टीवी पत्रकार शिवेंद्र प्रताप सिंह के पिताजी का बनारस में निधन

बनारस से मिली जानकारी के मुताबिक टीवी पत्रकार शिवेंद्र प्रताप सिंह के पिताजी राजेंद्र प्रताप सिंह का निधन हो गया है. वे 62 साल के थे और बनारस के शिवपुर के निवासी थे. पिछले 4 महीने से राजेंद्र प्रताप सिंह की तबियत खराब चल रही थी. उन्हें ब्रेन ट्यूमर हुआ था जिसका इलाज चल रहा था. 20 जुलाई को उन्होंने अंतिम सांस ली. बनारस के मणिकर्णिका घाट पर परिजनों और शुभचिंतकों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार हुआ.

पत्रकार शिवेंद्र अपने मां-पिता के अकेले हैं. उनके पिता जी कई कंपनियों में नौकरी करने के बाद रिटायर हो गए थे और अब गांव व बनारस में रहते थे. इकलौते पुत्र शिवेंद्र इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज, न्यूज24, लाइव इंडिया आदि चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. वे हिंदुस्तान अखबार के बनारस संस्करण के भी हिस्से रहे हैं. पिता के न रहने पर अब घर-परिवार की सारी जिम्मेदारी शिवेंद्र के कंधों पर आ गई है.

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नवगछिया के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार झा उर्फ सुनील झा नहीं रहे

शुक्रवार को चार बजे सुबह पटना के आईजीआईएमएस में ली अंतिम सांस… बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर के दयालपुर ग्राम के निवासी सुनील कुमार झा का शुक्रवार को पटना के आईजीआईएमएस में इलाज के दौरान निधन हो गया. वे कैंसर से पीड़ित थे. कुछ दिनों पूर्व जब उन्हें परेशानी हुई तो उन्हें इलाज के लिए भागलपुर के जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अन्न जल लेना पूरी तरह से बंद कर दिया था.

भागलपुर में सुधार नहीं होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान रेफर किया गया. लेकिन यहां भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ. शुक्रवार को सुबह चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके पार्थिव शरीर को दोपहर बाद तक उनके पैतृक आवास पर लाया गया. शनिवार को उनका दाह संस्कार किया गया. सुनील कुमार झा उर्फ सुनील दा करीब 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय थे. उन्होंने पटना व भागलपुर से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान, नई बात और दैनिक भास्कर में बिहपुर से कार्य किया. वे बिहपुर के पहले पत्रकार थे.

वे नवगछिया व्यवहार न्यायालय में अधिवक्ता भी थे. उनके निधन पर बड़े भाई विनोद कुमार, दिलीप कुमार झा, गोपी कृष्ण झा, मां गायत्री देवी गहरे सदमे में हैं. सुनील झा बेबाक और स्पष्टवादी पत्रकार के रूप में पूरे नवगछिया अनुमंडल में जाने जाते थे. वे प्रखर वक्ता भी थे. किसी मंच से उनका संबोधन श्रोताओं को ताली बजाने को मजबूर कर देता था. सुनील झा का स्कूली जीवन तुलसीपुर हाई स्कूल में बीता. वे यहां छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे. फिर उन्होंने अंग्रेजी भाषा से एमए किया और एलएलबी भी किया. सुनील झा के निधन पर नवगछिया अनुमंडल के पत्रकार शोक संतप्त हैं. पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है.

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वेद उनियाल यानि एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत…

Yogesh Bhatt : एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत. आज की पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो वेद भाई (वेद उनियाल) के नाम से परिचित होंगे। वेद भाई संघर्ष का वो नाम है , जो जिया भी संघर्ष में और विदा भी संघर्ष करते करते हुआ। वेद उनियाल उत्तराखंड राज्य आंदोलन का वो नाम है, जिसने इस आंदोलन को उम्र भर जिया। न कोई कारोबार, न कोई सियासत, न कोई रोजगार, सिर्फ और सिर्फ संघर्ष। राज्य आंदोलन के दौर में वह सिर्फ प्रथम पंक्ति के योद्धा ही नहीं, बल्कि चिंतक, विचारक और प्रमुख रणनीतिकार भी रहे। अस्सी-नब्बे के दशक के दौरान जनांदोलनों, जन सरोकारों से जुड़े लोग बखूबी वेद उनियाल से वाकिफ हैं।

वेद उनियाल मूलत: हार्डकोर वामपंथी थे ,नक्सली धारा के छात्र नेता भी रहे। देहरादून डीएवी कालेज के छात्रसंघ महासचिव के रूप में उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। इसके बाद चाहे शिक्षा का आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो, रोजगार आंदोलन हो या फिर जनसरोकारों से जुड़ी कोई भी लड़ाई, शायद ही कोई ऐसा आंदोलन रहा हो , जिसमें उनकी भूमिका न रही हो। राज्य आंदोलन के दौर में जब राजनीतिक विचारधारा का सवाल उठा, तो वेद भाई ने क्षेत्रीय दल को तरजीह देते हुए यूकेडी को चुना और उसके शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे।

अनगिनत आंदोलन, भूखहड़ताल, जेल और पुलिसिया दमन, ये सब वेद भाई के जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा रहे। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह कभी भी सुविधाभोगी और अवसरवादी नहीं रहे। आंदोलन के दौर में ही वे गंभीर रूप से गठिया के शिकार हो गए , लेकिन बावजूद इसके उनका संघर्ष बरकरार रहा। उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तब गैर कांग्रेसी-गैर भाजपाई मोर्चा बनाने का जिम्मा उनके ही पास था। इतना ही नहीं उत्तराखंड क्रांति दल का राजनीतिक घोषणा पत्र बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती थी। निसंदेह वेद भाई जैसे जीवट, ओजस्वी और प्रखर आंदोलनकारी तेवर वाला जज्बा हर एक में नजर नहीं आ सकता। ये उनकी जीवटता ही थी कि दो दशक तक उन्होंने एक गंभीर रोग का डटकर मुकाबला किया।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस उत्तराखंड के लिए उन्होंने सब कुछ दांव पर रखा, वो उत्तराखंड, और सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उनके आंदोलन के दौर के साथी तक न तो उनके संघर्ष को मान्यता दिला सके और न ही आंदोलनकारी के रूप में उचित सम्मान। अपने जीवन का अंतिम सोपान वेद भाई ने बेहद कठिनाई से जिया। एक तरफ बीमारी, दूसरी तरफ आर्थिक तंगी और इसी दौरान पुत्र शोक का वज्रपात उन्हें झेलना पड़ा। चंद गिने-चुने लोग ही रहे होंगे जिन्होंने कठिन वक्त में वेद भाई की सुध ली होगी। दुभाग्यपूर्ण तो यह था कि उनके अंतिम संस्कार के दौरान चंद आंदोलनकारी चेहरे, कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी ही शामिल रहे।

वेद भाई के जाने के बाद आज सरकारों पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार को दोष दिया जा रहा है कि उसने एक राज्य आंदोलनकारी नेता के लिए कुछ नहीं किया। यह बात बिल्कुल सही है, लेकिन यह भी सच है कि दोष सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि उन आंदोलनकारी शक्तियों का भी है, जो आज अपनी ही हैसियत खो बैठे हैं। निसंदेह यदि वेद भाई भाजपा या कांग्रेस में होते, तो शायद स्थिति कुछ अलग होती। मगर जब राज्य बनने के बाद सत्ता की मलाई चाटने वाली तमाम संघर्षशील ताकतों ने ही उनकी सुध नहीं ली, तो फिर सरकार से उम्मीद ही क्या की जाती? वैसे भी मौजूदा दौर में न तो आंदोलनकारियों की कोई हैसियत है और न उनके संघर्ष को कोई मान्यता।काश, वेद भाई की अंतिम यात्रा से ही सही आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक ले पातीं।

पत्रकार योगेश भट्ट की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Subhash Sharma आर्थिक तंगी तो वेद भाई ने आजीवन झेली । फ़िर हर हाल में खुश रहना और राज्य की चिंता करना तो उनकी आदत में शुमार हो गया था । दो वर्ष पूर्व उनके एक मात्र पुत्र की मृत्यु तो, उनके साथ ज्यादती ही थी । परेशानियों की इंतेहा हो गयी थी । राज्य आंदोलन को गति देने के लिये उन्होंने लगभग 16 दिनो (या शायद उससे ज्यादा) की भूख हड़ताल की, तो वो भी पूरी ईमानदारी से । जिन पुलिस अधिकारी ने प्रशासन के आदेश पर उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिये उनको जबरन गोद में उठा कर अस्पताल में पहुँचाया था, उन्होंने मुझे बताया था कि, सूख कर हड्डियों का ढाँचा रह गये थे वेद भाई ! इसी भूख हड़ताल ने उनके लीवर, उनका नर्वस सिस्टम बहुत ज्यादा डेमेज कर दिया था । यही बीमारी बढ़ती गयी और धीरे धीरे उनके शरीर के अधिकाँश हिस्सों को प्रभावित करती चली गयी । हाँ, मस्तिष्क से वे पूरी तरह स्वस्थ थे । आदरणीय भाभीजी ने जिस तरह वेद भाई का साथ निभाया, वो तो अनुकरणीय है ही । परन्तु ओमी भाई ने भी वेद भाई का साथ बहुत ही ईमानदारी से निभाया । उनके इस तरह जाने का बहुत दुख है, पर नियति के आगे किसी का वश नहीँ । वेद भाई का फ़िर से क्रान्तिकारी अभिवादन।

Suresh Belwal भगवान वेद भाई की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे । कुछ व्यक्ति शायद मानव कल्याण के लिए ही पैदा होते हैं और अपना काम करके चले जाते हैं । ऐसे दधीचि को मेरा प्रणाम।

Sarswati P Sati वेद भाई का जाना संघर्षों के एक इतिहास की पुस्तक का गुम हो जाना जैसा है। अफ़्सोश यह प्रांत उनके लायक न बन पाया

Ganesh Kothari जिसने भी राज्य की चिंता की ..वो ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से तन्ग ही हैँ और ज़िसने कुछ भी नहीं किया वो मौज में …वाह रे उत्तराखंड की प्रबुद्ध और जागरुक जनता …

Prabhat Dhyani श्रद्वांजलि। उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण का सपना देखने वाले तथा उस सपने को हकीकत में साकार करने के लिये अपने सर्वस्व को झोंक देने वाले बड़े भाई वेद उनियाल जी का निधन उन तमाम साथियों के लिये बड़ी क्षति है जो समय-समय पर उनका मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे।तथा उनसे प्रेरणा लेते थे। साथियों से निवेदन है कि वेद भाई उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण के बाद हुयी प्रदेश में मची लूट तथा राज्य अवधारणा को दरकिनार करने से बहुत दुःखी व मायूश थे। वे इस बात को लेकर भी साथियों से बहुत ज्यादा निराश थे कि प्रदेश में मजबूत क्षेत्रीय विकल्प नहीं बन पाया जिसके कारण राज्य विरोधी ताकतें मजबूत होती गयी। उनके निधन पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्वांजलि यही होगी कि हम उस विचार व संकल्प को पूरी प्रतिबद्वता के साथ साकार करें।

Rajeev Uniyal हार्दिक अश्रुपूर्ण नमन मैंने वेद भाई को नजदीक से देखा है सदैव ऊर्जा से ओतप्रोत रहते थे और एक सुनहरे भविष्य का सपना उनकी आंखों में रहता था दुखद है कि सरकार और समाज दोनों ही ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया वैसे वेद भाई किसी सम्मान व मान की परवाह करते भी नहीं थे और सदैव संघर्षशील रहते थे

Dhirendra Kumar Uniyal भगवान वेद भाई कि आत्मा को शांति प्रदान करे ॥ सभी निकट जनो को धैर्य व साहस प्रदान करे ॥ सच्चे आंदोलनकर्ता किसी के मोहताज नहीं होते वो सबके दिलो मे होते हैं चाहे वो बाबा उत्तराखण्डी हों , चाहे बाबा बमराडा हों , चाहे श्रीदेव सुमन हों ॥ स्वार्थ वस सब श्रद्धाजंलि व माल्यापर्ण तक हीं सीमित रहते हैं जबकि हमे उनके आदर्शों पर चलकर उनके सपनों को साकार करना पडेगा जिसके लिये हम कटिबद्ध हैं ॥

Arya Surendra सच लिखा, अच्छा लिखा। पोस्ट में उठाया गया सवाल न तो सरकार और न ही किसी भी संगठन को कठघरे में खड़ा करता है। यह सामाजिक संवेदना का विषय है। इस स्तर पर पूरे समाज मे हो रहे क्षरण पर हमारा ध्यान नहीं जाता। ज्यादातर आंदोलन, संघर्ष और हड़ताले एक छोटे वर्ग के हित लाभ से जुड़े एजेंडे पर राजनीतिक उद्देश्य से होते हैं इसलिए उस एजेंडे/संघर्ष और उसके नेतृत्व से बड़े समाज का कोई भावात्मक लगाव नहीं रहता जो बाद में उसके व्यवहार में उदासीनता के रूप में दिखाई देता है।

Amitabh Srivastava He was always ready with answers for every question we asked him. The more difficult the problem the brighter his solution. But unfortunately he had no answers about his own life’s problems. RIP.

Geeta Ram Gaur इस महान संघर्षशील व्यक्तित्व को दिल से भावनात्मक श्रद्धांजलि ईश्वर इन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें , भाई जी आपके इस लेख ने उनसे जुडे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है और आत्म अवलोकन करने पर मजबुर कर दिया है , साथ ही आपने सच्ची श्रदांजलि लेख के माध्यम से भी दी है_ॐ शांति -3
Dataram Chamoli भट्ट जी आपने सही कहा कि आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक लें। सवाल अकेले वेद उनियाल जी का नहीं है। इससे पहले स्वर्गीय बी. एस. परमार उत्तराखंडी के अंतिम दिन भी बहुत खराब रहे। इलाज और रोटी के लिए वे मोहताज रहे। अफसोस कि उक्रांद के काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, पुष्पेश त्रिपाठी जैसे साधन संपन्न नेताओं ने उनका हाल जानने की जरूरत तक नहीं समझी थी। खैर, हम आम लोग तो यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर वेद जी की आत्मा को शांति प्रदान करे।

Ashish Uniyal योगेश भाई आपका लेख लुंजपुंज होती संवेदनाओं को कितना झकझोर पाएंगा, यह तो नहीं बताया जा सकता लेकिन आपके दिखाए इस दर्पण में आंदोलनकारी ताकतों को अपना चेहरा अवश्य देखना चाहिये!

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कवि-गद्यकार अजित कुमार का निधन

‘चांदनी चन्दन सदृश’: हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे / क्यों दिखें? / हम लिखेंगे: / चांदनी उस रुपये-सी है / कि जिसमें / चमक है, पर खनक ग़ायब है.” नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे. आज सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया. देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था. तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए. उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं. इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं. अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है.

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे. कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था. श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)
जनवादी लेखक संघ

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मुम्बई के जाने माने प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का दुर्घटना में निधन

मुम्बई के जाने माने फ़िल्म प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का वाराणसी से सटे गोपीगंज थाना इलाके के छतमी में एक ट्रक से हुई दुर्घटना में गुरुवार की सुबह निधन हो गया। वो मूलतः भदोही जिले के रहने वाले थे। वो सोमवार को भदोही आए थे। उनकी पत्नी यहां सीतामढ़ी में शिक्षिका हैं। हादसे के वक्त राजू सीतामढ़ी स्थित आवास से दवा लेने के लिए बाइक द्वारा गोपीगंज बाजार जा रहे थे।

अपने घर से वो थोड़ी ही दूर आगे बढ़े थे कि एक ट्रक ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। घटना के बाद चालक ट्रक के साथ फरार होने की कोशिश में था लेकिन पुलिस ने दबोच लिया। उनके निधन की खबर मिलते ही मुम्बई के फ़िल्म पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार मिथलेश सिन्हा ने राजू उपाध्याय के निधन पर शोक जताया है। राजू उपाध्याय का बॉलीवुड में कभी सिक्का चलता था। अपने समय की बॉलीवुड पत्रिकाएं फ़िल्म फेयर, मूवी, माधुरी आदि में उनकी क्लिक की हुई तस्वीरें खूब छपती थीं।

वे अपने जमाने के सितारे दिलीप कुमार, राजकपूर सहित अमिताभ बच्चन के काफी लाडले थे। हाल ही में उन्हें शाहरुख खान ने एक कैमरा भी उपहार में दिया था। बताते हैं कि राजू उपाध्याय आमिर खान के भी काफी करीबी थे और आमिर अपने साथ किसी भी कार्यक्रम में राजू उपाध्याय को जरूर ले जाते थे। मुम्बई के चेम्बूर में रहने वाले राजू उपाध्याय इन दिनों अपने गांव गए थे जहां यह दुर्घटना हुई।

उन्हें हाल में ही दादासाहेब फॉल्के एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। राजू उपाध्याय के निधन पर चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट ने गहरा शोक जताया है। चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट के अध्यक्ष इंद्र मोहन पन्नू, उपाध्यक्ष अतुल मोहन ने राजू उपाध्याय के निधन पर गहरा दुख जताते हुए उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार
मुंबई
9322411335

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पठानिया जी का अंतिम संदेश- ”जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती”

भला ऐसे भी कोई जाता है… : जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती। मेरे व्हाट्सएप पर वरिष्ठ पत्रकार पठानिया जी का अंतिम संदेश यही था। पत्रकारिता में अपना जीवन खपा देने वाले बड़े भाई समान मित्र राकेश पठानिया अंतिम समय में मुझे याद करते रहे। (जैसा पारिवारिक सदस्यों ने आज अल सुबह बताया)। पता नहीं दोस्ती के कई कर्ज चुकाने बाकी रह गए।

जीवन सच में अनमोल है। आपके लिए खुद की जि़ंदगी न जाने क्या महत्व रखती है, लेकिन परिवार के लिए आप ही जि़ंदगी हो। यह वक्त न तो किसी तरह के वाद-विवाद का है और न ही इस असमय मृत्यु के कारणों की पड़ताल का। हम सबका फर्ज यह है कि हम पठानिया जी के परिवार की ऐसी क्या मदद करें कि उनका आगे का जीवन आसानी से कट सके। दोस्तों! पठानिया जी की पहचान एक कर्मठ पत्रकार के रूप में रही। पत्रकारिता के अलावा उनका कोई अतिरिक्त व्यवसाय नहीं रहा। धर्मपत्नी गृहिणी हैं, जबकि दो बच्चे अभी छोटी कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

मैं दिल से आभारी हूँ धर्मशाला के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवम दिवंगत पठानिया जी के मित्र श्री मुन्नू ठाकुर जी का जो संकट की इस घड़ी में पांच लाख की आर्थिक सहायता के साथ सामने आए हैं। वहीं नूरपुर के पूर्व विधायक श्री राकेश पठानिया ने दिवंगत पत्रकार राकेश पठानिया जी के एक बच्चे की शिक्षा का पूरा खर्च वहन करने की बात कही है। उम्मीद है दैनिक जागरण संस्थान उन्हें समुचित मुआवज़ा प्रदान करेगा। हमसे जो हर संभव मदद होगी, उसके लिए हम तैयार हैं।

पत्रकार शशिभूषण पुरोहित की फेसबुक वॉल से. 

जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर

etv वाले मृत्युंजय की फेसबुक पोस्ट ने आज मझे सुबह सवेरे बुरी तरह झटक दिया था। पोस्ट में कांगड़ा जिले में पत्रकारिता के सूरमा और जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर मिल गयी। मृत्युंजय ने पत्रकार समाज को हुयी इस बड़ी क्षति की सूचना देकर अपना धर्म निभाया लेकिन राकेश पठानिया जैसे पत्रकारिता के ‘वीर पुरुष’ को मौत यूँ घेरकर निगल लेगी यह सब यकीं करना मुश्किल हो रहा था। तब फेसबुक पर कई पोस्टों ने तेज़ी पकड़ी तो बीसियों बार पढ़ पढ़कर भी दिल को दिन भर दिलासे देने जुटा रहा क़ि नहीं यह कैसे हो सकता है! लेकिन यह सच था क़ि शान ए धर्मशाला हमारे बड़े भाई राकेश पठानिया अब नहीं रहे थे। फट से जागरण में फोन घुमाया तो पुराने मित्रों ने बताया क़ि हाँ यह सही है लेकिन सब अचानक।हुआ है। पिछली शाम तक ठीक थे। दिनेश कटोच ने ही इन मेरे जागरण वाले मित्र को भी बताया था क़ि पठानिया अब ठीक हैं। शुक्रवार को तो पठानिया ने जागरण में भी खुद ही बताया था क़ि अब उन्हें लग रहा है क़ि वह ठीक हो जाएंगे। मतलब सब सामान्य था। मगर शनिवार की रात पठानिया के जीवन के लिए एक ऐसी घुप अँधेरी रात साबित हो गयी थी क़ि जिसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था। बताया गया क़ि टांडा मेडिकल कॉलेज में केमोथेरापि के बाद शनिवार को उनकी तबियत आधी रात के बाद एकाएक ऐसी बिगड़ी क़ि थामी नहीं जा सकी। दिन भर मित्रों से चर्चा करता रहा पठानिया की। कइयों ने अपने अपने अनुभव बांटे।

अभी रात सामने आ गयी। अब सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन आँखों के आगे से भाई पठानिया की सूरत-सीरत हटने का नाम नहीं ले रही थी तो सोचा क़ि क्यों न श्र्द्धांजलि के कुछ शब्द उन्हें मैं भी समर्पित कर दूँ। राकेश पठानिया सचमुच पूरी तरह।से पत्रकारिता को ही समर्पित थे। पहले कभी जनसत्ता तो फिर उसके बाद दैनिक जागरण। जागरण के लिए उन्होंने बतौर पत्रकार ही नही बल्कि एक अभिभावक की भूमिका भी निभायी। प्रेस स्थापित करने से लेकर अखबार के हर खरे बुरे के चिंतक और किसी भी संकट के दौर में बेहतरीन व्यवस्थापक। यूँ तो वह बड़े अंतर्मुखी थे।लेकिन कभी कभी घुटन से बचने के लिए दिल की बातें साझी भी कर लिया करते थे। वह एक सरल सकारत्मक व्यक्तितव के धनि थे। बुरा करने से बचते थे और ऐसी ही सलाह भी दूसरों को दिया करते थे। पत्रकारिता में भिड़न्त और सींगबाज़ी इन्हें पसंद नहीं थी।

उन्हें मैंने ऐसे महसूस किया कई बार क़ि वह समाज में सभी पक्षों के पैरोकार थे। पत्रकारिता से वह सब नहीं जिससे किसी भी पक्ष को क्षति हो। खिलाफ खबर भी लिखेंगे लेकिन शब्द शिष्टता और शब्द संयम पर पूरा जोर। मैंने उन्हें एक टीम लीडर के रूप में कई बार बढ़िया काम करते हुए देखा। वह किसी को नाराज करने के पक्ष में कभी नहीं रहते। टीम में सभी को प्यार से और कम संसाधनों की स्थिति में अपना बेहतर देने की सदा प्रेरणा देने की उनके प्रयासों को हम कई बार देखते और महसूस करते थे। यह उनके व्यक्तितव का ही करिश्मा था क़ि जागरण के संजय गुप्ता इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे और इन पर हर मामले में भरोषा करते थे। तात्कालिक मुख्य महा प्रबन्धक निशिकांत ठाकुर हिमाचल के तमाम बड़े निर्णय पठानिया से ही मशविरे के बाद लेते थे। उनसे जुडी कई स्मृतियाँ जेहन में उछल कूद-भागमभाग कर रही है और दिल-दिमाग को बेचैन कर रही हैं। भाई आपको हमेशा याद रखेंगे और आपका वो फोन उठाते ही जुबां से निकलने वाला ‘जय देया महाराज’।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश्वर ठाकुर की फेसबुक वॉल से.

(स्व. राकेश पठानिया)

बड़का चली आ…

मैं जागरण आफिस छोटे पाउ नवनीत  कन्ने मिलना गया तां ओहथु बड़का ओरां दुस्सी पे। मैं पैरीं हत्थ लाये तां बड़के गले ने लाई ल्या। पूछ्या अज कतां?  मैं ल्या अज तुहां सोगी मिलना आई गया, बड़का बड़ा खुस, शीशे पार नवनीत हल्की स्माइल दई ने दुरे ते हाल चाल पुछि ल्या। बड़के चा मंगाई लई,गप्प छप चली,बड़के कताबा ताई कई सुझाब दई पाए। कुछ ईजा करना कुछ उंझा। मिंझो पता हा बड़का ठीक नी ए, पर बड़के कुछ बी शो नी होना दित्ता, फेस पर से नेचुरल रौनक नी थी पर बड़का पूरा जोर लाये की कुछ भी शो न होय। जेलु में एचपीसीए दे भ्रष्टाचार दे खिलाफ मामला चकया तां बड़के बड़ी मदद कित्ती। प्रेस क्लब दे पचां धूप्पा च कुर्सी लाई ने बड़के ते सलाह लेनी। बड़के वाल बड्डा आरी एक्सपीरियंस था।

बड़का गर्मजोशी ने मिलदा था पर सलाई दिन्दी बारी बड़ा गंभीर। ए मत करदे,से करी लेना। मैं तिन की साल पहले शिमले आई रया तां मुलाकात घटी गई। विच पाकिस्तान दे मैचे खिलाफ जेलु मैं मुहिम चलाई तां बड़का बड़ा खुस पर बमारिया दी बजा ने बेशक बड़का डोन होना शुरू होई आ था पर खबर से दई कड़क इ लिखनी। मैं पूछ्या बड़का अजकल सुझदे नी, बोल्या अजकल यरा मेरे ते दौड़ पज्ज नी हुंदी तां एथि डेस्क पर ठीक रहन्दा। नवनीत कन्ने मिलला तां नवनीते गलाया बड़के दा जिंदगी भर दा एक्सपीरियंस अजकल अहाँ दे कम्मे ओ दा। एथि बड़के जो कोई टेंशन ब नी ए। बमारी ते तंग होई बड़के रिजाइन करना लाया हा तां नवनीते रिक्वेस्ट कित्ती तुहां टेंशन मत ल्या।

जागरण आफिस आई ने जे दिल करे से करा, जेलु दिल करे तेलु आ कन्ने जा। भाई, इन्हा दे ओने ने सांझो सबनी जो बड़ा कुछ सिखने जो मिलदा, नवनीत दी सेंसटिविटी मिंझो कॉलज टेमे ते पता थी हुन तां वैसे बी नवनीत काफी मैच्योर है उन्नी इकी तीरे ने दो निशाने लाये। बड़का बी अडजस्ट कन्ने बड़के दे एक्सपीरियंस दा फायदा उपरे ते बड़के दा दिल भी ओर ओई जाँदा। कल पता लग्गा बड़का अपना एक्सपीरियंस जागरण आफिस बंडी ने पता नी कतां जाई रया। हुन बड़के दी सकल नी सुजनी बस,ख़बरां च बड़के दी झलक सुजनी जेडी बड़के वाकियों जो बंडी। बड़के दी कमी कदी पूरी नी ओई सकदी। भगवान बड़के दी आत्मा जो शांति दें। जय हिंद

-विनय शर्मा
डिप्टी एडवोकेट जनरल
हिमाचल सरकार

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नहीं रहे धर्मशाला के वरिष्ठ पत्रकार राकेश पठानिया

(स्व. राकेश पठानिया)

एक कलमकार की मौत और सौ सवाल : कहने को तो अब हिमाचल प्रदेश का शहर धर्मशाला प्रदेश की दूसरी राजधानी है और स्मार्ट सीटी भी बनने जा रही है, मगर आज से दो दशक पहले भी धर्मशाला की प्रदेश की राजनीति में काफी अहमियत थी। तब की पत्रकारिता आज के दौर से कहीं अलग और काफी मुश्किल भरा टास्क थी। कुछ गिनी चुनीं अखबारें प्रदेश के बाहर से छपकर आती थीं और इनके पत्रकारों के तौर पर घाघ लोगों का कब्जा था। किसी नए खबरनवीस के लिए अखबार में जगह तलाशना कोयले के खान में हीरा तलाशने जैसा मुश्किल काम था। सीनियर भी ऐसे थे, जो उस समय के दौर में मिलने वाली तबज्जों और आवभगत के चलते किसी को करीब फटकने नहीं देते थे, और शागिर्द की बात करें तो ऐसा सांप सूंघ जाता था कि मानो वह एकलव्य बनकर उनके लक्ष्य को भेदने को तैयार हो।

ऐसे ही दौर में कुछ अच्छे लोगों की अंगुली पकड़ कर एक दुबले पतले लड़के ने भी कलम को हथियार बनाकर एक लक्ष्य निर्धारित किया। तब पत्रकार बनने के लिए तनख्वाह की सोचना तो दूर की बात खबर भेजने तक के लिए जेब ढिली करनी पड़ती थी। वो समय ऐसा था जब पत्रकारिता का जुनून जिसके सिर पर चढ़ता, वो वेतन की परवाह किए बिना खुद की जेब से भी खर्चा करके पत्रकार बनना चाहता था। पत्रकार भी वही बनते जो फक्कड़पन की परवाह किए बिना अपनी खबर के प्रकाशित होने पर अपना सीना चौड़ा किए संतोष के साथ शान से जीते थे। तब जनसत्ता जैसी व्यवस्था से लडऩे वाली अखबार का साथ मिलना किसी सपने के साकार होने जैसा ही था।

ऐसे ही दौर में कलम थामने वाला यह पतला दुबला युवक था राकेश पठानिया। पत्रकारिता के शोक या कहें जुनून ने उसके सामान्य से व्यक्तित्व को तराशने के साथ-साथ कुछ ऐब भी दे दिए। लगातार धूम्रपान करना और जमकर शराब पीने की लत एक दाग की तरह थी। शायद यही लत इस कलमकार को हम सब से दूर ले जाने वाली थी। या कहें कि उसका शांत स्वभाव और गुस्से व रोष को अंदर ही दबाए रखने की कला उसे अंदर से खोखला कर सकती थी। ये सब बातें इसलिए कर रहा हूं कि रविवार को गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सुबह उठते ही राकेश पठानिया की असमय मृत्यु का दहलाने वाला समाचार मिला। सिर्फ मैं ही नहीं उन्हें जानने व उनके साथ उठने बैठने वाला हर इनसान सकते में था। यह बात तो हर कोई जानता था कि राकेश पठानिया की तबीयत ठीक नहीं चल रही है और काफी समय से उनका ईलाज चल रहा है।

इसकी बीमारी के चलते उन्हें सीटी आफिस से हटाकर बनोई स्थित प्रकाशन कार्यालय के डैस्क में भेज दिया गया है। दो दशक से जो जगह जिसकी कर्मस्थली रही हो और अचानक बूरा समय आते ही उस जगह से बेदर करना भी किसी सदमे से कम नहीं रहा होगा। डैस्क में काम के साथ-साथ ईलाज भी चलता रहा, मगर दुबले शरीर में काम व चिंता के बोझ के अलावा भी की तरह जलते सिगरेट के धूंए से बेदम हो चुके फेफड़े साथ छोड़ चुके थे। चरमरा चुकी चिकित्सा व्यवस्था भला किसी पत्रकार को छोड़ती भी कैसे। बीमारी कुछ और ईलाज कुछ। जब असल बीमारी को पता चला तब तक मौत का केंकड़ा फेफड़ों को कुतर चुका था। शांत स्वभाव भला बदलता भी कैसे। दर्द व रोष को अंदर ही दबाने की कला अब धीरे-धीरे इस खबरनवीस को किसी ओर ही दुनिया में ले जाने को आतूर थी। किसी को इसकी भनक तक नहीं चली थी, नहीं तो बाद में अफसोस करने वाले भला इस तरह उसे तिल-तिल मरता नहीं देखते।

महज ५४-५५ वर्ष की उम्र में राकेश पठानिया की मौत से पत्रकार समाज सकते में है। पगार से ज्यादा बेगार की चीज बन चुकी पत्रकारिता के चलते राकेश पठानिया की शादी भी काफी अधिक उम्र में हुई थी। एक बेटा महज सात साल का और बेटी १२ वर्ष की है। छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर से बाप का साया उठना और भी चिंता का विषय है। घर-परिवार की बात करें तो वर्षों से किराए के मकान में रहने वाला परिवार आज भी वहीं पर है। ऐसे में परिवार की  चिंता भी हर किसी के जहन में है। दैनिक जागरण में सीनियर चीफ रिपोर्टर की पोस्ट पर नियमित कर्मी होने के चलते अब सबका ध्यान कंपनी से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर टिका है। सभी मदद को तैयार हैं, मगर कितनी मदद होगी इस पर स्वत: सोचा जा सकता है। आखिर आज दिन तक एक पत्रकार की मौत पर परिवार को मिला भी क्या है। अफसोस और जीवन में किए कार्यों की प्रशंसा के चंद शब्दों से ज्यादा कोई दे भी क्या सकता है। आर्थिक मदद भी कर देंगे तो क्या इतने छोटे बच्चों के लंबे पड़े भविष्य की सफलता के लिए इनके साथ टिके रहना हर किसी के बस में है। पत्रकारों की हालत तो यह है कि दूसरों के दुखों को बखान तो कर सकते हैं, मगर खुद पर मुसीबत आती है तो अपने ही कन्नी काटे जाते हैं। कुल मिलाकर पत्रकारिता संकट के दौर में है। वेतन के लिए पत्रकार नौकरियां खोए बैठे हैं। अधिकार मिल नहीं पा रहा, ऊपर से एक पत्रकार का इस तरह जाना पत्रकारिता के भविष्य की तस्वीर नहीं तो ओर क्या है।

अपनी खबर कर काफी खुश हुए थे राकेश पठानिया

प्रिंट मीडिया का एक पत्रकार वर्षों तक अपने काम में लगा रहता है। इस दौरान वह कईयों की मदद करता है और कईयों का रोष मोल लेता है। ऐसे में उसके लिए प्रशंसा के बोल उसके और उसे जानने वालों के बीच ही दबे रह जाते हैं। अखबारों को पढऩे वाले लाखों पाठकों तक उसकी खबरें तो पहुंचती हैं, मगर उसकी पहचान और चेहरा दबा रह जाता है। ऐसे में अगर कोई उसकी प्र्रतीभा को सम्मान देता है और उसकी खबर किसी अखबार में छपती है, तो उसे आम आदमी से कहीं ज्यादा खुशी होती है। ऐसा ही राकेश पठानिया के साथ तब हुआ जब फरवरी 2016 में उन्हें सम्मान दिया गया और मैने वेबसाइट में उनकी खबर चलाई। उनका फोन आया और उन्होंने एक आम पाठक की तरह आभार जताते हुए मुझे कहा कि आज अपनी खबर पढ़कर उन्हें लगा कि उनकी भी कोई उपलब्धि है, जो खबर बनकर उन्हें अच्छी लगी। प्रस्तुत है वह खबार…….

दैनिक जागरण के राकेश पठानिया को एक्सीलेंस अवार्ड

धर्मशाला, 21 फरवरी। राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण के के धर्मशाला स्थित जिला कांगड़ा ब्यूरो के प्रभारी एवं सीनियर चीफ रिपोर्टर राकेश पठानिया को पत्रकारिता में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। शनिवार को आयोजित समारोह में समाचार पत्रिका समस्त भारत की ओर से उन्हें यह सम्मान बीसीसीआई सचिव एवं एचपीसीए अध्यक्ष, सांसद अनुराग ठाकुर और दिव्य हिमाचल के संपादक अनिल सोनी ने प्रदान किया। राकेश पठानिया जिला कांगड़ा के उन सफलतम पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने उस दौर से पत्रकारिता की शुरुआत की थी, जब पत्रकार बनना किसी चुनौती से कम नहीं था। उस दौरान पत्रकार को इतना वेतन तक नहीं मिल पाता था कि परिवार का गुजार कर सकें। उन्होंने विपरित परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई। शुरुआत में राकेश पठानिया उस समय की प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता के रिपोर्टर रहे। इसके बाद उन्हें वर्ष 2000 के करीब दैनिक जागरण  का जिला प्रभारी बनाया गया। तब से लेकर आज तक वे दैनिक जागरण परिवार का हिस्सा बने हुए हैं। मौजूदा समय में राकेश पठानिया जिला प्रेस क्लब धर्मशाला के प्रधान भी हैं।

रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)।

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लोकस्वामी मैग्जीन के संपादक रजनीकांत वर्मा का निधन

लोकस्वामी समूह के ग्रुप एडिटर रजनीकांत वर्मा नहीं रहे. हार्ट अटैक के कारण उनका निधन हो गया. वे पचपन साल के थे. वे पिछले कुछ समय से बीमार भी चल रहे थे जिसके कारण उनका इलाज चल रहा था. उत्तराखंड के हल्द्वानी (नैनीताल) के रहने वाले रजनीकांत ने करियर का काफी लंबा अरसा इंदौर में व्यतीत किया.

वे लोकस्वामी से पहले शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यरत थे. वे ‘माया’ पत्रिका में भी रह चुके हैं. रजनीकांत वर्मा काफी समय से दिल्ली में रहकर ‘लोकस्वामी’ हिंदी पाक्षिक पत्रिका का संपादन करते थे. वे लंबे समय तक इंदौर में रह चुके हैं. वे पिछले 26 साल से लगातार लोकस्वामी समूह से जुड़े हुए थे. लोकस्वामी समूह के समूह संपादक रजनीकांत वर्मा के अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं.

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सन्मार्ग अखबार के संपादक आनंद बहादुर सिंह का बनारस में निधन

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज और पत्रकारिता के युग पुरुष सन्मार्ग अखबार के संपादक अनंदबहादुर सिंह का इलाज के दौरान शनिवार को तड़के 4 बजे निधन हो गया। उनके निधन से पत्रकारिता क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। श्री सिंह की 87 वर्ष कीअवस्था थी। उनके निधन की जानकारी जैसे ही समाज के बुद्धिजीवी, पत्रकारों और उनके शुभचिंतकों को लगा जो जैसे था उनके भदैनी स्थित आवास की ओर दौड़ पड़ा। श्री सिंह का जन्म 29 अगस्त 1930 (लोलार्कछठ) के दिन हुआ था। वह शुरु से धार्मिक प्रवृत्ति और काशी के गंगो-जमुनी यकजहती के संवाहक थे। उनका श्री संकटमोचन मंदिर के महंत परिवार से ताल्लुकात होने की वजह से उनकी रूचि गोस्वामी तुलसीदास जी में रही। वह रामचरित मानस में जबरदस्त पकड़ रखते थे। इतना ही नही वह काशी के इतिहास के बारे में भी अच्छी जानकारी रखते थे।

श्री सिंह ने अपने पत्रकारिता क्षेत्र में कैरियर वाराणसी के लोकप्रिय सांध्यकालीन अखबार सन्मार्ग से सन् 1952 में जुड़कर की। शुरूआती दौर में संपादक स्व. पं. गंगाशंकर मिश्र के साथ काम शुरु किया और उनसे संपादन के गुर भी सीखे। श्री सिंह धीरे-धीरे अखबार के संपादक नियुक्त हुए तो सन्मार्ग को काफी ऊंचाई तक ले गए। श्री सिंह के पास 65 वर्ष के पत्रकारिता का अनुभव था। सरल स्वभाव के धनी श्री सिंह पत्रकारिता की नर्सरी थे जिसके छत्रछाया में कई दिग्गज पत्रकारों ने कलम चलाना सीखा। अवस्था हो जाने की वजह से उन्हें पांच दिन पूर्व सर सुंदरलाल अस्पताल में यूरिन इंफेक्शन के कारण भर्ती कराया गया था, जहा उनका शनिवार तड़के निधन हो गया। श्री सिंह अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गए है। श्री सिंह का एक लड़का विजयबहादुर सिंह और दो लड़की सविता राय और सरिता शर्मा है। श्री सिंह का अंतिम संस्कार हरिश्चन्द्र घाट पर किया गया। उन्हें मुखाग्नि बेटे विजयबहादुर ने दी।

स्वतंत्रता संग्राम में गए थे जेल

परिवारीजनों की माने तो आनंदबहादुर सिंह स्वतंत्रता संग्राम के वक्त जेल भी भेजे गए थे लेकिन बाद में वह छुटे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया। हालाँकि जेल जाने का कोई प्रमाण मौजूद नही है। जब देश में सन् जून 1975 में आपातकाल लगा उस वक़्त भी अनंदबहादुर सिंह ने कलम को अपना हथियार बनाया था। श्री सिंह को श्रद्धांजलि देने वालों में संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र, ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजयनाथ मिश्र, धर्मेंद्र सिंह, संपूर्णानंद तिवारी, एसपी सिटी, भदैनी टाइम्स के संपादक अवनिन्द्र कुमार सिंह, काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी सुभाष सिंह, अत्रि भरद्वाज, विकास पाठक, विनय मौर्या, अभय शंकर तिवारी,  सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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आगरा-मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल का निधन

मथुरा के नियति हास्पीटल में आज सुबह करीब सवा आठ बजे वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल जी ने आंखें मूंद ली। उन्होंने आज अखबार में लंबे समय तक क्राइम रिपोर्टर और फिर सिटी इंचार्ज के तौर पर सेवा दी। इससे पहले उन्होंने विकासशील भारत में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम किया। आज अखबार छोड़ने के बाद वे डीएलए से जुड़ गए। यहां उन्होंने बतौर सीनियर क्राइम रिपोर्टर काम किया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका अंतिम पड़ाव पुष्पांजलि ग्रुप के पुष्प सवेरा अखबार में सिटी इंचार्ज के रुप में रहा। ये वही पुष्पांजलि ग्रुप है जिसके हास्पीटल में उनके इलाज के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1 साल के इलाज के लिए भेजी गई 5 लाख रुपये की धन राशि का महज 4 महिने में ही गोलमाल कर दिया। हालांकि तमाम मीडियाकर्मियों और सामाजिक व राजनीतिक लोगों ने उनके इलाज में प्रत्यक्ष व परोक्ष सहयोग किया पर उन्हें बचाया न जा सके।

श्री अग्रवाल अपनी नेक, ईमानदार और धारदार क्राइम रिपोर्टिंग के लिए प्रदेशभर में जाने जाते हैं। पिछले 40 सालों में उत्तर प्रदेश का उन जैसा दूसरा तेज तर्रार क्राइम रिपोर्टर न हुआ। उनकी क्राइम बीट पर पकड़ के कारण ही प्रदेश में इन सालों में जो भी डीजीपी हुए वे हमेशा विनोद अग्रवाल से प्रभावित रहे। विनोद अग्रवाल ने अपनी ईमानदार पत्रकारिता की एक नई पीढ़ी तैयार की। उनके सिखाए कई क्राइम रिपोर्टर आजकल मीडिया के नामचीन संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेन्द्र पटेल की एफबी वॉल से.

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मुंबई की वरिष्ठ फिल्म पत्रकार पिरोज वाडिया का निधन

SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST PIROJ WADIA

Dear Member,

With great sorrow and regret we have to inform you that Piroj Wadia, a senior film journalist and Press Club member passed away today in Mumbai after a brief illness. Piroj, aged 67 was in journalism for almost four decades with Free Press Journal, The Daily, Indian Express and Cine Blitz.

She will be laid to rest on Tuesday 7.45 am at Tower of Silence, Kemps Corner. Our heart goes out to her family and may they have the strength to bear this huge loss.

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

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नहीं रहे लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार केसी खन्ना

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) के दशकों पुराने सहयोगी केसी खन्ना का निधन हो गया है। अंग्रेजी दैनिक दि पॉयनियर के उप समाचार संपादक रहे केसी खन्ना आईएफडब्लूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व यूपी प्रेस क्लब की गवर्निंग बाड़ी के सदस्य रहे थे। दिवंगत पत्रकार केसी खन्ना की रस्म पगड़ी शनिवार १७ जून शाम ४ बजे राजाजीपुरम गोल चौराहे गुरुद्वारे में होगी।

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बनारस के वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन

Ak Lari : वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन। वह ‘आज’ अखबार से जुड़े थे। वह ‘आज’ अखबार में संपादक रहे लक्ष्मी शंकर व्यास के बड़े पुत्र थे। अवस्था करीब 76 साल थी। रिटायर्ड होने के बाद ‘आज’ अखबार में संम्पादकीय लेखन का दायित्व निभा रहे थे। जानकारी के अनुसार रत्न शंकर जी तीन दिन से कार्यालय नहीं आ रहे थे। अस्वस्थ थे। घर पर ही इलाज चल रहा था।

आज सुबह थोड़ी तबीयत खराब होने पर डाक्टर को दिखाया। आराम भी हुआ लेकिन शाम को बेचैनी महसूस होने और अपने डॉक्टर के कहने पर उन्हें रात करीब आठ बजे लक्ष्मी अस्पताल लाया गया। एक घंटे तक इलाज चला। शायद दिल का दौरा पड़ा था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी अन्नत यात्रा मंगलवार सुबह नौ बजे दण्डपाणि गली स्थित आवास से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली।

वह अपने पीछे तीन पुत्रियों, एक पुत्र और तीन भाईयों सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये है। स्वर्गीय व्यास ने अर्थशास्त्र में काशी विद्यापीठ से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की थी। शुरुआती दौर में वह बैंकिंग से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। आजीवन पत्रकारिता से जुड़े रहे। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ।अन्तरराष्ट्रीय राजनीति, खेल समेत हर तरह के लेखन में माहिर थे। व्यंग्य लेखन और कार्र्टून बनाने में भी उनका कोई सानी नहीं था।

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एके लारी की एफबी वॉल से.

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कैंसर से पीड़ित वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह का निधन

Jaishankar Gupta : करीब चार दशकों की दोस्ती को एक झटके में तोड़ कर धर्मेंद्रपाल सिंह का इस तरह असमय चले जाना भारी दुख दे गया। 1980 में हमारी मुलाकात लोदी एस्टेट में स्थित असली भारत के दफ्तर में हमारी मुलाकात हुई थी। हम वहां संवाददाता सह उप संपादक थे। धर्मेंद्र हिन्दुस्तान अखबार में कार्यरत थे लेकिन हमारे संपादक, पूर्व सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे अजय सिंह से करीबी के कारण धर्मेंद्र वहां आते जाते या कहें सलाहकार सहयोगी की भूमिका में थे। 1997 में जब हम हिन्दुस्तान से जुड़े तब वह वहां वरिष्ठ और पुराने सहयोगी के रूप में मिले। कुछ बातों को लेकर मतभेद भी होते थे लेकिन मनभेद कभी नहीं हुए। कम मिलते थे लेकिन निजी रिश्तों में प्रगाढ़ता में कमी कभी नहीं आई। कैंसर से वह जूझ रहे थे। और कुछेक अवसरों पर और खासतौर से आपरेशन के बाद तो लगा कि उन्होंने अपराजेय कहे जानेवाले कैंसर को परास्त कर दिया है लेकिन कल रात वह इस लड़ाई को हार गए। मन बोझिल और सदमें में है। अपने बेलौस ठहाकों के लिए मशहूर मित्र को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। शोक की इस घड़ी में हमारी सहानुभूति और संवेदना सुषमा जी और उनके परिवार के साथ है।

Omkar Chaudhary :  आज एक और मित्र चले गए। वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (पूर्व खेल संपादक हिंदुस्तान) का कल रात निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ़ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। जबड़े का ऑपरेशन हुआ था। तब लगा था कि सब ठीक हो गया है। कुछ दिन ठीक रहे। लेखन भी करते रहे। अचानक सुषमा भाभी का फोन आया कि कमर में तेज दर्द है। इस रविवार के लिए लेख नहीं भेज पाएंगे। मन में शंका हुई। उसी सप्ताह हाल जानने के लिए घर गया तो बिस्तर पर पाया उन्हें। बात बात पर ठहाके लगाने वाले धर्मेन्द्रपाल असहाय होकर दर्द से कराह रहे थे। मेरे बहुत बेहतरीन दोस्त थे। शुभ चिंतक थे। शानदार पत्रकार थे। बहुत पीड़ा है उनके जाने की। शब्दों में बयान करना मुश्किल है। कितने ही पल याद आ रहे हैं। मेरा अश्रुपूर्ण नमन।

Umakant Lakhera : दुखद सूचना. परम मित्र, वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व खेल संपादक) का आज 6 जून को सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। उनका अंतिम संस्कार आज सुबह 11 बजे दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकट CNG शवदाह गृह पर किया गया। Our beloved friend Sh Dharemendra Pal Singh, a senior journalist & former Sports Editor, Dainik Hindustan has passed away today morning, He was suffering from backbone cancer for the last few weeks. The last rites conducted at CNG crematorium Nigumbodh Ghat at 11 am today (June 6, 2017).

सौजन्य : फेसबुक

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वाराणसी में हिन्दुस्तान अखबार के वरिष्ठ छायाकार मंसूर आलम का निधन

वाराणसी से एक दुखद खबर आ रही है। यहां हिंदुस्तान अखबार के वरिष्ठ फोटोग्राफर मंसूर आलम का निधन आज सोमवार की सुबह हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सर सुन्दर लाल अस्पताल में भर्ती कराया गया। रविवार को मंसूर आलम की हालात एकदम से खराब हो गयी और उन्हें सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में ले जाने की जरूरत पड़ गयी लेकिन सघन चिकित्सा कक्ष उस समय खाली नहीं था और अंततः सोमवार की सुबह मंसूर आलम ने दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

उनके निधन से काशी के पत्रकारों और छायाकारों में शोक का माहौल है। सूत्र बताते हैं कि आर संजय जी और दूसरे मीडिया कर्मियों ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन से भी मदद मांगी मगर मंसूर आलम को कोई भी मदद काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन से नहीं मिली। मीडियाकर्मियों ने उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री नीलकंठ से भी मदद मांगी मगर उनकी भी नहीं चली। हिंदुस्तान अखबार के वाराणसी संस्करण के संपादक पर भी लोग उंगलियां उठा रहे हैं जिन्होंने अपने फोटोग्राफर को न सिर्फ ढेर सारा तनाव देकर बीमार कर देने में बड़ी भूमिका निभाई बल्कि इलाज के दौरान अपने स्तर से कोई मदद नहीं की।

मंसूर आलम ने ‘आज’ समाचार पत्र के साथ-साथ सहारा में भी अपनी सेवाएं दी थीं। मंसूर आलम अपनी फोटोग्राफी और मधुर व्यवहार दोनों के लिए जाने जाते थे। वे कई फोटोग्राफरों के लिए अभिभावक की भूमिका में भी  रहे। उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। मंसूर आलम के निधन पर वाराणसी प्रेस क्लब के सचिव रंजीत गुप्ता ने गहरा दुख जताते हुए कहा है मंसूर भाई लाजवाब फोटोग्राफर के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे। उनके सहयोग से ही मैंने 90 वार्ड, शहर के पार्कों पर पहली बार स्टोरी किया था। यह पहली बार किसी अखबार में हुआ था। सहारा की इस स्टोरी के बाद काफी काम भी हुआ। मंसूर भाई का सहयोग नहीं मिलता तो यह स्टोरी नहीं कर पाता। मंसूर भाई का काशी के घाटों और काशी की संस्कृति से विशेष लगाव था। रंजीत गुप्ता ने यह भी जानकारी दी है कि 15 मई को एस. अतिबल छाया चित्र प्रतियोगिता में उनके साथ काम कर चुकी रेखा और मैने मंसूर आलम सम्मान पुरस्कार देने का निर्णय किया है.

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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जाने-माने फिल्म पत्रकार और अपने किस्म के अदभुत इंसान ब्रजेश्वर मदान नहीं रहे

Prabhat Ranjan : अचानक बहुत दुखी और अकेला महसूस कर रहा हूँ. आज मैंने अचानक वेबसाईट जानकीपुल.कॉम पर एक कमेन्ट देखा. कमेन्ट कल शाम का था. बस एक लाइन लिखी थी- brajeshwar madan is no more! कमेन्ट आदित्य मदान का था, जो उनका भतीजा है. पढ़कर सन्न रह गया. हालाँकि बरसों से उनसे कोई संपर्क नहीं था. आखिरी बार जब उनसे बात हुई थी तो लकवे के कारण उनके मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी. उनको उस तरह से बोलते देख मैं इतना डर गया कि मैंने फिर कभी उनसे बात करने की कोशिश भी नहीं की. लेकिन मन में यह संतोष था कि वे जीवित हैं. लेकिन इस कमेन्ट को पढने के बाद वह जाता रहा.

(ये तस्वीरें कई बरस पहले मदान साहब की बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ की है.)

उनके जाने से ज्यादा इस बात का दुःख है कि वे इस तरह से गए. फिल्मों पर उनके जैसा सम्मोहक लेखन करने वाला लेखक नहीं था. फिल्म लेखन के लिए सबसे पहले जिस हिंदी लेखक को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था वे ब्रजेश्वर मदान ही थे. उनकी कहानियों का भी अपना मिजाज था और 80 के दशक तक हर प्रमुख संचयन में उनकी कहानियां आती रहीं. धीरे धीरे वे खुद को भूलने लगे और हम हिंदी वाले उनको. मेरे उनके बीच इतना कुछ निजी था कि अब याद करने का भी मन नहीं कर रहा. बस इतना ही कि मेरे लेखक बनने में नेपथ्य से उनकी भूमिका बहुत बड़ी थी.

मुझे अपनी पहली कहानी ‘जानकी पुल’ के लिए ‘सहारा समय कथा सम्मान’ मिला था. सब यही समझते रहे कि उस ज्यूरी में मनोहर श्याम जोशी थे इसलिए मुझे वह पुरस्कार मिला. आज मैं इस सच को स्वीकार करना चाहता हूँ कि मदान साहब ने अपने बूते वह पुरस्कार मुझे दिलवाया था.
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं भी हों आपको लगता है सर पर एक साया तो है. लेकिन अब मैं उम्र के उस दौर में पहुँच रहा हूँ जब सर से एक एक कर साये उठते जा रहे हैं.

अंतिम प्रणाम मदान साहब!

जानकीपुल डाट काम के संपादक प्रभात रंजन की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Gopeshwar Singh ब्रजेश्वर मदान की समीक्षाएं पढ़कर मैं बड़ा हुआ| वे जिसे अच्छा कहते, वही फिल्म मैं अपने छात्र जीवन में देखता था| उन्हें मेरी श्रधांजलि!

Urmilesh Urmil बेहद तकलीफ हुई सुनकर। मदान जी से अनेक मुलाकातें हैं, खासकर 1982-85के दौर में। प्रतिभाशाली लेखक को सलाम और श्रद्धांजलि।

Dayanand Pandey ब्रजेश्वर मदान सब के अजीज थे , उन के बहुत से मुरीद थे , मैं भी उन के मुरीदों में हूं । मेरी कहानियों पर उन्हों ने ख़ूब लिखा है । बाद के दिनों में उन्हों ने कवितायेँ भी ख़ूब लिखीं । अपनी पत्नी के निधन पर लिखी कविता में जिस तरह दो पल्लों वाले दरवाजे का रुपक उन्हों ने रचा है वह दुर्लभ है । उन की बहुत सी यादें मन में जीवित हैं । उन की कहानियां , उन की कविताएं , उन के फ़िल्मी लेख बहुत याद आते हैं । पर जो उन का सब से चटक रंग है , वह है उन के अनथक संघर्ष का । जैसे फ़िल्मी ग्लैमर में किसी एक्स्ट्रा का संघर्ष हो । हिंदी में उस कठिन समय में फ्रीलांसिंग करना पहाड़ तोड़ना ही था , अब भी है । पर वह यह पहाड़ बड़े मन से तोड़ते रहे । उन से 1981 में पहली बार दरियागंज , नई दिल्ली में मिलना हुआ था । फिर कुछ बरस पहले आख़िरी बार राष्ट्रीय सहारा , नोएडा कार्यालय में । उन के झूठ बोलने और उन के सच के तमाम कहे अनकहे किस्से हैं , जिन को अभी याद करने का कोई सबब नहीं है । उन का लेखन , उन की सरलता उन का बहुत कुछ ढक लेती है । उन का दुःख भी । नि:संतान होना उन का सब से बड़ा दुःख था । नया घर बनवाने के बाद पत्नी का जाना उन्हें बुरी तरह तोड़ गया था । तब दो पल्ले के दरवाजे में एक पल्ला चला गया था । अब दूसरा पल्ला भी चला गया । उन का जाना दुःख तो देता है पर उन्हें दुःख से , बीमारी से मुक्ति मिली , यह सोच कर संतोष भी होता है । विनम्र श्रद्धांजलि !

Sanjay Swatantra कहानी और फिल्म लेखन में एक ऐसा नाम, जो हमेशा याद किया जाएगा। मदान जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

Vir Vinod Chhabra सत्तर के दशक में जब कभी दिल्ली जाना होता था तो ब्रजेश्वर मदान से मुलाक़ात ज़रूर होती थी। तब वो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस से प्रकाशित होने वाली एक फ़िल्मी पत्रिका (नाम याद नहीं आ रहा है) में सहायक संपादक होते थे। इसके एडिटर राजकेसरी थे। हम उनसे शिकायत करते थे कि फलां मैगज़ीन वाला पारिश्रमिक नहीं दे रहा है। वो एक फ़ोन खटखटाते और हमें पैसे मिल जाते थे। बहुत बढ़िया किस्सा-गो, लेखक थे और उससे बड़े शानदार मानुस।
मुझे अत्यंत दुःख हुआ उनके निधन की खबर सुन कर।
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

Vinod Anupam ओह, हिंदी फिल्म समीक्षा से परिचित कराने वाले थे,मदान साहब, उनके रहने का अहसास भर ताकत देता था, हार्दिक श्रद्धांजलि

Swapnil Srivastava उनसे एक दो मुलाकाते है। दिल्ली के हिंदी समाज ने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली और हम जैसे लोग दूर से उनके बारे में नहीं जान पाये। यह दुखद है।

Jai Narayan Prasad मैं भी ब्रजेश्वर मदान जी को अच्छी तरह जानता था। सिनेमा की समझ उनके लेखन से आई और बढ़ी थी। उनके जाने का अफसोस तो कभी न खत्म होने वाला अफसोस है। क्या उनके बाल-बच्चे नहीं है? आपके जवाब के इंतजार में?

Vimalendu Vimalendu बहुत दुखद खबर है। उनके अनेक आलेख पढ़े हैं। फिल्मों पर लिखने की समझ उन्हें पढ़ते हुए ही बनी है। नमन मदान साहब को।

Manoj Kumar दुखद | हम हिन्दी के पाठकों को ब्रजेश्वर मदन, विनोद भारद्वाज, प्रयाग शुक्ल जैसे लेखकों ने ही फ़िल्म पर होने वाले (और संभव) विमर्श से अवगत करवाया| श्रध्दांजलि |

Naresh Sharma It is really shocking news………despite my many efforts could not trace him……….Prabhat Ranjan…will connect you via mail box……

Astbhuja Shukla विस्मरण और कृतघ्नता हिन्दी में स्थायी भाव बन रहे हैं विनम्र श्रद्धांजलि

Pushp Ranjan ” मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती.”.
ग़ालिब ने इन शब्दों में ज़िन्दगी का फलसफा लिख डाला था.
ब्रजेश्वर मदान जी की मृत्यु, और उससे पहले उनके लकवाग्रस्त हो जाने वाली बात सचमुच उदास कर देने वाली है.

Mahendra Sharma दुखद। बहुत प्यारे इन्सान थे, मदान जी। उनकी स्मृति को नमन।

Vinit Utpal सर, आपने ही मुझे पहली बार राष्ट्रीय सहारा के ऑफिस में उनसे मिलवाया था. तब से उनका स्नेह बना रहा. नमन.

Rajeev Mittal मदान जी से मिलना नहीं हुआ कभी..पर लेखन से हमेशा परिचित रहा..दुःख यही है आज..कि ऐसे लोग चुपके से निकलते जा रहे हैं..

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SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST MANI D’MELLO

Dear Member,

We are extremely sorry to inform you that senior journalist and Mumbai Press Club member, Mani D’Mello, passed away this morning at Holy Family Hospital, Bandra, following a prolonged illness.

D’Mello aged 54 years, a seasoned crime reporter, worked in various capacities in several newspapers such as Mid-Day, Free Press Journal (FPJ), Times of India and television news channels. During his tenure at FPJ, Mani mentored many reporters who still considered him as their guide.

He will be laid to rest on Thursday. Funeral procession will start at 4.30 pm from his residence — Carters Apts, Sherly Rajan Road, Bandra West.

Mass will be at 5.00 pm at St Anne’s Church, Pali Hill, Bandra West followed by burial at St Andrews Church, Hill Rd, Bandra (West).

Our heart goes out to his family and may they have the strength to bear this huge loss.

Regards,

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

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पहले प्रदीप संगम, फिर ओम प्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी का जाना….

एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग या दुर्योग, जो कहिए… मेरे ज्यादातर प्रिय पत्रकारों का समुदाय धीरे-धीरे सिकुड़ता छोटा होता जा रहा है… दो-तीन साल के भीतर एकदम से कई जनों का साथ छोड़कर इस संसार को अलविदा कह जाना मेरे लिए स्तब्धकारी है… पहले आलोक तोमर, फिर प्रदीप संगम, उसके बाद ओमप्रकाश तपस और अब संतोष तिवारी… असामयिक रणछोड़ कर चले जाना या जीवन के खेल में आउट हो जाना हर बार मुझे भीतर तक मर्माहत कर गया… सारे पत्रकारों से मैं घर तक जुड़ा था और प्यार दुलार का नाता बहुत हद तक स्नेहमय सा बन गया था… इनका वरिष्ठ होने के बाद भी यह मेरा सौभाग्य रहा कि इन सबों के साथ अपना बोलचाल रहन-सहन स्नेह से भरा रसमय था… कहीं पर कोई औपचारिकता या दिखावापन सा नहीं था… यही कारण रहा कि इनके नहीं होने पर मुझे खुद को समझाने और संभलने में काफी समय लगा…

फिलहाल तो बात मैं संतोष जी से ही शुरू करता हूं । मेरा इनसे कोई 23 साल पुराना नाता रहा। भीकाजी कामा प्सेस के करीब एक होटल में शाम के समय कुछ लोगों से मिलने का कार्यक्रम था । मेरे पास अचानक हिन्दुस्तान से संतोष जी का फोन आया- अनामी शाम को एक जगह चलना है, तैयार रहना। मैने जब जिज्ञासा प्रकट की तो वे बौखला गए। अरे जब मैं बोल रहा हूं तो फिर इतने सारे सवाल जवाब क्यों? बस् इतना जान लो कि जो मेरी नजर में सही और मेरे प्रिय पत्रकार हैं, बस्स मैं केवल उन्ही दो चार को बुला भी रहा हूं।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले तो मेरी संतोष जी से दर्जनों बार फोन पर बातें हो चुकी थी, मगर अपने अंबादीप दफ्तर से 100 कदम से कम की दूरी पर एचटी हाउस की बहुमंजिली इमारत में कभी जाकर मैं संतोष जी से मिला नहीं था। ना ही कभी या कहीं इनसे मिलने का सुयोग बना था। मैं फटाफट अपने काम को निपटाया और फोन करके एचटी हाउस के बाहर पहुंच गया। वहां पर संतोषजी पहले से ही मौजूद थे। मुझे देखते ही बोले- अनामी… मेरे सिर हिलाने पर उनने लपक कर मुझे गले से लगा लिया। साले कलम से जितना आक्रामक दिखते हो उतना तीखा और आक्रामक तो तुम लगते नहीं। अब इस पर मैं क्या कहता… बस्स जोर से खिलखिला पड़ा तो वे भी मेरे साथ ही ठहाका लगाने लगे। यह थी मेरे प्रति संतोष जी की पहली प्रतिक्रिया।

देर रात तक मेहमानों के संग बातें होती रहीं और साथ में मदिरामय माहौल भी था। इससे मैं काफी असहज होने लगा तो संतोष जी मुझे कमरे से बाहर ले गए और ज्ञान प्रदान किया। जब तुम कहीं पर पत्रकार के रूप में जाओ तो जरूरी नहीं कि सारा माहौल और लोग तुम्हारी अपेक्षाओं या मन की ही बातें करेंगे। कहीं पर असामान्य लगने दिखने से बेहतर है कि तुम खान पान पर अपने ध्यान को फोकस कम करके काम और जो बातचीत का सेशन चल रहा है उसमें औरों से हटकर बातें करो ताकि सबों का ध्यान काम पर रहे और खान पान दोयम हो जाए। इन गुरूमंत्रों को बांधकर मैं अपने दिल में संजो लिया और अंदर जाकर बातचीत के क्रम को एक अलग तरीके से अपने अनुसार किया।

पत्रकारिता के लगभग दो दशक लंबे दौर में बहुत दफा इस तरह के माहौल का सामना करना पड़ा। जब अपने साथी मित्रों का ध्यान काम से ज्यादा मदिरा पर रहा तो मैंने अपने अनुसार बहुत सारी बातें कर ली और मदिरा रानी के संग झूले में उडान भर रहे मेरे मित्रों ने मेरी बातों पर कोई खास तवज्जो नहीं दी। इसके फलस्वरूप मेरी रिपोर्ट हमेशा औरों से अलग और कुछ नयी रहती या होती थी। इस पर अगले दिन अपने साथियों से मुझे कई बार फटकार भी खानी पड़ी या कईयों ने मुझे बेवफा पत्रकार का तगमा तक दे डाला था कि खबरों के मामले में यह साला विश्वास करने लायक नहीं है। आपसी तालमेल पर भी न्यूज को लेकर किसी समय सीमा का बंधन नहीं मानेगा।

तमाम उलाहनों पर भिड़ने की बजाय हमेशा मेरा केवल एक जवाब होता कि न्यूज है तो उसके साथ कोई समझौता नहीं। इस तरह के किसी भी संग्राम में यदि मैं कामयाब होता या रहता तो संतोषजी का लगभग हमेशा फोन आता, वेरी वेरी गुड अनामी डार्लिंग। वे अक्सर मुझे मेरे नाम के साथ डार्लिंग जोडकर ही बोलते थे। मैने उनसे कई बार कहा कि आप जब डार्लिंग कहते हैं तो बबल कहा करें जिससे लोग समझेंगे कि आप किसी महिला बबली से बात कर रहे हैं…. अनामी में डार्लिंग जोडने से तो लोग यही नहीं समझ पाएंगे कि आप किसी को अनामी बोल रहे है या नामी बोल रहे है या हरामी बोल रहे हैं। मेरी बातें सुनकर वे जोर से ठहाका लगाते… वे कहते- नहीं, बबल कहने पर ज्यादा खतरा है यार… अनामी इतना सुंदर और अनोखा सा इकलौता नाम है कि इसको संबोधित करना ज्यादा रसमय लगता है।

इसी तरह के रसपूर्ण माहौल में मेरा नाता चल रहा था. मुझसे ज्यादा तो मुझे फोन करके अक्सर संतोषजी ही बात करते थे। हमेशा एचटी हाउस की जगत विख्यात कैंटीन में मुझे बुलाते और खान पान के साथ हमलोग बहुत मामले में बात भी कर लिया करते थे। उनका एक वीकली कॉलम दरअसल दिल्ली की समस्याओं पर केंद्रित होता था। कई बार मैने कॉलम में दी गयी गलत सूचनाओं जानकारियों तथ्यों और आंकड़ो की गलती पर ध्यान दिलाया तो मुझे हमेशा लगा कि शायद यह उनको बुरा लगेगा। मगर एक उदार पत्रकार की तरह हमेशा गलतियों पर अफसोस प्रकट किया और हमेशा बताने के लिए प्रोत्साहित किया।

हद तो तब हो गयी जब कुछ प्रसंगों पर लिखने से पहले घर पर फोन करके मुझसे चर्चा कर लेते और आंकड़ो के बारे में सही जानकारी पूछ लेते। उनके द्वारा पूछे जाने पर मैं खुद को बड़ा शर्मसार सा महसूस करता कि क्या सर आप मुझे लज्जित कर रहे हैं, मैं कहां इस लायक कि आपको कुछ बता सकूं। मेरे संकोच पर वे हमेशा कहते थे कि मैं भला तुमको लज्जित करूंगा, साले तेरे काम का तो मैं सम्मान कर रहा हूं, मुझे पता है कि इस पर जो जानकारी तुम दोगे वह कहीं और से नहीं मिलेगी।

उनकी इस तरह की बातें और टिप्पणियां मुझे हमेशा प्रेरित करती और मुझे भी लगता कि काम करने का मेरा तरीका कुछ अलग है। आंकड़ो से मुझे अभी तक बेपनाह प्यार हैं क्योंकि ये आंकड़े ही है जो किसी की सफलता असफलता की पोल खोलती है। हालांकि अब नेता नौकरशाह इसको लेकर काफी सजग और सतर्क भी हो गए हैं मगर आंकडों की जुबानी रेस में ज्यादातर खेलबाजों की गाड़ी पटरी से उतर ही जाती है। संतो,जी र मेरा प्यार और नेह का नाता जगजाहिर होने की बजाय लगातार फोन र कैंटीन तक ही देखा जाता। हम आपस में क्या गूफ्तगू करते यह भी हमारे बीच में ही रहता।

एक वाक्या सुनादूं कि जब वे मयूरविहार फेज टू में रहते थे तो मैं अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पर्व में मिठाई का एक पैकेट लेकर खोजते खोजते सुबह उनके घर पर जा पहुंचा। । घर के बाहर दालानव में मां बैठी थी। मैने उनसे पूछा क्या आप संतो,जी की मां है ? मेरे सवाल पर चकित नेत्रों से मुझे देखते हुए अपने अंचल की लोक भाषा में कुछ कहा जिसका सार था कि हां । मैने उनके पैर छूए और तब मेरा अगला सवालथा कि क्या वे घर पर हैं ? मां के कुछ कहने से पहले ही तब तक भीतर से उनकी आवाज आई जी हा अनामी डार्लिंगजी संतोष जी घर पर हैं आप अंदर आईए। उनकी आवाज सुनकर मां ने जाने का रास्ता बना दिया तो मैं अंदर जा पहुंचा।

मेरे हाथ में मिठाई का डिब्बा देखकर वे बोल पड़े ये क्या है ? थोडा तैश में बोले गजब करते हो छोटे भाई हो और बड़े भाई के यहां मिठाई लेकर आ गए। अरे बेशरम मिठाई खाने आना चाहिए ना कि लाना। मैं भी थोडा झेंपते हुए कहा कि आज दीवाली था और आप दिल्ली के पहले पत्रकार हो जिसके घर मैं आया हूं। तो बोले- मुझे ही आखिरी पत्रकार भी रखना जब किसी पत्रकार के यहां जाओगे मिठाई लेकर तो वह तेरी ईमानदारी पर संदेह करेगा कि घर में मिठाई के कुछ डिब्बे आ गए तो लगे पत्रकारों में बॉटकर अपनी चौधराहट दिखाने। कुछ देर के बाद जब मैं जाने लगा तो मुझे मिठाई के दो डिब्बे तमाया एक तो मेरी तरफ से तुमको और दूसरा डिब्बा जो लाया था उसके एवज में यह दूसरा डिब्बा।

मैं दोनों डिब्बे थामकर जोर से हंसने लगा,तो वे थोडा असहज से होते हे सवाल किया कि क्या हुआ? मैंने कहा कि अब चौधराहट मैं नहीं आप दिखा रहे हैं। फिर हमलोग काफी देर तक खिलखिलाते रहे और अंत में फिर चाय पीकर घर से बाहर निकला। दीपावली या होली पर जब कभी शराब की बोतल या कभी कभी बंद पेटी में दर्जनों बोतल शराब की घर पहुंचा देने पर ही मैं अपने उन मित्रों को याद करता जिनके ले यह एक अनमोल उपहार होती। बाद में कई विधायकों को फोन करके दोबारा कभी भी शराब ना भेजने का आग्रह करना पड़ता ताकि मुझे से कपाने के लिए परिश्रम ना करना पड़े।

इसी तरह 1996 के लोकसभा चुनाव में बाहरी दिल्ली के सांसद सज्जन कुमार की एक प्रेसवार्ता में मैं संतोषजी के साथ ही था। मगर सज्जन कुमार के बगल में एक मोटा सा आदमी बैठा था । दोनों आपस में कान लगाकर सलाह मशविरा कर रहे थे। बातचीत के दौरान भी अक्सर उनकी कनफुसियाहट जारी रही। प्रेस कांफ्रेस खत्म होने के बाद मैं दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के तालकटोरा रोड वाले दफ्तर के बाहर खडा ही था कि सज्जन कुमार के उसी मोटे चमच्चे पर मेरी नजर गयी। तीसरी दफा अंदर से निकल कर अपनी गाड़ी तक जाना और लौटने की कसरता के बीच मैने हाथ जोडते हुए अभिवादन के साथ ही पकड़ लिया। माफ करेंगे सर मैं आपको पहचाना नहीं?

दैनिक जारगण के रिपोर्टर ज्ञानेन्द्र सिंह मेरे साथ था। मैने अपना और ज्ञानेन्द्र का परिचय दिया तो वो बोल पडा अरे मैं गोस्वामी एचटी से । मगर इस क्षणिक परिचय से मैं उनको पहचान नहीं सका। तब जाकर हिन्दुस्तान के चीफ रिपोर्टर रमाकांत गोस्वामी का खुलासा हुआ। मैने कहा कि सर आप मैं तो सज्जन का कोई पावर वाला चमच्चा मान रहा था। मेरे यह कहने पर वे झेंप से गए मगर तभी उन्होने हाथ में लिए अंडे पकौडे और निरामिष नाश्ते को दिखाकर पूछा कुछ लोगे ? मैने उनसे पूछा कि क्या आप लेते है ? तो वे एक अंहकार भाव से बोले मैं तो पंडित हूं ? तब मैंने तुरंत पलटवार किया मैं तो महापंडित हूं इसको छूता तक नहीं। मेरी बातों से वे बुरी तरह शर्मसार हो उठे। मगर कभी दफ्तर में आकर मिलने का न्यौता देकर अपनी जान बचाई। मैने इस घटना को संतोषजी को सुनाया तो मेरी हिम्मत की दाद दी। हंसते हे कहा की ठीक किय़ा जो लोग पत्रकार होकर चमच्चा बन जाने में ज्यादा गौरव मानते हैं उनके साथ इस तरह का बर्ताव जरूरी है।

शांतभाव से एक प्यार लगाव भरा हमारा रिश्ता चल रहा था कि एकाएक पता लगा कि वे अब दैनिक जागरण में चले गए. इस खबर पर ज्यादा भाव ना देकर मैं एक बार अपने भारतीय जनसंचार संस्थान काल वाले मित्र उपेन्द्र पांडेय से मिलने जागरण पहुंचा तो संयोग से वहीं पर संतोषजी से मुलाकात हुई। जागरण के कुछ स्पेशल पेज में आए व्यापक परिवर्तनों पर मैने उपेन्द्र से तारीफ की तो पता चला कि आजकल इसे संतोषजी ही देखरहे हैं। तब मैंने पूरे उल्लास के साथ उनके काम करने के अंदाज पर सार्थक प्रतिक्रिया दी। मैंने यह महसूस किया कि वे हमेशा मेरी बातों या सुझावों को ध्यान से लेते थे। मैने कहा भी कि आप आए हैं तो भगवती जागरण में धुंवा तो प्रज्जवलित होनी ही चाहिए। मेरी बातों को सुनकर संतोषजी ने फिर कहा अनामी तेरी राय विचारों का मैं बड़ा कद्र करता हूं क्योंकि तुम्हारा नजरिया बहुतों से अलग होता है। यह सुनकर मैंने अपना सिर इनके समक्ष झुका लिया तो वे गदगद हो उठे। उन्होंने कहा तेरी यही विन्रमता ही तेरा सबसे बड़ा औजार है। लेखन में एकदम कातिल और व्यक्तिगत तौर पर एकदम सादा भोला चेहरा। अपनी तारीफ की बातें सुनकर मैं मारे शरम के धरती में गड़ा जा रहा था।

जागऱण छोड़कर उपेन्द्र के साथ चंड़ीगढ बतौर संपादक दैनिक ट्रिब्यून में चले गए। 1990-91 में लेखन के आंधी तूफानी दौर में कई फीचर एजेंसियों के मार्फत ट्रिब्यून में मेरी दर्जनों रपट लेख और फीचर छप चुके थे। 193 में मैं जब चंडीगढ़ एक रिपोर्ट के सिलसिसे में गया तो उस समय के ट्रिब्यून संपादक विजय सहगल जी से मिला। परिचय बताने पर वे एकदम चौंक से गए। बेसाख्ता उन्होंने कहा अरे अनामी मैं तो अभी तक अनामी को 40-45 साल का समझ रहा था. आप तो बहुत सारे प्रसंगों पर रोचक लिखते हैं। सहगल जी की बातें सुनकर मैं भी हंसने लगा। लगभग यही प्रतिक्रिया थी पहले चौथी दुनिया और बाद में राष्ट्रीय सहारा के पटना ब्यूरो प्रमुख परशुराम शर्मा की। 1995 में एक दिन नोएडा स्थित सहारा दफ्तर में मिल गए। परिचय होने पर उन्होंने मुझे गले से लगा लिया- अरे बाप रे बाप,  कितना लिखता है तू। मैं तो उम्रदराज होने की सोच रहा था पर तू तो एकदम बच्चा निकला। दो दशक से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी उनका स्नेह बरकरार है।

कभी कभी मैं लिखने की रफ्तार तथा छपने की बारिश पर सोचता हूं तो अब मैं खुद चौंक जाता हूं। पहले लगता था कि मेरे हाथ में सरस्वती का वास हो। लंबा लिखना मेरा रोग था। कम शब्दों में लिखना कठिन होता था। बस कलम उठाया तो नदियां बह चलीं वाली हालत थी। पर अब लगता है मेरे लेखन का खुमार ही पूरी तरह उतर-सा गया हो। अब तो लिखने से पहले उसकी तैयारी करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर लगता है मानो लिखना संभव हो पाता है। मुझे कई बार चंडीगढ भी बुलाया पर मैं जाकर मिल ना सका। उपेन्द्र पांडेय ने मुझे दिल्ली का भी फोन नंबर दिया और कई बार बताया भी कि संतोष, अभी दिल्ली में ही हैं, मगर मैं ना मिल सका और ना ही बातचीत ही हो सकी। अभी पिछले ही माह उपेन्द्र ने फोन करके कहा कि अब माफी नहीं मिलेगी, तुम चंडीगढ़ में आओ, बहुत सारे मित्र तुमसे मिलने के लिए बेताब हैं।

मैं भी अप्रैल में दो तीन दिन के ले जाना चाह रहा था। इसी बहाने अपनी मीरा मां और रमेश गौतम पापा समेत अजय गौतम और छोटे भाई के साथ एक प्यारी सी बहन से भी मिलता। कभी हजारीबाग में रहकर धूम मचाने वाले ज्योतिषी पंडित ज्ञानेश भारद्वाज की भी आजकल चंडीगढ में तूती बोल रही है. संतोष जी के साथ एक पूरे दिन रहने और संपादक के काम काज और तमाम बातों पर चर्चा करने के लिए मैं अभी मानसिक तौर पर खुद को तैयार ही कर रहा था कि एक रोज रात 11 बजे एकाएक फेसबुक पर भडास4मीडिया में संतोष तिवारी के न रहने की खबर देखकर सन्न रह गया। ऐसा प्रतीत हुआ मानों वे रूठ गए हों मुझसे। कोई उलाहना दे रहे हों कि साले दो साल से बुला रहा हूं तो तेरे को फुर्सत नहीं थी तो ठीक है अब तू चंडीगढ़ आ तो सही पर अब मेरे पास भी तुमसे मिलने का समय नहीं।

मैं इस लेख को देर रात तक जागकर कल ही लिख देना चाह रहा था पर मेरे सामने संतोषजी इस कदर मानों आकर बैठ गए हों कि मेरे लिए उनकी यादों से निकलना और शब्द देना संभव नहीं हो पाया। और अंतत: पौने एक बजे रात को मैंने अपना कम्प्यूटर बंद दिया। आज सुबह से ही मेरे भीतर संतोषजी समाहित से हैं। लगता है मानो वे मेरे लेख को देख रहे हों और जल्दी जल्दी लिखने को उकसा रहे हों। आमतौर पर मेरे नयन जल्दी सजल नहीं होते मगर हिन्दी पत्रकारिता ने एक सुयोग्य उत्साही संपादक को खो दिया है। अपने सहकर्मियों को अपने परिवार का सदस्य सा मानकर प्यार और स्नेह देने वाले दिल्ली में कितने लोग रह गए है? उपेन्द्र पांडेय के लाख कहने पर भी अब तो फिलहाल चंडीगढ जाने का उत्साह ही नरम पड़ गया। किस मुंह से जाउं या किसके लिए? फिलहाल तो संतोषजी की अनुपस्थिति / गैरमौजूदगी ही मेरे को काट रही है. मुझे बारबार अनामी डार्लिंग की ध्वनि सुनाई पड़ रही है कि दिल्ली जैसे शहर में संतोषजी के अलावा और कौन दूसरा हो सकता है जो अनामी डार्लिंग कहकर अपना प्यार स्नेह और वात्सल्य दिखला सके।

और अंत में, माफ करेंगे प्रदीप संगम जी और ओम प्रकाश तपस जी। आलोक तोमर भैय्या पर तो एक लेख लिखकर मैं अपना प्यार तकरार इजहार कर चुका हूं। मगर आप दोनों पर अब तक ना लिखने का कर्ज बाकी है। पूरा एक लेख आप लोगों पर हो, यह मेरा प्रयास होगा। फिलहाल तो इस मौके पर केवल कुछ यादों की झांकी। संगम जी से मैं सहारनपुर से जुडा था। जिंदगी में बतौर वेतन कर्मी यह पहली नौकरी थी। शहर अनजाना और लोग पराय़े। मगर डा. रवीन्द्र अग्रवाल और प्रदीप संगम ने मुझे एक सप्ताह के अंदर शहर की तमाम बारीक जानकारियों से अवगत कराया। संगम जी के घर के पास में ही मैं भी किराये पर रहता था तो सुबह की चाय के साथ देर रात तक संगम क्लास जारी रहता। भाभी का व्यावहार स्नेहिल और मिलनसार स्वभाव था। इससे मेरे मन के भीतर की लज्जा खत्म हो गई और संगम जी का घर एक तरह से हमारे लिए जब मन चाहा चले गए वाला अपना घर हो गया था। बाद में संगमजी दिल्ली हिन्दुस्तान में आए तो 1988 की बहुत सारी यादें सजीव हो गयी। हम लोग कनाट प्लेस में अक्सर साथ रहते। मगर सपरिवार संगम जी हिमाचल घूमने क्या गए कि पहाड की वादियों में ही एकाएक हमलोगों को अलविदा बोल गए।

यह मेरे लिए भी एक सदमा था। तभी नवभारत टाईम्स में काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश तपस जी एकाएक हमारे बीच से चले गए। बात 1994 की है जब मैंने दिल्ली के दो गांवों पर एक स्टोरी की. दिल्ली और साक्षरता अभियान को शर्मसार करने वाले दो गांव यमुना नदी के मुहाने पर है। मैं जहांगीरपुरी के निर्दलीय विधायक कालू भैय्या को तीन किलोमीटर तक पैदल लेकर इस गांव में पहुंचा और मुस्लिम बहुल इस गांव की बदहाली पर मार्मिक रपट की। राष्ट्रीय सहारा में खबर तो पहले छपी मगर हमारे डेस्क के महामहिमों के चलते यह खबर पहले पेज पर ना लेकर भीतर के किसी पेज में लगा दी गयी। अगले दिन मैंने काफी नाराजगी भी दिखाई मगर चिड़िया चुग गयी खेत वाली हालत थी।

खबर छपकर भी मर गयी थी, मगर एक सप्ताह के भीतर ही नवभारत टाईम्स में यही खबर छपी- ‘दिल्ली के दो अंगूठा टेक गांव’। खबर छपने पर दिल्ली में नौकरशाही स्तर पर हाहाकार मचा। सरकार सजग हुई और एक माह के अंदर ज्ञान पुर्नवास साक्षरता आदि की व्यवस्था करा दी गयी। मैने खबर की चोरी पर तपस जी से फोन पर आपत्ति की. मैने कहा कि आपको खबर ही करनी थी तो एक बार तो मुझसे बात कर लेते मैं आपको इतने टिप्स देता कि आप और भी कई स्टोरी बना सकते थे। मैं तो फिर से इस प्रसंग पर अब लिखूंगा ही नहीं क्योंकि पेपर वालों को इसकी समझ ही नहीं है। मेरी बातों पर नाराज होने की बजाय तपस जी ने खेद जताया और मिलने को कहा। जब हम मिले तो जिस प्यार उमंग उत्साह और आत्मीयता से मुझसे मिले कि मेरे मन का सारा मैल ही धुल गया। हम लोग करीब 16-17 साल तक प्यार और स्नेह के बंधन में रहे। इस दौरान बहुत सारी बातें हुई और वे सदैव मुझे अपने प्यार और स्नेह से अभिभूत रखा। मगर एक दिन एकाएक सुबह सुबह तपस जी के भी रूठने की खबर मिली. हर अपना वो वो पत्रकार लगातार मेरी नजरों से ओझल हो रहे हैं जिसको मैं बहुत पसंद करता हूं। हे भगवान मुझे इस दुर्भाग्य से बचाओ प्रभू।

लेखक अनामी शरण बबल आईआईएमसी के पासआउट हैं और कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उनसे संपर्क asb.deo@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार और संपादक संतोष तिवारी का निधन

Shambhu Nath Shukla : आज दोपहर रोहतक से पुरषोत्तम शर्मा का फोन आया और उसने जब बताया कि भाई साहब संतोष तिवारी जी नहीं रहे तो शॉक्ड रह गया। जेहन में 41 साल पहले का 1976 यूं घूम गया जैसे कल की ही बात हो। हम तब सीपीआई एमएल के सिम्पैथाइजर थे। हम यानी मैं और दिनेशचंद्र वर्मा। हमने तब श्रीपत राय की कहानी पत्रिका में एक कहानी पढ़ी जिसके लेखक का पता दिनेश के पड़ोस वाले घर का था। वह लेखक थे संतोष तिवारी। हम उस पते पर घर पहुंचे। संतोष के पिताजी ने दरवाजा खोला तो हमने पूछा कि तिवारी जी हैं?

संतोष तिवारी

वे बोले मैं ही हूं बताइए। हमने उनसे कहानी पर बातचीत शुरू की तो वे कुछ उखड़े-उखड़े से लगे और बोले आप संतोष की बात कर रहे हो? हमने कहा जी। तब उन्होंने अपने लड़के संतोष को बुलवाया। जो हाफ पैंट पहने हमारे सामने आ खड़ा हुआ। करीब 16 साल के इस किशोर को देखकर हमें लगा कि हम गलत पते पर आ गए हैं। इस बालक से क्या बात की जाए और हम चले आए। दो दिन के बाद संतोष हमारे घर आ धमका और शुरू हो गई बातचीत जो अब तक चलती रही। संतोष खूब बातूनी था और यारों का यार। वह न तो कम्युनिस्ट था न समाजवादी न कांग्रेसी न जनसंघी। वह एक सामान्य जन की तरह आस्तिक था और एक सामान्य शहरी की तरह माडर्न।

शराब से उसे परहेज नहीं था बल्कि खूब पीता था अलबत्ता अंडा तक स्पर्श नहीं करता था। राजनीति से उसे परहेज था और मुझसे कह रखा था कि आप हमारे ट्रिब्यून में कालम तो हर सप्ताह लिखो पर राजनीतिक कतई नहीं। अब मुझे अपना कालम चलाए रखने के लिए ललित निबंध लिखने पड़े एकदम दांत, नाक, कान सरीखे। मगर इससे एक बात हुई कि मेरी ललित निबंधों पर पकड़ बनी और कई आईएएस जब बताते हैं कि हम आपके निबंध पढ़कर पास हुए तो लगता है कि मैं भी पास हो गया। ऐसे संतोष तिवारी आज विदा ले गए तो शॉक्ड तो होना ही था।

दो साल से मैने अपने कई अजीज और करीबी खो दिए। पहले अपने दामाद हर्षवर्धन पांडेय को खोया, फिर अग्रज ब्रजेंद्र गुरू को। इसके बाद अनुज सुरेंद्र त्रिवेदी को और आज अपने अजीज सखा संतोष तिवारी को। जब से सुना तब से न विषाद प्रकट कर पा रहा हूं न दुख। अब कुछ चित्त स्थिर हुआ तब यह पोस्ट लिख सका।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

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पिंक सिटी प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष विश्वास कुमार का निधन

जयपुर से खबर है कि पिंक सिटी प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष विश्वास कुमार जी का आज सुबह 9:30 बजे निधन हो गया. उनकी शव यात्रा उनके गांधी नगर स्थित आवास से 2:00 बजे रवाना हुई और लाल कोठी श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार किया गया. इस मौके पर शहर के गणमान्य लोग मौजूद थे.

IFWJ mourns Vishwas Sharma

The Indian Federation of Working Journalists (I.F.W.J.) deeply mourns the sad death this morning of its leader Com.Vishwas Kumar Sharma, former chief reporter of the Rajasthan Patrika and the daily Ambar in Jaipur. He was suffering from cancer. The I.F.W.J. President K Vikram Rao, its Secretary General Com. H.B. Madan Gowda (Karnataka) and its Secretary (Headquarters) New Delhi Com. Vipin Dhuliya recalled the tremendous services of Com.

Vishwas Sharma to the cause of working journalists. He was elected thrice the general secretary of the Rajasthan Working Journalists Union. He led RWJU delegations to IFWJ conferences many times. Com.Vishwas had represented the IFWJ in international conference in Prague(Czech Republic) and in Bratislava(Slovakia). His importance as a journalist was realized before his visit abroad. His passport did not have the official stamp of “immigration check not required”.

This meant that no visa could be issued. He landed in New Delhi on a public holiday. But then the foreign minister, Kunwar Natwar Singh, had got the office of the Regional Passport Officer opened and got Vishwas Sharma’s travel documents stamped. The IFWJ Working Committee meeting scheduled to be held in Andhra Pradesh next month will have its mandap named after Com.Vishwas Kumar Sharma, announced the Secretary

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नेशनल वायस चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्र के पिता अवध नारायण मिश्रा का निधन

नेशनल वायस न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ बृजेश मिश्र के पिता अवध नारायण मिश्र का बीते दिनों निधन हो गया. उनके निधन पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत कई वरिष्ठ नेताओं, पत्रकारों, गणमान्य लोगों ने शोक व्यक्त किया है. अवध नारायण मिश्र भी पत्रकारिता के पेशे से लम्बे समय तक जुड़े रहे हैं और अपने लेखन के ज़रिये उन्होंने समाज की तमाम विसंगतियों के खिलाफ संघर्ष किया. उनका कौशाम्बी के कड़ा घाट पर बड़ी संख्या में संभ्रात लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया. मुखाग्नि उनके बड़े शैलेश मिश्र ने दी.

अवध नारायण मिश्रा के निधन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने गहरा शोक व्यक्त किया. उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की. इंडियन फेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के पदाधिकारियों ने भी अवध नारायण मिश्र के निधन पर अपनी संवेदना प्रकट की. एक बयान में कहा गया है- ”अवध नारायण मिश्र ने उस दौर में कलम के ज़रिये समाज की सेवा की जब सूचना के इतने साधन मौजूद नहीं थे. उनके निधन से पत्रकारिता और साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है. ईश्वर उनके परिवार को इस असहनीय दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे.”

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हिंदुस्तान, मुजफ्फरपुर के वरिष्ठ पत्रकार विजय सिंह का सड़क हादसे में निधन

Sami Ahmad : भाई विजय सिंह कल रात सड़क हादसे में हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। ज़िंदादिल इंसान। हौसला हमेशा साथ। जब मोतिहारी के ‘तास’ की बात निकलती फ़ौरन दावत देते, आइये ना भैया। मैं भी भैया ही कहता। लेकिन ऐसी खबर पर अब मैं चौंकता नहीं क्योंकि मुज़फ्फरपुर के साथ यह बदकिस्मती बहुत पुरानी हो गयी है। एक तो इस पेशे की मजबूरी है, देर रात लौटने की। जो बचे बस उनकी किस्मत है वरना अपने इलाके में कौन कब सड़क हादसे का शिकार हो जाए और किस पर कब बिजली का तार गिर जाए, कहा नहीं जा सकता। वैसे भी हमारे समाज में ऐसी मौतों को कभी गम्भीरता से नहीं लिया जाता।

Ravi Prakash : यकीन नहीं हो रहा। दुखी हूं। पिछली बार जब हम मिले, आप कितने खुश थे। मोतिहारी से मुजफ्फरपुर की ट्रेन यात्रा हमारी आखिरी मुलाकात बन जाएगी, ऐसा अंदाजा नहीं था। आपसे हर मुलाकात प्रेरणा देती थी। आप कितने इनोवेटिव थे। अपडेट रहते थे। पिछली दफा भी हमनें खूब बातें की थीं। नयी योजनाओं पर। अफसोस, अब आपसे मुलाकात नहीं होगी। प्रभात खबर के सिलिगुड़ी संस्करण में रहते हुए आपने CPM के घोषणा पत्र में गड़बड़ी की बहुचर्चित स्टोरी की।

हिंदुस्तान में हाल ही में आपने नेपाल पर शानदार रिपोर्ट लिखी। दैनिक जागरण में रहते हुए भी आपकी कलम ने अपनी ठसक बनाए रखी। आपकी कई कहानियां हमारे जेहन में है। मोतिहारी मोह नहीं होता, तो आप हमारी तरह किसी दूसरे शहर में होते। और बेहतर जिंदगी जीते। आपको मोतिहारी से मुहब्बत थी। वरना, रोज सुबह ट्रेन से मुजफ्फरपुर आना और देर रात मोतिहारी वापस लौटना, हर किसी के वश की बात नहीं।

आपको सिलिगुड़ी रास नहीं आया। मेरे जोर देने के बावजूद कई और शहरों के बेहतरीन आफर आपने नहीं स्वीकारे। आपका मोतिहारी प्रेम! Vijay भैया, आप रुला कर चले गए। आपकी इतनी यादें हैं कि किताब लिख दूं। ईश्वर आपकी आत्मा को शांति बख्शें और परिवार को इस दुख से उबरने की शक्ति। मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। प्रणाम। सलाम। आप हमारी यादों में जिंदा रहेंगे। हमेशा।

मोतिहारी से बाहर के मेरे दोस्त, जो विजय सिंह को नहीं जानते, उनके लिए- विजय सिंह चंपारण के वरिष्ठ पत्रकार थे। इन दिनों हिंदुस्तान अखबार के मुजफ्फरपुर संस्करण में वरिष्ठ पद पर थे। आज अल सुबह रात के करीब 1 बजे मुजफ्फरपुर में हुई एक सड़क दुर्घटना में उनका स्वर्गवास हो गया। इससे पूर्व वे प्रभात खबर, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स और समाचार एजेंसी भाषा के साथ भी उल्लेखनीय पारियां खेल चुके थे।

समी अहमद और रवि प्रकाश की एफबी वॉल से.

यूपी में भी सड़क हादसे में एक प्रतिभाशाली पत्रकार का निधन हो गया… पढ़ें पूरी खबर…

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किसी को यकीन नहीं हो रहा युवा पत्रकार राजुल निगम अब नहीं रहे

स्व. पत्रकार राजुल निगम की विभिन्न तस्वीरें…

सुल्तानपुर के पत्रकार जगत के महानायक थे राजुल निगम… महान व्यक्तित्व के धनी पत्रकार थे राहुल निगम। इन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में सराहनीय कार्य तो किया ही, पत्रकारिता की लाज बचाने के लिए अतुलनीय कार्य किया। सुल्तानपुर का पत्रकार जगत आज अपने एक महानायक राजुल निगम को खो कर एक खालीपन अधूरेपन अपूर्णता का एहसास कर रहा है। राजुल निगम जी न्यूज सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में कार्यरत रहे और अपने कार्यों की बदौलत समाज में अपनी एक प्रतिष्ठित जगह बनायी, साथ ही पत्रकारिता की शुचिता और पत्रकारों के सम्मान के लिए सदैव आगे बढ़कर लड़ाई लड़ी।

पत्रकार हित की लड़ाई में जब पत्रकार जे.डे. की हत्या के विरोध में धरना चल रहा था, उस समय छायाकार राज बहादुर यादव की पुलिस ने बर्बर पिटाई कर दी। इसके विरोध में राजुल निगम जी ने आगे बढ़कर सभी पत्रकारों को एकजुट कर पुलिस अधीक्षक सुल्तानपुर का घेराव किया और न्याय दिलाकर ही शान्त हुए। बहरहाल वह एक अलग बात थी कि राजुल निगम जी के इस आन्दोलन को किसी ने उनका निजी स्वार्थ बताकर भड़ास4मीडिया पर खबर चलवा दिया था, ‘‘सुल्तानपुर में अपना-अपना हित साधाने के लिए पत्रकार चला रहे आन्दोलन’’ शार्षक से।

बाद में राजुल निगम ने अपने तार्किक पत्र के माध्यम से भड़ास4मीडिया के सम्पादक यशवंतजी को असलियत का आइना दिखाकर उनकी भूल का एहसास कराया था और अपना पत्र छापने के लिए प्रेरित किया। राजुल ने इस पत्र में लिखा- ‘‘यशवंत जी आपकी खुद की लड़ाई जो सिस्टम से चल रही है, कम से कम हम उसे निजी स्वार्थों की नहीं मान रहे हैं। अगर आपकी लड़ाई निजी स्वार्थों की है तो इस लड़ाई को भी आप उसी श्रेणी में मान सकते हैं।’’

किसी को यकीन नहीं हो रहा कि राजुल नहीं अब हमारे बीच नहीं रहे। राजुल निगम जी का व्यक्तित्व, कार्य, जुनून आज हमारे लिए प्रेरणादायक है। वे हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे। उनका यशस्वी कृत्य पत्रकारिता जगत सदैव स्मरण रखेगा। पत्रकार जगत ने वास्तव में अपना एक महानायक खो दिया जिसकी भरपाई सुल्तानपुर व अमेठी के लिए फिलहाल संभव नहीं दिख रहा।

सुरजीत यादव
पत्रकार
अमेठी
मो.- 9005909448
surjeetcrimenews@gmail.com

राजुल निगम की मृत्यु के कारणों को जानने के लिए नीचे क्लिक करें…

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भड़ास संपादक यशवंत के बड़े पिता जी श्रीकृष्ण सिंह का निधन

भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह के बड़े पिताजी श्रीकृष्ण सिंह का कल उनके जिले गाजीपुर स्थित पैतृक गांव में देहांत हो गया. उनकी उम्र 85 साल से ज्यादा थी. उन्हें कोई रोग / शोक नहीं था. उनका निधन हार्ट अटैक के कारण हुआ. वे अपने पीछे चार बेटे, बहुओं और नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. यशवंत कई रोज से अपने गांव में ही थे. सो, उन्होंने बड़े पिता जी के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार में शिरकत किया. यशवंत ने फेसबुक पर अपने बड़े पिताजी को लेकर एक संस्मरणात्मक राइटअप लिखा है, जिसे नीचे दिया जा रहा है….

Yashwant Singh : बड़े पिता जी यानि श्रीकृष्ण सिंह की उम्र 85 साल से ज्यादा थी. वे खानदान में सबसे अलग थे. बेहद डेमोक्रेटिक. सबके प्रति साफ्ट रहे. कभी कड़क स्वभाव में उन्हें देखा नहीं. बच्चा हो या बुजुर्ग, हर कोई उनसे हर तरह की बात कर लेता और वह सबकी मजे में सुनते.

गांव में कोई उनका विरोधी नहीं था और वे खुद किसी के विरोधी नहीं बने. बेहद पाजिटिव व्यक्तित्व. किसी से कोई आकांक्षा नहीं रखे कभी, अपने बेटों से भी नहीं. जो कुछ कर दे तो ठीक, न करे तो ठीक. उनकी अपनी दुनिया थी. वे बाकी परिजनों / सवर्णों की तरह फ्यूडल कतई नहीं थे.

लंबी उम्र हो जाने के कारण सेहत को लेकर सतर्क रहा करते. अपना काम काज खुद करते और टहलने में कोताही न बरतते. उनके जीते जी उनसे उमर में छोटे कई सारे लोग गुजर गए. वे तब यही कह करते- अरे वह तो मुझसे छोटे थे, बड़ी जल्दी चले गए.

चार रोज पहले वह बुढ़ापे के हालात का वर्णन अनायास करने लगे. वह बताने लगे- ”चाहे जो कहो, बुढ़ापे में तकलीफ तो है. खड़े होने पर तकलीफ, बैठो तो तकलीफ. न उठो बैठो तो तकलीफ.” वे आगे हंसते हुए बोले- ”ऐसी तकलीफों के कारण ही लोग मर जाना ज्यादा पसंद करते हैं.”

यह बात उनने मुस्कराते हुए कही और मैं बिना गहराई में गए उनका साथ देते हुए हंस-मुस्करा पड़ा. मुझे लगा वो ये बात बस बतियाने के लिए कुछ कहने सुनने हेतु कह बता रहे हैं. मैंने इसका कोई दूसरा या सांकेतिक मतलब नहीं निकाला. पर मैं गलत था. वह शायद अपने तन के जर्जर होते जाने को लेकर यह बात ज्यादा संवेदनशील मन:स्थिति में कह रहे थे. यानि वे मौत के लिए तैयार थे, शायद मौत को आमंत्रित कर रहे थे.

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बड़े पिताजी से हम लोग कुछ भी कह / मांग लेते थे. वे जानते हैं कि मैं कभी-कभार सुर्ती यानि तंबाकू खा लेता हूं. इसलिए वह मुझे देखते तो सुर्ती में चूना मिलाकर हथेली में रगड़ने लगते. चार रोज पहले वह सुर्ती बना रहे थे, तभी उनके पीछे एक बिल्ली ने म्याऊं कहा. मैंने कैमरा आन कर बिल्ली पर फोकस किया और बिल्ली-सी आवाज निकालने की कोशिश करने लगा.

बिल्ली जाल में फंसने लगी. उसे मेरी बिल्ली-सी आवाज परिचित सी जान पड़ने लगी. उसने दोनों कान खड़े कर लिए और आंख फाड़कर देखना शुरू किया. बिल्ली बड़े पिताजी के पीछे थी. बड़े पिता जी समझ ही नहीं पाये कि आखिर मैं कर क्या रहा हूं, क्यों बिल्ली की आवाज निकाल रहा हूं. उन्हें धीरे से बताया कि पीछे बिल्ली है, उसको रिकार्ड कर रहा हूं.

मैंने कैमरे के पीछे मुंह छिपा रखा था और बिल्ली अपनी आवाज की नकल करने वाले की शकल देखना चाह रही थी, आवाज का केंद्र तलाश रही थी. वह चौकन्नी होकर हौले से करीब आई. इसी दरम्यान बड़े पिताजी ने तंबाकू रगड़ कर मेरी हथेली पर रख दिया.

यह अंतिम वीडियो है जिसमें बड़े पिताजी दिख रहे हैं, शुरुआत में सशरीर, बाद में उठकर आते हुए और मुझे तंबाकू देते हुए. मैं लीन था बिल्ली से संवाद करने की कोशिश में.

संबंधित वीडियो का लिंक ये है : https://www.youtube.com/watch?v=53nqm9hgNL8

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बड़े पिता जी का दो बार पहले भी हार्ट अटैक हो चुका था. तीसरी बार यह अटैक जानलेवा साबित हुआ. उनकी मृत्यु के बाद गांव-घर के लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह अच्छी मौत है, बिना किसी से कुछ सेवा टहल कराए, चलते-फिरते चले गए. थोड़ी ही देर में देखा कि बैंड बाजा मंगा लिया गया. लोहार भाई बांस छील काट कर अंतिम यात्रा के लिए तैयारी करने लगे. गांव के कई बड़े बुजुर्ग उनके इर्दगिर्द खड़े हो गए. हंसी मजाक का दौर चलने लगा.

लोहार ने हंसते हुए कहा कि दो चार इकट्ठे बना दे रहा हूं, कई लोग लाइन में लगे दिख रहे हैं, ये कई बुजुर्ग बस आजकल-आजकल हुए पड़े हैं, जाने कब टपक जाएं. लोहार का इशारा लाठी टेककर खड़े एक बुजुर्ग ठाकुर साहब की तरफ था, जो खुद हंसोड़ शख्स हैं. लोग उनकी तरफ देख ठठा कर हंसने लगे तो उनने जवाब में नहले पर दहला मारा, अभी तो गुरु कइयों को श्मशान पहुंचाउंगा, उसके बाद सोचूंगा.

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बड़े पिता जी की शव यात्रा गाजे बाजे के साथ शुरू हुई और नजदीकी गंगा घाट पर जाकर खत्म हुई. उनके शव को गंगा में विसर्जित किया गया. ऐसी मान्यता है कि किसी संत ने कई गांवों के लोगों को शवों को गंगा में विसर्जित करने को कहा था, तबसे यह परंपरा चली आ रही है. मुझे यह इसलिए ठीक लगता है क्योंकि नेचर का फूड चेन मेनटेन रहता है. हम मछली खाते हैं और जल के जीवों को खाने के लिए हम खुद को पेश कर देते हैं. बड़े पिता जी शाकाहारी थे और दूध उनका सर्वप्रिय सदाबहार आहार थे. वे किसिम किसिम के शाकाहारी खाने के शौकीन थे.

बड़े पिताजी के चले जाने के बाद पूरा गांव उनकी किस्मत की सराहना करने में जुटा रहा, मौत हो तो ऐसी, पूरा जीवन जिया और खटिया पर लेटकर भोगने की जगह हंसते खेलते टहलते चले गए. मैंने महसूस किया कि गांव के लोग शहरियों से ज्यादा प्रैक्टिकल होते हैं, जीवन-मृत्यु को लेकर. वह जीवन को जीवंतता से जीने की समझ तो रखते ही हैं और मौत को एक अनिवार्य साथी मानकर उसके प्रति वेलकम भाव भी रखते हैं. गांववालों के रुख / भाव को देखकर मुझे अच्छा लगा. मैंने गहरे उतरकर काफी कुछ महसूस किया.

मेरा कर्मकांड में भरोसा नहीं है इसलिए शव विसर्जन के बाद अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट आया. गांव और परिवार के लोग तेरह दिन तक मृत्यु संस्कार में लीन रहेंगे, सुबह नहाने से लेकर सिर के बाल उतरवाने और तेरहवें दिन बड़े पैमाने पर सामूहिक भोज करने कराने में लगे रहेंगे. मेरे खयाल से ये सब पैसे की बर्बादी है. लेकिन गांव वाले शायद इन्हीं कर्मकांडों के जरिए खुद की सामूहिकता को जी पाते हैं और दुखों सुखों को एक दूसरे से शेयर कर पाते हैं, जो कि अच्छा ही है.

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कल पूरा दिन जीवन-मौत, शव, शोक, बैंड-बाजा, अंतिम संस्कार, गंगा विसर्जन आदि से भरा रहा. आज देर सुबह सोकर उठा तो पूरा गांव और खेत-खलिहान कोहरे से ढंके मिले, चंद कदम आगे तक का राह नहीं सूझ रहा. इस रहस्यमय मौसम के संदेश को समझने के वास्ते पूरा एक चक्कर लगाया, गांव के बगीचों और खेतों का, मेड़ दर मेड़ और पेड़ दर पेड़. मुझे हर जगह बिझी मिली ओस की बूंदों में बड़े पिताजी दिखाई दे रहे थे, चमकते-खिलखिलाते.

दरअसल जीवन में दुख, ग़म, खुशी, उत्सव, जीवन, मौत… ऐसा कुछ अलग-थलग, मोनोलिथिक-सा नहीं होता… एक प्रक्रिया है जो संचालित होती रहती है और हम सब अपने-अपने मन मिजाज ज्ञान संस्कार चेतना समझदारी सोच के हिसाब से इसे कनसीव कर अलग अलग नाम दे दिया करते हैं..

नहा खा कर दोपहर बाद जब मैं शहर यानि जिला मुख्यालय के फोर जी वाले इलाके में आया तो मोबाइल का नेट आन किया. देखा सिंगिंग से संबंधित एक मोबाइल एप्प के बारे में एक संदेश ह्वाट्सएप में आया हुआ है. इसे डाउनलोड किया, इंस्टाल किया, और आजमाने में जुट गया, आप भी रिजल्ट देखें और कुछ क्षण गुनगुनाएं.. : https://www.youtube.com/watch?v=Tgf_9fIK5nk

ग़मगीन होना श्रद्धांजलि देना नहीं होता, गुनगुनाना असल में सच्ची श्रद्धांजलि होती है, जिसमें हम जीवन के उदात्ततम स्वरूप के लिए प्रकृति के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करने हेतु थोड़ा म्यूजिकल हो जाते हैं… लव यू आल.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह से संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.

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पानी और पर्यावरण के लिए लड़ने वाले संत पुरुष अनुपम मिश्र नहीं रहे

आज सुबह व्हाट्सएप पर सुप्रभात संदेशों के साथ एक दु:खद संदेश यह भी मिला कि जाने-माने पर्यावरणविद् और गांधीवादी अनुपम मिश्र नहीं रहे… जिस देश में चारों तरफ पाखंड और बनावटीपन का बोलबाला हो वहां पर एक   शुद्ध खांटी और खरे अनुपम मिश्र का होना कई मायने रखता है। सोशल मीडिया से ही अधकचरी शिक्षित हो रही युवा पीढ़ी अनुुपम मिश्र को शायद ही जानती होगी। देश में आज-कल ‘फकीरी’ के भी बड़े चर्चे हैं। लाखों का सूट पहनने और दिन में चार बार डिजाइनर ड्रेस पहनने वाले भी ‘फकीर’ कहलाने लगे हैं, मगर असली फकीरी अनुपम मिश्र जैसे असल गांधीवादी ही दिखा सकते हैं। उनका अपना कोई घर तक नहीं था और वे गांधी शांति फाउंडेशन नई दिल्ली के परिसर में ही रहते थे।

आज सुबह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली, उनकी उम्र 68 वर्ष की थी। अनुपम मिश्र पिछले एक साल से कैंसर से पीडि़त थे। अब यह भी सोच और शोध का विषय है कि अनुपम मिश्र जैसे सीधे-सरल व्यक्ति को भी कैंसर जैसी बीमारी आखिर क्यों चपेट में ले लेती है..? अनुपम मिश्र का एक परिचय यह भी है कि उनके पिता स्व. भवानीप्रसाद मिश्र प्रख्यात कवि रहे हैं। मैं गीत बेचता हूं… जैसी कई उनकी कविताएँ मंचों पर काफी लोकप्रिय रही है। अनुपम मिश्र शुद्ध गांधीवादी तो रहे, वहीं पर्यावरण और पानी के लिए उन्होंने अद्भुत काम किए। दस्यु अन्मुलन आंदोलन के अलावा भाषा पर भी उन्होंने बहुत काम किया।

जल संरक्षण पर उनकी लिखी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ तो एक नायाब दस्तावेज है। इस किताब को कितनी भी बार पढ़ लो, मगर मन नहीं भरता। गर्मियों के दिनों में जब पूरा देश पानी की किल्लत महसूस करता है और उस दौरान जब कुएं, बावड़ी और तालाब याद आते हैं तब अनुपम मिश्र की ये किताब सबको याद आती है। इस किताब की लाखों प्रतियाँ बिक गईं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ, मगर इस किताब की भी कोई कमाई अनुपम मिश्र ने नहीं ली और इसका इस्तेमाल करने की अनुमति भी उन्होंने सबको दे दी। ‘हमारा पर्यावरण’ और ‘राजस्थान की रजत बूंदें’ जैसी किताबें भी उनकी खासी चर्चित रही।

‘आज भी खरे हैं तालाब’ जैसी किताब हमारे नीति-नियंताओं के लिए आई ओपनर का काम करती है। देश के प्रमुख तालाबों और उनके निर्माण की प्रक्रिया को अत्यंत सुंदर भाषा शैली में अनुपम मिश्र ने प्रस्तुत किया है। इस किताब में इंदौर के यशवंत सागर और बिलावली तालाब तक का उल्लेख है। जिस वक्त अनुपम मिश्र ने देश में पर्यावरण पर काम शुरू किया तब सरकार में पर्यावरण नाम का कोई विभाग तक नहीं होता था। यह बात अलग है कि पर्यावरण मंत्रालय से लेकर राज्य सरकारों के प्रदूषण नियंत्रण मंडल जैसे विभागों ने भ्रष्टाचार का प्रदूषण ही अधिक फैलाया। बहरहाल, अनुपम मिश्र नहीं रहे यह खबर नि:संदेह मायूस करने वाली है। इस गांधीवादी और पर्यावरणविद और पानी के लिए लडऩे वाले असल ‘फकीर’ को विनम्र शृद्धांजलि!

लेखक राजेश ज्वेल इंदौर के सांध्य दैनिक अग्निबाण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत् और 30 साल से हिन्दी पत्रकारिता में संलग्न एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया पर भी लगातार सक्रिय. संपर्क : 9827020830

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हादसे की तस्वीर लेने गये भास्कर के फोटोग्राफर की सड़क दुर्घटना में मौत

दैनिक भास्कर के फोटोग्राफर आदित्य कुमार सिंह की मौत। भीषण कोहरे में बिहार के हाजीपुर में हुए सड़क हादसे का कवरेज करने जा रहे आदित्य को मुर्गी लदे वाहन ने कुचल दिया। वे हाजीपुर ब्यूरो में कार्यरत थे। फोटो पत्रकार आदित्य कुमार सिंह को मंजन नाम से भी जाना जाता था। उनकी उम्र मात्र 25 साल थी। घटना हाजीपुर में मुजफ्फरपुर जाने वाले वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या­77 पर सदर थाना क्षेत्र में एकारा गुमटी के पास हुई।

मंजन देसरी थाना क्षेत्र के खोकसा गांव के रहने वाले थे। घटना के बाद उनके परिजन और बिहार के पत्रकारों में शोक की लहर फैली है। पुलिस ने हादसे के बाद आदित्य को कुचलने वाले वाहन के चालक को गिरफ्तार कर गाड़ी को जब्त कर लिया है। वहीं, स्थानीय निवासियों ने इस घटना के विरोध में सड़क को जाम कर दिया। उधर, प्रशासन ने मृतक आदित्य के परिजनों को चार लाख रुपये का मुआवजा देने की घोषणा की है।

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हिंदी और भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक विवेकी राय का निधन

वाराणसी : हिंदी और भोजपुरी के प्रसिद्ध लेखक विवेकी राय का आज वाराणसी में निधन हो गया. वे 93 वर्ष के थे. उन्होंने तड़के करीब 4.45 बजे अंतिम सांस ली. सांस लेने में दिक्कत की वजह से वाराणसी के निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. उन्होंने 19 नवंबर को ही अपना 93वां जन्मदिन मनाया था. वह मूल रूप से गाजीपुर के सोनवानी गांव के निवासी थे. 

उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकों की रचना की. वे ललित निबंध और कथा साहित्य के रचयिता थे. उनकी रचनाएं ग्रामीण पृष्ठभूमि का बहुत ही सुंदर चित्रण करती थी. ललित निबंध विधा में इनकी गिनती आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय की परंपरा में की जाती है. ‘मनबोध मास्टर की डायरी’ और ‘फिर बैतलवा डाल पर’ इनके सबसे चर्चित निबंध संकलन हैं और ‘सोनामाटी’ उपन्यास राय का सबसे लोकप्रिय उपन्यास है.

इन्हें 2001 में महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार से और 2006 में यश भारती सम्मान से सम्मानित किया गया था. डॉ. राय ने हिंदी के साथ ही भोजपुरी साहित्य जगत में भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई थी. उन्होंने आंचलिक उपन्यासकार के रूप में ख्याति अर्जित की. उन्होंने 50 से अधिक पुस्तकें लिखी. विवेकी राय को मूलत: ललित निबंध, कथा साहित्य के लिए जाना जाता था.

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Remembering Devendra Upadhyay

Delhi Union of Journalists has expressed its deep shock at the passing away of its  veteran member and senior journalist. writer  Mr. Devendra Upadhyay. He was 70. He died of massive heart attack late last night (13th Nov. 2016 in Private Hospital, New Delhi). 

He was also actively associated with the number of demonstrations and movements of journalists and writers. His passing away is irreparable loss to DUJ and the other organisations he was associated for long time. He was a sitting national council member of the DUJ and leader of the journalist movement for several years.

Shri. Upadhyay belongs to a freedom fighter family. His father late Ragubar Datt Upadhyay was among the leading freedom fighter of Uttar Pradesh/Uttarakhand.

He served many years as National Chief of Bureau of leading Hindi Daily Deshbandhu. Before that he also worked in many other leading Hindi dailies like Janyug and Amrit Prabhat.

Born in Khumad village, District of Almora. Sri Upadhyay was also associated with Uttarakhand Patrakar Parishad as its President for the last many years. DUJ expresses its deepest and heartfelt condolences to the close family members, friends and well wishers.

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वरिष्ठ छायाकार हरजिंदर सिंह और पत्रकार अरविन्द श्रीवास्तव का निधन

लखनऊ : एक दुखद खबर है. वरिष्ठ छायाकार हरजिंदर सिंह का निधन हो गया है. उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट हरजिंदर सिंह के असामयिक निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है. हिन्दी दैनिक ‘आज’ से बीते कई दशकों से संबद्ध रहे हरजिंदर सिंह का हृदयगति रुकने से निधन हो गया है.

राज्य मुख्यालय पर कई दशकों से मान्यता प्राप्त छायाकार रहे हरजिंदर सिंह को श्रद्दांजिल अर्पित करते हुए समिति ने उन्हें लोकप्रिय, मिलनसार व सबके साथ सुख दुख में शरीक रहने वाला बताया है. उत्तर प्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ने हरजिंदर सिंह के निधन को पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए उनके संतप्त परिवार के प्रति संवेदता जतायी है. दिवंगत छायाकर हरजिंदर सिंह का अंतिम संस्कार गुरुवार दोपहर ३.३० बजे भैसाकुंड शवदाह गृह पर होगा.

सगीर ए खाकसार ने सूचना दी है कि भारत-नेपाल सीमा पर स्थित सिद्धार्थनगर ज़िले के बढ़नी बॉर्डर के प्रखर पत्रकार अरविंद श्रीवास्तव का निधन हो गया है. इससे बढ़नी और कृष्णानगर मे शोक की लहर दौड़ गयी है. दैनिक जागरण से जुड़े अरविंद स्थानीय लोगों में काफी लोकप्रिय थे. उनके निधन से नेपाल सीमा पर साफ सुथरी पत्रकारिता की छवि को धक्का लगा है. बहुत ही संक्षिप्त बीमारी में गोरखपुर मेडिकल कालेज में रात एक बजे उन्होंने अंतिम सांस ली.

वो कबीर पंथ से जुड़े थे, इसलिए उनकी चिता को अग्नि नहीं दी गयी. उनके परिवार की इच्छा के अनुसार उनको सुपुर्द ए खाक कर दिया गया. उनकी अंतिम यात्रा में नेपाल और भारत के सीमाई इलाके के लोग भारी तादाद में शामिल हुए. इसमें पत्रकारों के अलावा ब्यापारी, नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे. उनके अंतिम संस्कार में वरिष्ठ पत्रकार राकेश तिवारी, अभय बख्शी, मुस्तन सेरूल्लाह खान, विकास सिंह, विजय श्रीवास्तव, सलमान हिंदी, आज़ाद फ़ैज़ी, इरशाद अहमद, अजय गुप्ता, दिनेश पांडेय, रवि शुक्ला, सरदार हरभजन सिंह, त्रियुगी अग्रहरि, सतीश शर्मा, मोहम्मद इब्राहिम, जमाल अहमद, मुजीबुल्लाह, सगीर ए खाकसार आदि के अलावा शोहरत गढ़ विधान सभा के बसपा प्रत्याशी मोहम्मद जमील सिद्दीकी ने हिस्सा लिया। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे। परिजनों को पहाड़ जैसे इस दुख को सहने की शक्ति दे। अंतिम संस्कार में शामिल सभी लोगों ने ईश्वर से यही प्रार्थना की।

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वरिष्ठ पत्रकार गिरीश निकम दिल्ली में छाए प्रदूषण की बलि चढ़ गए!

Gurdeep Singh Sappal : गिरीश निकम चले गए। मौत ने पिछले साल भी उनके दिल पर दस्तक दी थी। तब भी उनकी धड़कन को पूरी तरह जकड़ कर थाम दिया था। लेकिन न्यूयॉर्क की आपात मेडिकल सुविधाओं ने उसे परास्त कर दिया था। मौत, जो सिगरेट और रम के बुलावे पर आयी थी, धीरे धीरे पीछे हटती गई, वेंटिलेटर पर साँसें वापिस सामान्य होती गयी। गिरीश जी उठे और वापिस स्क्रीन पर छा गए।

लेकिन आज मौत जीत गयी। पिछले महीने ही गिरीश के सारे टेस्ट सही आए थे। वो ख़ुश था। उन्हें नहीं मालूम था कि इस बार बुलावा शायद दिल्ली में छाए प्रदूषण का था और मेडिकल सुविधा दिल्ली के सरकारी अस्पताल की थी, जहाँ वक़्त पर वेंटिलेटर उपलब्ध ही नहीं हो सका। इसलिए इस बार धड़कन जब थमी तो फिर हरकत में नहीं आयी और गिरीश अलविदा कह ही गए। तेरह महीनों के इस अनुभव ने यह तो समझा ही दिया कि ज़िंदगी और मौत सिर्फ़ ऊपर वाले के हाथ नहीं है, बल्कि देश, परिस्थिति और मेडिकल सुविधाओं के भी ग़ुलाम हैं। गिरीश से जब राज्यसभा टीवी का पहला शो ऐंकर करने को कहा गया तो वे ऐंकरिंग की स्थापित परम्परा की एंटीथीसिस थे। लेकिन आज जब वो अंतिम शो कर स्टूडियो की दहलीज़ से जीवन से रूखसत हुए, तो टीवी डिबेट की नयी परिभाषाएँ गढ़ चुके थे।

जब हमने पहला कार्यक्रम डिज़ाइन किया तो चर्चा हुई कि ऐंकर कौन करे।हम लीक से हट कर टीवी डिबेट का प्रयोग करना चाहते थे। सम्पादकीय मीटिंग में मैं, उर्मिलेश, राजेश बादल और अनिल नायर थे। ये विचार बना कि टीवी दर्शक स्टाइल से परे, कुछ गम्भीर परिचर्चा भी देखना चाहते हैं। यह कुछ कुछ यूटोपीयन सा ख्याल ही था। सर्वसम्मति बनी की गिरीश से ऐंकर कराया जाए। वैसे इस सर्वसम्मति से ख़ुद गिरीश भौंचक्के थे। उन्होंने ऐंकरिंग तो दूर, कभी टीवी के लिए रिपोर्टिंग तक नहीं की थी। इसलिए पहले तो तैयार नहीं हुए। पर जब उन्हें हर तरह की मदद का भरोसा दिया गया, ट्रेनिंग का वादा दिया गया, आश्वस्त किया गया तो आख़िरकार राज़ी हुए।

यह हमारा पहला प्रयोग था। शुरुआती लड़खड़ाहट के बाद गिरीश ने जो रफ़्तार पकड़ी, जो स्टाइल विकसित हुआ, वही अब राज्य सभा टीवी की पहचान बन गया है। शालीन स्वर में, बिना उत्तेजना के तीखे सवाल पूछने की कला और सभी पक्षों को अपने विचार रखने की मोहलत गिरीश के कार्यक्रम की और चैनल की विशिष्टता बन गए । हमने तय किया था कि राज्यसभा टीवी देखने वाले सभी दर्शकों को हर डिबेट में कुछ नयी जानकारी मिले और वे सभी पक्षों के तर्क से अवगत हों, उसमें हम शायद सफल हुए हैं। इसमें गिरीश का बहुत बड़ा योगदान है। इसीलिए हर राजनीतिक विचारधारा में उसके बहुत से घनिष्ट मित्र बने। प्रबुद्ध दर्शकों का एक बहुत बड़ा वर्ग और ख़ासतौर पर कॉम्पटिशन परीक्षा देने वाले छात्र गिरीश के नियमित दर्शक थे और आज के बाद वे उन्हें निश्चित ही मिस करेंगे।

गिरीश एक स्वाभिमानी, ज़िंदादिल आदमी थे। साफ़ स्पष्ट, तार्किक सोच। नास्तिक थे। कोई लाग लपेट नहीं। दिल और ज़ुबान के बीच कोई फ़ासला नहीं था। अपनी ही टेक के मालिक थे। लेकिन सुलझे हुए और अनुभवी पत्रकार थे। शुरू में उन्हें हम सब से सामंजस्य बैठाने में कुछ दिक़्क़त आयी, पर जब उन्हें आश्वस्त किया गया कि हमारी परिकल्पना ऐसे चैनल की है जहाँ हर व्यक्ति अपने स्वभाव के साथ रह सके, हर पत्रकार की अपनी व्यक्तिगत स्पेस हो और केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों पर फ़ोकस रहे, तो वो ढलते गए और फिर तो इस चैनल की संस्कृति गढ़ने में अग्रणी ही रहे।

राज्यसभा टीवी के सबसे उम्रदराज़ पत्रकार थे, लेकिन सबसे युवा पत्रकारों की दोस्ती कमोवेश उनसे ही पहले होती थी। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि किसी जूनियर सहयोगी को कोई समस्या हुई तो सबसे पहले गिरीश से ही साझा की। वह अपने से बहुत कम उम्र के इन पत्रकारों का दोस्त तो थे ही, ख़ुद को उनका शिक्षक भी मानते थे। उनको गढ़ने की, निखारने की लत सी थी उन्हें। इसी में सुकून भी पाते थे और गर्व भी करते थे।

जो व्यक्ति उम्र के दायरे को नकार कर जिया, आज वो उम्र के दायरे से ही बाहर हो गया है। उसकी कमी खलेगी। जीवन क्षणभंगुर है, ये पढ़ा तो बहुत है, महसूस आज हुआ, पूरी शिद्दत के साथ हुआ। अलविदा गिरीश! राज्यसभा टीवी के सभी साथी तुम्हारी कमी हमेशा महसूस करेंगे।

राज्यसभा टीवी के एडिटर इन चीफ और सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

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