राडिया टेप पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- इस टेप के कई प्रसंग बेहद परेशान करने वाले (सुनें)

सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि पूर्व कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया के फोन टेप की कई बातें परेशान कर देने वाली हैं। सीबीआई ने कहा है कि इन टेपों में से कुछ की जांच जरूरी है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी और न्यायमूर्ति वी. गोपाल गौड़ा की पीठ ने कहा, "सीबीआई ने कई निष्कर्ष निकाले हैं और इस प्रतिलिपि में संभावित परिणाम कई चीजों को उजागर करते हैं। इसमें कई चीजें परेशान कर देने वाली हैं।"

जांच एजेंसी ने कहा कि इसमें एक प्रारंभिक जांच (पीई) दर्ज करने और प्रतिलिपि से संबंधित कुछ मुद्दों पर अन्य एजेंसियों के साथ मिल कर जांच करने की जरूरत है। 5800 टेलीफोन वार्ताओं वाले राडिया के टेपों की जांच पर आधारित अपनी रिपोर्ट में एजेंसी ने ये बातें कही है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है। सीबीआई ने 15 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्री को राडिया के टेप की जांच से संबंधित अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

राडिया के फोन को आयकर विभाग ने तब निगरानी के दायरे में ले लिया था, जब वित्त मंत्रालय को 16 नवंबर 2007 को एक अनाम पत्र मिला था, जिसमें आरोप लगाया था कि महज कुछ ही वर्षो में इस महिला ने 300 करोड़ रुपये का व्यापारिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है। शिकायत में राडिया के विदेशी संपर्क होने के भी आरोप लगाए गए थे। आयकर विभाग ने 2008-09 के बीच तीन बार 60-60 दिनों के लिए फोन को निगरानी पर रखा। टेप को सार्वजनिक किए जाने की मांग को लेकर एक गैर सरकारी संगठन द्वारा दायर याचिका पर अदालत सुनवाई कर रही है। टेप में कुछ गैरकानूनी या आपराधिक तथ्य शामिल हैं। मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

जांच टीम के अधिकारियों द्वारा किए गए सराहनीय काम की प्रशंसा करते हुए अदालत ने इस बात पर हैरत जताई कि 2जी मामले के अलावा आखिर संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने आगे कहा कि यह संयोग है कि अदालत ने राडिया के टेपों को लेकर आदेश दिया। यह कहते हुए अदालत ने पूछा कि आयकर विभाग ने इसे लिपिबद्ध क्यों नहीं कराया। दूरसंचार विभाग में महत्वपूर्ण पद पर काम करने वाले एक अधिकारी के निजी क्षेत्र की नौकरी में चले जाने की ओर इशारा करते हुए अदालत ने पूछा, "वर्गीकृत सरकारी सूचना तक पहुंच वाला कोई व्यक्ति यदि निजी क्षेत्र के संगठन का कर्मचारी हो जाता है तब क्या होगा।" न्यायमूर्ति सिंघवी ने सवाल किया, "वर्गीकृत सूचनाओं की सुरक्षा कैसे होगी? यदि कार्यालय छोड़ने से पहले लालच दिया जाए तो व्यक्ति हेराफेरी कर सबकुछ मिटा देगा।" अदालत ने कहा, "हम इन सभी मुद्दों की गहन जांच का निर्देश देंगे।"


राडिया टेप सुनने के लिए यहां क्लिक करें : राडिया टेप (सुनें)

‘देख तमाशा’ में इस बार दूरदर्शन के क्रांतिकारी अफसर राजशेखर व्यास

तहसीन मुनव्वर ने 'लोक स्वामी' मैग्जीन के 'देख तमाशा' कालम में इस बार राजशेखर व्यास का कार्टून बनवाया है और उनकी शख्सियत के बारे में बयान किया है. दूरदर्शन के अफसर राजशेखर व्यास को क्रांतिकारी अधिकारी कहा जाता है. इन्होंने आजादी की लड़ाई के योद्धाओं पर काफी काम किया है.

(कालम पढ़ने के लिए उपरोक्त पन्ने पर क्लिक कर दें )

राजशेखर दूरदर्शन में एडीजी के पद पर कार्यरत हैं.  इन्होंने सिर्फ भगत सिंह पर ही 39 किताबें लिखी हैं और कुल सात वृत्त चित्र भी बनाए हैं. भगत सिंह के अलावा 45 अन्य क्रांतिकारियों को भी वृत्तचित्रों में उतारा है. कुल वृत्तचित्रों यानि डाक्युमेंट्रीज की बात करें तो लगभग 200 इनके खाते में दर्ज हैं. इनके चार हजार से अधिक लेख देश विदेश की पत्र पत्रिकाओं में छपे हैं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

एंकर सिद्धार्थ शर्मा एबीपी न्यूज छोड़कर स्टार स्पोर्ट्स में एवीपी बने

एबीपी न्यूज से इस्तीफा देकर सिद्धार्थ शंकर स्टार स्पोर्ट्स में एवीपी बन गए हैं. करीब 11 वर्षों से स्टार न्यूज फिर एबीपी न्यूज के साथ एंकर के रूप में पारी खेल चुकने के बाद सिद्धार्थ शर्मा ने अब नई चुनौती से दो-चार करने का मन बनाया और स्टार स्पोर्ट्स का रुख किया.

यहां अच्छे खासे पैकेज व पद पर गए सिद्धार्थ का काम कंटेंट, प्लानिगं, प्रोग्रामिंग, एक्जीक्यूशन यानि पर्दे के पीछे का है. करीब 15 वर्ष से सिद्धार्थ एंकरिंग कर रहे थे. वे जी न्यूज में भी काम कर चुके हैं. सिद्धार्थ ने पिछले महीने एबीपी न्यूज से इस्तीफा दिया. भड़ास4मीडिया से बातचीत में सिद्धार्थ ने बताया कि वे एक तरह का काम करते करते बोर हो गए थे. बदलाव चाहते थे. नई चुनौती भी. इसलिए स्टार स्पोर्ट्स ज्वाइन किया.

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Court issues fresh summons to Sahara, its chief Subrata Roy

Mumbai : The order came on a day when SEBI made a forceful plea in the Supreme Court today to take contempt action against Subrata Roy along with his two firms and their directors for not complying with its order for refunding Rs 24,000 crore to investors. A magistrate on Tuesday issued fresh summons to two Sahara Group firms and their top executives, including the organisation chief Subrata Roy, asking them to appear on September 30 in connection with the alleged violation of regulations of Companies Act and Sebi Act.

The court had earlier taken cognisance of the case filed by SEBI and issued summons but no report was filed regarding service of summons (by Sebi) to the respondents, following which the court issued fresh summons against them. The order came on a day when SEBI made a forceful plea in the Supreme Court today to take contempt action against Subrata Roy along with his two firms and their directors for not complying with its order for refunding Rs 24,000 crore to investors.

The magistrate had on July 7 taken cognisance of SEBI's complaint and issued process against the two companies Sahara India Real Estate Corp Ltd (SIRECL) and Sahara Housing Investment Corp Ltd (SHICL) and their top officials under various sections of the Companies Act and the Sebi Act. The relevant sections of the Companies Act deal with matters related to disclosures made in the prospectus or issue of shares or debentures, criminal liability for mis-statements in prospectus, penalty for fraudulently inducing persons to invest money and penalty for false statements.

Sebi had begun a probe in 2008 after it received complaints alleging that SIRECL and SHICL were issuing convertible bonds to the public throughout the country without complying with the applicable statutory requirements. It was later found that the two companies had raised funds amounting to close to Rs 25,000 crore by allotting Optionally Fully Convertible Debentures (OFCD) to more than 3 crore investors without following various statutory and regulatory requirements stipulated under the Companies Act and the relevant Sebi regulations.

Subsequently, Sebi passed an order in 2011, directing the two companies and their promoters and directors to repay the amount raised through OFCDs to the investors along with a 15 per cent interest. The order was challenged by the companies but it was upheld by the Securities Appellate Tribunal in October 2011 and by the Supreme Court in August 2012.

The apex court had also directed these companies to deposit the money with Sebi for further repayment to the investors. So far, SIRECL and SHICL have deposited only Rs 5,120 crore with Sebi. The regulator has initiated the process of refund to genuine investors out of the money deposited by these firms. The firms claimed they have already refunded over Rs 20,000 crore to the investors directly and their total outstanding liability is less than Rs 5,120 crore deposited with Sebi. (PTI)


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इलाहाबाद में विकास, अरुणाभ व विनीत ने ज्वाइन किया आई-नेक्स्ट, शशिकांत पहुंचे कैनविज टाइम्स, सात और इधर से उधर

इलाहाबाद में इस समय नौजवान पत्रकारों में भगदड़ मची हुई है। हाल ही में 10 ने संस्थान बदलकर नई जगह ज्वाइन कर लिया। इनमें ज्यादातर ऐसे नवयुवक खबरनवीस शामिल हैं, जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी पत्रकारिता की ट्रेनिंग अभी-अभी पूरी हुई है और वे अब मैदान में है, कलमबाजी का करतब दिखाने के लिए। इनमें पांच लड़के ऐसे हैं, जो अनुभवी, अनुशासनप्रिय व कलम के धनी संपादक डेली न्यूज एक्टिविस्ट के जेपी सिंह की पाठशाला से निकले हैं।

इनमें विकास गुप्ता, जो अभी तक ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ में थे, ने ‘आई-नेक्स्ट’ ज्वाइन कर लिया है। विकास ने पत्रकारिता की शुरूआत ‘युनाइटेड भारत’ से शुरू की थी। यहां से वह अमृत प्रभात गए, जहां पर कई एक चर्चित खबरें ब्रेक कर उन्होंने इलाहाबाद की पत्रकारिता में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज करायी। इसके बाद उन्हें डेली न्यूज एक्टिविस्ट के संपादक जेपी सिंह ने अपने यहां बुला लिया था। जहां पर वह अपनी कलम में धार देने के अलावा पत्रकारिता के वे तमाम ‘गुरु’ सीखे, जिसकी बदौलत नौकरी और धमक दोनों बची रहती है।

‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ के स्टार रिपोर्टर शशिकांत सिंह ने ‘कैनविज टाइम्स’ इलाहाबाद में चीफ रिपोर्टर के पद पर ज्वाइन किया है। शशिकांत ने पिछले साल हिन्दुस्तान बदायूं ज्वाइन कर लिया था, जहां हिन्दुस्तान प्रबंधन ने उनके साथ चीटिंग की। महीनों काम कराने के बाद न तो ज्वाइनिंग लेटर दिया और न ही पेमेंट। बाद में वह वहां से हताश होकर पुनः ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ लौट आए थे। शशिकांत सिंह की गिनती बेहद कर्मठ व ईमानदार पत्रकार के रूप में होती है।

‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ के ही पत्रकार परवेज कैनविज टाइम्स तो नागेन्द्र अब जनसंदेश टाइम्स पहुंच गये हैं। वहीं आई-नेक्स्ट में बतौर स्टाफ रिपोर्टर कार्यरत रहे अजीत शुक्ला ने रीवां मध्यप्रदेश में राजस्थान पत्रिका ज्वाइन किया है। जनसंदेश टाइम्स में डेस्क पर कार्यरत अरुणाभ मिश्र ने भी आई-नेक्स्ट ज्वाइन कर लिया है। जबकि आई-नेक्स्ट से राजस्थान पत्रिका उज्जैन पहुंचे विनीत तिवारी एक बार फिर आई-नेक्स्ट इलाहाबाद लौट आए हैं। अमृत प्रभात के रिपोर्टर दिलीप पटेल ने राजस्थान पत्रिका रीवां तो अशोक शुक्ला ने जन संदेश टाइम्स इलाहाबाद छोड़कर शहडोल मध्यप्रदेश में राजस्थान पत्रिका ज्वाइन कर लिया है।

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट

ताकि कल कोई और डिंपल घुट-घुट कर मरने को विवश न हो

यशवंत जी, मै डिंपल विपिन मिश्रा उल्हास नगर जिला ठाणे महाराष्ट्र में रहती हूं। मूलतः मैं चौबेपुर वाराणसी की रहने वाली हूं। मेरे पिताजी स्वर्गीय बलवंत मिश्रा मुंबई के एक काटन मिल में काम करते थे। लिहाजा मैं सपरिवार मुंबई रहती थी। मेरे पिताजी के दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। मैं छोटी थी। मेरी बड़ी बहन की मौत गाँव में ही संदिग्ध अवस्था में हो गयी थी। इसके बाद मेरे पिताजी सभी को लेकर मुंबई चले आए। पर मेरा बड़ा भाई विकलांग होने के कारण घर पर ही रह गया। मैं अपने पिताजी, माँ और छोटे भाई के साथ मुंबई के सायन उपनगर में हंसी खुशी के साथ रहती थी।

मेरा दुर्भाग्य उस दिन शुरू हुआ जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था। उस नफरत की आग ने मुंबई में भी कहर ढाया। उस समय मैं दूसरी क्लास में पढ़ती थी। मैं स्कूल में ही थी जब भगदड़ मचनी शुरू हो गयी। किसी तरह जब मैं घर पहुंची तो वहां कोई नहीं था। मेरा घर जल रहा था। मैं रोते बिलखते इधर उधर भटकती रही। शाम को मेरे माँ बाप मिले। हम कई लोग रात को एक सुनसान जगह पर रात बिताए। घर जल चुका था और वहां रहने के लिए कुछ बचा भी नहीं था।

इसके बाद मेरे पिताजी सपरिवार उल्हासनगर आकर रहने लगे। पर हम लोगों की खुशियां छिन चुकी थी। कुछ दिन बीते थे, मेरी माँ ने साथ छोड़ दिया। उसके बाद मेरे पिताजी भजन कीर्तन में अधिक ध्यान लगाने लगे। करीब 2005 में मेरे पिताजी रिटायर हो गए। पेंशन के पैसे से किसी तरह गुजारा होने लगा। पर मुंबई जैसे शहर में इतनी कम रकम में गुजारा होना मुश्किल था। मेरे भाई को जब अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए थी वह नहीं निभाया और घर छोड़कर अलग रहने लगा। अब घर पर मैं और पिताजी रहने लगे। एक सहेली के कहने पर मैंने भांडूप में एक रिलायंस कंपनी के काल सेंटर में जाब कर लिया। मेरा काम बकाया बिलों की वसूली के लिए फोन करना था। रिलायंस के ही एक ग्राहक विपिन मिश्रा जो ठाणे में रहते थे. उन्हे मैंने फोन किया। स्वाभाविक है मुंबई जैसे शहर में जब उत्तर प्रदेश का कोई मिल जाता है तो घर जैसी ही अनुभूति होती है। लिहाजा बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वे वाराणसी के नजदीक भदोही के ही हैं। वे मुंबई में फोटोग्राफी करते थे। मुझसे वे बार-बार फोन करके बात करने लगे। बातचीत के ही दौरान उन्होंने मुझसे घर का पता पूछा और एक दिन घर चले आए। एक ही क्षेत्र के रहने के कारण मेरे पिताजी से उनकी बात होने लगी।

खैर मैं अधिक विस्तार में न जाकर यह बताना चाहूँगी कि उन्होंने पिताजी से कहा कि वे भी अकेले हैं और मुझसे शादी करना चाहते हैं। हम दोनों राज़ी थे लिहाजा पिताजी भी मान गए और 2009 अंबरनाथ के दुर्गा मंदिर में हम लोगों की हिन्दू रीतिरिवाज से विवाह हो गया। यह बात विपिन ने अपने परिवार से छुपाई थी। हमारी भूल यह थी कि हमने विपिन की इस बात पर विश्वास किया कि वे अपने परिवार से अलग अकेले थे। इस रिश्ते को स्वीकारने के लिए विपिन के पिताजी ने मेरे पिताजी से 10 लाख रुपए और रकम की मांग की तथा गाँव में दोबारा शादी करने की बात कही। पर मेरे पिताजी के पास पैसे नहीं थे। उन्होंने मेरी ससुराल वालों को बहुत समझाया पर वे नहीं माने। मेरे भविष्य को लेकर पिताजी चिंतित रहने लगे। पर विपिन बार बार अपने परिवार को मनाने की बात करते रहे। उनकी बातों पर विश्वास करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। इसी तरह एक एक दिन गुजरने लगे। इसी बीच मेरे गर्भ मे विपिन और मेरे प्यार का अंकुर भी पनपने लगा। विपिन कहने लगे कि अब शांत रहो जब हम लोगों का बच्चा हो जाएगा तो घर वाले भी मान जाएंगे।

मेरे पास भी भरोसा करने के अलावा कोई चारा नहीं था। पर दिमाग मे हमेशा टेंशन बनी रहती थी। मेरे पिताजी अलग चिंतित रहते थे। उनकी तबीयत खराब रहने लगी। और 8 अप्रैल 2011 को इसी सदमे के कारण हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गयी। अब मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था। पर विपिन के बातों पर भरोसा करती रही। उन्होंने मुझे अस्पताल मे भर्ती कराया और बोले की गाँव में उनके दादा जी की तबीयत खराब है, लिहाजा वे घर चले गए। मुझे नहीं पता था कि वे मुझे धोखा दे रहे हैं। 2 मई को मेरी बेटी आंचल पैदा हुयी और विपिन ने 5 मई को गाँव में दूसरी शादी कर ली। यह बात मुझे एक साल बाद पता चली। फिर मैं टूट गयी। मेरे रोने गिड़गिड़ाने का विपिन पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे मुझे धमकी देने लगे कि तुम अकेली हो, यदि शांत नहीं रही तो जान से मार दी जाओगी। मैं बुरी तरह टूट चुकी थी। इस बीच मुझे मेरी मुहबोली भाभी जो आजमगढ़ की हैं, उन्होंने मेरा बहुत साथ दिया। यहां तक की मुझे बेटी की तरह सहारा दिया।

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। कई बार मन में खयाल आया कि खुद को खत्म कर लूं पर आंचल को देख कर हिम्मत नहीं पड़ती थी। आखिर मेरे गुनाहों की सज़ा उसे क्यों। काफी दिन इसी तरह बीत गए। फिर मैंने सोचा कि जब फेसबुक से अफवाह फैलाई जा सकती है तो क्या न्याय की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। मैंने अपनी व्यथा फेसबुक के माध्यम से सबसे कहनी शुरू की। कुछ लोगों ने मेरा मज़ाक उड़ाया और कुछ लोगों ने सहयोग किया। काफी प्रयास के बाद मैं लोगों को विश्वास दिलाने मे सफल हुयी कि मैं न्याय के लिए लड़ रही हूं। चार महीने की अथक मेहनत के बाद मैंने भदोही में समर्थक जुटाये और नवंबर 2012 में भदोही आई। मैं अपने ससुराल गयी तो मेरे साथ हजारों लोग थे। ससुराल वाले घर छोड़कर भाग गए। जिले की पंचायत ने मेरे पक्ष में फैसला दिया। पर वे लोग नहीं माने। मैंने भदोही के न्यायालय मे घरेलू हिंसा के तहत मामला दर्ज़ कराया जिसकी अवधि छह माह होती है, पर अभी तक कोई फैसला नहीं आया।

इन सब बातों को लेकर मैं बहुत परेशान रहने लगी हूं। विपिन के परिवार वालों ने धमकी दी थी कि भदोही में मेरे लोगों का राज़ चलता है और मुझे लगता है कि वास्तव में उसने सही कहा था। जरा सोचिए सभी बड़े अखबारो में खबर छपी कि मेरा साथ देने वाले ग्राम प्रधानों को पूर्वांचल के एक बड़े माफिया ने जान से मारने की धमकी दी थी। पर आज तक उस मामले की जांच तक नहीं हुयी। मुझे जान से मारने की धमकी दी गयी, यह खबर मुंबई से दैनिक जागरण के मुख्य पेज़ पर छपी, पर कोई कार्यवाही नहीं हुयी।  

आज यह सब बातें मैं इसलिए लिख रही हूं कि अब मेरी ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं है। जिस तरह मैं काफी दिनों से मानसिक तनाव से गुजर रही हूं। उसका दुष्परिणाम मेरे सामने आ गया है। काफी दिनों से मेरे सिर में दर्द हो रहा था। मैं पैन किलर खाकर किसी तरह काम चला रही थी। मुझे नींद भी नहीं आती, यह सब सोच कर। शनिवार को मैंने जांच कराई तो पता चला कि मुझे ब्रेन ट्यूमर है। मैं इसका इलाज़ करा नहीं सकती क्योंकि उसके लिए पैसे चाहिए जो मेरे पास हैं नहीं। और मैं किसी से मांग सकती नहीं। हो सकता है मैं कल न रहूं। पर कुछ सवाल है जो मै मीडिया और कानून दोनों से आपके माध्यम से पूछना चाहती हूं।

1– देश की कानून व्यवस्था पीड़ितो को न्याय दिलाने के लिए बनी है। पर क्या पीड़ित न्याय पाता है? जो कानूनी दाव पेंच हैं क्या वे पीड़ित से अधिक अपराधियो को लाभ नहीं पहुंचाते हैं। या फिर देर से मिला न्याय क्या किसी समस्या का हल है। यदि मेरे मामले मे देखा जाय तो लगातार चार पाँच महीने मेहनत करके, लोगों के उल्टे सीधे सवालों के जवाब देकर लोगों को यह भरोसा दिलाई की मैं सच के साथ हूं। मेरे साथ अन्याय हुआ है। अपनी बेटी को न्याय दिलाने, उसे बाप का नाम दिलाने मैं लोगों से कर्ज लेकर भदोही गयी। और आज तक विपक्षियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुयी। मेरी जान का खतरा है, पर कोई सुरक्षा नहीं है। क्या ऐसे कानून के भरोसे कोई महिला कभी अपने साथ हुये अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत करेगी।

2– मैंने अपने साथ हुये अन्याय के खिलाफ साथ देने के लिए मीडिया से गुहार लगाई। मीडिया ने साथ भी दिया। मुंबई की चाल में रहने वाली एक सामनी गरीब महिला जब भदोही पहुंची तो उसे मीडिया ने ही चर्चित बना दिया। मीडिया की देन रही कि मेरा मामला काफी ऊपर तक गया। मीडिया ने चर्चित किया तो क्राइम पेट्रोल ने तीन एपिसोड बना डाले। पर मैं तो वहीं की वहीं हूं। जब कोई मामला चर्चित होता है तो मीडिया भी साथ देती है। मैं मीडिया की ऋणी हूं और आजीवन रहूँगी। पर क्या मीडिया का दायित्व बस वहीं तक है। क्या उसके बाद पैदा हुये हालात पर निगाह रखना मीडिया का दायित्व नहीं। कल मैं मर जाऊं, एक बार फिर खबर छपेगी, लोग अफसोस जताएँगे। और बस हो गया, परसो दूसरी डिंपल आ जाएगी। फिर सब कुछ वही।

यशवंत जी, अपनी बात मैं इसलिए कह रही हूं कि मैं भड़ास की अहमियत जानती हूं और अपनी बात आपके माध्यम से उन लोगों तक पहुंचाना चाहती हूं जो मेरी बात समझ सकते हैं। मेरा भरोसा अब नहीं है। हो सकता है मैं रहूं या नहीं। पर इतना अवश्य कहना चाहूँगी की देश में तमाम ऐसी महिलाए हैं जो समाज का सामना दुख सहने के बाद भी इसलिए नहीं कर पाती हैं कि उन्हें पता है कानून उन्हें समय पर न्याय नहीं देगा। और मीडिया भी अपनी जिम्मेदारियों को सिर्फ खबर तक ही सीमित रखती है। किसी को न्याय मिला की नहीं, उसके हालात कैसे हैं, कोई मतलब नहीं। और समाज तो कुंभकरण की नींद सो ही रहा है। उसे जगाना और भी मुश्किल है। मैं यह कहना चाहती हूं कि समाज का प्रत्येक वर्ग अपनी जिम्मेदारियों को समझे और उन्हें पूरा करे ताकि कल कोई और डिंपल घुट घुट कर मारने को विवश न हो।

डिंपल

dimple misra

dimplemisra123@gmail.com

पुलिस ने 100 करोड़ उगाही में सुभाष चंद्रा, सुधीर चौधरी और समीर को दोषी माना, चार्जशीट दायर

पुलिस ने जिंदल पावर एंड स्टील लिमिटेड से कथित कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की आड़ में 100 करोड़ रुपये की उगाही के प्रयास मामले में जी न्यूज के चेयरमैन सुभाष चंद्रा, जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया और जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी को जांच में दोषी पाया है। पुलिस ने तीनों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया है, जिस पर अदालत 19 अगस्त को संज्ञान लेगी। पुलिस ने इस मामले के अन्य आरोपी चेयरमैन के बेटे पुनीत गोयनका और भाई जवाहर गोयल को अभियुक्त बनाने के मुद्दे पर फैसला अदालत पर छोड़ दिया है।

पुलिस ने पटियाला हाउस स्थित अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अमित बंसल के समक्ष 70 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें पुलिस ने कहा है कि आरोपी चंद्रा, सुधीर व समीर के खिलाफ उगाही के लिए षड्यंत्र रचने व अन्य धाराओं में मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं। पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया। पुलिस ने कोर्ट को बताया कि पुनीत और जवाहर गोयल के खिलाफ भी काफी साक्ष्य हैं और अन्य साक्ष्य एकत्रित किए जा रहे हैं। पुलिस ने इन दोनों का नाम इसी आधार पर कॉलम नंबर 12 में रखा है।

पुलिस के मुताबिक, मामले में समीर अहलूवालिया व सुधीर चौधरी की भूमिका प्रमुख रही है। चैनल के व्यावसायिक लाभ को देखते हुए सुभाष चंद्रा ने भी उनका पूरा साथ दिया। इस मामले में इन तीनों के अलावा चैनल के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका भी काफी संदिग्ध है। इन लोगों ने अपने कार्यालय में बैठकर जिंदल समूह की कंपनी को ब्लैकमेल करने और उसकी प्रतिष्ठा नष्ट करने के लिए षड्यंत्र रचा। इन सभी की भूमिका की विस्तृत जांच जारी है। समीर और सुधीर को गिरफ्तारी के 20 दिन बाद अदालत ने 17 दिसंबर, 2012 में जमानत दे दी थी। वहीं चेयरमैन चंद्रा व उनके बेटे को अग्रिम जमानत मिल गई थी।

पुलिस ने कहा कि कथित कोयला घोटाला मामले में संसद में पेश सीएजी रिपोर्ट को जी न्यूज के लोगों ने बदलकर गलत तरीके से चैनल पर दिखाया, ताकि याची से उगाही की जा सके। चैनल ने 7 से 13 सितंबर तक लगातार गलत स्टोरी चलाई थी। स्टिंग ऑपरेशन के ऑडियो व वीडियो से भी इस तथ्य का खुलासा हुआ है। हालांकि, जी न्यूज ने 100 करोड़ रुपये विज्ञापन के रूप में लेने का तर्क रखा, जिसे पुलिस ने खारिज कर दिया। पुलिस के अनुसार, इस तथ्य की भी पुष्टि हो चुकी है कि समीर व सुधीर होटल हयात में शिकायतकर्ता जिंदल स्टील के निदेशक-एचआर राजीव भदौरिया से मिले और 100 करोड़ रुपये की मांग दोहराई।


जिंदल से डील करते सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की सीडी देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें..

http://old1.bhadas4media.com/video/viewvideo/638/media-world/zee-jindal-cd-naveen-jindal-sudhir-chaudhari-and-samir-ahluwaliya.html

टैक्स चोर है दबंग दुनिया अखबार का मालिक किशोर वाधवानी

इंदौर में नई दुनिया अखबार ने दबंग दुनिया अखबार के मालिक किशोर वाधवानी के खिलाफ टैक्स चोरी की एक खबर छापी है. इसमें बताया गया है कि किशोर वाधवानी ने कई करोड़ रुपये की टैक्स चोरी की है और संबंधित विभाग ने टैक्स चोरी को लेकर नोटिस जारी किया है. नई दुनिया के 30 जुलाई के अंक में छपी खबर की कटिंग किसी ने भड़ास के पास भेजा है, जिसे हम यहां प्रकाशित करने जा रहे हैं.

पूरी खबर यूं है….

इस खबर से साबित हो रहा है कि गुटखा व्यापारी किशोर वाधवानी की अखबार चलाने के पीछे असली मंशा क्या है. बताते हैं कि येन केन प्रकारेण पैसा बनाने में जुटा किशोर वाधवानी सत्ता और पावर को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए अखबार का इस्तेमाल करता है. वाधवानी टैक्स चोरी करने के लिए एक्साइज विभाग के इंस्पेक्टरों को भी मोटी रकम खिलाकर अपने साथ मिला लेता है.

अगर आपके पास भी ऐसी कोई जानकारी, खबर, सूचना है जिसका प्रकाशन भड़ास पर किया जाना जरूरी है तो आप उसे मेल के जरिए bhadas4media@gmail.com तक पहुंचा दें. भेजने वाले का नाम गोपनीय रखा जाएगा.

तेलंगाना के बाद कई और राज्यों के लिए बढ़ेगा दबाव

तेलंगाना के गठन का रास्ता साफ होने लगा, तो देश के कई हिस्सों में नए राज्यों के लिए दबाव बढ़ने जा रहा है। खासतौर पर गोरखालैंड की मांग कर रहे नेताओं ने अपनी सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में अलग गोरखालैंड बनाने की मांग सालों से चली आ रही है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा लंबे समय से इसके लिए आंदोलनरत रहा है। तेलंगाना के मुद्दे से उत्साहित होकर जीएमएम ने सोमवार से गोरखालैंड की मांग के लिए 72 घंटे के बंद का आयोजन भी कर डाला। इसी तरह से असम के उत्तरी हिस्सों के कई जिलों को मिलाकर पृथक बोडोलैंड बनाने की मांग हो रही है। दरअसल, इस इलाके में बोडो आदिवासियों का बाहुल्य है।

ये लोग लंबे समय से अपने लिए अलग राज्य की मांग करते आए हैं। इस मुद्दे पर कई बार हिंसक आंदोलन भी हो चुके हैं। महाराष्ट्र में विदर्भ राज्य की मांग लंबे समय से लंबित है। नागपुर के आसपास के इलाके अपने लिए विदर्भ राज्य चाहते हैं। लेकिन, राज्य के विभाजन के खिलाफ शिवसेना, कांग्रेस व एनसीपी का नेतृत्व है। ऐसे में, विदर्भ की मांग को ज्यादा गति नहीं मिल पाई। लेकिन, सामाजिक आर्थिक जानकारों का मानना है कि विदर्भ राज्य की मांग कई कारणों से एकदम उचित मानी जा सकती है। रालोद के प्रमुख अजित सिंह छोटे राज्यों के प्रबल समर्थक हैं। उन्होंने यूपीए की बैठक में कल तेलंगाना के फैसले को एकदम जायज ठहराया था। वे तो कहते हैं कि छोटे राज्यों के गठन से विकास की नई संभावनाएं बनेंगी। अजित सिंह, विदर्भ की मांग को भी एकदम जायज मानते हैं। वे उत्तर प्रदेश के और विभाजन के प्रबल पैरवीकार हैं। उनकी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश के नाम से नए राज्य का दर्जा दिलाने के लिए आंदोलनरत भी है। अजित सिंह, तेलंगाना के गठन के फैसले को बहुत शुभ बता रहे हैं।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

लंबी जद्दोजहद के बाद हो गया तेलंगाना का फैसला

लंबी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने आखिरकार आंध्र प्रदेश का बंटवारा करके तेलंगाना राज्य के गठन के लिए अपनी मंजूरी दे ही दी। आज (बुधवार) कैबिनेट की बैठक में तेलंगाना के प्रस्ताव पर मुहर लग जाएगी। पिछले पांच दशकों से तेलंगाना के मुद्दे पर आंदोलन चल रहा है। यूं तो कांग्रेस नेतृत्व ने 2009 में ही तेलंगाना के गठन की तैयारी कर ली थी। लेकिन, उस दौर में आंध्र प्रदेश के रॉयल सीमा और तटीय आंध्र के हिस्सों में इतनी उग्र प्रतिक्रिया हुई, जिसे देखते हुए कांग्रेस नेतृत्व ने इस फैसले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश की थी।

लेकिन, तेलंगाना की आग इतनी भड़क चुकी थी कि इसे पूरी तरह से दबाना संभव नहीं रहा। इस मुद्दे को लेकर मनमोहन सरकार भी लंबे समय से खासी दुविधा में फंसी रही है। अगले कुछ महीनों में लोकसभा के चुनाव होने हैं। ऐसे में, पार्टी रणनीतिकारों ने अलग तेलंगाना के गठन को मंजूरी देना जरूरी समझा। क्योंकि, ऐसा न करने पर कांग्रेस को भारी राजनीतिक नुकसान होने की आशंका थी। इसी को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने तेलंगाना राज्य के गठन को मंजूरी दे दी है। इस फैसले पर यूपीए के घटक दलों ने भी अपनी मुहर लगा दी है।

तेलंगाना के मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व ने कल दिनभर मंत्रणाओं का दौर जारी रखा। पहले यूपीए घटकों की समन्वय समिति की बैठक की गई। इस बैठक में यूपीए के सभी घटकों ने अलग तेलंगाना प्रदेश बनाने के लिए आम सहमति से मंजूरी दे दी। इस बैठक के कुछ देर बाद ही कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई। इसमें तेलंगाना के फैसले पर मुहर लगा दी गई। कैबिनेट से मंजूरी दिलाने के बाद नए राज्य के गठन की वैधानिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। कांग्रेस रणनीतिकारों ने उम्मीद जाहिर की है कि संसद के मानसून सत्र में ही तेलंगाना के विधेयक को दोनों सदनों में मंजूरी मिल जाएगी। इसके बाद संसद का प्रस्ताव राष्ट्रपति भवन मंजूरी के लिए भेजा जाएगा।

तेलंगाना के मुद्दे पर हुए इस बड़े फैसले से एक ओर जहां तेलंगाना के 10 जिलों में खुशी की लहर देखी गई, वहीं शेष आंध्र के हिस्सों में भारी नाराजगी की खबरें आने लगी हैं। खुफिया एजेंसियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पहले ही अगाह कर दिया था कि तेलंगाना के गठन के फैसले से रॉयल सीमा और तटीय आंध्र के हिस्सों में कुछ जगह हिंसक तांडव भी हो सकता है। ऐसे में, जरूरी है कि संवेदनशील इलाकों में अर्द्ध सैनिक बलों की तैनाती करा दी जाए। इस खतरे को देखते हुए कई शहरों में अर्द्ध सैनिक बलों के 3 हजार जवानों की तैनाती करा दी गई थी। सरकार के सामने मुश्किल यह है कि तेलंगाना के फैसले को लेकर कांग्रेस के अंदर ही राज्य में क्षेत्रवाद की राजनीति ने उग्र रूप धारण कर लिया है। इस स्थिति को काबू में रखना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बन गई है। इतना जरूर हुआ है कि तमाम आशंकाओं के बावजूद मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा नहीं दिया है। जबकि, दो दिन से इस तरह की अफवाहें फैल रही थीं कि मुख्यमंत्री रेड्डी ने तेलंगाना के मुद्दे पर इस्तीफे का अल्टीमेटम दे दिया है। इतना ही नहीं रॉयल सीमा और तटीय आंध्र से आने वाले चार केंद्रीय मंत्रियों ने भी फिलहाल, चुप्पी साध ली है। जबकि, इनकी तरफ से यही संकेत मिल रहे थे कि तेलंगाना राज्य बनाने का फैसला हुआ, तो ये लोग भी मंत्री पदों से तुरंत इस्तीफा दे देंगे।

हालांकि, कांग्रेस के बड़े नेता भी अभी दावे से नहीं कह पा रहे हैं कि तेलंगाना के मुद्दे पर पार्टी के अंदर कोई बड़ा बवाल नहीं खड़ा हो सकता। क्योंकि, मुख्यमंत्री रेड्डी अपने समर्थकों के दबाव से काफी बेचैन बताए जा रहे हैं। आंध्र के कई केंद्रीय मंत्रीगण भी भारी दबाव में माने जा रहे हैं। क्योंकि, इन्हें खतरा है कि तेलंगाना के फैसले के बाद भी वे कुर्सी से चिपके रहे, तो स्थानीय जनता के गुस्से का शिकार बन सकते हैं। मंगलवार की सुबह आंध्र क्षेत्र से आने वाले केंद्रीय मंत्री एम. एम पल्लम राजू,   जे.डी. सीलम, डी. पुरंदेश्वरी व पनाबका लक्ष्मी ने पार्टी के महासचिव दिग्विजय सिंह से मुलाकात की थी। उल्लेखनीय है कि दिग्विजय सिंह आंध्र के संगठन मामलों के प्रभारी भी हैं। इन मंत्रियों ने पार्टी महासचिव से कहा था कि मौजूदा स्थितियों में तेलंगाना के गठन का फैसला काफी विस्फोटक हो सकता है। इस फैसले के बाद मंत्री पदों पर बना रहना उनके लिए मुश्किल होगा।

समझा जाता है कि इन मंत्रियों ने सामूहिक रूप से ऐन मौके पर दबाव बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन, यह कवायद ज्यादा कारगर नहीं रही। क्योंकि, तीन दिन पहले ही पार्टी के कोर ग्रुप ने तेलंगाना के मुद्दे पर सैद्धांतिक सहमति का फैसला कर लिया था। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, इस फैसले के पीछे रणनीति यही रही है कि ऐसा करने से तेलंगाना क्षेत्र की 17 लोकसभा सीटों में से कम से कम 10 तो पक्के तौर पर कांग्रेस की झोली में आ ही जाएंगी। यदि तेलंगाना का फैसला लंबित रखा जाता है, तो लोकसभा के चुनाव में हो सकता है कि पार्टी को यहां एक भी सीट न मिले। ऐसे में, इतना राजनीतिक जोखिम लेना ठीक नहीं रहेगा। इसकी एक वजह यह भी है कि इस बार तटीय आंध्र और रॉयल सीमा के इलाके में कांग्रेस के हालात अच्छे नहीं रहे। क्योंकि, वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगन मोहन रेड्डी की बढ़ी लोकप्रियता ने कांग्रेस की संभावनाएं काफी कमजोर बना दी हैं।

दरअसल, तेलंगाना के मुद्दे ने आंध्र की राजनीति में कांग्रेस को काफी कमजोर बना दिया है। यह मुद्दा पार्टी के लिए लंबे समय से दोधारी तलवार बना हुआ है। जबकि, पिछले चुनाव में आंध्र की 42 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस की झोली में 33 सीटें आई थीं। इस तरह से देश में किसी एक प्रदेश से कांग्रेस को सबसे ज्यादा सीटें आंध्र से ही मिली थीं। 2009 के चुनाव में कांग्रेस के पास यहां पर लोकप्रिय नेता वाई. एस. राजशेखर रेड्डी थे। लेकिन, एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी आकस्मिक मौत के बाद यहां कांग्रेस का खेल बिगड़ता चला गया। मुख्यमंत्री पद के मुद्दे पर राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस आलाकमान से टकराव की मुद्रा अपना ली थी। जब तमाम जिद के बाद उन्हें अपने पिता की जगह मुख्यमंत्री पद की कुर्सी नहीं मिली, तो उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व को ठेंगा दिखाने की जुर्रत करनी शुरू की थी। इसी प्रक्रिया से जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस के विद्रोही नेता बन गए। अंतत: उन्होंने कांग्रेस को राजनीतिक चुनौती देने के लिए वाईएसआर कांग्रेस पार्टी बना ली। जगन रेड्डी का रॉयल सीमा क्षेत्र के बड़े इलाके में राजनीतिक दबदबा हो गया है। तटीय आंध्र के कई संसदीय क्षेत्रों में भी जगन मोहन का प्रभाव बढ़ा है। यह अलग बात है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में जगन मोहन पिछले कई महीनों से जेल के अंदर हैं। लेकिन, जेल के सीखचों में रहकर भी वे लगातार कांग्रेस की राजनीति को झटका देने में सफल रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि रॉयल सीमा और तटीय आंध्र के लोग राज्य के विभाजन के धुर खिलाफ रहे हैं। इसी खिलाफत की वजह से तेलंगाना के गठन का मामला लगातार टलता आया है। तेलंगाना के मुद्दे पर ही कांग्रेस के नेता के. चंद्रशेखर राव कई साल पहले पार्टी से अलग हो गए थे। उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) का गठन किया था। चंद्रशेखर की इस पार्टी को तेलंगाना क्षेत्र के 10 जिलों में काफी सफलता भी मिलती रही है। यूपीए-1 की सरकार में वे केंद्रीय मंत्री भी बने थे। क्योंकि, कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें आश्वासन दिया था कि यूपीए सरकार जल्दी ही तेलंगाना के गठन का फैसला कर लेगी। लेकिन, जब सरकार यह फैसला लगातार टालती रही, तो चंद्रशेखर सरकार से अलग हो गए थे। उन्होंने तेलंगाना में यह प्रचार किया कि कांग्रेस धोखेबाजी की राजनीति करती है।

एक तरफ रॉयल सीमा क्षेत्र में जगन मोहन रेड्डी की बढ़ती लोकप्रियता, दूसरी तरफ तेलंगाना के मुद्दे पर पार्टी के अंदर का दबाव इतना सघन हुआ कि कांग्रेस के लिए धर्म संकट खड़ा हुआ। कांग्रेस नेतृत्व के लिए तेलंगाना के मुद्दे पर कई ऐसे बिंदु हैं, जिनको लेकर अब तक माथापच्ची जारी है। तेलंगाना क्षेत्र में 10 जिले आते हैं। इनमें ग्रेटर हैदराबाद, रंगारेड्डी, मेडक, नालगोंडा, महबूबनगर, वारंगल, करीमनगर, निजामाबाद, आदिलाबाद व खम्मम हैं। इन जिलों की आबादी करीब साढ़े 3 करोड़ है। इसका क्षेत्रफल 1,14,800 वर्ग किमी है। तेलंगाना क्षेत्र पहले निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा था। तेलंगाना का मतलब होता है, तेलुगु की धरती। आजादी के बाद 1948 में निजाम की हैदराबाद रियासत का विलय भारत में हुआ था। इसके बाद से 1956 तक तेलंगाना का अस्तित्व एक अलग राज्य के रूप में रहा है। लेकिन, 1956 में इसका विलय आंध्र प्रदेश में कर दिया गया था। उल्लेखनीय है कि भाषा के आधार पर गठित होने वाला पहला राज्य आंध्र ही बना था।

हैदराबाद, करीब 400 साल पुराना शहर है। यहां पर आईटी उद्योग से लेकर विकास के तमाम भरपूर संसाधन हैं। करीब, 70 लाख की आबादी वाले इस महानगर की संपन्नता का आकलन इसी से किया जा सकता है कि आंध्र के कुल राजस्व का करीब आधा हिस्सा अकेले हैदराबाद शहर से ही आता है। इसीलिए हैदराबाद का मुद्दा टंटे की खास जड़ बना रहा है। फिलहाल, यही तय किया गया है कि दोनों प्रदेशों की संयुक्त राजधानी 10 सालों तक यहीं रहेगी। यह बात मान ली गई है कि   हैदराबाद अंतत: तेलंगाना के हिस्से मेंं ही रहेगा। लेकिन, शेष आंध्र को नई राजधानी बनाने के लिए केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज मिलेगा। शेष आंध्र की राजधानी कहां बनाई जाएगी? इस पर बाद में फैसला होगा।

सवाल यह भी है कि तेलंगाना का भूगोल यही रहेगा या इसमें कोई बदलाव किया जाएगा? क्योंकि, एक प्रस्ताव यह भी है कि रॉयल सीमा क्षेत्र के दो जिलों अनंतपुर और कर्नूल को तेलंगाना में शामिल कर लिया जाए, तो दोनों प्रदेशों में कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से बेहतर अवसर बनेंगे। उल्लेखनीय है कि इन दोनों जिलों में दलित आबादी काफी है। इससे तेलंगाना के समीकरण कांग्रेस के लिए कुछ अनुकूल बन सकते हैं। जबकि, टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव, इस प्रस्ताव के खिलाफ माने जाते हैं। रॉयल सीमा क्षेत्र के कई दिग्गज नेता भी तमाम कारणों से इस तरह के प्रस्ताव के विरोधी हैं। तेलंगाना के मौजूदा 10 जिलों में मुस्लिम आबादी महज 2 प्रतिशत है। दलित आबादी का औसत भी काफी कम है। ऐसे में, जातीय आधार पर कांग्रेस के लिए चुनावी समीकरण अनुकूल नहीं माने जा रहे। भाजपा, पिछले कई सालों से तेलंगाना के समर्थन में है। ऐसे में, कई संसदीय क्षेत्रों में उसकी संभावनाएं अच्छी बन गई हैं। अनंतपुर और कर्नूल शामिल करने के मुद्दे पर टीआरएस के लोग यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इन जिलों का तेलंगाना की संस्कृति से कोई जुड़ाव नहीं है। ऐसे में, इन्हें तेलंगाना का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

2009 में तेलंगाना की मांग को लेकर के. चंद्रशेखर राव ने 10 दिन का उपवास किया था। उस दौर में उनके आमरण अनशन को लेकर यहां पर हिंसा का तांडव हुआ था। इसी को देखते हुए तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने तेलंगाना गठन का ऐलान किया था। यह अलग बात है कि बाद में सरकार कई कारणों से इस वायदे से मुकर गई थी। केंद्र सरकार ने तेलंगाना के मुद्दे पर 2010 में जस्टिस कृष्णा आयोग बना दिया था।

इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट बड़ी गोल-मोल दी थी। यही कहा था कि अलग राज्य गठित करने की जगह तेलंगाना के खास विकास के लिए एक क्षेत्रीय परिषद का गठन किया जा सकता है। लेकिन, तेलंगाना क्षेत्र के लोगों ने इस सिफारिश को स्वीकार करने से इनकार किया था। इस आंदोलन में कांग्रेस के लोगों ने जमकर हिस्सेदारी की, तो नई जान पड़ी। इसी वजह से तेलंगाना के कांग्रेसी नेताओं ने अलग राज्य के लिए दबाव गुट बना लिया। हालांकि, मुख्यमंत्री रेड्डी अंदर ही अंदर इसकी खिलाफत करते आए हैं। क्योंकि, वे रॉयल सीमा क्षेत्र से आते हैं। तेलंगाना, देश का 29वां राज्य होगा।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

मध्य प्रदेश जनसंपर्क का ‘एम’ गवर्नेन्स और आहूजा-नगेले की जोड़ी

अबतक ई गवर्नेंस शब्द शासकीय भाषा में केन्द्र एवं राज्य शासनों में प्रचलित हैं, लेकिन मध्यप्रदेश जन संपर्क ने नया शब्द इजाद कर लिया है- 'एम' गवर्नेंस. इसके अंतर्गत जनसम्पर्क विभाग के अपर सचिव एवं अपर संचालक जो पिछले एक दशक से ज्यादा समय से विज्ञापन शाखा को देख रहे हैं, अपने नित्य सखा अथवा साझेदार को लाभ पहुँचाने में कोई कसर नही छोड़ते हैं. 

पिछले वित्तीय वर्ष में मुख्यमंत्री के मोबाईल संदेश के नाम पर 15 लाख रुपये और इस वित्तीय वर्ष में 6 लाख रुपये एम गवर्नेंस के नाम पर सामाजिक न्याय विभाग से नशा मुक्ति मोबाईल संदेश के नाम पर वेबसाइट mppost.com को भुगतान किया गया है.

विभाग की तरफ से पत्र लिखकर राशि का आवन्टन मंगवाया जाना भी एक विचारणीय और जाँच का मुद्दा है. मध्यप्रदेश में भाजपा चुनाव हारती है तो ठीकरा लाजपत आहूजा के नाम फूटना तय है परन्तु वह तब तक काफी कुछ कर चुका होगा और सेवानिवृत्त हो जाएगा. 

हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि भाजपा नेता उमा भारती के खिलाफ दिग्विजय सिंह ने मानहानि का मामला दायर किया था तब mppost.com के कर्ताधर्ता सरमन नगेले उनके गवाह थे. इन्हें जब भी मौका मिलता है, आहूजा उपकृत करने का अवसर चूकते नहीं हैं. संघियों की जमात को कौन समझाए कि विभीषण और रावण दोनों उनके यहां ही विद्यमान हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आज समाज अखबार से छंटनी शुरू, संपादकीय के कई लोग निकाले गए

आज समाज में छंटनी की जो रिपोर्ट तैयार हुई थी, उस पर अमल शुरू कर दिया गया है. बताया जाता है कि कल सात लोगों को निकाल दिया गया. ये लोग जब आफिस पहुंचे काम करने तो उन्हें गेट से ही यह कहकर लौटा दिया गया कि वे लोग कार्यमुक्त हो चुके हैं. यह मामला आज समाज अंबाला का है.

संपादकीय से करीब 45 लोग बाहर निकाले जाने हैं. इन्हें किश्तों में निकाले जाने की शुरुआत हो चुकी है. पेज आपरेटर्स, टाइपिस्ट, मार्केटिंग, सरकुलेशन आदि विभागों को ले लें तो संख्या सौ से उपर जाएगी. बड़े पैमाने पर चल रही छंटनी से आज समाज में हड़कंप का माहौल है.

अगर आपको भी छंटनी के बारे में कुछ पता हो तो भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.


पढ़िए मूल खबर…

'आज समाज' अखबार में किन-किन की छंटनी होगी, किनके पैसे कम होंगे, पढ़िए सारा हाल इस इनटरनल रिपोर्ट में

टाइम्स ऑफ इंडिया से खफा हैं पूर्व सीजेआई कबीर, जेपी ग्रुप ने भी नोटिस भेजा

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया अल्तमस कबीर के कुछ फैसलों को लेकर जहां न्यायपालिका विवादों के घेरे में है, वहीं 27 जुलाई 13 को ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अखबार में छपी न्यूज ''Apex court bench slams decision of ex-CJI Kabir'' जिसमें वर्तमान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की टिप्पणी- ''These order should not have been passed'' से बवाल मचा हुआ है। वहीं जय प्रकाश एसोसिएट्स 'जेपी' के एक नये कारनामें का भी खुलासा हुआ है। खिसियाए जेपी प्रबंधन ने इस खबर पर टाइम्स ऑफ इडिया अखबार को नोटिस भेजी है। जेपी ग्रुप ने कहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर एकपक्षीय है।

(टीओआई की खबर पढ़ने के लिए उपरोक्त कटिंग पर क्लिक करें)

नोटिस के अलावा जेपी ने इस खबर की सत्यता को- दो अखबारों में विज्ञापन छपवाकर चुनौती दी है। जेपी की इस नोटिस की कुछ लाइन को टाइम्स ऑफ इंडिया ने 28 जुलाई 13 के अंक में छापा है। जिसके मुताबिक जेपी ग्रुप के संस्थान 'जल' ने इस अखबार में छपी खबर पर स्पष्टीकरण मांगा है और कहा कि अखबार ने जो कुछ भी छापा है, वह सच नहीं है। उधर पूर्व सीजेआई अलत्मस कबीर ने भी अखबार की खबर पर कार्रवाई करने को कहा है। उन्होंने पीठ के दोनों जजों से लिखित में स्पष्टीकरण मांगा है, ताकि जरूरत पड़ने पर मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के हवाले से प्रकाशित की गयी टिप्पणी के मामले में अखबार पर कार्रवाई की जा सके।

इस बाबत उत्तर प्रदेश के एक अखबार ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ के स्थानीय संपादक जेपी सिंह ने 29 जुलाई 13 के अंक में मध्यांतर पेज पर ‘‘विवादों के घेरे में न्यायपालिका’’ शीर्षक से बहुत ही सारगर्भित व न्यायसंगत टिप्पणी की है, जो पठनीय है। पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया अल्तमस कबीर द्वारा जेपी एसोसिएट्स को राहत देने वाले फैसले की खबर पर 23 जुलाई 13 को वर्तमान सीजेआई की टिप्पणी आई थी। तभी से देश भर के अखबारों व अधिवक्ताओं के बीच इस पर तीखी बहस हो रही है।

(जेपी सिंह लिखित विश्लेषण पढ़ने के लिए उपरोक्त कटिंग पर क्लिक कर दें)

श्री जेपी सिंह ने लिखा कि सेवानिवृत्त होने के बाद अपने फैसलों को लेकर विवादों में घिरे पूर्व मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने अपने फैसले पर सीजेआई पी. सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा टिप्पणी करने को अपमानजनक बताया है। हलांकि, उन्होंने दावा किया कि जेपी एसोसिएट्स मामले में सीजेआई पीठ ने कोई टिप्पणी नहीं की। उन्होंने पीठ के दोनों जजों से लिखित में स्पष्टीकरण मांगा है, ताकि जरूरत पड़ने पर मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई के हवाले से प्रकाशित की गयी टिप्पणी के मामले में अखबार पर कार्रवाई की जा सके। 18 जुलाई को सेवानिवृत्त हुए पूर्व सीजेआई की पीठ ने जेपी एसोसिएट्स को 100 करोड़ रुपये जुर्माने के मामले में राहत दी थी। मई 2012 में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने जेपी एसोसिएट्स पर यह जुर्माना लगाया था।

पूर्व सीजेआई ने बताया कि उन्होंने खबर प्रकाशित होने के बाद पीठ के दोनों जजों से बात की। दोनों का कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई भी टिप्पणी नहीं की है। उन्होंने दोनों जजों से यही बात लिखित में देने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह अखबार के खिलाफ कार्रवाई करेंगे। एक सवाल पर उन्होंने कहा कि पीठ की टिप्पणी पर उन्हें काफी शर्मिंदगी और नाराजगी हुई थी। अगर टिप्पणी की खबर साबित हुई तो माफीनामा की मांग करेंगे।

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.


जेपी ग्रुप के 'जाल' को जानने के लिए राजीव चंदेल की इस रिपोर्ट को जरूर पढ़ें–

जेपी समूह ने 'जाल' में फंसाया हिमाचल प्रदेश को, समानान्तर शासन-तंत्र चला रहा

वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली ने कहा- भारतीय राजनीति अपराधियों की गिरफ्त में, न्याय प्रक्रिया बेहद धीमी

देहरादून : वरिष्ठ पत्रकार विलियम मार्क टुली को आज भी इस बात का अफसोस है कि हिंदुस्तान में न्याय प्रक्रिया बेहद धीमी है और पुलिस 1861 के नियम-कानून के आधार पर काम कर रही है। यही वजह है कि गुनहगार खुले घूम रहे हैं और राजनीति अपराधियों की गिरफ्त में है। मार्क टुली मंगलवार दोपहर राजपुर रोड स्थित एक होटल में अपनी पुस्तक ‘नो फुल स्टाप्स इन इंडिया’ पर चर्चा के लिए मौजूद थे। यहां आजाद भारत की उपलब्धियां गिनाते हुए उन्होंने चुनाव आयोग को सबसे पारदर्शी संस्था करार दिया।

मार्क टुली की यह पुस्तक यूएस में पत्रकारिता से जुड़े निबंधों का संकलन है। इन्हें यूएस में ‘द डिफीट आफ ए कांग्रेस मैन’ के रूप में छापा गया। कोलकाता में जन्में तकरीबन 78 साल के टुली ने बतौर पत्रकार इंडो-पाक युद्ध के साथ ही भोपाल गैस त्रासदी, आपरेशन ब्लू स्टार, राजीव गांधी की हत्या, बाबरी मस्जिद विवाद जैसे बड़े मुद्दे कवर किए। 1994 में बीबीसी से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने स्वतंत्र लेखन का रुख किया। उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। ‘अमृतसर’, ‘राज टू राजीव’, ‘इंडियाज अनएंडिंग जर्नी’, ‘इंडिया : द रोड अहेड’ उनकी लिखित अन्य पुस्तकें हैं। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार एलन सीले, सुभाष पंत, जनकवि डा. अतुल शर्मा, दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर के मनोज पंजवानी आदि उपस्थित रहे।

एमकेपी पीजी कालेज समेत कई स्कूलों के बच्चे कार्यक्रम में मौजूद थे। उन्होंने टुली पर सवालों के बाउंसर उछाले। एक सवाल राजनीति के अपराधीकरण हो जाने का था। इसे स्वीकारते हुए टुली ने गांवों में नौकरशाही को लेकर नाराजगी के आलम को सबके सामने रखा। टुली ने कहा कि नेता तो फिर भी पांच साल बाद वहां पहुंचते हैं, लेकिन गांव वालों की गर्दन नौकरशाही के जाल में फंसी है। एक सवाल राजनेताओं की छवि से जुड़ा था। पूछा गया कि क्या नेताओं की भी ट्रेड यूनियन तैयार हो गई है, जो एक नेता के फंसते ही उसे क्लीन चिट दिलाने के लिए ‘संघर्ष’ शुरू हो जाता है। इसे भी टुली ने न्याय प्रक्रिया की धीमी रफ्तार से जोड़ा। उन्होंने शासन की गुणवत्ता में कमी की बात कही। (अमर उजाला)

थिएटर आर्टिस्ट शिल्पी मारवाह के साथ पुलिस ने की अभद्रता, सड़क पर दी मां-बहन की गालियां

दामिनी और गुड़िया मामले के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए कसम खाने वाली दिल्ली पुलिस ने हदें पार कर दी हैं। बीच सड़क पर एक महिला को मां-बहन की गालियां दी और बुरी तरह से बेइज्जत किया। वह महिला कोई और नहीं, अमिस्ता थियेटर की अभिनेत्री शिल्पी मारवाह हैं।

मामला बस इतना था कि वह आटो में बैठ कर जा रही थीं कि आटो को एक कार वाले ने टक्कर मार दी। इसके बाद कार मालिक, आटो वाले के साथ हाथापाई पर उतर आया। बीच बचाव के लिए शिल्पी आगे आर्इं। तू-तू, मैं-मैं हुई। ट्रैफिक पुलिस खड़े तमाशा देखती रही।

स्ट्रीट प्ले करतीं शिल्पी मारवाह (फाइल फोटो)

कार मालिक ऊंची पहुंच वाला बताया जा रहा है। इसी के चलते उसने पुलिस को फोन किया। आदर्श नगर पुलिस स्टेशन के एसआई संदीप कुमार मौके पर पहुंचे। बिना कुछ सोचे समझे उन्होंने शिल्पी मारवाह को भद्दी गालियां दी और थाने में दो घंटे तक बैठाए रखा। इस दौरान वह लगातार उन्हें मानसिक प्रताड़ना देते रहे। साथ ही धमकी भी दी कि दी कि ‘इतना पिटवाऊंगा कि कुछ बोलने लायक नहीं रहेगी’। अमिस्ता थियेटर के डायरेक्टर अरविंद गौड़ जब पुलिस स्टेशन पहुंचे तो सारी सीमाएं तोड़ते हुए इंस्पेक्टर संदीप कुमार उनसे भी बेआंदाज हो गए। फिलहाल काफी तू-तू, मैं-मैं के बाद मामला उच्च अधिकारियों के पास पहुंचा। अब मामले में विजलेंस जांच चल रही है।  

सवाल यह है कि एक बुजुर्ग आटो वाले को पिटने से बचाना कहां की नाइंसाफी है। शिल्पी मारवाह दिल्ली की जानी मानी थियेटर कलाकर हैं। महिला अत्याचारों पर वह समय-समय पर नुक्कड़ नाटक करती रहती हैं। हाल ही में आई फिल्म रांझणा में उन्होंने अभिनय भी किया है। शिल्पी के साथ हुई बदसलूकी ने ‘आप के लिए, आप के साथ’ रहने का नारा लगाने वाली दिल्ली पुलिस का चेहरा बेनकाब कर दिया है।

तीसरे मोर्चे के भी खास निशाने पर रहेंगे मोदी!

तीसरे मोर्चे के लिए वामपंथी नेता तेजी से सक्रिय हो रहे हैं। तीसरे राजनीतिक विकल्प का ताना-बाना तैयार करने के लिए जोड़-तोड़ की मुहिम शुरू की जा रही है। 5 अगस्त से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। सभी दलों के दिग्गज दिल्ली पहुंचने वाले हैं। सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं की रणनीति है कि संसद सत्र के दौरान क्षेत्रीय सेक्यूलर दलों से साझा राजनीति के लिए समझदारी बना ली जाए।

सीपीएम की इस पहल में सबसे बड़ी दिक्कत तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी बन रही हैं। क्योंकि, वे किसी भी स्थिति में वाम मोर्चे के साथ नहीं खड़ी हो सकतीं। क्योंकि, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी वाम मोर्चा ही है। इन दिनों दोनों धड़ों के बीच कई मुद्दों पर हिंसक टकराव की भी नौबत आ खड़ी हुई है। ऐसे में, सीपीएम के उस्तादों ने बड़ी चालाकी से कोशिश शुरू की है कि तीसरे मोर्चे से ‘ममता कांटा’ पहले ही अलग-थलग कर दिया जाए।

सीपीएम के वरिष्ठ सांसद सीताराम येचुरी कह चुके हैं कि इस दौर में तीसरे राजनीतिक विकल्प की सख्त जरूरत है। क्योंकि, भाजपा और कांग्रेस की आर्थिक नीतियों में मौलिक रूप से कोई फर्क नहीं है। दोनों दलों के नेतृत्व में चलने वाले गठबंधन एक तरह से दिशाहीन हैं। ये मोर्चे आम आदमी को खुशहाली देने वाली राज व्यवस्था नहीं बना सकते। ऐसे में, बहुत जरूरी हो गया है कि गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस का कोई तीसरा राजनीतिक प्रयोग हो। इसके लिए उन लोगों ने प्रयास तेज किए हैं। सीपीएम के वरिष्ठ नेता प्रकाश करात ने तो काफी पहले कह दिया था कि सेक्यूलर विचारों वाले दल एक बार फिर जुटें, तो तीसरे मोर्चे का गठन कोई मुश्किल बात नहीं है।

करात की नजर में इस राजनीतिक प्रक्रिया में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की बड़ी भूमिका हो सकती है। वैसे भी उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा लोकसभा की सीटें हैं। यदि सपा ने विधानसभा चुनाव के तरीके से लोकसभा में भी अच्छा प्रदर्शन किया, तो तीसरे मोर्चे की तरफ से मुलायम सिंह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हो सकते हैं। वाम मोर्चा समय आने पर मुलायम सिंह का इस पद के लिए समर्थन भी कर सकता है।

पिछले दिनों सीताराम येचुरी ने डीएलए से बातचीत के दौरान कहा था कि खांटी समाजवादी नेता मुलायम सिंह में प्रधानमंत्री बनने के सभी गुण हैं। यदि सपा लोकसभा में काफी सीटें जीत गई, तो मुलायम सिंह के लिए नई संभावनाएं जरूर बनेंगी। यहां राजनीतिक हल्कों में सीपीएम के इन तेवरों के पीछे एक खास रणनीति समझी जा रही है। यही कि सीपीएम नेतृत्व बड़ी होशियारी से मुलायम का गुणगान करके उनको खुश करने की कोशिश कर रहा है। ताकि, वे दीदी (ममता) के मोह से एकदम बाहर आ जाएं।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद ने मुलायम को अपनी दीदी (ममता) का खास संदेश दिया था। सपा सुप्रीमो को बताया गया कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस और सपा के बीच जो राजनीतिक खटास पैदा हुई थी, उसे अतीत की बात मानी जाए। यदि सपा सुप्रीमो तीसरे मोर्चे के लिए दिलचस्पी लें, तो तृणमूल कांग्रेस इसमें सहयोग करने को तैयार हैं। बस, शर्त यही है कि इस राजनीतिक मुहिम से वाम मोर्चे को दूर रखना है।

दरअसल, ममता बनर्जी अपने स्तर पर सेक्यूलर दलों का एक फ्रंट तैयार करना चाहती हैं। इस संदर्भ में वे जदयू के नेता एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात भी कर चुकी हैं। इसके पहले ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से ममता की बातचीत हो चुकी है। सेक्यूलर फ्रंट के लिए टीडीपी के प्रमुख चंद्र बाबू नायडू भी तैयार हैं। इस सिलसिले में अनौपचारिक तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा भी कई नेताओं से बातचीत कर चुके हैं। लेकिन, तीसरे मोर्चे के ताने-बाने नए सिरे   से बुनने में सबसे बड़ी बाधा वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के धुर विरोधी रिश्ते आ रहे हैं। क्योंकि, तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी नेता किसी भी सूरत में एक मंच पर आने को तैयार नहीं हैं।

इस संदर्भ में येचुरी यही कहते हैं कि वे लोग राजनीतिक छुआ-छूत में विश्वास नहीं करते। लेकिन, जिस तरह से तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही है, उसे देखकर नहीं लगता कि इस दल के पास कोई राजनीतिक समझदारी बची है। यदि ये पार्टी अपने तौर-तरीकों में कुछ सुधार कर ले, तो वे लोग इस पार्टी को लेकर कोई अड़ियल रवैया नहीं अपनाना चाहेंगे। लेकिन, इतना जरूर है कि उन लोगों का निजी अनुभव तृणमूल कांग्रेस को लेकर अच्छा नहीं हैं।

शुरुआती दौर में वाम दलों ने तीसरे मोर्चे के संदर्भ में नकारात्मक तेवर अपनाए थे। यही कहा था कि इस मोर्चे की राजनीतिक साख अच्छी नहीं रही है। पिछले वर्षों में इसके जो राजनीतिक प्रयोग रहे हैं, वे जनता की नजर में अपनी साख नहीं बना पाए। ऐसे में, महज राजनीतिक सौदेबाजी के लिए ऐसी किसी राजनीतिक जोड़-तोड़ में वाम दलों की कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन, वाम दलों ने अब अपनी रणनीति बदल दी है। वे कोशिश कर रहे हैं कि ‘सेक्यूलर फ्रंट’ जैसे मोर्चे बनने के बजाए सीधे तीसरे मोर्चे के लिए जमकर लॉबिंग की जाए।

इसकी एक वजह यह भी है कि मीडिया सर्वेक्षणों में यह बात सामने आने लगी है कि ताजा स्थितियों में एनडीए और यूपीए दोनों की ताकत महज 150-150 सीटें जीत पाने की बन पा रही है। ऐसे में, 200 से ज्यादा सीटें सेक्यूलर दलों के खाते में आ सकती हैं। जाहिर है कि चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर कुछ ऐसी ही बनी, तो सत्ता में तीसरा मोर्चा आ सकता है। क्योंकि, एनडीए भी 6 साल सत्ता में रह चुका है। इस दौर में भाजपा के ‘सुशासन’ की तमाम पोल खुल चुकी है। जबकि, यूपीए-2 की दूसरी पारी लगातार राजनीतिक झंझावातों के बीच से गुजर रही है। इस दौर में महंगाई तेजी से बढ़ी है। मनमोहन सरकार ने इस दौर में घोटालों और महाघोटालों के नए रिकॉर्ड बनाए हैं। ऐसे में, यूपीए सरकार के लिए राजनीतिक स्थितियां अनुकूल नहीं रहीं।

यह अलग बात है कि भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी जैसे वरिष्ठ नेताओं को लग रहा है कि केंद्र सरकार से नाराजगी के चलते भाजपा की बेहतर चुनावी संभावनाएं बन गई हैं। उन्होंने तो पिछले दिनों यहां तक दावा किया कि मौजूदा हालात में भाजपा जीत का नया रिकॉर्ड बना सकती है। बस, उन्होंने अपनी पार्टी के लोगों को यही सलाह दी है कि वे इस अनुकूल अवसर का लाभ उठा लें। आपसी ‘महाभारत’ में अपनी ऊर्जा न जाया करें।

कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद कहते हैं कि आडवाणी जैसे नेता अपनी पार्टी के लोगों की हताशा दूर करने के लिए इस तरह के जुमले उछाल रहे हैं। ऐसे में, आडवाणी की टिप्पणी को बस, बड़बोलापन ही कहा जा सकता है। राजनीतिक हल्कों में आडवाणी के नए ‘जोश’ को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं शुरू हुई हैं। उल्लेखनीय है कि नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर आडवाणी, पार्टी नेतृत्व से तुनके रहे हैं। क्योंकि, उनके विरोध के बावजूद पार्टी ने मोदी को चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान सौंप दी है।

अभी यह भरोसे से नहीं कहा जा रहा कि मोदी के मुद्दे पर आडवाणी का गुस्सा एकदम शांत हो गया है। लेकिन, वे अचानक पार्टी की संभावनाओं को लेकर जोश में तो आ ही गए हैं। इसकी क्या वजह हो सकती है, इसको लेकर पार्टी के अंदर कई तरह के कयास जारी हैं। बहरहाल, नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा की चुनावी तैयारी काफी जोरों पर है। खुद, मोदी कांग्रेस के खिलाफ खासी आक्रामक मुद्रा में दिखाई पड़ते हैं। वे सीधे तौर पर मनमोहन सरकार के साथ ‘10 जनपथ’ पर तीखे निशाने साधते रहते हैं। स्पष्ट संकेत हैं कि टीम मोदी राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए हिंदुत्व कार्ड चलाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ेगी। पिछले दिनों मोदी खुद अपने को हिंदू राष्ट्रवादी करार कर चुके हैं।

मोदी के खास सिपहसालार एवं उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव अमित शाह, अयोध्या जाकर राम मंदिर का मुद्दा गरमाने की कोशिश कर चुके हैं। मोदी के इन तेवरों के चलते कांग्रेस ने भी पलटवार की तैयारी शुरू की है। इस पार्टी के नेता बार-बार गुजरात के दंगों में टीम मोदी की भूमिका का जिक्र करते हैं। कोशिश हो रही है कि इस रणनीति के चलते कम से कम मुस्लिम वोट का रुझान पूरे देश में कांग्रेस के प्रति बढ़ जाए।

कांग्रेस की इस रणनीति का आकलन करके वामदलों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस की सेक्यूलर राजनीति एक बड़ा पाखंड है। यदि देश में सही मायने वाली सेक्यूलर राजनीति को बढ़ावा देना है, तो जरूरी है कि तीसरा राजनीतिक विकल्प मजबूत हो। मुलायम, चंद्र बाबू नायडू, नवीन पटनायक व नीतीश कुमार जैसे सेक्यूलर दिग्गजों ने कांग्रेस से भी ज्यादा, मोदी पर निशाना साधना शुरू किया है।

मुलायम ने तो कह दिया है कि चुनाव के बाद ही सही मायने में तीसरे मोर्चे का गठन होगा। लेकिन, जमीनी सच्चाई यही है कि मोदी जैसे नेताओं के खतरनाक मंसूबों को सपा जैसे खांटी सेक्यूलर दल ही ध्वस्त कर सकते हैं। कांग्रेस के लोग तो महज बातें करते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। यह बात जनता समझने भी लगी है।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

बलात्कारी बाबा दविंदा नंद को दंड दिलाने पीड़िता पहुंची जंतर-मंतर, मीडिया सपोर्ट करे

केदारनाथ हादसे के पीड़ितों के साथ विजय बहुगुणा सरकार द्वारा किए जा रहे छलावे के खिलाफ चल रहे धरने की कवरेज़ के लिए मैं जंतर-मंतर गया। आन्दोलनकारियों का आरोप है कि विजय बहुगुणा के इर्द-गिर्द मौजूद रहने वाले लोग पीड़ितों के लिए देश भर से भेजी गई राहत सामग्री से अपना घर भर रहे हैं या फिर उसे बेच कर अपने बंगले बनवा रहे हैं। इस हादसे ने बहुगुणा के कई चमचों को करोड़पति बना दिया। इस बात में वक्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे तथ्यों पर भरोसा करें तो दम भी लगता है।

जंतर-मंतर पर इस धरने से सिर्फ 10 मीटर की दूरी पर खामोश बैठी एक अबला को देख मेरा ध्यान बरबस ही उसकी ओर खिंच गया। धरना स्थल पर आखिर यह अकेली महिला किस नाइंसाफी के लिए जंग लड़ रही है। इस उत्सुकता से मेरे कदम बरबस ही उसकी ओर बढ़ गए। पूछा कि कहां से आई हो, तो पता बृज धाम बताया। यहां क्या लेने आई हो, पूछा तो फफक-फफक कर रोने लगी। और सुबकते हुए जो आप बीती बयान की तो बृज की इस ग्वालन की जिंदगी को नर्क बनाने वाला एक तथा कथित कृष्ण भक्त निकला।

यह खबर इंसानियत को तार-तार करने वाले एक ऐसे भगवाधारी को बेनकाब करती है जो पुलिस तंत्र, अपराधियों व नेताओं की मिली भगत से कृष्ण भक्ति का चोला ओढ़ कर न सिर्फ महिलाओं को अपनी हवस का शिकार बनाता है बल्कि जुबान

बलात्कारी बाबा
बलात्कारी बाबा
खोलने पर उन्हें अपनी ऊंची पहुंच के चलते झूठे मामले गढ़ कर उन्हें इस कदर उलझा देता है कि इंसान जीते-जी मरने के लिए मजबूर हो जाए। उत्तर प्रदेश में पुलिस कैसे काम करती है, बाबा यह न सिर्फ बखूबी जानता है बल्कि पुलिस की इस कमजोरी का धड़ल्ले से इस्तेमाल भी करता है।

इस मामले में पुलिस द्वारा अदालत में प्रस्तुत की गई तस्वीर से अदालत भी हैरान है। महिला एवं उसके पति पर बनाया गया तथाकथित अपहरण का एक मामला अदालत में विचाराधीन है इसीलिए उसका जिक्र हम अदालत का सम्मान करते हुए नहीं कर सकते। किंतु वर्तमान में महिला ने बाबा द्वारा बनाए गए तथाकथित झूठे मामले से डेढ़ साल बाद जमानत मिलने के उपरांत बाबा की जो हकीकत बयान की है वह न सिर्फ हैरतअंगेज है बल्कि पुलिस तंत्र की अपराधियों से सांठ-गांठ की नंगी तस्वीर भी प्रस्तुत करती है।

मामले में पुलिसिया कहर एवं कार्यप्रणाली का सहज अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 7 जुलाई 2011 को कृष्ण नगरी बृजधाम में हुए बलात्कार व उसके उपरांत 26 दिसंबर 2011 तक लगातार होते रहे एक महिला के शारीरिक शोषण की रिपोर्ट लिखाने जब एक महिला थाने गई तो उसकी बात को नज़रअन्दाज़ कर लचर कानूनों का भरपूर फायदा उठाते हुए

पीड़िता की बेटी, जिसके साथ भी बाबा ने दुराचार का प्रयास किया
पीड़िता की बेटी, जिसके साथ भी बाबा ने दुराचार का प्रयास किया
उसके पूरे के पूरे खानदान को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया। पुलिस ने अपने तमाम हथकंडों का खुलकर प्रयोग किया।

महिला व उसके पति के फोन पर जो भी फोन आया उसी का नाम एफआईआर में लिखते गए और सबको एक साथ सलाखों के पीछे पहुंचा दिया। कहानी एवं साक्ष्य बेहद शातिराना तरीके से बुने गए। किंतु अब अदालत को इस पुलिसिया कहानी पर शक होने लगा है। संभवतः इसीलिए अदालत ने महिला को जमानत पर रिहा कर पुलिस को बाबा के खिलाफ मामला दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं।

सात जुलाई 2011 के मामले में ठीक 2 साल 8 दिन बाद न्यायालय के हस्तक्षेप से 15 जुलाई 2013 को  वृन्दावन थाने में स्वामी दविंदा नन्द तीर्थ के खिलाफ अपराध संख्या 480/13 के तहत भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, 354- ए, 354 बी, 376/511/506 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है किंतु बाबा निर्भय है। पुलिस मुठ्ठी में है और सत्ता में बैठे मंत्री जेब में। सब सुबह-शाम चरण छूते हैं। महिला की व्यथा को पुलिस बिना जांच के दरकिनार कर रही है, स्थानीय मीडिया भी बाबा से थर्राता है।

मामले से सम्बन्धित खबरें तो छप रही हैं किंतु घिसे-पिटे पुलिसिया बयानों पर आधारित। महिला को घर से उठाने की लगातार धमकियां दी जा रही हैं। उसके व उसकी मुंहबोली बेटी के साथ गैंग रेप की धमकियों का क्रम भी जारी है। एफआईआर की शैली बयां करती है कि बाबा को बचाने का हर रास्ता एफआईआर में मौजूद है।

मामला बेहद संगीन है। बाबा के आश्रम के इर्द-गिर्द पुलिस की गाड़ियां ड्यूटी बजा रही हैं। बाबा को बचाने व महिला को रास्ते से हटाने के लिए रणनीतियां तैयार हो रही हैं। कौन महिला का साथ दे रहा है और किस हद तक वह साथ दे सकता है, इसका आकलन किया जाने लगा है।

आइए अब आपको बताते हैं बाबा की दरिंदगी। बाबा ने न सिर्फ एक महिला से प्रसाद में बेहोशी की दवा मिलाकर उसके साथ बलात्कार किया, बल्कि उसकी अश्लील फिल्म भी बनाई। लगभग 6 महीने तक डरा-धमका कर उसका शोषण भी करता रहा। बाबा ने 14 साल की बच्ची को नग्न कर दिया और उससे भी बलात्कार को कोशिश की। महिला के शोर मचाने पर बात खुली तो उक्त चक्रव्यूह रच कर बाबा ने कान्हा की नगरी को दागदार कर दिया।

बाबा के हवस की शिकार पीड़िता न्याय के लिए जंतर मंतर पर बैठी है
बाबा के हवस की शिकार पीड़िता न्याय के लिए जंतर मंतर पर बैठी है
गुजरात से ताल्लुक रखने वाला बाबा दविंदा नन्द तीर्थ सेवा संस्थान का प्रमुख है। इस जघन्य अपराध की पटकथा यहां से शुरू होती है कि बाबा के पास हीरा सिंह नाम का एक ड्राईवर काम करता था। नीरू (काल्पनिक नाम) हीरा सिंह की पत्नी है। बाबा द्वारा दी जाने वाली नाम मात्र की पगार से मुश्किल से हीरा सिंह जीवन बसर करता था। आर्थिक तंगी के चलते हीरा ने बाबा से अपनी पत्नी को भी आश्रम में नौकरी देने की बात कही तो बाबा ने हीरा सिंह के इस प्रस्ताव को खुश होकर स्वीकार कर लिया और हीरा की पत्नी नीरू को अपनी निजी सेविका के रूप में आश्रम में रख लिया।

अब नीरू को बाबा के पांव दबाने और मालिश करने का काम सौंपा गया जिसे नीरू भी एक पहुंचे हुए सन्त की सेवा समझ खूब मन लगाकर करने लगी किंतु बाबा की बुरी नीयत का एहसास उसे जब तक हो पाता तब तक बाबा के भेष में छुपा भेडि़या उसकी इज्जत तार-तार कर उसे अपनी दरिंदगी से रौंद चुका था।

पुलिस में दर्ज करवाए अपने बयान में नीरू ने कहा है कि 7 जुलाई 2011 को बाबा ने उसका हाथ सहलाते हुए कहा कि तू मेरी मन लगा कर सेवा किया कर मैं तेरे सारे कष्ट दूर कर दूंगा। कुछ देर बाद बाबा ने मुझे 4 पेड़े खाने को दिए और कहा कि आज प्रभु की तुझ पर कृपा हो गई है, यह पेड़े खा ले, इससे तेरे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। नीरू ने जैसे ही यह पेड़े खाए वह बेसुध हो गई और बाबा ने उसके साथ बलात्कार किया। बलात्कार के बाद बाबा ने उसे डराया-धमकाया व जुबान बंद रखने के लिए प्रलोभन भी दिए। इसके बाद नीरू कई दफा बाबा की हवश का शिकार बनी।

पुलिस में दर्ज बयान में उसने कहा है कि एक महीने के लिए बाबा उसे बेंग्लौर लेकर गया जहां बाबा का फ्लैट है। जब वह किचन में काम कर रही थी तो उसे अपनी मुंहबोली बेटी की चीखने की आवाज सुनाई दी। वह बाबा के कमरे में गई तो वहां बाबा ने लड़की के कपड़े उतार दिए थे और उससे बलात्कार का प्रयास कर रहा था इसी बीच वहां नीरू का पति हीरा आ गया। बाबा की खूब पिटाई हुई। बात थाने जाने की होने लगी तो बाबा ने पैर पकड़ लिए और आइन्दा ऐसा न करने की बात कही। उसने कहा कि एक बार छोड़ दो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा। बैंग्लौर में कोई जान-पहचान न होने के कारण नीरू, उसकी बेटी व उसका पति वृन्दावन आ गए। वृन्दावन में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही तो पुलिस ने यह कह कर रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया कि मामला बैंग्लौर का है यहां रिपोर्ट दर्ज नहीं हो सकती।

इस बीच बाबा ने पैसे का लालच देकर हीरा को शान्त कर दिया। लगभग दो तीन-महीने तो बाबा शान्त रहा लेकिन उसके बाद फिर उसने नीरू पर दबाव बनान शुरू कर दिया कि अपनी बेटी को लेकर यहां आ जा वरना मैं तुझे बर्बाद कर दूंगा। बाबा नीरू की अश्लील फिल्म जो उसने पहले से बना कर रखी थी सबको दिखाने की धमकी देने लगा। नीरू ने बताया कि बाबा के दबाव में आकर एक बार फिर वह आश्रम जाने लगी किन्तु अब वह बाबा से पर्याप्त दूरी रखने लगी। एक दिन बाबा ने नीरू को आश्रम में अकेला पा कर दबोच लिया व बलात्कार का प्रयास करने लगा कि तभी वहां नीरू का पति हीरा व आश्रम का एक अन्य कर्मचारी नीरज आ गए।

दोनों ने बाबा को नीरू के साथ गन्दी हरकत करते अपनी आंखों से देख लिया था। दोनों ने इस रोज भी बाबा की खूब पिटाई की। हीरा, नीरज व नीरू बाबा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने थाने पहुंचे किंतु पुलिस ने बाबा के दबाव में मामला दर्ज ही नहीं किया और पुलिस की मदद से अपने अपहरण की एक मनगढ़ंत कहानी बनाकर हीरा, नीरू व उसके परिवार के 25 सदस्यों को जेल भिजवा दिया। नीरू के पति समेत उसके 20 से अधिक परिजन आज भी सलाखों के पीछे हैं। नीरू के पास बाबा की ज्यादतियों के गवाह भी हैं और सबूत भी किंतु कोई उसकी बात सुनने को राजी नहीं।

29 जुलाई, सोमवार को नीरू कुछ सामान लेने बाजार गई तो बाबा के गुर्गों ने उसे घेर दिया। 9 बजकर 13 मिनट पर फोन कर उसने इस घटना की जानकारी इस पत्रकार को दी। नीरू इंसाफ की इस लड़ाई में बिल्कुल अकेली है। अत्यन्त गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली नीरू को बेहद धनाढ्य व पहुंच वाला यह बाबा कहीं भी, कुछ भी नुकसान पहुंचा सकता है। नीरू के 18 वर्षीय छोटे भाई को भी बाबा ने 8 महीने पहले पुलिस से मिल कर चोरी के एक झूठे इल्जाम में सिर्फ इसलिए गिरफ्तार करवा दिया ताकि वह सलाखों के पीछे कैद अपनी बहन की रिहाई के लिए कोई प्रयास न कर सके। यह समाचार प्रभावी ढंग से मीडिया की सुर्खियां बन सके तो नीरू की जान बच सकती है। अन्यथा जो हालात मैंने महसूस किए उसके मुताबिक कुछ दिनों बाद ''एक थी नीरू'' शीर्षक के साथ प्रकाशित करना पड़ेगा।

गोपाल शर्मा की रिपोर्ट.

फाइलों में सिमट गया डीएलए, दिल्ली-एनसीआर में सरकुलेशन खत्म

छह साल पहले धमाकेदार एंट्री करने वाले डीएलए का विस्तार अब सिमटने लगा है। चार दमदार कर्मियों को हटाए जाने के बाद डीएलए के सरकुलेशन पर बुरा असर पड़ा है। नोएडा में दो माह पहले कार्यालय बंद कर दिया गया था। इसके कुछ दिन बाद दिल्ली में 16 में से 13 कर्मियों को हटा दिया गया। उसके बाद गाजियाबाद में चार कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इनमें दो सरकुलेशन से जुड़े लोग थे।

इसका नतीजा यह रहा है कि गाजियाबाद में अधिकांश स्थानों से एजेंसियां बंद हो गई। नवयुग मार्केट और तुराबनगर जैसे स्थानों पर बढ़िया सरकुलेशन बंद हो गया। सिर्फ कंप्लमेंट्री कापी आ रही है। मोदीनगर, मुरादनगर, पिलखुवा, सिंभावली, बहादुरगढ़ में अखबार बंद हो गया। गुलावठी में दो सौ कापियां गिर गई। गढ़ में 50 से ऊपर कापियां बंद हो गईं। साहिबाबाद में सरकुलेशन बंद हो गया। मात्र दस कापियां जा रही हैं वो भी कंप्लीमेंट्री हैं। इतना सब कुछ होने के बाद सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि वो दिन दूर नहीं जब अखबार के कार्यालय में ताला लग जाएगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

द्रोपदी के बाद दुर्गा का “चीर-हरण”!

तीन-चार दिन से देश में एक महिला को लेकर कोहराम मचा है। इस महिला के चेहरे पर तेजाब भले न फेंका गया हो, लेकिन जो फेंका गया है, वो तेजाब से भी ज्यादा ज्वलनशील है। बीते साल दिल्ली की बस में सामूहिक बलात्कार की घटना से भी ज्यादा कष्टकारी है। बस जरुरत एक महिला के दर्द को समझने की है। दिल्ली में बस में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना को अंजाम देने वाले गिरफ्तार कर लिये गये। आरोपियों को सजा अदालत सुनायेगी, लेकिन इस यहां इस मामले में तो पीड़ित महिला को ही ‘सजा’ सुना दी गयी है। अदालत द्वारा नहीं, सत्ता की हनक में सत्ताधारियों द्वारा।

यहां जिस महिला के साथ हुई घटना की बात या चर्चा मैं कर रहा हूं, उसका नाम है दुर्गा शक्ति नागपाल। 2009 बैच की भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की अधिकारी। तीन-चार दिन पहले तक मैंने भी दुर्गा शक्ति का कहीं नाम नहीं सुना था। अचानक अखबारों और टीवी चैनलों पर देखा-पढ़ा, तो घर बैठे ही दुर्गा शक्ति नागपाल से परिचय हो गया। बिना रु-ब-रु हुए। पता चला कि, दुर्गा शक्ति नागपाल को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने निलंबित करके ‘रेत में दबा’ दिया है। या यूं कहें कि रेत की भेंट चढ़ा दिया है। बिना किसी जांच पड़ताल के। महज अपने चहेतों, सिपहसलारों और इर्द-गिर्द मंडराने वालों के कहने पर।

दुर्गा शक्ति नागपाल देश की राजधानी से सटे यूपी के कमाऊ-पूत समझे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) जिले के सदर सब-डिवीजन में एसडीएम पद पर नियुक्त थीं। सुना है कि, दुर्गा ने इलाके में रेत खनन-माफियाओं को दौड़ा-दौड़ा कर छकाया, दु:ख पहुंचाया था। अगर यह कहें कि, दुर्गा ने खनन माफियाओं और उनके गुर्गों की नाक में दम कर रखा था, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दुर्गा से दुखी खनन-माफिया लखनऊ में बैठे अपने उन आकाओं के पांवों में जाकर लेट-लोट गये, जिनके बलबूते उन्हें रेत-खनन के ठेके-पट्टे मिले थे। दुर्गा के दमखम से दुखी खनन-माफियाओं का दर्द उनके आकाओं के दिमाग में नासूर सा बनकर समा गया।

मुद्दा दुर्गा शक्ति नागपाल का नहीं था। मुद्दा था, खनन-माफिया के जरिये हर साल होने वाली करोड़ों की काली-कमाई डूबने का। मुद्दा था रेत के अवैध खनन में जुटे शातिर और अपराधी किस्म के लोगों के रास्ते में एक औरत के आ घुसने का। मुद्दा था करोड़ों के बारे-न्यारे होने की राह में बाधा बनने का। मुद्दा था सफेदपोश, पुलिस और अपराधियों की मिलीभगत से होने वाली काली-कमाई में रोकटोक का। अगर कोई दबंग या नेता होता। तो उसे रास्ते से आसानी से हटाया जा सकता था। यहां तो कुकर्मों के बीच में एक महिला के हस्तक्षेप का मुद्दा था। वह भी उस महिला के, जिसने कभी ‘कुर्सी’ के लालच को जेहन में पलने ही नहीं दिया। जब कुर्सी का लालच नहीं, तो फिर वो मर्जी की मालिक थी। रेत का खनन उसे नाजायज लगा। दुर्गा शक्ति नागपाल को लगा कि, इससे सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है, सो उसने सरकारी खजाना बचाने के लिए रेत खनन-माफियाओं को सबक सिखा दिया। कुछ ही दिनों में तमाम खनन माफियाओं और उनके गुर्गों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज करा दिये। दबंगों की दबंगई खुद लेकर रेत-माफियाओं की खनन में जुटी मशीनें, ट्रेक्टर, ट्रक जब्त करके लाइन में लगवा दिये। इस उम्मीद में कि अब रेत का अवैध खनन रुक जायेगा। उसके इस प्रयास से सरकारी खजाने को हो रहा आर्थिक नुकसान रुकेगा।

सच है कि इंसान जैसा सोचता है, वैसा होता नहीं है। दबंग आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल सरकारी खजाने को आर्थिक नुकसान से बचाने के चक्कर में बस यह भूल गयीं। वे भूल गयीं, कि आईएएस की नौकरी…..सरकारी नौकरी होती है। वे नई-नई आईएएस थीं। दुर्गा को नहीं पता था शायद कि, सरकार और सफेदपोशों की नज़र में आईएएस अफसर की औकात क्या होती है! बिचारी दुर्गा को नहीं पता था कि, वो आईएएस बनकर भी उतनी दबंग नहीं हैं, जितना की सत्ता चला रहे कुछ अंगूठा टेक। दुर्गा शक्ति नागपाल ने इसका भी ख्याल नहीं किया, कि जिस खनन-माफिया को वे रौंदने जा रहीं हैं, सूबे की सरकार और सत्ता के गलियारों में वह खनन-माफिया आराम-इत्तमिनान से चहलकदमी करते हैं। सरकार बनाने और सरकार चलाने वालों के साथ वे गलबहियां करते हैं।

जाने-अनजाने में दुर्गा शक्ति भूल गयीं, कि वे दबंग तो हैं, मगर सरकार की “नौकर” हैं। उन्होंने इस बात का कतई ख्याल ही नहीं रखा कि, भले ही रेत-खनन से सरकारी खजाने को करोड़ों की आर्थिक चपत लग रही हो, मगर जितना वो खनन-माफियाओं से बचाकर सरकारी खजाने में जमा नहीं करा पायेंगी, उससे कहीं ज्यादा रेत का चोरी-छिपे दोहन करके उनसे ज्यादा कमाकर रेत खनन माफिया सत्ता के कथित सपूतों को भेंट चढ़ाये पहले से ही बैठे हैं। अब भला बताओ इसमें गलती किसकी है? रेत खनन माफिया और सफेदपोशों की मिलीभगत का पता दुर्गा शक्ति नागपाल को नहीं है, तो इसमें भला गलती सूबे के मुख्यमंत्री, या फिर रेत खनन नियंत्रण करने वाले मंत्रालय की थोड़ा ही न है। सत्ताधारियों की आंख से अगर देखोगे तो, इसमें तो गलती आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल की ही है।

दुर्गा शक्ति को समझना चाहिए था, कि उन्हें ताकत सरकार ने दी है। अब वो थीं कि, रेत खनन माफियाओं से ही जा भिड़ीं। बिना किसी लाग-लपेट के। सीधे-सीधे, आमने-सामने। भला ऐसे भी कहीं होता है! सरकारी नौकरी में। सरकारी नौकरी का मतलब- सरकार जो चाहें वो करो। रेत के पट्टे खनन ठेकेदारों को दुर्गा शक्ति नागपाल ने तो दिये नहीं थे। रेत-खनन के पट्टे तो लखनऊ में बैठे संबंधित विभाग के मंत्रालय से बंटा करते हैं। ऐसे में अगर सरकारी खजाने की ऐसी-तैसी हो रही है, तो इस बात की चिंता भला एक अदना सी नई-नवेली (2009 बैच आईएएस) दुर्गा शक्ति नागपाल को करने की क्या जरुरत थी। शायद दुर्गा को नहीं पता था कि, सरकार अपने खजाने को अगर लुटाने पर उतर आये, तो उसे बचाने वाला कोई नहीं होता। मुझे जहां तक लगता है कि, खुद को (एसडीएम) मिले अधिकारों की ‘हनक’ में बिचारी दुर्गा शक्ति नागपाल ने रेत-खनन माफियाओं को ‘मिट्टी’ में मिलाने से पहले आगे-पीछे कुछ देखा-सोचा ही नहीं था।

अब इसमें गलती बिचारी दुर्गा नागपाल की भी नहीं है। वो समझ रही थीं, कि वे कानून का पालन कराकर सरकारी खजाने की ऐसी-तैसी होने से बचाकर विशेष पुरस्कार की हकदार हो जायेंगी। उन्हें क्या पता था कि, कानून का सहारा लेना उन्हें ही ‘सबक’ सिखा देगा। हां मुझे इतना जरुर पता है, कि दुर्गा शक्ति नागपाल ने अगर लखनऊ में रेत-खनन माफियाओं का मेला कभी देखा होता, तो वे उन्हें दौड़ाने का काम कभी न करतीं। दूसरे दुर्गा शक्ति नागपाल या उनके खानदान में किसी ने कभी रेत-खनन का अवैध धंधा भी नहीं किया था। सो भला दुर्गा नागपाल को पता भी कैसे होता कि, सरकार में कैसे बंदरबांट होती है, रेत खनन के पट्टों (ठेकों) की। कुल मिलाकर मुझे तो यही लगता है कि, सरकार ने भले ही दुर्गा शक्ति नागपाल को सोच-समझकर निलंबित करके, उन्हें ‘औकात’ में लाने की कोशिश की हो, लेकिन दुर्गा को सत्ता के साथ रेत खनन-माफिया की ‘जुगलबंदी’ का अहसास कतई नहीं था। वरना भला वे भी बैठे-बिठाये फटे में टांग क्यों अड़ातीं?

वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौहान का विश्लेषण.

इन्क्रीमेंट की पर्ची देखते ही नाखुश होकर दादा ओम कटारा ने भास्कर से दिया इस्तीफा

दैनिक भास्कर, कोटा के पहले और मशहुर संवाददाता दादा ओम कटारा ने भास्कर से इस्तीफा दे दिया है। खबर है कि इस्तीफा मंजूर भी हो गया है। सधी और सटीक रिपोर्टिंग की पहचान रखने वाले दादा ओम कटारा पिछले १३ साल से भी ज्यादा समय से भास्कर से जुड़े रहे हैं। वे कोटा में तब से रिपोर्टिंग कर रहे हैं जब भास्कर के मालिक रमेश अग्रवल को हर चीज़ की सीधे रिपोर्टिंग की जाती थी।

पूरा कोटा शहर जिन्हें सम्मान और आदर भाव से दादा बुलाता है, ऐसे दादा कटारा को नाखुश होकर इस्तीफा देना पड़ा। दादा पिछले साल ही ६० बरस के हो गए थे और भास्कर के आग्रह पर वे रिपोर्टिंग कर रहे थे। उन्हें इस बात का अफ़सोस था कि श्रवण गर्ग, कल्पेश याग्निक, नवनीत गुर्जर, ओम गौड़ जैसे कई वरिष्ठ संपादकों के साथ काम करने के बाद भी उनके बाद आए भास्कर ज्वाइन करने वाले कई जूनियरों को पदोन्नति दे दी गई परंतु वे जहां थे वहीं रह गए। उस पर एमपी से आए नए-नवेले संपादक द्वारा बार-बार ताने मारने के कारण वे कई महीनों से विचलित थे।

इसकी शिकायत उन्होंने कोटा संपादक रह चुके और अभी पूरे राजस्थान का कार्यभार देख रहे ओम गौड़ से भी की। जब उनका इन्क्रीमेंट गेट कीपर से भी कम सिर्फ 500 रुपए लगाया गया तो उन्होंने इन्क्रीमेंट की पर्ची मिलते ही सबसे पहले नाखुश होकर इस्तीफा दे डाला। फ़िलहाल कोटा भास्कर में इन्क्रीमेंट के मामले में सभी के हाल काटो तो खून जैसा हो रहा है। रिपोर्टिंग टीम और डेस्क पर जल्द ही बड़े बदलाव होने की सम्भावना नजर आ रही है।

पेड न्यूज पर भोपाल में अफसरों की लगाई क्लास

भोपाल। यदि चुनाव के दौरान किसी पार्टी का उम्मीदवार पैसे देकर अपने विरोधी के पक्ष में या विरोध में खबरें प्रकाशित या प्रसारित कराता है तो उसकी जांच कैसे होगी? यह खर्च तो संबंधित उम्मीदवार के खाते में जोड़ दिया जाएगा जबकि उसने यह खर्च किया ही नहीं। पेड न्यूज के संबंध में इस प्रकार की गड़बड़ियां रोकने के लिए निर्वाचन आयोग और जिला प्रशासन ने क्या पुख्ता व्यवस्था की है।

कलेक्टर कार्यालय में सोमवार को आयोजित जिला स्तरीय स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में कांग्रेस के पूर्व विधायक पीसी शर्मा एवं अन्य नेताओं ने यह सवाल पूछे तो अधिकारी बगलें झांकते नजर आए। बैठक में अपर कलेक्टर बसंत कुर्रे, एडीएम बीएस जामोद सहित अन्य अधिकारी एवं विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद थे।

कुर्रे ने बैठक में पेड न्यूज के लिए निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए इंतजामों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए जिला स्तर पर कमेटी बनाई जाएगी, जो उम्मीदवारों के पक्ष और विपक्ष में छपने वाली खबरों की जांच कर खर्च संबंधित उम्मीदवार के खाते में जोड़ने का काम करेगी।

कविलाश के हटने के बाद दैनिक जागरण के आईटीओ आफिस में अफरातफरी का आलम

कविलाश के आइटीओ से हटते ही उसके खास गुर्गों की रातों की नींद उड़ गई है। एक सज्जन तो कार्यालय में अकेला रिपोर्टर होने के बावजूद भी पूर्वी दिल्ली का चीफ बना बैठा है। गाजियाबाद में वह सरकारी दफ्तरों में 100-200 रुपए मांग के लिए बदनाम था। वहीं, पूर्वी दिल्ली पहुंचते ही पहले उसने वहां स्थित सभी रिपोर्टरों को बाहर करवाया।

पूर्वी दिल्ली में वह जहां आनंद विहार बस अ्डा, उत्तर पूर्वी व पूर्वी जिला निगम जोन, पूर्वी दिल्ली नगर निगम से हर माह उगाही करता है, वहीं, जो अवैध निर्माण करने वाला उसे पैसे नहीं देता उनके खिलाफ खुद या फिर किसी अन्य से आरटीआई लगवाकर उसे ब्लैकमेल करता है। वह शख्स हर छोटी व बड़ी खबर पर मिठाई या डिब्बा या फिर राजदरबार का पैकेट मंगवाता है जो मिठाई व राजदरबार नहीं देता उसकी खबर नहीं छपती है। वह केवल उन्हीं की खबर लिखता है जो उसे रुपयों की भेंट चढ़ाता है। जो माल नहीं देता है उसकी निगेटिव खबर लगाकर उनसे पैसों के लिए दबाव बनाया जाता है।

हमेशा मुंह में राजदरबार खाए रहने वाले इस शख्स ने दैनिक जागरण पूर्वी दिल्ली कार्यालय के बोर्ड पर पीक थूक-थूककर उसे लाल कर दिया है। वहीं, छज्जे पर उलटी कर-कर के कई किलो राजदरबार इकट्ठा कर दिया है। उसकी राजदरबार खाने की आदत से बिल्डिंग में स्थित अन्य आफिस वाले काफी परेशान हैं। पूरी बिल्डिंग का सीवरेज बीते दिनों उसके थूक से जाम हो गया था। उस बदतमीज शख्स से जिले का कोई नेता व आरडब्ल्यूए वाला बात करना नहीं चाहता। पाठकों ने रीलिज देने के लिए पूर्वी दिल्ली कार्यालय का रुख करना बंद कर दिया है। इसका नतीजा है कि पिछले कुछ सालों में दैनिक जागरण पूर्वी दिल्ली का सरकुलेशन घटा है जो पहले दिल्ली के सभी सेंटरों से आगे हुआ करता था। हालांकि अब वह शख्स नौकरी की तलाश कर रहा है लेकिन उसकी शिक्षा-दीक्षा बहुत कम है, इसलिए उसे और कहीं नौकरी मिलने में कठिनाई हो रही है।

वहीं, आइटीओ कार्यालय पर कई चीटर टाइप के लोगों पर गाज गिरनी तय है। संस्थान के पास आइटीओ कार्यालय में स्थित वरिष्ठ व कनिष्ठों में से किसी को इंचार्ज बनाने लायक क्षमता नहीं दिख रही है। नतीजन बाहर से ही इंचार्ज लाना प़डेगा। वरिष्ठों को विष्णु त्रिपाठी ने खुद आकर उनके समक्ष ज्ञान का जो प्रकाश फैलाया है उससे सबकी हालत पतली है। कई लोग तो आजकल डर की वजह से दो पैग फालतू लगा रहे हैं।

वहीं एक अन्य सज्जन कमाई का हिसाब-किताब लगा आगे की प्लानिंग कर रहे हैं. एक अन्य ने तो आना ही छो़ड दिया है. कुछ लोग दिल्ली से बाहर अपने ट्रांसफर होने को लेकर चिंतित हैं तो कुछ दिल्ली में छोटे सेंटरों के इंचार्ज बनने की फिराक में लगे बैठे हैं। कुल मिलाकर एक बात है कि जिसने जैसा कर्म किया उसके साथ वैसा ही होने जा रहा है। जिसने लोगों का दिल दुखाया था आज उसकी व उसके गुर्गों की हालत उसके कर्मों की ही परिणति है। 

योगेश कुमार सोनी की रिपोर्ट. संपर्क: 9999907181

नभाटा, ईटी हिंदी और सांध्य टाइम्स, दिल्ली के मार्केटिंग हेड सत्यम जोशी ने इस्तीफा दिया

टाइम्स ग्रुप के साथ पिछले 9 साल से जुड़े सत्यम जोशी ने बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड को गुडबाय बोल दिया है. वे नवभारत टाइम्स, सांध्य टाइम्स और इकोनामिक टाइम्स हिंदी के दिल्ली एडिशन के मार्केटिंग के रूप में पिछले छह साल से काम देख रहे थे. उनका पद डिप्टी चीफ मैनेजर (ब्रांड) का था.

सत्यम रेडियो मिर्ची के लिए भी काम कर चुके हैं और 'नान ट्रेडीशन रेवेन्यू स्ट्रीम' को स्थापित करने वालों में से एक रहे हैं. सत्यम का सेल्स और मार्केटिंग के फील्ड में 13 वर्षों का अनुभव है. वे आईसीआईसीआई बैंक, बांबे डाइंग के साथ भी काम कर चुके हैं.

आवाजाही, इस्तीफा, ज्वायनिंग की सूचनाएं भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

आदिवासी साहित्य पर विस्तृत परिचर्चाओं के साथ संपन्न हुई जेएनयू में दो दिवसीय संगोष्ठी

जेएनयू में आदिवासी साहित्यः स्वरूप और संभावनाएं पर गोष्ठी के दूसरे दिन का पहला सत्र डॉ रमन प्रसाद सिन्हा के संयोजन में शुरू हुआ। इस सत्र का उद्देश्य आदिवासी साहित्य की अवधारणा और इतिहास के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न विधाओं में हो रहे समकालीन लेखन की पड़ताल करना था। जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए शोधार्थियों ने अपने विचार रखे। पहले सत्र में डॉ. कला जोशी ने भील जाति की संस्कृति उनके गीत, जन्म, मृत्यु परंपराओं के विषय में विस्तार से बात की।

डॉ. सुरेश ने आदिवासी साहित्य की अवधारणा पर विचार करते हुए उसकी विविधता पर रोशनी डाली। उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य लिखना उनका अधिकार है। जिन्होंने सहा है उन्हें उसे अभिव्यक्त करने का भी अधिकार है। गणेश माझी ने शिक्षा संस्कृति व मुक्ति के सवाल पर बात रखी। अंशिका शुक्ला, सुमन देवी, वीरेन्द्र ने संजीव के कथा साहित्य में आदिवासी चेतना को दिखाया। वीरेन्द्र कुमार मीणा संजीव के कथा साहित्य में आदिवासी चेतना देखने का प्रयास करते हैं। मुमताज ने आदिवासी साहित्य की अवधारणा पर अपने विचार रखे। सत्र के अंत में रमन प्रसाद सिन्हा जी ने कहा कि आदिवासी साहित्य की अवधारणा को जानने के लिए इतिहास और उसके समकालीन लेखन को समझना होगा। देवेन्द्र चौबे के संयोजन में इसके समांतर सत्र में अजय पूर्ति, राजेश्वर कुमार, गणेश, मंजू कुमारी, डॉ. सुधा निकेतन रंजन, हनुमान सहाय मीणा, डॉ. विनोद विश्वकर्मा आदि ने अपनी बात रखी।

गोष्ठी के दूसरा सत्र डॉ. गोबिन्द प्रसाद के संयोजन में शुरू हुआ। दूसरे सत्र में आदिवासी लेखन के समाजशास्त्र पर विचार किया गया। स्तुति राय ने ‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में बेडि़या समुदाय के सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों पर प्रकाश डाला। अंजु रानी और कविता यादव आदिवासी साहित्य और दलित साहित्य की विषमताओं व समानताओं पर बात रखी। अनिरुद्ध ने ‘जंगल के दावेदार’पर विचार रखे और अब्दुर्रहीम ने आदिवासी साहित्य के विकास में उर्दू फिक्शन के योगदान देखने की कोशिश की। उषा किड़ो ने रोज़ केरकट्टा की कहानियों पर अपने विचार रखे। राजकुमार मीणा ने ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के आदिवासी विमर्श में योगदान के बारे में बात की। प्रीति त्रिपाठी ने तुलसी के साहित्य में आदिवासी समाज को देखने की कोशिश की।

आदिवासी समाज को तुलसी किस प्रकार अपने साहित्य में पेश करते है, इस पर श्रोताओं का ध्यान खींचा। देवयानी भारद्वाज ने भाषा व शिक्षा को महत्व की दृष्टि से देखा और कहा कि आदिवासी बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देनी चाहिए। बच्चे का सही विकास करने के लिए उसके मनोविज्ञान को समझना होगा। डॉ. गोबिन्द प्रसाद ने कहा कि भाषा और अस्मिता के अंतर्संबंध को समझना होगा। प्रो. हरिमोहन शर्मा ने कहा कि वर्चस्ववादी ताकतें अस्मिताओं को अपने चश्मे से देखना चाहती हैं। अस्मिताएं इसीलिए संघर्षरत हैं कि हमें हमारे नजरिए से देखिए। समस्याओं को समझने की जरूरत है। साहित्यकार मनुष्य विरोधी चीजों के लिए संघर्ष करता है।

इसी सत्र के समांतर हाल नं. 1 में डॉ. रामचंद्र के संयोजन में प्रतियोगियों ने अपनी अपनी बात रखी। वर्षा वर्मा ने आदिवासी आत्मकथा के द्वारा उनकी समस्याओं और अनुभववादी लेखन शैली की चर्चा की। अभिषेक यादव ने आदिवासियों पर हो रहे भूमण्डलीकरण, वैश्वीकरण द्वारा हो रहे हमलों पर ध्यान दिलाया। भावना बेदी ने आदिवासी साहित्य में स्त्री प्रश्न पर बात की। अभिषेक पांडेय ने झारखंडी समुदाय की परंपराओं और प्रकृति संस्कृति के बारे में बताया। राजवीर सिंह ने बेलगांव के जीवन को आलोचनात्मक रूप से देखने का प्रयास किया। डॉ. माझी ने संथाली भाषा पर बात की। डॉ. भारती ने आदिवासी स्त्री मुक्ति का प्रश्न सामने रखती हैं। डॉ. प्रमोद कुमार मीणा विस्थापन का नासूर झेलते आदिवासियों की स्थिति को महाश्वेता देवी के उपन्यासों देखने की कोशिश की। इस सत्र के अंत में जेएनयू के क्रांतिकारी कवि विद्रोही ने अपनी कविताएं पढ़ीं।

तीसरा सत्र डॉ. ओमप्रकाश के संयोजन में शुरू किया गया, जिसमें डॉ. हर्षिता ने आदिवासी कविता को परिभाषित करने की कोशिश की। लखिमा देवरी बोडो साहित्य में आदिवासी समाज की स्थिति पर बात की। रूबीना सैफी ने आदिवासी हिंदी कविता में इतिहास, वर्तमान और भविष्य को वर्चस्व और प्रतिरोध की संस्कृति के संदर्भ में देखने की कोशिश की। सोनम मौर्य ने ‘ग्लोबल गांव के देवता’ विस्थापन की समस्या को देखने की कोशिश की। वसुंधरा गौतम ने डायन प्रथा के बारे में विस्तार से बताया और साहित्य में भी उसे देखने की कोशिश की।

निशा सिंह ने हिंदी ब्लॉक में आदिवासी विमर्श पर अपनी बात रखी। भंवर लाल मीणा ने लोकगीतों का समाजशास्त्र स्वरूप प्रस्तुत किया। डॉ. बन्ना राम मीणा ने कहा इस आदिवासी विमर्श में निरंतरता रहे। डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी ने दो विचारणीय प्रस्ताव रखे जैसे-भारतीय आदिवासी लेखन की अधिकारिक भाषा क्या हो? और भारत सरकार दिल्ली में दलित आदिवासी साहित्य अकादमी की स्थापना करे। हरिराम मीणा हम अभी भी आदिवासी समाज को ठीक से नहीं जान पाए हैं। जितना भी आदिवासी साहित्य लिखा गया है वो आदिवासी भाषा में लिखा गया है। उसका अनुवाद हिंदी में आना चाहिए।

इसके अलावा किम उ जो, डॉ. रमेश चंद्र मीणा, डॉ. जनक सिंह, मधुरा केरकेट्टा, अमितेश, नीतिशा खलखो, पल्ली श्री व शमला देवी ने अपना पर्चा पढ़ा। गोष्ठी का समापन संयोजन गंगा सहाय मीणा और भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. रामबक्ष  के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। जिससे प्रो. सुधा पई, पद्मश्री प्रो. प्रो. अन्विता अब्बी और दिलीप मंडल उपस्थित थे।

प्रेस विज्ञप्ति

दैनिक भास्कर में इंक्रीमेंट से पत्रकार दुखी

लंबे समय से इंक्रीमेंट का लॉलीपॉप देते हुए आखिर में दैनिक भास्कर मैनेजमेंट ने इंक्रीमेंट की सूची जारी कर दी। लेकिन इंक्रीमेंट को लेकर पत्रकारों में बेहद नाराजगी है। औने-पौने इंक्रीमेंट कर मैनेजमेंट यह जताने की कोशिश कर रहा है जैसे उसने बड़ा एहसान किया है। मात्र 500 से लेकर 6 हजार तक का इंक्रीमेंट हुआ है। बताया जाता है कि इनक्रीमेंट में नेशनल एडीटर कल्पेश याज्ञनिक की ही चली है।

कल्पेश ने पता नहीं किस खुन्नस में बेहद कंजूसी से इंक्रीमेंट किए हैं। जबकि सभी संपादकीय विभाग के लोगों को चेयरमैन सुधीर अग्रवाल का व्यक्तिगत पत्र प्राप्त हुआ था जिसमें उन्होंने बड़ा मीठा बनते हुए लिखा था- ''साथियों,  आपको इंक्रीमेंट देते हुए संस्थान अति प्रसन्न है, यह आपकी कड़ी मेहनत और भास्कर के प्रति ईमानदारी का सबूत है।'' इस इनक्रीमेंट से दुखी होकर कुछ बड़े लोग जो अब तक कल्पेश याज्ञनिक के मुंह लगे थे, वे भास्कर को अलविदा कहने वाले हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आईएएस दुर्गा शक्ति मामले में रिट याचिका दायर

लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने कल आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल निलंबन मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में रिट याचिका दायर किया. याचिका के अनुसार उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में अवैध बालू खनन और सार्वजनिक भूमि पर अवैध धार्मिक निर्माण की भारी समस्या है. सुप्रीम कोर्ट ने भी इनके सम्बन्ध में बार-बार कड़े निर्देश दिये हैं.

ऐसे में दुर्गा शक्ति सहित जो भी अधिकारी अवैध बालू खनन और सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक स्थलों के निर्माण हेतु अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कार्यवाही करते हैं, उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है, ना कि निलंबन अथवा दण्डित करने की. अतः ठाकुर ने हाई कोर्ट से सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण, भारत सरकार को दुर्गा शक्ति के निलंबन के सम्बन्ध में रिपोर्ट तलब कर गलत पाने पर उसे निरस्त करने के निर्देश देने की मांग की है. साथ ही सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों को बालू माफियाओं और सार्वजनिक भूमि पर अवैध धार्मिक निर्माण कर कार्यवाही करने वाले अफसरों को सहयोग प्रदान करने और उनका मनोबल नहीं तोड़ने सम्बंधित निर्देश जारी करने हेतु निर्देशित करने की भी प्रार्थना की है.

नलिनी के ‘नेपाल वन टीवी’ का काठमांडू ब्यूरो चीफ सुंदर सिंह विधूरी एंकर रेणुका से दुर्व्यवहार में गिरफ्तार

दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले क्राइम शो 'आंखों देखी' की संचालिका नलिनी सिंह की नेपाल वन टेलीविजनके काठमांडू ब्यूरो चीफ सुन्दर सिंह विधुरी को नेपाल प्रहरी ने नेपाल वन चैनल में कार्यरत एक महिला पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार के आरोप में गिरफ्तार किया है। नलिनी सिंह बाराखम्भा रोड, दिल्ली से नेपाल वन टेलीविजन का प्रसारण करती हैं।

सुंदर सिंह विधूरी
सुंदर सिंह विधूरी
नेपाल के कई आनलाइन न्यूज पोर्टल ने सुन्दर सिंह विधुरी की गिरफ्तारी की खबर प्रकाशित की है। काठमाण्डू से प्रकाशित होने वाले साँघु साप्ताहिक ने सोमवार को 'नेपाल वन चैनल' में सेक्सुअल ह्रेसमेंट की न्यूज पहली बार प्रकाशित की। काठमाण्डू से प्रकाशित सौर्य दैनिक ने भी 'नेपाल वन टीवी में यौन प्रस्ताव' शीर्षक में समाचार प्रकाशित किया है। नेपाल वन टीवी काठमाण्डू के प्रशासन प्रमुख सुबोध बगाले ने सूचना प्रकाशित करके रेनुका कांडेल द्वारा लगाये गये आरोप को गलत बताया है। सूचना में १३ जुलाई २०१३ से रेणुका कांडेल को बर्खास्त करने का निर्णय लेने की बात का उल्लेख है।

आरोप लगानेवाली रेणुका कंडेल के प्रेस वक्तव्य के मुख्य अंश

मैं चार वर्ष से नेपाल वन टेलीविजन में बतौर भोजपुरी कार्यक्रम संचालक कार्यरत थी। मैंने जब ज्वाइन किया तो कुँवारी थी। संस्था के भारत स्थित हेड अफिस से नेपाल चीफ के रूप में सुन्दर सिंह विधुरी को भेजा गया था। सुंदर मुझे फेसबुक से डबल मिनिंग वाला भद्दा मैसेज भेजते थे। मैं अकेली ही काठमाण्डू में रहती थी। वो मेरे रुम में आता था। पास आकर बैठना चाहता था और अश्लील हरकतेँ करना चाहता था। कभी दिल्ली स्थित नेपाल वन में परिचर रह चुका सुन्दर काठमांडो स्टुडियो में शूटिंग के दौरान अभद्र मजाक करता था। परोक्ष रूप से बुलाता था। मैंने सुन्दर सिंह को बारबार चेतावनी भी दी। सामान्य साक्षर सुन्दर विधुरी को प्रशासन ‌‌और टेलीविजन के विषय में भी कुछ नहीं आता था। टेलीविजन से निकाले जाने के डर से मैं कुछ भी नहीं बोलती थी। जब मैं शादीशुदा हो गई तबसे सुन्दर सिंह ने मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। मुझे प्रोग्राम से निकालने की योजना बनाया। जब मैंने विरोध किया तो सुन्दर सिंह विधुरी और कैमरापर्सन विराज श्रेष्ठ ने मुझे गालियां देते हुए हाथापाई करने लगे। सुन्दर सिंह को काठमाण्डू के सुन्धारा क्षेत्र से वेश्यावृत्ति के आरोप मे प्रहरी ने गिरफ्तार भी किया था। सुन्दर सिंह ‌और विराज श्रेष्ठ पर सेक्सुअल ह्रेसमेन्ट, मानसिक प्रताड़ना और हाथापाई करने का आरोप मैं लगाती हूं और प्रहरी प्रशासन से कार्रवाई की मांग करती हूं।

काठमांडू से अर्चना की रिपोर्ट.

सहारा के नोएडा स्थित आफिस में करेंट से दो बच्चे बुरी तरह झुलसे

सहारा वालों को इन दो बच्चों का भी श्राप लगेगा. नोएडा स्थित सहारा के आफिस के दूसरे फ्लोर पर खुले छत पर बिजली के नंगे तार बिछे हुए थे. कल की बात है जब इन्हें ठीक करने के लिए कांट्रैक्टर ने दो किशोर उम्र बच्चों को भेज दिया. ये दोनों जब छत पर गए तो उस दौरान एक बच्चे के नमाज का वक्त हो गया था, सो उसने नमाज पढ़ना शुरू कर दिया. दूसरा बच्चा बिजली के नंगे तारों को ठीक करने में जुट गया. बारिश से पूरे छत पर पानी फैला हुआ था. जगह-जगह नंगे तार थे.

इसी दौरान काम कर रहे बच्चे को चार सौ चालीस वोल्ट की बिजली ने अपने चंगुल में ले लिया. बिजली के चपेट में आए इस बच्चे की चीख सुनकर नमाज पढ़ रहा लड़का उसे बचाने दौड़ा. वह भी बिजली की चपेट में आ गया. करंट ने दोनों की दुर्गति कर दी.

उसी दौरान सहारा मीडिया में कार्यरत एक सज्जन नमाज पढ़ने छत की तरफ बढ़े तो उन्हें करंट की चपेट में आए बच्चे दिखे. उन्होंने फौरन शोर मचाया. ढेर सारे लोग उपर भागे. डंडे आदि के सहारे करंट के शिकार बच्चों को बिजली से हटाया गया और उन्हें अस्पतालों में भर्ती कराया गया. दोनों बच्चों की हालत गंभीर बताई जाती है. एक बच्चा आईसीयू में है.

देखना है कि लापरवाही का मामला सहारा वालों पर चलता है या नहीं. साथ ही बाल मजदूरी का मामला भी कांट्रैक्टर व सहारा पर दर्ज किया जाना चाहिए. पर ऐसा कुछ होने वाला नहीं है. क्योंकि यह बड़े बड़ों का मामला है. पिस गए गरीब व मासूम दो लड़के. उपर वाला इन लड़कों को सेहत बख्शे और इनकी हालत बिगाड़ने वालों को दुर्गति.

जेपी समूह ने ‘जाल’ में फंसाया हिमाचल प्रदेश को, समानान्तर शासन-तंत्र चला रहा

: जय प्रकाश एसोसिएट्स के काले कारनामें, जानें क्या है पूरा मामला : जेपी द्वारा इलाहाबाद जिले की बारा व करछना तहसील में स्थापित किये जा रहे दैत्याकार बिजली उत्पादन कारखाना से आम जनता को क्या लाभ और क्या हानि होगी, यह समझने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आज कॉरपोरट महाबली जय प्रकाश एसोसिएट्स के गला घोंटू शिकंजे में हिमाचल प्रदेश है। वहां उसकी तमाम अल्ट्रा-मेगा परियोजनाएं खड़ी हो रही हैं।

सीमेंट, तापविद्युत और जल विद्युत बनाने वाले उसके कई संयत्र लग रहे हैं। इस पहाड़ी प्रदेश में उच्च शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालय स्थापित करने के नाम पर जेपी एसोशिएट्स ‘टीचिंग शॉप्स या डिग्री-डिप्लोमा मिलें' लगा रहा है। वह इस प्रदेश के लोगों को उजाड़ रहा है। उनके बेशकीमती सामुदायिक प्राकृतिक संसाधनों को हड़प रहा है। पहाड़ी राज्य के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को बिगाड़ रहा है। प्रदेश में सत्तारूढ़ विरोधी दलों को फंडिग भी कर रहा है। सच कहा जाय तो हिमाचल प्रदेश में जेपी एसोशिएट्स अपना समानान्तर शासन-तंत्र चला रहा है।

हिमाचल में देशज लोग स्थानीय स्तर पर जगह-जगह कॉरपोरेट घरानों द्वारा लगायी जा रही बड़ी-बड़ी परियोजनाओं से जूझ रहे हैं। जेपी एसोसिएट्स द्वारा खड़ी की जा रही हर परियोजना उनके निशाने पर है। एक के बाद एक करके राज्य सरकारों ने भले ही हिमाचल में जेपी समूह को अपने संयत्र लगाने के लिये पलक पांवड़े बिछाकर न्योता दिया हो, लेकिन प्रदेश की जनता ने उसे अपने यहां से भगाने के लिये कमर कस रखी है।

लोगों के सतत संघर्ष की गूंज हिमाचल उच्च न्यायालय में पहुंची और उसकी हरित पीठ ने सोलन जिले के भगेरी इलाके में लग रहे जेपी एसोशिएट्स के सीमेंट संय़त्र को अवैध घोषित कर दिया। न्यायालय ने जेपी समूह के ताप विद्युत संयत्र को भी अवैध घोषित कर दिया। बाद में इसे रद् कर दिया गया। जेपी एसोसिएट्स की यह परियोजनाएं न केवल अवैध घोषित की गईं, बल्कि इनको मिलीं पर्यावरणीय मंजूरी भी रद् की गयी। हिमाचल उच्च न्यायालय ने परियोजनाओं को तीन महीने के अंदर समेटने का आदेश सुनाया है। न्यायालय ने कंपनी पर 100 करोड़ का जुर्माना भी ठोका।

हिमाचल उच्च न्यायालय ने अपना आदेश पारित करते समय जो टिप्पणियां की हैं, वे विकास के नाम पर कॉरपोरेट घरानों और सरकारों की मिली जुली कारगुजारियों का कच्चा चिट्ठा खोलती हैं। पर्यावरण सम्बंधी नियमों, मानकों और शर्तों की पूरी तरह अवेहलना की गयी है। विशेष रूप से 1994 तथा 2006 में निर्गत ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ सम्बंधी अधिसूचनाओं की जानबूझकर अनदेखी की गयी। ठीक से कहीं कोई जनसुनवाई नहीं हुई। कम्पनी के समस्त परियोजना-विषयक अभिलेखों को झूठ का पुलिंदा बताया गया है। हर स्तर पर कंपनी ने गलत बयानी और धोखाधड़ी की है, लोगों को गुमराह किया है।

अगर किसी तथाकथित महत्वाकांक्षी वृहदाकार संयत्र पर काम शुरू हो जाता है तो उसे इस देश में रोकने का चलन कतई नहीं है, भले ही वह बेहद खतरनाक, नुकसानदेह और भयावह क्यों न हो। तर्क दिया जाता है कि इसमें कुछ लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला हुआ है और इस पर अब तक काफी धनराशि खर्च की जा चुकी है।

हिमाचल उच्च न्यायलय की 2 सदस्यीय हरित पीठ के न्यायधीशों सर्व श्री दीपक गुप्ता और संजय करोल ने इस तरह के तर्क को सिरे से खारिज करते हुए तीन महींनों के भीतर परियोजना को पूरी तरह से समेट लेने का आदेश पारित कर दिया। इतना ही नहीं, न्यायालय ने कंपनी को यह आदेश दिया कि चार समान किस्तों में वह मार्च 2015 तक 100 करोड़ रुपये की भरपाई बतौर जुर्माना सुनिश्चत करे। इस धनराशि का उपयोग स्थानीय पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को सुधारने तथा इलाके के लोगों की भलाई व बेहतरी के लिये चिकित्सालय, पाठशालायें और सामुदायिक केंद्र खोलने के निमित्त किया जाय।

राज्य सरकार उसमें से 10 करोड़ रुपए उन गांव वासियों को मुआवजे के रूप में दे सकती है, जिनकी सामुदायिक जमीन को गलत ढंग से पूल में शामिल कर दिया गया जो आर्वंिटत की जा सकती हैं। जेपी समूह का जय प्रकाश एसोशिएट्स लिमिटेड हिमाचल में कहर ढा रहा है, जिसका अंग्रेजी में संक्षिप्त रूप JAL है। जेपी समूह उसे जल कहता है। लेकिन है सचमुच वह ‘जाल’ जिसमें फंसा हुआ हिमाचल प्रदेश कसमसा रहा है और लोग उसके खिलाफ आन्दोलित हैं।

जेपी समूह की कारस्तानी के अनगिनत रूप हैं। जैसा कि जेपी के कारगुजारियों के सम्बंध में जून 2012 में आजादी बचाओ आन्दोलन के संयोजक डा0 बनवारी लाल शर्मा ने इस संवाददाता को बताया था। यही नहीं उन्होंने इस सम्बध में आन्दोलन भी किया था जिससे जेपी ग्रुप काफी पेरशानी उठानी पड़ी और वह कानूनी शिकंजे में फंस गया।

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.

सुब्रत राय को अवमानना के लिए छह माह की कैद हो : सेबी

पूरा देश देख रहा है कि चिटफंड के उस्ताद सुब्रत राय का क्या होगा. फिलहाल सारी कवायद हवाबाजी सरीखी ही नजर आ रही है. पर आज जब सेबी ने यह अनुरोध कर दिया कि सुप्रीम कोर्ट अवमानना के मामले में सुब्रत राय को छह माह जेल भेज दे तो ज्यादातर लोग इस बात पर चर्चा करने लगे हैं कि क्या वाकई सुब्रत राय जेल जाएंगे? हालांकि इस सिस्टम में इतने पेंच हैं कि सु्ब्रत राय बच भी सकते हैं, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है.

फिलहाल सेबी की बात करें जिसने उच्चतम न्यायालय से पुरजोर गुहार लगायी है कि निवेशकों को 24 हजार करोड़ रूपए लौटाने के न्यायिक आदेश का पालन नहीं करने के कारण सहारा समूह के मुखिया सुब्रत राय और उनकी दो कंपनियों तथा उनके निदेशकों को दंडित किया जाये. सेबी ने सुप्रीम कोर्ट में सुब्रत राय के इस तर्क का प्रतिवाद किया कि सहारा इंडिया हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कार्प लि. और सहारा इंडिया रियल इस्टेट कार्प लि, द्वारा निवेशकों का धन नहीं लौटाने के कारण उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता है. सेबी ने कहा कि इन कंपनियों में सुब्रत राय के 70 फीसदी शेयर हैं और ऐसी स्थिति में उसे न्यायालय की अवमानना के लिये छह महीने की कैद या जुर्माने की सजा दी जा सकती है.

न्यायमूर्ति के एस राधाकृष्णन और न्यायमूर्ति जे एस खेहड़ की खंडपीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अरविन्द दत्तार ने कहा, इन कंपनियों का प्रवर्तन होने के नाते इसमें उनकी स्थिति है जो कंपनियों में निदेशकों की होती है और वह भी अवमानना के लिये जिम्मेदार हैं. उन्हें भी कंपनियों के दूसरे निदेशकों के साथ दंड दिया जाना चाहिए. दात्तार ने न्यायालय की अवमानना कानून की धारा 12 के तहत राय और अन्य को अधिकतम सजा देने का अनुरोध किया. इस धारा के तहत अधिकतम छह महीने की कैद की सजा का प्रावधान है. उन्होंने कहा, इन कंपनियों द्वारा एकत्र की गयी धनराशि की मात्रा को देखते हुये यह राय और कंपनियों को अधिकतम दंड देने का उचित मामला है. उन्होंने कहा कि कंपनियों ने एक नहीं बल्कि शीर्ष अदालत के तीन तीन आदेशों का उल्लंघन किया है.

सेबी के वकील ने कहा कि इन कंपनियों ने निवेशकों को धन लौटाने के बारे में शीर्ष अदालत के 31 अगस्त और दिसंबर, 2012 के आदेशों पर अमल नहीं किया है. सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने जानना चाहा कि क्या यह रकम समूह की दूसरी कंपनियों से वसूली जा सकती है. सेबी ने दलील दी कि अन्य कंपनियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है क्योंकि निवेशकों से एकत्र किया गया धन समूह की दूसरी कंपनियों में लगाया गया जिसका मुखिया वही प्रवर्तक है. न्यायालय राय, दो कंपनियों और उनके निदेशकों के खिलाफ दायर तीन अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था. ये सभी छह अगस्त को अपना पक्ष रखेंगे. शीर्ष अदालत ने पिछले साल 31 अगस्त को सहारा समूह को निवेशकों को नवंबर के अंत तक धन लौटाने का निर्देश दिया था. न्यायालय ने यह समय सीमा आगे बढ़ाते हुये कंपनियों को 5120 करोड़ रूपए तत्काल जमा कराने और दस हजार करोड़ रूपए जनवरी के पहले सप्ताह में तथा शेष फरवरी के प्रथम सप्ताह में जमा कराने का निर्देश दिया था.

सेबी ने न्यायालय से कहा कि इस समूह ने पांच दिसंबर को 5120 करोड़ रुपए का ड्राफ्ट दिया था लेकिन इसके बाद वह शेष रकम का भुगतान करने में विफल रहा है. शीर्ष अदालत ने पिछले साल 31 अगस्त को सहारा समूह की दो कंपनियों को तीन महीने के भीतर अपने निवेशकों को 15 फीसदी ब्याज के साथ सारी रकम लौटाने का निर्देश दिया था. न्यायालय ने कहा था कि यदि कंपनी यह धन लौटाने में विफल रहती हैं तो सेबी उनकी संपत्ति कुर्क करने के साथ ही बैंक खाते जब्त कर सकती है. इन दोनों कंपनियों, इनके प्रवर्तक राय और निदेशक वंदना भार्गव, रवि शंकर दुबू और अशोक राय चौधरी को सेबी को यह धन लौटाने का निर्देश दिया गया था. (एजेंसी)

मुफ्त इलाज संबंधी शासनादेश जारी होने पर लखनऊ के पत्रकार नेताओं ने आभार जताया

उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने मान्यता प्राप्त पत्रकारों के संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीटूयूट आफ मेंडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) में मुफ्त इलाज संबंधी शासनादेश जारी होने पर सरकार के प्रति आभार जताया है। समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने आज जारी बयान में कहा कि इस शासनादेश के जारी होने से पत्रकारों की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हुयी है।

उन्होंने कहा कि फिलहाल उक्त सुविधा का लाभ केवल राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को ही मिलेगा पर जल्दी इसमें पत्रकारों के परिजनों को भी शामिल किया जाएगा। समिति ने इस आशय का एक पत्र प्रमुख सचिव सूचना को दिया है। उन्होंने कहा कि इस बारे में सकारात्मक बातचीत हो रही है और जल्दी ही पत्रकारों के परिजनों को इसमें शामिल किया जाएगा।

समिति के सचिव सिद्धार्थ कलहंस ने बताया कि हाल ही में समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री व प्रमुख सचिव सूचना से मुलाकात कर उनसे शासनादेश जल्दी जारी कराने को कहा था। उक्त प्रतिनिधिमंडल ने प्रमुख सचिव सूचना से हाल में पत्रकारों को आवंटित हुए सरकारी आवासों के आवंटन की अवधि को एक साल के बजाय पांच साल करने, विराज खंड स्थित पत्रकार पुरम योजना के भूखंडों के विक्रय पर लगी रोक की सीमा को घटा कर 15 साल किए जाने की भी मांग रखी थी। प्रतिनिधि मंडल में समिति के उपाध्यक्ष सत्यवीर सिंह, नरेंद्र श्रीवास्तव, सचिव सिद्धार्थ कलहंस, संयुक्त सचिव राजेश शुक्ला, कोषाध्यक्ष नीरज श्रीवास्तव, कार्यकारिणी सदस्य श्रीधर अग्निहोत्री आदि शामिल थे।

प्रेस विज्ञप्ति
 

‘मिस्र में क्रांति और प्रतिक्रांति’ विषय पर अमेरिकन साम्राज्यवाद विरोधी एक्टिविस्ट सुजै़न एडली ने दिया व्याख्यान

दिल्ली, 30 जुलाई, 2013। आज हिन्दी भवन में ‘पॉलेमिक’ और ‘बिगुल मज़दूर दस्ता’ ने ‘मिस्र में क्रान्ति और प्रतिक्रान्ति’ विशय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया जिसमें मुख्य वक़्ता के रूप में अमेरिका की जानी मानी श्रमिक संगठनकर्ता और साम्राज्यवाद विरोधी एक्टिविस्ट सुजै़न एडली ने भाग लिया। सुज़ैन एडली अरब अमेरिकी समुदाय की संगठनकर्ता भी हैं और वह ‘अरब जनउभार’ को करीबी से देखती आयी हैं। परिचर्चा मुख्य रूप से 2011 की शुरुआत से अरब विश्व और खासकर मिस्र में चल रहे सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलनों पर केन्द्रित रही।

लगभग एक घण्टे के अपने वक्तव्य में सुश्री एडली ने न सिर्फ़ इन आन्दोलनों के सकारात्मक पहलुओं पर ज़ोर दिया बल्कि उनकी सीमाओं और उनके सम्मुख चुनौतियों को भी चिन्हित किया। उन्होंने मिस्र के आन्दोलन में सक्रिय तमाम श्रमिक संगठनों की संक्षिप्त विवेचना भी प्रस्तुत की। हलांकि मुख्य रूप से स्वयंस्फूर्त होने की वजह से और एक संगठित नेतृत्व और सोची समझी रणनीति के अभाव में ये आन्दोलन अब तेजी से अपनी ऊर्जा खोते जा रहे हैं।  

मिस्र में मोर्सी समर्थकों पर हालिया हमलों पर भी चर्चा हुई। अन्त में सुश्री एडली ने द्वारा समूचे विश्व में प्रगतिशील आन्दोलनों को कुचलने में अमेरिकी साम्राज्यवाद की भूमिका पर भी बात की। परिचर्चा के बाद श्रोताओं ने अपने प्रश्न पूछे जिनका सुश्री एडली ने धैर्यपूर्वक जवाब दिया। सुश्री एडली भारत में मौजूदा समय में ज़ारी तमाम श्रमिक आन्दोलनों में भी सक्रिय हैं। ‘पोलेमिक’ के मिथिलेश ने कार्यक्रम का संचालन किया जिसमें बीच बीच में विहान सांस्कृतिक टीम ने क्रान्तिकारी गीतों को भी प्रस्तुत किया।

Talk by American intellectual Suzanne Adely

30th July, 2013, Delhi : ‘Polemic’ and ‘Bigul Mazdoor Dasta’ jointly organized a talk ‘Revolution and Counter- Revolution in Egypt’, by noted American Labour activist and Anti-imperialist and Palestine Solidarity activist, Suzanne Adely at Hindi Bhawan today. Ms. Adely is also an Arab American community organizer and has been observing the Arab spring from close quarters.

The talk focused mainly on the social and political movements which had been brewing in the Arab World, and especially Egypt since early 2011. In her one hour long address, Ms. Adely not only highlighted the positives that these movements generated but also pointed out the limitations and challenges they faced. She also gave a brief analysis of the various workers groups that had been and still are active in the Egyptian movement.

However, being largely spontaneous and lacking an organized leadership and well thought-out strategy, these movements are fast losing their steam. The recent crackdown on Morsi supporters by the military was also discussed. Ms. Adely talked about the role US imperialism has been playing to suppress all the progressive movements taking place everywhere in the world. The talk was followed by a question-answer session in which the audiences participated enthusiastically. Ms. Adely who is also active in worker’s struggles taking place in India,

answered all the questions patiently. Mithilesh of ‘Polemic’ conducted the programme which was interspersed with a few revolutionary songs.

Shivani

Convener

Polemic

प्रेस विज्ञप्ति

मुंबई लेबर कोर्ट ने आउटलुक कर्मियों को निकाले जाने पर रोक लगाई

तीन अंतरराष्ट्रीय मैग्जीनों पीपल, मैरी क्लेयर और जियो को भारत में प्रकाशित कर रहे आउटलुक समूह ने इन तीनों मैग्जीनों को भारत में बंद कर देने की घोषणा करते हुए इसमें कार्यरत करीब सौ से ज्यादा लोगों को सड़क पर ला दिया. इन कर्मियों को न तो पहले सूचित किया गया, न ही एडवांस सेलरी दी गई और न ही इनका बकाया दिया जा रहा है. इस कदम से नाराज कर्मी कोर्ट चले गए. पीपल मैग्जीन के निकाले गए कर्मचारियों ने मुंबई लेबर कोर्ट में एक याचिका दायर की है.

याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आउटलुक ग्रुप को आदेश दिया कि बिना कानूनी प्रक्रिया पूरा किए कर्मियों को बर्खास्त न किया जाए. इस आदेश की प्रति कोर्ट की तरफ से आउटलुक ग्रुप प्रेसीडेंट इंद्रनील राय और एडिटोरियल चेयरमैन विनोद मेहता के पास भेज दिया गया है.

याचिकाकर्ताओं की तरफ से कोर्ट में एडवोकेट अनीस एस काजी उपस्थित हुए और कर्मियों का पक्ष रखा. मंगलवार की सुबह दायर याचिका पर संज्ञान लेते हुए मुंबई लेबर कोर्ट के जज पीके चिटनीस ने आउटलुक प्रबंधन को स्टेटस-को यानि यथास्थिति कायम रखने का आदेश दिया. साथ ही कर्मियों की सेवा भी जारी रखने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि कानूनी व तयशुदा प्रक्रियाओं का पालन किए बिना कर्मियों को बर्खास्त नहीं किया जा सकता.

मूल खबर-

आउटलुक समूह ने तीन मैग्जीनों को बंद किया, सौ से ज्यादा कर्मी बर्खास्त

आउटलुक समूह ने तीन मैग्जीनों को बंद किया, सौ से ज्यादा कर्मी बर्खास्त

अभी कुछ ही समय पहले टाइम्स आफ इंडिया वालों ने वीकली मैग्जीन क्रेस्ट बंद करने का फैसला किया और अब सूचना आउटलुक ग्रुप से आ रही है कि इसने बिना नोटिस दिए करीब सौ से ज्यादा कर्मियों को निकाल दिया, यह कह कर कि वे लोग अब 'पीपल', 'मैरी क्लेयर' और 'जियो' मैग्जीनों को तत्काल प्रभाव से बंद कर रहे हैं. इन मैग्जीनों की मुंबई टीम से जुड़े सैकड़ों लोग बेरोजगार हो चुके हैं. दिल्ली में भी इसका असर पड़ा है. बिना कोई नोटिस दिए अचानक निकाल दिए जाने से ये मीडियाकर्मी समझ नहीं पा रहे कि वे अब कहां जाएं, क्या करें.

सूत्रों के मुताबिक करीब केवल मार्केटिंग टीम के 135 लोगों को निकाला जा चुका है. एडिटोरिलय के लोगों को धीरे धीरे बाद में निकाला जाएगा. इस बारे में आउटलुक समूह का कहना है- “Outlook Publishing (India) Pvt. Ltd. wishes to inform its readers that it is discontinuing its licensing arrangements with 'People', 'Geo' and 'Marie Claire' magazines with effect from the forthcoming issues of these magazines.”

बताया जा रहा है कि आउटलुक प्रबंधन ने करीब साल भर से ज्यादा समय से अपने फ्रीलांसर जर्नलिस्टों को पे नहीं किया है जिन्होंने इन मैग्जीनों में लिखा. साथ ही सैकड़ों लोगों को बिना एडवांस सेलरी दिए, बिना नोटिस दिए निकालना भी बेहद घटिया हरकत है. कर्मचारियों का बकाया दिए बिना और उन्हें पहले से बताये बिना निकालना इतना क्रूर कदम है कि अगर यही काम कोई गैर-मीडिया कंपनी करती तो बड़ा बवाल होता, पर मीडिया का मामला है तो सब चुप्पी साधे हैं.

इसके आगे की खबर पढ़िए…

मुंबई लेबर कोर्ट ने आउटलुक कर्मियों को निकाले जाने पर रोक लगाई

‘आज समाज’ अखबार में किन-किन की छंटनी होगी, किनके पैसे कम होंगे, पढ़िए सारा हाल इस इनटरनल रिपोर्ट में

देश की मीडिया में संभवतः पहली बार कहीं ऐसा कुछ छप रहा है, जिसे आज भड़ास छाप रहा है. यह एक अखबार की इनटरनल रिपोर्ट है. इसे अखबार में कार्यरत और वरिष्ठ पद पर तैनात एक सज्जन ने तैयार किया है. उनका नाम फिलहाल यहां नहीं दिया जा रहा है. उन महोदय ने कितनी आसानी से छंटनी के लिए अपने साथी पत्रकारों के नाम गिनाए हैं और छंटनी के कारण के लिए उन पत्रकारों की बुराई गिनाई है, साथ ही इन लोगों की छंटनी की सिफारिश कर दी है.

मीडिया का मतलब धंधा है और धंधा है तो गंदा भी होगा. दुख ये कि जिस मीडिया को समाज और सरोकार के प्रतिरूप के बतौर माना गया, जाना गया, उसे अब पूरी तरह धंधेबाजों ने अपने हाथों में ले रखा है. चिटफंडिये, हत्यारे, भ्रष्टाचारी, बनिया, कारपोरेट, नेता… यही लोग आजकल मीडिया के मालिक बने हुए हैं और इनका एकमात्र लक्ष्य केवल पावर और पैसा है. वे इसी मकसद को हासिल करने के लिए मीडिया मालिक बने रहेंगे, प्रशासन और सिस्टम से गठजोड़ कर अपने स्वार्थ की पूर्ति करते रहेंगे. फिलहाल तो आप यह इंटरनल रिपोर्ट पढ़िए, आज समाज अखबार की, जिसमें पत्रकारों के नाम, उनकी सेलरी, उनके काम आदि के बारे में बताते हुए उनकी छंटनी की सिफारिश की गई है.

ये इंटरनल रिपोर्ट जिन सज्जन ने तैयार की है, वे अगर नंबर एक पर खुद का नाम लिखते और खुद की छंटनी कर दिए जाने का वाजिब कारण बताते तो शायद उनके प्रति हम सबका सम्मान बढ़ जाता. लेकिन जैसा कि दौर चल रहा है, लोग अपनी बचाने में दूसरों की बलि चढ़ाने के लिए तत्पर रहते हैं. रिपोर्ट बनाने वाले सज्जन ने इसे अपनी मीडिया कंपनी के सीईओ के पास भेज दिया है. रास्ते में कहीं से भड़ास ने इस रिपोर्ट को लपक लिया, जो आपके सामने पेश है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


रिपोर्ट.

सीईओ सर

महोदय,  अखबार के खर्चों में हो रही लगातार बढ़ोत्तरी को ध्यान में रख कर कार्यकारी निदेशक श्री राकेश शर्मा द्वारा  कटौती करने के जो निर्देश मिले थे उसी के अनुसार एक लिस्ट बनायी है। इसे लागू करने से एडिटोरियल कास्ट में करीब करीब पौने तीन लाख रुपये की हर महीने बचत हो जायेगी। वैसे इनके न रहने से काम में किसी भी तरह का कोई भी असर देखने को नहीं मिलेगा।  
सादर

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बन्दे जिन्हें हटाना है
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श्री बलवंत तक्षक …….75 हज़ार रुपये
ये जनाब कुछ भी काम नहीं करते हैं। शाम को छह बजे ऑफिस आते हैं। रोज एक उपन्यास पढ़ते हैं और घर चले जाते हैं। बीच-बीच में ऑफिस के लॉन में घूमते हैं। इनसे जब कोई पेज चेक करवाने जाता है तो यह कह कर टाल देते हैं कि किसी और को दिखा लें। पिछले छह महीने में इनका किसी तरह का कोई यागदान नहीं रहा है। हाल ही में तो इन्होंने एक सब एडिटर को हरिभूमि रोहतक भी भेजा है। इन्हें यहाँ रखने का कोई भी मतलब नहीं है।      
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श्री यशवीर कादियान —- 60 हज़ार रुपये
श्री कादियान का आचरण और व्यवहार बहुत ही ख़राब है। डेस्क के लोग तो तबसे ही इनसे खासे परेशान हैं, जबसे आज समाज का अम्बाला संस्करण शुरू हुआ है। कई बार तो झगड़े तक हुए हैं। हाल ही में इन्होंने खुद ही यह नियम बना लिया था कि ये अब चंडीगढ़ ऑफिस से नहीं, घर से काम करेंगे। ये जनाब अनुशासनहीन भी हैं और जो मन में आता है करते रहते हैं। इनका आज समाज में रहना कहीं से भी उचित नहीं है।  
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श्री स्वतंत्र सक्सेना ……60 हज़ार रुपये
श्री सक्सेना के पास भी कोई काम नहीं है। सिर्फ एक एडिट लिखते हैं ये। वो भी सिर्फ चार सौ शब्दों का। ये नहीं भी रहेंगे फिर भी हमारा काम चल जायेगा। वैसे काम न करने के कारण इन्हें पहले भी नोटिस दिया जा चुका है। श्रीमान जी आज कल छुट्टी पर चल रहे हैं।
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श्री मोहन वशिष्ठ ……..23 हज़ार रुपये
ये कहने को आर्ट डिपार्टमेंट के हेड हैं, लेकिन ये जनाब अपनी योग्यता के हिसाब से काम नहीं करते हैं। अकसर गायब रहते हैं, आजकल कहाँ है पता नहीं? सुना है कहीं काम कर रहे हैं। वैसे कहने को नाक की सर्जरी करवाने के लिए मेडिकल लीव पर गये हैं। इन्हें हटाना भी संस्थान के हित में रहेगा।
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श्री संदीप घनघस …स्ट्रिंगर  भिवानी ….चार हज़ार रुपये
श्री जीतेन्द्र वालिया …फोटोग्राफर  भिवानी ….आठ हज़ार रुपये     
श्री बजरंग मीणा …रिपोर्टर फतेहाबाद …आठ हज़ार रुपये
श्री अरुण भरद्वाज …रिपोर्टर सिरसा ….ग्यारह हज़ार रुपये   
श्री तारीफ गौतम ….रिपोर्टर हिसार ….आठ हज़ार पांच सौ रुपये
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वेतन घटेगा
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श्री अशोक कुमार …रिपोर्टर ,,,भिवानी ….इनका वेतन दस हज़ार से घटा कर सात हजार किया जा रहा है     
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कुल बचत : दो लाख 60 हज़ार पांच सौ रुपये
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इसके अलावा हिसार कलस्टर के अंतर्गत आने वाले सभी फ़ोटोग्राफ़रों के वेतन में भी कटौती की जा रही है ,,,,,विवरण निम्न है
श्री नरेश कुमार ..हिसार ….सात हज़ार रुपये …..अब इन्हें कुल चार हज़ार रुपये दिए जायेंगे
श्री लवली मेहता ….फतेहाबाद ……55 सौ रुपये ….इन्हें अब तीन हज़ार रुपये दिए जायेंगे
श्री सुनील मेहरोत्रा ….जींद …..सात हजार रूपये ….इन्हें अब चार हज़ार रुपये दिए जायेंगे
श्री संजीव शर्मा …..सिरसा ….सात हज़ार रुपये ……इन्हें अब चार हज़ार रुपये
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फ़ोटोग्राफ़रो का वेतन कम करने से कुल बचत होगी : 11 हज़ार पांच सौ रूपये  
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कुल बचत : दो लाख 60 हज़ार पांच सौ + 11 हज़ार पांच सौ = दो लाख 72 हज़ार रुपये मात्र

शिवराज की जनआशीर्वाद यात्रा के आगे नतमस्तक हुआ मप्र का मीडिया, क्या ये पेड न्यूज नहीं?

यशवंत जी पिछले दिनों भड़ास पर एक लेख पढ़ा था, प्रकाश हिंदुस्तानी ने लिखा था, शीर्षक था- हिंदी के रीजनल न्यूज चैनलों का एकमात्र काम अपने राज्य के मुख्यमंत्री की जय जय कार करना. पिछले दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज की जनआशीवार्द यात्रा के दौरान इसकी याद आ गई….

मध्यप्रदेश का पूरा मीडिया शिवराज की यात्रा के सामने नमस्तक हो गया….. इस तरह लाइव चला रहा था कि मानों प्रदेश की सबसे बड़ी खबर यहीं हो…. चुनाव आयोग पेड न्यूज की बात करता है, ये जो 5-6 घंटे लगातार लाइव चल रहा था बिना बात के राज्य सरकार की जय जयकार की जा रही थी… क्या ये पेड न्यूज की श्रेणी में नहीं आता….

सहारा…ईटीवी…जी मध्यप्रदेश और इंडिया न्यूज मध्यप्रदेश जैसे बड़े रीजनल चैनलों ने मुख्यमंत्री और 5-6 नेताओं का भाषण लाइव चलाया… बंसल न्यूज और ऐसे ही कुछ छोटे चैनलों ने कुर्सी और टेंट लगने से लेकर यात्रा खत्म होने तक ..शिवराज के रथ का पिछवाड़ा भी लाइव दिखाया…..सवाल यही है कि ये पत्रकारिता का कौन सा रूप है…..मध्यप्रदेश में सारे न्यूज चैनल शिवराज का गुणगान कर रहे हैं….साफ है कि इन्हे जनसंपर्क से पैसा मिल रहा है….खूब विज्ञापन दिए जा रहे है पर क्या इसका मतलब ये हो गया है कि रीजनल चैनल प्रदेश सरकार के गुलाम हो जाए….सिर्फ वही दिखाया जाए जो प्रदेश के मुख्यमंत्री को पसंद हो….

ट्राई कितने ही नियम बना ले कि 30 घंटे में 9 मिनट से ज्यादा विज्ञापन नहीं होना चाहिए पर मध्यप्रदेश के न्यूज चैनल कई बार इस तरह के आयोजन में मुख्यमंत्री के भाषण को घंटों लाइव चलाता है….तो क्या ये ट्राई ने नियमों का उल्लघन है….शिवराज की जन आशीर्वाद रैली को जिस तरह मप्र की मीडिया ने प्रस्तृत किया है वो बहुत शर्मनाक है….ये मजबूरी हो गई है रीजनल चैनल की अगर बीजेपी की जगह कांग्रेस की सरकार होती तो वी यही होता जो आज हुआ…. जिस तरह से रीजनल चैनलों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है उसी तरह से राज्यों में चाटुकारिता बढ़ती जा रही है….

अब चैनल का न्यूज हैड सरकार के प्रवक्ता जैसी बाते करता नजर आता है…सिर्फ राज्य सरकार के मंत्रियों के इंटव्यू लेना.. IAS और IPS से अफसरनामा करना…राज्य सरकार की तारीफ करना ये चैनल के न्यूज हैड का काम रह गया है….बाकी क्या चल रहा है चैनल में…कहां जा रही है पत्रकारिता इससे कोई लेना देना नहीं….

अभी मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में थोड़ा समय बाकी है….पर चुनाव आते आते ये न्यूज चैनल पत्रकारिता को और शर्मसार करेंगे….ऐसे में चुनाव आयोग को चाहिए कि वो देखे किस नेता को कौन सा चैनल कितनी देर तक दिखा रहा है….क्यों कि यही पेड न्यूज है ….पैसे देकर टीवी पर दिखना…पैसे देकर मुख्यमंत्री का भाषण या आयोजन लाइव चलवाना…..राज्यों में पत्रकारिता के गिरते स्तर को अगर रोकना है तो सख्ती से इस चाटुकारिता को बंद करना होगा नहीं तो राज्यों में भूल ही जाओ पत्रकारिता नाम की कोई चीज होती है….सिर्फ चाटुकारिता ही नजर आएगी….

मध्यप्रदेश के पत्रकार द्वारा भेजे गये पत्र पर आधारित.

उत्तराखंड में जनता को राशन नहीं मिल रहा जबकि चैनल रोज पीट रहे सरकारी रकम

यशवंत जी, आपको अवगत कराना है कि उत्तराखंड का सूचना विभाग इन दिनों पूरी तरह जनविरोधी हो गया है. इस विभाग पर गंभीरता से नजर डालिए और इसके खिलाफ लगातार सीरीज चलाकर खबरें छापिए. मुख्यमंत्री के कार्यों के प्रचार प्रसार करने के नाम पर सीएम बहुगुणा का गुणगान करने वाले हर चैनल को हर रोज हजारों रुपए दिए जा रहे हैं. सब रकम जोड़ लें तो लाखों में बैठेगा हिसाब किताब.

इन न्यूज चैनलों पर पेड न्यूज डायरी चलाई जा रही है. जरा दिखवाइए, टीवी 100, सहारा, इंडिया न्यूज, टाईम टीवी, साधना, जैसे कई चैनल मलाई काट रहे हैं जबकि जनता को राशन नहीं मिल रहा है. यह सब किसके इशारे पर हो रहा है… बताया जाता है कि नए डीजी भी शांत हो कर बैठ गए हैं. सूचना विभाग से कई लोग किनारे कर दिए गए पर राजेश कुमार जैसे लोग अब भी टिके हुए हैं… साधना न्यूज को विज्ञापन से लेकर उत्तराखंड में संजय श्रीवास्तव एंड कंपनी को नई फ्रेंचाइजी दिलवाने में राजेश कुमार की बड़ी भूमिका है. कंपनी के सीईओ राकेश शर्मा से सीधे डीलिंग करते हैं सूचना विभाग के राजेश कुमार.. जरा देख लीजिएगा… खबरें लिखे जाने पर और मसाला मिलेगा…

उत्तराखंड से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पूरे देश में मोदी लहर बहाने वालों के मुंह पर तमाचा है ये सर्वे

हाल में कुछ बड़े मीडिया हाउसेस ने सर्वे कराया. सर्वे के मुताबिक, कांग्रेस और भाजपा को मिलने वाली (लोकसभा) सीटों में सिर्फ 15 से 20 सीट का फासला है. भाजपा को महज़ 20 ज़्यादा. ये उन लोगों के मुंह पर तमाचा है, जो पूरे देश में मोदी की लहर बहने का दावा करते हैं. तमाम सर्वे बता रहे हैं कि देश की दो बड़ी पार्टियां (कांग्रेस और बीजेपी) 150 सीट भी नहीं पाएंगी. साथ ही UPA और NDA का कुनबा 200 के आंकडें को भी बमुश्किल छू पायेगा. यानी कुल 543 सीटों में से भाजपा 150 (लगभग एक चौथाई) का आंकडा भी ना छू पाए तो ये किस लहर और किस लोकप्रियता के दावे की बात हो रही है?

भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दे पर कांग्रेस पीछे हुई है, मगर इसका फायदा बीजेपी को कहां मिलता दिख रहा है? (सर्वे के मुताबिक़) कांग्रेस और बीजेपी के बीच 15-20 सीटों का बेहद कम फासला कभी भी पाटा जा सकता है, क्योंकि चुनाव अभी 8 महीने दूर है. अब ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या नरेंद्र मोदी का मीडिया मैनेजमेंट इतना तगड़ा है कि भाजपा को 150 सीट भी ना मिले और बात हर तरफ "मोदी की तथा-कथित आंधी" चलने की हो रही है? (सर्वे के मुताबिक) देश का महज़ 25% जनमानस मोदी की भाजपा को वोट दिखाई देता दे रहा है, और मीडिया इसे पूरे देश की सोच घोषित करता फिर रहा है.

देश के 4 दक्षिण-भारतीय राज्यों में भाजपा के खाता खुलने के आसार भी नहीं दिख रहे और नरेन्द्र मोदी का शानदार मीडिया मैनेजमेंट उन्हें सारे देश में लोकप्रिय करार दे रहा है! है ना मज़ाक की बात? पूर्वोत्तर भारत में भी बीजेपी का मामला सिफ़र है, मगर मोदी का गुणगान करने वाले इस से बे-खबर हैं! यूपी, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल में भी (सर्वे के अनुसार) क्षेत्रीय पार्टियों का वर्चस्व कायम रहेगा! ऐसे में मोदी हैं कहाँ? पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण में से महज़ उत्तर और पश्चिम से मिलती कुछ सीटें जीतने वाली पार्टी (भाजपा) और उसके समर्थक किस बात को लेकर मुंगेरीलाल के हसीं सपने बुन रहे हैं?

अब रहा सवाल मीडिया मैनेजमेंट का, तो मोदी और उनकी टीम इसमें माहिर है! मात्र 25 फीसदी वोट को काल्पनिक तौर पर 75% घोषित करवाने की तिकड़म में माहिर मोदी एंड मैनेजमेंट, इवेंट मैनेजमेंट या एडवरटाइजिंग कंपनी के सर्वेसर्वा हो सकते हैं मगर ज़मीनी हकीकत से दो-चार होने का माद्दा नरेन्द्र मोदी और मीडिया के उनके तथा-कथित सहयोगियों में नहीं है …जो….25 को 75 बताने का प्रचार करने में जुटे हैं ! मीडिया हाउस चलाने के लिए आर्थिक सहूलियतों की ज़रुरत होती है …हो सकता हो कि….25५ को 75 बताने का खेल एक गोपनीय समझौता हो , जो फिलहाल जगजाहिर नहीं हुआ है ! मगर हालिया सर्वेक्षण नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बखिया उधेड़ने के लिए काफी हैं !

अजित सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: 09594471363

‘जानेमन जेल’ की प्रीबुकिंग 15 अगस्त तक, अधिकतम छूट का लाभ उठाएं

Hind Yugm Prakashan : भड़ास4मीडिया http://www.bhadas4media.com के संस्थापक और सीईओ यशवंत सिंह की जेल डायरी शृंखला की पहली कड़ी 'जानेमन जेल' की प्रीबुकिंग हम आज से शुरू कर रहे हैं। यशवंत सिंह ने जेल-जीवन को बहुत ही सकारात्मक नज़रिए से देखा है। यशवंत जेल से बाहर की दुनिया को असली जेल मानते हैं और भीतर की दुनिया को एक खुला संसार। लगभग ढाई महीने के अपने जेल-जीवन को इन्होंने अपनी महबूबा की तरह प्यार किया।

उम्मीद है कि आप भी इस जेल-संस्मरण को पढ़कर आनंदित होंगे। प्रीबुकिंग 15 अगस्त 2013 तक चलेगी। प्रीबुकिंग में किताब पर अधिकतम छूट के साथ आपको मिलेगी यशवंत सिंह द्वारा हस्ताक्षरित प्रति। नीचे दिए गए पांच में से किसी भी आप्शन पर क्लिक करें और किताब बुक करें.

प्री-बुकिंग में किसी दिक्कत का सामना कर रहे हों तो किताब का नाम, अपना पता (पिन कोड एवं मोबाइल नं सहित) शैलेष भारतवासी के मोबाइल नंबर 9873734046 पर SMS करें.

(हिंदयुग्म प्रकाशन की तरफ से जारी विज्ञप्ति)


Yashwant Singh  : कोई मेरी भी किताब खरीद ले रे.. आनलाइन खरीद पर बंपर छूट है .. सेल सेल सेल… वरना जेल जेल जेल… पढ़ कर आनंद न आए तो फिर वापस जेल जाने को तैयार हूं 🙂 शुक्रिया शैलेष भाई, बिना एक पैसा लिए किताब छापने के लिए… ध्यान रखें, प्री-बुकिंग के दौरान आपको कोई पेमेंट नहीं करना है. जब किताब आपके पते पर भेज दी जाएगी, तब पेमेंट देना है. अगर आपको आनलाइन प्री-बुकिंग में कोई दिक्कत आती है तो आप अपना पता और मोबाइल नंबर लिखकर प्रकाशक शैलेष भारतवासी के मोबाइल नंबर 9873734046 पर एसएमएस भी कर सकते हैं.

('जानेमन जेल' के लेखक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.)

मोर्चा संभालो अपना, वीरेनदा!

कविता कैसे लिखी जाए या कोई व्‍यक्ति कवि कैसे कहलाए, इससे कहीं ज्‍यादा अहम बात यह है कि जो लिखा जा रहा है उसमें कविताई कितनी है। वह आपको कितना जोड़ पा रहा है। उसमें पढ़ने वाले को खुद से जोड़ने की संवेदना कितनी है। पलाश बिस्‍वास उर्फ पलाशदा बरसों से कलकत्‍ता में रह रहे हैं और जनसत्‍ता में नौकरी करते हुए बामसेफ आदि मंचों से लगातार सरोकार के विषयों पर स्‍वतंत्र हस्‍तक्षेप करते रहे हैं।

पलाश विश्वास
पलाश विश्वास
खूब लिखते हैं, खूब मेल करते हैं और रोज़ रात को हमारे मेलबॉक्‍स इनकी मेल से भर जाते हैं। लेकिन इस बार इन्‍होंने जो लिखा है, वह न सिर्फ अदभुत है, जबरदस्‍त प्‍यार और संवेदना को दर्शा रहा है, वैश्विक चिंताओं को आवाज़ दे रहा है और साथ ही निजी स्‍मृतियों का आवाहन भी कर रहा है। किसी प्रियजन पर कैसे एक बेहतरीन कविता लिखी जा सकती है, कवि वीरेन डंगवाल पर पलाशदा की लिखी इन दुर्लभ पंक्तियों से इसे समझा जा सकता है। संदर्भ है आगामी 5 अगस्‍त को वीरेनदा के 67वें जन्‍मदिन पर दिल्‍ली में होने वाला एक जुटान।  –अभिषेक श्रीवास्तव (माडरेटर, जनपथ.काम)


वीरेनदा के लिए

-पलाश विश्वास-

क्या वीरेनदा, ऐसी भी नौटंकी क्या जो तुमने आज तक नहीं की

गये थे रायगढ़ कविता पढ़ने और तब से

लगातार आराम कर रहे हो

अस्वस्थता के बहाने

कब तक अस्वस्थ रहोगे वीरेन दा

यह देश पूरा अस्वस्थ है

तुम्हारी सक्रियता के बिना

यह देश स्वस्थ नहीं हो सकता, वीरेन दा

राजीव अब बड़ा फिल्मकार हो गया

फिल्म प्रभाग का मुख्य निदेशक है इन दिनों

फोन किया कि वीरेनदा का जन्मदिन मनाने दिल्ली जाना होगा

बल्कि, सब लोग जुटेंगे दिल्ली में

भड़ास पर पगले यशवंत ने तो विज्ञापन भी टांग दिया

किमो तो फुटेला को भी लगे बहुत

देखो कैसे उठ खड़ा हुआ

और देखो कैसे टर्रा रहा है जगमोहन फुटेला, वीरेन दा!

आलसी तो तुम शुरू से हो

कंजूस रहे हो हमेशा लिखने में

अब अस्वस्थ हो गये तो क्या

लिखना छोड़ दोगे?

ऐसी भी मस्ती क्या?

मस्ती मस्ती में बीमार ही रहोगे

हद हो गयी वीरेनदा!

एक गिरदा थे

जिसे परवाह बहुत कम थी सेहत की

दूजे तुम हुए लापरवाह महान

सेहत की ऐसी तैसी कर दी

अब राजधानी में डेरा डाले हों, बरेली को भूल गये क्या वीरेन दा?

अभी तो जलप्रलय से रूबरू हुआ है यह देश

अभी तो ग्लेशियरों के पिघलने की खबर हुई है

अभी तो सुनायी पड़ रही घाटियों की चीखें

अभी तो डूब में शामिल तमाम गांव देने लगे आवाज़

बंध नदियां रिहाई को छटफटा रही हैं अभी

लावारिस है हिमालय अभी

गिरदा भी नहीं रहा कि

लिखता खूब

दौड़ता पहाड़ों के आर-पार

हिला देता दिल्ली-लखनऊ-देहरादून

अभी तुम्हारी कलम का जादू नहीं चला तो

फिर कब चलेगा वीरेनदा?

कुछ गिरदा के अधूरे काम का ख्याल भी करो वीरेनदा!

तुमने कोलकाता भेज दिया मुझे

कहा कि जब चाहोगे

अगली ट्रेन से लौट आना

सबने मना किया था

पर तुम बोले, भारत में तीनों नोबेल कोलकाता को ही मिले

नोबेल के लिए मुझे कोलकाता भेजकर

फिर तुम भूल गये वीरेनदा!

अभी तो हम ठीक से शुरू हुए ही नहीं

कि तुम्हारी कलम रुकने लगी है वीरेनदा!

ऐसे अन्यायी, बेफिक्र तो तुम कभी नहीं थे वीरेनदा!

चूतिया बनाने में जवाब नहीं है तुम्हारा वीरेनदा!

हमारी औकात जानते हो

याद है कि

नैनी झील किनारे गिरदा संग

खूब हुड़दंग बीच दारू में धुत तुमने कहा था, वीरेनदा!

पलाश, तू कविता लिख नहीं सकता!

तब से रोज़ कविता लिखने की प्रैक्टिस में लगा हूं वीरेनदा

और तुम हो कि अकादमी पाकर भी खामोश होने लगे हो वीरेनदा!

तुम जितने आलसी भी नहीं हैं मंगलेश डबराल

उनकी लालटेन अभी सुलग रही है

तुम्हारा अलाव जले तो सुलगते रहेंगे हम भी वीरेनदा!

नज़रिया के दिन याद हैं वीरेन दा

कैसे हम लोग लड़ रहे थे इराक युद्ध अमेरिका के खिलाफ

तुम्हीं तो थे कि वह कैम्पेन भी कर डाला

और लिख मारा `अमेरिका से सावधान'

साम्राज्यवादविरोधी अभियान के पीछे भी तो तुम्हीं थे वीरेनदा!

अब जब लड़ाई हो गयी बहुत कठिन

पूरा देश हुआ वधस्थल

खुले बाजार में हम सब नंगे खड़े हैं आदमजाद!

तब यह अकस्मात तुम

खामोशी की तैयारी में क्यों लगे हो वीरेनदा?

आलोक धन्वा ने सही लिखा है!

दुनिया रोज़ बनती है, सही है

लेकिन इस दुनिया को बनाने की जरूरत भी है वीरेनदा!

दुनिया कोई यूं ही नहीं बन जाती वीरेनदा!

अपनी दुनिया को आकार देने की बहुत जरूरत है वीरेनदा!

तुम नहीं लिक्खोगे तो

क्या खाक बनती रहेगी दुनिया, वीरेनदा!

इलाहाबाद में खुसरोबाग का वह मकान याद है?

सुनील जी का वह घर

जहां रहते थे तुम भाभी के साथ?

तुर्की भी साथ था तब

मंगलेश दा थे तुम्हारे संग

थोड़ी ही दूरी पर थे नीलाभ भी

अपने पिता के संग!

इलाहाबाद का काफी हाउस याद है?

याद है इलाहाबाद विश्वविद्यालय?

तब पैदल ही इलाहाबाद की सड़कें नाप रहा था मैं

शेखर जोशी के घर डेरा डाले पड़ा था मैं

100, लूकरगंज में

प्रतुल, बंटी और संजू कितने छोटे थे

क्या धूम मचाते रहे तुम वीरेनदा!

तब हम ख्वाबों के पीछे

बेतहाशा भाग रहे थे वीरेनदा!

अब देखो, हकीकत की ज़मीन पर

कैसे मजबूत खड़े हुए हम अब!

और तुम फिर ख्वाबों में कोन लगे वीरेनदा!

अमरउ जाला में साथ थे हम

शायद फुटेला भी थे कुछ दिनों के लिए

तुम क्यों चूतिया बनाते हो लोगों को?

हम तुम्हारी हर मस्ती का राज़ जानते हैं वीरेनदा!

कोई बीमारी नहीं है

जो तुम्हारी कविता को हरा दे, वीरेनदा!

अभी तो उस दिन तुर्की की खबर लेने बात हुई वीरेनदा!

तुम एकबार फिर दम लगाकर लिक्खो तो वीरेनदा!

तुमने भी तो कहा था कि धोनी की तरह

आखिरी गेंद तक खेलते जाना है!

खेल तो अभी शुरू ही हुआ है, वीरेनदा!

जगमोहन फुटेला से पूछकर देखो!

उससे भी मैंने यही कहा था वीरेन दा!

अब वह बंदा तो बिल्कुल चंगा है

असली सरदार से ज्यादा दमदार

भंगड़ा कर रहा है वह भी वीरेनदा!

यशवंत को देखो

अभी तो जेल से लौटा है

और रंगबाजी तो देखो उसकी!

जेलयात्रा से पहले

थोड़ा बहुत लिहाज करता था

अब किसी को नहीं बख्शता यशवंत!

मीडिया की हर खबर का नाम बन गया भड़ास, वीरेनदा!

अच्छे-अच्छों की बोलती बंद है वीरेनदा!

हम भी तो नहीं रुके हैं

तुमने भले जवानी में बनाया हो चूतिया हमें

कि नोबेल की तलाश में चला आया कोलकाता!

अपने स्वजनों को मरते-खपते देखा तो

मालूम हो गयी औकात हमारी!

यकीन करो कि हमारी तबीयत भी कोई ठीक

नहीं रहती आजकल

कल दफ्तर में ही उलट गये थे

पर सविता को भनक नहीं लगने दी

संभलते ही तु्म्हारे ही मोरचे पर जमा हूं, वीरेनदा!

तुम्हारी जैसी या मंगलेश जैसी

प्रतिभा हमने नहीं पायी

सिर्फ पिता के अधूरे मिशन के कार्यभार से

तिलांजलि दे दी सारी महत्वाकांक्षाएं

और तुरंत नकद भुगतान में लगा हूं, वीरेनदा!

दो तीन साल रह गये

फिर रिटायर होना है

सर पर छत नहीं है

हम दोनों डायाबेटिक

बेटा अभी सड़कों पर

लेकिन तुमहारी तोपें हमारे मोर्चे पर खामोश नहीं होंगी वीरेनदा!

तुमने चेले बनाये हैं विचित्र सारे के सारे, वीरेनदा!

उनमें कोई खामोशी के लिए बना नहीं है वीरेनदा!

तुम्हें हम खामोशी की इजाज़त कैसे दे दें वीरेनदा!

बहुत हुआ नाटक वीरेन दा!

सब जमा होंगे दिल्ली में

सबका दर्शन कर लो मस्ती से!

फिर जम जाओ पुराने अखाड़े में एकबार फिर

हम सारे लोग मोर्चाबंद हैं एकदम!

तुम फिर खड़े तो हो जाओ एकबार फिर वीरेनदा!

फिर आजादी की लड़ाई लड़ी जानी है

गिरदा भाग निकला वक्त से पहले, वीरेनदा!

और कविता के मोर्चे पर तुम्हारी यह खामोशी

बहुत बेमज़ा कर रही है मिजाज़ वीरेनदा!

तुम ऐसे नहीं मानोगे

तो याद है कि कैसे अमर उजाला में

मैंने जबरन तुमसे अपनी कहानी छपवा ली थी!

अब बरेली पर धावा बोल तो नहीं सकता

घर गये पांच साल हो गये

पर तुमने कहा था कि

पलाश, तू कविता लिख ही नहीं सकता!

तुम्हारी ऐसी की तैसी वीरेनदा!

अब से एक से बढ़कर एक खराब कविता लिक्खूंगा वीरेनदा!

भद तुम्हारी ही पिटनी है

इसलिए बेहतर है, वीरेनदा!

जितना जल्दी हो एकदम ठीक हो जाओ,वीरेनदा!

और मोर्चा संभालो अपना, वीरेनदा!

हम सभी तुम्हारे मोर्चे पर मुस्‍तैद हैं वीरेनदा!

और तुम हमसे दगा नहीं कर सकते वीरेनदा!


पत्रकार, कवि, साहित्यकार वीरेन डंगवाल के 66वें जन्मदिन पर आप सभी आमंत्रित हैं. दिल्ली में आईटीओ के करीब हिंदी भवन में पांच अगस्त को शाम पांच बजे आप सभी का इंतजार रहेगा.

निवेदक- वीरेन दा के मित्रगण एवं प्रशंसक

यूपी के घोटालेबाज प्रमुख सचिव (नियुक्ति) राजीव कुमार की सजा स्थगन का ‘राज’

लखनऊ।  प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में हाईकोर्ट से सजायाफ्ता हैं। यह दागी अफसर भ्रष्टों को मलाईदार तैनातियां बांटकर सरकार की छवि खराब कर रहा है। आखिर एक घोटालेबाज आईएएस जेल न जाकर पूरी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाकर इतने महत्वपूर्ण पद पर कैसे विराजमान है? दरअसल यह एक बड़ा षड्यंत्र है, जिसमें पूर्व दागी संयुक्त निदेशक सीबीआई जावेद अहमद, सीबीआई के वकील अनुराग खन्ना समेत यूपी सरकार के कई बड़े अफसर शामिल हैं वरना आज राजीव कुमार जेल की सलाखों के पीछे होते। इस षड्यंत्र की उच्चस्तरीय जांच कराने से कई बड़े खुलासे और होंगे।

नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में दागी आईएएस राजीव कुमार को सीबीआई की विशेष अदालत ने तीन वर्ष कैद के साथ जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ यह भ्रष्ट अफसर हाईकोर्ट पहुंचा और न्यायाधीशों ने सजा को न सिर्फ स्थगित किया बल्कि जुर्माने पर भी रोक लगा दी और घोटालेबाज आईएएस राजीव कुमार की ताजपोशी पुनः प्रमुख सचिव नियुक्ति की मलाईदार तैनाती पर हो गयी। अब जरा उस षड्यंत्र से पर्दा उठाया जाए, जिसके जरिए हाईकोर्ट तक को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। एनआरएचएम, खाद्यान्न व सूचना विभाग का भर्ती घोटाला समेत तमाम बड़े घोटालों की सीबीआई जांचों से भ्रष्टों को बचाने वाले तत्कालीन दागी संयुक्त निदेशक सीबीआई जावेद अहमद ने राजीव कुमार को बचाने का काम किया था। इसमें पूर्व लोकायुक्त सुधीर वर्मा के दामाद व राजीव कुमार के केस में सीबीआई के वकील अनुराग खन्ना भी शामिल थे।

खन्ना को आईएएस राजीव कुमार ने ही नोएडा का वकील बनवाया था। इसलिए उन्होंने अपना कर्ज उतारते हुए हाईकोर्ट में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला नहीं दिया। जिसमें सुप्रीमकोर्ट ने मुम्बई हाईकोर्ट द्वारा भ्रष्टाचार के दोषी लोकसेवक की सजा को स्थगित करने पर रोक लगायी थी। सुप्रीमकोर्ट में क्रिमिनल अपील नंबर 1648 (2012) के जरिए महाराष्ट्र सरकार थ्रू सीबीआई एंटी करप्शन ब्रांच मुंबई ने बालाकृष्ण दत्तात्रेय कुंभार के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट द्वारा सजा स्थगन के खिलाफ अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश डॉ. बीएस चौहान ने सुनवाई के बाद इस मामले में दिये अपने आदेश में लिखा है कि यह अपील 8.4.2008 के मुंबई हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ की गयी है।  सेंट्रल एक्साइज के सुपरिटेंडेंट रहे बालाकृष्ण दत्तात्रेय कुंभार के खिलाफ प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1998 में अंडर सेक्शन 13 (2) सेक्शन 13 (1 (ई) में स्पेशल जज सीबीआई द्वारा 15.10.2007 को स्पेशल केस नंबर 93 (2000) (आय से अधिक संपत्ति मामला) में सजा सुनाई गयी थी। लेकिन मुंबई हाईकोर्ट ने 8.4.2008 को अपने फैसले में भ्रष्टाचार के दोषी अफसर के खिलाफ सजा को स्थगित कर दिया था। 1 लाख का जुर्माना तक इस अफसर पर हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश ने अपने फैसले के पैरा नंबर नौ में महाराष्ट्र सरकार बनाम गजानन एआईआर 2004 एससी 1188 केस का हवाला देते हुए कहा कि इस फैसले मंे ठीक इसी तर्ज पर केसी सरीन और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अतर सिंह (2003) 12 एससीसी 434 में भी फैसला सुनाया गया था कि सिर्फ यह तर्क देकर कि अगर आरोप सिद्धि व सजा प्राप्ति को न स्थगित किया गया तो सरकारी सेवक की नौकरी चली जाएगी, किसी की भी सजा को स्थगित नहीं किया जा सकता है। यह बेहद अहम फैसला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण आदेश से भ्रष्ट लोकसेवकों की सजा को हाईकार्ट स्थगित नहीं कर सकता है। लेकिन नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में दोषी आईएएस प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार की अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न सिर्फ 3 वर्ष की सजा स्थगित कर दी बल्कि जुर्माने पर भी रोक लगा दी।

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि अपना कर्ज उतारने के चक्कर में सीबीआई वकील अनुराग खन्ना ने हाईकोर्ट में सीबीआई की तरफ से पैरवी करते हुए न्यायाधीशों को सुप्रीमकोर्ट के इस महत्वपूर्ण आदेश के बारे में बताया ही नहीं। अगर हाईकोर्ट को वास्तव में शीर्ष न्यायपालिका के आदेश  के बारे में बताया जाता, जिसमें भ्रष्टाचार के दोषी सरकारी सेवक की सजा को स्थगित करने के मुंबई हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीमकोर्ट ने रोक लगायी थी तो आज आईएएस राजीव कुमार न सिर्फ जेल की सलाखों के पीछे होते बल्कि प्रमुख सचिव नियुक्ति के मलाईदार पद पर भी न बैठे होते। लेकिन तत्कालीन संयुक्त निदेशक सीबीआई जावीद अहमद व सीबीआई वकील अनुराग खन्ना ने आईएएस राजीव कुमार को नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में जेल जाने से बचाने के लिए हाईकोर्ट से सजा को स्थगित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दरअसल तत्कालीन संयुक्त निदेशक सीबीआई जावीद अहमद ने यूपी के तमाम बड़े घोटालों व मामलों की सीबीआई जांचों को दबाकर भ्रष्टों को बचाने  में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

खासतौर पर हजारों करोड़ का एनआरएचएम घोटाला, खाद्यान्न घोटाला समेत  सूचना विभाग का भर्ती घोटाला, जिसमें प्रमुख रुप से आईएएस संजय अग्रवाल, महेश गुप्ता, बादल चटर्जी, विजय शंकर पाण्डेय, अजय कुमार उपाध्याय, आईएएस विनय कुमार श्रीवास्तव, पूर्व मंत्री अनंत मिश्रा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, देवेंद्र पांडे समेत 11 पीसीएस व कई अफसर-नेता फंसे है। जावीद अहमद ने ही आरूषि हत्याकांड को भी दफन कराने के उच्चस्तरीय प्रयास किए थे। सीबीआई जब तक संयुक्त निदेशक सीबीआई रहे जावीद अहमद के कार्यकाल की व्यापक जांच नहीं करेगी तब तक उत्तरप्रदेश के किसी भी बड़े घोटाले की जांच के अंतिम मुकाम तक पहुंचना मुमकिन नहीं है। वहीं आईएएस राजीव कुमार को बचाने के सीबीआई अफसरों व सीबीआई वकील के षड्यंत्र की गहराई से जांच हाईकोर्ट को इसलिए भी करानी चाहिए क्योंकि यह दो न्यायपालिकाओं के बीच टकराव की स्थिति पैदा करने का बेहद गंभीर प्रकरण भी है।

लखनऊ से पत्रकार मनीष श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

एक चैनल की लव स्टोरी : शादीशुदा कैमरामैन और शादीशुदा एंकर की मोहब्बतें

En dino xxxxxnews channel me ek shadishuda anchor aur ek shadishuda cameraman ki love story charcha ka vishay bani hai. chaliye kahani ki suruat krte hai camera person se. en mahasay ki teen mahine pahle hi shadi hui hai aur aaj kal ye ek shadishuda anchor ke pyar me pagal hai. wo mohtarma jis shift me rehti hai ye mahasay v usi shift me rehte hai. eske baad channel me shuru hoti hai inki mohbbatein.

ye dono studio ke pass maujud ek khali jagay me din bhar aslil harkat krte rhte hai. lekin enhe bolne wala koi nhi hai kyoki ye camara person studio ke incharg hai. isliye inhe koi kuch nhi kehta. ye janab office chhodkar outdoor shoot par kavi nhi jate. itna hi nhi, agar ye dono jab office se bor ho jate hai to filmcity k eek kone me jakar baith jate hai. office to office, pura filmcity inki mohbbat ka gawah bana hua hai. kavi kavi ye log red colour ki car me najar aa jate hai. asal me in mahashay ko ladkiyon ko patane ki maharat hasil hai. isse pahle v ye chnnel ki kai ladkion ko ghuma chuke hai. asal me ye HR ke khas mane jate hai isliye inke sau khoon maff hain.

ab agge bat krte hai shadishuda anchor ki. ye mahila anchor avi kuch dino pahle hi xxxxxnews me join ki hai. lekin inke charche pure filmcity me hai. ye kisi bade banner se nhi aayi hai lekin apne ko aaj tak ki anchor se kam nhi manti. sabse maje ki bat inhe na to anchoring krne aati hai aur na hi koi dusra kam. channel me har koi in mohtarma ke attitude se pareshan hai. chahe wo panel ho ya phr make up artist. ye mohtarma camera person ke pyar me is kadar andhi hai ki inhe kuch nhi dikhai deta. ye mohtarma channel me kab aati hai aur kab jati hai kisi ko pata nhi rehta sivay un camaraman ke. ye office aate hi studio ke pass wale room me ghus jate hai phir suru ho jati hai inki mohbbatein. kehne ko to ye dono shadishuda hai, lekin kaun kehta hai pyar dobara nhi ho sakta….

कानाफूसी कैटगरी की यह रिपोर्ट एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित है.

दैनिक जागरण की आड़ में संतोष ठाकुर बना धन कुबेर

सबसे पहले विष्णु त्रिपाठी और श्रवण गर्ग की टीम को साहस भरी बधाई, निशिकांत ठाकुर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी पर भरपूर प्रहार करने के लिए। यह कारनामा जो इन लोगों ने कर दिखाया है, वह आज तक संजय भईया भी नहीं कर पाए। दरअसल संजय भईया अकेले थे, वे इनका बिकल्प काफी समय से खोज रहे थे, जो उनको अब मिल गए हैं।

ताज्जुब की बात है कि एक अनुभवहीन अनपढ़ आदमी जागरण में रहकर कुछ सालों में ही करोड़ों का आदमी सिर्फ इसलिए बन जाता है कि वह निशिकांत का भाई-भतीजा है या फिर उनके गांव का है। जी हां हम बात कर रहे हैं, फरीदाबाद में तैनात संतोष ठाकुर की। देखने में इतना सीधा लगता है कि मानों कुछ जानता ही न हो। लोगों से इतना मीठा बोलता कि लोग इसके चुंगल में फंस जाते हैं।

संतोष कम पढ़ा लिखा है लेकिन निशिकांत ठाकुर के गांव बिहार का है, इसलिए वे मेहरबान हैं। संतोष फरीदाबाद में पिछले आठ-दस सालों से है। जागरण के विज्ञापन के बिलों में जमकर हेराफेरी कर रहा है। ये सब ब्यूरो चीफ बिजेंद्र बंसल के साथ मिलकर कर रहा है। मौजूदा समय में दोनों के पास दजनों की संख्या में प्लाट और मकान हैं जिनकी कीमत इस वक्त करोड़ों में हैं। संतोष के काम में जो भी दखल देता है, उसकी झूठी शिकायत निशिकांत से करके बाहर करवा देता है।

पूर्व ब्यूरो चीफ जगन्नाथ गौतम व राकेश शर्मा उनके हालिया शिकार बने हैं। संस्थान द्वारा पिछले साल एक तेज तर्रार रिपोर्टर रमेश ठाकुर को फरीदाबाद में तैनात किया गया था, उन्होंने संतोष के कारनामों को उजागर करना चाहा, लेकिन उससे पहले ही संतोष ने निशिकांत को बरगलाकर रमेश को वहां से हटवा दिया। जबकि निशिकांत जी रमेश को बहुत पसंद करते थे। खैर जब से जागरण में भगदड़ मची है तभी से संतोष का रक्तचाप बढ़ा हुआ है। सूत्रों से पता चला है कि अंदरखाने संस्थान की ओर से उनकी चल-अचल संपत्ति की जांच शुरू कर दी है। इसके अलावा बिजेंद्र बंसल, राजीव अग्रवाल, वीके शुक्ला, कैलाश मिश्र की भी जांच शुरू कर दी गई है।

संतोष के कुछ प्लाटों का ज्रिक

-ओजोन सेक्टर, बड़खल के पास तीन बेडरूम का मकान, बाजार भाव लगभग 49 लाख.
-ग्रीन फील्ड कोलोनी में प्लाट, बाजार भाव 56 लाख.
-बीपीटीपी में मकान, बाजार भाव 50 लाख.
-नहर पार में तीन प्लॉट, बाजार भाव करोड़ों में.
-इन सभी मकानों की किस्तें दीपक चोमाल और संजय सैलानी द्वारा भरी जाती हैं.

योगेश कुमार सोनी की रिपोर्ट. संपर्क: 9999907181

निहार रंजन आईनेक्स्ट, लखनऊ के प्रभारी बने, निहाल ने पंजाब केसरी ज्वाइन किया, उदित ने कांपैक्ट छोड़ा

इंदौर नई दुनिया से तबादला होकर आए निहार रंजन सक्‍सेना ने आई-नेक्‍स्‍ट लखनऊ के प्रभारी का पद संभाल लिया है. एक अन्य जानाकारी के मुताबिक अमर उजाला कांपैक्ट से एक विकेट गिर गया है. खबर है कि उदित बर्सले ने नोएडा में कॉम्‍पैक्‍ट की मुख्‍य डेस्‍क से इस्‍तीफा देकर भोपाल में भास्‍कर डॉट कॉम ज्‍वाइन कर लिया है.

पिछले दो वर्षों से हिन्दुस्थान समाचार एजेंसी, दिल्ली में काम कर रहे निहाल सिंह ने पंजाब केसरी (जालंधर) से अपनी नयी पारी की शुरुआत की है. निहाल को पंजाब केसरी में बतौर संवाददाता स्वास्थ्य समाचारों के संकलन की जिम्मेदारी दी गयी है. एजेंसी के एक वरिष्ठ संवाददाता और उनके साथ दो अन्य संवाददाताओं ने भी प्रबंधन को अगले दो महीने में संस्थान छोड़कर जाने की नोटिस दे रखी है.

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चापलूसी की हद, शिवपाल के चरणों में इटावा प्रशासन, रिपोर्टर को धमकी (देखें तस्वीरें)

इटावा : अपना नंबर बढाने के लिए पुलिस अधिकारी किस कदर नेताओं की चापलूसी में लगे हैं, इसकी बानगी एक बार फिर देखने को मिली। इस बार जगह थी मुख्यमंत्री का गृहजनपद इटावा। हेलीकॉप्टर से इटावा पहुंचे कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव जैसे ही नीचे उतरे वैसे ही जनपद के एएसपी ऋषिपाल सिंह और सिटी मजिस्ट्रेट शारदा प्रसाद यादव कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव की चरण वंदना करते नज़र आए।

इसे चापलूसी की हद नहीं तो और क्या कहेंगे। समाचार प्लस पर अधिकारियों की चापलूसी की खबर दिखाए जाने के बाद समाचार प्लस इटावा संवाददाता मनोज दुबे के पास एक फोन आया जिसमें उन्हें इटावा में न रहने देने और जान से मारने की धमकी भी मिली।


मीडिया, शासन-प्रशासन, राजनीति की ऐसी खबरें जिसे अखबार वाले न छाप पाते हों, चैनल वाले न दिखा पातें हो, उसे भड़ास तक पहुंचाएं. bhadas4media@gmail.com पर मेल करें. खबर भेजने वाले का नाम पता पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

आईएएस दुर्गा के लिए आवाज उठाइए पर पत्रकार धनंजय को मत भूल जाइए

Yashwant Singh : दुर्गा शक्ति नागपाल आईएएस हैं, इसलिए उनकी ईमानदारी और उनका सस्पेंसन बड़ा मसला बन जाता है.. पर जब किसी जिले का एक स्ट्रिंगर, जो संसाधन विहीन होता है, सुविधा विहीन होता है, अपने जान पर खेल कर मंत्री व आईपीएस के गलत आचरण की पोल खोलता है और इसके एवज में अपने उपर फर्जी मुकदमें लदा पाता है तो उसके लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं होता.. संपादकों की संस्थाएं, मालिकों की संस्थाएं, प्रेस काउंसिल आदि दिल्ली मुंबई के बड़े पत्रकारों-संपादकों के दुखों या बड़े मीडिया हाउसों के दुखों पर तुरंत रिएक्ट करती हैं, चौथे खंभा पर हमला बताती हैं लेकिन इन धनंजय सिंह भदौरिया जैसे सामान्य पत्रकार पर हो रहे अन्याय के खिलाफ कौन बोलेगा…

शिवपाल यूपी सरकार में ताकतवर मंत्री हैं, एटा का जो एसएसपी है वह भी सत्ता से संरक्षित है… अब अगर ये लोग किसी स्ट्रिंगर को बर्बाद करने पर लग जाएं तो कितना मिनट लगेगा… धनंजय सिंह भदौरिया उन लोगों को भी पेश कर चुके हैं जिन लोगों को आगे कर उनके खिलाफ मुकदमें दर्ज कराए गए… जिन्हें पीड़ित बताया है पुलिस ने उन लोगों ने लिखकर दे दिया है कि वे कतई पीड़ित नहीं हैं, बल्कि पुलिस वालों ने उन्हें सरकारी पैसे मिलने के प्रलोभन में सादे कागजों पर साइन कराया था… तब भी धनंजय सिंह भदौरिया पर से मुकदमा हटा नहीं है.. धनंजय ने मुझे कथित पीड़ितों के बयान वीडियो फार्मेंट में, डाक्यूमेंट्स, शपथ पत्र आदि मेल से अटैच करके भेजा है… उसे प्रकाशित करा दिया है..

पर सिर्फ भड़ास पर छप जाने से काम नहीं चलने वाला.. इसे यूपी में जंगल राज के खौफनाक मंजर के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके शिकार कभी हम होते हैं तो कभी आप, कभी दुर्गा होती हैं तो कभी धनंजय होते हैं… इन निकम्मे, जाहिलों, जनविरोधी नेताओं व अफसरों को अब ठीक से सबक सिखाने का वक्त आ गया है… धरती वीरों से खाली नहीं है.. जरूर इन्हें इनके किए की सजा प्रकृति इन्हें हमारे आपके आंखों के सामने ही देगी…

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप धनंजय के साथ सत्ता-सिस्टम द्वारा किए जा रहे अन्याय के बारे में विस्तार से जान-समझ सकते हैं…

मंत्री शिवपाल और आईपीएस अजय मोहन की पोल खोलने वाले पत्रकार पर फर्जी मुकदमें

http://bhadas4media.com/article-comment/13388-2013-07-29-13-32-38.html


भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

पंचकूला में करोड़ों के प्लाट मुख्यमंत्री हुडडा के चहेतों को मिट्टी के भाव, इनेलो ने कहा लुटा देंगे हरियाणा को

चंडीगढ़ : इनेलो ने मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर अपने चहेतों व करीबी लोगों को पंचकूला में औद्योगिक प्लॉट दिए जाने की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री सत्ता से जाते-जाते अपने करीबी लोगों को मालामाल करने व चहेतों को प्लॉटों की रेवडिय़ां बांटने में लगे हुए हैं।

इनेलो के प्रदेश संगठन सचिव व कलायत के विधायक रामपाल माजरा ने हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण द्वारा इसी महीने 2 जुलाई को पंचकूला में अलॉट किए गए औद्योगिक प्लॉटों को पाने वालों की सूची जारी करते हुए कहा कि प्लॉट पाने वालों में मुख्यमंत्री के ओएसडी, मुख्यमंत्री के सचिव, हरियाणा के अतिरिक्त महाधिवक्ता, वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता, एक पूर्व कांग्रेस विधायक का बेटा, मुख्यमंत्री के समधि के करीबी लोग और एक विश्वविद्यालय के कुलपति के पारिवारिक सदस्य भी शामिल हैं।

श्री माजरा ने कहा कि हुड्डा द्वारा इन प्रभावशाली लोगों को ये औद्योगिक प्लॉट कौडिय़ों के भाव दिए गए हैं और जिसके बाजार मूल्य और अलॉटमेंट मूल्य में करोड़ों रुपए का अंतर है जिससे मु यमंत्री ने अपने चहेतों को करोड़ों का फायदा पहुंचाया है। पत्रकार स मेलन में इनेलो के राष्ट्रीय महासचिव आरएस चौधरी, कालका के विधायक प्रदीप चौधरी, प्रदेश महासचिव अशोक शेरवाल, पूर्व डीजीपी एमएस मलिक व पार्टी के मीडिया प्रभारी राम सिंह बराड़ भी मौजूद थे।

श्री माजरा ने कहा कि मुख्यमंत्री जो कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (हुडा) के चेयरमैन भी हैं, की मंजूरी के बाद 2 जुलाई को पंचकूला में 14 औद्योगिक प्लॉट अलॉट किए गए। उन्होंने कहा कि प्लॉट पाने वालों में मुख्यमंत्री के ओएसडी बीआर बेरी की पुत्रवधू श्रीमती मोना बेरी, मुख्यमंत्री के सचिव सिंह राम का बेटा प्रदीप कुमार, थानेसर के पूर्व कांगे्रस विधायक रमेश गुप्ता के बेटे अमन गुप्ता, हरियाणा के वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता एवं मुख्यमंत्री के बेहद करीबी नरेंद्र हुड्डा की पत्नी नंदिता हुड्डा व हरियाणा के अतिरिक्त महाधिवक्ता प्रभजीत सिंह की पत्नी श्रीमती मनजोत कौर भी शामिल हैं।

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री के बेहद करीबी व हरियाणा के सीनियर डिप्टी एडवोकेट जनरल एवं रोहतक निवासी सुनील कत्याल के पारिवारिक सदस्य डागर कत्याल, मुख्यमंत्री के करीबी संजीव भारद्वाज के बेटे सिद्धार्थ भारद्वाज, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल डीडीएस संधू के पारिवारिक सदस्य कंवरप्रीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री के समधी एवं पूर्व मंत्री करण सिंह दलाल के रिश्तेदार लेफ्टिनेंट कर्नल ओपी दहिया और मुख्यमंत्री के बेहद करीबी परिवार की सदस्य सेक्टर-28 निवासी श्रीमती रेणू हुड्डा भी शामिल हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री के एक अन्य करीबी मित्र जो पीजीआई से रिटायरमेंट लेकर आजकल प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं, डॉ. गणेश दत्त भी प्लॉट पाने वालों में शामिल हैं।
श्री माजरा ने कहा कि हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण की ओर से जो कुल 14 प्लॉट अलॉट किए गए हैं उनमें बाकी तीन प्लॉट भी पाने वालों में मुख्यमंत्री के करीबी लोग शामिल हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के ओएसडी बीआर बेरी न सिर्फ रिटायरमेंट के बाद भी अपने पद पर जमे हुए हैं बल्कि उनकी पुत्रवधू को औद्योगिक प्लॉट भी दे दिया गया है। उन्होंने कहा कि हरियाणा के वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता नरेंद्र हुड्डा की पत्नी पंचकूला के साथ लगते मोरनी रोड पर स्थित शानदार होटल गोल्डन ट्यूलिप की भी मालिक बताई जाती हैं और यह परिवार भी मुख्यमंत्री के बेहद करीबी लोगों में है। श्री माजरा ने मुख्यमंत्री द्वारा अपने चहेतों को की गई औद्योगिक प्लॉटों की बंदरबांट की तीखी आलोचना करते हुए यह अलॉटमेंट तुरंत रद्द किए जाने की मांग की।

प्रदेश टुडे : रीलांच या लोकापर्ण

मध्य प्रदेश से प्रकाशित होने वाले शाम से अखबार प्रदेश टुडे को लेकर लोगों के मन में शंकाएं हो गई हैं। अखबार का ग्वालियर से एडीशन 31 जुलाई को शुरु होने वाला है। लेकिन भोपाल में प्रचार किया जा रहा है कि ग्वालियर एडीएशन की रीलांचिग की जा रही है। इसकी सूचना बाकायदा अखबार में विज्ञापन प्रकाशित करके दी गई है। ऐसे में लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि ग्वालियर एडीशन रीलांच हो रहा है या फिर उसकी ग्वालियर में लांचिंग हो रही है।

ग्वालियर में जो होर्डिंग लगाए गए हैं वे कह रहे हैं कि ग्वालियर में इसका लोकापर्ण किया जा रहा है पर भोपाल में कहा जा रहा है कि इसकी रीलांचिंग होने वाली है। ग्वालियर प्रदेश टुडे में वे सभी लोग एंट्री पा गए हैं जिन्हें या तो नईदुनिया से भगाया गया या फिर वे पिछलग्गू बनकर खुद ही भाग। संपादक से लेकर रिपोर्टर की टीम ऐसे लोगों से भरी पड़ी है। नईदुनिया के कुछ लोग वहां पार्ट टाइम नौकरी करने भी पहुंच गए हैं। यह बात नईदुनिया प्रबंधन के कानों तक पहुंच गई है। सबसे अहम बात यह है कि प्रदेश टुडे में अखबारों की समीक्षा का जो कालम छपता है, उसमें प्रदेश टुडे की टीम नईदुनिया के खिलाफ ही भड़ास निकलने में व्यस्त है। ऐसे में देखना यह है कि इनकी यह भड़ास कब तक पूरी होती है।

गरीबी के आंकड़े पर फंसी सरकार को आने लगा है गुस्सा!

योजना आयोग के चर्चित गरीबी के नए आंकड़े ने केंद्र सरकार की काफी किरकिरी करा दी है। इस मुद्दे पर अपनों ने भी योजना आयोग पर गुस्सा उतारना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के अंदर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया को लेकर अंदर ही अंदर काफी गुस्सा बढ़ा है। आहलुवालिया का नाम लिए बगैर पार्टी के कई दिग्गजों ने योजना आयोग की इस नई ‘बाजीगीरी’ को कोसना शुरू कर दिया है। यहां तक कि पार्टी के चर्चित महासचिव दिग्विजय सिंह को भी आयोग के दावे हजम नहीं हो रहे हैं। उन्होंने खुलकर कह दिया है कि गरीबी के ताजा आंकड़े उन्हें भी समझ में नहीं आ रहे हैं।

5 अगस्त से संसद का सत्र शुरू होने जा रहा है। सत्र शुरू होने के महज कुछ दिन पहले ही उठे इस विवाद से पार्टी के रणनीतिकार काफी हलकान होने लगे हैं। राजनीतिक माहौल को देखते हुए सरकार ने भी इस मामले में किनारा करने का विकल्प चुन लिया है। हालांकि, केंद्रीय योजना राज्यमंत्री राजीव शुक्ला ने इस मुद्दे पर सरकार का यह कहते हुए बचाव किया है कि गरीबी के ताजा आंकडे से सरकार का कोई सीधा रिश्ता नहीं है। क्योंकि, यह आंकड़ा योजना आयोग ने जारी किया है। इस पर अभी सरकार ने कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। ऐसे में, जो लोग इस मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, यह बात कुछ ठीक नहीं लगती। शुक्ला का दावा है कि सरकार ने पहले ही सुरेश तेंदुलकर समिति के फॉर्मूले से बनाए गरीबी के आंकड़े को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में, दो साल पहले ही गरीबी का आकलन करने के लिए रंगराजन समिति बना दी गई थी। इस समिति की रिपोर्ट अगले साल आने वाली है। इसका सरकार को इंतजार है। ऐसे में, बेवजह इस मामले को तूल देने की जरूरत नहीं है।

दरअसल, मंगलवार को योजना आयोग ने आंकड़ा जारी करके यह जानकारी दी थी कि देश में गरीबों की संख्या तेजी से घटी है। अप्रत्यक्ष रूप से यह जताने की कोशिश की गई कि यूपीए सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के चलते तेजी से गरीबी उन्मूलन हुआ है। जाहिर है कि इस तरह के सुहावने आंकड़े से रणनीतिकारों को उम्मीद रही होगी कि इससे राजनीतिक रूप से सरकार की वाहवाही होगी। शुरुआती तौर पर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता इस आंकड़े को लेकर काफी उतावले भी हो गए थे। कई नेताओं ने सरकार और पार्टी की अतिरिक्त ‘वफादारी’ में कई ऐसे बोल बोल दिए, जिनसे पार्टी की काफी फजीहत हुई है।

उल्लेखनीय है कि पार्टी के सांसद राज बब्बर ने दावा किया था कि खाने-पीने की चीजों में महंगाई उतनी नहीं बढ़ी, जितने का स्यापा किया जा रहा है। अभिनेता से सांसद बने बब्बर ने यह दावा किया था कि आज भी मुंबई जैसे महंगे शहर में किसी को 12 रुपए में भरपेट खाना मिल जाता है। इसी प्रकरण में पूर्व केंद्रीय मंत्री रसीद मसूद ने कह डाला कि दिल्ली में तो 5 रुपए में ही खाना मिल जाता है। दावेदारी के इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला यहां तक बोल गए कि खाना तो 1 रुपए में भी मिल जाता है। इस तरह के बड़बोले बयानों ने जैसे जख्म में मिर्च का काम कर दिया। पूरे देश में आम जनता से लेकर मीडिया और विपक्ष ने इन बयानों की जमकर खबर ली।

खास तौर पर टीवी मीडिया ने यह दर्शाने की कोशिश की कि देशभर में कांग्रेस के दफ्तरों में भी खाने की थाली कहीं 40-50 रुपए से कम में नहीं मिलती। 5 रुपए में तो मुश्किल से एक कप चाय ही मिल पाती है। जगह-जगह लोगों ने टीवी न्यूज चैनलों के कैमरों पर सरकार को कोसा। यही कहा कि 5 रुपए और 1 रुपए में खाना मिलने की बात कहकर नेतागण गरीबों के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं। इस मामले में दांव उल्टा पड़ते देखकर कांग्रेस नेतृत्व ने अपने नेताओं के इन बयानों से खुद को अलग कर लिया। बाद में, जब बयानों की ज्यादा धुनाई-पिटाई शुरू हुई, तो राज बब्बर जैसे नेताओं ने अपने बयान के लिए माफी मांग ली। रसीद मसूद बोले कि उनकी बात को सही ढंग से नहीं समझा गया। इसीलिए, वे अपने बयान पर खेद जताते हैं।

इस माफीनामे के बावजूद महंगाई और गरीबी के मुद्दे पर लोगों का गुस्सा काफी बढ़ चला है। लोगों के इस गुस्सैल तेवर को देखते हुए कांग्रेस के कई रणनीतिकार ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए आगे आ गए हैं। केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने भी गरीबी के आंकड़े के मामले में योजना आयोग की रीति-नीति पर सवाल उठा दिए हैं। उन्होंने कहा है कि अभी तक यही तय नहीं हो पाया कि आखिर गरीबी का वास्तविक मापदंड क्या है? जब बात हुई थी कि गरीबी के विभिन्न पहलुओं का आकलन करने के बाद रंगराजन समिति नया आंकड़ा तैयार करेगी, तो फिर जल्दबाजी क्यों की गई? सिब्बल ने बगैर नाम लिए योजना आयोग के कर्ताधर्ताओं पर नाराजगी जताई है। उन्होंने याद दिलाया कि दो साल पहले भी इसी मुद्दे पर आयोग ने सरकार की फजीहत करा दी थी। इसके बाद फिर वही गलती कैसे की गई?

योजना आयोग के सूत्रों के अनुसार, गरीबी के आंकड़े को लेकर जितना राजनीतिक बवाल मचा है, उसको लेकर आहलुवालिया भी काफी दुखी हैं। अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने योजना भवन में अपने सहयोगियों से यही कहा है कि नेताओं की आलोचनाओं से टीम को ज्यादा डरने-घबराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि, तेंदुलकर फॉर्मूले से गरीबी का नया आंकड़ा देकर योजना आयोग ने कोई अपराध नहीं किया है। सिर्फ यह बताने की कोशिश की है कि तीन सालों में गरीबी के मोर्चे पर क्या तस्वीर बनी है?

कांग्रेस नेतृत्व की सबसे बड़ी मुश्किल यह बढ़ गई है कि इस मुद्दे पर सरकार के सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस ने काफी नाराजगी वाले तेवर अपना लिए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने खुलकर कह दिया है कि उनकी पार्टी को टीम आहलुवालिया का यह आंकड़ा स्वीकार्य नहीं है। क्योंकि, इससे सरासर एक गलत राजनीतिक संदेश जाने का खतरा पैदा हो गया है। सीपीएम के वरिष्ठ नेता मोहम्मद सलीम का मानना है कि सरकार गरीबी के इस मामले में राजनीतिक ढोंग ज्यादा कर रही है। पहले तो एक सुनियोजित रणनीति के तहत आयोग से आंकड़ा जारी कराया गया, ताकि नई तस्वीर को लेकर सरकार की वाहवाही कराई जा सके। जब खेल उल्टा पड़ गया, तो सरकार ने चालाकी दिखाते हुए इस काम की जिम्मेदारी  योजना आयोग पर डाल दी। अब तो सरकार के मंत्री भी आयोग के आंकड़े पर असहमति जता रहे हैं। दरअसल, यह सब कांग्रेस का राजनीतिक ढोंगभर है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने लंबे समय बाद सरकार के खिलाफ मुंह खोला है। उन्होंने इस मुद्दे पर यही कहा है कि सस्ती लोकप्रियता बटोरने के चक्कर में कांग्रेस ने योजना आयोग को हथियार बनाकर गरीबों के साथ भद्दा मजाक किया है। इसे लोग माफ नहीं कर सकते। भाजपा नेतृत्व ने रणनीति बनाई है कि यह मामला संसद के दोनों सदनों में उठाया जाए। सरकार से यह पूछा जाएगा कि आखिर योजना आयोग ने किसके इशारे पर तेंदुलकर समिति फॉर्मूले के आधार पर गरीबी का आधा-अधूरा आंकड़ा जारी किया? जबकि, संसद की अनुमति से ही इस काम के लिए रंगराजन समिति बना दी गई थी। इस मुद्दे को लेकर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव भी खफा बताए जा रहे हैं। हालांकि, औपचारिक तौर पर उन्होंने सरकार के खिलाफ कोई तीखी टिप्पणी अब तक नहीं की है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे पर ‘डेमेज कंट्रोल’ के लिए सक्रिय हो गया है। इसी के चलते सरकार ने इस विवाद से अपने को अलग करने की कोशिश की है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कल यहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्षों और विधानसभा के नेताओं के साथ बैठक की थी। इसमें भी गरीबी के आंकड़े वाले मामले में चर्चा हुई थी। कई नेताओं ने अपनी राय बताई कि महंगाई से जुडेÞ मुद्दों पर यदि सावधानीपूर्वक बयान नहीं दिए गए, तो पार्टी के लिए दांव उल्टा पड़ सकता है। क्योंकि, महंगाई को लेकर लोग इतने गुस्से में हैं कि उन्हें छोटी सी भी बेतुकी बात से काफी तकलीफ हो जाती है।

कोशिश की जा रही है कि संसद सत्र शुरू होने के पहले ही यह राजनीतिक विवाद एकदम ठंडा करा दिया जाए। केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कह भी दिया है कि इस मुद्दे को लेकर बहस बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं रह गया है। अच्छा यही रहेगा कि लोग गरीबी पर रंगराजन समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर लें। उनका दावा है कि मनरेगा जैसी तमाम कल्याणकारी योजनाओं से बड़े पैमाने पर गरीबी उन्मूलन हुआ है। खाद्यान्न सुरक्षा गारंटी के नए कानून से गरीबी के मोर्चे पर बड़ी जीत मिलने वाली है। शायद, सरकार की इस ‘गेम चेंजर’ योजना को लेकर विपक्ष ज्यादा बेचैन है। हो सकता है कि इसी की वजह से छोटी से बात पर भी बतंगड़ खड़ा करने की कोशिश होती है। लेकिन, ऐसे गैर-जिम्मेदार राजनीतिक तौर-तरीको से देश का भला नहीं हो सकता।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

शिविर में सैकड़ों पत्रकारों के लर्निंग लाइसेंस बने और वाहन प्रदूषण की जांच हुई

दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन और इंद्रप्रस्थ प्रेस क्लब आफ इंडिया द्वारा आईपी डिपो स्थित परिवहन कार्यालय में वाहन प्रदूषण की जांच और ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के लिए एक शिविर लगाया गया. ड्राइविंग लाइसेंस कैंप का उद्घघाटन दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने किया. इस अवसर पर दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष डा. योगानन्द शास्त्री और दिल्ली के परिवहन मंत्री श्री रमाकांत गोस्वामी भी उपस्थित थे. शिविर में 250 से अधिक पत्रकारों के लर्निग लाइसेंस बनाए गए और 150 वाहनों की प्रदूषण की जांच की गई.

दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज वर्मा ने बताया कि दिल्ली में युवा पत्रकारों का एक बड़ा तबका है जो रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों से यहां आए हैं. ऐसे में उनके लिए ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना एक मुश्किल भरा और भागदौड़ वाला काम होता है. इसी के मद्देनजर यह शिविर लगाया गया. इंद्रप्रस्थ प्रेस क्लब के अध्यक्ष नरेंद्र भंडारी के मुताबिक दिल्ली के परिवहन विभाग के सहयोग से पत्रकारों के लिए एक ही छत के नीचें लाइसेंस बनाने की सभी सुविधाएं मुहैया कराई गईं और उन्हें हाथों हाथ लर्निंग लाइसेंस दे दिया गया. परिवहन विभाग द्वारा लगाए गए इस शिविर में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने तथा जानकारी के लिए भारी संख्या में पत्रकारों ने हिस्सा लिया.

शिविर में आने वाले लोगों को परिवहन कार्यालय के कर्मचारियों और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन व इंद्रप्रस्थ प्रेस क्लब की टीम ने लाइसेंस बनवाने के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी उपलब्ध कराई. शिविर में लाइसेंस संबंधित लोगों को फार्म दिए गए तथा समस्त कागजात की जांच के बाद लाइसेंस बनाने की प्रक्रिया को पूरा कराया गया. कैंप में पहुंचे पत्रकारों को जानकारी उपलब्ध कराई गई तथा लोगों ने प्रक्रिया पूरी करने के बाद लाइसेंस बनवाए. कैंप में करीब 250 से अधिक पत्रकारों का लाइसेंस बनाए गए, जिसमें महिलाएं और युवतियां भी शामिल रही. इस अवसर पर इद्रप्रस्थ क्लब के संरक्षक श्री मनोज मिश्रा, अध्यक्ष श्री नरेन्द्र भंडारी, सचिव श्रीमती अंजली भाटिया और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज वर्मा और महासचिव अनिल पांडेय के अलावा नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स के पूर्व कोषाध्यक्ष मनोहर सिंह भी मौजूद थे.

प्रेस विज्ञप्ति

पत्रकार मुन्ने भारती को दिल्ली पुलिस के अफसरों ने सम्मानित किया

Munne Bharti : दिल्ली स्पेशल कमिश्नर पुलिस कानून व्यवस्था दीपक मिश्रा और अतिरिक्त पुलिस आयुक्ता अजय चौधरी सहित सीनियर पुलिस अफसर ने साउथ ईस्ट पुलिस द्वारा ईस्ट ऑफ़ कैलाश स्थित चन्द्रकला ऑडिटोरियम में आयोजित युवा समारोह में मुझे पत्रकार के साथ समाज सेवा करने के लिए अवॉर्ड दिया गया है..

मेरी खुदा से दुआ है कि ख़िदमत ए खलक़ (समाज सेवा) के लिए हिम्मत दे, ताकि मै अपनी इस दुनियावी ज़िंदगी में दूसरों के काम हमेशा आता रहूँ… मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ अतिरिक्त पुलिस आयुक्ता अजय चौधरी साहब के साथ डॉक्टर जॉय तिर्केय, गौरव शर्मा आईपीएस, दिल्ली स्पेशल कमिश्नर पुलिस कानून व्यवस्था दीपक मिश्रा, सहित साउथ ईस्ट पुलिस का जिन्होंने मुझे इस काबिल समझा…

मुन्ने भारती के फेसबुक वॉल से.

किरण बेदी ने राजदीप और उनके चैनल की गलती की तरफ इशारा किया, राजदीप ने शालीनता से गलती सुधारी

Vineet Kumar : आज के शो में किरण बेदी ने जितने आवेश में राजदीप सरदेसाई और उनके चैनल की गलती की तरफ इशारा किया, राजदीप ने उतनी ही शालीनता से अपनी गलती सुधारी..उनका ये अंदाज अच्छा लगा. दरअसल राजदीप और सीएनएन-आइबीएन अधिकारी की जिम्मेदारी को बार-बार आदर्श बताते आ रहे हैं.( शायद आगे अब न करें.) शो खत्म ही होनेवाला था कि किरण बेदी ने टोका- राजदीप,यू एंड योर चैनल ऑल्वेज यूज द वर्ड आइडियलिस्टिक, इट्स नॉट द इश्यू ऑफ टू वी आइडियलिस्टक ऑर समथिंग एल्स, इट्स द इश्यू ऑप द ड्यूटी.करेक्ट इट फस्ट. राजदीप ने न कवेल इसके लिए सॉरी कहा बल्कि उस पंक्ति को दोबारा सुधारकर आइडियलिस्टिक की जगह ड्यूटी शब्द का इस्तेमाल किया.

दरअसल ड्यूटी की जगह जैसे ही हम आइडियलॉजी या आइडियलिस्टिक शब्द का इस्तेमाल करते हैं, वैसे ही हम ये अर्थ प्रसारित करना चाहते हैं कि ये व्यावहारिक नहीं है जबकि सच्चाई ये है कि अगर ड्यूटी करना, अपनी ड्यूटी समझना ही व्यावहारिक नहीं है तो फिर सिस्टम के दुरुस्त होने की संभावना का क्या होगा ? अच्छा है, न्यूज चैनलों में इस तरह से एक के बाद एक शब्द रिप्लेस करके मनमाने शब्द प्रयोग करके अर्थ रिड्यूस किए जाते हैं, उन पर वक्त-वेवक्त रोक-टोक होती रहे.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

डीडी न्यूज देखकर लग रहा है कि आज वहां के एंकर रिवायटल खाकर बैठे हैं

Vineet Kumar : डीडी न्यूज देखकर लग रहा है कि आज वहां के एंकर रिवायटल खाकर बैठे हैं. इतना धारदार अंदाज मैंने दूरदर्शन को पिछले दो-तीन सालों में कभी नहीं देखा. संजीव श्रीवास्तव से लेकर उनके बाद के एंकर इतने उत्साह और निष्पक्ष दिखने की कोशिश में चर्चा कर रहे हैं कि जैसे ये चैनल सरकार के बिना किसी दवाब में काम करता है. दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन मामले में अखिलेश यादव सरकार की जमकर धज्जियां उड़ा रहे हैं..

यकीन मानिए, आज की तरह अगर डीडी का अंदाज आगे भी रहा तो मैं तो बाकी के चैनल देखना छोड़ दूंगा. लेकिन जैसे ही मामला कांग्रेस पर आकर अटकता, ऐंई,वंई शुरु हो जाता. भला हो एनडीटीवी इंडिया के भूतपूर्व विजय त्रिवेदी का जो कांग्रेस के संदर्भों को भी शामल कर रहे थे और बता रहे थे कि आज अगर अखिलेश यादव की जगह कांग्रेस के अखिलेश प्रताप सिंह आ जाएं तो स्थिति बदल नहीं जाएगी..असल चीज है कि ये अधिकारी स्वयं कितना विरोध करते हैं. अच्छा लगा कि इस जोश में राजेश जोशी की कविता की एक पंक्ति भी बोल गए- जो सच बोलेंगे, वो मारे जाएंगे.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

आईएएस दुर्गा के सस्पेंसन पर आईपीएस अमिताभ ठाकुर की कविता शासन को आइना दिखाती है

Braj Bhushan Dubey : आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्‍बन पर भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्‍ठ अधिकारी श्री अमिताभ ठाकुर के द्वारा लिखी गयी ये कविता वाकई झकझोर देने वाली है। यह कविता विधि की मर्यादा के प्रतिकूल किये गये निलम्‍बन पर शासन को आइना दिखाती है, एक झन्‍नाटेदार थप्‍पड चलाती है, दुर्गा जैसी अधिकारियों को और करती है मजबूत, दूसरी तरफ बन्‍द हों शासन के ऐसे गन्‍दे दस्‍तूर।

श्री अमिताभ जी इस प्रकार के अकेले भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं जो निर्भीक होकर पारिवार के साथ सही को सही व गलत को गलत कहने का साहस रखते हैं। अमिताभ जी द्वारा लिखित कविता ये है…

जय दुर्गा

    अरे ठीक है
    कि एक दिन
    बहाल मैं
    हो जाउंगी,
    दो दर्द
    मुझे मिला
    क्या भूल
    उसका पाउंगी.
    गुनाह था
    क्या मेरा
    मुझको भी
    चले पता,
    आगे कभी
    दुबारा
    उसको तो
    ना दुहराउंगी.
    कहते थे
    सारे साथी
    अब न्याय
    तुझको करना,
    क्या झूठ
    थीं वे बातें
    क्या मुझको
    था बहलाया.
    इतना तो
    सोच रखा,
    इस जिंदगी
    में अब,
    किसी और
    को ये दुर्गा
    गलत ना
    सताएगी.

(अमिताभ ठाकुर)


आम आदमी पार्टी के गाजीपुर जिलाध्यक्ष ब्रज भूषण दुबे के फेसबुक वॉल से.

 

दुर्गा के निलंबन से मैं निजी तौर पर आहत और तकलीफजदा हूं : आईपीएस अमिताभ ठाकुर

Amitabh Thakur : I feel personally immensely pained at the suspension of young and dynamic IAS officer Ms Durga Shakti Nagpal. Yes, she will get reinstated sooner or later but the scar will be permanent and its impact on other IAS, IPS officers far-reaching.

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युवा और उत्साही आईएएस अफसर सुश्री दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन पर व्यक्तिगत स्तर पर ह्रदय से आहत और तकलीफजदा हूँ. यह सही है कि वह आज नहीं तो कल बहाल हो जायेगी पर इसके निशान लंबे समय तक रहेंगे और यह दूसरे आईएएस, आईपीएस अफसरों के लिए भी एक नजीर के रूप में काम करेगा.

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     जय दुर्गा

    अरे ठीक है
    कि एक दिन
    बहाल मैं
    हो जाउंगी,
    दो दर्द
    मुझे मिला
    क्या भूल
    उसका पाउंगी.
    गुनाह था
    क्या मेरा
    मुझको भी
    चले पता,
    आगे कभी
    दुबारा
    उसको तो
    ना दुहराउंगी.
    कहते थे
    सारे साथी
    अब न्याय
    तुझको करना,
    क्या झूठ
    थीं वे बातें
    क्या मुझको
    था बहलाया.
    इतना तो
    सोच रखा,
    इस जिंदगी
    में अब,
    किसी और
    को ये दुर्गा
    गलत ना
    सताएगी.

उपरोक्त टिप्पणी और कविता आईपीएस अमिताभ ठाकुर के फेसबुक वॉल से.

दुर्गा शक्ति नागपाल का निलंबन वापस लेने की तैयारी में अखिलेश सरकार

सूत्रों से आ रही खबर के अनुसार अखिलेश सरकार युवा आईएएस ऑफिसर दुर्गा श‌क्ति नागपाल का निलंबन वापस लेने की तैयारी में है। ऐसा आईएएस एसोसिएशन के भारी दबाव को चलते हो रहा है। गौरतलब हो कि विगत शनिवार को देर रात खनन माफियाओं के खिलाफ अभियान चलाकर सुर्खियों में आईं दुर्गा शक्ति नागपाल को अखिलेश सरकार ने निलंबित कर दिया था जिसके बाद आईएएस अधिकारियों में काफी ज्यादा रोष और गुस्सा था।

इस संदर्भ में आज आईएएस एसोसिएशन के सदस्यों ने आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष और कार्यवाहक मुख सचिव अलोक रंजन से मुलाक़ात की और युवा आईएएस ऑफिसर दुर्गा श‌क्ति नागपाल के निलंबन पर गहरी नाराजगी जताई। ऐसा माना जा रहा है कि आईएएस एसोसिएशन की गहरी नाराजगी के बाद अब अखिलेश सरकार आईएएस ऑफिसर दुर्गा श‌क्ति नागपाल के निलंबन को वापस लेने की तैयारी कर रही है।

लखनऊ से अनुराग मिश्रा की रिपोर्ट.

इसी सपा सरकार ने रामपुर में इस्लामिक मदरसे को बुलडोजर से गिराया और संचालक को जेल भेज दिया

Kanwal Bharti : उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार ने नोएडा में आईएस ऑफिसर दुर्गाशक्ति नागपाल को निलम्बित करने का कारण यह बताया है कि उन्होंने रमजान के महीने में एक मस्जिद का निर्माण गिरवा दिया था, जो अवैध रूप से सरकारी ज़मीन पर बनायी जा रही थी. लेकिन रामपुर में रमजान के महीने में ही जिला प्रशासन ने एक सालों पुराने इस्लामिक मदरसे को बुलडोज़र चलवाकर गिरवा दिया और विरोध करने पर मदरसा संचालक को जेल भिजवा दिया.

पर अभी तक किसी भी ऑफिसर को समाजवादी अखिलेश सरकार ने न निलम्बित किया है और न हटाया है. जानते हैं क्यों? क्योंकि यहाँ अखिलेश का नहीं, आज़म खां का राज चलता है. वह रमजान में मदरसा गिरवा सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं. उनको रोकने की मजाल तो खुदा में भी नहीं है.

प्रख्यात दलित साहित्यकार और चिंतक कंवल भारती के फेसबुक वॉल से.

मंत्री शिवपाल और आईपीएस अजय मोहन की पोल खोलने वाले पत्रकार पर फर्जी मुकदमें

मैं धनंजय सिंह भदौरिया, समाचार प्लस न्यूज चैनल का एटा का संवाददाता हूं। प्रार्थी ने 9 अगस्त 2012 को उत्तर प्रदेश के मंत्री  शिवपाल यादव की खबर "चोरी करो डकैती नहीं" चलाई थी. इसके बाद एटा के एसएसपी अजय मोहन शर्मा द्वारा सपा के महासचिव रामगोपाल यादव के पैर छूते की खबर 24-1-2013 को दिखाई थी।

इन दोनों खबरों से बौखलाकर सपा नेताओं के इशारे पर मुझे झूठे मुक़दमे में फंसाकर मुझे सबक सिखाने की योजना एटा के एसएसपी अजय मोहन शर्मा ने बनाई थी। ये महोदय रामगोपाल यादव की कृपा से आज भी एटा के एसएसपी हैं। मैंने 10-8-2012 को ही भारत सरकार के गृह मंत्री को एक टेलीग्राम किया था जिसमें यह आशंका जताई थी कि मेरी खबर से मंत्री शिवपाल यादव और यूपी सरकार के पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता बौखलाकर मुझे झूठे मुकदमों में फसा सकते हैं।

मेरी आशंका के अनुसार ही एसएसपी एटा अजय मोहन शर्मा ने उक्त सपा नेताओं के इशारे पर मेरे खिलाफ एटा जनपद में दो दिन में दो फर्जी मुक़दमे दर्ज करा दिए। पहला मुकदमा 27 जून को कोतवाली नगर एटा में धारा 406 /420 /504 /506 अपराध संख्या 434 राज सिंह पुत्र देवी सिंह निवासी नगला सेवा थाना कोतवाली देहात जनपद एटा से कराया. जिसके नाम से मुकदमा लिखाया गया है उसने मय शपथ पत्र के आईजी आगरा जोन के समक्ष प्रस्तुत
होकर कहा है कि यह मुकदमा मैंने धनंजय सिंह भदौरिया के खिलाफ दर्ज नहीं कराया है और मैं निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहता हूं।

इसी प्रकार दूसरा मुकदमा 28 जून 2013 को मेरे खिलाफ एटा के थाना सकीट में धारा 279, 337, 427, 506 आईपीसी 3 (1) 10 एससी, एसटी एक्ट के तहत अपराध संख्या 84 /13 में जितेन्द्र कुमार पुत्र श्याम सुन्दर निवासी नगला काजी थाना सकीट जिला एटा से दर्ज करा दिया। यहां भी जिनके नाम से मेरे खिलाफ मुकदमा लिखाया गया है, उस जीतेन्द्र कुमार ने भी आगरा जोन के आईजी आशुतोष पाण्डेय के सामने पेश होकर मय शपथ पत्र के कह दिया कि मैंने धनंजय भदौरिया के खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं कराया है और मैं झूठी कार्यवाही नहीं करना चाहता हूँ। जीतेन्द्र कुमार का रिकॉर्ड बयान है कि मुझसे यह कहकर कुछ कोरे कागजों में दस्तखत करवा लिए गए थे कि सरकार की योजना आयी है जिसके तहत एटा के एसएसपी और डीएम से 50000 रुपये दिलवा दिए जाएंगे|

मैंने आईजी जोन आगरा से मिलकर दोनों शिकायत कर्ताओं को उनके समक्ष मय शपथपत्रों के पेश कर दोनों झूठे मुकदमों को ख़त्म करने की बात की तो उन्होंने एटा के एसएसपी को फोन कर दोनों मुक़दमे ख़त्म करने को कहा
परन्तु एसएसपी एटा उक्त सपा नेताओं के दबाव में मेरे ऊपर स्वयं दर्ज कराये गए झूठे मुकदमों को ख़त्म करने को तैयार नहीं है और मुझे जेल भेजने की धमकी दे रहे हैं.

धनंजय सिंह भदौरिया

टीवी जर्नलिस्ट
एटा
उत्तर प्रदेश

एमएलए एमपी को निश्चित सुरक्षाकर्मी देने के खिलाफ याचिका

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर  ने आज उत्तर प्रदेश शासन द्वारा सुरक्षाकर्मी दिये जाने के सम्बन्ध में जारी दो शासनादेशों को चुनौती देती एक याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में दायर की है. याचिका के अनुसार एमएलए, एमपी, पूर्व एमएलए/एमपी, निगमों के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, जिला पंचायत अध्यक्ष, नगर पालिका प्रमुख आदि को सुरक्षा देने विषयक 05 मई 2008 और 11 जनवरी 2013 के शासनादेश पूर्णतः विरोधाभाषी, विभेदकारी और त्रुटिपूर्ण हैं. जहाँ एक मौजूदा एमएलए/एमपी को निशुल्क दो गनर का प्रावधान रखा गया है वहीँ पूर्व एमएलए/एमपी को 10 प्रतिशत व्यय पर मात्र एक. इसके विपरीत निगमों के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को एक निशुल्क और 10 प्रतिशत व्यय पर दूसरे गनर की बात कही गयी है.   

ठाकुर के अनुसार इस प्रकार इन सभी पदधारकों के लिए सुरक्षा सम्बंधित सार्वभौम प्रावधान करना यह प्रदर्शित करता है कि इस मामले में विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया है. इसी प्रकार एक सामान्य जन को कितनी भी जरूरत होने पर निजी खर्च पर ही सुरक्षाकर्मी प्रदान करने की व्यवस्था दिखाती है कि यह आमजन के लिए विभेदकारी है.  
 

आईएएस दुर्गा निलंबन : केन्द्र सरकार यूपी से रिपोर्ट मांगे

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर  ने सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण, भारत सरकार को पत्र लिख कर आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन के सम्बन्ध में विस्तृत रिपोर्ट मांगे जाने की मांग की है. ठाकुर ने कहा है कि चूँकि केन्द्र सरकार आईएएस अफसरों का नियंता प्राधिकारी है और उसे अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियमावली 1969  के नियम 3(6ए) के तहत निलंबन के सम्बन्ध में आख्या प्राप्त करने का अधिकार है, अतः नागपाल के निलंबन के सम्बन्ध में तत्काल विस्तृत रिपोर्ट मांगी जाए और निलंबन के आधारहीन और अनुचित पाए जाने पर उसे निरस्त किया जाए.

पत्र में यह भी मांग की गयी है कि केन्द्र सरकार सभी प्रदेशों के मुख्य सचिवों को बालू माफियाओं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसएलपी संख्या 8519/2006 में दिनांक 29 सितम्बर 2009 को सार्वजनिक भूमि पर अवैध धार्मिक निर्माण नहीं करने सम्बंधित आदेश की अवहेलना करने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने वाले आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों को सहयोग प्रदान करने और उन्हें निलंबित कर उनका मनोबल नहीं तोड़ने सम्बंधित निर्देश जारी करे.

Letter to Central Government in IAS Durga Shakti suspension

To,
The Secretary,
Department of Personnel and Training,
Ministry of Personnel, PG and pension,
Government of India,
New Delhi

Subject- Improper suspension of young IAS officer Ms Durga Shakti Nagpal in Uttar Pradesh

Sir,

1-The petition Dr Nutan Thakur is a social activist working in the field of transparency and accountability in governance and is also wife of an IPS officer from UP Cadre Sri Amitabh Thakur. Here she she wishes to state that a young IAS officer Ms Durga Shakti Nagpal of 2009 batch, UP cadre was suspended on Saturday by the Uttar Pradesh government. She was allegedly suspended by the State government after a dispute regarding a religious place where she allegedly acted against the provisions of law while demolishing the illegal constructions.

2. That as per the Indian Express news article _”According to sources, Nagpal had visited a village in Rabupura area of Greater Noida on Saturday following information that a masjid was being constructed without permission. "Though the masjid was built on private land, no clearance was taken. The building was illegal. While the villagers argued, they did not stand in the way when the structure was brought down," said District Magistrate Ravi Kant.”

3. That but the entire Media is full of facts and stories that tell another theory. As per India Today- “However, according to sources, the officer's drive against illegal mining had irked a leader of the ruling Samajwadi Party, Narendra Bhati, and he had complained about her to the party leadership. Nagpal had led the seizure of 24 dumpers allegedly engaged in illegal quarrying and got 15 people arrested recently. She had formed special flying squads to stop the illegal sand mining along the Yamuna and Hindon rivers” while as per The Times of India –“The UP government late on Saturday night suspended Durga Shakti Nagpal, the sub-divisional magistrate of Gautam Budh Nagar. Nagpal, a 2010 batch IAS officer, who has been in news for her crackdown on illegal sand mining, was allegedly suspended over a dispute related to a religious place.” As per The Hindu-“A woman IAS officer, who had clamped down on illegal mining and resolutely taken head on the powerful sand mafia in Uttar Pradesh, has been suspended barely 10 months after she got her first posting in the State.  A 2009-batch IAS officer posted as Sub-Divisional Magistrate (SDM) of Gautam Budh Nagar in September last year, 28-year-old Durga Shakti Nagpal was penalised ostensibly for the demolition of a wall at a disputed place of worship” while as per Hindustan Times-“Nagpal had taken on the powerful sand mafia in the area and was suspended just months into her assignment. She was ostensibly penalised for ordering demolition of a wall at a disputed place of worship in Greater Noida. However, opposition parties have alleged that the SDM was suspended on the behest of sand mafia” and as per The Indian Express-“The Uttar Pradesh government on Sunday suspended an IAS officer who had taken on the sand mafia by clamping down on illegal mining in the Yamuna and Hindon riverbeds over the last few months.  Durga Shakti Nagpal, a 2009-batch IAS officer posted as Sub Divisional Magistrate (Sadar) in Gautam Buddh Nagar, had impounded several trucks engaged in illegal quarrying and registered over 20 FIRs. “

4. That the universal statement of the same facts means it is very clear why Ms Nagpal was suspended.

5. That this fact gets all the more support if one takes into account The Times of India news article dated 23/06/2013-“Durga IAS takes on Noida sand mafia” by Ms Vandana Keelor which says- “A young woman IAS officer has taken on the brazen sand mining mafia in Gautam Budh Nagar. Durga Shakti Nagpal, the aptly named sub-divisional magistrate (Sadar), has seized 24 dumpers engaged in illegal quarrying in the past two days. Fifteen alleged offenders have also been arrested. Special flying squads have been formed to stop the raging menace along Yamuna and Hindon rivers in western UP.”  It also says-“Since April, the UP police have lodged 17 FIRs over the menace. In 22 cases, chief judicial magistrates have ordered the arrest of illegal sand dredgers. Last month alone, the mining department lodged a complaint with the police against 55 people in Greater Noida. "In three months, 297 vehicles and machinery involved in illegal sand mining was impounded. We have collected fines amounting to Rs 82.34 lakh," said Ashish Kumar, mining officer, GB Nagar. According to officials, though more than Rs 2 crore was recovered in fines last year, the revenue department still incurred huge losses.”

6. That it needs to be seen that this news article was published nearly a week before the suspension actually took place, linking it very clearly to the actual reason for suspension.

7. That even if one assumes that Ms Nagpal was suspended for demolishing an illegal construction, it needs to be kindly noted that she was only doing her job. As per the order dated 29/09/2009 of the Hon’ble Supreme Court of India in  Special Leave to Appeal (Civil) No(s).8519/2006 from the judgement and order dated 02/05/2006 in SCA No.9686 of 2006 of the Hon’ble High Court of Gujarat at Ahmedabad – “As an interim measure, we direct that henceforth no   unauthorized    construction shall  be carried out  or permitted in the    name       of     Temple,        Church,    Mosque       or Gurudwara etc. on public streets, public parks or other public places etc. In    respect       of     the    unauthorized construction of religious nature which has already taken place, the State Governments and the Union Territories shall review the same on case to case basis and take appropriate steps as expeditiously as possible. In order to ensure compliance of our directions, we    direct         all         the         District          Collectors           and Magistrates/Deputy              Commissioners           in     charge     of        the Districts to ensure that there is total compliance of the order passed by us. They are directed to submit a report within four weeks to the concerned Chief Secretaries or the Administrators of the Union Territories who in turn will send a report to this Court within eight weeks from today.”

8. That this order of the Hon’ble Supreme Court stands true even today as it has not been modified till date.

9. That even if being suspended for demolishing a Mosque being illegally built, in any case, Ms Nagpal, a young IAS officer of hardly a few years of service has been suspended on completely arbitrary reasons, firstly for taking on the Sand mafia and secondly on complying with the order of the Hon’ble Supreme Court.

10. That suspension of IAS officers is undertaken under Rule 3 of the All India Services (Discipline and Appeal) Rules 1969 where the relevant provisions say- “3. Suspension.—(1) If, having regard to the circumstances in any case and, where articles of charge have been drawn up, the nature of the charges, the Government of a State or the Central Government, as the case may be, is satisfied that it is necessary or desirable to place under suspension a member of the Service, against whom disciplinary proceedings are contemplated or are pending, that Government may— (a) if the member of the Service is serving under that Government, pass an order placing him under suspension, or (b) if the member of the Service is serving under another Government request that Government to place him under suspension, pending the conclusion of the disciplinary proceedings and the passing of the final order in the case. (1A) If the Government of a State or the Central Government, as the case may be, is of the opinion that a member of the Service has engaged himself in activities prejudicial to the interests of the security of the State, that Government may— (a) if the member of the Service is serving under that Government, pass an order placing him under suspension, or (b) if the member of the Service is serving under another Government, request that Government to place him under suspension, till the passing of the final order in the case”

11. That while Rule 3 subrule 2 says- “A member of the Service who is detained in official custody whether on a criminal charge or otherwise for a period longer than forty-eight hours, shall be deemed to have been suspended by the Government concerned under this rule and Rule 2 subrule 4 says-“ A member of the Service shall be deemed to have been placed under suspension by the Government concerned with effect from the date of conviction, if, in the event of conviction for a criminal offence, if he is not forthwith dismissed or removed or compulsorily retired consequent on such conviction provided that the conviction carries a sentence of imprisonment exceeding forty-eight hours”, in the State of Uttar Pradesh, there are at least one example each where an IAS officer was not suspended despite being detained for more than 48 hours. It was the case of Sri Pradeep Shukla, senior IAS officer who got arrested on 10/05/2013, he was finally suspended after much uproar on 21/08/2013. Similarly there is the example of another senior IAS officer who is convicted in a corruption case but has not been suspended for a day.

12. That unlike them Ms Nagpal got suspended for her honest work being done with complete dedication. One very well knows how difficult it is for anyone to fight sand mafia and how powerful these sand mafia are. One can hardly forget the killing of a young IPS officer Sri Narendra Bhati by the same kind of sand mafia.

13. That an IAS officer is first and foremost an employee of the Union of India and if anything improper is done against an IAS officer, the Central Government has the right to seek a detailed report in the matter and take necessary action as per the Rules.

14. That Rule 3 Subrule 6A of the above Rules says-“Where an order of suspension is made, or deemed to have been made, by the Government of a State under this rule, detailed report of the case shall be forwarded to the Central Government ordinarily within a period of fifteen days of the date on which the member of the Service is suspended or is deemed to have been suspended, as the case may be.”

15. That again as per D.P. & A.R. letter No. 11018/1/76—AIS (III), dated 11-2-1976, In the event of suspension of a moS, Government of India may be communicated telephonically immediately and the facts communicated within 15 days: – As soon as a member of the Service is placed under suspension or is deemed to have been placed under suspension, the fact may be communicated to this Department telegraphically and a detailed report of the case may be furnished within 15 days of the date of suspension, as provided for in the rules.

16. That hence being the Cadre controlling authority of IAS officers and realizing that prima-facie an illegality and irregularity has been done by the UP Government in suspending Ms Nagpal where she has been suspended for ulterior and extraneous reasons, the petitioner makes the following prayers-

PRAYERS

1.  Kindly immediately seek a report regarding suspension of Ms Durga Shakti Nagpal as per provisions of Rule 3 subrule 6A of the All India Services (Discipline and Appeal) Rules 1969 and the Government Memorandum D.P. & A.R. letter No. 11018/1/76—AIS (III), dated 11-2-1976,

2.  Kindly quash the suspension order if it is found to be irregular, inappropriate and not according to the provisions of law, because the Central Government has a right to do so under Rule 3 of the All India Services (Discipline and Appeal) Rules 1969

3.  Kindly also direct Chief Secretaries, Home Secretaries and Forest Secretaries of all the States/UTs of India that due protection, support and encouragement be given to all those IAS, IPS and IFS officers who take on the Sand Mafia and who act in accordance with the Hon’ble Supreme Court order dated 29/09/2009 in Special Leave to Appeal (Civil) No(s).8519/2006 as regards illegal religious construction in public places and not to harass and demoralize them through punitive measures like suspension, Departmental action etc

Lt No- NT/DSN/UOI/01  
Dated- 29/07/2013
 

Yours sincerely,

Dr Nutan Thakur
5/426, Viram Khand,
Gomti Nagar, Lucknow

आदिवासी साहित्य को अपने मानकों से न परखें : सुखदेव थोराट

: आदिवासियों द्वारा लिखा जा रहा साहित्य ही आदिवासी साहित्य – वंदना टेटे : आदिवासी के उन्नयन के लिए लिखा जा रहा साहित्य  आदिवासी साहित्य है, चाहे कोई भी लिखे – संजीव : सोमवार, 29 जुलाई को असुर लेखिका सुषमा असुर द्वारा सृष्टि और पुरखों के मंत्रोच्चार के साथ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में 'आदिवासी साहित्‍य:स्‍वरूप और संभावनाएं’ विषयक संगोष्ठी का आरंभ हुआ. दो दिनों तक चलने वाली इस संगोष्ठी के पहले दिन उद्घाटन सत्र में यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव थोराट ने कहा कि हमारा समाज आदिवासियों की समस्याओं के बारे में नहीं जानता. हमें आदिवासियों के बारे में जानने की जरूरत है, जो कि साहित्य के जरिए ही संभव है. उन्होंने आगे कहा कि अब तक वंचित-दलित साहित्य को आलोचकों ने नकारा है और उन्हें मुख्यधारा के मानकों के हिसाब से परखने की कोशिश की है. जबकि आदिवासी समुदाय उन मानदंडों की परवाह नहीं करता. उन्होंने कहा कि आदिवासी साहित्य के साथ आदिवासी समुदाय को समझे जाने की जरूरत है.

जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विवि के कुलपति एस.के. सोपोरी ने कहा कि अब तक आदिवासियों की अनदेखी होती आई है. इस स्थिति को खत्म करना है और आदिवासी समाज के सामने समक्ष चुनौतियों को समझने की जरूरत है. इसमें साहित्य मददगार होगा. भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष प्रो. रामबक्ष ने इस मौके पर कहा कि साहित्य में आदिवासी और दूसरे वंचित तबकों से जुड़े विमर्शों को उठाने की जरूरत है.

उद्घाटन सत्र को संबोधित  करते हुए झारखंड से आईं  आदिवासी कार्यकर्ता और लेखिका वंदना टेटे ने इसे परिभाषित करने की कोशिश की कि आदिवासी साहित्य किसे कहा जाए. उन्होंने कहा कि आदिवासियों द्वारा लिखे गए साहित्य को ही आदिवासी साहित्य कहा जाना चाहिए. आदिवासियों के बारे में जो साहित्य गैर आदिवासियों द्वारा रचा जा रहा है, उसे आदिवासी समुदाय पर केंद्रित शोधकार्य माना जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने की बातें बहुत कही जाती हैं, लेकिन जब कोई आदिवासी हिंदी में साहित्य लिखता है तो उसे नकार दिया जाता है. टेटे ने आदिवासी और गैर आदिवासी नजरियों के अंतर को भी रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि आदिवासियों की दृष्टि अपने जीवन और संसाधनों को बचाने की रहती है जबकि गैर आदिवासियों की दृष्टि उन पर कब्जा करने की होती है.

जेएनयू के समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार ने उद्घाटन सत्र के अपने संबोधन में कहा कि इस संगोष्ठी की जिम्मेदारी है कि वह आदिवासी साहित्य के स्वरूप को लोगों के सामने लाए. उन्होंने कहा कि वंचित समाज की कथा की धुरी आदिवासी समाज में है. उन्होंने इस पर जोर दिया कि आदिवासी साहित्य पर बात करते हुए आधुनिकता को कहीं छोड़ना नहीं चाहिए और कहा कि आदिवासी साहित्य में व्यक्त असंतोष, अभावों और अविश्वास के स्वर को समझने की जरूरत है.

आयोजन के पहले दिन, आदिवासी साहित्य के स्वरूप और सौंदर्य पर पर केंद्रित पहले सत्र में भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार प्राप्त युवा कवि अनुज लुगुन ने कहा कि आदिवासी समाज को इस तरह नहीं देखना चाहिए कि यह आदिम और पिछडा समाज है. उन्होंने कहा कि हमारी दृष्टि यह होनी चाहिए कि इतिहास में समाज दो अलग अलग दिशाओं में विकसित हुए. इनमें एक में प्रकृति को साथ लेकर चला गया जबकि दूसरे में उसका शोषण किया गया. लुगुन ने कहा कि यह सोच गलत है कि आदिवासी समाज ठहर गया है और इसका विकास नहीं हो पाया. आदिवासी समाज में भी कृषि का विकास हुआ, आजीविका के दूसरे तरीकों का विकास हुआ.

इसी सत्र को संबोधित करते हुए डामू ठाकरे ने कहा कि आदिवासियों का साहित्य मौखिक साहित्य रहा है और नई पीढ़ी उसे लिखित रूप दे कर लोगों के सामने ला रही है. जवाहर लाल बांकिरा ने अपने संबोधन में आदिवासी धर्म में जीवसत्तावाद को रेखांकित किया और कहा कि आदिवासी प्रकृति में अतिमानवीय शक्ति को मानते और पूजते रहे हैं. लेखिका सुषमा असुर ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न पेश किया कि आदिवासी जिंदा रहने के लिए लड़ें या साहित्य को बचाने के लिए. उन्होंने कहा कि आदिवासी अपने संसाधनों और जीवन को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और साहित्य को भी इसी तरह बचाया जा सकता है.

जोवाकिम तोपनो ने मुंडारी भाषा और इसकी शाब्दिक समृद्धि के विभिन्न आयामों पर रोशनी डाली. श्यामचरण टुडू ने संथाल साहित्य का अवलोकन किया. इसी सत्र में काशराय कुदाद ने आदिवासी साहित्य को व्यापक समाज तक लाने के लिए शिक्षा और भाषा के विकास पर जोर दिया.

बहुसांस्कृतिक एवं बहुभाषीय भारतीय साहित्यिक अभिव्यक्तियों में आदिवासी जीवन और समाज की उपस्थिति पर केंद्रित दूसरे सत्र में और चर्चित उपन्यास ग्लोबल गांव के देवता के लेखक रणेन्द्र ने मुंडारी भाषा में लिखे जा रहे साहित्य पर विस्तार से बताया. उन्होंने लेमुरिया द्वीप के मिथक की ऐतिहासिकता पर भी रोशनी डाली. इसी सत्र में प्रख्यात कथाकार संजीव ने कहा कि आदिवासी समाज के उन्नयन के लिए लिखे जा रहे साहित्य को आदिवासी साहित्य माना जाना चाहिए, चाहे उसे कोई भी लिखे. उन्होंने यह भी कहा कि वे आदिवासी समुदाय की रूढ़ियों और अंधविश्वासों को ढोते जाने के पक्ष में नहीं हैं. दूसरे सत्र को प्रख्यात आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल और लेखिका रमणिका गुप्ता ने भी संबोधित किया. रमणिका गुप्ता ने कहा कि आदिवासी साहित्य और संस्कृति की बात करते हुए उनके इतिहास पर नजर डालनी होगी, जो कि संघर्षों से भरा हुआ है. गुप्ता ने कहा कि साहित्य मजदूरों किसानों को जिंदा रखता है, साहित्यकार तो उसका परिष्कार करता है. उन्होंने दलित और आदिवासी समुदायों में अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि दलितों को उनकी संस्कृति तक से वंचित कर दिया गया और वे हिंदू धर्म की संस्कृति पर ही चलते हैं, जबकि आदिवासियों की अपनी संस्कृति है, जिसमें धर्म नहीं है बल्कि आस्था और विश्वास है. निर्मला पुतुल ने कहा कि आदिवासी साहित्य की हजारों वर्षों की पुरानी परंपरा है. आदिवासियों के गीतों और कथाओं के मूल में में जल, जंगल और जमीन तथा प्रकृति ही रहे हैं. पुतुल ने यह भी कहा कि आधुनिक भाषाओं के विकास में आदिवासी भाषाओं का अहम योगदान है.  महाराष्ट्र से आए वाहरू सोनवणे ने कहा कि आदिवासी साहित्य अभी लिखा जा रहा है. अभी इसमें बहुत सारे बदलाव होने हैं इसलिए अभी आदिवासी साहित्य के सौंदर्यशास्त्र के बारे में कुछ कहना अधूरा होगा. उन्होंने कहा कि साहित्य का केंद्रबिंदु जीवन प्रणाली और संस्कृति की अभियक्ति है. साहित्य का काम है जीवन को दिशा देना. सोनवणे ने कहा कि साहित्य दो तरह का होता है- एक वह साहित्य होता है जो व्यवस्था के विरुद्ध लिखा जाता है और दूसरी तरह का साहित्य व्यवस्था के पक्ष में. उन्होंने कहा कि हम आदिवासी उन्हें नहीं कहते जो आदिम काल से रह रहे हैं, बल्कि उन्हें कहते हैं जो बराबरी और इंसाफ पर आधारित जंगल की संस्कृति को अपनाते हैं.

पहले दिन के आयोजन का समापन अश्विनी कुमार पंकज द्वारा निर्देशित नाटक भाषा कर रही है दावा से किया गया. इसके साथ ही आदिवासी नृत्य भी पेश किया गया.

संगोष्ठी के दूसरे  और अंतिम दिन, मंगलवार 30 जुलाई  को सुबह 9.30 बजे पहले सत्र में आदिवासी साहित्य की अवधारणा और इतिहास के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न विधाओं में हो रहे समकालीन लेखन की पड़ताल की जाएगी. इस दिन सुबह 11 बजे से दूसरे सत्र में आदिवासी लेखन के समाजशास्त्र पर विचार किया जाएगा. दोपहर बाद दो बजे से शुरू होने वाले तीसरे सत्र में ग्लोबल समाज में आदिवासी भाषा, समाज और साहित्य पर विचार-विमर्श होगा. इस सत्र का मकसद ग्लोबल आर्थिक संरचना में आदिवासी समाज के वास्तविक मुद्दों और उससे संबंधित साहित्य की चुनौतियां, संभावना और भूमिका को सूत्रबद्ध करना है. इन सत्रों में विभिन्न शोधार्थी और विशेषज्ञ भागीदारी करेंगे. कार्यक्रम का समापन पद्मश्री प्रो. अन्विता अब्बी, प्रो सुधा पई और दिलीप मंडल की उपस्थिति में किया जाएगा.

प्रेस रिलीज

‘आरके एचआईवी एड्स’ की ओर से चंडीदत्त शुक्ल को बेस्ट फीचर एडिटर का एवार्ड

: विद्या बालन, मनोज बाजपेयी और मोनिका बेदी को मिला आरके एक्सिलेंस नेशनल अवॉर्ड्स : अभिनेता तनवीर ज़ैदी को स्पेशल जूरी अवार्ड्स : मुंबई में सक्रिय सामाजिक संस्था 'आरके एचआईवी एड्स' की ओर से आठवां आरके अवॉर्ड्स समारोह आयोजित किया गया। इस मौके पर होटल 'नोवोटेल' जुहू, मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में बॉलीवुड की नामचीन हस्तियों ने शिरकत की। अवॉर्ड हासिल करने वालों में प्रमुख रहे–

मनोज बाजपेयी (बेस्ट एक्टर,पॉपुलर), विद्या बालन (बेस्ट एक्ट्रेस, पॉपुलर), तिग्मांशु धूलिया (बेस्ट डायरेक्टर), आदित्य चोपड़ा – यशराज फिल्म्स (बेस्ट प्रोड्यूसर), प्रमोद माउथो(बेस्ट कैरेक्टर एक्टर), मोनिका बेदी (सर्वश्रेष्ठ खलनायिका, टीवी), गुलशन ग्रोवर (सर्वश्रेष्ठ खलनायक), शक्ति कपूर (बेस्ट कॉमेडी एक्टर), अली असग़र(बेस्ट कॉमेडी एक्टर,टीवी), राजू श्रेष्ठा(प्राइड ऑफ बॉलीवुड), टीना घई(बॉलीवुड बेस्ट सोशल एक्टिविस्ट), नगमा (बेस्ट एक्ट्रेस,भोजपुरी), रवि किशन (बेस्ट एक्टर,भोजपुरी),श्रवण(बेस्ट म्यूज़िशियन – आशिकी फ़ेम), चण्डीदत्त शुक्ल (बेस्ट फीचर एडिटर), संभावना सेठ (बेस्ट आइटम डांसर), पूजा वर्मा(रोल मॉडल), के के गोस्वामी(बेस्ट कॉमेडी एक्टर,विशेष अवॉर्ड),फारुख शेख (लाइफ टाइम अचीवमेन्ट), जावेद अली (बेस्ट सिंगर), महालक्ष्मी अय्यर (बेस्ट सिंगर), अभिजीत घोषाल (राइजिंग सिंगर), जीनत अमान (लाइफ टाइम अचीवमेंट), एहसान खान (बेस्ट विलेन,जूरी), तनवीर ज़ैदी (बेस्ट एक्टर,जूरी) और रितुपर्णा सेनगुप्ता (बेस्ट एक्ट्रेस, जूरी)।

पुरस्कार वितरण राजनीतिज्ञ तारिक अनवर, अशोक सिंह, अभिनेत्री नगमा, अभिनेत्री एवं निर्माता पूनम झावर ने किया। इस अवसर पर `अरिका फिल्म्स इंटरनेशनल' की हिंदी फीचर फ़िल्म 'ये जीवन है' की खास स्क्रीनिंग भी की गई। इस फ़िल्म में तनवीर ज़ैदी और दिव्या द्विवेदी की जोड़ी है, साथ ही नवोनिता चक्रवर्ती, अंजली राणा, एहसान खान, अली असग़र, हरिओम पराशर,पप्पू पॉलिस्टर,सुनीता सिंह,संतोष श्रीवास्तव, तालिब,पीकू,राकेश श्रीवास्तव ने भी बेहतरीन अभिनय किया है। फिल्म के निर्माता तौक़ीर ज़ैदी और कार्यकारी निर्माता राही सुल्तानपुरी हैं। कहानी रूबी ज़ैदी ने लिखी, वहीं पटकथा और संवाद मेहंदी आब्दी के हैं। यूनिट निर्देशक अरविन्द सिंह और संजय अस्थाना हैं। फिल्म के निर्देशक राजेश कुमार ने बताया कि फ़िल्म की विशेष स्क्रीनिंग इसलिए की गई, ताकि एड्स के प्रति फैली भ्रांतियां दूर की जा सकें।

(प्रेस रिलीज़)
 

गाजीपुर में जारी है भीड का इंसाफ

गाजीपुर में भीड का इंसाफ लगातार जारी नजर आ रहा है। एक सनसनीखेज वारदात के तहत बेखौफ बदमाशों ने रविवर की रात गाजीपुर मे ग्राम प्रधान के भाई की गोली मार कर हत्या कर दी। घटना कासिमाबाद क्षेत्र के सलामतपुर गांव की है। वारदात को अंजाम देने के बाद भाग रहे बदमाशों मे से एक को ग्रामीणों ने पकड़ लिया।घटना से आक्रोशित ग्रामीणों ने बदमाश की जमकर पिटाई की। जिससे उसने भी मौके पर ही दम तोड़ दिया। घटना के बाद गुस्सायें लोगों ने बदमाशों की दो बाइकों मे आग लगा दी। घटना की सूचना पाकर मौके पर पहुंचें पुलिस अधिकारियों को आक्रोशित ग्रामीणों को शान्त कराने मे काफी मशक्कत का सामना करना पड़ा। मृतक युवक के परिजनों का आरोप है,कि स्थानीय पुलिस की मिलीभगत से बदमाशों ने घटना को अंजाम दिया है।घटना के बारे मे बताया जा रहा है,कि सलामतपुर के ग्राम प्रधान मनीष जायसवाल का छोटा भाई अखलेश गांव मे जनरल मर्चेण्ट की दुकान चलाता है।मृतक युवक की दुकान पर कई बाइकों पर सवार हथियारबंद बदमाश रविवार की रात पहुंचे और अखिलेश को गोली मार दी। घटना मे गंभीर रुप से घायल युवक ने अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया। घटना को अंजाम देने के बाद भाग रहे बदमाशों को ग्रामीणों ने दौड़ा लिया,एक बदमाश आक्रोशित ग्रामीणों के शिंकजे मे आ गया। जिसकी गुस्सायी भीड़ ने जम कर पिटाई की।आरोपी बदमाश की ग्रामीणों की पिटाई से मौके पर ही मौत हो गई। आक्रोशित ग्रामीणों ने बदमाशों की दो बाइकों को भी आग के हवाले कर दिया।घटना को लेकर गांव मे तनाव का माहौल है। मृतक के परिजनों का आरोप है,कि स्थानीय पुलिस की शह पर रंगदारी मांग रहे बेखौफ बदमाशों ने घटना को अंजाम दिया है। गौरतलब हो कि विगत 11 जुलाई को भी जिले के नन्‍दगंन थानाक्षेत्र के फतेउल्‍लाहपुर गांव के महिला ग्राम प्रधान के पति को गोली मारकर भाग रहे तीन बदमाशों को भीड ने मौत के घाट उतार डाला था।— गाजीपुर से के0के0 की रिपोर्ट

कुछ दबंग और माफिया प्रवृत्ति के लोग मुझे भदोही में पत्रकारिता नहीं करने देना चाहते

एक अपील…. साथियों, मैं उत्तर प्रदेश भदोही का एक ऐसा पत्रकार हूं जो बिना किसी डर के निर्भय होकर, निष्पक्ष होकर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी। चाहे वह पत्रकारों की लड़ाई रही हो या फिर समाज की। भदोही जैसे छोटे जनपद में रहकर मैंने जो मामले उठाए वह राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बना। ज्ञानपुर जेल में कैदी की बर्बर पिटाई का मामला रहा हो या फेसबुक के जरिये अपने साथ हुये अन्याय के खिलाफ लड़ाई शुरू करने वाली डिंपल मिश्रा का मामला। इन मामलों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का काम मैंने किया।

भय, लालच से परे रहकर मैंने विशुद्ध रूप से पत्रकारिता धर्म का पालन किया। मुझे कई बार खरीदने की कोशिश की गयी पर मैं उन पत्रकारों में नहीं था जिनकी आत्मा चंद खनकते सिक्कों पर गिरवी हो जाती है। पर इसका खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। मेरे कार्यालय वालों ने मेरे साथ धोखा किया और अपनी ईमानदारी की कीमत मुझे नौकरी छोड़कर चुकानी पड़ी। कुछ दबंग और माफिया प्रवृत्ति के लोग मुझे भदोही में पत्रकारिता नहीं करने देना चाहते हैं। उनके साथ इस सियासत में कुछ ऐसे पत्रकार मित्र भी शामिल हैं, जिनकी मित्रता पर कभी मुझे गर्व होता था। उन दबंगों और माफियाओ के साथ मिलकर मुझे भदोही छोडने के लिए विवश किया जा रहा है।

यही नहीं मुझे और मेरे परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए मेरे पीछे भदोही की पुलिस भी लगाई गयी है। मैं आप सभी से पूछना चाहता हुं आखिर ऐसा क्यों..? क्या सच का साथ देना गुनाह है..? क्या मीडिया में ईमानदारी से पत्रकारिता करना गुनाह है…? क्या भदोही में सिर्फ वही पत्रकारिता करेगा जो चंद खनकते सिक्कों पर बिक जाता है….? क्या भदोही में किसी कीमत पर न बिकने वाले पत्रकारों को पत्रकारिता नहीं करने दी जाएगी…? मैं आप सभी से एक सवाल करना चाहता हूं। अपना समूचा जीवन पत्रकारिता को समर्पित कर देने वाला यह व्यक्ति आखिर कहां जाए…?

क्या मैं गुंडों और माफियाओं के डर से भदोही छोड़कर भाग जाऊं..? क्या पुलिस किसी ईमानदार और शरीफ व्यक्ति या पत्रकार के लिए नहीं बल्कि माफियाओं के लिए काम करेगी…? मैं भदोही की अवाम के साथ देश के सभी जिम्मेदार लोगों और पत्रकारों से पूछना चाहता हूं कि क्या पुलिस सिर्फ अपराधियों की सुरक्षा के लिए और मेरे जैसे पत्रकार को परेशान करने के लिए बनी है..? मित्रों, मैं किसी कीमत पर हार मानने वालों या बिकने वालों में से नहीं हूं। पत्रकारिता हित के लिए मैं हमेशा लड़ाइयां लड़ता रहूँगा। न्याय के लिए गुहार लगाने वाली तमाम डिंपल मिश्रा जैसी बेसहारों की आवाज़ बनता रहूँगा। चाहे इसकी कीमत कुछ भी चुकानी पड़े। मैं भदोही मे रहकर ही बहादुरी और निडरता से पत्रकारिता करूंगा। ……क्या आप देंगे मेरा साथ..? जीत जाएंगे हम तू अगर संग है…..ज़िंदगी हर कदम एक नयी जंग है।

जय हिन्द………!
जय कलम……..!
जय अखबार……!

लेखक मिथिलेश द्विवेदी यूपी के भदोही जिले के तेजतर्रार पत्रकार हैं.

Anna Hazare Vidya Balan to Share Dias with most Corrupt & Racist FIA in USA

It is very shocking to know that Shri Anna Hazare Ji is going to participate in Donkey Parade organized in the name of India Day Parade by quasi criminals and Thugs posing as self proclaimed Leaders from Gujarati community.  It looks like FIA an organization of Thugs with no vision for India or its culture or traditions is buying legitimacy by bringing Shri Anna Hazare Ji to their annual Donkey Parade. No high achiever self made Indian as well as American practicing high moral and ethical values wants to participate in this parade that is nothing but an insult to India and every Indian around the world.

As per IRS form 990 filed by FIA in 2011 the Donkey Parade cost them $357,000. For 2012 Form 990 is not available or has yet to be filed by FIA. Surprisingly the Sikh Day Parade that has the practically same number of floats made by the same vendor and same number as well as same marching Bands, cost only $85,000. The Sikh Day Parade is more organized with the right message and more than plenty free food, water and snacks for Indians as well as locals. If one closely look at the Form 990; FIA executives has spent $25,479 on Reception & Banquet and $25,865 for Video coverage, flowers, trophies, Badge & sashes for them selves, their friends & sponsors. Another $89,635 was spent on occupancy and travel, $10,967 on conference and meetings by FIA. A whopping $49,043 is paid to scantily clad performers to do vulgar Bollywood numbers; who really love India! Only Ramesh Patel or his lunatic supporters can explain what is occupancy and why they need to plunder public funds on their own comforts and image building.
 
India Day Parade by FIA in New York and OTIBA & IBA in New Jersey is nothing but a vulgar Bollywood Parade organized by self proclaimed Leaders of Gujarati Samaj for themselves, their sponsors and supporters. It has become a mindless affair for local politicians & Photo Hungry Desi (PHD) Gujju Leaders posing as Indian Community Leaders along with their supporters who can not be paraded for any cause any where in the world including the famous Pushkar Mela of Rajasthan in India for animals. Most pathetic is dominance of Bollywood Star as Grand Marshal supported by office bearers of FIA, OTIBA & IBA with doubtful integrity, who are stealing from community organizations and selling its honor & dignity. Every year chaos reigned right at the beginning of the parade with hordes of badge and sash wearing Gujarati Office Bearers, their Sponsors and friends breaking the cordons to be near the Bollywood Star the so called Grand Marshal for the Parade. All that the parade viewers on the sidelines could see is an unruly mass of organizers, sponsors & their friends behaving like animals rolling down the avenue along with meaningless floats.

My sincere thanks to CG Dnyaneshwar Mulay; like a beacon of hope who called for transparency, accountability, full financial disclosures and representation of all faiths and states of India in FIA. According to Editorial by Prof. Saluja in The Indian Panorama, "CG Mulay advised FIA leadership to ensure women representation in Leadership position as women represent "Shakti" in Indian culture. Mulay also advised FIA to high light India's economic growth as part of their India Day Parade celebrations". Mr. Ramesh Patel and other FIA officials ridiculed CG Mulay and made out of context stupid remarks. CG Mulay’s predecessor for reasons best known to them never criticized FIA; especially CG Prabhu Dayal who was publicly humiliated in 2009 and was put on a float with an absconding criminal Nirav Mehta from India to lead the Donkey Parade as FIA President in 2010.

Recently FIA Chairman reception committee Sarvesh Dharyan of New Jersey was arrested by US Justice Dept. on 7-17-13 for Money Laundering, Bribery, Kickbacks, honest services fraud and Travel Act violations. Only the Travel Act violation attracts max. 5yrs prison rest all other crimes; each attracts max. 20yrs prison.
 
It is my strong opinion as well as the opinion of so many honest individuals of Indian community in New York & New Jersey that Anna Ji will ruin his public image as a fighter against corruption by joining the most corrupt and racist Indian organization FIA in America. We make a humble request to Shri Anna Hazare Ji not to attend any India Day Parade in America that is nothing but Insult to India by quasi criminals with no vision for India and respect for diversity and its rich culture and traditions.

Respectfully submitted,

Dave Makkar 

973 760 6006 C 973 416 1600 W

davemakkar@yahoo.com

निशिकांत ठाकुर का किला ध्वस्त होने की ओर

साथियों, दैनिक जागरण में आज जो हड़कंप मचा है, उसकी एक मात्र वजह इसके मुख्य महाप्रबंधक और स्थानीय सम्पादक निशिकान्त ठाकुर ही हैं. जिस संस्थान ने उसे एक क्लर्क से इतने बड़े पद पर भेजा, उसी संस्थान का बेड़ा गर्क करने की कोई कसर इस महानुभाव ने नहीं छोड़ी. जालंधर में तीन अलग अलग गोत्र वाले लोगों – a.c. chandra, b.c. mishra, kavilash batsal- (ये तीनों इसके सगे साले हैं) को भरती किया.

तीनों का अगर आज टेस्ट ले लिया जाये तो पांचवीं कक्षा न पास होगी इनसे. लेकिन ख़ुदा मेहरबान तो गधा पहलवान वाली कहावत इन पर लागू होती है. तीनो गधे जीजा जी की कृपा से मालदार हो चुके हैं. एक भांजा जो दैनिक जागरण से निकाला जा चुका था, उसको फिर से लाकर न केवल नौकरी दी बल्कि चीफ रिपोर्टर भी बनाया. आजकल चंडीगढ़ में है. अगर एक भी खबर कोई ब्रेक की हो तो उसका नाम बताये! निशिकांत ने मामा जी नाम के एक JHA sahib को जालंधर में रखा है…कहते हैं बिहार के हैं और रिश्तेदार हैं… खूब मजे में हैं…उनकी ड्यूटी क्या है, किसी को भी नहीं पता.

जिस कमलेश रघुवंशी का पाला-पोसा, पालतू बनाया जालंधर पूरा खाया, उसको झारखण्ड में भेज दिय…वहां गयी श्रवन गर्ग और विष्णु त्रिपाठी की टीम ने जो उसकी हवा निकाली उसका भी पता चला है.  न्यूज़ एडिटर की तो बलि ले ली गयी, कमलेश को कहा कि उसे स्टेट हैड किसने बनाया? इतनी बेइज़्ज़ती? शाहिद रज़ा जैसे व्यक्ति को जालंधर में न्यूज़ एडिटर बना कर अपना उल्लू सीधा करते रहे. पंजाबी में एक नौकर को हुज़ूरिया कहते हैं, इस हुज़ूरिया शाहिद रज़ा का अब तबादला कर दिया गया है, उस पे तरस नहीं किया कि अब उसकी कोठी कौन पूरी करवाएगा, सारी लिवाली तो अब गयी!

वीरेंद्र रैना १४ साल से तरक्की की इंतज़ार में वफादारी के साथ डटा रहा, लेकिन तरक्की चंद्रशेखर को…ludhiana unit में. इसके पहले पंजाब हेड राकेश शांतिदूत को जाने पे विवश किया था…

अब एक एक करके इनके गुर्गे जाने लगे हैं …निशिकन्त का किला ध्वस्त होने की ओर अग्रसर है… कविलाश ने तो हिंदुस्तान में नौकरी की गुहार लगाई थी…इंकार हो गया है. बाकी लोगों का क्या होगा कालिया? सूरज ढलता भी है निशिकांत भूल गया था… निशिकांत नहीं, भगवान सबको रोज़गार देता है, व्यक्ति को उसकी मेहनत आगे ले जाती है, उसकी किस्मत आगे बढ़ाती है … निशिकांत को लगता था कि वही ऐसा कर सकता है… सब झूठ पकड़ा गया है… सुदामा पाठक वाला मामला भी सामने आने वाला है। इसमें पेपर रील घोटाला खुलेगा जल्द …!

अभी तो विष्णु त्रिपाठी और श्रवण गर्ग की टीम ने जो हौसला दिखाया है… उनके कहे पर संजय गुप्ता ने जो एक्शन लिया है, उसके लिए जागरण को बधाई ! निशिकांत की कोटरी के लोग अब अपने साथियों को पानी देने के लिए चुल्लुओं का प्रबंध कर लें!

ऋषि कुमार नागर

Rishi Kumar Nagar
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लखनऊ में दो बड़े न्यूज चैनलों के कैमरापर्सन ने शराब के नशे में दिनदहाड़े किया हंगामा

दो बड़े न्यूज चैनलों जिनमें एक हिंदी का है और एक अंग्रेजी का, के कैमरा पर्सन ने परसों दोपहर लखनऊ स्थित गोमती नगर में शराब के नशे में खाड़ी कार में टक्कर मारी. जब टक्कर लगने पर कार में बैठी महिला ने विरोध किया तो महिला के साथ बदसलूकी की गई. उसके ड्राईवर को मारा-पीटा गया और उसके कपडे फाड़ डाले.

यह हंगामा शनिवार को दोपहर २ के आस पास बरपा, फातिमा हास्पिटल के सामने. इस दौरान ढेर सारे राहगीर दोनों कैमरापर्सन का तमाशा देखते रहे. जो भी आगे आया उसे भी इन लोगो ने मारा पीटा. दोनों को जब पुलिस थाने में ले गयी तो वहां पर भी उन्होंने हंगामा काटा. थानेदार को अर्दब में लेने की कोशिश की गई. इस दौरान दर्जन भर पत्रकार उनके पक्ष में थाने पहुंच गए. इस दौरान हुई मारपीट में महिला के ड्राईवर का कान और होंठ फट गए.

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं, चार आने की धनिया हैं…

पत्रकार और पत्रकारिता की वर्तमान हालत पर चुटकुले, कविताएं, शेर-ओ-शायरियां आदि उसी तरह तैयार होने लगी हैं जैसे कभी एक नेताओं और राजनीति पर लिखा-पढ़ा-कहा जाता था. जिस भी क्षेत्र में धंधेबाजों की भारी संख्या हो जाती है, और जेनुइन लोगों की कम, तो उस क्षेत्र के कामकाज की मूल भावना ही खत्म हो चुकी होती है. नेताओं ने राजनीति की और अफसरों ने प्रशासन की जिस तरह से माकानाकासाकानाका कर रखा है, उसी तर्ज पर पत्रकारों ने पत्रकारिता की कर दिया है.

अच्छे, ईमानदार, सरोकारी, जुझारू, रीढ़ वाले और हिम्मती पत्रकारों की संख्या दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है. अब तो ईमानदार पत्रकार भी सिस्टम व गिरोह के आगे नतमस्तक होकर चुपचाप कारपोरेट जर्नलिज्म के फ्लाईओवर पर फर्राटा भरते हुए अपने लिए भौतिक सुख सुविधाओं को बटोरने के काम में लग जाते हैं. उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब उनकी संवेदना, सरोकार, सोच, आजादखयाली आदि का कत्ल हो गया और वे कब खुद की नौकरी बचाने, नौकरी के बारे में सोचते रहने वाले रोबोट में तब्दील हो गए. एक कविता पत्रकार राहुल पांडेय ने भेजी है, पत्रकारों के उपर, बहुत ही सटीक है. आप भी पढ़ें और हंसें फिर सोचें. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

कापी राइट : राहुल पांडेय, अयोध्या-फैजाबाद वाले

‘हिन्दुस्तान’ को बिहार में पहली बार मिला बिहारी संपादक, अबतक के सबसे कम उम्र के एडीटर हैं तीर विजय सिंह

Vinayak Vijeta : पटना से प्रकाशित दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ को अपने प्रकाशन के 27 वर्षों के ऐ लंबे अंतराल में पहली बार बिहारी संपादक मिला है। गौर तलब है हिन्दुस्तान प्रबंधन ने कुछ दिन पूर्व ही हिन्दुस्तान, पटना के वरीय स्थानीय संपादक के रुप में तीर विजय सिंह की नियुक्ति की है।

तीर विजय सिंह मूल रुप से रोहतास जिले के गढनोखा के रहने वाले हैं। गढनोखा स्थित हाई स्कूल से ही इन्होंने माध्यमिक और उच्च शिक्षा पूरी की। दैनिक ‘प्रदीप’ की जगह 1986 से पटना से प्रकाशित ‘हिन्दुस्तान’ के प्रकाशन के अबतक के 27 वर्षों में अबतक इस अखबार ने 11 संपादक देखें हैं जिनमें हरिनारायण निगम, सुनील दूबे, चंद्रप्रकाश, सुनील दूबे, गिरीश मिश्रा, नवीन जोशी, श्याम वेताल, सुनील दूबे, अकू श्रीवास्तव, के के उपाध्याय एवं तीर विजय सिंह का नाम शामिल है।

सुनील दूबे जहां तीन बार हिन्दुस्तान, पटना के वरीय स्थानीय संपादक बने वहीं 7 जनवरी 1969 को जन्में नए संपादक ‘हिन्दुस्तान’ पटना के नए संपादक तीर विजय सिंह अबतक यहां पदस्थापित संपादकों में सबसे कम उम्र के संपादक हैं। बिहार के ‘नब्ज’ और ‘कब्ज’ दोनों को भलिभांति जानने और परखे रहने वाले बिहार के इन संपादक से बिहार के पाठकों को समाचार के मामलों में काफी अपेक्षा और आशा रहेगी।

हिंदुस्तान, पटना में कार्य कर चुके विनायक विजेता के फेसबुक वॉल से.

हैलीकाप्टर से घूम चुके उत्तराखंड के ढेर सारे पत्रकार इतने प्रसन्न हैं कि हर वर्ष ऐसी आपदा की कामना कर रहे हैं

देहरादून : 16-17 जून की आपदा के बाद नेताओं, अफसरों के हैलीकाप्टर के दौरे अभी तक थमे नहीं हैं। उत्तराखंड और दिल्ली के पत्रकारों ने भी हैली के मजे लिये। दिल्ली की उमस भरी गर्मी को इस आपदा ने दिल्ली के पत्रकारो को कुछ दिनों के लिये टाल जैसा दिया। दिल्ली में इस गर्मी में ट्रैफिक में फंसे रहने वाले पत्रकारों को खूव आवभगत सूचना एवं जन संपर्क विभाग उत्तराखंड ने की।

देहरादून के साथ-साथ आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भी सुविधायुक्त होटलों में इन पत्रकारों के लिये इंतजाम करना उत्तराखंड सरकार नहीं भूली। भले ही आपदा पीड़ितों के लिये राशन और टैण्ट देना अभी तक भूली हुई है। हैलीकाप्टर उत्तराखंड में आसमान में खूब इधर उधर मंडराते हुए 17 जून के बाद 18 जून के आते-आते मौसम के खुलते ही राज्य की पूरी सरकार, उसके नौकरषाह, मंत्रीगण और विधायक तो हैली में धूम ही रहे थे कि पत्रकार क्यों पीछे रहते।

पिथौरागढ़ में एक प्रेस कान्फ्रेस में जिले के प्रभारी मंत्री दिनेश अग्रवाल को जब यह सवाल पूछा गया कि मंत्री और नौकरशाह हैली से उतर नहीं रहे हैं तो मंत्री ने पत्रकारों से ही पूछा कि आपदाग्रस्त क्षेत्रों की फोटो और टीवी के लिये फुटेज लेने के लिये पत्रकार बतायें कि वे किस माध्यम से गये, तो पत्रकार इधर उधर झांकने लगे। प्रतिवर्ष विज्ञापन और प्रसार के माध्यम से अरबों रूपये उत्तराखंड से कमाने वाले और दिल्ली की मीडिया जो उत्तराखंड के विज्ञापनों पर गिद्द दृश्टि रखकर करोडों रूपये यहां से ले जाते हैं। जनता के टैक्स से जमा होने वाले उत्तराखंड के खजाने को विज्ञापनों के माध्यम से लूटने वाले मीडिया घरानों को इतनी भी षर्म नहीं थी कि उत्तराखंड से 13 वर्षों में जो कमाया है। उसका एक अंश भी रिपोर्टिंग में खर्च करें।

केदार घाटी के आपदा की त्रासदी को देखने के लिये जाते समय प्रदेश के काबिना मंत्री हरक सिंह रावत ने हैली में रखे राशन के कट्टे उतरकर देहरादून के पत्रकारों को हैली में बिठाकर चल दिये। केदारनाथ से लौटते समय एक घायल वृद्ध महिला हाथ जोड़कर हरक सिंह रावत के सामने आसूं बहाते रह गयी लेकिन उसे हैली में जगह नहीं दी गयी। विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री अपने हैली में पत्रकारों को ठूंसकर अपने साथ दौरे में ले जा रहे थे ताकि दूसरे दिन अखबार में उनकी फोटो छप सके और सायं टीवी चैनलों में उनके भ्रमण की खबर आ सके। उत्तराखंड के साथ ही देश का एक भी टीवी तथा प्रिंट मीडिया का घराना आगे नहीं आया जिसने आपदा के रिपोर्टिंग के लिये हैली तो रहा निजी वाहनों से अपने पत्रकारों को भेजा हो। पत्रकारों की नजर आपदा में फंसे लोगों को निकालने में तथा राहत सामग्री गांवों तक पहुंचाने के लिये लगे हैलीकाप्टरों पर बनी हुई है। एक पत्रकार के हैली में बैठने से आपदा पीड़ितों को अस्सी किलो राशन कम पहुंचा।

इसकी चिंता न बेशर्म पत्रकारों को थी और न ही अपनी वाहवाही में मस्त सरकार के प्रतिनिधियों को। दिल्ली के एनडीटीवी के पत्रकार केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के साथ हैली में फिर रहे थे तो आज तक, आईबीएन 7, एवीपी न्यूज, जीटीवी, ईटीवी सहित अन्य चैनल यह देख रहे थे कि किस नेता, अफसर के हैली में उनको जगह मिल जाय। उत्तराखंड सरकार से विज्ञापन ही नहीं विज्ञापन पैकेज के रूप में करोड़ों बटोरने वाले इन चैनल और अखबारों की नीयत इतनी गिर चुकी थी कि आपदा की घटना के दस दिन बाद ही सरकारों के गुणगान के करोड़ों रूपये के विज्ञापन और आपदा पीड़ितों की हालत के विज्ञापन इनके चैनलों और अखबारों में नजर आने लगे थे। अखबारों के द्वारा देश के तमाम काले धंधों में लिप्त मीडिया घरानो ने आपदा के दौरान भी उत्तरखंड सरकार के साथ साठगांठ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उत्तराखंड के टीवी चैनलों में सरकार के खिलाफ दिये जाने वाले बाइट गायब हो गये थे। टीवी चैनलों के स्थानीय मीडियाकर्मी कहने लगे थे कि केवल घटना का जिक्र बाइट में किया जाय, तभी चलेगी।

सरकार के खिलाफ दी जाने वाली बाइट को डेस्क से ही गायब कर दिया जा रहा है। वर्श 2010 में जब आपदा की घटना घटी थी तो ईटीवी के उत्तराखंड ब्यूरो प्रमुख तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक के साथ बिना कैमरे के हैली में घूम रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये टीवी पत्रकार न होकर निशंक के पीआरओ हैं। तब हालत यह थी कि ईटीवी में सायं के समाचार पैकेज में पटवारी की जगह निशंक की ही बाइट चल रही थी। इस बार भी आपदा के बाद बहुगुणा सरकार पर शुरुआती दिनों में मीडिया का हमला रहा। क्योंकि मुख्यमंत्री आपदा के बाद दिल्ली चले गये थे और प्रधानमंत्री मनमोहन और सोनिया गांधी उत्तराखंड में हैली से मुआयना कर रहे थे। आपदा की त्रासदी के बाद हुई कैबिनेट की बैठक में सरकार का रूख भी आपदा विरोधी रहा था। इन सब सरकार विरोधी खबरों के बीच जैसे ही हैलीकाप्टर उत्तरखं डमें पहंुचने लगे तो मीडिया बहुगुणा सरकार के गुणगान में जुट गयी। हैलीकाप्टरों ने विपक्ष के विधायकों को भी लुभाने में सरकार की पूरी मदद की। प्रतिपक्ष के नेता अजय भट्ट भी राज्य सरकार के हैली में घूमते रहे।

पिथौरागढ़ जिले के धारचूला में सरकारी हैली से पहुंचे भट्ट ने हैलीपैड में ही अधिकारियों से बात की और उड़कर वापसी कर ली। स्थानीय भाजपा के नेताओं को दो घंटे बाद पता चला कि उनके नेताजी आये थे और चले गये। शायद भट्ट को इस बात की डर रही होगी कि हैली उन्हें घारचूला में ही न छोड़ दे या फिर कहीं मौसम खराब न हो जाय। भारतीय सेना भी पत्रकारों पर डोरे डालती रही। केदार घाटी में रेस्क्यू का कार्य सेना के हवाले था और हैली भी।सेना के अफसर पत्रकारों को देखते ही हैली में बैठने का ईषारा कर अपने साथ ले जा रहे थे और उनके चैनल और अखबार का नाम पूछने के साथ ही समय भी पता कर रहे थे कि कब वे अपने को टीवी में देख पायेंगे। अक्सर सेना से पत्रकार व नेता खफा रहते हैं क्यों कि वे उन्हें घास नहीं डालते हैं। इस बार सेना पत्रकारों पर मेहरबान रही।

भाकपा माले के राज्य कमेटी सदस्य इंद्रेश मैखुरी बताते हैं कि जब वे केदार घाटी में पहुंचे तो उनके गले में कैमरा लटका हुआ था, सेना के अफसर ने उन्हें पत्रकार समझकर ईशारा कर उन्हें बुला लिया और कहा कि सर क्या आपको इस रस्सी से नदी पार करवा दें! तकि आपकी अच्छी फोटो बन जायेगी। और उसने सेना के जवानों के द्वारा किये जा रहे कार्यों को कैमरे में कैद करने और अपने अधिकारी का मेल आईडी उन्हें थमा दिया कहा कि इन सभी फोटोग्राफों को मेल में डाल दें। क्योंकि आज हम कैमरा लाना भूल गये हैं। इतना ही नहीं मैखुरी से अखबार का नाम भी पूछा और कहा कि अपने अखबार में भी हमारी फोटो लगवा दें। सेना भी मीडिया के द्वारा हो रहे प्रचार में स्वयं को आगे करने में जुटी हुई थी। सरकार और सेना पत्रकारों पर इस कदर मेहरबान थी। पिथौरागढ़ में प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने कुमाउ कमिश्नर के पत्रकार वार्ता का बहिष्कार कर दिया। इसके पीछे यह बात थी कि इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार हवाई यात्रा कर चुके थे और बेचारे प्रिंट वाले छूट गये थे।

डीएम को जब पता चला तो उसने मीडिया को देख रहे एसडीएम सदर नरेश दुर्गापाल को लताड़ लगायी और मीडिया को मनाने को कहा। उसके बाद पिथौरागढ़ के पत्रकार तो रहे उनके दोस्तों को भी हैली में धूमने का मौका मिला। उत्तराखंड के आपदा पीड़ितों को निकालने के अभियान तथा राषन पहंुचाने के कार्य में अगर किसी ने सबसे अधिक रूकावट पैदा की है तो वह मीडिया है। हैली के सफर का मौका केवल टीवी चैनल और दैनिक अखबारों के पत्रकारों को ही दिया गया। साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक सहित कम प्रसार वाले जनपक्षीय अखबारों को इस यात्रा से वंचित रखा गया। देहरादून में कई साप्ताहिक अखबारों से सूचना अधिकारियों ने यहां तक कह डाला कि आप लोग तो अखबार पढ़कर खबर बना लेना। आपका अखबार तो कल नहीं छपना है। जनता के संसाधनों से चलने वाले मीडिया ने हांलाकि हैली की जगह पैदल यात्रा कर आपदा प्रभावितों के दुख दर्द को सामने लाने का अभियान जारी रखा। एक पत्रकार ने तो यहां तक कहा कि वह पटवारी नहीं है जो हैली जाकर सरकारी आंकलन करेगा। उसका कहना था कि सरकार की जगह समाचार पत्र के संस्थानों को रिपोर्टिंग के लिये सुविधाऐं उपलब्ध करानी थी।

आज तक चैनल ने तो हर घाटी में अपने पत्रकार उतार दिये थे दो घंटे रिपोर्टिंग के बाद इन पत्रकारों को इंटरनेट वाली सुविधाजनक जगह पर पहंुचाना सेना और सरकार का प्रमुख कार्य बन गया था। चाहे आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जारी अभियान ही क्यों न रूक जाये। लेकिन पत्रकार साहब तो पत्रकार ही ठहरे। हैली सेवा का चालीस प्रतिशत आनंद पत्रकारों ने उठाया। आज पत्रकार इतने प्रसन्न है कि उत्तराखंड में हर वर्ष इसी तरह की आपदा की कामना कर रहे हैं।

उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के वरिष्ठ प्रान्तीय उपाध्यक्ष और भाकपा माले नेता जगत मर्तोलिया की रिपोर्ट.

हे फेसबुक वालों, नंदना को नंगना मत बनाईये

Deepak Sharma  : फेसबुक पर विरोध नही लोगों को ब्लाक किया जाता है. ब्लाक करना मुझे आता नही और विरोध करना व्यर्थ है. लेकिन एक चरित्र हत्या से थोडा व्यथित हों. जी हाँ जिस तरह नंदना सेन को वस्त्रविहीन किया गया है लाखों लाख वर्चुअल दीवारों पर वो इस देश की संस्कृति नही. हम भूल गए की नंदना देश की ऐसे दुर्लभ संतान है जिनकी मा पद्मश्री और पिता भारत रत्न है. वो हारवर्ड विश्विद्यालय की टापर है. बच्चों के अधिकारों के लिए लड़ती है और अंतर राष्ट्रीय अभिनेत्री है. नंदना को अपने पिता अमर्त्य सेन के मोदी पर विवादस्पद बयान के लिए निशाना नही बनाना चाहिए. बाप के बोल पर बेटी की बली नही चडाई जा सकती.

मित्रों कोई फिल्म में काम करेगा तो रोल के मुताबिक कपडे ओड़ने उतारने पड़ सकते हैं. अगर नंदना दो फिल्मो में रोल की डिमांड पर टॉपलेस हो गयी तो इसके लिए उन्हें द्रौपदी नही बनाएये. फिल्मो में खासकर अंतर राष्ट्रीय रीयलिस्टिक फिल्मो में हेरोइन का निर्वस्त्र होना शास्त्रीय कला है. इस कला का वैसे ही सम्मान करिये जैसे हमारी संस्कृति में नगर वधुओं का किया जाता था. जैसे खजुराहो के मंदिरों पर शिल्प का किया जाता है. प्लीज़ नंदना की कला का सम्मान कीजिये . परदे पर उनका देह प्रदर्शन एक शास्त्रीय अभिव्यक्ति है. .प्लीज़ इस कला को परखिये जानिये …नदना को नंगना मत बनाईये. वो भारत रत्न पिता और पद्मश्री मा की संतान हैं. उनके DNA का मूल समझिए.

वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.

आईएएस दुर्गा नागपाल के पक्ष में खड़ा हुआ सोशल मीडिया, अखिलेश यादव की लानत-मलानत

Ashish Sagar Dixit : खनन माफियाओ के खिलाफ अभियान चलाने वाली आई.ए.एस. महिला दुर्गा शक्ति नागपाल को उनकी इमानदारी का जो सिला मिला उसके लिए उत्तर प्रदेश की सरकार को कुछ नही कहना चाहूगां क्योकि ये सरकार ही माफियाँ चलाते है l काश की बुंदेलखंड के बाँदा, चित्रकूट, हमीरपुर और महोबा में भी दुर्गा शक्ति नागपाल सा कोई होता तो बात बनती l बाँदा में तो हालात ये है की जिला खनिज अधिकारी को बालू माफिया खदानों में बंधक ही बना लेते है l तात्कालिक जिला खनिज अधिकारी जे.पी. दिवेदी ने तो खनिज निदेशक के सामने हाथ खड़े कर दिए है l उनका कहना है की जिले की पुलिस ही माफियाँ के साथ है l हर साल करीब 510 करोड़ रूपये खनिज राजस्व देने वाला बुंदेलखंड अपने ऊपर तीन दशको से किये जा रहे प्राकृतिक उजाड़ / बलात्कार से आहत है l यहाँ की काली पहाड़िया वीरान और नदियाँ अपनी कोख बालू से खाली कर रही है l मीडिया लिखता है लेकिन खबर सिर्फ रद्दी के ठेले तक ही जाकर मर जाती है l सातों जिलो में फैला खनन का सिंडीकेट सरकार की सहमती से चलता है चाहे सरकार किसी की भी रहे l

शिवा जैन : खनन माफियाओं पर आतंक बनकर टूटने वाली बहादुर आईएएस अधिकारी को खनन माफिया के दवाब में आकर उत्तर प्रदेश सरकार ने निलम्बित कर दिया.. यदि आप चाहते हैं कि इस देश में ईमानदार अफसर निडर हो कर अपने कर्तव्य निभा सकें तो इस खबर को फेसबुक पर जितना फैला सकते हैं फैलाइए और सपा सरकार को एहसास करवाइए कि हम सब दुर्गा शक्ति के कंधे से कन्धा मिला कर खड़े हैं..

Subhash Tripathi : आईएएस के निलंबन से बढ़ेगा हतोत्साहन.. भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन की चर्चा पूरे देश में तल्खी के साथ हो रही है। आईएएस की ईमानदारी को लेकर हर कोई निलंबन की कार्यवाही गलत बता रहा है। दिल्ली से लेकर आगरा तक कई लोगों ने व्यक्तिगत तौर से भी मुझसे इसकी चर्चा कर आपत्ति जताई। देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों के साथ खनन माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने वाली दुर्गाशकित के निलंबन को लेकर खबरें सुर्खियों में हैं। दूसरे राज्यों के प्रमुख अखबारों प्रभात खबर व देश बंधु जैसे अखबारों ने भी निलंबन की आलोचना करते हुए खबर को प्रमुखता से प्रथम पेज पर स्थान दिया है। आईएएस नागपाल यथा नाम तथा गुण दिखती हैं। अगर ऐसों का निलंबन हुआ तो ईमानदार अफसरों में हतोत्साहन बढ़ेगा। वैसे ही अब ये गिनती के रह गए हैं।

Mansi Manish : इस देश में आईएएस-पीसीएस बनकर सिर्फ चमचागीरी करनी होती है..जरा भी दायें-बायें किया तो वही होता है जो दुर्गाशक्ति नागपाल के साथ हुआ… बालू माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत करने वाली आईएएस अधिकारी को उत्तर प्रदेश सरकार ने ससपेंड कर दिया… बहाना ये ढूँढा कि सांप्रदायिक सद्भाव के खिलाफ कदम उठाया… कोई नहीं,, सच सब जानते हैं… देखते हैं कितने और रोड़े आते हैं एक बेहतर अधिकारी के रस्ते में

Sandeep Garg : सच हारने लगा है

संसद में मनमोहन सिंह ने सच को हरा दिया ,
देश और अन्ना के साथ किये वादों से मुकर गए ,

UP में अखिलेश सरकार सच को हरा दिया ,
ईमानदार IAS ऑफिसर को ससपेंड कर दिया ,

हरियाणा की हुड्डा सरकार ने सच को हरा दिया ,
वाड्रा के खिलाफ कारवाई करने वाले ऑफिसर का तबादला कर दिया ,

देश में हुए हर घोटाले के आरोपी आजाद घूम रहे हैं ,
162 अपराधी संसद में बैठे हैं ,

झूठ सच को मारने लगा है ,
सच अब हारने लगा है ,

अपने वोट का सही इस्तमाल कर ,
आम आदमी देश और सच को बचा सकता है ,
भ्रष्ट नेताओ के देश को ,
आम आदमी का देश बना सकता है , जय हिन्द

Aam Aadmi Party : IAS officer Durga Shakti Nagpal, who was in news last week for clamping down on illegal sand mafia in Greater Noida, has been suspended. The reason for the suspension of Nagpal is not clear yet. According to sources, the Samajwadi party leader Narendra Bhati was peeved against IAS officer's drive against illegal mining and thus complained about her to the SP leadership. The SP leader allegedly did this to settle scores with the officer. Nagpal had led the seizure of 24 dumpers engaged in illegal quarrying and arresting 15 people last week. This kind of action against honest officers is unacceptable.

Braj Bhushan Dubey : मुख्‍यमंत्री जी ! क्‍या कुसूर था इस भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी का। यही न कि इसने आपके विधायकों/मंत्रियों की गलत पैरवी/आदेश को नहीं माना होगा। एक बात तो साफ है कि यह अभी चोर और भ्रष्‍ट नहीं होगी इतने कम समय की नौकरी यानि कि अण्‍डर टेनिंग में। बडे उत्‍साह से नौकरी ज्‍वाइन किया होगा कि कुछ बेहतर करेंगे, सुधार करेंगे, भ्रष्‍टाचार को समाप्‍त करने का प्रयास करेंगे। गलत लोगों को कानून के हवाले करेंगे आदि। यह कौन सा गुनाह हो गया। आपका चेहरा अब विगडता जा रहा है इसे ठीक कीजिये अन्‍यथा जो लोग आपकी तारीफ करते नहीं अघाते थे वे आपको कोसेंगे और आगे हिसाब भी लेंगे। भगवान आपको सदबुद्धि दें।

फेसबुक पर आ रहीं प्रतिक्रियाओं में से कुछ का संकलन.

काश, मीडिया वाले दुर्गा की ईमानदारी का दस फीसद हिस्सा भी अपने में समेटकर काम कर रहा होते

Vineet Kumar : आप ग्रेटर नोएडा की एसडीएम दुर्गा शक्ति नागपाल के सस्पेंड किए जाने की घटना को उसकी ईमानदारी की सजा कह लीजिए लेकिन असल में ये उसी ग्रेटर नोएडा में कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे मीडिया के मैनेज होकर काम करने, अखिलेश यादव सरकार के चंपू बनकर रहने का नतीजा है. मीडिया अगर दुर्गा की ईमानदारी का दस फीसद हिस्सा भी अपने में समेटकर काम कर रहा होता तो मजाल है कि अखिलेश यादव की सरकार उसे सस्पेंड कर देती ? उसके कदमों के आगे बिछी मीडिया ने दुर्गा को इस हालत में पहुंचाया है.

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दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन की खबर के साथ "रेत माफिया का अखिलेश सरकार पर दवाब" जैसा पुछल्ला लगाकर खबरें प्रसारित करने से मीडिया को लग रहा है कि जैसे दर्शक-पाठक ये समझ ही नहीं रहे हैं कि उसने अब तक इससे जुड़ी खबरें प्रसारित नहीं की इसलिए दुर्गा जैसी ईमानदार अधिकारी के साथ ऐसा करने की जुर्रत अखिलेश यादव सरकार ने की. अखिलेश यादव क्या, देश की किसी भी राज्य सरकार को मीडिया से किसी भी स्तर पर न तो खौफ है, न संकोच और न ही पकड़े जाने का डर. नहीं तो जिस ग्रेटर नोएडा में दर्जनों नेशनल चैनल हों, वहां मजाल है कि रेत माफिया काम करते रहें और सरकार पर मीडिया का दवाब न बने. रेत तो छोड़िए, इस नोएडा में और भी बहुत कुछ होता है लेकिन सरकार के आगे लोटनेवाले मीडिया के बूते नहीं है उसे सामने लाना.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

मैं अपने अपमान और धमकी का मामला राजुल माहेश्‍वरी और केंद्रीय संपादकों तक ले जाऊंगा : शंभू दयाल वाजपेयी

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला , बरेली ने मेरे बारे में कल जिस तरीके से व्यक्तिगत हमला करते हुए द्वेषपूर्ण – अपमानकारी छापा है और 'कपडे उतार लेने' की धमकी दी हैं उससे मेरा परिवार बेहद परेशानी में है। पत्‍नी अवसाद में हैं । दोनों बच्‍चे सहमे हैं और डरे हैं कि अमर उजाला वाले पता नहीं क्‍या करवा दें। मैं लगभग 22 -23 वर्षों से सपरिवार बरेली आवासित हूं और यहां तथा निकटवर्ती जिलों में और खास कर कुमाऊं में एक ठीक ठाक पहचान रखता हूं। अच्‍छे सामाजिक और पत्रकारी संबंधों का दायरा है। दर्जनों ऐसे वरिष्‍ठ पत्रकार और संपादक हैं जिनको अखबार में रखवाने और सिखाने में कभी मददगार बना हूं।

अमर उजाला में छपे आइटम को लेकर लोग पूछते हैं तो जवाब नहीं दे पा रहा । मानसिक और भावात्‍मक रूप से आहत – व्यथित हूं। इसलिए और अधिक क्‍योंकि अमर उजाला जैसे बडे अखबार ने छापा है। अशोक अग्रवाल और अतुल माहेश्‍वरी के जमाने में यह अखबार पश्चिमी उप्र का सर्वाधिक प्रतिष्ठित अखबार था लेकिन इस का स्‍तर क्‍या हो गया है इस का सहज अंदाजा मेरे बारे में छपे आइटम से ही लगाया जा सकता है। मैं देश के संपादकों- पत्रकारों और चिंतनशील बुद्धिजीवियों से विनम्र अनुरोध करना चाहता हूं कि वे इस ' आइटम' की भाषा – भंगिमा को पढ- देख कर यह बताने का अनुग्रह करें कि क्‍या यह अनुमन्‍य अखबारी – पत्रकारी भाषा है ? मैं इसे पंपलेटी भाषा और शैली मानता हूं । बेहतर होता कि ये अपने उद्देश्‍यपूर्ति के लिए मेरे बारे में पंपलेट -पर्चे छपवा कर बंटवा देते।

जीवन में आरोप वगैरह लगते रहते हैं। अकारण भी लोग निजी तौर पर वैर भाव – दुश्‍मनी मान लेते हैं। लेकिन एक बडा अखबार इस स्‍तर पर उतर आयेगा , यह मेरे लिए अकल्‍पनीय है। मैं इस बात से और विस्मित हूं कि इसके संपादक दिनेश जुयाल के साथ मैंने अमर उजाला , कानपुर में करीब 20 वर्ष पहले काम किया है और तब से उनके हमारे बीच निजी पारिवारिक रिश्‍ते हैं। आना -जाना है। मेरे विचार , पारदर्शी रहन सहन वगैरह के बारे में कमोबेश भलीभांति वाकिफ हैं।इसके सिटी चीफ पंकज सिह से भी तीन चार साल से सम्‍पर्क है। वह मेरे आवास आते रहे और सम्‍मान भाव ही प्रदर्शित करते रहे हैं। मैं आजन्‍म बिकने वाला रहा हूं यह बात इसके पहले इन्‍होंने पहले कभी क्‍यों नहीं बतायी । बताते तो अपना संबंध – धर्म ही निभाते ।

अब महज इस लिए कुपित हो गये कि मैं ने शहर के सब से बडे अस्‍पताल गंगाशील को मनमाने ढंग से बंद करा दिये जाने के खिलाफ फेस बुक पर लिखा और उसे सब से बड़ी मीडिया वेबसाइट भडास4 मीडिया ने भी छापा। भाई मैंने अपने लिखे में अमर उजाला या इसके किसी पत्रकार भाई का नाम तो लिया नहीं था। मामले को छाप तो नगर के अन्‍य प्रमुख अखबार दैनिक जागरण और हिंदुस्‍तान भी रहे थे। आपने तो नाहक ही मुझ बेरोजगार पत्रकार पर अपने अखबार की तोप तान दी।

मैं एक जागरूक भारतीय नागरिक और पत्रकार होने के नाते अपने अभिव्‍यक्ति की संवैधानिक सीमाओं और अधिकारों से से परिचित हूं। आप जो कहें और आपका अखबार जो लिखे उसी पर अक्षरस: सब ताली पीटें । आपके ही चश्‍मे से चीजों को देखा जाय अन्‍यथा आप धो देंगे, मिट्टी में मिला देंगे , कपडे उतार लेंगे । अपने इस कृत्‍य को आप पत्रकारिता का धर्म मानते रहें । मैं इसे अभिब्‍यक्ति की आजादी पर हमला मानता हूं। अमर उजाला की स्‍वेच्‍छाचारिता और अखबारी आपराधिक आतंक मानता हूं।

अमर उजाला के दिये ताप-संताप से किंचित उबरने के बाद मैं अपने अपमान और धमकी का मामला इसके मालिक राजुल माहेश्‍वरी और केन्‍द्रीय संपादकों तक ले जाऊंगा। यह बताने के अनुरोध और अपेक्षा के साथ कि क्‍या इसे वे सही मानते हैं। अगर नहीं तो क्‍या कार्रवाई करते हैं। यदि हां, तो मुझे यह समझने में सुविधा होगी कि अखबार में कुछ भी और किसी भी ढंग से किसी के बारे में लिखा -कहा जा सकता है।

मैं एक साल से आजीविका की दृष्टि से खाली जरूर हूं लेकिन पत्रकारी पेशे और जरूरत से टायर्ड- रिटायर्ड नहीं हूं। अपने मन माफिक ही काम करने का आदी हूं, नौरी का नहीं। दो तीन जगह बातचीत चला रहा हूं। दो तीन महीने में कहीं बैठे होने की उम्‍मीद है। आप से मिला ज्ञान तब मेरे काम आ सकता है। कहीं मदद न मिले तो हारे को हरिनाम, अदालत का आश्रय भी है। आप जैसे सर्व समर्थ – सम्‍पन्‍न संस्‍थान से मुकदमा लडने को मेरे पास आजकल पैसे नहीं है। इसलिए बरेली बार एसोसिएशेन से जा कर नि:शुल्‍क कानूनी सहायता दिलवाने का अनुरूध करूंगा।

एक बात से शायद आप जान कर अनजान बने हैं। अखबारों ने मुझ से मुक्ति नहीं पायी है। मैंने दैनिक जागरण से रिटायरमेंट की आयु 58 साल पूरी करने से तीन महीने पहले इस्‍तीफा दिया था। एक तो परिवार बरेली और मैं गोरखपुर था। दूसरे बरेली में बरेली में नये अखबार 'नमस्कार बरेली' की योजना बनी थी। मैं कल अपने गांव घर से लेकर यहां तक की कुल सम्‍पत्ति घोषित करूंगा। अमर उजाला से अपेक्षा करूंगा कि वह उसकी पूरी जांच करवा ले। 26 साल की अखबार की नौकरी के बाद मेरे पास क्‍या है और इस अवधि में उसके लोगों के पास क्‍या है, अमर उजाला को घोषणा करनी चाहिए। आपकी सलाह / धमकी और मंशा पर बिंदुवार उत्‍तर कल।

अमर उजाला में जो छापा गया है, वह यहां है, क्लिक करके पढ़ें- Amar Ujala Dhamki

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

प्रेस काउंसिल ने मीडियाकर्मियों पर अत्याचार का मामला सही पाया, कार्रवाई व मुआवजे के निर्देश

हाथरस। विधान सभा चुनाव की पोलिंग पार्टियों की रवानगी की कवरेज करने गए मीडिया कर्मियों के साथ अभद्रता, कैमरे आदि तोड़ने तथा मारपीट कर घायल कर देने के मामले की कराई गई शिकायत को भारतीय प्रेस परिषद ने सही पाया है। इस मामले में परिषद ने दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने, नुकसान की भरपाई करने के आदेश शासन-प्रशासन को दिए हैं।

विधान सभा चुनाव के लिए पोलिंग पार्टियों की रवानगी से पूर्व गत 27 फरवरी 2012 को स्थानीय एमजी पॉलीटेक्निक में अराजकता का माहौल था। जिस पुलिस के पास नागरिकों की सुरक्षा का जिम्मा रहता है, वही पुलिस कर्मी अराजकता का नंगा नाच कर रहे थे। लाठी, डंडों व रायफल की वटों से सभी को पीटा जा रहा था।

वहां कवरेज करने गए पत्रकारों व छायाकारों के साथ जमकर तांडव का नंगा खेल खेला। जिससे वह घायल हो गए तथा उनके उपकरण टूटकर बिखर गए। इस मामले में पत्रकार अतुल कुलश्रेष्ठ व लालता प्रसाद जैन ने यह मामला भारतीय प्रेस परिषद में दर्ज कराया था। इस मामले में बनारस में प्रेस परिषद ने सुनवाई की। परिषद ने मुख्य सचिव सहित प्रशासन की ओर से डीएम व एसपी को तलब किया था। पूरा प्रकरण सुनने के बाद शिकायत को सही पाया और निर्णय सुनाते हुए कहा कि इस मामले में दोषी पुलिस कर्मियों के खिलाफ एक्शन लिया जाए। पत्रकारों के हुए नुकसान की भरपाई सहित उन्हें उचित मुआवजा दिया जाए। इस सुनवाई में पत्रकारों के प्रतिनिधि के रूप में एडवोकेट गौरव अग्रवाल, सामाजिक कार्यकर्त्ता प्रवीण वार्ष्णेय तथा प्रशासनिक प्रतिनिधि के रूप में एसडीएम जेके जैन मौजूद थे। प्रेस काउंसिल का फैसला आने के बाद यहां पॉलिटैक्निक में पत्रकारों ने एक बैठक कर प्रेस काउंसिल के फैसले का स्वागत किया और इस मामले में अपनी जीत होने पर खुशियां मनाई।

चेन लुटेरों का महिला पत्रकार ने पीछा किया तो पिस्तौल दिखा डराया

जालंधर से खबर है कि थाना डिवीजन नंबर 5 के अंतर्गत आते बद्री कालोनी में अपनी बेटी को एक्टिवा पर स्कूल बस तक छोड़ने आई एक महिला पत्रकार से बाइक सवार दो झपटमार चेन छीन कर फरार हो गए। महिला पत्रकार ने बहादुरी दिखाते हुए जब उनका पीछा करने की कोशिश की तो झपटमारों ने उस पर पिस्तौल तान दी और फरार हो गए।

पुलिस को दी शिकायत में ऊषा पवार ने बताया कि वह सुबह करीब साढ़े सात बजे अपनी बेटी को बाबू जगजीवन राम चौक तक छोड़ने के लिए जा रही थी जहां पर उसकी बस आती है। उसने बताया कि वह बेटी को उतार कर जैसे ही वापस आने लगी तो बाइक पर सवार दो झपटमार उसके गले से चेन छीन कर फरार हो गए। उसने अपनी एक्टिवा से उनका पीछा करना शुरू किया तो थोड़ी सी आगे जाने पर झपटमारों ने पिस्तौल उस पर तान दी। इसके चलते वह रुक गई और झपटमार फरार हो गए। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
 

डीएलए, गाजियाबाद से इंदु शेखावत, रोहित शर्मा, रामबीर सिंह, पिंटू रावल का इस्तीफा

डीएलए, गाजियाबाद से सूचना है कि सीनियर सब एडिटर इंदु शेखावत, रोहित शर्मा, सरकुलेशन से रामबीर सिंह और पिंटू रावल ने डीएलए छोड़ दिया है. फेसबुक पर इंदु शेखावत की पोस्ट के मुताबिक उन्होंने डीएलए को अलविदा कह दिया है, वे किस अखबार से जुड़ेंगे, इसका अभी खुलासा नहीं हो सका है. रोहित शर्मा भी अखबार की तलाश में हैं. डीएलए, गाजियाबाद कार्यालय में संपादक के अलावा अब दो रिपोर्टर ही रह गए हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

‘हिन्दुस्तान’ व ‘जागरण’ पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप, आरक्षण समर्थकों ने नारा लगाया ‘ब्राह्मणवादी मीडिया से सावधान’

इलाहाबाद। आरक्षण के नये फार्मूले पर इलाहाबादी मीडिया के कुछ संस्थानों द्वारा एक तरफा कवरेज पर समर्थक प्रतियोगी छात्रों में काफी गुस्सा है। आरक्षण के समर्थन में दो दिन से जगह-जगह हो रहे विरोध-प्रदर्शन के दौरान मीडिया कर्मी भी उनके निशाने पर हैं। शनिवार व रविवार को कई जगहों पर समर्थकों के विशाल हुजूम से मीडिया के खिलाफ जमकर नारे बाजी की गयी। सपा जिलाध्यक्ष पंधारी यादव के घर घेराव व तोड़फोड़ के दौरान समर्थकों में मीडिया के खिलाफ गुस्से को देख फोटोग्राफर कवरेज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

दरअसल लोकसेवा आयोग द्वारा लागू त्रिस्तरीय आरक्षण के मुद्दे पर शहर में हुए उग्र विरोध-प्रदर्शन के दौरान कुछ बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों द्वारा की गई रिपोर्टिंग पर सवालिया निशान लग रहे हैं। खासकर मीडिया की आरक्षण विरोधी भूमिका पर। इस घटना की रिपोर्ट की विभिन्न समाचारों की प्रस्तुति में भिन्नता दिखायी देगी। विभिन्न भी घटना के दृश्यों मंे भी अपने-अपने तरीके से चुनाव किया गया। किसी भी पाठक और दर्शक के लिये यह एक उत्सुकता का प्रश्न हो सकता है कि आखिर एक ही घटना की प्रस्तुति में यह भिन्नता क्यों है। दरअसल समाचार लिखने वालों की पृष्ठिभूमि में भिन्नता है। इनमें कौन दलित, पिछड़े और सवर्ण हैं, यह साफ-साफ समझा जा सकते है।

आरक्षण समर्थकों ने मीडिया के खिलाफ गुस्से का इजहार एक पर्चा निकालकर किया है, जो इलाहाबाद में चर्चा का विषय बना हुआ है। पर्चे में आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के दौरान दैनिक हिन्दुस्तान के संपादक दयाशंकर शुक्ला ‘सागर’ व दैनिक जागरण के चीफ रिपोर्टर हरिशंकर मिश्रा पर एकतरफा रिपोर्टिंग का आरोप लगाया गया है। पर्चे में लिखा गया है कि इन दोनों लोगों ने पत्रकारिता के सिद्धांतों को ताक पर रख कर कवरेज कराया और अपने पत्रों में प्रमुखता से खबर छापी। उन पर ब्रह्मणवादी होने का आरोप है और पर्चे में कहा गया है कि ब्राह्मण वादी मीडिया से सावधान!

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.

पत्रकार श्रद्धानिधि प्राप्त करने में राधा वल्लभ शारदा पर धोखाधड़ी का आरोप

भोपाल : वर्किग जर्नलिस्ट यूनियन मध्यप्रदेश के स्वयं भू प्रांतीय अध्यक्ष राधा वल्लभ शारदा पर पत्रकार विनय जी. डेविड ने पत्रकार श्रद्धानिधि प्राप्त करने में धोखाधड़ी का आरोप लगाया है। विनजय जी डेविड ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार है…  म.प्र. राज्य शासन ने मध्यप्रदेश में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ और बुर्जुग पत्रकारों के लिये श्रद्धानिधि योजना चालू की जिसकी स्वीकृति आदेश किये गये एवं विधिवत श्रद्धानिधि प्राप्त करने के लिये नियम एवं योजना बनाई गई। जिसमें 10 बिन्दुओं के आधार पर योजना का लाभ पत्रकारों को दिये जाने थे।

श्रद्धनिधि स्वीकृत किये जाने के लिये विधिवत 13 बिन्दुओं की जानकारी सहित आवेदन पत्र चाहे गये थे। जिसके साथ नोट में चार बिन्दुओं में पहली शर्त श्रद्धानिधि की नियम एवं शर्ते बताई गई है वहीं बिन्दू क्रमांक 10, 11 एवं 12 के संबंध में शपथपत्र प्रस्तुत किया जाना हैं वहीं अन्य दो शर्ते पेमेन्ट के मामले की है।

नियम और शर्तोँ से ज्ञात होता हैं कि यह योजना उन वरिष्ठ और बुर्जुग निर्धन पत्रकारों के लिये है जो अन्य कारणों से सक्षम नहीं। वहीं बिन्दु क्रमांक 3 स्पष्ट करती है कि आवेदक आयकर दाता श्रेणी में नहीं आता है वहीं इस बाबत शपथपत्र भी चाहा गया। बिन्दु क्रमांक 7 पर स्पष्ट बताया गया हैं (ज्यों का त्यों) अधिमान्य पत्रकार पर किसी प्रकार का कोई अपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं होना चाहिए। साथ ही आवेदन में बिन्दु क्रमांक 11 और 12 से जानकारी चाही गई।

श्रद्धानिधि की रकम प्राप्त करने करने के लिये राधावल्लभ शारदा इन दोनों बिन्दुओं के कारण अपात्र है। शारदा को नियमित विज्ञापन प्राप्त होता है जो आयकर के दायरे में हैं और से आयकरदाता की श्रेणी में आते है और दूसरे बिन्दु के आधार पर आवेदक के ऊपर कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं होना चाहिये तो हम बता दे कि शारदा के ऊपर धारा 420 का प्रकरण दर्ज (जनसंपर्क के सभी अधिकारियों को जानकारी है ) हैं। अब नियम विरूद्ध षडयंत्र कर इन्होंने श्रद्धानिधि में अपना नाम जुड़वा लिया। इसका प्रमाण है जनसंपर्क संचालनालय मध्यप्रदेश का आदेश क्रमांक 5081/ज.सं.सं./ अधिमान्यता (श्र.नि.)/13-14 भोपाल, दिनांक 26 जुलाई 2013। आयुक्त जनसंपर्क श्री राकेश शर्मा ने प्रथम सूची जारी की हैं उसमें 48 नम्बर पर इनका नाम प्रदर्शित हैं जिसमें बकायदा क्रमांक 48श्री राधा वल्लभ शारदा, भोपाल जन्म्तिथि  01/02/1943 आयु 69 वर्ष दर्शाई गई हैं। अब जब श्रद्धानिधि योजना का लाभ प्राप्त करने के लिये शारदा ने साजिश की है तो अब एक प्रकरण 420 का और दर्ज किया जा सकता है आखिर शासन को और प्रदेश के पत्रकारों का शोषण करने वाला शारदा को इस योजना के लाभ लेने की क्या आवश्यकता थी।

‘जातिपॉश’ में फंस गयी सपा सरकार, मुलायम कुनबे तक पहुंची आरक्षण की तपिश

उ0प्र0 में हाईकोर्ट ने जाति आधारित रैलियों व सम्मेलनों पर तो रोक लगा दी है। लेकिन इसी प्रदेश में अब ‘जातिवाद’ का एक बहुत घिनौना स्वरूप प्रकट हो रहा है। आरक्षण के नाम पर ऐसी गंदी राजनीति राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं। उत्तर प्रदेश में सभी जातियों को आपस में लड़ाया जा रहा है राजनीति करने के लिये। यह बहुत खतरनाक प्रवृत्ति जन्म ले रही है। समाज की अत्यंत पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने के लिये सरकारी सेवाओं में व्यवस्था की गयी पर यह ‘आरक्षण व्यवस्था’ राजनीति का औजार बन गयी है। अधिक से अधिक सुविधा बटोरने के लिए जातियां लामबंद हो रही हैं। पॉलिटिक्स करने वाले उसका लाभ उठा रहे हैं। यह ‘वाद’ टूटने की बजाय और मजबूत हो रहा है।

जातियां ‘गैंग’ के रूप में ‘वार’ कर रही हैं। वोट बटोरने के लिए जातियां मुख्य आधार बन गयी हैं। यूपी में ‘वाद’ के तिलस्म के आगे साम्यवाद की वर्गीय राजनीति औंधे मुॅह गिर गयी लगती है। वर्गों में समायीं भिन्न-भिन्न जातियां अब आपस में वर्चस्व की लड़ाई लड़ने के मूड में हैं। सपा सरकार के आरक्षण के नये फार्मूले से जो तूफान उठा है, उसमें पिछड़े वर्ग में ही अलग-अलग जातियों की भयंकर नाराजगी गौरतलब है, जिसे देख समाजवादी नेता मुलायम सिंह का पूरा कुनबा सहमा हुआ है। स्थिति यहां तक आ गयी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आरक्षण के नये फार्मूलेे से पीछे हटना पड़ा। उन पर ‘यादववाद’ का आरोप लगा, अन्य पिछड़ी जातियां खुलेआम पक्षपात के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार कर रही हैं।

सवर्ण प्रतियोगी छात्र इसे अपनी जीत मानकर कितना ही जश्न मनाएं, लेकिन हकीकत यह नहीं है। लोक सेवा आयोग कार्यालय के सामने इलाहाबाद में हुए आरक्षण विरोधी उग्र प्रदर्शन से इस सरकार को फर्क पड़ने वाला नहीं था। जबरदस्त ‘यादववाद’ के आक्षेप से घिरे इस सत्तालोलुप कुनबे को जब पार्टी का ‘बेस वोट बैंक’ खिसकता नजर आया तो आनन-फानन में आरक्षण के नये फारमूले को वापस ले लिया गया। यह बात इन्हें तब पता चली जब आरक्षण समर्थकों के दल से यादव प्रतियोगी छात्रों को छोड़, पिछड़े वर्ग की अन्य जातियांे ने रणनीतिक तरीके से दूरी बना ली। यही नहीं अन्य पिछड़ी जातियों के प्रतियोगी छात्र अब मुलायम के पूरे कुनबे को पानी पी-पी कर गरिया रहे हैं।    

देश की आन्तरिक दुर्बलताओं में कई तरह के ‘वाद’ राष्ट्रीय पतन के कारण बने हैं। ये ऐसे रोग हैं, जो भारतीय समाज को घुन की तरह अन्दर से खोखला कर रहे हैं। जातिवाद ने तो असाध्य रोग का रूप धारण कर लिया है। आरक्षण के नये फार्मूले से इस समय जातियों, उपजातियों में शीत युद्ध छिड़ा हुआ है। पिछले 15 दिन से इलाहाबाद शहर अराजकता की आग में जल रहा है। पहले जहां चारों तरफ आरक्षण विरोधी छात्रों का तांडव तारी था तो वहीं अब आरक्षण समर्थक बवाल काट रहे हैं। पुलिस प्रशासन बेचारा बना हुआ है। लोकसभा चुनाव सिर पर है। बेरोजगारी भत्ता व लैपटॉप वगैरह से सपा के पक्ष में जो थोड़ा बहुत माहौल बन रहा था, उसमें पलीता लग गया है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की हालत- भइ गति सांप-छछुन्दर केरी, उगलत, निगलत प्रीति घनेरी जैसी हो चुकी है। सरकार न तो आरक्षण विरोधियों को नाराज करना चाहती है और न ही समर्थकों को ही। इधर आरक्षण के नये फार्मूले को वापस लिया तो उधर काफी विरोध के बावजूद डा0 अनिल कुमार यादव को पुनः लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। स्थिति बेहद नाजुक है। कई शहरों में छात्रों के बीच आपस में टकराव व हिंसा के आसार हैं। सपा के बड़े-बड़े नेता, मंत्री, सांसद, विधायक सहमे हुए हैं। आक्रोशित प्रतियोगी छात्र लाठी-डंडा लेकर सपा नेताओं के घरों-दफ्तरों पर धावा बोल रहे हैं। इस क्रोधाग्नि में आरक्षण विरोधियों व समर्थकों में अजीब किस्म की साम्यता है। दोनों के टारगेट पर सपा नेता हैं।

अखिलेश सरकार के आशिर्वाद से निकला आरक्षण का भस्मासुर विकराल तांडव कर रहा है। पूरा यूपी ‘जातिवाद’ के मझधार में फंसा है। कैसे निकलें इससे। ‘जाति’! हाय री जाति! जाति-जाति रटते, जिनकी पूंजी केवल पाखंड। महात्मा बुद्ध के समय से इस कुप्रथा पर चोट मारी जा रही है। जाति मिटाने को बड़े-बड़े आन्दोलन चले। अनेक समाज सुधारकों ने इस पर करारा प्रहार किया। कबीर से लेकर नानक, रैदास तक ने इस कीचड़ से उपर उठने के लिये लोगों की आत्मा को झकझोरा । महर्षि दयानंद, विवेकानंद, रामा स्वामी, महात्मा फुले, डा0 अम्बेडकर, गांधी जी, इन सब ने अपने-अपने ढंग से जाति प्रथा को समाप्त करने की कोशिश की। जिसे कभी  मुलायम सिंह अपना गुरु बताते थे, उन डा0 राममनोहर लोहिया ने स्वयं जाति तोड़ो का नारा दिया। आधुनिक भारत में जेपी व डा0 लोहिया दोनों ने ही आजीवन जातिविहीन समाज बनाने का प्रयास किया। पर यह ऐसा रोग है कि दूर होने का नाम ही नहीं लेता।

आरक्षण प्रक्रिया में बदलाव से आपसी सद्भावना का माहौल बिगड़ रहा है। यह पाक रमाजान का महीना है। तीज-त्योहारों का मौसम सावन भी सबाब की ओर है। एक तरफ रोजेदार इबादत में मशगूल हैं तो दूसरी ओर शिव भक्त कांवरियों का बोल बम, बोल बम गुंजायमान है। संगम नगरी का समाज बहुभाषी, बहुसंस्कृति और बहुधर्मी रहा है। गंगा-जमुनी तहजीब की नगरी प्रयाग की यही विशेषता रही है। सनातन धर्म के साथ-साथ ढाई हजार वर्ष से बौद्ध व जैन धर्म यहां रहा है। सैकड़ों सालों से ईसाई व पारसी धर्म के मानने वाले यहां शांति चैन से रहे हैं। इस्लाम भी सैकड़ों सालों से इस शहर में है। इसी इलाहाबाद से अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान और सभी ने मिलकर संघर्ष किया। पर अंग्रेज जाति और धर्म के नाम पर इंसानों के बीच दरार पैदा करने में सफल हुए। जाति और धर्म के नाम पर देश को बांटने तथा राज करने की नीतियां चलायीं। उसी समय से धर्म के नाम पर कटुता फैली, नतीजतन दंगे होने लगे। हिन्दू-मुसलमानों के बीच मारकाट होने लगी। जातियां आपस में लड़ गईं। आजादी के बाद भी धर्म व जाति के नाम पर राजनीति बंद नहीं हुई। कालांतर में यह मुद्दे राजनीति का औजार बन गये। मंदिर-मस्जिद के झगड़े, रामसेतु का झगड़ा, गोधरा कांड, मूर्तियां विखंडित करने के कुत्सित प्रयासों ने समाज को बहुत तोड़ा है। अब सामाजिक विघटन की प्रक्रिया को और आगे बढ़ा रहा है यह ‘जातिवाद’। जातीय टकराहट अब भारतीय राजनीति की सबसे बेस्ट पॉलिसि और खतरनाक शतरंजी चाल है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अब समाज को तोड़ने वाली अधिकांश घटनाओं के पीछे राजनीति का ही हाथ है। लोग मिलजुल कर रहना चाहते हैं पर राजनेता और धर्म नेता अपने निहित स्वार्थों के कारण शांति और सद्भावना का वातावरण विगाड़ते रहते हैं।

क्या कारण है इस महामारी का? उसका जवाब शायद डा0 लोहिया के एक वक्तव्य से मिल सकता है। 1961 में उन्होंने कहा था ‘‘ संप्रति धर्म और राजनीति का सम्बंध बिगड़ गया है। धर्म दीर्घकालीन राजनीति है तो राजनीति अल्पकालीन धर्म’’ है। धर्म श्रेय के लिये तो राजनीति बुराई के खिलाफ लड़ती है। आज बुराई के खिलाफ लड़ाई में धर्म प्राणहीन हुआ है तो राजनीति बहुत ही कलह की और बेमतलब हुई है। वह कहते थे कि सामंती शोषण के तीन हथियार हैं-जाति, भाषा और दाम नीति। उन्हीं दिनों उन्होंने नारा दिया-अंग्रेजी हटाओ, ‘‘जाति तोड़ो’’ और दाम बांधों। लेकिन उनके अनुयायी यह क्या कर रहे हैं। जाति-धर्म के नाम पर ऐसी आपसी नफरत पैदा की जा रही है जिसका परिणाम भयावह है।

नई आर्थिक नीति ने इस नफरत की अग्नि में घी डालने का काम किया है। खेती को घाटे का सौदा साबित कर कृषि पर आधारित लघु उद्योगों को बर्बाद कर दिया गया। हमारी सदियों की आत्मनिर्भरता छिन्न-भिन्न हो गयी। नतीजतन अब गांव-गांव में बेरोजगारों की विशाल फौज खड़ी हो गयी। कोई स्वरोजगार न होने से वे केवल और केवल नौकरी पर आश्रित हो गये हैं। उनकी चेतना इस कदर कुन्द कर दी गयी है कि अब उन्हें लग रहा है नौकरी नहीं होगी तो वह भूंखें मर जायेंगे। उनका सारा पुरषार्थ एक अदद नौकरी के लिये संघर्ष कर रहा है। इसके लिये वह आज कुछ भी करने को तैयार हैं। राजनीति के चतुर खिलाड़ी युवाओं की इस लाचारी, मजबूरी को समझ चुके हैं। तो नौकरी के लिए महासंग्राम तो होना ही है। जगह-जगह गृहयुद्ध जैसी परिस्थितियां चल रही हैं। जियो हे यूपी के लाला……

इलाहाबाद से राजीव चन्देल की रिपोर्ट.

छात्रावास की मांग को प्रखर बनाने के लिए पांच अगस्त को आईआईएमसी पहुंचें

भारतीय जनसंचार संस्थान, नईदिल्ली में पिछले ढाई दशकों से छात्रों को छात्रावास की सुविधा से वंचित रखा गया है, जबकि यहां अन्य देशों के छात्रों एवं छात्राओं को यह सुविधा हासिल है. वर्षों से जारी इस ग़ैर-बराबरी के ख़िलाफ़ संस्थान के पूर्व छात्रों की एक अहम बैठक 27 जुलाई, शनिवार को कनॉट प्लेस स्थित इंडियन कॉफी हाउस में संपन्न हुई.

इस बैठक में अलग-अलग सत्रों के कई पूर्व छात्रों ने हिस्सा लिया और सबों ने छात्रावास की अहमियत और इसके अभाव में छात्रों को होने वाली परेशानियों का ज़िक्र किया. सभी पूर्व छात्रों का कहना था कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान छात्रावास की महत्ता सिर्फ भोजन और आवासीय सुविधा की पूर्ति मात्र के लिए नहीं होती, बल्कि छात्रावास का महत्व उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों के बीच अधिक है.

छात्रावास की मांग को प्रखर बनाने के लिए पांच अगस्त को आईआईएमसी पहुंचेंछात्रावास की मांग को प्रखर बनाने के लिए पांच अगस्त को आईआईएमसी पहुंचेंछात्रावास होने से न सिर्फ कैंपस में शैक्षणिक माहौल बेहतर होता है, बल्कि छात्रावास में रहने से छात्रों के बीच देश, काल और परिस्थितियों के मुद्दों पर गंभीर बहस और चिंतन का वातावरण विकसित होता है. इसी स्वस्थ चिंतन और विचार से समाज खड़ा होता है और इसका सकारात्मक असर देश पर पड़ता है.

पूर्व छात्रों की इस बैठक में भारतीय जनसंचार के नए शैक्षणिक सत्र- 2013-14 के छात्रों को सत्र के पहले दिन से ही छात्रावास की अहमियत और इससे छात्रों को वंचित किए जाने के मसले पर जागरूक करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ. सभी छात्रों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि 5 अगस्त, सोमवार, 2013 को सत्रारंभ के समय, जिसे ऑरिएनटेशन यानी परिचय सत्र कहा जाता है, इस दौरान भारतीय जनसंचार संस्थान परिसर में सभी पूर्व छात्र नए छात्रों को छात्रावास के मुद्दे पर पर्चा और बैनर के ज़रिए जागरूक करेंगे. इसके अलावा, नव प्रवेशी छात्रों के बीच छात्रावास के लिए एक मांग-पत्र वितरित किया जाएगा, जिसमें उनसे नाम, पता, सत्र, मोबाइल नंबर और ईमेल के बारे में जानकारी मांगी जाएगी. यही मांग-पत्र एकत्र कर संबंधित मंत्रालय को भेजा जाएगा.

इस बैठक में सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री मनीष तिवारी ने नाम एक ज्ञापन तैयार किया गया, जिसमें उनसे छात्रावास का निर्माण शीघ्र शुरू कराने की मांग की गई. इस ज्ञापन में सभी पूर्व छात्रों ने अपने हस्ताक्षर किए. इस ज्ञापन को माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री को रजिस्टर्ड डाक से पावती( इकनॉलेजमेंट) सहित सोमवार 29 जुलाई को भेजा जाएगा. भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व छात्रों की इस बैठक में सरोज कुमार( 2011-12), चेतना भाटिया( 2008-9), संजीव कुमार साहू( 2010-11), केशव कुमार( 2010-11), वेद प्रकाश( 2012-13), शेखर समुन सिन्हा( 2012-13), निखिल कुमार वर्मा( 2010-11), देवेश खंडेलवाल( 2010-11), विनय जायसवाल( 2007-08), अनवीश कुमार राय( 2007-08), नवीन कुमार( 2007-08), विजय प्रताप( 2007-08), प्रणव सिरोही( 2007-08), मुनि शंकर( 2011-12), भूपेंद्र प्रताप सिंह( 2012-13), वरुण शैलेष( 2008-09), रमेश भगत( 2010-11), कपिल शर्मा( 2007-08), प्रवीण द्विवेदी( 2010-11) और अभिषेक रंजन सिंह (2007-08) ने हिस्सा लिया.

राजीव रंजन तिवारी और अशोक किंकर की नई पारी, अनिल पांचाल का तबादला

जनसंदेश टाइम्स, गोरखपुर में कार्यरत राजीव रंजन तिवारी ने इस्तीफा देकर राजस्थान पत्रिका के साथ नई पारी शुरू की है. वे जयपुर स्थित पत्रिका के आफिस में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर काम संभालेंगे. राजीव कई अखबारों में व विभिन्न शहरों में काम कर चुते हैं.

एक अन्य जानकारी के मुताबिक गवर्नेंस नाऊ मैग्जीन से अशोक किंकर भी जुड़ गए हैं. किंकर पहले भी आलोक मेहता के साथ काम कर चुके हैं.

मध्य प्रदेश के रतलाम से खबर है कि राजस्थान पत्रिका अखबार के रिपोर्टर अनिल पांचाल को हाल ही में हटा कर खंडवा भेजा गया पर उन्होंने वहां ज्वाइन नहीं किया है. प्रबंधन ने कई शिकायतों के बाद पांचाल का तबादला किया. नगर निगम के कुछ पार्षदों ने अनिल की करतूतों के बारे में संपादक अरूण चौहान को कई बार शिकायत दी. चौहान ने अनिल की जांच करवाई और अनिल को मौका दिया. बाद में अनिल का तबादला कर दिया गया.

दैनिक भास्कर, भीलवाड़ा से सूचना है कि यहां मार्केटिंग विभाग में तैनात तीन कर्मियों ने इस्तीफा दे दिया है.

अगर आपने भी कहीं से इस्तीफा दिया है या कहीं नई शुरुआत की है तो भड़ास के जरिए अपनी जानकारी सब तक पहुंचा दें. भड़ास तक अपनी बात पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

पत्रकार व परिवार पर एसिड फेंकने वाले गुंडे ने अब एक अन्य पत्रकार पर किया जानलेवा हमला

महाराष्ट्र के पुर्णा मे पिछले दिन पत्रकार दिनेश चौधर सहित उनके पूरे परिवार पर हुए ऍसिड हमले से पूरा महाराष्ट्र हिल चुका था. इस ऍसिड हमले के एक आरोपी अनिल कुरकुरेने कल रात्रि नौ बजे एक पत्रकार अनिल अहेरे पर जानलेवा हमला बोल दिया है. इस हमले में अहेरे का सिर फट गया है. पांव पर भारी चोट आयी है. उन्हें स्थानिक हस्पताल मे भरती किया गया है. इस वारदात की रिपोर्ट कल रात ही पुर्णा पोलिस को दी थी, लेकिन 'कल देखेंगे' कह कर पुलिस ने रविवार सुबह तक एफआईआर दाखिल नही किया था.

अऩिल अहिरे अपने बाईक से पुर्णा के पास के गांव देगाव से रात वापस आ रहे थे. बर्माला पूल पर कुछ लोगों ने उन्हे रोक दिया और यह लोग उन पर दंडे बरसाने लगे. जब अहिरे गंभीर जख्मी हो के गिर गये तो हमलावर वहां से भाग पड़े. कल रात साढ़े नौ बजे यह वारदात हुई. पुर्णा में गैर कानूनी धंधे चलते हैं. पुलिस इसे अऩदेखी करती है.जब कोई पत्रकार इसके विरोध मे अपनी कलम से आवाज उठाता है तो उसका आवाज हमले करके बंद किया जाता है.पिछले दिन दिनेश चौघरी पर जो ऍशिड हमला हुआ था उसमे शहर कांग्रेसका प्रेसिडेन्ट मास्टर माईंड है.सय्य्द अली सय्यद हसन नाम का यङ शस्ख गैरकानुनी गुटखा बेचता है यह उनपर आरोप है.इस बारे मे जब तरूण भारतने खबर छापी तो दिनेश चौधरीपर ऍसिड हमला किया गया था.

अली फिलहाल न्यायिक हिरासत में है.  उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में रखने के आदेश परभणी के जिला न्यायालय ने दिये हैं. अनिल कुरकुरे उनका ही साथी है. इस पर भी काफी सारे इल्जाम हैं. लेकिन पुलिस जिस सख्ती से पेश आनी चाहिए, उस सख्ती से पेश नहीं आ रही. इससे गुंडों का हौसला बढता जा रहा है और पत्रकार हमले के शिकार हो रहे हैं. पिछले पांच महीने में पत्रकार के उपर हुआ कल का दूसरा गंभीर हमला है. पुर्णा मे चल रहे इस गुंडा राज से पुर्णा के पत्रकार काफी दहशत में हैं. महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समितीने यह बात महाराष्ट्र के गृह मंत्री आर.आर.पाटील के कान पर डाली है, परभणी जिले के पत्रकोरों ने इस हमले की कड़ी शब्दों में निंदा की है. महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती के प्रमुख एसएम देशमुख ने भी इस हमले की निंदा की है.
 

दैनिक जागरण में 14 करोड़ की गड़बड़ी, निशिकांत के आदमियों की घेरेबंदी

दैनिक जागरण संस्था को अपना मामू का घर समझने वाले निशिकांत ठाकुर के करीब पांच-सात दर्जन भाई-भतीते, साले व उनके गांव से संबंध रखने वाले कर्मचारी इस वक्त दुबके हुए हैं क्योंकि इस वक्त उनके चापलूसों की संस्था से सफाई करने का अभियान शुरू हो गया है। इसलिए ऐसे लोगों की अंदर भगदड़ मची हुई है। बिहारी कर्मचारियों के एक सबसे बड़े संरक्षणकर्ता की पिछले दिनों संस्थान से छुट्टी कर दी गई। कुछ कर्मचारियों ने तो दूसरे जगहों पर नौकरी खोजनी शुरू भी कर दी है। निशिकांत ठाकुर के साले कविलाश मिश्र और उनके मजबूत सिपहसालार अरूण सिंह के बाद अब फरीदाबाद में सालों से पैर जमाए बैठे संतोष ठाकुर की कुंडली खुलनी शुरू हो गई है।

संतोष ठाकुर कुछ साल पहले जब बिहार से नौकरी की तलाश में दिल्ली आया था, तो उस वक्त उसके पास डीटीसी की बसों में चलने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। लेकिन कुछ ही सालों में उसने फरीदाबाद में अपना साम्राज्य खड़ा कर दिया है। बेहिसाब सम्पत्ति बना ली है। संतोष ठाकुर खुद को निशिकांत ठाकुर का भतीजा बताता है। जिस तरह से निशिकांत की घेराबंदी की जा रही है उससे बाहर के यूनिटों में काम करने वाले उनके चेले-चपाटे लगातार नोएडा कार्यालय पर नजर रखे हुए हैं। निशिकांत के आदमियों की घेराबंदी का मुख्य कारण विज्ञापन के पैसों में भारी हेराफेरी बताया जा रहा है। हाल ही में दैनिक जागरण के विज्ञापन में 14 करोड़ की गड़बड़ी का मामला सामने आया है जिसके तहत यह फैसला लिया जा रहा है। बताया जाता है कि अरुण सिंह को भी इसी कारण इस्तीफा देना पड़ा है।

रमेश ठाकुर की रिपोर्ट.

भोपाल में राज एक्सप्रेस में कार्यरत सब एडिटर को वाहन ने रौंदा, मौके पर ही मौत

भोपाल। पिपलानी थाना इलाके में शनिवार-रविवार की दरमियानी रात तेज रफ्तार वाहन ने एक बाइक सवार मीडियाकर्मी को रौंद डाला। हादसे में मीडियाकर्मी की मौके पर ही मौत हो गई। पुलिस ने परिजनों को सूचना दे दी है। मूलत: सिंगरोली निवासी 32 वर्षीय आदित्य पिता आनंदी वर्मा न्यू सुभाष नगर में बीएल ताम्रकार के घर में किराए से रहते थे। वह राज एक्सप्रेस में सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे।

वह देर रात करीब ढाई बजे मिनाल स्थित अपने आफिस से बाइक पर सवार होकर अपने घर के लिए निकले थे। जेके रोड तिराहे पर अज्ञात तेज रफ्तार वाहन ने उनको कुचल दिया, जिससे उनकी मौत हो गई। हादसा इतना दर्दनाक था कि यातायात पुलिस द्वारा सड़क के बीचों बीच रखे आठ-दस स्टापर वाहन की टक्कर से क्षतिग्रस्त होकर सड़क किनारे जा गिरे। मौके पर पहुंची पुलिस को मीडियाकर्मी के शव और बाइक के अलावा कुछ नहीं मिला। पुलिस अब तक टक्कर मारने वाले वाहन का पता नहीं लगा सकी है, पुलिस को मौके से किसी भारी वाहन की बॉडी के टुकड़े जरूर मिले है। फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटे होने की बात कर रही है। पीएम के बाद परिजनों को शव सौंप दिया गया।

सिक्‍ता देव ने उदय प्रकाश के हाथों ग्रहण किया ‘स्‍व. वेद अग्रवाल पत्रकारिता एवं साहित्य सम्मान’

मेरठ : प्रखर पत्रकार रहे स्‍व. वेद अग्रवाल स्‍मृति पत्रकारिता/साहित्‍य सम्‍मान इस वर्ष एनडीटीवी से जुड़ीं पत्रकार सिक्‍ता देव को दिया गया। 27 जुलाई 2013 को मेरठ के चैंबर ऑफ कॉमर्स में यह पुरस्‍कार उन्‍हें प्रख्‍यात साहित्‍यकार उदय प्रकाश, गीतकार लक्ष्‍मी शंकर शुक्‍ला एवं अप्रतिम कथाशिल्‍पी चित्रा मुदगल ने उत्‍तर प्रदेशीय महिला मंच के 30वें स्‍थापना समारोह कार्यक्रम के अवसर पर प्रदान किया। इस मौके पर देश के अलग-अलग राज्‍यों से आईं सात ऐसी विदुषी महिलाओं को भी हिंद प्र भा सम्‍मान दिया गया जिन्‍होने विपरीत परिस्थितियों में मुकाम हासिल करते हुए महिलाओं का संबल बनी हैं।

भोपाल में पली-बढ़ी सिक्‍ता देव ने दिल्‍ली के एक जाने-माने कालेज में पढ़ाई के बाद पत्रकारिता की तरफ रुख किया। उन दिनों टीवी पत्रकारिता अपने शैशवकाल में थी और लोगों को लगता नहीं था कि टीवी अखबारी खबरों के आगे टिक पाएगा। इसलिए नए लोग ही टीवी की तरफ अपना रुख कर रहे थे। सिक्‍ता ने भी ऐसा ही किया। उन्‍होने क्रिकेट मैच फिक्सिंग से लेकर नाइन इलेवन, कंधार कांड, संसद और अक्षरधाम पर आतंकी हमला, अबू सलेम की वापसी और समझौता एक्‍सप्रेस ब्‍लास्‍ट जैसे अहम मसलों की रिपोर्टिंग और एंकरिंग की। सिक्‍ता देव देश की उन गिनी-चुनी पत्रकारों में से एक हैं जिनका रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ ही कलम पर भी पूरा अधिकार है। विषय की वह मोहताज नहीं हैं। सिक्‍ता देव के लाइव पैनल डिस्‍कशन सबसे अलग होते हैं। मध्‍य प्रदेश के एक आईपीएस अफसर की बेटी और ओडिशा के एक राजघराने से ताल्‍लुक रखने वाली सिक्‍ता आम आदमी के दर्द को बखूवी बयां कर रहीं हैं।

अपने संबोधन में सिक्ता देव ने कहा कि अब तक महिला वर्ग को मौका मिलने की बात कही जाती थी। कहा जाता था कि अगर उन्हें मौका मिले तो वह कुछ कर सकती हैं, लेकिन आज महिलाएं मौका छीनना जान चुकी हैं और उपलब्धियां हांसिल कर रही हैं। आज महिलाएं मौके की मोहताज नही हैं।

समारोह में समाज के लिए विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली शांति किंडो, दीपिका सूद, अंजू अनामिका, रेखा शर्मा, नूतन धामा, रजिया सुल्तान, दर्शना शर्मा को भी सम्मानित किया गया।  झारखण्ड के आदिवासी इलाकों में महिला उत्थान की अलख जगाने वाली शांति किंडो अपने सम्मान पर बेहद उत्साहित दिखीं। उन्होंने भावुक अंदाज में अपने सम्मान को वास्तव में संघर्ष का सम्मान बताया। इस वर्ष अंतरराष्‍ट्रीय मलाला अवार्ड प्राप्‍त करने वाली 15 साल की रजिया सुल्‍तान ने कहा कि आज जरुरत बच्‍चों का बचपन बचाने और उनका रुख बाल श्रम से शिक्षा की ओर मोड़ने की अहम जरुरत है। अंजू अनामिका, नूतन धामा, दर्शना शर्मा, दीपिका सूद, रजिया सुलतान ने भी अपने संबोधन में महिला उत्थान के विभिन्न बिंदुओं और वर्तमान दशा पर प्रकाश डाला।

मुख्य वक्ता उदय प्रकाश ने उत्तर प्रदेशीय महिला मंच के कार्यों को सराहा। उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों का महत्व तब और बढ़ेगा, जब हम अपने आप को अंदर से बदलेंगे। सम्मानित होते वक्त यह ध्यान रहे कि जिस अभियान के लिए सम्मानित किया जा रहा है, आगे भी वह चलता रहे। लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने टूटते लोगो को उम्मीद नई देते हुए, लोग हैं कुछ जिंदगी को जिंदगी देते हुए पंक्ति से अपनी बात कही। ममता किरण ने भ्रूण हत्या पर कटाक्ष किया तो चित्रा मुदगल ने महिला उत्थान के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिये। इस दौरान स्मारिका ‘वरदा’ का विमोचन भी किया गया।

मोदी भक्तों द्वारा किया जा रहा शत्रुघ्न सिन्हा और अमर्त्य सेन की बेटियों का चरित्र हनन निंदनीय

रजनीश के झा : जिस तरह से सोनाक्षी (शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी) और नन्दना (अमर्त्य सेन की बेटी) का चिर चरित्र हननं कथित धार्मिक राम भक्त (माफ़ कीजियेगा मोदी भक्त) और राष्ट्रवादियों द्वारा किया जा रहा है (सनद रहे सिन्हा साहब भाजपा सांसद है) किसी दिन गैर विचार होने पर अपनी माँ बहन (माफ़ कीजियेगा हमारी माँ बहन) को सड़क पर खड़ा कर के बोली लगा सकते हैं।

जिस दल की मौलिक भावना नारी के खिलाफ हो उस से आप विकाश करते रहिये और पुरे देश को गोधरा में तब्दील कर लीजिये। मोदी का नाश सर्वनाश दिखने लगा है क्यूंकि एक नहीं कई सूर्पनखा भारतीयता सभ्यता और संस्कृति का तिलांजलि कर के खर दूषण को अपना चुके हैं। (रजनीश झा के फेसबुक वॉल से)

Vivek Kumar : भारत रत्न अमर्त्‍य सेन ने भाजपा के कद्दावर नेता और स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी को पीएम पद के लिए नाकाबिल क्या बताया, मोदी समर्थकों की ओर से सोशल नेटवर्किंग साइटस पर सेन के खिलाफ नाराजगी और कटु वचन के जोरदार हमले तेज हो गए. लेकिन हद तो तब हो गयी जब अमर्त्‍य सेन को नीचा दिखाने के लिए लोगों ने ट्विटर और फेसबुक पर उनकी बेटी और अभिनेत्री नंदना सेन पर अश्लील टिप्पणी करने लगे. कुछ लोगों ने तो अमर्त्‍य सेन को एक गैरजिम्मेदार पिता तक कह डाला है. लोगों ने लिखा है कि अमर्त्‍य सेन पहले आप अपनी टॉपलेस बेटी नंदना सेन को काबू में करो तब देश के नेताओं पर टिप्पणी करना. गुजरात के मोदी समर्थकों ने सेन की पुत्री नंदना सेन के अश्लील चित्र को फेसबुक पर अपलोड कर दिया. भाजपा ने इस प्रकरण से यह कहते हुए खुद को अलग कर लिया है कि यह गुजरात भाजपा का अधिकृत फेसबुक पेज नहीं है. फेसबुक पर गुजरात बीजेपी नाम से तैयार आइडी के ताजा पोस्ट में अम‌र्त्य सेन की फोटो के साथ कथित तौर से नंदना सेन की अर्द्धनग्न तस्वीर जोड़कर पोस्ट किया गया है, जिस पर लिखा है कि सेन साहब पहले अपना घर, बेटी को संभालिए, मोदी पर निर्णय करने के लिए भारत के बहुत नागरिक हैं, हमें किसी सठियाए बुढ्ढे की सलाह नहीं चाहिए. इस आइडी पर साढ़े पांच हजार सदस्य हैं, जिनमें एक सदस्य का यह भी दावा है कि यह फोटो ब्राजील की मॉडल मारिया का है ना कि सेन की बेटी का. नरेंद्र मोदी के समर्थन में इस आइडी पर लगातार पोस्ट की जा रही हैं. फेसबुक, ट्वीटर और अन्य सोशल साइट्स में जो कोई भी मोदी के खिलाफ बोलता है, उसके खिलाफ इस आइडी पर अभद्र तरीके से हमला किया जाता है. (विवेक कुमार के फेसबुक वॉल से)

अविनाश दास का माल उड़ा कर मोहन श्रोत्रिय ने अपने नाम से छपवा लिया

Avinash Das : अगर ये साबित हो जाए कि Mohan Shrotriya का प्रतिवाद एक असत्‍य-पत्र है और राजस्‍थान की उन नदियों पर छपी किताबों का एकमात्र लेखक मैं ही था और मोहन श्रोत्रिय उन किताबों के सिर्फ भाषा-सुधारक और सुपरवाइजर थे, तो क्‍या आप सब माफी मांगेंगे? और तब क्‍या आपलोग मोहन श्रोत्रिय का सामाजिक बहिष्‍कार करने के लिए तैयार होंगे?

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बात लगभग सोलह साल पुरानी है। मुझसे पूछा जा रहा है कि इतने दिनों बाद इस बात की याद क्‍यों आयी। दरअसल इन बातों को कह सकने का बीच के वक्‍फे में कोई मौका नहीं मिल पाया था। मुझे जो प्रतिवाद करना था, उन्‍हीं दिनों कर चुका था और भीकमपुरा से लौट भी आया था। सारे लिंक पाठकों के सामने हैं, ताकि दोनों तरफ की बातें सुनी जा सके… (अविनाश दास के फेसबुक वॉल से)

Abhishek Srivastava :  Avinash Das और Mohan Shrotriya नाम के दो दावों और दो निजी सचाइयों तथा Om Thanvi के 'वामपंथ विरोधी एजेंडे' के संदर्भ में चार बातें मैं भी कहना चाह रहा हूं। पहली बात: जनसत्‍ता के संपादक लोकतंत्र की आड़ में अपने अखबार का 'वाम विरोध' के लिए लगातार सचेतन इस्‍तेमाल कर रहे हैं, इसमें मुझे कोई शक नहीं है। अविनाश का लेख जाने-अनजाने संपादक के निजी एजेंडे में फिट है। दूसरी बात: अविनाश के आत्‍मवक्‍तव्‍य को सौ फीसदी सच मानने के लिए मेरे पास निजी अनुभवों और दूसरे युवा वाम कार्यकर्ताओं-लेखकों के अनुभवों का मोटा आधार मौजूद है। ऐसा शोषण प्रचुर मात्रा में होता रहा है और हो रहा है। तीसरी बात: कोई भी युवा वाम कार्यकर्ता-लेखक अपने श्रम के शोषण को उसके वर्तमान देश-काल में उजागर न कर के दरअसल व्‍यापक बिरादराना एकता और राजनीतिक प्रतिबद्धता का ही संकेत देता है। यदि ऐसा रियलटाइम में होने लगा, तो कई वाम मठों के टूटने का खतरा पैदा हो जाएगा। कात्‍यायनी और शशिप्रकाश का ज्‍वलंत उदाहरण हमारे पास है। इसलिए हमेशा श्रम के शोषण को सह जाना अनैतिक नहीं होता, श्रम के शोषण की कहानियां बाद में कभी भी लिखी जा सकती हैं, जब शोषक का चेहरा अपने आप बेनकाब होने की स्थिति में आ गया हो या फिर व्‍यापक उद्देश्‍य पर उस वक्‍तव्‍य का कोई असर न हो रहा हो। चौथी बात: श्रम के शोषण की दास्‍तान लिखते वक्‍त ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि वह जाने-अनजाने किसी की एजेंडापूर्ति का औज़ार न बन जाए। उससे प्रामाणिकता का संकट पैदा होता है। पांचवीं बात: उपर्युक्‍त चारों स्‍थापनाएं अविनाश और श्रोत्रिय जी के दिए परस्‍पर काटने वाले तथ्‍यों से निरपेक्ष मानी जाएं क्‍योंकि सच क्‍या है, इसे कोई तीसरा तय नहीं कर सकता। (अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से)

Pankaj Chaturvedi : अभी अभी श्री ओम थानवीजी का फोन आया, भीकमपुरा किशौरी की पुस्‍तकों के बारे में श्री अविनाश की जनसत्‍ता में प्रकाशित टीप पर असल में मेरा सरोकार किसी पक्ष या विपक्ष में खड़े होना नहीं था. बस अनुपम मिश्र जैसे संत पुरूष का भी उसमें नाम था, तो मुझे लगा था कि अविनाश के आलेख पर दो व्‍यक्तियों, राजेन्‍द्र सिंहजी और अनुपम बाबू का मनतव्‍य अवश्‍य लिया जाना था. ओमजी ने बताया कि उन्‍होंने आलेख को प्राकशित करने के पहले दोनों से ही उनका पक्ष जाना था और तभी आलेख प्रकाशित किया था. यह दुखद भी है और भयावह भी, कोई युवा उत्‍साह, पवित्रता के भाव और लगन के साथ हिंदी की लिखने पढने की दुनिया में आए और उसकी मेहनत किसी दीगर नाम से छपे. सच में यह बौद्धिक बलात्‍कार की तरह ही होगा. काश हम अपनी गलती को मान कर उसे स्‍वीकार करने के महान गुणों को अपने में समाहित कर पाते. (पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से)

संजीव सिन्हा : वामपंथियों की संकीर्ण मानसिकता की खुलती पोल..  आज के जनसत्ता में कमल किशोर गोयनका, कृष्णदत्त पालीवाल और अविनाश के लेख प्रकाशित हुए हैं। तीनों ने जमकर वामपंथियों की खबर ली है. गोयनका ने प्रेमचंद की मार्क्सवादी छवि गढ़े जाने पर प्रहार किया है. तो पालीवाल ने रामविलास शर्मा को लिखे निराला के पत्र को उद्धृत किया है, जिसमें निराला मार्क्सवादियों के बारे में कहते हैं, "ये उच्च शिक्षित जन कुछ लिखते भी हैं, इसमें मुझे संशय है." वहीं अविनाश ने वामपंथी लेखक द्वारा युवा कलम की कमाई हड़प जाने की विद्रूपता को सहजता से प्रस्तुत किया है. शाबाश जनसत्ता! (संजीव सिन्हा के फेसबुक वॉल से)

मुसलमानों के लिए हलाल सर्च इंजन हाजिर

Shahnawaz Malik : चूंकि रोज़ा चल रहा है इसलिए गूगल देवता ने एक ऐसा सर्च इंजन इजाद किया है जो रोज़ा मकरूह नहीं होने देगा। हराम-हलाल की तर्ज़ पर मुसलमानों के लिए अब हलाल सर्च इंजन हाज़िर है। अड्रेस है Halalgoogling.com। इस सर्च इंजन में पोर्नोग्राफी, न्यूडिटी, गे, लेस्बियन वगैरह-वगैरह के लिंक नहीं खुलेंगे।

सारी हराम गतिविधियों को यहां ब्लॉक कर दिया गया है। सौ फीसदी ख़ालिस सर्च इंजन है..इसीलिए नाम हलाल गूगल रखा गया है। रोज़ेदार बिना किसी डर के यहां अपना काम निपटा सकते हैं। माहे-रमज़ान में गूगल देवता की ओर से मुसलमानों के लिए इससे बेहतर रहमत या ईदी कुछ और नहीं हो सकती। (शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से)
 

यूपी का जंगलराज : खनन माफिया के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली आईएएस दुर्गा नागपाल सस्पेंड

Anurag Tiwari : आइये हम सब मिलकर यूपी की सपा सरकार को धन्यवाद दें, जिसने खनन माफिया के खिलाफ मुहिम छेड़ने वाली आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड कर दिया है। बेचारी खुद को दुर्गा की शक्ति समझ बैठी थी। मूर्ख नारी! मालूम नहीं सरकार में साक्षात शिव के पाल विराजमान हैं। क्या करें मुख्यमंत्री जी नए नए आईएस बने बच्चे हैं, आखिर अभी 2011 का ही तो बैच है उनका, धीरे धीरे सेटिंग का गेम सीख जायेंगे। लोग बताते हैं कि हमारे मुख्यमंत्री जी पर्यावरण इंजीनियरिंग में ऑस्ट्रेलिया से डिग्री लेकर आये हैं! आप बेहतर समझते होंगे अनियंत्रित खनन का मतलब, अभी केदारनाथ में कुदरत ने बिला वजह इतना नाटक किया, इसका मतलब समझाने के लिए। (अनुराग तिवारी के फेसबुक वॉल से.)

ज्यादातर खनन का काम नरेंद्र भाटी के लोग ही कर रहे थे, इन्हीं ने आईएएस दुर्गा नागपाल की शिकायत की

Pankaj Chaturvedi : ग्रेटर नोएडा में अवैध खनन के खिलाफ मुहिम चलाने वाली बहादुर आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड कर दिया गया है. दुर्गा नागपाल ने ग्रेटर नोएडा में बन रहे एक धार्मिक स्थल के निर्माण पर रोक लगा दी थी. ये निर्माण बगैर अनुमति लिए गैरकानूनी तरीके से हो रहा था. हालांकि इसका निर्माण शुरुआती दौर में था, लेकिन इस

दुर्गा नागपाल
दुर्गा नागपाल
पर कार्रवाई करते हुए दुर्गा ने इसके निर्माण को ढहा दिया. सूत्रों के मुताबिक स्थानीय नेता नरेंद्र भाटी ने समाजवादी पार्टी हाईकमान से शिकायत की, जिसके बाद शनिवार देर रात दुर्गा को सस्पेंड कर दिया गया. माना जा रहा है कि इस पूरी कार्रवाई के पीछे अवैध खनन के खिलाफ चलाई गई दुर्गा नागपाल की मुहिम ही है, क्योंकि सूत्रों के मुताबिक ज्यादातर खनन का काम नरेंद्र भाटी के लोग ही कर रहे थे और वो इस कार्रवाई से चिढ़े हुए थे. बहादुर आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल ने अपनी जोरदार मुहिम से खनन माफिया की नाक में दम कर दिया था. उन्होंने दर्जनों जगह छापे मारे थे, लेकिन ईमानदारी और बहादुरी के लिए इनाम और तारीफ की जगह उन्हें सस्पेंड कर दिया गया. उप्र इन दिनों बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है अभी कांवड़ व रमजान को लेकर पश्चिमी उप्र के एक छोट से गांव में दंगे हो चुके हें और उसमें गांव के हर घर के मुसलमान को पीएसी ने पीटा। ऐसे में निष्‍पक्ष, ईमानदार अफसरों का जीना मुहाल है. दुर्गा को सस्‍पेंड करने का पुरजोर विरोध करें.  श्री अखिलेश यादव के सभी संपर्क उपलब्‍ध करवा रहा हूं. सभी लोग एक साथ अपने-अपने तरीके से आवाज उठाएं कि ईमानदार लोगों के साथ अन्‍याय ना होने दें. cmup@up.nic.in, 0522-2235477, 0522-2235454, 9013180048, yadavakhilesh@gmail.com & Chief Minister, 5, Vikramaditya Marg, Lucknow, Uttar Pradesh (पंकज चतुर्वेदी के फेसबुक वॉल से)

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने आईएएस दुर्गा नागपाल की बहादुरी की पहले पेज पर खबर छापी थी

Sanjay Sharma : जिस आईएएस अफसर को अदालत ने तीन साल की सजा सुनाई वो राजीव कुमार यूपी का प्रमुख सचिव नियुक्ति बना बैठा है और जिस आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल ने अपनी नौकरी अभी शुरू की. नोयडा में खनन माफियाओं के खिलाफ कार्यवाही करना उन्हें भारी पढ़ गया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने उनकी बहादुरी की पहले पेज पर खबर छापी थी. खनन माफियाओं के दबाव लगातार बढ़ रहे थे और आज युवा मुख्यमंत्री ने इस अफसर को निलंबित कर दिया ..ऐसी ही चलानी होगी सरकार तभी तो 2014 में नतीजे बढ़िया आयेंगे. (संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से)

दो साल के अंदर ही पिछली सरकार के रंग में रंग गयी यूपी की सपा सरकार

Anurag Mishra : सन २०१२ के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मायावती सरकार को गुंडों, चोरो और अपराधियों की सरकार बताने वाली और चुनाव बाद सत्ता में आने की स्थिति में अपराधमुक्त, भयमुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी सत्ता में आने के दो साल के अंदर ही पिछली सरकार के रंग में रंग गयी है। मजे की बात यह है कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी ये पूर्ववर्ती सरकार को भ्रष्टाचारियों और अपरधियों की सरकार कहने से नहीं हिचकिचाते है। अरे भाई अगर वो गलत थे तो आपके ही अब तक के करम कौन से बहुत अच्छे है ? (अनुराग मिश्रा के फेसबुक वॉल से)
 

पत्नियों की अदला-बदली पर जेएनयू की स्टूडेंट ने अपने नेवी आफिसर हस्बैंड के खिलाफ आवाज उठाई तो उसे पीटा गया

Tara Shanker : चरित्रहीन, मर्दवादी और बलात्कारी इंडियन नेवी! कितनी शर्मनाक बात है कि इंडियन नेवी में ऑफिसर्स की पार्टी में पत्नियों की अदला-बदली होती है ऐसे जैसे औरतें सिर्फ भोग विलास की कोई वस्तु हों! ऐसा पहली बार नहीं हुआ है…..ये सब बचपन से सुनता आ रहा हूँ!

किसी तरह हिम्मत जुटाकर JNU की एक स्टूडेंट ने जब अपने ही नेवी ऑफिसर हस्बैंड के खिलाफ आवाज़ उठाई तो पूरी नेवी और सरकार मामले को दबाने में लग गयी! और उलटे लड़की को फंसा कर उसे मारा-पीटा जा रहा है ताकि वो केस वापस ले ले क्योंकि उस पार्टी में नेवी के टॉप के ऑफिसर भी लिप्त पाए गए! Shame on you Indian Nevy! This is intolerable!

तारा शंकर के फेसबुक वॉल से.

पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी को अमर उजाला, बरेली एडिशन में लिख कर धमकाया गया!

Shambhu Dayal Vajpayee : अमर उजाला के नाम… भई सलाह तो अच्‍छी दी है। साथ में धमकी भी। ऐसी सलाह तो अपना कोई बड़ा हितैषी ही दे सकता है। ''बुढापे में गीता पढो दद्दा या फिर शंभु शंभु भजो। बहुत भड़ासी बैठे हैं यहां। कई बार कपडे भी उतार लेते हैं।'' यह कुछ इसी तरह है जैसे कोई स्‍वेच्‍छाचारी परिवारी बुर्जुग को कहे – जिंदगी भर तो तुमने केवल पाप किये ही हैं। मैं धर्म की गंगा में गोते लगा रहा हूं तो टोका टाकी न करो। अब तुम सठिया गये हो। शहर – समाज में क्‍या हो रहा है इसकी चिंता छोडो। हमारे पास बडे अखबार की निर्बाध ताकत है । इस लिए इसे देखना और क्‍या स्‍याह – सफेद है , यह तय करना केवल हमारा काम है। नहीं मानोगे तो हम तुम्‍हारे कपडे उतार कर नंगा कर देंगे। कह देंगे कि जिंदगी भर केवल बिके हो । बुढापे में भी बिक रहे हो।

पढ कर अच्‍छा लगा। पठनीय है । आप भी पढिये । अमर उजाला के जिस भी भाई ने लिखा है और जिन्‍हों ने भी लिखवाया है मैं उनके प्रति इस नेक सलाह सह कपडे उतार लेने की धमकी देने के लिए आभारी हूं। मैं इस सलाह -धमकी को सम्‍मान शिरोधार्य कर रहा हूं। केवल कुछ विनम्र निवेदन है। मैंने गंगाशील प्रकरण पर जो उचित समझा फेस बुक पर लिखा , लेकिन भडास 4 मीडिया को कभी भेजा नहीं। उन्‍हों ने अपने आप ही लगाया । मेरा गंगाशील वाले डा. निशांत गुप्‍ता या उस अस्‍पताल के किसी डाक्‍टर से परिचय -सम्‍पर्क नहीं है। डा. प्रमेन्‍द्र माहेश्‍वरी से जरूर संबंध हैं। 10 -12 सालों से। इस मामले में उनसे भी कभी बात नहीं हुई।किसी के कहने नहीं नितांत अपनी अंत: प्रेरणा से और स्‍वांत: सुखाय लिखा । यह जानते हुए भी आपकी अथाह ताकत के मुकाबले इस मंच पर मेरे लिखने का कोई अर्थ नहीं है। मैं ने कहीं भी अपने किसी पत्रकार भाई या अमर उजाला का नामोल्‍लेख नहीं किया । इन जनरल लिखा और एक सधी हुई पत्रकारीय मर्यादा का किया। मेरा पक्ष गलत हो सकता है पर मेरा किसी पत्रकार या भाई या अमर उजाला से कोई निजी वैर भाव या द्वेष नहीं था। मेरा मकसद कथित घटना के दोषियों को बचाना नहीं , केवल मनमानी तरीके से इतने बडे अस्‍पताल को बंद कराने और सपत्‍नीक डा. निशांत को पूरी घटना के लिए दोषी साबित करने को रेखांकित करना ही था। मैं पीडिता को समुचित न्‍याय दिलाने और दोषियों को उनके दोषानुरूप दंडित किये जाने का पक्षधर हूं। मनमानी ढंग से अस्‍पताल को , बिना उसके प्रतिपरिणामों के बारे में विचार किये, बंद किये जाने को एक पक्षीय मानता हूं।

इसके बाजूद आपने मुझ पर ब्‍यक्तिगत हमला किया है। मुझ अकिंचन से नाहक ही तिलमिला गये। आप आइएमए को नंगा करते रहिए, आईजी की चडढी उतारते रहिए। आपके पास बडी ताकत है , कुछ भी कर सकते हैं। मेरे कपडे उतार लेना तो आप के लिए बायें हाथ का खेल है। यही क्‍या , आप तो मुझे जिला बदर भी करा सकते हैं, जेल भी भेजवा सकते हैं। मेरे पास आप जैसी अखबारी ताकत तो बल है नहीं। आपका बडा उपकार होगा यदि आप अपने प्रभाव से कोई उच्‍च स्‍तरीय जांच करा कर मेरी छट्ठी पसनी का ब्‍यौरा अपने अखबार में उदघाटित कर सकें। मैं ईमानदारी का पुतला या दूध का धुला भले न होऊं लेकिन विश्‍वास मानिये यह नहीं जानता कि जीवन में या अखबारी सफर में कहां कहां बिका।

यह है वह कालम जिसमें अमर उजाला ने मेरे बारे में '' सोशल साइट पर बिकिये'' शीर्षक से लिखा।

सोशल साइट्स पर बिकिए

खबरों को बेचने का धंधा करने वालों से अखबारों ने मुक्ति भले ही पा ली हो लेकिन सोशल साइट्स पर उनके लिए दुकानदारी की बड़ी गुंजाइश है। दिल की भड़ास निकालने के बहाने वे शब्दों की ऐसी जलेबी पका रहे हैं कि उनका दाता खुश। पता नहीं उनके कितने दाता हैं और कैसे-कैसे हैं। मक्खन-मलाई उनकी कलम से ऐसे टपकती है कि मत पूछिए। मतलब की बात ऐसे पकड़ते हैं जैसे चुंबक कील को लपकता है। मुर्गे लपकने में माहिर एक बड़े भाई ने इस बीच खूब कलम तोड़ी है। उन्हें अखबारों में सच छापने वाले अहंकारी लग रहे हैं और विश्वसनीयता का संकट बताकर उन्हें डरा भी रहे हैं। बलात्कार पीड़ित शहर की एक लड़की न्याय की जंग लड़ रही है और वह इस लड़की से लड़ने वालों के लिए लड़ रहे हैं। बुढ़ापे में गीता पढ़ो दद्दा, या फिर शंभु, शंभु भजो। अब कितना लपकोगे। कम से कम ऐसे संवेदनशील मामले में तो शील शील कहकर अश्लील लोगों के साथ न खड़े हो। ऐेसी साइट्स पर दौड़ना रिस्की है। बहुत भड़ासी बैठे हैं। ये तो कई बार कपड़े भी उतार देते हैं।

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Shambhu Dayal Vajpayee अमर उजाला , बरेली से एक अनुरोध और : बहुत जल्‍दबाजी में लिखा है। जो कमियां हों याथायोग्‍य सुधार लीजिएगा। रुद्रपुर निकल रहा हूं। देर शाम लौटूंगा । वैसे मेरे दुबले तन पर ज्‍यादा कपडे नहीं है। उतारने या उतरवाने में आपको अधिक श्रम नहीं होगा। जो हैं भी उन्‍हें साथ लेकर मैं पैदा नहीं हुआ था । सब दूसरे के दिये ही हैं।

वरिष्ठ पत्रकार शंभू दयाल वाजपेयी के फेसबुक वॉल से.

मनरेगा में की मौज तो पहुंच गये जेल

: सरपंच, सचिव और उपयंत्री को 6-6 वर्ष की सजा और अर्थदण्ड : गबन के आरोप में न्यायालय ने सुनाया फैसला : जिले की जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत चकमी का है मामला : डिण्डौरी। हर हाथ को १०० दिन का सुनिश्चित रोजगार मुहैया कराने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की राशि का गबन करना सरपंच, सचिव और उपयंत्री को मंहगा पड़ गया। न्यायालय ने तीनों आरोपियों को गबन के आरोप में ६-६ वर्ष की सजा सुनाई है।

लगभग ६ वर्ष पूर्व सरपंच, सचिव और उपयंत्री द्वारा मनरेगा के लाखों रूपये मनमाने ढंग से फूंक दिये गये थे जिसकी शिकायत जिला प्रशासन के आला अफसरों से भी उस दौरान की गई थी। शिकायत की जांच जिला पंचायत द्वारा कराये जाने पर इस बात की भी पुष्टि हो गई कि सरपंच, सचिव  व उपयंत्री द्वारा शासकीय राशि का गबन किया गया है। जांच प्रतिवेदन जिला पंचायत द्वारा पुलिस थाना करंजिया पहुंचा दिया गया जिसके बाद तीनों के विरूद्ध अलग-अलग धाराओं के तहत मामला पंजीबद्ध कर लिया गया।

यह है पूरा मामला रू- जानकारी के मुताबिक जनपद पंचायत करंजिया की ग्राम पंचायत चकमी की तत्कालीन सरपंच ललिता बाई, सचिव बद्री प्रसाद सिंह और उपयंत्री रवीन्द्र भालेकर की तिकड़ी ने मिलकर मनरेगा की राशि का जमकर बंदरबाट किया था। जानकारी में बतलाया गया कि २००६-०७ से ३१ अगस्त २००८ तक ग्राम पंचायत के लिए ८५ लाख ८७ हजार ३८ रू. की राशि जारी की गई थी जिसमें से इन तीनों आरोपियों के द्वारा लगभग १९ लाख ४८ हजार ६० रूपये मनमाने ढंग से निकाल कर आपस में बांट लिये गये। जब यह जानकारी ग्राम पंचायत के अन्य जनप्रतिनिधियों और ग्रामवासियों को लगी तब उन्होंने प्रशासन के आला अफसरों से इस संबंध में आपत्ति जाहिर करते हुए सरपंच, सचिव व उपयंत्री की शिकायत की थी। उल्लेखनीय है कि उस दौरान इस मामले ने जमकर सुर्खियां बटोरी थीं।

जांच में हुआ खुलासा रू- शिकायत की जांच जिला पंचायत के अफसरों द्वारा शुरू कराई गई। पंचायत के दस्तावेज और आबंटन की तमाम जानकारियां एकत्रित करने के बाद इस बात की तो पुष्टि शुरूआती जांच में ही हो गई थी कि मनरेगा की राशि में हेरफेर किया गया है। जांच को और गति देते हुए जिला पंचायत के तत्कालीन अधिकारियों ने लगातार पूछताछ और दस्तावेजों की छानबीन कर यह पाया कि सरपंच, सचिव और उपयंत्री की तिकड़ी ने सरकारी राशि के गबन का जमकर खेल खेला है। जांच प्रतिवेदन तैयार कर जिला प्रशासन के आला अफसरों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। उस दौरान पदस्थ जिला पंचायत सीईओ के निर्देश पर जांच प्रतिवेदन पुलिस थाना करंजिया की ओर भेजा गया जिसके बाद पुलिस ने अग्रिम कार्यवाई प्रारंभ की।

सुनाई गई सजा, लगाया अर्थदण्ड रू- जांच प्रतिवेदन प्राप्त होने के पश्चात पुलिस थाना करंजिया में १५ अक्टूबर २००८ को धारा ४२०, ४०९ और ३४ आईपीसी के तहत मामला दर्ज कर लिया गया, जिसके बाद पूरा मामला न्यायालय पहुंच गया। मामला दर्ज होने के बाद लगभग ५ वर्षों तक आरोपों और दलील का दौर न्यायालय में चलता रहा तथा आरोप सिद्ध होने के पश्चात् अपर जिला सत्र न्यायाधीश द्वारा तीनों आरोपियों तत्कालीन सरपंच ललिता बाई, सचिव बद्री प्रसाद सिंह और उपयंत्री रवीन्द्र भालेकर को ६-६ वर्ष के कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही तीनों आरोपियों पर २-२ हजार रूपये का अर्थदण्ड भी लगाया गया है। आरोपियों द्वारा यदि अर्थदण्ड नहीं दिया जाता तो एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास आरोपियों को भुगतना पड़ेगा।

इन्दीवर कटारे की रिपोर्ट.

रेलवे स्टेशन से सोलह बोरा बाल पुष्टाहार बरामद

देवरिया : देवरिया सदर रेलवे स्टेशन से सरकारी बाल पुष्टाहार को तस्करी के माध्यम से ट्रेन से बिहार भेजने के मामला एक बार फिर सामने आया है। इस बार 16 बोरी बालपुष्टाहार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर दो से शनिवार को बरामद किया गया है। इस मामले में एस डी एम सदर दिनेश कुमार गुप्त के निर्देश पर राजकीय रेलवे पुलिस में जिला कार्यक्रम अधिकारी ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है।

गौरतलब है कि इसके पूर्व भी कई बार देवरिया सदर और भटनी रेलवे स्टेशन से बाल पुष्टाहार बरामद किया जा चुका है। लेकिन जिला कार्यक्रम अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह जो पिछले कई वर्षों से कुण्डली मारकर देवरिया में जमे हुए हैं की लापरवाही एवं मिली भगत से बाल पुष्टाहार की तस्करी पर नकेल नहीं कसा जा सका। अब तक भटनी एवं देवरिया रेलवे स्टेशनों से करीब पचासों बोरा बाल पुष्टाहार बरामद हो चुका है।

इस सम्बन्ध में एस डी एम दिनेश कुमार गुप्त ने बताया कि बिहार में इसकी बड़ी मांग है और बाल पुष्टाहार को दुधारू जानवरों को खिलाया जाता है। उन्होने बताया कि बाल पुष्टाहार की तस्करी में विभाग के लोग एवं कई सफेदपोश शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि कुछ माह पूर्व एक सौ बोरी बाल पुष्टाहार तरकुलवा थाना अन्तर्गत एक नहर के किनारे छिपा कर रखा गया था जबकि उसके कुछ दिनों पहले एक ट्रैक्टर ट्राली पर 150 बोरी पुष्टाहार लाद कर इसे बिहार भेजा जा रहा था कि पथरदेवा के पास पकड़ लिया गया। हर बार एफ आई आर दर्ज होता है लेकिन विभागीय मिलीभगत से बाद में लीपा-पोती कर दिया जाता है।
 

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

हमारे महंत पत्रकार इसी तरह जूरी के सदस्य बनकर पत्रकार के बजाय अखबार मालिक को सम्मानित करते रहेंगे!

Vineet Kumar : पिछले दिनों दैनिक भास्कर ने अपने यहां छंटनी की और जबरदस्ती मीडियाकर्मियों से इस्तीफा देने का दवाब बनाया. उसके कुछ दिनों बाद मीडिया इन्डस्ट्री में हल्ला हुआ कि यहां भारी पैमाने पर भर्ती हो रही है. एक तरफ रातोंरात लोगों को सड़क पर लाने का काम और दूसरी तरफ भारी पैमाने पर अवसर होने की खबर..

क्या मीडिया इन्डस्ट्री के भीतर की बर्बरता इसी तरह चलती रहेगी और हमारे महंत पत्रकार इसी तरह जूरी के सदस्य बनकर पत्रकार के बजाय अखबार मालिक को सम्मानित करते रहेंगे. महंतों ने पूछा नहीं भास्कर से कि आपने ऐसा क्यों किया ? मीडिया इन्डस्ट्री दुनियाभर के लोगों से जितनी नैतिकता और मानवता की बात करता है, वो खुद उतना ही अनैतिक और क्रूर है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

दिल्ली पुलिस जेएनयू के तीस छात्रों को अवैध रूप से पकड़ कर प्रताड़ित कर रही

खबर है कि जेएनयू के करीब 30 छात्रों को दिल्ली की वसंत विहार पुलिस ने पकड़ रखा है. इन छात्रों को अवैध रूप से हिरासत में लेकर प्रताड़ित किया जा रहा है. आरोप है कि सुजाता नामक लड़की को पीटा भी गया है जिसने नेवी के वाइफ स्वैपिंग स्कैंडल को लेकर केस दायर कर रखा है. फेसबुक पर अखिल कुमार ने जानकारी दी है कि वे लोग वसंत विहार पुलिस स्टेशन पर हैं और उन लोगों के साथ बुरा सलूक किया जा रहा है. छात्रों को अवैध रूप से हिरासत में रखे जाने की सूचना पाकर कई लोग थाने पहुंच रहे हैं और अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं. पुलिस वाले इन लोगों से भी बदतमीजी कर रहे हैं. अखिल कुमार अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं –

URGENT… more than 30 students from JNU have been detained at vasant vihar police station. The police illegally detained and have harassed and betaen up sujata, the girl who filed a case against the wife swapping scandal of the navy. We were here to protest and are being mistreated and harassed. It's an urgent request to all of you, please join us here at the vasant vihar police station and also inform the media as wide and as soon as possible!

राजकमल राय जनसंदेश टाइम्स, गाजीपुर के ब्यूरो चीफ बने, अविनाश प्रधान का इस्तीफा

यूपी के गाजीपुर जिले से सूचना है कि यहां दैनिक जागरण के पूर्व ब्यूरो चीफ रहे राजकमल राय ने नई पारी की शुरुआत जनसंदेश टाइम्स अखबार के साथ की है. बताया जाता है कि राजकमल के ज्वाइन करने के बाद ब्यूरो चीफ का काम देख रहे अविनाश प्रधान ने आफिस आना बंद कर दिया है.

भड़ास तक सूचनाएं जानकारियां bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

एनडीटीवी वाले कुमार विक्रांत ने आजतक न्यूज चैनल का दामन थामा

एनडीटीवी इंडिया से सूचना मिली है कि कुमार विक्रांत सिंह ने इस चैनल से इस्तीफा देने के बाद अब नई पारी की शुरुआत आजतक न्यूज चैनल के साथ करने जा रहे हैं. बताया जाता है कि वे एसोसिएट एडिटर के पद पर आजतक ज्वाइन कर रहे हैं.

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आई-नेक्स्ट, लखनऊ के संपादकीय प्रभारी राधा कृष्ण त्रिपाठी ने हिंदुस्तान, लखनऊ ज्वाइन किया

लखनऊ से खबर है कि आई-नेक्स्ट के संपादकीय प्रभारी राधा कृष्ण त्रिपाठी ने अब नई पारी की शुरुआत हिंदुस्तान हिंदी दैनिक के साथ की है. उन्होंने आज लखनऊ में न्यूज एडिटर के पद पर ज्वाइन किया है. आई-नेक्स्ट, लखनऊ में लगातार उठापटक होती रहती है और यहां से लोग मौका पाते ही निकल लेते हैं.

भड़ास तक सूचनाएं जानकारियां bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.  

चंद्रशेखर बेहेरे मराठी पत्रकार परिषद के निर्विरोध वर्किंग प्रेसिडेन्ट चुने गये

मराठी पत्रकार परिषद के चुनाव में नंदुरबार के तापीकाठ के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रशेखर बेहेरे कार्याध्यक्षपद के लिए और रायगड के माथेरानके पत्रकार संतोष पवार जनरल सेक्रेटरी के रूप मे अविरोध चुने गये है. चुनाव निर्णय अधिकारी विजय पवारे ने मुंबई मे यह घोषणा की. नवनिर्वाचित पदाधिकारियों का परिषद के पूर्व अध्यक्ष तथा महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समितीके प्रमुख एस.एम.देशमुख ने अभिनंदन किया है.

परिषद का संमेलन 24 आौर 25 अगस्त  को औरंगाबाद में होने जा रहा है. इस सम्मेलन में नये पदाधिकारी अपनी जिम्मेवारी संभालेंगे. परिषद के विद्यमान कार्याध्यक्ष किरण नाईक अब अध्यक्ष होने जा रहे हैं. नये पदाधिकारियों का कार्यकाल दो साल का है. मराठी पत्रकार परिषद यह महाराष्ट्र के पत्रकारों की सबसे पुरानी संस्था है. 75 साल से कार्यरत इस संस्था का चुनाव हर दो साल को होता है. वर्किंग प्रेसिडेंट और जनरल सेक्रेटरी का चुनाव होता है.

संस्था के घटना के तहत वर्किंग प्रेसिडेन्ट दो साल के बाद प्रेसीडेन्ट होता है. इस बार वर्किंग प्रसिडेन्ट पद के लिए चार पत्रकारों ने आवेदन पत्र दाखिल किये. लेकिन एक उम्मीदवार ने उम्मदवारी वापीस ली जबकि नियमों की पूर्तता न करने कारण अन्य दो उम्मेदवारों की उम्मेदवारी चुनाव अधिकारी विजय पवार ने खारिज की और चंद्रशेखर बेहेरे को अविरोध वर्किंग प्रसिडेन्ट घोषित किया. मराठी पत्रकार परिषद के महाराष्ट्र के हर जिले मे शाखांए है और राज्य के 7 हजार पत्रकार मराठी पत्रकार परिषद के सदस्य है. मराठी के जानेमाने पत्रकारों ने इस संस्था का अध्यक्ष पद संभाला है.

हरिभूमि वालों ने बबलू तिवारी को फिर से पत्रकार किस मकसद से बनाया?

आज से 4-5 साल पहले छत्तीसगढ़ की मीडिया में चर्चित क्राइम रिपोर्टर हुआ करते थे बबलू तिवारी. अब उन्होंने फिर से सक्रिय पत्रकारिता में वापसी की है. दो दिन पहले उन्होंने गोपनीय रूप से हरिभूमि रायपुर में ड्यूटी ज्वाइन की. बबलू तिवारी ने दोबारा वापसी क्यों की,  ये सवाल प्रेस क्लब व मीडिया पर्सन में चर्चा का विषय बना हुआ है. बबलू ने कुछ साल पहले मीडिया छोड़कर व्यवसाय में अच्छी सफलता पाई थी. इनोवा से चलते हैं, ठाट-बाट बदल गया है.

वे अब रेगुलर मीडिया पर्सन की ड्यूटी कर पाएंगे, ये किसी के गले नहीं उतर रहा है. प्रेस क्लब में चर्चा है कि या तो बबलू अपने फायदे के लिए या हिमांशु द्विवेदी ने अपने फायदे के लिए उन्हें वापस बुलाया है. छत्तीसगढ़ में चुनाव नजदीक है और बबलू तिवारी डिटेक्टिव एजेंसी चलाते हैं. उनके कई और कामधंधे सुनाई पड़ते हैं. 4 साल मीडिया से दूर रहे बबलू का नाम दो साल पहले एक महिला के मकान को लेकर भी विवादों में था. उम्मीद है इस मुद्दे पर बबलू तिवारी या हिमांशु या हरिभूमि प्रबंधन जरूर अपना पक्ष रखेगा.

रायपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

दैनिक जागरण, गोरखपुर में जारी है हलचल, अबकी त्रिलोकी पांडेय की विदाई

दैनिक जागरण, गोरखपुर से सूचना है कि सिद्धार्थनगर में कुछ महीने पहले तैनात किए गए सीनियर सब एडिटर त्रिलोकी पांडेय की विदाई हो गई है. बताया जाता है कि ये पिछले कुछ दिनों से इनपुट हेड संजय मिश्रा की नजरों में खटक रहे थे. त्रिलोकी पर पहले आफिस आने पर रोक लगाई गई फिर लखनऊ शिकायत कर तलब करवा लिया. लखनऊ पेशी में त्रिलोकी को खरी खोटी सुनाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

ज्ञात हो कि कुछ रोज पहले सिटी चीफ की कुर्सी देने का वादा करके बुलाये गए जीतेन्द्र पाण्डेय ने संजय मिश्र से त्रस्त होकर टाटा कर दिया. जग्नैन सिंह नीटू नाम के सब एडीटर को निकाल दिया गया. वजह बने संजय, क्योंकि उन्हें नीटू पसंद नहीं था. गोरखपुर यूनिट का फिर वही हाल होने जा रहा है जो दो साल पहले हुआ था. तबके संपादक शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी को जिस चांडाल चौकड़ी ने खा लिया था, वही मण्डली अब उमेश शुक्ल को गिरफ्त में लिए है.

शुक्ल जी की जरूरतों को संजय और उनके कारकून समय से पूरा कर रहे हैं और जो चाह रहे हैं करवा ले रहे हैं. कई लोग तो संजय के बारे में फील्ड में सभी को सुनियोजित तरीके से बता रहे हैं कि सिर्फ छह महीने के अन्दर संजय यूनिट के संपादक बन जायेंगे.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

इलाहाबाद में अब आरक्षण समर्थकों ने शुरू किया हंगामा, बवाल, उपद्रव

मुलायम सिंह यादव की पहल पर यूपीपीसीएस परीक्षा में लागू नई आरक्षण नीति को रद किए जाने के बाद आरक्षण समर्थकों ने बवाल शुरू कर दिया है. शनिवार की सुबह बड़ी संख्या में आरक्षण समर्थकों के एक गुट ने अल्लापुर के कैलाशपुरी इलाके में स्थित सपा के जिलाध्यक्ष पंधारी यादव के घर पर पथराव किया, जिससे वहां खड़ा पुलिस का एक वाहन क्षतिग्रस्त हो गया. पुलिस ने हंगामा कर रहे छात्रों को खदेड़ा तो वह सपा कार्यालय आ गए.

वहां उन्होंने मुलायम सिंह यादव मुर्दाबाद के नारे लगाए और नई आरक्षण नीति को फिर से बहाल करने की मांग की. आरक्षण समर्थकों के इस हुजूम ने जार्जटाउन थाना और सपा नेता रंजना बाजपेई के घर के सामने भी हंगामा करने की कोशिश की. सूचना पाकर आइजी आलोक शर्मा, प्रभारी एसएसपी अरुण कुमार पांडेय भारी फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे.

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य प्रशासनिक सेवा में आरक्षण देने का विवादास्पद निर्णय वापस ले लिया है. इस व्यवस्था में आरक्षित वर्ग के छात्रों को प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के साथ इंटरव्यू में भी आरक्षण दिया गया था. अखिलेश सरकार के इस फैसले के बाद सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि इस फैसले से सपा सरकार एक खास वर्ग को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही थी. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में निलंबित फैसले से पहले ही अपना निर्णय जनता को सुना दिया. उन्होंने आयोग के चेयरमैन अनिल यादव को लखनऊ बुलाया था, जिसके बाद आयोग ने नए आरक्षण नियम को वापस ले लिया.

पिछले सोमवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्रों की अपील पर नई आरक्षण व्यवस्था पर रोक लगा दी थी. इसके साथ ही राज्य में 2011 की परीक्षा के सफल प्रत्याशियों के इंटरव्यू पर भी रोक लगाई गई थी. कोर्ट ने राज्य सरकार से जाति आधारित इस नई व्यवस्था पर स्पष्टीकरण मांगा था. उसके बाद राजनीतिक विवाद पैदा हो गया था. इसके विरोध में इलाहाबाद व अन्य जगहों पर छात्रों ने तोड़फोड़ की थी, जिसके बाद उनके खिलाफ मामले भी दर्ज किए गए थे. सरकार ने अब यह मुकदमे भी वापस लेने की घोषणा की है.

मेरा 42 साल का अनुभव है, मैं जौहरी हूं, मैंने परखा है, मीनाक्षी टंच माल हैं : दिग्विजय सिंह

मध्य प्रदेश में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली मीनाक्षी नटराजन को 'टंच माल' कहकर नए विवाद को जन्म दे दिया. बयान को लेकर जब बवाल बढ़ता गया तो खुद मीनाक्षी नटराजन दिग्विजय सिंह के बचाव में उतर आईं. उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह ने उनकी तारीफ में ऐसा कहा था, इसलिए इस मामले को तूल दिए जाने की जरूरत नहीं है.

जहां मीनाक्षी ने इस बयान को तूल ना देने की वकालत की तो वहीं कांगेस नेता रेणुका चौधरी ने भी कहा कि दिग्विजय सिंह का वह कमेंट मीनाक्षी नटराजन के लिए कंप्लीमेंट था. दिग्विजय सिंह के आपत्तिजनक बयान के बाद मीनाक्षी नटराजन ने दिग्विजय सिंह का पक्ष लिया और कहा कि उन्होंने मेरी तारिफ की है.

जहां पार्टी नेताओं ने इस बयान के बाद दिग्विजय सिंह का बचाव किया तो वहीं दिग्विजय सिंह ने मामले पर सफाई देते हुए कहा कि मैंने चैनलों पर अपना बयान देखा है, उसे गलत तरीके से पेश किया गया है. जो लोग मुझे बदनाम करने की कोशिश कर रह हैं उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करूंगा. उन्होंने मीडिया पर मानहानि का मुकादमा करने की धमकी दी।

गौरतलब है कि मध्य पदेश में एक जनसभा के संबोधित करते समय दिग्विजय सिंह की जुबान ऐसी फिसली कि उन्होंने अपनी ही पार्टी की महिला सांसद पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर डाली. उन्होंने कहा कि मैं पुराना जौहरी हूं और मुझे चीजों की परख है. मीनाक्षी नटराजन सौ परसेंट 100 टंच माल हैं. जहां कांगेस नेता दिग्विजय सिंह का बचाव कर रहे है वहीं बीजेपी नेता मीनाक्षी लेखी ने कहा कि दिग्विजय सिंह मानसिक तौर पर बीमार हैं. अभद्र भाषा में बात करने का कॉपीराइट उन्हीं के पास है. अब देश भी दिग्विजय सिंह को गंभीरता से नहीं लेता.

उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के मंदसौर में दिग्विजय सिंह ने मंच पर बैठीं मीनाक्षी नटराजन की तारीफ करते हुए कहा कि मीनाक्षी टंच माल हैं. उन्होंने कहा कि मेरा 42 साल का अनुभव है. मैं जौहरी हूं और मैंने परखा है. लेकिन इस मामले पर बीजेपी ने उन्हें आड़े हाथों लिया. बीजेपी नेता सरोज पांडे ने उनकी टिप्पणी को ओछी करार दिया है. हालांकि मीनाक्षी ने दिग्विजय सिंह को क्लीनचिट दी है.

गरीबों के हिस्से की योजनाएं व रकम अपने पेट में जमा करने वालों को गरीब कैसे नजर आएंगे (देखें कार्टून)

Yashwant Singh : गरीब के हिस्से की योजनाएं और रकम की दिशा अपने पेट की तरफ मोड़कर अफसर और नेता इस कदर रकम पीट लेते हैं कि उनके देखने, सोचने, जीने का नजरिया व अंदाज ही बदल जाता है… अब देखिए ना, ये महोदय गरीब को खोज रहे हैं, क्योंकि इन्हें इस काम पर लगाया गया है…

और इनका माइंडसेट ये है कि गरीब उन्हीं की साइज का होगा, सो इन्हें दूर-दूर तक दिख नहीं रहा… इस कारण ये तकनीकी यंत्रों के सहयोग से गरीब अनुसंधान कार्य कर रहे हैं.. और बेचारा गरीब है कि इनके पैरों के आसपास पड़े गिरे बचे जूठन को बीन पोंछ झाड़ कर जीने के लिए पेट भरने में जुटा है.. माई बाप हुजूर सरकार साहब सुब्बा कहते बोलते हुए.. ((मीतू का आभार, यह कार्टून मुझ तक पहुंचाने के लिए))

भड़ास के एडिटर यशवंत के फेसबुक वॉल से.

जौनपुर में पत्रकारों से बदतमीजी करने वाले बीडीओ ने खेद जताया

 दु‌र्व्यवहार के विरोध में पत्रकारों ने दिया धरना :  केराकत (जौनपुर): तहसील के दो पत्रकारों के साथ स्थानीय खंड विकास अधिकारी द्वारा किए गए दु‌र्व्यवहार के विरोध में तहसील के पत्रकारों ने शुक्रवार को एसडीएम कार्यालय के समक्ष धरना देकर ज्ञापन सौंपा। पत्रकार दिलीप कुमार विश्वकर्मा व योगेंद्र यादव के साथ खंड विकास अधिकारी वीरेंद्र कुमार ने उस समय दु‌र्व्यवहार किया जब दोनों समाचार संकलन करने ब्लाक मुख्यालय गए हुए थे। पत्रकारों के साथ हुए दु‌र्व्यवहार को लेकर तहसील के पत्रकारों ने अब्दुल हक अंसारी की अध्यक्षता में धरना देकर एक ज्ञापन एसडीएम ऋतु सुहास को सौंपकर खंड विकास अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की।

तहसील बार एसोसिएशन के अध्यक्ष नम:नाथ शर्मा, दिनेश कुमार शुक्ल, महेंद्र शंकर पांडेय, लाल बहादुर शुक्ल, हीरेंद्र यादव आदि अधिवक्ताओं ने धरने में शामिल होकर विचार व्यक्त किया, साथ ही न्यायिक कार्य से विरत रहने का भी निर्णय लिया। इस मौके पर मोहर्रम अली, नरायन सेठ राही, रामनाथ यादव, प्रदीप सिंह, राम जन्म पटेल, विनय सिंह, अच्छेलाल यादव एवं राजेंद्र विश्वकर्मा आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। संचालन मिश्रीलाल सोनकर व संजय दूबे ने किया। धरनोपरांत पत्रकारों ने एसडीएम ऋतु सुहास को ज्ञापन सौंपा तो उन्होंने व सीओ मायाराम वर्मा ने पत्रकारों के समक्ष बीडीओ वीरेंद्र कुमार को बुलाकर वार्ता किया। बीडीओ ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए खेद जताया।

पत्रकार शशांक शुक्ला हत्याकांड की मजिस्ट्रेटी जांच शुरू

बांदा : चर्चित शशांक शुक्ला हत्याकांड की मैजिस्ट्रेटीयल जांच शुरू हो चुकी है। प्रशासन घटना से संबंधित साक्ष्य संकलित कर रहा है। इसके लिए पखवारेभर का समय निर्धारित किया गया है। बताते चलें कि मुहल्ला शंकर नगर निवासी टीवी चैनल के पत्रकार शशांक शुक्ला की 16 जुलाई को हत्या कर दी गई थी। घटना को आत्महत्या दिखाने के लिए हत्यारोपियों ने शव लोहिया पुल रेलवे लाइन के नजदीक फेंक दिया था।

घटना को लेकर मीडियाकर्मियों में खासा रोष रहा है। प्रशासन ने मजिस्ट्रेटियल जांच के निर्देश दिए थे। इसमें जिला मैजिस्ट्रेट ने उपजिला मजिस्ट्रेट को जांच अधिकारी नामित किया था। घटना की जांच के बारे में उपजिला मजिस्ट्रेट गिरीश कुमार का कहना है कि इससे संबंधित कोई साक्ष्य आदि पेश करना हो तो पखवारे भर के अंदर किसी भी कार्य दिवस में सुबह 10 से सायं 5 बजे तक दे सकते हैं। लिखित व मौखिक दोनो रूप से साक्ष्य मान्य होंगे।

टैम का विवाद सुलझा, संख्या में जारी होंगे दर्शकों के आंकड़े

नई दिल्ली : टीवी चैनलों की दर्शक संख्या के बारे में टैम के आंकड़ों का विवाद सुलझ गया है। ब्रॉडकास्टर्स, ऐड देने वाले और रेटिंग एजेंसी के बीच सहमति बनी है, जिसके तहत दर्शक संख्या के आंकड़े प्रतिशत के बजाय संख्या के आधार पर जारी किए जाएंगे। टैम का कई प्रसारकों के साथ उसकी रेटिंग को लेकर विवाद रहा है। टैम की टीवी और ऐड इंडस्ट्री के साथ इस बात को लेकर सहमति बनी कि वह संख्या (हजारों में) ही टेलिविजन रेटिंग (टीवीटी) जारी करेगा।

भारतीय प्रसारण महासंघ (आईबीएफ) और भारतीय विज्ञापन एजेंसियां संघ (एएएआई), इंडियन सोसायटी ऑफ ऐडवर्टाइजर्स (आईएसए) और टैम द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि टीवीटी निश्चित संख्या में टीवी दर्शकों के आंकड़े दिखाता है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध टीवीटी एकमात्र रेटिंग होगी। आंकड़ों के प्रस्तुतीकरण के नए तरीके से ऐसे चैनलों को फायदा होगा, जो क्षेत्रीय स्तर के हैं और जिनके दर्शकों की संख्या काफी सीमित है। प्रसारण उद्योग के एक सदस्य ने कहा कि ये चैनल अब अपने दर्शकों की संख्या दिखा सकेंगे। इन चैनलों के दर्शकों की संख्या हालांकि ठीक-ठाक होती है, लेकिन प्रतिशत में आंकड़े जारी होने पर उनके बारे में ठीक से पता नहीं चल पाता। साप्ताहिक आंकड़ों के अलावा टैम द्वारा हर हफ्ते चार हफ्ते के टीवीटी का ऑप्शन भी दिया जाएगा। हालांकि टैम टीवीआर का साप्ताहिक प्रतिशत लाना जारी रखेगा, जैसा कि वह पहले करता रहा है, लेकिन इसे सिर्फ इंडस्ट्री को उपलब्ध कराया जाएगा। (भाषा)

संपादक जी लोग एतवार के अपने अखबार में आधा-आधा पन्ना जो प्रवचन तानते हैं, उस पर न जाना रे भाई

Hareprakash Upadhyay : संपादक जी लोग एतवार के अपने अखबार में आधा-आधा पन्ना जो प्रवचन तानते हैं, उस पर न जाना रे भाई। जो सोचते हैं, ऊ बात ऊ लोग लिख दें तो समझो कि दंगा हो जाये, बहुत क्रांतिकारी विचार हैं हिन्दी के संपादकों के। कल एगो संपादक जी से औचक मिलना हुआ ( नाम में क्या रखा है, वैसे उन्होंने जो बताया, नाम न छापने की शर्त्त पर नहीं है)। उन्होंने मुझसे छूटते ही पूछा, तुम हिन्दू नहीं हो?

मैंने कुछ मजे में कुछ अपने स्वभाववश कहा कि जी बिल्कुल नहीं। संपादक जी गुस्सा गये, फिर पूछे, क्या तुम चमार हो? बस बस… बात मेरी समझ में आ गयी, ये जो गर्व से कहो हम हिन्दू हैं वाले हिन्दू भाई लोग हैं न, वे वंचित जातियों को हिन्दू तक नहीं मानते। संपादक जी बता रहे थे मुझे कि नरेंद्र भाई मोदी के खिलाफ मीडिया में घृणा प्रचार चल रहा है और इससे मोदी जी को जनता की और सहानुभूति मिल रही है। उनके अनुसार मोदी जी को पीएम बनने से कोई रोक नहीं सकता।

मैंने कहा कि पहली बात कि मोदी जी को उनके आडवाणी जी पीएम बनने नहीं देंगे सर और दूसरी बात, मोदी जी के खिलाफ मीडिया कहाँ हैं, वह तो उनके हर बयान को तान कर दिखा रहा है, उनके गुण का प्रकारांतर से रोज ही गान और बखान कर रहा है। उनके हर कहे को मीडिया ऐसी गंभीरता से ले रहा है, जैसे वे ही देश चला रहे हों। संपादक जी मेरी बात पर सहमत नहीं हुए, बहुते गुस्सा गये। मैंने सोचा, फूट लो बेटा, इसी में भलाई है और मैं ठेके की ओर निकल लिया। का गलत किया मैंने भाई?

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हरे प्रकाश उपाध्याय के फेसबुक वॉल से.

‘स्टार इंडिया’ की तरफ से हिंदी न्यूज चैनल लाने की तैयारी हुई शुरू!

: कानाफूसी : Last year, the most talked news of the media industry was the split between ABP and STAR India. The joint venture of 74:26 of ABP and STAR India respectively ended in April 2012. STAR India is now all set to launch a new Hindi news channel to capture the Hindi market, share industry sources. The development is in its preliminary stage. Recruitment and test runs are in process now. Industry bigwigs are expected to join the new channel. The name of the channel is not known yet.

There is ambiguity on whether STAR India will form a joint venture with another brand for the initiative. A foreign entity can buy only up to 26 per cent stake as increase in FDI in media to 49 per cent is still under consideration. Meanwhile, challenges have grown in the market since the time ABP and STAR India split last year. Carriage fees, frequency of TAM ratings, net versus gross billings, subscription fees, 10+2 ad cap – these are some of the issues that the new channel will have to take head on once it enters the market.

STAR, on the other hand, has a strong bouquet of sports and entertainment channel brands, which have been genre leaders. This apart, the media group’s earlier experience of running Star News will come in handy while navigating the highly competitive Hindi news genre in the country.

रिपोर्ट : Anirudh Sharma

जब केदारनाथ में रात को अजीबो गरीब आवाजों ने टीवी चैनल के रिपोर्टरों को परेशान किया

: कानाफूसी : तबाही के बाद सावन में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की कवरेज करने गए टीवी चैनल के पत्रकारों को खंडहर हो चुकी इमारतों में रात बिताना महंगा पड़ गया. जी हां, केदारनाथ में कुछ पत्रकार 21-22 जुलाई को कवरेज करने गए थे. उनके साथ कुछ और भी लोग थे. देर शाम मंदिर के पास पहुंचे टीवी चैनल के पत्रकारों को वहां देर हो गयी और वो खबरें बनाने के लिए अगले दिन का इंतजार करने लगे. इसके लिए उनको वहां रुकना भी पड़ा.

तेज़ हवा और ठण्ड वहां के माहौल को और भी डरावना बना रही थी. जैसे तैसे शाम तो बीत गयी लेकिन रात का अँधेरा वहां बहुत धीरे बीत रहा था. कोई कैम्प नहीं, कोई रुकने की जगह नहीं, कोई लाइट नहीं और न कोई फ़ोन के सिग्नल. बस अँधेरा. पूरे केदारघाटी में केदार धाम में चारो और पड़े मलबे के ढेर और वहां उड़ान भर रहे गिद्ध देखने के बाद शायद ही कोई वहां रात को रुकने के बारे में सोच सके. लेकिन वो ना केवल वहां रुके बल्कि एक ऐसी इमारत में ठहरे जिसकी बगल में जमींदोज हो चुकी एक इमारत के मलबे से उठ रही दुर्गन्ध खुद साबित कर रही थी कि हमें जहां रात बितानी है वहां आसपास कहीं इंसानी लाश पड़ी है.

दस डिग्री तापमान के बीच काफी समय तक वो मंदिर समिति के पदाधिकारियों के साथ केदार बाबा के आंगन में हाथ तापते रहे लेकिन बारिश ने ऐसा करने से रोक दिया. इसके बाद इन पत्रकारों को भुतहा सरीखी एक इमारत में रात बिताने को जाना पड़ा. जिस इमारत में रिपोर्टरों ने रात बिताई उसका निचला हिस्सा पानी के सैलाब की भेंट चढ़ चुका था और इमारत के उपरी हिस्से का जो हाल था उसे देख कर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस  कयामत की रात वहां कितना खौफनाक मंजर रहा होगा.

जिस कमरे में वो पत्रकार रुके, वहां पड़ा लोगों का अस्त व्यस्त सामान ये बताने को काफी था कि 16 जून को वहां जो लोग थे वो किस कदर खौफजदा हालात में अपना सब कुछ छोड़ कर जान बचाने के लिए भागे होंगे. कडकड़ाती ठण्ड के बीच इन पत्रकारों ने उस कमरे में किसी तरह रात के 12 बजे तक का वक्त काट लिया. उसके बाद जैसे ही वो सोने के लिए कमरे के बिस्तर पर लेटे ही थे कि अचानक तक़रीबन एक बजे पानी की तेज़ आवाज के बीच उनके  कमरे की किवाड़ को किसी ने बहुत तेज़ी से खड़खड़ाया.

एक बारी लगा शायद उनका भ्रम है पर कुछ मिनटों बाद वही आवाज सुनाई दी. बगल में लेटे साथी ने दूसरे से चुप रहने को कहा. उसके बाद नींद कहा आने वाली थी. फिर भी दिन भर की थकान के कारण वो सोये और फिर तीन बजे उनके कमरे की किवाड़ पर वही आवाज आई. फिर भी वो चुप रहे. दुबारा आने पर इधर से कुछ पत्रकारों ने आवाज लगायी कौन है कौन है. पर कोई नहीं जगा. जैसे तैसे सुबह हो गयी. जो लोग वहां किसी और ईमारत में रुके थे, उनसे जब पत्रकारों ने पूछा कि क्या आप थे हमारे कमरे के बाहर तो उन्होंने साफ मना कर दिया.

यकीन मानिये कि कैसे बीती वह रात उन पत्रकारों की. जब बाद में उन्होंने देखा कि जिस कमरे में वो रुके थे उसके ठीक बराबर में एक महिला की लाश लोहे में फंसी हुई थी. शायद पानी से बचने के लिए वो वहां से भागी होगी और वहीं फंसी रह गयी. अब तक जितने भी पत्रकार वहां रात को रुके हैं वो सब मंदिर से दो किलोमीटर दूर हेलीपैड पर रुके हैं. वो पहली टीम थी पत्रकारों की जो बिलकुल मंदिर में रुकी. यह घटना केदारनाथ में नेशनल चैनलों के उत्तराखंड के तीन रिपोर्टरों के साथ घटी है.

संजय ए. की रिपोर्ट.

‘इलाहाबादी मीडिया’ और उसके कुछ ‘रंगे सियार’ भी आत्म निरीक्षण करें

हमारे संचार माध्यमों, खासकर ‘इलाहाबादी मीडिया’ को भी कुछ आत्मनिरीक्षण करने की जरूरत है। पिछले कुछ वर्षों से इलाहाबादी मीडिया या कहा जाय पत्रकारों ने सामान्यजनों से बात करना बंद ही कर दिया है। इसलिये वे पाठकों को या देखने वालों को यह कैसे बता सकते हैं कि लोगों के मन में क्या चल रहा है। माल-मलाई की आशा वाले कार्यक्रमों में तो कोई एक सैकड़ा पत्रकार हाजिर हो जाते हैं, लेकिन पुलिसिया दमन, सरकारी नीतियों का मुखर विरोध करने या भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे, सालों से यहां कुंडली मारकर बैठे अफसरों के खिलाफ ‘वास्तविक तरीके’ से एक ने भी ‘कवर’ नहीं किया।

यहां मीडिया ने शायद यह तय कर लिया है कि 70 फीसदी लोग जो कुछ सोचते हैं, कहते हैं या करते हैं उससे कोई ‘खबर’ नहीं बनती। कलम की ताकत से ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ की परम्परा डालने वाले हमारे कुछ सीनियर पत्रकार ‘बूढ़े शेर’ की मानिन्द गुर्राने का काम तो अभी भी कर रहे हैं, लेकिन ‘इस समय’ को बदलने व इसके प्रतिरोध के पत्रकारीय तरीके खोजने में अब उनकी रूचि नहीं रह गयी लगती है। बाकी बचे कुछ तो ‘रंगे सियार’ से अधिक कुछ नहीं हैं।

ज्यादा दूर न जाएं। लोकसेवा आयोग द्वारा लागू त्रिस्तरीय आरक्षण के मुद्दे पर शहर में हुए उग्र विरोध-प्रदर्शन को ही लें ।कुछ बड़े मीडिया संस्थानों के पत्रकारों द्वारा की गई रिपोर्टिंग पर सवालिया निशान लग रहे हैं। खासकर मीडिया की आरक्षण विरोधी भूमिका पर। इस घटना की रिपोर्ट की विभिन्न समाचारों की प्रस्तुति में भिन्नता दिखायी देगी। विभिन्न चैनलों द्वारा भी घटना के दृश्यों मंे भी अपने-अपने तरीके से चुनाव किया गया। किसी भी पाठक और दर्शक के लिये यह एक उत्सुकता का प्रश्न हो सकता है कि आखिर एक ही घटना की प्रस्तुति में यह भिन्नता क्यों है। दरअसल समाचार लिखने वालों की पृष्ठिभूमि में भिन्नता है। इनमें कौन दलित, पिछड़े और सवर्ण हैं, यह साफ-साफ समझा जा सकते है। इनमें तो एक प्रमुख संवाददाता ‘पीत पत्रकारिता’ के पितामह  माने जाते हैं और ‘जाति का दुमछल्ला’ जोड़ने में ‘फेविकोल’ से भी ज्यादा असरदार साबित हो चुके हैं।

कुछ महीने पूर्व प्रतापगढ़ जनपद के बलीपुर गांव में सीओ समेत ‘तीहरे हत्याकांड’ के बाद पूरी घटना की कवरेज पढ़ने के बाद इलाहाबादी मीडिया बंधुओं की लेखनी पर सिर चकरा गया । दरअसल, इस तरह की घटनाओं के बाद मीडिया में ज्यादा से ज्यादा आक्रामक खबरें प्रकाशित करने की होड़ रहती है। ‘ताकि सच जिन्दा रहेे’ का स्लोगन लिखने वाले एक अखबार में इलाहाबादी रिपोर्टरों ने हाल के वर्षों में जिस तरह कुछ बेबुनियाद, झूंठी, मनगढ़ंत और तथ्यहीन खबरें लिखीं, उससे ‘सच’ बेचारे ने गंगा में छलांग लगाकर आत्महत्या कर लिया। बलीपुर कांड के बाद इस अखबार ने जो ‘नारा’ लिखा ‘कुंडा का गुंडा, कुंडा में गुंडाराज’, क्या कोई विद्वान, मूर्धन्य पत्रकार, संपादक पाठकों को यह बता सकता है कि तिहरे हत्याकांड से इन नारों का क्या कनेक्शन है। जब तक कोई स्पष्ट प्रमाण या संकेत न मिल जाए, कोई भी समाचार सिर्फ संभावना व अनुमान के आधार पर नहीं छापना चाहिये। परन्तु ‘अपराध के मनोविज्ञान’ के लिहाज से पहले से ही सुलझी हुई व ‘रिएक्शन’ में घटी घटना को समाचार प्रस्तुतकर्ताओं द्वारा जिस ‘टोन’ में कवरेज किया गया, वह वास्तव में पत्रकारिता धर्म के मूल भावना के खिलाफ है। परन्तु समाचार माध्यमों ने इस सीमा रेखा को बार-बार पार किया। बलीपुर कांड से यह बात विल्कुल साफ हो जाती है कि किसी संगठन, व्यक्ति या स्थान विशेष का नाम लेकर उस समय तक प्रकाशित सभी समाचार आधारहीन थे।

इसे मात्र कयास या अनुमान ही कहा जा सकता है, परन्तु इस आशय की खबरों को लेकर जिस प्रकार इलाहाबाद से प्रकाशित दो बड़े अखबारों में समानता पायी गयी, उस पर सवाल उठना लाजिमी है। इन खबरों में ऐसे तकाजों को पूरा करने की चेष्टा और पूरे घटनाक्रम को एक खास दिशा देने की कवायद नजर आती है। इसी के चलते तथ्यात्मक समाचारों में स्पष्ट भिन्नता और अनुमानित समाचारों में अद्भुत समानता देखने को मिलती है। यह मात्र संयोग नहीं हो सकता। इसके पीछे अवश्य कुछ शक्तियां हैं, जो लगातार समाचार माध्यमों को एक ही प्रकार के ‘इनपुट्स’ दे रही थीं, ताकि जांच को एक खास दिशा दी जा सके। जहां तक ‘अमर उजाला’ द्वारा झूंठे व मनगढ़ंत समाचार छापने का सवाल है, उनमें 10 दिसम्बर 2010 को ‘पत्रकार ने बनायी महिला पत्रकार की अश्लील वीडियो क्लिप’ की क्या कभी सत्यता प्रमाणित की जा सकती है। यह समाचार मनगढ़ंत, आपत्तिजनक और वास्तविकता से कोसों दूर था। ऐसी खबरें पढ़कर सच कितने दिन जिन्दा रह सकता है यह तो इस अखबार के कर्ता-धर्ता ही बता सकते हैं।

मीडिया के लोग उस समाचार को अब भी नहीं भुला पा रहे हैं। जिसके बारे में यहां के प्रेस क्लब और उसके स्वयंभूटाइप अध्यक्ष, सचिव ने -अमर उजाला से आज तक एक बार भी पत्राचार कर यह नहीं पूछा कि आखिर ‘ इलाहाबाद के वे दो पत्रकार कौन हैं? क्या यह एक बड़ा सवाल नहीं है कि ‘हरहाल में इसका खुलासा होना चाहिये। लेकिन यह तो सभी जानते हैं कि वे यह क्यों पूछेंगे? जबकि वह स्वयं इन्हीं दो एक बड़े संस्थानों के ‘मठाधीशों’ व ‘सजातीय गैंग’ की बदौलत इस कुर्सी पर विराजमान हैं। प्रेस क्लब यदि ‘वास्तव में 100 प्रतिशत लोकतांत्रिक प्रक्रिया’ अपनाता तो क्या आज तस्वीर ऐसी ही होती, जैसी इस वक्त है।

सर्वविदित ‘माफियाओं’ द्वारा पत्रकार विजय प्रताप सिंह की हत्या के बाद उनके परिवार को आर्थिक सहायता देने व दिलाने के मामले में जिस तरह से ‘प्रेस क्लब’ ने औपचारिकता निभाकर पूछ दबा लिया था, उसे देखते हुए क्या कोई पत्रकार साथी भविष्य में ‘यहां से’ न्याय की उम्मीद कर सकता है। इसके पहले दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार श्यामेंद्र कुशवाहा के ‘कथित अपहरण’ के मामले में इसी प्रेस क्लब ने जिस तरह से आईजी एकेडी द्विवेदी के साथ अंदरखाने गठजोड़ कर तत्कालीन एसएसपी बीके सिंह पर दबाव बनाने में पूरी ताकत झोंक थी, क्या कभी विजय प्रताप के लिये एक क्षण के लिये भी यह जानने का प्रयास किया कि यह हमला ‘नंदी’ पर हुआ था या विजय प्रताप पर।

यह तो ‘डेली न्यूज एक्टिविस्ट’ की खोजी पत्रकारिता से संभव हो पाया कि दरअसल पत्रकार श्यामेंद्र कुशवाहा का अपहरण नहीं हुआ था, बल्कि वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गये थे, या किये गये थे । इसके पीछे का असली रहस्य क्या था, इस सच को वरिष्ठ पत्रकार सुनील राय ने देश की सबसे प्रतिष्ठित मैगजीन ‘इंडिया टुडे’ में खोलकर रख दिया था । जिसके बाद इलाहाबादी मीडिया को लेकर ‘समलैंगिकता’ और ‘चकलाघर’ के शौकीनों पर बड़ी लंबी बहस चली। यह भी पता चला कि कौन पत्रकार किस जगह से अपने लिये ‘सुकोमल लौंडा’ खोजता है। यहां के एक मीडिया संस्थान में तो एक वरिष्ठ पत्रकार ;ध्यान दीजिये उम्र में, पद में नहींद्ध अपने सहायक संपादक को ‘गाड़दास’ कहकर सम्बोधित किया करते हैं। यह बात अलग है कि जरूरत पड़ने पर वह अपना यह ‘प्रिय सम्बोधन’ सार्वजनिक रूप से नहीं कहेंगे, क्योंकि यह ‘चरित्र’ संस्थान में लंबे दिनों तक टिके रहने में सहायक है।

किसी पर ‘आरोप’ और उसका दुष्प्रचार अलग बात है, लेकिन सत्यता प्रमाणित करना कठिन है। पहली बात तो यह है कि किसी एक चीज को नहीं समझ पाने को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। एक नजरिया योग्यता को अयोग्यता में बदलने की होती है, जिसकी वजह से चीजों में फर्क करना सामान्य तौर पर मुश्किल हो जाता है। मीडिया में यह कला बहुतों को आती है। इसलिये ऐसे में यदि हम मीडिया में योग्यता की बात करें तो यह बड़े बारीकी से समझने की जरूरत है कि मीडिया के क्षेत्र में जिसे ‘योग्यता’ कहते हैं, आखिर वह क्या है? जिसे वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया कुछ ऐसे परिभाषित करते हैं, मीडिया में योग्यता को बहुत सरलीकृत तरीके से नहीं समझा जा सकता है।

भारतीय समाज में जाति से योग्यता का निर्धारण तय होता रहा है। योग्यता में पहनने, बोलने, वह भी खास भाषा बोलने, उठने, बात व्यवहार, रंग-रूप स्वयं की प्रस्तुति आदि जैसे पहलू भी जुड़े होते हैं। योग्यता एक पैकजिंग है। इसीलिये लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के इस महत्वपूर्ण अंग में कई बार जनता तक सच्ची और तथ्यात्मक खबरें पहुंचाने के दायित्व पर निजी पूर्वाग्रह, सरकारी मशीनरी के हथियार और पत्रकारीय मूल्यों के खिलाफ तथ्यों की छानबीन की दूरी के चलते कई तरह के ‘वाद’ हावी हो जाते हैं। ऐसे सड़े-गंधाते विचारों के बीच पत्रकारिता कभी भी अपेक्षाओं के अनुरूप खरी नहीं उतरती है और समाज को दिशा में ‘प्रो-एक्टिव’ हो जाती है।

हमने इसी उद्देश्य से पत्रकार विजय प्रताप सिंह की स्मृति और उनकी निष्पक्ष लेखनी को जिन्दा रखने के बहाने मीडिया विमर्श अयोजित करने तथा एक ‘नवजनवादी पत्रकार मंच’ बनाने का निर्णय लिया है, जहां पर एक लोकतांत्रिक संस्था की तरह, बिना किसी पूर्वाग्रह, ‘वाद’ के स्वस्थ मानसिकता के साथ काम होगा। सेमिनार में भागीदारी के लिये आप सभी आमंत्रित हैं। जैसा कि अन्य जगहों पर माीडिया संस्थानों में मिल बैठकर सेमिनार व विमर्श होता है, वह भी हम तीन-तीन महींने के अंतराल में करेंगे। यह मंच समय-समय पर किसी एक घटना को लेकर मीडिया की भूमिका का अध्ययन भी करेगा, ताकि पत्रकारिता पर किसी को भी अंगुली उठाने का कोई मौका न मिले। संप्रेषण के क्षेत्र में मीडिया विमर्श से जुड़ी नई पुरानी सामग्री के बीच हम एक रिश्ता भी कायम करना चाहते हैं, ताकि संप्रेषण के विषय में हम अपने चिंतन और अध्ययनों की गति को तेज कर सकें।

बहादुर साथियों, कहने को तो बहुत कुछ है पर आज इतना ही। दर्द को दबा कर रखने से वह एक दिन असीम शक्ति बन जाता है। फिर जब यह पिटारा खुलेगा तो बात दूर तलक जायेगी ही! कलम खसीटने की मजबूरी को इस खबरनवीस की आरजू न समझा जाय। किसी भी ‘कटु वचन’ के लिए गुस्ताखी माफ हो के साथ मीडिया के सभी साथियों को सादर नमस्कार!

धन्यवाद!

राजीव चन्देल

इलाहाबाद


भड़ास तक अपने आर्टिकल, विचार, विश्लेषण bhadas4media@gmail.com के जरिए मेल करके पहुंचा सकते हैं.

हिंदुस्तान देहरादून से तीन का तबादला, एक का इस्तीफा

हिन्दुस्तान, देहरादून से सूचना है कि चीफ कॉपी रिपोर्टर प्रेम पुनेठा के इस्तीफ़ा देने के बाद लम्बे समय कुनाल दरगन ने भी संस्थान को अलविदा कह दिया है. कुनाल दरगन लंबे समय तक हरिद्वार के क्राइम रिपोर्टर रहे. पिछले दिनों हरिद्वार कार्यालय में हुई उठापटक के बाद दरगन का तबादला देहरादून कर दिया गया था. कुनाल की हिंदुस्तान को ज़माने मे महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

उधर, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार हिंदुस्तान, देहरादून से तीन वरिष्ठ लोगों का तबादला हिंदुस्तान, लखनऊ के लिए कर दिया गया है. चर्चा है कि तबादले की जद में कुल चार लोग आए हैं. इनमें से तीन के नाम पता चल गए हैं. एक हैं सुनील सिंह जो डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. बताया जाता है कि सुनील उन्नाव कानपुर के आसपास के रहने वाले हैं, इसलिए उनको लखनऊ भेजा गया है. चीफ सब एडिटर अशोक पांडेय का भी तबादला लखनऊ किया गया है. लखनऊ के ही निवासी संजय शर्मा जो चीफ सब एडिटर के रूप में हिंदुस्तान, देहरादून में कार्यरत हैं, को भी लखनऊ भेज दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि लखनऊ में अखबार जमाने के लिए प्रदेश की विभिन्न यूनिटों से लोगों का तबादला करके लखनऊ भेजा जा रहा है.

राजस्थान : जो पत्रकार नहीं उन्हें भी जमीन आवंटित, कोर्ट ने जवाब तलब किया

जयपुर। राजस्थान हाई कोर्ट ने न्यू पत्रकार कॉलोनी में भूखंड आवंटन को लेकर राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश अमिताभ राय और न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह सिराधना की खंडपीठ ने यह आदेश गुरुवार को प्रार्थी सुनील कुमार हेडा की याचिका की सुनवाई के बाद दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अश्विनी चौबिसा ने कोर्ट को बताया कि न्यू पत्रकार कॉलोनी के भूखंड आवंटन योजना में ऐसे लोगों को भूखंड आवंटन किए जा रहे हैं जो कि इस लाभ प्राप्ति के विधिक तौर पर हकदार नहीं है।

सरकार इसके बावजूद आवंटन करने पर आमादा है। इस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह आदेश दिया कि राज्य सरकार को एक ज्ञापन दे जिसे राज्य सरकार 15 दिनों के अंदर याचिका में उठाई गई आपत्तियों की छानबीन करके 30 जुलाई को अपना स्पष्टीकरण कोर्ट में पेश करे। इस मामले की आगामी 30 जुलाई को सुनवाई होगी।

यशवंत जी, रांची के ‘खबर मंत्र’ अखबार की अच्छाइ भी तो छापिए

यशवंत जी, आपसे आग्रह है कि आप हर किसी की बुराई छापते हैं लेकिन अच्छाई भी तो देखा कीजिए. 'खबर मन्त्र' अखबार के बारे में आपको जो लगा, शुरू के दौर में ठीक था. लेकिन अब रांची में 'खबर मन्त्र' हर एक दिन कमाल पे कमाल कर रहा है. उसे भी तो छापिए. उसके फेसबुक आईडी पर लेआऊट तो चेक कीजिए. अभी रांची में सबसे अच्छा लेआऊट दे रहा है.

खबरों में दो बार खबर का असर भी हुआ. पहला तो टैक्स मामले में और दूसरा सीएम के आवास के सामने जेप के लड़कियों को बाहर ही रखा गया था. उसे खबर मन्त्रा ने प्रकाशित किया तो वहां से सारे जैप की पुलिस यानि लड़कियों को वहां से हटा दिया गया।  आज गरीबों को 4 महीनों से उनका खाना नहीं मिल रहा है।

मैं तो आपको अपना छोटा भाई समझ कर यही कहूंगा अब तो इसको जरूर प्रकाशित करें कि कंटेट भी अच्छा हो गया है, लेआऊट भी धमाल हो गया है। और हर दिन कुछ न कुछ नया खबर का असर भी हो रहा है। आपसे आग्रह है कि इसको जरूर अपने वेब पर डालिए। मैं अपना नाम भी बता रहा हूं। मेरा नाम जगजीवन है और मैं इस अखबार का चीफ डीजाइनर हूं। सारा लेआऊट मैं ही तय कर रहा हूं। इससे पहले हिन्दुस्तान में कई संस्करण को लांच भी कराया हूं। बिजनेस भास्कर में 4 साल रहा हूं।

आपका

जगजीवन

खबर मंत्रा

रांची


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