हमारी-आपकी चुप्पियों के बीच एक वरिष्ठ पत्रकार का यूं अचानक चले जाना (देखें वीडियो)

वरिष्ठ पत्रकार पुनीत कुमार पचास की उमर में चल बसे… वो सहारा समय में नेशनल हेड रह चुके हैं. काफी समये से वो फ्री लांस जर्नलिज्म कर रहे थे. आईआईएमसी से पासआउट और कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे पुनीत की मृत्यु कुछ दिन पहले हुई लेकिन चर्चा बस पुनीत की एफबी वॉल तक सीमित है. भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत ने पुनीत को यूं याद कर दी श्रद्धांजलि…  देखें वीडियो…

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राजेश शर्मा के निधन से भड़ास ने एक सच्चा शुभचिंतक खो दिया

राजेश शर्मा चले गए. दिवाली की रात. हार्ट अटैक के कारण. उमर बस 44-45 के आसपास रही होगी. वे इंडिया न्यूज यूपी यूके रीजनल चैनल के सीईओ थे. राजेश भाई से मेरी जान पहचान करीब आठ साल पुरानी है. वो अक्सर फोन पर बातचीत में कहा करते- ”यशवंत भाई, तुम जो काम कर रहे हो न, ये तुम्हारे अलावा कोई दूसरा नहीं कर सकता. मैंने मीडिया इंडस्ट्री को बहुत करीब से देखा है. यहां सब मुखौटे लगाए लोग हैं. भड़ास के जरिए तुमने आजकल की पत्रकारिता को आइना दिखाया है.”

राजेश प्रैक्टिकल आदमी थे. वह मीडिया और बाजार के रिश्तों को अच्छे से समझते थे. वह कहते भी थे- ”यार, हम लोगों को टारगेट पूरा करना होता है, रिजल्ट देना होता है. तब जाकर सेलरी मिलती है.”

मेरी पिछली बातचीत राजेश शर्मा से तब हुई जब इंडिया न्यूज के मालिक कार्तिक शर्मा ने भड़ास पर मुकदमा किया था. बहुत सारी बातें हुई थी फोन पर. राजेश ने कहा था कि यार यशवंत, बहुत दिन हुआ, बैठते हैं अपन एक दिन.

काफी पहले की बात है. राजेश तब इंडिया न्यूज में नहीं थे. नौकरी तलाश रहे थे. उनके रिक्वेस्ट पर एक बार मैं तबके अपने मित्र रहे समाचार प्लस वाले उमेश शर्मा के पास ले गया. वहां से मिलकर हम दोनों बाहर निकले. राजेश के कार में ज्यों ही बैठा, त्यों कुछ लोगों ने मेरा नाम पूछा और मुझे बाहर निकाल कर टांग लिया. वे लोग खुद को पुलिस वाले बता रहे थे. राजेश बेहद डर गए, इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से. बाद में उन्होंने बताया था- ”यशवंत, मैं यार इतना डर गया था कि गाड़ी फुल स्पीड में भगाते हुए सीधे अपने घर जाकर ही रुका.” यह राजेश की साफगोई थी, उनकी सहजता थी जो इस बात को भी सीधे-सीधे कह दिया.

बता दें कि नोएडा पुलिस की एसटीएफ द्वारा की गई उस गिरफ्तारी के बाद मुझे दो दिन नोएडा के कई थानों के हवालातों में रखा गया. फिर डासना जेल भेज दिया गया जहां 68 दिन रहने के बाद छूटा. इस जेल जीवन पर ‘जानेमन जेल’ नामक किताब लिखी. यह गिरफ्तारी इंडिया टीवी, दैनिक जागरण समेत कई चैनलों-अखबारों के मालिकों-मैनेजरों-संपादकों की एक बड़ी साजिश के तहत हुई थी. तात्कालिक कारण बना विनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी जोशी से मेरा पुराना झगड़ा. इन दोनों के कंधें पर बंदूक रहकर ढेर सारे मीडिया हाउसेज ने पूरी योजना बनाई कि अबकी यशवंत और भड़ास को नेस्तनाबूत कर देना है. इस साजिश में मीडिया मालिकों ने यूपी की तत्कालीन नई-नई आई अखिलेश सरकार के बड़े अफसरों और मुलायम घराने के कुछ बड़े नेताओं को भी शामिल कर लिया था, गलत तथ्य और गलत जानकारियां देकर.

खैर, बात हम लोग कर रहे थे राजेश शर्मा की.

भड़ास पर जब जब आर्थिक मदद के लिए अपील की गई, राजेश भाई ने हर बार चुपचाप पांच हजार या दस हजार रुपये भड़ास के एकाउंट में डालने के बाद फोन पर कहते- ”यशवंत यार इस मदद के बारे में किसी से न जिक्र करना और न कुछ लिखना.”

राजेश प्रबंधन के हिस्से हुआ करते थे, इसलिए जानते थे कि भड़ास से खुलेआम संबंध शो करना करियर के लिए अच्छा नहीं. वो इसका जिक्र फोन पर मजाक में किया करते थे और चुटकी लेते हुए कहते थे- ”भड़ास से दोस्ती और दुश्मनी दोनों करियर के लिए बुरी है…” यह कहते हुए वह ठठा कर हंसते थे…

जिंदादिल राजेश से एक दफे लखनऊ के एक होटल में मुलाकात हो गई, अचानक. राजेश अपने आफिसियल टूर पर लखनऊ गए थे और होटल में रुके हुए थे. मैं एक प्रोग्राम में शिरकत करने होटल में गया हुआ था. हम दोनों होटल के रेस्टोरेंट में अचानक टकरा गए. निगाह मिलते ही राजेश भाई एकदम से खड़े हुए और दोनों हाथ फैलाकर मुस्कराते हुए आगे बढ़े, मैं भी उनकी ओर मुखातिब हुआ. उन्होंने गले लगाया और पीठ थपथपाते हुए कई बार कहा- ”मेरे भाई, मेरे भाई… जमाने बाद मिले हम लोग.” फिर देर तक बात हुई, हंसी-मजाक चला.


मूल खबर :


राजेश को लेकर बहुत सारी बातें हैं, यादें हैं. क्या-क्या कहा जाए. एक इतने जीवंत, सहज, सरल, जिंदादिल और भावुक आदमी का इतना जल्द चले जाना किसी को भी हजम नहीं हो रहा. पर मौत एक कड़वी सच्चाई है जिसे मन मसोस कर कुबूल करना पड़ता है, हजम करना पड़ता है. राजेश का शरीर भले ही आग के हवाले होकर राख में तब्दील हो चुका है लेकिन उनकी यादें हम जैसों के दिलों में हमेशा बनी रहेंगी, जीवंत रहेंगी…

राजेश मेरे अच्छे शुभचिंतकों में से थे लेकिन हम दोनों फेसबुक पर फ्रेंड नहीं थे. राजेश रिश्तों की शो-बाजी पसंद नहीं करते थे. और, शायद भड़ास वाला यशवंत होने के कारण मेरे साथ रिलेशन को पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि यह उनके करियर की भी मजबूरी थी. राजेश के मन-दिल को मैं समझता था इसलिए उनकी भावनाओं, उनकी मजबूरियों को भी महसूस करता था. सो, हम लोग फेसबुक पर भले फ्रेंड न रहे हों, लेकिन दिल के स्तर पर बेहद करीबी नाता था…

दोस्त, जिस भी दुनिया में गए हो, ऐसे ही हंसते मुस्कराते इठलाते जीना.. तुम्हारे जाने से मीडिया की दुनिया एक शानदार शख्सियत से महरूम हो गई है… खासकर मैंने अपना एक सच्चा शुभचिंतक / साथी खो दिया है जो हमेशा पूछा करता था- ”यशवंत, कोई दिक्कत हो तो बताना…” ये पूछना ही मेरे लिए काफी था क्योंकि आजकल की मायावी दुनिया में कौन किसकी चिंता करता है…

राजेश भाई, आप कहा करते थे, साथ क्या जाएगा, सब यहीं रह जाएगा, इसलिए किसके खातिर बेइमानी करना. आपके भीतर एक उदात्त किस्म का इंसान था जो सब कुछ, हर ओर-छोर महसूस करता था और सबकी सीमाओं-दायरों को समझा करता था. राजेश अपनी व्यस्त लाइफ, आफिसियल टूर आदि को लेकर कई बार चिंतित होते थे. कहते- यार सांस लेने की फुर्सत नहीं मिलती. एक जगह से टूर निपटा कर लौटे तो दूसरा टूर तैयार रहता है.

राजेश भाई, आपने देख लिया न करियर की आपाधापी का नतीजा. इस तनाव और भागदौड़ से निजात पाने के लिए एल्कोहल का सहारा लेते हैं. योगा कसरत के लिए समय निकाल नहीं पाते. नतीजा, शरीर और नसें दिन प्रतिदिन शिथिल होती जातीं. कई किस्म के लेयर्स नसों के भीतर चढ़ते भरते चले जाते हैं… एक दिन नतीजा आता है हार्ट अटैक के रूप में… उम्मीद करते हैं आपके असमय चले जाने से मीडिया के कुछ ऐसे साथी सबक लेंगे जो आपकी ही तरह की व्यस्ततम लाइफस्टाइल जीते हैं. मुझे याद आता है राजेश भाई आपके घर पर घंटों बैठकर बतियाना. तब मैं दिल्ली के बाबा नीम करोली आश्रम गया था और बगल में ही छतरपुर में आपका घर था. मैंने फोन लगाया और आपने फौरन घर पर बुला लिया. वह केयर, प्यार और सम्मान सब याद आ रहा.

लव यू राजेश भाई, सैल्यूट यू राजेश भाई…

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के संस्थापक और संपादक हैं. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

भड़ास पर राजेश शर्मा को लेकर छपी पिछली खबर ये है…

इस खबर में राजेश शर्मा की तस्वीर है, दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ…

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इंडिया न्यूज यूपी-यूके रीजनल चैनल के सीईओ राजेश शर्मा का हार्ट अटैक से निधन

दीपक चौरसिया और रवि शर्मा के साथ सबसे बाएं राजेश शर्मा

एक दुखद खबर आ रही है दिल्ली से. इंडिया न्यूज समूह के रीजनल न्यूज चैनल इंडिया न्यूज यूपी यूके के सीईओ राजेश शर्मा का ऐन दिवाली की रात हार्ट अटैक से निधन हो गया. उनकी उम्र 45 वर्ष के आसपास रही होगी. जिंदादिल स्वभाव वाले राजेश बेहद मेहनती और निष्ठावान शख्सियत थे. यही कारण है कि इंडिया न्यूज में एंट्री के बाद उन्होंने लगातार तरक्की की.

इंडिया न्यूज से पहले राजेश कई बड़े चैनलों में काम किए थे. आज दोपहर उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में कर दिया गया. दिल्ली के मूल निवासी राजेश के परिवार में अब उनकी पत्नी और इकलौती पुत्री हैं. राजेश शर्मा के निधन पर इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत ने अपनी फेसबुक वॉल पर एक तस्वीर शेयर करके ये लिखा है :

Rana Yashwant : बहुत याद आओगे : कोई मौक़ा चूकते हुए नहीं देखा तुमको. ज़िंदगी के हर पल में कुछ ना कुछ ज़िंदगी-सा होते रहना चाहिए – तुम्हारा सलूक ज़िंदगी के साथ ऐसा ही रहा. अचानक आ जाना, अपनापन जताना और फिर अचानक निकल जाना.

कल दिन में साथ थे तुम और कल ही अचानक हमेशा के लिए निकल भी गए. ऐसे कई मौक़े उम्र भर याद रहेंगे जब तुम्हारे साथ होने से ही मन/माहौल बदल गए. पिछले महीने मेरे जन्मदिन पर पास आकर जिस गर्मजोशी से तुम मिले, वही तुम हो और हमेशा रहोगे. ज़िंदगी को तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत रहेगी और मौत हमेशा शर्मिंदा रहेगी.

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निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह को जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया था!

इसी साल मार्च महीने में न्यूज24 के एसोसिएट प्रोड्यूसर कामता सिंह की रहस्यमय हालात में मौत हो गई थी. जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई है उसमें बताया गया है कि उन्हें जहर देकर और गला घोंटकर मारा गया. कामता चैनल से ड्यूटी करके रात 12 बजे सोने चले गए थे. साथ में पत्नी भी सो रही थीं. सुबह छह बजे वे नहीं उठे और न हलचल कर रहे थे. तब पत्नी उन्हें अस्पताल ले गईं. वहां डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. फिलहाल बिसरा रिपोर्ट का आना अभी बाकी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट की खबर हिंदुस्तान अखबार में छपी है, जो इस प्रकार है…

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वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिताजी लालता प्रसाद सिंह का निधन

स्वर्गीय लालता प्रसाद सिंह

अमर उजाला, इंडिया टुडे, चौथी दुनिया समेत कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह के पिता जी लालता प्रसाद सिंह का मास्को में निधन हो गया. वे 92 वर्ष के थे. उनका काफी समय से इलाज चल रहा था और हर बार वह स्वस्थ होकर घर लौट आते थे. इस बार वह अस्वस्थ हुए तो अस्पताल से वापस नहीं लौट पाए. वह अपने पीछे दो पुत्र और एक पुत्री समेत नाती-पोतों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं. इन दिनों वह मास्को में अपने छोटे बेटे के यहां रह रहे थे.

शीतल पी. सिंह पिता जी की मृत्यु की खबर सुनते ही मास्को के लिए रवाना हो गए. कल पार्थिव शरीर के साथ वह लोग भारत आएंगे और संभव: परसों अपने गृह जिले सुल्तानपुर पहुंचेंगे. पिता लालता प्रसाद सिंह बेहद उदात्त चेतना के शख्स थे. वे हल्थ सर्विसेज में कार्यरत रहे. रिटायरमेंट के बाद वह सुल्तानपुर जिले के कादीपुर तहसील स्थित अपने गांव सराय कल्यान के निवास करते रहे. साथ ही साथ दिल्ली से लेकर मास्को तक अपने पुत्रों के यहां आते-जाते रहे. उनके निधन पर उनके पुत्र शीतल पी. सिंह और उनको जानने-चाहने वाले पत्रकार असरार खान ने फेसबुक पर जो लिखा वह इस प्रकार है–

Sheetal P Singh : पिता बहुत अस्वस्थ थे। कल शाम (22 सितंबर) उनकी आख़िरी शाम थी! बहुत जुझारू रहे। चार दशक मधुमेह के साथ निकाल गये। कई अस्पतालों को छकाया। छोटे भाई के यहाँ मास्को में थे बीते तीन महीने से। वापसी के दिन ब्रेन स्ट्रोक हुआ। मैं भी पता लगते ही आया। पिछले महीने मिलकर गया ही था।

Asrar Khan : प्रिय साथी शीतल सिंह और अभिन्न मित्र बीपी सिंह के पिता परम आदरणीय श्री लालता प्रसाद सिंह जी अब इस दुनिया में नहीं रहे… इस दुःखद समाचार को सहने की ताकत तो मुझमें नहीं है क्योंकि मेरे भी पिता की तरह थे और विचारों से इतना प्रगतिशील और आधुनिक थे कि सहज ही हम उन्हें मित्र और कामरेड भी समझते थे…. सच तो यह है कि एक साधारण व्यक्ति के रूप में वे एक महात्मा थे जो किसी भी महत्वाकांक्षा से परे विशाल ह्रदय वाले मानवता नैतिकता और उच्च आदर्शों एवं व्यवहार के प्रेरणाश्रोत थे… उनकी कमी कभी पूरी नहीं होगी… इन्हीं शब्दों के साथ मैं अतुलनीय व्यक्तित्व के धनी प्रिय पिता जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं…

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लखनऊ के फोटो जर्नलिस्ट संजय त्रिपाठी का निधन

लखनऊ के वरिष्ठ छायाकार संजय त्रिपाठी का आज भोर में दिल का दौरा पड़ने से असामयिक निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार आज दिन में दो बजे बैकुंठ धाम में किया गया. संजय के पुत्र शुभम 4PM अखबार में छायाकार हैं. 4पीएम के संपादक संजय शर्मा ने वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट संजय त्रिपाठी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया. उन्होंने बताया कि संजय जी बहुत अच्छे छायाकार थे. परमपिता परमेश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवार को दुख सहने की क्षमता दे.

संजय त्रिपाठी के साथ काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि संजय ज़िन्दादिल इंसान थे और अपने काम में माहिर, मस्त-मौला। उनके पिताजी विधायक थे पर खुद राजनीति से दूर रहे और राजनीति करने वालों से बेहद चिढ़ते थे। मनमर्जी के मालिक थे। कहते थे ज़िम्मेदारियाँ पूरी हो गईं, अब जिंदगी का आनंद लेना है। पर वो बैठने वाले इंसान नहीं थे। काम हो या न हो, कैमरा लेकर निकल पड़ते थे। अच्छी फोटो हाथ लगते ही क्लिक कर देते और फेसबुक पर अपलोड करते। गाँव जाकर कुछ काम धंधा करना चाहते थे। राष्ट्रीय सहारा छोड़ने के बाद कुछ मायूस से रहने लगे थे। जनवरी में वो जनसत्तान्यूज़.कॉम से जुड़े और इसे नयी बुलंदी प्रदान की।

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Legendary journalist, author and novelist Arun Sadhu passes away

We are very sad to inform you that a legendary journalist, author and novelist Arun Sadhu passed away on Monday morning due to illness at a city hospital. He was 76. Known for his expansive work in journalism, commentary on current affairs and politics, Sadhu has authored award winning political novel like Simhasan which was later made into a film that is still relevant and treated as a cult classic. His social novel Mukhavata, and his first novel Mumbai Dinank are considered top class.

He won several accolades such as Sahitya Akademy Award for his literary works. He was elected president of All India Marathi Sahitya Sammelan in 2007. A guiding star to several journalists and students of journalism, Sadhu also worked as head of the mass communications department of Pune University for six years. Earlier, he worked with several national dailies including Indian Express. He wrote in Marathi, Hindi and English.

He studied and essayed the rise of Shiv Sena, wrote on the Vietnam war and the Chinese revolution. Sadhu practiced what he preached.  He had wished his body be donated for medical research. So there will be no funeral. The Mumbai Press Club is deeply saddened, and pays late Sadhu rich tributes. We condole his death and share grief with his family, friends and well-wishers. A condolence meeting will be held very soon at the Club. We will keep you informed.

Dharmendra Jore
Secretary, Mumbai Press Club

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लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह का निधन

Sad news. journalist Arvind Narayan Singh, who had been associated with Nav Bharat Times, Rashtriya Sahara and Hindustan, died at his Indira Nagar, Lucknow residence on Sept. 7, Thursday. RIP

Devesh Singh : वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह हमारे बीच नहीं रहे। आज हम सब के बीच वरिष्ठ पत्रकार अरविंद नारायण सिंह नहीं रहे। प्रातः तकरीबन सवा चार बजे उन्होंने अन्तिम सांस ली। लंबे समय से वह हिपेटाइटिस से जूझ रहे थे। अन्तोगत्वा आज मौत के आगे जिंदगी ने घुटने टेक दिये। यूं तो मीडिया जगत में उनकी लोकप्रियता किसी से छिपी नहीं है। हिन्दुस्तान अखबार से अलग होने के बाद वह कुछ बुझे-बुझे से रहने लगे थे। कभी उन्होंने अपने दर्द को बयां नहीं किया।

मीडिया में चंद लोग ही होंगे जिन्हें उनकी बीमारी के बारे में मालूम होगा। इधर काफी समय से उन्होंने गुमनामी की चादर ओढ़ दीनदुनिया से अपने को अलग कर लिया था। आज भी मेरी शादी में नाचते हुए उनका मुस्कराता चेहरा मुझे याद आ रहा है। हिन्दी भाषा पर उनकी गजब की पकड़ थी। पान खाने के वह बेहद शौकीन थे। अरविंद जी कम बोलेते थे। काफी नपी-तुली भाषा का इस्तेमाल करना उनकी आदत में शुमार था।

उन्होंने अपने को हमेशा तड़क भड़क जीवन शैली से अलहदा रखा। सादा जीवन के वह अनुयायी थे। आज जब वह हम सब के बीच नहीं है उनकी हर बात याद आती है। मेरा दुर्भाग्य रहा जो मुझे उनके साथ काम करने का मौका नहीं मिला। फिर भी मैं उनके काफी करीब था। अरविंद जी की एक बेटी है जिसकी मेडिकल की पढ़ाई पूरी हो चुकी है। दुख की इस घड़ी में ईश्वर उनके परिवार को सहन शाक्ति दे। अंतिम या़त्रा आज शाम चार बजे उनके निवास स्थान 15-सी नील बिहार कालोनी सेक्टर-14, इन्दिरानगर से भैंसाकुंड के लिए निकली। इस दौरान काफी संख्या में उनके जानने वाले मौजूद रहे।

लखनऊ के युवा पत्रकार देवेश सिंह की एफबी वॉल से.

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मौत का दर्शन सुनाते इस आईएएस अफसर ने दे ही दी अपनी जान (देखें वीडियो)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं. Continue reading

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मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे!

Asad Zaidi : मनोज पटेल का अचानक चले जाना अच्छा नहीं लग रहा है। हिन्दी में दुनिया भर की समकालीन कविता के अनुवाद की जो रिवायत अभी बन रही है, वह उसके बनाने वालों में एक थे। वह कविता के अत्यंत ज़हीन पाठक थे, नफ़ीस समझ रखते थे, और उनकी पसन्द का दायरा व्यापक था।

कल से कई बार ख़याल अाया कि उनके ब्लॉग ‘पढ़ते-पढ़ते‘ (http://padhte-padhte.blogspot.in/) का, जिसने अपनी तरह से लोगों को प्रभावित और शिक्षित किया, अब क्या होगा। उनके दोस्तों से अपील है कि ब्लॉग की सारी सामग्री को व्यवस्थित रूप से डाउनलोड करके सुरक्षित कर लें। 30 मार्च 2012 को उन्होंने महमूद दरवीश की एक कविता का अनुवाद अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया था, जिसमें ये पंक्तियाँ थीं :

मौत को भी अचानक होता है प्यार, मेरी तरह
और मेरी तरह मौत को भी पसंद नहीं इंतज़ार

मनोज भी दरवीश ही की तरह कैंसर में गिरफ़्तार होकर चल बसे। अलविदा!

साहित्यकार और पत्रकार असद जैदी की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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बेहतरीन अनुवादक और ब्लागर मनोज पटेल नहीं रहे

Amitaabh Srivastava : बेहतरीन अनुवादक, ब्लॉगर, फेसबुक मित्र मनोज पटेल का यूँ अचानक चले जाना! क्या कहें सिवाय इसके कि जीवन बहुत अनिश्चित है, समय बहुत क्रूर. पुस्तक मेले की मुलाकात याद आयी और मन भर आया. हम जैसों के लिए तो उनके अनुवाद एक नयी दुनिया की खिड़कियों का काम करते थे. उनका ब्लॉग पढ़ते-पढ़ते पढ़कर ही कई नामों से परिचय हुआ था. बहुत अफ़सोस है मन में, बड़ा मनहूस दिन रहा आज. विनम्र श्रद्धांजलि

Gopal Rathi : दुखभरी खबर… हमारे फेसबुक मित्र द्वय शायर अमर नदीम साहब और दुनिया भर की कविताओं को हिंदी में अनुवादित करने वाले युवा कवि मनोज पटेल के दुखद निधन की खबर अभी अभी फेसबुक के माध्यम से मिली l अपने अपने क्षेत्र की इन सिद्धहस्त हस्तियों का फेसबुक पर हमारा मित्र होना हमारा सौभाग्य रहा l उनसे कभी नही मिला लेकिन उनके जाने पर दुख और वियोग की अनुभूति हो रही है l दोनों मित्रों को लाल सलाम l

Anil Janvijay : दुनिया भर के कवियों की कविताओं को हिन्दी में लाने वाले युवा कवि मनोज पटेल नहीं रहे। बेहद दुख हो रहा है। दिल रो रहा है।

Mridula Shukla : असमय चले जाना एक विलक्षण मनुष्य का, आत्मीय मित्र का शुभकामना लेने की हालत में नहीं हूँ मित्रों। विदा मनोज पटेल।

Arun Dev : मनोज पटेल ने वेब पर साहित्य को अपने परिश्रम और सुरुचि से समृद्ध किया है. वह इस तरह कैसे जा सकते हैं. उन्हें तो अभी बहुत कुछ करना था. समालोचन की तरफ से विनम्र श्रद्धासुमन.

Hemant Krishna : अपने अनुज मनोज पटेल नहीं रहे। ऐसा लग रहा है जैसे सब कुछ थम गया हो। आंखें अश्रुपूरित हो गई हैं। अपूरणीय क्षति। भगवान उनकी आत्मा को शांति और परिवार को सहन शक्ति प्रदान करे।

Pallavi Trivedi : जिस ब्लॉग को पढ़कर विश्व कविता से पहचान कायम हुई और साथ ही Manoj Patel से भी। यूं उनका अचानक चले जाना स्तब्ध कर गया। अब तक यकीन न हो रहा कि मनोज पटेल अब नहीं हैं। उनके ब्लॉग के रूप में वे हमेशा रहेंगे। हम जब भी ब्लॉग पर जाएंगे,वे वहीं मिलेंगे। विदा दोस्त … बहुत याद आओगे।

Ghanshyam Bharti : साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र और जिले की माटी के लाल मनोज पटेल का चुपके से जाना वास्तव में आत्मिक रूप से झकझोर देने वाली एक बड़ी घटना है। ऐसे में उस्ताद शायर मरहूम इरफान जलालपुरी की यह पंक्तियां बरबस ही याद आ रही हैं — “ओढ़कर मिट्टी की चादर बेनिशां हो जाएंगे, एक दिन आएगा हम भी दास्तां हो जाएंगे”

Hafeez kidwai : कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ…न मिलते है, न साथ चाय पीते हैं, न लड़ते हैं, न बहस होती है यहाँ तक बात भी तो नही होती है।फिर जब वह चले जाते हैं तो ज़िन्दगी में खालीपन सा क्यों आ जाता है। ऐसा कैसे लगता है की दिल के अंदर कोई फाँस सी लग गई हो। फेसबुक पर ऊपर नीचे ऊँगली चलाते कितने दोस्त पन्नों की तरह पलटते जाते हैं। कितनों के नाम तो कितनों की तस्वीर तो कितनों के अल्फ़ाज़ ज़बरदस्ती दिमाग में पालथी मारकर बैठ जाते हैं। जब यह उठकर जाने लगते हैं तो इनकी होशियारी तो देखिये, पूरा दिल ओ दिमाग साथ ले जाने लगते हैं। जाते जाते सूखी आँखों को लबालब भरे तालाब में बदल यह पलट कर भी नही देखते। मनोज पटेल चुपके से चले गए। सच कहें जो उनके अल्फाज़ो की चादर ओढ़ रात में सोया था, लगा कोई एक झटके में छीन ले गया। यह भी कितना अजीब है की बिला ज़रूरत वह चादर खुद बखुद उढ़ गई और खुद बखुद उड़ भी गई। मगर जब यह चादर हटी तो लगा की बचा ही क्या है अब हमारे पास। अजब दर्द के मारे हम, पता नही कहाँ से मनोज पटेल के अल्फ़ाज़ टकरा गए और हमारे इर्द गिर्द फैल गए, क्या पता की रात की एक करवट से यह लफ़्ज़ टूट जाएँगे और इनके टूटने की आवाज़ भी न सुनाई देगी। आज मनोज ने दिल को ऐसा झटका दिया है कि मेरे पास आने वाले अल्फ़ाज़ मुँह बाए खड़े हैं और कह रहें हैं कि अगर तुम ज़िंदा रहो तो चौखट पर आएं वरना कहो तो यहीं से अलविदा। पता नहीं, मैं कुछ कह नहीं सकता, जब तक मैं मनोज को अलविदा बोलकर आता हूँ तब तक मेरा इंतज़ार करना.

सौजन्य : फेसबुक

मनोज पटेल के नीचे दिए गए ब्लाग पर जाकर आप उनकी अनूदित रचनाओं को पढ़-जान सकते हैं :

‘पढ़ते-पढ़ते’ ब्लाग : मनोज पटेल

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टीवी पत्रकार शिवेंद्र प्रताप सिंह के पिताजी का बनारस में निधन

बनारस से मिली जानकारी के मुताबिक टीवी पत्रकार शिवेंद्र प्रताप सिंह के पिताजी राजेंद्र प्रताप सिंह का निधन हो गया है. वे 62 साल के थे और बनारस के शिवपुर के निवासी थे. पिछले 4 महीने से राजेंद्र प्रताप सिंह की तबियत खराब चल रही थी. उन्हें ब्रेन ट्यूमर हुआ था जिसका इलाज चल रहा था. 20 जुलाई को उन्होंने अंतिम सांस ली. बनारस के मणिकर्णिका घाट पर परिजनों और शुभचिंतकों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार हुआ.

पत्रकार शिवेंद्र अपने मां-पिता के अकेले हैं. उनके पिता जी कई कंपनियों में नौकरी करने के बाद रिटायर हो गए थे और अब गांव व बनारस में रहते थे. इकलौते पुत्र शिवेंद्र इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज, न्यूज24, लाइव इंडिया आदि चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. वे हिंदुस्तान अखबार के बनारस संस्करण के भी हिस्से रहे हैं. पिता के न रहने पर अब घर-परिवार की सारी जिम्मेदारी शिवेंद्र के कंधों पर आ गई है.

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नवगछिया के वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार झा उर्फ सुनील झा नहीं रहे

शुक्रवार को चार बजे सुबह पटना के आईजीआईएमएस में ली अंतिम सांस… बिहार के भागलपुर जिले के बिहपुर के दयालपुर ग्राम के निवासी सुनील कुमार झा का शुक्रवार को पटना के आईजीआईएमएस में इलाज के दौरान निधन हो गया. वे कैंसर से पीड़ित थे. कुछ दिनों पूर्व जब उन्हें परेशानी हुई तो उन्हें इलाज के लिए भागलपुर के जेएलएनएमसीएच में भर्ती कराया गया था. उन्होंने अन्न जल लेना पूरी तरह से बंद कर दिया था.

भागलपुर में सुधार नहीं होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान रेफर किया गया. लेकिन यहां भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ. शुक्रवार को सुबह चार बजे उन्होंने अंतिम सांस ली. उनके पार्थिव शरीर को दोपहर बाद तक उनके पैतृक आवास पर लाया गया. शनिवार को उनका दाह संस्कार किया गया. सुनील कुमार झा उर्फ सुनील दा करीब 25 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय थे. उन्होंने पटना व भागलपुर से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान, नई बात और दैनिक भास्कर में बिहपुर से कार्य किया. वे बिहपुर के पहले पत्रकार थे.

वे नवगछिया व्यवहार न्यायालय में अधिवक्ता भी थे. उनके निधन पर बड़े भाई विनोद कुमार, दिलीप कुमार झा, गोपी कृष्ण झा, मां गायत्री देवी गहरे सदमे में हैं. सुनील झा बेबाक और स्पष्टवादी पत्रकार के रूप में पूरे नवगछिया अनुमंडल में जाने जाते थे. वे प्रखर वक्ता भी थे. किसी मंच से उनका संबोधन श्रोताओं को ताली बजाने को मजबूर कर देता था. सुनील झा का स्कूली जीवन तुलसीपुर हाई स्कूल में बीता. वे यहां छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे. फिर उन्होंने अंग्रेजी भाषा से एमए किया और एलएलबी भी किया. सुनील झा के निधन पर नवगछिया अनुमंडल के पत्रकार शोक संतप्त हैं. पत्रकारों ने उनके निधन पर शोक प्रकट किया है.

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वेद उनियाल यानि एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत…

Yogesh Bhatt : एक ‘संघर्ष’ का ‘संघर्षमय’ अंत. आज की पीढ़ी में बहुत कम लोग होंगे जो वेद भाई (वेद उनियाल) के नाम से परिचित होंगे। वेद भाई संघर्ष का वो नाम है , जो जिया भी संघर्ष में और विदा भी संघर्ष करते करते हुआ। वेद उनियाल उत्तराखंड राज्य आंदोलन का वो नाम है, जिसने इस आंदोलन को उम्र भर जिया। न कोई कारोबार, न कोई सियासत, न कोई रोजगार, सिर्फ और सिर्फ संघर्ष। राज्य आंदोलन के दौर में वह सिर्फ प्रथम पंक्ति के योद्धा ही नहीं, बल्कि चिंतक, विचारक और प्रमुख रणनीतिकार भी रहे। अस्सी-नब्बे के दशक के दौरान जनांदोलनों, जन सरोकारों से जुड़े लोग बखूबी वेद उनियाल से वाकिफ हैं।

वेद उनियाल मूलत: हार्डकोर वामपंथी थे ,नक्सली धारा के छात्र नेता भी रहे। देहरादून डीएवी कालेज के छात्रसंघ महासचिव के रूप में उनके राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। इसके बाद चाहे शिक्षा का आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो, रोजगार आंदोलन हो या फिर जनसरोकारों से जुड़ी कोई भी लड़ाई, शायद ही कोई ऐसा आंदोलन रहा हो , जिसमें उनकी भूमिका न रही हो। राज्य आंदोलन के दौर में जब राजनीतिक विचारधारा का सवाल उठा, तो वेद भाई ने क्षेत्रीय दल को तरजीह देते हुए यूकेडी को चुना और उसके शीर्ष नेतृत्व में शामिल रहे।

अनगिनत आंदोलन, भूखहड़ताल, जेल और पुलिसिया दमन, ये सब वेद भाई के जीवन संघर्ष का अभिन्न हिस्सा रहे। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वह कभी भी सुविधाभोगी और अवसरवादी नहीं रहे। आंदोलन के दौर में ही वे गंभीर रूप से गठिया के शिकार हो गए , लेकिन बावजूद इसके उनका संघर्ष बरकरार रहा। उनके व्यक्तित्व का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तब गैर कांग्रेसी-गैर भाजपाई मोर्चा बनाने का जिम्मा उनके ही पास था। इतना ही नहीं उत्तराखंड क्रांति दल का राजनीतिक घोषणा पत्र बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं पर होती थी। निसंदेह वेद भाई जैसे जीवट, ओजस्वी और प्रखर आंदोलनकारी तेवर वाला जज्बा हर एक में नजर नहीं आ सकता। ये उनकी जीवटता ही थी कि दो दशक तक उन्होंने एक गंभीर रोग का डटकर मुकाबला किया।

लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिस उत्तराखंड के लिए उन्होंने सब कुछ दांव पर रखा, वो उत्तराखंड, और सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि उनके आंदोलन के दौर के साथी तक न तो उनके संघर्ष को मान्यता दिला सके और न ही आंदोलनकारी के रूप में उचित सम्मान। अपने जीवन का अंतिम सोपान वेद भाई ने बेहद कठिनाई से जिया। एक तरफ बीमारी, दूसरी तरफ आर्थिक तंगी और इसी दौरान पुत्र शोक का वज्रपात उन्हें झेलना पड़ा। चंद गिने-चुने लोग ही रहे होंगे जिन्होंने कठिन वक्त में वेद भाई की सुध ली होगी। दुभाग्यपूर्ण तो यह था कि उनके अंतिम संस्कार के दौरान चंद आंदोलनकारी चेहरे, कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी ही शामिल रहे।

वेद भाई के जाने के बाद आज सरकारों पर सवाल उठ रहे हैं। सरकार को दोष दिया जा रहा है कि उसने एक राज्य आंदोलनकारी नेता के लिए कुछ नहीं किया। यह बात बिल्कुल सही है, लेकिन यह भी सच है कि दोष सिर्फ सरकार का ही नहीं, बल्कि उन आंदोलनकारी शक्तियों का भी है, जो आज अपनी ही हैसियत खो बैठे हैं। निसंदेह यदि वेद भाई भाजपा या कांग्रेस में होते, तो शायद स्थिति कुछ अलग होती। मगर जब राज्य बनने के बाद सत्ता की मलाई चाटने वाली तमाम संघर्षशील ताकतों ने ही उनकी सुध नहीं ली, तो फिर सरकार से उम्मीद ही क्या की जाती? वैसे भी मौजूदा दौर में न तो आंदोलनकारियों की कोई हैसियत है और न उनके संघर्ष को कोई मान्यता।काश, वेद भाई की अंतिम यात्रा से ही सही आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक ले पातीं।

पत्रकार योगेश भट्ट की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं…

Subhash Sharma आर्थिक तंगी तो वेद भाई ने आजीवन झेली । फ़िर हर हाल में खुश रहना और राज्य की चिंता करना तो उनकी आदत में शुमार हो गया था । दो वर्ष पूर्व उनके एक मात्र पुत्र की मृत्यु तो, उनके साथ ज्यादती ही थी । परेशानियों की इंतेहा हो गयी थी । राज्य आंदोलन को गति देने के लिये उन्होंने लगभग 16 दिनो (या शायद उससे ज्यादा) की भूख हड़ताल की, तो वो भी पूरी ईमानदारी से । जिन पुलिस अधिकारी ने प्रशासन के आदेश पर उनकी भूख हड़ताल तुड़वाने के लिये उनको जबरन गोद में उठा कर अस्पताल में पहुँचाया था, उन्होंने मुझे बताया था कि, सूख कर हड्डियों का ढाँचा रह गये थे वेद भाई ! इसी भूख हड़ताल ने उनके लीवर, उनका नर्वस सिस्टम बहुत ज्यादा डेमेज कर दिया था । यही बीमारी बढ़ती गयी और धीरे धीरे उनके शरीर के अधिकाँश हिस्सों को प्रभावित करती चली गयी । हाँ, मस्तिष्क से वे पूरी तरह स्वस्थ थे । आदरणीय भाभीजी ने जिस तरह वेद भाई का साथ निभाया, वो तो अनुकरणीय है ही । परन्तु ओमी भाई ने भी वेद भाई का साथ बहुत ही ईमानदारी से निभाया । उनके इस तरह जाने का बहुत दुख है, पर नियति के आगे किसी का वश नहीँ । वेद भाई का फ़िर से क्रान्तिकारी अभिवादन।

Suresh Belwal भगवान वेद भाई की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे । कुछ व्यक्ति शायद मानव कल्याण के लिए ही पैदा होते हैं और अपना काम करके चले जाते हैं । ऐसे दधीचि को मेरा प्रणाम।

Sarswati P Sati वेद भाई का जाना संघर्षों के एक इतिहास की पुस्तक का गुम हो जाना जैसा है। अफ़्सोश यह प्रांत उनके लायक न बन पाया

Ganesh Kothari जिसने भी राज्य की चिंता की ..वो ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से तन्ग ही हैँ और ज़िसने कुछ भी नहीं किया वो मौज में …वाह रे उत्तराखंड की प्रबुद्ध और जागरुक जनता …

Prabhat Dhyani श्रद्वांजलि। उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण का सपना देखने वाले तथा उस सपने को हकीकत में साकार करने के लिये अपने सर्वस्व को झोंक देने वाले बड़े भाई वेद उनियाल जी का निधन उन तमाम साथियों के लिये बड़ी क्षति है जो समय-समय पर उनका मार्ग दर्शन प्राप्त करते थे।तथा उनसे प्रेरणा लेते थे। साथियों से निवेदन है कि वेद भाई उत्तराखण्ड़ राज्य निर्माण के बाद हुयी प्रदेश में मची लूट तथा राज्य अवधारणा को दरकिनार करने से बहुत दुःखी व मायूश थे। वे इस बात को लेकर भी साथियों से बहुत ज्यादा निराश थे कि प्रदेश में मजबूत क्षेत्रीय विकल्प नहीं बन पाया जिसके कारण राज्य विरोधी ताकतें मजबूत होती गयी। उनके निधन पर उनके प्रति हम सबकी सच्ची श्रद्वांजलि यही होगी कि हम उस विचार व संकल्प को पूरी प्रतिबद्वता के साथ साकार करें।

Rajeev Uniyal हार्दिक अश्रुपूर्ण नमन मैंने वेद भाई को नजदीक से देखा है सदैव ऊर्जा से ओतप्रोत रहते थे और एक सुनहरे भविष्य का सपना उनकी आंखों में रहता था दुखद है कि सरकार और समाज दोनों ही ने उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया वैसे वेद भाई किसी सम्मान व मान की परवाह करते भी नहीं थे और सदैव संघर्षशील रहते थे

Dhirendra Kumar Uniyal भगवान वेद भाई कि आत्मा को शांति प्रदान करे ॥ सभी निकट जनो को धैर्य व साहस प्रदान करे ॥ सच्चे आंदोलनकर्ता किसी के मोहताज नहीं होते वो सबके दिलो मे होते हैं चाहे वो बाबा उत्तराखण्डी हों , चाहे बाबा बमराडा हों , चाहे श्रीदेव सुमन हों ॥ स्वार्थ वस सब श्रद्धाजंलि व माल्यापर्ण तक हीं सीमित रहते हैं जबकि हमे उनके आदर्शों पर चलकर उनके सपनों को साकार करना पडेगा जिसके लिये हम कटिबद्ध हैं ॥

Arya Surendra सच लिखा, अच्छा लिखा। पोस्ट में उठाया गया सवाल न तो सरकार और न ही किसी भी संगठन को कठघरे में खड़ा करता है। यह सामाजिक संवेदना का विषय है। इस स्तर पर पूरे समाज मे हो रहे क्षरण पर हमारा ध्यान नहीं जाता। ज्यादातर आंदोलन, संघर्ष और हड़ताले एक छोटे वर्ग के हित लाभ से जुड़े एजेंडे पर राजनीतिक उद्देश्य से होते हैं इसलिए उस एजेंडे/संघर्ष और उसके नेतृत्व से बड़े समाज का कोई भावात्मक लगाव नहीं रहता जो बाद में उसके व्यवहार में उदासीनता के रूप में दिखाई देता है।

Amitabh Srivastava He was always ready with answers for every question we asked him. The more difficult the problem the brighter his solution. But unfortunately he had no answers about his own life’s problems. RIP.

Geeta Ram Gaur इस महान संघर्षशील व्यक्तित्व को दिल से भावनात्मक श्रद्धांजलि ईश्वर इन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दें , भाई जी आपके इस लेख ने उनसे जुडे लोगों को आईना दिखाने का काम किया है और आत्म अवलोकन करने पर मजबुर कर दिया है , साथ ही आपने सच्ची श्रदांजलि लेख के माध्यम से भी दी है_ॐ शांति -3
Dataram Chamoli भट्ट जी आपने सही कहा कि आंदोलनकारी ताकतें (अगर कहीं बची हैं तो) कुछ सबक लें। सवाल अकेले वेद उनियाल जी का नहीं है। इससे पहले स्वर्गीय बी. एस. परमार उत्तराखंडी के अंतिम दिन भी बहुत खराब रहे। इलाज और रोटी के लिए वे मोहताज रहे। अफसोस कि उक्रांद के काशी सिंह ऐरी, दिवाकर भट्ट, पुष्पेश त्रिपाठी जैसे साधन संपन्न नेताओं ने उनका हाल जानने की जरूरत तक नहीं समझी थी। खैर, हम आम लोग तो यही प्रार्थना कर सकते हैं कि ईश्वर वेद जी की आत्मा को शांति प्रदान करे।

Ashish Uniyal योगेश भाई आपका लेख लुंजपुंज होती संवेदनाओं को कितना झकझोर पाएंगा, यह तो नहीं बताया जा सकता लेकिन आपके दिखाए इस दर्पण में आंदोलनकारी ताकतों को अपना चेहरा अवश्य देखना चाहिये!

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कवि-गद्यकार अजित कुमार का निधन

‘चांदनी चन्दन सदृश’: हम क्यों लिखें? / मुख हमें कमलों सरीखे / क्यों दिखें? / हम लिखेंगे: / चांदनी उस रुपये-सी है / कि जिसमें / चमक है, पर खनक ग़ायब है.” नयी कविता के ग़ैर-रूमानी मिज़ाज की ऐसी प्रतिनिधि पंक्तियां लिखनेवाले कवि-गद्यकार श्री अजित कुमार हमारे बीच नहीं रहे. आज सुबह 6 बजे लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुए 84 साल की उम्र में दिल्ली के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया.

हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य को अपनी गरिमामय उपस्थिति से जीवंत रखनेवाले अजित जी ने लगभग छह दशकों की अपनी साहित्यिक सक्रियता से हिन्दी की दुनिया को यथेष्ट समृद्ध किया. देवीशंकर अवस्थी के साथ ‘कविताएँ 1954’ का सम्पादन करने के बाद 1958 में उनका पहला कविता संग्रह ‘अकेले कंठ की पुकार’ प्रकाशित हुआ था. तब से ‘अंकित होने दो’, ‘ये फूल नहीं’, ‘घरौंदा’, ‘हिरनी के लिए’, ‘घोंघे’ और ‘ऊसर’ – ये कविता-संग्रह प्रकाशित हुए. उपन्यास ‘दूरियां’, कहानी-संग्रह ‘छाता और चारपाई’ तथा ‘राहुल के जूते’, संस्मरण और यात्रा-वृत्त की पुस्तकें ‘दूर वन में’, ‘सफरी झोले में’, ‘निकट मन में’, ‘यहाँ से कहीं भी’, ‘अँधेरे में जुगनू’, ‘सफरी झोले में कुछ और’ और ‘जिनके संग जिया’, तथा आलोचना पुस्तकें ‘इधर की हिन्दी कविता’, ‘कविता का जीवित संसार’ और ‘कविवर बच्चन के साथ’ प्रकाशित हुईं. इनके अलावा नौ खण्डों में ‘बच्चन रचनावली’, ‘सुमित्रा कुमारी सिन्हा रचनावली’, ‘बच्चन निकट से’, ‘बच्चन के चुने हुए पत्र’, ‘हिन्दी की प्रतिनिधि श्रेष्ठ कविताएं’ समेत बीसियों पुस्तकें उनके सम्पादन में निकलीं. अभी-अभी उनकी किताब ‘गुरुवर बच्चन से दूर’ छप कर आयी है.

अपनी लम्बी बीमारी और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अजित जी लेखन में लगातार सक्रिय रहे. कुछ समय से दिल्ली की साहित्यिक संगोष्ठियों में उनका आना-जाना थोड़ा कम अवश्य हो गया था, पर विभिन्न संचार-माध्यमों के ज़रिये साहित्यिक समुदाय के साथ उनका जीवंत संपर्क बना हुआ था. श्री अजित कुमार का निधन हिन्दी की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है. जनवादी लेखक संघ उनके योगदान को स्मरण करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)
जनवादी लेखक संघ

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मुम्बई के जाने माने प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का दुर्घटना में निधन

मुम्बई के जाने माने फ़िल्म प्रेस फोटोग्राफर राजू उपाध्याय का वाराणसी से सटे गोपीगंज थाना इलाके के छतमी में एक ट्रक से हुई दुर्घटना में गुरुवार की सुबह निधन हो गया। वो मूलतः भदोही जिले के रहने वाले थे। वो सोमवार को भदोही आए थे। उनकी पत्नी यहां सीतामढ़ी में शिक्षिका हैं। हादसे के वक्त राजू सीतामढ़ी स्थित आवास से दवा लेने के लिए बाइक द्वारा गोपीगंज बाजार जा रहे थे।

अपने घर से वो थोड़ी ही दूर आगे बढ़े थे कि एक ट्रक ने उन्हें अपनी चपेट में ले लिया। घटना के बाद चालक ट्रक के साथ फरार होने की कोशिश में था लेकिन पुलिस ने दबोच लिया। उनके निधन की खबर मिलते ही मुम्बई के फ़िल्म पत्रकारों में शोक की लहर दौड़ गयी। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार मिथलेश सिन्हा ने राजू उपाध्याय के निधन पर शोक जताया है। राजू उपाध्याय का बॉलीवुड में कभी सिक्का चलता था। अपने समय की बॉलीवुड पत्रिकाएं फ़िल्म फेयर, मूवी, माधुरी आदि में उनकी क्लिक की हुई तस्वीरें खूब छपती थीं।

वे अपने जमाने के सितारे दिलीप कुमार, राजकपूर सहित अमिताभ बच्चन के काफी लाडले थे। हाल ही में उन्हें शाहरुख खान ने एक कैमरा भी उपहार में दिया था। बताते हैं कि राजू उपाध्याय आमिर खान के भी काफी करीबी थे और आमिर अपने साथ किसी भी कार्यक्रम में राजू उपाध्याय को जरूर ले जाते थे। मुम्बई के चेम्बूर में रहने वाले राजू उपाध्याय इन दिनों अपने गांव गए थे जहां यह दुर्घटना हुई।

उन्हें हाल में ही दादासाहेब फॉल्के एक्सीलेंस अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। राजू उपाध्याय के निधन पर चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट ने गहरा शोक जताया है। चैम्बर ऑफ फ़िल्म जर्नलिस्ट के अध्यक्ष इंद्र मोहन पन्नू, उपाध्यक्ष अतुल मोहन ने राजू उपाध्याय के निधन पर गहरा दुख जताते हुए उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार
मुंबई
9322411335

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पठानिया जी का अंतिम संदेश- ”जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती”

भला ऐसे भी कोई जाता है… : जिंदगी बहुत खूबसूरत है, लेकिन अपनों के बिना तू अच्छी नहीं लगती। मेरे व्हाट्सएप पर वरिष्ठ पत्रकार पठानिया जी का अंतिम संदेश यही था। पत्रकारिता में अपना जीवन खपा देने वाले बड़े भाई समान मित्र राकेश पठानिया अंतिम समय में मुझे याद करते रहे। (जैसा पारिवारिक सदस्यों ने आज अल सुबह बताया)। पता नहीं दोस्ती के कई कर्ज चुकाने बाकी रह गए।

जीवन सच में अनमोल है। आपके लिए खुद की जि़ंदगी न जाने क्या महत्व रखती है, लेकिन परिवार के लिए आप ही जि़ंदगी हो। यह वक्त न तो किसी तरह के वाद-विवाद का है और न ही इस असमय मृत्यु के कारणों की पड़ताल का। हम सबका फर्ज यह है कि हम पठानिया जी के परिवार की ऐसी क्या मदद करें कि उनका आगे का जीवन आसानी से कट सके। दोस्तों! पठानिया जी की पहचान एक कर्मठ पत्रकार के रूप में रही। पत्रकारिता के अलावा उनका कोई अतिरिक्त व्यवसाय नहीं रहा। धर्मपत्नी गृहिणी हैं, जबकि दो बच्चे अभी छोटी कक्षाओं में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

मैं दिल से आभारी हूँ धर्मशाला के प्रतिष्ठित व्यवसायी एवम दिवंगत पठानिया जी के मित्र श्री मुन्नू ठाकुर जी का जो संकट की इस घड़ी में पांच लाख की आर्थिक सहायता के साथ सामने आए हैं। वहीं नूरपुर के पूर्व विधायक श्री राकेश पठानिया ने दिवंगत पत्रकार राकेश पठानिया जी के एक बच्चे की शिक्षा का पूरा खर्च वहन करने की बात कही है। उम्मीद है दैनिक जागरण संस्थान उन्हें समुचित मुआवज़ा प्रदान करेगा। हमसे जो हर संभव मदद होगी, उसके लिए हम तैयार हैं।

पत्रकार शशिभूषण पुरोहित की फेसबुक वॉल से. 

जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर

etv वाले मृत्युंजय की फेसबुक पोस्ट ने आज मझे सुबह सवेरे बुरी तरह झटक दिया था। पोस्ट में कांगड़ा जिले में पत्रकारिता के सूरमा और जिंदादिली की मिसाल राकेश पठानिया की मौत की मनहूस खबर मिल गयी। मृत्युंजय ने पत्रकार समाज को हुयी इस बड़ी क्षति की सूचना देकर अपना धर्म निभाया लेकिन राकेश पठानिया जैसे पत्रकारिता के ‘वीर पुरुष’ को मौत यूँ घेरकर निगल लेगी यह सब यकीं करना मुश्किल हो रहा था। तब फेसबुक पर कई पोस्टों ने तेज़ी पकड़ी तो बीसियों बार पढ़ पढ़कर भी दिल को दिन भर दिलासे देने जुटा रहा क़ि नहीं यह कैसे हो सकता है! लेकिन यह सच था क़ि शान ए धर्मशाला हमारे बड़े भाई राकेश पठानिया अब नहीं रहे थे। फट से जागरण में फोन घुमाया तो पुराने मित्रों ने बताया क़ि हाँ यह सही है लेकिन सब अचानक।हुआ है। पिछली शाम तक ठीक थे। दिनेश कटोच ने ही इन मेरे जागरण वाले मित्र को भी बताया था क़ि पठानिया अब ठीक हैं। शुक्रवार को तो पठानिया ने जागरण में भी खुद ही बताया था क़ि अब उन्हें लग रहा है क़ि वह ठीक हो जाएंगे। मतलब सब सामान्य था। मगर शनिवार की रात पठानिया के जीवन के लिए एक ऐसी घुप अँधेरी रात साबित हो गयी थी क़ि जिसका कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता था। बताया गया क़ि टांडा मेडिकल कॉलेज में केमोथेरापि के बाद शनिवार को उनकी तबियत आधी रात के बाद एकाएक ऐसी बिगड़ी क़ि थामी नहीं जा सकी। दिन भर मित्रों से चर्चा करता रहा पठानिया की। कइयों ने अपने अपने अनुभव बांटे।

अभी रात सामने आ गयी। अब सोने की कोशिश कर रहा था लेकिन आँखों के आगे से भाई पठानिया की सूरत-सीरत हटने का नाम नहीं ले रही थी तो सोचा क़ि क्यों न श्र्द्धांजलि के कुछ शब्द उन्हें मैं भी समर्पित कर दूँ। राकेश पठानिया सचमुच पूरी तरह।से पत्रकारिता को ही समर्पित थे। पहले कभी जनसत्ता तो फिर उसके बाद दैनिक जागरण। जागरण के लिए उन्होंने बतौर पत्रकार ही नही बल्कि एक अभिभावक की भूमिका भी निभायी। प्रेस स्थापित करने से लेकर अखबार के हर खरे बुरे के चिंतक और किसी भी संकट के दौर में बेहतरीन व्यवस्थापक। यूँ तो वह बड़े अंतर्मुखी थे।लेकिन कभी कभी घुटन से बचने के लिए दिल की बातें साझी भी कर लिया करते थे। वह एक सरल सकारत्मक व्यक्तितव के धनि थे। बुरा करने से बचते थे और ऐसी ही सलाह भी दूसरों को दिया करते थे। पत्रकारिता में भिड़न्त और सींगबाज़ी इन्हें पसंद नहीं थी।

उन्हें मैंने ऐसे महसूस किया कई बार क़ि वह समाज में सभी पक्षों के पैरोकार थे। पत्रकारिता से वह सब नहीं जिससे किसी भी पक्ष को क्षति हो। खिलाफ खबर भी लिखेंगे लेकिन शब्द शिष्टता और शब्द संयम पर पूरा जोर। मैंने उन्हें एक टीम लीडर के रूप में कई बार बढ़िया काम करते हुए देखा। वह किसी को नाराज करने के पक्ष में कभी नहीं रहते। टीम में सभी को प्यार से और कम संसाधनों की स्थिति में अपना बेहतर देने की सदा प्रेरणा देने की उनके प्रयासों को हम कई बार देखते और महसूस करते थे। यह उनके व्यक्तितव का ही करिश्मा था क़ि जागरण के संजय गुप्ता इन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते थे और इन पर हर मामले में भरोषा करते थे। तात्कालिक मुख्य महा प्रबन्धक निशिकांत ठाकुर हिमाचल के तमाम बड़े निर्णय पठानिया से ही मशविरे के बाद लेते थे। उनसे जुडी कई स्मृतियाँ जेहन में उछल कूद-भागमभाग कर रही है और दिल-दिमाग को बेचैन कर रही हैं। भाई आपको हमेशा याद रखेंगे और आपका वो फोन उठाते ही जुबां से निकलने वाला ‘जय देया महाराज’।

वरिष्ठ पत्रकार राजेश्वर ठाकुर की फेसबुक वॉल से.

(स्व. राकेश पठानिया)

बड़का चली आ…

मैं जागरण आफिस छोटे पाउ नवनीत  कन्ने मिलना गया तां ओहथु बड़का ओरां दुस्सी पे। मैं पैरीं हत्थ लाये तां बड़के गले ने लाई ल्या। पूछ्या अज कतां?  मैं ल्या अज तुहां सोगी मिलना आई गया, बड़का बड़ा खुस, शीशे पार नवनीत हल्की स्माइल दई ने दुरे ते हाल चाल पुछि ल्या। बड़के चा मंगाई लई,गप्प छप चली,बड़के कताबा ताई कई सुझाब दई पाए। कुछ ईजा करना कुछ उंझा। मिंझो पता हा बड़का ठीक नी ए, पर बड़के कुछ बी शो नी होना दित्ता, फेस पर से नेचुरल रौनक नी थी पर बड़का पूरा जोर लाये की कुछ भी शो न होय। जेलु में एचपीसीए दे भ्रष्टाचार दे खिलाफ मामला चकया तां बड़के बड़ी मदद कित्ती। प्रेस क्लब दे पचां धूप्पा च कुर्सी लाई ने बड़के ते सलाह लेनी। बड़के वाल बड्डा आरी एक्सपीरियंस था।

बड़का गर्मजोशी ने मिलदा था पर सलाई दिन्दी बारी बड़ा गंभीर। ए मत करदे,से करी लेना। मैं तिन की साल पहले शिमले आई रया तां मुलाकात घटी गई। विच पाकिस्तान दे मैचे खिलाफ जेलु मैं मुहिम चलाई तां बड़का बड़ा खुस पर बमारिया दी बजा ने बेशक बड़का डोन होना शुरू होई आ था पर खबर से दई कड़क इ लिखनी। मैं पूछ्या बड़का अजकल सुझदे नी, बोल्या अजकल यरा मेरे ते दौड़ पज्ज नी हुंदी तां एथि डेस्क पर ठीक रहन्दा। नवनीत कन्ने मिलला तां नवनीते गलाया बड़के दा जिंदगी भर दा एक्सपीरियंस अजकल अहाँ दे कम्मे ओ दा। एथि बड़के जो कोई टेंशन ब नी ए। बमारी ते तंग होई बड़के रिजाइन करना लाया हा तां नवनीते रिक्वेस्ट कित्ती तुहां टेंशन मत ल्या।

जागरण आफिस आई ने जे दिल करे से करा, जेलु दिल करे तेलु आ कन्ने जा। भाई, इन्हा दे ओने ने सांझो सबनी जो बड़ा कुछ सिखने जो मिलदा, नवनीत दी सेंसटिविटी मिंझो कॉलज टेमे ते पता थी हुन तां वैसे बी नवनीत काफी मैच्योर है उन्नी इकी तीरे ने दो निशाने लाये। बड़का बी अडजस्ट कन्ने बड़के दे एक्सपीरियंस दा फायदा उपरे ते बड़के दा दिल भी ओर ओई जाँदा। कल पता लग्गा बड़का अपना एक्सपीरियंस जागरण आफिस बंडी ने पता नी कतां जाई रया। हुन बड़के दी सकल नी सुजनी बस,ख़बरां च बड़के दी झलक सुजनी जेडी बड़के वाकियों जो बंडी। बड़के दी कमी कदी पूरी नी ओई सकदी। भगवान बड़के दी आत्मा जो शांति दें। जय हिंद

-विनय शर्मा
डिप्टी एडवोकेट जनरल
हिमाचल सरकार

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नहीं रहे धर्मशाला के वरिष्ठ पत्रकार राकेश पठानिया

(स्व. राकेश पठानिया)

एक कलमकार की मौत और सौ सवाल : कहने को तो अब हिमाचल प्रदेश का शहर धर्मशाला प्रदेश की दूसरी राजधानी है और स्मार्ट सीटी भी बनने जा रही है, मगर आज से दो दशक पहले भी धर्मशाला की प्रदेश की राजनीति में काफी अहमियत थी। तब की पत्रकारिता आज के दौर से कहीं अलग और काफी मुश्किल भरा टास्क थी। कुछ गिनी चुनीं अखबारें प्रदेश के बाहर से छपकर आती थीं और इनके पत्रकारों के तौर पर घाघ लोगों का कब्जा था। किसी नए खबरनवीस के लिए अखबार में जगह तलाशना कोयले के खान में हीरा तलाशने जैसा मुश्किल काम था। सीनियर भी ऐसे थे, जो उस समय के दौर में मिलने वाली तबज्जों और आवभगत के चलते किसी को करीब फटकने नहीं देते थे, और शागिर्द की बात करें तो ऐसा सांप सूंघ जाता था कि मानो वह एकलव्य बनकर उनके लक्ष्य को भेदने को तैयार हो।

ऐसे ही दौर में कुछ अच्छे लोगों की अंगुली पकड़ कर एक दुबले पतले लड़के ने भी कलम को हथियार बनाकर एक लक्ष्य निर्धारित किया। तब पत्रकार बनने के लिए तनख्वाह की सोचना तो दूर की बात खबर भेजने तक के लिए जेब ढिली करनी पड़ती थी। वो समय ऐसा था जब पत्रकारिता का जुनून जिसके सिर पर चढ़ता, वो वेतन की परवाह किए बिना खुद की जेब से भी खर्चा करके पत्रकार बनना चाहता था। पत्रकार भी वही बनते जो फक्कड़पन की परवाह किए बिना अपनी खबर के प्रकाशित होने पर अपना सीना चौड़ा किए संतोष के साथ शान से जीते थे। तब जनसत्ता जैसी व्यवस्था से लडऩे वाली अखबार का साथ मिलना किसी सपने के साकार होने जैसा ही था।

ऐसे ही दौर में कलम थामने वाला यह पतला दुबला युवक था राकेश पठानिया। पत्रकारिता के शोक या कहें जुनून ने उसके सामान्य से व्यक्तित्व को तराशने के साथ-साथ कुछ ऐब भी दे दिए। लगातार धूम्रपान करना और जमकर शराब पीने की लत एक दाग की तरह थी। शायद यही लत इस कलमकार को हम सब से दूर ले जाने वाली थी। या कहें कि उसका शांत स्वभाव और गुस्से व रोष को अंदर ही दबाए रखने की कला उसे अंदर से खोखला कर सकती थी। ये सब बातें इसलिए कर रहा हूं कि रविवार को गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सुबह उठते ही राकेश पठानिया की असमय मृत्यु का दहलाने वाला समाचार मिला। सिर्फ मैं ही नहीं उन्हें जानने व उनके साथ उठने बैठने वाला हर इनसान सकते में था। यह बात तो हर कोई जानता था कि राकेश पठानिया की तबीयत ठीक नहीं चल रही है और काफी समय से उनका ईलाज चल रहा है।

इसकी बीमारी के चलते उन्हें सीटी आफिस से हटाकर बनोई स्थित प्रकाशन कार्यालय के डैस्क में भेज दिया गया है। दो दशक से जो जगह जिसकी कर्मस्थली रही हो और अचानक बूरा समय आते ही उस जगह से बेदर करना भी किसी सदमे से कम नहीं रहा होगा। डैस्क में काम के साथ-साथ ईलाज भी चलता रहा, मगर दुबले शरीर में काम व चिंता के बोझ के अलावा भी की तरह जलते सिगरेट के धूंए से बेदम हो चुके फेफड़े साथ छोड़ चुके थे। चरमरा चुकी चिकित्सा व्यवस्था भला किसी पत्रकार को छोड़ती भी कैसे। बीमारी कुछ और ईलाज कुछ। जब असल बीमारी को पता चला तब तक मौत का केंकड़ा फेफड़ों को कुतर चुका था। शांत स्वभाव भला बदलता भी कैसे। दर्द व रोष को अंदर ही दबाने की कला अब धीरे-धीरे इस खबरनवीस को किसी ओर ही दुनिया में ले जाने को आतूर थी। किसी को इसकी भनक तक नहीं चली थी, नहीं तो बाद में अफसोस करने वाले भला इस तरह उसे तिल-तिल मरता नहीं देखते।

महज ५४-५५ वर्ष की उम्र में राकेश पठानिया की मौत से पत्रकार समाज सकते में है। पगार से ज्यादा बेगार की चीज बन चुकी पत्रकारिता के चलते राकेश पठानिया की शादी भी काफी अधिक उम्र में हुई थी। एक बेटा महज सात साल का और बेटी १२ वर्ष की है। छोटे-छोटे बच्चों के सिर पर से बाप का साया उठना और भी चिंता का विषय है। घर-परिवार की बात करें तो वर्षों से किराए के मकान में रहने वाला परिवार आज भी वहीं पर है। ऐसे में परिवार की  चिंता भी हर किसी के जहन में है। दैनिक जागरण में सीनियर चीफ रिपोर्टर की पोस्ट पर नियमित कर्मी होने के चलते अब सबका ध्यान कंपनी से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर टिका है। सभी मदद को तैयार हैं, मगर कितनी मदद होगी इस पर स्वत: सोचा जा सकता है। आखिर आज दिन तक एक पत्रकार की मौत पर परिवार को मिला भी क्या है। अफसोस और जीवन में किए कार्यों की प्रशंसा के चंद शब्दों से ज्यादा कोई दे भी क्या सकता है। आर्थिक मदद भी कर देंगे तो क्या इतने छोटे बच्चों के लंबे पड़े भविष्य की सफलता के लिए इनके साथ टिके रहना हर किसी के बस में है। पत्रकारों की हालत तो यह है कि दूसरों के दुखों को बखान तो कर सकते हैं, मगर खुद पर मुसीबत आती है तो अपने ही कन्नी काटे जाते हैं। कुल मिलाकर पत्रकारिता संकट के दौर में है। वेतन के लिए पत्रकार नौकरियां खोए बैठे हैं। अधिकार मिल नहीं पा रहा, ऊपर से एक पत्रकार का इस तरह जाना पत्रकारिता के भविष्य की तस्वीर नहीं तो ओर क्या है।

अपनी खबर कर काफी खुश हुए थे राकेश पठानिया

प्रिंट मीडिया का एक पत्रकार वर्षों तक अपने काम में लगा रहता है। इस दौरान वह कईयों की मदद करता है और कईयों का रोष मोल लेता है। ऐसे में उसके लिए प्रशंसा के बोल उसके और उसे जानने वालों के बीच ही दबे रह जाते हैं। अखबारों को पढऩे वाले लाखों पाठकों तक उसकी खबरें तो पहुंचती हैं, मगर उसकी पहचान और चेहरा दबा रह जाता है। ऐसे में अगर कोई उसकी प्र्रतीभा को सम्मान देता है और उसकी खबर किसी अखबार में छपती है, तो उसे आम आदमी से कहीं ज्यादा खुशी होती है। ऐसा ही राकेश पठानिया के साथ तब हुआ जब फरवरी 2016 में उन्हें सम्मान दिया गया और मैने वेबसाइट में उनकी खबर चलाई। उनका फोन आया और उन्होंने एक आम पाठक की तरह आभार जताते हुए मुझे कहा कि आज अपनी खबर पढ़कर उन्हें लगा कि उनकी भी कोई उपलब्धि है, जो खबर बनकर उन्हें अच्छी लगी। प्रस्तुत है वह खबार…….

दैनिक जागरण के राकेश पठानिया को एक्सीलेंस अवार्ड

धर्मशाला, 21 फरवरी। राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र दैनिक जागरण के के धर्मशाला स्थित जिला कांगड़ा ब्यूरो के प्रभारी एवं सीनियर चीफ रिपोर्टर राकेश पठानिया को पत्रकारिता में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए एक्सीलेंस अवार्ड से सम्मानित किया गया है। शनिवार को आयोजित समारोह में समाचार पत्रिका समस्त भारत की ओर से उन्हें यह सम्मान बीसीसीआई सचिव एवं एचपीसीए अध्यक्ष, सांसद अनुराग ठाकुर और दिव्य हिमाचल के संपादक अनिल सोनी ने प्रदान किया। राकेश पठानिया जिला कांगड़ा के उन सफलतम पत्रकारों में शामिल हैं, जिन्होंने उस दौर से पत्रकारिता की शुरुआत की थी, जब पत्रकार बनना किसी चुनौती से कम नहीं था। उस दौरान पत्रकार को इतना वेतन तक नहीं मिल पाता था कि परिवार का गुजार कर सकें। उन्होंने विपरित परिस्थितियों के बावजूद पत्रकारिता में अपनी पहचान बनाई। शुरुआत में राकेश पठानिया उस समय की प्रतिष्ठित अखबार जनसत्ता के रिपोर्टर रहे। इसके बाद उन्हें वर्ष 2000 के करीब दैनिक जागरण  का जिला प्रभारी बनाया गया। तब से लेकर आज तक वे दैनिक जागरण परिवार का हिस्सा बने हुए हैं। मौजूदा समय में राकेश पठानिया जिला प्रेस क्लब धर्मशाला के प्रधान भी हैं।

रविंद्र अग्रवाल
धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश)।

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लोकस्वामी मैग्जीन के संपादक रजनीकांत वर्मा का निधन

लोकस्वामी समूह के ग्रुप एडिटर रजनीकांत वर्मा नहीं रहे. हार्ट अटैक के कारण उनका निधन हो गया. वे पचपन साल के थे. वे पिछले कुछ समय से बीमार भी चल रहे थे जिसके कारण उनका इलाज चल रहा था. उत्तराखंड के हल्द्वानी (नैनीताल) के रहने वाले रजनीकांत ने करियर का काफी लंबा अरसा इंदौर में व्यतीत किया.

वे लोकस्वामी से पहले शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कार्यरत थे. वे ‘माया’ पत्रिका में भी रह चुके हैं. रजनीकांत वर्मा काफी समय से दिल्ली में रहकर ‘लोकस्वामी’ हिंदी पाक्षिक पत्रिका का संपादन करते थे. वे लंबे समय तक इंदौर में रह चुके हैं. वे पिछले 26 साल से लगातार लोकस्वामी समूह से जुड़े हुए थे. लोकस्वामी समूह के समूह संपादक रजनीकांत वर्मा के अचानक चले जाने से उनके जानने वाले स्तब्ध हैं.

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सन्मार्ग अखबार के संपादक आनंद बहादुर सिंह का बनारस में निधन

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज और पत्रकारिता के युग पुरुष सन्मार्ग अखबार के संपादक अनंदबहादुर सिंह का इलाज के दौरान शनिवार को तड़के 4 बजे निधन हो गया। उनके निधन से पत्रकारिता क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। श्री सिंह की 87 वर्ष कीअवस्था थी। उनके निधन की जानकारी जैसे ही समाज के बुद्धिजीवी, पत्रकारों और उनके शुभचिंतकों को लगा जो जैसे था उनके भदैनी स्थित आवास की ओर दौड़ पड़ा। श्री सिंह का जन्म 29 अगस्त 1930 (लोलार्कछठ) के दिन हुआ था। वह शुरु से धार्मिक प्रवृत्ति और काशी के गंगो-जमुनी यकजहती के संवाहक थे। उनका श्री संकटमोचन मंदिर के महंत परिवार से ताल्लुकात होने की वजह से उनकी रूचि गोस्वामी तुलसीदास जी में रही। वह रामचरित मानस में जबरदस्त पकड़ रखते थे। इतना ही नही वह काशी के इतिहास के बारे में भी अच्छी जानकारी रखते थे।

श्री सिंह ने अपने पत्रकारिता क्षेत्र में कैरियर वाराणसी के लोकप्रिय सांध्यकालीन अखबार सन्मार्ग से सन् 1952 में जुड़कर की। शुरूआती दौर में संपादक स्व. पं. गंगाशंकर मिश्र के साथ काम शुरु किया और उनसे संपादन के गुर भी सीखे। श्री सिंह धीरे-धीरे अखबार के संपादक नियुक्त हुए तो सन्मार्ग को काफी ऊंचाई तक ले गए। श्री सिंह के पास 65 वर्ष के पत्रकारिता का अनुभव था। सरल स्वभाव के धनी श्री सिंह पत्रकारिता की नर्सरी थे जिसके छत्रछाया में कई दिग्गज पत्रकारों ने कलम चलाना सीखा। अवस्था हो जाने की वजह से उन्हें पांच दिन पूर्व सर सुंदरलाल अस्पताल में यूरिन इंफेक्शन के कारण भर्ती कराया गया था, जहा उनका शनिवार तड़के निधन हो गया। श्री सिंह अपने पीछे भरापूरा परिवार छोड़ गए है। श्री सिंह का एक लड़का विजयबहादुर सिंह और दो लड़की सविता राय और सरिता शर्मा है। श्री सिंह का अंतिम संस्कार हरिश्चन्द्र घाट पर किया गया। उन्हें मुखाग्नि बेटे विजयबहादुर ने दी।

स्वतंत्रता संग्राम में गए थे जेल

परिवारीजनों की माने तो आनंदबहादुर सिंह स्वतंत्रता संग्राम के वक्त जेल भी भेजे गए थे लेकिन बाद में वह छुटे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनों में हिस्सा लिया। हालाँकि जेल जाने का कोई प्रमाण मौजूद नही है। जब देश में सन् जून 1975 में आपातकाल लगा उस वक़्त भी अनंदबहादुर सिंह ने कलम को अपना हथियार बनाया था। श्री सिंह को श्रद्धांजलि देने वालों में संकटमोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र, ख्यात न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजयनाथ मिश्र, धर्मेंद्र सिंह, संपूर्णानंद तिवारी, एसपी सिटी, भदैनी टाइम्स के संपादक अवनिन्द्र कुमार सिंह, काशी पत्रकार संघ के पदाधिकारी सुभाष सिंह, अत्रि भरद्वाज, विकास पाठक, विनय मौर्या, अभय शंकर तिवारी,  सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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आगरा-मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल का निधन

मथुरा के नियति हास्पीटल में आज सुबह करीब सवा आठ बजे वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्रवाल जी ने आंखें मूंद ली। उन्होंने आज अखबार में लंबे समय तक क्राइम रिपोर्टर और फिर सिटी इंचार्ज के तौर पर सेवा दी। इससे पहले उन्होंने विकासशील भारत में बतौर क्राइम रिपोर्टर काम किया। आज अखबार छोड़ने के बाद वे डीएलए से जुड़ गए। यहां उन्होंने बतौर सीनियर क्राइम रिपोर्टर काम किया।

पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका अंतिम पड़ाव पुष्पांजलि ग्रुप के पुष्प सवेरा अखबार में सिटी इंचार्ज के रुप में रहा। ये वही पुष्पांजलि ग्रुप है जिसके हास्पीटल में उनके इलाज के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 1 साल के इलाज के लिए भेजी गई 5 लाख रुपये की धन राशि का महज 4 महिने में ही गोलमाल कर दिया। हालांकि तमाम मीडियाकर्मियों और सामाजिक व राजनीतिक लोगों ने उनके इलाज में प्रत्यक्ष व परोक्ष सहयोग किया पर उन्हें बचाया न जा सके।

श्री अग्रवाल अपनी नेक, ईमानदार और धारदार क्राइम रिपोर्टिंग के लिए प्रदेशभर में जाने जाते हैं। पिछले 40 सालों में उत्तर प्रदेश का उन जैसा दूसरा तेज तर्रार क्राइम रिपोर्टर न हुआ। उनकी क्राइम बीट पर पकड़ के कारण ही प्रदेश में इन सालों में जो भी डीजीपी हुए वे हमेशा विनोद अग्रवाल से प्रभावित रहे। विनोद अग्रवाल ने अपनी ईमानदार पत्रकारिता की एक नई पीढ़ी तैयार की। उनके सिखाए कई क्राइम रिपोर्टर आजकल मीडिया के नामचीन संस्थानों में सेवाएं दे रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेन्द्र पटेल की एफबी वॉल से.

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मुंबई की वरिष्ठ फिल्म पत्रकार पिरोज वाडिया का निधन

SAD DEMISE OF SENIOR JOURNALIST PIROJ WADIA

Dear Member,

With great sorrow and regret we have to inform you that Piroj Wadia, a senior film journalist and Press Club member passed away today in Mumbai after a brief illness. Piroj, aged 67 was in journalism for almost four decades with Free Press Journal, The Daily, Indian Express and Cine Blitz.

She will be laid to rest on Tuesday 7.45 am at Tower of Silence, Kemps Corner. Our heart goes out to her family and may they have the strength to bear this huge loss.

Dharmendra Jore
Secretary
Mumbai Press Club

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नहीं रहे लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार केसी खन्ना

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) के दशकों पुराने सहयोगी केसी खन्ना का निधन हो गया है। अंग्रेजी दैनिक दि पॉयनियर के उप समाचार संपादक रहे केसी खन्ना आईएफडब्लूजे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी व यूपी प्रेस क्लब की गवर्निंग बाड़ी के सदस्य रहे थे। दिवंगत पत्रकार केसी खन्ना की रस्म पगड़ी शनिवार १७ जून शाम ४ बजे राजाजीपुरम गोल चौराहे गुरुद्वारे में होगी।

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बनारस के वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन

Ak Lari : वरिष्ठ पत्रकार रत्न शंकर व्यास का निधन। वह ‘आज’ अखबार से जुड़े थे। वह ‘आज’ अखबार में संपादक रहे लक्ष्मी शंकर व्यास के बड़े पुत्र थे। अवस्था करीब 76 साल थी। रिटायर्ड होने के बाद ‘आज’ अखबार में संम्पादकीय लेखन का दायित्व निभा रहे थे। जानकारी के अनुसार रत्न शंकर जी तीन दिन से कार्यालय नहीं आ रहे थे। अस्वस्थ थे। घर पर ही इलाज चल रहा था।

आज सुबह थोड़ी तबीयत खराब होने पर डाक्टर को दिखाया। आराम भी हुआ लेकिन शाम को बेचैनी महसूस होने और अपने डॉक्टर के कहने पर उन्हें रात करीब आठ बजे लक्ष्मी अस्पताल लाया गया। एक घंटे तक इलाज चला। शायद दिल का दौरा पड़ा था। उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनकी अन्नत यात्रा मंगलवार सुबह नौ बजे दण्डपाणि गली स्थित आवास से मणिकर्णिका घाट के लिए निकली।

वह अपने पीछे तीन पुत्रियों, एक पुत्र और तीन भाईयों सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये है। स्वर्गीय व्यास ने अर्थशास्त्र में काशी विद्यापीठ से स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की थी। शुरुआती दौर में वह बैंकिंग से जुड़े रहे। बाद में उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। आजीवन पत्रकारिता से जुड़े रहे। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे ।अन्तरराष्ट्रीय राजनीति, खेल समेत हर तरह के लेखन में माहिर थे। व्यंग्य लेखन और कार्र्टून बनाने में भी उनका कोई सानी नहीं था।

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार एके लारी की एफबी वॉल से.

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कैंसर से पीड़ित वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह का निधन

Jaishankar Gupta : करीब चार दशकों की दोस्ती को एक झटके में तोड़ कर धर्मेंद्रपाल सिंह का इस तरह असमय चले जाना भारी दुख दे गया। 1980 में हमारी मुलाकात लोदी एस्टेट में स्थित असली भारत के दफ्तर में हमारी मुलाकात हुई थी। हम वहां संवाददाता सह उप संपादक थे। धर्मेंद्र हिन्दुस्तान अखबार में कार्यरत थे लेकिन हमारे संपादक, पूर्व सांसद और केंद्र सरकार में मंत्री रहे अजय सिंह से करीबी के कारण धर्मेंद्र वहां आते जाते या कहें सलाहकार सहयोगी की भूमिका में थे। 1997 में जब हम हिन्दुस्तान से जुड़े तब वह वहां वरिष्ठ और पुराने सहयोगी के रूप में मिले। कुछ बातों को लेकर मतभेद भी होते थे लेकिन मनभेद कभी नहीं हुए। कम मिलते थे लेकिन निजी रिश्तों में प्रगाढ़ता में कमी कभी नहीं आई। कैंसर से वह जूझ रहे थे। और कुछेक अवसरों पर और खासतौर से आपरेशन के बाद तो लगा कि उन्होंने अपराजेय कहे जानेवाले कैंसर को परास्त कर दिया है लेकिन कल रात वह इस लड़ाई को हार गए। मन बोझिल और सदमें में है। अपने बेलौस ठहाकों के लिए मशहूर मित्र को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। शोक की इस घड़ी में हमारी सहानुभूति और संवेदना सुषमा जी और उनके परिवार के साथ है।

Omkar Chaudhary :  आज एक और मित्र चले गए। वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (पूर्व खेल संपादक हिंदुस्तान) का कल रात निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ़ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। जबड़े का ऑपरेशन हुआ था। तब लगा था कि सब ठीक हो गया है। कुछ दिन ठीक रहे। लेखन भी करते रहे। अचानक सुषमा भाभी का फोन आया कि कमर में तेज दर्द है। इस रविवार के लिए लेख नहीं भेज पाएंगे। मन में शंका हुई। उसी सप्ताह हाल जानने के लिए घर गया तो बिस्तर पर पाया उन्हें। बात बात पर ठहाके लगाने वाले धर्मेन्द्रपाल असहाय होकर दर्द से कराह रहे थे। मेरे बहुत बेहतरीन दोस्त थे। शुभ चिंतक थे। शानदार पत्रकार थे। बहुत पीड़ा है उनके जाने की। शब्दों में बयान करना मुश्किल है। कितने ही पल याद आ रहे हैं। मेरा अश्रुपूर्ण नमन।

Umakant Lakhera : दुखद सूचना. परम मित्र, वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्रपाल सिंह (दैनिक हिंदुस्तान के पूर्व खेल संपादक) का आज 6 जून को सुबह निधन हो गया। वे पिछले कुछ सप्ताह से रीढ की हड्डी के कैंसर से पीड़ित थे। उनका अंतिम संस्कार आज सुबह 11 बजे दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकट CNG शवदाह गृह पर किया गया। Our beloved friend Sh Dharemendra Pal Singh, a senior journalist & former Sports Editor, Dainik Hindustan has passed away today morning, He was suffering from backbone cancer for the last few weeks. The last rites conducted at CNG crematorium Nigumbodh Ghat at 11 am today (June 6, 2017).

सौजन्य : फेसबुक

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वाराणसी में हिन्दुस्तान अखबार के वरिष्ठ छायाकार मंसूर आलम का निधन

वाराणसी से एक दुखद खबर आ रही है। यहां हिंदुस्तान अखबार के वरिष्ठ फोटोग्राफर मंसूर आलम का निधन आज सोमवार की सुबह हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे। सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सर सुन्दर लाल अस्पताल में भर्ती कराया गया। रविवार को मंसूर आलम की हालात एकदम से खराब हो गयी और उन्हें सघन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में ले जाने की जरूरत पड़ गयी लेकिन सघन चिकित्सा कक्ष उस समय खाली नहीं था और अंततः सोमवार की सुबह मंसूर आलम ने दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

उनके निधन से काशी के पत्रकारों और छायाकारों में शोक का माहौल है। सूत्र बताते हैं कि आर संजय जी और दूसरे मीडिया कर्मियों ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन से भी मदद मांगी मगर मंसूर आलम को कोई भी मदद काशी हिंदू विश्वविद्यालय प्रशासन से नहीं मिली। मीडियाकर्मियों ने उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री नीलकंठ से भी मदद मांगी मगर उनकी भी नहीं चली। हिंदुस्तान अखबार के वाराणसी संस्करण के संपादक पर भी लोग उंगलियां उठा रहे हैं जिन्होंने अपने फोटोग्राफर को न सिर्फ ढेर सारा तनाव देकर बीमार कर देने में बड़ी भूमिका निभाई बल्कि इलाज के दौरान अपने स्तर से कोई मदद नहीं की।

मंसूर आलम ने ‘आज’ समाचार पत्र के साथ-साथ सहारा में भी अपनी सेवाएं दी थीं। मंसूर आलम अपनी फोटोग्राफी और मधुर व्यवहार दोनों के लिए जाने जाते थे। वे कई फोटोग्राफरों के लिए अभिभावक की भूमिका में भी  रहे। उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। मंसूर आलम के निधन पर वाराणसी प्रेस क्लब के सचिव रंजीत गुप्ता ने गहरा दुख जताते हुए कहा है मंसूर भाई लाजवाब फोटोग्राफर के साथ साथ अच्छे दोस्त भी थे। उनके सहयोग से ही मैंने 90 वार्ड, शहर के पार्कों पर पहली बार स्टोरी किया था। यह पहली बार किसी अखबार में हुआ था। सहारा की इस स्टोरी के बाद काफी काम भी हुआ। मंसूर भाई का सहयोग नहीं मिलता तो यह स्टोरी नहीं कर पाता। मंसूर भाई का काशी के घाटों और काशी की संस्कृति से विशेष लगाव था। रंजीत गुप्ता ने यह भी जानकारी दी है कि 15 मई को एस. अतिबल छाया चित्र प्रतियोगिता में उनके साथ काम कर चुकी रेखा और मैने मंसूर आलम सम्मान पुरस्कार देने का निर्णय किया है.

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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जाने-माने फिल्म पत्रकार और अपने किस्म के अदभुत इंसान ब्रजेश्वर मदान नहीं रहे

Prabhat Ranjan : अचानक बहुत दुखी और अकेला महसूस कर रहा हूँ. आज मैंने अचानक वेबसाईट जानकीपुल.कॉम पर एक कमेन्ट देखा. कमेन्ट कल शाम का था. बस एक लाइन लिखी थी- brajeshwar madan is no more! कमेन्ट आदित्य मदान का था, जो उनका भतीजा है. पढ़कर सन्न रह गया. हालाँकि बरसों से उनसे कोई संपर्क नहीं था. आखिरी बार जब उनसे बात हुई थी तो लकवे के कारण उनके मुंह से आवाज नहीं निकल पा रही थी. उनको उस तरह से बोलते देख मैं इतना डर गया कि मैंने फिर कभी उनसे बात करने की कोशिश भी नहीं की. लेकिन मन में यह संतोष था कि वे जीवित हैं. लेकिन इस कमेन्ट को पढने के बाद वह जाता रहा.

(ये तस्वीरें कई बरस पहले मदान साहब की बीमारी के बाद स्वास्थ्य लाभ की है.)

उनके जाने से ज्यादा इस बात का दुःख है कि वे इस तरह से गए. फिल्मों पर उनके जैसा सम्मोहक लेखन करने वाला लेखक नहीं था. फिल्म लेखन के लिए सबसे पहले जिस हिंदी लेखक को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था वे ब्रजेश्वर मदान ही थे. उनकी कहानियों का भी अपना मिजाज था और 80 के दशक तक हर प्रमुख संचयन में उनकी कहानियां आती रहीं. धीरे धीरे वे खुद को भूलने लगे और हम हिंदी वाले उनको. मेरे उनके बीच इतना कुछ निजी था कि अब याद करने का भी मन नहीं कर रहा. बस इतना ही कि मेरे लेखक बनने में नेपथ्य से उनकी भूमिका बहुत बड़ी थी.

मुझे अपनी पहली कहानी ‘जानकी पुल’ के लिए ‘सहारा समय कथा सम्मान’ मिला था. सब यही समझते रहे कि उस ज्यूरी में मनोहर श्याम जोशी थे इसलिए मुझे वह पुरस्कार मिला. आज मैं इस सच को स्वीकार करना चाहता हूँ कि मदान साहब ने अपने बूते वह पुरस्कार मुझे दिलवाया था.
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कहीं भी हों आपको लगता है सर पर एक साया तो है. लेकिन अब मैं उम्र के उस दौर में पहुँच रहा हूँ जब सर से एक एक कर साये उठते जा रहे हैं.

अंतिम प्रणाम मदान साहब!

जानकीपुल डाट काम के संपादक प्रभात रंजन की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Gopeshwar Singh ब्रजेश्वर मदान की समीक्षाएं पढ़कर मैं बड़ा हुआ| वे जिसे अच्छा कहते, वही फिल्म मैं अपने छात्र जीवन में देखता था| उन्हें मेरी श्रधांजलि!

Urmilesh Urmil बेहद तकलीफ हुई सुनकर। मदान जी से अनेक मुलाकातें हैं, खासकर 1982-85के दौर में। प्रतिभाशाली लेखक को सलाम और श्रद्धांजलि।

Dayanand Pandey ब्रजेश्वर मदान सब के अजीज थे , उन के बहुत से मुरीद थे , मैं भी उन के मुरीदों में हूं । मेरी कहानियों पर उन्हों ने ख़ूब लिखा है । बाद के दिनों में उन्हों ने कवितायेँ भी ख़ूब लिखीं । अपनी पत्नी के निधन पर लिखी कविता में जिस तरह दो पल्लों वाले दरवाजे का रुपक उन्हों ने रचा है वह दुर्लभ है । उन की बहुत सी यादें मन में जीवित हैं । उन की कहानियां , उन की कविताएं , उन के फ़िल्मी लेख बहुत याद आते हैं । पर जो उन का सब से चटक रंग है , वह है उन के अनथक संघर्ष का । जैसे फ़िल्मी ग्लैमर में किसी एक्स्ट्रा का संघर्ष हो । हिंदी में उस कठिन समय में फ्रीलांसिंग करना पहाड़ तोड़ना ही था , अब भी है । पर वह यह पहाड़ बड़े मन से तोड़ते रहे । उन से 1981 में पहली बार दरियागंज , नई दिल्ली में मिलना हुआ था । फिर कुछ बरस पहले आख़िरी बार राष्ट्रीय सहारा , नोएडा कार्यालय में । उन के झूठ बोलने और उन के सच के तमाम कहे अनकहे किस्से हैं , जिन को अभी याद करने का कोई सबब नहीं है । उन का लेखन , उन की सरलता उन का बहुत कुछ ढक लेती है । उन का दुःख भी । नि:संतान होना उन का सब से बड़ा दुःख था । नया घर बनवाने के बाद पत्नी का जाना उन्हें बुरी तरह तोड़ गया था । तब दो पल्ले के दरवाजे में एक पल्ला चला गया था । अब दूसरा पल्ला भी चला गया । उन का जाना दुःख तो देता है पर उन्हें दुःख से , बीमारी से मुक्ति मिली , यह सोच कर संतोष भी होता है । विनम्र श्रद्धांजलि !

Sanjay Swatantra कहानी और फिल्म लेखन में एक ऐसा नाम, जो हमेशा याद किया जाएगा। मदान जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

Vir Vinod Chhabra सत्तर के दशक में जब कभी दिल्ली जाना होता था तो ब्रजेश्वर मदान से मुलाक़ात ज़रूर होती थी। तब वो चांदनी चौक के भागीरथ पैलेस से प्रकाशित होने वाली एक फ़िल्मी पत्रिका (नाम याद नहीं आ रहा है) में सहायक संपादक होते थे। इसके एडिटर राजकेसरी थे। हम उनसे शिकायत करते थे कि फलां मैगज़ीन वाला पारिश्रमिक नहीं दे रहा है। वो एक फ़ोन खटखटाते और हमें पैसे मिल जाते थे। बहुत बढ़िया किस्सा-गो, लेखक थे और उससे बड़े शानदार मानुस।
मुझे अत्यंत दुःख हुआ उनके निधन की खबर सुन कर।
अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि।

Vinod Anupam ओह, हिंदी फिल्म समीक्षा से परिचित कराने वाले थे,मदान साहब, उनके रहने का अहसास भर ताकत देता था, हार्दिक श्रद्धांजलि

Swapnil Srivastava उनसे एक दो मुलाकाते है। दिल्ली के हिंदी समाज ने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली और हम जैसे लोग दूर से उनके बारे में नहीं जान पाये। यह दुखद है।

Jai Narayan Prasad मैं भी ब्रजेश्वर मदान जी को अच्छी तरह जानता था। सिनेमा की समझ उनके लेखन से आई और बढ़ी थी। उनके जाने का अफसोस तो कभी न खत्म होने वाला अफसोस है। क्या उनके बाल-बच्चे नहीं है? आपके जवाब के इंतजार में?

Vimalendu Vimalendu बहुत दुखद खबर है। उनके अनेक आलेख पढ़े हैं। फिल्मों पर लिखने की समझ उन्हें पढ़ते हुए ही बनी है। नमन मदान साहब को।

Manoj Kumar दुखद | हम हिन्दी के पाठकों को ब्रजेश्वर मदन, विनोद भारद्वाज, प्रयाग शुक्ल जैसे लेखकों ने ही फ़िल्म पर होने वाले (और संभव) विमर्श से अवगत करवाया| श्रध्दांजलि |

Naresh Sharma It is really shocking news………despite my many efforts could not trace him……….Prabhat Ranjan…will connect you via mail box……

Astbhuja Shukla विस्मरण और कृतघ्नता हिन्दी में स्थायी भाव बन रहे हैं विनम्र श्रद्धांजलि

Pushp Ranjan ” मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती.”.
ग़ालिब ने इन शब्दों में ज़िन्दगी का फलसफा लिख डाला था.
ब्रजेश्वर मदान जी की मृत्यु, और उससे पहले उनके लकवाग्रस्त हो जाने वाली बात सचमुच उदास कर देने वाली है.

Mahendra Sharma दुखद। बहुत प्यारे इन्सान थे, मदान जी। उनकी स्मृति को नमन।

Vinit Utpal सर, आपने ही मुझे पहली बार राष्ट्रीय सहारा के ऑफिस में उनसे मिलवाया था. तब से उनका स्नेह बना रहा. नमन.

Rajeev Mittal मदान जी से मिलना नहीं हुआ कभी..पर लेखन से हमेशा परिचित रहा..दुःख यही है आज..कि ऐसे लोग चुपके से निकलते जा रहे हैं..

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xxx

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