हिंदुस्‍तान के सीईओ अमित चोपड़ा का इस्‍तीफा

हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर लिमिटेड से बड़ी खबर आ रही है कि सीईओ अमित चोपड़ा का संस्‍थान से नाता टूटने वाला है. बताया जा रहा है कि अमित चोपड़ा ने संस्‍थान को इस्‍तीफा दे दिया है. वे इस दौरान नोटिस पीरियड पर चल रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि वे स्‍टार समूह के किसी वेंचर से जुड़ने जा रहे हैं. वैसे अमित चोपड़ा को लेकर दूसरी चर्चा यह भी है कि उनके परफार्मेंस को देखते हुए प्रबंधन ने गाज गिराई है. वे लम्‍बे समय से एचएमवीएल को अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके पहले हिंदुस्‍तान हिंदी के एचआर हेड मोहम्‍मद साबिर भी इस्‍तीफा देकर जा चुके हैं. कहा जा रहा है कि देर सबेर प्रधान संपादक शशि शेखर पर भी प्रबंधन गाज गिरा सकता है. 

वरिष्ठ पत्रकार मिश्रीलाल गुप्ता का निधन

जयपुर। भरतपुर जिला मुख्यालय के वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी एवं पूर्व पार्षद श्री मिश्रीलाल गुप्ता का सोमवार को निधन हो गया। वे करीब 81 वर्ष के थे उनका स्वास्थ्य खराब होने की वजह से उन्हें आगरा के निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने सोमवार सुबह अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार भरतपुर में किया गया। मिश्रीलाल गुप्ता ने 1958 से अपनी पत्रकारिता यात्रा की शुरुआत दिल्ली से प्रकाशित “दैनिक वीर अर्जुन” के संवाददाता के रूप में की थी।

वे दो दशक से अधिक समय तक “हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी” के भरतपुर प्रतिनिधि के बतौर कार्य करते रहे। बाद में वे “राजस्थान पत्रिका” भरतपुर के ब्यूरो चीफ भी रहे। उन्होंने करौली-भरतपुर से प्रकाशित “दैनिक पूर्वी राजस्थान” और साप्ताहिक “सही दिशा” का सम्पादन भी किया। अपने अंतिम समय में वे “राजस्थान पत्रिका” के भरतपुर संस्करण के लिए ब्रजभाषा में दोहे लिखते रहे। उनके परिवार में तीन पुत्र एवं एक पुत्री है। मृदुभाषी, मिलनसार और समाजसेवी श्री गुप्ता वर्षों तक “श्री हिन्दी साहित्य समिति“ भरतपुर से भी जुड़े रहे। वे नगर परिषद भरतपुर के पार्षद भी रहे। उनके निधन पर हिन्दुस्थान समाचार परिवार सहित विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। 

1401 करोड़ रुपये के घोटाले में एफआईआर हेतु कोर्ट में मुकदमा

गोमतीनगर थाने तथा एसएसपी, लखनऊ द्वारा 1401 करोड घोटाले में एफआईआर दर्ज करने से इनकार करने पर मेरे द्वारा आज मा० सीजेएम लखनऊ श्री राजेश उपाध्याय के समक्ष मुक़दमा किया है. मैंने 05 दिसंबर को कैग रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने हेतु एक प्रार्थनापत्र थाना गोमतीनगर, लखनऊ में दिया था जिसे थाने ने प्राप्त कर लिया गया पर एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया था. मा० सीजेएम द्वारा गोमतीनगर थाने से रिपोर्ट मंगवाते हुए मामले की सुनवाई 17 दिसंबर नियत की गयी है.

इतने बड़े घोटाले में भी अब तक कोई कार्यवाही नहीं हो रही है. पूर्ण उम्मीद है कोर्ट से न्याय मिलेगा.

नूतन ठाकुर के फेसबुक वॉल से साभार.

असीम त्रिवेदी को समर्थन देने जंतर मंतर पहुंचे यशवंत एवं संजीव

 नई दिल्‍ली : आईटी एक्‍ट के सेक्‍शन 66 ए के खिलाफ कार्टूनिस्‍ट असीम त्रिवेदी एवं उनके सहयोगी आलोक दीक्षित जंतर मंतर पर शनिवार से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं. सोमवार को अनशन का तीसरा दिन है. न्‍यू मीडिया में अभिव्‍यक्ति की आजादी चाहने वाले सैकड़ों लोग जंतरमंतर पहुंच कर असीम और आलोक का हौसला आफजाई कर चुके हैं. असीम का कहना है कि धारा 66 ए का हटना जरूरी हो गया है. यह सेक्‍शन अभिव्‍यक्ति की आजादी के लिए खतरा है.

असीम ने कहा कि वर्ष 2008 में इस कानून को जल्‍दबाजी में बनाया गया औ महज 15 मिनट में आठ कानून पास किए गए, जिसमें सेक्‍शन 66ए भी शामिल था. उन्‍होंने कहा कि सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर कमेंट करने व उसे लाइक करने के मामले में तीन साल की सजा और पांच लाख रुपये के जुर्माना का प्रावधान है, आखिर यह कैसी कानून व्‍यवस्‍था है. देश की आम जनता के बीच भय पैदा करने वाले इस कानून को हटाया जाना नितांत जरूरी है.

राजनेताओं पर प्रहार करते हुए असीम ने कहा कि कई राजनेता मनमाने तरीके से भाषण और व्‍यक्‍तव्‍य देकर देशवासियों की भावनाओं को आहत करते हैं लेकिन उनके खिलाफ किसी सजा का प्रावधान नहीं है. कैसा लोकतंत्र है कि इसमें लोक को तंत्र डराने पर तुला हुआ है. पुलिस ने असीम को जंतर मंतर से हटाने की कोशिश भी की. अनशन स्‍थल पर कई पत्रकार और न्‍यू मीडिया के लोग भी पहुंचे न्‍यूज एक्‍सप्रेस के वरिष्‍ठ पत्रकार संजीव चौहान, भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह भी जंतर मंतर पहुंचकर असीम और आलोक को अपना समर्थन दिया.

यशवंत ने तो फेसबुक पर भी असीम का समर्थन करने की अपील की है. यशवंत लिखते हैं, ''जंतर-मंतर पर हमारे-आपके लिए असीम त्रिवेदी और उनकी टीम आमरण अनशन पर है. आईटी एक्ट की धारा 66A को हटाने की मांग है. ये ऐसी धारा है जिसमें कोई भी कभी फेसबुक यूजर, ट्विटर यूजर, बलागर, वेब संचालक तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है… मैं कल भी जंतर-मंतर गया था और आज भी अभी वहीं से लौटा हूं… उम्मीद है एनसीआर वाले साथी जरूर जंतर मंतर जाएंगे… अगले कई रोज असीम वहीं बैठे मिलेंगे.''


सोमवार को असीम के अनशन का तीसरा दिन है. संभावना है कि स्‍वतंत्रता की अभिव्‍यक्ति की पैरोकारी करने वाले तमाम लोग जंतर मंतर पहुंच कर असीम का हौसला बढ़ाएंगे. दूसरी तरफ पुलिस असीम को जबरदस्‍ती अनशन से हटाने की कोशिशों में जुटी हुई है. असीम और आलोक किसी भी स्थिति में अपना अनशन खतम करने या हटने को तैयार नहीं हैं.

कानपुर एवं फतेहपुर में अपना विस्‍तार करेगा लखनऊ सत्‍ता अखबार

लखनऊ से प्रकाशित होने वाला दैनिक अखबार 'लखनऊ सत्‍ता' अपने विस्‍तार की योजना बना रहा है. खबर है कि प्रबंधन इस अखबार का विस्‍तार कानपुर और फतेहपुर में करने जा रहा है. इस अखबार का प्रकाशन 2006 से किया जा रहा है. 12 पेज का यह रंगीन अखबार कानपुर और फतेहपुर के आसपास के जिलों कानपुर देहात, उन्‍नाव में भी वितरित किया जाएगा. इसके बाद अखबार के नए एडिशन का पड़ाव इलाहाबाद होगा. यहां पर लखनऊ की तरह आठ पेज का फुल साइज अखबार प्रकाशित किया जाएगा.

प्रबंधन का मुख्‍य फोकस स्‍थानीय खबरों पर होगा, जिन्‍हें बड़े अखबार अपने यहां स्‍थान नहीं देते हैं. विज्ञापन के लिए भी अखबार लोकल मार्केट पर ही ध्‍यान दे रहा है. अखबार का वेबसाइट भी लांच किया जा चुका है. इस अखबार के प्रधान संपादक का दायित्‍व समीर त्रिपाठी निभा रहे हैं.

भारत के भाग्य विधाता कितने में बिके होंगे?

वॉलमार्ट ने भारत आने के लिए अमेरिका में लॉबिंग पर 125 करोड़ खर्च किये हैं … अब सोचने की बात यह है कि भारत के भाग्य विधाता कितने में बिके होंगे? मैंने पहले भी लिखा था कि भाजपा वाले भी नाटक ही कर रहे हैं, सच में विरोध कर रहे होते तो संसद में हारने के बाद सड़क पर भी आते… संसद जनता से बड़ी थोड़े ही है… पूरा देश विरोध में खड़ा हो जाये, तो वॉलमार्ट के बाप भी नहीं आ पायेंगे… मतलब साफ़ है कि पैसा और गिफ्ट सब के पास पहुंचा है… संसद में जनता को दिखाने के लिए सिर्फ ड्रामा हुआ था…

पत्रकार बीपी गौतम के फेसबुक वॉल से साभार.

125 करोड़ रुपये खर्च कर भारत में घुसा वालमार्ट

नई दिल्ली। रीटेल में एफडीआई के मुद्दे पर संसद में मिली जीत से सरकार उत्साहित है। वहीं, एक खबर के मुताबिक रीटेल की दुनिया में बड़े नाम वालमार्ट ने भारत में अपने रास्ते खुलवाने के लिए साल 2008 के बाद से अब तक करीब सवा सौ करोड़ रुपए लॉबिंग में खर्च किए। अमेरिकी सीनेट में वॉलमार्ट ने ये जानकारी दी है, जिसके बाद विपक्ष एक बार फिर सरकार पर हमलावर हो गया है।

लंबी जद्दोजहद के बाद रीटेल में एफडीआई के मुद्दे पर सरकार संसद में कामयाब रही। लेकिन एक खबर ने सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर दी है। अमेरिकी सीनेट में दाखिल अपनी रिपोर्ट में वॉलमार्ट ने कहा है कि उसने भारत में अपने लिए दरवाजे खुलवाने के लिए साल 2008 के बाद से अब तक अमेरिकी कानून निर्माताओं के साथ लॉबिंग पर 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी करीब सवा सौ करोड़ रुपए खर्च किए हैं।

वॉलमार्ट के मुताबिक इस साल सितबंर में खत्म हुई आखिरी तिमाही में ही कंपनी ने करीब 1.65 मिलियन डॉलर यानी करीब दस करोड़ रुपए खर्च किए। जाहिर है कि इस खबर ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक और मौका दे दिया है। बीजेपी प्रवक्ता मुख्तार अब्बास नकवी के मुताबिक ये फ्लोर मैनजमेंट नहीं था बल्कि फंड मैनजमेंट था। इसे आम आदमी स्वीकार नहीं करेगा। अमेरिकी नियमों के मुताबिक कंपनियों को अपने मामलों की पैरवी करने के लिए विभिन्न एजेंसियों और विभागों के साथ लॉबिंग की इजाजत है। लेकिन उन्हें हर तिमाही अमेरिकी सीनेट में लॉबिंग पर खर्च होने वाली रकम का ब्योरा देना होता है।

समाचार एजेंसी पीटीआई की इस खबर पर सरकार और कांग्रेस ने सधी हुई प्रतिक्रिया करते हुए कहा कि ये रिटेल में एफडीआई के खिलाफ हो रहे दुष्प्रचार का हिस्सा है। केंद्रीय मंत्री हरीश रावत के मुताबिक ये सब चीज़ें दुष्प्रचार का हिस्सा हैं। इन सब बातों से आगे भी जूझना पड़ेगा। इसमें कोई तथ्य नहीं है। अगले छह महीने के अन्दर सभी बातों का खुलासा हो जाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी के मुताबिक बेबुनियाद खबरें हैं। अगर ऐसी कोई सच्चाई किसी के पास है तो साबित करे। रिश्वत की बुनियाद पर विदेशी ताकत नहीं आ सकती। ऐसे एजेंडे देश के हित में नहीं हैं। (आईबीएन)

किसी को वालमार्ट की चम्पी करते देखें तो उसके मुखारविंद को ही नहीं, उसके पेट की ओर भी देखें!

इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर आज यह खबर बहुत महत्त्वपूर्ण है। खबर में अमेरिकी सेनेट में खुद वालमार्ट द्वारा पेश की गई एक रिपोर्ट के हवाले से खुलासा है कि भारत में अपना खुदरा कारोबार घुसाने की कोशिशों के तहत कंपनी ने महज "लॉबिंग" पर पिछ्ले चार सालों में 25 मिलियन डालर (125 करोड़ रुपये से ऊपर) खर्च किए हैं। कंपनी ने सेनेट को बताया है कि 30 सितम्बर को खत्म हुई तिमाही भर में उसने 1.65 मिलियन डालर (सवा आठ करोड़ से ऊपर) लॉबिंग मात्र पर खर्च कर डाले हैं, जिसमें "भारत में एफडीआइ पर चर्चाएं कराना" भी शामिल है। ….तो आगे आप किसी को बढ़-चढ़ कर वालमार्ट की चम्पी करते देखें तो उसके मुखारविंद को ही नहीं, उसके पेट की ओर भी देखें!

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

गुजरात समाचार का न्‍यूज चैनल जीएसटीवी टुडे लांच

गुजरात में प्रकाशित होने वाले गुजरात समाचार अखबार समूह ने अपना न्‍यूज चैनल भी लांच कर दिया है. जीएसटीवी टुडे नाम से लांच हुए इस चैनल को पिछले महीने से टेस्टिंग रन पर चलाया जा रहा था. इस चैनल का संचालन आसपास मल्‍टीमीडिया लिमिटेड के बैनर तले किया जा रहा है. 9 दिसम्‍बर को चैनल की लांचिंग के समय ग्रुप सीएमडी श्रेयांश शाह, ग्रुप डाइरेक्‍टर अमन शाह, वाइस प्रेसिडेंट आसपास मल्‍टीमीडिया विजय श्रीवास्‍तव भी मौजूद रहे.  

इस मौके पर वीपी विजय श्रीवास्‍तव ने कहा कि यह चौबीस घंटे का न्‍यूज एवं करेंट अपेयर्स टीवी चैनल स्‍थानीय भाषा गुजराती के अलावा मिक्‍स हिंदी में प्रसारित किया जाएगा. यह चैनल जीटीपीएल, केबल एवं टाटा स्‍काई के माध्‍यम से देखा जा सकेगा. इस चैनल को जय शुक्‍ला हेड कर रहे हैं. वे अहमदाबाद में बैठेंगे, जबकि सूची सिन्‍हा चैनल की न्‍यूज हेड होंगी, जो दिल्‍ली में बैठेंगी तथा हिंदी कंटेंट तथा राष्‍ट्रीय खबरों को देखेंगी.

अब सामने लाएंगे जिंदल ग्रुप की हकीकत : सुभाष चंद्रा

नई दिल्ली : जिंदल ग्रुप से 100 करोड़ रुपये की उगाही के मामले में पूछताछ के बाद सुभाष चंद्रा ने जिंदल ग्रुप पर निशाना साधा है। जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा ने कहा कि अब सोमवार से वह सबके सामने जिंदल ग्रुप की हक़ीकत रखेंगे। इतने पर ही नहीं रुके सुभाष चंद्रा, उन्‍होंने यह भी कहा कि वे जिंदल ग्रुप पर मानहानि का मुकदमा करेंगे। उन्होंने सफाई दी कि जिंदल ने ही उनके दोनों संपादकों को 25 करोड़ रुपये का विज्ञापन देने की बात कही थी।

पूछताछ के बाद सुभाष चंद्रा ने बाद में मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा। अधिकारियों के मुताबिक पूछताछ के दौरान कई अहम बातें सामने आई हैं जिनको फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जाएगा। गौरतलब है कि जिंदल की कंपनी पर भी अरबों के कोयला घोटाले के आरोप हैं। समझा जा रहा है कि जी ग्रुप अब फिर से इस मामले को उठाकर नवीन जिंदल की सच्‍चाई भी सामने लाने की कोशिश करेगा।


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आज कोर्ट में पेश होंगे जी न्‍यूज के दोनों संपादक

नई दिल्ली। नवीन जिंदल की कंपनी से खबर ना दिखाने की एवज में सौ करोड़ रुपये मांगने के केस में गिरफ्तार जी के दो संपादकों की आज फिर से कोर्ट में पेशी होनी है। ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा से भी क्राइम ब्रांच आज लगातार तीसरे दिन पूछताछ कर सकता है। इससे पहले पुलिस की क्राइम ब्रांच शनिवार को नौ घंटे तथा रविवार को 7 घंटे तक सुभाष चंद्रा तथा पुनीत गोयनका से पूछताछ कर चुकी है। पूछताछ के बाद चंद्रा ने मीडिया में बयान दिया है कि उन्हें पूरे मामले के बारे में तब पता चला जब पुलिस में एफआईआर दर्ज की गई।

चंद्रा और पुनीत रविवार को दोपहर करीब डेढ़ बजे दिल्ली पुलिस के क्राइम ब्रांच के दफ्तर पहुंचे। इनसे पुलिस ने शनिवार को भी साढे नौ घंटे तक पूछताछ की थी। सूत्रों के मुताबिक पूछताछ के दौरान पुलिस ने चंद्रा से पूछा कि क्या समीर आहूलवालिया ने जिंदल से चल रही बातचीत के बारे में उन्हें फोन पर बताया था। पुलिस का दावा है कि उसके पास जी बिजनेस के हेड समीर अहलूवालिया और चंद्रा के बीच हुई 286 सेकेंड हुई बातचीत का रिकॉर्ड है। तो सुभाष चंद्रा ने डील की जानकारी से इनकार कर दिया।

कारोबारी नवीन जिंदल ने अपने इस आरोप के पक्ष में स्टिंग की एक सीडी भी पेश की है। रविवार को हुई पूछताछ में कई बार सुभाष चंद्रा, पुनीत और जी के दोनों संपादकों को आमने सामने बिठाया गया तो कई बार सबसे अलग-अलग भी पूछताछ की गई। गौरतलब है कि पुलिस के अनुरोध पर कोर्ट ने शनिवार को जी संपादक सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया को दो दिन की पुलिस हिरासत में भेजा है। दोनों को आज फिर कोर्ट में पेश किया जाएगा। जबकि कोर्ट ने 14 दिसंबर तक सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका की गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है।

आज भोपाल में जुटेंगे प्रदेश के पत्रकार, देंगे गिरफ्तारी

भोपाल। पत्रकारों के संयुक्त आंदोलन के लिए प्रदेश भर में समर्थन जुटने लगा है और जनसंपर्क संचालनालय का विरोध व्यापक होता जा रहा है। राजधानी से निकली बगावत की आवाज तमाम महानगरों, जिलों-कस्बों से होते हुए तहसील और गांवों तक जा पहुंची है और राज्य के कोने-कोने से जनसंपर्क संचालनालय की उन भेदभावपूर्ण तथा पक्षपातपूर्ण नीतियों के खिलाफ आवाज उठने लगी है, जिनके चलते प्रदेश का आम पत्रकार स्वाभिमान की जिंदगी जीने तक से मोहताज है।

जनसंपर्क संचालनालय में विज्ञापनों के लिए किए जाने वाले भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और पहुंच वालों के दबदबे के विरोध में तमाम पत्रकार लामबंद होने लगे हैं। विभिन्न पत्रकार संघों के बैनर तले संचालित जिलों-नगरों में सक्रिय इकाइयों ने संगठित होकर भोपाल चलो का नारा दे दिया है और हजारों पत्रकार भोपाल पहुंचने के लिए कूच करने लगे हैं। प्रदेश भर के पत्रकारों ने ठान लिया है कि राजधानी जाकर उन्हें अपनी आवाज जोरदार ढंग से बुलंद करनी है और अपना हक लेकर ही वापस लौटना है, फिर चाहे सरकार जेलों में डाले, या हिंसा का सहारा ले। एकजुटता का परिचय देते हुए सभी ने ऐलान कर दिया है कि हम अपने लिए अधिमान्यता किसी भी कीमत पर हासिल करेंगे, विज्ञापनों में अपना हिस्सा लेंगे और आवास, चिकित्सा, बीमा, बच्चों की शिक्षा, और पेंशन जैसे मूलभूत अधिकार पाकर रहेंगे।  

कोर कमेटी के सदस्य श्री पाल ने बताया कि आज रात तक प्रदेश के कोने-कोने से लगभग 500 पत्रकारों का जत्था भोपाल पहुंचेगा। इंदौर, उज्जैन, होशंगाबाद संभाग एवं जिलों से पत्रकार चार पहिया वाहानों से भोपाल सुबह 10 बजे तक पहुंचेंगे। इस आंदोलन में लगभग पांच हजार से भी अधिक पत्रकार एवं प्रेस के कर्मचारी शामिल होने की उम्मीद है। दिनांक 10 दिसम्बर 2012 दिन सोमवार को 10 सुबह 11 बजे पत्रकार भवन के सामने सभी पत्रकार एकत्रित होकर 11.30 बजे रैली के के रूप में न्यूमार्केट, न्यू मार्केट थाना, रंगमहल होते हुए जनसंपर्क कार्यालय के तिराहे पर गिरफ्तारी देकर जनसंपर्क मंत्री को ज्ञापन सौपेंगे।

आपसी मतभेद भुलाकर काम करें पत्रकार : प्रवीण खारीवाल

नीमच। काफी लंबे समय बाद सभी पत्रकारों को एक साथ देखा है। एकजुटता का लाभ मिलता है। जब तक पत्रकार शत-प्रतिशत आत्मनिर्भर नहीं हो पाएगा तब तक उसके परिवार व भविष्य की चिंता रहती है। प्रस्तावित भवन का निर्माण होने के बाद सभी प्रौद्योगिकी सुविधाएं दी जाएगी। यह बात जावद विधायक ओमप्रकाश सखलेचा ने कही। श्री सखलेचा पत्रकार संघ के दीपावली एवं नववर्ष मिलन समारोह में बोल रहे थे। वे आयोजन के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि पत्रकार को सकारात्मक कार्य की प्रशंसा करना चाहिए। पत्रकार समाज से बाहर नहीं समाज का अंग ही है। पूरे मालवा का नीमच प्रमुख शहर है। नीमच बढ़ेगा तो हर व्यक्ति का विकास होगा। पत्रकारों की आवास योजना पर प्रदेश सरकार की योजना पर विस्तार से जानकारी दी।

आयोजन में इंदौर प्रेस क्लब के अध्यख प्रवीण खारीवाल ने कहा कि मतभेद भुलाकर काम करें। मतभेद का फायदा दूसरे लेते हैं। एकजुट होने पर कई बड़े नेता आपके पास रहेंगे। एकजुटता के कारण यह विशेष काम हुआ है। हमारे पास संघ का भूखंड है। जिस पर भव्य भवन का निर्माण किया जाए ताकि आने वाले समय में सभी आयोजन एक ही स्थान पर हो सके। भवन अपना होने पर विभिन्न सांस्कृतिक व साहित्यिक कार्यक्रम होते रहते हैं। उन्होंने जानकारी दी कि इंदौर प्रेस क्लब चार-पांच सालों से राष्ट्रीय स्तर का आयोजन कर रहा है। अब अगला चरण अंतरराष्‍ट्रीय स्तर के आयोजन का है। जिसमें 7 देशों के कई बड़े समाचार पत्र समूह के संपादक शामिल होंगे। इस मौके उन्होंने प्रेस क्लब के कार्यों की जानकारी दी। इंदौर प्रेस क्लब आज जिस मुकाम है उसके लिए आपके क्षेत्र के निवासी व पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेता की देन है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाचार पत्र अमृत कुंभ से जुड़े सम्पतलाल पटवा ने कहा कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य पत्रकारो के हितों को ध्यान में रखते हुए उनके लिए भविष्य तैयार कर उनका क्रियान्वयन करना व उनके संचालन हेतु एक भवन बनाना। भूखंड तो काफी समय से है। नीमच को पत्रकार जगत के कारण को जाना जाता रहा है। पत्रकार व मीडिया प्रजातंत्र के चार स्तंभ सबसे प्रमुख माना जाता है। ये दोनों ही प्रजातंत्र को जिंदा रखे हुए हैं। कलम की ताकत का मुकाबला ईश्वर को छोड़कर किसी से नहीं किया जा सकता है। पत्रकार समाज को दिशा, उन्नति के अवसर प्रदान कर उसका सर्वांगीण विकास करता है। पत्रकारिता को इसलिए समाज का दर्पण कहा जाता है। उन्होंने अपेक्षा की कि पत्रकार संघ को सक्रिय कर जो योजनाएं सामने लाए हैं उसका स्वागत है। उन योजनाओं का शीघ्र क्रियान्वयन कर संघ को तेजी से आगे बढ़ाएं।

भाजपा जिलाध्यक्ष दिलीपसिंह परिहार ने कहा कि अपनी मंजिल सामने है। पत्रकारों के दर्द को समझते हैं। पत्रकार एकत्र हो रहे हैं तो यह नीमच के लिए विकास की इबारत है। संगठन का महत्व होता है। कलम से क्रांति आई है। उन्होंने विश्वास दिलाया कि जो जनप्रतिनिधि होंगे उनसे पत्रकारों के विकास के लिए सदैव योजनाएं मंजूर कराई जाएगी। मंडी व्यापारी संघ अध्यक्ष राकेश भारद्वाज ने कहा कि पत्रकार संघ को पुनर्जीवित किया जा रहा है। पत्रकार समाज के लोगों का हितैषी होता है। इस भवन के निर्माण में हर संभव सहयोग किया जाएगा। समाज में पत्रकार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भाजपा कोषाध्यक्ष संतोष चौपड़ा ने अपने अभिन्न मित्र तथा पत्रकार साथी गोपाल खंडेलवाल को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि आज भी देश की गतिविधियों की जानकारी के लिए समाचार पत्र देखने का चलन है। उसका आधार स्तम्भ पत्रकार होता है। कलम सबसे बड़ी ताकत होती है। वास्तव में समाचार एकत्र करना कठिन कार्य है। सकारात्मक पत्रकारिता का लाभ देश व समाज को मिलता है। उन्होंने भवन निर्माण के सपने के साकार की उज्‍ज्‍वल कामना की। उन्होंने सहयोग का विश्वास दिलाया।

पुराने पत्रकार साथी यशवंत बंसल ने पुरानी पत्रकारिता का रेखांकन प्रस्तुत करते हुए आज के संदर्भ में मिलने वाली सुविधाओं की चर्चा की। उन्होंने खुशी जाहिर की कि पत्रकारों ने एकजुटता के साथ काम करने का संकल्प दोहराया है। इससे शहर और पत्रकार समाज के लिए अच्छा संदेश जाएगा। उन्होंने 40 वर्ष पहले के समाचार पत्र का उल्लेख किया। नए पत्रकारों से उन्होंने अपेक्षा की कि पत्रकारिता को नई उंचाईयों पर ले जाए। आयोजन के प्रारंभ में वरिष्ठ पत्रकार आयोजन संघ के आधार स्तम्भ सुरेंद्र सेठी ने कहा कि जिस मुकाम के लिए कदम बढ़ाया है उससे खुश हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि 6 माह में पत्रकार भवन का निर्माण प्रारंभ हो जाएगा। आधारशिला मुख्यमंत्री से रखाई जाएगी। उन्होंने विधायक श्री सखलेचा का आभार व्यक्त किया। पिछले कुछ समय से पत्रकारों पर जो अत्याचार हुए हैं उससे एकजुटता का माहौल बना है। कोशिश करेंगे कि पत्रकारों के लिए कुछ नया कर सकें।

वरिष्ठ पत्रकार पी. मोतीलाल शर्मा ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने नीमच की अतीत की उज्ज्‍वल पत्रकारिता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि आपस में चर्चा करने का यह अवसर है जिससे जिले के पत्रकारों के विकास को गति मिले। पत्रकारों को एक स्थान उपलब्ध हो जहां चर्चा की जा सके। इसके लिए यह प्रयास प्रारंभ किया। उन्होंने स्वर्गीय गोपाल खंडेलवाल का स्मरण कर उनके कार्यों का उल्लेख किया और भावी योजनाएं बताई। श्री शर्मा ने बताया कि प्रत्येक वर्ष 18 मई को स्वर्गीय गोपाल खंडेलवाल की स्मृति में श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार दिया जाएगा। इसमें जिले से पृविष्ठियां आमंत्रित करने की बात बताई। स्वर्गीय गुलाबचंद सेठी की स्मृति में व्याख्यान माला के आयोजन तथा देश के प्रख्यात साहित्सकारों को आमंत्रित करने की बात कही। इसके साथ ही साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम करने की जानकारी दी।

इस मौके पर श्री खारीवाल तथा समंदर पटेल के प्रतिनिधि राजू वर्मा का शाल श्रीफल से सम्मान किया गया। इसके साथ ही मंचासीन अतिथि श्री सखलेचा, श्री खारीवाल, श्री पटवा, श्री परिहार, श्री भारद्वाज, श्री चोपड़ा को आयोजन कमेटी के सदस्यों ने स्मृति चिहन प्रदान किए। आयोजन में विशेष सहयोग के लिए माहेश्वरी समाज के सचिव शिव माहेश्वरी का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में महिपालसिंह चौहान और सुरेश सन्नाटा ने संबोधित किया। इस मौके पर पुरषोत्तम मेघवाल, रेडक्रास चेयरमेर रविंद्र मेहता, जावद जनपद अध्यक्ष सत्यनारायण पाटीदार, ज्ञान मंदिर विधि महाविद्यालय के प्राचार्य विवेक नागर, जिनेंद्र डोसी, नरेंद्र गांधी, किशोर जेवरिया अर्जुनलाल नरेला, सीटू के प्रदेश सचिव शेलेंद्र ठाकुर, केके गर्ग, शिवशंकर शर्मा, परियोजना अधिकारी एस कुमार, भाजपा महामंत्री हेमंत हरित आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन जीवन कौशिक ने किया। आभार वरूण खंडेलवाल ने माना।

नीमच से श्‍याम जाटव की रिपोर्ट.

‘प्रताप’ के सौ साल पूरे, वर्ष भर कार्यक्रम होगा आयोजित

उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन हिंदी पत्रकारिता के पुरोधा अमर शहीद श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के कुशल संपादन में प्रकाशित समाचार पत्र प्रताप के प्रकाशन के सौ वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष 2013 को ‘आत्मोसर्ग की पत्रकारिता के सौ साल’ के रुप में मनाते हुए पूरे साल भर कार्यक्रम आयोजित करेगी। यह जानकारी उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के प्रंतीय महामंत्री प्रयाग पांडे प्रांतीय उपाध्यक्ष पंकज वार्षणेय ने संयुक्त रुप से देते हुए बताया कि 9 नवंबर 2013 को मूर्धन्य पत्रकार श्री गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से ‘प्रताप’ नामक समाचार पत्र का प्रकाशन किया था।

उन्होंने इस समाचार पत्र के माध्यम से न सिर्फ समाज की सेवा की थी बल्कि सरकार की दमन नीति के खिलाफ साहसिक पत्रकारिता करते हुए आदर्श पत्रकारिता के अनेकों ओजस्वी उदाहरण प्रस्तुत किये। मात्र चालीस वर्ष की अल्पायु में कानपुर में 25 मार्च 1931 को साम्पर्दायिक दंगे के दौरान एक मुस्लिम परिवार की जान बचाने के प्रयास में साहसिक पत्रकारिता करते हुए शहीद हो गऐ थे। उन्होंने बताया श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र प्रताप के प्रकाशन के सौ वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष 2013 को आत्मोसर्ग की पत्रकारिता के सौ साल के रुप में मनाते हुए पूरे साल भर विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन करेगी। 1 जनवरी को पूरे प्रदेश भर में सभी नगर व जिला ईकाइयों के माध्यम से विचार गाष्ठियों का आयोजन करेगी।


यूनियन द्वारा 25 मार्च को शहीद दिवस, 22 अप्रैल एवं 6 जुलाई को दमन-विरोधी दिवस, 8 जुलाई को जन सहयोग दिवस, 26 अक्टूबर को अभ्युदय दिवस, 30 अक्टूबर को दमन-विरोधी दिवस, 9 नवंबर को अभ्युदय दिवस के रुप में मनाया जायंगा। प्रंतीय महामंत्री प्रयाग पांडे ने बताया कि उत्तराखण्ड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की प्रांतीय कर्यकारिणी द्वारा श्री गणेश शंकर विद्यार्थी जी के पत्रकारीय जीवन पर केंद्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन किया जाएगा सेमिनार का स्थान और तिथि बाद में घाषित किया जाएगी।

कार्यक्रमों का समापन 9 नवम्बर 2013 को राज्य स्थापना दिवस और ‘‘प्रताप’’ के अभ्युदय दिवस के मौके पर सभी नगर जिला इकाइयां आत्मोसर्ग की पत्रकारिता का अभ्युदय दिवस मनाएगी। इसी के साथ कार्यक्रम का समापन होगा प्रांतीय महामंत्री प्रयाग पांडे ने बताया इन कार्यक्रमों के सफल संचालन के लिए कुंमाउ में प्रांतीय उपाध्यक्ष पंकज वार्ष्णेय एवं गढवाल में प्रांतीय सचिव त्रिभुवन उनियाल को सचिव बनाया गया है। उन्होंने जन पक्षीय पत्रकारिता से जुडे सभी संपादकों, पत्रकारों और समाचार संस्थनों से इन कार्यक्रमों के सफल संचालन में सक्रीय सहयोग की अपील की है।

इस अवसर पर सम्पन्न हुई बैठक में जनपद नैनीताल में यूनियन द्वारा सभी नगरों में 25 दिसम्बर तक सदस्यता अभियान चलाया जाएगा इसके बाद सभी नगर इकाइयों के चुनाव सम्पन्न कराये जाऐंगे। बैठक का संचालन जिलाध्यक्ष विपिन चन्द्रा ने किया अध्यक्षता प्रदेश उपाध्यक्ष पंकज वार्ष्णेय ने की। बैठक में हसीन अहमद, गौरव गुप्ता, अजय जोशी, कीर्ति राज सिंह रुमाल, महेन्दर नेगी, पकज सक्सेना, धन सिंह बिष्ट, अनुपम गुप्ता, अजय कुमार, सतीश अग्रवाल, इश्वरीय लाल शर्मा, रवि दुर्गापाल, कपिल कुमार, रवि कुमार, हेमेंद्र उप्रेती, शैलैन्द्र भंडारी, देवेन्द्र मेहरा, भूपेंद्र गुप्ता आदि मौजूद थे। (प्रेस रिलीज)

हिंदुस्‍तान, बदायूं पहुंचे योगेंद्र सागर एवं श्‍याम मिश्रा

हिंदुस्‍तान, बदायूं से खबर है कि दो रिपोर्टरों ने यहां ज्‍वाइन किया है. अमर उजाला, गढ़मुक्‍तेशवर से इस्‍तीफा देने वाले योगेंद्र सागर तथा बरेली निवासी श्‍याम मिश्रा को बदायूं में ज्‍वाइन कराया गया है. दोनों लोग इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. उल्‍लेखनीय है कि हिंदुस्‍तान, बदायूं में रिपोर्टरों की भारी कमी थी. अकेले जिला प्रभारी उपेंद्र द्विवेदी एक फोटोग्राफर के साथ मिल कर जिले को संभाल रहे थे. अब माना जा रहा है कि उन्‍हें दो रिपोर्टरों के आने से सहूलियत मिलेगी. चर्चा है कि प्रबंधन एक और रिपोर्टर को बदायूं भेजने की तैयारी कर रहा है. 

कौन हैं ख़बर के बहाने अफजल गुरु को ‘बेखौफ़’ बता कर महिमामंडित करने वाले?

 

अफजल गुरु का दिल कसाब की फांसी पर कितना धड़का, कितना नहीं ये तो किसी को नहीं पता, लेकिन समाचार एजेंसी आईएएनएस को उसकी खासी फिक्र हो गयी है। ये एजेंसी इस आतंकवादी को न सिर्फ एक बहादुर और निडर लड़ाका साबित करने की कोशिश में हैं, बल्कि उसे धार्मिक भी बताने में जुटी है।
 
बिन मौसम की बरसात की तरह एजेंसी ने कुछ जेल अधिकारियों से बातचीत के हवाले से ये खबर छाप दी कि अफजल को मौत का खौफ़ नहीं है। मानों अफजल देशद्रोही आतंकवादी नहीं, भगत सिंह हो गया। एजेंसी ने न सिर्फ जेल के आधिकारिक प्रवक्ता सुनील गुप्ता का बयान लिया, बल्कि एक 'अनाम' अधिकारी का भी हवाला दिया है।
 
अब भला कोई ये बताए कि क्या तिहाड़ जेल ने अफजल का कोई मनौवैज्ञानिक टेस्ट करवाया था जो उसके प्रवक्ता को पता चल गया कि वो फांसी से डर नहीं रहा है? या फिर जेल के अधिकारी ये उम्मीद कर रहे थे कि कसाब के फांसी की ख़बर सुन कर अफजल गश खाकर गिर पड़ेगा? 
 
खास बात ये है कि इस खबर को सबसे पहले और प्रमुखता से छापने वाले समाचार समूह वे ही हैं जो इन दिनों सरकार की खुशामद में जी-जान से जुटे हैं। हिन्दुस्तान, जागरण और जी न्यूज। रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि कैसे अफजल के सहयोगियों की सजाएं कम कर दी गयीं और कौन लोग फांसी के विरोध में जुटे हैं।
 
अब जबकि राष्ट्रपति के यहां से भी अफजल की फांसी की सजा माफ करने की उम्मीद खत्म हो चुकी है, ये एजेंसी और समाचार माध्यम क्या साबित करने में जुटे हैं वे ही जानें, मेरा तो मानना है कि ये भी एक तरह का देशद्रोह है।
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये आलेख उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। उनसे dheeraj@journalist.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

सुभाष चंद्रा व पुनीत गोयनका से फिर हुई कई घंटे पूछताछ

ज़ी समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका से 100 करोड़ रुपये की उगाही के मामले में दूसरे दिन भी पूछताछ की गयी. कल साढ़े नौ घंटे की पूछताछ के बाद पुलिस ने पिता पुत्र को जांच के लिये दोपहर दोबारा पेश होने का निर्देश दिया था.

चंद्रा और पुनीत करीब डेढ़ बजे अपराध शाखा के कार्यालय पहुंचे. इससे पूर्व दोनों से साढ़े ग्यारह बजे तक पूछताछ की गयी थी. ज़ी न्यूज़ के संपादक संदीप चौधरी और समीर अहलूवालिया को अदालत ने दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. दोनों को अपराध शाखा के कार्यालय लाया गया जहां चंद्रा और उनके पुत्र से पूछताछ की जा रही थी.

चंद्रा को अदालत ने अंतरिम जमानत दे दी थी जिसके चलते उन्हें 14 दिसंबर तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. बयान में ज़ी ने कहा कि चंद्रा और पुनीत दिल्ली पुलिस को पूरा सहयोग दे रहे हैं जिससे सच सामने आ सके. बयान में कहा गया, ‘हम न्याय और निष्पक्ष जांच की उम्मीद करते हैं. चंद्रा और पुनीत के सहयोग से उन अफवाहों का अंत हो गया जिसमें बताया जा रहा था कि दोनों पूछताछ में शामिल होने से बच रहे हैं.’

ज़ी न्यूज़ लिमिटेड के वकील विजय अग्रवाल ने बताया कि चंद्रा और गोयनका भी जांच में शामिल हो गये हैं इसलिये पुलिस के पास संपादकों की जमानत का विरोध करने का कोई आधार नहीं बनता.’ 

सूत्रों के अनुसार पूछताछ में चंद्रा और पुनीत ने आरोपों का खंडन कर दिया और दावा किया कि यह कोयला घोटाला की खबरों को दबाने का प्रयास था. सूत्रों ने बताया कि ज़ी समूह के मालिक सुभाष चंद्रा से पूछा गया कि क्या अहलूवालिया ने उन्हें टेलीफोन कर जिंदल कंपनी से हुई चर्चा की जानकारी दी थी. पुलिस का दावा है कि उसके पास टेलीफोन के रिकार्ड हैं जिससे पता चलता है कि अहलूवालिया ने करीब तीन मिनट तक चंद्रा से बात की और विमर्श की जानकारी दी.

पुलिस ने इस मामले में पूछताछ के लिये चंद्रा को तीन बार नोटिस भेजा था. पहले चंद्रा ने पूछताछ के लिये हाजिर होने में यह कहकर असमर्थता जताई थी कि वह देश के बाहर हैं पर तीन दिसंबर को उन्होंने बताया कि नोटिस जारी होने के 96 घंटों के भीतर वह पेश हो जायेंगे. पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिये हाजि़र होने को कहा था.

जांचकर्ताओं ने पहले एक अदालत को बताया था कि वह चंद्रा को भी आरोपी मान रहे हैं क्योंकि उन्हें जिंदल की कंपनी और उनके कर्मचारियों के बीच हुये करार की जानकारी थी. वहीं ज़ी न्यूज़ ने धन की उगाही के आरोप का खंडन किया और अपने दोनों वरिष्ठ पत्रकारों की रिहाई की मांग की.


 

प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया द्वारा रिलीज की गई खबर..

Police question Zee Chairman Chandra, son for second day

Chandra's Zee Group is accused of a Rs 100-cr extortion bid from Congress MP Naveen Jindal's company

Press Trust of India / New Delhi 

Dec 09, 2012

Zee Group Chairman Subhash Chandra and his son Puneet Goenka were questioned for the second day today in connection with the alleged Rs 100 crore extortion bid from Congress MP Naveen Jindal's company.

After nine-and-half hour questioning and confronting them with two arrested Zee editors, police asked the father and son duo to appear before investigations this afternoon.

Both Chandra and Puneet came to Crime Branch office at around 1.30 PM today. Yesterday, the questioning had lasted till 11.30 PM. Zee Editors Sudhir Chaudhury and Samir Ahluwalia, who had been remanded to two-day police custody by a court today, were brought to the Crime Branch office last night where Chandra and his son were being questioned. Chandra had secured an interim protection from arrest till December 14 from a Delhi court. In a late night statement yesterday, Zee Group said both Chandra and Puneet extended fullest cooperation to the Delhi Police so that truth emerges.

"We expect justice and a fair inquiry. The fullest cooperation ended attempted mis-impressions that Mr Chandra and Goenka were avoiding joining the investigations," it said.

"Now that Chandra and Goenka have joined the investigations, police have no ground to oppose the bail of the two editors," Zee News Ltd's counsel Vijay Aggarwal said.

During questioning yesterday, sources said Chandra and Puneet denied the allegations and claimed it was an attempt to scuttle news reports on the Coalgate scam.

The sources said Chandra was asked whether Alhuwalia had telephoned him and informed him about the discussions with Jindal's company. Police had claimed to have phone call records to show that Alhluwalia had spoken to Chandra for nearly three minutes explaining the discussions.

Chandra's questioning came after police sent three notices asking him to join the investigations in the case in which Chaudhury and Ahluwalia were arrested late last month following investigations into a complaint filed on October two.

Chandra had earlier told the police that he could not appear before them as he was out of the country, but later on December 3 he informed them he will be ready to appear within 96 hours of notice. Police then asked him to appear before them yesterday. Investigators have told a local court earlier that they were treating Chandra as an accused as he knew about the dealings between his employees and Jindal's company.

Zee Group has denied the allegations of extortion and demanded the immediate release of its two senior journalists, alleging the police action was "illegal" and "designed for something else".

इंडिया न्यूज में अमित आर्या को मिली बड़ी जिम्मेदारी, इसरार शेख के पर कटे (इंटरनल मेल पढ़ें)

: इंडिया न्यूज हरियाणा के हेड बनाए गए, एडिटर कोआर्डिनेशन के रूप में आईटीवी, न्यूज एक्स और एनडब्ल्यूएस देखेंगे, नेशनल का एसाइनमेंट भी देखेंगे: ये है एचआर द्वारा जारी पत्र : Dear All, We are pleased to welcome Mr. Amit Arya in " India News Family". Amit Ji has worked with Bag Films, Dainik Bhaskar, India TV, India News, P-7 and Live India at different capacity. 

He is graduated in Law and master in Journalism. Amit Arya Ji will act as Editor Coordination for ITV, News X and NWS. He will be also heading ITV Haryana and National assignment.

Mr. Israr Sheikh Ji will be taking care of National Channel in Morning Band.

Mr. Ram Kaushik Ji will act as Editor coordination for ITV.

We hope you all will extend your support to all of them in their new responsibilities.

Regards

Human Resource Team

द हिंदू में भी प्रकाशित हुई रमन सरकार और न्यूज चैनलों की पेड न्यूज दास्तान

: Chhattisgarh government paid TV channels for favourable news coverage, claims paper : Absolutely nothing wrong in funding the channels in a transparent way, says official : SUVOJIT BAGCHI : Raman Singh’s BJP government “has paid for favourable news stories” and “regular live coverage” to a host of national and local television channels, an English language newspaper reported.

Furthermore, the senior editors of the channels concerned allegedly wrote to the public relations (PR) department of the Chhattisgarh government “negotiating” rates to produce “news stories” and to ensure “positive coverage.”

The news story ‘Chhattisgarh government pays for all TV news that is fit to buy,’ published by theIndian Express on Friday, claimed the paper had in its possession nearly 200 documents exchanged between the PR department and the editors. While not challenging the veracity of the story, the Chhattisgarh government has brought counter allegations against the Indian Express, claiming that the newspaper has “taken more than 50 lakh” in the last two years as advertisements.

The channels named by the newspaper are Z24, a franchisee of Zee News, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh, Sadhna News and other “smaller, local networks.”

The newspaper has published details of money allegedly received for government-friendly coverage ranging from welfare programmes, planting of trees in Naya Raipur, distribution of rice at subsidised rates to the poor, the Queen’s Baton relay in Commonwealth Games, the budget presentation, Independence Day speech by the leaders and even the generation of public reaction to welfare schemes — “five persons in each district with 30 seconds for every reaction,” the report says.

BJP leader Sushma Swaraj’s visit and anti-Naxal reports are also funded by the PR department, claimed the report.

The report listed what it called the rate for each of the paid news items. In May 2010, Hindi television channel Sahara Samay had presented a five-point proposal to the PR department. It included special television packages on Sahara Samay, 15 times a day, featuring “CM’s speeches, government policies and various departmental news” and the rate was reportedly fixed at Rs. 3.28 crore per year at Rs. 3,000 per minute. It also had proposals like covering the Chief Minister’s programmes using outdoor broadcast vans “live for 10 minutes” at Rs. 48 lakh per year. There were other offers like running side strips on screen, tickers, and side panels for which the PR department had to pay substantially.

The story provided ‘evidence’ of how other channels — Z24, ETV Chhattsigarh and Sadhna News — collected money for broadcasting the government’s welfare schemes.

“In May 2011, Leader of the Opposition in the Lok Sabha, Sushma Swaraj, visited Bastar to inaugurate achana distribution programme. Z24, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh, and Sadhna News telecast the programme live and produced ‘special stories’… Cost of the same was Rs. 14.26 lakh,” the report said.

On Friday, the State government’s PR department challenged the allegations but did not deny funding the television channels. Principal Secretary, PR, N. Baijendra Kumar told The Hindu that there was “absolutely nothing wrong in funding the channels in a transparent way.”

“We purchase airtime to showcase success stories, informative and promotional programmes through advertisements, advertorials, features and sponsored programmes in public interest,” said Mr. Kumar.

He refused to accept the clear difference between advertorials and news and repeatedly said that the PR department had not funded any “news.”

“Nobody highlighted the government’s welfare schemes, including The Hindu, but still we give advertisements. What is wrong if we do that for the television?” asked Mr. Kumar. Representatives of other media houses, sitting in the room, explained to the correspondent that the government “funds talk shows, which even feature the opposition party.”

“Mr. Varavara Rao, the Naxal sympathiser, appeared in my talk show,” said Mr. Kumar.

A handwritten note issued by the PR department claimed that in the last two years, an amount exceeding Rs. 54,43,000 had been released to the Indian Express for advertisements. However, theIndian Express letters to the PR department did not establish that the paper was selling news space to the government. Rather, it was evident that the marketing department, and not the editors, were selling the ad-space.

‘Out of frustration’

Later at night, the PR department issued a press note claiming that the Indian Express “has published said article out of frustration” as the government had “rejected” the paper’s proposal seeking more advertisements.

Mr. Kumar said the government had no plans to “review existing media funding policy.”

A reality: activists

Local activists said paid news was a reality in Chhattisgarh and the media refused to carry important stories for fear of government action.

“During the President’s visit, 45 activists from Bastar were detained in Raipur and nothing came out. I presume it is all because of paid news,” said B.K. Manish, a tribal activist from Raipur.


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छत्तीसगढ़ सरकार से न्यूज, प्रोग्राम, टिकर, स्पेशल पैकेज, साइड पैनल, लाइव के पैसे वसूलते हैं न्यूज चैनल

प्रभातम् ग्रुप को मिला ‘प्रयाग महाकुंभ-2013’ के मीडिया सेंटर का जिम्मा

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रभातम् ग्रुप को प्रयाग महाकुम्भ 2013 में अत्याधुनिक मीडिया सेंटर स्थापित करने का जिम्मा सौंपा है। दुनिया के सबसे बड़े इस जन पर्व की जानकारी और खबरें देश विदेश के मीडिया कर्मियों और संस्थानों को निर्बाध उपलब्ध कराना इस मीडिया सेंटर का एक प्रमुख कार्य होगा। प्रभातम् ग्रुप के चेयरमेन दिनेश गुप्ता ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि समूह के सभी सहयोगियों के सहकार से चुनौती को सफलतापूर्वक सरअंजाम देंगे। प्रभातम् ग्रुप हरिद्वार महाकुम्भ में भी मीडिया सेंटर का सफलतापूर्वक संचालन कर चुका है। 

सन् 2005 में हरिद्वार में आयोजित इस पर्व की खबरें और जानकारी सारी दुनिया को एक साथ लगातार मुहैया करने के लिए उत्तराखण्ड की तत्कालीन सरकार ने विशेष प्रशस्ति पत्र भी प्रदान किया था। प्रयाग (इलाहाबद) में बारह साल बाद होने वाले इस जनपर्व में लगभग तीन करोड़ से ज्यादा लोगों के शामिल होने का अनुमान है। आस्था और विश्वास के इस विराट उत्सव की कवरेज के लिए एक हजार से ज्यादा विदेशी पत्रकार और मीडिया कर्मियों के जुटने की संभावना है। 

स्थानीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कुल मिला कर लगभग तीन हजार मीडिया कर्मियों को भी प्रभातम् समूह का मीडिया सेंटर समाचार प्रेषण की सुविधांए मुहैया करवाएगा। प्रभातम् ग्रुप का प्रतिनिधित्व कर रहे सीईओ राकेश शर्मा का दृढ़ विश्वास है कि अत्याधुनिक टैक्नोल़जी, नवीनतम उपकरण और कर्तव्य-व्यवचायिकता के प्रति समर्पित कुशल सहयोगियों की टीम सभी लक्ष्यों को हासिल करने की क्षमता रखती है। 

प्रभातम् ग्रुप की क्षमताओं से उत्तरप्रदेश सरकार को परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रभातम् के सह-संस्थान साधनान्यूज यूपी/यूके के चैनल हेड बृजमोहन सिंह महाकुम्ब के दौरान देश-विदेश के मीडिया कर्मियों को सकारात्मक सहयोग का बीड़ा उठाया है। प्रयाग कुम्भ क्षेत्र में मीडिया सेंटर के निर्माण के लिए प्रभातम ग्रुप दो वरिष्ठ अमर शाही और दीपक सेन गुप्ता के नेतृत्व में तकनीकि दल इलाहाबाद में डेरा डाल दिया है। साधनान्यूज यूपी/यूके के चैनल हेड बृजमोहन सिंह के मुताबिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सौ से ज्यादा सहयोगियों की टीम मीडिया सेंटर और कुम्भ क्षेत्र में कार्यरत रहेगी।

मैं आतंकवादी नहीं हूं मिस्टर चीफ मिनिस्टर : राजेन टोडरिया

आज सुबह करीब नौ बजे गांव से मेरे भतीजे का फोन आया कि राज्य की खुफिया एजेंसी का कोई कर्मचारी मेरे गांव जा पहुचा और मेरे बारे में पूरी तहकीकात करने लगा। जैसे कि मैं क्या करता था, मैं क्या करता हूं,मेरा अतीत क्या था, मेरा वर्तमान क्या है, देहरादून में मैं कहां रहता हूं,किसका मकान है,किराए पर है या मेरा है। फिर मेरे परिवार से मेरे चचेरे भाई को थाने में बुलवा लिया गया उनसे पूछताछ की गई। 

दो-तीन पहले नई टिहरी से भी मेरे पड़ोसियों ने भी मुझे इसी तरह की पूछताछ की जानकारी दी। कुछ दिन पहले गोपेश्वर में मेरे एक पुराने मित्र का फोन आया था। वो मेरी राजी खुशी जानना चाहते थे। वो चिंतित थे कि मैं आजकल पत्रकारिता के अलावा क्या कर रहा हूं। उन्हे लगता था कि कहीं मैं किसी ऐसी वैसी राजनीतिक गतिविधि में तो लिप्त नहीं हूं। मैंने उनसे जानना चाहा कि क्यों वह यह सब कुछ पूछ रहे हैं। उनका कहना था कि खुफिया विभाग के कुछ लोग मेरे अतीत को खंगाल रहे हैं। इनमें स्वास्थ्य विभाग और कुछ अन्य विभागों के कर्मचारी भी हैं।

नई टिहरी और गोपेश्वर में हो रही पूछताछ को मैने रुटीन खुफिया जांचों का हिस्सा मानकर अनदेखा कर दिया लेकिन आज जब गांव से भतीजे का फोन आया तो मुझे लगा कि खुफिया विभाग मेरे बारे में इस अंदाज के साथ पूछताछ कर रहा है कि जैसे कि मैं किसी आतंकवादी गतिविधि में लिप्त हूं। गांव के लोग सीधे-सादे होते हैं। यदि वहां कोई पुलिस का आदमी मेरे बारे में पूछताछ करने के लिए भी चला गया तो उन्हे लगता है कि कहीं मैं किसी अपराधिक कार्य में तो लिप्त नहीं हूं। मेरे भाई आम पहाड़ी ग्रामीण हैं। वो भयभीत हैं कि खुफिया विभाग वाले मेरे बारे में क्यो पूछ रहे हैं,पुलिस उन्हे थाने बुला कर मेरे बारे क्या जानकारी लेना चाहती है।

उन्हे लगता है कि कहीं पुलिस मुझे किसी अपराध में अरेस्ट तो नहीं करने जा रही है। वो मुझसे पूछ रहे थे कि मैने कहीं कोई गलत काम तो नहीं किया? मेरे लिए यह चैंकाने वाली घटना है। जाहिर है कि यह कोई सामान्य पूछताछ नहीं है। ये सारी चीजें तबसे शुरु हुई हैं जबसे टिहरी लोकसभा उपचुनाव में उत्तराखंड जनमंच ने चुनाव बहिष्कार का नारा दिया। टिहरी-उत्तरकाशी में मतदान भी कम हुआ और कांग्रेस प्रत्याशी हार भी गए। क्या ये घटनायें उसी का बदला लेने के लिए की जा रही है? या फिर पहाड़ी क्षेत्रवाद को उभारने के लिए मेरे को निशाना बनाया जा रहा है।

मिस्टर चीफ मिनिस्टर!मेरा स्पष्ट आरोप है कि मेरे बारे में ये खुफिया अभियान आपके कहने या आपके इर्दगिर्द के लोगों के कहने पर चलाया जा रहा है। यह आरोप मैं पूरी जिम्मेदारी और नौकरशाही में अपने सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर लगा रहा हूं। ऐसा नहीं है कि यह पहली घटना है। मुझे सितंबर में ही एक आला पुलिस अधिकारी ने आगाह किया था कि आप अपने बीएसएनएल वाले नंबर पर सावधानी के साथ बात करें।

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि वो टेप हो रहा हो। लेकिन मैने उनकी इस बात को बहुत गंभीरता से नहीं लिया। क्योंकि मैं तो वैसे ही सार्वजनिक रुप से इतनी तीखी टिप्पणियां करता हूं कि किसी को मेरे फोन टेप करने की जरूरत ही नहीं है। लेकिन इन घटनाओं से लगता है कि वो अधिकारी गलत नहीं रहा होगा। माननीय मुख्यमंत्रीजी! मेरा कहना है कि जो जानकारी सरकार के उच्च स्तर के निर्देशों के आधार पर खुफिया विभाग मेरे बारे में जुटा रहा है वो जानकारी तो आप भी उन्हे दे सकते थे। आखिर आप तो मुझे सन् 1989 से जानते हैं। उत्तराखंड आंदोलन में आपको लोकसभा चुनाव न लड़ने की सलाह देने वालों में स्व0 इंद्रमणि बडोनी के साथ मैं भी था। टिहरी लोकसभा का सन् 1999 तक ऐसा कौन सा चुनाव जिसमें आपने मुझसे और मेरे कर्मचारी साथियों से सहयोग नहीं मांगा हो।

मिस्टर चीफ मिनिस्टिर! आपको शायद याद न हो पर मैं आपको याद दिला सकता हूं कि मैं वही राजेन टोडरिया हूं जिसे आपने अपनी एक खबर छपवाने के लिए शिमला में ढूंढवाया था। बेहतर होता यदि आपकी खुफिया एजेंसियां मेरे बारे जानकारी जुटाने के लिए आपसे संपर्क करती। यदि जानकारी जुटाना मकसद नहीं है तो फिर ये सब क्या है? क्या आप मेरे मित्रों,परिजनों,परिचितों को क्यांे भयभीत कर रहे हैं। ये कौन सी राजनीति है,कैसी राजनीति कर रहे हैं आप? मैं आपको बताना चाहता हूं कि आपकी सरकार इस लुकाछिपी के खेल को बंद करे।

यदि आपको मुझे गिरफ्तार करना है, पहाड़ी आतंकवादी घोषित कर मुझे गोली मारनी है, रासुका में बंद करना है तो करें। मैं थाने में आकर खुद गिरफ्तारी दे दूंगा। लेकिन खुफिया जांच के नाम पर मेरे मित्रों, परिजनों, परिचितों को भयभीत करना बंद करें। एक और बात मैं कहना चाहूंगा कि हम लोग पहाड़ के लोगों के हकों की खातिर उत्तराखंड में 1994 के बाद आए 12 लाख बाहरी लोगों और उनकी सरकार से अंतिम दम तक लड़ेंगे। मत भूलियेगा कि ये वही पहाड़ी है जिन्होने स्व0 हेमवतीनंदन बहुगुणा के सम्मान के लिए इंदिरा गांधी की सत्ता की ताकत को बौना साबित कर दिया था। आज भी हम वही करने की ताकत और बूता रखते हैं। हमें सत्ता की ताकत से झुकाया नहीं जा सकता।

राजेन टोडरिया वरिष्ठ पत्रकार हैं. वे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में विभिन्न अखबारो में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं. वे जनपक्षधर पत्रकारिता के लिए हमेशा सक्रिय रहते हैं. उन्होंने अपनी यह बात फेसबुक पर प्रकाशित की है. इस पोस्ट पर कुछ टिप्पणियां इस तरह आई हैं…

धर्म सिंह बुटोला Oh! so, it shall be better if you could forward your grievances to cm-uk@nic.in also

Rajen Todariya Nahi! meri koi grivance nahi! i DO NOT WANT HIS MERCY.I want his apology on behalf of Intelligence agency and immediate action against those who are responsible.

Kapil Sharma 2 or 2 panch nahi saanch koi aanch nahi …….sir

Kailash Koranga Gundaraj band karo

Chandra Shekhar Joshi वरिष्‍ठ पत्रकार राजेन टोडरिया के परिवार के साथ इस तरह की घटना की हम भर्त्‍सना व निंदा करते हैं- चन्‍द्रशेखर जोशी केन्‍द्रीय महासचिव- केन्‍द्रीय कूर्माचल परिषद, देहरादून

Rajesh Bharti dukad suchna hai bhai sahab. ye sarkar to pichhali se bhi jyada giri hui hai. jo Iske galat kamo par bolega use yah darayegi. ap chinta na kare Iska bhi aant hona hai.

Sushil Dobhal हम सब आपके साथ है भाई साहब !

Prabhat Upreti fine

Lmohan Kothiyal We condemn this act.

दीपक के साथ पुण्‍य प्रसून भी जाएंगे इंडिया न्‍यूज!

: कानाफूसी : इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में एक बड़ी चर्चा पुण्‍य प्रसून बाजपेयी को लेकर है. जी न्‍यूज से किनारे करने के बीच एक खबर आ रही है कि पुण्‍य प्रसून भी दीपक चौरसिया के साथ इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन करने वाले हैं. कहा जा रहा है कि जी न्‍यूज प्रकरण के बाद उनके सामने भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया था, परन्‍तु दीपक चौरसिया के इंडिया न्‍यूज से जुड़ने की खबरों के बीच पुण्‍य प्रसून के भी इंडिया न्‍यूज पहुंचने की चर्चा तेज है. बताया जा रहा है कि दीपक के जुड़ने के चलते ही पुण्‍य के भी वहां पहुंचने की बात हो रही है. दोनों लोग आजतक में भी रह चुके हैं और पुराने साथी हैं. दीपक के बारे में खबर है कि वे एक जनवरी से चैनल ज्‍वाइन करेंगे.  

दीपक चौरसिया के इनकार के बाद भी यह खबर लगभग पक्‍का हो चुका है कि उनका एबीपी न्‍यूज से संबंध खतम हो चुका है तथा वे पार्टनर के रूप में इंडिया न्यूज के साथ जुड़ने जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि वे हिस्‍सेदारी के अलावा मोटी सैलरी पर आ रहे हैं. अगर चर्चाओं के अनुसार इंडिया न्‍यूज से पुण्‍य प्रसून बाजपेयी भी जुड़ गए तो यह चैनल दूसरे चैनलों के लिए खतरा बन सकता है. यह भी सीरियस चैनलों की श्रेणी में आ जाएगा. कारण दीपक और पुण्‍य दोनों टीवी मीडिया के ब्रांड नेम हैं. और अगर ये एक साथ किसी चैनल से जुड़े तो निश्चित रूप से इसका फायदा भी मिलना तय है. अब देखना है कि यह चर्चा आगे क्‍या गुल खिलाता है. हालांकि इस संदर्भ में पुण्‍य प्रसून से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया.

संदीप बाधवा बने सहारा के मीडिया डिविजन के सर्वेसर्वा

सहारा में एक बार फिर हलचल है. खबर है कि उपेंद्र राय के ऊपर लाकर बैठाए गए संदीप बाधवा को अब मीडिया डिविजन का भी हेड बना दिया है. मीडिया से जुड़े सारे निर्णय अब संदीप बाधवा ही लेंगे. फाइनेंसियल निर्णय भी अब इनके जिम्‍मे रहेगा. अब तक यह जिम्‍मेदारी उपेंद्र राय के पास थी. मीडिया से जुड़े सारे फैसले वे ही लेते थे. हालांकि संदीप वाधवा की नियुक्ति के बाद उपेंद्र राय उन्‍हें ही रिपोर्ट कर रहे थे. संदीप बाधवा के नई जिम्‍मेदारी का नोटिस नोएडा कार्यालय के बोर्ड पर चस्‍पा कर दिया गया है.

उपेंद्र राय के बारे में खबर है कि उनका फैसला लेने का निर्णय भले ही कम कर दिया गया है, परन्‍तु उनकी सुविधाओं में कोई कटौती नहीं की गई है. वे पहले की तरह ही सारी सुविधाएं पाते रहेंगे. सहारा की पॉलिसी रही है वो किसी को हटाता नहीं बल्कि किसी को लाकर ऊपर बैठा देता है. गोविंद दीक्षित, रणविजय सिंह समेत कई नाम हैं, जिन्‍हें उनके पद में बिना कोई कटौती किए ससम्‍मान किनारे लगा दिया गया. अब यह पता नहीं चल पाया है कि पहले की तरह उपेंद्र राय का नाम अखबार के प्रिंट लाइन में जाता रहेगा या यहां भी संदीप बाधवा ही नजर आएंगे.

लखनऊ के दो बच्चो ने जस्टिस काटजू को भेजा कानूनी नोटिस

लखनऊ निवासी तनया ठाकुर, बीए एलएलबी प्रथम वर्ष, व उनके भाई आदित्य ठाकुर, कक्षा 11 के छात्र ने आज दिनांक 9 दिसंबर 2012 को जस्टिस मार्कंडेय काटजू को उनके द्वारा 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख कहे जाने के खिलाफ कानूनी नोटिस भेजा है। तनया और आदित्य के अनुसार जस्टिक काटजू जैसे सम्मानित एवं जिम्मेदार पदधारक व्यक्ति द्वारा ऐसी बात कहे जाने से भारत की मर्यादा का उल्लंघन होता है तथा विदेश में भारत व भारतियो के प्रति गलत धरना बनाने की संभावना बढ़ जाती है।

उन्होंने जस्टिक काटजू के बयान पर खेद और दुःख व्यक्त करते हुए लिखा कि वे चाहते है जस्टिस मार्कंडेय काटजू क्षमा प्रर्थना  करे अन्यथा वे 30 दिन बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। नीचे काटजू को भेजा गया नोटिस।


To,

Sri Markandey Katju,

Chairman,

Press Council of India,

New Delhi.

Subject: Regarding your statement about 90% Indians being idiots.

Sir,

We are Aditya Thakur, 14, and Tanaya Thakur, 17, residents of 5/426 Viram Khand, Gomti Nagar, Lucknow. We are students of Class 11th Police Modern School, Lucknow and 1st Year BA.LLB at Chanakya National Law University, Patna respectively. We are writing this letter to you regarding your statement published in various newspapers on Sunday, 9th December 2012 and reiterated from your contribution to The Indian Express editorial page.

Being average citizens of India, we in most likeliness fall in the same 90% category and were deeply hurt and humiliated by your words. Both of us have huge respect for you and have time and again found your views to be insightful and illuminating. But we also hold India and Indians in high regard and anything which undermines the honor of the country or its citizen affects us directly. As per an article in the Times of India and various other English newspapers, your words were: – “I say ninety per cent of Indians are idiots. You people don't have brains in your heads … It is so easy to take you for a ride.” You further added: – “You mad people will start fighting amongst yourself not realizing that some agent provocateur is behind this” and “You are idiots so how difficult is it to make an idiot of you”. The newspaper further states that you said these harsh words to ‘make Indians, whom he loved to understand the whole game and not remain fools.’

In our opinion, the aforementioned statements would help in nothing but deprecating the reputation of India and its citizens. No country in this world is free of riots or differences and India is no exception. The reasons for the unrest are different in different nations and calling the citizen of one of these countries ‘idiots’ and ‘mad’ is no solution. . A person who holds as esteemed an office as you should have deliberated on the implications of your statements. Your opinions are considered important not only in India but also abroad. In these circumstances when you call us ‘fools’ and ‘idiots’ it is bound to be taken in the negative sense and will have an undesirable effect on our country and our character in the eyes of the rest of the world.

Being Indians and being firm believers in the ideals enshrined in our constitution, we ask you, in this letter to kindly take your words back and issue a public apology. In case this does not happen within a period of 30 days; we would be left with no option other than to move to a suitable judicial forum for defamation and hurting public sentiments.

Letter No: AT/MK/DR-01

Dated- 9/12/12                                                                          (Aditya Thakur) (Tanaya Thakur)

5/426 Viram Khand,  
Gomtinagar
Lucknow.
# 94155-34525

रेप केस का खुलासा करने वाले वन इंडिया के पत्रकार को धमकी

फतेहपुर। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर में रेप की शिकार दलित छात्रा के पक्ष में मुहिम चलाकर पल-पल की खबर उजागर करने वाले वनइंडिया से जुड़े पत्रकार रामलाल जयन को शनिवार की शाम फोन पर धमकी मिली है। धमकी देने वाले ने खुद को सपा लोहिया वाहिनी का पदाधिकारी बताया है। सबसे पहले हम आपको बता दें कि वनइंडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार रामलाल जयन ने सबसे पहले आपको खबर दी थी कि फतेहपुर शहर के लोधीगंज की रहने वाली एक दलित छात्रा को बलात्कार का अभियोग दर्ज कराने पर मुकामी पुलिस पहले चार दिन महिला थाने में बंद किए हुए है। अब उसे 24 नवम्बर से शहर के नारी निकेतन में बंद किए है।

इस मामले को रामलाल जयन ने मुहिम चलाकर लगातार लगातार आपके सामने अपडेट दिये और कई तथ्‍यों को उजागर किया। शनिवार की शाम 6:32 बजे जयन के मोबाइल फोन 8858531032 पर मोबाइल नम्बर 9838388148 से धमकी भरी काल आई। जयन ने बताया कि फोन करने वाले ने अपना नाम महेश पांडेय बताया। वो खुद को सपा लोहिया वाहिनी का पदाधिकारी बता रहा था। उसने धमकी दी कि अगर इस मामले में पीडि़ता से सुलह-समझौता न कराया और मीडिया में आ रही खबरें बंद न हुई तो वह रामलाल जयन सहित पीडि़ता की हत्या करा देगा।

यह धमकी पहली बार तब आई है, जब नवोदित महिला संगठन ‘नागिन' की मुखिया शीलू निषाद ने प्रश्नगत मामले में सोमवार को एसपी कार्यालय फतेहपुर में धरना देने का ऐलान किया है। हालांकि इस बारे में जब सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चैधरी को जयन ने बताया तो उनका कहना था कि ‘लोहिया वाहिनी में महेश पांडेय नाम का कोई पदाधिकारी नहीं है, यह कोई अपराधी किस्म का व्यक्ति होगा जिसके बारे में जांच कराई जाएगी। पत्रकार रामलाल जयन ने बताया कि प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को जरिए ई-मेल शिकायत भेज कर धमकी देने वाले शक्स की पहचान करने और सम्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। (वनइंडिया)

साईं प्रसाद ग्रुप के पूर्व सीईओ एसएल श्रीवास्‍तव का एक बड़ा फर्जीवाड़ा

एसएल श्रीवास्तव साईं प्रसाद ग्रुप के पूर्व सीईओ थे। इन्हें कुछ महीनों पहले कंपनी द्वारा निकाल दिया गया था। अब इन्होंने साईं प्रसाद ग्रुप को बदनाम करने का तानाबाना बुन डाला और इस कंपनी से मिलते हुए नाम से चार कंपनी बना डाली-  1. श्री साईं स्पेसेस क्रियेसन लिमिटेड, 2. श्री साईं ऑटो प्राइवेट लिमिटेड, 3. श्री साईं नॉन कोन्वेंसनल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, .4. श्री साईं सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड। अब आप सोच रहे होंगे कि कंपनी बनाने में क्या फर्जीवाड़ा है? ये हम बताते हैं। श्रीवास्तव ने अपने शैतान दिमाग से साईं प्रसाद ग्रुप को बदनाम करने का तानाबाना बुना है और इस कड़ी में साईं प्रसाद ग्रुप से निकाले गए कर्मचारियों की भर्ती की जा रही है। 

लखनऊ के 238 – A इन्द्रानगर में एक ऑफिस खोला गया। जब मैं कुछ दिन पहले वहां से निकल रहा था तो मैंने न्यूज़ एक्सप्रेस की एक्सयूवी गाड़ी खड़ी देखी। नंबर महाराष्ट्र का था। मेरे मन में जिज्ञासा हुई कि मैं भी इस चैनल के किसी बड़े अधिकारी से मिलूं, सो मैं वहां पहुँच गया। मैंने वहां मौजूद व्यक्ति, जिसका नाम धर्मेन्द्र सिंह था, से अपना परिचय दिया और पूछा कि ये न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल का ऑफिस है? तो उसने कहा हां, ये उसी का ऑफिस है पर यहाँ से चैनल नहीं ग्रुप के दूसरे काम होते हैं जैसे कि चिट-फण्ड, एनर्जी, आईटी से सम्बंधित।

मुझे कभी भी साईं प्रसाद ग्रुप के बारे में इतनी जानकारी थी नहीं थी, सो मैंने जिज्ञासु बनकर सवाल पूछने शुरू कर दिए। वहा मौजूद धर्मेन्द्र ने जब मुझसे पूछा कि आप किस काम से आये हैं तो मैंने हाजिर जवाब होकर कहा कि मैं एक निवेशक हूँ। इतना सुनते ही चाय और बिस्कुट आर्डर कर दिए गए। जब वहां मौजूद तथाकथित सिंह ने मुझसे पूछा कि आप कितना निवेश करेंगे, तो मैंने कहा एक लाख। उसने तुरंत एक ब्रोसर मेरे सामने रखकर स्कीम बतानी शुरू कर दी और बोला हमारी कंपनी पांच साल में आपका पैसा दुगना कर देगी।

मेरे मन में कई सवाल उठने लगे कि ये कैसे हो सकता है? फिर मैंने भी सवाल दागने शुरू कर दिए? मेरे सवाल से परेशान होकर धर्मेन्द्र ने अपने मोबाइल फ़ोन से किसी रविन्द्र को फ़ोन किया और वहां आने को बोला। मैंने पूछा कि कौन आ रहा है तो उसने बोला हमारे रीजनल मैनेजर हैं, मुझे ज्यादा कंपनी के बारे में पता नहीं है उनको सब मालूम है। मैंने उससे पूछा कि आप के चैनल का ऑफिस कहां पर है? तो उसने हकलाती जवान से बताया कि हमारी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर एसएल श्रीवास्तव जी हैं और हम साईं प्रसाद ग्रुप में अब नहीं हैं। हमारे डायरेक्टर साहब साईं ग्रुप में पहले पार्टनर थे, अब उनसे अलग होकर अपनी चार कंपनी बना ली है और भारत के पांच राज्यों में हमारा काम चल रहा है। मैंने सोचा कि ये जरुर कोई फर्जीवाड़ा है। मैंने समय न होने का बहाना बनाकर उनसे अलविदा कहा और कल आने की बात कहकर चलता बना।    

मेरे मन में कई सवाल कौंध रहे थे कि धर्मेन्द्र ने पहले मुझसे झूठ क्यों बोला और बाद में सच क्यों बोला? पर मैंने भी ठान ली कि मैं भी पूरा मामला पता कर के रहूँगा। मैंने भी सबसे बड़े खोजी नारद गूगल बाबा का सहारा लिया और उनके द्वारा दिए गए ब्रोसर पर उपलब्ध जानकारी को खोजने में लग गया और काफी मेहनत के बाद मैंने पूरी रात जग कर एक बड़े घोटाले की बू सुंघ ली।

पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है कि …जब आप गूगल पर जा कर श्री साईं कंपनी टाइप करेंगे तो साईं प्रसाद ग्रुप की वेबसाइट खुल जाएगी और एक बड़ा ग्रुप सामने होगा और हो जायेगा खेल। दूसरा जब आप मिनिस्ट्री आफ कॉरपोरेट की वेबसाइट पर जायेंगे तो श्री साईं स्पेसेस क्रियेशन लिमिटेड, 2. श्री साईं ऑटो प्राइवेट लिमिटेड, 3. श्री साईं नॉन कोन्वेंसनल एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, 4. श्री साईं सिस्टम प्राइवेट लिमिटेड का पूरा चिट्टा देख सकते है। मैंने भी वही किया और उपलब्ध जानकारी के आधार पर लग गया उनकी पड़ताल करने। फिलहाल ये पता चला कि एसएल श्रीवास्तव को साईं प्रसाद ग्रुप से गबन के चलते निकाल दिया गया था और निकले जाने के दो महीने बाद उन्होंने तीन कंपनिया बनाई, वो भी उसके मिलते जुलते नाम से।

पर मेरे मन में कई सवाल है जिनका जवाब आना बाकी है :

1- एसएल श्रीवास्तव की कंपनी लोगों का बीमा किस आधार पर कर रही है?

2- श्री साईं कंपनी पांच वर्ष में आपका धन दुगना कैसे कर रही है?

3- ज्‍वाइंट वेंचर के नाम पर लोगों से रुपए लेने की परमीसन इस कंपनी को किसने दी? क्या ये कंपनी को भारत सरकार ने कोई परमीसन दी है?

4- मात्र 500000/-, 100000/- और 1600000/- रुपए की पूंजी वाली कंपनी करोड़ों रुपए लोगों से किस आधार पर उगाह रही है? ये मैं नहीं कह रहा जो दस्तावेज मुझे एमसीए की वेबसाइट से प्राप्त हुए हैं वो कह रहे हैं और जो ब्रोसर श्री साईं कंपनी द्वारा छपाए गए है उसमे धन को दुगना करने और बीमा करने की बात लिखी है। पाठकों मैं पेशे से पत्रकार हूँ और जिज्ञासु भी, एक साधारण सा वाकया कभी कभी कहानी बना देता है। फिलहाल दीगर बात ये है कि शातिर आदमी घोटाले करते हैं पर हर एक घोटालेबाजों के तरीके अलग-अलग होते हैं। अभी में पूरी घटना की तह में जाने में लगा हूँ।

ये हैं कुछ डाक्यूमेंट्स–

डाक्यूमेंट एक

डाक्यूमेंट दो

डाक्यूमेंट तीन

डाक्यूमेंट चार

डाक्यूमेंट पांच

डाक्यूमेंट छह

डाक्यूमेंट सात

अमित की रिपोर्ट.


इसे भी पढ़ें- धन दोगुना करने का फर्जीवाड़ा कर रहा है एसएल श्रीवास्तव

न्‍यूज एक्‍सप्रेस के ‘ऑपरेशन सौदा’ ने खोली दिल्‍ली-एनसीआर के सुरक्षा की पोल

अंदर की खबर दिखाने वाले न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल ने देश की सुरक्षा में सेंध को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है। न्यूज़ एक्सप्रेस की टीम अपने स्टिंग ऑपरेशन 'ऑपरेशन सौदा' के जरिए देश के सामने ये सच्चाई लाई है कि किस तरह पुलिस की लापरवाही से दिल्ली-एनसीआर के किसी भी इलाके में खूंखार आतंकवादी किराए पर आसानी से मकान ले सकते हैं। न्यूज एक्सप्रेस की टीम ने दिल्ली-एनसीआर के पांच थानों ग्रेटर नोएडा में कासना एच्छार चौकी, ग़ाजियाबाद के शास्त्री नगर थाना, दिल्ली में सरिता विहार थाना, नोएडा सेक्टर-92 की पुलिस चौकी, और वसुंधरा ग़ाज़ियाबाद थाने की पोल खोली है।

इन सभी थानों में तैनात पुलिस बड़े-बड़े आतंकियों का वेरिफिकेशन चंद रुपये लेकर कर देती है। पुलिस की ये लापरवाही तब है जब पुलिस ये बात अच्छी तरह जानती है कि आतंकियों का स्लीपर सेल लोगों के साथ घुल-मिलकर इसी तरह काम करता है। ग्रेटर नोएडा की कासना एच्छर चौकी की पुलिस ने इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकी रियाज़ भटकल की तस्वीर लगे वेरिफिकेशन फॉर्म पर मामूली आनकानी के बाद 200 रुपये लेकर मुहर लगा दी। गाजियाबाद के शास्त्री नगर थाने की पुलिस भी किराए के लिए लश्कर-ए-तैयब्बा और हूजी से जुड़े खतरनाक मोहम्मद अकरम की लगी तस्वीर वाले फॉर्म पर 300 रुपये लेकर मुहर लगा दी।

न्यूज़ एक्सप्रेस की टीम ये जानना चाहती थी कि क्या ग़ाजियाबाद पुलिस की तरह दिल्ली पुलिस भी मोहम्मद अकरम को नहीं पहचानती, इसके लिए टीम सरिता विहार थाने पहुंची। वहां भी पुलिस मोहम्मद अकरम जैसे खूंखार आतंकी को नहीं पहचान पाई और 200 रुपये में उसकी तस्वीर लगी फॉर्म का वैरिफिकेशन कर दिया। वहां क़तील सिद्दिकी की तस्वीर लगे फॉर्म का भी पुलिस ने वैरिफिकेशन कर दिया। नोएडा सेक्टर-92 की पुलिस चौकी ने भी 300 रुपये में रियाज भटकल के साथ-साथ डॉक्टर जाफर इकबाल की तस्वीर लगी फॉर्म को वेरिफाई कर दिया। वसुंधरा ग़ाज़ियाबाद के थाने ने भी लश्कर-ए-तैयब्बा से जुड़े मज़हर इकबाल जैसे खूंखार आतंकी की तस्वीर लगी फ़ॉर्म का वैरिफिकेशन 350 रुपये में कर दिया। इस तरह न्यूज़ एक्सप्रेस ने ऑपरेशन सौदा के तहत खुलासा कर दिया कि पुलिस सुरक्षा को लेकर कितनी सतर्क है। इस पूरे स्टिंग को आप यू-ट्यूब पर भी देख सकते हैं। (प्रेस रिलीज)

नेशनल दुनिया के करेस्‍पांडेंट हैं तो किसी नेता को लेकर कानपुर पहुंचें!

: मालिक की बहन की शादी में पत्रकारों को सौंपी गई कार्ड बांटने और नेताओं को लाने की जिम्‍मेदारी : एक दौर था जब पत्रकार केवल अपनी लिखी गई खबरों के लिए जाना-पहचाना जाता था. उसकी जिम्‍मेदारी भी केवल अपने संपादक के प्रति होती थी. मालिकों से सीधा उनका कोई लेना देना नहीं होता था. संपादक उनके तथा मालिक के बीच की कड़ी होता था, जो पत्रकारों के हित तथा सम्‍मान की रक्षा करता था. प्रभाष जोशी जैसे संपादक तो पत्रकार हित में अपने मालिकों की भी नहीं सुनते थे. मालिकों की नजर में भी अपने पत्रकारों एवं संपादकों का सम्‍मान होता था. परन्‍तु आज के दौर में पत्रकारों का सम्‍मान तो गया ही संपादकों ने भी अपनी सारी इज्‍जत मा‍लिकों चरणों में गिरवी रख दी है.

दिल्‍ली से एक अखबार प्रकाशित होता है. नाम है नेशनल दुनिया. इसके संपादक हैं आलोक मेहता. वही आलोक मेहता जो कई अखबारों में संपादक रहे हैं. कांग्रेस के प्रति साफ्ट कार्नर रखते हैं और नईदुनिया के बंद होने के बाद रातोंरात नेशनल दुनिया को निकालने का रिकार्ड भी इनके पास है. इस अखबार के मालिक कहे जाते हैं शैलेंद्र भदौरिया. कानपुर के रहते हैं. आज इनकी बहन की शादी है. अब अखबार मालिक के बहन की शादी हो और बड़े-बड़े नेता न जुटें तो फिर इज्‍जत किस बात की? बस भदौरिया साहब को लग गया कि बड़ा आदमी दिखना है तो नेताओं-मंत्रियों का शादी में आना जरूरी है. बहुत ही जरूरी है.

तो इसके लिए उन्‍हें कहां कुछ करना था. उन्‍होंने तो अखबार खोल ही रखा है. आखिर इसके संपादक और पत्रकार कब काम आएंगे. इन्‍हीं कामों के लिए नेशनल दुनिया जैसा हाथी पाल कर रखा गया है. सो, भदौरिया साहब ने अपने करेस्‍पांडेंटों को शादी का कार्ड थमा दिया. और निर्देश दे दिया कि जाओ मेरे कार्ड वाहकों, जाओ और कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओं-मंत्रियों को इसे दे आओ. और उनसे आने के लिए निवेदन करो. अखबार की वजह से बने संबंध के आधार पर उन्‍हें कानपुर प्रस्‍थान के लिए तैयार करो. बेचारे करेस्‍पांडेंट या पत्रकार का जिस किसी भी नेता से संबंध था, सबको कार्ड वाहक बना दिया गया.

अब यह पता नहीं चल पाया कि संपादक जी को भी कार्ड बांटने की जिम्‍मेदारी दी गई या नहीं, पर समझा जा सकता है कि जब संपादक जी अपने पत्रकारों से कराए जाने वाले इस कार्य का विरोध नहीं कर पाए तो अपने मामले में कहां कर पाए होंगे, अगर उन्‍हें ऐसी कोई जिम्‍मेदारी मिली भी होगी तो. अब बेचारे कार्डवाहक पत्रकार परेशान हैं कि कैसे बड़े नेताओं-मंत्रियों को लेकर कानपुर पहुंचे. संसद सत्र चल रहा है. बताया जा रहा है कि कई करेस्‍पांडेंट तो अपने पर्सनल संबंधों का हवाला देते हुए कुछ नेताओं को तैयार किए हुए हैं कानपुर चलने को. पर क्‍या पता नेताजी लोग अंत समय में गच्‍चा दे जाएं अपनी फितरत के अनुसार, तब बेचारे करेस्‍पांडेंट क्‍या करेंगे?

वैसे भी नेशनल दुनिया के कर्मचारी परेशान हैं. किसी को दो तो किसी को तीन महीने की तनख्‍वाह नहीं मिली है. बेचारे यहां वहां से लेकर ईएमआई और बच्‍चों की फीस भर रहे हैं. मार्केट में नौकरी नहीं है, लिहाजा कहीं जाना भी नहीं बन पा रहा है. उपर से मालिक ने कुछ दिन पहले मीटिंग करके कह दिया है कि हम कुछ समय बाद अंग्रेजी अखबार भी लांच करने जा रहे हैं इसलिए वे और मेहनत करने को तैयार रहें. हालांकि उन्‍होंने तनख्‍वाह पर कोई बात नहीं की. एप्‍वाइंट लेटर पर कोई बात नहीं की, पीएफ पर कोई चर्चा नहीं की. बेचारे अपने प्रधान संपादक जी के चक्‍कर में बुरी तरह फंस गए हैं.   

इतना ही नहीं प्रधान संपादक आलोक मेहता जी भी बेचारे इन पत्रकारों को कोई जानकारी नहीं उपलब्‍ध करा पा रहे हैं. सही भी है कि आलोक मेहता जी एक बार इन लोगों को बेरोजगार होने से बचा चुके हैं तो क्‍या हर बार वे ही बचाएंगे. पैसे मिलने होंगे तो मिल जाएंगे, कहां वे किसी को रोककर रखे हैं, जिसे जाना हो जाए. संपादक जी भी कहां भाग रहे हैं, जो पत्रकार एवं कर्मचारी अपने तनख्‍वाह के लिए परेशान हो रहे हैं. क्‍या कुछ महीने हवा को खा-पीकर गुजारा नहीं कर सकते नेशनल दुनिया के पत्रकार? अरे भाई तनख्‍वाह की चिंता छोड़ों पहले भदौरिया साहब की बहन की शादी में नेताओं को लेकर पहुंचो तथा वहां जाकर लोगों की आगवानी करो, पानी पिलाओ. कामधाम ठीक रहा तो देर सबेर तनख्‍वाह भी मिल ही जाएगी.

संतोष वर्मा जैसे लोग कभी मरते नहीं

बस 2012 के फरवरी महीने के शुरुआती दिनों में ही मुलाकात हुई थी संतोष वर्मा से। हालांकि अब मेरी धर्मपत्नी बन चुकी अलका अवस्थी उनको पहले से जानती थीं। अलका ने संतोष वर्मा के साथ पत्रकारिता भी की। ठीक ठीक नहीं याद कि वो कौन सी तारीख थी लेकिन इतना याद है कि फरवरी का महीना था। संतोष वर्मा से बनारस से देहरादून पहुंचने के बाद मैं अपनी पत्नी के साथ पहली बार उनसे मिलने पहुंचा था। संतोष वर्मा और मुझमें उम्र का बड़ा फासला था लेकिन संतोष वर्मा ने जिस गर्मजोशी से मुझे गले से लगाया वह अविस्मरणीय है।

मैं चूंकि उनसे पहली बार मिल रहा था लिहाजा संकोच और औपचारिकता के चलते मैं सिर्फ हाथ मिला कर रह जाना चाहता था लेकिन संतोष जी ने हाथ मिलाने के बाद मुझसे कहा – ‘नहीं ऐसे नहीं।‘ इसके बाद संतोष जी ने मुझे गले से लगा लिया। आप जिससे पहली बार मिल रहे हों वो आपको यूं अपनाए ये कम होता है। हम- मैं, मेरी पत्नी अलका और संतोष जी सर्द रात में देहरादून की उस सड़क पर थोड़ी देर तक बात करते रहे। चूंकि रात हो रही थी लिहाजा हम जल्द ही घर की और निकल गए। इसके बाद संतोष जी से अक्सर मुलाकात होती रही। संतोष जी भावुक थे और मर्मस्पर्शी मनुष्य। खबरों के लिहाज से उनके पास एक बेहतर सोच भी थी।

उनसे मेरी आखिरी मुलाकात देहरादून में उनके ही घर पर हुई थी। वो दिव्य हिमगिरी पत्रिका के कार्यकारी संपादक के पद से त्यागपत्र दे चुके थे। घर पर ही अध्ययन कर रहे थे। भविष्य की कई योजनाएं भी उन्होंने बेहद संक्षेप में लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ मुझे बता दीं। लगभग 25 सालों तक जिसने पत्रकारिता को जिया हो उसके भीतर जो आत्मविश्वास होना चाहिए वो पूरा था संतोष जी के साथ। एक बात और, मैंने कभी उनके भीतर अहंकार नहीं देखा। मेरे आलेखों पर अक्सर उनकी टिप्पणियां आती रहती थीं। अभी हाल ही में उन्होंने मेरे एक आलेख पर फेसबुक के जरिए टिप्पणी की थी। उनके और मेरे बीच पत्रकारिता के अनुभव का फासला करीब 15 सालों का था लेकिन वो हमेशा उत्साहवर्धन करते रहते।

मृदुभाषी संतोष जी के कमरे में भी संतोष पसरा होता था। एक तंग गली के पिछले हिस्से में बने एक छोटे से कमरे में रहने वाले संतोष वर्मा को कहीं से भी दिखावा पसंद नहीं था। संतोष वर्मा के देहांत की खबर बेचैन करने वाली थी। इससे भी अधिक इस बात पर दुख हुआ कि उनके परिजनों ने उनकी मृत देह को स्वीकार करने से भी मना कर दिया। ये सही है कि पत्रकार भी हमारे समाज का ही एक हिस्सा होता है। पेट और परिवार को पालने के लिए उसे भी पैसे कमाने पड़ते हैं। संतोष जी भी इन सामाजिक बाध्यताओं से घिरे थे। उनके परिवारजनों ने उनकी मृत देह हो लेने से भले ही कर दिया हो लेकिन संतोष वर्मा जी के साथ कई साथी और हैं जो उनकी मृत देह का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करेंगे।

जिस संतोष के लिए हम सब परेशान रहते हैं वो संतोष वर्मा में पर्याप्त था। व्यथित और दुखी मन के साथ भी अब तक ये स्वीकार नहीं कर पाया हूं कि संतोष वर्मा अब हमारे बीच नहीं हैं। फिर भी नश्वर शरीर की अनिवार्यता स्वीकार कर ही लूंगा। बस तसल्ली रहेगी कि कुछ उपहारों के साथ संतोष वर्मा अब भी हमारे साथ हैं।

लेखक आशीष तिवारी देहरादून में नेटवर्क10 आउटपुट हेड हैं.

सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया फिर दो दिन के पुलिस रिमांड पर

जी समूह के दो संपादकों को दिल्ली की एक अदालत ने दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. अब जांच अधिकारी मामले में सबूत जुटाने के लिए उनको जी समूह के प्रमुख सुभाष चंद्रा और उनके बेटे से रुबरु करा सकेंगे. मेट्रोपोटिलन मजिस्ट्रेट अंकित सिंगला ने आदेश दिया, ‘दो दिन की पुलिस हिरासत का आदेश दिया जाता है.’ अदालत ने कहा, ‘मौजूदा मामले में सत्र अदालत ने अन्य दो आरोपियों ‘चंद्रा और गोयनका’ को जांच में शामिल होने का निर्देश दिया है.अगर जांच एजेंसी को सभी चार आरोपियों के बयानों को एक दूसरे के सामने लाने का मौका नहीं दिया जाता तो सबूत इकट्ठे नहीं किये जा सकते क्योंकि आपराधिक साजिश के आरोप हैं.’

अदालत ने जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को सोमवार तक के लिए हिरासत में पूछताछ के लिहाज से भेजते हुए कहा, ‘जांच एजेंसी को सबूत इकट्ठा करने के मौके से वंचित नहीं किया जा सकता.’ अदालत ने जी के संपादकों की इस दलील को खारिज कर दिया कि उन्हें हिरासत में पूछताछ के लिए भेजने से कोई मकसद हल नहीं होगा क्योंकि उन्होंने न्यायिक हिरासत के तहत तिहाड़ भेजे जाने से पहले दो दिन तक पुलिस हिरासत में जांच में सहयोग दिया था.

हालांकि अदालत ने कहा कि अगर अभियोजन पक्ष आगे पुलिस हिरासत की जरूरत के लिहाज से परिस्थिति दर्शाता है तो महज यह तथ्य पुलिस हिरासत से मना करने का कारण नहीं हो सकता कि पहले ही दो दिन की पुलिस हिरासत में भेजा जा चुका है. (सहारा)


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पलामू में दैनिक जागरण के छायाकार को भाजयुमो नेता ने पीटा

: अखबार में नहीं छपी एक भी लाइन : झारखंड के पलामू से खबर है कि दैनिक जागरण के छायाकार को भाजयुमो के एक नेता ने पीट दिया. इस घटना की जानकारी छायाकार ने अखबार प्रबंधकों को दी, परन्‍तु अखबार ने इस खबर के बारे में एक लाइन प्रकाशित करना भी गंवारा नहीं समझा. बताया जा रहा है कि रांची से प्रकाशित होने वाले दैनिक जागरण के पलामू कार्यालय में प्रियदत्‍त उर्फ छोटू छायाकार के रूप में काम करते हैं. किसी बात को लेकर एक भाजयुमो नेता ने छोटू को पीट दिया.

इस घटना के बाद पत्रकारों ने आपात बैठक कर उक्‍त छायाकार से हुई मारपीट की निंदा की. पत्रकारों ने भाजयुमो नेता के समझौता के दबाव से भी इनकार कर दिया है. अखबार में छायाकार के साथ मारपीट की एक लाइन की खबर प्रकाशित नहीं हुई. इससे भी पत्रकारों में रोष है. लम्‍बे समय से पलामू में पत्रकारों का कोई संगठन नहीं होने से पत्रकारों के उत्‍पीड़न की घटनाओं में इजाफा हुआ है. 

नईदुनिया से इस्‍तीफा देकर हरिभूमि पहुंचे चंद्रमोहन

छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर से खबर है कि बीते चार वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय चन्द्रमोहन द्विवेदी ने नईदुनिया से अपना इस्तीफा दे दिया है। चन्द्रमोहन तक़रीबन ढाई वर्षों से नईदुनिया में बतौर रिपोर्टर अपनी सेवाएं दे रहे थे। इससे पहले वे हिन्दुस्थान संवाद सेवा और स्थानीय न्यूज़ चैनल में रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। नईदुनिया के बाद चन्द्रमोहन ने हरिभूमि में अपनी नई पारी शुरू की है। यहाँ उन्हें फिलहाल शिक्षा सहित स्पेशल स्टोरी की जिम्मेदारी दी गयी है।

नईदुनिया में रहते हुए चन्द्रमोहन ने धर्म-समाज जैसी बीट से शुरुआत कर क्राइम, हेल्थ, एजुकेशन जैसी बीट पर काम किया। साथ ही उन्हें यहाँ फिलर के रूप में माना जाता था, लगभग हर बीट पर अपनी पकड़ रखने के कारण जहाँ दूसरे रिपोर्टर हाथ खड़ा कर देते वो काम चन्द्रमोहन को दे दिया जाता था। बताते हैं कि संस्थान  में सबसे अधिक सक्रिय रहने के बावजूद सीनियर की उपेक्षा से परेशान होकर उन्होंने नईदुनिया को अलविदा कहा। पता चला है कि चन्द्रमोहन के बाद कुछ और लोग भी संस्थान छोड़ने का मन बना रहे हैं।

Chhattisgarh government paid TV channels for favourable news coverage, claims paper

: Absolutely nothing wrong in funding the channels in a transparent way, says official : Raman Singh’s BJP government “has paid for favourable news stories” and “regular live coverage” to a host of national and local television channels, an English language newspaper reported. Furthermore, the senior editors of the channels concerned allegedly wrote to the public relations (PR) department of the Chhattisgarh government “negotiating” rates to produce “news stories” and to ensure “positive coverage.”

The news story ‘Chhattisgarh government pays for all TV news that is fit to buy,’ published by theIndian Express on Friday, claimed the paper had in its possession nearly 200 documents exchanged between the PR department and the editors. While not challenging the veracity of the story, the Chhattisgarh government has brought counter allegations against the Indian Express, claiming that the newspaper has “taken more than 50 lakh” in the last two years as advertisements.

The channels named by the newspaper are Z24, a franchisee of Zee News, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh, Sadhna News and other “smaller, local networks.” The newspaper has published details of money allegedly received for government-friendly coverage ranging from welfare programmes, planting of trees in Naya Raipur, distribution of rice at subsidised rates to the poor, the Queen’s Baton relay in Commonwealth Games, the budget presentation, Independence Day speech by the leaders and even the generation of public reaction to welfare schemes — “five persons in each district with 30 seconds for every reaction,” the report says.

BJP leader Sushma Swaraj’s visit and anti-Naxal reports are also funded by the PR department, claimed the report. The report listed what it called the rate for each of the paid news items. In May 2010, Hindi television channel Sahara Samay had presented a five-point proposal to the PR department. It included special television packages on Sahara Samay, 15 times a day, featuring “CM’s speeches, government policies and various departmental news” and the rate was reportedly fixed at Rs. 3.28 crore per year at Rs. 3,000 per minute. It also had proposals like covering the Chief Minister’s programmes using outdoor broadcast vans “live for 10 minutes” at Rs. 48 lakh per year. There were other offers like running side strips on screen, tickers, and side panels for which the PR department had to pay substantially.

The story provided ‘evidence’ of how other channels — Z24, ETV Chhattsigarh and Sadhna News — collected money for broadcasting the government’s welfare schemes. “In May 2011, Leader of the Opposition in the Lok Sabha, Sushma Swaraj, visited Bastar to inaugurate achana distribution programme. Z24, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh, and Sadhna News telecast the programme live and produced ‘special stories’… Cost of the same was Rs. 14.26 lakh,” the report said.

On Friday, the State government’s PR department challenged the allegations but did not deny funding the television channels. Principal Secretary, PR, N. Baijendra Kumar told The Hindu that there was “absolutely nothing wrong in funding the channels in a transparent way.” “We purchase airtime to showcase success stories, informative and promotional programmes through advertisements, advertorials, features and sponsored programmes in public interest,” said Mr. Kumar.

He refused to accept the clear difference between advertorials and news and repeatedly said that the PR department had not funded any “news.” “Nobody highlighted the government’s welfare schemes, including The Hindu, but still we give advertisements. What is wrong if we do that for the television?” asked Mr. Kumar. Representatives of other media houses, sitting in the room, explained to the correspondent that the government “funds talk shows, which even feature the opposition party.”

“Mr. Varavara Rao, the Naxal sympathiser, appeared in my talk show,” said Mr. Kumar. A handwritten note issued by the PR department claimed that in the last two years, an amount exceeding Rs. 54,43,000 had been released to the Indian Express for advertisements. However, theIndian Express letters to the PR department did not establish that the paper was selling news space to the government. Rather, it was evident that the marketing department, and not the editors, were selling the ad-space.

‘Out of frustration’

Later at night, the PR department issued a press note claiming that the Indian Express “has published said article out of frustration” as the government had “rejected” the paper’s proposal seeking more advertisements. Mr. Kumar said the government had no plans to “review existing media funding policy.”

A reality: activists

Local activists said paid news was a reality in Chhattisgarh and the media refused to carry important stories for fear of government action. “During the President’s visit, 45 activists from Bastar were detained in Raipur and nothing came out. I presume it is all because of paid news,” said B.K. Manish, a tribal activist from Raipur. (द हिंदू)

पुलिस के सामने पेश हुए जी समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा

नई दिल्ली : ज़ी समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा शनिवार को दिल्‍ली पुलिस के सामने पेश हुए. दिल्‍ली पुलिस ने सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कंपनी से कथित तौर पर समूह के दो संपादकों द्वारा 100 करोड़ रुपये ऐंठने के प्रयास के मामले के सिलसिले में पूछताछ के लिए बुलाया था. इसके लिए पुलिस ने उन्‍हें तीन बार नोटिस भी भेजा था. आज दोनों संपादकों को भी उनके सामने बुलाकर पूछताछ होगी. साकेत कोर्ट इसके लिए आदेश जारी कर चुका है.

जिंदल की कंपनी ने आरोप लगाया था कि नुकसान नहीं पहुंचाने वाले समाचार नहीं प्रसारित के एवज में दोनों संपादकों ने 100 करोड़ रुपये की मांग की थी. संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिए सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका अग्रिम जमानत के लिए कोर्ट गए थे. जिस पर कोर्ट ने 14 दिसम्‍बर तक इन दोनों लोगों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी. चंद्रा अपने वकीलों के साथ चाणक्यपुरी में अपराध शाखा के कार्यालय पहुंचे, जहां उनसे पूछताछ की गई.

गौरतलब है कि पुलिस ने इस आरोप में जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को 27 नवम्‍बर को गिरफ्तार किया था, जिसके बाद से वे दोनों तिहाड़ जेल में हैं. सुभाष चंद्रा और पुनीत को भी पूछताछ के लिए तीन बार नोटिस भेजा गया. जिस पर चंद्रा ने पुलिस को बताया था कि वे देश के बाहर हैं वापस आने पर वे पूछताछ के लिए प्रस्‍तुत होंगे. परन्‍तु उसके पहले उन्‍होंने अग्रिम जमानत की अर्जी दायर कर दी.

हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर का ढोंगी लेख और उनके प्रोफेशनलिज्म का सच

पिछले रविवार को हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर का लेख उनके अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ पर पढ़ा। सम्पादकीय इस हेडिंग से शुरू होता है "खुद आईना देखें, उसे दिखाने वाले". पर सवाल यह है कि  क्या खुद शशि शेखर ने भी वह आइना देखा है जिसकी बात वह अपने लेख में कर रहे हैं। अपने लेख में चार चाँद लगाने के लिए शशि ने मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक से लेकर सत्यता, निष्ठता और निर्भीकता की बात की। शशि जी को लगता होगा बड़े-बड़े शब्द पढ़ कर पाठकों को अच्छा लगेगा। पाठकों को लगेगा कि देखिए  सम्पादक जी कितने अच्छे हैं कितने निर्भीक हैं कितने निष्पक्ष हैं। 

शशि जी ने अपने लेख में एक बात बहुत ढंग से समझाई कि …"अगर समाज को पेशेवर डॉक्टर, शिक्षक या वकील की जरूरत है, तो प्रोफेशनल पत्रकार की क्यों नहीं? फिर यह कहने में संकोच क्यों कि हम पेशेवर तौर पर सच बोलने और लिखने वाले हैं। पर इसके लिए सच बोलने-लिखने वालों को सत्य की राह पर ही चलना होगा।" … पर सवाल यह है कि जब तक शशि जी जैसे लोग सम्पादक रहेंगे तब तक कोई भी प्रोफेशनल पत्रकार कैसे हो सकता है।

शशि जी, कोई भी व्यक्ति प्रोफेशनल तभी बन पाता है जब उसे उसका भविष्य सुरक्षित नजर आता हो। आप जैसे नान-प्रोफेशनल संपादकों के साथ कोई प्रोफेशनल पत्रकार बन पाएगा, यह समझ से परे है।  किसी की नियुक्ति के समय  प्रोफेशनलिज्म  के बजाय क्षेत्रीयता, जाति  और धर्म को सेलेक्शन का क्राइटेरिया बनाने वाले सम्पादक ऐसी बड़ी-बड़ी बातें लिखें तो समझ से दूर की बात है। शशि को बड़ी-बड़ी बातें लिखने से पहले अपने गिरेबान में झांकना होगा। तब सच लिखना होगा। 

वैसे तो हिंदुस्तान हिंदी हमेशा से ही क्षेत्रीय गुटबाजी का बड़ा अड्डा रहा है। कभी बिहारी कभी पहाड़ी तो आजकल बनारसी बाबू और कनपुरियों का सिक्का खूब चल रहा है। हिन्दुस्तान में आजकल जो लोग सत्ता में बैठे हुए हैं उनका सम्बन्ध कानपुर से ज्यादा है। दिल्ली ब्यूरो प्रमुख से लेकर दिल्ली के स्थानीय सम्पादक तक सभी बनारस से कानपुर के बीच के लोग हैं। यहाँ तक कि जिन लोगों की नियुक्ति सब एडिटर लेवल पर हुई उनका सम्बन्ध भी यूपी की इसी बैल्ट से है। 

हिन्दुस्तान के अन्दर काम करने वाले लोग भी दबी जुबान कहने लगे हैं कि हिन्दुस्तान में काम करने की कुछ विशिष्ट अनकही शर्तें हैं जिनमें सबसे बड़ी शर्त है आपका बनारसी या कानपुरी कनेक्शन होना। चाहे वह किसी भी रूम में क्यों न हो। यही कारण है कि  हिंदुस्तान में ऐसे लोगों को अहम जिम्मेदारी दी जा रही है जिनका कनेक्शन यूपी के इन शहरों से है। पत्रकारिता में प्रोफेशनलिज्म की बात करने वाले हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक शशि शेखर से एक ही सवाल है कि नौकरी देते समय उनका ये प्रोफेशनलिज्म कहां चला जाता है।

उपरोक्त विचार किन्हीं shail का है, जिन्होंने मेल आईडी srti2006@gmail.com के जरिए भड़ास4मीडिया को भेजा है.


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संतोष वर्मा ने कहा था कि ऐसे ही जीवन कट जाएगा

संतोष वर्मा जी के निधन की खबर मुझे शनिवार को दिन में करीब 11 बजे मिली। मुझे जैसे ही यह खबर मिली कि उनके शव को कोई लेने वाला नहीं है। वे देहरादून के दून अस्पताल में पड़े हैं, मुझे बडा ही आश्चर्य हुआ कि इस नेक दिल इंसान के साथ ऐसे कैसे हो सकता है। मैंने तुरंत देहरादून के कई लोगों से संपर्क किया जो संतोष वर्मा जी को जानते थे। सभी ने मुझे बताया कि उनके परिवार की तरफ से कोई उनकी डेडबाडी लेने को तैयार नहीं है। सभी ने उनको पहचानने से इनकार कर दिया है। मुझे इतना दुख कभी नहीं हुआ था जितना इस घटना ने दुखी कर दिया है। वाह रे दुनिया।

मैं बताना चाहूंगा कि साल 2010 में मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। दुखद की बात यह है कि जिन्होंने उनसे मेरी मुलाकात कराई वे भी कुछ महीने पहले गुजर गये। वो थे दुर्गाप्रसाद पाण्डेय, जो दिल्ली के एक न्यूज पेपर महामेधा दैनिक में फीचर एडिटर थे। संतोष जी के साथ मैं एक पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में रात भर लगा रहा। उस समय देहरादून के सीएम निशंक पोखरियाल थे जो उस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। उस कार्यक्रम में मैंने उनको काम करते हुए देखा था। उस समय मैं उनके कमरे पर गया तो देखा इतना बड़ा पत्रकार इतने छोटे से कमरे में रह रहे हैं। जहां सही से रोशनी भी नहीं आती। मैंने उनसे पूछा कैसे रहते है भाई साहब उन्होंने बताया कि ऐसे ही जीवन कट जाएगा। क्या करेंगे बड़े कमरे में रहकर।

लेकिन उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनके साथ मरने के बाद ऐसा होगा। मैं तो केवल एक साल, जब तक देहरादून में था, उनसे मिलता रहा। उन्होंने ही मुझे क्वार्क एक्सप्रेस के बारे में जानकारी दी थी, समझाया था अपने लैपटॉप पर। वह हमेशा बताते थे कि जब वह बरेली में दैनिक जागरण में हुआ करते थे तो क्या पत्रकारिता थी। आज की पत्रकारिता कैसी हो गई है। उन्होंने एक बार मुझे बरेली में अपने माध्यम से इन्टरव्यू के लिए भेजा था। हालांकि मैंने ज्वाइन नहीं किया। जब उन्होंने जाना कि मैंने ज्वाइन करने से इनकार कर दिया है। तब वह मुझे बहुत समझाये। देहरादून के घण्टाघर पर स्थित एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान पर हम दोनों लोग काफी समय तक बैठ रहे।

लेखक संतोष पांडेय जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़े हुए हैं. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 8410765753 के जरिए किया जा सकता है.

जी हां शशिशेखर जी, ‘कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है’

पत्रकारिता की खराब हालत पर चिन्तित नहीं हैं शशिशेखर। वो तो कह रहे हैं कि कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है। आप उनका लिखा फिर पढ़िए। दुनिया भर की बात करने से शुरू हुआ लेख दरअसल यही कहता है कि मीडिया पैसे क्यों न कमाए? वे यह भी पूछते हैं कि इसमें हर्ज क्या है? हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले पर मौन अपने इस आलेख में उन्होंने कहा है…

“.. हम क्यों न उन सिद्धांतों पर चर्चा करें, जिनके बल पर पूरे संसार के पत्रकार आज तक अपना सीना चौड़ा करके चलते रहे हैं? हम सभी को पत्रकारिता की किताबों में पढ़ाया गया है कि हमारा काम संविधान सम्मत, सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल और जन साधारण के हित में होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है? अक्सर लोग आरोप लगाते हैं कि व्यवसायीकरण ने मीडिया को गलत रास्ते पर ला पटका है। क्या वाकई ऐसा है? ” 

नीरा राडिया टेप और नवीन जिन्दल के आरोपों पर दो संपादकों की गिरफ्तारी के बाद भी वे पूछ रहे हैं कि मीडिया गलत रास्ते पर है कि नहीं। चिन्तित वे बिल्कुल नहीं लग रहे हैं। वे तो संपादक होने का धर्म निभा रहे हैं।  

आगे पढ़िए। उन्होंने लिखा है, “यह ठीक है कि मीडिया व्यावसायिक हो गया है। यह भी सही है कि उसे लाभ-हानि के तराजू में तोला जाता है। ठीक यह भी है कि तमाम मीडिया कंपनियां शेयर बाजारों में लिस्टेड हैं और हर तीन महीने में अपने नफे-नुकसान का ब्योरा पेश करती हैं। मैं पूछता हूं कि इसमें हर्ज क्या है? एक अखबार, न्यूज चैनल या खबरिया वेबसाइट अपने उपयोगकर्ता से वायदा क्या करती है? यही कि हम आप तक खबर और विचार पहुंचाएंगे। पता नहीं क्यों, हम भूल जाते हैं कि समाचार का अकेला, और सिर्फ अकेला तत्व ‘सत्य’ है।” यहां भी वे यही पूछ रहे हैं कि मीडिया कंपनियां पैसे कमाएं इसमें हर्ज क्या है? 

वे कहते हैं, “अगर सच के साथ छेड़छाड़ की गई है, तो वह कहानी हो सकती है, खबर नहीं। अब पत्रकारों को तय करना है कि उनकी पेशेवर नैतिकता क्या है? वे खबर लिखना और दिखाना चाहते हैं या कहानी? भूलिए मत, इस देश को मसालेदार कहानियों के मुकाबले खबरों की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए आज भी वही अखबार या चैनल प्रतिष्ठा पाते हैं, जो सच पर अडिग रहते हैं।” अब शशिशेखर जी के इस ज्ञान से असहमत होने का कोई कारण नहीं है और परेशानी तो यही है कि ऐसे अखबार बहुत कम रह गए हैं। और सच दिखाने-बताने की तो छोड़िए सिर्फ चुने हुए सच को खबर बनाना भी बेईमानी है लेकिन इसकी भी चर्चा वे नहीं करते।    

उन्होंने लिखा है, “एक बात और। अगर समाज को पेशेवर डॉक्टर, शिक्षक या वकील की जरूरत है, तो प्रोफेशनल पत्रकार की क्यों नहीं? ” पर वे प्रोफेशनल पत्रकारों की दशा-दिशा की चर्चा नहीं करते। यह नहीं बताते कि पत्रकारों को पेशेगत ईमानदारी दिखाने में क्या बाधा आती है और इस बात की भी चर्चा नहीं करते कि कैसे एक पत्रकार फर्जी स्टिंग दिखाने के बावजूद संपादक बन गया और ऐसा गैर पेशेगत काम करने के लिए पकड़ा गया है जो शायद पहले हुआ ही न हो। वे यह नहीं कहते कि संपादक बनाने में व्यावसायिकता का ख्याल रखा गया होता तो यह पत्रकार शायद वह सब करने के लिए तैयार ही नहीं होता जिसका आरोप उसपर है।

शशिशखेर जी ने आखिर में  लिखा है, “फिर यह कहने में संकोच क्यों कि हम पेशेवर तौर पर सच बोलने और लिखने वाले हैं।” किसे है? सवाल तो यह है कि सच बोलने-लिखने वालों को मीडिया में पूछ कौन रहा है। और अगर उसपर कोई परेशानी आती है तो उसके पास रास्ते क्या हैं। क्या ऊंची कुर्सी पर पहुंचने वाले सत्य बोल लिख कर पहुंचे हैं? ऐसे में कोई क्यों सत्य बोले लिखे? इसपर भी उन्होंने प्रकाश नहीं डाला है। सब जानते हैं कि संपादक बनने के लिए कैसी योग्यता की आवश्यकता रह गई है और ऐसे में आदर्शों की बात करने का कोई मतलब नहीं है। मीडिया के लिए भारी-भरकम कानून और आचार संहिता से भी सत्य बोलने लिखने वाले नहीं डरते हैं। फिर भी … शशिशेखर जी पूछते हैं, “… तो मीडिया पर चाबुक चलाने से क्या हो जाएगा? ” और यह भी कि, “…. कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।”

ऐसे में मेरा साफ मानना है कि शशिशेखर संपादक होने का अपना धर्म निभा रहे हैं। पत्रकारिता के गिरते स्तर की चिन्ता उन्हें नहीं है। अगर थोड़ी-बहुत है भी, तो इसलिए कि वे संपादक हैं और मोटी तनख्वाह मिल रही है। और इसीलिए वे कह रहे हैं कि मीडिया पैसे क्यों न कमाए। जब मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना है तो गिरते स्तर की चर्चा का मतलब भी बदल जाता है। खबर वही छपेगी जिसमें खर्च नहीं होगा, कम होगा। खबर ढूंढ़ने और उसकी पुष्टि करने के लिए क्यों पैसे खर्च किए जाएं। संपादन और गुणवत्ता पर क्यों खर्च किया जाए। मानहानि के मुकदमों का जोखिम क्यों उठाया जाए। वेज बोर्ड की सिफारिशें क्यों मानी जाएं, ठेके पर काम क्यों नहीं कराया जाए, स्ट्रिंगर को न्यूनतम मजदूरी कियों दी जाए, कर्मचारियों को समय पर तरक्की क्यों दी जाए, अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत क्यों किया जाए। काम का अच्छा माहौल क्यों बनाया जाए।

संपादकों का उद्देश्य, मकसद और काम ही बदल गया है…. जो हो रहा है उसे सही ठहराना…. लगे रहिए… 

संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और स्व-उद्यमी हैं. वे लंबे समय तक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक जनसत्ता में वरिष्ठ पद पर रहे. उसके बाद उन्होंने अनुवाद की अपनी कंपनी प्रारंभ किया और लंबे समय से स्व-रोजगार के जरिए दिल्ली-एनसीआर में शान से रह रहे हैं. वे समय समय पर विभिन्न मुद्दों पर बेबाक लेखन अखबारों, वेब, ब्लाग आदि पर करते रहते हैं. उनसे संपर्क anuvaadmail@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. संजयजी  www.prachaarak.com नामक वेबसाइट का संचालन भी करते हैं.


मूल आलेख- पत्रकारिता की खराब हालत पर बहुत चिंतित हैं शशि शेखर

सड़क हादसे में आईबीएन7 के पत्रकार की बहन की मौत

चंदौली जिले के बबुरी से खबर है कि आईबीएन7 के स्ट्रिंगर सूरज जायसवाल की बहन की मौत सड़क हादसे में हो गई. वाराणसी के अग्रसेन कॉलेज में बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा जयति जायसवाल (20 वर्ष) परीक्षा की तैयारी के लिए बबुरी अपने घर आई हुई थी. वो अपने पिता के साथ सुबह टहलने के लिए निकली थी तभी एक अनियंत्रित ट्रक ने उसे कुचल दिया. घटना स्‍थल पर ही उसकी मौत हो गई. जयति के जीजा संतोष जायसवाल भी पत्रकार हैं तथा इंडिया टीवी से जुड़े हुए हैं.

स्‍थानीय लोगों ने अपने गाडि़यों से पीछा करके ट्रक चालक को पकड़कर मय वाहन पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने शव का पोस्‍टमार्टम कराने के बाद परिजनों को सौंप दिया. जयति पढ़ने में बहुत मेघावी थी. जयति की मौत ने परिवारवालों को तोड़ कर रख दिया है. जिले के पत्रकारों ने भी सूरज जायसवाल की बहन के दुखद एवं आकस्मिक मौत पर गहरा शोक व्‍यक्‍त किया है.

फेसबुक पर बेहद सक्रिय थे संतोष वर्मा, देखें- कुछ तस्वीरें, कुछ पोस्ट

हृदय गति रुकने से देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार संतोष वर्मा का निधन होने के बाद अब जबकि उनकी दो पत्नियों और सगे भाई ने डेडबाडी लेने से इनकार कर दिया है तो लोगों के मन में यह उत्सुकता पैदा हो रही है कि आखिर संतोष वर्मा जी कौन थे और उनकी जीवनशैली, सोच क्या थी. इस बारे में अभी ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है. लेकिन उनके फेसबुक एकाउंट से पता चलता है कि वे फेसबुक पर काफी सक्रिय रहा करते थे. वे रोजाना कुछ न कुछ पोस्ट किया करते थे. साथ ही उन्होंने अपनी कई तस्वीरें भी अपलोड कर रखी हैं. 

संतोष वर्मा ने 21 नवंबर को अपने वाल पर लिखा है- ''Aaj Divya Himgiri ke executive editor post se resign kar diya..''. 

उन्होंने फेसबुक पर अपने बारे में ये लिखा है- ''Start life with Dainik Jagran Meerut as sub editor in 1985. From 1989 to dec 2003 worked with Amar Ujala at Meerut, Kanpur, Noida. In Jan 2004 re join Jagran at Bareilly  In 2005 start work with daily Mahamedha as editorial incharge, and in dec 2006 come at Dedhradun and worked in Janpaksh Aajkal the uttaranchal no.1 magazine as assistant editor. Currently working editor of morning daily Janbharat Mail. Born on 26 January''

इससे पता चलता है कि संतोष वर्मा जी विशुद्ध पत्रकार थे और पूरे जीवन पत्रकारिता की. वे दैनिक जागरण, अमर उजाला में लंबे समय तक रहे. महामेधा और जनपक्ष आजकल में लंबे समय तक रहे. जिस व्यक्ति का इतना लंबा करियर रहा हो, जिसके साथ सैकड़ों लोगों ने काम किया हो, वो जब मरता हो तो कोई उनके परिजनों के बारे में बताने वाला तक नहीं, कोई उनकी डेडबाडी तक पहुंचने वाला नहीं. फेसबुक पर संतोष वर्मा ने होमटाउन के रूप में मेरठ लिखा है और फेवरिट कोटेशन में लिखा है- ''work is worship. Satyam Shivam Sundaram''. 

मतलब ये कि जो आदमी काम को पूजा मानता हो और सत्यम शिवम सुंदरमा जिसका प्रिय वाक्य हो, वह जब मौत को गले लगाता है तो न तो उसका साथी कर्मयोगी उसके पास नजर आता है और न ही कोई सत्य शिव और सुंदर सरीखी स्थिति उसको लेकर बन पाती है. संतोष जी की कुछ तस्वीरें उनके फेसबुक एकाउंट से लेकर यहां प्रकाशित की जा रही हैं.. 


 

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…तो क्‍या इंडियन एक्‍सप्रेस ने विशेषांक का प्रस्‍ताव नकारे जाने के बाद ये खबर लिखा है?

रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार ने उस पर (पेड न्यूज) के तौर पर विज्ञापन देने के आरोप संबंधी एक अंग्रेजी दैनिक में आज छपी उस रिपोर्ट को कपोल कल्पित और भ्रामक करार देते हुए अखबार पर उलटे आरोप लगाया कि अंग्रेजी दैनिक ने उसके विशेषांक निकालने के प्रस्ताव नहीं माने जाने पर चिढ़ के कारण ये आरोप लगाये गये हैं। राज्‍य सरकार ने जोर देकर कहा कि वह पेड न्यूज को कतई बढ़ावा नहीं देती और उक्त अंग्रेजी दैनिक को भी उसी नीति से विज्ञापन मिलते हैं जिसके आधार पर अन्य मीडिया संस्थानों को दिये जाते हैं।

राज्‍य सरकार ने यहां जारी एक बयान में कहा कि अंग्रेजी दैनिक ने राज्‍योत्सव 2012 के अवसर पर विज्ञापन नहीं देने पर मीडिया पर गंभीर आरोप लगाते आज एक समाचार प्रकाशित किया है, जिसमें इलेक्ट्रानिक मीडिया के विभिन्न चैनलों का नाम उल्लेख करते हुए छत्तीसगढ सरकार द्वारा एक चैनल द्वारा प्रस्ताव देने एवं उन्हें अपेक्षित राशि का विज्ञापन स्वीकृत करने का उल्लेख किया है लेकिन स्वयं उक्त समाचार पत्र को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्वीकृत विज्ञापन का उल्लेख नहीं किया है, जबकि समय-समय पर छत्तीसगढ शासन द्वारा उसे अल्प अवधि में ही 54.50 लाख का विज्ञापन स्वीकृत किये गये हैं। इसके अलावा जनसम्पर्क विभाग ने वर्ष 2011 एवं 2012-13 में निविदा सूचना पर आधारित लगभग 42 लाख रुपए तथा छत्तीसगढ संवाद के माध्यम से विभिन्न निगम मंडलों के तकरीबन 04 लाख 44 हजार रुपए के विज्ञापन दिये तथा लगभग 40 लाख रुपए के वर्गीकृत विग्यापन जारी किए हैं।

बयान में आरोप लगाया गया है कि उक्त अंग्रेजी दैनिक प्रबंधन कपोल-कल्पित समाचार प्रकाशित कर यह भ्रामक संदेश देना चाहता है कि छत्तीसगढ़ शासन मीडिया को विज्ञापन देकर उसे अपने प्रभाव में रखना चाहता है। जबकि स्वयं वह अखबार भी ऐसे विज्ञापन इस प्रकार की पहल कर विज्ञापन हासिल करता है। बयान में राय सरकार ने कहा कि उक्त अंग्रेजी दैनिक का 11 अक्टूबर 2012 का तीन पृष्ठ विज्ञापन 22 लाख रुपए के स्थान पर 15 लाख रुपए में और 14 मई 2012 के 18 लाख रपए के प्रस्ताव को 15 लाख रपए में तब्दील कर दिया गया था तथा 19 अगस्त 2011 को अंग्रेजी दैनिक के 69 वें स्थापना दिवस के विशेषांक के लिए आये विज्ञापन के 27 लाख रुपए के प्रस्ताव को अस्वीकृत किया गया था। इसी प्रकार 23 फरवरी 2011के एक विशेषांक प्रस्ताव सहित कई अन्य विज्ञापन प्रस्ताव थे, जो उपयुक्त एवं सामयिक नहीं होने के कारण अमान्य कर दिये गये थे जिसके कारण उन्हें नाराजगी है। संभवत. अंग्रेजी दैनिक में उक्त समाचार के जरिए अपनी सीज निकालने की कोशिश की गयी होगी।

राज्‍य सरकार ने कहा. ..न्यूज किसी भी फार्म में हो. चाहे वह प्रिन्ट मीडिया हो अथवा इलेक्ट्रोनिक मीडिया, उसमें न्यूज के लिए विज्ञापन नहीं दिया जाता। जनसम्पर्क विभाग केवल जन कल्याणकारी योजनाओं, सफलता की कहानी, विशेष आलेख और जनसम्पर्क विभाग की विज्ञापन नीति के अनुसार संबंधित विषयों पर विज्ञापन और संपादकीय, विशेष कार्यक्रम, विशेष आलेख आदि के लिए किसी भी समाचार पत्र या इलेक्ट्रोनिक मीडिया से प्रस्ताव प्राप्त होने पर जनहित में और लोक सम्पर्क के आधार पर महत्वपूर्ण तथा उचित होने पर महत्वपूर्ण जानकारी एवं कार्यक्रमों के लिए विज्ञापन दिए जाते हैं। (देशबंधु)

अब हाई रेस्‍क्‍यू टीम तलाशेगी एनडीटीवी के कैमरामैन एन रवि को

धर्मशाला : एनडीटीवी के कैमरामैन एन रवि का अभी तक कोई पता नहीं चल सका है। उनके परिजन परेशान और दुखी हैं। एन रवि की माता एन सुगुनाटाय शुक्रवार को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जी शिवा कुमार और जिलाधीश केआर भारती से मिलकर अपने पुत्र की खोज तेज करने का निवेदन किया हैं। जिलाधीश केआर भारती ने उन्हें आश्वस्त किया है कि कैमरामैन की खोज के लिए हाई रेस्क्यू टीम भेजी जाएगी। वन विभाग से भी सहयोग लिया जाएगा। जरूरत पड़ी तो हेलीकॉप्‍टर से भी सर्च अभियान को चलाया जाएगा।

एनडीटीवी प्रबंधन भी कैमरामैन की जानकारी को लेकर चिंतित है। दिल्‍ली हेड ऑफिस से प्रशासनिक प्रबंधक धनंजय कुमार पिछले दो सप्‍ताह से यहां पर डेरा डाले हुए हैं तथा एन रवि को ढूंढने के लिए हर संभव कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है तथा लोग कुछ बुरा होने की आशंका भी व्‍यक्‍त करने लगे हैं। फिर भी धनंजय यहां के लोकल गाइड और सर्च टीम के साथ एन रवि की तलाश में जुटे हुए हैं।

पत्रकार संतोष वर्मा की डेडबाडी लेने से दोनों पत्नियों और सगे भाई ने किया इनकार

: बैंक एकाउंट में 15 लाख मिले : अब प्रशासन कराएगा अंतिम संस्कार : कल हृदय गति रुकने से देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार संतोष वर्मा का निधन हो गया. उसके बाद लोग उनके परिजनों को तलाशने लगे पर कोई नहीं मिला. संतोष के साथ काम कर चुकीं सुनीता भास्कर को जब संतोष जी के निधन की सूचना मिली तो उन्होंने परिजनों का पता लगाने का प्रयास किया पर सफलता न मिलने पर पूरे मामले को फेसबुक पर डाला और उत्तराखंड से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों के वाल पर शेयर किया. 

इसके बाद भड़ास को भी जानकारी मिली जिसके तहत भड़ास पर न्यूज प्रकाशित किए जाने के साथ साथ समाचार प्लस के निदेशक, देहरादून के एसएसपी, अमर उजाला के स्थानीय संपादक समेत कई लोगों को फोन कर घटना की जानकारी दी गई. वरिष्ठ पत्रकार की डेडबाडी को यथोचित सम्मान के साथ रखे जाने और परिजनों की तलाश किए जाने की भड़ास की पहल और प्रयास के बाद कई लोगों ने फेसबुक पर भी मामले की जानकारी दी.

इन्हीं जानकारियों के दौरान पता चला कि संतोष वर्मा की निजी जिंदगी सुखद नहीं थी. उनकी दो शादियां थी. पहली पत्नी ने उन पर मुकदमा किया हुआ था. अशोक मधुप की बिजनौर से टिप्पणी ये आई- ''santosh verma ki pahli ssural nahtaur bijnor me he.yaha se unka tlak ho gaya tha .phir bhi unki ssural me suchit kara diya hai.. Ashok Madhup, bijnor''.

संजय स्वदेश ने बताया- ''संतोष वर्मा जी 2004 में महामेधा में सेवारत थे..अभी महामेधा में कार्यरत 

स्वर्गीय संतोष वर्माउनके समय के सहयोगियों से बातचीत कर रहा हूं… शायद कुछ परिवार वालों के बारे में पता चले…. लेकिन जहां मुझे जानकारी मिली है, उनका पारिवारिक जीवन बहुत तबाह था…. गाजियाबाद के वरिष्ठ पत्रकार तब के दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ और अब शायद अमर उजाला में सेवारत राज कौशिक ही उन्हें महामेधा में लाए थे. संभव हो उनके पास उनके परिवार के जुड़े लोगों की जानकारी हो… दुर्भाग्य से उनका नंबर मेरे पास नहीं है….''

सुनीता भास्कर ने बताया- ''इतनी जानकारी मिली है कि उनकी दूसरी पत्नी यहाँ उत्तराखंड के पौड़ी जनपद मैं रहती हैं जो कि फोन रिसीव नहीं कर रही हैं….और पहली जानकारी तो दे ही दी अशोक मधुप जी ने…..परिजनों तक पहुंचना संभव न हो सके या वह नहीं आयें तब भी उनकी अंत्येष्टि सम्मान से होनी चाहिए…'' सुनीता आगे बताती हैं- ''मैंने संतोष जी को मुख्यधारा मीडिया के दफ्तरों मैं एड़ियां घिसते देखा है….काबिल कापी एडिटर थे..बावजूद कहीं भी उन्हें नहीं लिया गया अंततः एक स्थानीय अख़बार जनभारत मेल के सीनियर एडिटर रहे लम्बे समय तक….द संडे इन्डियन के उत्तराखंड संवाददाता रहे…एक समय में उत्तराखंड की प्रतिनिधि पत्रिका जनपक्ष आजकल के सब एडिटर भी रहे..''

पूरे रात प्रयास करने के बाद अब ताजी स्थिति ये पता चली है कि संतोष वर्मा जी के सगे भाई और पहली व दूसरी पत्नी ने उनकी डेडबाडी लेने से मना कर दिया है. प्रशासन ने संतोष जी के बारे में जानकारी कराई और उनके डिटेल तलाशे तो पता चला कि उनके बैंक एकाउंट में 15 लाख रुपये हैं. इस बात का खुलासा होने के बाद माना जा रहा है कि हो सकता है कोई पैसे के लालच में ही सही, डेडबाडी लेने आ जाए.

हालांकि भाई और दोनों पत्नियों के लाश लेने से इनकार करने के बाद देहरादून प्रशासन अपनी निगरानी में सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की तैयारियां कर रहा है. उसके पहले लाश का पोस्टमार्टम किया जाएगा. कहने वाले आपस में यही कह रहे हैं कि दो दो पत्नियां, भरा पूरा परिवार, एकाउंट में 15 लाख रुपये होने के बावजूद कोई डेडबाडी लेने को तैयार नहीं है.  क्या यही जिंदगी का सच है? 

शुरुआती खबर पढ़ें-

देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार संतोष वर्मा का निधन, लाश लेने वाला कोई नहीं

अब इंडिया टुडे कैसे पढ़े और कहां रखें

Subhash Tripathi : छोटे शहर इंडिया टुडे के नए कामक्षेत्र। इंडिया टुडे का ये विशेषांक किसी घर में कैसे रखा जाए। ये बड़ा सवाल बन गया है। मैं आउटलुक व इंडिया टुडे जैसी पत्रिकाओं का सामान्य पाठक हूं। घर में वेंडर किताबें दे गया। जब देखी गयी तो कहीं छिपाना पड़ा आखिर ऐसे विशेषांकों से ही ये प्रतिष्ठित पत्रिकाएं बाजार बनाएंगी। पहले से ही अब पढ़ने की ललक कम हुई है। ऐसे विशेषांक पिछले कई सालों से सचित्र प्रकाशित हो रहे हैं। इसके दूसरे चित्रों की बात छोड़िए कवर पेज का फोटो भी यहां देना पसंद नहीं करता हूं। पत्रिकाएं पूरे घर के लिए होती हैं। इंडिया टुडे में जो विशेषांक और प्यास बुझाने के गुर सिखाए हैं। वे आम पाठकों के लिए बेहद आपत्तिजनक हैं। अब घर में कौन सी पुस्तकें आए ये बड़ा मुद्दा है। पहले साप्ताहिक हिन्दुस्तान, धर्मयुग, ब्लिट्ज व करंट, रविवार व दिनमान जैसी पत्रिकाएं रूचि के साथ पढ़ी जाती थी। करंजिया के लेखों को पढ़ने में मुझे बड़ा मजा आता था। फिर एसपी सिंह कुरबान अली की खबरें समीक्षा के साथ, अब इंडिया टुडे कैसे पढ़े और कहां रखे।

वरिष्‍ठ पत्रकार सुभाष त्रिपाठी के फेसबुक वॉल से साभार.

प्रभात खबर के पत्रकार धर्मेंद्र का निधन

एक और दुखद खबर. प्रभात खबर के चितरपुर प्रतिनिधि धर्मेंद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे. वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे और हैदराबाद में उनका इलाज चल रहा था. पिछले 18 वर्ष से प्रभात खबर से जुड़े धर्मेंद्र ने काफी निडरता के साथ पत्रकारिता की. प्रभात खबर परिवार में उसकी गिनती सबसे मेहनती सहयोगियों में होती थी.

प्रभात खबर, रांची के आरई विजय पाठक के एफबी वॉल से साभार.

गुवाहाटी छेड़खानी मामला : पत्रकार बरी, 11 दोषियों को सजा

गुवाहाटी। पूरे देश को झकझोर देने वाले गुवाहटी छेड़छाड़ मामले में शुक्रवार को 11 लोगों को दोषी करार देते हुए अदालत ने उन्हें दो साल की कैद व दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। मुख्य आरोपी अमरज्योति कलिता की अगुआई में गत नौ जुलाई को इस घटना को सरेआम अंजाम दिया गया था। मामले में चार लोगों को आरोप मुक्त कर दिया गया है। अदालत ने इस सनसनीखेज मामले में महज पांच माह में अपना फैसला दिया है।

असम के कामरूप जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एसपी मोइत्रा की अदालत ने शुक्रवार को मुख्य आरोपी समेत 11 लोगों को आइपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया। अदालत ने स्थानीय टीवी चैनल के पत्रकार गौरव ज्योति नियोग समेत चार लोगों को साक्ष्य के अभाव में आरोप मुक्त कर दिया। मालूम हो कि गत नौ जुलाई की रात गुवाहटी के मुख्य मार्ग जीएस रोड पर एक पब के सामने सरेआम एक लड़की के साथ कई लोगों ने छेड़छाड़ करते हुए उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया। मौके पर मौजूद गौरव ने घटना की वीडियो क्लिप बनाई और यू-ट्यूब पर लोड कर दिया। मामला सामने आने के बाद देश भर में सनसनी फैल गई।

फुटेज के आधार पर पुलिस ने मुख्य अभियुक्त समेत बीस लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया, लेकिन जांच के बाद 16 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। इस मामले में पत्रकार गौरव पर फुटेज के लिए भीड़ को उकसाने और फिर इस सीन को रिकॉर्ड करवाने का आरोप भी लगा था। उस वजह से उसके चैनल के प्रबंध संपादक को इस्तीफा देना पड़ा था। मामला तूल पकड़ा तो राज्य सरकार ने दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया व गुवाहाटी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अपूर्व ज्योति बरुवा का तबादला कर दिया। पुलिस ने पूरी तेजी से काम किया और सारे आरोपियों को गिरफ्तार किया। मामले में आरोप पत्र कामरूप के सीजेएम कोर्ट में दाखिल किया। यह केस को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया गया।

आरोप पत्र में 16 लोगों के नाम थे, लेकिन एक आरोपी के किशोर होने की वजह से उसे बाल सुधार गृह को भेज दिया गया। 15 लोगों के खिलाफ सुनवाई चली, जिसमें से 11 को अपराध का दोषी पाया गया। शुक्रवार को जब फैसला सुनाया जा रहा था, तब कलिता अपनी मां की श्राद्ध की वजह से अदालत में मौजूद नहीं था। (जागरण)

सेबी ने मांगा सहारा समूह के सभी खातों का विवरण

नई दिल्ली। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) सहारा के मामले में कोई कोताही नहीं बरतना चाहता। सेबी ने सभी बैंकों से कहा कि वह सहारा समूह व इसके निर्देशक व प्रोमोटर्स के सभी खातों की जानकारी उपलब्ध कराएं। इस मामले में आरबीआई, ईडी और वित्तीय खुफिया इकाई से भी सेबी ने मदद देने की बात कही है। सेबी ने देश के सभी बैंकों से कहा है कि सहारा समूह के सभी बैंक खातों की पूरी जानकारी बोर्ड को दें।

सेबी ने यह भी कहा है कि इसके सभी निर्देशकों व प्रोमोटर्स के खातों के विवरण भी उपलब्ध करवाएं। अन्‍य संस्‍थाओं से भी मदद मांगी है ताकि इस मामले की तह तक पहुंचा जा सके। गौरतलब है कि  सहारा समूह की दो रियल एस्टेट कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन ने कनवर्टेबल डिवेंचर के जरिए निवेशकों से 24 हजार करोड़ रुपये जमा करवाए थे। सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी सेबी ने इन दोनों कंपनियों के कामकाज को गैरकानूनी करार देते हुए निवेशकों के पैसे लौटाने को कहा था।

सहारा सेबी के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने सेबी के फैसले को सही ठहराते हुए सहारा से निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया, जो रकम लगभग 27 हजार करोड़ रुपये के आसपास है। सहारा समूह को सात फरवरी तक तीन किस्‍तों में अपने निवेशकों को यह सारी रकम लौटानी है। इसे देखते हुए सेबी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता।

sebi sahara

आईटी एक्‍ट के खिलाफ असीम और आलोक आज से अनिश्चितकालीन अनशन पर

पिछले दिनों फेसबुक और तमाम आनलाइन माध्यमों का इस्तेमाल करने पर कई लोगों को जेल जाना पड़ा. इसके लिये आईटी एक्ट की धारा 66 (A), जिसे 2008 में जल्दबाजी में सूचना तकनीकी कानून के साथ जोड़ दिया गया था, जिम्मेदार है. 22 दिसंबर 2008 को संसद में महज़ 15 मिनट के भीतर 8 क़ानून पास हुए थे. आई टी एक्ट का सेक्शन 66-A भी उनमे से एक था. इससे पता लगता है कि कितनी लापरवाही के साथ इतना तानाशाही क़ानून पास कर दिया गया.

यह पूरा का पूरा एक्ट यूनाइटेड किंगडम के 'पोस्ट आफिस एक्ट' की नकल है और वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी आम इंटरनेट यूजर को जेल में डालने की क्षमता रखता है. आखिर जब इस कानून में इतनी खामियां है तो संसद इनमें सुधारों के लिये कोई पहल क्यूं नहीं करती? देश के आम नागरिकों के बीच सरकार डर क्यूं पैदा कर रही है?

हम अपने सांसदों को इसलिये नहीं चुनते कि वे संसद में बैठ कर ब्लू-फिल्म देखें या घोटालों पर घोटाले करते जाएं और हम जब आवाज उठाएं तो हमें जेल भेज दिया जाए. इस कानून को हटाने की जिम्मेदारी भी हमारी संसद और हमारे सांसदों की ही है. आईटी एक्ट पर बहरी हो चुकी सरकार तक अपना संदेश पहुंचाने के लिये हमारे साथी आलोक दीक्षित और असीम त्रिवेदी 8 दिसम्बर से जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठ रहे हैं. असीम त्रिवेदी खुद इस कानून के भुक्तभोगी हैं जिन्हे 08 सितम्बर 2012 को आईटी कानून की धारा 66 A और कई दूसरे कानूनों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था. मीडिया के साथियों ने उस समय अभिव्यक्ति की आजादी पर हुए इस हमले का पुरजोर विरोध करते हुए देश में ‘फ्रीडम आफ स्पीच’ के समर्थन में एक अभियान छेड़ दिया था. एक बार फिर शाहीन, रेनू और सुनील विश्कर्मा की गिरफ्तारी ने इंटरनेट पर अपनी बात रख रहे लोगों के मन में भय का माहौल पैदा कर दिया है. इन सभी घटनाओं में राजनीतिक दलों की भूमिका किसी से छिपी नहीं हैं.

जिस तरह इंटरनेट यूज़र्स को आये दिन गिरफ्तार किया जा रहा है, आज की युवा पीढ़ी के भीतर अजीब किस्म का डर बैठ गया है कि अगर वो राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर कुछ टिप्पणी करेंगे तो उन्हें पुलिस गिरफ्तार कर सकती है. इसलिए बहुत आवश्यक है कि इंटरनेट यूज़र्स को खौफज़दा करने वाले इस क़ानून को ज़ल्द से ज़ल्द असंवैधानिक घोषित किया जाए, जो अनुच्छेद 19 में मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी को बाधित करता है. इस क़ानून की परिभाषा इतनी अस्पष्ट है कि किसी भी इंटरनेट यूज़र सेक्शन 66-A लगाकर गिरफ्तार किया जा सकता है. आज जब सभी ये मानते हैं कि ये क़ानून हमारी अभिव्यक्ति की आज़ादी को बाधित करता है तो फिर हमारी संसद इसे वापस लेने को क्यों तैयार नहीं है. आपसे अनुरोध है कि जन्तर मंतर पहुंच कर अभिव्यक्ति की आजादी के लिये किये जा रहे इस अनिश्चितकालीन

क्या है कानून?

आईटी कानून आईटी यानी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यमों के बीच होने वाली सूचना, जानकारी और आंकड़ों के आदान प्रदान पर लागू होता है. इसी कानून में एक धारा है 66 ए जिसमें कथित तौर पर झूठे और आपत्तिजनक संदेश भेजने पर सजा का प्रावधान है. इस धारा के तहत कंप्यूटर और संचार उपकरणों से ऐसे संदेश भेजने की मनाही  है जिससे परेशानी, असुविधा, खतरा, विघ्न, अपमान, चोट, आपराधिक उकसावा, शत्रुता या दुर्भावना होती हो. इसका उल्लंघन करने पर तीन  साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है.

कौन है दायरे में?

कंप्यूटर इस्तेमाल के बढ़ते  चलन और सोशल मीडिया के फैलते  दायरे को देखते हुए आईटी अधिनियम की अहमियत खासी बढ़  गई है. हाल के समय में कई ऐसे  मौके आए जब सोशल मीडिया पर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ सरकार और सरकारी एजेंसियों को नागवार गुजरी है. कई राजनेताओं और सरकार  के खिलाफ सोशल मीडिया पर टिप्पणियों को लेकर सरकार के भीतर सेंसरशिप की बातें चलती रही. आप भी फेसबुक या ट्विटर इस्तेमाल करते होंगे, कुछ पोस्ट करते होंगे कुछ लाइक करते होंगे, तो इस तरह आप भी आईटी कानून के दायरे

यह कानून  क्यों हटाया जाना चाहिए?

 1. इस कानून को हटाने का सबसे बड़ा कारण यह है की इस धारा को लागू करने का सरकार का उद्देश्य स्पष्ट नहीं है. सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यह कानून महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए लागू किया गया है. जबकि इस धारा 66A में परेशानी, खतरा, विघ्न, अपमान, चोट, आपराधिक, उकसावा, शत्रुता और दुर्भावना जैसे बिन्दुओं को जोड़कर इसे असीमित और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करने का माध्यम बना दिया गया है.

2. यह कानून किसी भी तरह से साइबर अपराध को नहीं रोकता. जिन उपरोक्त बिन्दुओं का उल्लेख किया गया है वो उनके लिए पहले से ही संविधान के किसी न किसी रूप में कानून बना हुआ है. इन्हे अभी सिर्फ राजनीतिक आलोचनाओं को रोकने के लिए ही कानून के रूप में लाया गया है. जब पहले से ही इन बिन्दुओं पर कानून बना हुआ है फिर इस कानून को बनाने का क्या उद्देश्य है. इसके अलावा राजनीति के खिलाफ बनाया गया एक कार्टून किस तरह से साइबर अपराध का उल्लंघन करता है. किसी राजनितिक हस्ती का विरोध या आलोचना करना किस प्रकार साइबर कानून का उल्लंघन है. प्रतिभापाटिल.कॉम नाम से बनाया गया डोमेन किस तरह कानून का उल्लंघन करता है.

3. आपतिजनक टिप्पणी के नाम पर इस धारा के माध्यम से आम आदमी के लिए तो सजा निर्धारित कर दी गयी है लेकिन जब नेता अपनी रैलियों में खुले आम अपनी बातों से अमन में जहर घोलने वाले नेताओं के लिए कोई कानून नहीं है.

4. इन साइबर कानूनों को पहले के अन्य कानूनों की तुलना में बहुत कठोर बनाया गया है. जो कि बिलकुल भी समानुपातिक और न्यायोचित नहीं है. जबकि हमे सहित तरीके से अपनी बात कहने व विरोध करने का पूरा अधिकार है.

5. यह कानून साइबर अपराध अपराध को रोकने के लिए बनाया गया है लेकिन यह सिर्फ इतने तक ही सीमित नहीं है. अगर कोई फेसबुक या ट्विट्टर के माध्यम से किसी प्रभावशाली व्यक्ति या उसकी नीतियों के खिलाफ अपने विचार रखता है तो वो भी इस कानून के दायरे में आ सकता है और उसे सजा हो सकती है. इस तरह धारा 66 A की वजह से निर्दोष लोग भी इसके शिकार बन रहे हैं.

6. संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के सम्बन्ध में स्पष्ट उल्लेख है की सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित किया जा सकता है. जबकि धारा 66(A) में साधारण और नुकसान न पहुंचाने वाले विचार भी कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकते हैं.

7. एक तरफ जहाँ बड़े-बड़े अपराधी अपराध करने के बाद छोटी सी सजा के बाद ही रिहा हो जाते हैं, वहीँ दूसरी तरफ दोस्तों के बीच फेसबुक के माध्यम से सिर्फ विचार प्रकट करने पर इस तरह की सजा का प्रावधान कहाँ तक ठीक है.

8. सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के नयी गाइडलाइन के अनुसार किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को ही ऐसे मामले दर्ज करने व कारवाई का अधिकार है, लेकिन देखा गया है की इससे पहले भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के कहने पर ही केस दर्ज कर कई लोगों को झूठे मामलों में फंसाया गया था. इसके अलावा अगर पुलिस ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज नहीं करती तो अदालत में जाकर मामला दर्ज कराया जा सकता है. (प्रेस रिलीज)

सीएम से पत्रकारों का संबंध बेहतर क्‍यों नहीं होने देना चाहते नौकरशाह?

नौकरशाहों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर दबाव बना लिया है यह बात अब सामान्य लोग भी कहने लगे हैं। मगर नौकरशाह इतनी मनमानी पर उतर आयेंगे कि वह मुख्यमंत्री के आदेशों की लगातार अवहेलना करेंगे ऐसा किसी ने नहीं सोचा था, मगर अफसोस कि ऐसा हो रहा है। लगातार हो रहा है। अब तक तो सामान्य सरकारी कामकाज को टालने की बात थी मगर अब अफसर सरकार और मीडिया के बीच दूरी बनाने में जुट गये हैं। मुख्यमंत्री के पत्रकारों के संबंध में दिये गये निर्देशों पर महीनों तक कोई कार्रवाई न करके अफसरशाही ने इसे साबित भी कर दिया है।

पत्रकारों की लंबे समय से मांग रही है कि राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों एवं उनके परिजनों को पीजीआई में नि:शुल्क चिकित्सा उपलब्ध करवायी जाये। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी ने सरकार बनते ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पत्र लिखकर इसकी मांग की थी। बाद में राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सदस्यों ने पुन: मुख्यमंत्री निवास पर जाकर उनसे पत्रकारों की इस मांग को पूरा करने का वायदा याद दिलाया।

सरकार के छह माह पूरे होने पर मुख्यमंत्री ने प्रेस वार्ता बुलाई थी। इसमें फिर यह मुद्दा उठा। इस दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बेहद खुश थे। पत्रकारों के याद दिलाने पर उन्होंने मुख्य सचिव जावेद उस्मानी से माइक पर हाथ रखकर इस संबंध में पूछा और तत्काल घोषणा कर दी कि राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकारों की पीजीआई में निरूशुल्क चिकित्सा व्यवस्था लागू की जायेगी। उत्साही मुख्यमंत्री ने यहां तक कह दिया कि इस आदेश को तत्काल लागू मानिये।

पत्रकारों के खेमे में इस बात को लेकर खुशी की लहर दौड़ गयी। कई पत्रकारों ने मुख्यमंत्री को इसके लिए धन्यवाद भी दे दिया। मगर नौकरशाहों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो नही चाहता था कि मीडिया और मुख्यमंत्री के संबंध बेहतर हो। इन अफसरों को लगता है कि अगर मुख्यमंत्री मीडिया के ज्यादा करीब हो जायेंगे तो उनके कारनामों की जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचने लगेगी। लिहाजा इस वर्ग ने कोशिशें तेज कर दीं कि किसी भी तरह मुख्यमंत्री का यह आदेश अमल में न आ सके। वह कामयाब भी हो गये। मुख्यमंत्री की घोषणा के तीन महीने बीतने पर भी इसके आदेश नहीं हो सके।

सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद कार्रवाई शुरू तो की गयी मगर वह एक विभाग से दूसरे विभाग के बीच ही गुम होकर रह गयी। अफसरों ने समझाया कि मीडिया अभी काबू में नहीं आ रहा। अगर इनको अभी से सुविधायें देना शुरू कर देंगे तो यह और बेकाबू हो जायेंगे। लिहाजा बेहतर यही है कि अगर पत्रकारों को यह सुविधा देनी भी है तो उन्हें लोकसभा चुनाव के समय ही दी जाये। जिससे पत्रकारों की सोच सरकार के प्रति सार्थक बने और लोकसभा चुनाव में मीडिया समाजवादी पार्टी का बेहतर सहयोग कर सके। लगता है कि अफसर मुख्यमंत्री को इस गलतफहमी में रखने में कामयाब भी हो गये। जिसके कारण पत्रकारों के हित की यह घोषणा लागू नहीं हो सकी।

मगर इस घटनाक्रम से पत्रकारों में गहरी नाराजगी है। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के पूर्व अध्यक्ष और पीटीआई के ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी का कहना है कि अब तक समाजवादी पार्टी की कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं होता था। पत्रकारों में अब इस बात की चर्चा हो रही है कि सपा में यह बदलाव क्यों? श्री गोस्वामी ने कहा कि मुलायम सिंह के विरोधी भी कहते थे कि एक बार उन्होंने जो कह दिया फिर उस बात से वह पलटते नहीं थे। सभी को उनके पुत्र अखिलेश यादव से भी इसी आचरण की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि जब मुख्यमंत्री ने पत्रकारों को चिकित्सा सुविधा देने की घोषणा कर दी तो इसे तत्काल लागू किया जाना चाहिए।

आईबीएन7 के ब्यूरो चीफ शलभ मणि का कहना है कि सपा के लोग हमेशा कहते थे कि बसपा की सरकार तानाशाही तरीके से चलती है। मगर अफसर इस सरकार को भी उसी दिशा में धकेलने का काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि सरकार की रफ्तार सुस्त है, जो काम तीन महीने में हो जाना चाहिए वह छह महीने में पूरा हो रहा है। अफसर कभी नहीं चाहेंगे कि सरकार और मीडिया के संबंध बेहतर हों। मगर मुख्यमंत्री को खुद यह बात समझ लेनी चाहिए।

राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी का कहना है कि वह खुद इस संबंध में एक दर्जन से अधिक बार मुख्यमंत्री से कह चुके हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ दो ही बातें हो सकती हैं पहली यह कि या तो अफसर मुख्यमंत्री की सुनते नहीं है या फिर खुद अपनी कही बातों को टालना मुख्यमंत्री की अदा बन गयी है। जब मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से सौ से अधिक पत्रकारों के बीच पत्रकारों को पीजीआई में नि:शुल्क चिकित्सा की बात करते हों तो यह मुख्यमंत्री की घोषणा सेल का दायित्व है कि वह इसे लागू करने की सार्थक पहल करे।

रायटर के ब्यूरो चीफ वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान का भी मानना है कि यह साफ संदेश जा रहा है कि मुख्यमंत्री अपनी बात को प्रभावी ढंग से लागू नहीं करवा पाते। यह उनके लिए तथा उनकी पार्टी के लिए शुभ संदेश नहीं है। राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के सचिव और बिजनेस स्टैडर्ड के यूपी के ब्यूरो चीफ सिद्धार्थ कालहंस के तेवर इस मामले में और कटु हैं। उनका कहना है कि अगर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को यह नहीं समझ में आ रहा कि इन्हीं अफसरों ने मायावती का बेड़ा गर्क किया था तो यह उनका दुर्भाग्य है। उन्होंने कहा कि समिति के पदाधिकारी एक बार फिर मुख्यमंत्री से मिलकर मांग करेंगे कि पत्रकारों को उनका हक दिया जाये।

जाहिर है मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का जो फैसला मीडिया में उन्हें लोकप्रिय बना सकता था उस फैसले को नौकरशाही नहीं पूरा होने दे रही। नौकरशाही के जलवे का नमूना बीते सप्ताह उस समय देखने को मिला जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने घर पर पत्रकारों को बुलाया था। मौका था किसानों के ऋण को माफ करने की योजना भी घोषणा का। मंच पर मुख्यमंत्री अपने कई और मंत्रियों और मुख्य सचिव जावेद उस्मानी के साथ बैठे थे। इसी बीच काबीना मंत्री बलराम यादव वहां पहुंचे, होना यह चाहिए था कि मुख्य सचिव अपनी कुर्सी छोड़कर साइड में आते। मगर मुख्य सचिव ने कुर्सी छोड़ना तो दूर कुर्सी से खड़े भी नहीं हुए। इससे पहले भी वह मुख्यमंत्री को सार्वजनिक रूप से बुके देने से इनकार करके अपना जलवा दिखा चुके हैं। जाहिर है कि जब सूबे में नौकरशाही का यह जलवा हो कि काबीना मंत्री को ही कुछ न समझा जा रहा हो तब यह मानना कि मीडिया से जुड़े लोगों के हित में कुछ काम हो पायेंगे बेमानी ही लगता है।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं. यह लेख उनके अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

पत्रकार को जेल भेजे जाने के विरोध में 11 दिसम्‍बर को बंद रहेगा जालौन

जालौन में सपा नेता पर हुए हमले के आरोप में एक पत्रकार को फर्जी फंसा कर जेल भेजने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। जिसको लेकर पत्रकार 22 नवम्बर से जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं, लेकिन अभी तक प्रशासन की ओर से कोई पहल न होने और निर्दोष पत्रकार को न छोड़े जाने पर जिले के पत्रकारों के साथ साथ सभी दलों के नेताओं और प्रतिनिधियों ने भी प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सभी संगठन, राजनैतिक दल और पत्रकार संगठनों के लोगों ने एक सुर में समर्थन देकर 11 दिसंबर को जिले भर का बाजार बंद कराने का आह्वान कर दिया है।

आपको बता दें कि 6 नवम्बर को देर रात जालौन के एट थाना क्षेत्र में सपा के पूर्व कोषाध्यक्ष राकेश पटेल जब अपने गाँव सोमई से बाइक से एट जा रहे थे तभी कुछ अज्ञात हमलावरों ने उन पर फायरिंग कर दी, जिसमें वो घायल हो गये थे। घटना के नौ दिन बाद सपा नेता के भाई ने 16 नवम्बर 2012 को गाँव के ही दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला के पत्रकार शशिकांत तिवारी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया था, जिस पर पुलिस ने करवाई कर पत्रकार को जेल भेज दिया था। इस मामले में जनपद के पत्रकारों ने जालौन के पुलिस अधीक्षक आरपी चतुर्वेदी से निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई करने की बात कही थी, लेकिन जांच कराने के बजाये पुलिस ने अपने ऊपर जनपद के सपा के एक जनप्रतिनिधि का दबाब होना बताया था, जिसके चलते पत्रकारों में आक्रोश भड़क गया। पत्रकारों ने 21 नवम्बर 2012 को जिलाधिकारी मनीषा त्रिघटिया से मामले की मजिस्ट्रेट जांच कराने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया और मजिस्ट्रेट जांच कराने से मना कर दिया।

इसके बाद जनपद के पत्रकार लामबंद हो गये और 22 नवम्बर 2012 से पत्रकारों ने उरई स्थित कलेक्ट्रेट परिसर में अनिश्चितकालीन धरना देना शुरू कर दिया, लेकिन धरने के करीब पंद्रह दिन बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई होती न देख पत्रकारों के साथ साथ राजनीतिक दलों तथा सामाजिक संगठनों को लोग भी शामिल हो गए। हालाँकि पत्रकारों के उत्पीड़न के साथ साथ भ्रष्टाचार में संलिप्त रहने के कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आदेश पर जालौन के पुलिस अधीक्षक निलम्बित भी हो चुके हैं, लेकिन पत्रकारों को पुलिस अधीक्षक के निलंबन से संतोष नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा का कहना है कि जब तक निर्दोष पत्रकार शशिकांत तिवारी को जेल से रिहा नहीं किया जाता और दोषी लोगों पर करवाई नहीं की जाती तब तक आन्दोलन जारी रहेगा। उन्होंने बताया कि 11 दिसंबर को होने वाले बाजार बंद में सभी संगठन के लोग शांतिपूर्वक बाजार बंद करायेंगे, जिसमें जिले भर के सभी स्कूल, कालेज, सरकारी कार्यालय सभी बंद रहेंगे।

बाजार बंद को लेकर की गई सभा में गौरीशंकर वर्मा, जगदीश तिवारी, हरेन्द्र विक्रम, कल्ला चौधरी, उरविजा दीक्षित, ब्लाक प्रमुख सुदामा दीक्षित, गिरीन्द्र सिंह, रेहान सिद्दीकी, अशोक द्विवेदी, विजय चौधरी, विनोद चतुर्वेदी (पूर्व विधायक), अभय द्विवेदी, किसान नेता राजवीर जादौन, बलराम सिंह लम्बरदार, लालू शेख सभी प्रमुख पार्टियों के लोगों एवं  मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह, अरविन्द द्विवेदी, ना‍थूराम निगम, दीपक अग्निहोत्री, संजय श्रीवास्तव, ब्रजेश मिश्रा, अतुल त्रिपाठी, संजीव श्रीवास्‍तव, ओमप्रकाश राठौर, अमित द्विवेदी, मनोज राजा, आबिद नकवी, सुनील शर्मा, संजय मिश्रा, रमाशंकर शर्मा, जमील टाटा, अरमान, विकास जादौन, श्रीकांत शर्मा, अलीम सिद्दीकी, संजय गुप्‍ता, अनुज कौशिक, विनय गुप्ता, अजय श्रीवास्‍तव, प्रदीप त्रिपाठी, शशिकांत शर्मा, जितेंद्र द्विवेदी, राहुल गुप्‍ता, संजय सोनी, इसरार खान, मनोज शर्मा, जीतेन्द्र विक्रम सिंह, अधिवक्ता युसूफ इश्तियाक, राज्यसभा सांसद ब्रजलाल खाबरी सहित तमाम पत्रकार, नेता एवं समाजसेवी मौजूद रहे और एक स्वर में पत्रकार की रिहाई एवं दोषियों को सजा देने की मांग की।

देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार संतोष वर्मा का निधन, उनकी लाश लेने वाला कोई नहीं

फेसबुक पर सुनीता भास्कर ने ये लिखा है : देहरादून के मित्रों के लिए… बेहद दुःख के साथ इत्तला है मित्रो …वरिष्ठ पत्रकार आदरणीय संतोष वर्मा जी की अनायास ही ह्रदय गति रुकने से मौत हो गयी है….उन्हें दून अस्पताल की मौर्चरी मैं रखा गया है..दुर्भाग्य से उनके घर परिवार का कुछ पता नहीं चल पा रहा है.क्यूंकि परिवार उनके साथ नहीं रहता था…अगर आप किसी को, जो जानते हैं उन्हें कुछ मालूम चल पाए तो इत्तला जरुर दें..शीघ्र अति..

इस स्टेटस पर कुछ कमेंट इस तरह आए हैं

बी.पी. गौतम … उस महान आत्मा के लिए श्रृद्धांजलि

Tarun Tiwari जरुर….R I P

Gopal Rana bHGwan iNKi AAtmA Ko sAnTI De

Nityanand Gayen शोक समाचार …. श्रद्धांजलि

Manoj Pandey बेहद दुःखद … श्रृद्धांजलि.

Vikrant Shukla RIP…..

Rajen Todariya Santosh Verma pahle Amar Ujala Merut mein the. 2008 mein unhone hamare sath Janpaksh mein kaam kiya . ishwar unki atma ko shanti de.

Vinod Kumar Chaudhary ,……..

सुनीता भास्कर सर कहाँ थे वह अमर मैं ..क्या दून मैं …. आपका फर्ज बनता है कुछ लिखने का उनपे…कुछ जानकारियां भी..

Gopal Rana msg 4rwrd kr diya h wo log aate hi honge g

Manisha Kulshreshtha Oh! shrdhanjali!

Rajen Todariya woh Amar Ujala Merut sub editor ke roop mein niyukt huye the uske baad shayad senior sub bhi rahe. Janpaksh mein unhone kafi mehnat kee. Janpaksh ko kamyaab banane mein unka parishram bhi raha hai.

Deven Mewari विनम्र श्रद्धांजलि…..

Misir Arun विनत श्रद्धांजलि !


संतोष वर्मा जी की तस्वीर यूं है…

”चैनल के पत्रकार के हत्‍यारों को गिरफ्तार कराया जाएगा”

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि काबर्दिनो-बल्कारिया क्षेत्र में हुई टीवी पत्रकार की हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार कर दंडित किया जाएगा। पुतिन ने रूसी मानवाधिकार लोकपाल व्लादिमीर लुकिन के साथ बैठक में कहा कि मुझे यकीन है कि हमारी पुलिस हत्यारों की तलाश करने का हर सम्भव प्रयास करेगी और इन अपराधियों को दंडित करेगी। समाचार एजेंसी आरआईए नोवोस्ती के अनुसार रूसी गणराज्य काबर्दिनो-बल्कारिया की राजधानी नलचिक में बुधवार देर रात वीजीटीआरके प्रसारण कम्पनी के लिए स्थानीय दैनिक समाचार कार्यक्रम की मजेबानी करने वाले कजबेक गेक्कियेव की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

जांचकर्ताओं की माने तो पत्रकार को उसकी पेशेवर गतिविधियों की वजह से निशाना बनाया गया है। पुतिन ने कहा कि गेक्कियेव की हत्या से मूलभूत मानवाधिकारों की रक्षा के उद्देश्यों से किए जा रहे कार्यो की क्षमता पर सवाल खड़े हो गए हैं। पत्रकार रक्षा समिति की रपट के अनुसार बीते दो दशकों में 53 पत्रकारों की हत्या हुई है। (एजेंसी)

प्रमोद भारद्वाज ने स्‍वदेश छोड़ा, अग्निबाण के ग्रुप एडिटर बने

खबर है कि चर्चित और युवा पत्रकार प्रमोद भारद्वाज ने स्वदेश ग्रुप छोड़ दिया है। वे वहां ग्रुप एडिटर थे। अब उन्होंने अपनी नई पारी मध्यप्रदेश के अग्निबाण ग्रुप से शुरू की है। उन्‍होंने यहां बतौर ग्रुप एडिटर ज्वाइन कर लिया है। वे ग्रुप के इवनिंग डेली के इंदौर, भोपाल संस्‍करणों को रीलांच कराएंगे साथ ही ग्वालियर, जबलपुर तथा छत्‍तीसगढ़ में रायपुर व बिलासपुर संस्‍करण लांच कराएंगे। ये इवनिंग डेली अब नयी सजधज और तेवर के साथ बाज़ार में उतरेगा। प्रमोद इसके लिए नयी टीम खड़ी कर रहे हैं। प्रमोद ग्रुप के एमडी राजेश चेलावत और ग्रुप के सीनियर मेम्बर विनोद खुजनेरी को रिपोर्ट करेंगे।

प्रमोद दो दशक से ज्‍यादा समय से उत्‍तर भारत की हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे जनसत्ता में रिपोर्टर फिर दैनिक भास्कर, भोपाल में विशेष संवाददाता रहे। भास्कर में छत्तीसगढ में एडिटर रहे। भास्कर का हरियाणा, चंडीगढ़ संस्‍करण और सूरत-वड़ोदरा में दिव्य भास्कर की लॉन्चिंग टीम के वे प्रमुख मेम्बर थे। अमर उजाला में वे जम्मू कश्मीर के स्टेट हेड, चंडीगढ़ में पंजाब-हरियाणा-हिमाचल  के स्टेट हेड रहे। फिर अमर उजाला में इलाहाबाद के भी एडिटर रहे। बाद में उन्‍हें नॉएडा में समूह का इनपुट एडिटर बनाया गया। चंडीगढ़ में उनका लांच किया पुल आउट माय सिटी आज पूरे ग्रुप में लागू है. रिपोर्टिंग, न्यूज़ और कंटेंट्स प्लानिंग और आम पाठक के लिए सुन्दर अख़बार बनाने में उनको प्रयोग करने में महारथ हासिल है। प्रमोद ने 7 किताबें लिखी हैं। पत्रकारिता के 2 बडे पुरस्कार और कहानी का देश का सबसे बड़ा पुरुस्कार उन्हें मिल चुका है। वे भारत सरकार की तरफ से इजराइल का स्टडी टूर भी कर आये हैं। उनकी 2 किताबें जल्दी ही आने वाली हैं।

क्यों न ‘हम’ अपने बेटे का नाम ‘मुलायम’ रख दें (देखें चार कार्टून)

मुलायम और मायावती ने जिस तरह कांग्रेस के आगे सरेंडर किया और एफडीआई को पास कराने में बड़ी भूमिका निभाई, उससे जनता के सामने कई संदेश गए हैं. यह कि दुश्मनों पर एतबार कर लो, नेताओं का कभी भरोसा न करो. जिस समाजवादी पार्टी ने एफडीआई के खिलाफ बंद का आयोजन किया था और उसके नेता लोग जिले जिले में रेल बस रोक कर आम जन जीवन ठप करने पर तुले थे, उसी सपा ने कांग्रेस को मदद देकर एफडीआई पास करा दिया. सबसे आश्चर्यजनक भूमिका मुलायम सिंह यादव की रही. मायावती तो तब भी अंत तक चुप रहीं और आखिर में लोकसभा में वाकआउट और राज्यसभा में खुलकर पक्षधरता दिखाकर अपनी राजनीतिक मजबूरी का इजहार कर दिया लेकिन मुलायम ने आखिर तक विरोध किया पर ऐन वक्त पर वाकआउट करके कांग्रेस को एफडीआई पर सपोर्ट दे दिया. इस मुद्दे पर चार कार्टून यहां पेश हैं. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


 

 


 


प्रधान संपादक बनते ही सीएम से ‘चर्चा’ करने पहुंच गए रवींद्र जैन!

 

रवींद्र जैन 'हिंदुस्तान एक्सप्रेस' नामक एक अखबार के संपादक बने. ज्यादा नहीं, हफ्ते दो हफ्ते हुए होंगे. और, आज उन्होंने खुद अपने फेसबुक एकाउंट के जरिए सबको बताया है कि उन्होंने सीएम शिवराज से चर्चा की और 'हिंदुस्तान एक्सप्रेस' के विस्तार की जानकारी दी. सोचिए, आजकल के दौर में लोग प्रधान संपादक बनते क्यों हैं और जो प्रधान संपादक बन जाता है वो तुरंत सीएम-पीएम के यहां भागकर जाता क्यों है? अपने अखबार के विस्तार के बारे में सीएम को बताने की जरूरत क्यों है? और, सीएम से 'चर्चा'में देश-दुनिया पर तो क्या बात होगी, बाकी क्या बात हुई और उसके क्या फायदा-नुकसान अखबार को होने वाला है? 

अर्थ के इस दौर में जब हर चीज बिकाऊ हो चुकी है, तब प्रधान संपादक की कुर्सी भी उससे परे नहीं है. आज ही वो खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपी है जिसमें बताया गया है कि छत्तीसगढ़ में सरकार की जय जय करने के लिए कई न्यूज चैनलों के संपादकों ने पेड न्यूज के बड़े बड़े प्रपोजल गर्व के साथ भेजे हैं. खैर, जब पूरे कुएं में भांग पड़ी हो तब किसी एक की क्या चर्चा करने. अपन तो रवींद्र जैन को शुभकामनाएं देंगे कि वे सीएम से चर्चा करने के बाद अब पीएम से भी चर्चा करने लायक बनें ताकि वे हिंदुस्तान एक्सप्रेस से उतर कर हिंदुस्तान अखबार पर चढ़ जाएं और यहां के प्रधान संपादक बन जाएं. खैर, वो दौर तो अब रहा नहीं जब सीएम लोग खुद एडिटर के यहां मिलने जाया करते थे और वेट किया करते थे. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


 

रवींद्र जैन ने फेसबुक वॉल पर जो प्रकाशित किया है, वह इस प्रकार है… जाहिर है, ये खबर उनके ही प्रधान संपादकत्व वाले अखबार हिंदुस्तान एक्सप्रेस में प्रकाशित हुई होगी…

समूह संपादक रवीन्द्र जैन की सीएम से चर्चा

हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के विस्तार की दी जानकारी

भोपाल। हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के समूह संपादक रवीन्द्र जैन ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात की और उन्हें हिन्दुस्तान एक्सप्रेस के मध्यप्रदेश में होने वाले विस्तार के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव एवं संयुक्त संपादक पंकज शिवहरे भी उपस्थित थे। 

हिन्दुस्तान एक्सप्रेस प्रबंधन ने वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र जैन को समूह संपादक का दायित्व सौपते हुए उन्हें पूरे प्रदेश में समाचार पत्र के विस्तार की जिम्मेदारी भी सौंपी है। शुक्रवार को विधानसभा स्थित मुख्यमंत्री के कार्यालय में रवीन्द्र जैन ने मुख्यमंत्री चौहान से मुलाकात की। उन्होंने मुख्यमंत्री को बताया कि हिन्दुस्तान एक्सप्रेस मध्यप्रदेश के अलावा हरियाणा और राजस्थान से भी प्रकाशित हो रहा है।  समाचार पत्र ने दिल्ली और महाराष्ट्र में भी प्रकाशन शुरू करने की तैयारियां कर ली हैं।

जैन ने मुख्यमंत्री को बताया कि मध्यप्रदेश में हिन्दुस्तान एक्सप्रेस मुरैना, ग्वालियर एवं भोपाल से प्रकाशित हो रहा है। शीघ्र ही इसे जबलपुर, इंदौर और रायपुर से प्रकाशित करने की योजना है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हिन्दुस्तान एक्सप्रेस को अपनी शुभकामनाएं दीं और उम्मीद की कि यह समाचार पत्र प्रदेश के विकास में अपनी भूमिका निभाएगा।

भूत के कारण मुझे अपना गांव छोड़ना पड़ा : लखन सालवी

आदरणीय, यशवंत जी भाईसाब को नमस्कार। मैंने जिस दिन आपको पुलिस पब्लिक प्रेस के बारे में लेख भेजा था। उसके एक दिन पूर्व ही मुझे आपके न्यूज पोर्टल भड़ास4मीडिया की जानकारी मिली थी। बताया गया था कि कोई भी पत्रकार अपनी व्यथा इस पोर्टल के माध्यम से सार्वजनिक कर सकता है। रातभर में कई कागज फाड़ने के बावजूद पुलिस पब्लिक प्रेस के संबंध में लेख पूरा हो ही गया। मैंने बिना आपसे बात किए वो लेख आपकों ईमेल द्वारा भेज दिया। खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब लेख भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित हुआ।

मुझे पता है कि इसकी अदृश्य प्रतिक्रिया क्या हुई होगी। आपकी जिंदादिली व खबर के प्रति न्याय की भावना को बारम्बार सलाम। मुझे जानकारी मिली है कि पवन भूत आपका करीबी है या जाणिता (आप उसे जानते है) है। बावजूद आपने मुझ अंजान युवक के लेख को प्रकाशित कर दिया। वाकई आपको धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए शब्द नहीं है मेरे पास।

मैं गरीब परिवार से हूं व अनुसूचित जाति से भी। हाशिए पर स्थापित जाति का होने के बावजूद कई ठोकरें खाने के बाद दैनिक भास्कर का स्ट्रिंगर रहा। उसके बाद क्षेत्र में ठीक-ठाक पहचान बन गई। लेकिन पवन भूत रूपी काले नाग ने आकर मेरी हंसती-खेलती जिन्दगी को डस लिया। किरण बेदी के नाम से प्रभावित होकर जुड़ गया और तीन माह तक काम किया। इस दौरान पता चला पवन भूत द्वारा तो पत्रिका कभी कभार ही छपवाई जाती है वो भी नाम मात्र की। तब मैंने एक दिन पवन भूत से कहा कि ‘सर लोग पत्रिका की मांग कर रहे हैं’। पवन भूत का जवाब आया कि ‘आम खाओ, गुठलिया मत गिनो’। मैं भौचक्का रह गया। विरोध किया, और स्वयं ही नौकरी छोड़ दी। लेकिन मुझे तीन माह की सेलरी नहीं मिली। 15 दिन के अतिरिक्त फास्ट ट्राइल कार्य का पैसा भी नहीं मिला। पवन भूत की गालियां व धमकियां सुनने को मिली वो अलग।

भाईसाब, पुलिस पब्लिक प्रेस के पवन कुमार भूत ने मेरी जिन्दगी को पांच साल पीछे धकेले दिया और पुलिस पब्लिक प्रेस की वजह से 25 वर्ष की उम्र में मैंने जो इज्जत बनाई थी, ईमानदारी पर चलकर जो छवि लोगों में बनाई थी वह धूमिल हो गई। मैंने पुलिस पब्लिक प्रेस को छोड़ने के साथ ही गांव भी छोड़ दिया क्योंकि जिन लोगों को मैंने सदस्य बनाया उन्हें पवन भूत द्वारा पत्रिका नहीं भेजी गई। वैसे मेरे अलावा अन्य रिपोर्टरों द्वारा बनाए गए सदस्यों को भी नहीं भेजी गई। लेकिन आज उन लोगों के सामने अपने आप को लज्जित महसूस करता हूं जिनको मैंने बतौर सदस्य पुलिस पब्लिक प्रेस से जोड़ा।

जब पुलिस पब्लिक प्रेस को छोड़ा तब ही सोच लिया कि पवन भूत के खिलाफ कार्यवाही तो करवानी है। मैं अपने स्तर पर प्रयास कर रहा हूं जिसमें आप जैसे लोगों का सहयोग मिल रहा है। मैं आपको पवन भूत द्वारा लिखी गई प्रतिक्रिया के खिलाफ पुनः प्रतिक्रिया भेज रहा हूं। पूरी रात जागकर प्रतिक्रिया लिखी व 4 बजे आपके लिए ये पत्र। 4.15 के ब्रह्म मुहुर्त में आपको ईमेल कर रहा हूं।

कृपया प्रकाशित करावें।

अति कृपा होगी, धन्यवाद।

लखन सालवी

+91 9828081636


जिस लिखे को प्रकाशित करने की बात लखन सालवी ने की है, उसे यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

आर्टिकल आन पवन भूत एक

आर्टिकल आन पवन भूत दो


लखन सालवी ने पवन भूत की 45 मिनट की बातचीत भी रिकार्ड की है, जिसे आप यहां सुन सकते हैं- 

भूत का स्टिंग : सुनें टेप : किरण बेदी की वजह से दिल्ली पुलिस मेरे पीछे पड़ी और लाखों का नुकसान हुआ

हजारों अखबारों में और पत्र-पत्रिकाओं में इस खबर को तमाम प्रमाणों सेहित दिया लेकिन बारां जिले के "निराला राष्ट्रध्वज" के अलावा यह खबर किसी भी अखबार में प्रकाशित नहीं हुई। दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका व दैनिक नवज्योति के पत्रकारों और सम्पादाकें को कई बाद इस फ्राड के बारे में बताया लेकिन वहीं हुआ ढाक के तीन पात . .  स्टोरी कहीं नहीं छपी। धन्यवाद देना चाहूंगा मुख्यधारा के समाचार पत्रों के भी बाप बन चुके भड़ास को जिन्होंने बेबाकी से स्टोरी को प्रकाशित किया। यशवन्त भाई को विशेष धन्यवाद जिन्होंने स्टोरी को प्रमुखता से सबसे पहले प्रकाशित किया। उसके बाद वेब मीडिया की मार्फत फैली इस खबर से तिलमिलाए पवन भूत ने मुझे फोन कर धमकी दी। -लखन सालवी, पत्रकार

पुलिस और पब्लिक के बीच सामंजस्य स्थापित करने तथा भारत को अपराध मुक्त बनाने के दावे से प्रकाशित की जा रही मासिक पत्रिका ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ के मालिक और सम्पादक पवन कुमार भूत ने मुझे अर्थात पत्रकार लखन सालवी को पोल खोलने से संबंधित लेखों को लिखने के कारण फोन कर धमकी दे डाली। हालांकि पवन भूत ने मुझे डराने की गरज से फोन किया था लेकिन मैंने चतुराई से उनसे कई जानकारियां जुटा ली। फोन पर पूरी बातचीत को यहां अपलोड किया जा रहा है. आप सुनें. बातचीत के प्रमुख अंश को नीचे प्रकाशित भी किया गया है….

भूत का स्टिंग … सुनें टेप…

 

पवन कुमार भूत


मैग्जीन के बेचे जाने वाले प्रेस कार्डों के सैंपल

मैग्जीन से जुड़ने के लिए किरण बेदी का नाम और तस्वीर इस्तेमाल किया जाता है. साथ ही जोर शोर से कई दावे किए जाते हैं.


…स्टिंग के कुछ अंश…

फोन की घंटी बजी . . . 

फोन उठाकर (लखन सालवी) – हल्लो कौन ?

आवाज आई – पवन कुमार (भूत). . नई दिल्ली से

लखन सालवी – बताइये

पवन कुमार – क्यों मेरा और अपना टाइम खराब कर रहे हो, क्यों लिख रहे हो मेरे भाई ? 

लखन सालवी – देखिए जो सच है वो मैं लिखता आया हूं और लिखता रहूंगा। आपने पाठकों से 400-400 रुपए लिए। उन्हें 2 साल तक पत्रिका भेजनी थी, दुर्घटना मृत्यु बीमा करवाना था लेकिन आपने ना तो बीमा करवाया और ना ही मैगजीन भेजी।

पवन भूत – वो हमारी तकनीकी भूल थी। वाकई में मेरे से भारी गलती हो गई थी। उस समय पाठकों से महज 400 रुपए लिए जा रहे थे लेकिन इन पैसों में से भी 100 रुपए बतौर कमीशन रिपोर्टर को दे दिए जाते थे। ऐसे में शेष रहे 300 रुपए में 2 साल तक पाठकों को पत्रिका भेजना तथा उनका दुर्घटना मृत्यु बीमा करवाना संभव नहीं हो सका। मैं अपनी इस गलती को आपके सामने, कोर्ट के सामने और पूरे संसार के सामने मानने को तैयार हूं।

लेकिन अब हमने सारा काम व्यवस्थित कर दिया है। अब हम बेईमानी का रास्ता छोड़कर ईमानदारी के रास्ते पर है। हमने प्लान चैंज कर लिया है, अब हमने सदस्यता शुल्क 400 रुपए की बजाए 1000 रुपए कर दिए है। इनमें से 250 रुपए बतौर कमीशन रिपोर्टर को दिया जा रहा है तथा 750 रुपए कम्पनी में जमा किए जा रहे है जिनसे पाठको को पत्रिका भेजी जा रही है। और लखन .. आप ये मत सोचना कि आपके लिखने से मैं काफी डर गया हूं और डर के मारे फोन कर रहा हूं। और हां आप मुझे नटवर लाल कहो, भालू कहो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता ।

((बात धीरे धीरे इन्टरव्यू में बदल गई। मैंने पवन भूत से कई सवाल किए जिनके जवाब पवन कुमार भूत बड़ी ही चतुरता से घुमाते हुए दिए। पवन भूत ने बताया कि उड़ीसा के सीएम ने भी लगाई 100 गुना देशी ताकत लेकिन कुछ नहीं बिगाड़ सके मेरा . . .))

उन लोगों का क्या जिन्होंने 400-400 रुपए देकर सदस्यता ली ?

उन सभी लोगों को पत्रिका भेजी जा रही है।

पाठको को पत्रिका नहीं मिल रही है ? राजस्थान के भीलवाड़ा जिले और गुजरात के सूरत जिले के कई पाठको ने बताया है।

(झल्लाकर) – वो तो मैं भेज दूंगा लेकिन तुम जो कर रहे हो वो ठीक नहीं है। तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। तुमने जो किया ना लखन . . उससे 100 गुना, 100 गुना देशी ताकत लगाकर के हमारे उड़ीसा के मुख्यमंत्री, सीबीआई व कई बड़ी-बड़ी संस्थाओं ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोला। सारी जांच की लेकिन मेरा कुछ नहीं कर पाए। तुम क्या कर लोगे?

रही बात पत्रिका की . . तो लखन, आपको बता दूं कि देश भर में कोई 1900 पत्र-पत्रिकाएं रजिस्टर्ड है आरएनआई में। आपकी दुआ से ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ एक मात्र ऐसी पत्रिका है जो कुछ हद तक ही सही लेकिन पाठको तक पहुंचती है। बाकी सारे के सारे पुलिस का लोगों (चिन्ह) उपयोग करते है, कार्ड बेचते है। मेरे पास ऐसी 10 बड़ी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं के कार्ड है जिनसे मैंने आजीवन सदस्यता ली। लेकिन वो पत्रिकाएं बंद हो गई, अब क्या कर सकते है? रविवार, टाइम्स आफ इंडिया जैसी कई बड़ी पत्रिकाओं के लाइफ टाइम मेम्बरशिप के कार्ड मेरे पास है लेकिन वो पत्रिकाएं मुझे नहीं मिलती है। कई नामचीन हिन्दी पत्र-पत्रिकाएं बंद गई। कई लोग चंदा लेकर प्रकाशित कर रहे है। लेकिन जो बंद हो गई उनका कुछ नहीं किया जा सकता है। हां मैंने जो गलती है कि है उसे सुधार दूंगा। और ये मेरे माइण्ड का ही कमाल है कि ‘‘पुलिस पब्लिक प्रेस’’ में इस प्रकार की कोई तकनीकी खामी नहीं है। और मैं हर हाल में मेरी 100 करोड़ की इस कम्पनी को चलाऊंगा।

आपने अपनी वेबसाइट पर कई सरकारी सुरक्षा, जांच विभागों एवं टीवी चैनलों को अवर एसोसिएट बताया है?

यह आपकी दिमागी शरारत है। कोई ऐसा भी सोच सकता है यह आपसे मुझे पता चला है। अवर एसोसिएट में हमने जिन्हें भी दशार्या वो क्राइम फ्री इंडिया की हमारी मुहिम में हमारे साथ काम करते है। हमने ऐसा थोड़ लिखा है कि वो हमारे पार्टनर है या हमारे से जुड़े हुए है। हां मैं उनका सहयोगी हूं और उनके साथ हूं।

आप बात को घुमा रहे है, आपने पुलिस पब्लिक प्रेस को उनका सहयोगी नहीं बल्कि उन तमाम सुरक्षा, जांच एजेन्सियों एवं टीवी चैनलों को अपना सहयोगी बताया है ?

ये सब आप कर रहे हो बाकि हमारी वेबसाइट कई सालों से चल रही है आज तक किसी ने कोई आपत्ति नहीं की।

अवर एसोसिएट की बात को टालते हुए कहते है और जिस किरण बेदी का नाम ले लेकर आप उछल कूद कर रहे हो। उस किरण बेदी की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है मरा।

पुलिस पब्लिक प्रेस से जुड़ने वाले लोगों को बताया जाता है कि किरण बेदी पुलिस पब्लिक प्रेस की सहयोगी है और पत्रिका व कई समाचारों आदि में दिए जाने वाले विज्ञापनों में भी पुलिस पब्लिक प्रेस के साथ किरण बेदी का फोटो प्रकाशित किया जाता है। आपके रिपोर्टर फार्म में भी ऐसा लिखा गया है।

ये गलत है। किरण बेदी की एक फोटो मैंने अपनी पत्रिका में तथा कहीं-कहीं विज्ञापनों में उपयोग की थी। जिसका खामियाजा मुझे मिला कि दिल्ली की पुलिस मेरे पीछे पड़ गई और उस महिला की वजह से मुझे लाखों का नुकसान हुआ। जिस दिन से ये बात समझ में आ गई कि उस दिन से मैंने किरण बेदी को डस्टबीन में डाल दिया। मैंने सोच लिया कि भई इस महिला के बिना भी हमारा काम चल सकता है, हमारा इनसे कोई लेना देना नहीं है। 

(किरण बेदी ने ऐसा क्या कि पुलिस आपके पीछे पड़ी है? इस सवाल का जवाब नहीं दिया।)

आपने पाठकों के दुर्घटना मृत्यु बीमा भी नहीं करवाए?

(झल्लाकर) – यार बताया ना . . . शुरू में मेरे से गलती हुई थी, 400 रुपए वाले प्लान में दुर्घटना मृत्यु बीमा करवाना संभव नहीं हो सका था। और ये बीमा कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, यह बीमा महज 39 में होता है। ये बीमा सरकार का दिखावा मात्र है। यह बीमा जनता के साथ फ्राड है।

जब आप जानते थे कि यह बीमा फ्राड है तो फिर अपने प्लान में क्यूं लिया ?

आगे से हम यह बीमा करवायेंगे ही नहीं अब हम मेडिक्लेम करवाएंगे।

बात बदलते हुए पवन भूत कहते है कि लखन . . . आपने लिखा कि 10 हजार में प्रेस कार्ड बांटे जा रहे है। ये बिलकुल गलत है। ऐसा नहीं है। मैं आपको बता दूं कि कुछ लोग है जो हमें विज्ञापन देते है। अब साला मुझे ये नहीं पता कि विज्ञापन देने वाला दाउद इब्राहिम है या रिक्सा वाला है या ड्राइवर है या दूकानदार है। जो 10 हजार का विज्ञापन देता है हम उन्हें कम्लीमेन्ट्र कार्ड देते है न कि कार्ड बेचते है। और आपको बता दूं कि ऐसा देश में कई पत्र-पत्रिकाओं वाले और टीवी न्यूज चैनल वाले कर रहे है। दिल्ली में 30000 रुपए में टीवी न्यूज चैनलों के कार्ड दिए जा रहे है। 30000 रुपए में फ्रेंचायजी दी जाती है और कार्ड जारी कर दिया जाता है। अब क्या बिगाड़ लेगी सरकार उनका ?

उन न्यूज चैनल के नाम बता सकते है जो ऐसे कार्ड जारी करते है ?

हां बिलकुल मैं उनकी वेबसाइट के लिंक आपको उपलब्ध करवा दूंगा और कार्ड भी दिलवा सकता हूं।

प्रवचन ऑफ मिस्टर नटवर लाल

लखन . . पैसा इस जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है। अपने परिवार के लिए पैसा कमाओं। आप ऊर्जावान युवा हो, अपनी ऊर्जा को सकारात्मक कार्यों में लगाओं। मुझे पता है मेरे खिलाफ अब तक आप कई जगहों पर लिख चुके हो। लेकिन हमेशा नेगेटिव सोचने और नेगेटिव करने से ने तो मेरा भला होगा न आपका भला होगा और ना ही समाज का भला होगा। इसलिए आपको एक सुझाव देता हूं कि सकारात्मक सोचो और करो।

आप कुछ भी कर लो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। सबूत ढूंढ कर मेरे खिलाफ जितना कुछ करना है कर लो मुझे पता है एक दिन इनकी मौत होनी है। आप मेरे खिलाफ जो कुछ कर रहे हो उसके परिणाम बहुत ही बुरे होंगे।


खैर . . . साफ हो चुका है कि पवन कुमार भूत ने फ्राड किया है। वो स्वीकार कर चुके है कि वो अपने पाठकों को पत्रिका नहीं भिजवा सके और दुर्घटना मृत्यु बीमा भी नहीं करवा सके। पवन भूत के इस फ्राड के खिलाफ प्रधानमंत्री, प्रेस काउंसिल आफ इंडिया, सीआईडी सहित कई लोगों संस्थाओं से शिकायत की गई लेकिन इन सब के द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई। क्या चोरी और सीना जोरी कर रहे पवन भूत जैसे लोगों से भरे इस देश में कानून नाम की कोई चिड़िया और उस चिड़िया की रक्षा करने वाले लोग हैं?

लखन सालवी

Lakhan Salvi

+91 98280-81636

+91 94686-57636 

www.lakhansalvi.blogspot.com


भूत के बारे में लखन सालवी का लिखा एक पुराना विश्लेषण भी पढ़ें- 

दस हजार रुपये में प्रेस कार्ड बेचने वाले भूत का अट्ठारह से अधिक बैंकों में है खाता


(सुनें)

 

सुनता है गुरु ज्ञानी…. (कबीर) को सुनें कुमार गंधर्व की आवाज में

Sunta hai guru gyani.. Gagan me awaaz ho rahi hai jheeni, jheeni, jheeni, jheeni, jheeni, jheeni… Lyrics by Kabir…. Performed by Kumar Gandharva … कुमार गंधर्व की आवाज में कबीर का एक भजन… सुनता है गुरु ज्ञानी… गगन में आवाज हो रही है झीनी, झीनी, झीनी, झीनी, झीनी, झीनी…


Ishq wala love… इश्क वाला लव…


Disco deewane… डिस्को दीवाने…


Non stop dance.. नान स्टाप डांस सांग


और गानें- Click


(सुनें)

शिशिर सोनी हरिभूमि के साथ, आकाश ने एमएच1 न्यूज ज्वाइन किया

शिशिर सोनी के बारे में सूचना है कि उन्होंने हरिभूमि अखबार में वरिष्ठ पद पर ज्वाइन किया है. शिशिर सोनी दैनिक भास्कर के नेशनल ब्यूरो में वरिष्ठ पद पर रह चुके हैं. कई अखबारों में काम कर चुके शिशिर अपनी बेहतरीन रिपोर्टिंग और एक्सक्लूसिव खबरों के लिए जाने जाते हैं. 

आकाश सिंह ने एमएच1 न्यूज में असिस्टेंट प्रोड्यूसर के रूप में ज्वाइन किया है. वे फोकस टीवी में भी काम कर चुके हैं. टेक वन इंस्टीट्यूट और एमिटी से उन्होंने पढ़ाई की हुई है.

जी संपादकों की गिरफ्तारी के तरीके पर दुखी हैं हरिभूमि के संपादक ओमकार चौधरी

जिस तरह जी न्यूज और जी बिजनेस के संपादकों को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है, उन तौर-तरीकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। इन संपादकों पर कोयला खदान आवंटन से जुड़ी खबरों के प्रसारण रोकने की एवज में जिंदल ग्रुप से सौ करोड़ रुपये की फिरौती मांगने का गंभीर आरोप लगाया गया है। 

एक स्टिंग आपरेशन के जरिए जिंदल ग्रुप ने यह सिद्ध करने का प्रयास भी किया है कि ये दोनों संपादक जिंदल के दफ्तर पहुंचे थे और वहीं उन्होंने खबर रोकने के लिए सौ करोड़ रुपये देने की मांग उनके सामने रखी। यह मसला उस समय सुर्खियों में आया था, जब नवीन जिंदल की ओर से जी ग्रुप के संपादकों के खिलाफ दिल्ली पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। दिल्ली पुलिस इस पूरे मामले की तहकीकात में लगी थी।

इस सिलसिले में दोनों संपादकों सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया से कई दौर की पूछताछ भी की गई। एक रोज फिर उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया गया और गिरफ्तार कर लिया गया। जी ग्रुप के वकील ने उनकी गिरफ्तारी पर सवाल खड़ा करते हुए जानना चाहा है कि जब दोनों संपादक और जी ग्रुप लगाए गए आरोपों की जांच में बिना किसी हील हुज्जत के सहयोग करते आ रहे हैं तो अचानक उन्हें गिरफ्तार क्यों किया गया है? यह सरकार को बताना होगा। 

आमतौर पर ऐसे मामलों में प्रक्रिया यही है कि अपनी जांच के आधार पर पुलिस कोर्ट में आरोप-पत्र दाखिल करती है और अदालत यदि जरूरी समझती है तो अभियुक्तों को हिरासत में लेने अथवा जमानत पर छोड़ने का निर्णय लेती है। पुलिस और सरकार ने चूकि वह तरीका नहीं अपनाकर सीधे संपादकों को गिरफ्तार किया है, इसलिए उसकी नीयत पर सवाल खड़े होना लाजिमी है। ऐसा वह उस हालत में कर सकती थी, जब वे सहयोग नहीं कर रहे हों। सहयोग के बावजूद अगर यह कदम उठाया गया है तो इसके पीछे की मंशा समझी जा सकती है। किसी भी मीडिया ग्रुप के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की गिरफ्तारी के फैसले को हल्के में नहीं लिया जा सकता। 

उनकी गिरफ्तारी के तरीके और समय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि उन्होंने गैर कानूनी तरीके से जिंदल ग्रुप से मोटी रिवत की मांग की है तो पुलिस का दायित्व है कि वह जांच, तथ्यों और सबूतों के आधार पर आरोप-पत्र तैयार कर अदालत में पेश करे और उन्हें सजा दिलाने का प्रयास करे परन्तु आरोप पत्र पेश करने से पहले ही जिस अंदाज में उन्हें गिरफ्तार करने की जल्दबाजी दिखाई गई है, उससे लगता है कि सरकार पूरे कोलगेट मसले को दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिश कर रही है। कोलगेट में बड़े पैमाने पर हुए भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के कारण सरकार की भारी फजीहत हुई है। यह बातें खुलकर सारे देश के समक्ष आ गई है कि सरकार और कांग्रेस ने अपने कुछ चहेतों को कोयला खदानों की बंदरबांट की है।

कैग की रिपोर्ट आने के बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर पिछले सत्र में संसद नहीं चलने दी। इस सत्र में भी यह मसला उठना तय है। गड़बड़ियां पाए जाने के बाद जिंदल ग्रुप सहित कई कंपनियों को आवंटित की गई कई कोयला खदाने रद्द की जा चुकी हैं। कई पर मुकदमें कायम किए जा चुके हैं। इनमें कांग्रेस के एक सांसद और उनके मंत्री भाई भी शामिल हैं। मीडिया के किसी अंग ने यदि कोई गलती की है तो इसका फैसला अदालत से होना चाहिए। इन गिरफ्तारियों के तौर तरीकों से सरकार ने बाकी मीडिया को भी एक संदेश देने की कोशिश की है, जिसे स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए शुभ संकेत तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता।

लेखक ओमकार चौधरी हरिभूमि अखबार के संपादक हैं.

पत्रकारिता की खराब हालत पर बहुत चिंतित हैं शशि शेखर

शशि शेखर. हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक. इससे पहले अमर उजाला के प्रधान संपादक रहे. आज अखबार से लेकर आजतक चैनल की भी यात्रा उन्होंने की. उन पर कई तरह के आरोप लगे और लगते रहते हैं. अपने अधीनस्थों से गाली गलौज से बातचीत करना, अखबार बेचने के लिए झूठी या आंशिक सच्चाई वाली खबरों को तान देना, कुशाग्र लोगों की जगह औसत से कम दिमाग वालों को तरजीह देना और चेला बनाकर रखना, जहां काम करना वहां के मैनेजमेंट के सारे प्रबंधकीय कामधाम भी पत्रकारों के जरिए करा देना, ब्राह्मणवादी मानसिकता से ग्रसित होने के कारण दलितों-पिछड़ों की नियुक्ति में उपेक्षा करना… ऐसे शशि शेखर अगर पत्रकारिता की गिरती हालत पर चिंता व्यक्त करें तो हम सबों का चिंतित हो जाना बहुत जरूर हो जाता है. पहले आप पढ़ें कि शशि शेखर ने अपनी चिंता किस रूप में व्यक्त की है. उसके बाद भड़ास पर एक वीडियो अपलोड किया जाएगा, जिससे शशि शेखर की शख्सियत के दूसरे पक्ष से अब अच्छे तरीके से परिचित हो जाएंगे. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


 

खुद आईना देखें, उसे दिखाने वाले

शशि शेखर

अपनी सनसनीखेज खबरों के जरिये दुनिया के तमाम सत्ता नायकों को दहला देने वाले जूलियन असांज की हालत गंभीर है और लंदन स्थित इक्वाडोर के दूतावास में उनका इलाज चल रहा है। भारत में दो वरिष्ठ पत्रकार तिहाड़ जेल में न्यायिक हिरासत गुजार रहे हैं। उधर ब्रिटेन में हर रोज ठंडे पड़ते मौसम में एक न्यायमूर्ति की रिपोर्ट के बाद बहस गरम है कि क्यों न मीडिया के लिए आचार संहिता लागू कर दी जाए? ये तीन खबरें दो अलग महाद्वीपों से आई हैं, परंतु इनकी ध्वनि एक है- मीडिया जटिल सवालों के घेरे में है, उसकी विश्वसनीयता दांव पर लगी हुई है।

असांज ने पिछले छह महीने से इक्वाडोर के दूतावास में शरण ली हुई है। विभिन्न देशों में उन पर तरह-तरह के मुकदमे हैं, जो शायद कभी आकार ही नहीं लेते, अगर उन्होंने संसार के सबसे ताकतवर लोगों से अदावत मोल न ली होती। अब जब वह फेफड़ों के गंभीर संक्रमण से ग्रस्त हैं, तो सवाल उठने लाजिमी हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हिरासत के दौरान उन्हें कुछ ऐसा दे दिया गया, जो इस वक्त उनके लिए घातक साबित हो रहा है? यदि इस पर जांच की मांग की जाए, तो दिक्कत यही है कि उन्हें उन्हीं लोगों से जूझना होगा, जो आरोपी होने के साथ मुन्सिफ भी हैं। ऐसा नहीं होता, तो उन्हें दर-बदर होने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। पर क्या बात सिर्फ इतनी सी है कि सत्ताधीशों से उलझना दिक्कतों को दावत देना है? कहीं यह एक चालू मुहावरा तो नहीं बन गया है?

इंग्लैंड से बात शुरू करते हैं। जब यह खबर आई कि संसार के सबसे ताकतवर मीडिया मुगल रुपर्ट मर्डोक के अखबार ने कुछ लोगों के फोन हैक कराए, तो सनसनी मच गई। ब्रिटेन के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था। इससे इतनी हाय-तौबा मची कि मर्डोक को अखबार बंद करना पड़ा और संपादक सहित वरिष्ठ अधिकारियों को जेल की हवा भी खानी पड़ गई। तब भी सवाल उठे थे कि आजादी के नाम पर क्या मीडिया उच्छृंखल हो गया है? क्या उसने लोगों की निजी जिंदगियों में झांकना शुरू कर दिया है? क्या उसने उस लक्ष्मण रेखा की चिंता करनी छोड़ दी है, जो उसे मर्यादा का सुरक्षा कवच प्रदान करती आई है?

हर लोकतंत्र की तरह ब्रिटेन में यह बहस सामाजिक हलकों का हिस्सा बनकर बदलाव लाती, उससे पहले ही राजनीतिक तंत्र ने उसे अपने कब्जे में ले लिया। तरह-तरह के आरोप उछलने लगे और सोशल मीडिया सच्चे-झूठे, किस्सों से भर गया। इसी दौरान लॉर्ड लेवेसन की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया गया। 17 महीनों की पड़ताल के बाद न्यायमूर्ति लेवेसन ने जो निष्कर्ष निकाले, उसने मीडिया संस्थानों को हिलाकर रख दिया है। उनका सुझाव है कि एक ऐसी निगरानी संस्था बनाई जाए, जिसमें सांसद और मीडिया के प्रतिनिधि शामिल हों। यह इतनी ताकतवर हो कि उसे ‘उद्योग और सरकार’ प्रभावित न कर सकें।

इस संस्था को आचार संहिता भंग होने की स्थिति में जांच करने के पूरे अधिकार होने चाहिए। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो संबंधित मीडिया संस्थान के कुल टर्नओवर का एक प्रतिशत या दस लाख पाउंड जुर्माने तक की सजा सुनाने का हक भी इसके हाथ में होना चाहिए। इस लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में एक सुझाव यह भी है कि मीडिया इंडस्ट्री को अपने लिए, अपनी तरफ से ऐसी संस्था बनानी चाहिए, जो उसके खिलाफ लगने वाले आरोपों की जांच कर सके और फैसले सुना सके।

इस जांच दल ने कुछ खबरों और उनके परिणामों की भी गहनता से जांच की। लॉर्ड लेवेसन के अनुसार, गलत अथवा भ्रामक रिपोर्टिंग की वजह से जन-धन की हानि हुई। कहने की जरूरत नहीं कि गए शुक्रवार को इस रिपोर्ट के आने के बाद से ब्रिटिश प्रेस में हंगामा मच गया है। पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी के लिए खतरा बताया है। आने वाले दिनों में वहां क्या कुछ होता है, यह देखना दिलचस्प रहेगा।

अब आते हैं भारत पर। एक नामचीन मीडिया समूह के दो वरिष्ठ संपादक इस समय अवैध वसूली के आरोप में न्यायिक हिरासत में हैं। एक कांग्रेसी सांसद का आरोप है कि इन लोगों ने उनसे खबर की एवज में 100 करोड़ रुपये की मांग की। उनके लोगों ने इस बातचीत को कैमरे में कैद कर सीडी दिल्ली पुलिस की विशेष अपराध शाखा के हवाले कर दी। पुलिस का दावा है कि विधिवत जांच के दौरान सीडी सही पाई गई। इसी के आधार पर उन्होंने कार्रवाई की। सवाल उठ रहे हैं कि क्या पुलिस ने अति सक्रियता दिखाई? जाहिर तौर पर मीडिया समूह ने नवीन जिंदल के आरोपों का खंडन करते हुए आरोप लगाया है कि सरकार मीडिया की आजादी का गला घोटने पर आमादा है।

मामला अब अदालत में पहुंच गया है, इसलिए इस सिलसिले में ज्यादा बात करने की बजाय हम क्यों न उन सिद्धांतों पर चर्चा करें, जिनके बल पर पूरे संसार के पत्रकार आज तक अपना सीना चौड़ा करके चलते रहे हैं? हम सभी को पत्रकारिता की किताबों में पढ़ाया गया है कि हमारा काम संविधानसम्मत, सामाजिक मर्यादाओं के अनुकूल और जन साधारण के हित में होना चाहिए। क्या ऐसा हो रहा है? अक्सर लोग आरोप लगाते हैं कि व्यवसायीकरण ने मीडिया को गलत रास्ते पर ला पटका है। क्या वाकई ऐसा है?

यह ठीक है कि मीडिया व्यावसायिक हो गया है। यह भी सही है कि उसे लाभ-हानि के तराजू में तोला जाता है। ठीक यह भी है कि तमाम मीडिया कंपनियां शेयर बाजारों में लिस्टेड हैं और हर तीन महीने में अपने नफे-नुकसान का ब्योरा पेश करती हैं। मैं पूछता हूं कि इसमें हर्ज क्या है? एक अखबार, न्यूज चैनल या खबरिया वेबसाइट अपने उपयोगकर्ता से वायदा क्या करती है? यही कि हम आप तक खबर और विचार पहुंचाएंगे। पता नहीं क्यों, हम भूल जाते हैं कि समाचार का अकेला, और सिर्फ अकेला तत्व ‘सत्य’ है।

अगर सच के साथ छेड़छाड़ की गई है, तो वह कहानी हो सकती है, खबर नहीं। अब पत्रकारों को तय करना है कि उनकी पेशेवर नैतिकता क्या है? वे खबर लिखना और दिखाना चाहते हैं या कहानी? भूलिए मत, इस देश को मसालेदार कहानियों के मुकाबले खबरों की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए आज भी वही अखबार या चैनल प्रतिष्ठा पाते हैं, जो सच पर अडिग रहते हैं।

एक बात और। अगर समाज को पेशेवर डॉक्टर, शिक्षक या वकील की जरूरत है, तो प्रोफेशनल पत्रकार की क्यों नहीं? फिर यह कहने में संकोच क्यों कि हम पेशेवर तौर पर सच बोलने और लिखने वाले हैं। पर इसके लिए सच बोलने-लिखने वालों को सत्य की राह पर ही चलना होगा। अगर वे ऐसा करते हैं, तो फिर मीडिया के लिए भारी-भरकम कानून और आचार संहिताएं बनाने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। फिर कानूनों से होता भी क्या है? तमाम संहिताओं के बावजूद यदि शताब्दियां बीत जाने पर भी अपराध नहीं रुके, अपराधी खत्म नहीं हुए, तो मीडिया पर चाबुक चलाने से क्या हो जाएगा?

यहां यह भी गौरतलब है कि मीडिया पर हंटर का तर्क हमारे चाल, चरित्र और चेहरे में आए बदलाव के बाद उठा है। यह मौजूदा वक्त की सबसे बड़ी मांग है कि लोगों को आईना दिखाने वाले खुद अपना चेहरा उसी आईने में देखें और अपने लिए सही रास्ते का चुनाव करें। कुछ लोगों की करतूत से हमेशा के लिए शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है।

(शशि शेखर का यह लिखा हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार.)

महुआ माजी पर आरोप इस लेख के जरिए लगा, लेखक हैं श्रवण कुमार गोस्वामी

: महान लेखक बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं : 'आजकल’ (फरवरी 2012) में स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल की एक रचना प्रकाशित हुई है-‘मैं महान लेखक क्यों नहीं बन सका?’ वस्तुतः यह रचना आकाशवाणी के किसी केंद्र के लिए प्रसारणार्थ लिखी गई थी.इस रचना की अंतिम पंक्ति है-‘महान लेखक हमेशा बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं.’ मेरे जानते हिन्दी साहित्य में किसी साहित्यकार को महान बनाने के कार्य की शुरुआत स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ही हो गई थी. 

इस काम को न तो कलकत्ता ने शुरू किया और न पटना ने. इस पाप का भागी बनारस भी नहीं हुआ. इलाहाबाद या लखनऊ ने भी ऐसा कोई कार्य नहीं किया. लेकिन अब हिन्दी साहित्य का केंद्र कलकत्ता, पटना, बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ से उजड़ कर दिल्ली बन गया है. दिल्ली में हिन्दी साहित्यकारों का जमावड़ा है और दिल्ली हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी मंडी भी है. और इस वजह ही यहां साहित्य में किसी को महान बनाने का उद्योग भी चालू है. अब तो यह एक सर्वविदित बात है कि हिन्दी के कुछ चौधरियों के पास ही वह कंट्रोल है, जिससे वे महान लेखकों का अपनी मर्जी के अनुसार उत्पादन करते हैं. यहां जब वे किसी के पीछे पड़ जाते हैं तो उसकी खटिया खड़ी करके ही दम लेते हैं, चाहे सामने वाला साहित्यकार कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो!

2006 में महुआ माजी का पहला उपन्यास राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली ने प्रकाशित किया-‘मैं बोरिशाइल्ला’. देखते ही देखते लेखिका महुआ माजी हिन्दी जगत में छा गईं. इन्हें लंदन में ‘इंदु शर्मा कथा सम्मान’ से 20 जुलाई 2007 को सम्मानित किया गया. रूपा एंड कंपनी, नई दिल्ली ने इस उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद ‘मी बोरिशाइल्ला’ भी प्रकाशित कर दिया. जाहिर है कि अचानक महुआ माजी को जो लोकप्रियता मिली, वह आकर्षण और आश्चर्य का विषय बनती चली गई. इस वर्ष उनका दूसरा उपन्यास ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ भी प्रकाशित हो गया है. इस उपन्यास का लोकार्पण दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में किया गया. राजकमल प्रकाशन ने इस उपन्यास की पांडुलिपि को तीसरे ‘फणीश्वरनाथ रेणु सम्मान’ से सम्मानित किया है. इसके अंतर्गत महुआ माजी को एक लाख रुपए की राशि भी प्रदान की गई. लोकार्पण के अवसर पर नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर उपस्थित थे. इस उपन्यास के प्रकाशन के बाद महुआ माजी को एक बार और लोकप्रियता के पुष्पक पर सवार होने का अवसर प्राप्त हो गया है. इसके लिए मेरी ओर से उन्हें डबल बधाई.

अब कुछ आत्मगत

डॉ. महुआ माजी बीच-बीच में मेरे घर आया करती थीं. मेरी पत्नी से उनकी खूब पटती थी. महुआ बराबर इस बात की प्रशंसा किया करती थीं कि भाभी जी ने अपने घर में किस्म-किस्म के फूलों के पौधे लगा रखे हैं. हमारे घर के गेट पर जो बोगनवेलिया है, वह उसकी खूब तारीफ करती थीं, क्योंकि उसकी पत्तियां एक साथ सफेद और गुलाबी दो रंगों की होती हैं. वह बराबर कहा करती थीं कि मैं भी इसे अपने घर में लगाऊंगी. ऐसी दो रंगों वाली पत्तियां आसानी से देखने को नहीं मिल पाती हैं.

2004 का वर्ष चल रहा था. एक दिन महुआ माजी का आगमन हुआ. उन्होंने कहा कि मैं एक उपन्यास लिख रही हूं. आपसे अनुरोध है कि इसे आप पढ़ने की कृपा करें और इसकी भाषा भी सुधार दें, क्योंकि मेरी मातृभाषा तो बांग्ला ही है. यों मैं हिन्दी में भी लिखने लगी हूं. अब यहां मैं अपनी डायरी का उपयोग करना चाहता हूं, जो कुछ यूं है-

शुक्रवार, 16 जुलाई 2004

महुआ माजी मिठाई का डिब्बा लेकर आई.मैंने अपनी नाराजगी जताई.वह कहने लगी कि खुशी की बात है, इसीलिए मैं मिठाई लेकर आई हूं. वह अपने उपन्यास की पांडुलिपि का आधा भाग पढ़ने के लिए दे गई है. इस उपन्यास का नाम है-‘मैं बोरिशाइल्ला पोला’ (मैं बोरिशाइल्ला का बेटा). यह बांग्लादेश की पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास है.

शनिवार, 17 जुलाई 2004

महुआ माजी के उपन्यास की पांडुलिपि के मैंने सौ पृष्ठ पढ़ लिए. यह लिखा तो अच्छा गया है, पर क्यों तो कभी-कभी यह संदेह होने लगता है… इसमें सौ पृष्ठों में ही तीन स्थानों पर जो चित्रण किया गया है उससे यह लगता है कि लेखिका चर्चित महिला लेखिका बनने के चक्कर में कोई संकोच नहीं करती.

शनिवार, 31 जुलाई 2004

महुआ माजी के उपन्यास की आंशिक पांडुलिपि मैंने पढ़ ली. इस उपन्यास के बारे में अब तक मेरी कोई निश्चित राय नहीं बन सकी है. लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि चूंकि यह उपन्यास एक रूपसी का है, इसलिए लोग इसे फुलाएंगे जरूर. महुआ को अभी ही ऐसा सत्कार मिल चुका है कि वह गलतफहमी में जीने लगी है. कभी-कभी मुझे ऐसी प्रतीति भी होती है कि यह कुछ पाने के लालच में अपना कुछ गंवा भी सकती है.

बुधवार, 11 अगस्त 2004

महुआ माजी को मैंने पठित पांडुलिपि लौटा दी. कुछ पृष्ठ पढ़ने को और मिल गए. बांग्लादेश महुआ ने देखा भी नहीं है. उसने वहां के बारे में अध्ययन तथा व्यक्तिगत बातचीत के आधार पर यह लिखा है. उसने कई तरह की जिज्ञासाएं प्रकट कीं. मैंने उन जिज्ञासाओं के उत्तर दे दिए. उसने स्वीकार किया कि मैत्रेयी पुष्पा और जया जादवानी के प्रभाव के कारण उसने सेक्स को स्थान दिया.

बुधवार, 6 अक्टूबर 2004

महुआ माजी पेस्ट्री लेकर आई. मैंने नाराजगी प्रकट की. मैंने पहले ही उसे कुछ लाने से रोक दिया था. पेस्ट्री में अंडा होता है. इसी आधार पर मैंने उसे लौटा दिया. पुराने परिच्छेद ले गई और नए परिच्छेद दे गई है.

शनिवार, 13 नवंबर 2004

महुआ माजी शाम को आई. वह लगभग दो सौ पृष्ठ और दे गई है. उसने बताया कि आधार प्रकाशन उसके उपन्यास के लिए अग्रिम के रूप में पचास हजार देने को तैयार है. वह बहुत सारी बातें बोल गई. जो स्थितियां बन रही हैं, वे महुआ का दिमाग चढ़ाने के लिए पर्याप्त हैं. मैं उसे समझाने की स्थिति में नहीं हूं, क्योंकि वह इतनी प्रबुद्ध नहीं है कि मेरी सीख पर ध्यान दे सके. उसे परिपक्व होने में समय लगेगा. वह यह नहीं समझ पा रही है कि लोग उसके उपन्यास की नहीं अपितु उसके रूप की कीमत लगा रहे हैं. ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वह किसी दुर्घटना का शिकार न बने.

रविवार, 5 दिसंबर 2004

महुआ की पांडुलिपि का संशोधन-कार्य पूरा हो गया.

महुआ माजी ने मुझसे पूछा कि मेरा उपन्यास आपको कैसा लगा? मैंने कहा-अभी मैं इस उपन्यास के बारे में कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं. पर मैं आपसे कुछ बातें अवश्य कहना चाहता हूं-आपका उपन्यास बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम पर आधारित है. लेकिन आपने अब तक बांग्लादेश को देखा भी नहीं है. आपको यह भी पता नहीं है कि पद्मा नदी किस ओर से किस दिशा की ओर बहती है. केवल सुनी-सुनाई बातों के सहारे या किताबें पढ़कर आपने इस उपन्यास को लिखा है. इसलिए आपको इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि इस उपन्यास के बारे में आपसे अनेक असुविधाजनक प्रश्न पूछे जा सकते हैं. यह सच है कि साहित्यकार परकाया प्रवेश कर अपने पात्रों को भी स्वाभाविक रूप प्रदान कर देता है. लेकिन, किसी अजाने और अपरिचित देश के भूगोल को स्वयं देखे और उसके प्रत्यक्ष अध्ययन के बगैर वहां का प्राकृतिक चित्रण वह नहीं कर सकता. आपके लेखन के समक्ष यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न कोई भी खड़ा कर सकता है.

रविवार, 5 दिसंबर 2004 को डॉ. महुआ माजी मेरे घर पर अंतिम बार आईं. इसके बाद उनका आगमन ‘आश्रय’ में आज तक नहीं हो सका है. इस दौरान मैं 2005 में भयंकर रूप से अस्वस्थ हुआ. रीढ़ के रेशन की स्थिति पैदा हो गई. लेकिन मैं आपरेशन से बच गया. डॉ. शामसुंदर राणा ने मुझे अपनी चुंबक चिकित्सा से ठीक कर दिया. 13 सितंबर 2009 को डाल्टनगंज में एक किताब के लोकार्पण में बोलते हुए मुझे ब्रेन स्ट्रोक हो गया. इसके कारण मेरा जीवन और मेरा परिवार पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया. मगर डॉ. महुआ माजी ने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि मैं रांची में जिंदा हूं कि मर गया.

यहां मैं अपनी डायरी का पुनः उपयोग करना चाहता हूं-

बुधवार, 1 फरवरी 2006

महुआ माजी ने फोन किया. उसने शुभ सूचना दी कि उसका उपन्यास प्रकाशित हो गया है, पर अभी कुछ ही प्रतियां तैयार हो सकी हैं. दिल्ली पुस्तक मेले में उसका उपन्यास प्रदर्शित किया गया. वह अपने साथ केवल एक प्रति लेकर आई थी, जिसे खगेन्द्र ठाकुर ले गए हैं. जब और प्रतियां आएंगी तो वह मुझे एक प्रति दे जाएगी.

उसने यह 'शुभ संदेश' भी दिया कि आभार प्रदर्शन वाला भाग प्रकाशक ने हटा दिया. प्रकाशक ने हटा दिया तो महुआ ने विरोध क्यों नहीं किया? मैंने पांडुलिपि की भाषा ठीक की थी, यह मैं कैसे भूलूं? इसमें महुआ का क्या दोष है? उसने यदि ऐसा नहीं किया होता तब आश्चर्य की बात होती. ऐसा करके उसने प्रमाणित कर दिखाया है कि वह आधुनिक और व्यवहारकुशल है.

सोमवार, 13 मार्च 2006

शाम को डॉ. प्रियदर्शी से भेंट हो गई. उनसे पता चला कि महुआ ने अपना उपन्यास रणेंद्र आदि के अतिरिक्त उन्हें भी पहुंचा दिया है. यह काम पंद्रह दिन पहले संपन्न हो चुका है. डॉ. सिद्धनाथ कुमार को 27 फरवरी को उपन्यास मिल गया था.इन घटनाओं के आलोक में मैंने यह तय कर लिया है कि यदि यह औरत अब अपना उपन्यास मुझे देने के लिए आई तो मैं उपन्यास नहीं लूंगा. मैं स्पष्ट कह दूंगा कि मेरे जीवन में पहले से दुःखों का बहुत बड़ा खजाना जमा है. मैं नहीं चाहता कि मेरे पास अब कोई भी ऐसी चीज रहे, जो मुझे बराबर डंक मारने का काम कर सके.

रविवार 10 अप्रैल 2011 को रांची में रविभूषण ने मानविक, रानीगंज (पश्चिम बंगाल) के सहयोग से राधाकृष्ण जन्मशती राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था.इसे सफल बनाने के लिए संजय भालोटिया ने रविभूषण के साथ मिलकर अथक श्रम किया था.

शाम को संगोष्ठी समाप्त हो गई. अपनी अस्वस्थता के कारण मैं धीरे-धीरे अपनी पत्नी राज गोस्वामी के साथ गेट के बाहर निकला. मैं कोई रिक्शा देख रहा था. उसी समय महुआ माजी भीतर से गेट के बाहर निकलीं और हमें नमस्कार बोलकर वह रास्ते के उस पार खड़ी अपनी ओमनी में बैठकर चली गईं. उन्होंने रुककर हमसे इतना भी पूछना उचित नहीं समझा- कि आप लोग कहां जाना चाह रहे हैं? इस घटना ने मेरे हृदय पर एक मोटी लकीर बना दी. 

‘मैं बोरिशाइल्ला’ का मूल लेखक कौन था

राजकमल प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित ‘प्रकाशन समाचार’ (जनवरी, 2011) में ‘प्रख्यात युवा उपन्यासकार महुआ माजी से वार्ता’ का प्रकाशन हुआ.इसमें एक स्थल पर महुआ माजी ने कहा है कि-‘ऐसी ही किसी पत्रिका के संपादक की मांग पर किसी विशेषांक के लिए कहानी लिखने के दौरान एक व्यक्ति से साक्षात्कार लिया था.वह साक्षात्कार ही लगभग पचास पृष्ठों का हो गया था.मैंने सोचा, इसे थोड़ा विस्तार देकर उपन्यासिका का रूप दे दूं.पर जब इस पर काम करना आरंभ किया तो इस विषय की गंभीरता का अहसास हुआ और एक-एक कर न जाने कितने ही लोगों का साक्षात्कार लेती चली गई.उनके द्वारा बताई गई बातों के सत्यापन के लिए विभिन्न पुस्तकालयों तथा अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त दस्तावेजों को खंगाल डाला.पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण विषय से संबंधित जानकारियां भी काम आईं.'

महुआ माजी को यह भी बताना चाहिए था कि उन्होंने किसका साक्षात्कार लिया था, जो साक्षात्कार ही लगभग पचास पृष्ठों का हो गया और इसके बाद उन्होंने जिन व्यक्तियों के साक्षात्कार लिए, जिनके साक्षात्कार से उन्हें सहायता और सहयोग मिला वे कौन थे? महुआ माजी का कथन कुछ अबूझ किस्म का है.केवल एक जगह वह सच्चाई उगलती हैं, वह भी अनायास ही, जब वह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करती हैं.मगर, वे यह बताने का कष्ट कभी नहीं करतीं कि ‘मैं बोरिशाइल्ला’ का मूल लेखक कौन था और उसका नाम क्या था?

महुआ माजी जी, आप एक बात बताना भूल गईं (?).आपने यह क्यों छिपाया कि आपके परिवार के एक व्यक्ति ने आपको बांग्ला भाषा में लिखित एक अधूरी रचना दी थी और आपसे कहा था-‘अब मुझसे लिखना नहीं हो पाता है, हो सके तो इस अधूरे उपन्यास को पूरा कर देना.’ आप जिसे साक्षात्कार बता रही हैं, बात ऐसी नहीं है.‘मैं बोरिशाइल्ला’ के वह मूल लेखक थे और वह बांग्लादेश के निवासी थे.वह आपके परिवार के, कुटुंब के थे.आपने स्वयं इस तथ्य को डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के समक्ष प्रकट किया था. दुर्भाग्य से शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012 को उनका रांची में निधन हो गया और सच उनके साथ ही सदा के लिए विदा हो गया.

‘मैं बोरिशाइल्ला’ उपन्यास के पाठकों को यह अच्छी तरह पता है कि इस उपन्यास में कहां-कहां पर फांक है.इसके पूर्वार्द्ध में बांग्लादेश की मुक्ति की कथा आती है और उत्तरार्द्ध में बंबई (बेकरी कांड) तथा कलकत्ता की घटनाएं आती हैं.पूर्वार्द्ध में बांग्लादेश का जो चित्रण है, उसमें एक सधी हुई लेखनी के दर्शन होते हैं और उत्तरार्द्ध में कथानक को तोड़-जोड़ के सहारे आगे बढ़ाने की चेष्टा देखने को मिलती है.इस हिस्से में लेखक का वह लेखन-कौशल नहीं दिखाई देता है, पूर्वार्द्ध में जो दर्शनीय है.

‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’: शोधग्रंथ उपन्यास या उपन्यास शोधग्रंथ हुआ

महुआ माजी, मैं आपका बहुत-बहुत आभारी हूं, जो आपने अपने दूसरे उपन्यास की एक प्रति मुझे 15 अप्रैल 2012 को देने की कृपा की, दो किताबों के लोकार्पण समारोह के समापन पर.मेरे जी में आया कि मैं आपके उपन्यास को लेने से इनकार कर दूं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया.मैं इस आयोजन में कोई अप्रिय दृश्य उपस्थित नहीं करना चाहता था.मैंने अपने मन को मारकर आपका उपन्यास ले लिया.मगर, मैं यह कैसे भूल सकता हूं कि जिस उपन्यास (मैं बोरिशाइल्ला) की पांडुलिपि के प्रत्येक पृष्ठ पर मेरी उंगलियों के स्पर्श के चिह्न हैं, आपने मेरे उस परिश्रम के बदले में आभार का एक शब्द भी अपने उपन्यास में नहीं व्यक्त किया.ऊपर से आपने यह झूठ भी गढ़ दिया कि प्रकाशक ने इस अंश को हटा दिया.अगर यह सच भी है तो भी यह तो बताइए कि आपके जीवन में ऐसी कौन सी विपत्ति पैदा हो गई थी कि आप 5 दिसंबर 2004 के बाद ‘आश्रय’ का पता भी सदा-सदा के लिए भूल गईं? अब तो आठ वर्ष होने को हैं.यह क्या है? ऐसे व्यक्तियों के बारे में मेरे पिताजी एक कहावत बराबर सुना दिया करते थे-मतलब के यार, सड़किया के पार.

महुआ माजी जी, आप समाज विज्ञान से एमए, पीएचडी तथा नेट उत्तीर्ण हैं.अब आप दो बड़े-बड़े उपन्यासों की लेखिका हैं.आपको उपन्यास लिखने का भी अनुभव है और शोधग्रंथ लिखने का भी.पर क्या उपन्यास तथा शोधग्रंथ लिखने की पद्धति एकसमान होती है? क्या किसी रचनाकार को इतनी छूट भी मिल जाती है कि वह शोधग्रंथ और उपन्यास को मिलाकर एक नए प्रकार की खिचड़ी पका दे?

‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ को आपने भी उपन्यास (?) ही माना है और राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने भी इसे उपन्यास के रूप में ही प्रकाशित और बहुप्रचारित किया है.

उपन्यास में आपने एक ‘डिसक्लेमर’ भी दिया है, जो इस प्रकार है-‘इस उपन्यास में मरंग गोड़ा और वहां से जुड़े तमाम पात्र, स्थान, कंपनी, खदान, मिल, टेलिंग डैम, नदी, सभी प्रकार की घटनाएं, विचार, आंदोलन आदि काल्पनिक हैं.संगेन, चारिबा, आदित्यश्री, प्रज्ञा, मोमोका, मासायुकि, अरिना, जाम्बीरा, मेन्जारी, सुकुरमुनी, रेकोण्डा, लुड़थु, परगना, सचिव, सगेन की ताई, अभिषेक जैसे ढेर सारे पात्र बिल्कुल काल्पनिक हैं.उनका किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति कोई संबंध नहीं है.’

प्रश्न यह है कि ‘मरंग गोड़ा’ यानी ‘जादूगोड़ा’ नामक स्थान इस दुनिया में है कि नहीं, कि यह भी एक काल्पनिक जगह है, जिसका भूगोल में कोई अस्तित्व है ही नहीं? आपके डिसक्लेमर के अनुसार इस उपन्यास (?) के सारे पात्र, घटनाएं, आंदोलन, विचार, आदि सब कुछ काल्पनिक ही है तो इस उपन्यास के अंत में जिन पुस्तकों, पत्रिकाओं, लेखों आदि से विशेष मदद मिली उनमें से कुछ नाम देने की क्या उपयोगिता है? क्या इनकी सहायता से आप कोई मिथ्या जाल फैलाना चाहती हैं?

इस सूची के अंत में आप फिर लिखती हैं-‘ऊपर उल्लिखित तथा अनुल्लिखित ऐसी सभी कृतियों तथा उनके लेखकों के प्रति हार्दिक आभार, जिनसे यह उपन्यास समृद्ध हुआ और लेखन के दौरान विभिन्न परिस्थितियों को इतिहास, भूगोल, अतीत और वर्तमान के साथ गहराई से समझने में मुझे मदद मिली.’

यह आपने क्या कह दिया? एक ओर आप अपने उपन्यास (?) को पूरी तरह से काल्पनिक घोषित करती हैं और दूसरी तरफ आप यह भी कहती हैं कि ऊपर उल्लिखित तथा अनुल्लिखित ऐसी सभी कृतियों और लेखकों से आपको इतिहास, भूगोल, अतीत और वर्तमान को गहराई से समझने में मदद मिली?

आपके इस कथन के विरोधाभास का क्या अर्थ निकाला जाए? यहां मुझे एक घटना याद आ रही है.अपने शोध के क्रम में मुझे नेशनल लाइब्रेरी कलकत्ता जाना पड़ा.वहां रांची की एक युवती से भेंट हुई.उत्सुकतावश मैंने उससे पूछा-‘आपको यहां कैसे आना पड़ा?’ उसने बताया-‘मेरी पीएचडी की थीसिस तैयार हो गई है.मेरे गाइड ने पचास-साठ ग्रंथों के नाम बिब्लियोग्राफी में शामिल करने के लिए यहां भेजा है.’ उसका उत्तर सुनते ही मैं हंस पड़ा.मैंने हंसते हुए कहा-‘जब आपकी थीमिस तैयार हो ही गई है तो पचास-साठ ग्रंथों के नाम बिब्लियोग्राफी में शामिल करने की क्या जरूरत है? आपने अपनी थीसिस में जिन-जिन ग्रंथों का उपयोग किया है, उनकी पूरी जानकारी देना ही पर्याप्त है.इससे अधिक और ग्रंथों के नाम देने की कोई आवश्यकता नहीं है.’

सामान्यतः लोग इसी रीति से शोधग्रंथ तैयार कर लिया करते हैं.जिन ग्रंथों के नामों के उल्लेख की जरूरत नहीं होती, उनके नाम भी डाल दिए जाते हैं ताकि परीक्षकों को भी लगे कि शोधार्थी असली पढ़ाकू है.

महुआ माजी जी आपने भी इसी पद्धति से अपने कथित उपन्यास उर्फ शोधग्रंथ को तैयार कर दिखाया है!

1. आपने अब तक बांग्ला, अंग्रेजी, हिन्दी आदि भाषाओं के हजारों उपन्यास पढ़े होंगे.इनमें से अब तक ऐसे कितने उपन्यास आपको मिले हैं जिन पर यह लिखा गया है कि यह उपन्यास पूर्णतः काल्पनिक हैं?

2. आपने अपने और दूसरों के कई शोधग्रंथ भी देखे होंगे.आपको ऐसे कितने शोधग्रंथ मिले हैं जिनके ऊपर ही यह लिखा हो कि ये पूर्णतः काल्पनिक हैं?

आपका ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ हिन्दी का एक अद्भुत ग्रंथ है, जिसकी जाति या प्रजाति के बारे में पता लगाना भी एक अनुसंधान का और कठिन काम है.मेरे जानते यह हिन्दी का पहला ग्रंथ माना जाना चाहिए, जिसके प्रारंभ में ही एक डिसक्लेमर है कि इसमें जो कुछ भी है वह पूर्णतः काल्पनिक है.ग्रंथ के अंत में अनेक सुप्रसिद्ध लेखकों के नाम और उनके ग्रंथों के नाम भी शामिल किए गए हैं ताकि लेखिका के बारे में लोगों को लगे कि उसने कितना गहन अध्ययन करने का कष्ट उठाया है.

आपका ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ वास्तव में क्या है, इस पर बाद में विचार होगा.पहले आपकी इस बात की प्रशंसा की जानी चाहिए कि आप जब भी कोई काम करती हैं, तो आप बहुतों का सहयोग लेती हैं और कभी-कभी उनके नामों का उल्लेख भी करती हैं.कुछ लोगों को आप अपनी किताबें भी उपहार में देती हैं.मगर, यह आपकी पुरानी लत है कि जिनके प्रति सबसे पहले आपको कृतज्ञ होना चाहिए, आप उनके नाम ही भूल जाया करती हैं.आपकी सुविधा के लिए मैं ऐसे अभागे लोगों की एक तालिका दे रहा हूं जिसे आप अकृज्ञता-सूची का नाम भी दे सकती हैं-

1. ‘मैं बोरिशाइल्ला’ के मूल लेखक के नाम के प्रति सबसे पहले आपको आभार व्यक्त करना चाहिए था और उनके नाम का श्रद्धा के साथ स्मरण करना चाहिए था, लेकिन आपने उनके नाम को छिपाने का अक्षम्य अपराध किया है.

2. ‘मैं बोरिशाइल्ला’ की पांडुलिपि को सुधारने का काम जिस नाचीज श्रवणकुमार गोस्वामी ने किया, उसके प्रति आभार प्रकट करना तो बहुत दूर की बात है, आपने बेशर्मी से यह तक कह दिया कि मेरा नाम प्रकाशक ने ही हटा दिया.सच क्या है, इसकी जानकारी या तो आपको है या अशोक महेश्वरी को.इस उपन्यास का प्रत्येक पाठक यह अनुमान लगा सकता है कि इस मोटे उपन्यास की पांडुलिपि को सुधारने में मुझे कितना समय और श्रम लगाना पड़ा होगा.यहां तक कि आपने ‘मैं बोरिशाइल्ला’ की प्रति कहकर भी आज तक मुझे नहीं दी है.

3. ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ को तैयार करने में आपने इंटरनेट का भरपूर उपयोग किया है, लेकिन आपने इंटरनेट के प्रति कोई कृतज्ञता प्रकट नहीं की. इसकी जरूरत भी क्या है? इंटरनेट कोई व्यक्ति तो है नहीं कि जिसके प्रति आभार प्रकट करना आवश्यक हो? यदि आप इंटरनेट को गाली भी देंगी तो उस बेचारे पर कोई प्रभाव तो पड़ने वाला है नहीं!

4. ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ के सहारे आपने यह प्रमाणित करने का भरपूर प्रयास किया है कि आप ‘हो’ भाषा और संस्कृति की भी विशेषज्ञ हैं.मगर, आपने जिस डॉ. आदित्य प्रसाद सिन्हा से यह विशिष्टता प्राप्त की है, क्या आपने उन्हें अपने उपन्यास की प्रति दी है? उल्टे आपने उनके नाम को भी उलट-पुलट कर जारज बना दिया है.इस उपन्यास के दो पात्र हैं, परंतु आपकी दृष्टि में ये दोनों काल्पनिक हैं, लेकिन ये दोनों पात्र रांची के जीवित पात्र हैं-श्रीप्रकाश और आदित्य प्रसाद सिन्हा.इन दोनों प्रतिभाओं का आपने भरपूर उपयोग किया है.पता नहीं आपने किस अधिकार से आदित्य प्रसाद सिन्हा से ‘आदित्य’ को लिया और श्रीप्रकाश से ‘श्री’ को लेकर एक नए पात्र ‘आदित्यश्री’ को जन्म दे दिया.इसके बावजूद आप यह दावा करती हैं कि आपका उपन्यास पूर्णतः काल्पनिक है? क्या किसी साहित्यकार को जीवित पात्रों के नाम बदलने का भी ऐसा कोई अधिकार प्राप्त होता है?

दो उपन्यासों की विचलित नियति

आपके दोनों उपन्यास विचलन के गंभीर रूप से शिकार हैं.आपकी यात्रा शुरू से पूरब से पश्चिम की ओर बढ़ती नजर आती है, मगर वह यात्रा अपने निर्धारित पथ से विचलित हो जाती है.यह बात आपके पहले उपन्यास में भी देखी जा सकती है और दूसरे उपन्यास में भी.आपने मुद्दा उठाया विकिरण, प्रदूषण एवं विस्थापन से जूझते हुए आदिवासियों का और आगे बढ़कर आप प्रज्ञा, आदित्यश्री और मोमोका की प्रेमकथा लिखने लगती हैं.लगता है कि अपने से लक्ष्य से च्युत हो जाना ही आपके लेखन की नियति है.

आपके दूसरे उपन्यास का जिस शान-ओ-शौकत से लोकार्पण हुआ और उसमें जैसी बड़ी-बड़ी हस्तियां शामिल हुईं, उनके नाम के आतंक से काफी लोग आतंकित माने जा सकते हैं.जब कोई ऐसे आतंक से आतंकित हो जाता है, तो सबसे पहले वह अपने विवेक को त्यागकर आतंक के क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाता है.तब किसी के लिए यह निश्चित करना कठिन हो जाता है कि ‘वास्तव’ क्या है?

इस बात की पूरी-पूरी आशंका है कि इस उपन्यास (?) की पांडुलिपि को नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर ने शायद ही पढ़ने का कष्ट उठाया हो.इनमें से किसी के भी पास इतनी फुर्सत कहां होती है! पफर भी कृष्णा सोबती जी ने उपन्यास के आवरण यह अनुशंसा छपने दी ‘हर सचेत नागरिक के लिए मानवीय चिंताओं की शैल्फ पर एक जरूरी टाईटल.’ -कृष्णा सोबती ने गनीमत है कि यह नहीं कहा कि ‘हर सचेत नागरिक के लिए मानवीय चिंताओं की शैल्फ पर एक पठनीय तथा संग्रहणीय टाईटल.’ उन्होंने बड़ी चालाकी से अपनी अनुशंसा भी दे दी और अपने को बचा भी लिया.

महुआ माजी ने ‘डिसक्लेमर’ लिखकर इस रचना को न तो उपन्यास रहने दिया और न ही शोधग्रंथ (थीसिस).इस चालाकी का उपयोग करते हुए वे स्वयं भूल गईं कि आप दोधार वाली तलवार का प्रयोग कर रही हैं, जिसकी वजह से न तो आप उपन्यासकार कही जा सकेंगी और न ही शोधकर्ता.

आश्चर्य इस बात का है कि हिन्दी के प्रखर आलोचक नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और हिन्दी फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक एवं गीतकार तीनों व्यक्तियों ने मिलकर महुआ माजी के उपन्यास (?) ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ की पांडुलिपि को तीसरे राजकमल कृति सम्मान के लिए चुना और महुआ माजी को फणीश्वरनाथ रेणु पुरस्कार प्रदान किया.

राजकमल प्रकाशन एक प्रतिष्ठित प्रकाशन संस्था है.इसने प्रकाशन व्यवसाय के अंतर्गत ही इस कथित उपन्यास को छापा है.इसने अपना काम पूरा कर दिया.कृष्णा सोबती और जावेद अख्तर भी अब एक किनारे नजर आ रहे हैं.लेकिन एकमात्र ओनस (onus) डॉ.  नामवर सिंह पर आ जाता है कि अब वह बताएं कि-‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ यह कृति उपन्यास है तो कैसे या यह शोधग्रंथ है तो वह भी कैसे? उम्मीद है, मुमकिन है, शीघ्र ही हमारे सामने एक नए आलोचनाशास्त्र की कोई नई अवधारणा अवतीर्ण हो सके!

एक नए विवाद का सूत्रपात

वैश्वीकरण तथा बाजारवाद के इस युग में ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ के प्रकाशन से एक नए विवाद का सूत्रपात हो गया है.इस विवाद को जन्म देने वाली कुमाता का नाम है-मार्केटिंग.इस मार्केटिंग ने अशोक महेश्वरी, नामवर सिंह, कृष्णा सोबती, जावेद अख्तर और महुआ माजी सबको एक ही कतार में ला खड़ा किया है.

बाजार में बिजनेस मैनेजमेंट वालों की मांग बढ़ती जा रही है.बीबीए तथा एमबीए की उपाधि प्राप्त करते ही लोगों को अच्छी नौकरी मिल जाती है.मार्केटिंग विषय लेने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है.मार्केटिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि अपनी विज्ञापन शैली की सहायता से मार्केटिंग का विशेषज्ञ किसी भी उत्पाद को बेच सकता है और उसकी मांग को बढ़ा सकता है.मार्केटिंग विशेषज्ञ में यह गुण होता है कि वह चाहे तो गधे को भी घोड़ा बताकर बेच सकता है.ऐसा करने में ही उसकी सफलता और तरक्की निहित होती है.

मैं ऐसे रचनाकारों से यह निवेदन अवश्य करना चाहूंगा जो रातों-रात ख्याति के शिखर पर आरूढ़ होना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि केवल बुद्धि से ही सब कुछ प्राप्त करना संभव नहीं हो पाता है.बुद्धि से ऊपर एक और चीज भी होती है-विवेक.यदि आपने विवेक को पहचाना नहीं और उसका समुचित उपयोग करना नहीं जाना, तो आपकी कीर्ति बहुत देर तक कहीं टिक नहीं सकती.जो लोग जल्दी-से-जल्दी अपनी कीर्ति-पताका को सबसे ऊपर फहराने की कामना करते हैं, उन्हें जरा सब्र से काम करना चाहिए और साधना पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

सबको पता होता है कि बांस के ऊपरी सिरे पर ही कोई पताका फहराई जाती है.बांस जितना ऊंचा होता है, उस पर फहराने वाली पताका हवा के झोंकों के कारण फर्र-फर्र उड़ती रहती है, फलतः देखते-ही-देखते हवा के तेज झोंकों के कारण शीघ्र ही पताका चिंदी-चिंदी होकर हवा में गायब हो जाती है और आकाश में केवल एक लंबा बांस ही खड़ा दिखाई देने लगता है.जब कोई अपनी कीर्ति-पताका को फहराने के लिए ऐसे ही किसी बांस की सहायता लेता है तो उसका ऐसा ही अंत अवश्यंभावी हो जाता है और अंततः वह बांस भी सड़-गल कर हवा हो जाता है.

वास्तव में अपनी कीर्ति-पताका को फहराने के लिए किसी बांस की कोई जरूरत नहीं होती बशर्ते कि वह वास्तविक कीर्ति-पताका हो.ऐसी कीर्ति-पताका भूत, वर्तमान और भविष्य एवं सभी दिशाओं में सर्वदा फहरती रहती है.

मैंने इस लेख का प्रारंभ श्रीलाल शुक्ल के एक कथन से किया था और अब मैं उनके इसी कथन से इस लेख का समापन भी करना चाहता हूं-‘महान लेखक हमेशा बनते नहीं, बनाए भी जाते हैं.’

पुनश्च…

यदि कोई पाठक मेरी डायरी के संबद्ध अंशों की प्रामाणिकता को जांचना चाहे तो उसे यह सुविधा लेखक के द्वारा उपलब्ध करा दी जाएगी.

लेखक श्रवण कुमार गोस्वामी रांची में रहते हैं और वरिष्ठ उपन्यासकार हैं.


महुआ माजी के पक्ष में अभियान चला रहीं गीताश्री का पक्ष यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं… 

एकाध मामले कोर्ट में जाएं तो दिमाग ठिकाने आ जाएंगे

महिला रचनाकारों के चरित्र हनन का जवाब लाठी से दें

महआ माजी ने फोन करके कहा- अपने पक्ष में सुबूत खोज लिया

महुआ माजी ने फोन करके कहा- अपने पक्ष में सुबूत खोज लिया

Geeta Shree :  अभी अभी महुआ माजी ने फोन करके बताया कि उसने अपने पक्ष में तमाम सबूत खोज लिए हैं..अपने पात्रों को भी पाठको से मिलवाएगी..साथ ही साल 2002 में जिसका 50 पेज का इंटरव्यू लिया था, वह भी मिल गया है, पांडुलिपि भी मिल गई जिसमें कांट छांट की गई है, पांडुलिपि का रफ ड्राफ्ट भी मिल गया है..उपन्यास के पात्र नहीं चाहते थे कि उनका नाम सावर्जनिक हो लेकिन कुछ दुष्ट मानसिकता वालों ने जो तूफान खड़ा किया है इसमें पात्र मजबूरन उड़ कर सामने आ जाएंगे..

महुआ चुनौती दे रही है कि आप उसके तमाम दस्तावेजो की फोरेंसिक जांच करा ले..सच सामने आ जाएगा..फिर क्या होगा उनका..जो अपनी उपेक्षा से इतने खफा हैं कि पुराने साथी को चोर करार दे दिया..ना आरोप में दम ना लेखन में कोई करुणा..तब आपका क्या होगा जनाबेआली..  

(वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री के फेसबुक वॉल से)

अमित आर्या की नई पारी, सईद अहमद का इस्तीफा

 

खबर है कि इंडिया न्यूज नेशनल में अमित आर्या ने ज्वाइन किया है. वे पहले भी इंडिया न्यूज में काम कर चुके हैं. अमित कई चैनलों में विभिन्न पदों पर रहे हैं. अमित आर्या ने किस पद पर ज्वाइन किया है, यह पता नहीं चल पाया है. 

एक खबर मुंबई से है. रोजनामा राष्ट्रीय सहारा, मुंबई के रेजीडेंट एडिटर सइद अहमद ने इस्तीफा दे दिया है. अबकी उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है. वे पहले भी एक बार इस्तीफा दे चुके हैं. रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के नए ग्रुप हेड सैयद फैसल ने अबकी उनका इस्तीफा कुबूल कर लिया है. यह जानकारी सूत्रों ने दी है. 

श्रीनिवास पंत ने सी न्‍यूज एवं साक्षी ने इंडिया न्‍यूज ज्‍वाइन किया

चढ़दीकला टाइम टीवी से खबर है कि श्रीनिवास पंत ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अब सी न्‍यूज उत्‍तराखंड की जिम्‍मेदारी संभालेंगे. उन्‍हें सी न्‍यूज का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. इसके पहले भी श्रीनिवास आउटपुट हेड के रूप में सी न्‍यूज की जिम्‍मेदारी संभाल चुके हैं. माना जा रहा है कि श्रीनिवास चैनल को उत्‍तराखंड में मजबूती प्रदान करेंगे. श्रीनिवास टीवी100, वॉयस ऑफ नेशन, टाइम टीवी में कई महत्‍वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. उनकी गिनती अच्‍छे खोजी पत्रकारों में की जाती है. श्रीनिवास ने सी न्‍यूज से जुड़ने की पुष्टि की.

खबरें अभी तक से खबर है कि साक्षी ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी इंडिया न्‍यूज एमपी-सीजी से शुरू की है. साक्षी को रन डाउन प्रोड्यूसर के पद पर ज्‍वाइन कराया गया है. वे इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुकी हैं.

महिला रचनाकारों के चरित्र हनन का जवाब लाठी से दें

Geeta Shree : दोस्तों….वक्त आ गया है कि साहित्य में भी गुलाबी गैंग बनाएं और चरित्रहनन का जवाब लाठी से दे। ये लोग नहीं मानेंगे..इनकी पहचान जरुरी है और इन्हें महफिल में घुसकर ठोंका जाए. महिला रचनाकारों की पहचान किसी ना किसी की गर्लफ्रेंड के रुप में करने की मानसिकता पर लाठी बरसाई जाए या उन्हें कोर्ट में घसीटा जाए…लाओ सबूत..यों ही कुछ भी बोल देना और गौसिप करना…इन दिनों इस तरह की हिंसा कुछ ज्यादा ही बढ़ रही है…लानत है…इस पढ़े लिखे समाज पर..सारा साहित्य कबाड़ में डाल दो..जहां नजर इतनी कुंठित और धुंधली है..

Shailendra Jha : mam ye burai sahitya me hi kya har jagah hai, 3-4 pahle din ki baat hai, main bus stand par khada tha, bagal me ek ladki khadi thi, ek gadi wala aaya aur usse poocha, chalogi ? ladki kuchh bole usse pahle maine usko danta, kya akr rahe ho, to usne kaha sorry bhaisahab mujhe paata nahi tha apki gf hai ? bloody where this mentality will take us ? highly deplorable

Ilesh Shah  in dino samaj ki sabhyata sirf lsfjo tak ya fir samajik taur se sirf dikhavetak hi simit rah gai he…upar se sabhya dikhta ye samaj andar ki gandgi sabhyata ki aad me chhupaye gumta he….sahi he vakt he kuchh thosh kadam uthane ka tabhi aise log samaj ke samne nange hoge aur asli roop unka dikhai dega…
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Shailesh Kumar : atyant avshyak hai aisa karna.. Lekin pehal ko manch ki avashyakta hai.. Jagrukta behad jaruri hai.. Dekha jaaye to corporate hote samaj har shetra mein inka sehyog talasha jaana kabiliyat par swal hai.. Aise log kuchh bhi karte aur bolte hain.. Aise jog judte hai jo Swayam apni pehchan talashte hain.. Apas ki hod baji mein nuksan hota hai vishay aur vishaykar ko.. Jo kisi ki nazar mein nahin aata.

वरिष्‍ठ पत्रकार गीताश्री के फेसबुक वॉल से साभार.

छत्तीसगढ़ सरकार से न्यूज, प्रोग्राम, टिकर, स्पेशल पैकेज, साइड पैनल, लाइव के पैसे वसूलते हैं न्यूज चैनल

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार की जय जय करने के लिए मीडिया वाले खुद बिछ जाते हैं और इसके लिए जमकर पैसे वसूलते हैं. यही नहीं, ये मीडिया वाले पैसे लेकर नक्सलवादी आंदोलन के खिलाफ कवरेज भी करते हैं. छत्तीसगढ़ में रमन सरकार का साफ साफ इशारा है कि नक्सलियों के खिलाफ खबरें दिखाओ, और उस खबर के पैसे ले जाओ. इससे आप समझ सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली आंदोलन के खिलाफ जो दुष्प्रचार आपको प्रिंट, टीवी और वेब पर दिखता है, उसका 99 फीसदी हिस्सा पेड होता है. यानि भारी भरकम पैसे लेकर ये लोग नक्सली आंदोलन को बदनाम करने के लिए कहानियां गढ़ते-दिखाते हैं. 

पहले बात करते हैं सहारा समय की. इस न्यूज चैनल ने अपना सब कुछ बेच डाला है. न्यूज, प्रोग्राम, स्पेशल पैकेज, टिकर, लाइव.. सब कुछ बेच डाला है. इन सबका वह दाम वसूलता है. सरकार के पक्ष में न्यूज दिखाने का अलग रेट है. प्रोग्राम दिखाने का अलग रेट है. स्पेशल पैकेज दिखाने का अलग रेट. टिकर का अलग रेट. लाइव का अलग रेट. सोचिए, किस तरह संपादकीय विभाग का एक एक कंटेंट बिका हुआ है. 

सहारा समय ने छत्तीसगढ़ सरकार को लिखित प्रपोजल दिया है कि वह प्रति मिनट तीन हजार रुपये के हिसाब से सरकार की जय जय करने वाले समाचार, प्रोग्राम प्रतिदिन पंद्रह बार प्रसारित करेगा और इसका साल भर के हिसाब से सवा तीन करोड़ रुपये से ज्यादा लेगा. यह प्रपोजल 2010-11 में दिया गया. सहारा समय ने पांच सूत्रीय अपने इस प्रस्ताव को छत्तीसगढ़ सरकार के पीआर डिपार्टमेंट को सौंपा था.

इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि रमन सिंह जहां कहीं भी भाषण देंगे, वहां सहारा समय की ओबी वैन जाएगी और लाइव प्रसारण दस मिनट तक किया जाएगा. प्रत्येक महीने में ऐसा चार प्रसारण होगा और प्रति प्रसारण एक लाख रुपये के हिसाब से साल का 48 लाख रुपये लिया जाएगा. खबरों, प्रोग्रामों, लाइव, साइड पैनल के अलावा सहारा समय का टिकर भी बिकाउ है. सहारा समय ने छत्तीसगढ़ सरकार को प्रस्ताव दिया कि सरकारी योजनाओं के प्रति जनता को जागरूक करने के लिए प्रत्येक दिन दस घंटे इससे संबंधित समाचार को टिकर (टीवी पर स्क्रीन के नीचे लिखित में चलने वाली खबरों की पट्टी) के जरिए प्रसारित किया जाएगा. इनमें से पांच घंटे प्राइम टीवी की अवधि के दौरान होंगे. इसका पैसा लगेगा साठ लाख रुपये सालाना.

सहारा समय ने तो स्पेशल पैकेज तक बेच डाला. प्रति महीने दो स्पेशल पैकेज साल भर तक दिखाने के लिए सहारा समय ने पचास लाख रुपये की मांग की. अपने प्रस्ताव में सहारा समय ने कहा है- “The channel will do a half-hour story on government schemes that have made a mark nationally, and how well Central schemes are being implemented in Chhattisgarh, and telecast it on its national, NCR and MP-Chhattisgarh channels. Schemes of the honourable CM will be presented in a better manner on the channel. Cost: Rs 50 lakh per year for two programmes a month.”

पांच सूत्रीय प्रस्ताव का पांचवां प्रस्ताव साइड पैनल को बेचने का है. इस पांचवें प्रस्ताव में साइड पैनल की व्याख्या की गई है. इसमें कहा गया है कि टीवी स्क्रीन का तीस फीसदी जगह घेरने वाले स्ट्रिप में रमन सिंह की सुंदर फोटो दिखाई जाएगी, किसी बच्चे या सुंदर नारे के साथ, ताकि उनकी अच्छी छवि बन सके. लेकिन इसके बदले में साल का साढ़े चौदह लाख रुपया लिया जाएगा. 

यह सारा खुलासा इंडियन एक्सप्रेस ने किया है. छत्तीसगढ़ में मीडिया के हाल और रमन सिंह की चाल पर इंडियन एक्सप्रेस में एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट छपी है. इस रिपोर्ट को पढ़ लेने से समझ में आ जाता है कि आज मीडिया की स्थिति क्या है और सत्ता किस तरह गलत चीजों को सही और सही को गलत स्थापित करने के लिए पालतू मीडिया का सहारा लेता है. इस रिपोर्ट से पता चलता है कि संपादक अब विज्ञापन मैनेजर हो गए हैं और उनका काम सरकारों से कंटेंट की डील करना हो गया है. इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित पूरी रिपोर्ट के लिए रिपोर्टर आशुतोष भारद्वाज को बधाई. पूरी रिपोर्ट नीचे है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Express exclusive: BJP's Raman Singh Chhattisgarh govt pays for all TV news that is fit to buy

Ashutosh Bhardwaj

Raipur, Fri Dec 07 2012

In May 2010, Hindi TV channel Sahara Samay presented a five-point proposal to the public relations department of the Chhattisgarh government about covering government activities during 2010-11:

1. Two-minute special package: Sahara Samay will show the package 15 times a day during news bulletins. It will contain “CM’s speeches, government policies, and special news related to various departments.” Cost: Rs 3.28 crore per year at Rs 3,000 per minute.

2. Live telecast of CM’s public meetings: “Whenever the chief minister makes a visit or addresses any meeting anywhere in the state, Sahara Samay will deploy its OB (Outdoor Broadcast) van and telecast the programme live for 10 minutes.” Cost: Rs 48 lakh per year for four broadcasts every month costing Rs 1 lakh each.

3. Ticker: People will be made aware of various government schemes for 10 hours a day, five of those hours during prime time. Cost: Rs 60 lakh per year.

4. Special package: “The channel will do a half-hour story on government schemes that have made a mark nationally, and how well Central schemes are being implemented in Chhattisgarh, and telecast it on its national, NCR and MP-Chhattisgarh channels. Schemes of the honourable CM will be presented in a better manner on the channel.” Cost: Rs 50 lakh per year for two programmes a month.

5. Side panel: “It’s a strip that will be displayed on 30 per cent of the screen and will carry a beautiful picture of CM Raman Singh with children and nice slogans.” Cost: Rs 14.6 lakh per year.

The proposals did not raise any eyebrows at the PR department, even though a leading news channel was quoting a price for covering the government and not to produce sponsored programmes or advertorials. After all, such arrangements had been in vogue for at least three years and this was not the first time a TV channel had sought to enter into a coverage deal with the government. Sahara Samay and the department haggled over the rates before the proposals were approved.

The Indian Express is in the possession of nearly 200 such documents of Chhattisgarh's PR department and letters from senior editors of TV channels that chronicle a flagrantly unethical relationship between the state and its leading private TV channels. The documents cover a span of about five years starting 2007 and contain proposals from channels to produce “news stories” and “provide positive coverage of government programmes”, price negotiations and approvals, among others.

Those involved in such deals include Z24, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh and Sadhna News, Chhattisgarh's main TV channels, besides some smaller, local networks. Z24 is a franchisee of Zee News. While its reporters are recruited locally, its editor Abhay Kishore is deputed by Zee News. The cost of such programmes can range from Rs 4 lakh to Rs 1.1 crore.

The documents show that Raman Singh's BJP government, which has ruled the state since 2003, has paid for favourable news stories and live coverage regularly. This includes government welfare programmes, planting of trees in Naya Raipur, distribution of subsidised rice to the poor, the Commonwealth Games Queen's Baton Relay, disputes pending in courts and even to generate public reaction to welfare programmes – “five persons in each district with 30 seconds for every reaction”, as one deal said.

No event is apparently sacrosanct for such transactions, be it the Republic Day or Independence Day speeches of government leaders, the state budget presentation or even food distribution in the tribal district of Bastar by visiting BJP Leader of the Opposition in the Lok Sabha, Sushma Swaraj. And most of these programmes do not say they are sponsored or paid for by the government and pass off as regular programming by the independent, private TV channels.

However, N Baijendra Kumar, an IAS officer who is the commissioner of the PR department, said it is an insult to claim that journalists can be bought. “We undertake sponsored programmes to showcase our success stories. We get our stories done, be it spots, features or documentaries as advertisements. There is nothing paid news about it, nothing hidden about it. Everything is in white, duly recorded and accounted,” he said.

Referring to TV channels being funded for some of their Naxal reports, Kumar said this was required to counter Naxal propaganda. “The urban network of Naxals is able to use the media to support them and their ideologies. Human stories of Naxal violence and efforts of government officers often go unreported, so we get these done,” he said.

Z24 editor Abhay Kishore said it was wrong to call this arrangement paid news. “It is mere selling of slots. We do not give wrong information to readers. It does not matter who is funding the story as long as it is genuine,” he said. “The term paid news is coined by the national media without understanding the concerns of regional media. We have to evolve new forms of revenue as it is a challenge to sustain TV journalism. This market is highly localised and therefore has less advertising. There is no corporate advertising. Hence we have to approach the government. We do not surrender but let them use our platform for development stories. We are number one here for the last three years and it would not have been so if it were for paid news. We have run several stories against the government.”

ETV's Chhattisgarh bureau chief Manoj Singh Baghel said it is “absolutely incorrect” to say that his channel produces news stories about the success of the Chhattisgarh government and broadcasts them as reports. “In fact, success stories of Chhattisgarh government, released by the public relations department are shown on the channel, but only as advertisement or sponsored items. There is always a clear understanding between the public relations department and all the channels, including ETV, that success stories are being released as advertisements,” Baghel claimed.

Sanjay Shekhar, Chhattisgarh bureau chief of Sadhna News, said “government advertisements” came in two forms. “They give us produced items or ask our marketing teams to produce them for which we charge an amount. Of late, the latter category has increased,” he said.

Sahara Samay refused to comment.

Political and media observers in the state trace the phenomenon to the assembly elections of 2003 when media houses and politicians, led by the then Congress government, entered into “sponsored news” deals. The relationship was apparently low-key until Raman Singh's government began investing heavily in marketing itself and media companies began diversifying into power, steel and real estate, leading to both sides finding a mutual need.

The state government's financial records show that until 2007, small, local firms were hired to produce documentaries and promotional features and these were given to news channels to broadcast. Subsequently, the government directly asked the channels to produce “news stories”. The consenting relationship between the establishment and the media had its teething troubles and ugly spats would sometimes spill out into the open. For instance, the government had last year publicly accused ETV of resorting to paid news and blackmailing.

Over the years, however, the government and the channels seem to have ironed out the glitches in their relationship and even come up with explanations and justifications for crossing the line, the observers said.

‘MANUFACTURED NEWS’

Some examples of the Chhattisgarh government’s PR

department paying TV channels for favourable coverage, and proposals from channels for paid coverage:

In March 2010, Z24 produced a report titled ‘Jenelia Ki Lal Kahani’ or ‘Jenelia’s Red story’ after Bastar police arrested a woman named Jenelia on suspicion that she was a Maoist. The report was produced even before the woman’s interrogation could be completed and the police could establish she was indeed a Maoist extremist. Z24 submitted a CD containing the report and a copy of the script, along with the CD of another story, to the PR department and demanded Rs 10 lakh plus service tax. Officials paid them Rs 4 lakh saying “the channel did not repeat the programme on prime time. Also, most of it was file footage”.

In February 2011, Sahara Samay proposed producing a “special programme focusing on how various government departments facing Naxal challenge are running development activities”. Cost: Rs 25 lakh plus service tax for programme “to be aired on national channel, NCR channel, MP-Chhattisgarh, Bihar-Jharkhand and Uttarakhand channels on 12 occasions.” A March 3 order gave permission to “produce and telecast special programmes on Naxalism”.

In May 2011, Leader of the Opposition in the Lok Sabha, Sushma Swaraj, visited Bastar to inaugurate a chana distribution programme. Z24, Sahara Samay, ETV Chhattisgarh and Sadhna News telecast the programme live and produced “special stories”. Cost: Rs 14.26 lakh.

In 2011, payment of Rs 25 lakh to four major TV channels approved for “live coverage of state budget and special stories”.

In 2009, payment of Rs 10 lakh to Z24 approved to “promote government schemes on the occasion of the channel’s first anniversary”. However, “since it could not be broadcast due to the model code of conduct of civic and panchayat elections,” the channel was instead asked to “produce 20-25 success stories”.

In 2008, Sadhna News covered Chief Minister Raman Singh's visit to Rajnandgaon live for an hour and broadcast a two-minute report 20 times. Cost: Rs 10 lakh.

On July 28, 2009 bills worth Rs 7.76 lakh cleared for “soft stories on Naveen Mukhyamantri Khadyaan Sahayata Yojana produced by ETV, Sahara Samay and Sadhna News”.

On April 1, 2010, ETV proposed to produce phone-in programmes 'Hello CM' and 'Hello Minister' in which the chief minister and other ministers reply to questions from the public. Cost: Rs 1.1 crore plus service tax.

In August 2009, ETV proposes to “produce stories on welfare schemes and run them five times a day for a month”. Cost: Rs 30 lakh plus service tax.

Sahara Samay proposes a 3-minute live telecast of CM’s Independence Day speech for Rs 5 lakh plus service tax. The channel also proposed to “produce 2-minute stories on CM's speech for two days on 16 occasions, eight each on prime and non-prime time”.

In April 2010, Z24, Sahara Samay, ETV and Sadhna News proposed doing “special stories” about 'Kamal Vihar', a controversial housing project of the Raipur Development Authority which has now landed in the high court. Cost: Rs 4 lakh to Rs 20 lakh.

In February 2010, Sahara Samay proposed producing reports on government schemes for SCs/STs with reactions from “five persons in each district with thirty seconds for every reaction”. In another proposal, the channel offers to get “reactions of public and experts on the government’s performance in two years”.

In February 2010, ETV proposes to earmark “a special slot for Republic Day jhanki (tableaux) eight times in two days”.

In March 2010, Sadhna News proposes to produce a “special bulletin of 30 minutes to broadcast positive aspects of government welfare schemes”.

पंजाब की शक्ति का हेडक्‍वार्टर भी होने लगा खाली

 

दैनिक जागरण व दैनिक भास्‍कर को बाहरी अखबार बताकर पंजाब में उतरे पंजाब की शक्ति का लुधियाना हेडक्‍वार्टर भी खाली होने लगा है। अमृतसर, जालंधर, लुधियाना व बठिंडा कार्यालय के साथ पूरे मालवा में कामकाज ठप हो चुका है। अब पिछले एक सप्‍ताह से लुधियाना के बीआरएस नगर में खुला शक्ति का कार्यालय खाली खाली पड़ा है। 
 
बताया जा रहा है कि डेस्‍क का अधिकांश स्‍टाफ छुट्टी पर जा चुका है। डेस्‍क के स्‍टाफ को अफवाहों पर ध्‍यान न देकर काम की सलाह देने वाले भास्‍कर छोड़कर चीफ सब एडिटर के तौर पर पंजाब की शक्ति ज्‍वाइन करने वाले बलराज मोड खुद घर बैठकर अपने फैसले के वक्‍त को कोस रहे हैं। लुधियाना व अमृतसर में फील्‍ड में काम कर रहे दूसरे अखबारों में काम तलाश रहे हैं। बताया जा रहा है कि दैनिक भास्‍कर व दैनिक जागरण छोड़कर अधिक रुपयों की उम्‍मीद में पंजाब की शक्ति ज्‍वाइन करने वाले डेस्‍क व फील्‍ड कर्मचारियों का करियर बर्बाद हो गया है और वह इस सदमे से उबर नही पा रहे हैं। 
 
अखबार के एमडी राजेश शर्मा और संपादक नवीन गुप्‍ता के चक्‍कर में करियर बर्बाद करने वाले कर्मचारी अब खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। पता चला है कि अखबार की लांचिंग से अब तक जुडे किसी भी कर्मचारी को एमडी राजेश शर्मा ने जेब से फूटी कौड़ी नहीं दी। बाजार में बुकिंग का जो लाखों रुपया जमा हुआ, उसी से सामान, खरीदकर दफ्‍तर सजा दिया गया। यह भी बताया जा रहा है कि संपादक नवीन गुप्‍ता व दूसरे कई वरिष्‍ठों को खुद वेतन नहीं मिला है और वह फील्‍ड में सप्‍लीमेंट निकालकर अपने वेतन का जुगाड़ करने वाले फील्‍ड जर्नलिस्‍टों से पहले मान-मनौव्‍वल और अब कोर्ट केस व कंपनी के नियम कानून समझकर रुपये निकालने के चक्‍कर में लगे हुए हैं ताकि उनके पल्‍ले कुछ पड़ सके। 
 
बाजार में मोटी बुकिंग के बावजूद अखबार न आने से पाठक भी खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। जिला स्‍तरों पर टीम काम छोड़ चुकी है और अगर कोई पाठक सर्कुलेशन इंचार्ज, संपादक और एमडी के फोन पर कॉल करता है तो कोई फोन ही नहीं उठाता। बताया जा रहा है कि मालवा व माझा क्षेत्र में बुकिंग ज्‍यादा थी, इसलिए पाठक अब पुलिस कंपलेंट और कोर्ट केस का मन बना रहे हैं। यह भी पता चला है कि बुकिंग करने वाले पत्रकारों से वह कोर्ट और पुलिस के पास पाठकों के हक में बयान देने के लिए फोन पर टाईअप कर रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर एमडी राजेश शर्मा और संपादक नवीन गुप्‍ता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और दोनों पर जल्‍द से जल्‍द दोबारा अखबार बाजार में लाने का दबाव बन रहा है।

ब्‍लैकबेरी व सैमसंग टैब के तले दबी पत्रकारों की बेइज्‍जती

 

: कानाफूसी : पंजाब के डिप्‍टी चीफ मनिस्‍टर सुखबीर बादल का बठिंडा में सभी पत्रकारों की मौजूदगी में प्रेस क्‍लब के प्रधान एसपी शर्मा को पत्रकारों की पॉपुलेशन बढ़ने की बात कहकर ताना मारने और इनकी फैमिली प्‍लांनिंग करने की बात कह बेइज्‍जत करने पर उनकी चुप्‍पी कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है। बताया जा रहा है कि दीवाली के मौके पर सत्‍ताधारी दल की तरफ से बठिंडा के पत्रकारों को ब्‍लैकबेरी और सैमसंग टैब मोबाइल गिफ्‍ट किए थे। साथ में काजू की टोकरी और शराब की पेटी भी दी गई। 
 
बतया जा रहा है कि यह सौगात भी इन्‍हीं उपरी दर्जे के लोगों को मिली जो सुखबीर के समक्ष प्रेस वालों की फैमिली प्‍लानिंग की बात पर जोरदार ठहाके लगा रहे थे। यह भी पता चला है कि डिप्‍टी चीफ मनिस्‍टर इससे पहले पत्रकारों को शराबी और क्रिमिनल तक कह चुके हैं। वह भी बठिंडा में अपने गांव जाने वाले पुल के उदघाटन के समागम के दौरान अगस्‍त माह में। बताया यह भी जा रहा है कि बठिंडा में कुछेक पत्रकार सरकारी आशीर्वाद से सस्‍ती आवासीय व खान-पान की सुविधा का भी लुत्‍फ उठा रहे हैं। जिस वजह से वह सुखबीर की बातों पर बुरा मानने और विरोध करने की जगह दांत निकालकर ठहाके लगाते रहे।

बीबीसी हिंदी के संपादक बने निधीश त्‍यागी

बीबीसी हिंदी से बड़ी खबर आ रही है. इसके नए संपादक निधीश त्‍यागी बनाए गए हैं. बीबीसी के लोगों ने इसकी आधिकारिक पुष्टि कर दी है और इस बाबत बीबीसी हिंदी में आंतरिक मेल भी जारी कर दिया गया है. निधीश अगले साल जनवरी में बीबीसी हिंदी में अपना पद ग्रहण कर लेंगे. बीबीसी ने हिंदी के संपादक के लिए बीते सितम्‍बर महीने में आवेदन मांगा था. 

 
निधीश के आने के साथ ही नील करी के जाने की चर्चाएं भी चल रही हैं. नील को अमित बरुआ के जाने के बाद अस्‍थाई तौर पर जिम्‍मेदारी सौंपी गई थी. संपादक बनने की होड़ में हालांकि राजेश प्रियदर्शी, ब्रजेश उपाध्‍याय, जुबैर अहमद, रूपा झा को भी माना जा रहा था, परन्‍तु बीबीसी प्रबंधन ने इन लोगों को इस लायक नहीं समझा. उसके पीछे कारण आंतरिक राजनीति को बताया जा रहा है. इनके अलावा रेस में राजेश कालरा, ज्‍योति मल्‍होत्रा, संजीव श्रीवास्‍तव, भारत भूषण, वीजे थापा, सुपर्णा सिंह के नाम भी शामिल थे. लेकिन बाजी निधीश त्‍यागी के हाथ लगी है. 
 
निधीश पिछले दो दशक से मीडिया में सक्रिय हैं. वे फिलहाल भास्‍कर के डिजिटल विंग के प्रमुख के रूप में कार्य कर रहे हैं. भास्कर के साथ यह उनकी दूसरी पारी थे. वे पहले भी भास्कर में चंडीगढ़ एडिशन के संपादक के रूप में जुड़े रहे हैं. इसके पहले उन्होंने द ट्रिब्‍यून, पुणे मिरर समेत कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दी हैं. इस संदर्भ में जब निधीश त्‍यागी से बात करने के लिए फोन किया गया तो उन्‍होंने कॉल रिसीव नहीं की.  

खबरें अभी तक में डिप्‍टी आउटपुट एडिटर बने लोकेश सिंह

करीब पांच साल तक टोटल टीवी के साथ जुड़े रहे लोकेश सिंह अब खबरें अभी तक में डिप्‍टी-आउटपुट एडिटर का काम सम्‍हालेंगे। टोटल टीवी से शुरुवात करने वाले लोकेश सिहं आउटपुट से अपना कैरियर शुरू किया था। इसके बाद टोटल टीवी में ही राजनीतिक संवाददाता के रूप में भी काम किया, जिसमें कई महत्‍वपूर्ण मंत्रालयों के साथ नेशनल बीजेपी बीट कई वर्ष बहुत करीब से देखते रहे। इसके बाद वो दैनिक हिन्‍दी पेपर राष्ट्रीयय स्‍वरूप के सीनियर संवाददाता के पद पर काम किया।

अब खबरें अभी तक के नए एडिटर इन चीफ विनोद मेहता की टीम के साथ जुडकर अपनी नई पारी की शुरूवात कर रहे है। जिन्‍हे डिप्‍टी- आउटपुट के साथ कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां सौपी गई है। इन्‍हें विनोद मेहता का नजदीकी माना जाता है। समझा जा रहा है कि टोटल टीवी से कई और लोग खबरें अभी तक की टीम में शामिल होंगे। 

विज्ञापन मुक्‍त दो चैनल ला रहा है एचबीओ!

भारत में पहली बार एचबीओ एशिया दो नए प्रीमियम मूवी चैनल शुरू करेगी, जो सब्सक्रिप्शन मॉडल पर उपलब्ध कराए जाएंगे। संभवत: दो चैनल एचबीओ डिफाइंड और एचबीओ हिट्स शुरू करने जा रही कंपनी डिजिटलीकरण कार्यक्रम पर दांव लगाने जा रही है और प्रीमियम खंड में उतरकर बढ़त बनाना चाहती है। कंपनी ने दो विज्ञापन मुक्त चैनलों के कंटेंट के लिए इरोस इंटरनैशनल के साथ साझेदारी भी की है। दोनों चैनलों के लगभग 30 फीसदी कंटेंट हिंदी फिल्मों (इरोस द्वारा उपलब्ध) के होंगे, जबकि बाकी कंटेंट पैरामाउंट और टाइम वार्नर जैसे हॉलीवुड स्टूडियोज से मिलेंगे।

ये चैनल स्टैंडर्ड और हाई-डेफनिशन दोनों में उपलब्ध होंगे। दोनों चैनल हिंदी में भी उपलब्ध कराए जाएंगे और भविष्य में उन्हें कई भाषाओं में भी उपलब्ध कराने की योजना है। एचबीओ-इरोस का गठजोड़ एचबीओ के भारत के वर्तमान प्रारूप के विकास पर भी काम करेगा, साथ ही भारतीय टेलीविजन बाजार और अंतरराष्ट्रीय वितरण के लिए मूल कंटेंट भी विकसित करेगा। अभी तक लॉन्च की तारीख और उसके मूल्यांकन को अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

एचबीओ एशिया के सीईओ जोनाथन स्पिंक ने कहा कि वे फिलहाल चैनल के प्रसारण के लिए कई डीटीएच और डिजिटल केबल कंपनियों के साथ बात कर रहे हैं। स्पिंक ने कहा, 'हम दोनों चैनल 100 रुपये प्रति घर मासिक की दर पर उपलब्ध कराएंगे।' यह शुल्क दो चैनलों के लिए ज्यादा तो नहीं है? इस पर स्पिंक ने कहा कि भारत में मनोरंजन बेहद सस्ता है। उन्होंने कहा, 'इन चैनलों के लिए यह बिल्कुल सही समय है क्योंकि उपभोक्ता अमीर हो रहे हैं और सही कंटेंट के लिए वह शुल्क देने की इच्छा रखते हैं। इस समय वे जो शुल्क दे रहे, वह बेहद कम है। कुछ एशियाई बाजारों में एचबीओ चैनल 10 डॉलर प्रति महीने की दर पर उपलब्ध हैं।' (बीएस)

महिलाओं की लड़ाई लड़ने के लिए इस अखबार को निकालती हैं महिलाएं

आर्थिक रूप से पिछड़े हुए तबके की महिला होने के नाते ग्रामीण इलाके में एक समाचार पत्र स्थापित करना कितना मुश्किल था? 'खबर लहरिया' की 40 वर्षीय प्रधान संपादक मीरा से मैंने यही सवाल किया। उन्होंने एक शिक्षक की तरह जवाब दिया, 'उतना ही मुश्किल जितना दुनिया में कहीं भी किसी भी अन्य पत्रकार के लिए हो सकता है। फिर भी कहा जाता है कि पत्रकारिता आसान है।' लेकिन यह उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित बुंदेलखंड है जो देश के सबसे पिछड़े  इलाकों में से है। यहां का समाज बिलकुल अलग है, राजनीतिक और आर्थिक शक्तियां भी ऐसी हैं कि यहां किसी संवाददाता के लिए काम करना आसान नहीं है। इस इलाके से खबर निकालने का मतलब है शक्तिशाली राजनीतिज्ञों से लोहा लेना।

जाहिर है ऐसे अखबार के लिए बहुत कम गुंजाइश बनती है जो पूरी तरह दलित, मुस्लिम और आदिवासी समुदाय की महिलाएं चलाती हैं। अखबार की एक क्षेत्रीय संपादक ने कहा, 'हमने खुद के लिए एक अलग तरह का अखबार शुरू किया। इसकी शुरुआत वर्ष 2002 में की गई थी। आप यकीन करें, हम 'पेड न्यूज' के बिलकुल खिलाफ हैं। हम ऐसे विज्ञापन लेने से भी मना कर देते हैं, जिनकी सामग्री हमारी नीतियों के खिलाफ होती हैं।' जब एक स्थानीय गुंडे ने अपनी हथियारों की दुकान का विज्ञापन देने के लिए खबर लहरिया से संपर्क किया तो हमने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। आठ पृष्ठों वाली साप्ताहिक पत्रिका 'बुंदेली फॉर न्यूज वेव्स' दिल्ली स्थित जेंडर एवं शिक्षा केंद्र 'निरंतर' के दिमाग की उपज है, जिसकी शुरुआत क्षेत्र में साक्षरता के प्रयोग के तौर पर की गई थी।

निरंतर की परियोजना समन्वयक दिशा मलिक कहती हैं, 'हमने महसूस किया कि यहां की महिलाएं साक्षर हैं, लेकिन उनके पास पढऩे लायक सामग्री कम है।' वे राष्ट्रीय अखबारों के क्षेत्रीय संस्करणों के साथ भी खुद को नहीं जोड़ सकती थीं क्योंकि भाषाई दिक्कत आती है। ऐसे अखबारों में उनकी समस्याओं पर भी कम ध्यान दिया जाता था। इन नव साक्षरों की जरूरतें पूरी करने का बुंदेली और बज्जिका जैसी स्थानीय भाषाओं में निकलने वाला अखबार एकमात्र उपाय नजर आया। इसकी शुरुआत आठ महिलाओं ने मिलकर की थी, लेकिन अब वे बढ़कर 29 हो गई हैं। ये महिलाएं खबरें लिखने समेत अखबार के सभी काम करती हैं।

उन्हें कंप्यूटर की बुनियादी जानकारी दी गई है, वे लेआउट बनाने, डिजाइन तैयार करने और तस्वीरों को जरूरत के हिसाब से तैयार करने के लिए एडोबी पेजमेकर और फोटोशॉप का इस्तेमाल करती हैं। कंप्यूटर पर तैयार अखबार के पन्ने प्रिंट के लिए चले जाने के बाद ये महिलाएं ही विपणन एजेंट का काम भी करती हैं। वे उत्तर प्रदेश के चित्रकूट, बांदा एवं महोबा और बिहार के सीतामढ़ी जिले के 700 गांवों के लगभग 30,000 पाठकों तक अखबार पहुंचाने की व्यवस्था करती हैं। काम यहीं खत्म नहीं होता, संवाददाताओं को विज्ञापन भी लाना होता है और डिजाइन भी तैयार करना होता है। इसमें राष्ट्रीय राजनीति को बहुत कम तरजीह दी जाती है।

पहले चार पृष्ठों पर भी स्थानीय गांवों और जिलों से संबंधित खबरों की प्रमुखता रहती है। इन खबरों का जोर मनरेगा और मिड डे मिल जैसे कार्यक्रमों पर रहता है। ज्यादातर छोटे प्रकाशनों के संवाददाताओं पर हल्के-फुल्के फायदे के लिए काम करने के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन खबर लहरिया के वरिष्ठ पत्रकार यह सुनिश्चित करती हैं कि ऐसी शिकायत न आए। इन दलित महिलाओं को अखबार की नौकरी से खुद को सशक्त बनाने और अपने तरीके से जीने में मदद मिली है। संवाददाताओं को 4,000-12,000 रुपये वेतन मिलता है। शिवदेवी दो वर्ष पहले शादी के हिंसक बंधन से मुक्त होने के बाद इस अखबार से जुड़ी थीं। अखबार की सबसे युवा संवाददाता 19 वर्षीय सुनीता पहले पत्थर खदान में काम करती थीं। पति से अलग रहने वाली लक्ष्मी कहती हैं, 'रिपोर्टिंग करने से हमारा आत्मविश्वास बढ़ा है।' उन्होंने अपने दो बच्चों को मायके भेज दिया है, ताकि काम पर ध्यान दे सकें।

शुरुआत में 'निरंतर' ऐसी महिलाओं की मदद करता था, घरेलू प्रताडऩा सहती थीं। उनके पति नहीं चाहते थे कि बीवियां देर रात तक काम करें। दिशा कहती हैं, 'लेकिन कई ऐसी संवाददाता भी हैं, जो परिवार की एकमात्र कमाऊ हैं और ज्यादातर के पति उनका साथ देते हैं।' अखबार की कीमत 2 रुपये है, जिससे मुनाफा नहीं होता और विज्ञापन भी नहीं मिलता है। स्थानीय ब्रांड भी विज्ञापन नहीं देते हैं। ज्यादातर विज्ञापन गांव के प्रधान, ब्लॉक स्तर के अधिकारियों, छोटे दुकानदारों और व्यापारियों की तरफ से दिए जाते हैं, जिनके लिए 200 रुपये से लेकर 5,000 रुपये तक भुगतान किया जाता है। इससे खबर लहरिया के अस्तित्व को गंभीर चुनौती आई है। अखबार के हर संस्करण पर सालाना 20 लाख रुपये का खर्च आता है और वितरण और विज्ञापन राजस्व से लगभग 96,000 रुपये की ही आमदनी होती है। लेकिन इसके संवाददाताओं को वर्ष 2004 में चमेली देवी जैन पुरस्कार मिला था और वर्ष 2008 में खबर लहरिया स्वतंत्र महिलाओं के सामूहिक मीडिया के तौर पर पंजीकृत हुआ। निरंतर ने संयुक्त राष्ट्र लोकतंत्र कोष और दोराबजी टाटा फंड से करार किया है, ताकि अखबार निकालने के लिए अगले दो वर्ष तक की वित्तीय जरूरतें पूरी की जा सकें। लेकिन इसकी विस्तार योजना (लखनऊ, फैजाबाद और वाराणसी में अवधी और भोजपुरी संस्करण) को देखते हुए इसे ऐसा मॉडल अपनाना पड़ेगा, जिसकी बदौलत यह आत्म निर्भर बन सके।

बीएस के लिए मनीषा पांडेय की रिपोर्ट.

मध्‍य प्रदेश में अखबारों के नाम पर छूट की लूट

जनता पार्टी के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी जब नवंबर की शुरुआत में राजनीतिक दृष्टि से देश के सबसे प्रतिष्ठित गांधी परिवार पर नेशनल हेराल्ड अखबार को चलाने वाली कंपनी के अधिग्रहण का आरोप लगा रहे थे उसी समय मध्य प्रदेश सरकार के एक फैसले पर कम ही लोगों की नजर गई जो इसी अखबार से जुड़ा था.

दरअसल प्रदेश की भाजपा सरकार ने राजधानी भोपाल में तीन दशक पहले कांग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड के हिंदी अखबार नवजीवन को रियायती दर पर दी एक एकड़ से अधिक की जमीन का आवंटन इन्हीं दिनों निरस्त किया है. वजह यह बताई गई है कि अखबार चलाने के नाम पर आवंटित इस जमीन का व्यावसायिक उपयोग हुआ है और इसीलिए सरकार यहां खड़ी व्यावसायिक इमारतों को अधिगृहीत करने की सोच रही है.

लेकिन शहर के व्यावसायिक क्षेत्र महाराणा प्रताप नगर के नजदीक स्थित प्रेस कॉम्प्लेक्स में यह अकेला मामला नहीं है. सरकार की ही मानें तो यहां तीन दर्जन से अधिक अखबारों द्वारा जमीन की लीज संबंधी प्रावधानों का मनमाने तौर पर उल्लंघन जारी है. सरकार ने सात साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अखबारों को व्यावसायिक गतिविधि मानते हुए सभी भूखंड आवंटियों को व्यावसायिक दर से रकम वसूलने के नोटिस जारी किए थे. मगर सरकार उनसे 510 करोड़ रुपये की यह रकम अब तक वसूल नहीं कर पाई है. 30 साल के लिए दिए गए अधिकतर भूखंडों की लीज साल 2012 के पहले समाप्त हो चुकी है. एक भी लीज का नवीनीकरण न होने के बावजूद अखबार मालिकों के लिए प्रेस कॉम्प्लेक्स व्यावसायिक गतिविधियों का गढ़ बना हुआ है. वहीं सरकार पर इसका सीधा असर राजस्व में हो रहे करोड़ों रुपये के नुकसान के तौर पर पड़ रहा है.

रियायत पर हुई इस खयानतबाजी की शुरुआत अस्सी के दशक में कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह के उस फैसले से जुड़ी है जिसमें उन्होंने भोपाल की बेशकीमती जमीन के 22 एकड़ क्षेत्र को प्रेस परिसर बनाने के लिए आरक्षित किया. तब दो रुपये 30 पैसे प्रति वर्ग फुट के हिसाब से 39 भूखंड बांटे गए थे. भोपाल विकास प्राधिकरण (बीडीए) ने इस बड़े क्षेत्र को विकसित करने का बोझ भी अपने खर्च पर उठाते हुए अखबारों के लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति जैसी तमाम सुविधाएं दीं.

प्रदेश बनने के पहले मध्य भारत के तमाम नामी अखबारों का मुख्य केंद्र नागपुर था. 1956 में जब नया प्रदेश नक्शे में आया और भोपाल उसकी राजधानी बनी तो अखबारों ने राजधानी की तरफ कूच किया. 1980 में सूबे की बागडोर अर्जुन सिंह के हाथों आते ही उन्होंने मीडिया को उपकृत करने की यह योजना बनाई. हालांकि करार की शर्तों में साफ था कि अखबार मालिक अपने अखबार से अलग कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं करेंगे. मगर समय के साथ रियल एस्टेट का कारोबार चढ़ते ही जब भूखंडों के भाव आसमान छूने लगे तो मुनाफा कमाने के मामले में अखबार मालिक भी पीछे नहीं रहे. प्रेस कॉम्प्लेक्स का मौजूदा भाव 15 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट से अधिक है और यही वजह है कि आज प्रेस कॉम्प्लेक्स में प्रेस से अधिक व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स दिखाई देते हैं.

इस मामले में नया मोड़ तब आया जब एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूल और अस्पताल से ठीक विपरीत मीडिया को व्यावसायिक गतिविधि मानते हुए रियायती दर पर आवंटित जमीन पर नाराजगी जताई. साथ ही उसने राज्य सरकार को अखबारों से जमीन आवंटन की तारीख से व्यावसायिक दर पर रकम वसूलने का निर्देश भी दिया. इसके बाद आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2006 में एक सर्वे किया. तहलका को मिली सर्वे की प्रति बताती है कि अखबार के संपादन और छपाई संबंधी कार्यों के लिए जारी हुए भूखंडों में यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर को प्रकाशकों द्वारा व्यावसायिक संपत्ति में बदल दिया गया है.  कुछ प्रकाशकों ने भूखंड बेच दिए हैं जबकि कुछ ने उसके आधे से अधिक हिस्से पर आवासीय और व्यावसायिक परिसर बनाकर किराए पर दे दिया. इसके अलावा कुछ ने अखबार के कार्यालय में ही अपनी दूसरी कंपनियों के कॉरपोरेट कार्यालय खोल दिए हैं.

2006 में बीडीए ने अनुबंध के विरुद्ध भूखंडों के उपयोग परिवर्तन को लेकर सभी प्रकाशकों को वसूली नोटिस भेजे थे लेकिन अब तक वसूली की रकम पांच गुना बढ़ने के बावजूद किसी से यह रकम नहीं ली जा सकी है. प्रकाशकों का तर्क है कि यदि उन्हें आवंटन के दौरान ही यह स्पष्ट कर दिया जाता कि बाद में उनसे बाजार दर वसूली जाएगी तो हो सकता है कि वे अपना अखबार यहां के बजाय कहीं और से चलाते. सीधी टिप्पणी से बचते कई प्रकाशक भी चाहते हैं कि कोई आसान रास्ता निकले ताकि चुनाव के ठीक पहले सरकार द्वारा डाले जाने वाले दबाव से वे बच सकें.

वहीं नवजीवन की लीज निरस्त करने वाले आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय के मंत्री जयंत मलैया बाकी अखबारों पर भी कार्रवाई के संबंध में यह तो बताते हैं कि उन्हें प्रेस के नाम पर चल रही व्यावसायिक गतिविधियों की पुख्ता जानकारी है लेकिन वे उन पर कार्रवाई की समयसीमा को लेकर कुछ नहीं बताते. वे कहते हैं, ‘राज्य सरकार इस संबंध में जल्द ही कोई फैसला लेगी.’ जहां तक प्रकाशकों की बात है तो तहलका ने नवभारत, दैनिक भास्कर, नई दुनिया, शिखरवार्ता और दैनिक जागरण के प्रकाशकों को ईमेल भेजकर इस मामले पर उनकी राय जानने की कोशिश की थी लेकिन खबर लिखे जाने तक इन अखबारों की तरफ से हमें कोई जवाब नहीं मिला.

इस मामले में दिग्विजय सिंह से लेकर उमा भारती के कार्यकाल तक कई समितियां बनीं लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. दरअसल अखबार मालिकों और सरकार के बीच यह जमीन सत्ता संतुलन का केंद्र बन चुकी है. अखबार मालिक जहां अपनी दुखती रग से बखूबी वाकिफ हैं वहीं सरकार भी यह जानती है कि यदि उसने कार्रवाई की तो सारा प्रेस उसके खिलाफ एकजुट हो जाएगा.

मध्य प्रदेश के अखबार भोपाल में रियायती दर और सिर्फ प्रेस गतिविधियों के संचालन की शर्त पर हासिल भूखंडों का सालों से व्यावसायिक उपयोग कर रहे हैं लेकिन भूखंड आवंटन रद्द करना तो दूर सरकार उनसे अब तक जुर्माना भी वसूल नहीं कर पाई है. तहलका के लिए शिरीष खरे की रिपोर्ट. जिसे साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

नोएडा में मीडियाकर्मी की कार बदमाशों ने लूटी

नोएडा : नोएडा में कोई भी सुरक्षित नहीं है. खबर है कि नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस-वे पर सेक्टर-44 के सामने चार बदमाशों ने एक चैनल में काम करने वाले मीडिया कर्मी से कार लूट ली. कर्मी की शिकायत पर कोतवाली सेक्टर-49 पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है. हालांकि अभी तक कार लुटेरों का कोई अता-पता नहीं चल पाया है. हमेशा की तरह पुलिस बस अंधेरे में तीर मारने में जुटी हुई है.

जानकारी के अनुसार सेक्‍टर 16 फिल्‍म सिटी में स्थित एक चैनल में सीनियर मैनेजर के रूप में  काम करने वाले नितिन वशिष्‍ठ सेक्‍टर 93 के पार्क व्‍यू एक्‍सप्रेस अपार्टमेंट में अपने परिवार के साथ रहते हैं. बुधवार की रात वे कार्यालय से अपनी सेंट्रो कार लेकर निकले. वे जब नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्‍सप्रेस वे पर सेक्‍टर 44 के पास पहुंचे तो पेशाब करने के लिए कार रोककर नीचे उतरे. वे जब वापस कार में बैठने के लिए जा ही रहे थे, तभी चार बदमाश आ धमके. चारों ने तमंचे के बल पर उनसे कार लूट ली. चारो बदमाश कार लेकर एक्‍सप्रेस वे से ही ग्रेटर नोएडा की तरफ भाग निकले. घटना से हतप्रभ नितिन ने इसकी सूचना पुलिस को दी. बाद में उन्‍होंने सेक्‍टर 49 थाने में मामला दर्ज कराया.

प्रभात खबर प्रबंधन ने मुकेश पाण्‍डेय को कार्यालय आने से मना किया

डेहरी ऑन सोन में सेक्‍स स्‍कैंडल मामले में मोडम कार्यालय प्रभारी मुकेश पाण्‍डेय का नाम आने के बाद प्रभात खबर ने उन्‍हें ऑफिस आने से मना कर दिया है. हालांकि उन्‍हें अभी बाहर नहीं किया गया है. जब तक जांच में वे पाक साफ साबित नहीं हो जाते तब तक उनको कार्यालय आने की मनाही कर दी गई है. वे लम्‍बे समय से प्रभात खबर से जुड़े हुए थे. सेक्‍स स्‍कैंडल में पकड़ी गई महिला रीता देवी ने मीडिया के सामने कई लोगों के साथ मुकेश पाण्‍डेय एवं एक और पत्रकार प्रमोद का नाम लिया था.

नेशन टुडे से जुड़े विशाल, अक्षय, सुहेल एवं अबुल

जल्‍द लांच होने जा रहे नेशन टुडे न्‍यूज चैनल से खबर है कि पिछले दिनों कई लोगों ने ज्‍वाइन किया है. एबीपी न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर विशाल कॉलरा एवं अक्षय शुक्‍ला नेशन टुडे पहुंच गए हैं. दोनों लोगों ने प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर ज्‍वाइन किया है. अक्षय स्‍टार न्‍यूज के एंकर हंट प्रतियोगिता के विजेता रहे हैं. सैयद सुहेल ने भी पी7 न्‍यूज से इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी नेशन टुडे के साथ प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर ज्‍वाइन किया है. इंडिया न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर अबुल भी नेशन टुडे से जुड़ गए हैं. उन्‍होंने भी प्रोड्यूसर कम एंकर के पद पर ज्‍वाइन किया है. 

सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका की गिरफ्तारी पर 14 दिसम्‍बर तक रोक

नई दिल्‍ली। जी समूह के चेयरमैन एवं उनके पुत्र पुनीत गोयनका को कम से कम आठ दिसम्‍बर को होने वाले पूछताछ के बाद पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकेगी. साकेत की एक सत्र अदालत ने जी ग्रुप के प्रमुख सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका को बड़ी राहत देते हुए उनकी गिरफ़्तारी पर 14 दिसंबर तक की रोक लगा दी है. कोर्ट ने यह आदेश सुभाष चंद्रा द्वारा दिए गए अग्रिम जमानत आवेदन पर दी है. सुभाष चंद्रा ने याचिका में इस बात की आशंका व्‍यक्‍त की थी कि पुलिस इस मामले में जांच के दौरान उन्‍हें गिरफ्तार कर सकती है.

एडिशनल सेशन जज राजरानी मिश्रा ने सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका की गिरफ़्तारी पर 14 दिसंबर तक रोक लगाई. हालांकि दिल्‍ली पुलिस ने अदालत को इस बात को आश्‍वस्‍त नहीं किया कि वो इन दोनों को जांच के दौरान गिरफ्तार नहीं करेगी. जी ग्रुप के वकील विजय अग्रवाल ने कहा कि चंद्रा और गोयनका को कोर्ट ने राहत दी है. इस केस में ग्रुप के दोनों संपादकों को गलत तरीके से हिरासत में रखा गया है. दिल्ली पुलिस सुभाष चंद्रा और दोनों संपादकों को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ करना चाहती है. लिहाजा पूछताछ से पहले दोनों लोगों ने एहतियातन अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी.

Arrest of Zee MEs & Punya Prasun Vajpayee

The media and public outcry over the recent arrest of Zee News and Zee business editors Sudhir Pachaury and Sameer Ahluwaliaha has badly eroded the transparency and confidence in the news aired by the electronic media though it will take a long time to reinstate its credibility in the public. 

The arrest of both the editors  across globe is not a new and rare thing. Before this the top media mogul Mr Ruport Murdoch has also faced the legal implication for engaging in phone hacking, police bribery, and exercising improper influence in the pursuit of publishing stories. The much hyped and decried legal confinement of Julian Assanze is not a hidden case but apart from all the three cases Julian Assanze can not be blamed for his honesty in the domain of journalism.

It has been seen that Sudhir and Sameer arrest has been being discussed by every journalist on the social networking sites as if he has committed a heinous crime that has not happen ever before. The suave and hardcore journalist Mr Punya Prasun Vajpayee has even been not spared only for defending these two editors for comparing the arrest with the days of Emergency.

The thing is not serious as it has been made to be. Sudhir and Sameer are only the faces. They were doing their duty like Managing Editors whose duty is to manage everything for the company in which they work. They have committed nothing wrong in the eyes of journalistic ethics. We have been committing errors by simply identifying them as journalists. So understanding them journalists is a utter foolishness and nothing else and the wastage of time.

As far the things are being related to Mr Punya Prasun Vajpayee that why he came in the defense of Sudheer and Sameer and why he compared the situation with Emergency and why he acted so hastily in his most sought after news titled “ Badi Khabar” are the only attempts to tarnish his image, honesty, dedication and major contribution in the field of electronic media and without understanding the factual situation.

Mr Vajpayee did what he should have done on the nick of the time. He is not a freelancer. He was on his pay roll and duty. And when a man is on duty he is only on duty. He has to do according to the terms and condition of the appointment letter though he was upset and in the dilemma whether to programme “Badi Khabar” or not.

However, he did it like the great Hindu mythological actor Karna of Mahabharat who had to pay the price of his loyalty and salt to the Kauravas. (Maalik Ka Namak Chukana Parta Hai.) He was only doing duty keeping in mind his Khuddari and Khudmukhtaari. And he is the real khuddar. And so the stature of Karna has always been high nobody can downsize his stature. Karna is always remembered for his generously not betrayal. So a Punya is punya. No body can washes him away. 

Prashant Kumaar 

cloudforu@gmail.com

 

सेक्स रैकेट में फंसा प्रभात खबर का पत्रकार मुकेश पांडेय

डेहरी ऑन सोन से पत्रकारिता को शर्मसार कर देने वाली खबर सामने आई है. दलाली, वसूली के बाद अब पत्रकारों के सेक्‍स रैकेट में भी शामिल होने की बात सामने आने लगी हैं. प्रभात खबर, डेहरी ऑन सोन के प्रभारी मुकेश पाण्‍डेय सेक्‍स रैकेट में संलिप्त थे. इसका खुलासा खुद गिरफ्तारी की गई महिला ने किया. प्रेस वार्ता के दौरान आन सोन के एसपी भी मौजूद थे. 

गौरतलब है कि दो दिन पहले डेहरी के जक्‍खी बिगहा में पुलिस ने छापामारी कर के पांच महिलाओं समेत दस लोगों को गिरफ्तार किया. गिरफ्तार महिला डेहरी थाना हाजत पुलिस को चकमा देकर फरार हो गई थी, जिसे रोहतास थाना के सोन टीला से गिरफ्तार किया गया. सेक्‍स रैकेट में रोहतास जिले के एक वरिष्‍ठ पत्रकार तथा डेहरी ऑन सोन के प्रभात खबर के प्रभारी मुकेश पाण्‍डेय का नाम आते ही सनसनी फैल गई. मुकेश पाण्‍डेय वहीं हैं, जिन्‍हें हिंदुस्‍तान ने बारह सालों तक अखबार में सासाराम का प्रभारी बना कर रखा था. वहां से छुट्टी होने पर उन्होंने प्रभात खबर का दामन थाम लिया था.

इस संदर्भ में मुकेश का पक्ष लेने के लिए फोन किया गया परन्‍तु उनसे संपर्क नहीं हो सका हालांकि इन आरोपों के संदर्भ में मुकेश पांडेय की बहन संगीता पांडेय का कहना है कि ऐसा कोई आरोप उक्‍त महिला ने नहीं लगाया बल्कि उसने कहा कि वे उन्‍हें जानती है. मैं भी वहां पर मौजूद थी. यह खबर सरासर गलत है कि मुकेश सेक्‍स रैकेट में शामिल थे. किसी को जानने मात्र से आरोपी नहीं बनाया जा सकता है. 

सेक्स रैकेट संचालिका के बयान को यहां देख सकते हैं, क्लिक करें…

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अखबार बांटने से करियर शुरू किया और आज वरिष्ठ प्रसार प्रबंधक हैं राजेंद्र गुप्ता

अखबारों के साथ लंबी पारी खेल रहे राजेंद्र गुप्ता यूं ही टकरा गए. उनसे बातचीत हुई. पता चला कि वे एक जमाने में अखबार बांटते थे. और, अब वरिष्ठ प्रसार प्रबंधक के पद पर हैं. उनके करियर की यात्रा और उनकी सोच से प्रभावित हुआ. सोचा, उनके बारे में सबको बताया जाना चाहिए. तो उनसे कुछ सवाल पूछे. उन्होंने जो जवाब दिया. वो यहां पेश है. 

सवाल-

-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.

-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.

-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…

-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…

-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..

जवाब-

राजेंद्र गुप्तामैं मूलतः उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिला अंतर्गत कोड़ा जहानाबाद का निवासी हूँ जहाँ मैंने 12 वीं तक शिक्षा प्राप्त की. उसके बाद 1981 में कानपुर के क्राइस्ट चर्च कालेज से ग्रेजुएशन किया. 1 नवम्बर 1981 को दैनिक विश्वामित्र कानपुर में बतौर प्रूफ रीडर अखबारी जीवन की शुरुआत की और वहां पर जनवरी 1986 तक रहा. इस दौरान वहां विज्ञापन का काम भी देखता रहा. अपरिहार्य कारणों से जनवरी 1986 में मुझे नौकरी छोड़ कर कोड़ा जहानाबाद वापस लौटना पड़ा.

जीवकोपार्जन हेतु कानपुर से प्रकाशित दैनिक आज अख़बार की एजेंसी लेकर  8 जून 1986 से  कोड़ा जहानाबाद व आसपास के इलाकों में अखबार बेचने का कार्य शुरू किया. कुछ महीने बाद दैनिक जागरण की भी एजेंसी ले ली. तब तक मेरा यह हाकर का धंधा अच्छी तरह चल निकला. इसी दौरान दैनिक जागरण के तत्कालीन समाचार संपादक आदरणीय प्रताप नारायण श्रीवास्तव के आदेश पर मैं अपने इलाके की ख़बरें भी भेजने लगा. मेरे द्वारा भेजी गयी ख़बरों की विश्वसनीयता एवं लेखन शैली को देखते हुए मुझे अवैतनिक संवाददाता बनाया गया. यह कार्य जनवरी 1991 तक चला. इस सबके चलते मैं रोजाना 74 किलोमीटर साईकिल चला कर हाकर का काम भी करता रहा.

किन्ही कारणों से मुझे गाँव छोड़कर एक बार फिर से कानपुर में बसना पड़ा. फरवरी 1991 में कानपुर में ही मेरी शादी हुई. उसी दौरान कानपुर में 1 मार्च 1992 से अमर उजाला का प्रकाशन शुरू हुआ. विज्ञान स्नातक की डिग्री लेने के बाद लगभग पांच वर्षों तक दैनिक विश्वामित्र की नौकरी करने व लगभग पांच वर्षों तक ही हाकर का कार्य करने से मुझे प्रसार विभाग के कामों की काफी जानकारी हो चुकी थी. इसी अनुभव के चलते अमर उजाला के तत्कालीन महाप्रबंधक श्री कमलेश दीक्षित ने मुझे 12 मई 1992 को अमर उजाला में प्रसार सहायक के रूप में भर्ती किया. अप्रैल 2005 तक मैं अमर उजाला में रहा. इस दौरान मुझे बनारस व मेरठ में भी रखा गया.

1993 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह द्वारा अमर उजाला के खिलाफ हल्ला बोल अभियान में  कई बार सरकारी प्रताड़ना का शिकार भी हुआ. 3 जुलाई 1994 को झाँसी में अमर उजाला के सम्मान को बचाने के लिए एक प्रतिद्वंदी अख़बार के गुंडों से हुए झगड़े में फायरिंग भी करनी पड़ी जिसमें उस प्रतिद्वंदी अख़बार के मालिक सहित 4 लोग घायल हुए थे. लगभग पांच वर्षों तक चले इस मुकदमे में गवाहों के अभाव में अदालत द्वारा बाइज्जत बरी भी हो गया था.

इसके बाद जुलाई 2005 में  दैनिक जागरण (रीवा), नई दुनिया (ग्वालियर), डीएलए (लखनऊ), जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ) होते हुए अब जम्मू के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक STATE TIMES में बतौर सीनियर सर्कुलेशन मैनेजर कार्यरत हूँ .मेरे परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे हैं.बड़ा बेटा महर्षि (21) सी.बी.आई. में कार्यरत है जबकि छोटा बेटा देवर्षि (16) अभी 12वीं में कानपुर में ही पढ़ रहा है.

पता नहीं क्यों मुझे बचपन से ही बैंक की नौकरी बहुत आकर्षित करती थी इसलिए मैंने 1978 से 1986 के बीच दस -बारह बार बैंक क्लर्क व प्रोबेशन आफिसर की परीक्षा दी, कुल छह बार लिखित परीक्षा पास भी की परन्तु मेरी यह ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो पाई. आखिर में निराश होकर मैं लक्ष्य विहीन भविष्य की ओर बढ़ने लगा. जीवकोपार्जन हेतु हाकर बनकर शुरू किया गया अख़बार बेचने का काम मुझे आज इस मुकाम तक लायेगा , यह मैंने कभी नहीं सोचा था.

अब मैंने अपने कैरियर का लक्ष्य भगवान के भरोसे छोड़ रखा है परन्तु  मैंने होश सँभालते ही अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया था कि बगैर किसी  को नुकसान पहुंचाए, ईमानदारी व नेकनीयती के साथ और यथासंभव दूसरों क़ी मदद करते हुए जिंदगी गुजारुंगा.और अभी तक उस पर अमल करता आ रहा हूँ .इसी लिए अब तक  इस धरती पर मेरे पास अपनी एक इंच भी जमीन नहीं है और न ही मेरे तीनों बैंक खातों में कुल मिलाकर पचास हजार रूपया है .

आज के समय में  अच्छाइयों व बुराइयों का पैमाना हर आदमी क़ी नज़रों में अलग-अलग है. इसलिए इन्हें गिनाना थोड़ा कठिन है. अपने जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए बस जिंदगी गुजारे जा रहा हूँ. चूँकि कफ़न में कोई जेब नहीं होती इसलिए संपत्ति संचय क़ी कोई ख्वाहिस नहीं, किसी भी व्यसन की न ही लत और न ही परहेज है. कभी-कभी शराब पीने से लेकर जुआ खेलने तक के शौक भी पाल रखे हैं. रोजाना पूजा-पाठ भी करता हूँ और अनजाने में होने वाली गलतियों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना भी कर लेता हूँ.

यह सच है कि आज पत्रकारिता के स्तर में काफी गिरावट आ चुकी है. पहले पत्रकारिता को मिशन का दर्जा मिला हुआ था परन्तु कुछ लोगों ने इसको वेश्यालय से भी बदतर बना दिया है जिनमें पत्रकार कम उनको रोजगार देने वाले मालिक ज्यादा हैं. अनेक अख़बार मालिक अपने यहाँ काम करने वाले पत्रकारों के माध्यम से ही अच्छे बुरे कामों को अंजाम देकर करोणों क़ी संपत्ति बना रहे हैं और इन "बेचारे" पत्रकारों को भी छीछड़े खाने  को मिल जाते हैं. कलम के इन  "बेचारे" सिपाहियों क़ी संख्या में अब लगातार इजाफा होता जा रहा है. फलस्वरूप राजनीतिकों क़ी तरह पत्रकारों क़ी छवि भी समाज में गिरती जा रही है. 

आज जब देश में लोकतंत्र के चारों स्तंभों में से विधायिका और कार्यपालिका के लोगों ने खुले-आम लूट मचा रखी है, ऐसे समय में आम जनता शेष दोनों खम्भों क़ी ओर टकटकी लगाकर निहार रही है कि शायद लोकतंत्र  क़ी रक्षा के लिए ये कुछ करें. तब हमारे ही कुछ लोग विधायिका और कार्यपालिका के लुटेरों के गिरोह में शामिल हो कर आम जनता के अरमानों पर पानी फेर रहे  हैं. अब आम लोगों क़ी धारणा यह बनती जा रही है कि न्यायपालिका (केवल उच्च स्तर की) ही लोकतंत्र  क़ी रक्षा कर सकती है. पत्रकारिता के स्तर को सुधारने के लिए किसी कानून की नहीं, स्वयं को ही सुधारने की जरुरत है. जो फ़िलहाल काफी मुश्किल है क्योंकि आज के समय में नैतिकता का कोई मूल्य नहीं रह गया है.

अपने कैरियर व जिन्दगी से मैं पूर्णतया संतुष्ट हूँ. बहुत ज्यादा पाने की इच्छा ही मानसिक तनाव का कारण है जो आदमी को भ्रष्टता की ओर ले जाता है. क्योंकि इच्छाएं तो लगातार बढ़तीं ही रहती हैं. कर्म पर विश्वास करो, फल अवश्य मिलेगा.

मीडिया के लोगों से मेरा कहना केवल यह है कि अभी भी सुधरने का समय है अन्यथा समाज तुमको भी उसी नजर से देखेगा जैसे आजकल राजनीतिज्ञों को देखता है. बुद्धिजीवी होने का तमगा तो दूर, इतनी अधिक दुर्दशा होगी जिसकी कल्पना नहीं कर सकते हैं. जिसकी शुरुआत भी हो चुकी है. आज जगह -जगह मीडिया के लोगों के साथ दुर्व्यवहार व मार-पीट की घटनाएँ आम होती जा रही हैं.

राजेंद्र गुप्ता से संपर्क rajendragupta61@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


आपमें से भी कोई अगर यह मानता है कि उसे अपनी बात, अपना करियर, अपनी सोच, अपना इंटरव्यू भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहिए तो आपका स्वागत है.  भड़ास ने स्थापित व नामचीन लोगों का इंटरव्यू प्रकाशित करने की जगह देश के कोने-कोने में सक्रिय मीडियाकर्मियों की बातों, अनुभवों, करियर, सोच को प्रकाशित करने को तरजीह दिया है. आपको करना बस इतना है कि आप नीचे दिए गए सवालों के जवाब भेज दें. अगर लगता है कोई बात इन सवालों से कवर नहीं हो पा रहा तो सवाल अपनी तरफ से क्रिएट कर सकते हैं. साथ में एक तस्वीर भी भेजें. जवाब और तस्वीर मेरी निजी मेल आईडी पर भेजें जो यूं है:  yashwant@bhadas4media.com

सवाल यूं हैं-

-अपने जीवन और करियर के बारे में विस्तार से बताएं.

-क्या आप वो सब कर पाए हैं, जो करना चाहते थे… यानि करियर और जीवन का लक्ष्य क्या क्या है?

-अगर कहा जाए कि आप अपनी पांच अच्छाइयां और पांच बुराइयां बताइए, तो क्या क्या गिनाएंगे.

– मीडिया में काम के दौरान कोई ऐसा अनुभव जिससे आप काफी दुखी हुए हों और कोई ऐसा अनुभव जिससे आपको काफी तसल्ली-खुशी मिली हो?

-पत्रकारिता के स्तर में घनघोर पतन हुआ है, क्या यह सच है, अगर हां तो किस तरह से और इसका असर क्या होगा, इसे ठीक कैसे किया जा सकता है…

-आपको अपने करियर और जीवन में क्या कुछ सीखने को मिला जिसे आप हम सभी से बांटना चाहते हैं…

– आपकी अपनी लाइफस्टाइल कैसी है? खान-पान, सुनने-पढ़ने में क्या पसंद है? शौक क्या है?

-आप जीवन में किससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहे और क्यों? आपके रोल माडल कौन हैं?

-आपने जीवन या करियर में कुछ ऐसा किया है जिसका आपको प्रायश्चित करने का दिल करता है?

-ऐसी कोई बात जो कहना चाहते हों, मीडिया इंडस्ट्री के लोगों से, पर अब तक कह न पाए हों..

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

वे तीन लड़कियां मुझे घूरतीं, बार-बार अपमानित करतीं (गुमनाम की डायरी का एक पन्ना)

इस लेख की शुरुआत में मैं मेरे सभी पाठकों, खासतौर से महिलाओं से अग्रिम क्षमा चाहता हूं, क्योंकि हो सकता है कि यहां लिखी गई कुछ बातें आपको उचित न लगें, लेकिन यह मेरे जीवन का एक कड़वा सत्य है। यह एक लड़का और पांच लड़कियों की कहानी है, लेकिन किसी सूरत में यह कोई रंगीली, रसीली या भड़कीली कहानी नहीं है। मैं कौन हूं? – इस सवाल का जवाब कुछ वजहों से नहीं दे रहा हूं। इसका जवाब आपको आखिर में समझ में आ जाएगा। 

आपकी जानकारी के लिए इतना काफी है कि मैंने पत्रकारिता में कुछ साल बिताए हैं। मैं मेहनत, ईमानदारी और वफादारी के मोर्चे पर हमेशा अव्वल रहा, परंतु गुटबंदी, धोखाधड़ी और सियासी अखाड़ेबाजी में मात खा गया, क्योंकि इसके संस्कार मेरे खून में नहीं थे। आज भी इन ‘सदगुणों’ को अपनाने में मैं नाकाम हूं। भारत के अलावा विदेशी अखबारों में मेरे कई लेख छप चुके हैं और मैंने कई बड़ी हस्तियों की लिखी किताबों का संपादन किया है।

आज उम्र के एक पड़ाव पर पहुंचकर मुझे लगता है कि पत्रकारिता में कर्मठता, वफादारी और ईमानदारी के लिए कोई जगह नहीं। हम अत्याचार से पीड़ित, शोषित और दलितों पर हुए जुल्म के खिलाफ कलम चलाते हैं, जबकि हम खुद कैसी स्थिति में रहते हैं, यह किसी को बता नहीं सकते। संपादकों और कुछ अत्याचारी वरिष्ठ लोगों के कारण हर पल काल-कोठरी का अनुभव भोगते हैं, फिर भी अपनी पीड़ा किसी को बता नहीं सकते। हो सकता है आप इस बात से सहमत न हों और आप सच भी हों, परंतु मेरा अनुभव यही है जो मैं कहने जा रहा हूं।

कई साल पहले एक छोटे-से गांव से मैं राजधानी आया। पहली बार ढेर सारी गाड़ियां और लोग देखे। अपने गांव में तो रात को लालटेन जलाते थे और यहां रात को भी रात नहीं होती। उन्हीं दिनों एक राष्ट्रीय दैनिक के संपादकीय विभाग में कर्मचारी की जरूरत थी तो मैंने आवेदन कर दिया। मुझे पता था – अपना काम यहां नहीं होने वाला, पर न जाने कैसे मुझे चुन लिया गया। मुझे मैग्जीन डिपार्टमेंट में लगाया गया। ऑफिस में पहली बार कम्प्यूटर देखा और एसी में बैठने का मौका मिला। मैं सुबह जल्दी ऑफिस जाता और देर शाम तक काम करता। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि मैंने सिर्फ दो दिन में हिंदी की टाइपिंग सीखी। मैं मेहनत को ही तरक्की का मूलमंत्र मानता और यही मेरी पूंजी थी।

मुझे मेरे वरिष्ठजन शाबासियां देते। हमेशा यही सनक सवार रहती कि कब सुबह हो और मैं मेरे उस परिवार में जाऊं। काम को लेकर मेरे सर पर जुनून सवार था। एक आर्टिकल में कॉमा की भी गलती न रह जाए, यह हमेशा मेरी कोशिश रहती। दो महीनों में मैं इतना कुशल हो गया था कि मैग्जीन की डमी और फाइनल प्रिंट मुझे ही पढ़ने के लिए दिए जाने लगे। उस ऑफिस में पांच लड़कियां थीं और मैं एक लड़का। वे सब मुझसे बड़ी थीं। मैं शपथपूर्वक यह बात कहता हूं कि मैंने उनमें हमेशा मेरी बड़ी बहन की ही छवि देखी।

खैर, वक्त गुजरता गया और मैं रोज अपने हासिल किए अनुभवों की बुनियाद पर तरक्की के नए सपने लेता। इस दौरान एक बात पर मैंने गौर किया कि मेरी सहकर्मी आए दिन शॉपिंग, पार्लर और मौज-मस्ती में व्यस्त रहतीं लेकिन मुझ पर काम का दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा था। मुझे आए दिन उनके हिस्से के काम करने पड़ते। बाद में मुझे पता चला कि गांव का होने की वजह से उन्होंने मेरा एक नाम भी रखा था। उस स्थिति में मैंने सिर्फ एक चीज पर ध्यान दिया – मेरा काम, क्योंकि इससे मेरे कौशल में वृद्धि हो रही थी। अब मैग्जीन के प्रूफ और अनुवाद मुझे घर के लिए दिए जाने लगे। एक बार संयोग ऐसा बना कि तीन दिन लगातार मुझे सुबह 10 बजे से रात तीन बजे तक काम करना पड़ा। मुझ पर धीरे-धीरे काम का दबाव बढ़ाया जा रहा था। मेरे सहकर्मी चैटिंग करते या किसी फैशन मैग्जीन के पन्ने उलटते। 

चौथे दिन मैं ऑफिस गया। मैग्जीन छूटने की तारीख नजदीक थी। काम जोरों पर था। मेरी सहकर्मी लंच रूम में अंत्याक्षरी कर रही थीं और मैं एक अमेरिकन लेखक के आर्टिकल का अनुवाद कर रहा था। उस दिन मैंने खाना भी नहीं खाया। शाम को मैडम ने मुझे बुलाया और कुछ प्रिंट देते हुए कहा कि इन्हें रात को पढ़कर लाना और कल सुबह करेक्शन लगवाकर फाइनल डमी मुझे देना। मैंने कहा कि मैं अगले दिन जल्दी आकर ये प्रिंट पढ़ दूंगा, क्योंकि आज बहुत थक चुका हूं, तो वे आग-बबूला हो गईं और तुरंत मेरी औकात बताने लगीं। 

खैर, मुझे डमी नहीं दी गई, लेकिन दूसरे दिन सब लड़कियों का गुट मुझसे इस तरह व्यवहार करने लगा जैसे मैं चिड़ियाघर से आया हूं। उनमें से तीन जो सबसे वरिष्ठ थीं, वे मुझे अजीब तरीके से घूरती रहतीं। मैं यहां पुनः महिलाओं से क्षमा चाहूंगा, क्योंकि मेरा इरादा आपका अपमान करना नहीं है। मैं नारी जाति का तहेदिल से सम्मान करता हूं क्योंकि मैंने मेरे परिवार से यही सीखा है। प्रायः हम पुरुषों पर ये आरोप लगते हैं कि ये दुष्ट, अत्याचारी, क्रूर और शोषक होते हैं, इन आरोपों में कुछ सच्चाई भी है, क्योंकि कई पुरुषों ने इस कथन को सच साबित किया है। मगर यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू है। अत्याचार, क्रूरता और षड्यंत्रों पर पुरुषों का ही एकाधिकार नहीं है। यह बात मैं तीर-तुक्के से नहीं अनुभव से कह रहा हूं।

वे तीनों लड़कियां मुझे कई बार अपमानित करतीं। उनका सबसे बड़ा हथियार था – घूरना। मैंने एक मित्र से इसकी चर्चा की तो वह बोला – अरे यार! तेरे तो मजे हो गए। ऐसा कर आज तो आंख मार दे। जो होगा देख लेंगे। अगर पट जाए तो वारे-न्यारे और बिगड़ जाए तो कह देना मैडम आंख में कुछ गिर गया था।

लेकिन मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। सच पूछो तो ऐसा करना मुझे मेरी बड़ी दीदी के सामने ऐसी गंदी हरकत करने जैसा लगा। मैं इसके बारे में किसी को कह भी नहीं सकता था। कोई मेरा विश्वास नहीं करता। सब लोग यही कहते – भाई, तू इत्ता सोणा तो ना है कि छोरियां तुझे ही देखें!!!

वह मेरे जीवन का सबसे दर्दनाक दौर था। कुछ औरतें ताना मारने, व्यंग्य करने, अपमान करने, गुट बनाने और षड्यंत्र रचने में कितनी कुशल होती हैं, यह मैंने तब जाना। माहौल इतना गंदा हो गया था कि वहां हर मिनट मेरे लिए नरक जैसा अनुभव था। आखिर एक दिन ऐसी स्थिति बनी कि मुझे उस जगह को अलविदा कहना पड़ा। उस दिन मैं बहुत खुश था।

इस घटना को कई वर्ष बीत गए। एक सवाल जो मेरे दिमाग में आता है कि हमारा समाज कपट, पाखंड और फरेब का तमगा पुरुषों को ही क्यों देता है? जबकि इसका एक और पहलू भी है। शायद इसका कारण ये है कि हमने सदियों से औरत को जुल्म और जोर से दबाकर रखा, तब उनकी छवि एक अबला, असहाय नारी की बन गई। अगर पुरुष किसी औरत को पीटता है तो हम मान लेते हैं कि यह पापी उस अबला को सता रहा है लेकिन अगर कोई महिला किसी पुरुष को पीटती है तो हम यही मानते हैं कि जरूर इसने कोई छेड़-छाड़ या गंदी हरकत करने की कोशिश की होगी, तभी बेचारी इसे पीट रही है। आखिर यह दोहरी मानसिकता क्यों?

मैं मानता हूं कि आज जब महिलाएं पुरुषों के साथ बराबरी के मैदान में हैं तो कुछ मामलों में उन्होंने पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया है। मेरे विचार से यह बात उन महिलाओं पर शत-प्रतिशत लागू होती हैं जिन्होंने मेरा शोषण किया।

उस घटना के बाद मैंने मीडिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। आज मैं हर महिला में उन लड़कियों की छवि देखता हूं। मैं जानता हूं कि मैं गलत हूं किंतु मेरा मन मुझे मजबूर करता है कि मैं किसी भी लड़की पर विश्वास नहीं करूं। आज मैं एक छोटी-सी फर्म का मालिक हूं। पिछले दिनों मेरे पास मार्केटिंग के लिए कुछ लोगों के आवेदन आए। उनमें कई लड़कियां थीं जो बहुत प्रतिभावान थीं, फिर भी मैंने उनके एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दिए और मेरा विचार है कि भविष्य में भी किसी लड़की को नौकरी न दूं। मैं ऐसा क्यों सोच रहा हूं, इसका बिल्कुल सही जवाब मैं नहीं जानता।

हां, एक और बात! जिस पत्रिका में मैंने काम किया था, मेरे जाने के बाद उसके हालात बेहद खराब हो गए। वहां कई दिनों तक अंदरूनी राजनीति चली और वह पत्रिका बंद हो गई। अब उसका कहीं कोई नामो-निशान नहीं है।

एक गुमनाम

उपरोक्त बातें जिस शख्स ने भड़ास के पास प्रकाशन हेतु प्रेषित किया, उसने एक लेटर भी भेजा है, जो इस प्रकार है— 

 

Adarniy Yashwant Bhai,

Saprem Namaskar!

Apki website to mai kai dino se roj hi padh raha hu, bahut achhi lagi. Mai is attached file me mere jivan ki sachi ghatana likhkar bhej raha hu. Agar thik lage to kripaya prakashit kijiye.

Mai isase jyada mera parichay nahi de sakata, kyoki lekh me jo bate likhi hai, Wo mere vyaktigat jivan aur samman se judi hai. Maine lekh me kisi vyakti ka nam, sanket aur sanstha ka nam nahi likha hai.

Prakshit karne ke bad please uska link mujhe jarur bhej dejiye.

Abhar sahit 

Apaka

Ek Gumnam pathak

कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ और स्याही की जगह सिक्कों का दम (दो स्केच)

कौन कहता है कि कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ नहीं है… बिलकुल साथ है.. लेकिन थोड़े अलग अंदाज और रूप में… इसे आप नीचे दिए गए स्केच के जरिए समझ सकते हैं… मीडिया के हालत पर भी एक  स्केच नीचे है… कलम हम लोगों की अब भी खूब चलती है.. बस स्याही की जगह सिक्कों के दम से चलती है और अब तो सौ करोड़ के सिक्के भी कम पड़ने लगे हैं… सौजन्य से फेसबुक. 


 … देखें कार्टून …

मनमोहन बड़ी मछली लाकर छोटी मछलियों को क्या समझा रहे हैं?
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एफडीआई पर इससे शानदार कार्टून दिखा हो तो बताइएगा…
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वॉलमार्ट के गड़ासे से किसे कटवा रहे हैं मनमोहन?
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तीन कार्टून, एक न्यूज कटिंग और पर्चे पर प्रकाशित एक अपील
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गर्लफ्रेंड बदलिए नहीं तो बर्बाद हो जाइएगा सर!
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भाग जल्दी, मूर्ति नहीं असली है… कुछ कार्टून

मनमोहन बड़ी मछली लाकर छोटी मछलियों को क्या समझा रहे हैं? (देखें कार्टून)

एफडीआई पर दो और शानदार कार्टून. एफडीआई के मसले पर भड़ास पर कुल चार कार्टून प्रकाशित किए गए हैं. यह तीसरा और चौथा हैं. इसके पहले के दो भी इसी के साथ नीचे दिए जा रहे हैं. कार्टूनिस्ट को बधाई. अपनी बात बिलकुल साफ तरीके से कह देने के लिए और पाठकों को समझने में बिलकुल भी दिक्कत न होगी कि एफडीआई क्या है. 

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इससे पहले जो दो कार्टून एफडीआई पर प्रकाशित किए जा चुके हैं, वे इस प्रकार हैं…

भड़ासी चुटकुला : बैठे रहना और कुछ न करना उसी के लिए संभव है जो सबसे उपर हो…

एक कौवा पेड़ पर बैठा था। कर कुछ नहीं कर रहा था। उसे देखकर एक खरगोश ने सोचा क्यों न वह भी कौवे की तरह बैठा रहे…. कुछ न करे। 

और वह जमीन पर बैठ गया। यूं ही। कुछ कर नहीं रहा था।

एक शेर आया और उसे पकड़ कर खा गया। 

कहानी की सीख – बैठे रहना और कुछ न करना उसी के लिए संभव है जो सबसे ऊपर हो।

सौजन्य से- संजय कुमार सिंह


30 भड़ासी चुटकुले

सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका के अग्रिम जमानत पर फैसला सुरक्षित

नई दिल्ली। जी न्यूज चैनल में खबर रोकने के एवज में पैसे मांगे जाने के मामले में जी न्‍यूज के मालिक सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। दिल्ली की साकेत कोर्ट ने सुभाष चंद्रा व पुनीत गोयनका की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया है। पुलिस ने दोनों की अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए अदालत में स्टेटस रिपोर्ट सौंपी, जबकि नवीन जिंदल के अधिवक्ताओं ने अदालत में दावा किया कि उनके मुव्वकिल को लगातार धमकाया जा रहा है।

गौरतलब है कि साकेत कोर्ट में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्राच की अर्जी पर कोर्ट ने आरोपी सुधीर व समीर को फिर से एक दिन के रिमांड पर देने की मांग मंजूर कर ली है। दोनों को आठ दिसम्‍बर को पेश होना है। पुलिस ने कहा था कि दोनों संपादकों को सुभाष चंद्रा के सामने बैठाकर पूछताछ करनी है। सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका को पुलिस ने नोटिस जारी करके आठ दिसम्‍बर को पेश होने को कहा है। इसके चलते ही एहतियात बरतते हुए सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका ने अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी।

पुलिस पहले ही स्‍पष्‍ट कर चुकी है कि जरूरत पड़ने पर इन लोगों को भी अरेस्‍ट किया जा सकता है। इसी डर की वजह से इन दोनों लोगों ने अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। संभावना है कि इस पर फैसला शाम तक आएगा। उल्‍लेखनीय है कि पुलिस ने गत दो अक्टूबर सासद नवीन जिंदल की कंपनी जिंदल स्टील पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) की शिकायत पर जी न्यूज चैनल के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलुवालिया के खिलाफ साजिश रचने व वसूली करने का आपराधिक मामला दर्ज किया था। शिकायत में कहा गया था कि दोनों संपादकों ने कोल आवंटन से संबंधित खबरें नहीं दिखाने के लिए बतौर विज्ञापन सौ करोड़ रुपये की माग की। क्राइम ब्राच ने 27 नवंबर को दोनों संपादकों को गिरफ्तार किया था, तब से वे तिहाड़ जेल में हैं।

No assurance from Delhi Police to Subhash Chandra on his arrest

: This is in connection with the alleged Rs 100 crore extortion bid by two editors of his channel : The Delhi Police today refused to give any assurance in a court here that Zee Group Chairman Subhash Chandra and his son will not be arrested, if their complicity comes up during probe in connection with the alleged Rs 100 crore extortion bid from Naveen Jindal's firm by two editors of his channel.

"We cannot commit or assure that they (Chandra and his son) will not be arrested. The moment we get a lead of the alleged extortion made on behalf of Zee Group by their two editors, we will arrest them," Rajiv Mohan, Special Public Prosecutor submitted before Additional Sessions Judge Raj Rani Mitra, who reserved the order on their anticipatory bail.

The prosecutor made the submission, while opposing the anticipatory bail plea moved by Chandra and his son Punit Goenka,  Managing Director of Zee Entertainment Enterprises Limited. Apprehending their arrest during interrogation by the police, Chandra and Goenka approached the court seeking interim protection. Senior advocate Geeta Luthra and Vijay Aggarwal, appearing for the father-son, contended that their clients are ready to join the probe, if the police gives them the assurance that the two will not be arrested during the time of interrogation.

"We (Chandra and Goenka) will join the investigation as has been asked by the police for December 8 and even before, if required. "But, if the police decides to arrest us, then it should give at least five days' time so that we can argue the matter at length on some other day," the counsel argued. (बीएस)

गाजीपुर के पत्रकार केके का भी पत्रकारिता से मोहभंग

: सलाह केंद्र शुरू किया : यशवंत और ब्रजभूषण के हाथों कराया लोकार्पण : पत्रकारिता के बिगड़ते रूप को देखकर पढ़े-लिखे पत्रकार मेनस्‍ट्रीम मीडिया से मुंह मोड़ने लगे हैं. स्थितियां ऐसी होती जा रही हैं कि पत्रकार अब पत्रकारिता छोड़ रोजी-रोजगार के दूसरे धंधों के साथ लोगों को जागरूक करने के दूसरे तरीके अपनाने लगे हैं. तमाम ऐसे पत्रकार हैं, जिन्‍हें लगता है कि वे कारपोरेट मीडिया के माध्‍यम से वो नहीं कर पा रहे हैं, जिसके करने का सपना-सोच लेकर पत्रकारिता में कदम रखा था, वो पत्रकारिता छोड़ जनसेवा एवं जीविकोपार्जन की दूसरी राहों की तरफ मुखातिब हो रहे हैं.

पिछले दिनों बिहार के कृष्‍ण कुमार कन्‍हैया ने पत्रकारिता छोड़ किसानों के बीच पहुंच गए तो ताजा मामला यूपी के गाजीपुर जिले का है. यहां कई वर्षों तक तमाम अखबारों एवं चैनलों को अपनी सेवा देने के बाद पत्रकार कृपा कृष्‍ण उर्फ केके भी अब जनसेवा एवं जीविकोपार्जन के दूसरे रास्‍ते पर कदम रख चुके हैं. 

केके ने गाजीपुर के कचहरी में एक सलाह केंद्र की स्‍थापना की है. इस केंद्र का लोकार्पण भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह और वरिष्ठ समाजसेवी  व आम आदमी पार्टी के नेता ब्रजभूषण दुबे ने किया. इस अभियान में वरिष्ठ समाजसेवी ब्रजभूषण दुबे की  भूमिका  सराहनीय है. यशवंत ने इस मुहिम की सराहना करते हुए इसे गांव स्‍तर तक ले जाने तथा लोगों से सीधा संवाद करते हुए उनकी समस्‍याओं के निराकरण पर जोर दिया.
 
केके इस केंद्र के माध्‍यम से गरीब एवं कम-पढ़े लिखे लोगों को निशुल्‍क सलाह उपलब्‍ध कराएंगे.  केके कहते हैं कि तमाम लोग ऐसे होते हैं, जिन्‍हें सरकार की योजनाओं के बारे में जानकारी नहीं होती. जानकारी होती भी है तो ये पता नहीं होता कि ये काम किस तरह से होगा, किस अधिकारी के पास जाने से होगा, किस विभाग में होगा. हम इन्‍हीं सब जानकारियों को निशुल्‍क लोगों को उपलब्‍ध कराएंगे. आईटीआई लगाने, भष्‍टाचार की शिकायत करने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की सलाह मुफ्त में लोगों को दी जाएगी. वे बताते हैं कि हम अपनी आमदनी के लिए जॉब वर्क पर निर्भर होंगे. यहां पर टाइपिंग और फोटो स्‍टेट जैसी सुविधाएं भी होंगी, जो लोगों को सशुल्‍क मिलेंगी. ये इसलिए किया जा रहा है ताकि इस केंद्र के संचालन का खर्च निकल सके.


केके गाजीपुर के पढ़े लिखे पत्रकारों में शुमार हैं. एमएम, एमकॉम, एमजे, एलएलबी की शिक्षा प्राप्‍त केके सम्‍यक भारत, लोक सत्‍य, पीस मेकर, बादल राग, सत्‍या टीवी, जनमत न्‍यूज, दूरदर्शन, सीएनवी7, आर्यन टवी, सी न्‍यूज, यूपी न्‍यूज, महुआ न्‍यूज जैसे संस्‍थानों को अपनी सेवा दे चुके हैं.

केंद्र के संचालन के लिए कई लोगों की टीम बनाई गई है. संचालन समिति ने बताया कि अब प्रत्येक सोमवार, शुक्रवार व शनिवार को निःशुल्क परामर्श व समस्या समाधान के लिये कचहरी स्थित हेल्प लाइन केन्द्र पर सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता एवं मीडिया कर्मी लोगों के लिये उपस्थित रहेंगे. इस केंद्र के उदघाटन के मौके पर मनीष, केके, अंजनी, सूर्यवीर, संजीव, राजेश आदि पत्रकार व तमाम सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे.

केके से फेसबुक पर संपर्क इस लिंक पर क्लिक करके कर सकते हैं- http://www.facebook.com/kripa.krishna.39

निश्चिंत रहे कांग्रेस, सभी मौकों के लिए सपा का ‘साम्‍प्रदायिक कार्ड’ तो है ना!

समाजवादी सरकार का दोहरा चरित्र उसके लिए लोकसभा चुनाव में संकट पैदा कर सकता है। वह 2009 के मुकाबले 2014 के चुनाव में और मजबूत होने की बजाये कमजोर हो जाये तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। एक तरफ केन्द्र की कांग्रेस सरकार का किसान विरोधी रवैया बरकरार है तो दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी साम्प्रदायिकता की आड़ में केन्द्र सरकार की खेवनहार बनी है। वह समझती है कि जनता उसके बहकावे में आ जाएगी, लेकिन उसे यह नहीं पता है कि केन्द्र की कांग्रेस गठबंधन सरकार की गलत नीतियों के कारण मंहगाई बढ़ती जा रही है तो उसके भ्रष्ट नेताओं के कारण देश में  भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है। इन दोनों ही विपत्तियों की मार सभी जातियों और वर्गों के लोगों को खाई जा रही है।

अपनी ‘दुकान’ चलाने के लिए समाजवादी नेताओं ने जनता की सभी समस्याओं की तरफ से मुंह मोड़ लिया है जो ठीक नहीं कहा जा सकता है। डीजल मंहगा हो गया, रसोई गैस, ईंधन मंहगा हुआ, परिवहन भाड़ा बढ़ गया, खाद-बीज की किल्लत हो गई। किसान की खेती मंहगी हो गई। उसकी उपज के दाम देने में तमाम बाधाएं पैदा की जा रही है। गेहूं, धान किसान सभी दुःखी हैं। कई राज्यों में तंगहाली और बदहाली से परेशान किसान आत्महत्या तक को मजबूर हो गए हैं। केन्द्र की कृषि विरोधी नीतियों के चलते ही देश में 2012-13 में प्रमुख फसलों की पैदावार में 2.8 फीसदी की गिरावट आने का अनुमान है। इन सब को अनदेखा कर सपाई नेता उलट बयानी करके जनता को भ्रमित करने में लगे हैं। उसके नेता भाजपा से दूरी के नाम पर कांग्रेस की करतूतों पर योंहि पर्दा डालते रहे तो निश्चित ही जनता भी उसे कांग्रेस की तरह माफ नहीं करेगी। सभी मौकों पर वह साम्प्रदायिकता का भूत खड़ा करके अपना साम्प्रदायिक कार्ड नहीं चला सकती है। उसके सांसदों और नेताओं की भी जनता के प्रति कुछ जवाबदेही बनती है।

बात कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों के कारण बने मौजूदा हालात की कि जाए तो आर्थिक शोध संस्थान सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन एकोनामी ने कहा है कि बुवाई क्षेत्र में कमी आती जा रही है। इससे प्रमुख फसलों का उत्पादन घटता जा रहा है। कृषि मूल्य नीति पर सरकार की परामर्शदात्री संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने वर्ष 2013-14 के लिए गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि किए जाने से इंकार कर दिया है। केन्द्रीय मंत्रिमण्डल की आर्थिक मामलों की सीमिति (सीसीईए) गेहूं पर फैसला करने से नवम्बर महीने में किनारा कर गई। कृषि मंत्रालय का प्रस्ताव था कि एमएसपी में 115 रूपए प्रति क्विंटल की वृद्धि की जाए किन्तु गेहूं का समर्थन मूल्य पिछले वर्ष की 1,285 रूपए प्रति कुंतल की दर से ही तय किया जा रहा है। यह कांग्रेस की किसान विरोधी नीति का ही परिणाम है कि देश के किसानों को तो उनकी फसल का उचित मूल्य भी नहीं दिया जा रहा है जबकि इन्हीं किसानों की फसल ऊॅचे दामों पर विदेशों को निर्यात की जा रही है। वैश्विक बाजार में भारतीय गेहूं की मजबूत मांग के चलते निर्यात निविदा पर 300 डालर से लेकर 324 डालर प्रति टन की कीमत मिल रही है। भारतीय गेहूं की उचित कीमतों के चलते निर्यात सब्सिडी 1275 करोड़ रुपए से घटकर मौजूदा वित्त वर्ष में 500 करोड़ रुपए से भी कम रह जाने की सम्भावना है।

ये आंकड़े जाहिर करते हैं कि भारतीय किसानों के साथ किस तरह उपेक्षापूर्ण हो रहा है। समाजवादी पार्टी किसानों को खुश करने के लिए कहती तो जरूर है कि गेहूं का समर्थन मूल्य 1500 रुपए से ज्यादा दिया जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी ने हमेशा किसानों और गांव-गरीब के हितों की चिन्ता की है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में प्रदेश के बजट का 70 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा कृषि क्षेत्र के लिए रखा था। समाजवादी पार्टी एफडीआई का विरोध इसलिए करती है क्योंकि यह किसान विरोधी कदम है। किसानों को इससे कोई फायदा नहीं होगी, लेकिन जब किसान विरोधी सरकार से समर्थन वापस लेने का उसका साथ नहीं देने की बात होती है तो सपा को कथित रूप से साम्प्रदायिकता याद आ जाती है। अगर समाजवादी पार्टी की बातों पर विश्वास कर लिया जाए तो ऐसा लगता है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के नाम पर वह हमेशा ही कांग्रेस के पाले में खड़ी रहेगी, क्योंकि उसके पास इसके अलावा कोई और विकल्प होगा भी नहीं। उसकी तो इतनी कभी ताकत होने से रही कि अपने बूते वह केन्द्र में सरकार बना सके।

समाजवादी नेता खुद तो किसान विरोधी राजनीति कर रहे हैं लेकिन कहते यह घूम रहे हैं कि पिछली बसपा सरकार को गांव और किसान दोनों से बैर था। पांच वर्षों तक बसपा राज में केवल पत्थरों, पार्कों, स्मारकों पर सरकारी खजाना लुटाया जाता रहा। समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों के हित की कई योजनाएं प्रारम्भ की है। उन्हें पेंशन, अनुदान, कर्ज माफी, मुफ्त सिंचाई की सुविधाएं दी है। उनकी बंधक जमीन की नीलामी पर रोक लगा दी है। गन्ना किसानों को उचित लाभकारी मूल्य दिलाए जाने का मुख्यमंत्री ने स्वयं आश्वासन दिया है। किसानों को समय से बीज, खाद मिले इसके लिए कड़े निर्देश दिए गए है। समाजवादी पार्टी सरकार किसानों की आर्थिक समृद्धि, कृषि उत्पादकता में वृद्धि एवं कृषि सुधारों को मजबूती देने के लिए कृतसंकल्प है, लेकिन यह सब कागजी बातें अधिक है और हकीकत इसमें कम है। सच्चाई तो यही है कि न तो बसपा को किसानों की चिंता थी और न ही मुलायम को किसानों की चिंता है। दोनों ही वोट बैंक की राजनीति में लगे हैं। यही वजह है उत्तर प्रदेश लगातार पिछड़ता जा रहा है। सभी वर्ग के लोगों का जीना मुहाल हो गया है। मुलायम को समझना चाहिए कि साम्प्रदायिकता का कार्ड खेल कर वह लम्बे समय तक प्रदेश की जनता को बूवकूफ नहीं बना सकते हैं क्योंकि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।

सपा को समझना चाहिए कि हिन्दुस्तान की राजनीति में सिर्फ उसके ही नेताओं के कंधों पर आदर्श की बात करने और किसी कौम या बिरादरी का ठेकेदार बनने की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। वह जिन कौमों के लिए हितैषी बनने की बात बार-बार दोहराते हैं, अगर उनकी बातों में सच्चाई होती तो यह इन कौम के लोगों ने उन्हें कब का दिल्ली का ताज भी पहना दिया होता जिसका वह वर्षों से सपना देखते आए हैं। वह जब किसी पर एक उंगली उठायेंगे तो तीन स्वतः उनकी तरफ उठेंगी। वह जब किसी नेता या पार्टी पर साम्प्रदायिकता की तोहम्मत लगा कर हमला बोलते हैं तो उन्हें भी तुष्टिकरण को बढ़ावा देने के लिए बदनाम होना पड़ता है। कुछ राजनैतिक पंडित तो यहां तक कहते हैं कि मुलायम की सोच अगर व्यापक होती और वह कुछ कौमों को साथ लेकर चलने की बजाए सबको साथ लेकर चलने पर ज्यादा तवज्जो देते तो उनके जैसे काबिल और जमीन से जुड़े नेता को देश की जनता कब का प्रधानमंत्री पद पर बैठा चुकी होती। तब, मुलायम को कांग्रेस के सामने यह लाचारी नहीं दिखाना पड़ती कि वह तो आपसे समर्थन ले सकते हैं या दे सकते हैं, 273 का आंकड़ा नहीं छू सकते।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

द सी एक्‍सप्रेस से अमन पठान का नाता खतम

जो फसल मैने बोई वो काटी नही कभी, दामन में गैर की मेरी मेहनत के फल गए। यह पंक्तियां द सी एक्सप्रेस कासगंज ब्यूरो कार्यालय में तैनात रिर्पोटर अमन पठान पर सटीक बैठ रही हैं, क्योंकि समाचार संपादक राजीव दधीच ने बीते बुधवार की शाम क्राइम रिर्पोटर अमन पठान को अकारण संस्थान से निष्कासित कर दिया गया। समाचार संपादक के इस फैसले से द सी एक्सप्रेस जुड़े रिर्पोटरों में रोष व्याप्त है। कासगंज ब्यूरो कार्यालय में कर्मचारियों में किया जा रहा बदलाव संस्थान के लिए घातक साबित हो सकता है।

जिस रिर्पोटर ने द सी एक्सप्रेस को कासगंज में लीड़िग पेपर की श्रेणी में लाने के लिए कोई कसर बाकी नही छोड़ी, उसी रिर्पोटर को संस्थान ने अकारण निष्कासित कर दिया। क्राइम रिर्पोटर अमन पठान का निष्कासन जातिवाद राजनीति की चाल बताया जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले राजीव दधीच ने कासगंज ब्यूरो कार्यालय में दो नए चेहरे ज्ञान त्रिवेदी, आर्येन्द्र यादव उर्फ गुड्डू यादव की भर्ती की है। मीडिया बाजार में अफवाह फैली हुई है कि ब्यूरो चीफ जितेन्द्र प्रताप को ज्ञान त्रिवेदी के आने के बाद हटा दिया गया है। जब इस बाबत अमन पठान से बातचीत की गई तो उन्होने बताया कि उन्हें अपने निष्कासन का कतई दु:ख नही है। पत्रकारिता में जातिवाद में सरोकार बढ़ रहा है। अफसोस सिर्फ इतना है संस्थान ने मेहनत का फल नही दिया। किसी की मेहनत का किसी को फल मिल गया है।

एफडीआई पर इससे शानदार कार्टून दिखा हो तो बताइएगा…

संसद में एफडीआई पर गुणा-गणित के मसले को लेकर आज बहुत सारे कार्टून अखबारों में छपे हैं, और फेसबुक ट्विटर आदि पर शेयर किए गए हैं. नीचे जो कार्टून दे रहा हूं, वह सबसे मस्त लगा. ट्रिपल एम यानि मनमोहन, मुलायम और मायावती की तिकड़ी के सांठगांठ को इससे अच्छे तरीके से नहीं दिखाया-बताया-समझाया जा सकता. कार्टूनिस्ट को बधाई इस शानदार काम के लिए…

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

बौद्ध अध्ययन की अन्तरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘संगायन’ का विमोचन

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा में डॉ. भदंत आनंद कौसल्‍यायन बौद्ध अध्‍ययन केंद्र के प्रभारी अध्‍यक्ष डॉ. सुरजीत कुमार सिंह द्वारा संपादित बौद्ध अध्‍ययन की अंतरराष्‍ट्रीय अर्द्धवार्षिक शोध पत्रिका ‘संगायन’ के प्रवेशांक का लोकार्पण भारतीय बौद्ध अध्‍ययन सोसाइटी की 12 वीं वार्षिक कांग्रेस में देहरादून के दून विश्‍वविद्यालय में राष्‍ट्रीय पांडुलिपि मिशन की निदेशक प्रो.दीप्ति त्रिपाठी के द्वारा किया गया। 

इस अवसर पर दून विश्‍वविद्यालय के कुलपति प्रो.बी.के.जैन, उत्‍तराखंड संस्‍कृत विश्‍वविद्यालय, हरिद्वार की पूर्व कुलपति प्रो.सुधारानी पांडे, नवनालंदा महाविहार के पूर्व निदेशक प्रो.उमाशंकर व्‍यास, भारतीय बौद्ध अध्‍ययन सोसाइटी के अध्‍यक्ष प्रो.सत्‍यप्रकाश शर्मा, 12 वीं बौद्ध अध्‍ययन काँग्रेस के महासचिव प्रो.भागचंद्र जैन और भारतीय बौद्ध अध्‍ययन सोसाइटी के महासचिव प्रो.वैद्यनाथ लाभ तथा देश-विदेश के बौद्ध अध्‍ययन व पालि भाषा से जुड़े विद्वान व शोधार्थी उपस्थित थे।

‘संगायन’ का प्रकाशन ‘पालि भाषा एवं साहित्‍य अनुसंधान परिषद’ के द्वारा किया गया है। इसके संपादक मण्डल में पालि भाषा एवं साहित्‍य अनुसंधान परिषद के संरक्षक व अध्‍यक्ष प्रो.भिक्षु सत्‍यपाल महाथेर समेत प्रो.एम.के.दास, प्रो.के.टी.एस.सराओ, प्रो.वैद्यनाथ लाभ, प्रो.संघसेन सिंह, प्रो.अंगराज चौधरी और प्रो.भालचंद्र खांडेकर शामिल हैं।

पत्रिका में देश भर के बौद्ध विद्वान और चिंतकों के अंग्रेजी एवं हिंदी में शोध आलेख प्रकाशित किए गए हैं। ‘संगायन’ के प्रधान संपादक डॉ.सुरजीत कुमार सिंह ने बताया कि आने वाले समय में इस पत्रिका में विदेशों के बौद्ध चिंतकों के शोध लेख भी प्रकाशित किए जाएंगे। उन्‍होंने आशा जताई कि बौद्ध धम्म और दर्शन के वैश्विक प्रचार-प्रसार को इस पत्रिका से माध्‍यम से और बल मिलेगा।

नवीन जिंदल के खिलाफ संपादक, सिस्टम, पुलिस वाले क्यों नहीं खड़े हो रहे?

Harshvardhan Tripathi : सुधीर, समीर दोनों अभी भी जेल में है। ताजी खबर ये है कि जी के संपादकों के बाद अब जी के मालिक सुभाष चंद्रा अपनी जमानत के लिए याचिका डाल रहे हैं, सावधानी वाली। जी के दोनों संपादक इसीलिए जेल में हैं ना कि वो, ब्लैकमेलिंग कर रहे थे। अभी तक सारे संपादक खिलाफ हो गए थे इन दोनों के। ठीक भी लग रहा था। 

लेकिन, अब बड़ा सवाल ये है कि नवीन जिदंल साहब के लोगों ने 20 करोड़ रुपए का तो, विज्ञापन (ब्लैकमेलिंग का एक हिस्सा) देना मान ही लिया था। मामला तो, 100 करोड़ पर बिगड़ा फिर जिंदल साहब के खिलाफ अब वही सारे संपादक या सिस्टम, पुलिस क्यों खड़े होने से बच रही है। 

टीवी जर्नलिस्ट और पी7न्यूज में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हर्षवर्धन त्रिपाठी ने यह विचार अपने फेसबुक वॉल पर व्यक्त किया है.


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zee jindal

एकाध मामले कोर्ट में जाएं तो दिमाग ठिकाने आ जाएंगे : गीताश्री

Geeta Shree : साहित्य में इन दिनों व्यक्तिगत हमले बहुत बढ रहे हैं। जिसको जो मर्जी आ रहा है किसी के बारे में लिखकर विवाद पैदा कर दे रहा है। कोई आधारहीन साहित्यिक चोरी का इल्जाम लगा रहा है तो कोई अपने साथ संबंधो को जोड़ कर प्रचार कर रहा है। घिन्न आने लगी है अब…अपना नया कुछ रच पाना संभव नहीं है तो यही सब लिखकर प्रचार पाते रहो और तूफान उठाते रहो..ये कौन सी प्रवृति है साहित्य में..ये कैसी दुनिया है जो मेरी समझ से परे है। अपने को महान साबित करने की कैसी होड़ है…राजेंद्र यादव तो अक्सर करते हैं और एक लेखिका ने उन पर कोर्ट केस करने की ठान ली..फिर बीच बचाव करके उनको समझाया गया कि साहित्यिक मसलों को कोर्ट से दूर रखना चाहिए…क्या सिर्फ साहित्य के नाम पर आप कुछ भी लिख देंगे और आप बेहद रसूख वाले लोग हैं तो सदियां आप पर भरोसा करेंगी…मुझे तो लगता है कि एकाध मामले कोर्ट में जाएं तो दिमाग ठिकाने आ जाएंगे..साहित्यकारो की दोस्ती एक डरावने सपने में बदल रहा है….

Pankaj Jha कुछ कहानी स्पष्ट लिखती.

Geeta Shree किसी का नाम लेना ठीक नही….कहानियां तो बहुत हैं..पाखी का ताजा अंक देखें..पढे..एक नया विवाद..आधारहीन..इसके पहले कितने विवाद हो चुके..साहित्यिक वध कहते हैं इसे…विवादप्रिय लोग इस हत्या में मजा लेते हैं..

Tejendra Sharma Hindi sahitya ki dunia mein itnee boo hai ki nahaatey samay bhee naak par rumaal rakhna padta hai.

Shikha Shalini जब आपने पाखी का जिक्र कर ही दिया है तो महुआ माजी का नाम लेने में आखिर क्या विवशता है? उन पर लगे आरोप गंभीर हैं। उन्हें वक्त चाहे जितना लेना हों ले लें लेकिन इसका संतोषजनक जवाब आना चाहिए। यह व्यापक हिंदी लेखक और पाठक समाज दोनों के हित में होगा।

Geeta Shree समझ में आ रहा है….मुझे कम ही दिन हुए इस इलाके में आए हुए…माजरा समझ गई..लेकिन इसका इलाज जरुरी..किसी के बारे में कुछ भी लिख देने की आदत खत्म होनी चाहिए..अब साहित्य भी सबूत की मांग करेगा तब कहां से पेश करेगें..जरुरी है कि किसी को सबक सिखाया जाए..कुछ फर्क पड़े तब। पेश करो सबूत…किसी की डायरी के अंश सबूत होने लगे तो बैक डेट में किसी के बारे में कुछ भी लिख दो..ये दुनिया…अपने गिरेबान में क्यों नहीं झांकती..नंगो को क्या फर्क पड़ता है..आइना सामने हो तो भी नहीं…
 
DrKavita Vachaknavee एक मित्र को कोट करना चाहूँगी – "श्रवण जी ने यह बात बहुत विलंब से लिखी और जिस रूप में लिखी उससे एक स्वर उभरता है कि चूंकि महुआ माजी ने उनके प्रति आभार व्यक्त नहीं किया इसलिए वह ऎसा लिख रहे हैं. जब वह महुआ माजी की प्रवृत्ति को पहचान गए थे तब उनसे यह उम्मीद ही क्यों कर रहे थे. इस बात से उनके आरोप हल्के हो जाते हैं, लेकिन जो तथ्य उन्होंने प्रस्तुत किए हैं उनपर विचार किया जाना चाहिए………" 

आउटलुक हिंदी मैग्जीन की वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार गीताश्री के फेसबुक वॉल से.

सुभाष चंद्रा एवं पुनीत गोयनका ने दी अग्रिम जमानत की अर्जी

: आज होगी सुनवाई : नई दिल्‍ली : जी न्यूज और जिंदल ग्रुप के केस में जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा और उनके बेटे पुनीत गोयनका ने दिल्ली के साकेत कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी है. इस अर्जी पर आज सुनवाई होगी. सुभाष चंद्रा के अधिवक्‍ता ने बताया कि सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका पुलिस की जांच में हर संभव सहयोग करना चाहते हैं, इसलिए एहतियात के तौर पर अग्रिम जमानत की अर्जी दी गई है ताकि पुलिस बेवजह उन्‍हें अरेस्‍ट ना करे.

दिल्‍ली क्राइम ब्रांच सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका को पूछताछ के लिए तीन बार नोटिस भेज चुकी है. तीसरे नोटिस में दोनों से आठ दिसम्‍बर को पेश होने को कहा गया है. इसके लिए कोर्ट से दोनों संपादकों की पेशी का आर्डर भी मिल गया है. साकेत कोर्ट ने आठ दिसम्‍बर को दोनों संपादकों सुधीर चौधरी और समीर चौधरी को पेश होने का आदेश दिया है. पुलिस सभी को आमने सामने बैठाकर बात करना चाहती है.

गौरतलब है कि नवीन जिंदल की कंपनी ने आरोप लगाया है कि जी न्यूज ने खबर रोकने के लिए 100 करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी. इसमें नवीन जिंदल की कंपनी की तरफ से दोनों संपादकों के अलावा सुभाष चंद्रा और उनके पुत्र पुनीत के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था. इस मामले में सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया को पुलिस ने 27 नवम्‍बर को अरेस्‍ट किया था तथा कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी.

सुभाष चंद्रा को भारी पड़ सकते हैं ये 286 सेकेंड

जिंदल ग्रुप से 100 करोड़ रुपये की उगाही के मामले में जी न्यूज के चेयरमैन सुभाष चंद्रा पर 286 सेकेंड भारी पड़ सकते हैं। जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की जब हयात होटल में जिंदल ग्रुप के अधिकारियों के साथ बैठक खत्म हुई तो समीर ने चंद्रा से फोन पर लगभग पांच मिनट बात की थी। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा चंद्रा और गिरफ्तार संपादकों को आमने-सामने बैठाकर यह जानने का प्रयास करेगी कि इस दौरान क्या बात हुई थी।

अपराध शाखा ने दावा किया है कि पुलिस के पास चंद्रा के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। पुलिस सूत्रों ने बताया कि होटल की बैठक खत्म होने के बाद हुई ये बातचीत ही चंद्रा के खिलाफ सबूत बनती जा रही है। हालांकि अभी तक पुलिस को दिए बयान में दोनों संपादक चंद्रा का बचाव कर रहे हैं। बैठक के बाद सुधीर की भी चंद्रा से बात हुई थी। संपादकों की जिंदल ग्रुप के साथ तीन बैठकें हुई थीं। संपादक बैठक में जाने से पहले और बैठक खत्म होने के बाद चंद्रा से बात करते थे। मोबाइल कॉल डिटेल से ये बात स्पष्ट हुई है।

दूसरी तरफ जी ग्रुप ने जिंदल से रुपये वसूलने के लिए जो कानूनी कागजात तैयार किए थे उनमें 100 करोड़ रुपये चेक से देने की बात कही गई थी। चेक जी ग्रुप के नाम से मांगे गए थे। ‘वसूली’ का लीगल पत्र जी ग्रुप के टेन स्पोर्ट्स के लॉ डिपार्टमेंट में तैनात एडवाइजर वीरेश दहिवार ने बनाया था। अपराध शाखा ने पूछताछ के लिए उन्हें बुलाया था, लेकिन वे पेश नहीं हुए। जी ग्रुप की ओर से कहा गया है कि वीरेश छुट्टी पर हैं। छुट्टी से लौट कर वे पूछताछ में शामिल होंगे। (उजाला)

दिल्‍ली के पास देने के लिए कुछ बचा नहीं और बनारस से मैंने कभी मांगा नहीं

बिना संदर्भ के कुछ भी कहीं भी छाप देना पाठक के साथ ज्‍यादती है, इसलिए यह इंट्रो दे रहा हूं। बनारस गया था, चार दिन हुए लौटे। अब भी दिमाग ठिकाने नहीं है। कुछ पुराने सवाल थे, खुद से किया एक वादा था, और भी बहुत कुछ… लौट कर यह लिखा। कुछ मित्रों का कहना था कि मुझे इसे छापना नहीं चाहिए। मुझे लगता है कि लिखने और छपने का बड़ा गहरा सम्‍बन्‍ध है। इसे डायरी का हिस्‍सा माना जा सकता है, लेकिन हर डायरी का एक सामाजिक मूल्‍य भी होता है, हो सकता है। दूसरे, लिख कर बक्‍से में रख लेने से बोझ जस का तस रहता है। छपने के बाद हलका होने की गुंजाइश रहती है। न हो, तो अपनी बला से। अस्मिताओं के विमर्श और अस्मिताओं के संकट के इस दौर में एक संकट ऐसा भी है, जो यदि निहायत निजी है तो इसके एकाध साझीदार भी होंगे ही, क्‍योंकि मेरे जाने कुछ भी नितांत निजी नहीं होता। सार्वजनिकता की गुंजाइश हर जगह है। क्‍यों न ऐसा सचेतन तौर पर किया जाए? रेचन के कई तरीकों में यह भी एक है। ''…जो जिगर के पार होता!'' शीर्षक सुझाने के लिए मेरे इस ब्लाग पोस्‍ट के पहले पाठक मित्र व्‍यालोक का शुक्रिया… -अभिषेक श्रीवास्तव.

…जो जिगर के पार होता!

अभिषेक श्रीवास्तव

मैंने एक वादा किया था खुद से। इस बात को दस साल से ज्‍यादा हो गए। दस साल जब कहता हूं तो… ख़ैर, बहुतों के जीवन में बीस, तीस और पचास साल गुज़रे होंगे ऐसे ही, इस पर क्‍या बात करनी। वे जाती हुई गर्मी और आ चुकी बरसात के बीच के चिपचिपे दिन थे जब खादी वाला भूरा कुर्ता, बाटा की भूरी चप्‍पल और नीली जींस पहन कर लखनऊ में एक जन जागरूकता अभियान के परचे लिए मैं सड़कों पर घूम रहा था। गुजरात दंगा बीता था। हम लोग फासीवाद का डर लोगों के मन में बैठा रहे थे। ऐसे लोगों को फासीवाद की आहट से चेताने और बदले में उनसे राजनीतिक चंदा उगाहने में हम लगे थे, जो बिल्‍कुल निस्‍पृह भाव से सेल्‍स टैक्‍स दफ्तर में बैठ कर सरकारी पंखे के नीचे रिश्‍वत लिया करते थे। वे आज भी वहीं हैं जबकि हत्‍यारा, पीएमओ की राह पर काफी आगे जा चुका है और फासीवाद के खिलाफ लोग अब परचे नहीं बांटते। उन्‍हीं चिपचिपे दिनों में खबर आई थी कि मेरा दिल्‍ली जाना तय हो चुका है। लखनऊ से झट बनारस आया, एक बड़े से नीले सूटकेस में सामान पैक किया और पहली बार काशी विश्‍वनाथ को छोड़ कर शिवगंगा एक्‍सप्रेस से मैं दिल्‍ली आ गया। गाड़ी बदली, शहर बदला। और फिर, मैंने खुद से एक वादा किया।

मुझे नहीं पता था कि दिल्‍ली में दस साल कैसे बीतते हैं। मैं नहीं जानता था कि दस साल बाद किसी वादे को निभा पाना वास्‍तव में कितना आसान या मुश्किल होता है। लेकिन अपना वादा मुझे भरसक याद रहा। इस दौरान ट्यूशन, पढ़ाई, आंदोलन, नौकरी, अनौकरी, प्रेम, शादी, बसावट और आजीविका के जटिल दुश्‍चक्र में भी मैं अपना वादा नहीं भूला। हां, वादे को पूरा कर पाने का निश्‍चय आज से तीन साल पहले ही भ्रम में, खुशफ़हमी में, बदल गया था। बावजूद इसके, मैं नहीं चाहता था कि दस साल बीते और मैं अपने ही सामने झुठला दिया जाऊं। इसीलिए, 2008 से दिल को भरमाए रखने का एक सिलसिला शुरू हुआ जो जुलाई 2012 आते-आते मेरे भीतर अवसाद की तरह घर कर चुका था। मेरा वादा मेरी आंखों के सामने टूट रहा था और मेरा साथ देने को कोई नहीं था। ज़ाहिर है, वादा भी मैंने किसी से पूछ कर, कह कर नहीं किया था। ये समस्‍या मेरी थी, निहायत निजी।

हर बार जब मैं लौटता किसी न किसी बहाने से, सब पूछते कि मैं काशी विश्‍वनाथ से क्‍यों जाता हूं जबकि शिवगंगा तो 12 घंटे में बनारस पहुंचाती है। इसका जवाब इतना आसान नहीं होता था। बीएचयू के दिनों में लड़कों को घर जाने के लिए ट्रेन किराये में पचास फीसदी रियायत मिलती थी। मुझे घर नहीं जाना होता था, इसलिए किराये में छूट का सुख मैं कभी नहीं ले सका। जहां घर था, वहां कुछ नहीं था। जहां कुछ नहीं था, वहीं घर था। कहां जाता ट्रेन से? इसीलिए जब दिल्‍ली आया, तो एक कमी पूरी हो गई कि चलो, दिल्‍ली में जब टिकट करवाऊंगा तो कह सकूंगा कि गांव जा रहा हूं। सभी तो ऐसा ही कहते हैं। कौन जानेगा फिर, कि मेरा गांव कहां है। बस ज्‍यादा से ज्‍यादा इतना, कि ये तो बनारस का रहने वाला है। फिर बनारस आकर सोच लूंगा कि कहां टिकना है, या कहां जाना है। दिल्‍ली में रह कर बार-बार बनारस जाने का खयाल और जब भी जाने का तय हो, उसकी मुनादी करना, फिर लौटने के बाद कुछ-कुछ लिख देना, दूसरों को किस्‍से सुनाना, फोटो शेयर करना, ये सब आज़माइश बीएचयू वाली कमी को पूरा करती थी जहां मैं किसी से नहीं कह पाता था कि इन छुट्टियों में मैं गांव जाऊंगा। या कि छुट्टियों के बाद, गांव से मैं फलां-फलां चीज़ें लेकर आया हूं।

वास्‍तव में, आज तक दिल्‍ली में मुझसे किसी ने नहीं पूछा कि मेरा गांव कहां है। बहुत से लोगों को मैं खुद ही बताता हूं कि मेरा पैतृक घर गाज़ीपुर में है। कुछ से कहता हूं कि बनारस का रहने वाला हूं। अक़सर कुछ लोग पूछते हैं बनारस में कहां, तो बोल देता हूं खोजवां, अर्दली बाज़ार या साकेत नगर। जैसी स‍हूलियत हो। एकाध बार फंसा भी हूं। जब लोग गाज़ीपुर के बारे में पूछते हैं, तो अपेक्षाकृत आसानी होती है क्‍योंकि वहां घर का एक ही पता है। लेकिन उसके आगे-पीछे मुझे कुछ नहीं पता। जब कभी किसी से गांव के नाम पर सिखड़ी कहता हूं, जैसा कि मुझे बचपन से बताया गया है, तो डरता हूं कि कहीं कुछ और न पूछ दे और मैं जाली साबित हो जाऊं। वैसे, जन्‍मस्‍थान के अलावा गाज़ीपुर कभी मेरा घर नहीं रहा, सिवाय नाना के घर के, जहां मेरे बचपन का कुछ समय बीता। और नाना, अब रहे नहीं। छह साल हो गए। जब तक वे थे, गाज़ीपुर चेतन के एक कोने में बना हुआ था। बनारस इस मामले में मेरे लिए कहीं ज्‍यादा ऑथेंटिक स्‍पेस है, क्‍योंकि वहां के आगे-पीछे सब कुछ कहानी में बुनकर बोल तो सकता हूं। मैं बनारस पर क्‍लेम कर सकता हूं। बस, इतना न पूछे कोई, 'केकरे घर से हउवा'?

दरअसल, बनारस में जिन जगहों पर मैं अलग-अलग समय में रहा, उनका उल्‍लेख अपने पते के तौर पर दिल्‍ली में करने की जो सहजता है, वह मेरा जीवन आसान बनाती है। बिल्‍कुल दूसरे कुछ लोगों की तरह जिनके अपने घर का एक पता तय है। और यदि किसी ने पूछ ही दिया कि बनारस में कौन गांव, तो चौबेपुर से बढि़या जवाब क्‍या होगा, जहां मैं हाईस्‍कूल तक वास्‍तव में रहा हूं। एक बार किसी ने पूछा था, चौबेपुर में कहां? मैंने उसे पावरहाउस के सामने से लेकर डुबकियां के बीच उलझा दिया। वैसे, जब कभी फंसा, कह दिया कि मामा के यहां रहता था। यहां कहानी की विश्‍वसनीयता असंदिग्‍ध हो जाती थी। अब ये थोड़ी कोई जानता है कि मेरा बचपन जहां बीता, वहां हर अगला आदमी मामा कहलाता था। अब भी कहता हूं, अर्दली बाज़ार वाले मामा या साकेत नगर कालोनी वाली मौसी। मेरे जानने वालों में शायद कुछ को ही पता हो कि मेरे अधिकतर परिजन लखनऊ में हैं, लेकिन लखनऊ मेरे अतीत का हिस्‍सा नहीं है। उसका जि़क्र मेरी कहानियों में तकरीबन वैसे ही आता है जैसे दूसरे लोगों की कहानियों में चंडीगढ़ वाली मौसी और रांची वाले मामा, वगैरह…।

तो ये तय रहा कि बनारस में कुछ जगहों पर रहने के कारण और उन्‍हीं जगहों को अपने घर का पता लोगों के सामने घोषित करने के कारण मैं बनारस से ज्‍यादा सहज हूं। ये सहजता बिल्‍कुल वैसी तो नहीं जैसी बनारस के किसी बाशिंदे के दिल्‍ली आने के बाद बनारस को लेकर होती है, लेकिन जब तक मैं बनारस पहुंच नहीं जाता, तब तक तो कम से कम मेरा जीवन आसान रहता ही है। अब वहां आकर कौन देख रहा है कि मैं होटल में रुका हूं या किसी मित्र के यहां। ये जो पूरा प्रपंच मैंने रचा है अपने घर/गांव के पते के इर्द-गिर्द, इसने मेरे जीवन की दो मुश्किलों को हल कर दिया है। अव्‍वल तो ये, कि दिल्‍ली इत्‍यादि के लोग मुझे बनारसी समझते हैं, जो लिटरली मैं हूं नहीं। दूजे, बनारस में आज मेरे जानने वाले गिनती के दस लोग भी नहीं हैं जो कि दिल्‍लीवालों से बात कर के मेरा झूठ पकड़ सकें। वैसे भी, कुछ भी चौबीस कैरेट नहीं होता। कहा जाए तो मैं खुद को बनारसी या गाज़ीपुरिया साबित कर सकता हूं ज़रूरत पड़ने पर। बुद्धिजीवी होने के ये सब लाभ हैं। गाज़ीपुर के कुछ लोगों के सामने मैं खुद को प्रवासी गाज़ीपुरी बताकर वहां के बारे में अपनी अज्ञानता को छुपा लेता हूं और वे सब समझते हैं कि मैं अब दिल्‍लीवाला बन चुका हूं, जो कभी घर/गांव नहीं जाता। हंसी आ रही है…।

बहरहाल, इसके आगे की स्थिति ये है कि मैं अब भी गांव जाना चाहता हूं, जैसे मैं बीएचयू की छुट्टियों में जाना चाहता था। तब काशी विश्‍वनाथ बनारस की स्‍टार ट्रेन हुआ करती थी। उससे एक रिश्‍ता सा लगता है। शिवगंगा को मैं कभी अपना नहीं सका। अव्‍वल तो इसलिए, कि मेरे बनारस छोड़ने के साल ही वह शुरू हुई थी। दूजे, उसमें बैठिए, खाना खाइए और सो जाइए, सवेरे सीधे बनारस में आंख खुलेगी। लगेगा ही नहीं कि आप अपने गांव जा रहे हैं। इसीलिए इस बार मुझसे जब फिर पूछा गया कि मैं काशी विश्‍वनाथ जैसी धीमी गाड़ी से क्‍यों जा रहा हूं, तो इस बारे में मेरे विचार पक चुके थे। मैंने तड़ से जवाब दिया कि देखिए, खरामा-खरामा चलने का लाभ यह होता है कि आप दिल्‍ली के विचारों का बोझ गाड़ी की धीमी गति के कारण उतार फेंक पाते हैं। इतना वक्‍त होता है कि खाली बैठे-बैठे आप गांव जाने के मोड में आ जाते हैं। और जब रात में सोते हैं, तो इस उम्‍मीद में कि सुबह अपने गांव का स्‍टेशन दिखेगा। सुबह का मतलब शिवगंगा की तरह सात बजे नहीं, खांटी पांच बजे। इस वक्‍त जब आप बनारस जंक्‍शन पर उतरते हैं, तो ऊंघते हुए शहर में अंगड़ाई लेता ट्रैफिक आपको अहसास कराता है कि आप गांव आए हैं। फिर आपकी मर्जी, चाहे तो अपने किसी पते पर पहुंच जाइए या फिर सीधा घाट पर। बनारस में रह कर इतना सुबह उठना और घाट पर जाना दिल्‍ली में बस चुके एक व्‍यक्ति के लिए वैसे भी संभव नहीं होता। काशी विश्‍वनाथ इस लिहाज से सबसे अच्‍छा साधन है। मैं हमेशा इसमें स्‍लीपर में चलता हूं। हमेशा बनारस के रहने वाले लोग मिल जाते हैं। मुसाफिरों से बातचीत में जब आप बनारस के नाम पर एक अलेजिएंस कायम करते हैं, तो लगता है कि जैसे उनके घर लौटने में आप भी सहभागी हैं। बीएचयू वाली कमी पूरी हो जाती है।   

पिछले तीन साल में मैं जब चला हूं, काशी विश्‍वनाथ से ही। दस साल बाद दिल्‍ली छोड़ देने का खुद से किया वादा 2008 में ही मैं जानता था कि टूटेगा। शायद यही बेचैनी थी कि पिछले दस साल में 2012 इकलौता साल रहा जब मैं तीन बार बनारस हो आया। चौथी बार जाते-जाते रह गया था। हर बार वजह बतानी पड़ती है न! साल की शुरुआत में एक शादी, फिर पटना में कार्यक्रम के बहाने और इस बार भी दो शादियां। लेकिन एक बहाना मेरे पास स्‍थायी था, जिसका इस्‍तेमाल इस बार मुझे करना पड़ा। कहता तो हर बार हूं, लेकिन अबकी चूंकि शादी किसी ऐसे खास की नहीं थी जिसमें न जाना अखरता, इसलिए मेरा पुराना बहाना काम आया। मैं शायद चाहता भी था भीतर से कि अबकी इस बहाने को खत्‍म कर दूं ताकि अगली बार कोई बहाना ना रहे। खुश्‍फ़हमी ज्‍यादा देर नहीं टिकती। तीन साल से खुशफ़हमी में हूं कि दस साल दिल्‍ली में रहने के बाद बनारस लौट जाऊंगा। बेमतलब पिछले तेरह महीने से लौटने की गणित लगा रहा था बेरोज़गारी में। इसी जून में गुरु ने कहा था, 'अपना खूंटा तलाशो'। खूंटा तलाशना जितना आसान होता है, शायद उतना ही मुश्किल भी। मुझे खुद नहीं पता था कि मैं आखिर क्‍या सोच कर बनारस में ज़मीन, मकान, दुकान आदि की ऑनलाइन खोज कर रहा था। एकाध मित्रों को मैंने कह डाला था कि सस्‍ते में कोई मकान-दुकान दिलवा दें। अपने पान वाले तक से मैंने ज़मीन खोजने को कहा था। ज़मीन भी तो उसी को मिलेगी जिसकी पहले से कोई ज़मीन हो। ज़मीन होती, तब न मिलती! मैंने पूरे घर को भरमा रखा था कि बनारस में एकाध काम-धंधा चालू करने वाला हूं। सब झूठ था। मैं जानता था कि मेरा खूंटा दिल्‍ली में ही गड़ा है। ठीक वैसे ही, जैसे 2002 में मैं जानता था कि मुझे दिल्‍ली जाना ही है। परीक्षा और नतीजा तो सब बाद की चीज़ थी।

क्‍या किसी बात को जानना और फिर उसे मानना उतना ही ज़रूरी है? मसलन, मैं जानता हूं कि मुझे दिल्‍ली में ही रहना है, लेकिन मैं इसे मान भी लूं, ये किसने कहा? मैं इसी डिनायल मोड में लंबे समय से था। कहां है कुछ बनारस में मेरे लिए? मेरा सिर्फ एक सामान था छूटा हुआ, वही पुराना बहाना जिसे लेकर हर बार मैं बनारस चला जाता था और खाली हाथ लौट आता था। हमेशा छुट्टी ही मिलती थी युनिवर्सिटी में। इस बार मैंने पूरे जतन से अपनी दस साल पुरानी डिग्री निकाल ली। एक मित्र कह रहे थे, डिग्री निकाल लेने से शहर से रिश्‍ता तो नहीं टूट जाता? उन्‍हें बताना मुश्किल है कि बीएचयू की वो डिग्री एक बैसाखी थी जिसके सहारे मैं अपने घर का पता लोकेट कर पाता था। अब मेरे पास बताने को कोई वजह नहीं है कि मैं बनारस क्‍यों जा रहा हूं। मैं जब डिग्री लेकर आया, तो मुझसे साकेत नगर वाली मौसी ने पूछा, ''अगली बार कब आओगे?'' और मेरे मुंह से निकल गया, ''अब कभी नहीं।''

दरअसल, बनारस मेरा शहर कभी नहीं था। गाज़ीपुर के शुरुआती तीन साल छोड़ दें तो ग्रेजुएशन तक मैं इसी शहर में रहा। रवींद्रपुरी, तेलियाबाग, ककरमत्‍ता रहा बचपन में, फिर लंबे समय तक चौबेपुर से सिगरा अप-डाउन करता रहा। बीएचयू में जिस साल साइन डाइ हुआ, मैं विवेकानंद हॉस्‍टल में था। फिर बाहर आया। खोजवां रहा। घौसाबाद, दारानगर, सब जगह रहा। उसके बाद फिर बीएचयू और साकेत नगर कालोनी। लेकिन बनारस मेरा शहर नहीं बना। ये बात मुझे पता नहीं थी। मुझे ये बात कुछ लोगों ने बताई। पहली बार, जब 2006 में मैंने अपना ब्‍लॉग बनाया और कुछ संस्‍मरणात्‍मक लिखा। कुछ लोगों को लगा कि यह पोस्‍ट अश्‍लील है। मुझे बीएचयू से लेकर दिल्‍ली के टीवी चैनल में काम करने वाले कुछ बनारसियों से फोन करवाए गए। मेल भी आए धमकी भरे। खुद को बनारसी क्‍लेम करते हुए एक ब्राह्मण ने धमकाया, ''बनारस की जनता ने ऐसी भाषा लिखने की इजाज़त सिर्फ काशीनाथ को दी है।'' जनता का लेखक सिर्फ काशीनाथ और जनता में से मैं नदारद! मैंने उस पोस्‍ट को डिलीट कर दिया। बुरा लगा था। जनता अगर इतनी सेक्‍टेरियन है तो मुझे इस जनता में नहीं होना। लेखन कर्म यदि इतना मोनोपोलिस्टिक है तो मुझे लेखक नहीं होना है। लेकिन दिल के मामलों में सख्‍ती नहीं चलती। मैंने खुद को थामे रखा। वादा याद रहा, कि लौटना है 2012 में। 

मार्च में गया था एक शादी में। एक अनपेक्षित हादसे में एक साथ कई दोस्‍तों को गंवा बैठा। कई रिश्‍ते टूट गए। अप्रैल में गया तो जलाती धूप में मुझसे मिलने वाला कोई न था। जो थे भी, वे स्‍कूल के बाद के मेरे सफ़र से अनजान थे। उनसे संवाद मुश्किल था। अबकी गया तो सिर्फ आज़माने, कि क्‍या कोई गुंजाइश बची है। संभावनाओं के जो-जो मकान थे, वहां सेंध लग चुकी थी। शहर के हाशिये पर पावर डिसकोर्स हो रहा था। गंगा बीच नाव पर अनुदान के सौदे होते दिखे। युनिवर्सिटी गुरुकुल बन चुकी थी। लोग, नए-पुराने, कमाते-खाते दिखे। विरासत में मिले पांडित्‍य को ब्राह्मण रिश्‍तों में बदलते देखा। शहर में पहली बार रात के 12 बजे कुछ अनजाने हादसे दिखे। पहली बार ठंडई की सारी दुकानें बंद दिखीं। पहली बार अंधेरे में डर लगा।    

मैं अब भी नहीं मानता कि दिल्‍ली में मुझे रहना है। खूंटे उखड़ते भी तो हैं। बनारस लौट जाने का एक वादा था, जो मैं पूरा नहीं कर सका। 2012 बीत रहा है। अब वह वादा पूरा नहीं होगा। मैं जानता तो था ही, अब मान भी चुका हूं। मेरा खूंटा बनारस में नहीं है। कभी था भी नहीं। गुरु को बताना अभी बाकी है। जल्‍द बताऊंगा। और हां, उन मित्रों को, जानने वालों को, हितैशियों को, सबको एक बात बतानी है जिन्‍होंने मुझे बार-बार अहसास कराया कि मैं बनारस का नहीं हूं। वो ये, कि मैं वास्‍तव में बनारस का नहीं हूं। गाज़ीपुर का तो खैर मैं हूं ही नहीं। और दिल्‍ली, इसका तो कोई नहीं हुआ आज तक। फिर क्‍या मैं, क्‍या पिद्दी का शोरबा। बनारस एक खूंटा था मेरे भीतर गहरे धंसा हुआ। मैंने अब उसे निकाल फेंका है। 2002 में दिल्‍ली आकर मैंने उससे पहले के जीवन को आर्काइव में डाल दिया था। 2012 के अंत में पिछले दस साल की आरकाइविंग करने जा रहा हूं। आरकाइव के उस बक्‍से में एक टूटा हुआ वादा भी होगा। कभी मौका लगा तो झाड़-पोंछ कर देखूंगा कि उसकी शक्‍ल कैसी है।

फिलहाल को तो बस इतना, कि दिल्‍ली के पास मुझे देने के लिए अब कुछ बचा नहीं है और बनारस से मैंने कभी कुछ मांगा नहीं था। एक पता था, एक आइडेंटिटी, एक भ्रम कह लीजिए, जिसे मैं छोड़ रहा हूं। कुछ हलका महसूस हो रहा है।

बाकी… एक मित्र अक़सर कहते हैं कि मेरे ऊपर पाउलो कोएल्‍हो की अलकेमिस्‍ट का गहरा असर है। यही सही… कीमियागर होना इतना बुरा भी तो नहीं!   

अलविदा बनारस!!! 

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. सरोकार और तेवर वाले पत्रकार माने जाते हैं. नियमित लेखन करते हैं, वह चाहे ब्लाग पर हो या अखबार में छपे. उपरोक्त पोस्ट उन्होंने अपने ब्लाग जनपथ पर प्रकाशित किया है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. जनपथ पर टहलने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं– www.junputh.com

 

झूठी जानकारी देकर बन गए मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार

महराजगंज : अपने को जनसत्‍ता एक्‍सप्रेस का जिला प्रभारी बताने वाले सतीशचंद्र श्रीवास्‍तव ने सरकारी मान्‍यता प्राप्‍त कर लिया है. वे इससे जुड़ी सारी सुविधाएं भी उठा रहे हैं. इसमें कोई बड़ी बात नहीं है, परन्‍तु ये सारी सुविधाएं उन्‍होंने झूठ बोलकर और गलत जानकारी देकर उठाई है. इसके बाद उनके स्‍कूल के प्रबंधन ने जिलाधिकारी के संज्ञान में इस मामला को डाला है. बताया जा रहा है कि सतीशचंद्र पिछले तीन दशक से महराजगंज के परतावल में स्थित पंचायत इंटर कालेज में एडेड अध्‍यापक हैं. इनको ट्रेजरी से वेतन भी मिल रहा है.

जबकि सतीशचंद्र ने मान्‍यता प्राप्‍त करने की लिए झूठी जानकारी दी है. उन्‍होंने खुद को प्राइवेट विद्यालय में अध्‍यापक बताया है, जबकि वे एडेड अध्‍यापक हैं. यह जानकारी होने के बाद विद्यालय के प्रबंधन ने यह मामला जिलाधिकारी के संज्ञान में डाल दिया है. हालांकि अभी तक इस मामले में कोई पूछताछ नहीं हुई है.

महराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट.

पावस कुमार एवं मनोज वर्मा ने शुरू की नई पारी

दैनिक भास्‍कर, दिल्‍ली से खबर है कि पावस कुमार ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. पावस ने अपनी नई पारी सीएनएन आईबीएन के न्‍यूज पोर्टस से करने जा रहे हैं. पावस की गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है. वे कुछ अन्‍य संस्‍थानों को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

हिंदुस्‍तान, बदायूं से खबर है कि मनोज वर्मा ने यहां से अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें यहां रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. वे पिछले कुछ समय से खाली चल रहे थे. मनोज की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन करने से पहले भी वे कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया के नाम पेशी वारंट जारी

: 8 दिसम्‍बर को कोर्ट में होगी पेशी : कोयला आवंटन घोटाला में कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल से जुड़ी खबर प्रसारित न करने की एवज में जबरिया सौ करोड़ रुपये मांगने के मामले में फंसे जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को अदालत में पेश होना पड़ेगा. साकेत कोर्ट ने पेशी वारट जारी किए हैं. महानगर दंडाधिकारी नेहा की अदालत ने निर्देश दिया कि दोनों संपादकों को 8 दिसंबर को अदालत के समक्ष पेश किया जाए.

दिल्‍ली क्राइम ब्रांच ने साकेत कोर्ट में अर्जी दायर कर अपील की थी कि आरोपी सुधीर चौधरी व समीर आहलूवालिया को फिर से एक दिन की रिमाड पर लेने की जरूरत है. पुलिस इन दोनों आरोपियों व जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा से आमने-सामने पूछताछ करना चाहती है. इसी संबंध में अदालत ने दोनों संपादकों को पेशी वारंट जारी किए हैं. क्राइम ब्रांच ने जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा व उसके बेटे को तीसरी बार नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए आठ दिसंबर को बुलाया है.

पुलिस ने 2 अक्टूबर 2012 को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल की कंपनी जिंदल स्टील पावर लिमिटेड की शिकायत पर जी न्यूज चैनल समूह के संपादक सुधीर चौधरी व बिजनेस हेड समीर आहलूवालिया, चेयरमैन सुभाष चंद्रा तथा उनके बेटे के खिलाफ साजिश रचने व वसूली करने का आपराधिक मामला दर्ज किया था. शिकायत में कहा गया था कि दोनों संपादकों ने कोल आवंटन से संबंधित खबरें नहीं दिखाने के लिए बतौर विज्ञापन सौ करोड़ रुपये की मांग की थी. पैसे नहीं दिए जाने पर कंपनी के खिलाफ जानबूझ कर गलत खबरें दिखाई गईं. सीडी की जांच के बाद क्राइम ब्रांच ने दोनों संपादकों को 27 नवंबर को गिरफ्तार कर लिया था.


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zee jindal

इंडिया टुडे समूह का ‘एजेंडा आजतक’ आज से होगा शुरू

आपके अपने, सबसे चहेते चैनल ने की है एक नई पहल. खबरों की दुनिया में 12 साल की लगातार बादशाहत एक नए मुकाम तक पहुंचाने की एक कोशिश है एजेंडा आजतक. 11 सालों तक इंडिया टुडे कॉन्क्लेव आयोजित करने के बाद इंडिया टुडे ग्रुप लेकर आ रहा है हिंदी जगत का ये महामंच, जिसका थीम है 'इंडिया मांगे मोर'. इस महामंच पर बहस होगी राजनीति से लेकर रंगमंच तक की, समाज से लेकर भाषा तक की. जो बातें होंगी, वो आईना होंगी आज की सोच और कल का सच की. सबसे खास बात ये कि ये बातें होंगी हिंदी में.

दो दिनों तक चलने वाले एजेंडा आजतक के इस महामंच में शामिल होंगी सियासी मंच की कई दिग्गज हस्तियां. बातें राष्ट्रीय राजनीति से लेकर क्षेत्रीय राजनीति तक की होगी. अलग-अलग राज्य, अलग-अलग एजेंडे और इन्हीं अलग-अलग एजेंडों पर बात करने के लिए अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री भी रहेंगे मौजूद इस महामंच पर. महाबहस और महामंथन के इस मंच पर वो चेहरे भी चमकेंगे, जिन्होंने सामाजिक आंदोलन के जरिए देश की राजनीतिक जमीन तक को हिला कर रख दिया. इसमें सियासत की बात होगी, समाज की बात होगी.

बदलते सामाजिक स्वरूप और सरोकार की जमीन पर बात उस खेल की भी होगी, जो अब भारत के लिए एक धर्म जैसा बन गया है. क्रिकेट हो, कितना क्रिकेट हो, कहां तक क्रिकेट हो- इन सवालों का जवाब देने के लिए भारत और पाकिस्तान के पांच पूर्व कप्तान खुद मौजूद रहेंगे इस मंच पर. देश के 65 बरसों के इतिहास पर पड़ोस का असर खूब हुआ. कल कैसा होगा ये रिश्ता, इस पर बोलने के लिए पाकिस्तान से आएंगे तहरीक-ए-इंसाफ के अध्यक्ष इमरान खान. क्रिकेट डिप्लोमेसी के इस दौर में इमरान की मौजूदगी इसलिए भी अहम होगी, क्योंकि उन्होंने बतौर क्रिकेटर भी इस देश को समझा है.

एजेंडा आजतक में बात उस आईने की भी होगी, जो बरसों से रुपहले पर्दे पर देश की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों को दिखाता आया है. बॉलीवुड की दुनिया इस बदलते भारत को कैसे देखती है, इस मंच पर वो भी पता चलेगा. 6 और 7 दिसंबर को इस महामंच पर तय होगा एजेंडा. एजेंडा आज के भारत को कल तक ले जाने का. कुल 21 सेशन में 40 से ज्यादा वक्ता रखेंगे अपने विचार. एजेंडा आज तक के इस पहले साल में दो दिन तक देश की राजधानी में देश और दुनिया के जाने-माने लोग एक दूसरे से विचार-विमर्श करेंगे. एजेंडा आजतक में तमाम विषयों पर खूब होगी चर्चा. साथ ही इसमें हिस्सा लेने वाले लोग ढेरों सवाल पूछ सकते हैं. (आजतक)

पत्रकार को अगवा करने वाले सपा विधायक पर मुकदमा

खबर छपने से बौखला कर 'आज' समाचार पत्र के जिला प्रतिनिधि विनोद सिंह को अगवा करने के मामले में आज़मगढ़ जनपद के मेहनगर विधानसभा के सपा विधायक बृजलाल सोनकर पर आजमगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया है। 9 अक्टूबर आज समाचार पत्र में एक खबर 'रिश्तेदारों और ठेकेदारों के लिए हैं बने हैं जन प्रतिनिधि' प्रकाशित हुई थी, जिसमें सपा विधायक बृजलाल सोनकर पर वहां की जनता ने आरोप लगाया था कि विधायक जी जन शिकायतों के सम्बन्ध मे दिए जाने वाले आवेदनों पर शुल्क लेते हैं।

पहली बार विधायक बने बृजलाल सोनकर खबर छपने के बाद आज समाचार पत्र के जिला प्रतिनिधि विनोद सिंह को वाहन में जबरन अगवा कर बैठा लिए और प्रताड़ित किया, ऐसा पत्रकार ने  कोर्ट को बताया। सबसे चौंकाने  बात तो यह हैं कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब आजमगढ़ के दौरे पर थे तो उनसे इस घटना की शिकायत भी पत्रकारों ने की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। पंचायती राज मंत्री बलराम यादव के माध्यम से पत्रकारों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भी भेजा भेजा था। जिले के पुलिस अधीक्षक से भी कार्रवाई की मांग की गई थी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। आखिर थक कर विनोद सिंह को न्यायालय की शरण में जाना पड़ा। इस मामले को न्यायालय ने संज्ञान में लेते हुए आरोपी विधायक के खिलाफ संबंधित थाने को मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। सपा के लोगों में इसके बाद बेचैनी बढ़ गई है।

ब्‍लैकमेल कर लूटने वाले तीन पत्रकारों को सजा

उज्जैन की एक स्थानीय अदालत ने तीन पत्रकारों एवं उनके दो सहयोगी सहित पांच को लोगों को ब्लैकमेल कर लूटने के आरोप में 5-5 साल की सजा और 3-3 हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई, जबकि एक आरोपी को संदेह का लाभ देकर छोड़ दिया। इनमें घटना के मुख्य आरोपी को 7 साल की सजा सुनाई गई है। उज्जैन के सप्तम अपर सत्र न्यायाधीश एके शुक्ला ने बुधवार को पत्रकार अनिल तिवारी, अभय तिरवार, सचिन गोयल तथा उनके सहयोगी मुन्ना कुशवाह एवं मोना खान को लोगों को लूटने एवं ब्लैकमेल करने के आरोप में यह सजा सुनाई।

अभियोजन के अनुसार ये सभी सदस्य अपनी सहयोगी मोना खान को किसी सुनसान जगह पर कॉलगर्ल बनाकर खड़ी कर देते थे और जब कोई ग्राहक उसे लेकर होटल जाता था तो बाद में वे नकली पुलिस बनकर वहां पहुंच जाते और उसे धमकाते थे। इसके बाद पत्रकार योजनाबद्ध ढंग से कैमरा लेकर वहां पहुंच जाते थे और उसे चैनल पर दिखाने की बात कर उसे लूट लेते थे। लगभग 3 साल पहले भी उन्होंने राजस्थान के झालावाड़ निवासी घीसूसिंह के साथ यही किया था लेकिन घीसूसिंह ने लुटने के बाद इसकी रिपोर्ट महाकाल थाने में कर दी। पुलिस ने जांच के बाद सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर मामला न्यायालय में पेश किया था। इन आरोपियों में मुख्य आरोपी अभय तिरवार स्थानीय समाचार पत्र का संपादक था, जबकि दो अन्य आरोपी राष्ट्रीय चैनलों से जुड़े थे। न्यायालय ने एक अन्य आरोपी दिनेश सोलंकी को संदेह के आधार पर छोड़ दिया। (भाषा)

गाजीपुर जिले के पत्रकार नवीन कुमार श्रीवास्तव बन गए सिविल जज

गाजीपुर । जिले के एक होनहार पत्रकार ने बिहार न्यायिक सेवा में सिविल जज के पद पर सफलता प्राप्त कर जिले का नाम रोशन किया है। सकलेनावाद निवासी वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पत्रकार ओंकार ना़थ श्रीवास्तव के पुत्र नवीन कुमार श्रीवास्तव ने प्रथम प्रयास में ही 134वीं रैंक के साथ सफलता अर्जित की है। 

नवीन वर्तमान में यूएनआई के मान्यता प्राप्त पत्रकार के साथ-साथ स्थानीय कचहरी में वकालत भी करते हैं। उनके चयन से क्षेत्रवासियों में हर्ष व्याप्त है। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता तथा वकालत के गुरु प्रकाश चन्द्र श्रीवास्तव को दिया। 

इनकी प्रारम्भिक शिक्षा राजकीय सिटी इंटर कालेज से हुई।  बी.एस.सी. की पढ़ाई इन्होंने पी जी कालेज गाजीपुर से की। विधि की परीक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 2003 में उत्तीर्ण की। स्थानीय कचहरी में 2004 से वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। पत्रकारिता के क्षेत्र में 2005 से यूएनआई न्यूज एजेंसी के लिए कार्य करना शुरू किया। इनकी सफलता पर गाजीपुर के पत्रकारों ने बधाई देते हुए इनके उज्जवल भविष्य की कामना की। साथ ही इन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया गया।

गाजीपुर से पत्रकार केके की रिपोर्ट. 

अनुरंजन झा के मेट्रोमोनियल चैनल का नाम होगा ‘शगुन’

: नए साल में नया शगुन : नया साल सभी के लिए ढेर सारी खुशियां और  नई उम्मीदें लेकर आता है…ये वक्त होता है मौज-मस्ती और अपनों के साथ खुशियां मनाने का… और इस बार ये रहने वाला है और भी बहुत खास…इस नए साल की शुरुआत होगी कभी ना खत्म होने वाले खुशियों के अहसास के साथ…देश में पहली बार अपनी तरह का सबसे अलग टीवी चैनल शगुन नए साल में आपके सामने होगा….इस खास चैनल में सबकुछ होगा शादियों से जुड़ा…..यानि अब शादी की खुशियां और उत्साह आपके घर में 2013 से रहेगा बारहो मास.

वर्टेंट मीडिया सॉफ्ट और पार्क मीडिया प्राइवेट लिमिटेड ऑडियो और विजुअल शोज बनाने में एक जाना-माना नाम है….और अब ये कंपनी लेकर आ रही है एक लाइफस्टाइल/मनोरंजन चैनल शगुन, जो जल्द ही लॉन्च होगा…. इस चैनल में बच्चों से लेकर युवाओं और बुजुर्गों तक सभी के लिए कुछ ना कुछ खास होगा….हमारा देश हमेशा से ही अपनी भव्य और शानदार शादियों के लिए जाना जाता रहा है….शादी किसी के भी जीवन का सबसे बड़ा और सबसे खास समारोह है… और  शगुन अब इस अहसास को बना देगा और भी बहुत खास…ये चैनल देश के जाने-माने   पत्रकार अनुरंजन झा की उम्दा सोच और उनके बेहतरीन अनुभव का नतीजा है… यह भारत का पहला ऐसा वैवाहिक चैनल है जो शादी संबंधी सारी जानकारी देगा…….शगुन टीवी चैनल के साथ ही इसकी वैवाहिक वेबसाइट भी लॉन्च की गई है.. बेवसाइट www.shagunindia.com पर जाकर आप अपने य़ा अपनों के लिए सही जीवन-साथी तलाश सकते हैं.

शगुन के जरिए आप अपना मनपसंद हम-सफर तो पा ही सकते हैं, और साथ ही साथ अपनी शादी की प्लानिंग भी कर सकते हैं…इस साइट से शादी में इस्तेमाल होने वाली तमाम चीजों की जानकारी के साथ आप इन्हें खरीद भी सकते हैं….यह एक ऐसा नया प्लेटफॉर्म है जहां आप ना सिर्फ एक अच्छा जीवन-साथी पाएंगे बल्कि शादी के इस शगुन को पूरे भारत के साथ शेयर भी कर पाएंगे…यानि नेशनल टीवी पर अपनी खुद की शादी को दिखाकर अपनी खुशियो में चार चांद लगा सकते हैं… शुभ शगुन.

पत्रकारों के चक्‍कर में फंसे गए एसडीओ, मामला होगा दर्ज

एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल के निधन पर देश में राष्‍ट्रीय शोक घोषित था वहीं दूसरी ओर बिहार प्रशासनिक सेवा से संबद्ध रोसड़ा (समस्तीपुर) के अनुमंडल पदाधिकारी सुनील कुमार ने राष्‍ट्रीय शोक को धत्ता बताते हुए स्थानीय दैनिक जागरण के पत्रकार, शहर के एक महात्वाकांक्षी शिक्षाविद्, शिक्षा माफिया एवं एक व्यवसायी की सलाह पर अमल करते बिजली बत्ती के चकाचौंध के बीच समारोहपूर्वक रोसड़ा अनुमंडल का स्थापना दिवस मनाया तथा केक काटकर खुशियां मनाई।

दैनिक जागरण ने अपने 2 दिसम्बर के अंक में इस समारोह से संबंधित समाचार को सचित्र प्रकाशित कर प्रशासनिक महकमे में जमकर वाहवाही लूटी। ठीक उसी दिन दैनिक हिन्दुस्तान अखबार के अनुमंडल संवाददाता संजीव कुमार सिंह ने प्रशासन के समारोहपूर्वक मनाये गये कार्यक्रम को प्रकाशित किया साथ ही प्रशासन के गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए जमकर खिंचाई करते हुए लिखा कि ‘एक तरफ राजकीय शोक दूसरी तरफ एसडीओ ने काटा केक’ समाचार प्रकाशित कर जागरण के मक्खनबाजी की पोल खोल दी।

एसडीओ एवं स्थानीय प्रशासन के इस अजब-गजब कारनामे पर स्थानीय स्तर पर चर्चा शुरू ही हुई थी कि रोसड़ा व्यवहार न्यायालय के अधिवक्त्ता उमेश प्रसाद राय ने मंगलवार 4 दिसम्बर को न्यायालय में एसडीओ के खिलाफ धारा 119, 120 एवं 120 बी. के तहत अभियोग-पत्र दायर कर दिया। अभियोग-पत्र पर संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने रोसड़ा थाना को एसडीओ एवं एडीएसओ पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी कर दिया। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि हिन्दुस्तान ने इस खबर को पेज नंबर 1 पर सभी संस्करणों में स्थान दिया लेकिन मक्खनबाजी के लिए मशहूर दैनिक जागरण ने इस खबर को एक कॉलम तक में भी प्रकाशित करना मुनासिब नहीं समझा।

5 दिसम्बर को रोसड़ा में एक ओर जहां हिन्दुस्तान की बल्ले-बल्ले रही वहीं जागरण की भद्द पिट गई। प्रशासन की मक्खनबाजी में तत्पर रहनेवाले शहर के तथाकथित माफियाओं ने 5 दिसम्बर को हिन्दुस्तान के स्थानीय अभिकर्त्ता इन्द्रकांत झा को रोसड़ा में आनेवाली हिन्दुस्तान की 2500 प्रतियों को भुगतान लेकर वितरण नहीं करने का ऑफर दिया, लेकिन स्थानीय संवाददाता की तत्परता के कारण हिन्दुतान के अभिकर्त्ता ने माफियाओं के ऑफर को रिजेक्ट कर दिया। शहर में प्रातः 8 बजे तक ही हिन्दुस्तान की प्रतियां नहीं मिल रही थी वहीं जागरण के बारे में लोगों तरह-तरह की हास्यास्पद टिप्पणियां सुनने को मिल रही थी।

समस्‍तीपुर से विकास कुमार की रिपोर्ट.

खुद को पत्रकार बताने वाला हत्‍या के प्रयास, लूट के आरोप में गिरफ्तार

महाराजगंज से खबर है कि अपने को एक अखबार का पत्रकार बताने वाले व्‍यक्ति को पुलिस ने हत्‍या के प्रयास तथा लूट के आरोप में गिरफ्तार किया है. जानकारी के अनुसार परतावल के रहने वाले नागेश कसौधन, जो खुद को जनमोर्चा अखबार का पत्रकार बताता है, को पुलिस ने पकड़ा है. पुलिस ने आरोप लगाया है कि नागेश परतावल के शराब भट्टी की हत्‍या का प्रयास करके उसके पास से दो लाख पच्‍चीस हजार रुपये की लूट में शामिल था.

पुलिस ने नागेश को आईपीसी की धारा 307, 394, 411 के तहत गिरफ्तार किया है. पुलिस ने नागेश को जेल भेज दिया है. इसके पहले भी इस तथाकथित पत्रकार पर कुछ मामले हैं.

महाराजगंज से ज्ञानेंद्र त्रिपाठी की रिपोर्ट. 

याहू 14 दिसंबर से बंद करेगा अपनी चैटरुम सेवा

याहू की लोकप्रिय चैट सर्विस याहू चैटरूम्स को बंद किया जा रहा है। कंपनी की ओर से मिली जानकारी के अनुसार पब्लिक चैट को स्थाई रूप से बंद किया जा रहा है। यह मशहूर चैट सर्विस साल 2005 में उस समय विवादों में आनी शुरू हो गई थी जब कंपनियों ने इस सेवा पर अपने विज्ञापन देने बंद कर दिए थे।

इसकी वजह सेक्स संबंधी अवैध चैट रूम का याहू पर मौजूद होना माना गया था। याहू कंपनी की ओर से आए एक ब्लॉग में लिखा गया है कि ये सेवा अब इस वेबसाइट के इस्तेमाल करने वालों के लिए पर्याप्त लाभ नहीं पहुंचा रही है। याहू चैट रूम्स 14 दिसंबर से गायब हो जाएंगे। इसके साथ ही पिंगबॉक्स भी बंद किया जा रहा है। इनसे संबंधित कुछ अन्य फीचर अगले साल जनवरी के अंत तक हटा दिए जाएंगे।

याहू ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि कभी-कभी सख्त फैसले लेने होते हैं ताकि उन चीजों पर ज्यादा ऊर्जा खर्च कर सके जिनसे यूजर्स को वेबसाइट पर अच्छा अहसास मिल सके। इसी वर्ष जून में हब्बो होटेल नाम की बच्चों पर केंद्रित लोकप्रिय सोशल नेटवर्किग को अस्थाई रुप से बंद कर दिया गया था। इस वेबसाइट पर आरोप थे कि इसका प्रयोग बाल यौन शोषण के लिए किया जा रहा है। ब्रिटेन के चैनल 4 ने दो महीने तक चली अपनी एक खोजी खबर में दिखाया कि कैसे उस वेबसाइट पर लॉग इन करने के तुरंत बाद सेक्स के बारे में खुल्लमखुल्ला बातचीत जारी हो जाती है।

याहू मैसेंजर को 1998 में लांच किया गया था लेकिन साल 2005 के आते-आते इसकी चैटरूम सेवा विवादों में घिरने लगी थी। इसी साल याहू ने इस मैसेंजर के कई पब्लिक चैट रूम्स को बंद कर दिया था। याहू के पब्लिक चैट रूम सेक्स संबंधी चैट की बहुतायत से विज्ञापन देने वाले भी दुखी थे। साल 2005 में कुछ चैट रूम बंद किए गए थे। इन्हें बंद करते वक्त याहू ने घोषणा की थी वे अब सिर्फ 18 वर्ष या उससे अधिक के व्यक्तियों को ही अपने मैसेंजर का प्रयोग करने देंगे।

अनुरंजन झा ला रहे हैं देश का पहला ‘मेट्रोमोनियल चैनल’

आईआईएमसी से पत्रकारिता की डिग्री लेने वाले और स्टिंग आपरेशन्स के जरिए इलेक्ट्रानिक मीडिया में अपना एक अलग स्थान बनाने वाले अनुरंजन झा इन दिनों नया प्रयोग करने में जुटे हैं. वे देश का पहला मेट्रोमोनियल चैनल लांच करने जा रहे हैं. इस चैनल के लिए करीब दर्जन भर लोगों की नियुक्तियां हो चुकी हैं. इसका आफिस नोएडा सेक्टर 63 के बी ब्लाक में बनाया गया है.

सूत्रों का कहना है कि चैनल का कानसेप्ट ऐसा है कि इसे पापुलर होने और लाभ में आने में वक्त नहीं लगेगा. शादी का बहुत बड़ा मार्केट है और इस मार्केट में इवेंट, रीयल इस्टेट, गारमेंट, फैशन समेत कई इंडस्ट्रीज रिलेटेड हैं. चैनल की कोशिश होगी कि वह मैरेज के सभी आयामों को टच करे और उससे जुड़े मार्केट को एक्सप्लोर करे. इस चैनल को लांच कराने के लिए जिस कंपनी का निर्माण किया गया है, उसमें कई लोगों के पैसे लगे हैं और अनुरंजन झा भी पार्टनर हैं. अनुरंजन ही चैनल को बतौर मालिक और हेड लीड करेंगे. उनकी टीम में करीब दस लोगों की नियुक्ति हो चुकी है.

इस बारे में जब अनुरंजन से बात की गई तो उन्होंने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और इतना कहा कि वे जल्द ही अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में विधिवत रूप से घोषणा करेंगे. उल्लेखनीय है कि अनुरंजन झा कोबरा पोस्ट, इंडिया न्यूज, इंडिया टीवी, सीएनईबी समेत कई चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

सहारा को फरवरी तक तीन किस्‍तों में लौटाने होंगे निवेशकों के पैसे

नई दिल्‍ली : सहारा रिफंड केस में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम फैसला दिया। कोर्ट ने सहारा समूह को अपने निवेशकों को अगले साल सात फरवरी तक किस्तों में 24,000 करोड़ रुपये वापस करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को तुरंत 5 हजार 120 करोड़ रुपये सेबी को जमा करने को कहा है। इसके बाद बाकी पैसे दो किश्तों में जमा कराने होंगे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों के 27 हजार करोड़ की राशि लौटाने के बारे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए सहारा समूह को बुधवार तक का वक्त दिया। शीर्ष कोर्ट में आज इस मसले पर सुनवाई हुई।

दो दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को फटकार लगाते हुए पूछा था कि वो यहां-वहां की बातों में न फंसें और साफ बताए कि जनता का पैसा लोटाने की उनकी मंशा है या नहीं। प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को सहारा को इसका जबाव देने के लिए एक दिन और मोहलत दी। पहले उन्हें न्यायालय को पैसा लौटाने के बारे में बताना था। सहारा समूह इस मसले पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त समय चाहता था।

सहारा समूह की ओर से खड़े वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमणियम ने समय बढाने का अनुरोध किया। इस पर न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई बुधवार के लिए स्थगित कर दी। सहारा समूह को न्यायालय ने कल ही निर्देश दिया था कि वह निवेशकों का धन लौटाने के मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे।

आपको बता दें कि सहारा ग्रुप ने अपने दो रियल एस्टेट कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन ने कनवर्टेबल डिवेंचर के जरिए निवेशकों से 24 हजार करोड़ रुपये जमा करवाए थे। सिक्योरिटी एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी सेबी ने इन दोनों कंपनियों के कामकाज को गैरकानूनी करार देते हुए निवेशकों के पैसे लौटाने को कहा था। सेबी के आदेश के खिलाफ सहारा ग्रुप सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, लेकिन इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने सेबी के फैसले को सही ठहराते हुए सहारा से निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपये 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने को कहा था।

sebi sahara

वॉलमार्ट के गड़ासे से किसे कटवा रहे हैं मनमोहन? (देखें कार्टून)

एफडीआई और इसके माध्यम से भारत में घुसकर हंगामा बरपाने को तैयार वॉलमार्ट को लेकर भारत में बहस तेज हो चुकी है. ऐसे में कार्टूनिस्ट भी अपनी कूची चला रहे हैं. नीचे दिए गए कार्टून को टीम केजरीवाल के सदस्य कुमार विश्वास ने फेसबुक पर शेयर किया है, इस कमेंट के साथ- 

@F.D.I. सब की मिलीभगत है और कोई सोचने को तैयार ही नहीं है ! दुनिया के दूसरे दरीचों के लिए खिड़कियाँ खोलना बिलकुल बुरा नहीं बशर्ते की उधर से ख़ुशबू, मुहब्बत और तहज़ीब आती हो ! लेकिन अगर "वैस्ट"(WEST) का "वेस्ट"(WASTE) ही व्यापार कहलाता हो तो हमारे मोहल्ले की परचून की दूकान पर सारी गोरी-कृपा कुर्बान की जा सकती है ! संसद में तय पटकथा के अनुसार भाइयों-बहिनों ने बहुत उत्तम अभिनय किया….जिन में इस पर फैसला लेने की ताक़त है उन्होंने हम से ली अपनी ताक़त बाज़ार में बेच डाली है ! हम क्या करें हल्ला मचाने के सिवाय ,खतरे से आगाह करने के अलावा….अब रो-पीट कर घर तो बैठ सकते नहीं….!

"हमें खतरे का अंदाज़ा है लेकिन
हमारे घर में दरवाज़ा नहीं है ,
तुम्हारे घर में दरवाज़ा है लेकिन ,
तुम्हे खतरे का अंदाज़ा नहीं है…..!"

पत्रकारिता छोड़ किसानों को जागरूक करने में जुट गए कृष्‍ण कुमार कन्‍हैया

कुछ युवा पत्रकार अब यह पेशा छोड़कर नए रास्‍तों की तलाश कर रहे हैं. तनाव, उलझन, दांवपेंच, राजनीति में उलझे मीडिया न्‍यूज रूम से इतर वे अपने लिए उन्‍मुक्‍त आकाश पाने की कोशिशों जुटे हुए हैं. ऐसे ही एक पत्रकार हैं कृष्‍ण कुमार कन्‍हैया. वे पिछले एक दशक से ज्‍यादा समय तक पत्रकारिता करने के बाद अब किसानों को आधुनिक कृषि प्रणाली सिखाने के साथ इसे अपनी आजीविका का साधन भी बनाने की दिशा में अग्रसर हैं. वे पिछले कई महीनों से किसानों के बीच रहकर उनकी समस्‍याओं को सुनने तथा उनका निवारण करने में जुटे हुए हैं.

मूल रूप से बेगूसराय के शाहपुर गांव के रहने वाले कृष्‍ण कुमार कन्‍हैया एक दशक से ज्‍यादा समय तक पत्रकारिता में जमे रहे. ईटीवी,  सहारा समय, हमार टीवी, साधना टीवी, न्‍यूज एक्‍सप्रेस, मौर्य टीवी जैसे चैनल के साथ दिल्‍ली-नोएडा तथा पटना में काम कर चुके कृष्‍ण कुमार अब पत्रकारिता के इतर किसानों के बीच अपनी दुनिया ढूंढ रहे हैं. उन्‍होंने नौकरी को अलविदा कह कर अब एग्री क्लीनिक खोल लिया है. एग्रीकल्‍चर से बीएससी कृष्‍ण कुमार अब किसानों को खेती के आधुनिक तकनीक बताने के साथ उन्‍हें सरकार द्वारा दिए जाने वाले लाभ तथा हानि से भी अवगत कराएंगे.

तकनीकी रूप से सक्षम कृष्‍ण कुमार तकनीक के माध्‍यम से भी किसानों को नई जानकारियां देंगे. कृष्‍ण कुमार बताते हैं कि भारत की अर्थव्‍यवस्‍था किसानों पर निर्भर करती है. पत्रकारिता के दौरान भी मैंने देखा कि इस समाज में कोई सबसे ज्‍यादा उपेक्षित है तो वो किसान हैं. उनकी बेहतरी के लिए कहीं कोई कार्यक्रम या जानकारी किसी भी न्‍यूज चैनल पर नहीं है. हम फिल्‍मों के लटके झटके दिखाते हैं लेकिन किसानों की उपज कैसे बेहतर हो इस पर कोई कार्यक्रम नहीं दिखता. यह बात काफी दिनों से दिमाग में चल रहा था परन्‍तु कोई आखिरी निर्णय लेना थोड़ा मुश्किल हो रहा था. पारिवारिक जरूरतों के अलावा सामाजिक तौर पर इसको मान्‍यता मिलने जैसी बातें परेशान कर रही थीं. पर आखिरकार दिल की बात मानी और इसकी शुरुआत कर दी.

कृष्‍ण कुमार बताते हैं कि आगरा यूनिवर्सिटी से एग्रीकल्‍चर में बीएससी होने के नाते उन्‍हें काफी सहूलियत भी हुई है. इसी चलते मैंने एग्री क्‍लीनिक की स्‍थापना की है, जो किसानों को आधुनिक तरीके से सूचना देने का काम करेगा. इस प्रोजेक्‍ट के जरिए किसानों को फिल्‍म के जरिए प्रशिक्षित किया जाएगा. जाहिर है किसान पढ़ने-समझने से ज्‍यादा देखकर अमल करते हैं. इसलिए यह प्रोजेक्‍ट किसानों के लिए काफी असरदार हो सकता है. वे किसानों को नए तरीके से कम लागत में अधिक उपज पैदा करने के तरीके के अलावा दूसरी नकदी खेतियों के बारे में जानकारी उपलब्‍ध कराएंगे. साथ ही तमाम ऐसी सरकारी योजनाएं जिनकी जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती है, उनसे भी उन्‍हें अवगत कराएंगे.

हाल ही में मौर्य टीवी छोड़ने के बाद उन्‍होंने इस एग्री क्‍लीनिक की स्‍थापना की है. इस एग्री क्‍लीनिक का उद्घाटन संत कुमार चौधरी ने किया, जो जयपुर में संचालित एक ट्रस्‍ट के डायरेक्‍टर हैं. सैकड़ों किसानों की उपस्थिति से उत्‍साहित कृष्‍ण कुमार कन्‍हैया कहते हैं कि किसानों के बीच काम करने का अलग ही मजा है. नया अनुभव मुझे भी मिल रहा है.  

माफियाओं को पालते हैं संघ वाले…!! देखिए, ये हाफपैंटधारी तो नामधारी है

दीपक आजाद उत्तराखंड के ऐसे युवा पत्रकार हैं जिन्होंने अपने सिद्धांतों और सरोकार से समझौता नहीं किया. जहां समझौते करने जैसे हालात आए वहां उन्होंने नौकरी छोड़ने ज्यादा पसंद किया. उन्होंने पेड न्यूज के मुद्दे पर दैनिक जागरण की नौकरी को लात मारी. कई अन्य जगहों पर काम किया लेकिन वहां अपने सिद्धांतों, तेवर और प्रगतिशील सोच के कारण एडजस्ट नहीं कर पाए. अब दीपक आजाद ने खुद की एक मैग्जीन का प्रकाशन शुरू किया है. नाम है वॉचडॉग. वे इसके प्रधान संपादक हैं.

मैग्जीन के प्रबंध संपादक वरिष्ठ पत्रकार विमल दीक्षित हैं. विमल भी कई अखबारों मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं और संपादकीय, मार्केटिंग, प्रसार समेत कई विभागों के विशेषज्ञ हैं. दीपक आजाद के संपादकत्व में शुरू हुई वॉचडॉग मैग्जीन मासिक है और इसका मूल्य 15 रुपये है. अबकी पांचवां अंक आया है मार्केट में. इस अंक की कवर स्टोरी संघ पर है. फ्रंट पेज की तस्वीर में नामधारी को हाफ पैंट यानि संघ का ड्रेस पहने दिखाया गया है. संघ में माफियाओं के बढ़ते वर्चस्व पर यह स्टोरी है. अगर मैग्जीन को आप अपने यहां मंगाना चाहते हैं तो दीपक आजाद से सीधे संपर्क 09410593337 पर रिंग करके कर सकते हैं. नीचे है मैग्जीन के फ्रंट पेज की तस्वीर…

रीलॉन्‍च हुई दैनिक भास्‍कर की अंग्रेजी वेबसाइट

दैनिक भास्‍कर समूह ने अपनी अंग्रेजी की वेबसाइट डेलीभास्‍कर डॉट कॉम को रीलॉन्‍च किया है. मंगलवार को फिल्‍म अभिनेता सलमान खान और कैटरीना कैफ ने 'द कुलेस्‍ट साइट' के टैग लाइन के साथ भास्‍कर की इस वेबसाइट को रीलॉन्‍च की. युवाओं को ध्‍यान में रखते हुए इस खास साज सज्‍जा के साथ डिजाइन किया गया है. इसे ज्‍यादा बेहतर बनाने की कोशिश की गई है. रीलॉन्‍च हुए वेबसाइट में फैशन, सेहत, ग्‍लैमर, गॉसिप, टेक्‍नॉलजी, ऑटो, स्‍पोर्ट्स समेत जीवन के सभी पहलुओं को ध्‍यान में रखा गया है.

इसके अलावा जयपुर, भोपाल, इंदौर, अहमदाबाद, दिल्‍ली, मुंबई, चंडीगढ़, लखनऊ आदि शहरों में लाइव न्‍यूज कवरेज यानी फोटो और वीडियो समेत की व्‍यवस्‍था भी सुनिश्चित की गई है. उल्‍लेखनीय है कि दैनिक भास्‍कर समूह का www.dainikbhaskar.com और divyabhaskar.com काफी लोकप्रिय वेबसाइट हैं. इसी को ध्‍यान में रखकर www.dailybhaskar.com की रीलॉचिंग की गई है.

”नेताजी बहुत नाराज हैं तुमसे, उठवा ली जाओगी”

लखनऊ की एक सामाजिक कार्यकत्री एवं आरटीआई एक्टिविस्‍ट उर्वशी शर्मा ने तालकटोरा थाना में आवेदन देकर शिकायत की है कि उनको तथा उनके परिवार को जान से मारने की धमकी मिली है. उर्वशी ने अपने शिकायत में आरोप लगाया है कि गुजरात से किसी हरिभाई यादव का फोन आया था, जिस पर उन्‍हें धमकी दी गई कि अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करना तथा आरटीआई डालना छोड़ दो, नहीं तो उठवा ली जाओगी. तुम्‍हारे इस काम से नेताजी भी बहुत नाराज हैं. उर्वशी ने पुलिस ने अपने तथा परिवार के जानमाल की रक्षा की गुहार लगाई है. नीचे उर्वशी शर्मा द्वारा पुलिस को दिया गया पत्र.

शोभना भरतिया के पति पर भी मेहरबान रहे हैं मोदी

नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा है कि मोदी ने अडानी ग्रुप के साथ-साथ हिंदुस्‍तान मीडिया वेंचर लिमिटेड की मालकिन शोभना भरतिया के पति की कंप‍नी जुबिलंट एनप्रो प्राइवेट लिमिटेड को भी केजी बेसिन में गैस ब्‍लॉक देकर उपकृत किया. इसमें मोदी के साथ कांग्रेसी नेताओं की भी साठगांठ है. उन्‍होंने कहा कि मोदी राज में केवल उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाया गया.

केजरीवाल ने आरोप लगाते हुए कहा कि अदानी समूह को जिस तरह से फायदा पहुंचाया गया है उससे साफ है कि मोदी बहुत साफ सुथरे या विकास पुरुष नहीं हैं. भाजपा के मुख्यमंत्री मोदी कांग्रेस के नेताओं से मिलकर उद्योगपतियों को जमीन और तेल के कुएं लुटा रहे हैं. केजरीवाल ने कहा कि मुख्यमंत्री मोदी का चेहरा इससे भी उजागर हो जाता है कि वह एयरफोर्स को जमीन देने के लिए बाजार भाव (8800 रुपये वर्गमीटर की दर) मांगते हैं और अदानी को एक रुपये वर्गमीटर पर जमीन दे देते हैं. उन्होंने बताया कि कच्छ में सेज के लिए अदानी को 14306 एकड़ जमीन एक रुपये से लेकर 32 रुपये वर्गमीटर के भाव से दी गई है.

केजरीवाल ने कहा कि इतना ही नहीं कोयला लुटाकर भी अदानी को बिजली की खरीद में भी मोटा फायदा पहुंचाया गया. राज्य सरकार ने अदानी से दो रुपये पैंतीस पैसे के भाव से बिजली खरीदने का करार किया पर उसे लाभ पहुचाने के लिए पांच रुपये पचास पैसे के भाव से बिजली खरीदी जा रही है. गुजरात को नरेंद्र मोदी कांग्रेसी नेताओं के साथ मिलकर लूट रहे है. उन्होंने पूछा कि जियो ग्लोबल और जुबिलंट एनप्रो प्राइवेट लिमिटेड को मोदी सरकार ने गैस ब्लॉक्स देने में मेहरबानी क्यों की? इन कंपनियों को मुफ्त में मोटा फायदा क्यों पहुंचाया गया? केजरीवाल तथा प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि मोदी की मेहरबानी की वजह से जियो ग्लोबल चलाने वाले जीन पॉल रॉय की हैसियत महज 3200 रुपये से बढ़कर 10 हजार करोड़ रुपये हो गई. उन्होंने कहा कि इसकी जांच होनी चाहिए कि इस कंपनी के पर्दे के पीछे मालिक कौन हैं? राज्यसभा सांसद रहीं शोभना भरतिया के पति की कंपनी जुबिलंट एनप्रो प्राइवेट लिमिटेड को केजी बेसिन में गैस ब्लॉक मिलने को वह कांग्रेस-भाजपा की साठगांठ बताते हैं. 

कांग्रेस-भाजपा की मिलीभगत उजागर करने के लिए उन्होंने यह भी जानकारी दी कि गांधीनगर में प्राइम लोकेशन पर दोनों दलों के सांसद-विधायकों को महज 45 रुपये वर्गमीटर के भाव से प्लॉट उपलब्‍ध कराए गए. ज्यादातर नेताओं ने अपने प्लॉट बेच भी दिए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि सस्ते प्लॉट लेने के खेल में न्यायपालिका से जुड़े व्यक्ति भी शामिल हैं. सभी लोग मिलकर गुजरात को लूट रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने संजीव भट्ट पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने आम आदमी पार्टी को अदानी और मोदी के बीच चल रहे खेल के बारे में बताया था लेकिन इसे कभी उठाया क्यों नहीं? केजरीवाल ने कहा कि अब जबकि भट्ट की पत्नी मोदी के खिलाफ कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं तब भी वह अदानी पर कुछ नहीं बोल रहे हैं. जो साबित कर रहा है इस खेल में सभी लोग शामिल हैं.

Jagran Prakashan to raise Rs 1.5 bn to retire short-term debt

MUMBAI: Jagran Prakashan Ltd (JPL), the company that publishes Hindi language newspaper Dainik Jagran, has decided to raise Rs 1.5 billion through issue of non-convertible debentures (NCDs). The company says that the funds will be utilised to augment its long term resources and retire its high interest bearing short-term debt.

Jagran Prakashan's board of directors on 1 December approved issue of secured NCDs up to an aggregate value of Rs 1.5 billion, which are rated AA+/Stable by ratings agency CRISIL. JPL is India's leading media and communications group with interests spanning across Print, OOH, Activations, Mobile and Online, covering all of India as its footprint.

The company's newspaper operations include nine newspaper titles in five different languages including Hindi daily Dainik Jagran, Punjabi daily Punjabi Jagran, daily bi-lingual newspaper i-next and English weekly tabloid City Plus. Earlier, JPL had snapped up NaiDunia Media for an enterprise value of Rs 2.25 billion in an all-cash deal that bolstered Jagran's presence in central India. The company publishes NaiDunia, which has a presence across Madhya Pradesh, Chhattisgarh, and Delhi-NCR.

In 2010, the company had acquired majority stake in Mid-Day Multimedia for Rs 2 billion. The acquisition gave JPL a foot-hold in English, Gujarati and Urdu newspaper market with the addition of English tabloid MiD-Day, Guajarati tabloid Mid-Day Gujarati, and Urdu daily Inquilab. US private equity firm Blackstone invested $50 million in Jagran Media Network (JMN), the parent company of JPL, in 2011.

In its ratings commentary, CRISIL said JPL's ratings continue to reflect its strong market position, healthy operating efficiencies, and strong financial risk profile. These rating strengths are partially offset by the company’s susceptibility to potential competition and to significant volatility in newsprint prices impacting its operating margin. Dainik Jagran, with readership of 56.4 million, had advertisement revenues of Rs 8.5 billion in 2011-12.

"Furthermore, the acquisition of Naidunia Media Ltd (NML) has strengthened JPL’s business risk profile. The leadership position and strong brand image of Dainik Jagran leads to stable revenues, along with increasing contribution from advertising revenues, and healthy profitability," the ratings agency said. IN FY 2012, JPL reported an operating income and a profit after tax (PAT) of Rs 13.55 billion and Rs 1.78 billion respectively on a consolidated basis against an operating income of Rs.12.21 billion and a PAT of Rs.2.07 billion for the previous year.

For the first six months of 2012-13, JPL reported an operating income of Rs 6.4 billion (Rs 6.1 billion) and PAT of Rs.1.25 billion (Rs.0.95 billion), on a standalone basis. JPL also has healthy financial flexibility, driven by liquid surplus of about Rs 1.9 billion as on 30 September. (IT)

सहारा आज बताएगा कब वापस करेगा निवेशकों का पैसा

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने निवेशकों के 27 हजार करोड़ की राशि लौटाने के बारे में स्थिति स्पष्ट करने के लिए सहारा समूह को बुधवार तक का वक्त दिया है। शीर्ष कोर्ट में आज फिर इस मसले पर सुनवाई होगी। प्रधान न्यायाधीश अलतमस कबीर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को सहारा को इसका जबाव देने के लिए एक दिन और मोहलत दी। पहले उन्हें न्यायालय को पैसा लौटाने के बारे में बताना था। सहारा समूह इस मसले पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त समय चाहता था।

सहारा समूह की ओर से खड़े वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमणियम ने समय बढाने का अनुरोध किया। इस पर न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई बुधवार के लिए स्थगित कर दी। सहारा समूह को न्यायालय ने कल ही निर्देश दिया था कि वह निवेशकों का धन लौटाने के मसले पर अपनी स्थिति स्पष्ट करे। न्यायाधीशों ने शीर्ष अदालत के निर्णय के बावजूद निवेशकों को धन लौटाने के मामले में ढुलमुल रवैये को लेकर मंगलवार को सहारा समूह को आड़े हाथ लेते हुए कहा था कि चूंकि उसने न्यायालय के आदेश पर अमल नहीं किया है, इसलिए उसकी बात सुनी नहीं जा सकती है।

बाद में न्यायालय निवेशकों का धन लौटाने के सवाल पर सहारा समूह के अनुरोध को सुनने के लिए तैयार हो गया था। न्यायालय ने सहारा इंडिया रियल इस्टेट कापरेरेशन लि और सहारा हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कापरेरेशन को आज यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया था कि क्या वे एक सप्ताह के भीतर निवेशकों को उनकी सारी रकम लौटा सकेंगे। (जी)

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