जल के बाद अब अन्न पर बाजार का कब्जा, मुंहमांगी कीमत देने को तैयार रहें

राजीव तिवारी बाबा

जीवन का मूलभूत अधिकार और कर्तव्य दोनों हैं भोजन… भारतीय संविधान में मूलभूत अधिकार और कर्तव्य दोनों का विस्तार से वर्णन है। आज सत्तर साल बाद देश की जनता और नेता दोनों ही कर्त्तव्यों को लगभग भूल ही गए हैं सिर्फ हमें अधिकार ही याद रहते हैं। अब हम जीवन की बात करते हैं। ये पूरी मानव जाति के लिए है। मूलभूत मतलब सबसे पहले यानि जब हम अस्तित्व में आते हैं। उसके बने रहने के लिए आवश्यक वस्तु। पृथ्वी पर करोड़ों साल के जीवन के विकास के क्रम आज मानव के रूप में सबसे विकसित जीवन के रूप में हम हैं। होमोसैंपियंस से लेकर अभी तक मानव जाति के पास आज तक का सबसे विकसित मस्तिष्क है। आदिमानव की तुलना में आज हमारे पास सबसे परिष्कृत संसाधन मौजूद हैं। कभी ध्यान दिया है कि जीवन की विकट परिस्थितियों में जब जीवन पर ही संकट हो तो कौन सी ऐसी चीजें हैं जिनके सहारे हम बचे रहेंगे। रुपया पैसा, कपड़ा लत्ता, हीरे मोती, घर मकान, घोड़ा गाड़ी, डीजल पेट्रोल, पढ़ाई लिखाई, आधुनिक सुविधाजनक मशीनें या ऐसा कुछ भी। या जल वायु और भोजन।

फिर से सोचिए कि अगर अत्याधुनिक विकास से मिले सुविधाजनक सारे संसाधन हों और जल वायु और भोज्य पदार्थ न हों तो जीवन चलेगा क्या? नहीं न। अब सोचिए जल वायु और भोजन हों लेकिन अन्य संसाधन न हों तो जीवन बचेगा क्या? हां बिल्कुल।

तो ये लड़ाई जीवन की इसी मूलभूत आवश्यकता के लिए है। भोजन नहीं होगा तो आप एक आध महीना जी सकते हैं। जल नहीं होगा तो कुछ दिन और वायु नहीं तो कुछ मिनट बस। पृथ्वी पर कुछ लोग अभी भी विश्वविजेता बनने का सपना पाले हैं जैसे इतिहास में समय समय पर कुछ महानुभाव करने की कोशिश करते रहे हैं। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किसी भी देश अथवा शासक के लिए ये अब संभव नहीं। महाशक्ति के लिए भी नहीं।

अब पहले जैसे युद्ध भी संभव नहीं। तो इसके लिए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही आर्थिक तौर तरीकों से ये उपक्रम किया जा रहा है। इसके लिए यूएनओ, डब्लूटीओ, डब्लूएचओ, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं के जरिए अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिशें की जा रही हैं। इनके जरिए दुनिया के देशों की सरकारों पर दबाव बनाकर अपनी योजनाओं को लागू करवाने की कवायद चल रही है। इसमें मल्टीनेशनल कंपनियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जो सभी देशों में कारोबार करने के बहाने घुसी हुई हैं।

जीवन के मूलभूत आवश्यक तत्व पेयजल संसाधनों पर इन कंपनियों का किसी न रूप में कब्जा हो चुका है जहां नहीं है वहां सरकारों के जरिए है। जहां नहीं है वहां करने की लगातार कोशिश हो रही है। गौर करियेगा शहरों में चाहे बोतल बंद पानी हो या नगर निगम की सप्लाई सब हम लोग खरीद ही रहे हैं। गांवों में भी भूमिगत जल लगातार प्रदूषित हो रहा है और वहां भी बोतलों में या पाइप सप्लाई के जरिए कब्जा हो रहा है।

अब बारी है भोजन की। होटल रेस्टोरेंट और पैकेज्ड प्रोसेस्ड फूड पर कब्जा हो चुका है। इनकी आप कीमत देते हैं जिसमें टैक्स शामिल हैं। अब निशाने पर हैं अनाज और फल सब्जी। अभी भी कच्चा अनाज वह फल सब्जी जो पैकेट में मिल रहा है वो अधिक कीमत में है और टैक्स शामिल है। अब खेत खलिहान तक कंपनियां और सरकार पहुंचना चाहती हैं। शुरू में लुभावनी स्कीमों से किसानों को भरमाया जाएगा फिर बाद में जब चंगुल में फंस जाएंगे तो खेत से ही पैकेट में अनाज फल सब्जी आएंगे और आपको मनमानी कीमत में बेचे जाएंगे। इसमें सरकार को टैक्स मिलेगा। यानि जल के बाद ये जीवन की दूसरी बड़ी मूलभूत आवश्यकता के लिए आपको मुंहमांगी कीमत देनी होगी और सरकार को टैक्स जाएगा।

आने वाले दो तीन दशकों में जल पूरी तरह नियंत्रण में होगा और भोजन भी। फिर यदि आप संकर्षण हुए तो आपको जीने के लिए या तो मुंहमांगी कीमत देनी होगी या अक्षम हुए तो आप सरकार के रहमो करम पर होंगे। पोलिटिकल पार्टियां आपको वोट के एवज में अनाज पानी देने के वादे करेंगी जिसका चलन शुरू भी हो गया है।

गनीमत है कि वायु अपनी प्रकृति के कारण इनके नियंत्रण में नहीं। अन्यथा सबसे पहले इसी पर नियंत्रण किया जाता और आप जीने के लिए इनकी गुलामी करने को मजबूर होते। हालांकि इसके भी प्रयास शुरू हैं। आधुनिक विकास के नाम पर वायू को इतना प्रदूषित कर दिया जाएगा कि आपको जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्व शुद्ध वायु को बोतलों में या अन्य तरीके से खरीदना होगा। संपन्न लोगों के यहां लाखों रुपए कीमत वाले शुद्ध मिनरल्स वाले पानी के प्लांट और शुद्ध अॉक्सीजन के प्लांट लगाने रहे हैं। शुद्ध अनाज फल सब्जी के अरबों रुपए के बाजार सज चुके हैं आर्गेनिक के नाम पर।

ये आप पर है कि इस वास्तविकता को समझें और स्वयं इस पर निर्णय करें कि कम से कम जीवन की मूलभूत आवश्यकता वाले तत्व जल वायु और भोजन कंपनियों और सरकारों के नियंत्रण में नहीं जाने देंगे। अभी जो लोग किसी भी विचारधारा या भावना से प्रेरित हों वो अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूर सोचें क्योंकि वर्तमान परिस्थितियों में हम प्रौढ़ लोग कितना जीयेंगे बीस तीस साल वो भी कैसे ये भविष्य के गर्त में है लेकिन बीस तीस साल बाद हमारे बच्चों लिए जीवन का गंभीर संकट खड़ा होने वाला है और तब आने वाली पीढ़ी हमें हमारी मूर्खता के लिए माफ नहीं करेगी। जीवन की मूलभूत आवश्यकता के अपने अधिकार और इस पाने के लिए अपने कर्त्तव्य के पालन से मत चूकिए।

लेखक राजीव तिवारी बाबा आध्यात्मिक चिंतक और सरोकारी पत्रकार हैं.

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