बाईस सुरक्षाकर्मी इस देश के महानतम अंधराष्ट्रवादी ऐंकर के आगे-पीछे तैनात रहेंगे!

Harsh Deo : टाइम्स नाउ के स्टूडियो में बैठकर तमाम स्वतंत्र चेता व्यक्तियों के विरुद्ध माइक पर बलबलाने वाला अर्णव गोस्वामी स्टूडियो से बाहर वाई श्रेणी की सरकारी हिफ़ाज़त में रहेगा! बेचारा राष्ट्रभक्तों की जर्सी गाय! उम्मीद नहीं थी इतने पतन की।

Mukesh Kumar : लो जी अब अर्नब गोस्वामी भी वाई कैटेगरी की सिक्योरिटी के साथ चलेंगे। बाईस सुरक्षाकर्मी इस देश के महानतम अंधराष्ट्रवादी ऐंकर के आगे-पीछे तैनात रहेंगे, ताकि पाकिस्तानी आतंकवादी उन्हें नुकसान न पहुँचा सकें (हालाँकि देश हित में तो शायद यही ठीक होगा कि आतंकवादी अगर मच्छर मारने की ख़तरनाक़ मुहिम पर निकले ही हैं तो वे कामयाब हो जाएं)। इसके पहले एक और अंधराष्ट्रवादी पत्रकार-ऐंकर को भी इसी तरह की सुरक्षा मुहैया कराई गई थी।

वरिष्ठ पत्रकार हर्ष देव और मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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अनुराग कश्यप का साहस काबिल-ए-तारीफ़ है

Mukesh Kumar : आम तौर पर फिल्म इंडस्ट्री कायरों से भरी पड़ी है (तथाकथित महानायक अमिताभ बच्चन इसकी सबसे बड़ी बानगी हैं)। एक-दो लोगों को छोड़कर कभी कोई खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करता। लेकिन अनुराग कश्यप ने जिस तरह से सीधे प्रधानमंत्री को आ़़ड़े हाथों लिया है वह काबिल-ए-तारीफ़ है और इसके लिए उन्हें शाबाशी दी जानी चाहिए। अंध राष्ट्रवादी नफ़रत और हिंसा के खिलाफ़ ये खुलकर बोलने का समय है। जो चुप हैं इतिहास उनको भी दर्ज़ कर रहा है।

Nadim S. Akhter : मैं फिल्मकार अनुराग कश्यप के साथ हूं. इस देश के हर नागरिक को अपने पीएम से एक नहीं, सैकड़ों सवाल पूछने का अधिकार है. प्रधानमंत्री हमारे सेवक हैं, मालिक नहीं. जो भक्त उन्हें ईश्वर का दर्जा देने पे तुले हुए हैं, वे कृपया लाइन से अलग हो जाएं. उन्हें बुलेट ट्रेन से लोकतंत्र की स्पेशल क्लास में भेजा जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार और नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी ने भी मोदी राज के आगे घुटने टेक दिए!

Mukesh Kumar : तो अब एनडीटीवी को भी घुटने टेकने पड़ गए हैं। सर्जिकल स्ट्राइक से जुड़े कवरेज को सेंसर करने के जो तर्क उसने दिए हैं वे न पत्रकारिता की कसौटी पर खरे उतरते हैं और न ही लोकतंत्र की। सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति करने या सेना पर संदेह करने वाली सामग्री नहीं दिखाने का ऐलान उसकी संपादकीय समझदारी के बजाय उसके भय को ज्यादा प्रतिध्वनित कर रहा है। प्रश्न और संदेह करना पत्रकारिता का बुनियादी काम है, मगर वह उसी से खुद को अलग कर रहा है। ये और कुछ नहीं राष्ट्रभक्ति का पाखंड है, जो दूसरे चैनल पहले से उससे बेहतर ढंग से कर रहे हैं। सरकार या सेना दोनों सही या ग़लत काम कर सकते हैं और मीडिया का ये दायित्व है कि वह दोनों ही को वस्तुपरक ढंग से रिपोर्ट करे।

ये शर्मनाक है कि उसने पी. चिदंबरम का इंटरव्यू और राहुल गाँधी का बयान नहीं दिखाया, जबकि इसी मसले पर अमित शाह की प्रेस कांफ्रेंस को लाइव किया। ये उसके डर जाने का सबूत तो है ही, उसके दोहरे रवैये का भी परिचायक है। उसे अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। हो सकता है कि उसे तनकर खड़े होने की सज़ा भुगतना पड़े और अंधराष्ट्रवादी उसे देशद्रोही घोषित कर दें (जो कि वे कर भी चुके हैं) मगर देश के प्रति वह अपनी जवाबदेही साबित तो कर सकेगा।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी समूह के संपादकीय नेतृत्व का पूरा नज़रिया अभिजातवर्गीय है : मुकेश कुमार

ये लोग लुटियन की दिल्ली और बॉलीवुड के सितारों से आगे देख ही नहीं पाते….

Mukesh Kumar : एनडीटीवी का पूरा चरित्र सेलेब्रिटी केंद्रित है, वह इससे उबर ही नहीं पाता। बीच-बीच मे एकाध कार्यक्रम या रिपोर्ट में दूसरे वर्ग भले आ जाएं मगर वह अपने इस मूल स्वभाव के अनुरूप ही व्यवहार करता रहता है। कोई समस्या हो या अभियान, उसकी प्रस्तुति तुरंत सेलेब्रिटीमय हो जाती है। स्क्रीन पर सेलेब्रिटी आकर जम जाते हैं और पूरे देश को ज्ञान देने लगते हैं। ये ज्ञान मोटे तौर पर अँग्रेज़ी में ही होता है। हिंदी के एक-दो चिकने चेहरे भी ले लिए जाते हैं और बीच-बीच में उन्हें भी थोड़ा-बहुत मौक़ा दे दिया जाता है मगर मोटे तौर पर अँग्रेज़ी के सेलेब्रिटी एंकर ही मोर्चा सँभालते हैं। शायद एनडीटीवी ने इसे एक फार्मूले की तरह ही अपना लिया है।

टाइगर बचाओ से लेकर स्वच्छता अभियान तक हर मामले में वही चमकते-दमकते चेहरों का जमावड़ा क्या ये नहीं बताता कि इस चैनल समूह के संपादकीय नेतृत्व का पूरा नज़रिया ही अभिजातवर्गीय है। ज़ाहिर है इसका असर काम करने वालों पर भी पड़ता ही होगा। सेलेब्रिटी पर ये निर्भरता निश्चय ही मार्केटिंग का ही फंडा है। बड़े ए़डवर्टाइजर, बड़े स्पांसर बड़े नामों से जुड़कर अपने प्रोडक्ट की छवि निर्माण का खेल खेलते हैं और चैनल उनके लिए साधन बन जाते हैं। सबसे ज़्यादा ये एनडीटीवी में ही होता है।

एनडीटीवी में बहुत सारी ख़ूबियाँ हैं, वह संतुलित रहता है, संयम से काम लेता है, चीख-पुकार से बचा हुआ है और तमाम चैनलों से उसका कंटेंट बेहतर होता है-पैकेजिंग के लिहाज़ से भी और कंटेंट के स्तर पर भी। अंध-विश्वासी एवं चमत्कार संबंधी अवैज्ञानिक किस्म के कार्यक्रम उस पर कभी नहीं दिखे। उसके जैसी विविधता भी किसी दूसरे चैनल में कम ही देखने को मिलती है। लेकिन उसका ये सेलेब्रिटी-प्रेम उसे दर्शकों से दूर कर रहा है। उसके पतन की एक वजह ये भी है। ये इस बात का भी प्रमाण है कि चैनल चलाने वालों की दृष्टि कितनी सीमित है। वह लुटियन की दिल्ली और बॉलीवुड के सितारों से आगे देख ही नहीं पाती।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी से सटने की कोशिश क्यों कर रहे अर्नब गोस्वामी?

Mukesh Kumar : अर्नब गोस्वामी की नीयत मुझे ठीक नहीं लगती। जिस तरह से चमचागीरी वाले अंदाज़ में उन्होंने पीएम को जन्मदिन पर बधाईयाँ दीं, उससे पता चलता है कि वे मोदी से सटने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पहले मोदी का नवनीत लेपन मार्का इंटरव्यू और हर रोज़ सरकार का ढोल पीटना बताता है कि उनके इरादे पत्रकारिता से इतर कुछ और भी हैं। विनीत जैन के कहने से वे ऐसा कर रहे होंगे, ये मुझे नहीं लगता।

मेरी समझ यही कहती है कि वे राजनीति में जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने अपना दाँव उस नेता और उस पार्टी पर लगा दिया है जिसके सितारे अभी बुलंद दिखलाई दे रहे हैं। हालाँकि राजनीति में अर्श से फर्श पर आने में देर भी नहीं लगती। लेकिन इतना जुआ तो खेलना पड़ता है। लगे रहो अर्नब भाई।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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बेचारी सुषमा स्वराज!

Mukesh Kumar : बेचारी सुषमा स्वराज। दुनिया भर से लोगों को बचाने के अभियान में लगी रहती हैं, मगर खुद को संकट से नहीं निकाल पा रहीं। विदेश नीति की इतनी बड़ी परीक्षा चल रही है और वे कहीं हाशिए पर फेंक दी गई हैं। किसी भी महत्वपूर्ण बैठक में उन्हें नहीं बुलाया जा रहा है, मानो उनका कोई वजूद ही न हो।

हाँ एक डिप्लोमेटिक मिशन का झुनझुना पकड़ा दिया गया है कि जाओ खूब बोलो, यही आपकी उपयोगिता है हमारे लिए। ब्राम्हणवादी-मर्दवादी नेताओं ने सचमुच में इस नारी के साथ वही किया है जो वे कर सकते हैं। मगर खुद सुष्मा स्वराज ने भी तो समर्पण कर रखा है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे?

Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी के पास डिग्री है तो सत्यमेव जयते के साथ ट्वीट क्यों नहीं कर दे रहे हैं। और नहीं कर रहे हैं तो भक्तों ने जैसे कन्हैया को नेता बनाया वैसे ही अरविन्द केजरीवाल की पार्टी को पंजाब चुनाव जीतने का मौका क्यों दे रहे हैं। भक्तों के उछलकूद का लाभ अरविन्द केजरीवाल को मिल रहा है। अलमारी में रखी डिग्री अंडा-बच्चा तो देती नहीं। ना बीमार होकर अस्पताल जाती है। आमलोगों की डिग्री तो पत्नी कहीं रख देगी, चूल्हा जला चुकी होगी या बच्चों के टिफिन पैक करके दे देगी। मोदी जी के साथ तो ये सब लफड़ा भी नहीं है। फिर इतनी देर?

डिग्री के मामले में अरविन्द केजरीवाल के दावे में दम लगता है। रही सही कसर चुप्पी से पूरी हो जा रही है। रेत में सिर छुपाने से काम नहीं चलता है। जितनी देर करेंगे उतने फंसेंगे। फिर इस्तीफा देने से कम में बात नहीं बनेगी। केजरीवाल को एक और श्रेय मिल जाएगा।

नरेन्द्र मोदी की डिग्री पर उठ रहे सवाल भाजपा के लिए बहुत मामूली हैं और सोनिया गांधी के रिश्वत लेने का मामला बहुत बड़ा। छप्पन ईंची सरकार की सीमा खुद तय हो रही है। ना सोनिया के खिलाफ कार्रवाई करेंगे ना मोदी पर आरोप का जवाब देंगे। आम आदमी पार्टी को तो अपना ही स्तर नहीं पता है। जय हो। यही हाल रहा तो देश की राजनीति में मजा ही नहीं रहेगा। एकदम गोबर हो जाएगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : इधर केजरीवाल बढ़-चढ़कर, ऐलानिया, खुल्लमखुल्ला, ताल ठोंकते हुए, डंके की चोट पर मोदी जी की डिग्रियों को फर्जी बता रहे हैंऔर उधर सरकार तथा बीजेपी दुबकी हुए है। वह चुप्पी धारण किए हुए है और इस कोशिश में है कि अगस्ता वेस्टलैंड के शोर-शराबे में केजरीवाल की आवाज़ दब जाए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। दूसरे इससे संदेह और भी पक्के होते जा रहे हैं कि मोदी ने फर्ज़ी डिग्रियाँ हासिल कीं और देश को उल्लू बनाया। प्रधानमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी राय बने ये न लोकतंत्र के लिए अच्छा है और न ही देश के लिए। ये उस हिंदुत्ववादी राजनीति पर भी कलंक होगा जो सदाचार को खुद की बपौती मानकर सबको दुषचरित्र साबित करने पर आमादा रहती है। इसलिए पार्टी और सरकार को सबूतों के साथ केजरीवाल के आरोपों का जवाब देना चाहिए, बल्कि उन पर क्रिमिनल डेफेमेशन का केस भी दायर कर देना चाहिए।

मोदीजी को दिल्ली सरकार और केजरीवाल टीम से निपटने की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने उनको काम न करने देने की चालें चलकर फुरसतिया बना दिया। अब ये तो सबको पता ही है कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। यही वजह है कि वे अपना वक़्त उनको परेशान करने के नए नए तरीके खोजने में लगा रहे हैं। अब अगर मोदीजी और उपराज्यापाल साहब इस रणनीति को उलट दें तो केजरीवाल सरकार काम में उलझकर रह जाएगी और उसके पास इतना समय ही नहीं रहेगा कि आपके खिलाफ़ खुराफ़ात में ही लगे रहें।

ये दिल्ली यूनिवर्सिटी भी केजरीवाल एंड कंपनी के साथ साज़िश में शामिल है। ये जान-बूझकर पीएम और आपकी डिग्रियों के बारे में भ्रम की स्थिति बनाकर अफवाहों और दुष्प्रचार को हवा दे रही है। स्मृति जी वीसी को तुरंत बर्खास्त करिए और न माने तो विवि ही बंद कर दीजिए। और अभी तक आपने सूचना आयुक्त को क्यों छोड़ रखा है? उसे भी उसके किए की सज़ा दीजिए। आरटीआई क्या इसी के लिए बनाई गई है कि आप हर कोई पीएम को बदनाम करने के लिए उसका इस्तेमाल करता फिरे। कड़ा सबक सिखाइए सबको।

अब तो प्रधानमंत्री को अपनी डिग्रियां निकालकर इन स्यूडो सेकुलरिस्टों और आपवालों के मुँह पर मारकर दिखा देना चाहिए कि ये लोग उनके बारे में जो अनर्गल प्रचार करते रहते हैं वह कितना झूठा है, कितना दुराग्रहों से प्रेरित है। स्मृति ईरानी आप भी मत छोड़िए इन नामुरादों को। वैसे तो ये नरक में जाएंगे ही और इनको कीड़े भी पड़ेंगे मगर ज़रूरी है कि आप लोगों की उज्ज्वल छवि देशवासियों और दुनिया के सामने और भी निखर करआए। आखिर आप देश के दो महत्वपूर्ण पदों पर बैठी महान विभूतियाँ हैं और आप लोग देश का नया इतिहास लिख रहे हैं। आपसे देशभक्तों को कितनी आशाएं हैं। उन्हें आप पर कितना विश्वास है ये आपसे बेहतर भला कौन जानता है। वे आप पर उछाले जा रहे कीचड़ से बहुत आहत हैं और उद्वेलित भी हैं। अगर संविधान और कानून न होता इस देश में तो वे एक को भी न छोड़ते। उम्मीद है आप लोग उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेंगे और विरोधियों को धूल चला देंगे। उन सबकी और मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दिल्ली सरकार ने फर्ज़ी वीडियो चलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर बेहद ज़रूरी काम किया है : मुकेश कुमार

Mukesh Kumar : जब केंद्र सरकार चुप हो, उसके मातहत काम करने वाली दिल्ली पुलिस चुप हो, चैनलों के संपादकों का संगठन चुप हो, एनबीए चुप हो, नियामक चुप हो, पत्रकारों के संगठन कुछ न कर रहे हों या कुछ न कर पा रहे हों तब दिल्ली सरकार ने फर्ज़ी वीडियो बनाने और चलाने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई करने की दिशा में क़दम उठाकर बेहद ज़रूरी काम किया है। अगर इस फर्जीवाड़े की प्रवृत्ति को रोका न गया तो ये न केवल मीडिया की बची-खुची साख को खा जाएगा, बल्कि पूरे देश को भारी संकटों में डालता रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टटेस पर आया जसबीर चावला का कमेंट इस प्रकार है…

Jasbir Chawla : सबके स्वार्थ साझे हैं. ये सब संगठन मत होकर तब बोलेंगे जब इन चैनलों के विरुद्ध दिल्ली सरकार सच में कोई कार्रवाही शुरू कर देगी. फिर इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी पर ख़तरा नजर आयेगा. दिल्ली सरकार के हर अच्छे कार्यक्रम की बखिया भी उधेड़ी जायेगी. केजरीवाल का मफ़लर, खाँसी सबकी खबर ली जायेगी. आप के आंतरिक मतभेदों की प्लांटेड ख़बरें आने लगेगी. लगेगा कि दिल्ली ही सारा देश है और सारे देश को दिल्ली में घटी हर खबर देखना चाहिये.

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टाइम्स नाऊ का लायसेंस रद्द कर अरनब गोस्वामी को जेल भेज देना चाहिए

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार का फर्जी वीडियो दिखाने में आगे रहने वाले न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ और इसके संपादक अरनब गोस्वामी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने फेसबुक पर एक संक्षिप्त पोस्ट लिखी है, जो इस प्रकार है :

Mukesh Kumar : सबसे पहले तो इसी ‘टाइम्स नाऊ’ चैनल का लायसेंस रद्द होना चाहिए और उसके बड़बोले संपादक-एंकर अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी, जो बात-बात पर घोषणा करता रहता है कि सबसे पहले उसके चैनल ने दिखाया, खबर ब्रेक की वगैरा वगैरा। अंधराष्ट्रवाद की ज़हरीली तरंगे फैलाने में इस चैनल ने सभी हदें लाँघ दी हैं। इसे इसका दंड मिलना ही चाहिए। कानून अपना काम कब करेगा?

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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माकपा के सवर्ण कम्युनिस्टों को सदबुद्धि आ गई…

Mukesh Kumar : शुक्र है कि माकपा को अब जाति व्यवस्था से उपजी सामाजिक विषमता के कारण होने वाले अत्याचारों एवं भेदभाव को अपनी नीति-रीति का हिस्सा बनाने की सद्बुद्धि आ गई है। सवर्णों के नेतृत्व ने उसे ऐसा करने से रोक रखा था, लेकिन सफाचट हो रहे जनाधार ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपना रवैया बदले और भारतीय परिस्थितियों में सामाजिक-आर्थिक विषमता को जोड़कर देखे।

लेकिन केवल नीतियों के स्तर पर इसे स्वीकारने से कुछ नहीं होगा। ज़रूरी है कि पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और स्त्रियों को संगठन में उचित हिस्सेदारी सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए अगर आरक्षण की व्यवस्था लागू करनी पड़े तो किया जाना चाहिए, वर्ना सवर्ण कभी उन्हें ऊपर नहीं आने देंगे। सवर्ण कम्युनिस्टों की मानसिक संरचना ऐसी है कि वे श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त रहते हैं और अपने मानदंडों पर ही सारे निर्णय लेने के लिए विवश करते हैं। इनके जाल से निकलकर ही पार्टी अपना जनाधार बढ़ा सकती है। लेकिन उसे ध्यान रखना होगा कि सामाजिक न्याय की उस नारेबाजी में भी न फँसे जिसमें लालू, मुलायम और मायावती वगैरा फँस गए हैं और उनकी राजनीति केवल खुद को किसी भी तरह सत्ता पर बनाए रखना है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से

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सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए

Om Thanvi : मुझे बहुत खुशी होगी, अगर सम-विषम प्रयोग सफल होता है। लेकिन सरकार को भी चाहिए कि आवागमन के वैकल्पिक, प्रदूषण रहित, साधनों की उपलब्धि में जी-जान लगा दे। दिल्ली की छाती पर एनसीआर हलकों में धुँआ उगलते वाहनों पर नियंत्रण के लिए पड़ोसी राज्यों की सरकारों से सहयोग की गुजारिश करनी चाहिए। एक और समस्या, जिसे तुरंत हल किया जाना चाहिए। रेडियो टैक्सी एक बेहतर सुविधा के रूप में विकसित हो रही है। लेकिन अपनी सफलता पर इतरा कर कंपनियां बेजा फायदा भी उठाने लगी हैं। मसलन ऊबर (Uber) को लें। “पीक आवर” अर्थात ज्यादा भीड़ के घंटों में चार-छः गुणा किराया झटकने लगे हैं। यह किसी की मजबूरी का फायदा उठाना है, सरासर ब्लैकमेलिंग है। दूसरी कंपनियां – जैसे मेरु (Meru) – तो ऐसा नहीं करतीं। कुछ टैक्सी संचालकों को लूट की यह आजादी क्यों?

दूसरा उदहारण, जिससे रेडियो टैक्सी प्रयोग हतोत्साहित हो रहा है: टी-3 के हवाई अड्डे पर – जहाँ से अधिकांश उड़ानें संचालित होती हैं – उतर कर ऊबर या ओला टैक्सी लें तो 150 रुपये भाड़े के अतिरिक्त ठोंके जाने लगे हैं। अन्य टैक्सी संचालक – ट्रेफिक पुलिस सेवा या मेरु – यह अतिरिक्त राशि नहीं लेते। यह क्या गड़बड़झाला है? किसी ने कहा, ऊबर-ओला टैक्सी की परिभाषा में नहीं आते इसलिए उनसे एयरपोर्ट अथॉरिटी सरचार्ज वसूलने लगी है। कुछ की राय है कि मेरु आदि अन्य महँगी सेवा वाली कंपनियों ने अपना धंधा उखड़ता देख यह दबाव बनवाया है। जो कारण हो, है यह अव्वल दरजे की बेवकूफी का नियम कि मेरु पर सरचार्ज नहीं, ऊबर-ओला पर लगेगा। वह भी दस-बीस रुपये नहीं, हर भाड़े पर 150 रुपये। सम-विषम दौर-दौरे में इस बड़े फच्चर को दूर करने का जतन तुरंत किया जाना चाहिए।

Mukesh Kumar : मैं दिल्ली में प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए किए जा रहे सम-विषम फार्मूले के प्रयोग का समर्थन करता हूँ। मुझे लगता है कि ढेर सारी परेशानियों के बावजूद इस तरह के प्रयोग ज़रूरी हैं। इनकी सफलता-असफलता से सबक लेकर आगे की रणनीति बनाई जा सकती है। वैसे भी ये कोई स्थायी उपाय नहीं है। जब कभी प्रदूषण का स्तर ख़तरनाक़ सीमा तक पहुँचेगा तभी इसे हफ़्ते या पंद्रह दिनों के लिए लागू किया जाएगा। ये भी हो सकता है कि प्रयोग के बाद इसे अव्यावहारिक पाया जाए और भविष्य में लागू ही न हो। इसलिए ज़्यादा हो हल्ला मचाने के बजाय सही ढंग से इस प्रयोग को करने में सहयोग करना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार द्वय ओम थानवी और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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शेखर गुप्ता की पीटर मुखर्जी, रवीना राज कोहली और स्टार टीवी के बारे में पढ़ने योग्य टिप्पणी

Mukesh Kumar : वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता की पीटर मुखर्जी, स्टार की सीईओ रह चुकी रवीना राज कोहली और स्टार टीवी के बारे में टिप्पणी पढ़ने योग्य है। ये अंश अख़बारों में प्रकाशित लेख से लिए गए हैं-

 

‘वे गंभीर, वरिष्ठ भारतीय संपादकों में से ‘सितारे’ इकट्‌ठा करना चाहते थे। सारे अंग्रेजी दुनिया से पर उन्हें पेश होना था उनके हिंदी चैनल पर। मेरे सामने इंटरव्यू आधारित कार्यक्रम ‘शेखर के शिखर’ की पेशकश रखी गई। उनके राडार पर अन्य दो अंग्रेजी के संपादक थे एमजे अकबर और वीर संघवी, जिनके सामने जैसा कि अनुमान था क्रमश: ‘अकबर का दरबार’ और ‘वीर के तीर’ का प्रस्ताव रखा गया। मैंने कहा कि ये तो बहुत ही साधारण शो लगते हैं। हम उबाऊ संपादकों को इकट्‌ठा कर ऐसे कार्यक्रम पेश करने का मतलब ही क्या हैं, जो मनोरंजक नज़र आते हैं? मुझे बताया गया कि यह तो ब्रैंडिंग है, ध्यान खींचने के लिए थोड़ा स्तर गिराना पड़ता है। मुझे सलाह दी गई, ‘ग्रो यंगर, शेखर डियर।’ मुझसे यह भी कहा गया कि सुर्खियां, ब्रैंड दर्शकों को आकर्षित करने के लिए यहां-वहां थोड़ी तोड़-मरोड़ कोई सस्तापन नहीं है, बल्कि आवश्यक है। रवीना ने मुझे झिड़की के स्वर में कहा, ‘इसीलिए तो तेरा अखबार नहीं बिकता। हमारे साथ काम शुरू करो और फिर देख तू।’

यहां गौरतलब है कि अपने चैनल को लेकर उनका यह रवैया था और मैं उसमें बेवजह ही शिकार हो रहा था- हालांकि, मैं उस शो के लिए राजी नहीं हुआ (कभी-कभी आप उचित फैसले कर लेते हैं), स्टार न्यूज़ चैनल मेरे स्टाफ में से बहुत ही अच्छे युवा साथियों का समूह लुभाकर ले गया। जल्दी ही चैनल बैठ गया और वे सारे कहीं के नहीं रहे। संभव है भारत अभी उस तरह के सस्तेपन के लिए भी तैयार नहीं है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि चैनल को अवीक सरकार ने खरीद लिया, जिसे अब एबीपी न्यूज़ कहते हैं। यह बहुत सफल भी है। यह विडंबना ही है कि ‘पिंजरे में परी’ ब्रेकिंग न्यूज एबीपी न्यूज़ पर ही चली थी। अब बारी वित्तीय नियमन माहौल की। मुखर्जी के वेंचर में सबसे बड़ा निवेश जिस फंड ने किया था, उसके कई प्रमुख संस्थापक शेयर बाजार में धोखाधड़ी के आरोप में अमेरिकी जेलों में पहुंच गए। इनमें रजत गुप्ता और राजरत्नम शामिल हैं। अनिल कुमार को प्रोबेशन मिला और कम से कम दो अन्य जांच के घेरे में हैं। इस तरह इसके पहले कि आप कहें कि मुखर्जियों ने निवेशकों को लूटा, यह पूछें कि वित्तीय जगत की ये होशियार शख्सियतें क्या कर रही थीं? मर्डोक का ‘स्टार’ तब बड़ी खुशी से भारतीय नियमन तंत्र से खिलवाड़ कर रहा था। जहां समाचार माध्यमों के विदेशी स्वामित्व पर रोक थी, ये लोग स्वामित्व की कठपुतली रचनाएं और बेनामी बिचौलिए खड़े कर रहे थे।’

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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केंद्र सरकार ने केबल एक्ट 1995 में चुपचाप संशोधन कर चैनलों को नोटिस जारी कर दिया, हम सब कब जगेंगे!

Mukesh Kumar : केंद्र सरकार ने केबल एक्ट 1995 में चुपचाप संशोधन करके 21 मार्च को गज़ट में अधिसूचना जारी कर दी और उसके आधार पर तीन चैनलों को नोटिस भी दे दिया। ख़ैर सरकार से इससे बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि वह तो पहले दिन से मीडिया को नाथने में लगी हुई है। एडिटर्स गिल्ड और बीईए ने ठीक ही सरकार की इस सेंसरशिप का कड़ा विरोध किया है।

लेकिन अब चैनलों को ही नहीं पूरे मीडिया को तय करना है कि वह इस निरंकुशता के सामने घुटने टेकेगा या दो-दो हाथ करेगा। मेरे खयाल से तो चैनलों को नोटिस का जवाब ही नहीं देना चाहिए और तमाम मीडिया कर्मियों को एकजुट होकर आंदोलन छेड़ना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मालिकों और बाज़ार से भी ख़तरा है, मगर सत्ता के पास जिस तरह की शक्ति और दमन के हथियार होते हैं वे उनके पास नहीं होते। इसलिए सरकार द्वारा मीडिया पर अंकुश लगाने की कोशिशों का सबसे पहले विरोध होना चाहिए।

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पब्लिक ब्रा़डकस्टर प्रसार भारती के मातहत चलने वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी तो पहले से ही सरकारी भोंपू थे मगर अब सरकार उसे पालतू कुत्ता बनाने पर आमादा है। वह उनके अधिकारियों को बुलाकर क्लास ले रही है, जबकि उसको ऐसा करने का अधिकार भी नहीं है। इस लिंक में पढ़िए कि कैसी-कैसी ख़बरों पर सरकार उन्हें हड़का रही है। http://goo.gl/ohjgf2

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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तो इसलिए टेलीविजन मीडिया में दर्शक हाशिए पर जा रहा है

भोपाल, 1 अगस्त । प्रख्यात जनसंचार शास्त्री मार्शल मेक्लुहान का कथन है कि ‘माध्यम ही संदेश है’। वर्तमान भारतीय मीडिया की स्थिति को देखकर आज यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ‘स्वामित्व ही संदेश है’। आज समाचारपत्र, टेलीविजन एवं अन्य मीडिया संस्थानों के मालिकों द्वारा तय किए गए विचार ही मीडिया में दिखाई देते हैं। यह विचार आज माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में वरिष्ठ पत्रकार श्री मुकेश कुमार ने व्यक्त किए।

आज विश्वविद्यालय परिसर में श्री मुकेश कुमार की नई पुस्तक ‘टी.आर.पी: टी.वी. न्यूज और बाजार’ पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस प्रसंग पर बोलते हुए श्री मुकेश कुमार ने कहा कि टी.आर.पी. की वास्तविकता एवं टी.आर.पी. पर भारतीय मीडिया जगत का विचार जानने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का सर्वेक्षण किया गया। तमाम कमियों एवं आलोचनाओं के बावजूद टी.आर.पी. के आकड़ों से ही आज भारतीय टेलीविजन मीडिया संचालित हो रहा है। एक ओर मीडिया संस्थाओं को मीडिया मालिकों के हितों को ध्यान में रखना है वहीं दूसरी ओर टी.आर.पी. के आकड़ों के अनुसार अपनी विषय सामग्री बनानी है। ऐसे दौर में टेलीविजन मीडिया में दर्शक हाशिए पर जा रहा है। लोग अपने-अपने हिसाब से टी.आर.पी. का उपयोग कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मीडिया के संचालन के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है और यह बाजार से प्राप्त होती है। इसीलिए आज की मीडिया को बाजार संचालित करता है। टी.आर.पी. हमें सिर्फ यह नहीं बताता की कौन-सा चैनल, कौन-सा कार्यक्रम नंबर वन है, बल्कि वह एक मार्केट पर्शेप्सन भी देता है। आज संपूर्ण टेलीविजन जगत में समाचार चैनलों का केवल 7 प्रतिशत शेयर है और इसमें भी अंग्रेजी न्यूज चैनल का केवल 0.3 प्रतिशत शेयर है।

इस परिचर्चा में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने भी सहभगिता की। विश्वविद्यालय के विज्ञापन एवं जनसंपर्क विभाग एवं संचार शोध के विद्यार्थियों ने परिचर्चा में हिस्सा लिया। परिचर्चा में ए.बी.पी. न्यूज के ब्यूरो चीफ वरिष्ठ पत्रकार श्री बृजेश राजपूत भी उपस्थित थे। इसके अतिरिक्त जनसंपर्क विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. पवित्र श्रीवास्तव, संचार शोध विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. मोनिका वर्मा एवं अन्य शिक्षक उपस्थित थे।

प्रेस विज्ञप्ति

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चुनाव जीतने के बाद सामने आने लगी अहंकारी केजरीवाल की असलियत

Mukesh Kumar : अहंकारी कौन? केजरीवाल या प्रशांत-योगेंद्र?? मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद केजरीवाल ने कहा था कि राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव लड़ने का फ़ैसला अहंकार से प्रेरित था। फिर उन्होंने इस फ़ैसले को नकारते हुए इसके पैरोकारों को पीएसी से बाहर कर दिया। अब वे कह रहे हैं कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अपना विस्तार करेगी। सवाल उठता है कौन अहंकारी है? कहीं ये केजरीवाल का अहंकार तो नहीं बोल रहा था कि मेरे होते हुए फ़ैसला करने वाले तुम तुच्छ लोग कौन होते हो? फैसला करने का हक मेरा और मेरे चमचों का है, किसी और का नहीं इसलिए अब का फ़ैसला सही है और अहंकार रहित है। इस पाखंड पर बलिहारी जाने का मन करता है।

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कैसी अजीब पार्टी है। पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने का विरोध करते हुए पहले केजरीवाल कहते हैं हम कोई नेपोलियन थोड़े हीं हैं जो विक्टरी मार्च निकालेंगे। सरे आम उन नेताओं को अपमानित करते हैं जो दूसरे राज्यों में पार्टी के विस्तार की बात करते हैं और अब फ़ैसला करते हैं कि पार्टी को राष्ट्रीय बनाएंगे। कितना दिग्भ्रमित है नेतृत्व और कहाँ जाएगी ये पार्टी?

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आप कार्यकर्ताओं की क्लास क्यों, नेताओं की क्यों नहीं? कितना हास्यास्पद है कि आप अपने कार्यकर्ताओं को राजनीति के पाठ पढ़ाने के लिए क्लास लगाने जा रही है। सब देख रहे हैं कि कार्यकर्ताओं ने नहीं उसके नेताओं ने राजनीतिक अपरिपक्वता का प्रदर्शन किया और वास्तव में उन्हें सीखने की ज़रूरत है। कार्यकर्ताओं ने तो बल्कि संयम और समझदारी ही दिखाई। नेताओं के लिए कार्यकर्ता क्लास लगाएं तो पार्टी के लिए बेहतर होगा।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल सरकार भी बांटने लगी रेवड़ियां, संसदीय सचिव बनाकार 21 MLA को मंत्री पद का दर्ज़ा दिया

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‘आप’ की हरकतें कहीं से भी उसे देश की दूसरी पार्टियों से अलग नहीं करती है

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केजरीवाल सरकार भी बांटने लगी रेवड़ियां, संसदीय सचिव बनाकार 21 MLA को मंत्री पद का दर्ज़ा दिया

Mukesh Kumar :  दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी रेवड़ियां बाँटने लगी है। इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बनाकार मंत्री पद का दर्ज़ा दे दिया गया है। इतने संसदीय सचिव देश के किसी भी राज्य में नहीं हैं। बहुत से राज्यों में तो ये हैं ही नहीं। लगता है किसी असंतोष को दबाने के लिए ऐसा किया गया है, क्योंकि दिल्ली जैसे आधे-अधूरे और छोटे से राज्य में तीन-चार संसदीय सचिवों से काम चल सकता था, इसके लिए इस पैमाने पर रिश्वत ब़ॉटने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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प्रशांत भूषण की ओर से दोस्ती का हाथ बढ़ाने पर केजरीवाल क्या करेंगे? अगर दूर की सोचेंगे, पार्टी की सोचेंगे, परिवर्तन की सोचेंगे तो हाथ थाम लेंगे। अगर अपनी सोचेंगे, चमचों की सोचेंगे, केवल दिल्ली सरकार की सोचेंगे, तो मुँह मोड़ लेंगे।

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कार्पोरेट जासूसी में पत्रकारों की भूमिका पर बहुत कम बात हो रही है। राडिया मामले में पहली बार इस पर जमकर चर्चा हुई थी, मगर उसके बाद सन्नाटा छा गया था। हाल में जासूसी की घटनाओं के बाद एक बार फिर से इस ओर ध्यान गया है मगर मीडिया में कोई चर्चा नहीं हो रही। न तो शांतनु सैकिया के बारे में लिखा जा रहा है और न ही उन आधा दर्ज़न पत्रकारों के बारे में जिन्हें कार्पोरेट की दलाली करने के आरोप में या तो नौकरी छोड़नी पड़ी या उन्हें हटा दिया गया। आख़िर ऐसा क्यों है?

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.


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ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।

Om Thanvi : तमाम एग्जिट पोल नतीजों के समान रुख से उन लोगों के मुंह बंद हुए (जो बचे उनके असल नतीजे के रोज हो जाएंगे) जो लोगों के चेहरों को नहीं पढ़ना चाहते, न हवा में तैरती गंध भांप पाते हैं। आज कई चैनलों पर जाना हुआ, कई पत्रकार मित्रों से मुलाकात हुई; यह सुनना अच्छा लगा कि जनता के बदलते मानस का हमें बेहतर अंदाजा हुआ और उसे उसी भाव में निरंतर हमने कहा भी। इस जोखिम के बावजूद कि पक्षपात और बिकाऊ हो जाने जैसे आरोप झेलने होंगे। सच्चाई यह है कि इस समर में केंद्र की विराट ताकत की हार, दिग्गज नेताओं की फौज के पराभव, पूंजीपतियों की थैलियों की निरर्थकता और जाति-धर्म आदि जैसे अनेक ध्रुवों के मिथक टूटने की सम्भावना कदम-कदम पर जाहिर थी। बहरहाल, ‘आप’ पार्टी के समर्थन में उमड़ा जन-सैलाब दिल्ली प्रदेश में ही नहीं, केंद्र की राजनीति के लिए भी नया आगाज है – यह बदलाव राजनीति के समूचे ढर्रे को प्रभावित करेगा। कुछ ज्यादा कह दिया क्या? इंतजार कीजिए और देखते रहिए। देश की राजनीति का रंग और तेवर अब बदलना ही चाहिए। क्या कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल नए संदेश और निहितार्थ समझ रहे हैं? और मोदीजी, आपके लिए डॉ लोहिया का संदेश — सुधरो या टूटो। इससे पहले कि संघ – और प्रकारांतर से पार्टी – अपनी ताकत फिर दिखाने लगे। ‘गुड गवर्नेन्स’ का झांसा नारे की शक्ल में बहुत ज्यादा खिंचेगा नहीं, जब लोग दिल्ली के छोटे-से शासन तंत्र से उसे जोड़कर देखने लगेंगे। ये केजरीवाल, जो सुबह हजामत करवाकर बैठा है, बड़ी जालिम चीज है!

Sanjaya Kumar Singh : एक्जिट पॉल के नतीजे देखने के बाद मुझे भाजपा के विज्ञापन याद आ रहे हैं। मैने सब लिख रखे हैं आज ये देखिए, “मैं किरण बेदी। दिल्ली में जब विकास की बात चली तो हमारे लोकप्रिय जननायक श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसकी कमान मेरे हाथों में दी और कहा, दिल्ली से आप पिछले 40 सालों से जुड़ी हैं अब थोड़ी सेवा और करनी है। मेरा ये मानना है कि दिल्ली में विकास का ये काम हम मिलजुल कर ही कर सकते हैं। इसलिए इस बार हमें भाजपा को पूर्ण बहुमत से जीताना है। मेरा दिल्ली वालों से वादा है कि हम आपको एक सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त राजधानी देंगे।” चलो चलें मोदी के साथ, अबकी बार मोदी सरकार और घर-घर में मोदी के बाद इस विज्ञापन में खुद किरण बेदी कहती हैं, “विकास का ये काम मिल-जुल कर ही कर सकते हैं।” सवाल ये उठता है कि मिल-जुल कर ही विकास करना था तो दिल्ली भाजपा के पुराने, अनुभवी नेताओं के साथ मिलजुल कर जीतने की कोशिश क्यों नहीं की गई। और मिल-जुल कर ही करना था तो दिल्ली में मोदी जी को किरण या क्रेन सेतु की जरूरत क्यों पड़ी। ना पार्टी ने स्पष्ट किया ना मतदाताओं को समझ में आया। मतदान के बाद किरण बेदी ने भाजपा के प्रति जो कृतज्ञता दिखाई उससे भी लगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए नहीं, किरण बेदी को बनाने के लिए ज्यादा जोर लगा रही थी। वरना क्या कारण है कि मास्टर स्ट्रोक इस तरह फिस्स हो गया। देखिए, चुनाव परिणाम अगर एक्जिट पॉल जैसे ही रहे तो भाजपा शायद इसपर विचार करे और कुछ समझ में आए। मै समझ रहा था कि भाजपा अगर दिल्ली में हार भी गई तो किरण बेदी का राज्यपाल बनना तय है। पर किरण बेदी 40 साल दिल्ली में ही रही हैं, बाहर तो वो टिक ही नहीं पाईं – चंडीगढ़ भी नहीं। गवरनर कहां की बनाई जाएंगी। कोई अनुमान?

Jaishankar Gupta : हमने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव के समय भी तमाम ओपीनियन और एक्जिट पोल्स को खारिज करते सार्वजनिक तौर पर, एक टीवी चैनल पर वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों के साथ चुनावी चर्चा में कहा था कि आप को 30 से कम सीटें नहीं मिलेंगी। तब कोई मानने को तैयार न था। इस बार भी शुरू से हमारा मानना रहा है कि आप को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा, लेकिन केजरीवाल के बारे में प्रधानमंत्री मोदी जी और उनकी पार्टी के बौने हो गए बडे नेताओं के मुंह से ‘सुभाषित’ झरने लगे, बौखलाहट में भाजपा की चुनावी राजनीति के चाणक्य और खासतौर से लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के सूत्रधार स्वनामधन्य अमित शाह जी ने मतदान से दो दिन पहले अपना रणनीतिक ज्ञान बांटा कि विदेश में जमा कालाधन लाकर र भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रु. जमा करने का वादा चुनावी जुमला भर था और यह भी कि दिल्ली का यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर रेफरेंडम नहीं माना जाना चाहिए, उसके बाद हमने कहना शुरू किया कि ‘आप’ को 40 से अधिक सीटें मिल सकती हैं। पता नहीं सीटों का आंकडा कहां जाकर फीट बैठेगा। दस फरवरी को सब पता चल जाएगा।

Mukesh Kumar : सारे एक्जिट पोल आम आदमी पार्टी की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। हालाँकि अंतिम परिणाम आने बाक़ी हैं लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दस लाख का सूट पहनकर अपनी हार स्वीकार करने की तैयारी नहीं कर लेनी चाहिए। उन्होंने अपने विज्ञापनों में कहा था कि जो देश सोच रहा है वह दिल्ली सोचती है, तो देश ने दिल्ली के ज़रिए संदेश दे दिया है कि उन्हें न तो उनका अंदाज़ रास आ रहा है और न ही उनकी सरकार का चाल-चलन। अपने परिवार के कुकर्मों पर चुप्पी साधे रहने और कुछ न करने का उनका अंदाज भी उनके पाप के घड़े को भर रहा है। क्या वे चेतेंगे? उनके महारणनीतिकार और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह समाज को तोड़-फोड़ कर जिस तरह की राजनीतिक बिसात बिछाकर विजय हासिल करने का नुस्खा आजमाते रहे हैं, उनके लिए भी इस हार में संदेश छिपा है। ओबामा की मत सुनिए मगर दिल्ली और देश की आवाज़ तो सुन लीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, जयशंकर गुप्त और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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एनडीटीवी प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को पूरी तरह घेर लिया

Shambhunath Shukla : एक अच्छा पत्रकार वही है जो नेता को अपने बोल-बचन से घेर ले। बेचारा नेता तर्क ही न दे पाए और हताशा में अंट-शंट बकने लगे। खासकर टीवी पत्रकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है। बीस जनवरी को एनडीटीवी पर प्राइम टाइम में Ravish Kumar और अभय दुबे ने भाजपा प्रवक्ता नलिन कोहली को ऐसा घेरा कि उन्हें जवाब तक नहीं सूझ सका। अकेले कोहली ही नहीं कांग्रेस के प्रवक्ता जय प्रकाश अग्रवाल भी लडख़ड़ा गए। नौसिखुआ पत्रकारों को इन दिग्गजों से सीखना चाहिए कि कैसे टीवी पत्रकारिता की जाए और कैसे डिबेट में शामिल वरिष्ठ पत्रकार संचालन कर रहे पत्रकार के साथ सही और तार्किक मुद्दे पर एकजुटता दिखाएं। पत्रकार इसी समाज का हिस्सा है। राजनीति, अर्थनीति और समाजनीति उसे भी प्रभावित करेगी। निष्पक्ष तो कोई बेजान चीज ही हो सकती है। मगर एक चेतन प्राणी को पक्षकार तो बनना ही पड़ेगा। अब देखना यह है कि यह पक्षधरता किसके साथ है। जो पत्रकार जनता के साथ हैं, वे निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं।

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल) नहीं होती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई मनोज तिवारी, जगदीश मुखी, विजय कुमार मल्होत्रा या स्मृति ईरानी हो सकता था। पर मोदी की दिल्ली रैली के बाद पार्टी को लगा कि बेहतर विकल्प की जरूरत है और किरण बेदी परिदृश्य में आईं। बेशक यह दिल्ली के लिए बेहतर विकल्प है। दूसरे संभावित उम्मीदवारों से अच्छी हैं। दिल्ली को लाभ हुआ है। भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी से परेशान है। मोदी के नाम पर वोट मांगने की रणनीति बदलनी पड़ी। भाजपा को केजरीवाल से (बादल + चौटाला+पवार से भी) ज्यादा डर लग रहा है। यह अच्छी बात है। अरविन्द केजरीवाल के कारण ही हम देख रहे हैं कि संघ से बाहर का भी कोई व्यक्ति भाजपा का चेहरा बन पाया। और मोदी ही हर जगह भाजपा के चेहरा नहीं रहेंगे। यह भी अच्छी बात है, सकारात्मक है। अगर हम एक ईमानदार और अच्छी साख वाली ताकत बना सकें तो स्थापित राष्ट्रीय पार्टियां ईमानदार नए चेहरों को जोड़ने के लिए मजबूर होंगी। इस दबाव को बनाए रखने की जरूरत है। आप को समर्थन का मतलब है राष्ट्रीय दलों को जनता के प्रति अपना व्यवहार बदलने के लिए मजबूर करना।

Mukesh Kumar : केजरीवाल का कहना सही लगता है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी नाक बचाने के लिए किरण बेदी को आनन-फानन में मुख्यंमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रोजेक्ट कर दिया है। अब अगर हारे तो ठीकरा बेदी के सिर फूटेगा और जीते तो कहा जाएगा मोदी बड़े रणनीतिकार हैं। लेकिन दिल्ली की हार मोदी एंड कंपनी के लिए बड़ी हार होगी और इसके ब़ड़े प्रभाव भविष्य की राजनीति पर देखने को मिलेंगे। आपको क्या लगता है, बेदी के कंधों पर रखकर बंदूक चलाने के इस प्रयोग से मोदी दिल्ली बचा पाएंगे?

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला, संजय कुमार सिंह और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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It is hard to be loved by Idiots… मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है…

Arun Maheshwari : ग्यारह जनवरी को दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों के हत्याकांड के बाद आज सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर सन् 2007 एक मुकदमा चला था। तब इस पत्रिका में डैनिस अखबार ‘जिलैट पोस्तन’ में छपे इस्लामी उग्रपंथियों पर व्यंग्य करने वाले कार्टूनों को पुनर्प्रकाशित किया गया था। इसपर पूरे पश्चिम एशिया में भारी बवाल मचा था। फ्रांस के कई मुस्लिम संगठनों ने, जिनमें पेरिस की जामा मस्जिद भी शामिल थी, शार्ली एब्दो पर यह कह कर मुकदमा किया कि इसमें इस्लाम का सरेआम अपमान किया गया है। लेकिन, न्यायाधीशों ने इस मुकदमे को खारिज करते हुए साफ राय दी कि इसमें मुसलमानों के खिलाफ नहीं, इस्लामी उग्रपंथियों के खिलाफ व्यंग्य किया गया है।

उसी समय, सन् 2008 में फिल्मकार डैनियला लिकोंत ने इस मुकदमे पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई – It is hard to be loved by Idiots ( मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है)। फ्रांस के वर्तमान राष़्ट्रपति फ्रांस्वा ओलेंद ने उसी डाक्यूमेंट्री में यह बात कही थी – ‘कुछ स्वतंत्रताएं ऐसी है जिन पर कोई बात नहीं हो सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं की जा सकती है।’’

डैनियला लिकोंत की इस डाक्यूमेंट्री पर तब लोगों का विशेष ध्यान नहीं गया था। लेकिन आज यही डाक्यूमेंट्री फ्रांस के लोगों के प्रतिवाद और ‘शार्ली एब्दो’ के प्रति एकजुटता का प्रतीक बन गयी है। वहां के फिल्म समाज ने यह निर्णय लिया है कि देश भर के सौ से भी ज्यादा सिनेमागृहों में इस डाक्यूमेंट्री का पूरे एक हफ्ते तक प्रदर्शन किया जायेगा। इसमें पेरिस, मार्सै, स्ट्रासबेरी, ले हाफ्रे की तरह के बड़े शहरों से लेकर वहां के ब्रिटेनी की प्लुएस्केत जैसे छोटे शहरों के सिनेमागृह भी शामिल है। इससे होने वाली आमदनी को ‘शार्ली एब्दो’ को सौंप दिया जायेगा।

अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैमरून ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए पोप के तर्क को खुले आम खारिज़ कर दिया है। पोप ने आस्था के अपमान का सवाल उठाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध किया था। कैमरून का कहना है कि किसी स्वतंत्र समाज में किसी धार्मिक आस्था को आहत करने का अधिकार होना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद भी यही रुख़ अख़्तियार किया ता। विडंबना देखिए कि ऐसा साहस छप्पन इंच की छाती वाले नहीं दिखाते। साधु-संतों के ऊल-जलूल बयानों पर मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव टाइप चुप्पी साध जाते हैं।

मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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बेचारे मनोज तिवारी सच बोलकर फँस गए… किरण बेदी की थानेदारी चल पड़ी…

Mukesh Kumar : बीजेपी में किरण बेदी की थानेदारी चल पड़ी है। बेचारे मनोज तिवारी सच बोलकर फँस गए। सांसदों से कार्यकर्ताओं की तरह व्यवहार करने वाली किरण बेदी ने उनकी शिकायत हाईकमान से कर दी और मनोज बाबू को झाड़ पड़ गई। बेदी के आने से दिल्ली बीजेपी में सिर फुट्व्वल का ये एक नमूना भर है। अभी बहुतेरे हैं जो नाखुश हैं और मौका मिलते ही हिसाब चुकता करेंगे।

बेदी ने हाईकमान को साध लिया है और चापलूसी में भी वे सबसे आगे निकल गई हैं। मधु किश्वर और स्मृति ईरानी को नया चैलेंजर मिल गया है। आख़िर बेदी ने मोदी को दुनिया का सबसे खूबसूरत नेता कहकर पार्टी में अपनी जगह को पुख्ता तो किया ही है, चापलूसी परंपरा को भी मज़बूती प्रदान की है। सीधी सी बात है बीजेपी में रहना है तो जय मोदी कहना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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अटल जी की पार्टी आज संसद को धता बताकर एक के बाद एक दस अध्यादेश जारी कर रही है

Mukesh Kumar : संसद सजावट की वस्तु है? तेईस-चौबीस साल पहले एक दूरदर्शन के लिए एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी-संसद से सड़क तक। ये फिल्म बीजेपी और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा संसद की कार्रवाई को हफ़्तों तक ठप करने को लेकर थी। उस समय पंडित सुखराम के टेलीकॉम घोटाले की गूँज चारों ओर थी और विपक्षी दल उत्तेजित थे। इस फिल्म के लिए मैंने भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का लंबा इंटरव्यू किया था, जिसमें उन्होंने संसद के बहिष्कार को जायज़ ठहराते हुए कहा था- संसद कोई सजावट की, प्रसाधन की वस्तु नहीं है।

आज उनकी पार्टी संसद को धता बताकर एक के बाद एक दस अध्यादेश जारी कर रही है। उसने सचमुच में संसद को प्रसाधन की वस्तु बना दिया है। ये परंपरा भी उसने मनमोहन सरकार से ही ग्रहण की है, क्योंकि उसने भी इसी तरह अध्यादेश-राज कायम कर रखा था। संसद को इस तरह से बाईपास करना बढ़ती निरंकुशता का द्योतक है। क्या इस निरंकुशता का कोई इलाज है हमारे पास?

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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एमजे अकबर के इस अधोपतन को कैसे देखा जाए

(मुकेश कुमार)


Mukesh Kumar : एक अच्छा खासा पत्रकार और लेखक सिर्फ सत्ता प्रतिष्ठान का अंग बनने के प्रलोभन में किस तरह प्रतिक्रियावादी हो जाता है इसकी मिसाल हैं एमजे अकबर। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका लेख इसे साबित करता है। उन्होंने इस्लामी पुनरुत्थानवाद को आटोमन और मुग़ल साम्राज्य से जोड़कर प्रस्तुत किया है, लेकिन कहीं भी ज़िक्र नहीं किया है कि तमाम पुनरूत्थानवादी शक्तियाँ दरअसल ऐसे ही कथित गौरवशाली अतीत को वर्तमान में तब्दील करने की कोशिश करते नफरत और हिंसा का अभियान चलाती हैं।

उनकी पार्टी और विशाल संघ परिवार भी जिस अखंड भारत, राम राज और सोने की चिड़िया की बात करता है, वह भी दरअसल, इसी सोच और भावना से प्रेरित है। आईएस के खलीफ़त की तरह वह भी पाकिस्तान तथा अफ़गानिस्तान तक दावा ठोंकता है और उसी हिसाब से विस्तार की कामना करते हुए अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करता है। यही हाल ईसाईयत का है और अन्य धर्मों तथा संस्कृति को मानने वालों के वर्ग का भी।

अफसोस कि अकबर ये भी देखने में चूक गए कि कट्टरपंथी इस्लाम के उभार में अमेरिका, सऊदी अरब और उनके तमाम मित्र देशों की क्या भूमिका है। उन्हें सबसे पहले कट्टरपंथी विचारों, हथियारों और धन-धान्य से जिन्होंने लैस किया उन्हें कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। ये पूरा रायता सोवियत संघ को नेस्तनाबूद करने और पेट्रोलियम पदार्थों पर अपना नियंत्रण कायम करने के लिए किया गया। अगर अकबर इस अंतरराष्ट्रीय राजनीति (जिसमें अर्थनीति एवं सामरिक लक्ष्य भी शामिल हैं) पर ग़ौर किया होता तो इतनी हल्की टिप्पणी नहीं करते, लेकिन वे अब एक दूसरे नज़रिए से लैस हैं। हो सकता है ये लेख हमें आपको नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पढ़ाने के लिए लिखा गया हो, ताकि वे प्रसन्न होकर कुछ बख्शीश आदि बख्श दें।

अगर समग्रता में एमजे इसे देखते तो वे ऐसा तंग नज़रिया नहीं अपनाते। यदि उन्होंने ये लेख बीजेपी के प्रवक्ता तौर पर लिखा है तो उन्हें स्पष्ट रूप से पहले ही कह देना चाहिए था और इस आधार पर उन्हें माफ़ किया जा सकता था, क्योंकि वे तो पार्टी के कार्यकर्ता की ज़िम्मेदारी निभा रहे थे। लेकिन बतौर लेखक ये लेख उन्हें संदिग्ध बनाता है, उनकी समझ पर प्रश्नचिन्ह लगाता है।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Arun Khare : इस देश की अखबार पढने वाली जनता बहुत समझदार हो चुकी है ।लिखा हुआ पढ कर लेखक की औकात समझ लेती है । अब दलीय प्रतिबद्धता वाले लेखक डस्टबिन में डाल दिए जाते
Mukesh Kumar नहीं अरुण जी, दलीय प्रतिबद्धता वाले पत्रकार पुरस्कृत भी हो रहे हैं, महिमामंडित भी। अभी एक चैनल के पत्रकार प्रमुख का भव्य आयोजन देखा नहीं आपने। यही वजह है कि पत्रकारों में भी सत्ता प्रतिष्ठान का अंग बनने की होड़ लगी रहती है। पहले भी लगती थी, आज भी लगी हुई है। रही बात पाठकों की तो वे जाएं भाड़ में। उन्हें उनसे जितना मतलब था वह सिद्ध हो चुका है।

Arun Khare : पैसे का सम्मान भी अब जनता देख रही है मुकेश भाई । इसी लिए सम्मानों का सम्मान भी तो घटने लगा है।

Maithily Gupta : जब भी कोई मेरे मन मुताबिक बात नहीं कहता तो मैं भी यही सोचता हूम कि उसका अधोपतन हो गया है,

Om Prakash : पूँजी ही आतंकराज और आतंकवाद का जड है। जिन बस्तर आसाम अफगान को खाने और रहने के लिए घर नहीं उन्हें हथियार कहाँ से आया। छत्तीसगढ़ आंध्रप्रदेश मे आदिवासी नक्सली माओवादी सलवा जुडूम पुलिस का खेल पूँजी और साम्राज्यवादी द्वारा संचालित है। आप अकबर जी की बात कर रहे है। यहाँ तो भारत के पूर्व और वर्तमान मुख्य न्यायधीस भी मोदी और भाजपा के चाटुकारिता मे लगे है।

Sanjay Khare : M J Akabar always known progovernment journalist. Some years ago he was psychofan of Arjun Singh. Why is he being given so importance.

Mukesh Kumar : मैथिली जी अगर चीज़ों के इतना सतही और सरलीकृत करना हो तो बेहतर है चुप ही रहा जाए। जो कुछ कहा गया है तर्कों के साथ। अगर आपके पास तर्क हों तो रखिए और तब विमर्श को आगे बढ़ाइए। बातों को हल्का करने का ये हुनर कहीं और आज़माइए।

Girijesh Vashistha : अकबर मौकापरस्त हैं. न इस से एक इंच इधर न उधर .

Mukesh Kumar : Sanjay, This is not that we are giving him any importance. I was just pointing out that how he is being selective while putting forward his point of view and this shows his downfall as a journalist. If he is still having a journalist in his heart, he must follow the basic rules of journalism. One might have difference of opinion but nobody can deny that he was a good journalist and prolific writer as well.

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