- भुखरादी कर रहा है.. एक ही मसले पर एक ही संगठन के दो पत्रकार गुटो ने लखनऊ मे नितीश कुमार को ज्ञापन देकर पत्रकारों की खिल्ली उड़वायी…

हे विक्रम राव, फ्रांस की बातें बाद में कर लेना, पहले आत्महत्या करने वाले बुजुर्ग पत्रकार त्रिपाठी जी की सुध तो ले लो

पता चला है कि मई दिवस पर IFWJ की रैली में जुटेंगे 1200 श्रमजीवी पत्रकार और के. विक्रम राव होंगे मुख्य वक्ता…. इनसे मेरा कहना है कि पहले मलिहाबाद तो जाओ, फिर कर लेना फ्रांस की बातें… लखनऊ में नाका थाना क्षेत्र में आर्थिक तंगी के चलते वरिष्ठ पत्रकार चंद्र शेखर त्रिपाठी (74) ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दे दी. श्री त्रिपाठी नव जीवन अख़बार में काम करते थे उसके बंद होने के बाद से इनका परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था. लेकिन इन पत्रकार नेताओं को कभी फुर्सत नहीं मिली कि वे ऐसे पीड़ित और गरीब पत्रकारों की सुध लेते.

upsacc की तरह ifwj के भी दो टुकड़े हो गये!

पत्रकारों के बटवारे का दर्द

-नवेद शिकोह-

पत्रकारों के बंटवारे के ‘जिन्नाओ’, कितने टुकड़े करोगे हमारे! फिल्म ‘जिस्म’ ने अच्छा बिजनेस दिया तो ‘जिस्म-टू’ बन गयी। इसी तरह नागिन-वन के बाद नागिन-टू, आशिकी के बाद आशिकी टू बनी। व्यवसायिक फिल्मों की व्यवसायिक सोच ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ये ट्रेन्ड शुरु किया था। भारत की आजादी के फौरन बाद भी कुछ ऐसा ही हुआ। नफा-नुकसान की व्यवसायिक सोच के साथ भारत की आजादी की लड़ाई मे मोहम्मद अली जिन्ना का शामिल होना कितना महंगा पड़ा था। जिन्ना की व्यवसायिक सोच की गन्दी सियासत ने भारत का बटवारा करके हमारे देश के टुकड़े कर दिये।

लखनऊ में धरना देते समय विक्रम राव और कामरान में हुई तकरार, देखें वीडियो

जिम्मेदार वरिष्ठ पत्रकारों / इन्साफ पसंद पत्रकार नेताओं से एक पत्रकार की गुजारिश

नीचे दिए गए वीडियो को ध्यान से देखिये। ये मौका था दिल्ली मे पत्रकारों के साथ बदसलूकी के खिलाफ हजरतगंज स्थित गाँधी प्रतिमा के नीचे विरोध प्रदर्शन का। इस तरह का मुजाहिरा पत्रकार एकता और एकजुटता की दलील भी देता है। लेकिन यहाँ का मंजर तो मकसद से विपरीत पत्रकारों के मतभेद, खंडित होने और बिखराव के साथ पत्रकार खुद बदसलूकी का शिकार होता दिखाई दिया। दो के बीच जमकर हुयी तकरार में एक वरिष्ठ था और एक उनसे काफी कनिष्ठ। एक युवा और एक बुजुर्ग। बुजुर्ग महोदय सम्मानित, जाने-पहचाने और राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। दो पीढ़ियों के पत्रकारों के हुजूम के बीचो-बीच दो पीढ़ियों के इन दो पत्रकारों की तकरार मे दोनों मे कोई एक गलत और कोई एक सही होगा।

उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष प्रांशु मिश्र के नाम नवेद शिकोह का खुला पत्र

…. आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम

भाई प्रांशु मिश्र

आपको पत्र लिखते वक्त मुझे अपनी एक गजल की कुछ पंक्तियाँ याद आ गयी :-

चाँद-तारों को जमी पर कैसे ला पाओगे तुम,
जुगनुओ को रौशनी में कैसे चमकाओगे तुम।
या हया अपनाओ या फिय बेहया हो जाओ तुम,
आँखों से आँखें मिलाकर कैसे शरमाओगे तुम?