इमेज बनाने में जुटे शिवराज की छवि का सरकारी विज्ञापन कहीं सत्यानाश तो नहीं कर रहे?

दिल्ली के हिन्दुस्तान टाइम्स में मध्य प्रदेश सरकार का दो पेज का विज्ञापन है। पहले और दूसरे पेज पर टाटा स्टील का विज्ञापन है जबकि तीसरे और चौथे पेज पर मध्य प्रदेश सरकार का यह विज्ञापन है। इस कारण अखबार का पहला पेज आज पांचवा (असल में सातवां) पेज है। जाहिर है अतिरिक्त पैसे देकर छपवाया गया है। Continue reading

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एचटी बिल्डिंग के सामने धरना देते हुए मरे मीडियाकर्मी का पुलिस ने लावारिस के रूप में किया अंतिम संस्कार

रविंद्र को नहीं मिल पाया अपनों का कंधा… साथियों का आरोप- HT प्रबंधन के दबाव में पुलिस ने लावारिस के रुप में किया अंतिम संस्‍कार… नई दिल्‍ली। 13 साल तक न्‍याय के लिए संघर्ष करने के बाद बुधवार की अंधेरी रात में मौत की आगोश में हमेशा-हमेशा के लिए सो जाने वाले हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के कर्मी रविंद्र ठाकुर को ना ही परिजनों का और ना ही अपने संघर्ष के दिनों के साथियों का कंधा मिल पाया। मंगलवार धनतेरस के दिन दिल्‍ली पुलिस ने उसकी पार्थिव देह का अं‍तिम संस्‍कार कर दिया। उसके अंतिम संस्‍कार के समय न तो उसके परिजन मौजूद थे और न ही उसके संस्‍थान के साथी।

रविंद्र ठाकुर के साथियों का आरोप है कि पुलिस ने हिंदुस्‍तान प्रबंधन के दबाव में जानबूझकर ऐसे दिन और समय का चुनाव किया कि जिससे कि हम उसके अंतिम संस्‍कार में पहुंच ही ना सके। उन्‍होंने बताया कि मंगलवार दोपहर को उन्‍हें दिल्‍ली पुलिस की तरफ से फोन आया कि रविंद्र के शव को अंतिम संस्‍कार के लिए सराय काले खां स्थित श्‍मशान घाट ले जाया जा रहा है। ये वो समय था जब वे दिल्‍ली हाईकोर्ट में थे और उनके केस की सुनवाई किसी भी समय शुरु हो सकती थी। जब तक हमारी सूचना पर दूसरे साथी श्‍मशान घाट पहुंचते तब तक पुलिस रविंद्र का अंतिम संस्‍कार करवा कर लौट चुकी थी।

उन्‍होंने बताया कि हम पुलिस से पहले दिन से ही मांग कर रह रहे थे कि यदि रविंद्र के परिजन नहीं मिल पाते हैं तो उसकी पार्थिव देह को हमें सौंप दिया जाए, जिससे उसका अंतिम संस्‍कार हम खुद कर सके। ऐसे में अचानक ऐसे समय में फोन आना जब हम हिंदुस्‍तान प्रबंधन से चल रही न्‍याय की लड़ाई से संबंधित एक केस के सिलसिले में कोर्ट में थे, दाल में कुछ काला है कि ओर संकेत करता है। पुलिस चाहती तो हमें समय रहते सूचित कर सकती थी, जबकि हम लगातार पुलिस के संपर्क में थे। उनका आरोप है कि पुलिस प्रबंधन पर दबाव बनाती तो रविंद्र के हिमाचल प्रदेश स्थित गांव का पता मिल जाता और आज उसके शव का लावारिस के रुप में अंतिम संस्‍कार नहीं होता। उन्‍होंने बताया कि इससे हम सकते में है। हमें ऐसी कतई उम्‍मीद नहीं थी कि बिड़ला जी के आदर्शों पर खड़ा यह मीडिया ग्रुप अपने एक कर्मचारी की मौत के बाद भी उसके परिजनों को उसके अंतिम संस्‍कार से महरुम रखने में अपनी ताकत का बेजा इस्‍तेमाल करेगा।

2004 में रविंद्र ठाकुर को हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने लगभग 400 अन्‍य कर्मियों के साथ निकाल दिया था। कड़कड़डूमा कोर्ट से जीतने के बावजूद भी ये कर्मी अभी तक सड़क पर ही हैं और अपनी वापसी के लिए अभी भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। रविंद्र कस्‍तूरबा गांधी स्थित हिंदुस्‍तान टाइम्‍स की बिल्डिंग के बाहर ही रात को सोता था, जहां वह और उसके साथी अपने हक के लिए आंदोलन करते थे। बुधवार रात उसी धरनास्‍थल पर उसका निधन हो गया। समय के थपेड़ों ने रविंद्र को अंर्तमुर्खी बना दिया था। जिस वजह से वह अपने साथियों से अपने परिजनों के बारे में कुछ बात नहीं करता था।

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…xxx xxx

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ब्रेकिंग न्यूज़ लिखते-लिखते जब हम खुद ही ब्रेक हो गए…

Ashwini Sharma :  ”ब्रेकिंग न्यूज़ लिखते लिखते जब हम खुद ही ब्रेक हो गए…, अपनों ने झाड़ा पल्ला जो बनते थे ख़ुदा वो भी किनारे हो गए..” साल 2005 में मुंबई इन टाइम न्यूज़ चैनल के बंद होने के बाद मैंने ये पंक्तियां लिखी थीं..तब मेरे साथ इन टाइम के बहुत से पत्रकार बेरोज़गार हुए थे..कुछ को तो नौकरी मिल गई लेकिन कुछ बदहाली के दौर में पहुंच गए..वैसे ये कोई नई बात नहीं है कई चैनल अखबार बड़े बड़े दावों के साथ बाज़ार में उतरते हैं..बातें बड़ी बड़ी होती हैं लेकिन अचानक गाड़ी पटरी से उतर जाती है..जो लोग साथ चल रहे होते हैं वो अचानक मुंह मोड़ लेते हैं..जो नेता अफसर कैमरा और माइक देखकर आपकी तरफ लपकते थे वो भी दूरी बना लेते हैं..

कई बार तो अपनों को भी मुंह मोड़ते देखा है..आज मैं ये सब इसलिए लिख रहा हूं..क्योंकि कुछ दिन पहले ही देश के नामचीन अखबार हिंदूस्तान टाइम्स अखबार की ऑफिस के सामने ही एक पत्रकार ने तड़पते तड़पते दम तोड़ दिया..तेरह साल पहले चार सौ लोगों को नैतिकता की बात करने वाले अखबार ने एक झटके में निकाल दिया था..वो तेरह साल से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहा था..मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता..आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर वो ज़िंदा था..

कोर्ट कचहरी मंत्रालय सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में होने के बाद भी सब आंखों में पट्टी बांधे थे..सो आखिरकार उस कमजोर हो चुके इंसान ने एचटी के ऑफिस के सामने ही दम तोड़ दिया..मैं यही कहूंगा कि ये घटना उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो किसी न किसी मीडिया हाउस में तैनात हैं..मेरा मानना है कि हालात अच्छे भी हो तो मुगालता नहीं पालना चाहिए और हो सके किसी असहाय भाई की मदद अवश्य करें..

‘भारत समाचार’ चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत टीवी पत्रकार अश्विनी शर्मा की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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निष्ठुर एचटी प्रबंधन ने नहीं दिया मृतक मीडियाकर्मी के परिजनों का पता, अब कौन देगा कंधा!

नई दिल्ली। अपने धरनारत कर्मी की मौत के बाद भी निष्ठुर हिन्दुस्तान प्रबंधन का दिल नहीं पिघला और उसने दिल्ली पुलिस को मृतक रविन्द्र ठाकुर के परिजनों के गांव का पता नहीं दिया। इससे रविन्द्र को अपनों का कंधा मिलने की उम्मीद धूमिल होती नजर आ रही है।

न्याय के लिए संघर्षरत रविन्द्र के साथियों का आरोप है कि संस्थान के गेट के बाहर ही आंदोलनरत अपने एक कर्मी की मौत से भी प्रबंधन का दिल नहीं पसीजा और उसने प्रेस परिसर में शुक्रवार को आई दिल्ली पुलिस को रविन्द्र के गांव का पता मुहैया नहीं कराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रबंधन के पास रविन्द्र का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, उसने जानबूझकर बाराखंभा पुलिस को एड्रेस नहीं दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए भर्ती होने वाले कर्मी का HR पूरा रिकॉर्ड रखता है। उस रिकॉर्ड में कर्मी का स्थायी पता यानि गांव का पता भी सौ प्रतिशत दर्ज किया जाता है। रविन्द्र के पिता रंगीला सिंह भी हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से 1992 में सेवानिवृत्त हुए थे। ऐसे में उनके गांव का पता न होने का तर्क बेमानी है। रंगीला सिंह भी इसी संस्थान में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत थे, जबकि रविन्द्र डिस्पैच में।

रविन्द्र के साथियों ने बताया कि रविन्द्र अपने बारे में किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। बस इतना ही पता है कि वह हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले का रहनेवाला है और उसका घर पंजाब सीमा पर पड़ता है। वह दिल्ली में अपने पिता, भाई-भाभी आदि के साथ 118/1, सराय रोहिल्ला, कच्चा मोतीबाग में रहता था। कई साल पहले उसका परिवार उस मकान को बेचकर कहीं और शिफ्ट हो गया था। रविन्द्र की मौत के बाद जब उनके पड़ोसियों से संपर्क किया तो वे उनके परिजनों के बारे में कुछ भी नहीं बता पाए। उनका कहना था कि वे कहां शिफ्ट हुए, उसकी जानकारी उन्हें भी नहीं है। रविन्द्र के परिजनों ने शिफ्ट होने के बाद से आज तक उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। रविन्द्र के संघर्षरत साथियों का कहना है प्रबंधन के असहयोग के चलते कहीं हमारा साथी अंतिम समय में अपने परिजनों के कंधों से महरूम ना हो जाए।

उन्होंने देश के सभी न्यायप्रिय और जागरूक नागरिको से रविन्द्र के परिजनों का पता लगाने के लिए इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर और फारवर्ड करने की अपील की। उनका कहना है कि अखबार कर्मी के दुःखदर्द को कोई भी मीडिया हाउस जगह नहीँ देता, ऐसे में देश की जनता ही उनकी उम्मीद और सहारा है। यदि किसी को भी रविन्द्र के परिजनों के बारे कुछ भी जानकारी मिले तो उनके इन साथियों को सूचना देने का कष्ट करें…
अखिलेश राय – 9873892581
महेश राय – 9213760508
आरएस नेगी – 9990886337

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

मूल खबर…

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एचटी बिल्डिंग के सामने सिर्फ एक मीडियाकर्मी नहीं मरा, मर गया लोकतंत्र और मर गए इसके सारे खंभे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : शर्म मगर इस देश के मीडिया मालिकों, नेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को बिलकुल नहीं आती… ये जो शख्स लेटा हुआ है.. असल में मरा पड़ा है.. एक मीडियाकर्मी है… एचटी ग्रुप से तेरह साल पहले चार सौ लोग निकाले गए थे… उसमें से एक ये भी है… एचटी के आफिस के सामने तेरह साल से धरना दे रहा था.. मिलता तो खा लेता.. न मिले तो भूखे सो जाता… आसपास के दुकानदारों और कुछ जानने वालों के रहमोकरम पर था.. कोर्ट कचहरी मंत्रालय सरोकार दुकान पुलिस सत्ता मीडिया सब कुछ दिल्ली में है.. पर सब अंधे हैं… सब बेशर्म हैं… आंख पर काला कपड़ा बांधे हैं…

ये शख्स सोया तो सुबह उठ न पाया.. करते रहिए न्याय… बनाते रहिए लोकतंत्र का चोखा… बकते बजाते रहिए सरोकार और संवेदना की पिपहिरी… हम सब के लिए शर्म का दिन है… खासकर मुझे अफसोस है.. अंदर एक हूक सी उठ रही है… क्यों न कभी इनके धरने पर गया… क्यों न कभी इनकी मदद की… ओफ्ह…. शर्मनाक… मुझे खुद पर घिन आ रही है… दूसरों को क्या कहूं… हिमाचल प्रदेश के रवींद्र ठाकुर की ये मौत दरअसल लोकतंत्र की मौत है.. लोकतंत्र के सारे खंभों-स्तंभों की मौत है… किसी से कोई उम्मीद न करने का दौर है.. पढ़िए डिटेल न्यूज : Ek MediaKarmi ki Maut

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :

Devender Dangi : 13 साल से संघर्षरत पत्रकार रविन्द्र ठाकुर की मौत नही हुई। उनकी हत्या हुई है। हत्या हुई है लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की। हत्यारे भी कोई गैर नहीं। हत्यारे वे लोग हैं जिन्होंने एक मीडियाकर्मी को इस हालत में ला दिया। करोड़ों अरबों के टर्नओवर वाले मीडिया हाउस मालिकों या खुद को नेता कहने वाले सफेदपोश लोगों को शायद अब भी तनिक शर्म नही आई होगी। निंदनीय। बेहद निंदनीय…

Amit Chauhan : बनते रहो शोषित वर्ग के ठेकेदार..करते रहो सबको न्याय दिलाने के फर्जी दावे..तुम पत्रकार काहे के चौथे स्तम्भ.. जब अपने ऊपर हुई अत्याचार की भी आवाज ना बन पाओ..शर्म आती है तुमपर की तुम खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मानते कहते हो…

Anand Pandey : आज फिर मैं पहले की तरह एक ही बात कहूंगा कि इस देश में मीडिया ने जितनी बड़ी भूमिका राजनीतिक या प्रशासनिक सफाई में लगाई है, उसका आधा भी अगर अपने अंदर की सफाई में लगती तो यह घटना नहीं होती.….

Kamal Sharma : न मीडिया मालिकों को शर्म और न ही सरकार को..विकास गया भाड़ में।

Sanjaya Kumar Singh वाकई, यह दौर किसी से उम्मीद नहीं करने का है। कोई क्या कर पाएगा और 13 साल तक कहां कर पाएगा और किसी ने कुछ किया होता तो ये आज नहीं कल मर जाते। करना तो सभी चारो स्तंभों को है उसके बाद समाज का आपका हमारा नंबर आएगा। उसके बिना हम आप अफसोस ही कर सकते हैं।

Dev Nath शर्म उनको मगर नहीं आती। जिस देश में पलक झपटते ही करोड़ो के वारे न्यारे हो जाते हों, जहां टीबी पर बैठकर संवेदनशीलता पर लेक्चर देते हों, जहां देश की न्यायपालिका हो, जहां सत्ता का सबसे बड़ा प्रतिष्ठान हो , जहां न्याय पाने की संभावना बहुत ज्यादा हो वहां अगर कोई इस तरह तिल तिल कर मर जाता हो तो हमें खुद पर और सिस्टम पर धिक्कार है.. Sad

Dhananjay Singh जबकि बिड़ला जी बहुत दयालु माने जाते थे और शोभना मैडम इन्नोवेटिव हैं। शर्मनाक

Ravi Prakash सीख… “कैरियर के लिहाज से मीडिया सबसे असुरक्षित क्षेत्र है। हाँ शौकिया हैं तो ठीक है, पर पूर्णकालिक और पूर्णतया निर्भर होना खतरनाक है।”

Sumit Srivastava Pranay roy nhi tha na ye nhi toh press club wale kab ka dharna dene lagte n na janekitni baar screen kali ho gyi hoti…

Vivek Awasthi कोर्ट भी सत्ता और अमीर लोगों की रखैल बनकर रह गया। न्याय के लिये किस पर भरोसा किया जाए।

Kamal Shrivastava अत्यंत शर्मनाक और दुखद…

Rajinder Dhawan एक दिन में करोड़ों कमाने वालों ने कर दी एक और हत्या।

Mystique Angel loktantra kaisa loktantra ….sb kuch fix hota h….kuchh bhi fair nhi hota…

Prakash Saxena लोकतंत्र तो कब का मरा है, ये सिस्टम उसी की लाश पर खड़ा है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है।

Satish Rai दुःखद परंतु वास्तविकता यही है।।।

Pradeep Srivastav हे ईश्वर, यह सब भी देखना था।

Pankaj Kharbanda अंधी पीस रही है, कुते खा रहे हैं

Rakesh Punj बहुत शर्मनाक सच

Bhanu Prakash Singh बहुत ही दुखद…..

Yashwant Singh Bhandari मेरी नजर खराब हो गयी है या लोग ही इस तरह के हो गए है?

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बॉबी घोष के जाने के बाद सुकुमार रंगनाथन बनाए गए एचटी के नए एडिटर इन चीफ

बॉबी घोष के हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार से अलग हो जाने के बाद सुकुमार रंगनाथन को नया एडिटर इन चीफ बनाया गया है. एस रंगनाथन अब तक इसी समूह के बिजनेस अखबार ‘मिंट’ के एडिटर के रूप में कार्य कर रहे थे. चेयरपर्सन शोभना भरतिया ने एक मेल के जरिए इसकी जानकारी सभी एचटी कर्मियों को दी. मेल में कहा गया है कि हिन्दुस्तान टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ के रूप में 48 वर्षीय सुकुमार रंगनाथन की नियुक्ति की गई है और वह एचटी के सभी प्रिंट व डिजिटल ऑपरेशंस की जिम्मेदारी संभालेंगे. मिंट से पहले रंगनाथन बिज़नेस टुडे मैग्जीन के मैनेजिंग एडिटर थे.

शोभना भरतिया का आंतरिक ई-मेल इस प्रकार है–

Dear Colleagues,

I am delighted to announce the appointment of Sukumar Ranganathan, 48, as the Editor-in-chief of Hindustan Times. He will oversee all the print and digital operations of HT and report to me.

Sukumar, who has post graduate degrees in Mathematics and Business Administration and has a graduate degree in Chemical Engineering, has been Editor of Mint, of which he was a co-founder, since late 2008. In his time as editor, Mint has become the most respected and awarded newsroom in the country, winning seven Society of Publishers of Asia awards, and 10 Ramnath Goenka awards. He joined HT Media in 2006 as part of the founding team of Mint. He has previously worked at the India Today Group and The Hindu Business Line.

Sukumar will also take over the leadership of the HT digital newsroom on 23 October.

Bobby, who has, in the short span of 14 months, managed to transform the HT digital newsroom into a truly integrated one, producing high-quality content, will be with the company till 31 October.

The company will shortly make an announcement on the editorial leadership of Mint.

Regards

Shobhana Bhartia

Chairperson and Group Editorial Director

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बहुत बड़े ‘खिलाड़ी’ शशि शेखर को पत्रकार नवीन कुमार ने दिखाया भरपूर आइना! (पढ़िए पत्र)

आदरणीय शशि शेखर जी,

नमस्कार,

बहुत तकलीफ के साथ यह पत्र लिख रहा हूं। पता नहीं यह आपतक पहुंचेगा या नहीं। पहुंचेगा तो तवज्जो देंगे या नहीं। बड़े संपादक तुच्छ बातों को महत्त्व नहीं दे। तब भी लिख रहा हूं क्योंकि यह वर्ग सत्ता का नहीं विचार सत्ता का प्रश्न है। एक जिम्मेदार पाठक के तौर पर यह लिखना मेरा दायित्व है। जब संपादक अपने अखबारों को डेरे में बदलने लगें और तथ्यों के साथ डेरा प्रमुख की तरह खेलने लगें तो पत्रकारिता की हालत पंचकुला जैसी हो जाती है और पाठक प्रमुख के पालित सेवादारों के पैरों के नीचे पड़ा होता है।

कल का आपका अखबार पढ़ा। जिसके आप प्रधान संपादक हैं। रविवासरीय हिंदुस्तान। कई अखबार लेता हूं लेकिन एक आदत सी है कि हिंदी के अखबार सबसे पहले पढ़ता हूं। पहली लीड थी – बाबा के बॉडीगार्ड की गोली से भड़की हिंसा, छह पुलिसकर्मी और दो निजी सुरक्षाकर्मियों पर देशद्रोह का केस। मुझे अजीब लगा। एक दिन पहले खट्टर सरकार के ठप पड़ जाने की सारी तस्वीरें पूरा देश देख चुका था। साफ था कि हिंसा भड़की नहीं हैं भड़कने दी गई है। खबर से ऐसा लगा कि अखबार ने सरकार को साफ बचा लेने की नीयत से पूरी खबर लिखी है। कई घटनाएं ऐसी होती हैं संपादक जी, जो संपादकीय विश्वसनीयता के चीथड़े उड़ाकर रख देती हैं। 32 हत्याओं और 200 से ज्यादा घायलों पर एक अखबार सत्य को जब परास्त करने की कोशिश करता है तो तथ्य की लाश पहले ही बिछ जाती है। लेकिन अब यह इतना साधारण सिद्धांत नहीं रहा।

मैंने फिर बाकी के अखबार पढ़े। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदू, नवभारत टाइम्स, भास्कर और आप ही के अखबार का सहोदर हिंदुस्तान टाइम्स। पढ़कर एक अजीब सी विरक्ति से मन उचट गया। एक तो खबरें ऐसी थी और दूसरे मैंने अपने प्रिय अखबार को सत्ता के तल्ले के नीचे कराहते देखा था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा था – “प्रधानमंत्री देश के प्रधानमंत्री हैं, बीजेपी के नहीं। कुछ जिम्मेदारी उनकी भी बनती है।” आपने कभी सुना है किसी अदालत ने किसी प्रधानंत्री पर ऐसा अविश्वास जताया हो? उसकी जवाबदेही को ऐसे चिन्हित किया हो? उसकी क्षमताओं को लेकर इस कदर आहत महसूस किया हो? अपने सीने पर हाथ रखकर खुद से पूछिए शशि जी आपने कभी सुना है ऐसा कि अदालत को याद दिलाना पड़े आप देश के प्रधानमंत्री हैं पार्टी के नहीं? सुना है तो इस पत्र को यहीं स्थगित समझें और नहीं तो एक पाठक की तकलीफ को समझने की कोशिश करें। सारे अखबारों को लगा कि यह खबर है सिवाए दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स के। आपके निबंध दोनों ही अखबारों में छपते रहते हैं। फिलहाल सिर्फ दैनिक हिंदुस्तान की बात क्योंकि पहली भाषा हिंदी होने के कारण उससे जुड़ाव ज्यादा है।

मुझे लगा कि अंदर के पन्ने में कहीं छोटी सी खबर होगी जरूर। इतनी महत्त्वपूर्ण खबर को 30 पन्ने के अखबार से उड़ाने के लिए जिगर चाहिए। कोई संपादक इतना निर्लज्ज और निष्ठुर नहीं हो सकता कि वो प्रधानमंत्री को पार्टी का प्रधानमंत्री कहे जाने पर एक भी कॉलम की जगह न दे। और सच में आप साहसी निकले। आपने सच में प्रधानमंत्री पर अदालत की टिप्पणियों को पाठकों की नजर से बचा लिया था। फिर मुझे हंसी आ गई। टिटिहरी के बारे में छात्र जीवन के किस्से की याद आ गई। आपने भी सुना होगा। टिटिहरी जब सोती है तो पैरों को आसमान की तरफ उठाकर रखती है। उसे लगता है कि आसमान को उसी ने थाम रखा है नहीं तो वो गिर जाएगा और सृष्टि खत्म हो जाएगी।

आपके मन में कहीं न कहीं ये जरूर रहा होगा कि अगर हिंदुस्तान खबर उड़ा देगा तो किसी को पता नहीं चलेगा और शहंशाह की नजरों में आपका नंबर बढ़ जाएगा। हर गुनहगार को चोरी करते हुए यही लगता है। वो चाहे शहर का चोर हो या खबर का। नंबर बढ़ने वाली बात इसलिए कहनी पड़ रही है कि चौदहवें पन्ने पर ही सही आपने मुख्यमंत्री खट्टर पर अदालत की टिप्पणियों को तो जगह दी है लेकिन उसी टिप्पणी में नत्थी प्रधानमंत्री के गिरेबान को साफ बचा लिया है। इसलिए आप इस छूट के पात्र नहीं हैं कि रिपोर्टर ने खबर छोड़ दी या डेस्क वाले से भूल हो गई है। वैसे भी अदालत की खबर आपने एजेंसी से ली है और एजेंसी ने पूरी खबर दी थी। वैसे भी प्रधानमंत्री पर इतनी बड़ी टिप्पणी को ड्रॉप करने का फैसला प्रधान संपादक से नीचे का मुलाजिम नहीं ले सकता।

आप तो जादूगर निकले शशि जी। सधा हुआ मंतरमार। हमने देखा है कि जादूगर नजरों के सामने से ताजमहल गायब कर देता है। कुतुबमीनार गायब कर देता है। और तो और हंसता-खेलता बच्चा गायब कर देता है। आप खबर गायब कर देते हैं। लेकिन पत्रकारिता के इस अपराध को जादू करना एक और अपराध हो जाएगा। इसे होशियारी कहते हैं। लेकिन हर जादू के बाद का सच ये है कि मतिभ्रम स्थायी नहीं होता। सूचना के अतिरेक और रफ्तार के दौर में यह मान लेना ही विचित्र लगता है कि अगर वो तथ्य को छिपा ले जाएगा तो वह जनता तक नहीं पहुंचेगा। मैंने जानबूझकर जनता शब्द का इस्तेमाल किया है पाठक का नहीं। क्योंकि इस फूहड़ मजाक के जरिए आपने एक खास प्रजाति की राजनीति की अनुयायी जनता को ही संबोधित किया था वर्ना पाठकों के विश्वास की फिक्र किसी को इस कदर बेईमान हो जाने की छूट नहीं देती।

जब मुझे लोग बताते थे कि आज का संपादक रहते हुए बाबरी मस्जिद को गिराने के समय आज अखबार में कैसे-कैसे जादू किए थे तो लगता था आप कच्चे रहे होंगे। तजुर्बे के अभाव में आपके भीतर का सवर्ण हिंदू फुफकार मार उठा होगा। लेकिन अब लगता है कि आप कच्चे नहीं मंजे हुए थे। आप तो बरसों से अपनी लाइन पर चल रहे हैं। वो तो हम हैं जो अभी भी अखबार को अखबार और संपादक को संपादक माने बैठे हैं। प्रधानमंत्री पर पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की टिप्पणी को गोल करके मेरे जैसे लाखों पाठकों की बची-खुची धारणाओं को ध्वस्त कर दिया है।

एक अखबार का खाप में बदल जाना खराब लगता है शशि जी। इससे भी खराब लगता है किसी संपादक का उस खाप का नंबरदार बन जाना। हम सब सत्य के साथ खड़े रहने के साहस के दुर्भिक्ष के दौर में जी रहे हैं। ऐसे में एक और संपादक का बेपर्दा हो जाना हमारी तरह के आशावादी लोगों के लिए एक और सदमा है। इस अपराध के लिए पाठकों से माफी मांगकर आप इस विश्वास की रक्षा कर सकते हैं लेकिन क्या एक बड़े अखबार का संपादक होने का दंभ और प्रधानमंत्री की नजरों से उतार दिए जाने का भय आपको ऐसा करने देगा?

आज से दैनिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स बंद कर रहा हूं। जानता हूं कि लाखों प्रतियों के प्रसार से एक प्रति का कम हो जाना राई बराबर भी महत्त्व नहीं रखता लेकिन पत्रकारिता के खापों को अपने ड्राइंग रूम में जानते-बूझते सजाकर रख भी तो नहीं सकता। सवाल केवल राम रहीम के डेरे का नहीं है। पत्रकारिता के डेरों और खापों का भी है। अफसोस, राम रहीम के डेरे के आतंक ने 32 नहीं 33 लाशें गिराई हैं। 33वीं लाश का नाम ‘हिंदुस्तान’ है।

आपका,

एक सुधी पाठक

नवीन कुमार

लेखक नवीन कुमार आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.

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हिन्दुस्तान का सालाना सकल राजस्व 1294 करोड़, फिर भी छठी कैटेगिरी

हिन्दुस्तान समाचार पत्र लगातार झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा है। हिन्दुस्तान ने मजीठिया का लाभ देने से बचने के लिए अपने को गलत व मनमाने तरीके से 6वीं कैटेगिरी में दर्शाया है जबकि ये अखबार नंबर वन कैटेगिरी में आता है। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के संबंध में भारत सरकार से जारी गजट के पृष्ठ संख्या 11 पर खंड 2 के उपखंड (क) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान की विभिन्न इकाइयों/शाखाओं/कंपनियों को समाचार पत्र की एकल इकाई ही माना जाएगा, चाहे उनके नाम अलग-अलग ही क्यों न हों।

इसके बावजूद हिन्दुस्तान अखबार कंपनी का Classification गलत व मनमाने तरीके से अपने आप करने Lower कैटेगिरी में दर्शा रहा है। उदाहरण के तौर पर हिन्दुस्तान की बरेली यूनिट 10 अक्टूबर 2009 को खुली। मजीठिया मामले में कंपनी केवल अपनी इसी यूनिट के राजस्व के आधार पर कैटेगिरी निर्धारित कर रही है। यानि वर्ष  2008-09 का 72 लाख, वर्ष 2009-10 का 2.72 करोड़ सकल राजस्व दर्शा रही है।

जबकि हिन्दुस्तान अखबार की मदर संस्था एचटी मीडिया लिमिटेड के वर्ष 2007-08, वर्ष 2008-09 व वर्ष 2009-10 के सकल राजस्व के औसत राजस्व से हिन्दुस्तान समाचर पत्र की कैटेगिरी तय होगी। एचटी मीडिया लिमिटेड ने FORM 23 ACA जो प्रत्येक वर्ष दाखिल किया है, उसमें वर्ष 2007-08 का 1226 करोड़ 91 लाख 84 हजार, वर्ष 2008-09 का 1355 करोड़ 77 लाख 17 हजार, वर्ष 2009-10 का 1299 करोड़ 11 लाख 60 हजार सकल राजस्व प्राफिट एंड लॉस एकाउंट में दर्शाया है। इस आधार पर कंपनी का सकल राजस्व 1294 करोड़ 60 लाख 20 हजार 333 रुपये होता है। कंपनी नंबर वन कैटेगिरी में आती है।

मजीठिया देने से बचने के लिए हिन्दुस्तान अखबार को अपने को अमर उजाला से एक पायदान नीचे 6वीं कैटेगिरी का बताने में भी कोई शर्मिंदगी नहीं है। अमर उजाला भी अपनी सभी यूनिटें अलग-अलग कंपनी की दर्शाकर 5वीं कैटेगिरी में दर्शाकर कर्मचारियों के हकों पर डाका डालने पर आमादा है।

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में ‘हिंदुस्तान’ अखबार को क्लीनचिट देने वाली शालिनी प्रसाद की झूठी रिपोर्ट देखें

यूपी में अखिलेश यादव सरकार के दौरान श्रम विभाग ने झूठी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एचटी मीडिया और एचएमवीएल कंपनी यूपी में अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ की सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रही है. श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है.

इसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है. रिपोर्ट में बताया गयाहै कि यूपी में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं जिनमें 955 कर्मचारी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 कर्मचारी हैं. यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है. रिपोर्ट नीचे दिया जा रहा है. पढ़ने के लिए संबंधित स्क्रीनशाट पर क्लिक करें दें…











पूरे मामले को समझने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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महाभ्रष्टाचारी अरुण मिश्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स की मालकिन शोभना भरतिया को भेज दिया लीगल नोटिस!

उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कारपोरेशन (यूपीएसआईडीसी) के विवादित चीफ इंजीनियर अरुण मिश्रा ने हिंदुस्तान टाइम्स अखबार को लीगल नोटिस भेज दिया है. हिंदुस्तान टाइम्स में कानपुर डेटलाइन से रिपोर्टर हैदर नकवी ने एक रिपोर्ट छापी कि कैसे एक लाख रुपये महीने तनख्वाह पाने वाला एक बाबू (यानि अरुण मिश्रा) देश के शीर्षस्थ वकीलों को अपना मुकदमा लड़ने के लिए हायर करने की क्षमता रखता है. ये शीर्षस्थ वकील हैं सोली सोराबजी, हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी और अन्य.

एचटी में प्रकाशित खबर का शीर्षक यूं है : ”UP babu accused of corruption has Rs 1L pay, hires top lawyers Rohatgi, Sorabjee”

ज्ञात हो कि अरुण मिश्रा को सीबीआई ने 2011 में गिरफ्तार किया था. उस पर 65 से ज्यादा फर्जी बैंक एकाउंट संचालित करने का आरोप था. ऐसा माना जा रहा है कि उसने ब्लैक मनी को ह्वाइट करने के मकसद से विभिन्न शहरों के कई बैंकों में फर्जी बैंक एकाउंट खुलवा रखे थे. आय से अधिक संपत्ति के आरोपी अरुण मिश्रा जब तनख्वाह ही महीने का एक लाख रुपये पाता है तो वह कैसे इतने महंगे वकीलों को फीस देता होगा. इन वकीलों के बारे में सब जानते हैं कि ये एक एक सुनवाई के दौरान उपस्थित होने के लाखों रुपये लेते हैं.  अरुण मिश्रा के खिलाफ ढेर सारे केस हाई कोर्ट और सु्पीम कोर्ट में चल रहे हैं.

अरुण मिश्रा अपने को बचाने के लिए इन टाप वकीलों की सेवाएं ले रहा है. लेकिन इस सेवा लेने से एक सवाल खड़ा हो गया है कि वह इन्हें पैसा कहां से देता होगा? क्या अरुण मिश्रा से केंद्रीय एजेंसियों को यह नहीं पूछना चाहिए कि आखिर वह इतने बड़े बड़े वकीलों को प्रत्येक पेशी पर लाखों रुपये कहां से देता है? ज्ञात हो कि 2011 में सीबीआई ने अरुण मिश्रा को दिल्ली के पृथ्वीराज रोड और देहरादून में संपत्तियों को जब्त किया था. पृथ्वीराज रोड वाली लुटियन जोन इलाके की अकेली प्रापर्टी की कीमत करीब 300 करोड़ रुपये से ज्यादा है. ऐसे में यह समझा जा सकता है कि यह महाभ्रष्टाचारी अरुण मिश्रा कहां से अपने टाप लेवल के वकीलों को फीस देता होगा. पहले हिंदुस्तान टाइम्स में छपी पूरी खबर पढ़िए… उसके ठीक बाद अरुण मिश्रा द्वारा अखबार को भेजे गए लीगल नोटिस को बांचिए…


एचटी में छपी मूल खबर….

UP babu accused of corruption has Rs 1L pay, hires top lawyers Rohatgi, Sorabjee

A bevy of legal luminaries have appeared multiple times in the Supreme Court and the Allahabad high court individually over the past three years to defend Arun Mishra, chief engineer with the UPSIDC.

Haidar Naqvi

Kanpur, Hindustan Times

What do India’s top lawyers — Soli Sorabjee, Harish Salve, Mukul Rohatgi and others — have in common? They have all defended a mid-level bureaucrat in Uttar Pradesh who is accused of amassing disproportionate assets worth crores and running scores of fake bank accounts.

A bevy of legal luminaries have appeared multiple times in the Supreme Court and the Allahabad high court individually over the past three years to defend Arun Mishra, chief engineer with the UP State Industrial Development Corporation (UPSIDC).

The unusual part — Mishra draws a monthly salary of just over Rs 1 lakh while it is understood that the lawyers often charge a fee ranging between five and twenty lakh per day. Despite repeated attempts, Mishra was not available for comment. A peon at his office said he wasn’t available and it wasn’t clear when he would arrive. The CBI arrested him in 2011 for allegedly operating 65 fake bank accounts with the Punjab National Bank, Dehradun, where he is supposed to have parked black money.

In 2011 also, the Enforcement Directorate (ED) seized his properties on Prithviraj Road in Delhi’s Lutyens Zone, and Dehradun. The Prithviraj Road property, apparently bought in the name of a company called Ajanta Merchants, where his wife and father are listed as directors, is alone worth an estimated Rs 300 crore.

Among his other alleged properties the ED is investigating, are 60 acres of land in UPSIDC Industrial Park on Kursi Road in Barabanki and the Asia School of Engineering and Management on another 52 acres of land. Court records show he and his family have two palatial houses in upscale Gomti Nagar of Lucknow, five properties in Dehradun and 100 acres of land in Barabanki. After the CBI investigation into the Dehradun fake accounts case, the SIT filed an FIR against Mishra over his alleged disproportionate assets in 2011 and the probe is ongoing.

The bureaucrat also faced charges in the 2007 Tronica City scam in Ghaziabad, where officers allegedly gave away more than 400 plots at throwaway prices. Mishra had joined UPSIDC as assistant engineer in 1986 and became chief engineer in 2002 — superseding many others — at a time he held the coveted charge of managing director of the corporation.

In the high court, he was defended by Shanti Bhushan, who apparently would fly down to Allahabad whenever there was a hearing, sources said. Soli Sorabjee, Harish Salve, Abhishek Manu Singhvi, Gopal Subramaniam, Nageshwar Rao, Shanti Bhushan argued against his dismissal, at different stages, in the Supreme Court, which stayed the high court’s order. Mishra rejoined as UPSIDC chief engineer within a month, in September 2014.

Rohatgi, now the country’s attorney general, appeared for Mishra in the SC in the case related to the CBI probe against him. In 2016 Mishra was deprived of his powers as UPSIDC chief engineer and was restricted to oversee development work in nine revenue divisions. He then hired Kapil Sibal to fight his case in the SC.

Salman Khurshid appeared for Mishra in the SC in a case wherein the Allahabad HC had passed different orders relating to his alleged forged mark sheets and engineering degrees.

TAINTED TRACK RECORD

-Arun Mishra, chief engineer with the UP State Industrial Development Corporation, was arrested by the CBI in 2011 for allegedly operating 65 fake bank accounts with the Punjab National Bank, Dehradun, where he is supposed to have parked black money.

-The same year, the Enforcement Directorate seized his properties on Prithviraj Road in Delhi’s Lutyens Zone and Dehradun.

-After the CBI investigation into the Dehradun fake accounts case, the SIT filed an FIR against Mishra over his alleged disproportionate assets in 2011 and the probe is ongoing. The bureaucrat also faced charges in the 2007 Tronica City scam in Ghaziabad where officers allegedly gave away more than 400 plots at throwaway prices.

-In August 2014, Mishra was dismissed from UPSIDC on the orders of Allahabad high court for getting his job on forged degrees. But he moved the Supreme Court challenging the high court’s decision.


अरुण मिश्रा की तरफ से एचटी की मालकिन शोभना भरतिया को संबोधित कर भेजा गया लीगल नोटिस यूं है….

Dated May 13th 2017

Ms Shobhana Bhartia

Chairperson Editorial Director

HT Media Limited

Hindustand Times House

18-20, Kasturba Gandhi Marg

New Delhi 110001, India


अरुण मिश्र की पूरी कुंडली जानने पहचानने के लिए नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें :

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हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर राज्यसभा में भी गूंजी

शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले अखबार हिन्दुस्तान टाईम्स के रिलायंस के मुकेश अंबानी द्वारा खरीदे जाने का मुद्दा बुधवार को राज्यसभा में भी गूंजा। हालांकि अभी तक हिन्दुस्तान टाईम्स के बिकने की खबर पर न तो हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन ने अपना पक्ष रख रहा है और ना ही रिलायंस की ओर से आधिकारिक बयान आया है।

बुधवार को राज्यसभा में जदयू नेता शरद यादव ने कहा- ”हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया और ये उद्योगपति पत्रकारिता को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। इस देश का क्या होगा? अब हिंदुस्तान टाइम्स भी बिक गया? कैसे चलेगा यह देश? यह चुनाव सुधार, यह बहस, ये सारी चीजें कहां आएंगी? कोई यहां पर बोलने के लिए तैयार नहीं है। निश्चित तौर पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि जो मीडिया है, लोकशाही में, लोकतंत्र में, यह आपके हाथ में है, इस पार्लियामेंट के हाथ में है. कोई रास्ता निकलेगा या नहीं निकलेगा? ये जो पत्रकार है, ये चौथा खंभा है, उसके मालिक नहीं हैं और हिंदुस्तान में जब से बाजार आया है, तब से तो लोगों की पूंजी इतने बड़े पैमाने पर बढ़ी है। मैं आज बोल रहा हूं, तो यह मीडिया मेरे खिलाफ तंज कसेगा, वह बुरा लिखेगा। लेकिन मेरे जैसा आदमी, जब चार-साढ़े चार साल जेल में बंद रहकर आजाद भारत में आया, तो अगर अब मैं रुक जाऊंगा तो मैं समझता हूं कि मैं हिंदुस्तान की जनता के साथ विश्वासघात कर के जाऊंगा।”

शरद यादव ने राज्यसभा में आगे कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिकने वाला है। तभी राज्यसभा के दूसरे सदस्यों ने श्री शरद यादव का ध्यान इस ओर दिलाया कि बिकने वाला नहीं बल्कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया है और इसे मुकेश अंबानी ने खरीदा है। इसके बाद श्री शरद यादव ने भी राज्यसभा में कहा कि हिन्दुस्तान टाईम्स बिक गया। श्री यादव ने कहा कि हमारे लोकतंत्र में बाजार आया, खूब आए लेकिन यह जो मीडिया है, इसको हमने किनके हाथों में सौंप दिया है? यह किन-किन लोगों के पास चला गया है? एक पूंजीपति है इस देश का, उसने 40 से 60 फीसदी मीडिया खरीद लिया है। ये अखबार के पूंजीपति मालिक कई धंधे कर रहे हैं। इन्होंने बड़ी-बड़ी जमीनें ले ली हैं और कई तरह के धंधे कर रहे हैं। वे यहां भी घुस आते हैं। इनको सब लोग टिकट दे देते हैं। मैं आपसे कह रहा हूं इस तरह यह लोकतंत्र कभी नहीं बचेगा।

श्री शरद यादव ने कहा कि इसके लिए एक कानून बनाना चाहिए कि अगर कोई मीडिया हाउस चलाता है या अखबार चलाता है, तो वह कोई दूसरा धंधा नहीं कर सकता है। हिंदुस्तान में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है। यह जो पत्रकार ऊपर बैठा हुआ है, वह कुछ नहीं लिख सकता है क्योंकि उसके हाथ में कुछ नहीं है। यही जब सूबे में जाता है तो मीडिया वहां की सरकार की मुट्ठी में चला जाता है। जो पत्रकार सच लिखते हैं उसे निकालकर बाहर कर दिया जाता है। फिर यह देश कैसे बनेगा, आप कैसे सुधार कर लोगे। जदयू नेता ने कहा कि मैं सबसे पूछना चाहता हूं कि सुधार कैसे होगा। इस देश में मीडिया के बारे में बहस क्यों नहीं होती। इस देश में ऐसा कानून क्यों नहीं बनता कि कोई भी व्यापार या किसी तरह की क्रास होल्डिंग नहीं कर सकता? तब हिंदुस्तान बनेगा।

शरद यादव का पूरा बयान देखने के लिये इस वीडियो लिंक पर क्लिक करें

 

https://www.youtube.com/watch?v=L_cGrOGKhWY

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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हिन्दुस्तान रांची के हेचआर हेड ने मजीठिया मांगने वाले दो कर्मियों के साथ की बदतमीजी, कॉलर पकड़ हड़काया, गाली दी

हिन्दुस्तान अखबार प्रबंधन इन दिनों मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाया मांगने वालों के खिलाफ लगातार दमन की नीति अपना रहा है और अपने ही किये वायदे से मुकर रहा है। रांची में मजीठिया वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन और भत्ते मांगने वाले दो कर्मचारियों ने जब श्रम आयुक्त कार्यालय में क्लेम लगाया तो इनका ट्रांसफर कर दिया गया। जब ये लोग कोर्ट से जीते तो हिन्दुस्तान प्रबंधन को उन्हें वापस काम पर रखना पड़ा। तीन दिन बाद ही जब ये कर्मचारी कार्यालय आकर काम करने लगे तो उन्हें कार्मिक प्रबंधक ने कालर पकड़ कर अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुये जबरी ट्रांसफर लेटर थमाने का प्रयास किया।

लखनऊ में भी हिन्दुस्तान प्रबंधन इसी तरह की रणनीति मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों के साथ इस्तेमाल कर चुका है। रांची में भी ऐसा ही किया जा रहा है। यहां मजीठिया वेजबोर्ड की लडाई लड रहे रांची हिन्दुस्तान के संपादकीय विभाग में कार्यरत मुख्य उप संपादक अमित अखौरी और वरीय उप संपादक शिवकुमार सिंह के साथ एचआर हेड हासिर जैदी ने 17 फरवरी को करीब पौने पांच बजे शाम को काफी बदतमीजी की।

पहले शिवकुमार सिंह को अपने कक्ष में बुलाकर कॉलर पकड़ा और हड़काया, फिर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए कहा कि इस लेटर पर साइन करो। उन्होंने पूछा कि लेटर में क्या है, तो एचआर हेड ने कहा कि तुम दोनों का तबादला रांची हेड आफिस से उत्तराखंड के हल्द़वानी में कर दिया गया है। जब शिवकुमार सिंह ने लेटर पर साइन करने से इनकार कर दिया, तो उनके साथ अभद्रता से पेश आते हुए हासिर जैदी ने गाली देते हुए कहा- ”साले पेपर पर साइन करो, नहीं तो दोनों को बड़ी मार मारेंगे, साले तुम लोगों के कारण हम अपनी नौकरी को खतरे में क्यों डालें, अब तुम लोगों को कोई सैलेरी-वैलेरी नहीं मिलेगी, दिल्ली से साला एचआर हेड राकेश गौतम ने तुम लोगों के कारण मेरी नींद हराम कर रखी है।”

शिवकुमार सिंह के हल्ला करने पर कक्ष के बाहर खड़े अपनी बारी का इंतजार कर रहे अमित अखौरी दौड़कर कक्ष में घुसे तो उन्हें भी गाली देते हुए हासिर जैदी ने जबरन लेटर पर साइन मांगा। दोनों के इनकार करने पर गार्ड को गेट बंद करने को कहा। फिर कहा कि ठहरो, दोनों ऐसे नहीं मानेगा, सालों तुम दोनों को ठीक करता हूं। यह कहते हुए कक्ष का दरवाजा लगाने के लिए जैसे ही वह आगे बढा, तो अमित अखौरी और शिवकुमार सिंह कक्ष से निकलकर गेट से बाहर भाग खड़े हुए। 

बता दें कि दोनों को श्रम अधीक्षक कोर्ट से तो बड़ी राहत मिली थी। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हिन्दुस्तान प्रबंधन ने 13 फरवरी को दोनों कर्मियों को ज्वाइन करा दिया था। लेकिन हाजिरी बनाने के बाद भी इनसे संपादकीय विभाग में काम नहीं लिया जा रहा था। मजीठिया वेजबोर्ड की अनुशंसा के तहत वेतन, एरियर, भत्ता समेत अन्य सुविधाओं की मांग करने पर इन दोनों कर्मियों को क्रमश: 17 नवंबर और छह दिसंबर 2016 से प्रबंधन ने मौखिक रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।

श्रम अधीक्षक कोर्ट के समक्ष हिन्दुस्तान रांची के एचआर हेड हासिर जैदी ने आठ फरवरी को सुनवाई के दौरान इन दोनों कर्मियों का बिना सर्विस ब्रेक किए ज्वाइन कराने और वेतनादि देने पर सहमति व्यक्त की थी। लेकिन पांच दिन के बाद ही दोनों को तबादले का लेटर थमाया जा रहा था। इन दोनों कर्मचारियों का तबादला लेटर बाद में उनके मेल पर भेज दिया गया। आपको बता दें कि इसके पहले भी हिन्दुस्तान प्रबंधन ने लखनऊ में इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। पहले सम्मान के साथ वापस काम पर रखा जाता है फिर बाद में मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों को टार्चर किया जाता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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यह शख्स जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया!

Deshpal Singh Panwar : अगर ये खबर सच है कि हिंदुस्तान टाइम्स समूह को मुकेश अंबानी खरीद रहे हैं तो तय है कि अच्छे दिन (स्टाफ के लिए पीएम के वादे जैसे) आने वाले हैं। वैसे इतिहास खुद को दोहराता है… कानाफूसी के मुताबिक एक शख्स जो इस समूह के हिंदी अखबार में चोटी पर है वो जहां रहा वहां या तो बंटवारा हुआ, या वो अखबार तबाह होता चला गया।

बनारस के ‘आज’ से लेकर जागरण के आगरा संस्करण का किस्सा हो या फिर वो अखबार जिसके मालिकों की एकता की मिसाल दी जाती थी और एक दिन ऐसा आया कि भाई-भाई अलग हो गए, बंटवारा हो गया, पत्रकारिता के लिए सबसे दुखद दिन था वो, कम से कम हम जैसों के लिए। अगर ये बात सच है तो इतने पर भी इनको चैन पड़ जाता तो खैरियत थी, एक भाई को केस तक में उलझवा दिया, उसके बाद जो हुआ वो भगवान ना करे किसी के साथ हो, वो सब जानते हैं…लिखते हुए भी दुख होता है..

अब अगर हिंदुस्तान समूह के बिकने की बात है तो कानाफूसी के मुताबिक इस हाऊस को भी लगा ही दिया ठिकाने। अगला नंबर मुकेश अंबानी का होगा अगर उन्होंने इन्हें रखा तो, वैसे ये जुगाड़ कर लेंगे, पीएम की तरह बोलने की ही तो खाते हैं.दुख किसी के बिकने और खुशी किसी के खरीदने की नहीं है हां स्टाफ का कुछ बुरा ना हो बस यही ख्वाहिश है। वेज बोरड की वजह से बिक रहा है ये मैं मानने को तैयार नहीं हूं। जो हो अच्छा हो..

कई अखबारों में संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार देशपाल सिंह पंवार की फेसबुक वॉल से.

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मुंबई के बाद अब दिल्ली एचटी को भी रिलायंस को बेचे जाने की चर्चा

देश भर के मीडियामालिकों में हड़कंप, कहीं मुफ्त में ना अखबार बांटने लगे रिलायंस…

देश के सबसे बड़े उद्योगपति रिलायंस वाले मुकेश अंबानी द्वारा मुंबई में एचटी ग्रुप के अखबार मिन्ट और फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स खरीदने की चर्चा के बाद अब यह चर्चा भी आज तेजी से देश भर के मीडियाजगत में फैली है कि मुकेश अंबानी ने दिल्ली में भी हिन्दुस्तान टाईम्स के संस्करण को खरीद लिया है। हालांकि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। हिन्दुस्तान टाईम्स के दिल्ली संस्करण में कर्मचारियों के बीच आज इस बात की चर्चा तेजी से फैली कि रिलायंस प्रबंधन और हिन्दुस्तान टाईम्स प्रबंधन के बीच कोलकाता में इस खरीदारी को लेकर बातचीत हुयी जो लगभग सफल रही और जल्द ही हिन्दुस्तान टाईम्स पर रिलायंस का कब्जा होगा।

रिलायंस के प्रिंट मीडिया में आने और हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की चर्चा के बाद आज देश भर के नामी गिरामी अखबार मालिकों में हड़कंप मच गया। सभी बड़े अखबार मालिकों में इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं जिस तरह रिलायंस ने जियो को लांच कर लोगों को मुफ्त में मोबाईल सेवा प्रदान कर दिया या रिलायंस के आने के बाद जिस तरह मोबाईल फोन जगत में रिलायंस का सस्ते दर का मोबाईल छा गया कहीं इसी तरह प्रिंट मीडिया में भी आने के बाद रिलायंस लोगों को मुफ्त अखबार ना बांटने लगे। ऐसे में तो पूरा प्रिंट मीडिया का बाजार उसके कब्जे में चला जायेगा।

यही नहीं सबसे ज्यादा खौफजदा टाईम्स समूह है। उसे लग रहा है कि अगर रिलायंस हिन्दुस्तान टाईम्स को मुफ्त में बांटने लगेगा या कोई लुभावना स्कीम लेकर आ गया तो उसके सबसे ज्यादा ग्राहक टूटेंगे और उसके व्यापार पर जबरदस्त असर पड़ेगा। आज देश भर के मीडियाकर्मियों में रिलायंस द्वारा मुंबई में मिंट तथा फ्लैगशिप हिन्दुस्तान टाईम्स को खरीदने की खबर पर जमकर चर्चा हुयी।

कुछ लोगों ने जहां इस फैसले को खुशी भरा बताया वहीं कुछ इस बात से भी परेशान थे कि इस खरीदारी में क्या हिंदी वाले हिन्दुस्तान समाचार पत्र के संस्करण भी खरीदे गये हैं। फिलहाल हिन्दुस्तान के किसी भी संस्करण के रिलायंस द्वारा खरीदे जाने की कोई जानकारी नहीं मिली है। रिलायंस के प्रिंट मीडिया जगत में आने से छोटे और मझोले अखबार मालिकों में भी भय का माहौल है। उनको लग रहा है कि रिलायंस उनके बाजार को भी नुकसान पहुंचायेगा। फिलहाल माना जा रहा है कि रिलायंस जल्द ही अपना पूरा पत्ता हिन्दुस्तान टाईम्स को लेकर खोलेगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्स्पर्ट
मुंबई
९३२२४११३३५


पत्रकार Praveen Dixit ने इस प्रकरण के बारे में एफबी पर जो कमेंट किया है, वह इस प्रकार है…

”The silent deal… Last week, HT chairperson Shobhana Bhartiya met up with Reliance supreme Mukesh Ambani. The idea was to sell Mint and eventually, the flagship, Hindustan Times. The second meeting between the merchant bankers in faraway Kolkata and the deal further cemented for Mint. Mint staffers in Mumbai have already moved into the office of CNBCNews18, some fired. This budget, the First Post and CNBC feeds went to Mint Live, an indication that things were working out to mutual benefit.”


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विश्वेश्वर कुमार ने क्राइम बीट इंचार्ज अभिषेक त्रिपाठी की ली बलि

वाराणसी : अब बनारस में दिखा मजीठिया बाबा का प्रकोप। मजीठिया वेज बोर्ड का जिन्न समाचारपत्र कर्मचारियों की बलि लगातार ले रहा है। केंद्र व राज्य सरकारों को अपने ठेंगे पर नचा रहे अखबार मालिकों के सम्मुख सुप्रीम कोर्ट से क्या राहत मिलेगी, यह तो कोई नहीं जानता। लेकिन यह राहत कब मिलेगी और तब तक लोकत्रंत का तथाकथित चौथा पाया किस कदर टूट चुका होगा, इसका अहसास होने लगा है।

यूपी का जहां तक सवाल है तो छोटे शहरों की बात ही छोड़िए…. पहले राजधानी लखनऊ, फिर गोरखपुर और अब बनारस में अखबार प्रबंधनों की प्रताड़ना के आगे तीन कर्मकारों को झुकना पड़ा। लखनऊ और गोरखपुर में हिन्दुस्तान प्रबंधन की दबंगई के सामने बीते एक माह में लगभग एक दर्जन पत्रकारों को नौकरी गंवानी पड़ी है और अब वे श्रम विभाग या कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं।

इधर वाराणसी में हिन्दुस्तान के तेजतर्रार युवा क्राइम रिपोर्टर अभिषेक त्रिपाठी को प्रबंधन के उलझाऊ दबाव में पिछले हफ्ते इस्तीफा देना पड़ा। पता चला है कि हिन्दुस्तान वाराणसी में बतौर स्थानीय सम्पादक अपनी दूसरी पारी खेलने आये विश्वेश्वर कुमार को कतरब्यौंत का निर्देश जारी किया गया है। यही वजह है कि सम्पादकजी को, जिन्हें लगभग सात वर्ष पूर्व इसी संस्थान से एक बार बेइज्जत करके निकाला जा चुका है, अति महत्वपूर्ण क्राइम बीट पर तीन रिपोर्टरों की मौजूदगी ज्यादा लगी और उन्होंने फरमान सुना दिया कि इस बीट के लिए एक ही व्यक्ति पर्याप्त है। अंतत: इतना दबाव बढ़ा कि बीट इंचार्ज अभिषेक ने इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। अन्य दो में कितनी जान है, यह बताना उचित नहीं होगा।

बनारस के वरिष्ठ पत्रकार योगेश गुप्त पप्पू की रिपोर्ट.

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मजीठिया मांगने पर हिंदुस्तान प्रबंधन ने अपने चार कर्मियों को नौकरी से निकाला

संजय दुबे ने कानपुर के उप श्रमायुक्त को पत्र लिखकर अपने और अपने साथियों के साथ हुए अन्याय के बारे में विस्तार से बताया है. मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर मांगने पर संजय दुबे, नवीन कुमार, अंजनी प्रसाद और नारस नाथ साह को पहले तो आफिस में घुसने पर रोक लगा दी गई. उसके बाद इन्हें टर्मिनेट कर दिया गया. हिंदुस्तान प्रबंधन के खिलाफ ये चारों कर्मी हर स्तर पर लड़ रहे हैं लेकिन इन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है.

संजय दुबे ने श्रम विभाग कानपुर के उप श्रमायुक्त को जो पत्र भेजा है, उसे प्रकाशित किया जा रहा है. पत्र में संजय का मोबाइल नंबर दिया हुआ है जिसके जरिए उनसे संपर्क कर उन्हें विधिक और अन्य किस्म की सहायता दी जा सकती है. संजय से संपर्क  sanjay_kdubey@rediffmail.com के जरिए भी किया जा सकता है.

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एचटी मीडिया को धूल चटाने वाले 315 कर्मियों की जीत से संबंधित कोर्ट आर्डर की कापी Download करें

हिंदुस्तान टाइम्स वालों ने अपने यहां सन 1970 से परमानेंट बेसिस पर काम कर रहे करीब 362 मीडिया कर्मियों को 2 अक्टूबर 2004 को बिना किसी वजह एकाएक बर्खास्त कर दिया था.  362 में से कई कर्मियों ने तो प्रबंधन के साथ सुलह कर लिया लेकिन 315 कर्मियों ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल कड़कड़डूमा में केस कर दिया. ट्रिब्यूनल ने 8 मार्च 2007 को एक अंतरिम आदेश पारित किया कि सभी 315 कर्मियों को मुकदमे के निपटारे तक एचटी मीडिया पचास फीसदी तनख्वाह गुजारे भत्ते के लिए दे. इसके खिलाफ एचटी वाले हाईकोर्ट चले गए.

बाद में यह मामला पटियाला हाउस कोर्ट ट्रांसफर किया गया जहां सभी कर्मियों की बहाली और बकाया भत्ते देने के आदेश पारित हुए. इसके खिलाफ एचटी मीडिया हाईकोर्ट गया तो हाईकोर्ट ने निचली आदेश के फैसले को सही ठहराया और मामला सेटल करने को वहीं जाने के लिए कहा. अब इस मामले में फाइनल फैसला आ गया है जिसमें एचटी मीडिया को अपने इन सैकड़ों कर्मियों को बहाल करने से लेकर सभी बकाया देने के आदेश हैं और ऐसा न करने पर एचटी मीडिया की संपत्ति जब्त करने के निर्देश है. इस प्रकरण से संबंधित खबर भड़ास पर पहले ही छप चुकी है. अब कोर्ट आर्डर की कापी भी आप डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर कोर्ट आर्डर की कापी डाउनलोड करें:

Court Order Copy Download

इस प्रकरण से संबंधित भड़ास पर छपी शुरुआती खबर यूं है…

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अपनी नौकरी बचाने के लिए शशि शेखर नीचता पर उतर आये हैं

रमन सिंह : हिन्दुस्तान में साइन कराने का सिलसिला शुरू… अपनी नौकरी बचाने के लिए शशि शेखर नीचता पर उतार आये है. इसी का नतीजा है कि इन दिनों हिन्दुस्तान अखबार में कर्मचारियों से दूसरे विभाग में तबादले के कागज पर साइन कराने का दौर शुरू हो गया है. दिल्ली में तो खुद शशि शेखर जी साइन करा रहे हैं. साइन नहीँ करने वालों को निकालने की धमकी भी दी जा रही है.  मजीठिया से घबराया हिन्दुस्तान फिलहाल जिस कागज पर साइन करा रहा है उसमें भी कई फर्जीवाड़ा है. इसलिए नीचे के फोटो को आप ध्यान से पढ़िए. दो फोटो हैं, दोनों को ध्यान से देखिए. कई फर्जीवाड़े समझ में आएंगे. 

दोनों फोटो को आप अगर ध्यान से देखेंगे तो उसमें शशि शेखर का हस्ताक्षर अलग अलग है. अब आप पता लगाइये कि कौन सही है. दूसरा फर्जीवाड़ा ये है कि लैटर 29 मई 2015 को जारी हुआ है और लोगोँ से साइन सितम्बर में कराया जा रहा है. तीसरा फर्जीवाड़ा- जिस कागज पर साइन करा कर कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार से हटा कर इंटरनेट डिवीज़न में डाला जा रहा है उसका वितीय वर्ष 2014-15 है जबकि कागज 29 मई 2015 को जारी हुआ है.

फेसबुक पर सक्रिय किन्हीं रमन सिंह के वॉल से.

वो कौन सी दो तस्वीरें हैं जिनको ध्यान से देखने पर कई किस्म का फर्जीवाड़ा नजर आता है. उन दोनों तस्वीरों को देखने के लिए नीचे लिख कर आ रहे 2 या Next पर क्लिक कर दें>>

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हिंदुस्तान अख़बार में आज सुबह से ही जबरन दस्तखत कराने की गहमागहमी चल रही है

मजीठिया डाल-डाल, अख़बार मालिक पात-पात। एक तरफ़ सुनाई दे रहा है कि इसी 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट पत्रकारों के पक्ष में मजीठिया वेतन आयोग लागू करने लिए दो-टूक फ़ैसला दे सकता है, तो दूसरी ओर अख़बार मालिकान एक बार फिर से इसकी तोड़ निकालने की जुगत में लग गए हैं। असल में अदालत ने राज्य सरकारों से 15 सितंबर तक रिपोर्ट माँगा है कि मजीठिया लागू करने के विषय में अख़बारों की स्थिति कहाँ तक पहुँची है।

इसी के मद्देनज़र अब अख़बार मालिक अपने कर्मचारियों से एक रजिस्टर पर दस्तख़त करवा रहे हैं, जिसे ही इस तरह की चिट्ठी के साथ सरकार को सौंप दिया जाएगा कि उनके कर्मचारियों को पर्याप्त वेतन या सुख-सुविधाएँ मिल रही हैं, सो उन्हें मजीठिया वेतनमान की ज़रूरत नहीं है।  हिंदुस्तान अख़बार में आज सुबह से ही जबरन दस्तख़त कराने की गहमागहमी चल रही है। किसी कर्मचारी को न तो बताया जा रहा है कि किसलिए दस्तख़त लिए जा रहे हैं और न तो उन्हें कोई चिट्ठी वग़ैरह ही दिखाई जा रही है। सिर्फ़ सामने एक रजिस्टर रख दिया गया है, जिस पर लोग एक-एक कर दस्तख़त कर दे रहे हैं बस। ज़्यादातर को बिलकुल गुमान नहीं है कि माज़रा क्या है। असल मामले की जानकारी तो अंदरूनी सूत्र दे रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस रजिस्टर के साथ ही पत्र नत्थी करके सरकार को सौंपा जाएगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

मूल खबर:

हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स में हाहाकार, वेज बोर्ड नहीं चाहिए वाले फार्म पर प्रबंधन जबरन करा रहा हस्ताक्षर

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हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स में हाहाकार, वेज बोर्ड नहीं चाहिए वाले फार्म पर प्रबंधन जबरन करा रहा हस्ताक्षर

इस वक्त हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में हाहाकार मचा हुआ है. नोएडा और दिल्ली से आ रही खबरों के मुताबिक दोनों अखबारों के कर्मियों से एक फार्म पर जबरन साइन कराया जा रहा है जिस पर लिखा हुआ है कि हमें मजीठिया वेज बोर्ड से अधिक वेतन मिलता है इसलिए हम मजीठिया वेज बोर्ड के लाभ नहीं लेना चाहते. सूत्रों के मुताबिक जो लोग फार्म पर साइन करने से मना कर रहे हैं उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है.

जानकारी के अनुसार हिन्दुस्तान हिंदी के नोएडा आफिस में एच.आर. की ओर से सभी लोगों से उस रजिस्टर पर जबरन  साइन करवाए जा रहे हैं जिस पर उन्होंने लिखा है कि हमें मजीठिया बेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं चाहिए और हम सब अभी मिल रही तनख्वाह से संतुष्ट हैं. इस तरह साइन कराया जाना न सिर्फ गैरकानूनी है बल्कि अमानवीय भी है. इसी तरह Hindustan Times Delhi के employees को भी sign करने के लिए फोर्स किया जा रहा है. भड़ास के पास आई एक सूचना यूं है: ”As I aware just a few minutes ago that the management of HT is forcing  his employees to sign a paper on which a matter is written means that The Employees of HT is satisfy with their salary and they do not want Wage Board (Majithiya). If any employee will refuse to sign …he has to leave his job. In this move a team of three person is working … 1. HR Head–Mr. Gautam 2. Chief Editor–Mr. Shashi Shekhar 3. Sr. Resident Editor—Mr. Sudhanshu Srivastava. Pls scroll this news on your portal asap so that no one can do injustice with the employees of HT and other media organizations.”

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मजीठिया वेज बोर्ड संघर्ष : शोभना भरतिया और शशि शेखर को शर्म मगर नहीं आती… देखिए इनका कुकर्म…

हिंदुस्तान अखबार और हिंदुस्तान टाइम्स अखबार की मालकिन हैं शोभना भरतिया. सांसद भी हैं. बिड़ला खानदान की हैं. पैसे के प्रति इनकी भूख ऐसी है कि नियम-कानून तोड़कर और सुप्रीम कोर्ट को धता बताकर कमाने पर उतारू हैं. उनके इस काम में सहयोगी बने हैं स्वनामधन्य संपादक शशि शेखर. उनकी चुप्पी देखने लायक हैं. लंबी लंबी नैतिक बातें लिखने वाले शशि शेखर अपने घर में लगी आग पर चुप्पी क्यों साधे हैं और आंख क्यों बंद किए हुए हैं, उनसे पूछा जाना चाहिए. आखिर वो कौन सी मजबूरी है जिसके कारण वह अपने संस्थान के मीडियाकर्मियों का रातोंरात पद व कंपनी जबरन बदले जाने पर शांत बने हुए हैं.

शोभना भरतिया अपने इंप्लाइज की पद व कंपनी इसलिए बदल रही हैं ताकि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उन्हें सेलरी न देनी पड़े. पर कुछ हिंदुस्तानियों ने तय किया है कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाएंगे. इन लोगों ने इस दिशा में पहला कदम भड़ास को सारे डाक्यूमेंट्स भेजकर उठाया है. जो दस्तावेज यहां दिए गए हैं, उसे आप ध्यान से देखिए और पढ़िए. दूसरों की आवाज उठाने वाले पत्रकारों के साथ रातोंरात कितना बड़ा छल हो जाता है लेकिन वे चुप्पी साधे रहने को मजबूर रहते हैं.

इन दस्तावेजों से पता चलता है कि हिन्दुस्तान अखबार ने अपने एडिटोरियल के लोगों के पदनाम और कंपनी के नाम बदल दिए हैं. सूत्रों के मुताबिक ये संपादकीयकर्मी 28 अप्रैल 2015 को समस्त गलत व झूठे दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट में दे देंगे. बताते चलें कि शोभना भरतिया और शशि शेखर दस्तावेजों में हेरफेर करके फर्जी तरीके से सैकड़ों करोड़ रुपये का सरकारी विज्ञापन छापने और इसका पेमेंट लेने के मामले के आरोपी भी हैं जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है.  

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एचटी मैनेजमेंट के खिलाफ ऐतिहासिक जीत, हाईकोर्ट ने 272 एचटी कर्मचारियों को काम पर रखने का आदेश दिया

एक ऐतिहासिक फैसला आया है. हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन की मनमानी के खिलाफ लड़ रहे 272 मीडियाकर्मियों को न्याय मिल गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इन 272 कर्मियों को फिर से काम पर रखने का आदेश हिंदुस्तान टाइम्स प्रबंधन को दिया है. कोर्ट के पूरे आदेश को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है: goo.gl/b2KE9i

दिल्ली यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स ने इस ऐतिहासिक जीत पर कर्मियों को बधाई दी है. डीयूजे की तरफ से जारी प्रेस रिलीज इस प्रकार है….

DUJ welcomes historic Delhi High Court judgement on Hindustan Times Workers Case

The Delhi Union of Journalists welcomes the judgement of the Delhi High Court reinstating the 272 workers of the Hindustan Times. The DUJ congratulates the 272 brave workers of the Hindustan Times Ltd for their historic victory against the management. Justice Suresh Kait has termed their retrenchment arbitrary, upheld the earlier judgement of the Industrial Tribunal and granted them reinstatement in service with back wages for the past nine years.

The Tribunal had on January 23, 2012 ordered reinstatement of the workers but the Hindustan Times management chose to drag its feet on the issue, seeking to divide the workers and evade the order. The High Court order of Nov. 17, 2014 not only upholds the Industrial Tribunal order but in addition clarifies that full back wages must be paid.

The order says, “reinstatement with full back wages is the proper relief to which the workmen are entitled, especially when their termination from services nine years back was based on a fictitious/sham transaction.”

It also says, “In case the relief of back wages is denied to the workmen, it would tantamount to placing a premium on the fraudulent conduct of the management which by its order of dismissal has virtually deprived hundreds of workmen of right to life and livelihood.”

Further the order states, “It is pertinent to point out here that 13 workmen have already died while fighting for their rights. Some of them if reinstated today had substantial remaining period of service. Several workmen had lost their family members as they did not have the necessary financial assistance or support to seek medical remedies.”

While hailing the verdict the Delhi Union of Journalists demands that the Hindustan Times management provide immediate relief to the workers by reinstating them and paying them their back wages. The DUJ thanks senior advocate Colin Gonsalves for his stellar role in fighting for the workers’ rights. 

The judgement, the DUJ believes, will strengthen the workers’ resolve to struggle for implementation of their rights. It will also provide hope to the retrenched journalists and other workers who are fighting several court battles against the Hindustan Times management.

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अमरीका-वियतनाम युद्ध को कवर करने वाले एकमात्र भारतीय पत्रकार थे हरिश्चन्द्र चंदोला

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हरिश्चन्द्र चंदोला ने वर्ष 1950 में दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स से अपने पत्रकारिता कैरियर की शुरूआत की। यह वह समय था, जब देश को आजाद हुऐ ज्यादा समय नहीं हुआ था। भारत में संचार माध्यमों का खास विकास नहीं हुआ था। मुद्रित माध्यमों में भी ज्यादातर अंग्रेजी अखबार ही प्रचलन में थे। उसमें भी टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स व इंडियन एक्सप्रेस ही प्रमुख अखबारों में थे। ऐसे में देश के प्रमुख समाचार पत्र में नौकरी मिलना हरिश्चन्द्र जी के लिए अच्छा मौका था। हरिश्चन्द्र जी की पारिवारिक पृष्ठभूमि पत्रकारिता से जुड़ी रही। यही कारण रहा कि उन्होंने देश के नहीं बल्कि विदेशी समाचार पत्रों में भी लेख लिखे। चंदोला विश्व के प्रमुख युद्ध पत्रकारों में पहचाने जाते हैं। उन्होंने सन् 1968 से लेकर 1993 तक के सभी महत्वपूर्ण युद्धों व क्रांतियों के बारे में घटना स्थल पर जाकर लिखा।

हरिश्चन्द्र ने अपनी पत्रकारिता के अधिकतम समय तक देश व देश के बाहर कई युद्धों व क्रांतियों को देखा और उस पर लिखा। उन्होंने युद्ध पत्रकारिता उस दौर में की जब जनसंचार माध्यमों का विकास ऐसा नही था जैसा वर्तमान में है। आज जनसंचार माध्यम अत्याधुनिक सुविधाओं से जुड गये हैं। विश्व के किसी भी कोने में यदि कोई घटना होती है तो पलभर में इसकी पूरी जानकारी लोगों को हो जाती है। लेकिन जब हरिश्चन्द्र ने पत्रकारिता में कदम रखा तो उस समय सीमित संसाधन थे और समाचारों के संप्रेषण में काफी दिक्कतें आती थी। अब यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि हरिश्चन्द्र ने किन और कैसी परिस्थितियों में पत्रकारिता की होगी। रणभूमि में जाकर जान की परवाह किये बगैर रिर्पोटिंग करना, इस बात की तस्दीक करता है कि पत्रकारिता के प्रति वो कितना संजीदा रहे हैं। चंदोला ने नागा समस्या को भी भूमिगत नागाओं के बीच में जाकर लिखा। 1979 में जब चीन ने वियतनाम पर हमला किया तो हरिश्चन्द्र चंदोला विश्व के दो पत्रकारों में एक थे, जो घटना की कवरेज के लिए सरहद पर पहुंचे। इसके एक साल बाद वो मिडिल ईस्ट में ईरान व ईराक युद्ध को कवर करने गये।

1- अमेरिका – वियतनाम युद्ध

यह युद्ध काफी लम्बे समय तक चला। हरिश्चन्द्र चंदोला ने इसका विवरण अपने समाचार पत्र जिसके वो प्रतिनिधि थे इंडियन एक्सप्रेस के अलावा भारत व विदेश के अन्य समाचार पत्रों के लिए भी लिखा। युद्ध भूमि में जाकर कवरेज करने वाले विश्व के गिने चुने पत्रकारों में वो भी एक थे। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण खबरें लिखी। कई बार उन्होंने अमेरिकन सैनिकों के साथ बखतरबंद गाड़ियों व हैलिकाप्टर में बैठकर रिपोंटिग की। दो तीन बार ऐसे मौके भी आये जब मौत उनके करीब से होकर गुजरी। अमेरिका वियतनाम युद्ध की लगातार कवरेज करने वाले वो एकमात्र भारतीय पत्रकार थे। इस दौरान हरिश्चन्द्र ने कई युद्ध प्रभावित वियतनामी क्षेत्रों का भी दौरा किया। इस युद्ध में अमेरिकी सेना द्वारा युद्ध पत्रकारों को पास दिये गये थे। लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी थीं। इस युद्ध में पत्रकारों के लिए अमेरिकी सेना ने काफी सुविधाएं उपलब्ध कराई थी। सैनिक छावनी में ठहरने की व्यवस्था थी। सैनिक कैंटीन से रियायती दरों पर पत्रकार को दिये गये पास दिखाकर सामान खरीद सकते थे। जो पत्रकार कवरेज के लिए युद्ध स्थल में जाना चाहता था, उसके लिए हैलीकाप्टर की सुविधा हर समय उपलब्ध थी।

2- ईरान ईराक युद्ध

ईरान-ईराक युद्व 1980 में छिड़ गया था। यहां सबसे पहले हरिश्चन्द्र ने कुवैत में भारतीय मजूदरों की व्यथा पर इंडियन एक्सप्रेस में लिखा। इसका असर यह हुआ कि इससे भारत का विदेश मंत्रालय हरकत में आया। 8 साल तक चली इस लड़ाई का हाल हरिश्चन्द्र ने दोनों देशों में जाकर लिखा। युद्ध पत्रकार के रूप में उनका यह दूसरा महत्वपूर्ण महत्वपूर्ण युद्ध था। कई सालों तक चले इस युद्ध की उन्होंने रणभूमि में जाकर रिपोंटिग की। उस समय ईराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को ईराक में आने पर पाबंदी थी। लेकिन हरिश्चन्द्र ने सद्दाम के खिलाफ खबर लिखने के बावजूद उनके क्षेत्र में गये और बेबाकी से लेखनी चलाई। हजबजा नरसंहार तथा मृत्युलोक की इंडियन एक्सप्रेस में लिखी उनकी रिर्पोट ने काफी हलचल मचाई। इस युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व के सभी युद्ध पत्रकार अपने अपने देशों में लौटकर जब आने देश के समाचार पत्रों में बड़ी-बड़ी खबरें लिख रहे थे, तब हरिश्चन्द्र ने मानवीय संवदेना व एक कुशल पत्रकार का धर्म निभाते हुए ईरान के युद्ध प्रभावितों के कैंप में गये और प्रभावितों की समस्यओं की ओर पूरे विश्व का ध्यान खींचा। उन्होनें अपनी खबरों में लिखा कि कैसे प्रभावित लोग सूखे ब्रेड व खजूर के सहारे दिन काट रहे हैं। उनकी इस रिपोंटिग को पत्रकारिता जगत द्वारा काफी सराहा गया।

3- कुवैत पर ईराकी हमला

1 अगस्त 1990  की रात 2 बजे ईराक की रिपब्लिकन गार्ड की छह डिविजन सरहद पार कर कुवैत में दाखिल हो गई। उस घटना की जानकारी मिलते ही हरिश् ने इसका विवरण समाचार पत्रों में भेजा। चूंकि खाड़ी युद्ध के समय हरिश्चन्द्र इस क्षेत्र में लम्बे समय तक रहे थे इसलिए उन्हें कवरेज में ज्यादा दिक्कतें नहीं आई। पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला ने भारतीय दूतावास के गायब हो जाने की खबर लिखी। दूसरे दिन दिल्ली में इस खबर के छपने के बाद विदेश मंत्रालय पता लगाने लगा कि आखिर दूतावास कहां गया। इस युद्ध की खबरें भी कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई।

4- फ्रांस-अल्जीरिया संघर्ष

फ्रांस और अल्जीरिया के बीच लम्बे समय तक संघर्ष चला। हरिश्चन्द्र ने इस पूरे संघर्ष का ब्यौरा भारत के अलावा चिश्व के कई अन्य प्रमुख समाचार पत्रों में भेजा। एक बार जब वो खबर भेज रहे थे कि तभी फ्रांसिसी सैनिकों ने अल्जीरियनों पर आक्रमण कर दिया। कुछ पलों में सडकें खून से लाल हो गई। किसी तरह हरिश्चन्द्र इस घटना में बचे।

इसके अलावा हरिश्चन्द्र ने एक युद्ध पत्रकार के तौर पर कई जनक्रांतियों, संघर्षो व युद्धों को युद्ध भूमि व घटना स्थल पर जाकर लिखा। हरिश्चन्द्र जिम्बाबबें से अल्जीरिया गये। यहां फ्रांसासी साम्राज्य के खिलाफ वहां के लोगों का हथियारबंद युद्ध चल रहा था। हरिश्चन्द्र फ्रांस और अल्जीरिया लड़ाकुओं के 18 मार्च 1962 के युद्ध विराम से पहले वहां पहुंचे और यहां के हालात पर उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए खबर लिखी। उस समय यहां का माहौल काफी संवेदनशील था। सड़कों पर चलने वाले अल्जीरियनों पर अपने घरों से फ्रांसिसी गोलियां चला उन्हें मार रहे थे। शहर में कई दिनों तक कर्फ्यू लगा रहा। ऐसे में खबर करना जान जोखिम में डालने से कम नहीं था, लेकिन हरिश्चन्द्र निरंतर इससे संबधित समाचार भेजते रहे।

एक दिन फरवरी की ठंडी सुबह जब वो पास के पहाड़ी के डारघर में खबर भेजने गये थे कि तभी नीचे से अल्जीरियनों का एक जलूस नारे लगाते आ रहा था। तारघर के पास बड़ी संख्या में फ्रांसिसी सशस्त्र पुलिस खड़ी थी, जिसका काम जलूस को आगे आने से रोकना था। वो तारघर से बाहर निकल ही रहे थे कि तभी गोलीबारी शुरू हो गई। कुछ ही देर में सड़क खून से लाल हो गई। कई अल्जीरियन सड़क पर मरे पड़े थे। हरिश्चन्द्र ने आंखों देखी इस घटना की खबर कई समाचार पत्रों को भेजी।
 
उपरोक्त के अतिरिक्त हरिश्चन्द्र ने इजरायल से अरबों की लडाई, फिलीस्तीनी क्रांति को भी कवर किया।

नागा भूमि का संघर्ष

हरिश्चन्द्र ने 1954 से 1960 के बीच चार सालों तक द टाइम्स ऑफ इंडिया के उत्तरपूर्व संवाददाता के तौर पर काम किया। इस दौरान उन्होंने उत्तरपूर्व की कई महत्वपूर्ण समस्याओं और घटनाओं को समाचार पत्र के माध्यम से लोगों के सामने लाया। इसमें नागाओं की लडाई महत्वपूर्ण थी।

नागालिम या नागा भूमि की लड़ाई विश्व की सबसे लंबी चली गुरूल्ला लड़ाईयों में एक है। सन् 1955 से प्रांरभ हुई लड़ाई के आज 56 साल हो चुके हैं। यह आने सामने में लड़ाई नहीं रही। बल्कि छिट-पुट गुरिल्ला युद्ध रहा। वर्ष 1997 से यहां युद्ध विराम है।
 
शुरूआत में नागाओं की लड़ाई राजनीतिक ही रही। सन् 1947 में भारत के अधिकार में आने के बाद नागाओं ने आंरभ के दशकों में आजादी अलावा कुछ नहीं मांगा। उल्लेखनीय है भारत सरकार व नागाओं के बीच कई दौर की वार्ताएं चली लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकल पाया। पत्रकार हरिश्चन्द्र चंदोला ने चार साल तक टाइम्स आफ इंडिया के लिए यहां से खबर लिखी। उन्होंने नागा गुरूल्लाओं के क्षेत्र में जाकर कई विवरण लिखे। वर्ष 1964 से 1968 तक वो भारत सरकार व नागाओं के बीच शांति वार्ता के सदस्य भी रहे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के अनुरोध पर हरिश्चन्द्र इस वार्तादल के सदस्य बने थे।

 

बृजेश सती

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