भाजपा के लिए गाय मात्र वोटबैंक, धड़ल्ले से हो रहा बीफ का निर्यात

देश में भाजपा की सरकार बनने के बाद जमीनी मुद्दे लगभग गौण हो गये हैं चारों ओर धर्म-जाति के साथ भावनात्मक मुद्दों का बोलबाला है। मोदी शासनकाल में सबसे ज्यादा जो मुद्दा गर्माया है वह गाय का रहा है। देश में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया गया कि गाय हिंदूओं की पूजनीय है और मुस्लिम इसका मांस खाकर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। केंद्र के साथ ही राज्य में काबिज भाजपा की सरकारों ने गाय को तरह-तरह की योजनाएं चलाईं । गाौमांस को लेकर जगह-जगह मॉब लिंचिंग के मामले भी हुए। इन सबके बीच जो रिपोर्ट निकल कर सामने आई है उसके अनुसार देश में गौमांस को लेकर हल्ला मचता रहा और देश से बड़े स्तर पर बीफ का निर्यात होता रहा। यह जगजाहिर हो चुका है कि भारत बीफ निर्यात का प्रमुख देश है और बीफ के बड़े निर्यातक भी हिंदू समाज से ही हैं। मोदी सरकार का दूसरा बड़ा मुद्दा पाकिस्तान रहा है। पाकिस्तान की आड़ में भारत में रह रहे मुस्लिमों को भी टारगेट बनाया गया। मुसलमानों के प्रति हिंदूओं में नफरत पैदा करने की बड़ी वजह गौमांस बनाने का प्रयास किया गया।

हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार भारत में करीब 71 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं। मतलब हिंदू अब मुस्लिमों से कहीं कम मांस नहीं खा रहे हैं। जगजाहिर है कि गिने-चुने राज्यों को छोड़कर भारत में गौमांस पर पूरी तरह से पाबंदी है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के मुताबिक 2014 में जब केन्द्र में मोदी सरकार आई तब से बीफ निर्यात में काफी वृद्धि हुई और इसके बाद उतार चढ़ाव चलता रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि यदि देश में गौमांस पर पाबंदी है तो बीफ का निर्यात कैसे हो रहा है? वह भी उस मोदी सरकार में जो गाय को पूजनीय मानती है। गाय के लिए उनके समर्थक जान लेने और देने के लिए भी तैयार रहते हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाय को पूजते हैं। गत दिनों एक मथुरा में एक कार्यक्रम में उन्होंने गाय को लेकर विपक्ष पर हमला बोला था। उनका कहना था कि गाय का नाम आते ही कुछ लोगों के बाल खड़े हो जाते हैं। यदि सत्ता में बैठे गौ रक्षकों के रहते हुए भी बीफ का निर्यात हो रहा है वह पहले से ज्यादा तो यह हिंदुओं की भावनाओं से खिलवाड़ है।

मतलब गाय का इस्तेमाल बस वोटबैंक के लिए हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार मोदी सरकार के बनने के तुरंत बाद बीफ का निर्यात घटा नहीं बल्कि बढ़ा था। हां बीच में उतार-चढ़ाव होता रहा है। वित्त वर्ष 2013-14 में बीफ निर्यात 13,65,643 मीट्रिक टन था जो कि वित्त वर्ष 2014-15 में बीफ का निर्यात बढकर 14,75,540 मीट्रिक टन हुआ। 2016-17 में बीफ़ निर्यात 13,30,013 मीट्रिक टन और 2017-18 में बढ़कर 13,48,225 मीट्रिक टन हो गया।

उदाहरण के लिए भले ही 2016-17 में गौ-मांस निर्यात की मात्रा 13,30,013 मीट्रिक टन से बढ़कर 2017-18 में 13,48,225 मीट्रिक टन हो गई हो वहीं इस अवधि में बीफ निर्यात का मूल्य 26,9303.16 करोड़ रुपये से घटकर 25,988.45 करोड़ रुपये रह गया, वहीं संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन (एफएओ) की रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 में भारत बीफ़ निर्यात के मामले में विश्वस्तर पर पांचवे स्थान पर है। वहीं इस मामले में पाकिस्तान नौवें स्थान पर है।

दिलचस्प बात यह है कि भाजपा और उसके सहयोगी दल गाय को हिंदूओं की आस्था और भावनाओं से जोड़कर हायतौबा करते हैं पर जो रिपोर्टर्ंे आती रही हैं उनके अनुसार बीफ के प्रमुख निर्यातक हिंदू ही हैं। गत दिनों में जनसत्ता में एक रिपोर्ट छपी थी कि देश के चार शीर्ष मांस निर्यातक हिंदू हैं। रिपोर्ट में अल कबीर एक्सपोर्ट (सतीश और अतुल सभरवाल), अरेबियन एक्सपोर्ट ( सुनील करन) एमकेआर फ्रोजन फूड्स (मदन एबट) पीएमएल इंडस्ट्रीज (एमएस बिंद्रा)। बताये गये थे। एक और तथ्य यह है कि गुजरात जहां शराब की पाबंदी है, वहां जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री रहे तो मांस का कारोबार काफी बढ़ा था। उनके सत्ता में आने से पहले गुजरात का मांस निर्यात 2001-2 में 10600 टन था जो कि 2010-1 में बढ़कर 22000 टन हो गया था। यह भी अपने आप में दिलचस्प है कि मोदी नेतृत्व वाली राजग सरकार ने मांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बजट नये बूचड़खानों की स्थापना और पुरानों के आधुनिकीकरण के लिए 15 करोड़ रुपए की सब्सिडी का प्रावधान किया। 2014-15 के दौरान भारत ने 24 लाख टन मीट का निर्यात किया जो कि दुनिया में निर्यात किए जाने वाले मांस का 58.7 फीसदी हिस्सा है।

देश से बड़े स्तर पर बीफ का निर्यात हो रहा है और भाजपा घरेलू मोर्चे पर मांस को लेकर राजनीति कर रही है। भाजपा की दोगली राजनीति देखिए कि पिछले दिनों अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स ने रिपोर्ट में दावा था कि बीजेपी विधायक संगीत सोम और दो लोगों ने अलीगढ़ में 2009 में मीट प्रॉसेसिंग यूनिट के लिए जमीन खरीदी थी। यही संगीत सोम दादरी मामले में गिरफ्तार आरोपियों के परिवार की मदद के लिए वहां पहुंच गये थे। उन्होंने अखलाक के परिवार को गाय काटने वाला करार दिया था। ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश के दादरी में बीफ खाने की अफवाह फैलने के बाद मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। इस संघर्ष में उनका बेटा दानिश घायल हो गया था। अखबार की रिपोर्ट में बताया था कि मीट फैक्ट्री के लिए जमीन खरीद से जुड़े दस्तावेजों में अल दुआ फूड प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड के तीन डायरेक्टरों में संगीत सोम भी था। बाकी दो के नाम मोइनुद्दीन कुरैशी और योगेश रावत बताये गये थे। अखबार से बातचीत में सोम ने बाकायदा कबूल भी किया था कि कुछ साल पहले उन्होंने जमीन खरीदी थी, लेकिन इस बात की जानकारी नहीं थी कि उन्हें कंपनी का डायरेक्टर बना दिया गया है। मीट प्रोडक्शन यूनिट की वेबसाइट के मुताबिक, यह हलाल मीट प्रोडक्शन की लीडिंग यूनिट बताई जातीहै, जो भैंसे, भेड़ और बकरे का मीट प्रोड्यूस करती है। हालांकि बाद में सोम ने यह भी कहा, था कि उन्होंने जमीन खरीदी थी, जो कुछ महीने बाद अल दुआ फूड प्रॉसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड को बेच दी थी।

जिस देश में बीफ और गौ हत्या के मुद्दे पर भीड़ हिंसा की शर्मनाक घटना घटती रही हैं। उस देश का सबसे बड़ा और सबसे आश्चर्यजनक सच यह है कि भारत में बीफ के सालाना कारोबार की रकम करीब 27 हजार करोड़ रुपये है। अमेरिका के एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट डिपार्टमेंट ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि मोदी सरकार बनने के बाद बीफ निर्यात में बढ़ोतरी हुई है। मोदी सरकार बनने के बाद पिछले कुछ सालों में बीफ और गौ हत्या के मामले में कई हत्याएं और संघर्ष हुए। इनमें ज्यादातर तो अफवाहों के चलते संगीन हो गये, जिनमें गुजरात के ऊना और अखलाक जैसे मामलें पूरे देश में सुख़िर्यों में रहे। इन सबके बावजूद सर्वे के आकड़ों ने न केवल बीफ और गौ हत्या प्रतिबंध पर बल्कि सरकार की कार्य प्रणाली पर भी सवाल उठाया है। मॉब लीचिंग घटनाओं के बाद भी बीफ कारोबार कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ा है। गौ मांस के नाम पर कई लोगों की बलि ले ली गई।

गौ हत्या को लेकर हुई हिंसा में 28 सितंबर 2015 को उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक को भीड़ ने घर में बीफ रखने के शक में मार डाला। जुलाई 2017 तक लगभग 20 माह में गो-तस्करी व बीफ रखने की शंका में अलग-अलग मामलों में 14 लोगों की जान भीड़ ने ले ली। अक्टूबर 2015 में कर्नाटक में बजरंग दल के कार्यकर्ता प्रशांत पुजारी की हत्या कथित तौर पर इसलिए की गई क्योंकि वह मेंगलुरू में गौ रक्षा के लिए मुहिम चला रहे थे। जुलाई 2016 में अहमदाबाद से करीब 360 किलोमीटर दूर उना में गो हत्या के आरोप में दलित युवकों कथित तौर पर गो-रक्षकों ने अर्धनग्न कर बुरी तरह मारा पीटा गया था। 1 अप्रैल 2017 को राजस्थान के अलवर में पहलू खान नाम के 55 वर्षीय पशु व्यापारी की कथित गोरक्षकों की भीड़ ने गो-तस्करी के शक में पिटाई कर दी थी। अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। 30 अप्रैल 2017 में असम के नगांव में गाय चुराने के शक में भीड़ ने 2 लोगों की हत्या कर दी। 7 जून 2017 में झारखंड के धनबाद में इफ्तार पार्टी के लिए बीफ ले जाने के आरोप में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। यह भी अपने आप में दिलचस्प है कि गाय को लेकर सबसे ज्यादा हंगामा उत्तर प्रदेश में हुआ है और अमेरिकी कृषि विभाग के अनुसार इसी प्रदेश में बूचडख़ानों की संख्या सबसे ज्यादा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 72 लाइसेंसी बूचडख़ाने हैं, जिसमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 38 हैं।

लेखक चरण सिंह राजपूत सोशल एक्टिविस्ट और जर्नलिस्ट हैं.

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Posted by Bhadas4media on Wednesday, September 18, 2019
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