लखनऊ में पत्रकार और पुलिस के बीच हर रात झड़प होती है

चालान से हलकान हुए लखनवी पत्रकार, कोरोना वायरस से लड़ने वाले दो वारियर्स हर रात आपस में लड़ जाते हैं

कोरोना काल में लखनऊ की तहज़ीब और खुशहाली के फूल मुरझा गये हैं। आलम ये है कि कोरोना वायरस से लड़ने वाले वारियर्स भी आये दिन आपस में भिड़ जाते है। पत्रकार और पुलिस के बीच हर रात झड़प होती है। शेर घास खाये तो ऐसी अद्भुत बात को कयामत के आसार बताया जाता है। पुलिस मान्यता प्राप्त, बड़े और स्थापित पत्रकारों को पकड़-पकड़ के उनका चालान काटे तो इसे भी कयामत के आसार की तरह ही देखा जायेगा।

कोरोना काल की मुफलिसी ने लखनऊ फिजाओं में भी वायरस के साथ बदमिजाज़ी घोल दी है। भूल जाइये जब शाम-ए-अवध में मोहब्बत की तान छिड़ती थी। नफासत और नज़ाकत वाले अख़लाक़ की खुश्बू महकती थी। पहले आप..पहले आप की गुजारिश में ट्रेन छूट जाती थी।

अब तो लखनवी तहज़ीब की ख्वाहिश भी मर गई है। लेकिन लखनऊ पुलिस अभी भी कम से कम पत्रकारों से उम्मीद करती है कि वो पुलिस से लखनवी तहज़ीब और नजाकत से पेश आयें। हांलाकि पुलिस खुद भी आम नागरिकों से तहज़ीबयाफ्ता लखनवी अंदाज में ही पेश आती है। रात को कर्फ्यू लग जाने के बाद सड़क पर घूम रहे एक युवक से एक सिपाही ने बहुत तहजीब से कहा- साहेबे आलम.. बरखुरदार.. जाने आलम.. ज़रा इधर तशरीफ लाइये ! मेरी छड़ी-ए-मुबारक (लाठी) आपके तशरीफ के बोसे (चूमना) लेना चाहती है।

बस इस किस्म की ही लखनऊ नजाकत शेष रह गई है। मुस्कुराता शहर अब चिड़चिड़ा हो गया है।अब यहां हर रोज दानिशवर भी अपने गुस्से को नहीं संभाल पाते। लड़ने लगते हैं। शहर के सहाफी भी तमाम मुसीबतों से घिरे हैं। रात को कर्फ्यू रहता है और रात को ही दफ्तर से घर निकलना पड़ता है। कोरोना और पुलिस दोनों का डर बना रहता है। कोरोना हो गया तो पत्नी की मांग सूनी और रात को पुलिस ने घेर लिया तो जेब सूनी।

आफिस में काम का दबाव भी है और नौकरी जाने का डर भी बना रहता। किसी को वेतन मिल रहा तो किसी को नहीं मिल रहा। कोई आधी तनख्वाह से ही संतोष किये हे। इस टैंशन के मारे लखनऊ में किसी ना किसी पत्रकार से रोज रात को पुलिस से पंगा होता है।

दहशत के इन दिनों में लखनऊ में पतंगें भी नहीं लड़तीं, तनावग्रस्त इंसान लड़ते हैं। पतंगे कटने के बजाय चालान कटते हैं। तमाम पेशेवरों की तरह मुफलिसी का दौर जी रहे पत्रकार का चालान जब पुलिस काटती है तो वो बहुत मायूस होता है। कुछ नहीं कर सकते। पत्रकार संगठन का उद्देश्य पत्रकारों का सम्मान बचाने की लड़ाई लड़ना नहीं चाटूकारिता रह गया है।

खैर बेचारा खाटी पत्रकार अब करे तो क्या करे। पुलिस की बद्तमीजी या नाजायज़ तरीके से चालान कटने की खबर फेसबुक पर डाल कर अपनी भड़ास निकाल लेता है।

अनिल भारद्वाज उर्फ बाबा खाटी पत्रकार हैं। वो अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं-

– -और सिपाही जी ने हमें तहजीब सिखाया

समय-क़रीब 10:30 रात

हम अपने अखब़ार के दफ्तर डालीबाग से निकले। गोल मार्केट चौराहे पहुँचे। चौराहे पर कई दारोगा और सिपाही वाहनों पर टूट पड़ रहे थे। सारे दारोगाओं के हाथ में चालान बुक थी। सिपाही गाड़ी रोक रहे थे। दारोगा बोनट पर बुक रख कर चालान काटना शुरु कर दे रहे थे। ये क्रम पिछले एक माह से जारी है ।हम भी महीनों से रोज-रोज झेल रहे हैं। कल 24 जुलाई की रात तो हद हो गयी। चौराहे पर पहुँचते ही 3 दारोगा 2 सिपाही घेर लिये। जैसे कोई आतंकी हो। पूछताछ पर मैंने बता दिया कि अखब़ार के दफ्तर से आ रहे हैं। मैं रोज इसी समय आता हूँ और आगे भी आता रहूंगा। अपना कार्ड भी दिखाया। दारोगा जी कहने लगे कि ये मान्य नहीं है। काफी देर तक तीखी बहस के बाद दो दारोगा दूसरे वाहनों की ओर चले गये लेकिन एक यदुवंशी दारोगा जी अड़ गये। चालान काटने पर आमादा। मेरे कार की आगे-पीछे से मोबाइल से फोटो लेने लगे। फिर नोकझोंक हुई। आधे घंटे बाद बोले-इंस्पेक्टर साहब चौकी के अन्दर बैठे हैं। उनसे मिलिये। अगर वो कहेंगे तभी जाने देंगे। मैं इंस्पेक्टर से मिला। कार्ड दिखाया। उन्होंने कहा, जाइये लेकिन पुलिस से भिड़ना ठीक नहीं। हम अपनी पर आ गये तो- – – – -। मैने कहा, ठीक है आप अपनी पर ही आ जाइये। इंस्पेक्टर साहब ने कहा, जाइए, आप लोग तिल का ताड़ बनाते हैं। मैं चौकी से बाहर निकला। यदुवंशी दारोगा जी से अनुमति ली। उनके साथ खड़े सिपाही जी ने मुझे बोलने की तहजीब सिखायी। हमने सुना। फिर गोलमार्केट चौराहे से अपने घर जानकीपुरम की ओर चल दिये।

हे महराज!
आवश्यक सेवाओं के साथ प्रेस को भी छूट दी गई है। अब तक तो मैं यही समझता था।
-अनिल भारद्वाज

इसी तरह मशहूर और वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट आर. बी. थापा का इस मसले पर अंदाज़े बयां जुदा है। वो अपनी वॉल पर लिखते हैं –

धन्यवाद ! उ प्र की वीर पुलिस ! कल चालान के नाम पर जो मेरा चीर हरण किया है! उससे मेरे अंदर एक अच्छाई आ गई! अब तो शौचालय भी जाता हूं तो मास्क और हेलमेट लगाकर?

इसी क्रम में एक पीड़ित पत्रकार हैं परवेज़ आलम साहब। एक मल्टी एडीशन उर्दू के अखबार के स्टेट हैड हैं। उनके साथ भी पुलिस ने ठीक नहीं किया। वो लिखते है-

कितना गिरेगी लखनऊ पुलिस पैसे के लिए… पुलिस निशातगंज के पास जांच के नाम पर नाजायज वसूली करने के लिए धमका रहे थे जब मैं डॉक्टर के यहां से आ रहा था तो पुलिस ने कहा कि पैसा दे या चालान काट दे जबकि मेरी गाड़ी नंबर यूपी 32 FS 1212 है। जिस पर प्रेस और विधानसभा का पास भी लगा है। मना करने का बाद भी फ़ोटो लेकर चालान काटने की धमकी देते रहे।

  • नवेद शिकोह
    पत्रकार, लखनऊ
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