ब्रेन हैमरेज के बाद SGPGI में भर्ती कराए गए लखनऊ के पत्रकार रीतेश द्विवेदी का निधन

लखनऊ में करीब 15 साल से पत्रकारिता कर रहे पत्रकार रीतेश द्विवेदी का संजय गांधी पीजीआई में निधन हो गया. उन्हें ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती कराया गया था. उनका अंतिम संस्कार लखनऊ के चौक के गुल्लाला श्मशान घाट पर किया गया. लखनऊ में चौपटिया के दिलाराम बारादरी के रहने वाले रीतेश ने राजधानी के कई बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़ कर लंबे समय तक पत्रकारिता की.

रीतेश अपने पीछे एक बेटा और पत्नी छोड़ गए हैं. रीतेश को मुखाग्नि उनके वृध्द पिता ने दी. अंतिम संस्कार के मौके पर बड़ी संख्या में पत्रकार और नेता मौजूद रहे. रीतेश द्विवेदी लखनऊ के अमर उजाला अखबार में भी कार्यरत रहे जहां स्थानीय संपादक पंचोली की बदतमीजी के कारण डिप्रेशन में चले गए और नौकरी से हाथ धो बैठे थे.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

आजतक के युवा पत्रकार रजत सिंह की दिल्ली के एम्स ट्रामा सेंटर में मौत

आजतक न्यूज चैनल के पत्रकार रजत सिंह का दो दिन पहले एक्सीडेंट हो गया था. नोएडा के बॉटनिकल गार्डन के पास उनकी बाइक को डम्पर ने टक्कर मार दी थी. उनके सिर में गंभीर चोटें आई थी. उन्हें एम्स के ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया था.

पत्रकार Dhirendra Pundir ने रजत सिंह को याद करते हुए फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है :

रजत सिंह नहीं रहा। युवा पत्रकारों में से कुछ पत्रकार आपको हमेशा उम्मीद दिलाते रहते है कि मीडिया को उनसे कुछ बेहतर स्टोरी मिलेंगी। वो मीडिया के आने वाले वक्त में मेहनती चेहरों में शुमार होंगे। रजत उन्हीं में से एक था। दिल्ली आजतक के उन पत्रकारों में से जिनके साथ आज छोड़ने के बाद भी राब्ता बना रहा। अरावली की पहाड़ियों पर उसकी स्टोरी पर काफी चर्चा भी हुई, मैंने कहा था कि आप इसको और भी बेहतर कर सकते थे अवार्ड से भी आगे। हंसते हुए रजत ने कहा था कि दादा आपके साथ काम करना है। ऐसे ही एक दिन विजय चौक पर रजत ने हंसते हुए का कि दादा कब मौका मिलेंगा।

मैंने भी हंसते हुए कहा कि अब तुम लोगों को नहीं मुझे ये कहना चाहिए कि मैं कब आप लोगों के साथ काम करूंगा। युवा सपनों के साथ उम्मीद का आसरा ज्यादा होता है,निराशा कम होती है। इस पर वो और मैं ठहाका मार कर हंस दिए। वो एक आखिरी मुलाकात थी। परसो एक साथी ने खबर दी कि रजत का एक्सीडेंट हो गया। फिर कल मेरी टीम के रिपोर्टर और रजत के जूनियर गौरव ने कहा कि सर वो एम्स में है और बचने की उम्मीद नहीं है। शाम को रजत से मिलने की उम्मीद में एम्स गया,एमरजेंसी विभाग में गया लेकिन वहां सी टू में रजत नहीं था। फिर मैंने अपने रिपोर्टर को फोन किया तो उसने कहा कि सर आप गलत आ गये है एम्मस में नहीं एम्मस ट्रामा सेंट्रर में है रजत। और तब मैं वहां पहुंच ही नहीं पाया, वापस आना पड़ा ऑफिस और फिर रात में गौरव का व्हाट्अप। मुझे मालूम नहीं रजत को न जानने वालों को मैं कैसे कह पाऊंगा कि रजत मीडिया की युवा उम्मींदों में से एक था। बस ये ही कह सकता हूं कि रजत नहीं रहा।

युवा पत्रकार दीपक गंभीर ने अपने मित्र को यूं याद किया है…

मन बहुत दुखी है। इसलिये की एक दोस्त, युवा पत्रकार आज हम सबको अलविदा कहकर इस दुनिया से चला गया। दिल्ली में मैंने और रजत ने कई बार फील्ड में साथ में ख़बरें की थी। रजत सिंह आज तक चैनल का एक युवा पत्रकार था और हमेशा मैंने उसको फील्ड पर जोश और उत्साह से लबरेज़ पाया। लेकिन किसी के लिए भी यकीन करना मुश्किल है कि रजत अब नहीं रहा, लेकिन अब वो हमारे साथ नहीं है सिर्फ उसकी यादें हैं। दो दिन पहले नॉएडा में रजत की बाइक का एक्सीडेंट हुआ था जिसके बाद वो एम्स में भर्ती था और अभी-अभी खबर मिली कि रजत अब नहीं रहा। मेरे दोस्त तुम हमेशा याद आओगे, तुम्हारा वो नाईट शिफ्ट में सबको हसाना और ये कहना की भाईसाहब चलो चाय पीते है। तुम्हारी ये सब बातें हमेशा याद आएँगी मेरे दोस्त। मन बहुत उदास और दुखी है। तुम जहाँ भी रहो खुश रहो। तुम्हारी यादें हम सबके दिलों में हमेशा रहेंगी। कभी सोचा नहीं था कि तुम ऐसे चले जाओगे। R.I.P….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सड़क हादसे में सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी का निधन

सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी के निधन होने की सूचना मिली है. विवेक पिछले कई सालों से अलग-अलग न्यूज़ चैनलो में अपनी सेवायें दे चुके है. वे श्री न्यूज़, चैनल वन न्यूज़, साधना न्यूज़ आदि चैनलों में गेस्ट कोआर्डिनेटर के तौर पर काम कर चुके हैं. बताया जाता है कि कल रात विवेक का निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया.

विवेक की बीती देर रात तकरीबन 11:30 बजे मौत हुई. वे अपनी मोटरसायकल से जा रहे थे तभी अज्ञात वाहन ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया. विवेक के आकस्मिक निधन से सुदर्शन न्यूज़ परिवार में मातम का माहौल है. उनके अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं. उनका अंतिम संस्कार आज शाम तीन बजे दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया गया.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यादें शेष : हंसमुख पत्रकार चंद्रप्रकाश बुद्धिराज का यूं पीड़ा लेकर जाना…

सीपी : अब यादें ही शेष….

राजू उर्फ चंद्र प्रकाश बुद्धिराजा उर्फ सीपी. पहले नाम का अर्थ जान लेते हैं, चंद्र के समान प्रकाश हो जिसका, बुद्धि के जो राजा हो। उर्फ सीपी पर भी गौर फरमाएं तो जुबां पर सीेधे विशालकाय अद्भुत, अनोखे दिल्ली की जान, कनॉट प्लेस (सीपी) का नाम दिमाग पर छा जाता है। अतिश्योक्ति न होगी कि सीपी के बिना दिल्ली अधूरी है।  नाम को सार्थक करता प्रभाव था हमारे सीपी का, जो दुनिया से चले गए। सच में, तुम्हारे बिना आज तुम्हारे साथियों की दुनिया भी वैसे ही अधूरी है, जैसे ‘सीपी’ बिना दिल्ली।

खैर, चंद्रप्रकाश बुद्धिराज उर्फ सीपी जी न्यूज चैनल घराने के स्थापित सदस्यों में से एक हमारे पत्रकार साथी, शारदीय नवरात्र की सप्तमी (8 अक्टूबर, 2016) को चुपचाप चले गए । बिल्कुल वैसे ही, हंसी, स्वाभिमानी चेहरा लिए, जैसे रोजाना तड़के किलारोड़ (रोहतक) समीप अपने निवास से फिल्म सिटी नोएडा अपने दफ्तर जी न्यूज के लिए चलते थे। या फिर यूं कहूं कि जैसे वह छुट्टी के दिन शहर में गिने-चुने पत्रकार, चुनिंदा नेता और बुद्धिजीवी साथियों से गप कर चुपके से चल देते थे।

निष्ठान और संकोची भी थे सीपी। एक किस्सा उनके स्वभाव से जुड़ा बताना चाहूंगा। ‘आपकी अदालत’ शो फेम मशहूर पत्रकार रजत शर्मा जब जी न्यूज में अपने इस चर्चित कार्यक्रम से ख्याति हासिल कर रहे थे, और फिर निजी मीडिया हाऊस बनाने निकले तो, सीपी से साथ चलने को कहा, पर सीपी तैयार नहीं हुए, शायद इसलिए कि वह सीमित संसाधनों में खुश रहने वाले शख्स थे। फालतू का रिस्क लेने की आदत नहीं थी। ट्रेजडी किंग दिलीप को भी अपने अंदाज से हंसाने का माद्दा था उनमें।

एक और पहचान है सीपी की, ठीक वैसी ही जैसे दो-चार रोज पहले नेपाल की एक आठवीं कक्षा की छात्रा प्रकृति मल्ला ने हासिल की है, अपनी हेंडराइटिंग के जरिए विश्वभर में। दरअसल, जवानी के दिनों में सीपी जब अनाज मंडी में पान की दुकान चलाते थे, वहां कत्थे-चूने के अलावा उन्हें स्याही का खर्च भी उठाना पड़ता था क्योंकि उम्दा हेंडराइटिंग के चलते बाजार में किसी को चिट्ठी-पत्री या कोई और जरूरी खत लिखवाना होता तो इनका नाम आता और लोग बोलते- सीपी पान वाले के पास चलते हैं। उस वक्त फेसबुक-व्हाटसएप, एसएमएस जैसे माध्यम नहीं होते थे। सच कहूं तो उस वक्त का फेसबुक-व्हाटसएप, एसएमएस था सीपी। इसी हुनर के जरिए उनकी एंट्री मीडिया जगत में हुई। शहर के कई पुराने लोगों के पास आज भी सीपी के लिखे खत, यादों की फाइलों में मिल जाएंगे।

संवाद में बेजोड़ और मिलनसार होने के बावजूद नई पीढ़ी की ‘पत्रकार बिरादरी’ में घुल नहीं पाए। नामी चैनल जी न्यूज से जुड़े होने के बावजूद सीपी को करीब से जानने वाले शहर के पत्रकार या तो वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में हैं या फिर इस श्रेणी को हासिल करने की दहलीज पर खड़े हैं। पान का शौक उनका बिल्कुल अमिताभ बच्चन के फिल्मी किरदार सरीखे था। एक मुंह में तो चार जेब में। आलम यह था कि पान की जुगाली से उनके होठ अकसर सुर्ख लाल दिखते थे। ज्यादा कुछ मैं उनके बारे में नहीं जानता, क्योंकि जितनी मेरी उम्र है, उतना उनका लिखने का अनुभव था। लेकिन पुरानी पीढ़ी से अनुभव हासिल करने के मेरे शौक से ही कुछ माह पहले उनकी चौकड़ी में मुझे जगह मिली, तो थोड़ा बहुत उनको जान पाया।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक पवन बंसलजी की पुस्तक, जो छपने को लगभग तैयार थी और सीपी ने अपने अंदाज के रंग उसमें भरे थे, उसकी फाइनल टचिंग टेबल पर मैं सीपी से मिला। किताब के शीर्षक को लेकर सब सोच-विचार में थे तब मैंने ‘गुस्ताखी माफ’ शीर्षक सुझाया, सीपी के साथ सबका समर्थन मिला औरें ‘गुस्ताखी माफ हरियाणा शीर्षक पर मुहर लग गई। कुछेक लेख के शीर्षक भी मैंने सुझाए कि बदला जाए तो और पठनीय होंगे। शीर्षक के अंदाज और मेरी उम्र देख कर वह गदगद हो गए और फिर कई छोटी-बड़ी रचनाएं, कविताएं साझा की।

मुझे भी एक नया हुनरबाज मिला तो खुशी हुई कि यह साझा सफर आगे बढ़ेगा तो मजा आएगा, लेकिन ऐसा हो न सका। कुछ दिन बाद ही पता लगा कि सीपी मुख कैंसर की गिरफ्त में आ गए। मैं मिलने गया तो थोड़ा भावुक हुए, लेकिन ऐसे पेश आए जैसे कुछ बात ही न हो, ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने उन दिनों बिल्कुल बोलने से मना किया था, पर बात किए बिना कहां मानने वाले थे। जाते हुए आश्वस्त किया कि जल्द ही कुछ लिख कर भेजता हूं।

कैंसर की पीड़ा में उनका ऑफिस आना-जाना लिखना पढऩा छूटने लगा। लेकिन जुनून की जिद से नया रास्ता चुन लिया। उम्र का अद्र्ध शतक पार करने बाद कैंसर की पीड़ा लिए सीपी फेसबुक से जुड़ गए, ताकि चाहने वालों से घर बैठे संवाद कर सकें। पोस्टें आने लगी, हमें लगा कि राहत है, लेकिन सप्ताह भर पहले अचानक फेसबुक पर पोस्ट डाली कि साथियों अब यहां (फेसबुक वॉल पर) मेरा इंतजार न करें। एकबारगी लगा कि ठिठौली कर रहे हैं, लेकिन यह ठिठौली न थी। इस संदेश की गंभीरता समझ उन तक पहुंच पाते, इससे पहले वह दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए बिल्कुल अकेला, संतान सुख से दूर, संगिनी सविता को, जिसे प्यार से सब अनु पुकारते हैं। उनसे मिल कर लौटा तो शैलेंद्र का लिखा, बंदिनी फिल्म का गीत याद आ गया ‘ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आजा…

लेखक अनिल कुमार मेडीकेयर न्यूज में समाचार संयोजक हैं. उनसे संपर्क a1outlook@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य और ओम प्रकाश बंसल का निधन

बिहार के गया से सूचना है कि चर्चित पत्रकार, जेपी आंदोलन से जुड़े एक्टिविस्ट व समाजसेवी प्रभात कुमार शांडिल्य का गुरुवार की दोपहर को निधन हो गया. उन्होंने गया शहर के नगमतिया रोड स्थित डॉ उषा लक्ष्मी आवास में अंतिम सांस ली.  वह काफी दिनों से बीमार थे. मूल रूप से बक्सर के रहनेवाले शांडिल्य जी का जन्म 24 नवंबर, 1951 को गया जिले के वजीरगंज के रहनेवाले राधेश्याम प्रसाद के घर में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा वजीरगंज में हुई. पटना स्थित बीएन कॉलेज से समाजशास्त्र में एमए उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने कभी नौकरी करने की नहीं सोची और अविवाहित जिंदगी गुजारी. वह ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन में काफी दिनों तक सक्रिय रहे.

इस बीच, राजस्थान के श्रीगंगानगर से खबर है कि श्रीगंगानगरके वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बंसल का शुक्रवार शाम जयपुर के एक निजी हॉस्पिटल में निधन हो गया। वे पिछले कई दिनों से वहां उपचाराधीन थे। लगभग साठ वर्षीय बंसल को दस सितंबर को हृदयघात के कारण उपचार के लिए जयपुर ले जाया गया था। शनिवार शाम चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार शनिवार सुबह किया गया। अंतिम यात्रा सुबह दस बजे उनके 69 बैंक कॉलोनी आवास से पदमपुर रोड कल्याण भूमि के लिए रवाना हुई।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उफ्फ… दैनिक जागरण अलीगढ़ और ईनाडु टीवी हैदराबाद में हुई इन दो मौतों पर पूरी तरह लीपापोती कर दी गई

अलीगढ दैनिक जागरण के मशीन विभाग में कार्यरत एक सदस्य की पिछले दिनों मशीन की चपेट में आकर मृत्यु हो गई. न थाने ने रिपोर्ट लिखा और न ही डीएम ने कुछ कहा. शायद सब के सब जागरण के प्रभाव में हैं. यह वर्कर 2 दिन पहले वहां तैनात किया गया था. उसका भाई वहां पहले से कार्यरत था. पंचनामा जबरन कर लाश को उठवा दिया गया. बताया जाता है कि अलीगढ़ दैनिक जागरण में शाफ्ट टूट कर सिर में लगने से मौत हुई.

यह कर्मचारी दो दिनों से ड्यूटी पर आ रहा था और उसका ट्रायल लिया जा रहा था. दैनिक जागरण प्रबंधन ने इसे रोड एक्सीडेंट दिखा दिया. पीड़ित को कहीं से कोई मदद नहीं मिली. कर्मचारी का नाम केशव प्रजापति बताया जाता है. घटना 24 सितंबर की रात ढाई बजे की है. कर्मचारी का मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को कई बार बुलाया गया लेकिन पुलिस नहीं आई. पंचनामा जागरण प्रबंधन के निर्देश के अनुसार भरा गया.

उधर, पत्रकार अमित सिंह चौहान (जी न्यूज में कार्यरत) के भाई यशपाल सिंह जो कि ईनाडु टीवी डिजिटल के हिंदी डेस्क पर कंटेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे, का 19 सितंबर 2016 को निधन हो गया.  डॉक्टर के अनुसार यशपाल सिंह का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ. यशपाल सिंह को उनके सहकर्मियों द्वारा समय से हैदराबाद के मशहूर ग्लोबल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था.  लेकिन अस्पताल की तरफ से एक लाख रुपए सिक्योरिटी के रूप में जमा करने को कहा गया तो ऐसा हो न सका क्योंकि किसी सहकर्मी के पास पैसा नहीं था. हालांकि ईलाज पर जो खर्च हो रहा था, इसके लिए पैसे लगातार जमा किए जा रहे थे. लोगों ने आनन फानन में ईनाडु दफ्तर को पूरी बात से अवगत कराया. बावजूद इसके ऑफिस से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई. यशपाल सिंह के फैमिली मेंबर से बात होने के बाद और पहुंचकर पूरे पैसे चुकाने के आश्वासन के बाद भी ऑफिस ने पैसे जमा नहीं किए. इससे इलाज के आभाव में 30 वर्षीय यशपाल सिंह का उक्त तारीख को रात दस बजे निधन हो गया.

यशपाल सिंह के बड़े भाई पत्रकार अमित फ्लाइट से जब तक हैदराबाद पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अमित सिंह ने भाई के निधन के बाद लापरवाही के कारण हत्या का केस दर्ज कराया है. इसकी स्थानीय एलबी नगर पुलिस जांच कर रही है. मामला बडे मीडिया हाउस से जुड़े होने के कारण पुलिस पर काफी दबाव है. अस्पताल प्रशासन और ईनाडु ग्रुप मामले को एक दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. इस मामले की रामोजी फिल्मसिटी में खूब चर्चा है. खबर यह भी है कि बीमारी के बाद भी यशपाल सिंह को काम से छुट्टी नही मिली थी. इसके कारण खराब तबीयत में उनने निधन से एक दिन पहले तक आफिस में काम किया था. यशपाल सिंह इसके पहले दिल्ली में एपीएन न्यूज व खबर भारती में काम कर चुके हैं. यशपाल यूपी के बहराइच जिले के रहने वाले थे. ईनाडु प्रबंधन ने मामला दबाने की लाख कोशिश की लेकिन पत्रकारों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुंबई में पत्रकार रामकुमार मिश्र का निधन

मुंबई : हमारा महानगर के पूर्व उपसम्पादक और दबंग दुनिया के उपसंपादक रामकुमार मिश्र का कल देर शाम मुम्बई के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे तबियत खराब होने पर केइएम अस्पताल में भर्ती थे। शाम को उनका शव उनके घाटकोपर स्थित निवास पर ले जाया गया जहाँ पत्रकारों और शुभचिंतको ने उन्हें भावभीनी श्रधांजलि दी।

चार दिन पहले रामकुमार मिश्र की तबियत ख़राब हुई थी फिर केइएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें आईसीयू में रखा गया था। बुधवार को ठीक हो गये थे और बाहर निकाल कर उन्हें सामान्य वार्ड में रखा गया था। रात का खाना खाने के बाद उलटी हुई और उसके बाद आधे घण्टे के भीतर उनकी मौत हो गयी।

शशिकांत सिंह
मुंबई
9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशोभूमि के पत्रकार अरविन्द सिंह को मातृशोक

मुबई से प्रकाशित हिन्दी दैनिक यशोभूमि के उपसंपादक और वरिष् पत्रकार अरविन्द सिंह की माताजी गुलाबी देवी भुवाल सिंह का मुंबई के शिवड़ी स्थित तिलक इमारत  स्थित आवास में निधन हो गया। वे  81 साल की  थीं। गुलाबी देवी लंबे समय से बीमार चल रही थीं। वे अपने पीछे पुुत्र अरविन्द सिंह, विनय सिंह और पत्री शशिकला सिंह सहित नातीपोते का भरापूूरा परिवार छोड़ गयी हैं।

उनका अंतिम संस्कार मुंबई के भोईवाड़ा श्मशान गृह में किया गया। वे मूलरुप से आजमगढ़ के नरफोरा गांव की रहने वाली थीं। मुखाग्नि उनके छोटे बेटे विनय सिंह ने दिया। गुलाबी देवी के निधन पर मुंबई के पत्रकारों ने शोक जताया है।

शशिकांत सिंहकी रिपोर्ट.

संपर्क 9322411335

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

प्रख्‍यात आलोचक एवं साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोतिय का निधन

prabhakar

हिंदी के प्रख्‍यात आलोचक एवं साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोतिय का गुरुवार की रात दिल्‍ली के सर गंगाराम अस्‍पताल में निधन हो गया. वे 76 वर्ष के थे तथा लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वे अपने पीछे पत्‍नी तथा एक पुत्र एवं पुत्री का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनका अंतिम संस्‍कार हरिद्वार में किया जाएगा. प्रभाकर क्षोत्रिय ने हिंदी की कई प्रतिष्‍ठित साहित्‍यिक पत्रिकाओं का संपादन किया. क्षोत्रिय के निधन से हिंदी साहित्‍य जगत को गहरा धक्का पहुंचा है.

डॉ. प्रभाकर क्षोत्रिय का जन्‍म मध्‍य प्रदेश के जावरा में 19 दिसंबर 1938 को हुआ था. उज्‍जैन में उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने के बाद वह भोपाल के हमीदिया कालेज में शिक्षक नियुक्‍त हो गए थे. उन्‍होंने हिंदी में पीएचडी एवं डीलिट की थी. हिंदी पट्टी में उनकी गिनती जाने-माने आलोचक और नाटककार के तौर पर होती थी. हिंदी आलोचना के अलावा उन्होंने साहित्य और नाटकों को भी एक नई दिशा प्रदान की.

क्षोत्रिय जी सबसे पहले मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सचिव एवं ‘साक्षात्कार’ व ‘अक्षरा’ के संपादक रहे. इसके अलावा वे भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं ‘वागर्थ’ व ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक पद पर कार्य करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली के निदेशक पद पर भी रहे. प्रभाकर क्षोत्रिय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे और उन्‍होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी कलम चलाई, लेकिन हिंदी साहित्‍य में आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्‍मरणीय है.

उनकी प्रमुख आलोचनात्‍मक कृतियों में  ‘सुमनः मनुष्य और स्रष्टा’, ‘प्रसाद का साहित्यः प्रेमतात्विक दृष्टि’, ‘कविता की तीसरी आख’, ‘संवाद’, ‘कालयात्री है. इसके अलावा कविता’ संग्रह में ‘रचना एक यातना है’, ‘अतीत के हंसः मैथिलीशरण गुप्त’, जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता’. ‘मेघदूतः एक अंतयात्रा, ‘शमशेर बहादुर सिंह’, ‘मैं चलूं कीर्ति-सी आगे-आगे’, ‘हिंदी – कल आज और कल’ प्रमुख कृतियां रहीं. इसके साथ ही हिंदीः दशा और दिशा’, ‘सौंदर्य का तात्पर्य’, ‘समय का विवेक’, ‘समय समाज साहित्य’ भी प्रमुख कृतियां रहीं. जबकि नाटक ‘इला’, ‘साच कहू तो…’, ‘फिर से जहापनाह’, जैसा अविस्मरणीय निबंधों को भी लिखा.

प्रभाकरजी के निधन पर देश भर के हिंदी साहित्‍यकार एवं पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरीके से याद किया. जनसत्‍ता के संपादक रहे वरिष्‍ठ पत्रकार एवं साहित्‍यकार ओम थानवी ने लिखा है : ”वरिष्ठ हिंदी आलोचक और अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादक रहे डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे। महभारत पर उनका बड़ा काम है। वे 76 वर्ष के थे और कुछ समय से ज़्यादा ही अस्वस्थ चले आ रहे थे। उनसे पहले-पहल 1984 में बरगी नगर (मध्यप्रदेश) में मिलना हुआ था, जब अज्ञेय जी ने वहां पांचवा वत्सल निधि शिविर आयोजित किया। बरसों बाद जनसत्ता आवास में उनके पड़ोस में रहने का सुख हासिल था। पीटर ब्रुक की तीन घंटे लम्बी नाट्य-फ़िल्म ‘महाभारत’ (मूल प्रस्तुति नौ घंटे) उन्होंने हमारे यहा एकाधिक बार देखी। मैंने बाद में उसकी प्रति तैयार कर उन्हें भेंट की थी। जब उनकी ‘महाभारत’ छप कर आई तो उसे देने स्वयं आए। जब स्वस्थ थे जनसत्ता आवास में शाम को सैर की फेरी लगाते थे। बाइपास के बाद तो नियमित रूप से। उस रास्ते पर उनकी पदचाप हमें लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी।”

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अलविदा अज्ञात जी, आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं

(स्व. अशोक अज्ञात जी)

कभी माफ़ मत कीजिएगा अशोक अज्ञात जी, मेरे इस अपराध के लिए … हमारे विद्यार्थी जीवन के मित्र अशोक अज्ञात कल नहीं रहे। यह ख़बर अभी जब सुनी तो धक् से रह गया । सुन कर इस ख़बर पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । लेकिन विश्वास करने न करने से किसी के जीवन और मृत्यु की डोर भला कहां रुकती है। कहां थमती है भला ? अशोक अज्ञात के जीवन की डोर भी नहीं रुकी , न उन का जीवन । अशोक अज्ञात हमारे बहुत ही आत्मीय मित्र थे । विद्यार्थी जीवन के मित्र । हम लोग कविताएं लिखते थे। एक दूसरे को सुनते-सुनाते हुए हम लोग अकसर अपनी सांझ साझा किया करते थे उन दिनों।

गोरखपुर की सड़कें , गलियां पैदल धांगते-बतियाते घूमते रहते थे। क्रांति के फूल खिलाते , खिलखिलाते रहते थे। वह हमारी मस्ती और फाकाकशी के भी दिन थे । हमारी आन-बान-शान और स्वाभिमान से जीने के दिन थे । ज़रा-ज़रा सी बात पर हम लोग किसी भी ख़्वाब या किसी भी प्रलोभन को क्षण भर में लात मार देने में अपनी शान समझते थे । इसी गुरुर में जीते और मरते थे । अठारह-बीस बरस की उम्र में हम लोग दुनिया बदलने निकले थे । दुनिया तो खैर क्या बदली, हम लोग ही बदलते गए , हारते और टूटते गए । लेकिन यह तो बाद की बात है । अब की बात है । पर उस समय , उस दौर की बात और थी । और अशोक अज्ञात तो अशोक ही थे। अशोक मतलब बिना शोक के। कुछ भी बन बिगड़ जाए उन को बहुत फर्क नहीं पड़ता था । अज्ञात का गुरुर उन्हें शुरु ही से और सर्वदा ही रहा।

हम लोग विद्यार्थी ज़रुर थे पर साहित्य में स्थानीय राजनीति की ज़मीन को तोड़ने के लिए जागृति नाम से एक संगठन भी बनाया था । जिस का मुख्य काम उन दिनों कवि गोष्ठियां आयोजित करना था । अशोक अज्ञात उन दिनों संकेत नाम से एक अनियतकालीन पत्रिका भी निकालते थे । और कि उस में वह किसी की सलाह या दखल नहीं लेते थे । वह उन का व्यक्तिगत शौक और नशा था । पान खाते-चबाते वह एक से एक गंभीर बात कर लेते थे । वह जल्दी किसी विवाद में नहीं पड़ते थे लेकिन चुप भी नहीं रहते थे। स्वार्थ उन में नहीं था , भावुकता लेकिन बहुत थी । उन के एक मामा जिन्हें हम लोग ओझा जी कहते थे, हम लोगों को पढ़ने के लिए अकसर सोवियत साहित्य उपलब्ध करवाते रहते थे।

अशोक अज्ञात का गांव टांड़ा हमारे गांव बैदौली से थोड़ी दूरी पर ही था । वह बाहुबली और कई बार काबीना मंत्री रहे हरिशंकर तिवारी के ख़ास पट्टीदार थे । लेकिन तमाम मुश्किलों और निर्धनता के बावजूद कभी भी उन से कोई मदद नहीं मांगी । न ही उन के हुजूर में गए । बचपन में ही उन के पिता नहीं रहे थे । उन की मां ने ही उन्हें पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया । टीन एज तक आते-आते अज्ञात जी ने परिवार की ज़िम्मेदारियां उठा लीं । उन्हीं दिनों अपनी एक बहन की शादी उस कच्ची उम्र में तय की थी । मैं भी गया था तब उन की बहन की शादी में उन के गांव। संयोग से विद्यार्थी जीवन में कुछ समय मैं गोरखपुर के रायगंज मुहल्ले में भी रहा था । वहां अज्ञात जी हमारे पड़ोसी रहे थे । अपनी बड़ी बहन के साथ रहते थे । वह हमारी कविताओं के , हमारे संघर्ष और हमारी उड़ान के दिन थे । पत्रकारपुरम , राप्ती नगर , गोरखपुर में भी वह मेरे पड़ोसी रहे थे । इस नाते जब भी गोरखपुर जाता था तो नियमित मुलाकात होती थी उन से । वह जब कभी लखनऊ आते तब भी हमसे मिलते ज़रुर थे । हमारे कथा साहित्य के वह अनन्य पाठक थे । खोज कर , मांग कर जैसे भी हो वह पढ़ते ज़रुर थे । न सिर्फ़ पढ़ते थे बल्कि पात्रों और कथाओं पर विस्तार से चर्चा भी करते थे । प्रश्न करते थे । किसिम किसिम के सवाल होते उन के पास । कई बार वह फ़ोन कर के बात करते । मिलने का इंतज़ार नहीं कर पाते थे।

मेरी कहानी मैत्रेयी की मुश्किलें और उपन्यास वे जो हारे हुए उन को बहुत प्रिय थे । इस लिए भी कि वह ख़ुद हारे हुए थे और कि इस उपन्यास के बहुत से चरित्र उन के जाने और पहचाने हुए लोग थे । हरिशंकर तिवारी भी इस उपन्यास में खल पात्र के रुप में उपस्थित थे इस लिए भी वह इसे बहुत पसंद करते थे । इतना ही नहीं , यह उपन्यास भी उन्हों ने उन तक पहुंचवा दिया यह कह कर कि आप अपने को चाहे जितना सफल मानिए , नायक मानिए लेकिन देखिए समय और साहित्य आप को किस तरह दर्ज कर रहा है । यह बात उन्हों ने मुझे फ़ोन कर बताई । मैं ने चिंतित हो कर कहा , यह क्या किया आप ने ? वह बोले , घबराईए नहीं आप । वह लोग बहुत बेशर्म और घाघ लोग हैं । उन को इन सब चीजों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । और सचमुच अशोक अज्ञात ने सही ही कहा था । उन या उन जैसों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था । फ़र्क तो छोड़िए , नोटिस भी नहीं ली उन या उन जैसे लोगों ने । लेकिन मैं चिंतित इस लिए हुआ था क्यों कि एक बार एक ख़बर के सिलसिले में महीनों धमकी आदि झेलना पड़ा था , इन्हीं तिवारी जी के चमचों से । अज्ञात जी बोले थे , ख़बर की बात और है।

अशोक अज्ञात अपनी कविताओं में जो चुभन बोते थे , अपने जीवन में भी वह चुभन महसूस करते रहे । निरंतर । इतना कि बाद के दिनों में वह सिर्फ़ पाठक बन कर रह गए । रचना छूट गई। उन के जीवन में आर्थिक संघर्ष इतना ज़्यादा था कि बाक़ी सारे संघर्ष और रचनात्मकता खेत हो गई थी । आज अख़बार की नौकरी ने उन्हें निचोड़ लिया था । पांच हज़ार , सात हज़ार या दस हज़ार रुपए की नौकरी में आज अख़बार की नौकरी में आज की तारीख में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति और उस के परिवार का बसर कैसे होता रहा होगा , समझा जा सकता है । गोरखपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे हैं वह । आज अख़बार में वह संपादक भी रहे कुछ समय तक । लेकिन संपादक और प्रेस क्लब के अध्यक्ष हो कर भी अज्ञात ही रहे । क्षुद्र समझौते कभी नहीं किए । दलाली आदि उन से कोसों दूर भागती थी । भूखे रह लेना वह जानते थे लेकिन हाथ पसारना नहीं । अशोक तो वह खैर थे ही । अशोक मतलब बिना शोक के । लेकिन अशोक अज्ञात भी हो जाए तो मुश्किल हो जाती है । अज्ञात नाम तो उन्हों ने कविता लिखने के लिए ख़ुद रखा था । पर क्या पता था कि अज्ञात नाम से कविता लिखने वाला , संकेत नाम की पत्रिका निकालने वाला यह व्यक्ति इतना भी अज्ञात हो जाएगा कि कैंसर की बीमारी का इलाज भी अपने पिछड़े गांव में करते हुए अपने गांव में ही आंख मूंद लेगा ! अपनी जन्म-भूमि में ही प्राण छोड़ेगा । और कि इस बीमारी की सूचना भी हम जैसों मित्रों को देने की ज़रुरत नहीं समझेगा।

अशोक अज्ञात फ़ेसबुक पर भी उपस्थित रहे हैं । और इस दौर में जब लोग अपनी फुंसी , खांसी , बुखार की भी सूचना परोस कर भी अपनी आत्म मुग्धता में फ़ोटो डाल-डाल कर धन्य-धन्य होते रहते हैं , वहीं हमारे अशोक अज्ञात ने अपने कैंसर की भनक भी नहीं होने दी किसी को । आप उन के अशोक और अज्ञात होने का अंदाज़ा इस एक बात से भी लगा सकते हैं । अब हम भी अपने को सिर्फ़ और सिर्फ़ कोस ही सकते हैं कि एक अभिन्न आत्मीय और स्वाभिमानी मित्र को क्यों इस तरह निर्वासित हो कर अज्ञात मृत्यु के कुएं में धकेल दिया । क्यों नहीं , खोज ख़बर रखी । माथा ठनका तो तभी था जब कुछ समय पहले गोरखपुर जाने पर उन के घर गया तो पता चला कि वह तो अपना घर बेच कर कहीं और जा चुके हैं । उन का फ़ोन मिलाया । फ़ोन बंद मिला । दूसरे पड़ोसी गिरिजेश राय ने बताया कि वह कर्ज में डूब गए थे , मकान की किश्तें बहुत हो गई थीं, पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं सो घर बेचना ही रास्ता रह गया था।

अब तो गिरिजेश राय भी नहीं रहे । फिर बाद में भी कई बार फोन किया , कभी फ़ोन नहीं मिला उन का । न ही कोई मित्र उन का बदला हुआ उन का कोई दूसरा नंबर दे पाया । फिर मैं भी अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में उलझ गया । अज्ञात जी की खोज-ख़बर लेना बिसर गया । ख़बर मिली भी तो यह शोक भरी ख़बर। जाने गोरखपुर के पत्रकार लोग गोरखपुर से कोई सत्तर किलोमीटर दूर उन के गांव टांड़ा भी पहुंचे होंगे या नहीं , मैं नहीं जानता। यह ज़रुर जानता हूं अज्ञात जी के इस तरह अज्ञात चले जाने में एक अपराधी मैं भी हूं। कभी माफ़ मत कीजिएगा अज्ञात जी , मेरे इस अपराध के लिए । इस लिए कि मैं कभी इस अपने अक्षम्य अपराध के लिए ख़ुद को माफ़ करने वाला नहीं हूं। अलविदा अज्ञात जी। आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं, अशोक नहीं हैं। दल्लों भड़ुओं के इस दौर में , कुत्ता और चूहा दौड़ में इस तरह बेनाम और बेपता मौत ही हम सब की अब तकदीर है। करें भी तो क्या करें अशोक अज्ञात जी । ख़ुद्दारी की खता की भी आख़िर कुछ तो सज़ा भी होती ही है।

मुश्किल यह भी है कि जैसे उन के पिता उन्हें भंवर में छोड़ कर चले गए थे , वैसे ही अज्ञात जी भी अपने बच्चों को भंवर में ही छोड़ कर गए हैं। दो बेटे हैं, बेरोजगार हैं। एक बेटी है, विवाह बाकी है। पत्नी भी बीमार रहती हैं। उनका इलाज भी वह नहीं करवा पाते थे। मुश्किलें और भी बहुत हैं। ईश्वर उन के परिवार को उन के विछोह की शक्ति दे और उन की आत्मा को शांति। एक अभागा मित्र और कर भी क्या सकता है भला?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

…और इस तरह नींद में चले गये अशोक अज्ञात

गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार अशोक अज्ञात नहीं रहे। इस सत्य को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास अब कोई चारा नहीं है। करीब छह-सात साल पहले की बात है। अशोक अज्ञात प्रेस क्लब का चुनाव जीते। उनकी पत्रकार-मंडली का शपथ-ग्रहण समारोह होना था। अज्ञात एक दिन मुझसे टकरा गये। बोले– शपथग्रहण समारोह के लिए मुख्य अतिथि के रूप में किसे बुलाऊँ?

मैंने कहा– सोचने का मौका दीजिए। दिमाग और नजर दौड़ाने लगा। अन्त में एक नाम सूझा। मैंने कहा– इस शोभा के लिए किसी ऐसे आदमी को बुलाया जाना चाहिए जो शब्द और वाणी का जादूगर हो। अज्ञात ने चयन का काम मुझ पर छोड़ दिया। मैंने कृष्ण कल्पित का चयन किया। गोरखपुर की पत्रकार बिरादरी अब भी कृष्ण कल्पित को याद करती है। मुझे याद आता है कि अशोक अज्ञात ने उस आयोजन में छोटा-सा भाषण देने के बाद कल्पित की चर्चित काव्यकृति ‘एक शराबी की सूक्तियां’ से कुछ कविताओं का पाठ भी किया था। अज्ञात मेरे ऐसे मित्र थे, जिनकी सादगी और सरलता मुझे किसी अन्य मित्र में नहीं दीखती। निष्कपट, निष्कलुष और निश्छल व्यक्तित्व के धनी अज्ञात सदैव मुस्कुराते हुए ही मिलते थे। कभी उन्हें उदास मुद्रा में नहीं पाया। दुख और पीड़ा भले उनके भीतर पल रही हो। बाहर से यही लगता था कि वह सुखी जीवन जी रहे हैं।

अज्ञात से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय 1977 के आसपास हुआ था। गोरखपुर के राजकीय जुबली कॉलेज के सामने एक फर्नीचर की दुकान है, जो मेरे एक मित्र दयाराम साहनी की है। वहीं अज्ञात का बैठना-उठना होता था। कई बार वहां अज्ञात को देखा, लेकिन सीधे उनसे परिचय न होने के कारण बातचीत नहीं हुई। एक दिन जब मैं उस अड्डे पर पहुँचा तो अज्ञात एक कविता सुना रहे थे। वह कविता इतनी दमदार थी कि मैंने उनसे उसे दोबारा सुनाने का इसरार किया। उन्होंने सुनाई। कविता गीतनुमा थी। मैंने उनसे कहा— यह कविता तो शायद बाबा नागार्जुन की है। वह कुछ-कुछ झेंपते-शरमाते हुए बोले— नहीं-नहीं यह मेरी लिखी है। मैंने उनकी बात मान तो ली, पर विश्वास नहीं हुआ। एक बार शाम के वक्त उनके डेरे पर जाना हुआ। उन दिनों अज्ञात शायद दैनिक जागरण में सब-एडिटर थे। उन्होंने रात में मेरे वहीं रुकने का कार्यक्रम बना दिया। मीट-चावल पकाया और मदिरा की व्यवस्था की। उनकी फरमाइश पर मैंने एक कविता सुनायी। और तब क्या था] उनका कवि जाग गया।

उन्होंने अलमारी से अपनी डायरी निकाली और दस-बारह गीत एवं कुछ अतुकांत कविताएं सुना डालीं। सच कहता हूँ, वैसी कविताएं मैंने न तो आज तक पढ़ी और न सुनीं। मजे की बात यह कि अज्ञात की इनमें से शायद ही कोई कविता अखबार या पत्रिका में छपी हो। तब मैं लघु पत्रिकाओं में खूब छप रहा था। अज्ञात की तुलना में मेरी कविताएं कहीं नहीं ठहरती थीं। उस समय गोरखपुर का बुद्धिजीवी समाज अज्ञात को बेहद अच्छा आदमी तो मानता था, लेकिन वह एक आला दर्जे के कवि हैं यह मान्यता नदारद थी। अज्ञात के व्यक्तित्व में गजब का वैराट्य और औदार्य था, लेकिन न जाने उनमें कौन-सी ऐसी ग्रंथि थी जो उनको ख्यात होने की कोशिश से रोकती थी। साल-डेढ़ साल पहले की बात है। मैं उनके घर पर रात में रुका था। उनकी बहुत सारी कविताएं सुनीं। उनसे कहा कि इनकी पाण्डुलिपि तैयार कर मुझे दे दीजिए। संग्रह छपवाने की जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। वह टाल गये। अब वह डायरी कहॉं और किस हालत में होगी, नहीं कह सकता। गोरखपुर गया तो खोजबीन कराने का प्रयास करूँगा। सातवें-आठवें दशक में गोरखपुर और आसपास के जिलों के गांव-कस्बों के स्कूल-कालेज विभिन्न अवसरों पर कवि सम्मेलन आयोजित किया करते थे, जिनमें स्थानीय कवि-शायर आमंत्रित किये जाते थे। अशोक अज्ञात भी इन आयोजनों में काव्यपाठ किया करते थे। वाहवाही मिलती थी, खुश हो लेते थे।

उन दिनों गोरखपुर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अच्छा जनाधार हुआ करता था। मेरा नाता माकपा से था। अशोक अज्ञात भाकपा के कार्ड होल्डर थे। पार्टी के धरना-प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। मैं था तो माकपा में, लेकिन लाल झंडा वाली सभी पार्टियों की गतिविधियों में रुचि लेता था और सभी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में रहता था। 1978 के आरम्भ में मुझे लखनऊ में सरकारी नौकरी मिल गयी और मैं गोरखपुर से चला गया। अशोक अज्ञात से इस बीच कोई सम्पर्क नहीं रख सका। अगस्त 1979 में रामेश्वर पाण्डेय के प्रयास से मुझे दैनिक जागरण में पत्रकार की नौकरी मिल गयी। मैं दोबारा गोरखपुर में। अप्रैल 1981 में दैनिक जागरण से निकाले जाने और उसके कुछ महीने बाद तक मैं गोरखपुर में रहा, लेकिन इस दौरान कभी अज्ञात से मिलना न हो पाया। हो सकता है, कभी कहीं दो-चार मिनट के लिए मिलना हुआ हो। याद में नहीं है।

1984 में मैंने कुछ महीने ‘आज’ अखबार में काम किया। तब अज्ञात भी ‘आज’ में आ चुके थे। आये दिन उनके घर आना-जाना होता था। मैं उनके परिवार का सदस्य जैसा था। मौका मिलने पर हम शाम की बैठकें भी कर लेते थे। इस अखबार में रहने के दौरान अज्ञात से मेरी प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। ‘आज’ मैं ज्यादा दिन न रहा। इसके बाद कई घाटों का पानी पीता रहा। आखिरकार, 1986 में ग्वालियर में पहुँच गया। वहां दैनिक भास्कर से मुझे तत्कालीन स्थानीय सम्पादक श्याम कश्यप ने निकलवा दिया। मजे की बात यह कि श्याम कश्यम ने ही मुझे नौकरी दिलवायी भी थी। कुछ महीने ‘चम्बलवाणी’ नाम के छोटे से अखबार में बिताये। और तभी मुझे राम विद्रोही जी ने, जो ‘दैनिक आचरण’ अखबार के सम्पादक हुआ करते थे, पार्ट टाइम नौकरी दिला दी। वे मेरे अत्यधिक आर्थिक कष्ट के दिन थे। एक रोज मेरे मित्र और जाने-माने पत्रकार अनिल पाण्डेय ग्वालियर आ धमके। तब वह ‘आज’ गोरखपुर में थे। ‘आज’ ज्वाइन करने का ऑफर लेकर गये थे। मैं कानपुर लग गया। उस दौरान लगभग हर महीने गोरखपुर एक-दो दिन के लिए जाता था, क्योंकि मेरा परिवार वहीं था। किसी से मिलूँ न मिलूँ, अशोक अज्ञात से अवश्य मिलता था। मेरे पास अज्ञात से जुड़ी अनगिनत यादें हैं। सभी यादें बॉंट पाना सम्भव नहीं।

अशोक अज्ञात ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के साधन के रूप में ट्यूशन करना शुरू किया। कई साल तक इसी से वह गुजारा करते रहे। इसके बाद उन्होंने आजमगढ़ के अखबार दैनिक देवल, गोरखपुर के ‘हिन्दी दैनिक’ और दैनिक जागरण में काम करते हुए ‘आज’ में जगह पायी। आज अखबार से ही वह रिटायर हुए। आज से ग्रेच्युइटी और पीएफ का पैसा निकलवाने में उन्हें नाको चने चबाने पड़े। पता नहीं, मरने से पहले पूरा पैसा प्राप्त कर सके या नहीं। 2014-15 में मैं गोरखपुर में रहने लगा था। उस समय अज्ञात घोर आर्थिक तंगी में जी रहे थे। उनका परिवार भी बिखर रहा था। लेकिन कभी उनके माथे पर शिकन नहीं देखता था।

पत्नी सीजोफ्रेनिया की शिकार हो गयी थीं। और बाद में चल बसीं। बड़ा बेटा अतुल मानसिक रूप से बीमार हो चला था। छोटा वाला किसी प्रकार सातवीं पास कर सका और पढ़ना बन्द कर दिया। दोनों के बीच की एक बेटी है— नेहा। वह पढ़ने में ठीक थी। नेहा शायद एम कॉम कर चुकी है। अज्ञात कहते थे कि नेहा जब तक पढ़ना चाहेगी, तब तक इसकी शादी करूँगा। मैं आये दिन उनके डेरे पर पहुँच जाता था और में वहीं रुक जाता था। वह अपनी कोई परेशानी शेयर नहीं करना चाहते थे। मैं ही उनको खोद-खोद कर पारिवारिक दिक्कतों की जानकारी लेता था। उनकी गम्भीर बीमारी की शुरुआत अनवरत हिचकी आने से हुई। करीब एक साल तक उन्हें हिचकी आती रही। इलाज चलता रहा। कोई फायदा नहीं होता था। इसी बीच, उन्‍हें मसूढ़े में दर्द की शिकायत हुई। कुछ दिन टालते रहे। जब शुभचिन्तकों के दबाव में जांच करायी तो कैंसर निकला। कीमोथेरैपी ने कुछ महीने उन्हें जिन्दगी बख्शी। जिस रोज उनकी मौत की खबर पायी, उससे दस दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। फोन नेहा ने उठाया था। बोली— पापा बात कर पाने की हालत में नहीं हैं। वह लाइन पर आये, दो-चार वाक्य बोल सके। और अन्त में कहा— विनय जी, नींद आ रही है। अब सोने दीजिए!

लेखक Vinay Shrikar से संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया कैंसर के ताजा अटैक को मात न दे सके

सुभाष लखोटिया के प्रशंसकों एवं चहेतों के लिए यह विश्वास करना सहज नहीं है कि वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। भारत के शीर्ष टैक्स और निवेश सलाहकार के रूप में चर्चित एवं सीएनबीसी आवाज चैनल पर चर्चित शो ‘टैक्स गुरु’ के 500 से अधिक एपिसोड पूरा कर विश्व रिकार्ड बनाने वाले श्री लखोटिया अनेक पुस्तकों के लेखक थे। वे पिछले कई दिनों से जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। उनको कैंसर था। डाक्टरों ने बहुत पहले उनके न बचने के बारे में कह दिया था लेकिन अपने विल पावर और जिजीविषा के कारण वे कैंसर व मौत, दोनों को लगातार मात दे रहे थे। पर इस बार जब हालत बिगड़ी तो कई दिनों के संघर्ष के बाद अंततः दिनांक 11 सितम्बर 2016 की मध्यरात्रि में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

हम सबके लिए यह हृदय विदारक और मन को पीड़ा देने वाला क्षण है जब हम सब अपने अजीज एवं हजारों-हजारों के चेहते श्री लखोटिया के असामयिक निधन के संवाद से उबर नहीं पा रहे हैं, यह अविश्वसनीय-सा लग रहा है और गहरा आघात दे रहा है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से वे न केवल दिल्ली बल्कि देश की विभिन्न सार्वजनिक संस्थाओं की धड़कन बन गये थे। उनका मन अंतिम क्षण तक युवा-सा तरोताजा, सक्रिय, आशावादी और पुरुषार्थी बना रहा।

सुभाष लखोटिया के जीवन के दिशाएं विविध हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। आपने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे प्रश्न कभी सामने आए ही नहीं। हर प्रयत्न परिणाम बन जाता कार्य की पूर्णता का। यही कारण है कि राजधानी दिल्ली की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं हैं जिससे वे सक्रिय रूप से जुड़े थे, वे अपने आप में एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। वे राजस्थान अकादमी, इनवेस्टर क्लब, लायंस क्लब नईदिल्ली अलकनंदा, मारवाड़ी युवा मंच, राजस्थान रत्नाकर और ऐसी अनेक संस्थाओं को उन्होंने पल्लवित और पोषित किया। उनकी अनेक अनूठी एवं विलक्षण विशेषताएं थीं और इसी कारण वे जन-जन में लोकप्रिय थे। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे। उनका जीवन घटनाबहुल था उसमें रचनात्मकता और सृजनात्मकता के विविध आयाम गुंथित थे।

अजमेर में जन्में श्री लखोटिया राजस्थान की संस्कृति एवं राजस्थानी भाषा के विकास के लिये निरन्तर प्रयत्नशील थे। दिल्ली में राजस्थानी अकेडमी के माध्यम से वे राजस्थानी लोगों को संगठित करने एवं उनमें अपनी संस्कृति के लिये जागरूकता लाने के लिये अनेक उपक्रम संचालित करते रहे हैं। न केवल राजधानी दिल्ली बल्कि देश-विदेश में राजस्थान की समृद्ध कला, संस्कृति व परंपरा पहुंचाने के लिये प्रयासरत थे। बीते 25 वर्ष से अकेडमी द्वारा लगातार दिल्ली में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न प्रतियोगिताओं, कवियत्री सम्मेलन, मरु उत्सव, राजस्थानी लेखकों को सम्मानित करने के आयोजन उनके नेतृत्व में होते रहे हैं। वे राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलवाने के लिए पिछले कई वर्षो से प्रयासरत थे। महिलाओं के लिए यह संस्था विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करती है और विशेष कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित भी करती है। संस्था का उद्देश्य देश-विदेश में रह रहे लोगों को एक साथ एक मंच पर लाना और आपसी भाई-चारे का मजबूत करना भी है। संस्था राजस्थान से जुड़ी हर परम्परा और उन क्षेत्रों से जुड़े कलाकार, विशेषज्ञ तथा बेहतर कार्य करने वालों को सहयोग कर आगे बढ़ावा देती है।

श्री सुभाष लखोटिया को सम्पूर्ण जीवन लायनिज्म को समर्पित रहा है। वे 1970 में ही लायंस इंटरनेशनल के द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा लायंस के रूप में सम्मानित हो गये थे। वे लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के संस्थापक एवं आधारस्तंभ थे। उनकी भारत में लायनिज्म को आगे बढ़ाने के लिए अविस्मरणीय एवं अनुकरणीय सेवाएं रही हैं। वे इस क्लब के माध्यम से सेवा, परोपकार के अनेक जनकल्याणकारी उपक्रम करते रहते थे। हाल ही में उन्होंने सेवा की गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिये प्रतिवर्ष एक लाख रूपये का ‘सुभाष लखोटिया सेवा पुरस्कार’ देना प्रारंभ किया। वे क्लब के विकास में न केवल सहभागी बने बल्कि उसे बीज से बरगद बनाया, उन सब घटनाओं और परिस्थितियों का एक अलग इतिहास है। उनसे जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएं हैं जिन्हें लांयस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है। श्री रामनिवास लखोटिया के वे पुत्र थे। पिता और पुत्र दोनों ने अजमेर में विक्टोरिया अस्पताल के समीप मोहनलाल गंगादेवी लखोटिया धर्मशाला का निर्माण करके समाजोपयोगी एवं प्रेरणादायी कार्य किया। वे पुष्कर के विकास के लिये भी तत्पर रहते थे। उन्होंने पद-प्रतिष्ठा पाने की न कभी चाह की और न कभी चरित्र कसे हासिये में डाला। स्वस्थ चिंतन से परिवर्तन की जो बुनियाद तैयार होगी वही स्वस्थ समाज एवं लोकमंगलकारी जीवन का नव-विहान करेगी- यही लखोटियाजी के जीवन का मार्ग है।

श्री सुभाष लखोटिया अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए है। सन् 2010 में ‘साहित्यश्री पुरुस्कार’, ‘सूर्यदत्त राष्ट्रीय अवार्ड’ एवं सन् 2014 में उन्हें लायंस इंटरनेशनल के द्वारा ‘सद्भावना के राजदूत पुरुस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 2010 में टैक्स गुरु बिसनेस शो के लिये राष्ट्रीय टेलीविजन अवार्ड भी प्रदत्त किया गया। हर व्यक्ति को लखपति और करोड़पति बनाने के लिये उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें काफी लोकप्रिय हुई है। वे समृद्धि की ही बात नहीं करते बल्कि हर इंसान को नैतिक एवं ईमानदार बनने को भी प्रेरित करते। देश के दर्जनों अखबारों में उनके न केवल टैक्स सलाह एवं निवेश से संबंधित बल्कि जीवन निर्माण एवं आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित लेख-साक्षात्कार प्रकाशित होते रहते थे। लखोटियाजी सतरंगी रेखाओं की सादी तस्वीर थे। गहन मानवीय चेतना के चितेरे थे। उनका हंसता हुआ चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है।

इस संसार में जन्म-मृत्यु का क्रम सदा से चलता रहा है। कुछ लोग अपने चुंबकीय व्यक्तित्व से अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऐसे ही दुर्लभ व्यक्तित्व के धनी थे लखोटियाजी। मिलनसार एवं हंसोड़ व्यक्तित्व उनका था, जो उन्हें हर किसी से एकाकार कर देता था। गुणग्राहकता ने उनके इस व्यक्तित्व को और भी लुभावना रूप दे दिया था। सरल व्यवहार से संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को वे आकर्षित कर लेते थे। उनके जीवन की दिशाएं विविध हैं, वे एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। उनके जीवन की खिड़कियाँ समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे।

लखोटियाजी की अनेकानेक विशेषताओं में एक प्रमुख विशेषता यह थी कि वे सदा हंसमुख रहते थे। वे अपने गहन अनुभव एवं आध्यात्मिकता के कारण छोटी-छोटी घटना को गहराई प्रदत्त कर देते थे। अपने आस-पास के वातावरण को ही इस विलक्षणता से अभिप्रेरित करते थे। यही मानक दृष्टि उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को समझने की कुंजी है। लखोटियाजी कहा करते थे कि जितना हो सके दूसरों के लिए सुख बांटो क्योंकि इस संसार में उसके समान अन्य कोई धर्म नहीं है। किसी को पीड़ित मत करो, किसी का दिल मत दुखाओ, क्योंकि उसके समान अन्य कोई पाप नहीं है। यह प्रयोग, समस्याओं के आर-पार जाने की क्षमता, वास्तविकता पर पडे़ आवरणों को तोड़ देने की ताकत और मनुष्यों की चिंता उनके अनुभवों में भी दिखाई पड़ती थी। इतिहास और वर्तमान-दोनों जगह वह उत्पीड़न के खिलाफ हैं और उसकी अभिव्यक्ति में पूरी तरह भयमुक्त हैं। अपनी तेज आंखों से वे उस सच को पहचान ही लेते हैं जो आदमी को तोड़ता है और उसे मशीन का केवल पुर्जा बनाकर छोड़ देता है।

लखोटियाजी के जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता की गहराई से जुड़े हैं और उस पर वह अटल भी रहते हैं किंतु किसी भी प्रकार की रूढ़ि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वह हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के हैं और यह मुक्त स्वरूप भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप है। यह उनके व्यक्ति की बड़ी उपलब्धि है। स्वभाव में एक औलियापन है, फक्कड़पन है और फकीराना अंदाज है और यह यह सब नैसर्गिक रूप में विद्यमान है जिसका पता उन्हें भी नहीं है। उनका दिल और द्वार सदा और सभी के लिए खुला रहा अनाकांक्ष भाव से जैसे यह स्वभाव का ही एक अंग है। मित्रों की सहायता में सदा तत्पर रहे। अपना दुख कभी नहीं कहा किन्तु दूसरों का दुख अवश्य बांटते रहे। छोटी बातों को बड़ा बनाकर कभी नहीं कहते, बड़ी बात को सहज भले बना दें।

लखोटियाजी में विविधता थी और यही उनकी विशेषता थी। उन्हें प्रायः हर प्रदेश के और हर भाषा के लोग जानते थे। उनकी अनेक छवि, अनेक रूप, अनेक रंग उभर कर सामने आते हैं। ये झलकियां बहुत काम की हैं। क्योंकि इससे सेवा का संसार समृद्ध होता है। लखोटियाजी का जितना विशाल और व्यापक संपर्क है और जितने अधिक लोग उन्हें करीब से जानने वाले हैं, अपने देश में भी और विदेशों में भी, उस दृष्टि से कुछ शब्दों से उनके बारे में बहुत नहीं जाना जा सकता, और भी आयाम और अनेक रोचक प्रसंग उजागर हो सकते हैं। यह काम कठिन अवश्य है, असंभव नहीं। इस पर भविष्य में ठोस काम होना चाहिए, ताकि उनकी स्मृति जीवंत बनी रहे।

लेखक ललित गर्ग से संपर्क 9811051133 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक दिन, दो गम

अजय कुमार, लखनऊ

एक साहित्य जगत की महान विभूति थी तो दूसरा संगीत की दुनिया का सम्राट। एक कलम का उस्ताद था तो दूसरे की उंगलियों की थाप लोंगो को सम्मोहित कर लेती थी। दोनों ने एक ही दिन दुनिया से विदा ली। बात तबला सम्राट पंडित लच्छू महाराज और साहित्य की हस्ताक्षर बन गईं महाश्वेता देवी की हो रही है। भगवान भोले नाथ की नगरी वाराणसी से ताल्लुक रखने वाले लच्छू महाराज और बंगाल की सरजमी से पूरे साहित्य जगत को आईना दिखाने वाली ‘हजार चौरासी की मां’ जैसी कृतियां की लेखिका महाश्वेता देवी (90) ने भले ही देह त्याग दिया हो लेकिन साहित्य जगत और संगीत प्रेमिेयों के लिये यह हस्तियां शायद ही कभी मरेंगी। अपने चाहने वालों के बीच यह हमेशा अमर रहेंगी।

बात पहले लच्छू महाराज की। तबला को नई  बुलंदियों तक ले जाने वाले वाले 71 वर्षीय लच्छू महाराज की अचानक हदय गति रूकने से हुई मौत की खबर जिसने भी सुनी उसके मुंह से बस एक ही शब्द निकला, ’बनारस घराने का तबला शांत हो गया’। जाने-माने तबला वादक पंडित लच्छू महाराज अभिनेता गोविंदा के मामा थे। लच्छू महाराज की मौत की खबर सुनते ही ठुमरी गायिका पद्विभूषण गिरिजा देवी, पद्मभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र, पंडित राजन -साजन मिश्र जैसे तमाम लोग स्तब्ध रह गये।

लच्छू महाराज यों ही महान नहीं बन गये थे। सम्मान हाासिल करने के लिए इस दौर में जहां लोग एड़ी चोटी का जोर लगा देते है। वहीं फक्कड़ मिजाज पंडित लच्छू महाराज ने पद्मश्री सम्मान ठुकार दिया  था। सितार के शहंशाह बड़े गुलाम अली, भारत रत्न पंडित रविशंकर समेत देश- दुनिया के नामचीन कलाकारों के साथ संगत करने वाले पंडित लच्छू महाराज ने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा  वह जीवन भर ईमादारी और रियाज के बल पर आगे बढ़ने की वकालत करते रहे।वर्ष 1992 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार थी तब तबला वादक पंडित लच्छू महाराज को पद्मश्री सम्मान के लिए नामित किया गया था। जब अफसर के घर आने की खबर महाराज को दी गईं तब उन्होंने बैरंग वापस कर दिया, लेकिन दुख की बात है कि उनकी अंतिम यात्रा अथवा श्रद्धांजलि देने को संगीत जगत की बड़ी हस्ती तो क्या नेता – जनप्रतिनिधि और अफसर तक नहीं पहुंचे। स्विट्जरलैंड से पत्नी टीना और बेटी चंद्रा नारायणी वीजा न मिलने के चलते तो भांजे एक्टर गोंविदा मौसम खराब होने से नहीं आ सके। सिंगर दलेर मेहंदी के भाई शमशेर मेहंदी को छोड़ दुनिया भर में फैले उनके हजारों शिष्यों में से एक भी नहीं दिखे।

भाई जय नारायण महाराज से जुड़े एक वाक्ये का वर्णन करते हुए कह रहे थे, ‘एक बार मशहूर नृत्यांगना सितार देवी के साथ उनका तबला वादक नहीं आया था। संगत के लिए लच्छू महाराज मंच पर आए तब सितार देवी ने कहा था ये बच्चा बजाएगा। लेकिन जब लच्छू महाराज ने बजाना शुरू किया तो 20 मिनट का कार्यक्रम 16 घंटे तक नॉन स्टॉप चलता रहा। पैर में खून बहने से सितारा देवी ही रुकीं और लच्छू महाराज को गले लगा लिया था।’

बात हजार चौरासी की मां जैसी कृतियां देने वाली महाश्वेता देवी (90) की कि जाये तो उपेक्षितों और दबे- कुचले तबकों की आवाज उठाने वाली लेखिका महाश्वेता का भी इसी दिन खून में सक्रमण और किडनी के काम करने से बंद कर देने के कारण मौत हो गई। साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण और मैग्सेसे जेसे पुरस्कारों से सम्मानित ‘हजार चौरासी की मां’ के अलावा ‘अरण्य अधिकार’ आदि शामिल है। महाश्वेता की लघु कहानियों के 20 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। महाश्वेता की मौत पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा,‘ देश ने एक महान लेखक को खोया है। जबकि बंगाल ने अपनी मां को खो दिया है।’

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र कुमार लल्ला का निधन

Jaishankar Gupta : दुखद सूचनाओं का सिलसिला है कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा। अभी अपने से बड़े लेकिन इलाहाबाद के दिनों से ही मित्र नीलाभ अश्क के निधन से उबर भी नहीं सके थे कि लल्ला जी- योगेंद्र कुमार लल्ला उर्फ योकुल के निधन के समाचार ने भीतर से हिलाकर रख दिया। लल्ला जी को जानता तो था मैं उनके धर्मयुग के जमाने से ही, लेकिन उन्हें करीब से जानने- समझने का अवसर कलकत्ता, आज के कोलकाता में आनंद बाजार पत्रिका के हिंदी साप्ताहिक रविवार के साथ जुड़ने के बाद मिला।

योगेंद्र कुमार लल्ला

लल्ला जी, बच्चों की बांग्ला भाषी लोकप्रिय पत्रिका आनंदमेला के हिंदी संस्करण मेला के संपादक के रूप में आनंद बाजार पत्रिका के साथ जुड़े थे। मेला के असामयिक अवसान के बाद वह रविवार के संयुक्त संपादक बन गए थे। उस समय रविवार के संपादक थे, हमारे एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। बाद में, एसपी सिंह के नवभारत टाइम्स के साथ जुड़ने के बाद उदयन (शर्मा) जी रविवार के संपादक बने तब भी या कहें रविवार के भी असमय अवसान तक लल्ला जी रविवार के साथ उसी पद पर बने रहे।

हम 1982 के शुरुआती महीनों में रविवार की संपादकीय टीम के साथ बतौर उपसंपादक जुड़े थे। उससे पहले रिटेनर के रूप में रिपोर्टिंग करते थे। रविवार के संपादकीय कार्यालय में मुझे लल्ला जी के पास ही बैठने और उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। हमारा निवास, उत्तर कोलकाता में सिंथी मोड़ के पास आटापारा लेन, लल्ला जी के बांगुर एवेन्यू के मकान के करीब ही था। उनके घर हमारा अक्सर, खासतौर से साप्ताहिक अवकाश के दिन, आना जाना लगा रहता था। वह हमारे, बड़े, संरक्षक भाई की तरह थे। भाभी भी बहुत स्नेहिल थीं।

रविवार के बंद होने के बाद भी कुछ महीनों तक हम लोग आनंदबाजार पत्रिका के साथ रहे। तब हम पटना में थे।

दिल्ली में हम नवभारत टाइम्स के साथ हो लिए। कुछ समय बाद लल्ला जी मेरठ में अमर उजाला के साथ फीचर संपादक के रूप में जुड़ गए थे। एक बार हम सपरिवार मेरठ उनके निवास पर गए थे। भाभी बच्चों को देख बेतरह खुश हुई थीं क्योंकि कोलकाता प्रवास के समय हमारे बच्चे नहीं थे।

कुछ वर्ष पहले उनसे वैशाली के उनके निवास पर मुलाकात हुई थी, लंबी। खूब सारी बातें हुई थीं, नई पुरानी। धर्मयुग से लेकर रविवार और इन कालजयी पत्रिकाओं के साथ जुड़े लोगों, राजनीति आदि के बारे में भी। उसके बाद से हमारा मिलना नहीं हुआ। वह क्रासिंग रिपब्लिक, गाजियाबाद में रहने चले गए थे। आज जब अकस्मात उनके निधन का समाचार मिला तो सहम सा गया। एसपी, उदयन जी के बाद लल्ला जी भी चले गए। लेकिन इन तीनों के साथ बिताए पल और उनसे जुड़ी समृतियां झकझोर रही हैं। नियति पर किसी का जोर नहीं, इस यथार्थ को स्वीकार कर पाना भी भारी पड़ रहा है। उनके साथ जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम।

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से प्रमुख दो कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Satyendra Pratap Singh प्रशिक्षु पत्रकार से उप संपादक व संवाददाता बनाने में योगेंद्र कुमार लल्ला जी का बहुत बड़ा योगदान था।रविवार बंद होने के बाद मैं उनसे जब मिलकर कहा कि आप कल दिल्ली जाकर घनश्याम पंकज जी मिल लीजिये।उन्होंने आपको दिनमान टाइम्स ज्वाइन करने के लिए बुलाया है तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ था।फिर उनके सामने मैं पंकज जी को फोन करके उनसे बात करवाया था।बाद में वह पंकज जी के साथ ‘स्वतंत्र भारत’ के लिए लखनऊ भी गए थे।लल्ला जी से मेरी आखिरी मुलाक़ात एस पी सिंह जी की अंतिम यात्रा में 19 साल पहले हुई थी। भावभीनी श्रद्धांजलि।

Satish Misra अपने जर्मनी प्रवास के दौरान धर्मयुग में लिखने का अवसर मिला। धर्मवीर भारती जी से खितोकिताबत होती थी पर उतर या तो सरल जी का या लल्ला जी का आता था। एक बार मुलाकात मुम्ब्बई में धर्मयुग के दफ्तर में हुई। उनसे फिर मुलाकात नहीं हुई। दुःख हुआ। श्रधांजलि

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सबसे माफी मांगते अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी

Hareprakash Upadhyay : सबसे माफी माँगते हुए अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी। बेहद प्रतिभावान-बेचैन, सहृदय लेखक, कवि- अनुवादक! मुझसे तो बहुत नोक-झोक होती थी, मैं उन्हें अंकल कहता था और वे मुझे भतीजा! अंकल! अभी तो कुछ और दौर चलने थे। कुछ और बातें होनी थी। आप तो सबका दिल तोड़ चले गये। पर शिकायतें भी अब किससे और शिकायतों के अब मानी भी क्या! अंकल, हो सके तो हम सबको माफ कर देना। नमन अंकल! श्रद्धांजलि!

Ajit Rai : नीलाभ नहीं रहे। नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब मैं 1989 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान में एम ए का छात्र था। सिविल लाइंस मे नीलाभ प्रकाशन के दफ्तर में सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद पर चर्चा करने जाता था। तब वे बीबीसी लंदन से लौटे ही थे। इन 27 सालों में अनगिनत मुलाकातें हैं। अभी पिछले साल हम अशोक अग्रवाल के निमंत्रण पर कुछ दिन शिमला में थे। उनके साथ की तीखी धारदार बहसों से हमे बहुत कुछ मिलता था। वे हमारी यादों मे हमेशा अमर रहेंगे।

Vishnu Nagar : खबर है कि नीलाभ नहीं रहे। कुछ ही दिन पहले उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के समारोह में देखा था बल्कि पहले उन्होंने मुझे देखा था और जैसा कि वे करते थे अक्सर समकालीनों के साथ व्यंग्योक्ति के साथ मेरा स्वागत किया था। फिर जब कार्यक्रम के बाद लौटने लगा तो वह संसद भवन के सभागार से निकलकर कुछ दूर एक दरवाज़े से टिककर खड़े थे पत्नी के साथ। ध्यान दिया तो उनके दोनो पैर बुरी तरह सूजे हुए थे। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो टाल गये। एक मित्र ने बताया कि उनकी दोनों किडनियाँ क्षतिग्रस्त हो गई थीं। मैंने प्रस्ताव किया कि मैं आपको सहारा देकर दरवाज़े तक ले चलूँ तो उन्होंने कहा, नहीं धीरे-धीरे चला जाऊँगा। क्या पता था कि इतनी जल्दी वे नहीं रहेंगे। उनके एक घनिष्ठ मित्र पंकज सिंह सात महीने पहले नहीं रहे थे, अब वे भी नहीं हैं। वे अच्छे कवि तो थे ही, अनुवाद करने में उनका सानी नहीं था। पिछले दिनों मैं उनके विदेशी कविताओं के कुछ अनुवाद पढ़ता रहा हूँ। उन्होंने वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय के लिए हिंदी साहित्य के मौखिक इतिहास पर बहुत अच्छा काम किया था, अपने ढँग का अनूठा मगर उसकी पूरी तरह अनदेखी हो गई, जिससे उनका तो क्या नुक्सान होना था हिंदीजगत का नुक्सान हुआ और होता रहेगा।

हरेप्रकाश उपाध्याय, अजित राय और विष्णु नागर की एफबी वॉल से.

मूल खबर :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जाने-माने पत्रकार और ‘रंग प्रसंग’ के संपादक नीलाभ अश्क का निधन

नीलाभ नहीं रहे. नीलाभ यानि नीलाभ अश्क. आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली. पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे. नीलाभ ‘रंग प्रसंग’ के संपादक थे. फेसबुक पर नीलाभ के कई जानने वालों ने उनके निधन की खबर पोस्ट की है. पत्रकार और समालोचक संगम पांडेय ने लिखा है- ”अभी-अभी ‘रंग प्रसंग’ के संपादक नीलाभ जी के अंतरंग रूपकृष्ण आहूजा ने बताया कि नीलाभ जी नहीं रहे।”

अशोक कुमार पांडेय, राहुल पांडेय और विमल वर्मा ने भी नीलाभ के न रहने की दुखद जानकारी साझा की है. विमल वर्मा लिखते हैं- ”अरे, नीलाभ भाई नहीं रहे। विश्वास नहीं हो रहा।” अरुण कुमार कालरा का कहना है कि कुछ समय पहले ही नीलाभ को उन्होंने NSD campus में देखा था… तब तो अस्वस्थ नहीं लग रहे थे परंतु अभी किसी ने बताया की कुछ दिनों से बीमार थे।

नीलाभ न सिर्फ एक बड़े पत्रकार थे बल्कि कवि, अनुवादक, रंगकर्मी, समालोचक समेत कई विधाओं के विशेषज्ञ थे. मनुष्य के रूप में बेहद फक्कड़, मनमौजी और सूफी तबीयत वाले नीलाभ पिछले कुछ वर्षों से पारिवारिक विवादों के कारण परेशान थे. हालांकि आखिरी दिनों में सब कुछ सेटल हो गया था और वे अपना सुखी पारिवारिक जीवन जी रहे थे. उन्होंने पिछले ही दिनों फेसबुक पर दो प्रायश्चित पत्र लिखे जो फेसबुक पर लिखे उनके आखिरी पोस्ट साबित हुए. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी भूमिका द्विवेदी और प्रकाश अशोक माहेश्वरी से माफी मांगी थी. इस पत्र का भाषा और संवेदना कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाला पूरे दिल से नीलाभ के दुख और प्रायश्चित में शरीक हो जाता है.

नीलाभ के निधन पर भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि नीलाभ दा के साथ कई शामें गुजारी हैं. वे गार्जियन, दोस्त, संरक्षक, शिक्षक समेत कई रूपों में दिखते थे. खुलकर अपनी बात कहने और जमकर ठहाके लगाने वाला शख्स इतनी जल्दी चला जाएगा, यकीन नहीं हो रहा. जिंदगी को पूरी उदात्तता, साहस और संवेदनशीलता के साथ जीने वाले शख्स का नाम है नीलाभ. भड़ास के दरियागंज आफिस में कई बार नीलाभ रुके और वहां उनसे कई किस्म की जानकारियां सीख सबक हासिल किया था. नीलाभ के न रहने से महसूस हो रहा कि हम लोगों के सिर से किसी अपने बेहद खास का साया उठ गया. पहले आलोक तोमर, फिर वीरेन डंगवाल, फिर पंकज सिंह और अब नीलाभ. एक एक कर वो सारे लोग ये दुनिया छोड़ जा रहे जिनके होने पर यह यकीन रहा करता था कि हम लोगों का कोई बड़ा भाई, कोई शिक्षक, कोई संरक्षक इस दुनिया में मौजूद है. अलविदा नीलाभ दा.

नीलाभ के निधन पर हरे प्रकाश उपाध्याय, अजित राय और विष्णु नागर की त्वरित टिप्पणियां….


नीलाभ ने आखिरी जो कुछ पोस्ट्स लिखी थीं, उन्हें नीचे के शीर्षक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं…


इसे भी पढ़ सकते हैं….

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

WHEN SAUMIT SINGH NEEDED HELP, NONE OF YOU WERE THERE….

सौमित सिंह की फाइल फोटो

I clearly remember that conversation with Saumit Singh. It was just after Independence Day in 2013. He was goading me to be more aggressive in my writing. “Tu Bohot Soft Hai. This is not journalism. You should say it the way it should be said,” he said.

There couldn’t be a better example of aggressiveness than Saumit Singh. Taking on Bollywood personalities is one thing but waging war against corporate giants is another. Saumit wrote numerous articles against corporate giants. I know for sure that some of them made the companies so uncomfortable that they hurled legal notices at him. In at least one of the cases, he was forced to apologise because he didn’t want to be dragged to a courtroom outside Delhi.

Saumit’s fearless blogs made news too. He made it to the front page of DNA when he made public, the conversations between Preity Zinta and Ness Wadia at the Wankhede Stadium, which led Preity to file a FIR of molestation against Wadia.

Saumit’s blog, about how he was told to drop a story about NSE, made headlines and “created a flutter in the media circles”.

Saumit wrote numerous such stories and in some of them he attacked senior editors of media houses quite blatantly. I would guess that further limited his scope of employment in some media houses. But he didn’t seem to care.

I am yet to see a public rebuttal to his stories. I don’t think in any of the stories, he had his facts wrong. I always believed that Saumit was doing very well given the nature of his journalism. His site had huge hits, in terms of page views. But this aggressive stance was also taking a toll on him. He was without a regular job for a while but there was nothing to believe that he was in any sort of crisis. He stopped writing regularly but we spoke off and on.

He admitted that he needed more funds for his website but he never said that he was suffering financially.  I briefly lost touch with him for about six months because I was going through a trying time myself and I was in between jobs, twice. I didn’t prepare myself for the shock that I was supposed to receive next.

On March 31st 2016, I received a message from his wife that Saumit has been admitted to Cosmos Institute of Mental Health and Behavioural Science at Vikas Marg, New Delhi. When I called Sushma, she told me that Saumit had been missing for two days and when he was finally found, a doctor advised that he be hospitalised immediately.

I send out WhatsApp messages to all common friends on my contact list, specially former colleagues of DNA with whom we have worked. I also asked Sushma to tell me if Saumit had any friends in the Mumbai page three circuit. I took down the names from her and sent out a message to them too.

Only three people responded positively and immediately — 1. Ayaz Memon 2. Parvez Damania and 3. Nandita Puri. All of them did whatever they could in that hour of crisis. Others just ignored my message.

Some of my journalist friends sent me a sad smiley in return and most of them didn’t even respond to the WhatsApp message even though I know that they had read it. The page three celebs about whom Saumit had written so many “positive” articles, couldn’t be less  bothered.

We tried to put out the message that he is sick and he needs help. Nobody, I repeat, nobody even responded to my call. In the end, thanks to Saumit’s family’s strong support, the crisis was over and Saumit came back home.

After Saumit came home, I made it a point to speak to him at least once every week. His wife told me that he is doing fine. Saumit told me that he is doing fine. But he was in depression. I spoke to him, convinced him to write for me again (so I can pay him some money through my company) but nothing seemed to be working. He was not willing to work.

I spoke to Sushma off and on and she said that she believes that Saumit will get over the phase soon. She expressed concern that nobody was calling him to find out how he was.  Yes this is true. Not a single person called him to find out how he is in the last few months when he needed these calls the most.

When I spoke to Saumit on June 30, he told me in a mocking tone that I too should stop calling him because “nobody cares”. I have never seen cases of severe depression before so I couldn’t recognise the obvious signs.

He killed himself a few days later. I know that all of you loved him (going by your social media posts) but none of you were there when he needed you the most. I appeal to every friend of his, who are posting tributes to social media to step forward and help his family.

Sushma is lucky that she has the help of her family members and Saumit’s family members. They are firmly lending their support to her. I am so happy that she has this protective ring around her. But we can do much more for him. If you want to make a difference, you can.

You may contact his wife Sushma and offer anything that might help them in this hour of need. I am again seeking help for Saumit. This time more openly and publicly. Only this time, I hope that at least some of you will respond. I am putting out this post with a few intimate details and asking for help with the permission of his wife.

His wife, Sushma, can be contacted at +91 98994 30161. Her email ID is sushama1976.singh@gmail.com

लेखक मयंक शेखर मशहूर फिल्म समीक्षक हैं.


इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी और शाहरुख़ खान जैसों संग जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में फांसी के फंदे से झूल गया!

एक था सोमू…. जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी, शाहरुख़ खान, आमिर खान जैसी नामी गिरामी हस्तियों और धनकुबेरों के साथ उसके फेसबुक प्रोफाइल पर जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में गरीबी से घबरा के यूँ किसी असहाय और अनाथ शख्स की तरह फांसी के फंदे से झूल जाए तो भला कौन यक़ीन कर पायेगा। यही वजह है कि मुम्बई, दिल्ली और लखनऊ के बड़े बड़े अखबारों में बरसों तक वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमिस्ट रह चुके बेहद हैंडसम, मिलनसार, जिंदादिल और सौम्य व्यवहार के सौमित सिंह की 40 बरस में उमर में ख़ुदकुशी से हुई मौत पर अभी भी उनके बहुत से मित्रों को यकीन नहीं हो पा रहा।

मगर त्रासदी यही है कि यही सच है। उसकी मौत के खबर आते ही सोशल मीडिया पर इस देश के छोटे बड़े अखबारों, टीवी चैनलों, वेब पोर्टल के पत्रकारों, संपादकों, फ़िल्मी और उद्योग जगत की कई हस्तियों ने दुःख जताना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर हर किसी ने रस्मी तौर पर उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए, उसकी मदद न कर पाने पर अफ़सोस जताया। एक बड़े अखबार से उसकी नौकरी छूटने के बाद से लेकर उसके मरने तक के पिछले महज दो ढाई साल के संघर्ष में उसके इतना अकेले पड़ जाने पर लोगों ने हैरानी भी जताई।

मगर मुझे कोई हैरानी नहीं है। क्योंकि मीडिया ने बहुतों की जान ऐसे ही ले ली है। मैं खुद मीडिया के इसी जानलेवा पेशे से अपनी जान छुड़ा कर 2011 में भाग चुका हूँ और इन दिनों अपने बिज़नस में जूझ रहा हूँ। सौमित, जिसे मैं अपनी क्लास 6th की उमर से सोमू के नाम से जानता हूँ, मेरा बचपन का बहुत करीबी दोस्त था। मगर हमारा साथ मेरे क्लास 12th पास करने के बाद बहुत कम रह गया था।

मैं पढाई और नौकरी के सिलसिले में जब इलाहाबाद से लेकर दिल्ली का सफ़र कर रहा था, तभी मुझे पता चला कि सोमू लखनऊ में पायनियर में पत्रकार हो गया था। मेरी गाहे बगाहे उससे बात मुलाक़ात हो जाती थी मगर नियमित संपर्क नहीं था। फिर मैं भी दुर्भाग्य से इसी पेशे में आ गया। दिल्ली में जैसे ही टाइम्स समूह से मैंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की तो उसी समय प्रेस क्लब में हुई एक मुलाक़ात में मुझे पता चला कि सोमू भी अब दिल्ली में ही है। फिर कई बार मेरी उसकी मयकशी की देर रात की महफ़िलें जमीं, कभी दिल्ली के प्रैस क्लब में, कभी उसके नए ख़रीदे फ्लैट में तो कभी कभी लखनऊ में भी।

उसका वह चमकदार दौर था। वह बहुत खुश रहता था और जिंदादिली से जी रहा था। हालांकि 2007 आते आते तक खुद मेरा जी मीडिया से घबराने लगा था। ऐसा भी नहीं था कि मेरा कैरियर का ग्राफ गिर रहा था बल्कि उस दौर में तो वह बढ़ ही रहा था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह, हिंदुस्तान टाइम्स समूह से होते हुए बिज़नस स्टैण्डर्ड आते आते तक मेरी पोस्ट और सैलरी में काफी इजाफा हुआ भी था। फिर भी गुटबाजी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, चमचागिरी, एक दूसरे के प्रति बर्बाद कर देने तक का द्वेष, भेदभाव और सबसे बड़ी बात नौकरी पर हमेशा लटकती तलवार के चलते मैं बहुत परेशान रहने लगा था। संपादकों और अपने बॉसेस के अहंकारी स्वाभाव और अपने सहकर्मियों में कौन दुश्मन है कौन दोस्त इसको लेकर बढ़ता दिन रात का तनाव चैन से जीने ही नहीं दे रहा था। फिर मैंने घबरा कर 2011 में मीडिया को अलविदा कह दिया। तब सोमू अपने जीवन के बेहतरीन दौर में था और बहुत संतुष्ट भी रहता था। मैं तो खैर वापस लखनऊ ही लौट आया, कुछ भी छोटा मोटा काम करके शान्ति से जिंदगी बिताने की चाह लिए।

उसी लखनऊ में जहां मेरी सोमू से तब मुलाक़ात हुई थी, जब मेरे पिताजी ने एक किराए का छोटा सा मकान लिया था और मेरा एडमिशन उन्होंने लखनऊ के उस समय में सबसे प्रतिष्ठित स्कूल महानगर बॉयज में क्लास 6th में कराया था। बहुत ही पॉश कॉलोनी में मेरे किराए के घर के सामने एक 10-15 हजार वर्गफीट में बनी आलीशान कोठी थी, जिसमे संयोग से अपना सोमू ही न सिर्फ रहता था बल्कि मेरे ही स्कूल में एक ही क्लास मगर अलग सेक्शन में पढता भी था। इसी वजह से हम दोनों बच्चों में गहरी दोस्ती भी हो गयी। मेरे पिता गाँव से पढ़कर निकले थे और लखनऊ में सरकारी विभाग में इंजीनियर थे। इसलिए मेरा परिवेश गांव और शहर का मिक्स था मगर सोमू एकदम अंग्रेजीदां और संपन्न घराने का बच्चा था।

वह कुछ ही समय पहले ढाका से आया था, जहां उसके नाना वर्ल्ड बैंक में थे। उसने अपना बचपन नाना नानी के यहाँ बिताया था फिर मेरे घर के सामने रहने वाले अपने मामा मामी के विशाल घर में आ गया था। उसके मामा बहुत पैसे वाले थे। विदेशी कार और सोमू के बर्थडे की भव्य पार्टियों समेत उनके रहन सहन से तो मुझे यही लगता था। सोमू के माता पिता कौन थे, क्या थे और वह क्यों शुरू से अपने नाना नानी और मामा मामी के यहाँ रहा, इसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। हाँ, शायद 9th या 10th क्लास के आसपास वह मुझे अपने मम्मी पापा से मिलाने ले गया था, जो कि कानपुर में एक छोटे से मकान में रहते थे। यहीं वह भी उसी दौर में रहने लगा था।

मैंने आधुनिकता के सारे तौर तरीके उसी से सीखे थे। टेबल टेनिस जैसा खेल हो या अंग्रेजी की कॉमिक्स किताबें पढ़ना, अंग्रेजी म्यूजिक-गाने, पहनावा सब सोमू को देख देख कर ही 9वीं-10वीं क्लास तक मैंने भी सीख लिया था। शायद यही वजह है कि धन के अभाव में ख़ुदकुशी कर लेने की खबर आने तक जीवन भर सोमू की मेरे दिलो दिमाग में ऐसी ही छवि थी कि वह न बहुत अभिजात्य वर्ग से है, जहां पैसा कोई समस्या ही नहीं है। तभी तो मैं कभी सपने में भी सोच नहीं पाया कि उसके इतने रसूखदार या धनाढ्य संपर्कों या नाते रिश्तेदारों के चलते या इतने बरसों तक उसके इतने अच्छे पदों पर नौकरी करते रहने के बावजूद वह इस कदर अकेला और अभावग्रस्त हो जाएगा।

मैं आज भी नहीं जानता कि उसके साथ ऐसा कैसे हुआ। मेरे मन औरों की तरह बहुत से सवाल है, मसलन क्यों वह इतने कम अरसे में ही इतना अकेला और अभावग्रस्त हो गया? कहाँ चले गए उसके सारे मददगार, दोस्त या रिश्तेदार? या क्यों वह अपने लिए इतने पैसे भी नहीं जोड़ पाया या कहीं चल अचल सम्पत्ति ले पाया, जिसे बेच कर दो ढाई साल तक वह बिना किसी के सामने हाथ पसारे जीवन यापन कर पाये? माना कि नौकरी छूटने के बाद शुरू की गयी उसकी वेबसाइट फेल हो गयी मगर क्यों उसे लगने लगा कि अब सब ख़त्म हो गया? क्यों उसने ये नहीं सोचा कि वह लखनऊ जैसे छोटे शहर में ही लौट जाए, जहाँ वह फिर से पत्रकारिता या फिर कुछ भी छोटा मोटा करके अपनी बाकी की जिंदगी चैन और शान्ति से गुजार सकता है? जैसे कि उसके बाकी के ढेरों दोस्त कर ही रहे हैं। यहां चकाचौंध और बड़ी बड़ी सफलताएं या नाम नहीं है, मगर चंद रिश्ते नाते और दोस्त तो हैं।

मुझे ये पता है कि अब ये सवाल हमेशा मेरे लिए सवाल ही रह जाएंगे क्योंकि इनका जवाब देने वाला मेरा बचपन का दोस्त मुझे रूठकर हमेशा के लिए इस दुनिया से ही चला गया है। उसका रूठना लाजिमी भी है। मैंने बहुत बड़ी गलती की, जो सिर्फ सोशल मीडिया और पुरानी जिंदगी के जरिये ही उसकी खुशहाल जिंदगी का भ्रम पाले रहा और कभी उससे पूछ ही नहीं पाया कि भाई कैसे हो। 2011 के बाद से अपनी नौकरी छोड़ने रियल एस्टेट कंपनी शुरू करने से लेकर अब तक चले अपने जीवन के झंझावातों में  मैं खुद भी इतना घिरा रहा कि कभी व्हाट्सएप्प या फोन पर भी मैंने उससे बचपन के दोस्त के नाते उसके सुख दुःख नहीं जाने।

2014 के बाद से अपनी वेबसाइट फेल होने के बाद से ही वह संकटों में घिरने लगा था मगर दुर्भाग्य से 2015 या 16 में मेरी न तो उससे एक बार भी मुलाक़ात हो पायी और न ही कभी फ़ोन पर बात हो पायी। हाँ, फेसबुक पर उसने 2015 में मेरे एक बार स्वाइन फ्लू होने की पोस्ट पर चिंता जताते हुए लिखा था कि भाई अपना ध्यान रखना।

मैंने तो अपना ध्यान रखा मेरे भाई मगर तुमने क्यों नहीं रखा? क्यों नहीं ध्यान रखा अपने छोटे छोटे बच्चों और बीबी का? क्यों जिंदगी से अचानक हार गए?

दो दिन पहले तुम्हारी मौत की हतप्रभ कर देने वाली खबर सुनी। एक दिन बहुत हल्ला और दुःख जताने वालों की चीखें सुनीं। मगर अब सब खामोश हो गए। अपनी अपनी जिंदगी में फिर से यूँ ही मगन हो गए, जैसे तब थे, जब तुम संघर्ष करके लगातार मौत की ओर बढ़ रहे थे।

मुझसे भारी गलती हुई जो मैंने अपने अनवरत चलने वाले संघर्षों में डूब कर तुमसे कभी तुम्हारा सुख दुःख नहीं पूछा। शायद तुम्हे मेरी याद नहीं थी या ये भरोसा नहीं था कि मैं तुम्हारे कुछ काम आ सकूँगा, इसीलिए तो तुमने मुझसे कभी कोई मदद नहीं मांगी न अपना दुःख बताया। सुचित्रा कृष्णमूर्ति जैसी मशहूर हस्ती की तरह मैं ये भी नहीं कह रहा कि एक फ़ोन ही कर दिया होता। तुम्हारे अलविदा कहने के बाद कल मुझे पुराने दोस्तों से ही पता चला कि तुमने उनसे पिछले महीने फ़ोन करके कुछ हजार रुपये मांगे थे अपने मेडिकल बिल चुकाने के लिए।

तुम्हारे जाने का दुःख तो है ही मगर इस बात का भी गहरा दुःख है मुझे कि तुम इस कदर टूटते गए, हारते गए और मैं जान तक नहीं पाया। पता नहीं पैसे रुपये से मैं तुम्हारे कितने काम आ पाता मगर मुझे इतना पता है कि अगर तुम्हारे ऐसे घनघोर दुःख का ज़रा भी अंदाजा होता तो मैं बचपन के दोस्त होने का पूरा फर्ज निभाता और तुम्हारा मनोबल न टूटने पाये, इसके लिए जी जान लगा देता। मन के हारे हार है और तुम मन से हार गए सोमू। वरना दुनिया में इतनी क़ुव्वत ही नहीं है, जो तुम जैसे जिंदादिल और बहादुर इंसान को हरा सके। मैं तुम्हे यही समझाता सोमू कि बहुत रास्ते हैं दुनिया में जीने के। जब तक शरीर काम करने लायक है, तब तक कुछ भी करो मगर जिन्दा रहो। झोपडी में भी रहकर अपने बच्चों को पालेगो तो भी कभी न कभी हालात फिर बदल ही जाएंगे मगर यूँ दुनिया ही छोड़ कर चले जाओगे तो उन बच्चों का क्या भविष्य होगा?

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। अब मेरे जैसे तुम्हारे कई दोस्त, हितैषी, नाते रिश्तेदार झूठे सच्चे आंसू बहा रहे है, दुःख जता रहे हैं, अपने अपने कारण-किस्से बता रहे हैं कि क्यों वह तुम्हे बचा नहीं पाये, क्यों उन्होंने तुम्हारा साथ नहीं दिया, क्यों तुम अकेले पड़ गए। लेकिन अब कड़वी हकीकत यही है कि तुम्हारे पीछे तुम्हारे बच्चे और बीबी अंधकारमय भविष्य की ओर चल पड़े हैं। और तुम…..माना कि बहुत बड़े खबरनवीस थे। बड़ी बड़ी ख़बरें तुमने ब्रेक कीं, जिनकी टीआरपी जबरदस्त थी…. मगर तुम्हारी जिंदगी में तो कोई टीआरपी नहीं है मेरे दोस्त….. तुम्हारी दर्दनाक ख़ुदकुशी में भी नहीं। इसलिए किसी के लिए खबर भी नहीं हो। हाँ, मेरे जैसे चंद लोग जरूर कुछ दिनों और यही किस्सा सुनाएंगे कि ……. एक था सोमू।

लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आईआईएमसी से प्रशिक्षित, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे अखबारों में दिल्ली में 12 साल तक पत्रकारिता कर चुके हैं. फिलहाल अपने गृह नगर लखनऊ में अपना व्यवसाय कर रहे हैं. अश्विनी से संपर्क srivastava.ashwani@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. 

इसे भी पढ़ें….

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

…यूं ही सौमित सिंह की तरह आत्महत्या कर मरते रहेंगे पत्रकार!

पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अपने आवास पर सोमवार की सुबह एक फ्रीलांस जर्नलिस्ट सौमित सिंह ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। खबर को जब मैंने फेसबुक पर इस स्टेटस के साथ शेयर किया…

”ध्वस्त हो चुकी पत्रकारिता की दुनिया में वाकई सर्वाइव करना बेहद मुश्किल है। कनेक्शन से कलेक्शन होता है यहां। दुनिया भर की औपचारिकताओं में बांधकर काबिलियत को जमींदोज करके कीमत तय की जाती है। और मां-बहन हो चुकी उस कीमत को जानकर दर्द होता है उसमें आप नवरत्न तेल खरीदिए..रोज सिर पर मलिए तो शायद ठंडक आपको कुछ राहत दे। फिर जब आप किसी दूसरे संस्थान की ओर पलायन करने की सोचते हैं तो आपकी विचारधारा काफी मायने रखती है। इसके इतर सैलरी स्लिप। अगर नहीं तो फिर से चंपादक अलग अलग तरह से आंकलन करते हैं। और शोषण आपको अवसाद का रास्ता दिखा देता है। पत्रकारिता की दुनिया के अलग ही दर्द हैं, जिसे न कोई सुनता है, न समझता है। हां ये जरूर देखता है कि आपमें कुत्ते बनने की काबिलियत है या नहीं। नहीं तो आपको कोई टायरों के नीचे कुचलने वाला है।”

मेरे इस स्टेटस पर कई कमेंट्स आए। इसमें से एक कमेंट ऐसा भी था जिसमें कहा गया था कि हर कोई रवीश कुमार नहीं बनता। चलिए ये मान लिया मैंने और मैं कोई रवीश कुमार सरीखे बनने को कह भी नहीं कह रहा क्योंकि वो अंधेरा दिखा देते हैं तो भी लोग वाह-वाह करते हैं, कुछ नया बताने लगते हैं लेकिन वहीं जब एक शुरूआती पत्रकार रवीश कुमार से भी बड़ा करता है तो भी उसको तवज्जो नहीं दी जाती। वजह है उसका कद। उसकी कीमत। समाज का एक बड़ा हिस्सा अपनी अपनी सुविधा के अनुसार बेहतर पत्रकार और घटिया पत्रकार, बिकाऊ पत्रकार और टिकाऊ पत्रकार, रंगबाज पत्रकार, लफ्फाज पत्रकार चुन चुका है। जो अब तैयार हो रहे हैं उनके के लिए कोई जगह नहीं। क्योंकि उन्हें इस बात के आधार पर नजरंदाज कर दिया जाता है कि इन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की है।

लेकिन साहब आपको बता दूं कि रवीश कुमार भी गर्भ से सीखकर नहीं आए। न ही दीपक चौरसिया, दो साल की उम्र इतनी जोर जोर से चिल्लाते हुए आसाराम पर डीबेट करते थे। यहां तक कि पुण्य प्रसून वाजपेई जी भी सत्ता के गलियारे के परिचित जन्म लेने के तुरंत बाद से ही नहीं हो गए थे। पत्रकारिता घिस घिसकर परचून की दुकान बन चुकी है। सबको अपना हल्दी धनिया बेचना है। नहीं बिक रहा तो गरम मसाले के तौर पर मॉल फंक्शन का शिकार, क्लीवेज आदि बातों से खबर बनाकर परोस दी जाती हैं।

आज खुद को नंबर वन बताने वाला कोई भी समाचार पत्र उठाकर देख लीजिए…बाबा बंगाली, टॉवर लगवाएं एक लाख रूपये रेंट मिलेगा आदि आदि विज्ञापन तो होता है और पूरा फायदा जाता है मालिकान को। मैं ये नहीं कह रहा कि फायदा लेना गलत है लेकिन साहब जी तोड़ मेहनत करने वालों के लिए भी नमक की व्यवस्था तो करा ही दीजिए, पुराने पत्रकारों के पास अनुभव माना जाता है…चाहे हों बड़ी सी कटोरी जो कि खाली है। आज रिज्यूमे भेजिए तो कूड़े के भाव जाता है। होता जुगाड़ के आधार पर है। तो मृत्यु कम उम्र में ही दिमाग में उपज जाती है और झूल जाती हैं सारी उम्मीदें, आशाएं, अपेक्षाएं। सच कहूं तो पत्रकारिता में भी जमीनी बदलावों की जरूरत है। अगर नहीं होते हैं तो मरते रहिए, आज आप कल हम…..और आने वाली पीढ़ी भी।

हिमांशु तिवारी आत्मीय
पत्रकार
himanshujimmc19@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मुंबई के पत्रकार Saumit Sinh का चालीस साल की उम्र में दिल्ली में निधन

Sad demise of Saumit Sinh

Dear Member,
Mumbai Press Club

With great sorrow and regret we have to inform you that our member, Saumit Sinh, passed away on Monday July 4, 2016 at Delhi.

Saumit, aged 40, worked for leading media organisations which includes Pioneer, NDTV, Headlines Today, DNA, Mumbai Mirror amongst others in his two decade long career. He is survived by his wife and two daughters.

Our heart goes out to his family and may they have the strength to bear this huge loss.

Rajesh Mascarenhas
Secretary
Mumbai Press Club

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

डीएसपी मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया

Vikas Mishra : मुकुल द्विवेदी का यूं जाना खल गया। मेरठ में मैं जब दैनिक जागरण का सिटी इंचार्ज था तब मुकुल द्विवेदी वहां सीओ थे। बेहद मृदुभाषी, पुलिसिया ठसक से दूर। सहज ही अच्छी दोस्ती हो गई। अक्सर मुलाकात होती थी। कभी दफ्तर में तो कभी हम दोनों के साझा मित्र संजय सिंह Sanjay Singh के घर पर मुलाकात होती थी। मेरा एक कनेक्शन इलाहाबाद का भी था, मैं उनसे सीनियर था।

2003 की बात है, रात करीब ढाई बजे मेरे पास दफ्तर से फोन आया था। बताया कि बागपत का अखबार लेकर जा रही जीप को सिविल लाइन थाने में पुलिस ने बंद कर दिया है, ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया है। अब अखबार समय से बागपत पहुंचे, ये जिम्मेदारी मुझ पर डाली गई थी। मैंने थाने फोन किया, बता चला कि सीओ साहब गश्त पर थे, जागरण की गाड़ी ने उनकी गाड़ी में ठोंक दिया, जिसमें सीओ साहब घायल हो गए हैं। ये सीओ कोई और नहीं मुकुल द्विवेदी ही थे।

मैंने थानेदार हरिमोहन सिंह को फोन किया तो उन्होंने बताया कि साहब की गाड़ी ठोंकी है, सर, कैसे छोड़ सकता हूं, नौकरी चली जाएगी। जागरण की गाड़ी न होती तो ड्राइवर को कूट दिया जाता। मैंने कहा कि आप हैं कहां, बोले-अस्पताल में। मैंने कहा कि मुकुल का क्या हाल है। बोले सिर में चोट लगी है। मैंने कहा, बात करवा दीजिए। खैर, मुकुल से बात हुई। हाल-चाल हुआ, कुशल क्षेम हुआ। मैं सीधा अस्पताल गया, चोट ज्यादा नहीं थी, गनीमत थी।

हंसी मजाक हुआ, मैंने मजाक में कहा कि इतनी मुस्तैदी से ड्यूटी निभाएंगे तो ऐसी ही आफत आएगी, आधी रात के बाद गश्त लगाने की क्या जरूरत थी..।

मुकुल भी हंस पड़े। मुकुल ने खुद थानेदार से कहा कि गाड़ी छोड़ दो। मैंने कहा नहीं, एक कांस्टेबल भी साथ भेजिए। मेरी जिम्मेदारी सप्लाई पहुंचवाने की है, सिरफिरे ड्राइवर को बचाने की नहीं। मुकुल बोले-कोई बात नहीं, हो जाता है।

मुकुल की मुझसे ही नहीं, वहां कई पत्रकारों से दोस्ती थी। दोस्त आइटम थे। जब हाथरस में थे, तब मेरी उनसे बातचीत हुई थी। यहां कामकाज की आपाधापी में बरसों तक बात नहीं हो पाई थी। दो हफ्ते भर पहले मुझे पता चला था कि मुकुल मथुरा में एसपी सिटी हैं, सोचा था कि बात करूंगा, लेकिन मुहूर्त नहीं निकल पाया। और जब उनके बारे में खबर आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

मन कचोट रहा है, क्या कहूं, काश उन्हें फोन कर लिया होता, मथुरा है ही कितनी दूर, एक बार मिल आता, लेकिन अब क्या कहूं। कहते हैं कि वीरों का हो कैसा बसंत। यानी वीरों का बसंत तो मोर्चे पर ही होता है। मुकुल द्विवेदी मोर्चे पर मारे गए। उनकी शहादत को नम आंखों से मैं सलाम करता हूं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे, उनके बुजुर्ग पिता, माता और पूरे परिवार को ये असीम दुख उठाने की क्षमता भी दे।

आजतक न्यूज चैनल में कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार आनन्द राज सिंह

Ramendra Jenwar : हमारे बहुत पुराने मित्र, हास्टल’मेट और पूर्व पत्रकार आनन्दराज सिंह के निधन की खबर अभी अभी एक और पत्रकार मित्र रवि दत्ता जी से प्राप्त हुई.. गहरा आघात लगा… लखनऊ के मित्रोँ को फ़ोन करके जानकारी दी है…. आनन्दराज सिंह ने पत्रकारिता में अपना करियर नेशनल हेराल्ड मेँ कापी होल्डर की पोस्ट से शुरू किया था..फिर प्रूफ रीडर हुए.. फिर हेराल्ड मेँ ही उप संपादक हुए और उसके बाद उन्होंने पीछे मुडकर नहीं देखा… टाइम्स आफ इंडिया से लोकमत टाइम्स होते हुए ओमान डेली आब्जर्वर फिर दुबई मेँ खलीज टाइम्स आदि जाने कितने अंग्रेजी अखबारोँ मेँ काम किया…

मधुमेह के मरीज थे लेकिन शराब और सिगरेट से परहेज नहीँ कर पाए… निरामिष भोजन के भी शौकीन रहे…. शादी बेंगलुरू से हुई थी… हम सब लोग बाराती बनकर गए थे…. मूल रूप से गोँडा जिले के रहने वाले थे…. अंग्रेजी के प्रकांड ज्ञाता थे… विद्वता का आलम यह था कि एमए प्रथम वर्ष की परीक्षा मेँ उन्हेँ एक प्रश्न इतना भाया कि एक ही प्रश्न का उत्तर लिखने मेँ उन्होने तीन कापियाँ भर दीँ लेकिन प्रश्न तो पाँच करने होते थे…. फिर भी परीक्षक ने उनकी योग्यता से प्रभावित होकर उन्हेँ पास मार्क्स दे दिए थे… बाद मेँ विभाग्ध्यक्ष डा विमला राव ने उन्हें बहुत समझाया तब सेकेंड इयर मेँ पाचोँ सवालोँ के जवाब लिखे…..

दुबई में थे तब रोज रात को मुझे फ़ोन करते थे और चाहे अनचाहे पूरी रात उनसे बात करनी पड़ती थी… बीच बीच मेँ पैग बनाने का टाइम भी माँगते थे…. उनको किसी ने खाली हाथ कभी नहीँ देखा… हमेशा हाथ मेँ अँग्रेजी का कोई मोटा उपन्यास या कोई और किताब और उसमेँ एक पेँसिल…. यूपी प्रेस क्लब हमारा बहुत दिनोँ तक स्थाई अड्डा रहा…. और क्या लिखूँ समझ नहीँ पा रहा….अलविदा मित्र…….

किसी के जाने का मुझको गिला नहीँ है मगर,
बहुत करीब से उठकर चला गया कोई।

वरिष्ठ पत्रकार रामेंद्र जनवार के इस एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Surendra Pratap Singh हमेशा एक मित्र का जाना दुखद होता है और जब दिल के अत्यंत करीब हो तो घोर पीड़ादायक। हम आप के इस दुख में आप के साथ हैं। विनम्र श्रद्धांजलि।

Jagat Narain Singh किसी अपने की शरीरी विदाई पीड़ा देती है…

Sanjeev Pathak मुझे भी रवि द्वारा ये दुखद सूचना मिली… बहुत पुरानी बातें याद आ रही हैं उनसे जुड़ी हुई.. अभी जाऊंगा घर… देखा नहीं है… कहीं देवा रोड पर बनवाया था.. रवि के फोन का इंतज़ार है क्योंकि उसे घर पता है…

Pradeep Kumar Mishra आपकी मित्रता, संवेदना, मित्र को असमय खोने कष्ट, अत्यन्त क्लेशकारी है, परमशक्ति आपको संयम तथा स्व. आनन्दराज सिहं जी के परिवार को शान्ति पृदान करे…

Vir Vinod Chhabra बहुत दुखद खबर। मेरी भी इनसे तीन बार की मुलाक़ात हुई है। दिलचस्प शख्सियत थे। एक हाथ में अख़बार और दूसरे हाथ में सिगरेट हमेशा रही। विनम्र श्रद्धांजलि।

Siddharth Kalhans बेहद दुखद। आनंदराज सिंह हमारे जिले के रहने वाले थे और हमेशा मुझे अपने अनुज की तरह माना। एक बार जब हमने बहुत ठानी दुबई जाने की तो वहां की हकीकत से उन्होंने रुबरु करा कर मुझे जाने से रोक दिया।

Shubhendu Dass Very sad and shocking.He worked with me too about 32 years back. Rest in peace in his heavenly abode

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दैनिक जागरण में समाचार संपादक शाहिद रजा सोमवार को दुनिया से रुखसत हो गए

मौत चुपचाप दबोच लेती है, चर्चा भी नहीं होता…..दैनिक जागरण में समाचार संपादक शाहिद रजा सोमवार को दुनिया से रुखसत हो गए। एक जनवरी 1960 को जन्मे शाहिद रजा की रुखस्ती एकदम खामोश और गुमनाम रही। करीब ढाई साल पहले लुधियाना यूनिट के प्रभारी पद से हटाकर उन्हें नोएडा सेंट्रल डेस्क पर बुला लिया गया था। यहां वह प्रदेश डेस्क पर काम कर रहे थे। बताया जा रहा है कि वह कुछ दिनों से बीमार थे। उनका दिल्ली के सरगंगा राम अस्पताल में किडनी का इलाज चल रहा था।

उनके इंतकाल पर गमगीन माहौल में सेंट्रल डेस्क के कर्मचारियों ने शोक सभा की और उनके जन्नतनसीन होने की खुदा से दुआ मांगी। अपनी उपेक्षा, उत्पीड़न और दोयम दर्जे के व्यवहार की वजह से वह काफी उदास रहते थे। उनकी बीमारी की मानसिक उत्पीड़न और निरंतन उपेक्षा एक बड़ी वजह बताई जाती है। शाहिद भाई काफी नेकदिल और तबियत के बेहद सादा इंसान थे। वह अपने काम को बेहद खामोशी से इंजाम देते थे। अपना सारा वक्त वह खबरों में मशरुफ रहकर ही गुजारते थे। कहा जाता है कि बॉस टाइप के अधिकारी उनकी सरेआम तौहीन करते थे परंतु वह पलट कर जवाब नहीं देते थे। जिस खामोशी से वह अपनी ड्यूटी को अंजाम देते रहे, उसी खामोशी से दुनिया को भी अलविदा कह गए। खुदा उनको जन्नत नसीब हो।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूपी में जंगलराज : गरीबी, कर्ज और भूख से त्रस्त किसान झिनकू पेड़ से लटक मरा

(उपरोक्त तस्वीर पर क्लिक कर संबंधित वीडियो देखें)


-रामजी मिश्र ‘मित्र’-

सीतापुर : कैसे कोई गरीब किसान झिनकू पेड़ पर लटक कर मर जाने में ही मुक्ति देख पाता है, इसे जानना हो तो आपको उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में आना पड़ेगा। यहां झिनकू की मौत अफसरों, नेताओं, सिस्टम से ढेर सारे सवालों का जवाब मांग रही है लेकिन सब भ्रष्टाचारी चुप्पी साधे मामले को दबाने में लगे हैं। किसान अन्नदाता होता है। झिनकू भी अन्नदाता था। लेकिन गरीबी, कर्ज और भूख ने उसे ऐसे बेबस किया कि पूरा सिस्टम उसे आत्महत्या की ओर ले जाने लगा।

यूं तो अन्नदाता सबका पेट भरता है लेकिन झिनकू के पेट की फिकर किसी ने नहीं की। जिले के महोली ब्लाक के मूड़ाहूसा का किसान आखिर फांसी पर झूल ही गया और इसके साथ ही उसने तमाम सरकारी वादों को खोखला साबित कर दिया। बुधवार बीस अप्रैल को हुई किसान की मौत पर भले शासन प्रशासन मौन हो लेकिन मीडिया में लगातार खबरें आने से मामला तूल पकड़ता जा रहा है। 

दरअसल झिनकू की मौत यूं ही नहीं हुई। उसकी कहानी बेहद दर्द भरी दास्तान है जिसमें संघर्ष की सारी सीमाएं टूट गईं। आपको बताते चलें कि हर दिन भूख सहना और फसल पकने पर अच्छे दिनों की राह अन्य किसानों की तरह झिनकू के सपने भी ऐसे ही थे। बारह साल पहले उसकी पत्नी आखिरकार कमजोर होकर बीमार हो गई। नतीजन झिनकू ने बहुत सारा कर्जा लेकर पत्नी को बचाने का पूरा प्रयास किया। झिनकू कर्जी भी हुआ और पत्नी भी हाथ से निकल गयी।

झिनकू की एक बिटिया अब शादी लायक हो चुकी थी। आखिर उसने सन 2009 में उसने अपनी बड़ी बेटी नीलम की शादी कर दी। वह पत्नी की बीमारी में लगे धन से हुए कर्जे को अब तक अदा नहीं कर पाया था। बेटी के ब्याह में उस पर तैंतीस हजार का सरकारी कर्ज भी हो गया। दिन रात भूख की फिकर छोड़कर झिनकू को कर्ज की फिकर सताने लगी। पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों पर मौसम का ऐसा कहर बरसा की उनकी पूरी फसल चौपट हो गयी। लोगों ने बताया झिनकू गरीबी के चलते पटवारी को पैसे न दे पाया जिस पर उसके फसल के नुकसान की जानकारी पटवारी ने नहीं बनाई और उसे सरकारी मुवावजा भी नहीं मिल सका। वह कई बार तहसील गया अधिकारियों से गिड़गिड़ाया लेकिन उसकी शिकायत न ही दर्ज की गई और न ही उसे किसी प्रकार की सहायता दी गयी।

झिनकू का एक बेटा महेंद्र शादी के बाद निशक्त हो गया। आखिर लोग उससे कर्जा लेने के लिए उसके बैल खेत में पहुँचकर रोक लेते। उसे गालियां मिलती, धमकियाँ मिलती। घर का खर्चा बहुत अधिक था। वह भूखा रहकर भी कर्ज के बोझ से दबा का दबा रह गया। अब अगर फसल का पैसा वह कर्ज अदायगी में दे भी देता तब भी भूख औरे घर के अन्य खर्चे से उसे मुक्ति मिलती नहीं दिख रही थी। आखिर झिनकू ने फांसी पर झूल कर धरतीपुत्र कहे जाने वाले मुलायम के पुत्र के राज्य में किसानों के साथ हो रहे अत्याचार की बड़ी कहानी को बयान कर डाला।

अधिकारियों ने इस मामले पर मौत के बाद भी झिनकू की कोई मदद नही की। इधर मौत के पाँच दिन बाद भी स्थानीय मीडिया इसे लगातार कवर कर रही है लेकिन अधिकारी मामले के थमने की राह देख रहे हैं। झिनकू के परिवार में एक बेटी बबली (16 वर्ष) और अनुज (12 वर्ष) निशक्त बेटा महेंद्र और उसकी पत्नी है। इन सबकी जिंदगी में हल किसके कंधे पर होगा, सवाल यह भी है। एक मौत ने कई ज़िंदगियों को अंधेरे में ढकेल दिया है। झिनकू के बैल मालिक के रहते सूखा पैरा चबाने को पा जाते थे लेकिन अब उन्हें वह भी नसीब होते नहीं दिख रहा। खूँटे से बंधे बैल पाँच दिन बाद भी मालिक की राह देखते जान पड़ते हैं। वहीं झिनकू के बच्चे और परिवार के लिए गाँव के लोग अब भी सरकारी सहायता के लिए आस लगाए बैठे हैं। 

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=rfk0PgMB8AQ

सीतापुर से रामजी मिश्र ‘मित्र’ की रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सामाजिक स्वीकृति पाने के लिए कई वर्षों तक विनोद बड़थ्वाल और सूर्यकांत धस्माना पैसे देकर सार्वजनिक कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि बनते थे!

Rajiv Nayan Bahuguna : शायद 1994 के आसपास कभी, मैं जयपुर से अपने अख़बार की नौकरी से कुछ दिन की छुट्टी पर घर आया था। देहरादून घण्टा घर के चौराहे पर मैंने देखा कि हथियार बन्द पुलिस वाले भले घर के से दिखने वाले दो युवकों को घेर कर ले गए। मैंने साथ खड़े अग्रज मित्र नवीन नौटियाल का आह्वान किया कि हमे हस्तक्षेप करना चाहिए। उत्तरखण्ड आंदोलन के दिन थे। मुझे लगा कि पुलिस इन दोनों को प्रताड़ित करने थाने ले जा रही है।

नवीन नौटियाल ने बताया कि ये दोनों विनोद बड़थ्वाल और सूर्यकांत धस्माना हैं, और पुलिस इन्हें प्रताड़ित करने नहीं ले जा रही, बल्कि इनकी सुरक्षा में तैनात है। मैंने उसी दिन पहली बार बड़थ्वाल को देखा, और उत्तरखण्ड में किसी नागरिक का ऐसा सुरक्षा तामझाम भी। बाद में देहरादून आया तो उनसे कई मुलाक़ातें हुयी। वह शादी व्याह आदि समारोहों में अपने गनर्स के साथ चहकते रहते थे। गढ़वाली समुदाय के लोग भी बरात की शोभा बढ़ाने को बन्दूक धारियों के कारण उन्हें बुलाते थे, और वह जाते थे।

कई वर्षों तक धस्माना और बड़थ्वाल पैसे देकर सार्वजनिक कार्यक्रमों के मुख्य अतिथि अथवा अध्यक्ष बनते थे क्योंकि उन्हें सामाजिक स्वीकृति चाहिए थी। उनसे धन लेकर उन्हें मुख्य अतिथि बनाने वाले ही बाद में उनकी निंदा करते थे। बाद में कोई फायदा न होते देख बड़थ्वाल ने ऐसे कार्यक्रमों में जाना छोड़ दिया। मूर्धन्य पत्रकार कुंवर प्रसून उनकी उपस्थिति उत्तराखण्ड की विधान सभा में आवश्यक मानते थे। लेकिन यह हो न सका। निसन्देह विनोद बड़थ्वाल एक निष्ठावान, दृढ और विनम्र राज नेता थे।

Pawan Lalchand : स्वर्गीय विनोद बडथ्वाल जी एक मिलनसार नेता थे जिनका जाना दुखी कर गया…ऐसे समय जब सूबे की सियासत में पालाबदल पर ज़ेरे-बहस छिड़ी है तब विनोद बड़थ्वाल जैसे नेता भले पहाड़ पर अपना दल न चढ़ा पाये हों लेकिन मरते दम सपाई बने रहकर दलीय निष्ठा की मिसाल पेश जरूर कर गये…ज्यादा बड़ा न सही पहाड़ की सियासत को ये सबक़ तो उनसे सीखना ही चाहिये…विनम्र श्रद्धांजलि

Mukesh Yadav : साल ठीक से याद नहीं, शायद 1993 की बात रही होगी. तब मुलायम सिंह को मुल्ला मुलायम का खिताब मिल चुका था. गागलहेड़ी (सहारनपुर) में सपा सुप्रीमो की रैली थी. मुलायम सिंह की मौजूदगी में एक नौजवान मंच से दहाड़ रहा था. तब मैंने पहली बार विनोद बड़थ्वाल को देखा था. आखिरी बार मैंने उनको करीब दो वर्ष पूर्व देहरादून में दिल्ली फ्रूट चाट (राजपुर रोड जाखन) पर देखा. उनकी गाड़ी सड़क के दूसरी तरफ खड़ी थी और वे अपने सुरक्षा प्रहरी के सहारे वहां खड़े थे. देखकर मेरे भीतर सहानुभूति जैसा कुछ उमड़ा! शायद राजनीति में निष्ठा नहीं, ताकत की पूछ ज्यादा है. मैं उसी विनोद बड़थ्वाल को याद रखना चाहूँगा जिसको मैंने पहली बार देखा था!

उत्तराखंड के तीन पत्रकारों के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

दिग्गज पत्रकार योगेंद्र बाली और वयोवृद्ध पत्रकार काशीनाथ चतुर्वेदी नहीं रहे

नई दिल्ली / ग्वालियर । वरिष्ठ पत्रकार व लेखक योगेंद्र बाली का गुरुवार सुबह निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार थे। योगेंद्र के पारिवारिक सूत्रों ने उनके निधन की जानकारी दी। उनके परिवार में पत्नी विजय और बेटियां- कलिका तथा पूर्वा हैं। उनका अंतिम संस्कार यहां लोधी रोड स्थित इलेक्ट्रिॉनिक शवदाह गृह में शाम सात बजे किया जाएगा। अपने लंबे करियर में योगेंद्र ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में बतौर संवाददाता भी सेवा दी। वह ‘द ट्रिब्यून’, ‘करंट वीकली’, ‘प्रोब’, ‘संडे मेल’, ‘द डे आफ्टर’, ‘एशिया डिफेंस न्यूज इंटरनेशनल’ से भी जुड़े रहे। वह ललित कला अकादमी की जनरल काउंसिल के सदस्य थे और इसकी कला, शिक्षा, प्रकाशन तथा अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों से संबद्ध समितियों के भी सदस्य रहे। योगेंद्र द्वारा लिखित पुस्तकों में ‘द कम्यूनल बोगी’, ‘चंद्र शेखर : ए पॉलिटिकल बायोग्रॉफी’, ‘पवन चैमलिंग : डेयरिंग टू बी डिफरेंट’ और ‘श्री सतगुरु राम सिंह जी एंड फ्रीडम मूवमेंट ऑफ इंडिया’ शामिल हैं।

उधर ग्वालियर से सूचना है कि वयोवृद्ध पत्रकार काशीनाथ चतुर्वेदी का बुधवार की रात निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे और लंबे समय से बीमार चल रहे थे। कलम के माध्यम से समाजसेवा की राह पर चलने का संकल्प लेने वाले श्री चतुर्वेदी ने जीवन के अंतिम समय में भी इस संकल्प को ध्यान में रखा। इसी के चलते उन्होंने जीते जी अपनी देह जीआर मेडिकल कॉलेज को दान देने का संकल्प लिया था। उनके छोटे बेटे अश्विनी चतुर्वेदी के मुताबिक गुरुवार की सुबह 11 बजे उनकी देह मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों को सौंपी गई। मूल रूप से भिंड जिले के अटेर के गांव तरसोखा में जन्मे श्री चतुर्वेदी की आरंभिक शिक्षा ग्वालियर में ही हुई। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि हासिल की। इसके बाद लखनऊ से पत्रकारिता की शुरूआत की। कुछ बरसों तक वहां पत्रकारिता करने के बाद वे ग्वालियर आ गए। यहां शहर के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दीं। इसके साथ ही समाचार एजेंसी यूएनआई आैर आकाशवाणी के संवाददाता भी रहे। जीवन के अंतिम दौर में स्वास्थ्य ठीक न रहने से उन्होंने सक्रिय पत्रकारिता से खुद को अलग कर लिया था। पत्रकारिता में शुभिता, शुचिता आैर सादगी को अपना आदर्श मानने वाले श्री चतुर्वेदी का शहर की पत्रकारिता में महत्वपूर्ण योगदान है, जो सदैव अविस्मरणीय रहेगा। पूर्व मंत्री भगवान सिंह यादव, जिनसे मुलाकात के कुछ देर बाद ही श्री चतुर्वेदी ने अंतिम सांस ली, ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार सुनील छईयां का निधन

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार सुनील छइयां नहीं रहे. वे कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. उन्होंने मेरठ के सुभारती मेडिकल कालेज में आखिरी सांस ली. आज शाम मेरठ में 4 बजे सूरजकुंड में दाह संस्कार किया जाएगा. सुनील छइयां काफी समय से बीमार चल रहे थे. उनका ब्रेन हैमरेज का इलाज लंबा चला और बाद में काफी स्वस्थ हो गए थे. लेकिन शरारी का काफी हिस्सा इस ब्रेन हैमरेज से प्रभावित हो गया था.

सुनील छइयां के निधन के बाद शहर के पत्रकारों, समाजसेवियों, नेताओं, गणमान्य नागरिकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और परिजनों को दुख की इस घड़ी में हौसला रखने की कामना की.

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हत्या की स्टोरी कवर करते समय कैमरामेन की हार्टअटैक से मौत

ठाणे। हत्याकांड की रिपोर्टिंग के लिए गए समाचार चैनल के कैमरामैन रतन राधेश्याम भौमिक की दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गयी है. भौमिक कल सुबह कासर वडवली हत्याकांड का कवरेज करने सिविल अस्पताल में गए. उसी समय सुबह करीब पौने नौ बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा.

सिविल के डाक्टर केम्पी पाटील और उनके सहयोगियों ने तत्काल उपचार शुरू किया. ज्यूपिटर अस्पताल ले जाने की तैयारी की गई लेकिन भौमिक ने पहले ही दम तोड़ दिया. करीब डेढ़ वर्ष पूर्व भौमिक का दिल का दौरा पड़ने के बाद एंजीओप्लास्टी हुई थी. आज सुबह दूसरा दौरा पड़ने से उन्होंने दम तोड़ दिया. रतन भौमिक (३१) अविवाहित थे. परिवार में माता पिता और दो भाई हैं. कल दोपहर बाद वागले इस्टेट स्मशान भूमि में भौमिक का अंतिम संस्कार किया गया जिसमें पारिवारिक सदस्यों के अलावा बड़ी संख्य में पत्रकार उपस्थित थे.

मुंबई से शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.


इसे भी पढ़ें :

एक बेहद ईमानदार और सरल स्वभाव का युवा पत्रकार जो 32 साल की उम्र में सबको अलविदा कह गया

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एक बेहद ईमानदार और सरल स्वभाव का युवा पत्रकार जो 32 साल की उम्र में सबको अलविदा कह गया

नहीं रहा ‘अनमोल’ रतन

-दानिश आज़मी-

चेहरे से टपकता हुआ पसीना, पसीने से तरबतर बदन, शरीर पर एक सस्ती कमीज़ और पैंट, बिखरे बाल और हाथ में एक डीवी टेप। 2009 से 2011 तक लगभग हर रोज़ ठाणे से अँधेरी दफ़्तर टेप लेकर आने वाला रतन कुछ इस तरह से ज़ेहन में याद है। अँधेरी ऑफिस में काम करने वालों के लिए वो रतन से ज़्यादा विक्रांत का कैमरामैन के रूप से जाना जाता था और विक्रांत के हिस्से की डाट भी उसे ही पड़ती थी। कभी टेप लेट लेकर आना तो कभी ग्लिच और कभी बाइट नदारद। गलती होती थी विक्रांत की लेकिन रतन मुस्कराता हुआ, डरता हुआ सब सुन लेता था। एक बेहद ईमानदार और सरल स्वभाव का युवा पत्रकार जो 32 साल की उम्र में सबको अलविदा कह गया।

रतन

अलविदा कहने का भी अंदाज़ निराला रहा.. विक्रांत के साथ काम करने के अलावा उसने हाल ही में न्यूज़ नेशन के लिए काम करना शुरू किया था। सुबह जब एक ही परिवार के 15 लोगों के मौत की खबर आई तो विक्रांत ने मुझे बताया की रतन हॉस्पिटल के विसुअल्स लेने गया है। 15 मिनट में भेज देगा। रतन हॉस्पिटल गया, शॉट्स बनाये, 08.15 से 08.18 तक न्यूज़ नेशन के लिए इसी खबर पर फोनो दिया।

फोनो देना उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। उसने अपने कुछ पत्रकार दोस्तों को बताया कि उसने फोनो दिया। परिवार को ख़ुशी में पहले ही बोल दिया था की वो न्यूज़ नेशन देखे। 08.21 पर रतन ने विक्रांत को फोन कर कहा की उसे सीने में दर्द हो रहा है। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन कहते है ना, ज़िन्दगी और मौत का कॉन्ट्रैक्ट होता है। आज रतन का यह करार पूरा होना था और पूरी कोशिश के बावजूद लगभग 9 बजे उसने आखिरी सांस ली। परिवार की हालत को शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

रतन के घर में उसके माँ पिता और दो भाई है। रतन के छोटा भाई का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है और सबसे छोटा भाई विकलांग पिता की छोटी सी दुकान में मदद करता है। पिता चलने में असमर्थ है और बल्ब के रिपयेरिंग से कुछ पैसे कमाते है। रतन की मौत परिवार के लिए सिर्फ अनमोल रतन की मौत भर नहीं है बल्कि उस साधन की भी मौत है जिससे घर की आजीवीका चलती थी। आज रतन के आखिरी क्रियाकरम में शरीक हुआ तो मन भाव विभोर हो गया। रतन के असमय और अकस्माक मृत्यु ने दिल में अजीब सी कम्पन पैदा कर दी है। ईश्वर रतन के परिवार इस मुश्किल घडी का सामना करने की ताकत दे, यही प्रार्थना है।

मुंबई से दानिश आज़मी की रिपोर्ट. संपर्क: danishazmireporter@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तीसरे रीटेक में निदा फ़ाज़ली बिफर गए और कुर्सी से उठते हुए चिड़चिड़ाकर बोले- मैं नहीं करता…

Abhishek Srivastava : शायद 2011 की गर्मी का मौसम था जब निदा फ़ाज़ली को रिकॉर्ड करने मैं करोलबाग के एक होटल में पहुंचा था। साथ में कैमरामैन नेगीजी थे। हम लोग कमरे में पहुंचे, तो बनियान में एक शख्‍स बिस्‍तर पर बेतरतीब लेटा हुआ था। उसके गले में सोने का एक मोटा सा सिक्‍कड़ लटक रहा था। नीचे पाजामे का नाड़ा झूल रहा था। जब देह ऊपर उठी, तो दोनों के बीच थोड़ा अस्‍त-व्‍यस्‍त, थोड़ा अचकचाए, अन्‍यमनस्‍क से निदा फ़ाज़ली बरामद हुए। बेहद संतुलित मुस्‍कराहट के साथ उन्‍होंने हमसे लाउंज में इंतज़ार करने को कहा। उतनी देर में नेगीजी ने गमले के पास कुर्सी रखकर फ्रेम बना लिया।

थोड़ी देर बाद निदा भारी कदमों से बाहर आते दिखे। उनका सिल्‍क का कुर्ता ऐसा कड़क था कि छू जाए तो चमड़ी भेद दे। उन्‍हें फ्रेम समझाया गया। कुर्सी पर बैठाया गया। शूट चालू हुआ तो एक कमज़र्फ़ मक्‍खी उनकी नाक के पास मंडराने लगी। नेगीजी ने मुझसे उसे भगाने को कहा। ‘नमक हलाल’ का अमिताभ बच्‍चन बनने से बचने की पूरी कोशिश मैंने की, लेकिन मक्‍खी जाने से रही और तीसरे रीटेक में निदा बिफर गए। कुर्सी से उठते हुए चिड़चिड़ाकर बोले, ”मैं नहीं करता… Nazim से कह देना बस हो गया।” बड़ी मुश्किल से उन्‍हें मना तो लिया गया, लेकिन कहन का मज़ा जाता रहा। अपनी लाइनें सपाट बोलकर बिना मुस्‍कराए वे कमरे में कट लिए।

पिछले साल जब लेखक असहिष्‍णुता के विरोध में पुरस्‍कार लौटा रहे थे, तब लंबे समय बाद निदा से फोन पर बात हुई। वे इस हरकत को बेवकूफ़ाना कह रहे थे। सुनकर मूड तो खराब हुआ था, लेकिन उनका आशय कुछ ज्‍यादा गहरा था जो बाद में समझ आया। हम लोगों ने दुनिया में जो पाले खींच दिए हैं, उनमें हर किसी को फिट करने की खामखां कोशिश में लगे रहते हैं। पुरस्‍कार वापसी के विरोध और समर्थन के अलावा एक तीसरा पक्ष भी था। यह पक्ष निदा का था, जिसे बाद में Punya Prasun Bajpai ने बड़ी खूबसूरती से एक वीडियो में बयां किया था। देखिए, रचनाकारों की ऐतिहासिक बग़ावत पर निदा क्‍या कह गए हैं:

ईनामों को वापिस करने से क्‍या होगा / अख़बारों में जीने-मरने से क्‍या होगा
क़लम तुम्‍हारे लिखना-लिखाना भूल चुके हैं / नाइंसाफ़ी से टकराना भूल चुके हैं
घर से निकलकर बाहर आओ / चलकर धूप से हाथ मिलाओ
या फिर अपना गुस्‍सा लेकर उजड़े हुए बग़दाद में जाओ
और किसी लिखने वाले के धूल भरे जूतों से पूछो
कैसे दर्द लिखा जाता है, कैसे बात कही जाती है।

स्वतंत्र पत्रकार और मीडिया एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


जनवादी लेखक संघ की प्रेस रिलीज…

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए… ऐसा कहने वाले, हिंदी-उर्दू की तरक्क़ीपसंद, जम्हूरियतपसंद अदबी रवायत के प्रतिनिधि शायर, निदा फ़ाज़ली का देहांत हम सबको गहरे विचलित कर देनेवाली एक ख़बर है. वे 78 साल के थे. देश के बंटवारे के समय, जब उनकी उम्र महज़ 9 साल की थी, उन्होंने अपने परिवार की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ भारत में ही रहने का फ़ैसला किया. ग्वालियर और भोपाल में अपने संघर्ष के आरंभिक दिन बिताने के बाद 1960 के दशक में वे बम्बई चले गए, जहां ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज’ में स्तम्भ लेखन करते हुए 80 के दशक में उन्हें फिल्मों में गीत लिखने के प्रस्ताव मिलने शुरू हुए.

उनके लिखे कई गाने बहुत लोकप्रिय हुए. वे उन रचनाकारों में से थे जिनके यहाँ ‘लोकप्रिय’ और ‘साहित्यिक’ का अंतर एक छद्म साबित होता है. उनकी कितनी ही पंक्तियाँ आम जनता की ज़ुबान पर चढ़ी हुई हैं. उनकी शायरी और फ़िल्म-गीत, दोनों में बहुत आमफ़हम मुहावरे में जिस स्तर की दार्शनिकता और जनपक्षधर अंतर्वस्तु मिलती है, वह कम ही रचनाकारों के यहाँ सुलभ है. तक़सीम से मिला दर्द आजीवन उनके साथ रहा और वे लगातार बहुत मज़बूती से फ़िरकापरस्ती, बुनियादपरस्ती के ख़िलाफ़ रहे. निदा फ़ाज़ली साहब ने 1997 में जनवादी लेखक संघ के कलकत्ता अधिवेशन में उपस्थित होकर औपचारिक रूप से संगठन की सदस्यता ली थी. तब से लेकर वे मृत्युपर्यंत जलेस के सदस्य रहे. उनके निधन से जनवादी लेखक संघ शोक-संतप्त है. हम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह

(महासचिव)

संजीव कुमार

(उप-महासचिव) 

जनवादी लेखक संघ


इसे भी पढ़ें….

इंटरव्यू : हमारा पूरा देश चंद अंबानियों में बंटा हुआ है : निदा फाजली

xxx

निदा फाजली ने कहा: अमिताभ की तुलना नहीं की थी कसाब से, मीडिया ने लगायी है आग

xxx

हमारी मय्यत पर तुम जो आना तो चार आंसू बहा के जाना… (सुनें)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: