SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST MANI D’MELLO

Dear Member,

We are extremely sorry to inform you that senior journalist and Mumbai Press Club member, Mani D’Mello, passed away this morning at Holy Family Hospital, Bandra, following a prolonged illness.

D’Mello aged 54 years, a seasoned crime reporter, worked in various capacities in several newspapers such as Mid-Day, Free Press Journal (FPJ), Times of India and television news channels. During his tenure at FPJ, Mani mentored many reporters who still considered him as their guide.

He will be laid to rest on Thursday. Funeral procession will start at 4.30 pm from his residence — Carters Apts, Sherly Rajan Road, Bandra West.

Mass will be at 5.00 pm at St Anne’s Church, Pali Hill, Bandra West followed by burial at St Andrews Church, Hill Rd, Bandra (West).

Our heart goes out to his family and may they have the strength to bear this huge loss.

Regards,

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पहले प्रदीप संगम, फिर ओम प्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी का जाना….

एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग या दुर्योग, जो कहिए… मेरे ज्यादातर प्रिय पत्रकारों का समुदाय धीरे-धीरे सिकुड़ता छोटा होता जा रहा है… दो-तीन साल के भीतर एकदम से कई जनों का साथ छोड़कर इस संसार को अलविदा कह जाना मेरे लिए स्तब्धकारी है… पहले आलोक तोमर, फिर प्रदीप संगम, उसके बाद ओमप्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी… असामयिक रणछोड़ कर चले जाना या जीवन के खेल में आउट हो जाना हर बार मुझे भीतर तक मर्माहत कर गया… सारे पत्रकारों से मैं घर तक जुड़ा था और प्यार दुलार का नाता बहुत हद तक स्नेहमय सा बन गया था… इनका वरिष्ठ होने के बाद भी यह मेरा सौभाग्य रहा कि इन सबों के साथ अपना बोलचाल रहन-सहन स्नेह से भरा रसमय था… कहीं पर कोई औपचारिकता या दिखावापन सा नहीं था… यही कारण रहा कि इनके नहीं होने पर मुझे खुद को समझाने और संभलने में काफी समय लगा…

फिलहाल तो बात मैं संतोष जी से ही शुरू करता हूं । मेरा इनसे कोई 23 साल पुराना नाता रहा। भीकाजी कामा प्सेस के करीब एक होटल में शाम के समय कुछ लोगों से मिलने का कार्यक्रम था । मेरे पास अचानक हिन्दुस्तान से संतोष जी का फोन आया- अनामी शाम को एक जगह चलना है, तैयार रहना। मैने जब जिज्ञासा प्रकट की तो वे बौखला गए। अरे जब मैं बोल रहा हूं तो फिर इतने सारे सवाल जवाब क्यों? बस् इतना जान लो कि जो मेरी नजर में सही और मेरे प्रिय पत्रकार हैं, बस्स मैं केवल उन्ही दो चार को बुला भी रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले तो मेरी संतोष जी से दर्जनों बार फोन पर बातें हो चुकी थी, मगर अपने अंबादीप दफ्तर से 100 कदम से कम की दूरी पर एचटी हाउस की बहुमंजिली इमारत में कभी जाकर मैं संतोष जी से मिला नहीं था। ना ही कभी या कहीं इनसे मिलने का सुयोग बना था। मैं फटाफट अपने काम को निपटाया और फोन करके एचटी हाउस के बाहर पहुंच गया। वहां पर संतोषजी पहले से ही मौजूद थे। मुझे देखते ही बोले- अनामी… मेरे सिर हिलाने पर उनने लपक कर मुझे गले से लगा लिया। साले कलम से जितना आक्रामक दिखते हो उतना तीखा और आक्रामक तो तुम लगते नहीं। अब इस पर मैं क्या कहता… बस्स जोर से खिलखिला पड़ा तो वे भी मेरे साथ ही ठहाका लगाने लगे। यह थी मेरे प्रति संतोष जी की पहली प्रतिक्रिया।

देर रात तक मेहमानों के संग बातें होती रहीं और साथ में मदिरामय माहौल भी था। इससे मैं काफी असहज होने लगा तो संतोष जी मुझे कमरे से बाहर ले गए और ज्ञान प्रदान किया। जब तुम कहीं पर पत्रकार के रूप में जाओ तो जरूरी नहीं कि सारा माहौल और लोग तुम्हारी अपेक्षाओं या मन की ही बातें करेंगे। कहीं पर असामान्य लगने दिखने से बेहतर है कि तुम खान पान पर अपने ध्यान को फोकस कम करके काम और जो बातचीत का सेशन चल रहा है उसमें औरों से हटकर बातें करो ताकि सबों का ध्यान काम पर रहे और खान पान दोयम हो जाए। इन गुरूमंत्रों को बांधकर मैं अपने दिल में संजो लिया और अंदर जाकर बातचीत के क्रम को एक अलग तरीके से अपने अनुसार किया।

पत्रकारिता के लगभग दो दशक लंबे दौर में बहुत दफा इस तरह के माहौल का सामना करना पड़ा। जब अपने साथी मित्रों का ध्यान काम से ज्यादा मदिरा पर रहा तो मैंने अपने अनुसार बहुत सारी बातें कर ली और मदिरा रानी के संग झूले में उडान भर रहे मेरे मित्रों ने मेरी बातों पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। इसके फलस्वरूप मेरी रिपोर्ट हमेशा औरों से अलग और कुछ नयी रहती या होती थी। इस पर अगले दिन अपने साथियों से मुझे कई बार फटकार भी खानी पड़ी या कईयों ने मुझे बेवफा पत्रकार का तगमा तक दे डाला था कि खबरों के मामले में यह साला विश्वास करने लायक नहीं है। आपसी तालमेल पर भी न्यूज को लेकर किसी समय सीमा का बंधन नहीं मानेगा।

तमाम उलाहनों पर भिड़ने की बजाय हमेशा मेरा केवल एक जवाब होता कि न्यूज है तो उसके साथ कोई समझौता नहीं। इस तरह के किसी भी संग्राम में यदि मैं कामयाब होता या रहता तो संतोषजी का लगभग हमेशा फोन आता, वेरी वेरी गुड अनामी डार्लिंग। वे अक्सर मुझे मेरे नाम के साथ डार्लिंग जोडकर ही बोलते थे। मैने उनसे कई बार कहा कि आप जब डार्लिंग कहते हैं तो बबल कहा करें जिससे लोग समझेंगे कि आप किसी महिला बबली से बात कर रहे हैं…. अनामी में डार्लिंग जोडने से तो लोग यही नहीं समझ पाएंगे कि आप किसी को अनामी बोल रहे है या नामी बोल रहे है या हरामी बोल रहे हैं। मेरी बातें सुनकर वे जोर से ठहाका लगाते… वे कहते- नहीं, बबल कहने पर ज्यादा खतरा है यार… अनामी इतना सुंदर और अनोखा सा इकलौता नाम है कि इसको संबोधित करना ज्यादा रसमय लगता है।

इसी तरह के रसपूर्ण माहौल में मेरा नाता चल रहा था. मुझसे ज्यादा तो मुझे फोन करके अक्सर संतोषजी ही बात करते थे। हमेशा एचटी हाउस की जगत विख्यात कैंटीन में मुझे बुलाते और खान पान के साथ हमलोग बहुत मामले में बात भी कर लिया करते थे। उनका एक वीकली कॉलम दरअसल दिल्ली की समस्याओं पर केंद्रित होता था। कई बार मैने कॉलम में दी गयी गलत सूचनाओं जानकारियों तथ्यों और आंकड़ो की गलती पर ध्यान दिलाया तो मुझे हमेशा लगा कि शायद यह उनको बुरा लगेगा। मगर एक उदार पत्रकार की तरह हमेशा गलतियों पर अफसोस प्रकट किया और हमेशा बताने के लिए प्रोत्साहित किया।

हद तो तब हो गयी जब कुछ प्रसंगों पर लिखने से पहले घर पर फोन करके मुझसे चर्चा कर लेते और आंकड़ो के बारे में सही जानकारी पूछ लेते। उनके द्वारा पूछे जाने पर मैं खुद को बड़ा शर्मसार सा महसूस करता कि क्या सर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं, मैं कहां इस लायक कि आपको कुछ बता सकूं। मेरे संकोच पर वे हमेशा कहते थे कि मैं भला तुमको लज्जित करूंगा, साले तेरे काम का तो मैं सम्मान कर रहा हूं, मुझे पता है कि इस पर जो जानकारी तुम दोगे वह कहीं और से नहीं मिलेगी।

उनकी इस तरह की बातें और टिप्पणियां मुझे हमेशा प्रेरित करती और मुझे भी लगता कि काम करने का मेरा तरीका कुछ अलग है। आंकड़ो से मुझे अभी तक बेपनाह प्यार हैं क्योंकि ये आंकड़े ही है जो किसी की सफलता असफलता की पोल खोलती है। हालांकि अब नेता नौकरशाह इसको लेकर काफी सजग और सतर्क भी हो गए हैं मगर आंकडों की जुबानी रेस में ज्यादातर खेलबाजों की गाड़ी पटरी से उतर ही जाती है। संतो,जी र मेरा प्यार और नेह का नाता जगजाहिर होने की बजाय लगातार फोन र कैंटीन तक ही देखा जाता। हम आपस में क्या गूफ्तगू करते यह भी हमारे बीच में ही रहता।

एक वाक्या सुनादूं कि जब वे मयूरविहार फेज टू में रहते थे तो मैं अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पर्व में मिठाई का एक पैकेट लेकर खोजते खोजते सुबह उनके घर पर जा पहुंचा। । घर के बाहर दालानव में मां बैठी थी। मैने उनसे पूछा क्या आप संतो,जी की मां है ? मेरे सवाल पर चकित नेत्रों से मुझे देखते हुए अपने अंचल की लोक भाषा में कुछ कहा जिसका सार था कि हां । मैने उनके पैर छूए और तब मेरा अगला सवालथा कि क्या वे घर पर हैं ? मां के कुछ कहने से पहले ही तब तक भीतर से उनकी आवाज आई जी हा अनामी डार्लिंगजी संतोष जी घर पर हैं आप अंदर आईए। उनकी आवाज सुनकर मां ने जाने का रास्ता बना दिया तो मैं अंदर जा पहुंचा।

मेरे हाथ में मिठाई का डिब्बा देखकर वे बोल पड़े ये क्या है ? थोडा तैश में बोले गजब करते हो छोटे भाई हो और बड़े भाई के यहां मिठाई लेकर आ गए। अरे बेशरम मिठाई खाने आना चाहिए ना कि लाना। मैं भी थोडा झेंपते हुए कहा कि आज दीवाली था और आप दिल्ली के पहले पत्रकार हो जिसके घर मैं आया हूं। तो बोले- मुझे ही आखिरी पत्रकार भी रखना जब किसी पत्रकार के यहां जाओगे मिठाई लेकर तो वह तेरी ईमानदारी पर संदेह करेगा कि घर में मिठाई के कुछ डिब्बे आ गए तो लगे पत्रकारों में बॉटकर अपनी चौधराहट दिखाने। कुछ देर के बाद जब मैं जाने लगा तो मुझे मिठाई के दो डिब्बे तमाया एक तो मेरी तरफ से तुमको और दूसरा डिब्बा जो लाया था उसके एवज में यह दूसरा डिब्बा।

मैं दोनों डिब्बे थामकर जोर से हंसने लगा,तो वे थोडा असहज से होते हे सवाल किया कि क्या हुआ? मैंने कहा कि अब चौधराहट मैं नहीं आप दिखा रहे हैं। फिर हमलोग काफी देर तक खिलखिलाते रहे और अंत में फिर चाय पीकर घर से बाहर निकला। दीपावली या होली पर जब कभी शराब की बोतल या कभी कभी बंद पेटी में दर्जनों बोतल शराब की घर पहुंचा देने पर ही मैं अपने उन मित्रों को याद करता जिनके ले यह एक अनमोल उपहार होती। बाद में कई विधायकों को फोन करके दोबारा कभी भी शराब ना भेजने का आग्रह करना पड़ता ताकि मुझे से कपाने के लिए परिश्रम ना करना पड़े।

इसी तरह 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार की एक प्रेसवार्ता में मैं संतोषजी के साथ ही था। मगर सज्जन कुमार के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था । दोनों आपस में कान लगाकर सलाह मशविरा कर रहे थे। बातचीत के दौरान भी अक्सर उनकी कनफुसियाहट जारी रही। प्रेस कांफ्रेस खत्म होने के बाद मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तालकटोरा रोड वाले दफ्तर के बाहर खडा ही था कि सज्जन कुमार के उसी मोटे चमच्चे पर मेरी नजर गयी। तीसरी दफा अंदर से निकल कर अपनी गाड़ी तक जाना और लौटने की कसरता के बीच मैने हाथ जोडते हुए अभिवादन के साथ ही पकड़ लिया। माफ करेंगे सर मैं आपको पहचाना नहीं?

दैनिक जारगण के रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र सिंह मेरे साथ था। मैने अपना और ज्ञानेन्द्र का परिचय दिया तो वो बोल पडा अरे मैं गोस्वामी एचटी से । मगर इस क्षणिक परिचय से मैं उनको पहचान नहीं सका। तब जाकर हिन्दुस्तान के चीफ रिपोर्टर रमाकांत गोस्वामी का खुलासा हुआ। मैने कहा कि सर आप मैं तो सज्जन का कोई पावर वाला चमच्चा मान रहा था। मेरे यह कहने पर वे झेंप से गए मगर तभी उन्होने हाथ में लिए अंडे पकौडे और निरामिष नाश्ते को दिखाकर पूछा कुछ लोगे ? मैने उनसे पूछा कि क्या आप लेते है ? तो वे एक अंहकार भाव से बोले मैं तो पंडित हूं ? तब मैंने तुरंत पलटवार किया मैं तो महापंडित हूं इसको छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे बुरी तरह शर्मसार हो उठे। मगर कभी दफ्तर में आकर मिलने का न्यौता देकर अपनी जान बचाई। मैने इस घटना को संतोषजी को सुनाया तो मेरी हिम्मत की दाद दी। हंसते हे कहा की ठीक किय़ा जो लोग पत्रकार होकर चमच्चा बन जाने में ज्यादा गौरव मानते हैं उनके साथ इस तरह का बर्ताव जरूरी है।

शांतभाव से एक प्यार लगाव भरा हमारा रिश्ता चल रहा था कि एकाएक पता लगा कि वे अब दैनिक जागरण में चले गए. इस खबर पर ज्यादा भाव ना देकर मैं एक बार अपने भारतीय जनसंचार संस्थान काल वाले मित्र उपेन्द्र पांडेय से मिलने जागरण पहुंचा तो संयोग से वहीं पर संतोषजी से मुलाकात हुई। जागरण के कुछ स्पेशल पेज में आए व्यापक परिवर्तनों पर मैने उपेन्द्र से तारीफ की तो पता चला कि आजकल इसे संतोषजी ही देखरहे हैं। तब मैंने पूरे उल्लास के साथ उनके काम करने के अंदाज पर सार्थक प्रतिक्रिया दी। मैंने यह महसूस किया कि वे हमेशा मेरी बातों या सुझावों को ध्यान से लेते थे। मैने कहा भी कि आप आए हैं तो भगवती जागरण में धुंवा तो प्रज्जवलित होनी ही चाहिए। मेरी बातों को सुनकर संतोषजी ने फिर कहा अनामी तेरी राय विचारों का मैं बड़ा कद्र करता हूं क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुतों से अलग होता है। यह सुनकर मैंने अपना सिर इनके समक्ष झुका लिया तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने कहा तेरी यही विन्रमता ही तेरा सबसे बड़ा औजार है। लेखन में एकदम कातिल और व्यक्तिगत तौर पर एकदम सादा भोला चेहरा। अपनी तारीफ की बातें सुनकर मैं मारे शरम के धरती में गड़ा जा रहा था।

जागऱण छोड़कर उपेन्द्र के साथ चंड़ीगढ बतौर संपादक दैनिक ट्रिब्यून में चले गए। 1990-91 में लेखन के आंधी तूफानी दौर में कई फीचर एजेंसियों के मार्फत ट्रिब्यून में मेरी दर्जनों रपट लेख और फीचर छप चुके थे। 193 में मैं जब चंडीगढ़ एक रिपोर्ट के सिलसिसे में गया तो उस समय के ट्रिब्यून संपादक विजय सहगल जी से मिला। परिचय बताने पर वे एकदम चौंक से गए। बेसाख्ता उन्होंने कहा अरे अनामी मैं तो अभी तक अनामी को 40-45 साल का समझ रहा था. आप तो बहुत सारे प्रसंगों पर रोचक लिखते हैं। सहगल जी की बातें सुनकर मैं भी हंसने लगा। लगभग यही प्रतिक्रिया थी पहले चौथी दुनिया और बाद में राष्ट्रीय सहारा के पटना ब्यूरो प्रमुख परशुराम शर्मा की। 1995 में एक दिन नोएडा स्थित सहारा दफ्तर में मिल गए। परिचय होने पर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया- अरे बाप रे बाप,  कितना लिखता है तू। मैं तो उम्रदराज होने की सोच रहा था पर तू तो एकदम बच्चा निकला। दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह बरकरार है।

कभी कभी मैं लिखने की रफ्तार तथा छपने की बारिश पर सोचता हूं तो अब मैं खुद चौंक जाता हूं। पहले लगता था कि मेरे हाथ में सरस्वती का वास हो। लंबा लिखना मेरा रोग था। कम शब्दों में लिखना कठिन होता था। बस कलम उठाया तो नदियां बह चलीं वाली हालत थी। पर अब लगता है मेरे लेखन का खुमार ही पूरी तरह उतर-सा गया हो। अब तो लिखने से पहले उसकी तैयारी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर लगता है मानो लिखना संभव हो पाता है। मुझे कई बार चंडीगढ भी बुलाया पर मैं जाकर मिल ना सका। उपेन्द्र पांडेय ने मुझे दिल्ली का भी फोन नंबर दिया और कई बार बताया भी कि संतोष, अभी दिल्ली में ही हैं, मगर मैं ना मिल सका और ना ही बातचीत ही हो सकी। अभी पिछले ही माह उपेन्द्र ने फोन करके कहा कि अब माफी नहीं मिलेगी, तुम चंडीगढ़ में आओ, बहुत सारे मित्र तुमसे मिलने के लिए बेताब हैं।

मैं भी अप्रैल में दो तीन दिन के ले जाना चाह रहा था। इसी बहाने अपनी मीरा मां और रमेश गौतम पापा समेत अजय गौतम और छोटे भाई के साथ एक प्यारी सी बहन से भी मिलता। कभी हजारीबाग में रहकर धूम मचाने वाले ज्योतिषी पंडित ज्ञानेश भारद्वाज की भी आजकल चंडीगढ में तूती बोल रही है. संतोष जी के साथ एक पूरे दिन रहने और संपादक के काम काज और तमाम बातों पर चर्चा करने के लिए मैं अभी मानसिक तौर पर खुद को तैयार ही कर रहा था कि एक रोज रात 11 बजे एकाएक फेसबुक पर भडास4मीडिया में संतोष तिवारी के न रहने की खबर देखकर सन्न रह गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे रूठ गए हों मुझसे। कोई उलाहना दे रहे हों कि साले दो साल से बुला रहा हूं तो तेरे को फुर्सत नहीं थी तो ठीक है अब तू चंडीगढ़ आ तो सही पर अब मेरे पास भी तुमसे मिलने का समय नहीं।

मैं इस लेख को देर रात तक जागकर कल ही लिख देना चाह रहा था पर मेरे सामने संतोषजी इस कदर मानों आकर बैठ गए हों कि मेरे लिए उनकी यादों से निकलना और शब्द देना संभव नहीं हो पाया। और अंतत: पौने एक बजे रात को मैंने अपना कम्प्यूटर बंद दिया। आज सुबह से ही मेरे भीतर संतोषजी समाहित से हैं। लगता है मानो वे मेरे लेख को देख रहे हों और जल्दी जल्दी लिखने को उकसा रहे हों। आमतौर पर मेरे नयन जल्दी सजल नहीं होते मगर हिन्दी पत्रकारिता ने एक सुयोग्य उत्साही संपादक को खो दिया है। अपने सहकर्मियों को अपने परिवार का सदस्य सा मानकर प्यार और स्नेह देने वाले दिल्ली में कितने लोग रह गए है? उपेन्द्र पांडेय के लाख कहने पर भी अब तो फिलहाल चंडीगढ जाने का उत्साह ही नरम पड़ गया। किस मुंह से जाउं या किसके लिए? फिलहाल तो संतोषजी की अनुपस्थिति / गैरमौजूदगी ही मेरे को काट रही है. मुझे बारबार अनामी डार्लिंग की ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि दिल्ली जैसे शहर में संतोषजी के अलावा और कौन दूसरा हो सकता है जो अनामी डार्लिंग कहकर अपना प्यार स्नेह और वात्सल्य दिखला सके।

और अंत में, माफ करेंगे प्रदीप संगम जी और ओम प्रकाश तपस जी। आलोक तोमर भैय्या पर तो एक लेख लिखकर मैं अपना प्यार तकरार इजहार कर चुका हूं। मगर आप दोनों पर अब तक ना लिखने का कर्ज बाकी है। पूरा एक लेख आप लोगों पर हो, यह मेरा प्रयास होगा। फिलहाल तो इस मौके पर केवल कुछ यादों की झांकी। संगम जी से मैं सहारनपुर से जुडा था। जिंदगी में बतौर वेतन कर्मी यह पहली नौकरी थी। शहर अनजाना और लोग पराय़े। मगर डा. रवीन्द्र अग्रवाल और प्रदीप संगम ने मुझे एक सप्ताह के अंदर शहर की तमाम बारीक जानकारियों से अवगत कराया। संगम जी के घर के पास में ही मैं भी किराये पर रहता था तो सुबह की चाय के साथ देर रात तक संगम क्लास जारी रहता। भाभी का व्यावहार स्नेहिल और मिलनसार स्वभाव था। इससे मेरे मन के भीतर की लज्जा खत्म हो गई और संगम जी का घर एक तरह से हमारे लिए जब मन चाहा चले गए वाला अपना घर हो गया था। बाद में संगमजी दिल्ली हिन्दुस्तान में आए तो 1988 की बहुत सारी यादें सजीव हो गयी। हम लोग कनाट प्लेस में अक्सर साथ रहते। मगर सपरिवार संगम जी हिमाचल घूमने क्या गए कि पहाड की वादियों में ही एकाएक हमलोगों को अलविदा बोल गए।

यह मेरे लिए भी एक सदमा था। तभी नवभारत टाईम्स में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तपस जी एकाएक हमारे बीच से चले गए। बात 1994 की है जब मैंने दिल्ली के दो गांवों पर एक स्टोरी की. दिल्ली और साक्षरता अभियान को शर्मसार करने वाले दो गांव यमुना नदी के मुहाने पर है। मैं जहांगीरपुरी के निर्दलीय विधायक कालू भैय्या को तीन किलोमीटर तक पैदल लेकर इस गांव में पहुंचा और मुस्लिम बहुल इस गांव की बदहाली पर मार्मिक रपट की। राष्ट्रीय सहारा में खबर तो पहले छपी मगर हमारे डेस्क के महामहिमों के चलते यह खबर पहले पेज पर ना लेकर भीतर के किसी पेज में लगा दी गयी। अगले दिन मैंने काफी नाराजगी भी दिखाई मगर चिड़िया चुग गयी खेत वाली हालत थी।

खबर छपकर भी मर गयी थी, मगर एक सप्ताह के भीतर ही नवभारत टाईम्स में यही खबर छपी- ‘दिल्ली के दो अंगूठा टेक गांव’। खबर छपने पर दिल्ली में नौकरशाही स्तर पर हाहाकार मचा। सरकार सजग हुई और एक माह के अंदर ज्ञान पुर्नवास साक्षरता आदि की व्यवस्था करा दी गयी। मैने खबर की चोरी पर तपस जी से फोन पर आपत्ति की. मैने कहा कि आपको खबर ही करनी थी तो एक बार तो मुझसे बात कर लेते मैं आपको इतने टिप्स देता कि आप और भी कई स्टोरी बना सकते थे। मैं तो फिर से इस प्रसंग पर अब लिखूंगा ही नहीं क्योंकि पेपर वालों को इसकी समझ ही नहीं है। मेरी बातों पर नाराज होने की बजाय तपस जी ने खेद जताया और मिलने को कहा। जब हम मिले तो जिस प्यार उमंग उत्साह और आत्मीयता से मुझसे मिले कि मेरे मन का सारा मैल ही धुल गया। हम लोग करीब 16-17 साल तक प्यार और स्नेह के बंधन में रहे। इस दौरान बहुत सारी बातें हुई और वे सदैव मुझे अपने प्यार और स्नेह से अभिभूत रखा। मगर एक दिन एकाएक सुबह सुबह तपस जी के भी रूठने की खबर मिली. हर अपना वो वो पत्रकार लगातार मेरी नजरों से ओझल हो रहे हैं जिसको मैं बहुत पसंद करता हूं। हे भगवान मुझे इस दुर्भाग्य से बचाओ प्रभू।

लेखक अनामी शरण बबल आईआईएमसी के पासआउट हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क asb.deo@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार और संपादक संतोष तिवारी का निधन

Shambhu Nath Shukla : आज दोपहर रोहतक से पुरषोत्तम शर्मा का फोन आया और उसने जब बताया कि भाई साहब संतोष तिवारी जी नहीं रहे तो शॉक्ड रह गया। जेहन में 41 साल पहले का 1976 यूं घूम गया जैसे कल की ही बात हो। हम तब सीपीआई एमएल के सिम्पैथाइजर थे। हम यानी मैं और दिनेशचंद्र वर्मा। हमने तब श्रीपत राय की कहानी पत्रिका में एक कहानी पढ़ी जिसके लेखक का पता दिनेश के पड़ोस वाले घर का था। वह लेखक थे संतोष तिवारी। हम उस पते पर घर पहुंचे। संतोष के पिताजी ने दरवाजा खोला तो हमने पूछा कि तिवारी जी हैं?

संतोष तिवारी

वे बोले मैं ही हूं बताइए। हमने उनसे कहानी पर बातचीत शुरू की तो वे कुछ उखड़े-उखड़े से लगे और बोले आप संतोष की बात कर रहे हो? हमने कहा जी। तब उन्होंने अपने लड़के संतोष को बुलवाया। जो हाफ पैंट पहने हमारे सामने आ खड़ा हुआ। करीब 16 साल के इस किशोर को देखकर हमें लगा कि हम गलत पते पर आ गए हैं। इस बालक से क्या बात की जाए और हम चले आए। दो दिन के बाद संतोष हमारे घर आ धमका और शुरू हो गई बातचीत जो अब तक चलती रही। संतोष खूब बातूनी था और यारों का यार। वह न तो कम्युनिस्ट था न समाजवादी न कांग्रेसी न जनसंघी। वह एक सामान्य जन की तरह आस्तिक था और एक सामान्य शहरी की तरह माडर्न।

शराब से उसे परहेज नहीं था बल्कि खूब पीता था अलबत्ता अंडा तक स्पर्श नहीं करता था। राजनीति से उसे परहेज था और मुझसे कह रखा था कि आप हमारे ट्रिब्यून में कालम तो हर सप्ताह लिखो पर राजनीतिक कतई नहीं। अब मुझे अपना कालम चलाए रखने के लिए ललित निबंध लिखने पड़े एकदम दांत, नाक, कान सरीखे। मगर इससे एक बात हुई कि मेरी ललित निबंधों पर पकड़ बनी और कई आईएएस जब बताते हैं कि हम आपके निबंध पढ़कर पास हुए तो लगता है कि मैं भी पास हो गया। ऐसे संतोष तिवारी आज विदा ले गए तो शॉक्ड तो होना ही था।

दो साल से मैने अपने कई अजीज और करीबी खो दिए। पहले अपने दामाद हर्षवर्धन पांडेय को खोया, फिर अग्रज ब्रजेंद्र गुरू को। इसके बाद अनुज सुरेंद्र त्रिवेदी को और आज अपने अजीज सखा संतोष तिवारी को। जब से सुना तब से न विषाद प्रकट कर पा रहा हूं न दुख। अब कुछ चित्त स्थिर हुआ तब यह पोस्ट लिख सका।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

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पिंक सिटी प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष विश्वास कुमार का निधन

जयपुर से खबर है कि पिंक सिटी प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष विश्वास कुमार जी का आज सुबह 9:30 बजे निधन हो गया. उनकी शव यात्रा उनके गांधी नगर स्थित आवास से 2:00 बजे रवाना हुई और लाल कोठी श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया. इस मौके पर शहर के गणमान्य लोग मौजूद थे.

IFWJ mourns Vishwas Sharma

The Indian Federation of Working Journalists (I.F.W.J.) deeply mourns the sad death this morning of its leader Com.Vishwas Kumar Sharma, former chief reporter of the Rajasthan Patrika and the daily Ambar in Jaipur. He was suffering from cancer. The I.F.W.J. President K Vikram Rao, its Secretary General Com. H.B. Madan Gowda (Karnataka) and its Secretary (Headquarters) New Delhi Com. Vipin Dhuliya recalled the tremendous services of Com.

Vishwas Sharma to the cause of working journalists. He was elected thrice the general secretary of the Rajasthan Working Journalists Union. He led RWJU delegations to IFWJ conferences many times. Com.Vishwas had represented the IFWJ in international conference in Prague(Czech Republic) and in Bratislava(Slovakia). His importance as a journalist was realized before his visit abroad. His passport did not have the official stamp of “immigration check not required”.

This meant that no visa could be issued. He landed in New Delhi on a public holiday. But then the foreign minister, Kunwar Natwar Singh, had got the office of the Regional Passport Officer opened and got Vishwas Sharma’s travel documents stamped. The IFWJ Working Committee meeting scheduled to be held in Andhra Pradesh next month will have its mandap named after Com.Vishwas Kumar Sharma, announced the Secretary

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नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्र के पिता अवध नारायण मिश्रा का निधन

नेशनल वायस न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्र के पिता अवध नारायण मिश्र का बीते दिनों निधन हो गया. उनके निधन पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं, पत्रकारों, गणमान्य लोगों ने शोक व्यक्त किया है. अवध नारायण मिश्र भी पत्रकारिता के पेशे से लम्बे समय तक जुड़े रहे हैं और अपने लेखन के ज़रिये उन्होंने समाज की तमाम विसंगतियों के खिलाफ संघर्ष किया. उनका कौशाम्बी के कड़ा घाट पर बड़ी संख्या में संभ्रात लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया. मुखाग्नि उनके बड़े शैलेश मिश्र ने दी.

अवध नारायण मिश्रा के निधन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गहरा शोक व्यक्त किया. उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की. इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के पदाधिकारियों ने भी अवध नारायण मिश्र के निधन पर अपनी संवेदना प्रकट की. एक बयान में कहा गया है- ”अवध नारायण मिश्र ने उस दौर में कलम के ज़रिये समाज की सेवा की जब सूचना के इतने साधन मौजूद नहीं थे. उनके निधन से पत्रकारिता और साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है. ईश्वर उनके परिवार को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे.”

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हिंदुस्तान, मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह का सड़क हादसे में निधन

Sami Ahmad : भाई विजय सिंह कल रात सड़क हादसे में हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। ज़िंदादिल इंसान। हौसला हमेशा साथ। जब मोतिहारी के ‘तास’ की बात निकलती फ़ौरन दावत देते, आइये ना भैया। मैं भी भैया ही कहता। लेकिन ऐसी खबर पर अब मैं चौंकता नहीं क्योंकि मुज़फ्फरपुर के साथ यह बदकिस्मती बहुत पुरानी हो गयी है। एक तो इस पेशे की मजबूरी है, देर रात लौटने की। जो बचे बस उनकी किस्मत है वरना अपने इलाके में कौन कब सड़क हादसे का शिकार हो जाए और किस पर कब बिजली का तार गिर जाए, कहा नहीं जा सकता। वैसे भी हमारे समाज में ऐसी मौतों को कभी गम्भीरता से नहीं लिया जाता।

Ravi Prakash : यकीन नहीं हो रहा। दुखी हूं। पिछली बार जब हम मिले, आप कितने खुश थे। मोतिहारी से मुजफ्फरपुर की ट्रेन यात्रा हमारी आखिरी मुलाकात बन जाएगी, ऐसा अंदाजा नहीं था। आपसे हर मुलाकात प्रेरणा देती थी। आप कितने इनोवेटिव थे। अपडेट रहते थे। पिछली दफा भी हमनें खूब बातें की थीं। नयी योजनाओं पर। अफसोस, अब आपसे मुलाकात नहीं होगी। प्रभात खबर के सिलिगुड़ी संस्करण में रहते हुए आपने CPM के घोषणा पत्र में गड़बड़ी की बहुचर्चित स्टोरी की।

हिंदुस्तान में हाल ही में आपने नेपाल पर शानदार रिपोर्ट लिखी। दैनिक जागरण में रहते हुए भी आपकी कलम ने अपनी ठसक बनाए रखी। आपकी कई कहानियां हमारे जेहन में है। मोतिहारी मोह नहीं होता, तो आप हमारी तरह किसी दूसरे शहर में होते। और बेहतर जिंदगी जीते। आपको मोतिहारी से मुहब्बत थी। वरना, रोज सुबह ट्रेन से मुजफ्फरपुर आना और देर रात मोतिहारी वापस लौटना, हर किसी के वश की बात नहीं।

आपको सिलिगुड़ी रास नहीं आया। मेरे जोर देने के बावजूद कई और शहरों के बेहतरीन आफर आपने नहीं स्वीकारे। आपका मोतिहारी प्रेम! Vijay भैया, आप रुला कर चले गए। आपकी इतनी यादें हैं कि किताब लिख दूं। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति बख्शें और परिवार को इस दुख से उबरने की शक्ति। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। प्रणाम। सलाम। आप हमारी यादों में जिंदा रहेंगे। हमेशा।

मोतिहारी से बाहर के मेरे दोस्त, जो विजय सिंह को नहीं जानते, उनके लिए- विजय सिंह चंपारण के वरिष्ठ पत्रकार थे। इन दिनों हिंदुस्तान अखबार के मुजफ्फरपुर संस्करण में वरिष्ठ पद पर थे। आज अल सुबह रात के करीब 1 बजे मुजफ्फरपुर में हुई एक सड़क दुर्घटना में उनका स्वर्गवास हो गया। इससे पूर्व वे प्रभात खबर, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स और समाचार एजेंसी भाषा के साथ भी उल्लेखनीय पारियां खेल चुके थे।

समी अहमद और रवि प्रकाश की एफबी वॉल से.

यूपी में भी सड़क हादसे में एक प्रतिभाशाली पत्रकार का निधन हो गया… पढ़ें पूरी खबर…

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किसी को यकीन नहीं हो रहा युवा पत्रकार राजुल निगम अब नहीं रहे

स्व. पत्रकार राजुल निगम की विभिन्न तस्वीरें…

सुल्तानपुर के पत्रकार जगत के महानायक थे राजुल निगम… महान व्यक्तित्व के धनी पत्रकार थे राहुल निगम। इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में सराहनीय कार्य तो किया ही, पत्रकारिता की लाज बचाने के लिए अतुलनीय कार्य किया। सुल्तानपुर का पत्रकार जगत आज अपने एक महानायक राजुल निगम को खो कर एक खालीपन अधूरेपन अपूर्णता का एहसास कर रहा है। राजुल निगम जी न्यूज सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में कार्यरत रहे और अपने कार्यों की बदौलत समाज में अपनी एक प्रतिष्ठित जगह बनायी, साथ ही पत्रकारिता की शुचिता और पत्रकारों के सम्मान के लिए सदैव आगे बढ़कर लड़ाई लड़ी।

पत्रकार हित की लड़ाई में जब पत्रकार जे.डे. की हत्या के विरोध में धरना चल रहा था, उस समय छायाकार राज बहादुर यादव की पुलिस ने बर्बर पिटाई कर दी। इसके विरोध में राजुल निगम जी ने आगे बढ़कर सभी पत्रकारों को एकजुट कर पुलिस अधीक्षक सुल्तानपुर का घेराव किया और न्याय दिलाकर ही शान्त हुए। बहरहाल वह एक अलग बात थी कि राजुल निगम जी के इस आन्दोलन को किसी ने उनका निजी स्वार्थ बताकर भड़ास4मीडिया पर खबर चलवा दिया था, ‘‘सुल्तानपुर में अपना-अपना हित साधाने के लिए पत्रकार चला रहे आन्दोलन’’ शार्षक से।

बाद में राजुल निगम ने अपने तार्किक पत्र के माध्यम से भड़ास4मीडिया के सम्पादक यशवंतजी को असलियत का आइना दिखाकर उनकी भूल का एहसास कराया था और अपना पत्र छापने के लिए प्रेरित किया। राजुल ने इस पत्र में लिखा- ‘‘यशवंत जी आपकी खुद की लड़ाई जो सिस्टम से चल रही है, कम से कम हम उसे निजी स्वार्थों की नहीं मान रहे हैं। अगर आपकी लड़ाई निजी स्वार्थों की है तो इस लड़ाई को भी आप उसी श्रेणी में मान सकते हैं।’’

किसी को यकीन नहीं हो रहा कि राजुल नहीं अब हमारे बीच नहीं रहे। राजुल निगम जी का व्यक्तित्व, कार्य, जुनून आज हमारे लिए प्रेरणादायक है। वे हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे। उनका यशस्वी कृत्य पत्रकारिता जगत सदैव स्मरण रखेगा। पत्रकार जगत ने वास्तव में अपना एक महानायक खो दिया जिसकी भरपाई सुल्तानपुर व अमेठी के लिए फिलहाल संभव नहीं दिख रहा।

सुरजीत यादव
पत्रकार
अमेठी
मो.- 9005909448
surjeetcrimenews@gmail.com

राजुल निगम की मृत्यु के कारणों को जानने के लिए नीचे क्लिक करें…

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भड़ास संपादक यशवंत के बड़े पिता जी श्रीकृष्ण सिंह का निधन

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के बड़े पिताजी श्रीकृष्ण सिंह का कल उनके जिले गाजीपुर स्थित पैतृक गांव में देहांत हो गया. उनकी उम्र 85 साल से ज्यादा थी. उन्हें कोई रोग / शोक नहीं था. उनका निधन हार्ट अटैक के कारण हुआ. वे अपने पीछे चार बेटे, बहुओं और नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. यशवंत कई रोज से अपने गांव में ही थे. सो, उन्होंने बड़े पिता जी के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में शिरकत किया. यशवंत ने फेसबुक पर अपने बड़े पिताजी को लेकर एक संस्मरणात्मक राइटअप लिखा है, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

Yashwant Singh : बड़े पिता जी यानि श्रीकृष्ण सिंह की उम्र 85 साल से ज्यादा थी. वे खानदान में सबसे अलग थे. बेहद डेमोक्रेटिक. सबके प्रति साफ्ट रहे. कभी कड़क स्वभाव में उन्हें देखा नहीं. बच्चा हो या बुजुर्ग, हर कोई उनसे हर तरह की बात कर लेता और वह सबकी मजे में सुनते.

गांव में कोई उनका विरोधी नहीं था और वे खुद किसी के विरोधी नहीं बने. बेहद पाजिटिव व्यक्तित्व. किसी से कोई आकांक्षा नहीं रखे कभी, अपने बेटों से भी नहीं. जो कुछ कर दे तो ठीक, न करे तो ठीक. उनकी अपनी दुनिया थी. वे बाकी परिजनों / सवर्णों की तरह फ्यूडल कतई नहीं थे.

लंबी उम्र हो जाने के कारण सेहत को लेकर सतर्क रहा करते. अपना काम काज खुद करते और टहलने में कोताही न बरतते. उनके जीते जी उनसे उमर में छोटे कई सारे लोग गुजर गए. वे तब यही कह करते- अरे वह तो मुझसे छोटे थे, बड़ी जल्दी चले गए.

चार रोज पहले वह बुढ़ापे के हालात का वर्णन अनायास करने लगे. वह बताने लगे- ”चाहे जो कहो, बुढ़ापे में तकलीफ तो है. खड़े होने पर तकलीफ, बैठो तो तकलीफ. न उठो बैठो तो तकलीफ.” वे आगे हंसते हुए बोले- ”ऐसी तकलीफों के कारण ही लोग मर जाना ज्यादा पसंद करते हैं.”

यह बात उनने मुस्कराते हुए कही और मैं बिना गहराई में गए उनका साथ देते हुए हंस-मुस्करा पड़ा. मुझे लगा वो ये बात बस बतियाने के लिए कुछ कहने सुनने हेतु कह बता रहे हैं. मैंने इसका कोई दूसरा या सांकेतिक मतलब नहीं निकाला. पर मैं गलत था. वह शायद अपने तन के जर्जर होते जाने को लेकर यह बात ज्यादा संवेदनशील मन:स्थिति में कह रहे थे. यानि वे मौत के लिए तैयार थे, शायद मौत को आमंत्रित कर रहे थे.

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बड़े पिताजी से हम लोग कुछ भी कह / मांग लेते थे. वे जानते हैं कि मैं कभी-कभार सुर्ती यानि तंबाकू खा लेता हूं. इसलिए वह मुझे देखते तो सुर्ती में चूना मिलाकर हथेली में रगड़ने लगते. चार रोज पहले वह सुर्ती बना रहे थे, तभी उनके पीछे एक बिल्ली ने म्याऊं कहा. मैंने कैमरा आन कर बिल्ली पर फोकस किया और बिल्ली-सी आवाज निकालने की कोशिश करने लगा.

बिल्ली जाल में फंसने लगी. उसे मेरी बिल्ली-सी आवाज परिचित सी जान पड़ने लगी. उसने दोनों कान खड़े कर लिए और आंख फाड़कर देखना शुरू किया. बिल्ली बड़े पिताजी के पीछे थी. बड़े पिता जी समझ ही नहीं पाये कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं, क्यों बिल्ली की आवाज निकाल रहा हूं. उन्हें धीरे से बताया कि पीछे बिल्ली है, उसको रिकार्ड कर रहा हूं.

मैंने कैमरे के पीछे मुंह छिपा रखा था और बिल्ली अपनी आवाज की नकल करने वाले की शकल देखना चाह रही थी, आवाज का केंद्र तलाश रही थी. वह चौकन्नी होकर हौले से करीब आई. इसी दरम्यान बड़े पिताजी ने तंबाकू रगड़ कर मेरी हथेली पर रख दिया.

यह अंतिम वीडियो है जिसमें बड़े पिताजी दिख रहे हैं, शुरुआत में सशरीर, बाद में उठकर आते हुए और मुझे तंबाकू देते हुए. मैं लीन था बिल्ली से संवाद करने की कोशिश में.

संबंधित वीडियो का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=53nqm9hgNL8

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बड़े पिता जी का दो बार पहले भी हार्ट अटैक हो चुका था. तीसरी बार यह अटैक जानलेवा साबित हुआ. उनकी मृत्यु के बाद गांव-घर के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह अच्छी मौत है, बिना किसी से कुछ सेवा टहल कराए, चलते-फिरते चले गए. थोड़ी ही देर में देखा कि बैंड बाजा मंगा लिया गया. लोहार भाई बांस छील काट कर अंतिम यात्रा के लिए तैयारी करने लगे. गांव के कई बड़े बुजुर्ग उनके इर्दगिर्द खड़े हो गए. हंसी मजाक का दौर चलने लगा.

लोहार ने हंसते हुए कहा कि दो चार इकट्ठे बना दे रहा हूं, कई लोग लाइन में लगे दिख रहे हैं, ये कई बुजुर्ग बस आजकल-आजकल हुए पड़े हैं, जाने कब टपक जाएं. लोहार का इशारा लाठी टेककर खड़े एक बुजुर्ग ठाकुर साहब की तरफ था, जो खुद हंसोड़ शख्स हैं. लोग उनकी तरफ देख ठठा कर हंसने लगे तो उनने जवाब में नहले पर दहला मारा, अभी तो गुरु कइयों को श्मशान पहुंचाउंगा, उसके बाद सोचूंगा.

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बड़े पिता जी की शव यात्रा गाजे बाजे के साथ शुरू हुई और नजदीकी गंगा घाट पर जाकर खत्म हुई. उनके शव को गंगा में विसर्जित किया गया. ऐसी मान्यता है कि किसी संत ने कई गांवों के लोगों को शवों को गंगा में विसर्जित करने को कहा था, तबसे यह परंपरा चली आ रही है. मुझे यह इसलिए ठीक लगता है क्योंकि नेचर का फूड चेन मेनटेन रहता है. हम मछली खाते हैं और जल के जीवों को खाने के लिए हम खुद को पेश कर देते हैं. बड़े पिता जी शाकाहारी थे और दूध उनका सर्वप्रिय सदाबहार आहार थे. वे किसिम किसिम के शाकाहारी खाने के शौकीन थे.

बड़े पिताजी के चले जाने के बाद पूरा गांव उनकी किस्मत की सराहना करने में जुटा रहा, मौत हो तो ऐसी, पूरा जीवन जिया और खटिया पर लेटकर भोगने की जगह हंसते खेलते टहलते चले गए. मैंने महसूस किया कि गांव के लोग शहरियों से ज्यादा प्रैक्टिकल होते हैं, जीवन-मृत्यु को लेकर. वह जीवन को जीवंतता से जीने की समझ तो रखते ही हैं और मौत को एक अनिवार्य साथी मानकर उसके प्रति वेलकम भाव भी रखते हैं. गांववालों के रुख / भाव को देखकर मुझे अच्छा लगा. मैंने गहरे उतरकर काफी कुछ महसूस किया.

मेरा कर्मकांड में भरोसा नहीं है इसलिए शव विसर्जन के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया. गांव और परिवार के लोग तेरह दिन तक मृत्यु संस्कार में लीन रहेंगे, सुबह नहाने से लेकर सिर के बाल उतरवाने और तेरहवें दिन बड़े पैमाने पर सामूहिक भोज करने कराने में लगे रहेंगे. मेरे खयाल से ये सब पैसे की बर्बादी है. लेकिन गांव वाले शायद इन्हीं कर्मकांडों के जरिए खुद की सामूहिकता को जी पाते हैं और दुखों सुखों को एक दूसरे से शेयर कर पाते हैं, जो कि अच्छा ही है.

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कल पूरा दिन जीवन-मौत, शव, शोक, बैंड-बाजा, अंतिम संस्कार, गंगा विसर्जन आदि से भरा रहा. आज देर सुबह सोकर उठा तो पूरा गांव और खेत-खलिहान कोहरे से ढंके मिले, चंद कदम आगे तक का राह नहीं सूझ रहा. इस रहस्यमय मौसम के संदेश को समझने के वास्ते पूरा एक चक्कर लगाया, गांव के बगीचों और खेतों का, मेड़ दर मेड़ और पेड़ दर पेड़. मुझे हर जगह बिझी मिली ओस की बूंदों में बड़े पिताजी दिखाई दे रहे थे, चमकते-खिलखिलाते.

दरअसल जीवन में दुख, ग़म, खुशी, उत्सव, जीवन, मौत… ऐसा कुछ अलग-थलग, मोनोलिथिक-सा नहीं होता… एक प्रक्रिया है जो संचालित होती रहती है और हम सब अपने-अपने मन मिजाज ज्ञान संस्कार चेतना समझदारी सोच के हिसाब से इसे कनसीव कर अलग अलग नाम दे दिया करते हैं..

नहा खा कर दोपहर बाद जब मैं शहर यानि जिला मुख्यालय के फोर जी वाले इलाके में आया तो मोबाइल का नेट आन किया. देखा सिंगिंग से संबंधित एक मोबाइल एप्प के बारे में एक संदेश ह्वाट्सएप में आया हुआ है. इसे डाउनलोड किया, इंस्टाल किया, और आजमाने में जुट गया, आप भी रिजल्ट देखें और कुछ क्षण गुनगुनाएं.. : https://www.youtube.com/watch?v=Tgf_9fIK5nk

ग़मगीन होना श्रद्धांजलि देना नहीं होता, गुनगुनाना असल में सच्ची श्रद्धांजलि होती है, जिसमें हम जीवन के उदात्ततम स्वरूप के लिए प्रकृति के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करने हेतु थोड़ा म्यूजिकल हो जाते हैं… लव यू आल.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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पानी और पर्यावरण के लिए लड़ने वाले संत पुरुष अनुपम मिश्र नहीं रहे

आज सुबह व्हाट्सएप पर सुप्रभात संदेशों के साथ एक दु:खद संदेश यह भी मिला कि जाने-माने पर्यावरणविद् और गांधीवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे… जिस देश में चारों तरफ पाखंड और बनावटीपन का बोलबाला हो वहां पर एक   शुद्ध खांटी और खरे अनुपम मिश्र का होना कई मायने रखता है। सोशल मीडिया से ही अधकचरी शिक्षित हो रही युवा पीढ़ी अनुुपम मिश्र को शायद ही जानती होगी। देश में आज-कल ‘फकीरी’ के भी बड़े चर्चे हैं। लाखों का सूट पहनने और दिन में चार बार डिजाइनर ड्रेस पहनने वाले भी ‘फकीर’ कहलाने लगे हैं, मगर असली फकीरी अनुपम मिश्र जैसे असल गांधीवादी ही दिखा सकते हैं। उनका अपना कोई घर तक नहीं था और वे गांधी शांति फाउंडेशन नई दिल्ली के परिसर में ही रहते थे।

आज सुबह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली, उनकी उम्र 68 वर्ष की थी। अनुपम मिश्र पिछले एक साल से कैंसर से पीडि़त थे। अब यह भी सोच और शोध का विषय है कि अनुपम मिश्र जैसे सीधे-सरल व्यक्ति को भी कैंसर जैसी बीमारी आखिर क्यों चपेट में ले लेती है..? अनुपम मिश्र का एक परिचय यह भी है कि उनके पिता स्व. भवानीप्रसाद मिश्र प्रख्यात कवि रहे हैं। मैं गीत बेचता हूं… जैसी कई उनकी कविताएँ मंचों पर काफी लोकप्रिय रही है। अनुपम मिश्र शुद्ध गांधीवादी तो रहे, वहीं पर्यावरण और पानी के लिए उन्होंने अद्भुत काम किए। दस्यु अन्मुलन आंदोलन के अलावा भाषा पर भी उन्होंने बहुत काम किया।

जल संरक्षण पर उनकी लिखी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ तो एक नायाब दस्तावेज है। इस किताब को कितनी भी बार पढ़ लो, मगर मन नहीं भरता। गर्मियों के दिनों में जब पूरा देश पानी की किल्लत महसूस करता है और उस दौरान जब कुएं, बावड़ी और तालाब याद आते हैं तब अनुपम मिश्र की ये किताब सबको याद आती है। इस किताब की लाखों प्रतियाँ बिक गईं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ, मगर इस किताब की भी कोई कमाई अनुपम मिश्र ने नहीं ली और इसका इस्तेमाल करने की अनुमति भी उन्होंने सबको दे दी। ‘हमारा पर्यावरण’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ जैसी किताबें भी उनकी खासी चर्चित रही।

‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी किताब हमारे नीति-नियंताओं के लिए आई ओपनर का काम करती है। देश के प्रमुख तालाबों और उनके निर्माण की प्रक्रिया को अत्यंत सुंदर भाषा शैली में अनुपम मिश्र ने प्रस्तुत किया है। इस किताब में इंदौर के यशवंत सागर और बिलावली तालाब तक का उल्लेख है। जिस वक्त अनुपम मिश्र ने देश में पर्यावरण पर काम शुरू किया तब सरकार में पर्यावरण नाम का कोई विभाग तक नहीं होता था। यह बात अलग है कि पर्यावरण मंत्रालय से लेकर राज्य सरकारों के प्रदूषण नियंत्रण मंडल जैसे विभागों ने भ्रष्टाचार का प्रदूषण ही अधिक फैलाया। बहरहाल, अनुपम मिश्र नहीं रहे यह खबर नि:संदेह मायूस करने वाली है। इस गांधीवादी और पर्यावरणविद और पानी के लिए लडऩे वाले असल ‘फकीर’ को विनम्र शृद्धांजलि!

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : 9827020830

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हादसे की तस्वीर लेने गये भास्कर के फोटोग्राफर की सड़क दुर्घटना में मौत

दैनिक भास्कर के फोटोग्राफर आदित्य कुमार सिंह की मौत। भीषण कोहरे में बिहार के हाजीपुर में हुए सड़क हादसे का कवरेज करने जा रहे आदित्य को मुर्गी लदे वाहन ने कुचल दिया। वे हाजीपुर ब्यूरो में कार्यरत थे। फोटो पत्रकार आदित्य कुमार सिंह को मंजन नाम से भी जाना जाता था। उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। घटना हाजीपुर में मुजफ्फरपुर जाने वाले वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या­77 पर सदर थाना क्षेत्र में एकारा गुमटी के पास हुई।

मंजन देसरी थाना क्षेत्र के खोकसा गांव के रहने वाले थे। घटना के बाद उनके परिजन और बिहार के पत्रकारों में शोक की लहर फैली है। पुलिस ने हादसे के बाद आदित्य को कुचलने वाले वाहन के चालक को गिरफ्तार कर गाड़ी को जब्त कर लिया है। वहीं, स्थानीय निवासियों ने इस घटना के विरोध में सड़क को जाम कर दिया। उधर, प्रशासन ने मृतक आदित्य के परिजनों को चार लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है।

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हिंदी और भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक विवेकी राय का निधन

वाराणसी : हिंदी और भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक विवेकी राय का आज वाराणसी में निधन हो गया. वे 93 वर्ष के थे. उन्होंने तड़के करीब 4.45 बजे अंतिम सांस ली. सांस लेने में दिक्कत की वजह से वाराणसी के निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. उन्होंने 19 नवंबर को ही अपना 93वां जन्मदिन मनाया था. वह मूल रूप से गाजीपुर के सोनवानी गांव के निवासी थे. 

उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकों की रचना की. वे ललित निबंध और कथा साहित्य के रचयिता थे. उनकी रचनाएं ग्रामीण पृष्ठभूमि का बहुत ही सुंदर चित्रण करती थी. ललित निबंध विधा में इनकी गिनती आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय की परंपरा में की जाती है. ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ और ‘फिर बैतलवा डाल पर’ इनके सबसे चर्चित निबंध संकलन हैं और ‘सोनामाटी’ उपन्यास राय का सबसे लोकप्रिय उपन्यास है.

इन्हें 2001 में महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से और 2006 में यश भारती सम्मान से सम्मानित किया गया था. डॉ. राय ने हिंदी के साथ ही भोजपुरी साहित्य जगत में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी. उन्होंने आंचलिक उपन्यासकार के रूप में ख्याति अर्जित की. उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें लिखी. विवेकी राय को मूलत: ललित निबंध, कथा साहित्य के लिए जाना जाता था.

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Remembering Devendra Upadhyay

Delhi Union of Journalists has expressed its deep shock at the passing away of its  veteran member and senior journalist. writer  Mr. Devendra Upadhyay. He was 70. He died of massive heart attack late last night (13th Nov. 2016 in Private Hospital, New Delhi). 

He was also actively associated with the number of demonstrations and movements of journalists and writers. His passing away is irreparable loss to DUJ and the other organisations he was associated for long time. He was a sitting national council member of the DUJ and leader of the journalist movement for several years.

Shri. Upadhyay belongs to a freedom fighter family. His father late Ragubar Datt Upadhyay was among the leading freedom fighter of Uttar Pradesh/Uttarakhand.

He served many years as National Chief of Bureau of leading Hindi Daily Deshbandhu. Before that he also worked in many other leading Hindi dailies like Janyug and Amrit Prabhat.

Born in Khumad village, District of Almora. Sri Upadhyay was also associated with Uttarakhand Patrakar Parishad as its President for the last many years. DUJ expresses its deepest and heartfelt condolences to the close family members, friends and well wishers.

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वरिष्ठ छायाकार हरजिंदर सिंह और पत्रकार अरविन्द श्रीवास्तव का निधन

लखनऊ : एक दुखद खबर है. वरिष्ठ छायाकार हरजिंदर सिंह का निधन हो गया है. उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट हरजिंदर सिंह के असामयिक निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है. हिन्दी दैनिक ‘आज’ से बीते कई दशकों से संबद्ध रहे हरजिंदर सिंह का हृदयगति रुकने से निधन हो गया है.

राज्य मुख्यालय पर कई दशकों से मान्यता प्राप्त छायाकार रहे हरजिंदर सिंह को श्रद्दांजिल अर्पित करते हुए समिति ने उन्हें लोकप्रिय, मिलनसार व सबके साथ सुख दुख में शरीक रहने वाला बताया है. उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने हरजिंदर सिंह के निधन को पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए उनके संतप्त परिवार के प्रति संवेदता जतायी है. दिवंगत छायाकर हरजिंदर सिंह का अंतिम संस्कार गुरुवार दोपहर ३.३० बजे भैसाकुंड शवदाह गृह पर होगा.

सगीर ए खाकसार ने सूचना दी है कि भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सिद्धार्थनगर ज़िले के बढ़नी बॉर्डर के प्रखर पत्रकार अरविंद श्रीवास्तव का निधन हो गया है. इससे बढ़नी और कृष्णानगर मे शोक की लहर दौड़ गयी है. दैनिक जागरण से जुड़े अरविंद स्थानीय लोगों में काफी लोकप्रिय थे. उनके निधन से नेपाल सीमा पर साफ सुथरी पत्रकारिता की छवि को धक्का लगा है. बहुत ही संक्षिप्त बीमारी में गोरखपुर मेडिकल कालेज में रात एक बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.

वो कबीर पंथ से जुड़े थे, इसलिए उनकी चिता को अग्नि नहीं दी गयी. उनके परिवार की इच्छा के अनुसार उनको सुपुर्द ए खाक कर दिया गया. उनकी अंतिम यात्रा में नेपाल और भारत के सीमाई इलाके के लोग भारी तादाद में शामिल हुए. इसमें पत्रकारों के अलावा ब्यापारी, नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. उनके अंतिम संस्कार में वरिष्ठ पत्रकार राकेश तिवारी, अभय बख्शी, मुस्तन सेरूल्लाह खान, विकास सिंह, विजय श्रीवास्तव, सलमान हिंदी, आज़ाद फ़ैज़ी, इरशाद अहमद, अजय गुप्ता, दिनेश पांडेय, रवि शुक्ला, सरदार हरभजन सिंह, त्रियुगी अग्रहरि, सतीश शर्मा, मोहम्मद इब्राहिम, जमाल अहमद, मुजीबुल्लाह, सगीर ए खाकसार आदि के अलावा शोहरत गढ़ विधान सभा के बसपा प्रत्याशी मोहम्मद जमील सिद्दीकी ने हिस्सा लिया। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। परिजनों को पहाड़ जैसे इस दुख को सहने की शक्ति दे। अंतिम संस्कार में शामिल सभी लोगों ने ईश्वर से यही प्रार्थना की।

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वरिष्ठ पत्रकार गिरीश निकम दिल्ली में छाए प्रदूषण की बलि चढ़ गए!

Gurdeep Singh Sappal : गिरीश निकम चले गए। मौत ने पिछले साल भी उनके दिल पर दस्तक दी थी। तब भी उनकी धड़कन को पूरी तरह जकड़ कर थाम दिया था। लेकिन न्यूयॉर्क की आपात मेडिकल सुविधाओं ने उसे परास्त कर दिया था। मौत, जो सिगरेट और रम के बुलावे पर आयी थी, धीरे धीरे पीछे हटती गई, वेंटिलेटर पर साँसें वापिस सामान्य होती गयी। गिरीश जी उठे और वापिस स्क्रीन पर छा गए।

लेकिन आज मौत जीत गयी। पिछले महीने ही गिरीश के सारे टेस्ट सही आए थे। वो ख़ुश था। उन्हें नहीं मालूम था कि इस बार बुलावा शायद दिल्ली में छाए प्रदूषण का था और मेडिकल सुविधा दिल्ली के सरकारी अस्पताल की थी, जहाँ वक़्त पर वेंटिलेटर उपलब्ध ही नहीं हो सका। इसलिए इस बार धड़कन जब थमी तो फिर हरकत में नहीं आयी और गिरीश अलविदा कह ही गए। तेरह महीनों के इस अनुभव ने यह तो समझा ही दिया कि ज़िंदगी और मौत सिर्फ़ ऊपर वाले के हाथ नहीं है, बल्कि देश, परिस्थिति और मेडिकल सुविधाओं के भी ग़ुलाम हैं। गिरीश से जब राज्यसभा टीवी का पहला शो ऐंकर करने को कहा गया तो वे ऐंकरिंग की स्थापित परम्परा की एंटीथीसिस थे। लेकिन आज जब वो अंतिम शो कर स्टूडियो की दहलीज़ से जीवन से रूखसत हुए, तो टीवी डिबेट की नयी परिभाषाएँ गढ़ चुके थे।

जब हमने पहला कार्यक्रम डिज़ाइन किया तो चर्चा हुई कि ऐंकर कौन करे।हम लीक से हट कर टीवी डिबेट का प्रयोग करना चाहते थे। सम्पादकीय मीटिंग में मैं, उर्मिलेश, राजेश बादल और अनिल नायर थे। ये विचार बना कि टीवी दर्शक स्टाइल से परे, कुछ गम्भीर परिचर्चा भी देखना चाहते हैं। यह कुछ कुछ यूटोपीयन सा ख्याल ही था। सर्वसम्मति बनी की गिरीश से ऐंकर कराया जाए। वैसे इस सर्वसम्मति से ख़ुद गिरीश भौंचक्के थे। उन्होंने ऐंकरिंग तो दूर, कभी टीवी के लिए रिपोर्टिंग तक नहीं की थी। इसलिए पहले तो तैयार नहीं हुए। पर जब उन्हें हर तरह की मदद का भरोसा दिया गया, ट्रेनिंग का वादा दिया गया, आश्वस्त किया गया तो आख़िरकार राज़ी हुए।

यह हमारा पहला प्रयोग था। शुरुआती लड़खड़ाहट के बाद गिरीश ने जो रफ़्तार पकड़ी, जो स्टाइल विकसित हुआ, वही अब राज्य सभा टीवी की पहचान बन गया है। शालीन स्वर में, बिना उत्तेजना के तीखे सवाल पूछने की कला और सभी पक्षों को अपने विचार रखने की मोहलत गिरीश के कार्यक्रम की और चैनल की विशिष्टता बन गए । हमने तय किया था कि राज्यसभा टीवी देखने वाले सभी दर्शकों को हर डिबेट में कुछ नयी जानकारी मिले और वे सभी पक्षों के तर्क से अवगत हों, उसमें हम शायद सफल हुए हैं। इसमें गिरीश का बहुत बड़ा योगदान है। इसीलिए हर राजनीतिक विचारधारा में उसके बहुत से घनिष्ट मित्र बने। प्रबुद्ध दर्शकों का एक बहुत बड़ा वर्ग और ख़ासतौर पर कॉम्पटिशन परीक्षा देने वाले छात्र गिरीश के नियमित दर्शक थे और आज के बाद वे उन्हें निश्चित ही मिस करेंगे।

गिरीश एक स्वाभिमानी, ज़िंदादिल आदमी थे। साफ़ स्पष्ट, तार्किक सोच। नास्तिक थे। कोई लाग लपेट नहीं। दिल और ज़ुबान के बीच कोई फ़ासला नहीं था। अपनी ही टेक के मालिक थे। लेकिन सुलझे हुए और अनुभवी पत्रकार थे। शुरू में उन्हें हम सब से सामंजस्य बैठाने में कुछ दिक़्क़त आयी, पर जब उन्हें आश्वस्त किया गया कि हमारी परिकल्पना ऐसे चैनल की है जहाँ हर व्यक्ति अपने स्वभाव के साथ रह सके, हर पत्रकार की अपनी व्यक्तिगत स्पेस हो और केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर फ़ोकस रहे, तो वो ढलते गए और फिर तो इस चैनल की संस्कृति गढ़ने में अग्रणी ही रहे।

राज्यसभा टीवी के सबसे उम्रदराज़ पत्रकार थे, लेकिन सबसे युवा पत्रकारों की दोस्ती कमोवेश उनसे ही पहले होती थी। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि किसी जूनियर सहयोगी को कोई समस्या हुई तो सबसे पहले गिरीश से ही साझा की। वह अपने से बहुत कम उम्र के इन पत्रकारों का दोस्त तो थे ही, ख़ुद को उनका शिक्षक भी मानते थे। उनको गढ़ने की, निखारने की लत सी थी उन्हें। इसी में सुकून भी पाते थे और गर्व भी करते थे।

जो व्यक्ति उम्र के दायरे को नकार कर जिया, आज वो उम्र के दायरे से ही बाहर हो गया है। उसकी कमी खलेगी। जीवन क्षणभंगुर है, ये पढ़ा तो बहुत है, महसूस आज हुआ, पूरी शिद्दत के साथ हुआ। अलविदा गिरीश! राज्यसभा टीवी के सभी साथी तुम्हारी कमी हमेशा महसूस करेंगे।

राज्यसभा टीवी के एडिटर इन चीफ और सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

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ब्रेन हैमरेज के बाद SGPGI में भर्ती कराए गए लखनऊ के पत्रकार रीतेश द्विवेदी का निधन

लखनऊ में करीब 15 साल से पत्रकारिता कर रहे पत्रकार रीतेश द्विवेदी का संजय गांधी पीजीआई में निधन हो गया. उन्हें ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती कराया गया था. उनका अंतिम संस्कार लखनऊ के चौक के गुल्लाला श्मशान घाट पर किया गया. लखनऊ में चौपटिया के दिलाराम बारादरी के रहने वाले रीतेश ने राजधानी के कई बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़ कर लंबे समय तक पत्रकारिता की.

रीतेश अपने पीछे एक बेटा और पत्नी छोड़ गए हैं. रीतेश को मुखाग्नि उनके वृध्द पिता ने दी. अंतिम संस्कार के मौके पर बड़ी संख्या में पत्रकार और नेता मौजूद रहे. रीतेश द्विवेदी लखनऊ के अमर उजाला अखबार में भी कार्यरत रहे जहां स्थानीय संपादक पंचोली की बदतमीजी के कारण डिप्रेशन में चले गए और नौकरी से हाथ धो बैठे थे.

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आजतक के युवा पत्रकार रजत सिंह की दिल्ली के एम्स ट्रामा सेंटर में मौत

आजतक न्यूज चैनल के पत्रकार रजत सिंह का दो दिन पहले एक्सीडेंट हो गया था. नोएडा के बॉटनिकल गार्डन के पास उनकी बाइक को डम्पर ने टक्कर मार दी थी. उनके सिर में गंभीर चोटें आई थी. उन्हें एम्स के ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया था.

पत्रकार Dhirendra Pundir ने रजत सिंह को याद करते हुए फेसबुक पर कुछ यूं लिखा है :

रजत सिंह नहीं रहा। युवा पत्रकारों में से कुछ पत्रकार आपको हमेशा उम्मीद दिलाते रहते है कि मीडिया को उनसे कुछ बेहतर स्टोरी मिलेंगी। वो मीडिया के आने वाले वक्त में मेहनती चेहरों में शुमार होंगे। रजत उन्हीं में से एक था। दिल्ली आजतक के उन पत्रकारों में से जिनके साथ आज छोड़ने के बाद भी राब्ता बना रहा। अरावली की पहाड़ियों पर उसकी स्टोरी पर काफी चर्चा भी हुई, मैंने कहा था कि आप इसको और भी बेहतर कर सकते थे अवार्ड से भी आगे। हंसते हुए रजत ने कहा था कि दादा आपके साथ काम करना है। ऐसे ही एक दिन विजय चौक पर रजत ने हंसते हुए का कि दादा कब मौका मिलेंगा।

मैंने भी हंसते हुए कहा कि अब तुम लोगों को नहीं मुझे ये कहना चाहिए कि मैं कब आप लोगों के साथ काम करूंगा। युवा सपनों के साथ उम्मीद का आसरा ज्यादा होता है,निराशा कम होती है। इस पर वो और मैं ठहाका मार कर हंस दिए। वो एक आखिरी मुलाकात थी। परसो एक साथी ने खबर दी कि रजत का एक्सीडेंट हो गया। फिर कल मेरी टीम के रिपोर्टर और रजत के जूनियर गौरव ने कहा कि सर वो एम्स में है और बचने की उम्मीद नहीं है। शाम को रजत से मिलने की उम्मीद में एम्स गया,एमरजेंसी विभाग में गया लेकिन वहां सी टू में रजत नहीं था। फिर मैंने अपने रिपोर्टर को फोन किया तो उसने कहा कि सर आप गलत आ गये है एम्मस में नहीं एम्मस ट्रामा सेंट्रर में है रजत। और तब मैं वहां पहुंच ही नहीं पाया, वापस आना पड़ा ऑफिस और फिर रात में गौरव का व्हाट्अप। मुझे मालूम नहीं रजत को न जानने वालों को मैं कैसे कह पाऊंगा कि रजत मीडिया की युवा उम्मींदों में से एक था। बस ये ही कह सकता हूं कि रजत नहीं रहा।

युवा पत्रकार दीपक गंभीर ने अपने मित्र को यूं याद किया है…

मन बहुत दुखी है। इसलिये की एक दोस्त, युवा पत्रकार आज हम सबको अलविदा कहकर इस दुनिया से चला गया। दिल्ली में मैंने और रजत ने कई बार फील्ड में साथ में ख़बरें की थी। रजत सिंह आज तक चैनल का एक युवा पत्रकार था और हमेशा मैंने उसको फील्ड पर जोश और उत्साह से लबरेज़ पाया। लेकिन किसी के लिए भी यकीन करना मुश्किल है कि रजत अब नहीं रहा, लेकिन अब वो हमारे साथ नहीं है सिर्फ उसकी यादें हैं। दो दिन पहले नॉएडा में रजत की बाइक का एक्सीडेंट हुआ था जिसके बाद वो एम्स में भर्ती था और अभी-अभी खबर मिली कि रजत अब नहीं रहा। मेरे दोस्त तुम हमेशा याद आओगे, तुम्हारा वो नाईट शिफ्ट में सबको हसाना और ये कहना की भाईसाहब चलो चाय पीते है। तुम्हारी ये सब बातें हमेशा याद आएँगी मेरे दोस्त। मन बहुत उदास और दुखी है। तुम जहाँ भी रहो खुश रहो। तुम्हारी यादें हम सबके दिलों में हमेशा रहेंगी। कभी सोचा नहीं था कि तुम ऐसे चले जाओगे। R.I.P….

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सड़क हादसे में सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी का निधन

सुदर्शन न्यूज़ के गेस्ट कोआर्डिनेटर और एसाइनमेंट हेड विवेक चौधरी के निधन होने की सूचना मिली है. विवेक पिछले कई सालों से अलग-अलग न्यूज़ चैनलो में अपनी सेवायें दे चुके है. वे श्री न्यूज़, चैनल वन न्यूज़, साधना न्यूज़ आदि चैनलों में गेस्ट कोआर्डिनेटर के तौर पर काम कर चुके हैं. बताया जाता है कि कल रात विवेक का निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया.

विवेक की बीती देर रात तकरीबन 11:30 बजे मौत हुई. वे अपनी मोटरसायकल से जा रहे थे तभी अज्ञात वाहन ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया. विवेक के आकस्मिक निधन से सुदर्शन न्यूज़ परिवार में मातम का माहौल है. उनके अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं. उनका अंतिम संस्कार आज शाम तीन बजे दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया गया.

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यादें शेष : हंसमुख पत्रकार चंद्रप्रकाश बुद्धिराज का यूं पीड़ा लेकर जाना…

सीपी : अब यादें ही शेष….

राजू उर्फ चंद्र प्रकाश बुद्धिराजा उर्फ सीपी. पहले नाम का अर्थ जान लेते हैं, चंद्र के समान प्रकाश हो जिसका, बुद्धि के जो राजा हो। उर्फ सीपी पर भी गौर फरमाएं तो जुबां पर सीेधे विशालकाय अद्भुत, अनोखे दिल्ली की जान, कनॉट प्लेस (सीपी) का नाम दिमाग पर छा जाता है। अतिश्योक्ति न होगी कि सीपी के बिना दिल्ली अधूरी है।  नाम को सार्थक करता प्रभाव था हमारे सीपी का, जो दुनिया से चले गए। सच में, तुम्हारे बिना आज तुम्हारे साथियों की दुनिया भी वैसे ही अधूरी है, जैसे ‘सीपी’ बिना दिल्ली।

खैर, चंद्रप्रकाश बुद्धिराज उर्फ सीपी जी न्यूज चैनल घराने के स्थापित सदस्यों में से एक हमारे पत्रकार साथी, शारदीय नवरात्र की सप्तमी (8 अक्टूबर, 2016) को चुपचाप चले गए । बिल्कुल वैसे ही, हंसी, स्वाभिमानी चेहरा लिए, जैसे रोजाना तड़के किलारोड़ (रोहतक) समीप अपने निवास से फिल्म सिटी नोएडा अपने दफ्तर जी न्यूज के लिए चलते थे। या फिर यूं कहूं कि जैसे वह छुट्टी के दिन शहर में गिने-चुने पत्रकार, चुनिंदा नेता और बुद्धिजीवी साथियों से गप कर चुपके से चल देते थे।

निष्ठान और संकोची भी थे सीपी। एक किस्सा उनके स्वभाव से जुड़ा बताना चाहूंगा। ‘आपकी अदालत’ शो फेम मशहूर पत्रकार रजत शर्मा जब जी न्यूज में अपने इस चर्चित कार्यक्रम से ख्याति हासिल कर रहे थे, और फिर निजी मीडिया हाऊस बनाने निकले तो, सीपी से साथ चलने को कहा, पर सीपी तैयार नहीं हुए, शायद इसलिए कि वह सीमित संसाधनों में खुश रहने वाले शख्स थे। फालतू का रिस्क लेने की आदत नहीं थी। ट्रेजडी किंग दिलीप को भी अपने अंदाज से हंसाने का माद्दा था उनमें।

एक और पहचान है सीपी की, ठीक वैसी ही जैसे दो-चार रोज पहले नेपाल की एक आठवीं कक्षा की छात्रा प्रकृति मल्ला ने हासिल की है, अपनी हेंडराइटिंग के जरिए विश्वभर में। दरअसल, जवानी के दिनों में सीपी जब अनाज मंडी में पान की दुकान चलाते थे, वहां कत्थे-चूने के अलावा उन्हें स्याही का खर्च भी उठाना पड़ता था क्योंकि उम्दा हेंडराइटिंग के चलते बाजार में किसी को चिट्ठी-पत्री या कोई और जरूरी खत लिखवाना होता तो इनका नाम आता और लोग बोलते- सीपी पान वाले के पास चलते हैं। उस वक्त फेसबुक-व्हाटसएप, एसएमएस जैसे माध्यम नहीं होते थे। सच कहूं तो उस वक्त का फेसबुक-व्हाटसएप, एसएमएस था सीपी। इसी हुनर के जरिए उनकी एंट्री मीडिया जगत में हुई। शहर के कई पुराने लोगों के पास आज भी सीपी के लिखे खत, यादों की फाइलों में मिल जाएंगे।

संवाद में बेजोड़ और मिलनसार होने के बावजूद नई पीढ़ी की ‘पत्रकार बिरादरी’ में घुल नहीं पाए। नामी चैनल जी न्यूज से जुड़े होने के बावजूद सीपी को करीब से जानने वाले शहर के पत्रकार या तो वरिष्ठ नागरिक की श्रेणी में हैं या फिर इस श्रेणी को हासिल करने की दहलीज पर खड़े हैं। पान का शौक उनका बिल्कुल अमिताभ बच्चन के फिल्मी किरदार सरीखे था। एक मुंह में तो चार जेब में। आलम यह था कि पान की जुगाली से उनके होठ अकसर सुर्ख लाल दिखते थे। ज्यादा कुछ मैं उनके बारे में नहीं जानता, क्योंकि जितनी मेरी उम्र है, उतना उनका लिखने का अनुभव था। लेकिन पुरानी पीढ़ी से अनुभव हासिल करने के मेरे शौक से ही कुछ माह पहले उनकी चौकड़ी में मुझे जगह मिली, तो थोड़ा बहुत उनको जान पाया।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक पवन बंसलजी की पुस्तक, जो छपने को लगभग तैयार थी और सीपी ने अपने अंदाज के रंग उसमें भरे थे, उसकी फाइनल टचिंग टेबल पर मैं सीपी से मिला। किताब के शीर्षक को लेकर सब सोच-विचार में थे तब मैंने ‘गुस्ताखी माफ’ शीर्षक सुझाया, सीपी के साथ सबका समर्थन मिला औरें ‘गुस्ताखी माफ हरियाणा शीर्षक पर मुहर लग गई। कुछेक लेख के शीर्षक भी मैंने सुझाए कि बदला जाए तो और पठनीय होंगे। शीर्षक के अंदाज और मेरी उम्र देख कर वह गदगद हो गए और फिर कई छोटी-बड़ी रचनाएं, कविताएं साझा की।

मुझे भी एक नया हुनरबाज मिला तो खुशी हुई कि यह साझा सफर आगे बढ़ेगा तो मजा आएगा, लेकिन ऐसा हो न सका। कुछ दिन बाद ही पता लगा कि सीपी मुख कैंसर की गिरफ्त में आ गए। मैं मिलने गया तो थोड़ा भावुक हुए, लेकिन ऐसे पेश आए जैसे कुछ बात ही न हो, ऑपरेशन के बाद डॉक्टरों ने उन दिनों बिल्कुल बोलने से मना किया था, पर बात किए बिना कहां मानने वाले थे। जाते हुए आश्वस्त किया कि जल्द ही कुछ लिख कर भेजता हूं।

कैंसर की पीड़ा में उनका ऑफिस आना-जाना लिखना पढऩा छूटने लगा। लेकिन जुनून की जिद से नया रास्ता चुन लिया। उम्र का अद्र्ध शतक पार करने बाद कैंसर की पीड़ा लिए सीपी फेसबुक से जुड़ गए, ताकि चाहने वालों से घर बैठे संवाद कर सकें। पोस्टें आने लगी, हमें लगा कि राहत है, लेकिन सप्ताह भर पहले अचानक फेसबुक पर पोस्ट डाली कि साथियों अब यहां (फेसबुक वॉल पर) मेरा इंतजार न करें। एकबारगी लगा कि ठिठौली कर रहे हैं, लेकिन यह ठिठौली न थी। इस संदेश की गंभीरता समझ उन तक पहुंच पाते, इससे पहले वह दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए बिल्कुल अकेला, संतान सुख से दूर, संगिनी सविता को, जिसे प्यार से सब अनु पुकारते हैं। उनसे मिल कर लौटा तो शैलेंद्र का लिखा, बंदिनी फिल्म का गीत याद आ गया ‘ओ जाने वाले, हो सके तो लौट के आजा…

लेखक अनिल कुमार मेडीकेयर न्यूज में समाचार संयोजक हैं. उनसे संपर्क a1outlook@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पत्रकार प्रभात कुमार शांडिल्य और ओम प्रकाश बंसल का निधन

बिहार के गया से सूचना है कि चर्चित पत्रकार, जेपी आंदोलन से जुड़े एक्टिविस्ट व समाजसेवी प्रभात कुमार शांडिल्य का गुरुवार की दोपहर को निधन हो गया. उन्होंने गया शहर के नगमतिया रोड स्थित डॉ उषा लक्ष्मी आवास में अंतिम सांस ली.  वह काफी दिनों से बीमार थे. मूल रूप से बक्सर के रहनेवाले शांडिल्य जी का जन्म 24 नवंबर, 1951 को गया जिले के वजीरगंज के रहनेवाले राधेश्याम प्रसाद के घर में हुआ था. उनकी शिक्षा-दीक्षा वजीरगंज में हुई. पटना स्थित बीएन कॉलेज से समाजशास्त्र में एमए उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने कभी नौकरी करने की नहीं सोची और अविवाहित जिंदगी गुजारी. वह ऑल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन में काफी दिनों तक सक्रिय रहे.

इस बीच, राजस्थान के श्रीगंगानगर से खबर है कि श्रीगंगानगरके वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश बंसल का शुक्रवार शाम जयपुर के एक निजी हॉस्पिटल में निधन हो गया। वे पिछले कई दिनों से वहां उपचाराधीन थे। लगभग साठ वर्षीय बंसल को दस सितंबर को हृदयघात के कारण उपचार के लिए जयपुर ले जाया गया था। शनिवार शाम चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार शनिवार सुबह किया गया। अंतिम यात्रा सुबह दस बजे उनके 69 बैंक कॉलोनी आवास से पदमपुर रोड कल्याण भूमि के लिए रवाना हुई।

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उफ्फ… दैनिक जागरण अलीगढ़ और ईनाडु टीवी हैदराबाद में हुई इन दो मौतों पर पूरी तरह लीपापोती कर दी गई

अलीगढ दैनिक जागरण के मशीन विभाग में कार्यरत एक सदस्य की पिछले दिनों मशीन की चपेट में आकर मृत्यु हो गई. न थाने ने रिपोर्ट लिखा और न ही डीएम ने कुछ कहा. शायद सब के सब जागरण के प्रभाव में हैं. यह वर्कर 2 दिन पहले वहां तैनात किया गया था. उसका भाई वहां पहले से कार्यरत था. पंचनामा जबरन कर लाश को उठवा दिया गया. बताया जाता है कि अलीगढ़ दैनिक जागरण में शाफ्ट टूट कर सिर में लगने से मौत हुई.

यह कर्मचारी दो दिनों से ड्यूटी पर आ रहा था और उसका ट्रायल लिया जा रहा था. दैनिक जागरण प्रबंधन ने इसे रोड एक्सीडेंट दिखा दिया. पीड़ित को कहीं से कोई मदद नहीं मिली. कर्मचारी का नाम केशव प्रजापति बताया जाता है. घटना 24 सितंबर की रात ढाई बजे की है. कर्मचारी का मौके पर ही मौत हो गई. पुलिस को कई बार बुलाया गया लेकिन पुलिस नहीं आई. पंचनामा जागरण प्रबंधन के निर्देश के अनुसार भरा गया.

उधर, पत्रकार अमित सिंह चौहान (जी न्यूज में कार्यरत) के भाई यशपाल सिंह जो कि ईनाडु टीवी डिजिटल के हिंदी डेस्क पर कंटेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे, का 19 सितंबर 2016 को निधन हो गया.  डॉक्टर के अनुसार यशपाल सिंह का निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ. यशपाल सिंह को उनके सहकर्मियों द्वारा समय से हैदराबाद के मशहूर ग्लोबल अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था.  लेकिन अस्पताल की तरफ से एक लाख रुपए सिक्योरिटी के रूप में जमा करने को कहा गया तो ऐसा हो न सका क्योंकि किसी सहकर्मी के पास पैसा नहीं था. हालांकि ईलाज पर जो खर्च हो रहा था, इसके लिए पैसे लगातार जमा किए जा रहे थे. लोगों ने आनन फानन में ईनाडु दफ्तर को पूरी बात से अवगत कराया. बावजूद इसके ऑफिस से कोई त्वरित कार्रवाई नहीं हुई. यशपाल सिंह के फैमिली मेंबर से बात होने के बाद और पहुंचकर पूरे पैसे चुकाने के आश्वासन के बाद भी ऑफिस ने पैसे जमा नहीं किए. इससे इलाज के आभाव में 30 वर्षीय यशपाल सिंह का उक्त तारीख को रात दस बजे निधन हो गया.

यशपाल सिंह के बड़े भाई पत्रकार अमित फ्लाइट से जब तक हैदराबाद पहुंचते तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अमित सिंह ने भाई के निधन के बाद लापरवाही के कारण हत्या का केस दर्ज कराया है. इसकी स्थानीय एलबी नगर पुलिस जांच कर रही है. मामला बडे मीडिया हाउस से जुड़े होने के कारण पुलिस पर काफी दबाव है. अस्पताल प्रशासन और ईनाडु ग्रुप मामले को एक दूसरे पर डालकर पल्ला झाड़ रहे हैं. इस मामले की रामोजी फिल्मसिटी में खूब चर्चा है. खबर यह भी है कि बीमारी के बाद भी यशपाल सिंह को काम से छुट्टी नही मिली थी. इसके कारण खराब तबीयत में उनने निधन से एक दिन पहले तक आफिस में काम किया था. यशपाल सिंह इसके पहले दिल्ली में एपीएन न्यूज व खबर भारती में काम कर चुके हैं. यशपाल यूपी के बहराइच जिले के रहने वाले थे. ईनाडु प्रबंधन ने मामला दबाने की लाख कोशिश की लेकिन पत्रकारों में यह प्रकरण चर्चा का विषय बना हुआ है.

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मुंबई में पत्रकार रामकुमार मिश्र का निधन

मुंबई : हमारा महानगर के पूर्व उपसम्पादक और दबंग दुनिया के उपसंपादक रामकुमार मिश्र का कल देर शाम मुम्बई के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे तबियत खराब होने पर केइएम अस्पताल में भर्ती थे। शाम को उनका शव उनके घाटकोपर स्थित निवास पर ले जाया गया जहाँ पत्रकारों और शुभचिंतको ने उन्हें भावभीनी श्रधांजलि दी।

चार दिन पहले रामकुमार मिश्र की तबियत ख़राब हुई थी फिर केइएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें आईसीयू में रखा गया था। बुधवार को ठीक हो गये थे और बाहर निकाल कर उन्हें सामान्य वार्ड में रखा गया था। रात का खाना खाने के बाद उलटी हुई और उसके बाद आधे घण्टे के भीतर उनकी मौत हो गयी।

शशिकांत सिंह
मुंबई
9322411335

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यशोभूमि के पत्रकार अरविन्द सिंह को मातृशोक

मुबई से प्रकाशित हिन्दी दैनिक यशोभूमि के उपसंपादक और वरिष् पत्रकार अरविन्द सिंह की माताजी गुलाबी देवी भुवाल सिंह का मुंबई के शिवड़ी स्थित तिलक इमारत  स्थित आवास में निधन हो गया। वे  81 साल की  थीं। गुलाबी देवी लंबे समय से बीमार चल रही थीं। वे अपने पीछे पुुत्र अरविन्द सिंह, विनय सिंह और पत्री शशिकला सिंह सहित नातीपोते का भरापूूरा परिवार छोड़ गयी हैं।

उनका अंतिम संस्कार मुंबई के भोईवाड़ा श्मशान गृह में किया गया। वे मूलरुप से आजमगढ़ के नरफोरा गांव की रहने वाली थीं। मुखाग्नि उनके छोटे बेटे विनय सिंह ने दिया। गुलाबी देवी के निधन पर मुंबई के पत्रकारों ने शोक जताया है।

शशिकांत सिंहकी रिपोर्ट.

संपर्क 9322411335

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प्रख्‍यात आलोचक एवं साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोतिय का निधन

prabhakar

हिंदी के प्रख्‍यात आलोचक एवं साहित्‍यकार प्रभाकर श्रोतिय का गुरुवार की रात दिल्‍ली के सर गंगाराम अस्‍पताल में निधन हो गया. वे 76 वर्ष के थे तथा लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वे अपने पीछे पत्‍नी तथा एक पुत्र एवं पुत्री का भरापूरा परिवार छोड़ गए हैं. उनका अंतिम संस्‍कार हरिद्वार में किया जाएगा. प्रभाकर क्षोत्रिय ने हिंदी की कई प्रतिष्‍ठित साहित्‍यिक पत्रिकाओं का संपादन किया. क्षोत्रिय के निधन से हिंदी साहित्‍य जगत को गहरा धक्का पहुंचा है.

डॉ. प्रभाकर क्षोत्रिय का जन्‍म मध्‍य प्रदेश के जावरा में 19 दिसंबर 1938 को हुआ था. उज्‍जैन में उच्‍च शिक्षा प्राप्‍त करने के बाद वह भोपाल के हमीदिया कालेज में शिक्षक नियुक्‍त हो गए थे. उन्‍होंने हिंदी में पीएचडी एवं डीलिट की थी. हिंदी पट्टी में उनकी गिनती जाने-माने आलोचक और नाटककार के तौर पर होती थी. हिंदी आलोचना के अलावा उन्होंने साहित्य और नाटकों को भी एक नई दिशा प्रदान की.

क्षोत्रिय जी सबसे पहले मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सचिव एवं ‘साक्षात्कार’ व ‘अक्षरा’ के संपादक रहे. इसके अलावा वे भारतीय भाषा परिषद के निदेशक एवं ‘वागर्थ’ व ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक पद पर कार्य करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञानपीठ नई दिल्ली के निदेशक पद पर भी रहे. प्रभाकर क्षोत्रिय बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे और उन्‍होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी कलम चलाई, लेकिन हिंदी साहित्‍य में आलोचना, निबंध और नाटक के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्‍मरणीय है.

उनकी प्रमुख आलोचनात्‍मक कृतियों में  ‘सुमनः मनुष्य और स्रष्टा’, ‘प्रसाद का साहित्यः प्रेमतात्विक दृष्टि’, ‘कविता की तीसरी आख’, ‘संवाद’, ‘कालयात्री है. इसके अलावा कविता’ संग्रह में ‘रचना एक यातना है’, ‘अतीत के हंसः मैथिलीशरण गुप्त’, जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता’. ‘मेघदूतः एक अंतयात्रा, ‘शमशेर बहादुर सिंह’, ‘मैं चलूं कीर्ति-सी आगे-आगे’, ‘हिंदी – कल आज और कल’ प्रमुख कृतियां रहीं. इसके साथ ही हिंदीः दशा और दिशा’, ‘सौंदर्य का तात्पर्य’, ‘समय का विवेक’, ‘समय समाज साहित्य’ भी प्रमुख कृतियां रहीं. जबकि नाटक ‘इला’, ‘साच कहू तो…’, ‘फिर से जहापनाह’, जैसा अविस्मरणीय निबंधों को भी लिखा.

प्रभाकरजी के निधन पर देश भर के हिंदी साहित्‍यकार एवं पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर अपने-अपने तरीके से याद किया. जनसत्‍ता के संपादक रहे वरिष्‍ठ पत्रकार एवं साहित्‍यकार ओम थानवी ने लिखा है : ”वरिष्ठ हिंदी आलोचक और अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं के सम्पादक रहे डॉ प्रभाकर श्रोत्रिय नहीं रहे। महभारत पर उनका बड़ा काम है। वे 76 वर्ष के थे और कुछ समय से ज़्यादा ही अस्वस्थ चले आ रहे थे। उनसे पहले-पहल 1984 में बरगी नगर (मध्यप्रदेश) में मिलना हुआ था, जब अज्ञेय जी ने वहां पांचवा वत्सल निधि शिविर आयोजित किया। बरसों बाद जनसत्ता आवास में उनके पड़ोस में रहने का सुख हासिल था। पीटर ब्रुक की तीन घंटे लम्बी नाट्य-फ़िल्म ‘महाभारत’ (मूल प्रस्तुति नौ घंटे) उन्होंने हमारे यहा एकाधिक बार देखी। मैंने बाद में उसकी प्रति तैयार कर उन्हें भेंट की थी। जब उनकी ‘महाभारत’ छप कर आई तो उसे देने स्वयं आए। जब स्वस्थ थे जनसत्ता आवास में शाम को सैर की फेरी लगाते थे। बाइपास के बाद तो नियमित रूप से। उस रास्ते पर उनकी पदचाप हमें लम्बे समय तक सुनाई देती रहेगी।”

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अलविदा अज्ञात जी, आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं

(स्व. अशोक अज्ञात जी)

कभी माफ़ मत कीजिएगा अशोक अज्ञात जी, मेरे इस अपराध के लिए … हमारे विद्यार्थी जीवन के मित्र अशोक अज्ञात कल नहीं रहे। यह ख़बर अभी जब सुनी तो धक् से रह गया । सुन कर इस ख़बर पर सहसा विश्वास नहीं हुआ । लेकिन विश्वास करने न करने से किसी के जीवन और मृत्यु की डोर भला कहां रुकती है। कहां थमती है भला ? अशोक अज्ञात के जीवन की डोर भी नहीं रुकी , न उन का जीवन । अशोक अज्ञात हमारे बहुत ही आत्मीय मित्र थे । विद्यार्थी जीवन के मित्र । हम लोग कविताएं लिखते थे। एक दूसरे को सुनते-सुनाते हुए हम लोग अकसर अपनी सांझ साझा किया करते थे उन दिनों।

गोरखपुर की सड़कें , गलियां पैदल धांगते-बतियाते घूमते रहते थे। क्रांति के फूल खिलाते , खिलखिलाते रहते थे। वह हमारी मस्ती और फाकाकशी के भी दिन थे । हमारी आन-बान-शान और स्वाभिमान से जीने के दिन थे । ज़रा-ज़रा सी बात पर हम लोग किसी भी ख़्वाब या किसी भी प्रलोभन को क्षण भर में लात मार देने में अपनी शान समझते थे । इसी गुरुर में जीते और मरते थे । अठारह-बीस बरस की उम्र में हम लोग दुनिया बदलने निकले थे । दुनिया तो खैर क्या बदली, हम लोग ही बदलते गए , हारते और टूटते गए । लेकिन यह तो बाद की बात है । अब की बात है । पर उस समय , उस दौर की बात और थी । और अशोक अज्ञात तो अशोक ही थे। अशोक मतलब बिना शोक के। कुछ भी बन बिगड़ जाए उन को बहुत फर्क नहीं पड़ता था । अज्ञात का गुरुर उन्हें शुरु ही से और सर्वदा ही रहा।

हम लोग विद्यार्थी ज़रुर थे पर साहित्य में स्थानीय राजनीति की ज़मीन को तोड़ने के लिए जागृति नाम से एक संगठन भी बनाया था । जिस का मुख्य काम उन दिनों कवि गोष्ठियां आयोजित करना था । अशोक अज्ञात उन दिनों संकेत नाम से एक अनियतकालीन पत्रिका भी निकालते थे । और कि उस में वह किसी की सलाह या दखल नहीं लेते थे । वह उन का व्यक्तिगत शौक और नशा था । पान खाते-चबाते वह एक से एक गंभीर बात कर लेते थे । वह जल्दी किसी विवाद में नहीं पड़ते थे लेकिन चुप भी नहीं रहते थे। स्वार्थ उन में नहीं था , भावुकता लेकिन बहुत थी । उन के एक मामा जिन्हें हम लोग ओझा जी कहते थे, हम लोगों को पढ़ने के लिए अकसर सोवियत साहित्य उपलब्ध करवाते रहते थे।

अशोक अज्ञात का गांव टांड़ा हमारे गांव बैदौली से थोड़ी दूरी पर ही था । वह बाहुबली और कई बार काबीना मंत्री रहे हरिशंकर तिवारी के ख़ास पट्टीदार थे । लेकिन तमाम मुश्किलों और निर्धनता के बावजूद कभी भी उन से कोई मदद नहीं मांगी । न ही उन के हुजूर में गए । बचपन में ही उन के पिता नहीं रहे थे । उन की मां ने ही उन्हें पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया । टीन एज तक आते-आते अज्ञात जी ने परिवार की ज़िम्मेदारियां उठा लीं । उन्हीं दिनों अपनी एक बहन की शादी उस कच्ची उम्र में तय की थी । मैं भी गया था तब उन की बहन की शादी में उन के गांव। संयोग से विद्यार्थी जीवन में कुछ समय मैं गोरखपुर के रायगंज मुहल्ले में भी रहा था । वहां अज्ञात जी हमारे पड़ोसी रहे थे । अपनी बड़ी बहन के साथ रहते थे । वह हमारी कविताओं के , हमारे संघर्ष और हमारी उड़ान के दिन थे । पत्रकारपुरम , राप्ती नगर , गोरखपुर में भी वह मेरे पड़ोसी रहे थे । इस नाते जब भी गोरखपुर जाता था तो नियमित मुलाकात होती थी उन से । वह जब कभी लखनऊ आते तब भी हमसे मिलते ज़रुर थे । हमारे कथा साहित्य के वह अनन्य पाठक थे । खोज कर , मांग कर जैसे भी हो वह पढ़ते ज़रुर थे । न सिर्फ़ पढ़ते थे बल्कि पात्रों और कथाओं पर विस्तार से चर्चा भी करते थे । प्रश्न करते थे । किसिम किसिम के सवाल होते उन के पास । कई बार वह फ़ोन कर के बात करते । मिलने का इंतज़ार नहीं कर पाते थे।

मेरी कहानी मैत्रेयी की मुश्किलें और उपन्यास वे जो हारे हुए उन को बहुत प्रिय थे । इस लिए भी कि वह ख़ुद हारे हुए थे और कि इस उपन्यास के बहुत से चरित्र उन के जाने और पहचाने हुए लोग थे । हरिशंकर तिवारी भी इस उपन्यास में खल पात्र के रुप में उपस्थित थे इस लिए भी वह इसे बहुत पसंद करते थे । इतना ही नहीं , यह उपन्यास भी उन्हों ने उन तक पहुंचवा दिया यह कह कर कि आप अपने को चाहे जितना सफल मानिए , नायक मानिए लेकिन देखिए समय और साहित्य आप को किस तरह दर्ज कर रहा है । यह बात उन्हों ने मुझे फ़ोन कर बताई । मैं ने चिंतित हो कर कहा , यह क्या किया आप ने ? वह बोले , घबराईए नहीं आप । वह लोग बहुत बेशर्म और घाघ लोग हैं । उन को इन सब चीजों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता । और सचमुच अशोक अज्ञात ने सही ही कहा था । उन या उन जैसों को कोई फ़र्क नहीं पड़ा था । फ़र्क तो छोड़िए , नोटिस भी नहीं ली उन या उन जैसे लोगों ने । लेकिन मैं चिंतित इस लिए हुआ था क्यों कि एक बार एक ख़बर के सिलसिले में महीनों धमकी आदि झेलना पड़ा था , इन्हीं तिवारी जी के चमचों से । अज्ञात जी बोले थे , ख़बर की बात और है।

अशोक अज्ञात अपनी कविताओं में जो चुभन बोते थे , अपने जीवन में भी वह चुभन महसूस करते रहे । निरंतर । इतना कि बाद के दिनों में वह सिर्फ़ पाठक बन कर रह गए । रचना छूट गई। उन के जीवन में आर्थिक संघर्ष इतना ज़्यादा था कि बाक़ी सारे संघर्ष और रचनात्मकता खेत हो गई थी । आज अख़बार की नौकरी ने उन्हें निचोड़ लिया था । पांच हज़ार , सात हज़ार या दस हज़ार रुपए की नौकरी में आज अख़बार की नौकरी में आज की तारीख में किसी स्वाभिमानी व्यक्ति और उस के परिवार का बसर कैसे होता रहा होगा , समझा जा सकता है । गोरखपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष भी रहे हैं वह । आज अख़बार में वह संपादक भी रहे कुछ समय तक । लेकिन संपादक और प्रेस क्लब के अध्यक्ष हो कर भी अज्ञात ही रहे । क्षुद्र समझौते कभी नहीं किए । दलाली आदि उन से कोसों दूर भागती थी । भूखे रह लेना वह जानते थे लेकिन हाथ पसारना नहीं । अशोक तो वह खैर थे ही । अशोक मतलब बिना शोक के । लेकिन अशोक अज्ञात भी हो जाए तो मुश्किल हो जाती है । अज्ञात नाम तो उन्हों ने कविता लिखने के लिए ख़ुद रखा था । पर क्या पता था कि अज्ञात नाम से कविता लिखने वाला , संकेत नाम की पत्रिका निकालने वाला यह व्यक्ति इतना भी अज्ञात हो जाएगा कि कैंसर की बीमारी का इलाज भी अपने पिछड़े गांव में करते हुए अपने गांव में ही आंख मूंद लेगा ! अपनी जन्म-भूमि में ही प्राण छोड़ेगा । और कि इस बीमारी की सूचना भी हम जैसों मित्रों को देने की ज़रुरत नहीं समझेगा।

अशोक अज्ञात फ़ेसबुक पर भी उपस्थित रहे हैं । और इस दौर में जब लोग अपनी फुंसी , खांसी , बुखार की भी सूचना परोस कर भी अपनी आत्म मुग्धता में फ़ोटो डाल-डाल कर धन्य-धन्य होते रहते हैं , वहीं हमारे अशोक अज्ञात ने अपने कैंसर की भनक भी नहीं होने दी किसी को । आप उन के अशोक और अज्ञात होने का अंदाज़ा इस एक बात से भी लगा सकते हैं । अब हम भी अपने को सिर्फ़ और सिर्फ़ कोस ही सकते हैं कि एक अभिन्न आत्मीय और स्वाभिमानी मित्र को क्यों इस तरह निर्वासित हो कर अज्ञात मृत्यु के कुएं में धकेल दिया । क्यों नहीं , खोज ख़बर रखी । माथा ठनका तो तभी था जब कुछ समय पहले गोरखपुर जाने पर उन के घर गया तो पता चला कि वह तो अपना घर बेच कर कहीं और जा चुके हैं । उन का फ़ोन मिलाया । फ़ोन बंद मिला । दूसरे पड़ोसी गिरिजेश राय ने बताया कि वह कर्ज में डूब गए थे , मकान की किश्तें बहुत हो गई थीं, पारिवारिक जिम्मेदारियां भी थीं सो घर बेचना ही रास्ता रह गया था।

अब तो गिरिजेश राय भी नहीं रहे । फिर बाद में भी कई बार फोन किया , कभी फ़ोन नहीं मिला उन का । न ही कोई मित्र उन का बदला हुआ उन का कोई दूसरा नंबर दे पाया । फिर मैं भी अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों में उलझ गया । अज्ञात जी की खोज-ख़बर लेना बिसर गया । ख़बर मिली भी तो यह शोक भरी ख़बर। जाने गोरखपुर के पत्रकार लोग गोरखपुर से कोई सत्तर किलोमीटर दूर उन के गांव टांड़ा भी पहुंचे होंगे या नहीं , मैं नहीं जानता। यह ज़रुर जानता हूं अज्ञात जी के इस तरह अज्ञात चले जाने में एक अपराधी मैं भी हूं। कभी माफ़ मत कीजिएगा अज्ञात जी , मेरे इस अपराध के लिए । इस लिए कि मैं कभी इस अपने अक्षम्य अपराध के लिए ख़ुद को माफ़ करने वाला नहीं हूं। अलविदा अज्ञात जी। आप तो अशोक थे लेकिन हम अब भारी शोक में हैं, अशोक नहीं हैं। दल्लों भड़ुओं के इस दौर में , कुत्ता और चूहा दौड़ में इस तरह बेनाम और बेपता मौत ही हम सब की अब तकदीर है। करें भी तो क्या करें अशोक अज्ञात जी । ख़ुद्दारी की खता की भी आख़िर कुछ तो सज़ा भी होती ही है।

मुश्किल यह भी है कि जैसे उन के पिता उन्हें भंवर में छोड़ कर चले गए थे , वैसे ही अज्ञात जी भी अपने बच्चों को भंवर में ही छोड़ कर गए हैं। दो बेटे हैं, बेरोजगार हैं। एक बेटी है, विवाह बाकी है। पत्नी भी बीमार रहती हैं। उनका इलाज भी वह नहीं करवा पाते थे। मुश्किलें और भी बहुत हैं। ईश्वर उन के परिवार को उन के विछोह की शक्ति दे और उन की आत्मा को शांति। एक अभागा मित्र और कर भी क्या सकता है भला?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं.

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…और इस तरह नींद में चले गये अशोक अज्ञात

गोरखपुर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार अशोक अज्ञात नहीं रहे। इस सत्य को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास अब कोई चारा नहीं है। करीब छह-सात साल पहले की बात है। अशोक अज्ञात प्रेस क्लब का चुनाव जीते। उनकी पत्रकार-मंडली का शपथ-ग्रहण समारोह होना था। अज्ञात एक दिन मुझसे टकरा गये। बोले– शपथग्रहण समारोह के लिए मुख्य अतिथि के रूप में किसे बुलाऊँ?

मैंने कहा– सोचने का मौका दीजिए। दिमाग और नजर दौड़ाने लगा। अन्त में एक नाम सूझा। मैंने कहा– इस शोभा के लिए किसी ऐसे आदमी को बुलाया जाना चाहिए जो शब्द और वाणी का जादूगर हो। अज्ञात ने चयन का काम मुझ पर छोड़ दिया। मैंने कृष्ण कल्पित का चयन किया। गोरखपुर की पत्रकार बिरादरी अब भी कृष्ण कल्पित को याद करती है। मुझे याद आता है कि अशोक अज्ञात ने उस आयोजन में छोटा-सा भाषण देने के बाद कल्पित की चर्चित काव्यकृति ‘एक शराबी की सूक्तियां’ से कुछ कविताओं का पाठ भी किया था। अज्ञात मेरे ऐसे मित्र थे, जिनकी सादगी और सरलता मुझे किसी अन्य मित्र में नहीं दीखती। निष्कपट, निष्कलुष और निश्छल व्यक्तित्व के धनी अज्ञात सदैव मुस्कुराते हुए ही मिलते थे। कभी उन्हें उदास मुद्रा में नहीं पाया। दुख और पीड़ा भले उनके भीतर पल रही हो। बाहर से यही लगता था कि वह सुखी जीवन जी रहे हैं।

अज्ञात से व्यक्तिगत तौर पर मेरा परिचय 1977 के आसपास हुआ था। गोरखपुर के राजकीय जुबली कॉलेज के सामने एक फर्नीचर की दुकान है, जो मेरे एक मित्र दयाराम साहनी की है। वहीं अज्ञात का बैठना-उठना होता था। कई बार वहां अज्ञात को देखा, लेकिन सीधे उनसे परिचय न होने के कारण बातचीत नहीं हुई। एक दिन जब मैं उस अड्डे पर पहुँचा तो अज्ञात एक कविता सुना रहे थे। वह कविता इतनी दमदार थी कि मैंने उनसे उसे दोबारा सुनाने का इसरार किया। उन्होंने सुनाई। कविता गीतनुमा थी। मैंने उनसे कहा— यह कविता तो शायद बाबा नागार्जुन की है। वह कुछ-कुछ झेंपते-शरमाते हुए बोले— नहीं-नहीं यह मेरी लिखी है। मैंने उनकी बात मान तो ली, पर विश्वास नहीं हुआ। एक बार शाम के वक्त उनके डेरे पर जाना हुआ। उन दिनों अज्ञात शायद दैनिक जागरण में सब-एडिटर थे। उन्होंने रात में मेरे वहीं रुकने का कार्यक्रम बना दिया। मीट-चावल पकाया और मदिरा की व्यवस्था की। उनकी फरमाइश पर मैंने एक कविता सुनायी। और तब क्या था] उनका कवि जाग गया।

उन्होंने अलमारी से अपनी डायरी निकाली और दस-बारह गीत एवं कुछ अतुकांत कविताएं सुना डालीं। सच कहता हूँ, वैसी कविताएं मैंने न तो आज तक पढ़ी और न सुनीं। मजे की बात यह कि अज्ञात की इनमें से शायद ही कोई कविता अखबार या पत्रिका में छपी हो। तब मैं लघु पत्रिकाओं में खूब छप रहा था। अज्ञात की तुलना में मेरी कविताएं कहीं नहीं ठहरती थीं। उस समय गोरखपुर का बुद्धिजीवी समाज अज्ञात को बेहद अच्छा आदमी तो मानता था, लेकिन वह एक आला दर्जे के कवि हैं यह मान्यता नदारद थी। अज्ञात के व्यक्तित्व में गजब का वैराट्य और औदार्य था, लेकिन न जाने उनमें कौन-सी ऐसी ग्रंथि थी जो उनको ख्यात होने की कोशिश से रोकती थी। साल-डेढ़ साल पहले की बात है। मैं उनके घर पर रात में रुका था। उनकी बहुत सारी कविताएं सुनीं। उनसे कहा कि इनकी पाण्डुलिपि तैयार कर मुझे दे दीजिए। संग्रह छपवाने की जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। वह टाल गये। अब वह डायरी कहॉं और किस हालत में होगी, नहीं कह सकता। गोरखपुर गया तो खोजबीन कराने का प्रयास करूँगा। सातवें-आठवें दशक में गोरखपुर और आसपास के जिलों के गांव-कस्बों के स्कूल-कालेज विभिन्न अवसरों पर कवि सम्मेलन आयोजित किया करते थे, जिनमें स्थानीय कवि-शायर आमंत्रित किये जाते थे। अशोक अज्ञात भी इन आयोजनों में काव्यपाठ किया करते थे। वाहवाही मिलती थी, खुश हो लेते थे।

उन दिनों गोरखपुर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एवं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का अच्छा जनाधार हुआ करता था। मेरा नाता माकपा से था। अशोक अज्ञात भाकपा के कार्ड होल्डर थे। पार्टी के धरना-प्रदर्शन में सक्रिय रूप से भाग लेते थे। मैं था तो माकपा में, लेकिन लाल झंडा वाली सभी पार्टियों की गतिविधियों में रुचि लेता था और सभी के नेताओं-कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में रहता था। 1978 के आरम्भ में मुझे लखनऊ में सरकारी नौकरी मिल गयी और मैं गोरखपुर से चला गया। अशोक अज्ञात से इस बीच कोई सम्पर्क नहीं रख सका। अगस्त 1979 में रामेश्वर पाण्डेय के प्रयास से मुझे दैनिक जागरण में पत्रकार की नौकरी मिल गयी। मैं दोबारा गोरखपुर में। अप्रैल 1981 में दैनिक जागरण से निकाले जाने और उसके कुछ महीने बाद तक मैं गोरखपुर में रहा, लेकिन इस दौरान कभी अज्ञात से मिलना न हो पाया। हो सकता है, कभी कहीं दो-चार मिनट के लिए मिलना हुआ हो। याद में नहीं है।

1984 में मैंने कुछ महीने ‘आज’ अखबार में काम किया। तब अज्ञात भी ‘आज’ में आ चुके थे। आये दिन उनके घर आना-जाना होता था। मैं उनके परिवार का सदस्य जैसा था। मौका मिलने पर हम शाम की बैठकें भी कर लेते थे। इस अखबार में रहने के दौरान अज्ञात से मेरी प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। ‘आज’ मैं ज्यादा दिन न रहा। इसके बाद कई घाटों का पानी पीता रहा। आखिरकार, 1986 में ग्वालियर में पहुँच गया। वहां दैनिक भास्कर से मुझे तत्कालीन स्थानीय सम्पादक श्याम कश्यप ने निकलवा दिया। मजे की बात यह कि श्याम कश्यम ने ही मुझे नौकरी दिलवायी भी थी। कुछ महीने ‘चम्बलवाणी’ नाम के छोटे से अखबार में बिताये। और तभी मुझे राम विद्रोही जी ने, जो ‘दैनिक आचरण’ अखबार के सम्पादक हुआ करते थे, पार्ट टाइम नौकरी दिला दी। वे मेरे अत्यधिक आर्थिक कष्ट के दिन थे। एक रोज मेरे मित्र और जाने-माने पत्रकार अनिल पाण्डेय ग्वालियर आ धमके। तब वह ‘आज’ गोरखपुर में थे। ‘आज’ ज्वाइन करने का ऑफर लेकर गये थे। मैं कानपुर लग गया। उस दौरान लगभग हर महीने गोरखपुर एक-दो दिन के लिए जाता था, क्योंकि मेरा परिवार वहीं था। किसी से मिलूँ न मिलूँ, अशोक अज्ञात से अवश्य मिलता था। मेरे पास अज्ञात से जुड़ी अनगिनत यादें हैं। सभी यादें बॉंट पाना सम्भव नहीं।

अशोक अज्ञात ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आजीविका के साधन के रूप में ट्यूशन करना शुरू किया। कई साल तक इसी से वह गुजारा करते रहे। इसके बाद उन्होंने आजमगढ़ के अखबार दैनिक देवल, गोरखपुर के ‘हिन्दी दैनिक’ और दैनिक जागरण में काम करते हुए ‘आज’ में जगह पायी। आज अखबार से ही वह रिटायर हुए। आज से ग्रेच्युइटी और पीएफ का पैसा निकलवाने में उन्हें नाको चने चबाने पड़े। पता नहीं, मरने से पहले पूरा पैसा प्राप्त कर सके या नहीं। 2014-15 में मैं गोरखपुर में रहने लगा था। उस समय अज्ञात घोर आर्थिक तंगी में जी रहे थे। उनका परिवार भी बिखर रहा था। लेकिन कभी उनके माथे पर शिकन नहीं देखता था।

पत्नी सीजोफ्रेनिया की शिकार हो गयी थीं। और बाद में चल बसीं। बड़ा बेटा अतुल मानसिक रूप से बीमार हो चला था। छोटा वाला किसी प्रकार सातवीं पास कर सका और पढ़ना बन्द कर दिया। दोनों के बीच की एक बेटी है— नेहा। वह पढ़ने में ठीक थी। नेहा शायद एम कॉम कर चुकी है। अज्ञात कहते थे कि नेहा जब तक पढ़ना चाहेगी, तब तक इसकी शादी करूँगा। मैं आये दिन उनके डेरे पर पहुँच जाता था और में वहीं रुक जाता था। वह अपनी कोई परेशानी शेयर नहीं करना चाहते थे। मैं ही उनको खोद-खोद कर पारिवारिक दिक्कतों की जानकारी लेता था। उनकी गम्भीर बीमारी की शुरुआत अनवरत हिचकी आने से हुई। करीब एक साल तक उन्हें हिचकी आती रही। इलाज चलता रहा। कोई फायदा नहीं होता था। इसी बीच, उन्‍हें मसूढ़े में दर्द की शिकायत हुई। कुछ दिन टालते रहे। जब शुभचिन्तकों के दबाव में जांच करायी तो कैंसर निकला। कीमोथेरैपी ने कुछ महीने उन्हें जिन्दगी बख्शी। जिस रोज उनकी मौत की खबर पायी, उससे दस दिन पहले ही फोन पर बात हुई थी। फोन नेहा ने उठाया था। बोली— पापा बात कर पाने की हालत में नहीं हैं। वह लाइन पर आये, दो-चार वाक्य बोल सके। और अन्त में कहा— विनय जी, नींद आ रही है। अब सोने दीजिए!

लेखक Vinay Shrikar से संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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टैक्स गुरु सुभाष लखोटिया कैंसर के ताजा अटैक को मात न दे सके

सुभाष लखोटिया के प्रशंसकों एवं चहेतों के लिए यह विश्वास करना सहज नहीं है कि वे अब इस दुनिया में नहीं रहे। भारत के शीर्ष टैक्स और निवेश सलाहकार के रूप में चर्चित एवं सीएनबीसी आवाज चैनल पर चर्चित शो ‘टैक्स गुरु’ के 500 से अधिक एपिसोड पूरा कर विश्व रिकार्ड बनाने वाले श्री लखोटिया अनेक पुस्तकों के लेखक थे। वे पिछले कई दिनों से जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे थे। उनको कैंसर था। डाक्टरों ने बहुत पहले उनके न बचने के बारे में कह दिया था लेकिन अपने विल पावर और जिजीविषा के कारण वे कैंसर व मौत, दोनों को लगातार मात दे रहे थे। पर इस बार जब हालत बिगड़ी तो कई दिनों के संघर्ष के बाद अंततः दिनांक 11 सितम्बर 2016 की मध्यरात्रि में इस दुनिया को अलविदा कह गए।

हम सबके लिए यह हृदय विदारक और मन को पीड़ा देने वाला क्षण है जब हम सब अपने अजीज एवं हजारों-हजारों के चेहते श्री लखोटिया के असामयिक निधन के संवाद से उबर नहीं पा रहे हैं, यह अविश्वसनीय-सा लग रहा है और गहरा आघात दे रहा है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से वे न केवल दिल्ली बल्कि देश की विभिन्न सार्वजनिक संस्थाओं की धड़कन बन गये थे। उनका मन अंतिम क्षण तक युवा-सा तरोताजा, सक्रिय, आशावादी और पुरुषार्थी बना रहा।

सुभाष लखोटिया के जीवन के दिशाएं विविध हैं। आपके जीवन की धारा एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। आपने कभी स्वयं में कार्यक्षमता का अभाव नहीं देखा। क्यों, कैसे, कब, कहां जैसे प्रश्न कभी सामने आए ही नहीं। हर प्रयत्न परिणाम बन जाता कार्य की पूर्णता का। यही कारण है कि राजधानी दिल्ली की अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और जनकल्याणकारी संस्थाएं हैं जिससे वे सक्रिय रूप से जुड़े थे, वे अपने आप में एक व्यक्ति नहीं, एक संस्था थे। वे राजस्थान अकादमी, इनवेस्टर क्लब, लायंस क्लब नईदिल्ली अलकनंदा, मारवाड़ी युवा मंच, राजस्थान रत्नाकर और ऐसी अनेक संस्थाओं को उन्होंने पल्लवित और पोषित किया। उनकी अनेक अनूठी एवं विलक्षण विशेषताएं थीं और इसी कारण वे जन-जन में लोकप्रिय थे। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे। उनका जीवन घटनाबहुल था उसमें रचनात्मकता और सृजनात्मकता के विविध आयाम गुंथित थे।

अजमेर में जन्में श्री लखोटिया राजस्थान की संस्कृति एवं राजस्थानी भाषा के विकास के लिये निरन्तर प्रयत्नशील थे। दिल्ली में राजस्थानी अकेडमी के माध्यम से वे राजस्थानी लोगों को संगठित करने एवं उनमें अपनी संस्कृति के लिये जागरूकता लाने के लिये अनेक उपक्रम संचालित करते रहे हैं। न केवल राजधानी दिल्ली बल्कि देश-विदेश में राजस्थान की समृद्ध कला, संस्कृति व परंपरा पहुंचाने के लिये प्रयासरत थे। बीते 25 वर्ष से अकेडमी द्वारा लगातार दिल्ली में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, विभिन्न प्रतियोगिताओं, कवियत्री सम्मेलन, मरु उत्सव, राजस्थानी लेखकों को सम्मानित करने के आयोजन उनके नेतृत्व में होते रहे हैं। वे राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलवाने के लिए पिछले कई वर्षो से प्रयासरत थे। महिलाओं के लिए यह संस्था विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करती है और विशेष कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित भी करती है। संस्था का उद्देश्य देश-विदेश में रह रहे लोगों को एक साथ एक मंच पर लाना और आपसी भाई-चारे का मजबूत करना भी है। संस्था राजस्थान से जुड़ी हर परम्परा और उन क्षेत्रों से जुड़े कलाकार, विशेषज्ञ तथा बेहतर कार्य करने वालों को सहयोग कर आगे बढ़ावा देती है।

श्री सुभाष लखोटिया को सम्पूर्ण जीवन लायनिज्म को समर्पित रहा है। वे 1970 में ही लायंस इंटरनेशनल के द्वारा सर्वश्रेष्ठ युवा लायंस के रूप में सम्मानित हो गये थे। वे लायंस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के संस्थापक एवं आधारस्तंभ थे। उनकी भारत में लायनिज्म को आगे बढ़ाने के लिए अविस्मरणीय एवं अनुकरणीय सेवाएं रही हैं। वे इस क्लब के माध्यम से सेवा, परोपकार के अनेक जनकल्याणकारी उपक्रम करते रहते थे। हाल ही में उन्होंने सेवा की गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिये प्रतिवर्ष एक लाख रूपये का ‘सुभाष लखोटिया सेवा पुरस्कार’ देना प्रारंभ किया। वे क्लब के विकास में न केवल सहभागी बने बल्कि उसे बीज से बरगद बनाया, उन सब घटनाओं और परिस्थितियों का एक अलग इतिहास है। उनसे जुड़े अनेक प्रसंग और घटनाएं हैं जिन्हें लांयस क्लब नई दिल्ली अलकनंदा के लिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है। श्री रामनिवास लखोटिया के वे पुत्र थे। पिता और पुत्र दोनों ने अजमेर में विक्टोरिया अस्पताल के समीप मोहनलाल गंगादेवी लखोटिया धर्मशाला का निर्माण करके समाजोपयोगी एवं प्रेरणादायी कार्य किया। वे पुष्कर के विकास के लिये भी तत्पर रहते थे। उन्होंने पद-प्रतिष्ठा पाने की न कभी चाह की और न कभी चरित्र कसे हासिये में डाला। स्वस्थ चिंतन से परिवर्तन की जो बुनियाद तैयार होगी वही स्वस्थ समाज एवं लोकमंगलकारी जीवन का नव-विहान करेगी- यही लखोटियाजी के जीवन का मार्ग है।

श्री सुभाष लखोटिया अनेक पुरस्कारों से सम्मानित हुए है। सन् 2010 में ‘साहित्यश्री पुरुस्कार’, ‘सूर्यदत्त राष्ट्रीय अवार्ड’ एवं सन् 2014 में उन्हें लायंस इंटरनेशनल के द्वारा ‘सद्भावना के राजदूत पुरुस्कार’ से सम्मानित किया गया। सन् 2010 में टैक्स गुरु बिसनेस शो के लिये राष्ट्रीय टेलीविजन अवार्ड भी प्रदत्त किया गया। हर व्यक्ति को लखपति और करोड़पति बनाने के लिये उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकें काफी लोकप्रिय हुई है। वे समृद्धि की ही बात नहीं करते बल्कि हर इंसान को नैतिक एवं ईमानदार बनने को भी प्रेरित करते। देश के दर्जनों अखबारों में उनके न केवल टैक्स सलाह एवं निवेश से संबंधित बल्कि जीवन निर्माण एवं आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित लेख-साक्षात्कार प्रकाशित होते रहते थे। लखोटियाजी सतरंगी रेखाओं की सादी तस्वीर थे। गहन मानवीय चेतना के चितेरे थे। उनका हंसता हुआ चेहरा रह-रहकर याद आ रहा है।

इस संसार में जन्म-मृत्यु का क्रम सदा से चलता रहा है। कुछ लोग अपने चुंबकीय व्यक्तित्व से अमिट छाप छोड़ जाते हैं। ऐसे ही दुर्लभ व्यक्तित्व के धनी थे लखोटियाजी। मिलनसार एवं हंसोड़ व्यक्तित्व उनका था, जो उन्हें हर किसी से एकाकार कर देता था। गुणग्राहकता ने उनके इस व्यक्तित्व को और भी लुभावना रूप दे दिया था। सरल व्यवहार से संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को वे आकर्षित कर लेते थे। उनके जीवन की दिशाएं विविध हैं, वे एक दिशा में प्रवाहित नहीं हुई है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं का स्पर्श किया है। उनके जीवन की खिड़कियाँ समाज को नई दृष्टि देने के लिए सदैव खुली रही। वे एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता थे, वहीं उत्कृष्ट समाज सुधारक और संवेदनशील जनसेवक एवं विचारक थे। वे चित्रता और मित्रता के प्रतीक थे।

लखोटियाजी की अनेकानेक विशेषताओं में एक प्रमुख विशेषता यह थी कि वे सदा हंसमुख रहते थे। वे अपने गहन अनुभव एवं आध्यात्मिकता के कारण छोटी-छोटी घटना को गहराई प्रदत्त कर देते थे। अपने आस-पास के वातावरण को ही इस विलक्षणता से अभिप्रेरित करते थे। यही मानक दृष्टि उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को समझने की कुंजी है। लखोटियाजी कहा करते थे कि जितना हो सके दूसरों के लिए सुख बांटो क्योंकि इस संसार में उसके समान अन्य कोई धर्म नहीं है। किसी को पीड़ित मत करो, किसी का दिल मत दुखाओ, क्योंकि उसके समान अन्य कोई पाप नहीं है। यह प्रयोग, समस्याओं के आर-पार जाने की क्षमता, वास्तविकता पर पडे़ आवरणों को तोड़ देने की ताकत और मनुष्यों की चिंता उनके अनुभवों में भी दिखाई पड़ती थी। इतिहास और वर्तमान-दोनों जगह वह उत्पीड़न के खिलाफ हैं और उसकी अभिव्यक्ति में पूरी तरह भयमुक्त हैं। अपनी तेज आंखों से वे उस सच को पहचान ही लेते हैं जो आदमी को तोड़ता है और उसे मशीन का केवल पुर्जा बनाकर छोड़ देता है।

लखोटियाजी के जीवन के सारे सिद्धांत मानवीयता की गहराई से जुड़े हैं और उस पर वह अटल भी रहते हैं किंतु किसी भी प्रकार की रूढ़ि या पूर्वाग्रह उन्हें छू तक नहीं पाता। वह हर प्रकार से मुक्त स्वभाव के हैं और यह मुक्त स्वरूप भीतर की मुक्ति का प्रकट रूप है। यह उनके व्यक्ति की बड़ी उपलब्धि है। स्वभाव में एक औलियापन है, फक्कड़पन है और फकीराना अंदाज है और यह यह सब नैसर्गिक रूप में विद्यमान है जिसका पता उन्हें भी नहीं है। उनका दिल और द्वार सदा और सभी के लिए खुला रहा अनाकांक्ष भाव से जैसे यह स्वभाव का ही एक अंग है। मित्रों की सहायता में सदा तत्पर रहे। अपना दुख कभी नहीं कहा किन्तु दूसरों का दुख अवश्य बांटते रहे। छोटी बातों को बड़ा बनाकर कभी नहीं कहते, बड़ी बात को सहज भले बना दें।

लखोटियाजी में विविधता थी और यही उनकी विशेषता थी। उन्हें प्रायः हर प्रदेश के और हर भाषा के लोग जानते थे। उनकी अनेक छवि, अनेक रूप, अनेक रंग उभर कर सामने आते हैं। ये झलकियां बहुत काम की हैं। क्योंकि इससे सेवा का संसार समृद्ध होता है। लखोटियाजी का जितना विशाल और व्यापक संपर्क है और जितने अधिक लोग उन्हें करीब से जानने वाले हैं, अपने देश में भी और विदेशों में भी, उस दृष्टि से कुछ शब्दों से उनके बारे में बहुत नहीं जाना जा सकता, और भी आयाम और अनेक रोचक प्रसंग उजागर हो सकते हैं। यह काम कठिन अवश्य है, असंभव नहीं। इस पर भविष्य में ठोस काम होना चाहिए, ताकि उनकी स्मृति जीवंत बनी रहे।

लेखक ललित गर्ग से संपर्क 9811051133 के जरिए किया जा सकता है.

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एक दिन, दो गम

अजय कुमार, लखनऊ

एक साहित्य जगत की महान विभूति थी तो दूसरा संगीत की दुनिया का सम्राट। एक कलम का उस्ताद था तो दूसरे की उंगलियों की थाप लोंगो को सम्मोहित कर लेती थी। दोनों ने एक ही दिन दुनिया से विदा ली। बात तबला सम्राट पंडित लच्छू महाराज और साहित्य की हस्ताक्षर बन गईं महाश्वेता देवी की हो रही है। भगवान भोले नाथ की नगरी वाराणसी से ताल्लुक रखने वाले लच्छू महाराज और बंगाल की सरजमी से पूरे साहित्य जगत को आईना दिखाने वाली ‘हजार चौरासी की मां’ जैसी कृतियां की लेखिका महाश्वेता देवी (90) ने भले ही देह त्याग दिया हो लेकिन साहित्य जगत और संगीत प्रेमिेयों के लिये यह हस्तियां शायद ही कभी मरेंगी। अपने चाहने वालों के बीच यह हमेशा अमर रहेंगी।

बात पहले लच्छू महाराज की। तबला को नई  बुलंदियों तक ले जाने वाले वाले 71 वर्षीय लच्छू महाराज की अचानक हदय गति रूकने से हुई मौत की खबर जिसने भी सुनी उसके मुंह से बस एक ही शब्द निकला, ’बनारस घराने का तबला शांत हो गया’। जाने-माने तबला वादक पंडित लच्छू महाराज अभिनेता गोविंदा के मामा थे। लच्छू महाराज की मौत की खबर सुनते ही ठुमरी गायिका पद्विभूषण गिरिजा देवी, पद्मभूषण पंडित छन्नू लाल मिश्र, पंडित राजन -साजन मिश्र जैसे तमाम लोग स्तब्ध रह गये।

लच्छू महाराज यों ही महान नहीं बन गये थे। सम्मान हाासिल करने के लिए इस दौर में जहां लोग एड़ी चोटी का जोर लगा देते है। वहीं फक्कड़ मिजाज पंडित लच्छू महाराज ने पद्मश्री सम्मान ठुकार दिया  था। सितार के शहंशाह बड़े गुलाम अली, भारत रत्न पंडित रविशंकर समेत देश- दुनिया के नामचीन कलाकारों के साथ संगत करने वाले पंडित लच्छू महाराज ने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा  वह जीवन भर ईमादारी और रियाज के बल पर आगे बढ़ने की वकालत करते रहे।वर्ष 1992 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली सरकार थी तब तबला वादक पंडित लच्छू महाराज को पद्मश्री सम्मान के लिए नामित किया गया था। जब अफसर के घर आने की खबर महाराज को दी गईं तब उन्होंने बैरंग वापस कर दिया, लेकिन दुख की बात है कि उनकी अंतिम यात्रा अथवा श्रद्धांजलि देने को संगीत जगत की बड़ी हस्ती तो क्या नेता – जनप्रतिनिधि और अफसर तक नहीं पहुंचे। स्विट्जरलैंड से पत्नी टीना और बेटी चंद्रा नारायणी वीजा न मिलने के चलते तो भांजे एक्टर गोंविदा मौसम खराब होने से नहीं आ सके। सिंगर दलेर मेहंदी के भाई शमशेर मेहंदी को छोड़ दुनिया भर में फैले उनके हजारों शिष्यों में से एक भी नहीं दिखे।

भाई जय नारायण महाराज से जुड़े एक वाक्ये का वर्णन करते हुए कह रहे थे, ‘एक बार मशहूर नृत्यांगना सितार देवी के साथ उनका तबला वादक नहीं आया था। संगत के लिए लच्छू महाराज मंच पर आए तब सितार देवी ने कहा था ये बच्चा बजाएगा। लेकिन जब लच्छू महाराज ने बजाना शुरू किया तो 20 मिनट का कार्यक्रम 16 घंटे तक नॉन स्टॉप चलता रहा। पैर में खून बहने से सितारा देवी ही रुकीं और लच्छू महाराज को गले लगा लिया था।’

बात हजार चौरासी की मां जैसी कृतियां देने वाली महाश्वेता देवी (90) की कि जाये तो उपेक्षितों और दबे- कुचले तबकों की आवाज उठाने वाली लेखिका महाश्वेता का भी इसी दिन खून में सक्रमण और किडनी के काम करने से बंद कर देने के कारण मौत हो गई। साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण और मैग्सेसे जेसे पुरस्कारों से सम्मानित ‘हजार चौरासी की मां’ के अलावा ‘अरण्य अधिकार’ आदि शामिल है। महाश्वेता की लघु कहानियों के 20 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। महाश्वेता की मौत पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा,‘ देश ने एक महान लेखक को खोया है। जबकि बंगाल ने अपनी मां को खो दिया है।’

लेखक अजय कुमार उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र कुमार लल्ला का निधन

Jaishankar Gupta : दुखद सूचनाओं का सिलसिला है कि टूटने का नाम ही नहीं ले रहा। अभी अपने से बड़े लेकिन इलाहाबाद के दिनों से ही मित्र नीलाभ अश्क के निधन से उबर भी नहीं सके थे कि लल्ला जी- योगेंद्र कुमार लल्ला उर्फ योकुल के निधन के समाचार ने भीतर से हिलाकर रख दिया। लल्ला जी को जानता तो था मैं उनके धर्मयुग के जमाने से ही, लेकिन उन्हें करीब से जानने- समझने का अवसर कलकत्ता, आज के कोलकाता में आनंद बाजार पत्रिका के हिंदी साप्ताहिक रविवार के साथ जुड़ने के बाद मिला।

योगेंद्र कुमार लल्ला

लल्ला जी, बच्चों की बांग्ला भाषी लोकप्रिय पत्रिका आनंदमेला के हिंदी संस्करण मेला के संपादक के रूप में आनंद बाजार पत्रिका के साथ जुड़े थे। मेला के असामयिक अवसान के बाद वह रविवार के संयुक्त संपादक बन गए थे। उस समय रविवार के संपादक थे, हमारे एसपी यानी सुरेंद्र प्रताप सिंह। बाद में, एसपी सिंह के नवभारत टाइम्स के साथ जुड़ने के बाद उदयन (शर्मा) जी रविवार के संपादक बने तब भी या कहें रविवार के भी असमय अवसान तक लल्ला जी रविवार के साथ उसी पद पर बने रहे।

हम 1982 के शुरुआती महीनों में रविवार की संपादकीय टीम के साथ बतौर उपसंपादक जुड़े थे। उससे पहले रिटेनर के रूप में रिपोर्टिंग करते थे। रविवार के संपादकीय कार्यालय में मुझे लल्ला जी के पास ही बैठने और उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। हमारा निवास, उत्तर कोलकाता में सिंथी मोड़ के पास आटापारा लेन, लल्ला जी के बांगुर एवेन्यू के मकान के करीब ही था। उनके घर हमारा अक्सर, खासतौर से साप्ताहिक अवकाश के दिन, आना जाना लगा रहता था। वह हमारे, बड़े, संरक्षक भाई की तरह थे। भाभी भी बहुत स्नेहिल थीं।

रविवार के बंद होने के बाद भी कुछ महीनों तक हम लोग आनंदबाजार पत्रिका के साथ रहे। तब हम पटना में थे।

दिल्ली में हम नवभारत टाइम्स के साथ हो लिए। कुछ समय बाद लल्ला जी मेरठ में अमर उजाला के साथ फीचर संपादक के रूप में जुड़ गए थे। एक बार हम सपरिवार मेरठ उनके निवास पर गए थे। भाभी बच्चों को देख बेतरह खुश हुई थीं क्योंकि कोलकाता प्रवास के समय हमारे बच्चे नहीं थे।

कुछ वर्ष पहले उनसे वैशाली के उनके निवास पर मुलाकात हुई थी, लंबी। खूब सारी बातें हुई थीं, नई पुरानी। धर्मयुग से लेकर रविवार और इन कालजयी पत्रिकाओं के साथ जुड़े लोगों, राजनीति आदि के बारे में भी। उसके बाद से हमारा मिलना नहीं हुआ। वह क्रासिंग रिपब्लिक, गाजियाबाद में रहने चले गए थे। आज जब अकस्मात उनके निधन का समाचार मिला तो सहम सा गया। एसपी, उदयन जी के बाद लल्ला जी भी चले गए। लेकिन इन तीनों के साथ बिताए पल और उनसे जुड़ी समृतियां झकझोर रही हैं। नियति पर किसी का जोर नहीं, इस यथार्थ को स्वीकार कर पाना भी भारी पड़ रहा है। उनके साथ जुड़ी स्मृतियों को प्रणाम।

अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से प्रमुख दो कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Satyendra Pratap Singh प्रशिक्षु पत्रकार से उप संपादक व संवाददाता बनाने में योगेंद्र कुमार लल्ला जी का बहुत बड़ा योगदान था।रविवार बंद होने के बाद मैं उनसे जब मिलकर कहा कि आप कल दिल्ली जाकर घनश्याम पंकज जी मिल लीजिये।उन्होंने आपको दिनमान टाइम्स ज्वाइन करने के लिए बुलाया है तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ था।फिर उनके सामने मैं पंकज जी को फोन करके उनसे बात करवाया था।बाद में वह पंकज जी के साथ ‘स्वतंत्र भारत’ के लिए लखनऊ भी गए थे।लल्ला जी से मेरी आखिरी मुलाक़ात एस पी सिंह जी की अंतिम यात्रा में 19 साल पहले हुई थी। भावभीनी श्रद्धांजलि।

Satish Misra अपने जर्मनी प्रवास के दौरान धर्मयुग में लिखने का अवसर मिला। धर्मवीर भारती जी से खितोकिताबत होती थी पर उतर या तो सरल जी का या लल्ला जी का आता था। एक बार मुलाकात मुम्ब्बई में धर्मयुग के दफ्तर में हुई। उनसे फिर मुलाकात नहीं हुई। दुःख हुआ। श्रधांजलि

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सबसे माफी मांगते अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी

Hareprakash Upadhyay : सबसे माफी माँगते हुए अनंत की ओर चले गये नीलाभ जी। बेहद प्रतिभावान-बेचैन, सहृदय लेखक, कवि- अनुवादक! मुझसे तो बहुत नोक-झोक होती थी, मैं उन्हें अंकल कहता था और वे मुझे भतीजा! अंकल! अभी तो कुछ और दौर चलने थे। कुछ और बातें होनी थी। आप तो सबका दिल तोड़ चले गये। पर शिकायतें भी अब किससे और शिकायतों के अब मानी भी क्या! अंकल, हो सके तो हम सबको माफ कर देना। नमन अंकल! श्रद्धांजलि!

Ajit Rai : नीलाभ नहीं रहे। नीलाभ से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब मैं 1989 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान में एम ए का छात्र था। सिविल लाइंस मे नीलाभ प्रकाशन के दफ्तर में सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद पर चर्चा करने जाता था। तब वे बीबीसी लंदन से लौटे ही थे। इन 27 सालों में अनगिनत मुलाकातें हैं। अभी पिछले साल हम अशोक अग्रवाल के निमंत्रण पर कुछ दिन शिमला में थे। उनके साथ की तीखी धारदार बहसों से हमे बहुत कुछ मिलता था। वे हमारी यादों मे हमेशा अमर रहेंगे।

Vishnu Nagar : खबर है कि नीलाभ नहीं रहे। कुछ ही दिन पहले उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के समारोह में देखा था बल्कि पहले उन्होंने मुझे देखा था और जैसा कि वे करते थे अक्सर समकालीनों के साथ व्यंग्योक्ति के साथ मेरा स्वागत किया था। फिर जब कार्यक्रम के बाद लौटने लगा तो वह संसद भवन के सभागार से निकलकर कुछ दूर एक दरवाज़े से टिककर खड़े थे पत्नी के साथ। ध्यान दिया तो उनके दोनो पैर बुरी तरह सूजे हुए थे। मैंने पूछा कि क्या हुआ तो टाल गये। एक मित्र ने बताया कि उनकी दोनों किडनियाँ क्षतिग्रस्त हो गई थीं। मैंने प्रस्ताव किया कि मैं आपको सहारा देकर दरवाज़े तक ले चलूँ तो उन्होंने कहा, नहीं धीरे-धीरे चला जाऊँगा। क्या पता था कि इतनी जल्दी वे नहीं रहेंगे। उनके एक घनिष्ठ मित्र पंकज सिंह सात महीने पहले नहीं रहे थे, अब वे भी नहीं हैं। वे अच्छे कवि तो थे ही, अनुवाद करने में उनका सानी नहीं था। पिछले दिनों मैं उनके विदेशी कविताओं के कुछ अनुवाद पढ़ता रहा हूँ। उन्होंने वर्धा के हिंदी विश्वविद्यालय के लिए हिंदी साहित्य के मौखिक इतिहास पर बहुत अच्छा काम किया था, अपने ढँग का अनूठा मगर उसकी पूरी तरह अनदेखी हो गई, जिससे उनका तो क्या नुक्सान होना था हिंदीजगत का नुक्सान हुआ और होता रहेगा।

हरेप्रकाश उपाध्याय, अजित राय और विष्णु नागर की एफबी वॉल से.

मूल खबर :

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जाने-माने पत्रकार और ‘रंग प्रसंग’ के संपादक नीलाभ अश्क का निधन

नीलाभ नहीं रहे. नीलाभ यानि नीलाभ अश्क. आज सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली. पिछले कुछ दिनों से वे बीमार चल रहे थे. नीलाभ ‘रंग प्रसंग’ के संपादक थे. फेसबुक पर नीलाभ के कई जानने वालों ने उनके निधन की खबर पोस्ट की है. पत्रकार और समालोचक संगम पांडेय ने लिखा है- ”अभी-अभी ‘रंग प्रसंग’ के संपादक नीलाभ जी के अंतरंग रूपकृष्ण आहूजा ने बताया कि नीलाभ जी नहीं रहे।”

अशोक कुमार पांडेय, राहुल पांडेय और विमल वर्मा ने भी नीलाभ के न रहने की दुखद जानकारी साझा की है. विमल वर्मा लिखते हैं- ”अरे, नीलाभ भाई नहीं रहे। विश्वास नहीं हो रहा।” अरुण कुमार कालरा का कहना है कि कुछ समय पहले ही नीलाभ को उन्होंने NSD campus में देखा था… तब तो अस्वस्थ नहीं लग रहे थे परंतु अभी किसी ने बताया की कुछ दिनों से बीमार थे।

नीलाभ न सिर्फ एक बड़े पत्रकार थे बल्कि कवि, अनुवादक, रंगकर्मी, समालोचक समेत कई विधाओं के विशेषज्ञ थे. मनुष्य के रूप में बेहद फक्कड़, मनमौजी और सूफी तबीयत वाले नीलाभ पिछले कुछ वर्षों से पारिवारिक विवादों के कारण परेशान थे. हालांकि आखिरी दिनों में सब कुछ सेटल हो गया था और वे अपना सुखी पारिवारिक जीवन जी रहे थे. उन्होंने पिछले ही दिनों फेसबुक पर दो प्रायश्चित पत्र लिखे जो फेसबुक पर लिखे उनके आखिरी पोस्ट साबित हुए. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी भूमिका द्विवेदी और प्रकाश अशोक माहेश्वरी से माफी मांगी थी. इस पत्र का भाषा और संवेदना कुछ ऐसा है कि पढ़ने वाला पूरे दिल से नीलाभ के दुख और प्रायश्चित में शरीक हो जाता है.

नीलाभ के निधन पर भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि नीलाभ दा के साथ कई शामें गुजारी हैं. वे गार्जियन, दोस्त, संरक्षक, शिक्षक समेत कई रूपों में दिखते थे. खुलकर अपनी बात कहने और जमकर ठहाके लगाने वाला शख्स इतनी जल्दी चला जाएगा, यकीन नहीं हो रहा. जिंदगी को पूरी उदात्तता, साहस और संवेदनशीलता के साथ जीने वाले शख्स का नाम है नीलाभ. भड़ास के दरियागंज आफिस में कई बार नीलाभ रुके और वहां उनसे कई किस्म की जानकारियां सीख सबक हासिल किया था. नीलाभ के न रहने से महसूस हो रहा कि हम लोगों के सिर से किसी अपने बेहद खास का साया उठ गया. पहले आलोक तोमर, फिर वीरेन डंगवाल, फिर पंकज सिंह और अब नीलाभ. एक एक कर वो सारे लोग ये दुनिया छोड़ जा रहे जिनके होने पर यह यकीन रहा करता था कि हम लोगों का कोई बड़ा भाई, कोई शिक्षक, कोई संरक्षक इस दुनिया में मौजूद है. अलविदा नीलाभ दा.

नीलाभ के निधन पर हरे प्रकाश उपाध्याय, अजित राय और विष्णु नागर की त्वरित टिप्पणियां….


नीलाभ ने आखिरी जो कुछ पोस्ट्स लिखी थीं, उन्हें नीचे के शीर्षक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं…


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