एक दशक के भीतर किसान अपने खेत कारपोरेट को बेचने को मजबूर हो जाएंगे!

पंकज मिश्रा-

सौ की सीधी एक बात समझ लें , उन्होंने जमीन के नीचे सब ले लिया है तेल के कुएं हो या खनिज , खदानें| ऊपर आसमान भी ले लिया है स्पेक्ट्रम के जरिये , हवाई रूट्स के जरिये , जंगल का भी खेल खत्म समझिए|

अब उनकी नजर जमीन पर है, चूंकि property को वह संवैधानिक अधिकार खुद मानते है लिहाजा सीधे नही ले सकते तो नाक उल्टी तरफ से पकड़ेंगे| ये तीनों बिल यही है , कहने को जमीन नही ले रहे तो स्थितियां ऐसी बना दो कि लोग खेत बेचने को मजबूर हो जाएं|

आप देखते जाइये बमुश्किल एक दशक के भीतर खेती से वर्कफोर्स निकल कर शहर के लेबर चौराहों और फैक्ट्री गेट के बाहर खड़ी काम मांगने लगेगी| यही अभीष्ट है|

अभी जो लोग खेती पर सब्सिडी के नाम पे कलपने लगते है वही जब कार्पोरेट्स farming करने लगेंगे तो सबसिडी के हिमायती बन जाएंगे| यही अमरीकी मॉडल है जो , हमारा भी आदर्श है| वह पूरा subsidy based मॉडल है बस किसान पिक्चर में नही , उसकी जगह कॉरपोरेट्स है और उनके मजदूर|

इसके बाद water bodies का नम्बर आएगा| भूगर्भ जल स्त्रोत ऑलरेडी प्राइवेट है, अब सतह पर के पानी से ऑक्सीजन सोखना है|

विकास का मॉडल अगर यही रहेगा , तो यही होगा | बात टुकड़ो में क्यो समझते है भाई साब , यह पूरा पैकेज है| पैकेज डील करना ही पड़ेगा, रो के चाहे गा के , हम तो भई गा रहे है|

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