सी न्‍यूज में राजनीतिक संपादक बने केपी मलिक, अनुराग की नई पारी

जी न्यूज़, सहारा व हिंदुस्तान टाइम्स समेत कई बड़े मीडिया हाउस में अपनी सेवाएँ देने के बाद केपी मलिक ने अब आगरा के सी न्यूज़ उत्तर प्रदेश / उत्तराखंड चैनल को बतौर राजनीतिक संपादक ज्वाइन कर लिया है। केपी मलिक सी न्यूज़ का काम दिल्ली ब्यूरो से देखेंगे। दिल्ली में बैठकर अब वे समूचे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राजनीतिक गतिविधियों पर रखेंगे। ये उनके लिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि उनके मातहत सी न्यूज़ के सभी रिपोर्टर्स, कैमरामैन, इनपुट व आउटपुट हेड होंगे। अब उम्मीद जताई जा रही है कि वे अपनी टीम को भी सी न्यूज़ ज्वाइन कराएँगे। यानी सी न्‍यूज में एक उठापटक देखने को मिल सकती है।

न्यूज पोर्टल तहलका न्यूज में उप-संपादक रहे पत्रकार अनुराग मिश्र नये वर्ष पर SAC Management India Pvt. Ltd के लखनऊ से प्रकशित होने वाले साप्ताहिक अखबार व न्यूज पोर्टल जन लोकतंत्र से अपनी नयी पारी की शुरुआत करेंगे। वो यहाँ पर बतौर उप- संपादक अपनी सेवायें देंगे। अनुराग मिश्र इससे पहले लखनऊ से चलने वाले न्यूज पोर्टल जनमत न्यूज और युनाइटेड भारत न्यूज पेपर में अपनी सेवायें दे चुके हैं। इसके अतिरिक्त स्वतंत्र पत्रकार के रूप लिखे उनके कई लेख लखनऊ से प्रकशित होने वाले विभिन्न अखबारों में प्रकशित हो चुके हैं।  

होटल ने ‘अपमानजनक’ गानों के लिए हनी सिंह का कार्यक्रम रद्द किया

नई दिल्ली : गुड़गांव के एक होटल में नववर्ष के स्वागत के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में हनी सिंह के गाने को प्रोग्राम को रद्द कर दिया है। यह काम खुद होटल ने किया है। हनी सिंह के कार्यक्रम का यहां पर विरोध हो रहा था। दिल्ली में सामूहिक बलात्कार के खिलाफ जबर्दस्त विरोध प्रदर्शन को देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक दल ने गायक हनी सिंह के एक कार्यक्रम के खिलाफ एक ऑनलाइन याचिका दाखिल की थी और आरोप लगाया कि उनके गीतों के बोल महिलाओं के प्रति अपमानजनक हैं। यह याचिका कल्पना मिश्रा ने चेंज डॉट कॉम के जरिये दायर की और अपील की थी कि आज गुड़गांव के एक होटल में नये साल की पूर्व संध्या पर आयोजित कार्यक्रम को रद्द किया जाए।

याचिका में जोर देकर कहा गया कि ऐसे अश्लील गीत अस्वीकार्य हैं और यह महिला विरोधी भावनाओं के चलते हैं। यह ठीक उन लोगों के विचारों की तरह है जिनके लिए दिल्ली में दिसंबर की रात में हुई बस की घटना ठीक थी। वहीं लखनऊं इस मशहूर पंजाबी गायक के खिलाफ सोमवार को अश्लील और महिलाओं के प्रति अभद्र गाना गाने के इल्जाम में एक मुकदमा दर्ज किया गया है। आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने लखनऊ के गोमतीनगर थाने में दर्ज मुकदमे में आरोप लगाया कि हनी सिंह ने अश्लीलता और भद्देपन की सभी सीमाएं लांघने वाले गाने ‘मैं हूं बलात्कारी’ और ‘केंदे पेचायिया’ लिखे और गाये हैं। ये गीत समाज में महिलाओं के प्रति असम्मान तथा गम्भीर अपराध बढ़ाने के उत्प्रेरक का काम करते हैं। उन्होंने कहा है कि ये गाने अत्यंत अश्लील, उत्तेजक और अभद्र होने के कारण भारतीय दंड विधान की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध की श्रेणी में आते हैं। (एनडीटीवी)

विज्ञापन फर्जीवाड़ा : हिंदुस्‍तान के साथ दैनिक जागरण और प्रभात खबर पर भी आ सकती है जांच की आंच

मुंगेर। पटना उच्च न्यायालय की याचिका संख्या क्रमशः क्रिमिनल मिससेलेनियस नं.-2951/2012 और क्रिमिनल मिससेलेनियस नं.-16763/2012 में न्यायमूर्ति माननीय अंजना प्रकाश के 17 दिसंबर के आदेश आ जाने के बाद बिहार पुलिस, खासकर बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई अब राज्य के 37 जिलों में पटना की निबंधन संख्या की आड़ में  अवैध ढंग से मुद्रित, प्रकाशित और वितरित होने वाले हिन्दी दैनिक अखबार क्रमशः दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक प्रभात खबर और पटना से ही अवैध ढंग से मुद्रित, प्रकाशित और वितरित उर्दू और अंग्रेजी दैनिकों के प्रबंधन और संपादकीय विभाग के प्रमुख, अवैध प्रकाशन और वितरण में सहयोग करनेवाली जिला स्तरीय पत्र-वितरण करनेवाली एजेंसियों के साथ-साथ अवैध प्रकाशन में समाचार आपूर्ति करनेवाली न्यूज एजेंसियों के प्रबंधन और संपादकों को किसी भी वक्त जांच के दायरे में ले सकती है। अवैध प्रकाशित अखबारों को जब्त कर सकती है और अवैध प्रकाशन से जुड़े किसी भी व्यक्ति की  गिरफ्तारी कर सकती है।

बिहार के जिलों-जिलोंके लिए अवैध ढंग से मुद्रित, प्रकाशित और वितरित होने वाले दैनिक अखबारों के फर्जीवाड़ा के मामलों में जिलों-जिलों के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक भी अपने-अपने स्तर से फर्जी अखबारों के विरूद्ध किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई करने के लिए अब कानूनी रूप में पूरी तरह स्वतंत्र और सक्षम हैं। पटना उच्च न्यायालय के आदेश के बाद पूरे बिहार में नव वर्ष 2013 में दैनिक हिन्दी अखबारों की काली करतूतों के और भी उजागर होने की प्रबल संभावना बन गई हैं। न्यायमूर्ति माननीय अंजना प्रकाश का आखिर आदेश क्या है? न्यायमूर्ति माननीय अंजना प्रकाश ने अपने 17 दिसंबर के आदेश में मुंगेर कोतवाली कांड संख्या-445/2011 में पुलिस अनुसंधान में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और दैनिक हिन्दुस्तान के 200 करोड़ के सरकारी विज्ञापन फर्जीवाड़ा में पुलिस अनुसंधान तीन महीनों में पूरा करने का आदेश जारी कर दिया।

न्यायमूर्ति अंजना प्रकाशन ने अपने आदेश में पैरा 12 में मुंगेर के जिलाधिकारी कुलदीप नारायण की जांच-रिपोर्ट को हू-बहू उद्धृत

डीएम मुंगेर
भी किया है, जिसने बिहार के पटना छोड़कर 37 जिलों में हिन्दी अखबारों के अवैध प्रकाशन की पोल खोल दी है। स्मरणीय है कि अवैध प्रकाशन के जरिए ही अखबार के मालिक और संपादक करोड़ों और अरबों रुपयों में सरकारी विज्ञापन का फर्जीवाड़ा कर रहे हैं। जांच और गिरफ्तारी के दायरे में अखबार के निदेशक, संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, प्रसार व्यवस्थापक, विज्ञापन प्रबंधक भी आते हैं। मुंगेर के डीएम ने पटना उच्च न्यायालय को भेजी अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि –‘‘मैंने आज दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर, मुंगेर और लखीसराय संस्करणों की प्रतियां प्राप्त कीं और पाया कि तीनों संस्करणों में समाचार भिन्न-भिन्न हैं, सरकारी विज्ञापन भी भिन्न-भिन्न हैं, परन्तु तीनों संस्करणों के संपादक, मुद्रक, प्रकाशक, फोन नं. और आरएनआई नम्‍बर एक ही हैं।‘‘

पटना उच्च न्यायालय को भेजे अपनी रिपोर्ट में मुंगेर के जिलाधिकारी कुलदीप नारायण ने आगे लिखा है कि-‘‘चूंकि तीनों संस्करणों में समाचार सामग्री भिन्न-भिन्न हैं, तीनों संस्करणों को अलग-अलग अखबार माना जायेगा और तीनों संस्करणों को अलग-अलग आरएनआई नम्‍बर लेनी चाहिए।‘‘ दैनिक हिन्दुस्तान को अभी हाल में प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली से भागलपुर प्रेस से मुद्रित और प्रकाशित करने की अनुमति मिली है। परन्तु, अखबार के मालिक और संपादक अवैध ढंग से मुंगेर, लखीसराय, जमुई, शेखपुरा, खगडि़या, बेगूसराय और अन्य जिलों के लिए अलग-अलग संस्करण मुद्रित, प्रकाशित और वितरित डंका की चोट पर कर रहे हैं। दैनिक हिन्दुस्तान के भागलपुर संस्करण का वर्तमान में रजिस्ट्रेशन नं. -आरएनआई-बीआईएचएचआईएन/2011/41407 है।

दैनिक प्रभात खबर को प्रेस रजिसट्रार, नई दिल्ली ने भागलपुर प्रेस से अखबार प्रकाशित करने की अनुमति दी है और इस अखबार का रजिस्‍ट्रेशन नम्बर -आरएनआई -2011/37188 है। परन्तु, दैनिक प्रभात खबर भी भागलपुर के रजिसट्रेशन नम्बर की आड़ में  मुंगेर, लखीसराय, जमुई, शेखपुरा, खगडि़या, बेगूसराय और अन्य जिलों के लिए अलग-अलग अवैध संस्करण मुद्रित, प्रकाशित और वितरित कर रहा है जो कानूनी अपराध है।

प्रेस रजिस्ट्रार, नई दिल्ली ने दैनिक जागरण को पटना स्थित प्रेस से अखबार को प्रकाशित करने की इजाजत दी है। परन्तु, दैनिक जागरण प्रबंधन ने पटना के रजिस्ट्रेशन नम्बर की आड़ में भागलपुर, मुंगेर, लखीसराय, जमुई, शेखपुरा, खगडि़या, बेगूसराय और अन्य जिलों के लिए अवैध ढंग से वर्षों तक अलग-अलग जिलावार संस्करणों का प्रकाशन किया और सरकारी विज्ञापन की लूट मचाई। अभी दैनिक जागरण भागलपुर, मुंगेर, खगडि़या, जमुई, लखीसराय, बेगूसराय और अन्य संस्करणों में निबंधन संख्या के स्थान पर ‘‘आवेदित‘‘ छाप रहा है। परन्तु, बिहार और केन्द्र सरकार बिना निबंधन के छपनेवाले दैनिक जागरण अखबार को सरकारी विज्ञापन अब भी प्रकाशन हेतु भेज रही है। यह अपने-आप में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के पदाधिकारियों का चमत्कारों में चमत्कार है। सरकारी विज्ञापन की लूट की संस्कृति का यह जीता जागता उदाहरण है।

पटना से प्रकाशित कई उर्दू और अंग्रेजी दैनिकों को कोलकत्ता से अखबार प्रकाशित करने की अनुमति है। परन्तु पटना स्थित प्रेस से अवैध ढंग से मुद्रित और प्रकाशित कर प्रबंधन कथित अंग्रेजी और उर्दू दैनिकों को पूरे बिहार में वितरित कर रहा है। उर्दू और अंग्रेजी अखबार भी अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन प्राप्त कर रहे हैं। सभी अखबारों के संस्करणों के अवैध ढंग से प्रकाशित करने के पीछे अवैध ढंग से केन्द्र और राज्य सरकारों का सरकारी विज्ञापन प्राप्त

श्रीकृष्‍ण प्रसाद
करना ही मात्र लक्ष्य है। मजे की बात है कि सभी अखबारों का प्रबंधन और संपादकीय विभाग के प्रमुख आर्थिक भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त हैं और उल्टे सत्ता और विपक्ष के नेताओं, आईएएस और आईपीएस अधिकारियों पर आंखें तरेरने में पीछे नहीं रहते हैं।

मुंगेर से श्रीकृष्‍ण प्रसाद की रिपोर्ट. इनसे संपर्क मोबाइल नम्‍बर 09470400813 के जरिए किया जा सकता है.

हिंदुस्‍तान के विज्ञापन घोटाले के बारे में और जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं- हिंदुस्‍तान का विज्ञापन घोटाला

http://bhadas4media.com/

 

इंडियन एक्‍सप्रेस ने भी छापी गैंगरेप पीडिता की पहचान, मामला दर्ज

खबर आ रही है कि दिल्ली में मेल टुडे अखबार के बाद इंडियन एक्‍सप्रेस के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज हुआ है. इंडियन एक्‍सप्रेस ने भी दिल्‍ली गैंगरेप पीडिता तथा उसके परिवार के पहचान का खुलासा कर दिया, जिसके चलते यह मामला दर्ज हुआ है. मीडिया एथिक्‍स में रेप या यौन हिंसा की शिकार महिला का पहचान उजागर करने पर अघोषित मनाही रही है. कोर्ट भी कई बार पीडिता की पहचान का खुलासा किए जाने पर नाराजगी जता चुका है, इसके बाद भी अब तक इस तरह के मामले में अखबार को हड़काकर या धमकाकर छोड़ दिया जाता था. अब एफआईआर दर्ज करने का यह शायद नया मामला है.

बताया जा रहा है कि गैंगरेप के बाद दिल्‍ली तथा पूरे देश में जिस तरह की सरकार विरोधी लहर है. युवाओं में जिस तरीके का आक्रोश उससे सरकार इस पूरे मामले में फूंक फूंक कर कदम रख रही है. यही कारण रहा कि पीडिता को न सिर्फ इलाज के लिए सिंगापुर भेजा गया, बल्कि उसका शव वापस आने पर आनन-फानन में अंतिम संस्‍कार कर दिया गया, जबकि परिवार चाहता था कि छात्रा का अंतिम संस्‍कार वे अपने पुश्‍तैनी जिले में विधिपूर्वक करें. सरकार तथा सरकारी मशीनरी इस मामले को लेकर पूरी तरह दबाव में है. वो किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं होने देना चाहती है, इसके चलते ही मेल टुडे के बाद इंडियन एक्‍सप्रेस के खिलाफ भी दिल्‍ली पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है.

मेल टुडे के खिलाफ हुए एफआईआर की खबर इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं – गैंगरेप पीड़िता की पहचान उजागर करने पर मेल टुडे अखबार के खिलाफ एफआईआर

सिटी न्यूज से हरीश फतेहचंदानी की विदाई

इंदौर। सिटी न्यूज के स्टेट न्यूज हेड हरीश फतेहचंदानी को सिटी न्यूज प्रबंधन ने बाय-बाय कर दिया है। फतेहचंदानी ने तीन माह पूर्व शुरू हुए सिटी न्यूज में दमदारी के साथ अपनी पारी की शुरुआत की थी। चर्चा है कि फतेहचंदानी की शिकायतों पर कार्रवाई करते हुए प्रबंधन ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया है। फिलहाल अनिल सिंह चौहान और अद्र्धेदु भूषण को एडिटोरियल का दायित्व सौंपा गया है। फतेहचंदानी ने सिटी न्यूज से पहले डीजी न्यूज, बीटी न्यूज और चौथा संसार में विभिन्न पदों पर काम किया है। डीजी न्यूज प्रबंधन से विवाद के चलते उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया गया था। सिटी न्यूज में जाने के बाद फतेहचंदानी ने डीजी न्यूज के अधिकांश स्टाफ को सिटी न्यूज में ज्वाइन कराया था।

गैंगरेप पीड़िता की पहचान उजागर करने पर मेल टुडे अखबार के खिलाफ एफआईआर

खबर आ रही है कि दिल्ली में मेल टुडे अखबार के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर लिया है. ऐसा गैंगरेप पीड़िता की पहचान उजागर करने के कारण किया गया है. बताया जा रहा है कि अखबार ने गैंगरेप पीड़िता के साथ हुए घटनाक्रम और विरोध में हुए प्रदर्शनों को लेकर जो कवरेज किया, उसमें गैंगरेप पीड़िता की पहचान को उजागर कर दिया. उसके असली नाम व पहचान का खुलासा कर दिया.

मीडिया एथिक्स में यह शामिल है कि रेप या अन्य किसी यौन हिंसा की शिकार महिला का मीडिया कभी पहचान उजागर न करे क्योंकि इसके कारण उसका सामाजिक व पारिवारिक जीवन प्रभावित होता है. आमतौर पर सभी मीडिया हाउस इस नियम का पालन करते हैं. कुछ एक बार अनजाने में कुछ मीडिया हाउस पहचान उजागर कर देते हैं जिसके कारण उन्हें प्रेस काउंसिल समेत कई संस्थाओं की आलोचना का शिकार होना पड़ता है. मेल टुडे द्वारा गैंगरेप पीड़िता की पहचान उजागर किए जाने से पूरे मामले में फूंक फूंक कर कदम रख रही दिल्ली पुलिस को मौका मिल गया एफआईआर दर्ज करने का. कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार के कुछ मंत्रियों की तरफ से इशारा मिलने के बाद पुलिस ने यह रिपोर्ट दर्ज की है.

बेहूदा गायक हनी पर आईपीएस अमिताभ गुस्साए, एफआईआर दर्ज, राइटर कल्पना ने दायर की याचिका

“मैं हूँ बलात्कारी” और “केंदे पेचायिया” जैसे अश्लीलता और भद्देपने की समस्त सीमाओं को पार करने वाले गानों को लिखने और गाने वाले पंजाबी और बॉलीवुड गायक हनी सिंह से आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर बेहद नाराज हैं. उन्होंने इस बेहूदा गायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी है. आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर ने यह एफआईआर थाना गोमतीनगर, लखनऊ में दर्ज कराया है.

अमिताभ ने अपने एफआईआर में कहा है कि हनी सिंह द्वारा लिखे और गाए गए गाने अत्यंत अश्लील, उत्तेजक और अभद्र हैं और समाज में महिलाओं के प्रति असम्मान तथा गंभीर अपराध बढाने के लिए उत्प्रेरक का कार्य करते हैं. एफआईआर धारा 292, 293 तथा 294 आईपीसी के अंतर्गत दर्ज हुआ है. वास्तव में बेहूदा गायक हनी सिंह के कई गाने अत्यंत ही अभद्र, घटिया और महिला विरोधी हैं. दिल्ली रेपकांड के बाद सोशल मीडिया पर हनी सिंह के विरोध का दौर शुरू हो गया है. बात जब आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर तक पहुंची तो उन्होंने खुद पहल करते हुए हनी को सबक सिखाने का फैसला किया और कानूनी कार्रवाई शुरू कराई है. उन्होंने सबसे पहला काम हनी सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराके के किया है.

इस बीच, खबर है कि दिल्ली के पास गुड़गांव स्थित एक होटल में वर्ष खत्म होने के मौके पर होने वाले हनी सिंह के कार्यक्रम का महिलाओं द्वारा विरोध जताया जा रहा है. राइटर कल्पना मिश्र ने एक याचिका के ज़रिए होटल के जनरल मैनेजर को चिट्ठी लिखकर हनी सिंह के कॉंसर्ट को रद्द करने की दर्ख़्वास्त की है.

कल्पना ने याचिका में हनी सिंह द्वारा लिखे गए एक बेहद अश्लील गाने का ज़्रिक करते हुए लिखा है, "लगातार बढ़ रहे बलात्कार के मामलों और बीते दिनों एक युवा लड़की की मौत को लेकर पूरे देश में गुस्सा है. हम जानते हैं कि बलात्कार इसलिए होते हैं क्योंकि हमारे देश में कुछ मर्दों को ये स्वीकार्य है जिसका सबूत ''मैं बलात्कारी हूं'' जैसे गीत हैं जो हनी सिंह द्वारा लिखा गया है".

कल्पना ने ये भी लिखा है, "महिलाओं के प्रति विकृत मानसिकता को दिखाते ऐसे गीत ही पुरुषों में ये सोच बैठाते हैं कि पिछले दिनों लड़की के साथ जो बस में किया गया वो सही था." इस दर्ख़्वास्त को मीडिया के कई दिग्गजों का समर्थन मिल रहा है जिनमें पत्रकार बरखा दत्त और वीर संघवी भी शामिल है. कुछ ही देर में इस याचिका पर एक हज़ार से ज़्यादा हस्ताक्षर हो चुके हैं.


हनी सिंह से संबंधित मूल खबर- 'बलात्कारी' हनी सिंह को प्रमोट कर रहे अनुराग कश्यप को शेम शेम कहें

जाने-माने पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने जी न्यूज को अलविदा कहा

साल के आखिरी दिन मीडिया जगत में धमाके पर धमाका हो रहा है. ताजी सूचना जी न्यूज से है. अंदरुनी सूत्रों के मुताबिक जी न्यूज से करीब चार वर्षों से ज्यादा समय के अपने जुड़ाव को खत्म करते हुए मशहूर पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने अपना इस्तीफा प्रबंधन को सौंप दिया है. समकालीन पत्रकारिता में पुण्य प्रसून बाजपेयी को खर बोलने और सरोकार पत्रकारिता के लिए अडिग रहने वाला पत्रकार माना जाता है.

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी के प्रसंग के बाद जब जी न्यूज प्रबंधन ने पुण्य को पूरे प्रकरण को मीडिया की आजादी से जोड़ने और सरकार द्वारा मीडिया पर अंकुश लगाकर इमरजेंसी जैसे हालात पैदा करने का स्टैंड लेते हुए एंकरिंग करने को कहा तो पुण्य ने जी न्यूज से खुद को अलग कर लिया और अवकाश पर चले गए थे. आज पुण्य ने विधिवत रूप से अपना इस्तीफा सौंप दिया है. ऐसा कम देखा गया है जब कोई पत्रकार अपने स्टैंड व सरोकार को लेकर खुद को मीडिया हाउस से अलग कर ले. पुण्य प्रसून बाजपेयी से जुड़े लोगों का कहना है कि पुण्य पूरे प्रकरण पर किताब भी लिख सकते हैं ताकि जी न्यूज में पर्दे के पीछे चले घटनाक्रमों को दुनिया के सामने ला सकें.

पुण्य प्रसून बाजपेयी टीवी के ऐसे पत्रकार हैं जो अपने सरोकारी व वैचारिक पत्रकारिता को जीते हुए भी खूब टीआरपी लाते हैं. उनका प्रोग्राम चाहे आजतक में चला हो या जी न्यूज में, उसे खूब दर्शक व टीआरपी मिलते हैं. कह सकते हैं कि पुण्य अपने दम पर अपने शो को न सिर्फ हिट करा ले जाते हैं बल्कि दर्शकों को सोचने व समझने के लिए कई सवाल छोड़ जाते हैं. वे अपने कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों को सत्ता-सिस्टम के खेलों के प्रति शिक्षित करते हैं, सचेत करते हैं.

जी न्यूज के साथ पुण्य ने अपनी पारी वर्ष 2008 में एक मई यानि मजदूर दिवस के दिन शुरू की थी. उसी साल 8 मई को जी न्यूज रि-लांच हुआ था. जी न्यूज में 'बड़ी खबर' पेश करते थे पुण्य. इस प्रोग्राम को देखने के लिए लोग इंतजार करते थे. पुण्य आजतक में रहे तो 'दस्तक', सहारा में रहे तो 'मास्टर स्ट्रोक', एनडीटीवी में रहे तो 'खबरों की खबर' पेश करते थे. इन चारों चैनलों में उनके इन वैचारिक कार्यक्रमों की टीआरपी चैनल के एवरेज टीआरपी से ज्यादा होती थी. मतलब ये कि टीआरपी के लिए आपको पतित होना ही पड़ेगा, इस नारे को न सिर्फ पुण्य ने चुनौती दी बल्कि यह करके दिखाया कि आप मिशन और सरोकार के बल पर भी अच्छी टीआरपी ला सकते हैं. आप गंभीर विषयों पर चर्चा-विश्लेषण-परिचर्चा-संबोधन करके भी चैनल को अच्छी टीआरपी दिला सकते हैं.

पुण्य प्रसून बाजपेयी के करियर, सोच, जीवन आदि के बारे में आप ज्यादा जानकारी कई वर्ष पहले लिए गए इस इंटरव्यू से पा सकते हैं…

पुण्य इंटरव्यू

साप्‍ताहिक अखबार के संपादक जावेद जाफरी एवं उसके पुत्र के खिलाफ रंगदारी का मुकदमा

मुरादाबाद से खबर है कि हिंदी साप्ताहिक जिगर की आवाज़ के बिहार संपादक जावेद जाफरी व उसके बेटे के खिलाफ मुरादाबाद के नागफनी थाने में रंगदारी मांगने के आरोप में मामला दर्ज हुआ है. यह मामला दर्ज कराया है कटघर थाना क्षेत्र के पीरजादा रोड पर रहने वाले राशन डीलर अकरम ने. पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है तथा इसकी जांच कर रही है. अकरम ने अपने शिकायत में आरोप लगाया है कि जावेद जाफरी व उसका पुत्र उससे काफी समय से अपने समाचार पत्र जिगर की आवाज़ के लिए विज्ञापन की मांग कर रहे थे.

अकरम का कहना है कि जब उनसे अपना विज्ञापन देने मना किया तो ये लोग उसे रास्‍ते में रोककर धमकाने लगे कि अगर उसने उन्हें हर महीने 5000 रुपये नहीं दिए तो वो अपने समाचार पत्र जिगर की आवाज़ में उसके खिलाफ समाचार प्रकाशित करेंगे. तब उसने तंग आकार थाना नागफनी मुरादाबाद में मामला दर्ज कराया है. पुलिस ने अकरम की तहरीर अपराध संख्‍या 212/12 में आईपीसी की धारा 384, 504, 506 के तहत मुक़दमा दर्ज कर लिया है. गौरतलब है कि ये वो ही जावेद जाफरी हैं जिसके खिलाफ आईबीएन7 के रिपोर्टर फरीद शम्सी, सहारा समय के अतुल सिन्हा व सिटी न्यूज़ के फ़िरसत खान सहित काफी लोगों ने रंगदारी मांगने के आरोप में मामले दर्ज करा रखे हैं। इस मामले की जांच एसआई बाबूराम कर रहे हैं.

बीटीवी से आउटपुट हेड आशीष मिश्रा का इस्‍तीफा

साल 2012 बीटीवी के लिए बहुत बुरा रहा। करीब 2 दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों ने चैनल को अलविदा कहा। कई तो ऐसे थे जो चैनल की शुरुआत से जुड़े हुए थे। खबर ये है कि डेढ़ साल पहले ईटीवी से बतौर आउटपुट हेड बीटीवी पहुंचे आशीष मिश्रा ने भी इस्तीफा दे दिया है। आशीष अपनी नई पारी की शुरूआत जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ से कर रहे हैं।

पिछले एक माह पहले ही आउटपुट से ही आदित्य श्रीवास्तव ने इस्तीफा दिया था। आदित्य ने भी आपनी नई पारी जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ से शुरू की है। आदित्य के बाद आशीष मिश्रा का इस्तीफा बीटीवी के आउटपुट डिपार्टमेंट को बड़ा झटका है। ऐसे में खबर ये भी है कि आशीष मिश्रा की जगह बंसल न्यूज के एक वरिष्ठ पत्रकार ज्वाइन कर रहे हैं। वे बंसल न्यूज की कार्यप्रणाली से परेशान थे।

पाठक नहीं मिलने से परेशान आई नेक्‍स्‍ट होगा रीलांच

तमाम कोशिशों के बावजूद कई शहरों में अमर उजाला के काम्‍पैक्‍ट से पार नहीं पा सकने वाल जागरण समूह के आई नेक्‍स्‍ट को नए साल पर रीलांच किया जा रहा है. बाइलिंगुअल टैबलाइड आई नेक्‍स्‍ट न केवल अपना लोगो चेंज कर रहा है बल्कि अपना लुक भी बदल कर रहा है. बताया जा रहा है कि जिस युवा वर्ग को टारगेट करके इस टैबलाइड को लांच किया गया था, वह इस वर्ग में अपनी पहचान नहीं बना पाया. स्थिति यह रही कि इसे जागरण के साथ क्‍लब करके कम्‍बो ऑफर मूल्‍य पर भी बेचने का जुगत लगाया गया, परन्‍तु सफलता नहीं मिली.

खबर है कि इसी से परेशान प्रबंधन अब नए सिरे से अखबार को रीलांच करने जा रहा है ताकि चेहरा बदलकर ही सही कम से कम इसके पाठक खोजे जाएं. वैसे आई नेक्‍स्‍ट अलग तरीके एवं नए कांसेप्‍ट के साथ लांच किया गया था, जिसमें हिंदी अंग्रेजी शब्‍दों का साथ में प्रयोग किया गया. पर हिंदी या अंग्रेजी को स्‍मूथली पढ़ने वाले लोगों को आधी हिंदी आधी अंग्रेजी समझ नहीं आई यानी आई नेक्‍स्‍ट के साथ 'माया मिली ना राम' वाली कहावत चरितार्थ हो गई.

जबकि अमर उजाला समूह का टैबलाइड शुद्ध रूप से हिंदी में लांच किया गया और लोगों ने उसे हाथों हाथ लिया. आज जिन जिन श‍‍हरों में इन दोनों टैबलाइड एक साथ प्रकाशित हो रहे हैं वहां काम्‍पैक्‍ट आई नेक्‍स्‍ट को पीछे कर रखा है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन युवाओं को फिर से जोड़ने की कोशिश के तहत अपने कंटेंट प्रजेंटेशन और स्‍टाइल में बदलाव करने के साथ इसे मोबाइल फ्रेंडली भी बनाने जा रहा है. इसी के साथ इस बाइलिंगुअल टैबलाइड के वेबसाइट को अगल अंदाज में चमकाया जाएगा. अब देखना है कि इतने बदलावा के बाद भी आई नेक्‍स्‍ट कुछ नए पाठक जोड़ पाता है या नहीं.

मशहूर टीवी जर्नलिस्ट दीपक चौरसिया ने एबीपी न्यूज से इस्तीफा दिया

अभी अभी सूचना मिली है कि दीपक चौरसिया ने एबीपी न्यूज से इस्तीफा दे दिया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार दीपक ने अपना इस्तीफा अपने चैनल हेड शाजी जमां को सौंपा है. दीपक के इस्तीफे से उन कयासों की पुष्टि हुई है जिसमें कहा जा रहा था कि दीपक चौरसिया एबीपी न्यूज से इस्तीफा देकर इंडिया न्यूज के हिस्से बनेंगे और मीडिया जगत में एक बड़े प्रयोग की शुरुआत करेंगे. इस्तीफे के बारे में दीपक ने कुछ भी कहने से इनकार किया पर एबीपी न्यूज से जुड़े सूत्रों ने बताया कि दीपक चौरसिया ने आज इस्तीफा देने के बाद आफिस छोड़ दिया. माना जा रहा है कि कल नए साल के पहले दिन से वे अपने करियर के सबसे बड़े प्रोजेक्ट की शुरुआत कर देंगे.

दीपक चौरसिया भारतीय न्यूज चैनल जगत में कई कारणों से चर्चित हैं. लगातार हार्ड वर्क के कारण शून्य से शिखर तक की यात्रा करने वाले दीपक की जबरदस्त फैन फालोइंग है. दीपक ने कई बड़ी खबरें ब्रेक की. उन्होंने कई बड़े घटनाक्रमों को सबसे शानदार तरीके से कवर किया. एंकर और रिपोर्टर, दोनों लिहाज से दीपक समकालीन टीवी पत्रकारिता में मानक की तरह हैं. जो नए लोग पत्रकारिता में आते हैं, उनके मन में, उनके अवचेतन में दीपक चौरसिया जैसा बनने का सपना होता है.

दीपक आजतक न्यूज चैनल में लंबे समय तक रहे और आजतक के लिए सबसे स्टार रिपोर्टर-एंकर कहलाए. बाद में स्टार न्यूज के लिए कुछ यूं काम किया कि स्टार न्यूज और दीपक चौरसिया एक दूसरे के पर्यायवाची बन गए. स्टार न्यूज जब एबीपी न्यूज में कनवर्ट हुआ तो दीपक चौरसिया के चेहरे को आगे करके मार्केट में यह कंपेन चलाया गया कि कुछ नहीं बदला है, सिर्फ नाम बदला है. एबीपी न्यूज से दीपक चौरसिया का जाना बड़ा झटका है. फिलहाल, दीपक के इस्तीफे ने भारतीय टीवी जगत में हलचल पैदा कर दिया है.

दो चर्चाएं : दिल्ली में मैजिक टीवी बंद, देहरादून में नेटवर्क10 के बंद होने के आसार

न्यूज चैनलों की दुनिया से दो सूचनाएं आई हैं. पहली खबर दिल्ली से चलने वाले चैनल मैजिक टीवी को लेकर है. सूत्रों का कहना है कि यह चैनल बंद हो गया है. कई तरह की दिक्कतों और उठापटक से जूझ रहे इस चैनल की हालत कई महीनों से खराब थी. गिने चुने लड़के इस चैनल को चला रहा थे. ज्यादातर समय यह चैनल रिकार्डेड मोड पर ही रहता था. बाद में चैनल के मालिक ने चैनल में निवेश के लिहाज से कई प्रयोग व प्रयास किए पर उनका कोई दाव काम नहीं आया.

उन्होंने चैनल को कई बार बेचने की भी कोशिश की लेकिन हर बार अंतिम समय में बात बिगड़ जाया करती थी. सूत्रों के मुताबिक इस चैनल के मालिक ने चैनल की लांचिंग तुरत-फुरत मुनाफा कमाने की मंशा से की थी लेकिन उन्होंने कभी कंटेंट के लिहाज से कोई प्रयोग नहीं होने दिया. प्रसून शुक्ला के चैनल हेड रहने के दौरान इस चैनल को सिस्टमेटिक और कंटेंट ओरियेंटेड बनाने की कोशिश की गई लेकिन मैनेजमेंट में बैठे नान-जर्नलिस्टिक एप्रोच के लोगों ने चैनल को कंटेंट के लेवल पर जमने नहीं दिया. प्रसून शुक्ला के इस्तीफे के बाद धीरे धीरे हालात बिगड़ते गए और अब खबर है कि चैनल पूरी तरह बंद हो चुका है. इस बारे में चैनल के प्रबंधन से संपर्क करने का प्रयास किया गया पर संपर्क नहीं हो सका.

उधर देहरादून से खबर है कि नेटवर्क10 चैनल बंदी के कगार पर है. करीब चार महीने से यहां काम कर रहे लोगों को सेलरी नहीं मिली है. अशोक पांडेय के संपादकत्व में चल रहे इस चैनल को एक बार बेचने की कोशिश भी की गई थी. पर यह प्रयास नाकाम रहा. पर मार्केट में यही फैला कर रखा गया कि चैनल बिक गया है ताकि उधारी और देनदारी के लिए चैनल पर दबाव बनाने में जुटे लोगों को शांत कराया जा सके. सूत्रों के मुताबिक यूपी के किन्हीं रामानंद यादव ने शुरुआती एग्रीमेंट करके पांच लाख रुपये एडवांस दे दिया था लेकिन उन्होंने चैनल लिया नही. फिलहाल चैनल के मालिक राजीव गर्ग ही हैं.

राजीव गर्ग ने भी चैनल को संचालित करने के लिए पैसा देने से मना कर दिया है और चैनल के संपादक अशोक पांडेय को खुद कमाओ, खुद खाओ, खुद चलाओ के तर्ज पर काम करने का निर्देश दे दिया है. इस कारण अशोक पांडेय कई महीनों से अपनी टीम के लोगों के जरिए मार्केट से पैसा उगाहने में लगे हुए हैं. बावजूद इसके अभी नेटवर्क10 के सभी कर्मियों को सेलरी नहीं मिल पाई है. सूत्र बताते हैं कि अशोक पांडेय और उनके कुछ खास लोगों की चांदी है, बाकी लोगों को पैसे न होने की बात समझा कर कार्य करो, इंतजार करो का फार्मूला थमाया जा रहा है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन चैनल चलाने का इच्छुक नहीं है. देर-सबेर इस चैनल को बंद हो जाना है.  इस बारे में जब अशोक पांडेय से बात की गई तो उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

उपरोक्त चर्चाओं, सूचनाओं पर अगर किसी की कोई अलग राय, जानकारी या फैक्ट हो तो वह इसे नीचे के कमेंट बाक्स या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए शेयर कर सकता है.

‘सत्ता-माफिया-पुलिस-मीडिया के धुरंधरों ने जबरन पंद्रह लाख का रंगदार बना कर जेल भिजवाया’

मुकेश भारतीय : आज साल-2012 का अंतिम दिन है। यह मेरे लिये आत्म-चिंतन का दिन है। 2012 मानसिक-शारीरिक तौर पर बड़ा पीड़ादायक रहा, फिर भी चेहरे पर मायूसी को फटकने न दिया। 2012 में व्यवस्था के प्रति मन में अविश्वास उत्पन्न हुआ। सत्ता-माफिया-पुलिस-मीडिया के धुरंधरों ने जबरन 15 लाख का रंगदार बना कर जेल भिजवाया। क्या ये लोग किसी को कभी भी कुछ भी बना सकते सकते हैं ? मलाल की बात है कि रांची की मीडिया ने अपना काम ईमानदारी से नहीं किया। उसने सच की परिभाषा ही बदल दी।

आईपीएस अफसर भी माफियाओं के आदेशपाल बने दिखे। सब कुछ हौच-पौच लगा। अब 2013 सामने है। अब न किसी से गिला और न किसी से कोई शिकवा। अब बस दिलोदिमाग में एक ही जुनून- हर उस लकीर के सामने बड़ी लकीर खींचने की, जो मेरे मार्ग में बाधक बने। अब सभी मित्रों के साथ नव वर्ष की ढेर सारी मंगलकारी शुभकामनाओं के साथ कल नये वर्ष में बात-मुलाकात होगी।

मुकेश भारतीय के फेसबुक वॉल से. मुकेश भारतीय वेब पत्रकारिता के जरिए झारखंड की भ्रष्ट मीडिया से लेकर अफसरों, नेताओं की पोल खोलते रहे और इसी कारण उन्हें साजिशन गिरफ्तार किया गया और प्रताड़ित किया गया.

नए साल की पूर्व संध्या पर आत्मचिंतन में जुटे काटजू को यशवंत का जवाब

Markandey Katju : I have been described variously as a megalomaniac, a crank, a maverick, a publicity seeker, a wild man, a loose cannon, and even a dog (by a Chief Minister), who 'comments on everything under the sun'. What am I really ? What do I stand for ? Since the new year is approaching I think a clarification of my views is in order. I submit that my views are consistent, coherent, and directed to one single aim : To help my country become prosperous with its people having decent lives. My views are already in my articles and videos on my blog justicekatju.blogspot.in and on the website kgfindia.com, but let me summarize.

(1) Before the Industrial Revolution which began in Western Europe in the mid 18th Century there were feudal, agricultural societies everywhere. The feudal method of production was so backward and primitive (the bullock, buffalo, or horse were used for tilling the land, not tractors ) that very little wealth was generated by it, and hence only a handful of people (kings, aristocrats, zamindars, etc) could be rich, while the vast majority had to be poor. When the cake is small, very few people can eat it.

In sharp contrast, after the Industrial Revolution a unique situation has been created in world history. Modern industry is so powerful and so big that enough wealth can now be generated to meet the basic needs of everyone, and now no one need be poor, and every human being can get a decent life.

However, despite this unique historical situation, the reality is that 80% of the people of the world, including 80% Indians, are poor.

(2) The worst thing in life is poverty. In India there is massive poverty, malnutrition (every second Indian child suffers from malnutrition), unemployment, farmers suicides, skyrocketing prices, lack of healthcare and good education for the vast majority, etc

(3) Science is the only solution to these great social evils. By science I do not mean physics, chemistry, mathematics and biology alone. By science I mean the entire scientific outlook and scientific temper, which must be spread to every nook and corner of our country if we wish to abolish these social evils.

(4) The truth is that the vast majority of our people are intellectually very backward, their minds full of casteism, communalism, and superstitions (see on my blog my articles 'Reply to Young Students', 'The 90%', 'Ten ways of being foolish', and Rid our body politic of communal poison'.). And it is not just the uneducated people who are backward. Vast sections of the so called educated people in our society are also casteist, communal, and superstitious.

(5) Therefore my whole effort is to combat backward, feudal ideas and promote rational and scientific thinking among the Indian people so that India emerges as a modern, highly industrialized, prosperous country, in which all its people (and not just a handful) are prosperous. This requires long, steady effort of patiently explaining the truth to the people, which is precisely what I have been doing since long.

(6) We have all the potential of becoming a modern, highly industrialized, prosperous country. We have today (which we did not have in 1947) thousands of outstanding scientists, technicians, engineers, managers, doctors, etc and we also have immense natural wealth, raw materials, etc. We have therefore to convert this potential into a reality so that all our people (and not just a handful) get decent lives.

Is this the objective and thinking of a 'megalomaniac', a 'loose cannon', a 'crank', and a 'wild man' ?


Yashwant Singh : आपका सब ठीक है, बस यह छोड़कर कि आप करप्ट कांग्रेसी नेतृत्व पर कभी अटैक नहीं करते, और बाकी सभी को गरियाते रहते हैं… यह दोहरा व्यवहार नेताओं सरीखा है, जिसकी अपेक्षा आपसे नहीं रखते. लोग कहते हैं कि कांग्रेस आलाकमान की कृपा से आपको आगे बहुत कुछ मिलने की संभावना है… आपका कांग्रेस नेतृत्व के प्रति साफ्ट कार्नर हम जैसों को चुभता है. दूसरा, आपको देश की इतनी चिंता है, इतनी बड़ी बड़ी बातें हैं तो ग्राउंड लेवल पर आप क्या कर रहे हैं… प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन के बतौर आपने किस भ्रष्ट मीडिया हाउस की खटिया खड़ी की?? और, भाषणबाजी छोड़ दिया जाए तो आप अपने से पहले के प्रेस काउंसिल चेयरमैनों से किस तरह अलग हैं… माफ करिएगा, आपके शब्दों के जंजाल में मैं नहीं पड़ने वाला. हां, कभी मैं भी आपका फैन हुआ करता था. लेकिन आपको नजदीक से जानने के बाद तो मुझे यह कहना ज्यादा अच्छा लगता है कि मुझे हजार दुश्मन दे दे, आप जैसा कोई एक दोस्त न दे… क्योंकि दुश्मन के बारे में तो ठीक ठीक पता होता है कि ये दुश्मन है.. पर दोस्त से दुश्मन होने की उम्मीद नहीं की जाती …. आप एक भ्रष्टतम पार्टी के संचालकों के पैरोल पर हैं, ये आरोप मैं लगाता हूं.. और, आपने कभी इनके खिलाफ दो बोल बोलें हो तो मुझे बताइएगा… नए साल में आप भ्रष्टाचार के मुखिया सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह को गरिया पाएं, भ्रष्ट मीडिया हाउसों को ऐतिहासिक दंड दे पाएं… यही दो उम्मीद आपसे करता हूं.. बाकी, लफ्फाजी मैं भी आपसे अच्छा कर सकता हूं लेकिन मैं अपनी बुराइयों के साथ सामने रहता हूं ताकि कोई मेरे आवरण छलावे में कोई न आए… पारदर्शिता के दौर में आपसे भी वैचारिक पारदर्शिता की उम्मीद हम करते हैं मिस्टर काटजू.

प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मारकंडेय काटजू के फेसबुक वॉल से.

काटजू की पोस्ट के नीचे टिप्पणी भड़ास के एडिटर यशवंत की है.

प्रेस क्लब नहीं मनाएगा नये साल का जश्न

नयी दिल्ली : बर्बर सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 वर्षीय छात्रा की मौत के बाद पूरे देश में फैली शोक की लहर के बीच प्रेस क्लब आफ इंडिया ने नये साल का जश्न नहीं मनाने का फैसला किया है। क्लब के महासचिव अनिल आनंद ने छात्रा के निधन पर गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए कहा कि पूरा पत्रकार जगत संकट की इस घड़ी में युवती के परिजनों के साथ है और हमारी उनके साथ पूरी सहानुभूति है।

दिवंगत बहादुर लड़की की आत्मा की शांति की हम कामना करते हैं। उन्होंने कहा कि शोक संतप्त परिवार के साथ अपनी संवेदना को जोड़ते हुए हमने तय किया है कि इस साल नए साल का समारोह क्लब में नहीं होगा। क्लब हालांकि खुला रहेगा लेकिन मृतक युवती की आत्मा की शांति के लिए दुवाएं की जाएंगी।
(भाषा)

”देश को नरक में धकेलने के दोषी नेताओं का नाम और उनकी तस्वीर हम एक दिन अपने समाचार पत्र में नहीं छापेंगे”

आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी हम कैसी सत्ता व्यवस्था में जी रहे हैं, इस पर और कुछ बोलने की क्या जरूरत रह गई है? राजनीति का धंधा करने वालों ने इस देश को दोजख बना डाला है। 'अनामिका' ने मृत्यु का वरण करने का हमारा आह्वान सुन लिया। लेकिन सच है कि 'अनामिका' मरी तो जैसे पूरे देश की आत्मा मर गई। घोर शोक और उद्वेलन के इस समय में हमने तय किया कि देश को नरक में धकेलने के दोषी नेताओं का नाम और उनकी तस्वीर हम एक दिन अपने समाचार पत्र में नहीं छापेंगे, चाहे वह नेता राष्ट्रपति हो या प्रधानमंत्री या कोई और।

…जब राजपथ पर आम आदमी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से न्याय का भरोसा चाह रहा था तो लाठियां बोल रही थीं… और जब 'अनामिका' मर गई तो सब जुट पड़े और कांव-कांव करने लगे! जब आम आदमी रोए तो उनको यह गाना लगता है, हर नेता मानवता पर अब ताना लगता है… 'अनामिका' के साथ हुई बर्बरता और सत्ता की आपराधिक उपेक्षा के खिलाफहै यह संपादकीय-प्रतिरोध… स्याह, नि:शब्द, मौन…!

वरिष्‍ठ पत्रकार तथा कैनविज टाइम्‍स के प्रधान संपादक प्रभात रंजन दीन के फेसबुक वॉल से साभार.

एसएचओ दिनेश कुमार का कारनामा : आंदोलनकारी लड़की को बंधक बना झाड़ू-पोंछा लगवाया

Mayank Saxena : ख़ुदा-दाद एसएचओ दिनेश कुमार का एक और हिला देने वाला बदसलूकी का मामला सामने आया है…कल शाम जंतर मंतर पर पहुंची एक लड़की ने बताया कि उसे सुबह डीटेन कर के दिन भर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में रखा गया…वहां उस लड़की से न केवल महिला पुलिस के अलावा एसएचओ दिनेश कुमार ने भी मारपीट की…उसका दुपट्टा खींचा…बल्कि उस लड़की का, जिसके चश्मे की पावर 10 थी…उसका चश्मा छीन कर दिन भऱ अपने पास रखा…और फिर जैसे बेशर्मी और अमानवता का इतना ही सिलसिला काफ़ी न था…एसएचओ दिनेश कुमार के आदेश पर उससे थाने में झाड़ू पोंछा भी करवाया गया…

इस घटना की जानकारी मिलने के बाद जब हम उस लड़की को लेकर इस मामले की शिकायत करने पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने गए तो पहले पहल तो शिकायत लिखने से ही मना कर दिया गया…उसके बाद एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया गया…रात भऱ वहां टिके रहने के बाद भी दिनेश कुमार आला अधिकारियों के साथ अपने कमरे में बैठ कर ठहाके लगाते रहे…

आप समझ रहे हैं न कि महिलाओं की सुरक्षा का भार कैसे अधिकारियों के ऊपर है…औऱ कितने संवेदनशील हैं ऐसे पुलिस अधिकारी…दिनेश कुमार के खिलाफ ये पहला मामला नहीं है…उन पर आए दिन महिलाओं और लोगों से बदसलूकी के आरोप लगते रहते हैं…क्या आपको नहीं लगता कि संसद मार्ग जैसे थाने पर तैनात इस अधिकारी पर कार्रवाई होनी चाहिए…

मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से.

इसी प्रकरण पर हिंदुस्तान अखबार में प्रकाशित खबर…


इसे भी पढ़ें-

संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिनेश कुमार ने फिर एक लड़की से की बदसलूकी

गैंगरेप के खिलाफ आनलाइन अभियान चलाने वाले बग्गा को पकड़ ले गई दिल्ली पुलिस

Raj Kamal : दिल्ली पुलिस अब कर रही है वेबसाइट युजरों के साथ बलात्कार। गैंगरेप कांड के बाद दिल्ली पुलिस ने ट्विटर और फेसबुक पर पोस्ट करने वालों पर कार्रवाई शुरू कर दी है। फेसबुक पर पुलिस व सरकार के खिलाफ इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने के लिए अपील करने वाले तेजिंदर पाल सिंह बग्गा को तीन दिन पुलिस हिरासत में रखने के बाद नजरबंद कर दिया गया है। वह कुछ कर न कर सकें , इसके लिए घर के बाहर दो कांस्टेबल तैनात किए गए हैं।

तेजिंदर ने बीते सोमवार को भगत सिंह क्रांति सेना की ओर से हैंग द रेपिस्ट मार्च की अपील करने वाला एक विज्ञापन फेसबुक पर डाला था। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में छात्रों को इसके कुछ पोस्टर भी दिए थे। फेसबुक के जरिए उन्होंने युवाओं से अपील की थी कि वे 29 दिसंबर को इंडिया गेट पर किसी भी तरह से पहुंचे और सरकार से फास्ट ट्रैक कोर्ट व महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने को लेकर प्रदर्शन करें।

फेसबुक पर यह पोस्ट अपडेट होते ही उनके पास असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस कार्यालय से फोन आया और उसे फेसबुक से यह विज्ञापन हटाने और इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने से मना किया गया। उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पुलिस उसे बृहस्पतिवार को घर से उठाकर ले गई। पुलिस ने उसे तीन दिन तक तिलक नगर थाना में हिरासत में रखा।

पुलिस ने उसे शनिवार तक छोड़ा ही नहीं। उसे शनिवार रात 12 बजे रिहा किया। पुलिस ने उसे घर से बाहर न जाने की हिदायत दी और कहा कि पुलिस के आला अधिकारियों के नए आदेश आने तक वह अपने घर पर ही नजरबंद रहेगा। पुलिस ने बग्गा के घर के बाहर दो कांस्टेबल तैनात किए हैं।

राजकमल के फेसबुक वॉल से.

 

पंकज मुकाती के डायरेक्टर एडिटोरियल बनते ही ‘दबंग दुनिया’ में दिखने लगा बदलाव

नई सोच और नई उर्जा से लबालब पंकज मुकाती के इंदौर से प्रकाशित होने वाले अखबार 'दबंग दुनिया' डायरेक्टर एडिटोरियल बनते ही अखबार में काफी बदलाव दिखने लगा है. गैंगरेप पीड़िता की मृत्यु के बाद इस अखबार का प्रथम पेज जिस तरह डिजाइन किया गया, उसकी काफी चर्चा हो रही है. नीचे वो फ्रंट पेज दिया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि पंकज मुकाती ने हाल में ही दबंग दुनिया के साथ नई पारी शुरू की है. वे इसके ठीक पहले अमर उजाला में हुआ करते थे. दबंग दुनिया ज्वाइन करने के पहले वे अमर उजाला, इलाहाबाद के संपादक थे और अमर उजाला प्रबंधन ने उनका तबादला बरेली के लिए कर दिया था. पंकज ने इलाहाबाद के बारे में अपने अनुभवों को शेयर करते हुए बताया- ''I stay 7 month at Allahabad and its really a great experience पंकज मुकातीof my life… i always remeber Allahabad as a turning point, city gives me confidance and peace of mind.''

पंकज अमर उजाला में सीनियर डिप्टी एडिटर हुआ करते थे. वे दैनिक भास्कर में कई शहरों में कई पदों पर रहे. भास्कर के साथ उन्होंने भोपाल, रायपुर और इंदौर में करीब पांच वर्षों तक काम किया. इसके बाद वे करीब तीन वर्षों तक राजस्थान पत्रिका समूह के हिस्से बने रहे. वे पत्रिका समूह के इवनिंग डेली न्यूज टुडे, इंदौर में एक्जीक्यूटिव एडिटर थे.

पत्रिका मध्य प्रदेश की लांचिंग टीम के सदस्य रहे पंकज मुकाती. बाद में वे पत्रिका, इंदौर के रेजीडेंट एडिटर बनाए गए. बाद में कंटेंट एडिटर के बतौर पत्रिका, जयपुर में काम किया. इंदौर में पले बढ़े और इसी शहर से पढ़ाई लिखाई करने वाले पंकज मुकाती कई अखबारों और कई शहरों में विभिन्न पदों पर काम करते हुए अब फिर से वापस इंदौर पहुंच गए हैं, एक नए अखबार को जमाने. दबंग दुनिया अखबार का नेतृत्व पंकज मुकाती को दिए जाने के कारण इंदौर के दूसरे जमे-जमाए अखबारों में कार्यरत लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें हैं.


वाह रे समाजवाद! इधर दर्द में पूरा देश, उधर सैफई में बिपाशा के ठुमके

खुद को राम मनोहर लोहिया के शिष्‍य और समाजवादी मानने वाले मुलायम सिंह यादव यानी नेताजी अब शायद समाजवाद भूलकर बाजारवाद या कहें कि अमरवाद में पूरी तरह रंग चुके हैं. अब उनके अंदर समाजवादियों की तरह संवेदनशीलता नहीं रह गई है. किसी समय अपने बात के पक्‍के माने जाने वाले नेताजी अब अपनी बातों को याद भी नहीं रखते. नेताजी समाजवाद से ज्‍यादा अब अमरवाद के नजदीक जा पहुंचे हैं. अमर सिंह भले ही मुलायम सिंह से अलग हो चुके हैं, पर उन्‍होंने जिस वाद का नेताजी को चस्‍का लगा दिया है, उसका पूरा असर देखने को मिल रहा है.

पूरे देश में दिल्‍ली गैंगरेप की शिकार युवती के मामले में पूरा देश खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा था. देशवासी गैंगरेप की शिकार छात्रा को खुद से जोड़कर देख रहे थे. वो भले छोड़कर चली गई, परन्‍तु उसे ठीक होने को लेकर हर कोई दुआ मांग रहा था. उस दौर में समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव देश के इस दर्द से दूर सैफई में बिपाशा वसु, ऋतिक रोशन एवं अन्‍य अभिनेत्रियों के नृत्‍य व ठुमकों का आनंद उठा रहे थे. ये वही मुलायम सिंह यादव और सीएम अखिलेश यादव हैं, जो बलात्‍कार पीडिता को नौकरी और अन्‍य सहयोग देने का वादा किया था. पर शायद अब ये समाजवादी नेता अब सारा समाजवाद भूल चुके हैं.

कम से कम नेताजी और सीएम अखिलेश यादव को इतना सोचना ही चाहिए था कि गैंगरेप की शिकार युवती उनके ही राज्‍य से ताल्‍लुक रखती है तो कम से कम थोड़ी संवेदना दिखा देते. पूरे सैफई महोत्‍सव कार्यक्रम रद्द भले ना करते कम से कम ठुमका का एकाध कार्यक्रम ही निरस्‍त करके संदेश देते कि गैंगरेप की शिकार युवती के प्रति उनकी सहानुभूति है, लेकिन नेताजी ने ऐसा कोई संदेश नहीं दिया और ना ही देने की कोशिश की, बल्कि मस्‍त मस्‍त ठुमको को देखकर खुश होते रहे. क्‍या समाजवाद से दूर होते दिख रहे नेताजी इन्‍हीं संवेदनाओं के सहारे देश का प्रधानमंत्री बनने का ख्‍वाब पाले हुए हैं. आखिर क्‍या हो गया है पुराने मुलायम सिंह यादव को? क्‍या सचमुच अमरवाद अब उनके भीतर से नहीं निकल पा रहा है?

अन्‍य अखबारों ने अपना धर्म भले ही नहीं निभाया परन्‍तु दैनिक भास्‍कर ने छोटा ही सही एक खबर देकर इस मामले को उठाने का प्रयास किया. भास्‍कर ने 'इधर गुस्सा, उधर ठुमका' शीर्षक से लिखा – ''एक तरह गैंग रेप पीडि़ता की मौत के बाद पूरे देश में गम और गुस्से ही लहर है तो वहीं दूसरी तरफ यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पैतृक गांव सैफई में उल्लास का माहौल है। यहां सैफई महोत्सव पिछले दो हफ्ते से बिना किसी झिझक व रोकटोक के जारी है। यहां आने वाले फिल्मी कलाकार जमकर ठुमके लगा रहे हैं। एक भी दिन कार्यक्रम रोका नहीं गया, जबकि इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि पीडि़ता यूपी की ही रहने वाली थी।''

अब आप ही तय कीजिए कि क्‍या इस तरह की असंवेदनशील लोग जनता का कितना भला सोच सकते हैं. ग्रेटर नोएडा में छात्रा से गैंगरेप होता है और यूपी की पुलिस मामला दर्ज नहीं करती, बल्कि पीडित परिवार ही पुलिस के डर से गांव छोड़कर पलायन कर जाता है. क्‍या जनता को यही सब देने का सपना दिखाकर अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी ने अपनी सरकार बनाई है. यूपी के तमाम जिलों में गैंगरेप हो रहा है, पर पुलिस किसी भी मामले को गंभीरता से नहीं ले रही है. पुलिस जनता का सेवक नहीं बल्कि आतंक बन कर यूपी में काम कर रही है, जिसके चलते लोग सारी बुराइयों के बावजूद मायावती सरकार को याद करने को मजबूर हो रहे हैं. अगर अब भी यूपी सरकार नहीं चेती तो सन 2014 बहुत शुभ साबित नहीं होगा.  

भुवनेश्‍वर में वरिष्‍ठ पत्रकार के घर से चेन की लूट

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्‍वर में लूटेरों का आतंक बढ़ गया है. ऐसा लग रहा है कि इन लुटेरों को पुलिस का कोई डर नहीं रह गए है. राजधानी में यूनिट दो के वीए 20/4 में रहने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार प्रद्युम्‍न महान्ति के घर में घुसकर लुटेरों ने लूट की घटना को अंजाम दिया. बताया जा रहा है कि शनिवार की शाम पत्रकार के घर के सामने उनकी सास, पत्‍नी तथा बेटी कहीं से लौट रही थीं तो एक लुटेरा उनकी सास का पीछा करते हुए उनके घर तक पहुंच गया.

लुटेरे ने उनकी सास को धमका कर तथा घायल कर उनके गले की चेन छीनकर भाग निकला. पत्रकार ने इस घटना की जानकारी पुलिस को दी. पुलिस मामले की जांच कर रही है. इस घटना से भुवनेश्‍वर के लोग खौफ में हैं. उनका कहना है कि जब हाई सिक्‍योरिटी जोन में लुटेरे घरों में घुसकर वारदात को अंजाम दे रहे हैं तो दूसरे इलाकों की स्थिति क्‍या होगी. 

रवि वर्मा एवं हिमांशु गुप्‍ता कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस से जुड़े

कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस औरैया से खबर है कि यहां आपसी घमासान चरम पर है. कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस के ब्‍यूरोचीफ वेद प्रकाश आर्य ने योगेश जादौन द्वारा नया आफिस कानुपर रोड पर खोले जाने के बाद काम करना बंद कर दिया है. साथ ही उनकी टीम भी बॉयकाट कर रही है. वहीं बीते शुक्रवार से नए आफिस में काम शुरू हो गया है. खबर है कि अमर उजाला व हिंदुस्‍तान में काम कर चुके रिपोर्टर रवि वर्मा एवं हिमांशु गुप्‍ता ने कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस के साथ काम शुरू कर दिया है. कल्‍पतरु में पहले से काम कर रहे कुछ और लोग के नए टीम में आने की संभावना है.

अब दिखेगा सरकारी क्षेत्र की कंपनियों का हाल पीएसयू टीवी पर

 

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के शीर्ष निकाय स्कोप ने ग्रामीण भारत सहित सभी क्षेत्रों में पहुंच बनाने के लिए पीएसयू टीवी चैनल शुरू करने की योजना बनाई है।
 
इसके अलावा स्कोप ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कर्मचारियों के लिए एक स्वतंत्र पीएसई प्रबंधन संस्थान खोलने के लिए दुनिया के बेहतरीन अकादमिक संस्थानों को आमंत्रित किया है।
 
हाल ही में स्कोप की 39वीं वार्षिक आम सभा में  महानिदेशक यूडी चौबे ने कहा कि उन्होंने भविष्य में दो नयी पहल पीएसयू टीवी शुरू करने और एक प्रबंधन संस्थान खोलने की तैयारी की है।
 
समझा जाता है कि स्कोप के पीएसयू टीवी के जरिये लोगों को सरकारी कंपनियों के बारे में विस्तार से जानने का अवसर मिल पाएगा। हालांकि अभी चैनल की विस्तृत योजना पर विचार नहीं हुआ है, लेकिन इस बारे में जल्दी ही रूपरेखा तैयार की जाएगी।

शर्लिन ने कहा – ”मैं रेप कराने को तैयार हूं”

: अगर इससे देश की बाकी लड़कियों की सुरक्षा की गारंटी मिलती हो : अभिनेत्री शर्लिन और विवाद का साथ चोली दामन का है. जहाँ शर्लिन होती हैं वहां विवाद होना तय है. हाल ही में एक मैग्ज़ीन के लिए नग्न तस्वीर खिंचवाने वाली शर्लिन ने अब एक नया धमाका किया है. शर्लिन ने ट्विटर पर लिखा है " मैं रेप के लिए तैयार हूँ". अगर आपको याद हो तो शर्लिन ने हाल के दिनों में ट्विटर पर अपनी कई आपत्तिजनक तस्वीरें पोस्ट की थीं. इस तरह के मामले में देखा जाता है कि यह सब करने से अक्सर फॉलोअर की बाढ़ आ जाती है. ऐसे ही शर्लिन के साथ भी हुआ. लेकिन दिल्ली में रेप के बाद बने माहौल ने शर्लिन का काम बिगाड़ दिया. शर्लिन के इस पोस्ट का विरोध हर कोई करने लगा है.

चारो तरफ से हमले होते देख शर्लिन ने जवाब दिया. शर्लिन चोपड़ा ने ट्विटर पर कहा है कि अगर उनका रेप किए जाने से देश की बाकी लड़कियों की सुरक्षा की गांरटी मिलती है तो वह इसके लिए तैयार हैं. लगातार आलोचना से परेशान शर्लिन ने रविवार को ट्वीट किया- 'डियर हेटर्स, आपका कहना है कि मेरे साथ भी रेप होना चाहिए. अगर मेरे रेप से यह गारंटी मिलती हो कि उसके बाद देश की किसी भी बेटी के साथ रेप नहीं होगा, तो मैं तैयार हूं.' इसके बाद लोगों ने ट्वीट कर अपनी प्रतिक्रिया दी. लोगों ने शर्लिन के इस व्यवहार को गलत बताया जिसके जवाब में शर्लिन ने कहा कि इसे सही सन्दर्भ में नहीं लिया गया है. खैर शर्लिन अपने मकसद में कामयाब होते दिख रही हैं क्योंकि शर्लिन लोकप्रियता की भूखी हैं और आजकल लोकप्रियता तक पहुँचने का रास्ता विवाद है जिसे जन्म देना शर्लिन को बखूबी आता है. (तहलका)

ब्‍लैक मास्‍ट हेड के साथ आज समाज ने दी छात्रा को श्रद्धांजलि

नई दिल्ली। दिल्‍ली में 16 दिसम्‍बर की रात चलती बस में गैंग रेप की शिकार हुई मेडिकल की छात्रा के निधन से पूरा देश मर्माहत है. मीडिया ने भी इस मामले को पूरा कवरेज दिया है. कुछ अखबारों ने 29 को ही खबर छापकर बाजी मार ली थी तो कुछ अखबारों ने आज इस संवेदनशील मुद्दे पर अलग-अलग हेडिंग और लेआउट के साथ श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है. तमाम अखबारों में आज समाज ने लेआउट के मामले में बाजी मार ली है. इस अखबार ने अपना पहला पेज पूरी तरह से 'निर्भया' को समर्पित कर दिया है.

आज समाज ने न केवल अपना मास्‍ट हेड ब्‍लैक कर दिया है बल्कि आधे से ज्‍यादा पेज में छात्रा की इलाज के दौरान की फोटो प्रकाशित करते हुए हेडिंग भी नेशनल शेम डे 16.12.12 लगाकर अलग तरीके से अपनी श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है. बताया जा रहा है कि इस पूरे ले आउट के पीछे समूह संपादक अजय शुक्‍ला की मेहनत रही है. अपने साथियों के साथ मिलकर उन्‍होंने आज समाज के माध्‍यम से 'निर्भया' को श्रद्धांजलि देने में पूर्ण रूप से सफल रहे. उन्‍होंने इसी मामले पर अग्रलेख भी लिखा है. 

एक दशक में मार दिए गए 373 पत्रकार

इराक के संवाददाता संयुक्त संगठन द्वारा 29 दिसम्बर को जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2003 में इराक युद्ध शुरू होने से लेकर अब तक कुल 373 संवाददाताओं की मौत हुई है। रिपोर्ट में कहा गया कि अब तक संवाददाता के खिलाफ हमला बंद नहीं हुआ है, जाहिर है कि इराक में मीडिया कर्मचारियों की स्थिति फिर भी खरतनाक है। रिपोर्ट के मुताबिक इराकी सुरक्षा दलों की कार्यक्षमता के अभाव के कारण पत्रकारों की हत्या करने वाले अधिकतर अपराधियों को अब तक दण्ड नहीं मिला है। वहां काम कर रहे पत्रकारों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। (सीआरआई)

पुष्‍प सवेरा अखबार के मालिक का बेटा पुनीत रंगरेलिया मनाते पकड़ा गया

आगरा : सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुई दामिनी के अंतिम संस्कार को कुछ घंटे भी नहीं बीते थे कि आगरा से प्रकाशित हिंदी समाचार पत्र पुष्‍प सवेरा के मालिक बीडी अग्रवाल का पुत्र पुनीत अग्रवाल रंगरेलियां मनाते हुए रविवार को रंगे हाथ पकड़ा गया। पुनीत आगरा के सबसे बड़े बिल्डर कंपनी पुष्पांजलि कंस्ट्रक्शंस का निदेशक भी है। उसके लिए रंगरेलियों की महफिल शहर के सबसे प्रमुख बाजार संजय प्लेस स्थित विज्ञापन एजेंसी के दफ्तर में सजाई गयी थी। इसके रंगरेलियों में किसी प्रकार का व्यवधान न हो इसके लिए ऑफिस के बाहर ताला बंद कर दिया गया था। 

बताया जा रहा है कि किसी ने पुलिस को पुनीत के रंगरेलियों की सूचना दे दी, जिसके बाद पुलिस ने ऑफिस के सामने  डेरा डाल लिया। ऑफिस को खुलवाकर बिल्डर समूह के निदेशक और युवती को पकड़कर थाने ले जाया गया, वहां कई घंटे तक हंगामा चलता रहा। मामले को मैनेज करने की भी कोशिश की जाती रही। बिल्डर समर्थक तमाम रसूखदार समर्थकों एवं अखबार के सम्पादकीय विभाग के सक्षम लोगों द्वारा पुलिस पर मामले को रफादफा कर लड़के को छोड़ने के लिए दवाब बनाया जाने लगा। पुलिस खासे दबाव में दिखी। पुनीत के ग्रुप के कर्मियों ने समाचार कवरेज करने पहुंचे मीडिया वालों से हाथापाई भी की।

बताया जा रहा है कि रविवार की दोपहर किसी ने हरीपर्वत पुलिस को सूचना दी कि संजय प्‍लेस में स्थित अवध बैंकट हॉल के पीछे स्थित एलेक्स एड एजेंसी के आफिस में अय्याशी के लिए एक लड़की लाई गयी है। ऑफिस को बाहर से बंद करके अंदर अय्यासी चल रही है। जब सूचना के बाद कोबरा मोबाइल के जवान पहुंचे तो बाहर से ताला पड़ा था, जिससे पुलिस लौट गई। फिर सूचना मिली कि जानबूझकर आफिस में बाहर से ताला डाला गया है। इसके बाद सीओ हरीपर्वत समीर सौरभ थाने के फोर्स के साथ पहुंच गए तथा शटर के पास कान लगाकर अंदर की बातें सुनने की कोशिश करने लगे। जब उन्‍हें पक्‍का यकीन हो गया कि अंदर लड़का एवं लड़की मौजूद हैं तो उन्‍होंने दुकान मालिक को बुलवाया, उसके नहीं आने पर उन्‍होंने एसएसपी को जानकारी देकर शटर का ताला तोड़़वा दिया।

शटर खुला तो पुनीत अग्रवाल और वह युवतती आपत्तिजनक अवस्‍था में मिले। पुलिस अभी पूरी तरह से पूछताछ भी नहीं की थी कि इस मामले की जानकारी पूरे शहर हो गई। इसके बाद पुलिस के पास तमाम लोगों के सिफारिशी फोन घनघनाने लगे। दोनों को पुलिस हरीपर्वत थाने ले गई। वहां से युवती को महिला थाने भेज दिया गया। इस दौरान पुष्‍प सवेरा अखबार के तमाम पत्रकार एवं कर्मचारी भी पहुंच गए। पुनीत के फोटो खींचे जाने को लेकर इन लोगों ने मीडियाकर्मियों से अभद्रता भी की। हाथापाई करने की भी कोशिश की।

हाईप्रोफाइल मामला होने के कारण पुलिस भी मीडिया के सामने कुछ बोलने से बचती नजर आयी। फिलहाल सम्बंधित थाना क्षेत्र के सीओ का कहना है कि पूरे मामले की तफ्तीश जारी है और अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। मीडियामैनेजमेंट की कोशिशें भी की जाने लगी, जिससे कि अन्य अखबारों में इस खबर को प्रकाशित होने से रोका जा सके। वैसे इससे पहले भी ये समूह कई बार कानूनी पचड़ों में फँसा है लेकिन अखबारों के लिए शहर का एक बड़ा विज्ञापनदाता होने के कारण मीडिया मैनेजमेंट हमेशा आसानी से कर लिया गया है। पर इस बार यह मुश्किल दिख रहा है। वहीं एसएसपी एससी दुबे ने बताया कि पुनीत के खिलाफ धारा 294 के तहत कार्रवाई की गई है। युवती को परिजनों के हवाले कर दिया गया है। एड एजेंसी आफिस के संबंध में जांच कराई जा रही है।

महाकाल से सम्‍पादक चंद्रकात यादव एवं जागरण से राजकुमार एवं दीपक की छुट्टी

झांसी से प्रकाशित होने वाला सांध्य दैनिक अखबार के सम्पादक चंद्रकांत यादव को निकाल दिया गया है। उनकी जगह आशुतोष बनर्जी को नया सम्‍पादक बनाया गया है। इस अखबार के प्रिंट लाइन से  चंद्रकांत यादव का नाम हटा दिया गया है। सूत्रों से पता चला है कि चंद्रकांत यादव को इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने की वजह से हटाया गया है। क्योंकि एक सप्ताह पहले झांसी में इलेक्ट्रानिक मीडिया के चुनाव हुऐ थे, जिसमें शकील अली हाशमी को अध्यक्ष और अमित श्रीवास्तव को महासचिव बनाया गया था।

महाकाल में सम्पादक चंद्रकांत यादव स्वयं एबीपी के झांसी संवाददाता भी है। इस चुनाव की खबर की विज्ञप्ति महाकाल समाचार पत्र भेजी गई थी, जो टाईप होकर पेज पर सेट भी कर दी गई थी। लेकिन पेज की जांच होते समय सम्पादक चंद्रकांत यादव ने इस खबर को हटवा दिया था। इसके बाद यह खबर महाकाल में प्रकाशित नहीं हो सकी थी। इसके बाद खबर न छपने की शिकायत इलेक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकारों ने समाचार पत्र के मालिक से की थी। जहां इस मामले में उन्होंने चंद्रकांत से भी जानकारी ली थी, बस यह खबर उनके लिए सिरदर्द बन गई और उनको सम्पादक से हटाकर अखबार से भी बाहर कर दिया गया है।

वहीं झांसी जागरण से खबर है कि क्राईम रिपोर्टर दीपक चन्देल व रेलवे रिपोर्टर रामकुमार साहू को भी निकाल दिया है। इन रिपोर्टरों ने अपनी पत्रकारिता कायम रखने के लिए झांसी से प्रकाशित जनसेवा मेल का दामन थाम लिया है। यह दोनों रिपोर्टर जागरण में कई सालों से अपनी सेवाएं दे रहे थे। इन दोनों पत्रकारों को निकाला जाना झांसी में चर्चा का विषय बना हुआ है।

नवीन लाल, परिमल तथा मोहित समेत कई को पत्रकारिता सम्‍मान

बेहतर रिपोर्टिंग करने के लिए शनिवार को कई पत्रकारों को सम्‍मानित किया गया है. दिल्‍ली के कांस्टिट्यूशन क्‍लब में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री निनोंग इरिंग ने इन सभी पत्रकारों को सम्‍मानित किया. जिन पत्रकारों को सम्‍मानित किया गया उनमें सहारा समय के सीनियर क्राइम रिपोर्टर नवीन लाल सूरी, एनडीटीवी के परिमल कुमार, न्‍यूज24 के मोहित मलहोत्रा तथा जी के प्रकाश कुमार शामिल हैं. इन सभी लोगों को बेहतर काम के लिए पुरस्‍कृत किया गया.

नवीन लाल को गाजियाबाद पुलिस पर किए गए स्‍टोरी 'लापता लोगों को बिना तलाशे कैसे करती है यूपी पुलिस लावारिश दिखाकर अंतिम संस्‍कार' के लिए पुरस्‍कृत किया गया. नवीन इसके पहले भी कई पुरस्‍कारों से पुरस्‍कृत हो चुके हैं. वे स्‍टार न्‍यूज, बीएजी तथा आईबीएन7 को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. बीएजी के लिए उन्‍होंने रेड एलर्ट और सनसनी के लिए कई बड़ी स्‍टोरियां कवर की. मूल रूप से गोरखपुर के रहने वाले नवीन ने भड़ास द्वारा पूछे जाने पर कहा कि वे अपना सम्‍मान देश की उस बहादुर लड़की को समर्पित करते हैं, जिसे बलात्‍करी दरिंदों के चलते असमय इस दुनिया से जाना पड़ा. इस मौके पर संदीप मारवाह, ब्रहम कुमार, विपिन गौड़ समेत कई चैनलों तथा अखबारों से जुड़े पत्रकार तथा रिपोर्टर मौजूद रहे.

31 दिसंबर की रात ”Occupy India Gate” अभियान

MCL यानि Movement for Civil Liberties नामक एक ग्रुप की तरफ से आह्वान किया गया है कि 31 दिसंबर की रात को इंडिया गेट पर कब्जा कर लो. ''Occupy India Gate'' नामक इस मुहिम के तहत फेसबुक पर लोगों को निमंत्रित किया जा रहा है. यह अभियान फेसबुक व ट्विटर पर सक्रिय ऐसे नौजवान चला रहे हैं जो पिछले कई रोज से इंडिया गेट व जंतर मंतर पर बेहद सक्रिय हैं.

इस ग्रुप के प्रमुfख लोगों में से एक पत्रकार मयंक सक्सेना ने सभी लोगों से आह्वान किया है कि 31 दिसंबर की रात वे इंडिया गेट पहुंच कर देश की जनता की असली ताकत पूरी दुनिया को दिखा दें और सरकार को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दें. 31 दिसंबर की रात Occupy India Gate नामक जो अभियान चलाया जा रहा है, उसके तहत फेसबुक व ट्विटर पर सक्रिय लोगों को भेजे जा रहे निमंत्रण का मजमून यूं है-

31 दिसम्बर की रात हम सब इंडिया गेट पर एकत्रित हो रहे हैं साथियों…हर हाल में…कैसे भी…पारा ज़रूर कम होगा…उंगलियां भी अकड़ेंगी…नाक भी बहेगी और बदन सर्दी से कांपेगा भी…लेकिन हमें वहां पहुंचना है, अपनी आवाज़ उस निजाम तक पहुंचाने के लिए, जिसको बहरे होने का ढोंग करना अच्छे से आ गया है…हम इंडिया गेट की ओर जाने वाले सभी रास्तों से आगे बढ़ेंगे…शांतिपूर्वक बढ़ेंगे…जहां तक जा पाएंगे, वहां तक बढ़ेंगे और फिर बैठ जाएंगे उन्हीं सड़कों पर जो हमारी हैं…इस साल की आखिरी रात से साल के पहले सूर्योदय तक हम बैठेंगे इंडिया गेट के चारों ओर…उस मक़सद के लिए, जिसके लिए हम 22 तारीख को घरों से निकले थे…ढोलक, मंझीरे, गिटार, ढपली, ड्रम्स लेकर कूच करिए 31 की रात इंडिया गेट की ओर…हम सब मिल कर हिंदुस्तान को बनाएंगे वो मुल्क, जिसका सपना देखते रहे हम….

-MCL (Movement for Civil Liberties)

सच में विज्ञापनों का धंधा कर रहे हैं टाइम्‍स समूह के जैन बंधु

Om Thanvi : जितने अखबार घर में आते हैं, आज अकेला टाइम्स ऑफ इंडिया है जिसमें पहला पन्ना अखबार का है ही नहीं। वह पूरा पन्ना विज्ञापन के लिए बेच दिया गया है। इसे आजकल जैकेट कहते हैं। इसे सभी 'पहनते' हैं। कभी-कभार हम भी। लेकिन राष्ट्र में छाए अपूर्व शोक की घड़ी में, जब ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने पर कोई दूसरी खबर ही न हो, एक पूरे अखबार का विज्ञापन के पन्ने के पीछे दुबक जाना क्या जाहिर करता है? अकारण नहीं है कि हाल में टाइम्स समूह के मालिक जैन बंधुओं में एक विनीत जैन ने अमेरिकी पत्रिका 'द न्यू योर्कर' को कहा था: " हम अखबारों का धंधा नहीं कर रहे हैं। हमें 90 फीसद आमदनी अगर विज्ञापनों से होती है, इसलिए हम विज्ञापनों के धंधे में हैं।"

सच बोला महाराज! प्रादेशिक अखबारों में तो वैसे ही खबरों पर विज्ञापनों का बोलबाला रहता है। शोक में बाजार की ऐसी कद्र कर आपने उन अख़बारों को भी नई राह दिखाई है। आगे-आगे देखिए होता है क्या।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

मैं छोकरी और लौंडिया शब्‍द इस्‍तेमाल करने वाले पत्रकारों के बीच काम करने को मजबूर हूं

Swati Arjun : हर संवेदनशील व्यक्ति की तरह मैं भी इस घटना के असर से अछूती नहीं हूं, लेकिन मैं आपके माध्यम से और चूंकि आप संस्थागत तौर पर इस प्रोफेशन में हमारे अग्रज हैं इसलिए आपके सामने अपनी चिंता व्यक्त कर रही हूं. पिछले 15 दिनों में जो बात मुझे सबसे ज्य़ादा खली वो अपने आस-पास के लोगो में इस घटना के प्रति असहिष्णुता थी…जिन पत्रकारों पर इस पीड़ित ल़ड़की की ख़बर लाने की ज़िम्मेदारी थी मैंने उन्हें उसका मज़ाक उड़ाते, उसके लिए अपमानजनक शब्दों का इ्स्तेमाल करते और उसकी तकलीफ़ को अपनी fake intellectuality के दर्प में कुचलते और रौंधते देखा है..।

एक औरत होने के नाते मेरे लिए ये असहनीय था लेकिन मेरे पास वो अधिकार नहीं था जो मैं उन्हें दी गई ज़िम्मेदारी को छीन पाती. क्या इस बीमारी का कोई इलाज है..? मुझे पता है कि ये असभ्यता है…ग़ैर अनुकूल है लेकिन फिर भी मैं ये कहना चाहूंगी कि इन तथाकथित बड़े पत्रकारों के मुंह से मैंने उस बहादुर लड़की के लिए मैंने छोकरी और लौंडिया जैसे शब्द इस्तेमाल करते हुए देखा और सुना है….और मैं ऐसे लोगों के बीच काम करने को मजबूर हूं…

बीसीसी की पत्रकार स्‍वाति अर्जुन के फेसबुक वॉल से साभार.

आकाशवाणी के कार्यक्रमों में बुलाए जाने वाले मेहमानों पर एक रोचक सर्वे (संपूर्ण रिपोर्ट)

देश में 23 भाषाओं और 146 बोलियों में अपने कार्यक्रम के जरिये देश जनसंख्या के 99.18% तक अपनी पंहुच रखने का दावा आकाशवाणी करता है लेकिन उसके कार्यक्रम कुछ खास विषयों और कुछ खास लोगों के विचारों को प्रसारित करने वाला एक लोक प्रसारक केन्द्र बन गया है। मीडिया शोध की मासिक पत्रिका जनमीडिया के नये अंक में प्रकाशित एक सर्वे में यह दावा किया गया है। पत्रकार अनिल चमड़िया के संपादन में हिन्दी में प्रकाशित जन मीडिया और अंग्रेजी में मास मीडिया के हर अंक में मीडिया पर आधारित एक सर्वे प्रस्तुत किया जाता है। मीडिया स्टडीज ग्रुप के लिए आकाशवाणी पर इस सर्वे का शोधार्थी वरूण शैलेश ने विश्लेषण तैयार किया है। यह सर्वे सूचना के अधिकार कानून के तहत प्राप्त जानकारी के आधार पर किया गया है।

सर्वे के जो परिणाम निकल कर सामने आए है वे ऑल इंडिया रेडियो के 2011 के दौरान सामयिकी, स्पॉटलाइट, न्यूज एनालिसिस,मनी टॉक, समाचार चर्चा, कंट्रीवाइड और करेंट अफेयर्स के तहत 527  प्रसारित कार्यक्रमों पर आधारित है। इस सर्वे में यह भी तथ्य उभरकर सामने आया है कि आकाशवाणी पर एक विशेष समूह को बातचीत  के लिए बार बार आमंत्रित किया जाता है। आकाशवाणी की तरफ से मुहैया कराई गई सूची के मुताबिक हिन्दी के कार्यक्रमों के लिए वर्ष 2011 में 242 मेहमानों को आमंत्रित किया गया।

अंग्रेजी के कार्यक्रमों में सामायिकी, स्पॉटलाइट, न्यूज एनालिसिस,मनी टॉक, समाचार चर्चा, कंट्रीवाइड और करेंट अफेयर्स जैसे कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं। पर प्रसारित कार्यक्रमों के लिए बुलाए गए विशेषज्ञों की सूची बताती है कि कुछ खास लोगों का लोक प्रसारक के कार्यक्रमों पर एक तरह से कब्जा है ।कई मेहमानों को एक से ज्यादा विषयों पर अपनी विशेषज्ञ टिप्पणी देने के लिए बुलाया गया। 2011 में 12 ऐसे मेहमान है जो 25 बार से लेकर 10 बार बुलाए गए। इनके नाम जन मीडिया और मास मीडिया में प्रकाशित किए गए हैं। आकाशवाणी में कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित दस मेहमान ऐसे हैं जिन्हें वर्षभर में करीब 1लाख साठ हजार रूपये से लेकर 53 हजार रूपये तक का भुगतान किया गया है। इनके भी नाम जन मीडिया और मास मीडिया के नये अंक में प्रकाशित किए गए हैं।

मीडिया स्टडीज ग्रुप द्वारा कराए गए सर्वे को इन पत्रिकाओं में प्रकाशित जाता है। पूर्व में कराए गए सर्वें में भी यह देखा गया कि लोकसभा टीवी से लेकर विभिन्न निजी व सरकारी मीडिया स्थानों में कुछ खास लोगों को विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के रूप में बुलाने की प्रथा चली आ रही है। पत्रिका ने आपातकाल के दिनों में  भी दूरदर्शन पर बुलाए जाने वाले मेहमानों का एक सर्वे प्रकाशित किया था। आपातकाल के दौर से आज तक इस मायने में स्थितियां बदलती नहीं दिखती है।सर्वे का मकसद कार्यक्रमों के लिहाज से आकाशवाणी के लोकतांत्रिक ढांचे की पड़ताल करना था।

संपूर्ण सर्वे को पढ़ने के लिए नीचे दी गई पीडीएफ फाइल पर क्लिक करें…

Survey on AIR.pdf

सुन रहे हैं ना सीएम साहब, नोएडा पुलिस के डर से गैंगरेप पीडित परिवार ने छोड़ा गांव

यूपी के सीएम, उनके पिता-भाई सब के सब दिल्ली गैंगरेप पीड़िता को न्याय दिलाने की बात करते हैं लेकिन उनके अपने शासन वाले प्रदेश में क्या हो रहा है, इस पर किसी की नजर नहीं है. इसी को कहते हैं चिराग तले अंधेरा. नोएडा पुलिस गैंगरेप के एक मामले में पीड़िता व उसके परिवार वालों को ही धमका रही है जिसके कारण पीड़िता व परिवार के लोग गांव छोड़कर पलायन कर चुके हैं. मामला ग्रेटर नोएडा के जारचा कोतवाली क्षेत्र के गांव छायसा का है. पीड़ित परिवार ने दुष्‍कर्म की नामजद शिकायत की लेकिन पुलिस ने छेड़छाड़ आदि में मामला दर्ज किया.

आरोपी बलात्‍कारी तो धमका ही रहे थे पीड़िता व उसके परिजनों को, नोएडा पुलिस भी आरोपियों के साथ खड़ी दिख रही है. पीड़ित परिवार ने पुलिस के भय से अपना गांव ही छोड़ दिया है. सुन रहे हैं ना यूपी के सीएम अखिलेश साहब, आपकी पुलिस के डर से पीडित परिवार ने गांव छोड़ दिया है, आरोपियों ने नहीं. आरोपियों को पुलिस संरक्षण दे रही है. घटना के तीन दिन बाद, जब मीडिया में मामला आ गया तब  छात्रा का मेडिकल हुआ. रेप की रिपोर्ट अब तक दर्ज नहीं की गई है. सिर्फ अपहरण और छेड़खानी का मामला दर्ज हुआ है. 

इस प्रकरण से स्पष्ट है कि नोएडा पुलिस आरोपी और बदमाशों को नहीं पकड़ रही बल्कि जो उत्पीड़ित है, उसे ही परेशान कर रही है. इस प्रकरण से संबंधित कुछ खबरें, जो दैनिक हिंदुस्‍तान, दैनिक जागरण और एनबीटी में प्रकाशित है, नीचे है, पढ़िए…


पुलिस से खतरा बता छोड़ा गांव

ग्रेटर नोएडा : जारचा कोतवाली क्षेत्र के गांव छायसा में गैंगरेप पीड़ित छात्रा और उसके परिवार ने गांव छोड़ दिया है। छात्रा के पिता ने जिलाधिकारी कार्यालय में मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि आरोपियों से छात्र को जान का खतरा है। पुलिस आरोपियों को संरक्षण दे रही है।

गौरतलब है कि 26 दिसंबर को छायसा गांव की 10वीं कक्षा की एक छात्रा का गांव के ही पांच युवकों ने अपहरण कर लिया था। कार में गैंगरेप के बाद उसे दादरी के पास फेंक दिया गया। युवती अपने पिता के साथ थाने में शिकायत करने पहुंची लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की।

इसके बाद गांव में पंचायत ने फैसला दिया कि परिवार केस दर्ज नहीं करवाएगा। लेकिन परिवार ने निर्णय मानने से इनकार दिया। काफी प्रयास के बाद गुरुवार को अपहरण और छेड़खानी का मामला ही दर्ज किया। मामला मीडिया में आने पर छात्रा का मेडिकल हुआ।

(हिंदुस्‍तान)


तीन दिन बाद भी छात्रा से दुष्कर्म की रिपोर्ट दर्ज नहीं

संवाद सहयोगी, दादरी : जारचा कोतवाली क्षेत्र में हाईस्कूल की छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म के मामले में तीन दिन बाद भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। शुक्रवार को करीब पचास घंटे बीतने के बाद छात्रा की चिकित्सीय जांच कराई गई। चिकित्सीय परीक्षण के बाद पुलिस ने दावा किया है कि पीड़ित की जांच में किसी तरह की चोट नहीं मिली। पुलिस साक्ष्य मिलने के बाद दुष्कर्म का मामला दर्ज करने की बात कह रही है। पुलिस की लापरवाही से ग्रामीणों में आक्रोश है।

ज्ञात हो कि जारचा थाना क्षेत्र में बुधवार को हाईस्कूल की छात्रा का पांच लोगों ने उस समय अपहरण कर लिया था, जब वह अर्धवार्षिक परीक्षा देने कॉलेज जा रही थी। छात्रा के परिजनों के मुताबिक दो आरोपियों ने जंगल में उसके साथ दुष्कर्म किया। शाम को आरोपी छात्रा को रेलवे रोड पर एक आरा मशीन के समीप फेंककर फरार हो गए। छात्रा ने एक शख्स की मदद से परिजन को फोन किया। परिजन छात्रा को लेकर घर पहुंचे। परिजन ने पुलिस को मामले की सूचना दी। लेकिन पुलिस ने तत्परता दिखा कार्रवाई करने के बजाए छात्रा से पूछताछ करना तक मुनासिब नहीं समझा। बृहस्पतिवार को छात्रा के परिजन कोतवाली पहुंचे और पांच लोगों पर अपहरण का आरोप लगाते हुए दुष्कर्म की शिकायत की। लेकिन पुलिस ने अपहरण व छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया। शुक्रवार को छात्रा को चिकित्सीय परीक्षण के लिए भेजा गया।

पांचों आरोपी पुलिस गिरफ्त से बाहर है। आरोपी पीड़ित के कुनबे के हैं और गांव में पड़ोस में रहते हैं। आरोपियों में दो सगे भाई शामिल हैं। उनकी गिरफ्तारी में विलंब से ग्रामीणों में खासा आक्रोश है। एसपी देहात अशोक कुमार का कहना है कि पीड़ित का चिकित्सीय परीक्षण कराया गया है। जांच में किसी तरह की चोट की पुष्टि नहीं हुई है। साक्ष्य एकत्र किए जा रहे हैं। इसके आधार पर दुष्कर्म की धाराएं लगाई जाएंगी।

(जागरण)


महिला आयोग से लगाई मदद की गुहार

दादरी।। जारचा कोतवाली एरिया के एक गांव की छात्रा से गैंगरेप के आरोपों को लेकर पीडि़त परिवार ने शनिवार सुबह राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा को शिकायत फैक्स की है। इसमें उनसे मदद की गुहार लगाते हुए पुलिस पर केस में फैसला करने के दबाव का आरोप लगाया गया है। वहीं, पीडि़त परिजनों ने देर शाम तक प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, राज्यपाल समेत कई समाजसेवी संस्थाओं को लेटर भेजकर न्याय दिलाने की मांग की है। हालांकि पुलिस ने कार्रवाई कर नामजद तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, घटना के बाद पीडि़त परिवार के घर विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता भी सहानुभूति जताने पहुंचे।

आरोप है कि 10 वीं की नाबालिग छात्रा को 26 दिसंबर की सुबह 9 बजे घर से स्कूल जाते समय रिश्ते में 3 चचेरे भाई, चाचा और ताऊ ने ब्लैक फिल्म चढ़ी कार में अपहरण कर लिया था। उसके बाद सभी पर गैंगरेप कर फेंकने का आरोप है। परिजनों ने उसी दिन शाम को पुलिस में पांचों आरोपियों के खिलाफ तहरीर दे दी थी। पुलिस ने घटना को अपहरण, छेड़छाड़ व मारपीट समेत कई धाराओं में दर्ज कर लिया था। मामले के तूल पकड़ने के बाद शुक्रवार को पुलिस ने पीडि़त को मेडिकल चेकअप के लिए भेजा था। पीडि़त परिजन जहां गैंगरेप का आरोप लगा रहे हैं, वहीं पुलिस का दावा है कि मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हुई है। वहीं, मामले को निपटाने को लेकर गांव में पंचायतों का दौर शनिवार को भी चलता रहा।

(एनबीटी)


इस प्रकरण की शुरुआती खबर पढ़ने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

नोएडा में चाचाओं और चचेरे भाइयों ने किया गैंगरेप, पुलिस ने पीड़िता पर ही बनाया कंप्रोमाइज के लिए दबाव!

मतंग सिंह के चैनलों में पैसे आए, हुई रीलांचिग, लेकिन पुराने कर्मियों का पीएफ अब भी बकाया

 

खबर है कि मतंग सिंह के फोकस टीवी और हमार टीवी की रीलांचिंग कर दी गयी है। कुछ ही दिनों पहले खबर आयी थी कि मतंग सिंह ने जिंदल ग्रुप के मुखिया नवीन जिंदल से अपने चैनलों में पैसा लगवाया है। हालांकि अभी किसका पैसा और कितना पैसा लगा है इस मामले में कोई भी पक्ष ठीक-ठीक जानकारी नहीं दे रहा है, लेकिन कुछ ही दिनों पहले चैनल के बचे-खुचे कर्मचारियों के कई महीनों से चले आ रहे बकाये वेतन का पूरा भुगतान कर दिया गया है। इतना ही नहीं, खबर ये भी है कि चैनलों में विदेशों से मशीनों की एक शिपमेंट भी आ गयी है जिसके इंस्टालेशन का काम भी जोरों से चल रहा है। 
 
हालांकि कई महीनों से ब्लैकआउट पर चल रहे चैनलों का प्रसारण सैटेलाइट से शुरु हुआ है या नहीं इस पर भी अभी साफ तस्वीर नहीं मिल पायी है। संस्थान से जुड़े सूत्रों का दावा है कि चैनलों का सैटेलाइट प्रसारण शुरु हो गया है जबकि डिस्ट्रीब्यूशन इंडस्ट्री के सूत्र बता रहे हैं कि  अभी चैनल कहीं दिख नहीं रहा है और केवल इनहाउस टेलीकास्ट ही चल रहा है।
 
उधर कुछ ही दिनों पहले संस्थान छोड़ कर जा चुके और  करीब दो ढाई साल पहले छोड़ चुके सैकड़ों कर्मचारियों के पीएफ को जमा नहीं करने का मामला एक बार फिर गर्मा रहा है। चैनलों के पूर्व कर्मचारियों ने साझा तौर पर कानूनी कार्रवाई कर अपने पीएफ वसूलने की तैयारी कर ली है। कई बार चेयरमैन और दूसरे अधिकारियों से इस बारे में बात करने के बाद भी मामला नहीं सुलझने पर  अब मीडियाकर्मियों ने कुछ कानूनी विशेषज्ञों का सहारा लेकर एक साझा मंच तैयार किया है जो जल्दी ही कार्रवाई शुरु करेगा। अब देखना है चैनल में लगाए गये पैसे से ये हिसाब-किताब भी चुकता होता है या नहीं।
 

बनारस, इलाहाबाद, आगरा, मुरादाबाद, अलीगढ़ में अवैध प्रकाशन कर रहा है दैनिक जागरण!

: बनारस एवं इलाहाबाद के कर्ताधर्ताओं के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी : देश का नम्‍बर एक अखबार यूपी में चार सौ बीसी के साथ प्रेस रजिस्‍ट्रेशन ऑफ बुक्‍स एक्‍ट की कई धाराओं के खुले आम उल्‍लंघन में बुरी तरह फंसता दिख रहा है. इस अखबार के छह यूनिटों को छोड़कर बाकी सारे एडिशन किसी ना किसी तरीके से फर्जी हैं. यह बात सामने आई है आरटीआई से मिली सूचना के आधार पर. आरटीआई की सूचना से पता चला है कि दैनिक जागरण के बनारस, इलाहाबाद, मुरादा‍बाद, आगरा, अलीगढ़, नोएडा एडिशनों का प्रकाशन गलत नामों पर हो रहा है. क्‍योंकि आरएनआई की जानकारी में जागरण पब्लिकेशन के अंतर्गत इन एडिशनों का नाम नहीं है.

यानी अगर जागरण के आधा दर्जन एडिशन सही रजिस्‍ट्रेशन पर प्रकाशित हो रहे हैं तो आधा दर्जन एडिशनों को सरकार तथा आरएनआई के आंखों में धूल झोंककर प्रकाशित किया जा रहा है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इन आधा दर्जन जगहों के अखबार जागरण प्रकाशन के बैनर तले रजिस्‍टर्ड नहीं हैं तो ये किस आधार पर दैनिक जागरण के नाम से अखबार का प्रकाशन कर रहे हैं. सबसे बड़ा फर्जीवाड़ा बनारस यूनिट में दिख रहा है क्‍योंकि यह अखबार इस नाम से रजिस्‍टर्ड न होते हुए भी बनारस तथा इलाहाबाद से दैनिक जागरण के नाम से प्रकाशित हो रहा है.

आरटीआई को आधार माना जाए तो यह अखबार इन आधा दर्जन यूनिटों पर बिना दैनिक जागरण नाम से रजिस्‍ट्रेशन के प्रकाशित हो रहा है. इस तरह से यह अखबार पिछले कई दशकों में इन आधा दर्जन यूनिटों से अरबों का सरकारी तथा पब्लिक विज्ञापन का राजस्‍व वसूल चुका होगा. यानी अगर इसकी जांच की जाए तो शायद देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आएगा. वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता काशी प्रसाद का कहना है कि इस तरह से किसी और नाम से रजिस्‍ट्रेशन के बाद दूसरे नाम से अखबार का प्रकाशन बिल्‍कुल चार सौ बीसी का मामला है. इसकी जांच कराई जाएगी तो अखबार से जुड़े तमाम लोग जेल के अंदर नजर आएंगे, साथ ही एक बड़े घोटाले का पर्दाफाश होगा.

जबकि आरटीआई एक्टिविस्‍ट और अधिवक्‍ता कृष्‍णा प्रसाद का कहना है कि एक जगह से अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराकर उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव गलत है. परन्‍तु दैनिक जागरण तथा हिंदुस्‍तान जैसे अखबार मात्र एक स्‍थान से रजिस्‍ट्रेशन कराकर अपने कई सब एडिशन प्रकाशित कर रहे हैं, जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट् -1867 की धाराएं 8(बी), 14/15 के अनुसार सही नहीं है. अगर इन मामलों की शिकायत की जाए तो इस तरह की गड़बड़ी करने वाले कई लोग जेल में होंगे. इधर, सूत्रों से पता चला है कि दैनिक जागरण के इसी फर्जीवाड़े को लेकर बनारस यूनिट के खिलाफ मामला दर्ज कराए जाने की तैयारी की जा रही है.

इस बारे में बताया जा रहा है कि बनारस में दैनिक जागरण अवैध तरीके से नौ जिलों में अपने ए‍डिशनों का प्रकाशन कर रहा है. इसके अलावा इलाहाबाद में भी कई जिलों में अवैध प्रकाशन किया जा रहा है. बिना रजिस्‍ट्रेशन के इन सभी जिलों में अखबार के नए संस्‍करण रोज प्रकाशित किए जा रहे हैं. बताया जा रहा है कि इसमें संपादक संजय गुप्‍ता, स्‍थानीय संपादक वीरेंद्र कुमार, बनारस के जीएम अंकुर चड्ढा, इलाहाबाद के जीएम गोविंद श्रीवास्‍तव समेत कई वरिष्‍ठों तथा सभी जिलों के प्रभारियों के खिलाफ कोर्ट में जाने की तैयारी की जा रही है. रमन कुमार का कहना है कि इस मामले में कई लोग उनके संपर्क में हैं, जो केस करने से पहले सारी जानकारी तथा सबूत पुख्‍ता कर लेना चाहते हैं. गौरतलब है कि रमन कुमार ने इसी आधार पर जागरण के कई निदेशकों के खिलाफ चारसौबीसी समेत पीआरबी एक्‍ट के तहत बिहार में मामला दर्ज कर रखा है, जिसके चलते निदेशकों में हड़कम्‍प मचा हुआ है.

बड़ा घोटाला : केवल छह जगहों से रजिस्‍टर्ड दैनिक जागरण पूरे यूपी में कर रहा है प्रकाशन!

खुद को नम्‍बर एक अखबार कहने वाला दैनिक जागरण फर्जीवाड़ा में भी नम्‍बर एक के पायदान पर चढ़ता दिख रहा है. अगर आरएनआई की सूचना को सही माने तो यह अखबार यूपी में कई जगह से फर्जी तरीके से अखबार का प्रकाशन कर रहा है. फर्जी एडिशनों के जरिए यह अखबार करोड़ों का सरकारी विज्ञापन उगाह चुका है. जानकारियों में अब इस अखबार तथा इसके प्रबंधन की कलई लगातार खुलती जा रही है. जिस तरह से इस अखबार के फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है, उससे साफ लगता है कि देर सबेर इसके कर्ताधर्ताओं को जेल जाना ही पड़ेगा. धीरे धीरे खुलासा हो रहा है कि इस अखबार ने किस तरह से सबको धोखा देकर माल बटोरा है.

देश का यह नम्‍बर वन अखबार यूपी में मात्र छह जगहों से रजिस्‍टर्ड है. रमन कुमार यादव द्वारा आरएनआई से मांगी गई सूचना अधिकार से इस बात का खुलासा हुआ है. सूचना में जानकारी दी गई है कि उत्‍तर प्रदेश में यह अखबार मात्र छह जगहों से प्रकाशित हो रहा है. जिन जगहों से इस अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराया गया है उसमें कानपुर, मेरठ, बरेली, लखनऊ, गोरखपुर और झांसी शामिल है. इसमें भी दिलचस्‍प बात यह है कि पांच जगहों के संपादक तो संजय गुप्‍ता हैं, लेकिन झांसी वाले एडिशन के संपादक यशवर्द्धन गुप्‍ता हैं. इनमें अभी तक जिन पब्लिशर का नाम तमाम एडिशनों में दिखाया जा रहा है उनमें कई लोग संस्‍थान से अलग हो चुके हैं. गोरखपुर से शैलेंद्र मणि त्रिपाठी तथा बरेली से चंद्रकांत त्रिपाठी जागरण से हट चुके हैं, वहीं लखनऊ के पब्लिशर दिखाए गए विनोद शुक्‍ला की मौत हो चुकी है.

आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार इन छह जगहों के अलावा दैनिक जागरण के नाम से इस अखबार का कहीं भी रजिस्‍ट्रेशन नहीं है. इससे साफ है कि अन्‍य जिलों एवं जिन स्‍थानों से यह अखबार प्रकाशित हो रहा है वो पूर्ण रूप से फर्जी है. ऐसे ही फर्जी प्रकाशन के चलते बिहार में इस अखबार के प्रबंधन के खिलाफ मुजफ्फरपुर में मामला कोर्ट में दायर किया गया है. जिस पर जल्‍द ही कोर्ट सुनवाई करने वाला है. इस मामले में कई लोगों की गवाही भी हो चुकी है. बिहार में इसी आधार पर मुकदमा दायर किया गया है कि यह अखबार गलत रजिस्‍ट्रेशन के आधार पर अरबों का सरकारी विज्ञापन अवैध ढंग से डकार चुका है.

बताया जा रहा है कि अब जल्‍द ही ऐसी ही कार्रवाई यूपी में भी किए जाने की तैयारी की जा रही है. सारी सूचनाएं एकत्रित करने के बाद इसके खिलाफ केस किए जाने की तैयारियां शुरू हो गई हैं. बताया जा रहा है अगर इस मामले में सरकारी मशीनरी तथा अन्‍य जिम्‍मेदार संस्‍थाओं ने ईमानदारी से अपना काम किया तो एक बहुत बड़े घोटाले पर से तो पर्दा उठेगा ही, दैनिक जागरण के तमाम कर्ताधार्ता भी आईपीसी की कई धाराओं में जेल की सलाखों के पीछे होंगे. गौरतलब है कि हिंदुस्‍तान के खिलाफ ऐसे ही भ्रष्‍टाचार के आरोप में दाखिल हुए केस में हाई कोर्ट ने मामले की जांच रिपोर्ट मात्र तीन महीने में पेश करने का आदेश दिया है.

पटना हाई कोर्ट ने हिंदुस्‍तान के मामले में उसकी एफआईआर निरस्‍त करने की अपील भी खारिज कर दी थी. बिहार में जागरण भी ऐसे ही शिकंजे में फंसा हुआ है. कोर्ट से आदेश होते ही इसके निदेशकों तथा संपादकों के ऊपर भी गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगेगी. अब देखना होगा कि अपने को तुर्रम खां समझने वाले दैनिक जागरण के कर्ताधर्ता अपनी इन हेराफेरियों में सजा पाने से किस तरीके से बचते हैं. खबर है कि जल्‍द ही यूपी में भी जागरण के फर्जी प्रकाशनों के खिलाफ मामला दर्ज कराया जाने वाला है. लोग कानूनी प्रक्रिया समझने की कोशिश कर रहे हैं. नीचे देखिए आरटीआई से मिली जानकारी में जागरण के वैध प्रकाशनों की लिस्‍ट.

 

भोपाल में दैनिक भास्‍कर ने बाजी मारी

सिंगापुर में गैंगरेप पीडिता के दुखद निधन की खबर छाप पाना हर अखबार के वश की बात साबित नहीं हुई. दिल्‍ली में राष्‍ट्रीय सहारा, पानीपत और मेरठ में दैनिक जागरण के लोगों ने सिटी एडिशन में इस दुखद खबर को प्रकाशित करने में सफल रहे. जागरण के कुछेक और एडिशनों में छोटी खबर प्रकाशित हुई. पर भोपाल में दैनिक भास्‍कर ने बाजी मारी. भास्‍कर ने इस दुखद खबर को बैनर बनाया. भोपाल के लोगों को सुबह गैंगरेप की शिकार लड़की के निधन की खबर दैनिक भास्‍कर से मिली.

अपराधों में लिप्‍त पत्रकारों का संरक्षण नहीं करता संगठन : भदौरिया

सिंगरौली : पत्रकारिता के क्षेत्र में कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं। समाचारों को कवरेज करने के दौरान ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी कलमकारों को आपराधिक प्रवृत्तियॉ से बचना चाहिए। उन्हें भ्रष्टाचार और कई संज्ञेय अपराधों के शिकंजे में ले लिया जाता है जिससे उनका भविष्य बिगड़ जाता है। इसी प्रकार अपराधों में लिप्त पत्रकारों का संगठन संरक्षण नहीं करता। उक्त विचार श्रमजीवी पत्रकार संघ के संभागीय सम्मेलन में प्रदेश अध्यक्ष शलभ भदौरिया ने व्यक्त किए।

श्रमजीवी पत्रकार संघ जिला इकाई सिंगरौली के तत्वावधान में संभागीय सम्मेलन एनसीएल की द्वुधी चुआ परियोजना स्थित सूर्य किरण भवन में समाहरोह संपन्न हुआ। इस अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि प्रदेशाध्यक्ष शलभ भदौरिया संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहम्मद अली प्रदेश कार्यसमिति सदस्य एपी गोस्वामी संभागीय अध्यक्ष अखिलेश पाण्डेय संभागीय उपाध्यक्ष केसी शर्मा जिला अध्यक्ष दिनेश पाण्डेय जिला महासचिव अब्दुल रशीद डाँ. एसके श्रीवास्तव व इंटक कि जिला अध्यक्ष श्रीमती शशिकला पाण्डेय उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार संदीप श्रीवास्तव ने की।

कार्यक्रम में आए विशिष्ट अतिथि सिंगरौली विधायक श्री राम लल्लू वैश्य नें भोपाल से आए प्रदेश अध्यक्ष श्री भदौरिया का स्वागत करते हुए कहा कि पत्रकार साथियों को सभी प्रकार की सरकारी सुविधाएं मिलनी चाहिए। उन पर समाज को आईना दिखाने का दायित्व है तो सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए श्रमजीवी पत्रकार संघ के संभागीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए सांसद श्री गोविंद मिश्र ने कहा कि पत्रकार साथी व संगठन के पदाधिकारी मेरे साथ मिलकर एनसीएल से एक भवन की मांग करें। श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष मोहम्मद अली ने प्रदेश के कई जिलों पत्रकार साथियों के साथ हुई ज्यादती पर उनके संरक्षण के लिए संगठन की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे संदीप श्रीवास्तव नें कहा कि पत्रकार समाचारों जन प्रतिनिधियों जिला प्रशासन व स्वयं के प्रबंधन के दबाव में कार्य करता है। वरिष्ठ पत्रकार डाँ कुणाल ने पत्रकारों से कराई जाने वाली बेगारी व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस गंभीर समस्या का निदान निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए अति आवश्यक है। कार्यक्रम का समापन महासचिव अब्दुल रशीद ने प्रदेश से आए मुख्य अतिथियों और मंचाशीन विशिष्ट अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए उपस्थित पत्रकार साथियों का धन्यवाद करते हुए किया। महासम्मेलन में भाग लेने के लिए सिंगरौली जिले के पूर्व जिलाध्यक्ष कालिका गुप्ता, रोहित गुप्ता, बैढन, मोरवा, चितरंगी, बरगवां से आधा सैकड़ा से अधिक पत्रकारों ने शिरकत की। कार्यक्रम के समापन अवसर से पूर्व वरिष्ठ पत्रकार व अतिथियों को शाल व श्रीफल भेंट किए गए।

गैंगरेप पीडित के अंतिम संस्‍कार एवं परिवार से दूर रहें न्‍यूज चैनल : बीईए

प्रसारक संपादक संघ (बीईए) ने न्‍यूज चैनलों को दिल्ली के सामूहिक बलात्कार कांड की पीड़िता के अंतिम संस्कार का कवरेज से दूर रहने को कहा है ताकि दुख की इस घड़ी में शोक संतप्त परिवार की निजता का सम्मान हो. संघ ने यह सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए हैं कि पीड़िता के परिवार की निजता का सम्मान हो. एबीपी न्यूज के संपादक शाजी जमां संघ के अध्यक्ष हैं और कई प्रमुख राष्ट्रीय टीवी खबरिया चैनलों के संपादक उसके सदस्य हैं.

अपने दिशानिर्देश में संघ ने खबरिया चैनलों से अंतिम संस्कार का कोई भी दृश्य या यहां तक कि शोकसंतप्त परिवार एवं उसके घर का शॉट भी नहीं दिखाने को कहा है. चैनलों से पीड़िता के किसी भी रिश्तेदार के साक्षात्कार भी नहीं प्रसारित करने के लिये कहा गया है. बीईए ने कहा कि बस शव के लाये जाने और अंतिम संस्कार की सूचना दी जा सकती है लेकिन अंतिम संस्कार का स्थल सार्वजनिक नहीं किया जाए. उसने चैनलों से शव के लाये जाने का शॉट नहीं दिखाने तथा शवयात्रा का पीछा नहीं करने को कहा है.

जब इस संबंध में बीईए महासचिव एन के सिंह से बात की गयी तब उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि खबरिया चैनलों को अंतिम संस्कार का कवरेज नहीं करने को कहा गया है. सिंह ने कहा कि लड़की और उसके परिवार की पहचान, मर्यादा एवं निजता की रक्षा की जरूरत को ध्यान में रखकर बीईए ने चैनलों से अंतिम संस्कार का कवरेज नहीं करने और उसका कोई भी दृश्य नहीं दिखाने को कहा है. दक्षिण दिल्ली में 16 दिसंबर को छह व्यक्तियों द्वारा सामूहिक बलात्कार किये जाने के बाद पीड़िता ने शनिवार तड़के सिंगापुर के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली. (भाषा)

मनमोहन सिंह के बाद अब शीला पर बरसा सोशल मीडिया

प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह 'अभी ठीक है' टिप्पणी कर सोशल मीडिया पर कड़ी आलोचनाओं का शिकार बने ही थे कि अगली बारी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की थी। सामूहिक बलात्कार की शिकार युवती की मौत पर अपने बयान के अंत में शीला ने भी प्रधानमंत्री जैसी टिप्पणी कर दी। सिंगापुर के एक अस्पताल में युवती के निधन पर शोक जताते हुए शीला ने संवाददाताओं के समक्ष बयान पढने के बाद कहा, (इट्स ओके) ठीक है। किसी रिकार्डिंग के बाद इस तरह की टिप्पणी आम बात है, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइट टि्वटर पर लोगों ने शीला की टिप्पणी पर आपत्ति की है।

एक ट्वीट में कहा गया कि शीला ने वही कर दिया, जो प्रधानमंत्री ने किया (सीएम डज अ पीएम)। एक अन्य ट्वीट में कहा गया कि शीला दीक्षित को बॉलीवुड में हाथ आजमाना चाहिए। युवती की मौत पर बयान के बाद उन्होंने कहा, इज इट ओके (क्या यह ठीक है)। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष विजेन्दर गुप्ता ने यह कहते हुए शीला की आलोचना की कि इससे एक त्रासदी पर उनकी संवेदनहीनता का पता चलता है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। भाकपा राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने भी इस टिप्पणी के लिए शीला की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा पाए लोगों को अधिक मानवीय होना चाहिए। दिल्ली सामूहिक बलात्कार घटना पर राष्ट्र के नाम टेलीविजन पर दिए संदेश के समाप्त होने पर प्रधानमंत्री ने पूछताछ वाले अंदाज में टिप्पणी की थी, 'ठीक है?' इसकी सोशल मीडिया में जमकर आलोचना हुई। (भाषा)

क्‍या चैनल गंभीर घड़ी में ऐसे विज्ञापनों का रेला थाम नहीं सकते थे?

'छोटा-सा ब्रेक' : जब देश शोक में डूबा हो, टीवी चैनल हर दामिनी पर हुए दमन के खिलाफ मोमबत्तियों की रोशनी और बेहतर न्याय पर चर्चाएं हम तक पहुंचा रहे हों — क्या उस गंभीर घड़ी में उन विज्ञापनों का रेला वहां थोड़ी देर के लिए थम नहीं सकता, जिनमें औरत को सामान बेचने के लिए जिंस की तरह इस्तेमाल किया गया हो? ऐसे शोक की घड़ी में समूचा देश, एक समान जज्बे के साथ, रोज तो नहीं डूबा होता!!

Divya Gupta Jain Mujhe bhi aisa hi laga.

Asha Jassal आपका कार्यक्रम देख रही थी तो इसी बात का मलाल मुझे हो रहा था ………

Dhirendra Pandey क्या आज न्यूज़ चैनल विज्ञापन के बिना प्रसारण नही कर सकते थे कितना घृणास्पद लग रहा है "" यू आर माई पम्पकिन "" ||

Meenu Jain desh dooba huaa hai shok mein , news channels nahin ……..dhikkar hai !

Anand Kumar Dwivedi विरोध केवल शब्दों से ही चरित्र से नहीं .. फिर नतीजा यही

Mutha Rakesh ye baat aap keh sakte hai media ke pramukh stambh hote hue bhi aapka akhbaar kjansatta kabhi bhi vigyapano v ochi patrakarita kaa shikar nahi hua aap desh ke ek matra sampadak hai jo kala ke kshtra ko pramukhta se bahut sara sathan dete hai i m proud on u sir on yr frdhship

Dharm Meena वो सब को जगा कर
खुद चिरनिद्रा मेँ सो गई ॥

Tejendra Sharma Om jee… aap se adhik vigyapan ka mehtava kaun samajh sakta hai. Business sense is not governed by emotions. Aapkee in bhaawnaon ka kroor business world mein koyee arth nahin hai…

डॉ. रश्मि !!!baazarvaad!!!

Manoj Bharti Gupta break ko jehl saktye lekin break beech me jo deodrent (axe skore) ki advertiement jo message de rahi uska kya hal hai !!

Amit Ranjan Chitranshi सारे शापिंग माल खुले हैं, दबंग-2 का शो हाउसफुल जा रहा ….

Nirmal Kumar सर यहाँ तो बलात्कार की घटना पर चर्चा हो रही है, अपने देश के चैनल वाले तो ऐसे हैं कि अगर उन्हें बलात्कार होते हुए कोई फूटेज मिले तो मदद के हाथ बढाने के बदले ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर जबरदस्त टी आर पी बटोरने के चक्कर में ये भी दिखा दे …

Zia Khan विराट कोहली का ऐड देखा होगा …लड़की पटाने के तरीको वाला …ये हमारे रोल मोडल जो परोस रहे है उस पर भी निगाह रखिये ….एक पिज्जा खाने वाली लड़की केह रही होती है के मेने 'वो' वाली फिल्म भी देखी है …ओर एक्स इफ्फेक्ट के तो क्या कहने …….क्या ये ही प्रोग्रसिव सोच है ..

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा और पानीपत व मेरठ में दैनिक जागरण ने सबको पछाड़ा

अखबारों के लिए परीक्षा की इस तरह की घड़ियां साल में चार-छह बार आ जाया करती है. देर रात गैंग रेप पीड़िता की मौत की खबर को छाप पाना हर अखबार के वश की बात नहीं साबित हुई. दिल्ली में राष्ट्रीय सहारा ने पूरे पहले पेज पर सिर्फ इसी खबर को डिस्प्ले कर सबको पछाड़ दिया है. दिल्ली में दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, जनसत्ता, टाइम्स आफ इंडिया समेत ढेरों अखबारों के पाठकों को सुबह गैंग रेप पीड़िता की मौत की खबर उनके अपने अखबार से नहीं बल्कि न्यूज चैनलों से मिली.

सूचना है कि पानीपत और मेरठ में दैनिक जागरण के लोग अपने अपने सिटी एडिशन्स में गैंग रेप पीड़िता की मौत की खबर को प्रमुखता से छापने में कामयाब हुए. धनबाद में दैनिक जागरण के लोग छोटी सी खबर पहले पन्ने पर छाप पाए. यह नहीं पता चला है कि अमर उजाला के किन किन एडिशन्स में गैंग रेप पीड़िता की मौत की खबर छप पाई है.

अगर आपके पास जानकारी हो कि आपके शहर में किन किन अखबारों में गैंगरेप पीड़िता की मौत की खबर छप पाई हो तो भड़ास से जरूर शेयर करें, नीचे दिए गए कमेंट बाक्स में कमेंट करके या फिर bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

भावनाओं का धंधा करने वाले राजनेता, मीडिया और बाजार अक्सर शोक के समय समाज से तर्क गायब कर देता है

Rajen Todariya : इस मौत ने भी मुझे उतना ही दुखी किया जितना छत्तीसगढ़ या झारखंड में माओवादी करार देकर मारे गए किसी अनाम युवा या युवती क मौत किया करती है, उतना ही दुखी हूं मैं जितना मणिपुर में मारे गए किसी पत्रकार के गम में होता हूं, उतना ही स्तब्ध हूं मैं जितना भूख और बेरोजगारी से हारकर आत्महत्या करते जवान लड़के या कर्ज में डूबे किसान की आत्महत्या पर होता हूं। इस तरह की मौतें समाज में गुस्सा पैदा करती हैं।

भावनाओं का धंधा करने वाले राजनेता, मीडिया और बाजार अक्सर शोक के समय समाज से तर्क गायब कर देता है। वह गुस्से में उन्माद भरता है। एक अच्छे खासे समझदार आदमी को उन्मादी भीड़ में बदल देता है। इसलिए गुस्सा और उन्माद से भरी भीड़ देश और समाज को कहीं नहीं ले जाती। एक दिन उन्माद और गुस्से का ज्वार उतर जाता है और हालत जस के तस हो जाते हैं। इसलिए यह समय उन्मादी भीड़ का हिस्सा बनने का नहीं बल्कि हर उस व्यक्ति के साथ खड़े होने का है जो राजनीतिक और सामाजिक निरंकुश तंत्र के बहुविध बलात्कारों के बीच अकेला है। आईए उस अकेले आदमी के साथ खड़े हों और हर तरह के अन्याय का प्रतिकार करें।

वरिष्ठ पत्रकार राजेन टोडरिया के फेसबुक वॉल से.

न्यूज चैनलों का फैसला- पीड़िता के अंतिम संस्कार, परिवार, गांव की लाइव कवरेज नहीं दिखाएंगे

Deepak Choubey : सभी न्यूज चैनलों ने आपसी सहमति से ये फैसला किया है कि हम उस लड़की के परिवार, उसके गांव, उसके अंतिम संस्कार की तस्वीरें नहीं दिखाएंगे. हम नहीं चाहते कि जिस परिवार की बेटी के साथ इतना दर्दनाक हादसा हुआ है, उसकी निजता का उलंघन हो. न्यूज चैनलों की आपसी सहमति के बाद बीईए ने एक गाइडलाइंस तैयार की है …..

1. No OB and teams at the funeral or home town or airport

2. do not show the funeral.

3. Do not show shots of home or family.

4. No shot of arrival of body.

5. no shots of transportation of body. And if course no chasing of the funeral van .

6. No interview with any relative .

7. Info about arrival of body and funeral should be given. However, location of funeral should not be given.

8. The above guidelines are exhaustive. There could be situations not covered in above points. In such cases, pl follow the guiding principle of protecting the IDENTITY , DIGNITY and PRIVACY of the girl.


Rajan Agrawal : न्‍यूज चैनलों के लिए एनबीए ने गाइडलाइन जारी की हैं। इसमें कहा गया है कि कोई भी न्‍यूज चैनल लड़की और परिजनों की कोई तस्वीर नहीं दिखाएगा। इसके अलावा, दाह संस्‍कार का समय और स्थान भी नहीं बताना है। साथ में शव लेकर आने वाली गाड़ी का कवरेज नहीं करना है। यही नहीं, पीड़िता के घर न्‍यूज चैनल अपनी ओबी वैन भी नहीं भेज सकते हैं। यदि कोई न्‍यूज चैनल इस गाइड लाइन का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।

    Shankar Suman its a gud step….channel should and have follow
 
    Ashish Kumar 'Anshu' khabar par to rok naheen hai….
 
    Rajan Agrawal Ashish Kumar 'Anshu' भाई अभी इस तरह की जानकारी नहीं मिल पाई है…
   
    Ashish Kumar 'Anshu' Facebook walon par vaise koi guide line lagoo hoti hai ya naheen? yah bhee bataiyga bhai….
    
    Ajit Anjum मैं सिर्फ तथ्य के स्तर पर जानकारी में सुधार कर दूं . सभी न्यूज चैनलों ने सहमति से ये फैसला किया है कि हम उस लड़की के परिवार, उसके गांव, उसके अंतिम संस्कार की तस्वीरें नहीं दिखाएंगे …..हमने आपसी सहमति से ये फैसला किया है कि हम उसके गांव में ओबी वैन नहीं भेजेंगे …लाइव कवरेज नहीं करेंगे ……ये न्यूज चैनलों का फैसला है, सरकारी गाइडलाइंस नहीं ….

फेसबुक पर दीपक चौबे और राजन अग्रवाल की वॉल से.

ऐसे बीमार समाज में बलात्कारी, यौन-शोषक और छेड़खानी करनेवालों के हौसले तो बुलन्द होंगे ही

Qamar Waheed Naqvi : उस अनाम शहीद को सलाम, जो इस देश की पुरुष-प्रणीत और पुरुष-नियंत्रित विकृत समाज व्यवस्था की बलि चढ़ गयी. उसके साथ जो कुछ हुआ, क्या उसके दोषी केवल वही बलात्कारी हैं? क्या उन बलात्कारियों को फाँसी पर चढ़ा देने भर से, क़ानून में बदलाव लाकर, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बना कर हम कुछ हासिल कर पायेंगे? बिलकुल नहीं. ये सब तो नितान्त सतही तरीक़े हैं जो इस पूरे मामले से उपजे जनाक्रोश को समय के साथ निपटा देंगे और नारी के शोषण और उत्पीड़न का घड़ियाली महाभोज यथावत चलता रहेगा.

क़ानून अपना काम करे, जल्दी से जल्दी करे, बलात्कारियों और हत्यारों को कड़ी से कड़ी सज़ा मिले. सरकार भी इससे हिली है, क़ानून में बदलाव की बात शुरू हो गयी है, उम्मीद है कि यह काम भी जल्दी हो जायेगा, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बनें, महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले अपराधों के बारे में पुलिस की मानसिकता में बदलाव लाया जाये आदि-आदि—- ये सब तो होगा, लेकिन सवाल तो इससे कहीं बड़ा है और वह यह है कि क्या हम अपने भीतर के बलात्कारी को फाँसी चढ़ाने के लिए तैयार हैं?

इसी फ़ेसबुक पर इसी घटना पर कुछ मित्रों ने बहुत ज़रूरी मुद्दे उठाये. उन सबको समेट कर देखें तो समझ में आ जाता है कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने लिए क़ानून, पुलिस, अदालत, फाँसी आदि का एक सीमित उपयोग तो है, लेकिन यह वास्तविक समाधान नहीं है. इसके लिए अपने भीतर ज़रा गहरे झाँकना होगा.

किसी मित्र ने लिखा कि हमारी सारी गालियाँ माँ-बहन से रिश्ता जोड़ कर क्यों हैं? जब आप गालियाँ देते समय किसी की माँ-बहन से रिश्ता जोड़ रहे होते हैं तो क्या आप मन ही मन बलात्कार नहीं कर रहे होते हैं? उस अनाम की शहादत पर ग़ुस्से से उबल रहे देश को संकल्प लेना चाहिए कि वह अपने सोच से, अपने मन से ऐसी सारी गालियों का पूरी तरह सफ़ाया कर देगा. आप यह संकल्प लेंगे?

इंडिया गेट पर प्रदर्शन करने गयी बहुत-सी महिलाओं ने शिकायत की किस तरह वहाँ नारेबाज़ी का नाटक कर रहे बहुत-से लोगों ने छेड़खानी की कोशिशें कीं. इनमें से ज़्यादातर या शायद सभी महिलाओं ने ऐसी ओछी हरकतों को उस समय बर्दाश्त कर लिया (क्योंकि किसी ऐसे हैवान की पिटाई की कोई ख़बर देखने को नहीं मिली). क्या आप संकल्प लेंगी कि ऐसी घटनाओं को सहन नहीं करना है, उनका हर हाल में प्रतिरोध करना है, अगर अकेले सम्भव नहीं तो स्कूलों में, काॅलेजों में, विश्वविद्यालयों में, अपने-अपने कार्यालयों, मुहल्ले में, काॅलोनी में, अपार्टमेंट में छोटे-छोटे समूह बना कर यह किया जा सकता है.

आइए हम संकल्प लें कि दहेज के लिए किसी महिला को किसी भी रूप में प्रताड़ित नहीं किया जायेगा, ताने भी नहीं कसे जायेंगे कि कम दहेज लेकर आयी है. महिला ही दहेज लेकर क्यों आये? पुरुष क्यों न दहेज दे?

आइए हम संकल्प लें कि महिला भ्रूण हत्या आज से बिलकुल बन्द कर देंगे! आख़िर महिला भ्रूण को क्यों मारते हो आप? पुरुष भ्रूण को क्यों नहीं मारते?

आइए हम संकल्प लें कि अपने-अपने कार्यालयों में किसी प्रकार का यौन उत्पीड़न नहीं करेंगे और नहीं होने देंगे.

ऐसा नहीं है कि इनमें से कई सारे अपराधों में सिर्फ पुरुष शामिल हैं. महिलाएँ भी बराबर की हिस्सेदार होती हैं, क्योंकि वे पुरुषवादी समाज की ग़ुलाम दासियों की तरह 'कस्टमाइज़ड' हो चुकी हैं.

तो देवियो और सज्जनो, एक मिनट अपने बारे में भी सोच कर देखिए. क्या आप इनमें से कुछ बदलना चाहते हैं? ये सब चीज़ें हमारे हाथ में हैं, जिन्हें हम कर सकते हैं. इसके लिए कहीं जा कर नारे लगाने की ज़रूरत नहीं है, यह मूक क्रान्ति आपके अपने घरों में हो सकती है, आप इस क्रान्ति के नेता बन सकते हैं. क्या तैयार हैं आप?

हमारे समाज का पूरा सोच विकृत है. कोई प्रेमिका की क़ीमत 50 करोड़ लगा कर अपनी राजनीति करता है, कोई महिलाओं को 'डेण्टेड-पेण्टेड' कह देता है, तो कोई 'परकटी' बता कर मखौल उड़ाता है, बहुतों को कपड़ों पर आपत्ति होती है तो कोई कह देता है कि उस अनाम लड़की ने विरोध ही क्यों किया, समर्पण कर दिया होता तो ऐसी हालत में न पहुँची होती!

यह एक महा-महा पुरुष समाज है, जो हमेशा औरत को अपने भोग, शोषण और सौदे की वस्तु की तरह देखा है, तभी तो चालचलन और चरित्र से जुड़ी सारी शर्तें सिर्फ औरतों पर लागू होती हैं. ऐसे बीमार समाज में बलात्कारी, यौन-शोषक और छेड़खानी करनेवालों के हौसले तो बुलन्द होंगे ही. कड़ा क़ानून बना कर, फ़ास्ट ट्रैक अदालतें बना कर, बलात्कारियों को फाँसी पर चढ़ा कर हम बलात्कार विरोधी होने का नाटक तो कर सकते हैं, अपने भीतर के बलात्कारी महा-पुरुष को कैसे मारेंगे, जो महिलाओं का सबसे बड़ा शत्रु है?

वरिष्ठ पत्रकार और आजतक के पूर्व न्यूज डायरेक्टर कमर वहीद नकवी के फेसबुक वॉल से.

बलात्कारी जब छूटता है तो फिर किसी लड़की की इज्जत तार-तार करता है

आखिरकार दिल्ली में गैंगरेप की शिकार लड़की ने इस बेरहम दुनिया को अलविदा कह दिया. सिंगापुर के डॉक्टर भी उसकी ज़िंदगी को बचा नहीं सके. आज पूरा देश रो रहा है. हर कोई व्यथित है. समझ नहीं आ रहा है कि आखिर कोई इंसान इस तरह हैवान कैसे बन सकता है कि पहले एक लड़की की वहशियाने तरीके से अस्मत लूटे फिर उसे लोहे की रॉड से पीटकर चलती बस से नीचे मरने के लिए फेंक दे. इस गैंगरेप की वारदात ने दिल्ली के साथ पूरे देश में सनसनी फैला दी है. वैसे ये कोई पहला मौका नहीं है जब चलती गाड़ी में किसी लड़की की अस्मत लूटी गई हो. आप कोई भी न्यूज चैनल या अखबार पर नज़र डालें तो रेप की खबरे पढ़ने को मिल ही जाती हैं. दूध पीती बच्ची या फिर बुढ़ापे की तरफ अग्रसर महिला कोई सुरक्षित नहीं है.

मैंने अपने इस छोटे से जीवन काल में कई रेप की स्टोरी पर काम किया है. हर स्टोरी को लिखते वक्त यही सोचता हूं कि इससे दर्दनाक और सिरहन फैलाने वाली दूसरी स्टोरी नहीं हो सकती. लेकिन जब आगे कोई दूसरी स्टोरी देखता हूं तो मेरा कलेज़ा कांप उठता हैं. उसमें पहले से भी ज्यादा वहशियानापन होता है. कई बार तो जिस पिता पर बेटी के घर बसाने की ज़िम्मेदारी होती है वही पिता अपनी बेटी की अस्मत लूटता है तो कई बार भाई तक बहन के सबसे बड़े गुनहगार बन जाते हैं. अब आप समझ सकते हैं कि जब घर में ही लड़की सुरक्षित नहीं है तो घर से बाहर तो उस पर बुरी नज़र रहती ही है. सवाल ये है कि एक लड़की भरोसा करे तो करे किस पर. सुरक्षित रहे तो रहे कैसे. कौन उसकी सुरक्षा की गारंटी देगा. सरकार क्या कर सकती है.

वैसे सरकार से उम्मीद करना भी बेईमानी है. सरकार एक और जांच की बात करती है और मीडिया का बढ़ता दबाव देखकर आनन फानन में आरोपी भी धर लिए जाते हैं. लेकिन आरोपी बाद में कोई ना कोई जुगाड़ कर निकल जाते हैं. कई बार तो ये भी देखा गया है कि किसी लड़की की अस्मत से खेलने वाला शख्स ज़मानत पर छूटने के बाद फिर से दूसरी लड़की की ज़िंदगी तबाह कर देता है. और एक बात कहना चाहता हूं कि जिस वर्दीधारियों पर लड़कियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होती उन्हें उगाही करने से फुर्सत ही नहीं रहती. मैं ये नहीं कहता कि सभी पुलिसवाले ऐसे होते हैं लेकिन कहते हैं आंख झूठ नहीं बोलती. मैंने और आपने भी कई बार देखा है कि किस तरह से वर्दी पहना शख्स कमज़ोरों की मदद की बजाय अपराध रोकने की बजाय खुद अपराध को बढ़ावा देता है. लड़की की अस्मत लुटती रहे लुटे, उसे भला क्या पड़ता है. पहले उसने देरी से कदम उठाया फिर आरोपी को बचाने में जुट जाती है.

अब दिल्ली वाले गैंगरेप के ही मामले में ही देखिए. लड़की बस में चीखती चिल्लाती रही. बस सड़क पर भागती रही. लेकिन किसी पुलिस वाले की उस पर नज़र नहीं गई. ऐसा हो ही नहीं सकता पुलिस ने ज़रूर देखा होगा लेकिन या तो वो सड़क किनारे खर्राटे मार रहे होंगे या फिर किसी ट्रक टेंपो वाले से वसूली करने में जुटे होंगे. मैं इस बात को इसलिए दावे से कर रहा हूं क्योंकि देश की राजधानी में औपचारिकता नाम के पुलिसवाले नाके नाके पर रहते ही हैं. कई बार तो ये देखा गया है कि पुलिसवाले अपराधियों पर कार्रवाई से बचते भी हैं. भाई, दिल्ली है, हो सकता है कि रेपिस्ट किसी नेता का खास हो और अभी वो पकड़ा गया, उधर पुलिस स्टेशन में किसी सफेदपोश का फोन आ जाए.

वैसे सिर्फ दिल्ली ही क्यों, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के साथ महाराष्ट्र के अलग अलग हिस्सों से भी लड़कियों की अस्मत लूटे जाने की खबरों की बाढ़ सी आ गई है. देश के दूसरे हिस्से भी लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं. लड़कियां सहमी हुई हैं. पग पग पर खतरा है. बावजूद इसके वो हार नहीं मान सकतीं. उन्हें जीवकोपार्जन के लिए घरों से निकलना ही पड़ेगा. अपने और अपने परिवार के सपनों की खातिर उन्हें बहोत कुछ झेलना पड़ेगा.

आज दिल्ली गैंगरेप की शिकार लड़की दम तोड़ चुकी है लेकिन सवाल ये है कि अब सरकार क्या करेगी. क्या आरोपियों का दोष साबित कर उन्हें फांसी देगी. क्या एक लड़की की शहादत को बर्बाद नहीं होने दिया जाएगा. क्या हमारे आपके बीच रहने वाले वहशियों को करारा सबक दिया जाएगा ताकि वो किसी लड़की के साथ घिनौनी हरकत करने से पहले लाख बार सोचे. वक्त आ चुका है. सरकार को आत्मचिंतन करना होगा और सिर्फ घड़ियाली आंसू बहाने की बजाय कड़े कदम उठाने होंगे नहीं तो देश का कोई भी कोना हो, लड़कियों के साथ हैवानी कृत्य होते ही रहेंगे..

लेखक अश्विनी शर्मा टीवी9 महाराष्ट्र के वरिष्ठ क्राइम पत्रकार हैं.  उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है.

रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो… (सुनें)

रहिए अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो…

हम-सुख़न कोई न हो और हमज़बां कोई न हो…

पडि़ए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार…

और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वां कोई न हो…

बे दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए…

कोई हमसाया न हो ओर पासबां कोई न हो…


rahiye ab aisi jagah chalakar jahaan koi na ho

hamasuKhan koi na ho aur hamazabaan koi na ho

bedar-o-deevaar sa ik ghar banaaya chaahiye

koi hamasaaya na ho aur paasabaan koi na ho

rahiye ab aisi jagah chalakar ……………..

padiye gar beemaar to koi na ho teemaar-daar

aur agar mar jaaiye to, nauha-Khvaan koi na ho

rahiye ab aisi jagah chalakar ……………..


मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की उपरोक्त रचना को सुरैया और अजीत वाडेकर की आवाजों में अलग-अलग सुनिए. सुरैया ने इसे मिर्ज़ा ग़ालिब फिल्म के लिए गाया है. नीचे आडियो प्लेयर में साउंड फुल कर प्ले कर दें…


(सुनें)

श्री मीडिया में पत्रकारिता का माहौल नहीं, क्या कर पाएंगे अजय उपाध्याय!

अजय उपाध्याय विद्वान पत्रकार माने जाते हैं. वे हिंदुस्तान, अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे हैं. वे कुछ महीनों से एक रीयल स्टेट कंपनी के मीडिया वेंचर श्री मीडिया समूह में बतौर प्रधान संपादक सक्रिय हैं. उन्हें वहां एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर भी बना दिया गया है. इस मीडिया कंपनी के मालिक मनोज द्विवेदी हैं. मनोज रीयल स्टेट कंपनी के भी मालिक हैं. श्री मीडिया का एक अखबार लखनऊ से निकलता है. चैनल नोएडा से चल रहा है.

ताजी कोशिश ये है कि अखबार व टीवी दोनों का संचालन नोएडा से हो और एनसीआर में भी अखबार निकाला जाए. सूत्रों के मुताबिक श्री मीडिया समूह जिस तरह की पत्रकारिता पर भरोसा करता है, और मीडिया में उतरने का उनका जो अंतिम मकसद है, वह पवित्र नहीं है. इस ग्रुप में पत्रकारों को रीयल स्टेट के कामधाम और ग्रुप के अन्य कार्यों को निपटाने में तो लगाया ही जाता है, उन्हें बड़े लोगों से अच्छे संबंध बना कर रखने को भी कहा जाता है. यही कारण है कि चैनल व अखबार पीआर एक्सरसाइज के माध्यम बनकर रह गए हैं. इनकी धमक मीडिया जगत में सुनाई नहीं पड़ी.

सूत्रों का कहना है कि अजय उपाध्याय इस ग्रुप के साथ जुड़कर खुद की साख खत्म कर लेंगे क्योंकि यहां पत्रकारिता का नहीं, पीआर का माहौल है. उधर, श्री मीडिया समूह के लोगों का कहना है कि अजय उपाध्याय को लाकर प्रबंधन ने मीडिया क्षेत्र में अपनी गंभीरता दिखाने की कोशिश की है. अजय उपाध्याय को फ्री हैंड दिया जाएगा ताकि वे श्री मीडिया समूह को मीडिया क्षेत्र में स्थापित कर सकें. वे अपनी जरूरत के हिसाब से टीवी, अखबार, पोर्टल में फेरबदल करेंगे और इन्हें री-लांच करेंगे. अजय उपाध्याय के आने से अशोक सिंह की स्थिति खराब हुई है. पहले वे श्री समूह के अखबार के प्रधान संपादक थे. अब डिमोट करके सिर्फ संपादक बना दिए गए हैं. प्रधान संपादक के रूप में अजय उपाध्याय का नाम अखबार में जाएगा.

अजीब बात ये है कि एक तरफ प्रबंधन के लोग अजय उपाध्याय को फ्री हैंड देने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पांच लोगों को सीओओ बनाकर उनकी तगड़ी घेराबंदी को रख दिया है. अखबार, टीवी व पोर्टल से पांच लोगों को सीओओ की जिम्मेदारी सौपीं गयी है. प्रिन्ट से पंकज वर्मा, चैनल से आलोक अवस्थी, प्रशांत द्विवेदी व एलविना कासिम और पोर्टल से अभय केसरवानी को सीओओ बनाया गया है. अब यह समझ से परे है कि ये पांच लोग सीओओ के रूप में कौन सी कसरत करेंगे. ये पांच सीओओ आंतरिक अराजकता बढ़ाने का ही काम करेंगे क्योंकि इससे पावर सेंटर ज्यादा हो जाएंगे और आंतरिक राजनीति भी खूब होगी. देखना है कि श्री मीडिया की नैया पार लग पाती है या नहीं. (कानाफूसी)

शरद दत्त पर्ल्स मीडिया में डायरेक्टर बने

पी7न्यूज चैनल, मनी मंत्रा बिजनेस मैग्जीन, शुक्रवार पत्रिका समेत कई तरह के मीडिया माध्यम संचालित करने वाली कंपनी पर्ल्स मीडिया से खबर है कि यहां शरद दत्त को डायरेक्टर बना दिया गया है. अब तक सहजपाल और केसर सिंह, दो डायरेक्टर हुआ करते थे. शरद दत्त के आने से तीन डायरेक्टर हो गए हैं. शरद दत्त पी7न्यूज पर कई जानी-मानी हस्तियों से इंटरव्यू करते हैं. उनका यह इंटरव्यू शुक्रवार मैग्जीन में प्रकाशित होता है.

इस बीच, खबर है कि अगले साल फरवरी में मनी मंत्रा मैग्जीन की सालगिरह के मौके को ध्यान में रखते हुए नगद इनामी स्कीम शुरू की गई है.

मीडिया से जुड़ी खबरें भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

कोलकाता के मीडिया में एक सगाई और शादी के लड्डू की चर्चा

: कानाफूसी : कोलकाता और पटना के ठंड में इन दिनों गर्माहट है. क्‍योंकि जनवरी में बंगाल और का मेल बंधन कोलकाता में होने जा रहा है. चूंकि दौर शादी विवाह का है इसलिए चर्चा की गरमाहट शादी विवाह पर ही है. लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि तुमको निमंत्रण कार्ड मिला क्‍या? पटना के लोग कोलकाता बारात लेकर आने की तैयारी में पूरे जोर शोर से लगे हैं. कुछ लोग अपना सूट टाई मोजा भी दुरस्‍त कर रहे हैं. लेकिन कोलकाता में मातमी सन्‍नाटा पसरा हुआ है. आप भी सोच रहे हैं कि खबर देने की जगह ये क्‍या बकवास कर रहे हैं.

तो भाइयों हम आपको बता दें कि हम हाल ही में ट्रांसफर होकर कोलकाता आए, जुम्‍मा जुम्‍मा कुछ दिन ही हुआ. और इस खबर में मेरी भी उत्‍सुकता थी कि कोलकाता की बहुचर्चित मीडिया गर्ल की शादी में हिस्‍सा लेने का मौका मिलेगा, लेकिन जिसकी शादी हो रही है वो भी अपनी शादी की खबर को अपने करीबियों से छुपाने में लगी हुई हैं. जबकि हफ्ते भर की छुट्टी लेकर सगाई भी कर आईं. दुल्हे राजा पटना में अपने दोस्‍तों और दिल्ली दफ्तर में आला अफसरों को अपनी शादी की दुहाई देकर नौकरी भी बचा चुके हैं (असम दौरे में बिल में घालमेल का मामला है). अब आते हैं मुद्दे पर क्‍यूं  मोहतरमा अपनी शादी छुपाना चाहती हैं तो भाई साहब जब इस बात का खुलासा उनके दफ्तर के लोगों ने किया और ये राज खोला कि वो शादी कर रही हैं एक बार फिर, तो जिज्ञासा स्‍वभाविक है कि कोलकाता की रिपोर्टरनी अपनी शादी की खबर छुपाने का नाकाम प्रयास कर रही हैं. और मेरे अंदर का पत्रकार जाग उठा. और अब परत दर परत खुलने लगी तो पता चला कि कोलकाता की ये हसीना शादी करने की शौकिन हैं और अब तक कई शादियां कर चुकी हैं.

इनके पूर्व पतियों की कतार में हिंदी के वरिष्ठ पत्रकार हैं, तो अंग्रेजी चैनल में बंगाल के क्षेत्रीय चैनल के कैमरामैन भी पूर्व पति के रूप में शोभा बढ़ा रहे हैं. हसीना के शिकार लोगों की खबर की तलाश में जब हम निकले तो मुझे कोलकाता का शायद ही कोई मीडिया हाउस मिला जो इनकी चर्चा से अछूता हो, हर जगह इनकी याद में रोने वाले मुझे मिले. राष्ट्रीय अंग्रेजी चैनल का कैमरामैन तो इनके चक्‍कर में अपनी पत्‍नी को तलाक देकर जेल की हवा भी खा चुका है. उसके साथ शादी कर राजडांगा स्‍कूल मेन रोड में घर बसाने के बाद श्रीमती जी शारीरिक रूप से उसको कमजोर करार देते हुए शादी भी तोड़ चुकी हैं. उनके दफ्तर का ड्राइवर तक इसका गवाह है. कैमरामैन जब अपने घर भोज किया था तब श्रीमती रिपोर्टरनी की भूमिका पत्नी वाली ही थी. इस बात को कोलकाता में उनके सहयोगी स्‍वीकार करते हैं. रिपोर्टरनी से अपनी शादी को बचाने की मेहनत कर ये भाई नाकाम हो चुका पर ये नहीं मानीं, जबकि वो इनको पत्‍नी मानते रहे. लेकिन शादी- शुदा कुंवारी रिपोर्टरनी को दया नहीं आई सो इनकी याद में महीनों पागल होकर घूमने के बाद घर वालों के दबाव में पति उर्फ कैमरामैन ने अब शादी कर ली है और वो बंदा एक बच्चे का बाप बन अपना जीवन गुजार रहा है. हसीना के चुंगल में फंसे लोगों को सावधान करना ही उसका मकसद बन गया है. जबकि बांग्ला के लीडिंग चैनल का कैमरामैन अपनी इस सर्वश्रेष्‍ठ चैनल की सर्वश्रेष्‍ठ रिपोर्टरनी के लिए घर से खाना बनाकर लाता और घंटों इंततार करने के बाद इनको खिलाकर सुख पाता था.

अपने अलीपुर के घर में (जहां रिपोर्टरनी पेइंग गेस्‍ट रहती थी) महीनों रंगरेलियां करने के बाद उसको भी अपने दिल से बाहर का रास्‍ता दिखा दी. श्रीमान इनके चक्‍कर में अपनी पड़ोसी विधवा भाभी जो इमकी प्रेमिका हुआ करती थी उससे भी हाथ धो बैठा है. बेचारा अब गाते फिर रहा है कि अपनी तो जैसे तैसे कट जाएगी ऐसै तैसे आपका का क्‍या होगा जनाबे आली. उसी से मुझे पता चला कि हिंदी के वरिष्‍ठ पत्रकार भी इसके प्‍यार में गोता लगा रहे हैं.  अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए अपने साथियों के साथ हम आधमके उनके दफ्तर और उनके बास को साथ लेकर पहुंच गए अंग्रेजी चैनल के कैमरामैन के दफ्तर. कैमरामैन ने जब खुलासा किया कि पत्रकार महोदय भी रिपोर्टरनी से उनसे पहले शादी कर चुके हैं तो महोदय की बोलती बंद हो गई. तब मुझे पता चला कि आखिर दुल्हे राजा खम ठोंक कर अपनी शादी का एलान कर रहे हैं और दुल्हिनया तो शरमा रही है. जबिक दुल्हे राजा प्रगतिशील विचार के हैं. उनको इस बात से शायद ही फर्क पडेगा. लेकिन दुल्हन के डर पर हर कोई  हैरान है कि एक ही वक्‍त पर कई-कई मर्द को लट्टू करनेवाली अपने दफ्तर के स्‍टूडियो में मीटिंग कर अपनी शादी की खबर से इनकार करती है और वही जब मंडप में दुल्हन के रूप में हाजिर होगी तो वो क्‍या करेंगे. हालांकि रिपोर्टरनी कोलकाता से प्रसारित एक हिंदी चैनल के मालिक की साली भी हैं और वो भी बेचारे परेशान हैं कि लोग उनसे मिठाई मांग रहे हैं और दुल्हन अभी तक उनको बताई ही नहीं. जो भी हो कोलकाता के हर मीडिया आफिस में सगाई और शादी के लड्डू का इंतजार है. हालांकि इंतजार तो बंगाल के आईपीएस और आईएएस लाबी में भी बहुतों को है. क्‍योंकि इनका सुख लेने वालों की जमात में वो भी शामिल हैं. और कोलकाता के मीडिया हाउस में यही चर्चा है कि उनको शादी का लड्डू मिलेगा या नहीं जबकि पटना में लोगबाग शादी में शामिल होने के लिए कोलकाता आने की तैयारी में जुटे हुए हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों ठगने वाला पत्रकार गिरफ्तार

गुवाहाटी। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड में नौकरी दिलाने का झांसा देकर कुछ लोगों से कथित तौर पर लाखों रुपये वसूलने वाले एक पूर्व पत्रकार को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने शुक्रवार को बताया कि विभिन्न अखबारों और टीवी चैनल के लिए काम कर चुके मोनी कुंतल सैकिया को एक व्यक्ति द्वारा एफआईआर दर्ज कराए जाने के बाद गिरफ्तार किया गया। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि सैकिया ने उससे पैसा लिया था और बदले में नौकरी दिलाने का वादा किया था।

सैकिया पर नौकरी दिलाने के नाम पर कई और लोगों को ठगने का आरोप है। कुछ साल पहले ही वह पत्रकारिता छोड़ चुका है और अब कारोबार कर रहा है। पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है। (एजेंसी)

डीएवीपी की समाचार पत्रों पर हंटर चलाने की तैयारी!

देहरादून। भारत सरकार का विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) देश के समाचार पत्रों पर काफी पड़ताल के बाद रेट लिस्ट जारी करने में कंजूसी बरत रहा है। डीएवीपी ने कई ऐसे समाचार पत्रों का भी रेट लिस्ट जारी कर दिया है जो सिर्फ फाइलों में छपते हुए नजर आते हैं। देश भर के 1468 मामलों में महज 349 समाचार पत्रों को ही विज्ञापन की मान्यता प्रदान की गई है, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य से सबसे अधिक फिर दिल्ली व उसके बाद मध्यप्रदेश एवं उत्तराखण्ड शामिल हैं, जबकि 24 समाचार पत्रों को 3 महीने के अंक जमा करने पर मान्यता दिए जाने की बात कही गई है। दूसरी ओर 1095 समाचार पत्रों को मान्यता प्रदान नहीं की गई है।

पिछले काफी समय से डीएवीपी के अंदर समाचार पत्रों की रेट लिस्ट को लेकर घपले की बातें समाने आई थी, जिसको देखते हुए अब डीएवीपी ने समाचार पत्रों द्वारा पेश किए जाने वाले आवेदन पत्रों पर बारीकी से नजर दौड़ाई है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार खबर है कि डीएवीपी ने रेट लिस्ट हासिल करने वाले देश के सैकड़ों समाचार पत्रों को नोटिस भी जारी किया है, जिनके द्वारा अभी तक अपने कागज पूरे नही किए हैं। वहीं आगामी 3 सालों के लिए जारी हाने वाले रेटों पर भी कैंची चलाने की सम्भावना है। इसके पीछे कई समाचार पत्रों द्वारा डीएवीपी से प्रसार संख्या अधिक दिखाने के चलते रेट हासिल किए गए थे, जिन पर डीएवीपी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। डीएवीपी के एडिशनल डायरेक्टर एनवी रेड्डी ने देश के 349 समाचार पत्रों को रेट जारी किए हैं, जिनमें अंडमान निकोबार का एक, आन्ध्र प्रदेश के 27, आसाम का 1, बिहार के 4, छत्तीसगढ़ के 11, दादर का 1, दिल्ली के 58, गुजरात के 14, हरियाणा के 7, जम्मू कश्‍मीर के 8, झारखंड के 4, कर्नाटक के 5, केरला के 1, मध्य प्रदेश के 35, महाराष्‍ट्रा के 12, मिजोरम के 1, नागालैन्ड के 1, उड़ीसा के 10, पंजाब के 2, राजस्थान के 28, सिक्किम का 1, तमिलनाडू के 3, त्रिपुरा का 1, उत्तर प्रदेश के 71, उत्तराखण्ड के 34, वेस्ट बंगाल के 8 समाचार पत्र शामिल हैं।

देहरादून से नारायण परगाईं की रिपोर्ट.

रघु आदित्‍य, ओम गौड़, ईशमधु तलवार समेत कई को राजस्‍थान गौरव अवार्ड

जयपुर। संस्कृति युवा संस्था की ओर से राज्य की 31 प्रतिभाओं को राजस्थान गौरव सम्मान से नवाजा गया। विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली इन प्रतिभाओं को यहां एक होटल में आयोजित भव्य समारोह में पूर्व राज्यपाल न्यायमूर्ति अंशुमान सिंह, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ममता शर्मा, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष बी.डी.कल्ला और राजस्थान फाउंडेशन के उपाध्यक्ष  राजीव अरोड़ा ने प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिन्ह, राजस्थानी साफा पहनाकर राजस्थान गौरव के अलंकरण से विभूषित किया।

समारोह का शुभारंभ महामंडलेश्वर पुरुषोत्तम भारती ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। राजस्थान गौरव अवार्ड पाने वालों में वरिष्ठ पत्रकार रघु आदित्य, ओम गौड़, ईशमधु तलवार, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी नीरज के.पवन, किरण सोनी गुप्ता, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी बी.एल.सोनी, प्रमुख समाजसेवी महेंद्र सनाढ्य, राजस्थानी फिल्म निर्माता महावीर जैन समेत उद्योग एवं व्यापार जगत से जुड़ी चुनिंदा शख्सियतें शामिल थीं। इस मौके पर पूर्व राज्यपाल न्यायमूर्ति अंशुमान सिंह ने सम्मानित प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की प्रशंसा की और बधाई दी। वहीं, संस्कृति संगठन के अध्यक्ष पंडित सुरेश मिश्रा ने कहा कि संस्कृति संगठन देश की संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृति से दूर करने के लिए संकल्पित है। संस्था के संरक्षक एचसी गनेशिया ने आभार व्यक्त किया।

जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में सैलरी के लाले, दिख रहे तालाबंदी के आसार

: भाई-भतीजावाद ने बिगाड़ कर रख दी अखबार की स्थिति : जनसंदेश टाइम्‍स, बनारस में कर्मचारियों का नया साल बिगड़ने वाला है. यहां काम कर रहे लगभग सौ कर्मचारियों का नवम्‍बर नवम्‍बर महीने की ही सैलरी अब तक नहीं मिली है, जबकि दिसम्‍बर भी खतम होने वाला है. कर्मचारी परेशान हैं. अच्‍छे अच्‍छे बैनरों को छोड़कर जनसंदेश टाइम्‍स से जुड़ने वाले लोग अब परेशान हैं. उन्‍हें अपने फैसले पर कोफ्त हो रही है. बताया जा रहा है कि यहां से जुड़े नौ जिलों में भी पिछले पांच-छह महीने से कर्मचारियों को सैलरी और अन्‍य खर्च नहीं दिए गए हैं.

खबर मिली है कि प्रबंधन हेड यूनिट में काम करने वाले कर्मचारियों को आश्‍वासन दे रहा है पर जिलों में कार्यरत लोगों को कह दिया गया है कि आप विज्ञापन जुटाओ और उसी से अपनी सैलरी तथा खर्च निकालो. प्रबंधन के इस फरमान के बाद जिलों में असंतोष व्‍याप्‍त हो गया है. बताया जा रहा है कि लांचिंग के कुछ समय बाद ही अखबार की स्थिति गड़बड़ हो गई. कारण बताया गया कि अनुभवी लोगों की जगह दोस्‍ती-यारी निभाने के चक्‍कर में ऐसे लोग भर लिए गए जो पत्रकारिता की मानक पर बहुत खरे नहीं उतर रहे थे.

यहां वहां से छंटे-छंटाए लोग भर लिए जाने के चलते शुरुआत से ही स्थितियां गड़बड़ हो गईं. और यह एक खास बिरादरी का अखबार दिखने लगा. कुछ जिलों में ऐसे लोगों को ब्‍यूरोचीफ बना दिया गया, जिन्‍हें जुम्‍मा जुम्‍मा साल-दो साल के पत्रकारिता का भी अनुभव नहीं था. इसके चलते सीनियर तथा जिलों में अपनी पहचान रखने वाले लोग अखबार से नहीं जुड़े, जिसका परिणाम यह हुआ कि रिवेन्‍यू माडल विकसित नहीं हो सका. जिलों में भी हिंदुस्‍तान से आए एक सीनियर रिपोर्टर की चली, जिसके चलते अच्‍छे लोगों की बजाय जुगाड़ वाले लोग ही जिलों में तैनात हो पाए.

खर्च बढ़ने तथा रिवेन्‍यू माडल विकसित नहीं होने के चलते प्रबंधन ने अपने हाथ खड़े कर लिए. प्रबंधन ने तय किया था कि प्रत्‍येक छोटे जिलों को 25 हजार रुपये में चलाया जाएगा तथा बड़े जिलों पर इससे थोड़ा ज्‍यादा खर्च किया जाएगा. इतना कम धनराशि में भी कुछ लोगों ने किसी तरह कार्यालयों का संचालन किया, परन्‍तु रिवेन्‍यू जनरेट नहीं होने के चलते जिलों को मिलने वाले ये खर्च भी बंद कर दिए गए. नियुक्ति से लेकर अखबार चलाने में भी संपादक एवं सीजीएम की भूमिकाएं सीमित कर दी गईं तथा कुछ खास लोगों को प्रमोट कर दिया गया, जिससे यह अखबार लांचिंग के समय ही कोई अलग छाप नहीं छोड़ पाया.

बनारस के जमे जमाए अखबारों में अपनी पहचान बनाना तो दूर यह अखबार अब बंदी के कगार पर पहुंचता दिख रहा है. बताया जा रहा है कि बनारस के एक बिल्‍डर अनुराग कुशवाहा का पैसा इसके संचालन में लग रहा है लेकिन वो भी अखबार से बहुत फायदा न देखते हुए पैसे देने बंद कर दिए हैं, जिसके चलते कर्मचारियों की सैलरी अटकी पड़ी है. सैलरी अनियमितता के चलते पहले भी कई लोग अखबार को अलविदा कह चुके हैं. अब देखना है कि यह अखबार चल पाता है या फिर तालाबंदी ही इसकी अंतिम परिणिति होती है.

मुझे नंगा करके ज़मीन पर बिठाया जाता है : सोनी सोरी

सुप्रीम कोर्ट की दया का बदला सरकार सोनी सोरी से ले रही है. सोनी सोरी ने २७ जुलाई के अपने जेल से सुप्रीम कोर्ट के नाम भेजे गये पत्र में कहा है कि ‘आज जीवित हूं तो आपके आदेश की वजह से. आपने सही समय पर आदेश देकर मेरा दोबारा इलाज कराया. एम्स अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान बहुत ही खुश थी कि मेरा इलाज इतने अच्छे से हो रहा है. पर जज साहब, आज उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है. मुझ पर शर्मनाक अत्याचार प्रताड़ना की जा रही है. आपसे निवेदन है, मुझ पर दया कीजियेगा .. जज साहब इस वख्त मानसिक रूप से अत्यधिक पीड़ित हूं.

(१) मुझे नंगा कर के ज़मीन पर बिठाया जाता है
(२) भूख से पीड़ित किया जा रहा है
(३) मेरे अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है ….

जज साहब छतीसगढ़ सरकार, पुलिस प्रशासन मेरे कपडे कब तक उतरवाते रहेंगे? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं. मुझेमें भी शर्म है. मुझे शर्म लगती है. मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं. शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं. जज साहब मुझ पर अत्याचार, ज़ुल्म में आज भी कमी नहीं है. आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर रहे हैं. जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया आज जो इतनी बड़ी बड़ी मानसिक रूप से प्रताड़ना दिया जा रहा है? क्या अपने ऊपर हुए ज़ुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है? क्या मुझे जीने का हक़ नहीं है? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है?….

इस तरह के ज़ुल्म अत्याचार नक्सली समस्या उत्पन्न होने का स्रोत हैं …..

सोनी का यह पत्र हम सब के लिये एक चेतावनी है कि कैसे एक सरकार अपने खिलाफ कोर्ट के किसी फैसले का बदला जेल में बंद किसी पर ज़ुल्म कर के ले सकती है ! सरकार साफ़ धमकी दे रही है कि जाओ तुम कोर्ट ! ले आओ आदेश हमारे खिलाफ ! कितनी बार जाओगे कोर्ट ?

सोनी पर यह ज़ुल्म सोनी के अपने किसी अपराध के लिये नहीं किये जा रहे ! सोनी पर ये ज़ुल्म सामजिक कार्यकर्ताओं से उसके संबंधों के कारण किये जा रहे हैं ! सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के अपराधिक कारनामों को उजागर करने की सजा के रूप में सोनी पर ये अत्याचार किये जा रहे हैं ! सोनी सामाजिक कार्यकर्ताओं के किये की सजा भुगत रही है ! हम बाहर जितना बोलेंगे जेल में सोनी पर उतने ही ज़ुल्म बढते जायेंगे !

सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमें वो यह लिखे कि अरुंधती राय, स्वामी अग्निवेश, कविता श्रीवास्तव, नंदिनी सुंदर, हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके.

सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं, इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा. फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे.

कोई तो बचाओ इस लड़की को. संसद , सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं. और हमारे वख्त में ही एक जिंदा इंसान को तिल तिल कर हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है. और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है.

शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है. एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं. मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा. नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे.

ये है सोनी सोरी का पत्र….

दंतेवाड़ा वाणी ब्लाग से साभार.

कांग्रेसियों की ज्ञान जांचने वाले आई नेक्‍स्‍ट ने खुद की गलती

इंदौर से निकले जागरण के अखबार 'आई-नेक्स्ट' को प्रबंधन ने जिस मकसद से निकला था, शायद अखबार उसे समझ नहीं पाया! गलतियों से भरपूर इस अखबार में आज (29 दिसम्बर) के अंक (पेज-6) में हुई गलती बेहद गंभीर है। कांग्रेस के नेताओं से अखबार के संवाददाताओं ने पार्टी की 127वीं वर्षगांठ पर कुछ सवाल पूछे थे। जाहिर है ज्यादातर नेता नहीं बता पाए की पार्टी की स्थापना कब, किसने और कहाँ की थी? इस एक पेज की खबर में नेताओं की खिल्ली उड़ाई गयी है।

\लेकिन, ध्यान देने की बात ये है कि अखबार ने अपने तरफ से सवालों के जो सही जवाब छापे है, उसमें भी कांग्रेस की स्थापना का साल 1855 छापा है। जबकि, कांग्रेस की स्थापना का वर्ष 1885 था। मध्यप्रदेश कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष योगेश यादव के जवाबों में भी 1855 लिखा है, जिसे सही बताया गया है! नईदुनिया को एक समय शुद्ध हिंदी वाला अखबार माना जाता था, आज वो गलतियों की खदान बन चूका है, 'आई-नेक्स्ट' भी उसी के नक़्शे कदम पर है।

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

यह जनता आज बलात्कारियों को मांग रही है, कल आप नेताओं को मांगेगी

: एक बेटी की विदा का शिलालेख! : सरकार का दूध अगर निरंतर काला न होता तो यह बेटी इस तरह अपमानित हो कर सिंगापुर की धरती से हम से विदा न हुई होती। उस की विदाई पर शिलालेख न लिखना पड़ता। बेटी का इस तरह विदा होना हम सब के मुंह पर करारा तमाचा है, जूता है, जाने क्या-क्या है। अगर सरकार समझती है कि सिंगापुर भेज कर उस बेटी के निधन पर उपजी आग पर वह पानी डाल लेगी तो सरकार की बुद्धि पर तरस आता है। सरकार भूल जाती है कि ब्रिटिश हुकूमत ने बहादुरशाह ज़फ़र को भी निर्वासन दे कर सिंगापुर भेजा था। उन्हें वहीं दफ़नाया भी गया था। ज़फ़र को लिखना पड़ा था :

कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूए-यार में।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद. अंग्रेजों ने उनके दोनो बेटों मिर्ज़ा मुगल और ख़िज़ार सुलतान का सर काट कर थाली पर उनके पास भेजा था और उनको बर्मा के रंगून में तड़ी-पार की सजा दे कर भेजा था । वही पर उनका देहांत हुआ 1862 में । तो क्या इस २०१२ में डेढ़ सौ साल बाद सिंगापुर फिर वही इतिहास दुहराने की याद दिला रहा है? क्यों कि तब1862 में ज़फ़र की आज़ादी की लगाई आग देश में बुझी नहीं और ब्रिटिश बहादुरों को तमाम जतन के बाद भी देश छोड़ कर जाना पड़ा था। तो क्या यह सरकार बहादुर शाह ज़फ़र की शहादत को, उस इतिहास को दुहराने की राह पर है? और उसी धुन में मगन निरंतर अपने दूध को काला बताने और जीत लेने की फ़िक्र में है?

आप पूछेंगे कि यह काला दूध की कैफ़ियत क्या है? तो जानिए कि यह एक लतीफ़ा है। लतीफ़ा यह है कि एक लड़का एक दिन स्कूल से वापस आया और अपनी मां से पूछा कि मम्मी दूध काला होता है कि सफ़ेद? मां ने पूछा कि माज़रा क्या है? तो बेटे ने पूरी मासूमियत से बताया कि आज स्कूल में एक लड़के से शर्त लग गई है। वह लड़का कह रहा था कि दूध सफ़ेद होता है और मैं ने कहा कि दूध काला होता है। तो दूध कैसा होता है मम्मी? मम्मी ने मायूस होते हुए कहा कि बेटा फिर तो तुम शर्त हार गए। क्यों कि दूध तो सफ़ेद ही होता है। बेटा यह सुन कर निराश हो गया। लेकिन पलटते ही बोला कि, मम्मी शर्त तो मैं फिर भी नहीं हारूंगा। शर्त मैं ही जीतूंगा। मम्मी ने पूछा कि वो कैसे भला? बेटा पूरी हेकड़ी से बोला, मैं मानूंगा ही नहीं कि दूध सफ़ेद होता है, मैं तो अड़ा रहूंगा कि दूध काला होता है। जब मानूंगा कि दूध सफ़ेद होता है तब तो हारूंगा? मैं तो कहूंगा कि दूध काला ही होता है। मम्मी बेटे की इस अकलमंदी पर मुसकुरा पड़ीं।

हमारी सारी सरकारें, केंद्र की हों, प्रदेशों की हों या कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान हो, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका, कारपोरेट हो, मीडिया हो या और जो भी कोई प्रतिष्ठान हों, सभी के सभी दूध को काला बताने की मुहिम इस कदर न्यस्त हैं कि वह सचमुच भूल चुके हैं कि दूध सफ़ेद होता है। हेकड़ी, झूठ और अहंकार में जकड़ी यह सरकारें और सत्ता प्रतिष्ठान सच से कोई नातेदारी रखना ही नहीं चाहते। गोया सच से बड़ा कोई पाप नहीं होता। यह सरकारें, यह व्यवस्था ऐसे ट्रीट करती हैं जनता के साथ  जै्से कभी किसी कारखाने के मालिकान और मैनेजमेंट कारखाने के कर्मचारियों के साथ ट्रीट करते थे। कि सारे सच और तर्क मालिकान और मैने्जमेंट के और सारी गलती कर्मचारियों की। सारे सरकारी कानून कर्मचारियों के हित में पर सारा सरकारी  अमला  मालिकान के पक्ष मे। तो कानून उस का हो जाता था जिस के हाथ में लाठी। और अंतत: साबित हो जाता था कि समरथ को नहीं दोष गोंसाई ! नतीज़ा सामने है कि अब इन कारखानों मे कहीं कोई कानून नहीं चलता। मालिकान जो चाहते हैं, वही कानून होता है।

सरकारें भी अब इसी राह पर हैं। वह सरकार नहीं, देश नहीं कोई कारखाना चला रही हैं। अपनी मिलकियत और जागीर समझ कर। कहीं कोई प्रतिपक्ष नहीं है। पक्ष और प्रतिपक्ष का खेल बस इतना ही बाकी रह गया है कि अभी हमारा टर्न, फिर तुम्हारा टर्न ! बस ! जनता-जनार्दन  बस उन के लिए सत्ता पाने का इंस्ट्रूमेंट भर है।

नहीं, इस बेटी के साथ हुए दुराचार पर जनता खास कर युवा जिस तरह उद्वेलित और आंदोलित हुए और सरकार और सिस्टम ने उनसे निपटने के जो तरीके अपनाए, जो लाक्षागृह बनाए वो बेहद शर्मनाक है। यह और यही तरीके वह अन्ना हजारे, रामदेव और अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के साथ भी आजमा चुकी है। जैसे अभ्यस्त हो चली है आंदोलनों के लिए लाक्षागृह बनाने के लिए। अब कि जैसे इसी बार नहीं कुछ मिला तो सिपाही सुभाष तोमर की आंदोलनकारियों की पिटाई से हुई मौत का ढिंढोरा पीट दिया। जब कि हार्ट अटैक से वह अपनी मौत मरा। मेट्रो स्टेशन बंद कर दिया, रास्ते बंद कर दिए। निहत्थे बच्चों की पिटाई की। उन पर इस बला की ठंड में पानी चलाया। वाटर केनन से। और जब सब कुछ से हार गए तो बता दिया कि दस आतंकवादी दिल्ली में घुस आए हैं जो इस आंदोलन में शरीक हो कर कुछ अप्रिय कर सकते हैं।

हद है भई ! एक दांव आंदोलन के राजनीतिज्ञ होने का भी चलाया पुलिस कमिश्नर की चिट्ठी के जरिए। बताया कि इस आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग भी शामिल हो गए हैं। हद है। आखिर क्यों नहीं शामिल हों भला? क्या उन के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं? गनीमत कि इस पर कम्युनिल कलर चढ़ा कर सेक्यूलर चश्मा नहीं लगाया। तो शायद इस लिए भी कि इस में वामपंथी छात्र संगठन भी खुल कर सामने थे। तो सरकार की यह तरकीब तितर-बितर हो गई। फिर शुरु हुई पुलिस और प्रशासन की नूरा कुश्ती। एस.डी.एम. की बात सामने आई कि पुलिस ने उन्हें पीड़ित का बयान ठीक से नहीं लेने दिया पुलिस ने। शीला दीक्षित की चिट्ठी और शिंदे की लुकाछुपी शुरु हो गई। अब यह देखिए शिंदे बेअसर होते दिखे तो वित्त मंत्री चिदंबरम को कमान संभालनी पड़ी। फिर ट्रांसपोर्ट और परिवहन विभाग आमने-सामने हो गए। एक दूसरे की गलती बताते हुए। आंदोलन फिर भी शांत नहीं हुआ। भ्रष्टाचार में डूबी सरकार के हाथ-पांव फूल गए। फिर सब की समझ में आ गया कि अब लड़की बचने वाली तो है नहीं और कही उस के निधन की आग में दहक कर आंदोलन उग्र हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। सो सिंगापुर भेज दिया उसे आनन-फानन ! तो क्या आंदोलन अब ठंडा पड़ जाएगा?

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के समय उन के लिए एक स्लोगन चलता था कि निर्णय न लेना भी एक निर्णय है। उन्हीं नरसिंहा राव के वित्त मंत्री रहे आज के प्रधानंत्री मनमोहन सिंह ने उस स्लोगन को और आगे बढ़ाया है। कि निर्णय लेते हुए तो दिखो पर निर्णय मत लो। संसद में महिला आरक्षण बिल पेश कर के भी वह पास नहीं करावा पाए तो इस लिए कि वह ऐसा चाहते ही नहीं थे। लोकपाल के साथ भी वह यही खेल खेल गए। और अभी ताज़ा-ताज़ा दलितों को प्रमोशन में आरक्षण मसले पर भी वह इसी खेल को दुहरा गए हैं। नहीं याद कीजिए कि अमरीका के साथ वह परमाणु समझौते को ले कर कैसा तो खेल गए थे? सरकार गिरने की चिंता नहीं की। क्यों कि वास्तव में वह भारत की पसंद के प्रधानमंत्री नहीं, अमरीका और वर्ड बैंक की पसंद के प्रधानमंत्री हैं।

इतने लाचार और असहाय कि उन्हें राहुल और सोनिया से मिलने के लिए टाइम मांगना पड़ता है। कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है। अपनी मर्जी से वह मंत्रिमंडल तो क्या खांसी जुकाम भी नहीं तय कर सकते है। आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर महगाई और भ्रष्टाचार का जो निर्मम खेल खेल रहे हैं वह इस का देश और लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इस की रत्ती भर भी उन को फ़िक्र नहीं है। तो शायद इस लिए भी कि वह जनता द्वारा चुन कर नहीं आते। जनता का जो दर्द है, वह नहीं जानते। उन के पांव बिवाई फटे पांव नहीं हैं। इस लिए इस का दर्द नहीं जानते वह। वह सिर्फ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाए रखने का दर्द जानते हैं। येन-केन-प्रकारेण। लेकिन दुराचार और हिंसा की मारी यह बेटी अपने बलिदान की  इबारत लिख कर आंदोलन और उबाल की जो आग बो गई है, वह राख होने वाली नहीं है। समय की दीवार पर लिखी इस आग को राजनीतिक पार्टियां पढे़ और समय रहते यह चोर-सिपाही का खेल खेलना और नूरा-कुश्ती बंद करें नहीं जनता उन को जला कर भस्म कर देगी। इस बेटी की आह को असर करने की उम्र अब खत्म होने को है। क्यों कि हालात अब बद से बदतर हो चुके हैं। ज़फ़र के एक शेर में ही जो कहें कि:

चश्मे-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

तो राजनीतिक पार्टियों के दुकानदार और यह सरकारें, कार्यपालिका और न्यायपालिका भी होश में आ जाएं। नहीं जनता अभी तक तो सिर्फ़ बलात्कारियों को मांग रही है, बेटी को इंसाफ़ देने के लिए। कल को आप राजनीतिक आकाओं को भी बस मांगने ही वाली है। फिर तो यह पुलिस, यह सेना सब इस जनता के साथ में होगी, आप की सुरक्षा में नहीं। जनता को इस कदर बगावत पर मत उकसाइए। इस अनाम बेटी की शहादत, जिस की मिजाजपुर्सी में समूचा देश खड़ा हो गया, खुद-ब-खुद, यही कह रही है। आंदोलनों के लिए लाक्षागृह बनाने से बाज़ आइए।  नहीं जनता, यह व्यवस्था बदलने को तैयार खड़ी है। इस भारत को मिस्र की राह पर मत ले जाइए। खूनी क्रांति से इस देश समाज को बचाने की ज़रुरत है। उस बेटी को प्रणाम कीजिए, और सुधर जाइए राजनीति, न्यापालिका और कार्यपालिका के हुक्मरानों। इस देश के नौजवान आप के गरेबान तक पहुंच चुके हैं। बहुत हो गया काला दूध बताने का खेल। यह लतीफ़ा अब देश बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

दयानंद पांडेय के ब्लाग सरोकारनामा से साभार.

गैंगरेप पीड़िता दामिनी तब बोली थी- मैं जीना चाहती हूं

नई दिल्ली : राजधानी में 16 दिसंबर की रात चलती बस में गैंगरेप और दरिंदगी की सारी सीमाओं को तोड़ देने वाली बर्बर वारदात की शिकार 23-वर्षीय लड़की ने जीने की इच्छा जताई थी और वह अपने जीवन को तार-तार करने वाले दोषियों को उनके किए की सजा दिलाना चाहती थी। घटना के तीन दिन बाद 19 दिसंबर को जब वह अपनी मां और भाई से पहली बार मिली, तो उसके शब्द थे 'मैं जीना चाहती हूं'… इलाज की पूरी प्रक्रिया के दौरान वह संकेतों में बात करती रही थी। उसकी ज्यादातर बातचीत उसके अभिभावकों के साथ हुई थी और उसने एक नहीं बल्कि दो-दो बार मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दिए थे।

पैरा-मेडिकल की यह छात्रा अत्यंत साहसी थी, जिसने न केवल बस में हमलावरों का प्रतिरोध किया था, बल्कि इलाज के दौरान भी हौसला नहीं खोया था। सफदरजंग अस्पताल में 10 दिन तक चले इलाज के दौरान तीन बार इस लड़की की मनोवैज्ञानिक जांच की गई, तब उसने अपने भविष्य के बारे में कुछ विचार जाहिर किए थे।

इस लड़की ने 21 दिसंबर को एसडीएम के समक्ष बहादुरी से बयान भी दिया था। उसने घटना का सिलसिलेवार ब्योरा दिया था, जो उसके साथ बस में चढ़े उसके मित्र द्वारा दिए गए बयान से मिलता-जुलता था। बयान के विवादों में घिरने के बाद लड़की ने एक बार फिर मजिस्ट्रेट के समक्ष पूरा घटनाक्रम बताया और इच्छा जताई कि उसके साथ वहशियाना कृत्य करने वालों को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए।

लड़की का इलाज करने वाले डॉक्टरों ने भी उसकी अदम्य जिजीविषा का लोहा माना और उसे बहादुर लड़की करार दिया। डॉक्टरों ने कहा था कि पीड़ित मनोवैज्ञानिक रूप से बिल्कुल ठीक है और भविष्य के प्रति आशावान है। इस लड़की को जब अस्पताल लाया गया था, तो उसकी हालत बहुत गंभीर थी, लेकिन इलाज के दौरान उसकी हालत में सुधार के संकेत मिले थे। पर क्रिसमस की रात उसकी नब्ज कुछ देर के लिए क्षीण हो गई और हालत बिगड़ने लगी थी। इसके बाद उसे सिंगापुर के अस्पताल ले जाया गया।

16 दिसंबर को सफदरजंग अस्पताल लाए जाने के बाद 10 दिन में लड़की के दो बड़े ऑपरेशन और एक छोटा ऑपरेशन हुआ था। संक्रमण और चोट की वजह से उसकी आंत का बड़ा हिस्सा डॉक्टरों ने निकाल दिया था। अस्पताल में ज्यादातर समय 23-वर्षीय इस पीड़ित को वेन्टीलेटर पर रखा गया था। केवल दो दिन ही वह वेन्टीलेटर से अलग रही और अपने आप सांस ले पाई थी। करीब एक पखवाड़े तक जीवन के लिए संघर्ष करने के बाद सिंगापुर के माउंट एलिजबेथ हॉस्पिटल में शनिवार को भारतीय समयानुसार तड़के दो बजकर 15 मिनट पर उसने दम तोड़ दिया।

समाचार एजेंसी भाषा से साभार.

गैंगरेप पीड़िता की मौत दिल्ली में ही हो गई थी : मेनका गांधी

Raj Kamal : भारतीय जनता पार्टी की नेता और सांसद मेनका गांधी ने गैंग रेप पीड़िता की मौत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि रेप पीड़िता की मौत दिल्ली में ही हो गई थी। उसे बोरे की तरह प्लेन में डालकर कर सिंगापुर भेज दिया गया। मेनका गांधी ने कहा कि जिन हालात से लड़की गुजर रही थी वैसे में बेहतर इलाज के नाम पर विदेश भेजना कहीं से भी तार्किक नहीं है। मेनका ने कहा, मैं मानती हूं कि लड़की का निधन दिल्ली में हो गया था।'

उन्होंने दिल्ली और केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस घटना के बाद सरकार में जिस तरह की प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए थी वह अब तक नहीं दिखी। सरकार कुछ कड़े कदम उठाकर लोगों में भरोसा और सुरक्षा का माहौल कामय कर सकती थी लेकिन नाकाम रही। मेनका गांधी ने कहा कि इस पूरे मामले को जिस तरह से हैंडल किया गया उससे कई तरह के सवाल खड़े होते हैं।

गौरतलब है कि कुछ डॉक्टरों ने भी लड़की को सिंगापुर भेजने पर हैरानी जतायी थी। डॉक्टरों का कहना था कि जब लड़की इस हालत में नहीं थी कि उसका आंत ट्रांसप्लांट किया जा सके तो सिंगापुर क्यों भेजा गया। एक्सपर्ट टीम के कुछ डॉक्टरों ने कहा था कि हमसे पूछा भी नहीं गया कि आखिर क्यों सिंगापुर लड़की को शिफ्ट किया जा रहा है। केवल इतना पूछा गया कि क्या लड़की वहां जाने की स्थिति में है। डॉक्टरों ने इस मेडिकल फैसला के बजाय राजनीतिक फैसला करार दिया था। इसके बावजूद मेनका गांधी का यह कहना कि लड़की का निधन दिल्ली में हो गया था डॉक्टरों के कथन से मेल नहीं खाता है। इस घटना में अब तक मेनका गांधी ने बिल्कुल नई और हैरान करने वाली बात कही है।

राजकमल के फेसबुक वॉल से.

सरकारों को टीवी चैनल शुरू करने की अनुमति नहीं : ट्राई

नई दिल्ली : भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकार (ट्राई) ने कहा है कि केंद्र व राज्य सरकारों को प्रसारण के कारोबार में उतरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ट्राई की इस व्यवस्था का तमिलनाडु सहित विभिन्न राज्यों सरकारों पर तत्काल प्रभाव हो सकता है। नियामक ने इस संबंध में आज अपने सुझाव दिये। उसने कहा है कि सरकारें ही नहीं राजनीतिक दलों को भी प्रसारण क्षेत्र में उतरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

सूचना एवं प्रसारण सचिव उदय कुमार वर्मा ने 30 नवंबर को ट्राई को पत्र लिखकर इस बारे में उसकी राय मांगी थी कि क्या राज्य या केंद्र अथवा उनके नियंत्रण वाली किसी इकाई को प्रसारण या चैनलों के वितरण में उतरने की अनुमति दी जानी चाहिए। वर्मा के इस पत्र में ट्राई के सचिव प्रभारी सुधीर गुप्ता ने कहा कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, कंपनियों, संयुक्त उद्यमों के साथ-साथ केंद्र या राज्य सरकारों से सम्बद्ध या उनके द्वारा वित्तपोषित इकाइयों को प्रसारण या टीवी चैनल वितरण के कारोबार में उतरने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। (एजेंसी)

मध्य प्रदेश में भाजपा विधायक के आफिस में बलात्कार

रेप के खिलाफ देभ भर में उबाल का असर प्रभावशाली लोगों पर नहीं पड़ता दिख रहा है. तभी तो एक के बाद एक कई घटनाएं लगातार घटित हो रही हैं. मध्य प्रदेश में तो भाजपा विधायक के आफिस में रेप किये जाने का मामला प्रकाश में आया है. बलात्कारी कोई और नहीं बल्कि भाजपा विधायक का भतीजा है. पूरे मामले को विस्तार से जानने-समझने के लिए नीचे दी गई न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें…

नोएडा में चाचाओं और चचेरे भाइयों ने किया गैंगरेप, पुलिस ने पीड़िता पर ही बनाया कंप्रोमाइज के लिए दबाव!

यूपी की पुलिस सुधरने वाली नहीं. बात नोएडा की है. दादरी में चलती कार में एक लड़की से गैंग रेप हुआ. रेप करने वाले उसके चाचा और चचेरे भाई निकले. सबसे पीड़ादायी यह रहा कि पीड़िता व उसके परिजनों पर ही पुलिस ने दबाव बना दिया कि वह आरोपियों से समझौत करके चुप हो जाए. गैंगरेप के इस घटनाक्रम को नोएडा से प्रकाशित हिंदी अखबारों में भी अंडरप्ले कराए जाने की तैयारी है. कहा जा रहा है कि ऐसा नोएडा पुलिस से रिश्ते अच्छे बनाए रखने के नाम पर किया जा रहा है. टाइम्स आफ इंडिया ने पूरे मामले को सच्चाई के साथ अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया है.

इस प्रकरण का फालोअप छपना भी कठिन है क्योंकि जब सत्ता-सिस्टम ही गैंग रेप की शिकार युवती व परिजनों को दबाव में लेकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करे और मेनस्ट्रीम मीडिया इस घृणित कार्य में पुलिस का सहभागी बन जाए तो कौन कहेगा कि सामूहिक दुष्कर्म हुआ और कौन छापेगा कि पीड़िता को न्याय नहीं मिला. लीजिए, टाइम्स आफ इंडिया की वेबसाइट में प्रकाशित खबर को पढिए. उसके ठीक नीचे दैनिक जागरण की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर को पढ़िए जिसमें पीड़िता के साथ हुए गैंगरेप को अंडरप्ले कर पुलिस के एंगल पर सब कुछ मैनेज करने का कार्य किया गया है.


टाइम्स आफ इंडिया की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर…

Class X girl gang-raped in a moving car in Noida

By Purusharth Aradhak, TNN | Dec 28, 2012

NOIDA: A class X student was allegedly gang raped by her uncles and cousins in Greater Noida on Friday. What is more shocking is that the victim has alleged that the police tried to hush up the entire incident and were forcing the victim and her family to come to a compromise with the accused. Also, The accused's car with tinted glass kept moving in several arterial roads in the city but no policemen stopped the car.

It was only when the locals staged a protest against police inaction, that the police lodged an FIR. The village panchayat also pressurized the victim's family for compromise.

The victim lives with her family in Chaysa village while she studies in an inter college in a nearby village. The victim was kidnapped on Wednesday morning when she was going to her school. The accused in a car stopped the victim and pulled her in the car. The accused reportedly put a handkerchief laced with sedative which put the girl in an unconscious state.

The girl was found in an unconscious state near a railway track in Dadri later in the evening on Wednesday. The family came to know about the incident after a local informed the family. When the victim regained consciousness, she narrated that two uncles and cousins allegedly kidnapped and then raped her.

SP (rural) Ashok Kumar said that the family initially had alleged that their girl was kidnapped and thrashed. "On the basis of complaint we had registered an FIR now family also alleged that the victim was also raped. Henceforth we sent the girl for medical examination. Initial report of medical examination suggests that there were no external injury marks on the private part but final report is not here yet. We will also add rape charges in the FIR," Kumar said So far no accused has been arrested but manhunt has been lauched to nab the culprits.

Meanwhile the victim's family was reportedly pressurized by the local panchyat and police for settlement. The family is demanding stringent action against the culprits. On Friday the victim's family members and supporters also staged the protest demanding early arresting of the accused.

The incident raised questions on the inadequate law and order in the region.


दैनिक जागरण की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर….

किशोरी का अपरहण, सामूहिक दुष्कर्म की आशंका

Fri, 28 Dec 2012

संवाददाता, ग्रेटर नोएडा : जारचा कोतवाली के छायसा गांव की एक किशोरी का अपहरण कर सामूहिक दुष्कर्म की चर्चाओं ने क्षेत्र में सनसनी फैला दी है। हालांकि, पुलिस सामूहिक दुष्कर्म से इन्कार कर रही है। पुलिस का कहना है कि अपहरण और छेड़खानी का मामला दर्ज किया है। आरोपियों की तालाश की जा रही है।

पुलिस ने बताया कि किशोरी बुधवार सुबह स्कूल जा रही थी। उसी समय गांव के कुछ युवकों ने रास्ते से उसका अपहरण कर लिया। किशोरी के शोर मचाने पर गांव वालों ने अपहरणकर्ता युवकों का पीछा किया। गांव वालों को पीछा करता देखकर युवक किशोरी को दादरी में छोड़कर फरार हो गए। सूचना पर पहुंचे किशोरी के परिजन उसे वापस ले गए। परिजनों ने पांच लोगों के खिलाफ नामजद मामला दर्ज कराया है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक किशोरी का अपहरण कर पांच युवकों ने उसके साथ दुष्कर्म किया।

इसके बाद उसे दादरी में फेंक कर फरार हो गए। किशोरी के परिजन कोतवाली पहुंचे, तो पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। दिल्ली की घटना के बाद पुलिस इस मामले को दबाने में लगी है। किशोरी के परिजनों पर रिपोर्ट दर्ज नहीं कराने को लेकर दबाव भी बनाया गया। उनसे अपहरण और छेड़खानी की तहरीर लिखवाई है। वहीं, एसपी देहात ने बताया कि आरोपियों की तालाश की जा रही है। यदि लड़की के अभिभावक तैयार हुए, तो लड़की का मेडिकल परीक्षण कराया जाएगा।

बिपाशा बसु को घूर कर देखने से मुंबई हो गयी ‘असुरक्षित’

मीडिया की महानता देखिये.. अगर दिनरात बॉडीगार्ड्स से घिरी रहने वाली बिपाशा बसु को कोई जिम में घूर कर देख लेता है तो मुंबई 'असुरक्षित' घोषित हो जाती है। फिल्मी सितारों और आइटम गर्ल्स के पीआर में जुटी मीडिया को ये भी समझ नहीं आया कि ये खबर छाप कर वो अपनी खिल्ली ही उड़ा रही है।

बिपाशा ने मीडिया को बताया कि वो जिस जिम में अपनी सेहत बनाने के लिये वर्जिश करने जाती हैं वहां कोई व्यक्ति उन्हे 'गलत तरीके से' घूर रहा था। अब उन्हें डर लग रहा है। अब मीडिया की बहादुरी ये हो गयी कि वो उन लाचार और कमजोर तबके की असुरक्षित लड़कियों की तुलना उस बिपाशा बसु से कर रही है जो अपनी सुरक्षा के इंतजामों पर हर साल लाखों रुपये खर्च करती हैं।

अब सवाल ये उठता है कि इस खबर का आइडिया किसके दिमाग में आया..? देश भर में दिल्ली के गैंग-रेप कांड पर हो रही चर्चा के बीच ये बयान उन्हें ऐसी चाटुकार मीडिया के जरिये सुर्खियां बटोरने का मौका जरूर दे गया। क्या बिपाशा बसु ये बताने की कोशिश कर रही हैं कि वो अभी भी इतनी हॉट हैं कि कोई उनका पीछा कर सकता है..??

अभी पूनम पांडे और वीना मलिक बाकी हैं..

(पत्रकार धीरज भारद्वाज की फेसबुक वॉल से साभार)

मैं तो बच गयी, क्योंकि चीखना मुझे आता था, लेकिन…

बात तब की है, जब मैं सिर्फ आठ साल की थी. खेलते-खेलते गेंद जब अंकल के घर में चली जाया करती थी, तो मैं भीतर से कांप जाती थी कि अब गेंद मुझे ही लेने जानी पड़ेगी. अंदर जाने का मन नहीं करता था. वो अंकल नहीं थे, बुरे अंकल थे, बहुत बुरे. जब वो मुझे छूते थे, तो उनका छूना मुझे अच्छा नहीं लगता था. मैं जानती नहीं थी कि वो मुझे क्यों छू रहे हैं, क्योंकि आठ साल की बच्ची अच्छा और बुरा नहीं जानती. लेकिन भीतर से शायद कुछ होता है, जो अच्छे और बुरे का भेद समझा देता है. पिता का स्पर्श बुरा नहीं होता जब वह अपनी बच्ची को प्रेम से चूमता है. लेकिन उसी उम्र का आदमी जब गलत मंशा से छूता है-चूमता है, तब एक मासूम बच्चा भी जान जाता है कि ये जो भी है अच्छा तो नहीं ही है.

गेंद लाने जब जाती तो वो मुझे किस करते थे, मेरे हाथों को कसकर पकड़ लेते थे, मुझे रोकते थे, खेलने जाने नहीं देते थे. एक दो बार तो मैं कुछ नहीं बोली, लेकिन उसके बाद मैं तेज़ी से चीखती थी और वहां से भाग जाती थी. आज भी जब मैं बचपन के बुरे अंकल को याद करती हूं, तो अपने हाथों को, गालों को होंठो को काट कर फेंक देने का दिल करता है या फिर उस बुरे अंकल को. आज कई दशक बाद भी वो स्पर्श मुझे चुभता है. मैं सौभाग्यशाली थी, क्योंकि मुझे चीखना आता था. लेकिन कितनी ही बच्चियां चीख भी नहीं पाती और उनके साथ बहुत कुछ हो जाता है. पुरुष जानवर होता है. वह छोटे बड़े का भेद भूल जाता है.

बात यहीं पर खतम नहीं होती, मेरी चाइल्हूड फ्रेंड मीरा (काल्पनिक नाम) जब सिर्फ पांच साल की थी, उसके बुआ के लड़के ने ही उसे एब्यूज़ किया करीब तीन साल तक. गर्मियों की छुट्टियां चल रही थीं. बुआ का लड़का (मीरा के सोकाल्ड भैया) वहीं अपने बच्चों के साथ मीरा के घर आया हुआ था. जो कि मीरा से 25 साल बड़ा था और मीरा की उम्र का उसका बेटा था. एक दिन मीरा के मम्मी पापा मीरा को घर पर ही छोड़ कर मूवी देखने चले गये. जब वे लौटे तो उन्होंने अपनी बच्ची के साथ बुआ के लड़के को गलत अवस्था में देखा. मीरा तो पांच साल की था. वो कुछ नहीं जानती थी. लेकिन वो 25 साल का मर्द तो जानता था कि क्या सही है क्या गलत. खैर ये तो हुई मीरा और बुआ के बेटे की बात, लेकिन मां बाप ने आपत्तिजनक अवस्था में देखने के बाद भी बात को दबा दिया वहीं. ये कहकर कि परिवार की बात है. बाहर जायेगी तो अपनी ही बदनामी होगी.

मां बाप इस तरह कैसे सोच सकते हैं? उन्हें गु्स्सा नहीं आता? इस तरह के मां बाप नपुंसक ही होते होंगे, क्योंकि उनका खून नहीं खौलता.  हम ही बढ़ावा देते हैं. हम खुद न्यौता देते हैं इन भेड़ियों को अपने घर में घुसने का. हम बेटियां पैदा करते हैं इनके लिए ताकि ये आयें और उन्हें नोच-नोच कर खायें. हमारी बच्चियां इतनी नाजों से इसलिए पाली जाती हैं, ताकि ये अपने मैल भरे खूनी नाखूनों से उनकी खाल को उधेड़ उधेड़ कर उसमें मवाद भर दें.

मैं तो बच गयी, क्योंकि चीखना मुझे आता था, लेकिन मीरा जैसी कितनी ही बच्चियां कितनी ही लड़कियां हैं, जो हर दिन खतम की जाती हैं. हर दिन उनका बचपन उनके ही खिलौने की गलियों में दम तोड़ता हैं. मासूमियत को किस तरह से कोई भेड़िया एक ही पल मैं रौंद देता है, मसल देता है अपनी बदबूदार हथेलियों के नीचे उसकी कोमल किलकारी को. वो तो भेद भी नहीं जान पाती है किलकारी और रुदन का. उसे तो सिर्फ हंसना आता है खिलौने के मिलने पर और रोना आता है खिलौने के टूट जाने पर. जब कोई उसकी मासूमित को ही इस क्रूरता से तोड़ देता है, तो ऐसे भेड़ियों का क्या इलाज है.

हम इंडिया गेट पर मोमबत्तियां जलाते हैं, परेड करते हैं, बैनर चमकाते हैं. किसकी सलामती की दुआ करते हैं, उसकी जो अब सिर्फ एक लाश है. कितनी बार मरती है वो. फिर उसके जीने का क्या फायदा. उसे मर जाने दो. शायद मरने के बाद वह जी जाये. हमें क्या लगता है कि दामिनी जिंदा रहेगी तो सब अच्छा हो जायेगा. नहीं कभी नहीं. दामिनी को मर जाना चाहिए. यदि वह जिंदा रही तो वह जीते- जी हर पल मरेगी हर दिन मरेगी. अपने शरीर को कहां लेकर जायेगी जो हर पल उसे उन जानवरों की याद दिलवायेगा. शरीर का हर हिस्सा जिसे बेरहमों ने इस तरह कुचल दिया. एक ही दामिनी नहीं हैं हमारे बीच. कितनी कितनी दामनियां हैं हमारे आसपास, जो इसी तरह खतम कर दी जाती हैं. क्या हंसती खिलखिलाती गाती गुनगुनाती प्रेम करती लड़की इन मर्दों को अच्छी नहीं लगती, जो इस तरह से उसे रौंद देते हैं.

ये कहानी सिर्फ एक मीरा एक दामिनी की नहीं है….कितनी कितनी मीरा और कितनी कितनी दामनियां? कब तक? हमें क्या लगता है सिर्फ फांसी देकर हम बलात्कार जैसे अपराध को खतम कर लेंगे. नहीं कभी नहीं. दिमक तो पूरे सिस्टम में है. इस सिस्टम को कुछ परिवर्तन की  ज़रूरत है फांसी के साथ साथ. सिंहासन पर बैठे शेरों को (जिनके हाथ में सत्ता है) कालर पकड़ कर सड़क पर पटकना होगा. हम डर्टी पिक्चर को सेंसर बोर्ड से ओके करा लेते हैं, लेकिन टीवी पर उनके सीन काटकर दिखाते हैं. वो फ्रस्टेशन कहां जायेगा? बलात्कार में परिवर्तित होकर हमारी बच्चियों पर ही तो निकलेगा. जब मैंने कामासूत्रा देखी तो मैं अंत तक यही सोचती रही कि इसमें कुछ तो काम (सेक्स) होगा. लेकिन पूरी फिल्म देखकर ऐसा लगा मानो किसी बिमार आदमी ने बनायी है. सेक्स दिखाना नहीं होता तो, कामसूत्र जैसी फिल्में जगह जगह बिमार-कुंठित-नपुंसक-मर्दों को छोड़ने के लिए बनाते हैं. जो अपनी मर्दानगी किसी का बलात्कार करके दिखाते हैं. इतने में ही वे खुद को मर्द मान बैठते हैं, लेकिन वे ये नहीं जानते कि किसी औरत को सम्मान देकर आप जितना प्यार और सम्मान पा सकते हैं उतना बलात्कार करके नहीं.

कंडोम का एड सही तरह से टीवी पर प्रसारित क्यों करते. सनी लियोन की मादक अदाओं के बिना भी कंडोम का एड दिया जा सकता है. क्या जब तक सनी लियोन की अदायें नहीं होंगी तब तक सेक्स में आंनद नहीं आयेगा. जिसे आनंद लेना होगा वो सनी लियोन के बिना भी ले लेगा. फिर क्यों हम ऐसी एक जमात तैयार कर रहे हैं, जो हर बच्ची हर लड़की में सनी लियोन को देखे और उसकी मासूमियत का अपहरण कर दे. हमारा समाज खुद ही तैयार कर रहा है बलात्कारी. क्यों सैक्स पर बात करते हुए हम आज भी झिझकते हैं. खुल कर बात क्यों नहीं करते. वैश्यावृत्ति को लीगल क्यों नहीं कर देते. बड़े-बड़े नेता हर रात लड़कियां बदलते हैं, लेकिन छोटे स्तर का आदमी जब बॉर और कोठों पर पाया जाता है, तो उसे जेल की हवा खानी पड़ती है. कंडोम बनाते हैं, सनी लियोन का वैलकम करते हैं, पार्न मूवीज़ के सीडी बनते और बिकते हैं. लेकिन सेक्स को क्यों छुपाते हैं. वैश्यावृत्ति को लीगल क्यों नहीं करते.

जब तक ये सेक्स का कीड़ा दीमाग में रहेगा हर दिन कई कई दामनियां बलात्कार की खूंटी पर टांग दी जायेंगी. समाज में गंदगी फैलाने की सबसे बड़ी जड़ टीवी और हिंदी सिनेमा है. जिस तरह आजकल कचरा और अधूरा सेक्स टीवी पर परोसा जा रहा है वही तो बलात्कारियों की एक फौज तैयार कर रहा है. कटरीना कैफ आधे आधे ब्लाउज़ पहन कर बाडीगार्ड के गानों पर नाच कर करोड़ों रुपये कमा लेती है. लेकिन अपने पीछे एक बिमार फौज को कुंठा से भर कर कितनी ही लड़कियों की ज़िंदगी को नरक बना जाती है. वो तो नाचकर करोंड़ों कमाती है, लेकिन उन्हें नहीं पता की उनके इस नंगें नाच गाने से किसी लड़की की अनमोल जिंदगी खतम हो जाती है.  ज़रूरत है सेक्स को सही तरीके से बताने दिखाने समझाने की. न कि एक कुंठित समाज तैयार करने की.

समाज तो तैयार हो चुका है जैसा उसे हमारे सिरहाने बैठे ठेकेदार तैयार करना चाहते थे. अब तो हम सिर्फ अफसोस कर सकते हैं और अपनी बारी का इंतज़ार कर सकते हैं. कहां सुरक्षित हैं हम? कहां सुरक्षित हैं हमारी बच्चियां? हम उन्हें कैसा भविष्य दे रहे हैं? हम उन्हें कुछ नहीं दे रहे एक डरे-सड़े-नपुंसक-बलात्कारी समाज के सिवा. क्या हमारी बच्चियां इन भेड़ियों का भोजन हैं? जो वे इन्हें इस तरह खाने का साहस कर बैठते हैं. साहस करेंगें भी क्यों नहीं.  समाज तो बदलने से रहा. क्योंकि ये मर्दों की बनायी दुनिया और धीरे धीरे औरतों की संख्या घट ही रही है. या तो इन्हें कोख में मार दिया जाता है. मां-बाप के प्रेम के चलते बच्ची यदि दुनिया में आ भी जाती है, तो दुनिया वाले उसे जीने नहीं देते. या तो उसे दहेज के लिए जलाकर मार डालेंगे या फिर उसका  बलात्कार कर देंगे, ताकि वो खुद ब खुद अपने आप को मार डाले. दुनिया अगर इतनी ही बुरी है तो ये दुनिया खतम हो जानी चाहिए. यहां अब बेटियां नहीं पैदा होनी चाहिए. जिस दुनिया में बिमार लोग बसते हों, वो दुनिया इस लायक ही नहीं कि वहां बेटियां पैदा हों.  जब बेटियां पैदा ही नहीं होंगी तो दुनिया अपने आप ही खतम हो जायेगी.

मैं हर औरत हर बच्ची हर लड़की हर बेटी से प्यार करती हूं. हर बच्ची को देखकर सिर्फ दिल यही कहता है, कि हे ईश्वर!  इसे बचाकर रखना. इसका बचपन इसका जीवन इसे जीने देना हंसते हुए, मुस्कुराते हुए. मत कुचलने देना इन मासूम फूलों को. इन्हें खिलने देना. महकने देना. इनमें से ही कोई कल्पना चावला, मेधा पाटेकर, बरखा दत्त, इंदिरा नूई, लता मंगेशकर, सानिया मिर्जां होगी. जो देश बदलनेवाली हैं उनके वजूद को क्यों खतम करते हैं ये भेड़िये. इन्हें जीने दो. ये जीना चाहती हैं. हंसते हुए मुस्कुराते हुए. बच्चियां जब हंसती हैं, तो पूरी कायनात उनके साथ हंसती हैं. इस हंसी को गूंजना है! आकाश तक पहुंचना है! उड़ना है बादलों से भी आगे किसी दूसरे आसमान में….

लेखिका ने अनाम रहना प्रीफर किया है.


इसे भी पढ़ सकते हैं- ''बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता… और यही इसकी तार्किक परिणति है''

डा. वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल ने दैनिक जागरण, देहरादून से इस्तीफा दिया

वरिठ पत्रकार डा. वीरेंद्र सिंह बर्त्वाल ने दैनिक जागरण, देहरादून से इस्तीफा दे दिया है। वे सात साल से यहां सेवाएं दे रहे थे और वर्तमान में वरिष्ठ उपसंपादक के पद पर कार्यरत थे। पता चला है कि वे अब हिंदी भाषा पर कुछ कार्य करने वाले हैं। हिंदी प्रिंट मीडिया में करीब डेढ़ दशक तक पत्रकारिता कर चुके डा. बर्त्वाल ने मसूरी में पर्वत इप्टा समाचार साप्ताहिक अखबार निकालकार करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने मसूरी टाइम्स, दैनिक हिंदुस्तान में मसूरी से ही बतौर संवाददाता कार्य किया और फिर चंडीगढ़ में दैनिक भास्कर से जुड़े।

इसके बाद उन्होंने वहीं अमर उजाला में सेवाएं दीं। तत्पश्चात 2005 में देहरादून में दैनिक जागरण ज्वाइन किया। हिंदी, राजनीति शास्त्र और पत्रकारिता में एमए कर चुके डा. बर्त्वाल ने हिंदी में पीएचडी की है। धर्म-संस्कृति, भाषा पर उन्होंने अनेक जानकारी परख आलेख लिखे हैं। कश्फ, भाषा, आलोचना, मीरायन और सम्मेलन जैसी प्रतिष्ठित हिंदी शोध पत्रिकाओं में उनके करीब एक दर्जन शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। कई नामी पत्रकारों के अधीन काम कर चुके डा. बर्त्वाल एक निजी विश्वविद्याल में अतिथि प्रवक्ता के रूप में अध्यापन भी कर चुके हैं। पता चला है कि डा. बर्त्वाल अब हिंदी भाषा पर कुछ कार्य कर रहे हैं। करीब छह माह पहले एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने के बाद से ही उन्होंने ये फैसला लिया था।
 

बर्मा उर्फ म्यांमार में निजी अखबारों के प्रकाशन को अनुमति मिली

फौजियों के बूटों तले जिस बर्मा उर्फ म्यांमार देश में लोकतंत्र कई दशकों से स्लीप मोड में है, वहां से धीरे धीरे अच्छी खबरें आने लगी हैं. वहां की शानदार नेता सू की अभी भारत आईं. बहुत कुछ कह कर गईं. ताजी सूचना है कि म्यांमार में निजी अखबार भी छप सकेंगे. म्यांमार की फौजी सरकार धीरे धीरे दुनिया की मुख्यधारा का हिस्सा बनने की तैयारी में है, इसलिए नियंत्रित तौर पर ही सही, लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक एक कर पुनर्जीवित करने की शुरुआत कर दी है. हालांकि यह कह पाना मुश्किल है कि वहां निजी अखबार कितने आजाद रह सकेंगे. पूरी खबर यूं है…

Myanmar to allow private daily newspapers

Yangon Dec 28:

Myanmar said today it will allow private daily newspapers starting in April for the first time sinैन ce 1964, in the latest step toward allowing freedom of expression in the long-repressed nation.

The Information Ministry announced on its website that any Myanmar national wishing to publish a daily newspaper will be able to submit an application in February. New papers will be allowed to begin printing April 1 in any language.

The move was an expected part of new press freedoms President Thein Sein has introduced as part of wider democratic reforms since taking office last year, after a half-century of military rule.

In August, the Government abolished direct censorship of the media and informed journalists they would no longer have to submit their work to state censors before publication as they had for almost half a century.

Myanmar has state-run dailies which serve as Government mouthpieces and more than 180 weeklies, about half of which cover news while the rest feature sports, entertainment, health and other subjects.

Private dailies in Burmese, English, Indian and Chinese languages were once vibrant in the former British colony, previously called Burma. But all were forced to close when late Dictator Ne Win nationalised private businesses in 1964.

साभार- पीटीआई.

इलेक्ट्रानिक मीडिया जज से लेकर पुलिस, सब कुछ हो गया है : दिग्विजय सिंह

अपने बयानों के लिए चर्चित कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने इलेक्ट्रानिक मीडिया को निशाने पर लिया है. उनके बयान के आधार पर खबर बनाते हुए समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया ने भोपाल डेटलाइन से Electronic media has become police, prosecution & judge: Digvijay शीर्षक से एक खबर रिलीज की है, जो इस प्रकार है…

Bhopal, Dec 28:

Deprecating the electronic media over coverage of protests following the gangrape in Delhi, Congress General Secretary Digvijay Singh today said it was playing the roles of police station, prosecution and the judge.

“During the agitation following the gangrape of a girl in New Delhi, the electronic media has become the police station, the prosecution and even the judge,” Digvijay said.

After a policeman died during the agitation in the aftermath of the gangrape, the electronic media showed an eyewitness who claimed to have seen the security personnel falling down, he said.

The eyewitness was even shown saying that the policeman had not been hit by anything, the Congress leader said, adding that all this was not the job of the electronic media.

“I think all of us have become irrelevant and the nation should be left at the mercy of the electronic media who will run it,” Singh said.

He said, however, in contrast, the print media “behaves responsibly” and does not go on and on about any particular story.

संदीप वाधवा सहारा मीडिया में विदेशी पूंजी लाएंगे, अंग्रेजी व बिजनेस चैनल के लिए विदेशी पार्टनर की तलाश

: कानाफूसी : इन दिनों सहारा मीडिया के नए नए साहब और सर्वेसर्वा बनकर आए संदीप बाधवा की सहाराइटों में खूब चर्चा है. उनके बारे में बताया जा रहा है कि वे सहाराश्री सुब्रत राय सहारा के पुत्र सुशांतो राय की पत्नी के सगे या दूर के भाई हैं. यानि मामला घर का है. दूसरे, बाधवा विदेशों में कारोबार और विदेशी पूंजी के मामले के अच्छे एक्सपर्ट भी है. सहाराश्री की प्रियारिटी इन दिनों ज्यादा से ज्यादा बाहरी पैसा अपने समूह में लगवाने की है ताकि कई तरह के संकटों से निपटा जा सके.

इस कारण विदेशी पूंजी व विदेशी कारोबार के विशेषज्ञ संदीप वाधवा को मीडिया की कमान दे दी गई है. चूंकि उनके पास विदेशी पूंजी और विदेशी टाइअप समेत ढेर सारे झमेले होंगे इसलिए वे सीधे तौर पर मीडिया के रोजाना व नीतिगत कार्यों को नहीं देख पायेंगे. सो, उनके हवाले से सारा कामधाम राव वीरेंद्र सिंह देखा करेंगे. जो सर्कुलर जारी हुआ है उसमें कहा गया है कि राव वीरेंद्र सिंह को संदीप वाधवा को असिस्ट करने की जिम्मेदारी दी गई है.

मतलब ये कि मीडिया का काम कहने को संदीप वाधवा देखेंगे लेकिन असल में राव वीरेंद्र सिंह देखेंगे और संदीप वाधवा पूरा जोर सहारा मीडिया में विदेशी पूंजी लाने में लगायेंगे. चर्चा है कि सहारा मीडिया के साथ इंग्लैंड के एक मीडिया हाउस का टाइअप होने जा रहा है. इस टाइअप के माध्यम से भारत में एक अंग्रेजी चैनल और बिजनेस चैनल सहारा मीडिया की तरफ से लांच किया जा सकता है. ऐसे ही सहारा के प्रिंट व टीवी के चल रहे बिजनेस के लिए विदेशी पार्टनर तलाशने पर जोर दिया गया है ताकि नगद पैसा सहारा के पास आ सके.

इन्हीं सब कारणों के चलते सहाराश्री ने उपेंद्र राय को सहारा के मीडिया सेक्शन से अप्रत्यक्ष तौर पर हटाकर सहारा समूह के भारत के कामधाम के सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी दी है. चूंकि उपेंद्र राय अपनी उर्जा मीडिया हेड होने के नाते पाते हैं, इसलिए बतौर एडिटर इन चीफ उनका नाम हर जगह जाता रहेगा, उनके कालम वगैरह छपते रहेंगे ताकि उपेंद्र राय की मार्केट में स्थिति पहले जैसी मजबूत बनी रहे. हालांकि सहारा के अंदर एक लाबी कोशिश में है कि उपेंद्र राय को मीडिया के कामधाम में किसी भी तरह से हस्तक्षेप करने से रोका जाए और उनका नाम भी अखबार आदि से हटवा दिया जाए. देखना है कि ये कोशिश सफल होती है या नहीं.

शंभूनाथ शुक्ला का मेरठ से नोएडा ट्रांसफर, फरवरी में रिटायर होंगे

वरिष्ठ पत्रकार और अमर उजाला, मेरठ में एक्जीक्यूटिव एडिटर के बतौर तैनात शंभूनाथ शुक्ला का तत्काल प्रभाव से तबादला मेरठ से नोएडा कर दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक उनका रिटायरमेंट अगले साल फरवरी में है. प्रबंधन उन्हें एक्सटेंशन देने के मूड में नहीं है. इस कारण उन्हें बाकी समय के लिए नोएडा अटैच कर दिया गया है.

शंभूनाथ लंबे समय से अमर उजाला के साथ हैं और कानपु, मेरठ, नोएडा समेत कई यूनिटों के सर्वेसर्वा रह चुके हैं. उधर, कुछ लोगों का यह भी कहना है कि मेरठ में स्थानीय संपादक के रूप में पदस्थ मृत्युंजय कुमार फ्रीहैंड होकर काम नहीं कर पा रहे थे, इसलिए उनके उपर तैनात शंभूनाथ का तबादला प्रबंधन ने कर दिया. शंभूनाथ के तबादले को लेकर जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं.

उधर, शंभूनाथ शुक्ला के करीबी लोगों का कहना है कि पत्रकारिता में कई दशकों से सक्रिय शंभू जी ने खुद अपना तबादला नोएडा मांगा था. उनके अनुरोध पर प्रबंधन ने उन्हें नोएडा बुला लिया. बताया जा रहा है कि रिटायरमेंट के बाद भी शंभू जी अमर उजाला से जुड़े रहेंगे और प्रबंधन उन्हें नई जिम्मेदारी देगा. लंबे समय तक कई अखबारों और कई शहरों में अखबारों के आपरेशंस के सारे कामकाज देखने वाले शंभूनाथ रिटायरमेंट के बाद दूसरे रोल में मीडिया में सक्रिय रहेंगे. इसके लिए उन्होंने खुद अपने स्तर पर फैसला लिया था.

इस क्रांतिकारी पत्रकार मयंक सक्सेना को सलाम कीजिए

Yashwant Singh : आज के समय में भी सच्चे पत्रकार हैं, जो न सिर्फ सच लिखते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सच के पक्ष में पूरे ताव से सड़क पर उतरते हैं… लव यू Mayank. और, मयंक जिंदाबाद. मुझे गर्व है आप पर. बड़े-बड़े नामधारी संपादकों-पत्रकारों से ज्यादा इज्जत मैं मयंक की करता हूं क्योंकि मयंक आज की मुर्दा पत्रकारिता और मुर्दा पत्रकारों के बीच में रहते हुए भी पूरी तरह जिंदा है.

मयंक-सा फिलहाल कोई नहीं… मयंक का लिखना, मयंक का बोलना, मयंक का कविता पढ़ना, मयंक का प्रेम करना, मयंक का आंदोलन करना.. मयंक का मनुष्यता के पक्ष में खड़े होना… सब लाजवाब होता है…

हम-आप कुछ करें न करें, कम से कम अपने समय के बेहतरीन लोगों को पहचान कर उन्हें भरपूर समर्थन तो दे ही सकते हैं.

धंधेबाज मीडिया मालिकों द्वारा रचित सीमा रेखा को फालो करते हुए और दिमाग-जुबान बंद रखकर नौकरी बजाते रहने वाले हमारे दौर के ढेरों पत्रकारों को यह मुगालता है कि वे महान हैं क्योंकि वे ज्यादा उम्र के हैं, या ज्यादा बड़े पद पर हैं, या ज्यादा बड़े ग्रुप में हैं, या ज्यादा बड़े बकचोद हैं, या ज्यादा बड़े लायजनर हैं, पर असल में वे दो कौड़ी के लोग हैं.

ये लोग अपनी चालाकी, कांइयापन और धूर्तता को अपनी महानता मानते हैं. लेकिन सच तो ये है कि, यह सब करके वे कब जनविरोधी हो जाते हैं, कब पत्रकारिता विरोधी हो जाते हैं, उन्हें खुद पता नहीं चलता. ऐसे लोगों को मयंक को सामने रखकर अपने भीतर झांकना चाहिए.

सच्चा-अच्छा-बड़ा पत्रकार वही होता है जो सच तो लिखे ही, सच के पक्ष में सड़क पर भी उतर जाए… सच के लिए लड़ते हुए सत्ता-सिस्टम से भी टकरा जाए… और, मयंक ऐसा ही है.

((नोट- पेट पालने के लिए पत्रकारिता में आए विचारविहीन-सरोकारहीन लोगों से अनुरोध है कि वे इस पोस्ट को न तो लाइक करें और न इस पर कमेंट करें.))

Chandramauli Pandey Hats off for Mayank bhai…..

Mohammad Anas Mayank Zindabad
 
Ashish Kumar 'Anshu' ese logon ko comment karte ya like karte paay jane par, aapki taraf se kya karyvayi hogi?
 
Dilnawaz Pasha Yashwant Singh भाई मयंक यहां एक्टिविस्ट के रोल में हैं…
 
Yashwant Singh Unhe mayank banne ke liye baadhya kar diya jaayega…
 
Satish Tyagi i m proud of mayank .
 
बी.पी. गौतम बहुत खूब … चेहरे का तेज़ और बात करने का अंदाज़ ही सब कुछ कह रहा है
 
Ashish Kumar 'Anshu' yadi unaki jeed ho ki YASHWANT banana hai fir?
 
Yashwant Singh Unhe etna aasaan vikalp nahi diya jaayega…
 
Yashwant Singh Mayank se abhi baat huyi. Police waale kayi baar unhe peet chuke hain… Bahut maara hai mayank ko. Andruni chote kaafi hain… Mai police brutality ki ninda karta hu… Mai aaj jantar mantar shaam ko jaaunga, mayank and other comrades ko support karne…
 
Mayank Saxena ज़िंदगी जीने के दो तरीके हैं…उसे बिता लीजिए…या उसे जी लीजिए…कुछ लोग पहला रास्ता चुनते हैं और कुछ लोग दूसरा…कुछ के पास रास्ता न चुनने का भी अधिकार है…ये हम सबका अपना निर्णय है…हर रास्ते के अपने फ़ायदे और नुकसान…मुश्किल और आसानी…
 
Yashwant Singh Mayank ji, es baar ke sangharsh pe ek diary numa kitaab likhiye taaki aapke gahantam anubhav saamne aa saken. Saath hi journalism ki duniya ke naye puraane loag soch vichar kar sake… Mere khayaal se diary likh daaliye.. Ye bada kaam karenge aap.
 
Rangnath Singh हां, यह संस्‍मरण जरूरी है।
 
Yashwant Singh Mayank ko gariyaate huwe abhi tak madan tiwari ka comment nahi aaya… Wait kar raha hu…
 
Vijay Jha · Friends with Sanjay Tiwari and 52 others
अब पुलिस कहेगा, "आन्दोलन कैसे हो >> कितना हो >> कहाँ हो >> ?"

तो बस हो गया आन्दोलन !
 
Chaitanya Chandan Mayank Saxena se maafi maangna chahta hun ki is mushkil ki ghari me main unke saath shaareerik roop se nahin hun, lekin unki khairiyat ki hamesha fikra lagi rahti hai. Mayank ko main jab se jaanta hun, dekha hai ki unke vichaar hamesha se krantikaari rahe hain. Wo kaafi sahasi aur prakrami vyakti hain. Hats off for mayank.
 
Rahul Kumar Yashwant Singh मयंक के लिए सम्मान तो दिल में है ही, अगर आप ’चू*’ शब्द का इस्तेमाल करना छोड़ देंगे तो क़सम से कहता हूं एक बदलाव लाने में आपका योगदान भी कमतर नहीं होगा… क्या ख़्याल है?
 
Prashant Kumaar Jo Tatasth Rahenge Waqt Likhega Unka Bhi Itihaas.
 
Yashwant Singh rahul kumar ji, सम्मान रखिए या अपमान रखिए, यह मुख्य चीज नहीं है. और, बदलाव लाने का ठेका भी कुछ लोगों को सौंप दीजिए, यह भी ठीक चीज नहीं है. हर किसी को मयंक जैसा होना चाहिए. बाकी, सबका अपना अपना अंदाजे बयां होता है. जरूरी नहीं कि मैं गालियों के साथ सहज फील करता हूं तो आप भी ऐसा करें… अपना अपना नजरिया है.. और इन छोटी मोटी चीजों से बड़े मकसद प्रभावित नहीं होते.
 
Rahul Kumar जिसे आप छोटी-मोट चीज़ कहकर चलता कर रहे हैं वो दरअस्ल मेरे ख़्याल में बड़े मक़सद को प्रभावित करता है. बहरहाल हम आपको काहे प्रवचन सुनाएंगे. हमें खटकता है सो हमने कह दिया. हमारी बात यहीं ख़त्म है. सविनय निवेदन था. ख़ैर.
 
Ravindra Ranjan shabaash mayank
 
Srikant Saurav यशवंत भाई की यही तो खासियत है. जब किसी ने बैर किया तो कह के उसकी लेते हैं. जो कोई दिल को भा गया तो सर-आँखों पर बिठा लेते हैं.
 
Srikant Saurav वह अरविन्द केजरीवाल हों,मयंक सक्सेना,दीपक शर्मा,यशवंत सिंह ,अन्ना हजारे,किरण बेदी,आईपी एस अमिताभ,यूपी के बर्खास्त सिपाही सुबोध यादव हों या कोई और. ऐसे तमाम शख्स भारत के सच्चे सपूत हैं जो बिरले पैदा होते हैं.
 
Harishankar Shahi हो सकता है वह ऐसे हों. लेकिन अगर ऐसा होने ऐसे होने का अहं इनमें और इनके साथियों में भर देता है. तो फिर ऐसा होना कोई बहुत खास होना नहीं होगा…(केवल पेट पालने सोचकर आया ही नहीं)
 
Srikant Saurav ऐसे ही लोग इतिहास बनाते है. जीते जी भले ही इन्हें परेशान किया जाता रहे. आलोचना मिलती है. पर अंततः अनुसरण भी इन्हीं का किया जाता है.
 
Mayank Saxena Harishankar Shahi से सहमत…मैं बिल्कुल खास नही हूं…और खिलाफ़ भी हूं खास हो जाने के…हां ये सच है कि केवल पेट पालने के लिए पत्रकार नहीं बना था क्योंकि उसके तो तमाम तरीके और भी हैं…
 
Srikant Saurav भूख किसी भी मनुष्य की नितांत ही मौलिक जरूरत है. और अपनी हिस्से व पेशे की ईमानदारी रखते हुए कोई पेट भरने के लिए थोड़ी-बहुत बेईमानी भी कर ले तो इसमें बुरा क्या है.
 
Harishankar Shahi Mayank भाई "मैं" ही तो बहुत खास होता है. इस खास के खिलाफ होना भी बहुत खास होता है….पेट पालने वालों को तो फिर भी क्षमा किया जा सकता है, लेकिन बहुत कुछ उड़ान पालने वाले ही अब इस पेशे की डोरी या लगाम थामे हैं…जो बड़ा अजीब है..पेट पालने वालों से ज्यादा अब स्वर्ण रथ पलने वालों को पालने का दौर बना दिया गया है.
 
Mayank Saxena श्रीकांत जी…देखिए अहम बात ये है कि तमाम ईमानदारी के रास्ते हैं जो आपका पेट भर देंगे…हां अगर आपकी आकांक्षाएं इससे आगे की हैं, तो आपका पेट कुछ भी नहीं भर सकता…Nature is sufficient for man's need…not for greed….
 
Mayank Saxena Harishankar Shahi भाई…एक आसान उपाय है…अगर हम अपनी आवश्यक्ताओं को सीमित कर लें तो उड़ान और बेईमानी दोनों से ही बच सकते हैं…और कोई रास्ता नहीं है…
 
Srikant Saurav यहाँ तो समाजसेवी का मुखौटा लगाये ऐसे-ऐसे स्टार एक्टिविस्ट हैं जो लोगों की सेवा करते-करते कब खुद की सेवा में लीं हो गए. उन्हें खुद ही पता नहीं चला.
 
Harishankar Shahi Mayank Saxena भाई "हम" तो सीमित वाले ही लोग हैं. लेकिन बात उस कमान की है जो बकैती करने वाले असीमित लोगों के हाथ में हैं.
 
Mayank Saxena सहमत…लेकिन कई ऐसे भी हैं जो आज भी ईमानदार हैं…आपको तय करने होंगे खुद अपने रास्ते…खुद अपने विकल्प चुनने होंगे…
 
Mayank Saxena Harishankar Shahi भाई थोड़ा रुकिए…उनका राज भी जाएगा…हर चीज़ खत्म होने के लिए ही बनी है…
 
Harishankar Shahi Mayank Saxena भाई जाने दीजिए जाता रहे उनका राज लेकिन जो उसके बाद आयेंगे वह कितने सही होंगे यह भी तो प्रश्न बनेगा. कुछ लोग क्रांति को भी फैशन मानकर दूसरे को कमतर बताते रहते हैं. अगर ऐसे लोग कमान पा गये तब जाने कैसी अवस्था होगी.
 
Mayank Saxena लेकिन सवाल ये है न कि आप बदलाव को रोक नहीं सकते…लड़ाई जारी रहे…जब जब आपको लगे कि निजाम गलत हाथ में है…
 
Srikant Saurav मयंक भाई,आज हम पूरी तरह उपभोक्तावादी दौर में जी रहे हैं. हमारे आस-पास ऐसा बाजारू माहौल पैदा कर दिया गया है जहाँ मूतने के भी पैसे लगते है. बेहद कठिन है खुद को बेईमानी से बचा पाना. क्योंकि हर बेईमानी की शुरूआत पेट भरने की जुगत से ही शुरू होती है.
 
Mayank Saxena कठिन तो है…पर आसान तो कुछ भी नहीं…कठिन भी कर के देखने में क्या हर्ज है…
 
Srikant Saurav हाँ इतने पर भी ईमानदारी बरक़रार रहे इसके लिए रोजाना की प्रैक्टिस करनी पड़ेगी.
 
Srikant Saurav मेरे गाँव के एक चाचा अक्सर एक कहावत कहते हैं 'घर में अन्न हो तो भुखना(उपवास) भी अच्छा लगता है.' इण्डिया गेट पर पहुँचने वाली भीड़ में अधिकांश इस 'खाए-पिए, अघाए' संस्कृति का हिस्सा है. वरना दिहाड़ी छोड़कर कितने मजदूर समाज सेवा के लिए आए हैं. इसकी भी जाँच कर ली जाए.
 
Harishankar Shahi निजाम सही हाथों में रहे इसके लिए हाथ तपे होने चाहिए. ठन्डे हाथों को हमेशा दस्ताने चाहिए होते हैं.
 
Neeraj Narwar sachche patrkar jinda to hai par nagny hai
 
Manoj Gautam aese patrakar bahut kam hain
 
Mohit Khan The best thing Mayank has that he is neither coward nor biased & says what he feels like….. he is just awesome when writing on anything…. keep it up bhai:-)
 
Myank Jogi love u myank ji hm aapke sath hai

सुनीता भास्कर अपुन तो लाईक कर सकता है न. गुरु???

Man Mohan Tripathi sahi hai guru, aap v mayank se kam nahi hao bhatt ji

Mayank Mishra mayank bhai ko mayank mishra ka saadar pranam……..||||| patrakarita ki alakh jagaye rakhiye…..

Gayatree Arya sahi kaha kam se kam aise logo ko samarthan to de hi sakte hain…….!

Ashish Awasthi Mayankwa rocks !!!

Wahid Naseem salaam

Mukhtiar Happy Singh balle !

Shashank Gupta mujhe naaj hai…

Mulchand Khichi mujhe garv hai

Vivek Tripathi जज्बे को सलाम ……………….See Translation

Javed Raju bahut khub

Kishor Verma Ohh ap mhan ho bhai

Ravi Babul जी…… सैल्यूट है मेरा…..

Keshav Bhatt nice……..


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. यशवंत को फेसबुक पर www.facebook.com/yashwantbhadas और www.facebook.com/yashwant.bhadas4media के जरिए पकड़ा जा सकता है.

मैं व्यर्थ ही ‘कई सम्मान से सम्मानित महान साहित्यकार विभूति नारायण राय’ के खिलाफ लिखता-बोलता हूं

Sanjeev Chandan : कभी-कभी लगता है कि मैं व्यर्थ ही "कई सम्मान से सम्मानित महान साहित्यकार विभूति नारायण राय' के खिलाफ लिखता -बोलता हूँ। सूत्रों की माने तो तब जबकि युवाओं की बेरोजगारी चरम पर है उन्होंने अपने वि वि के सहायक कुलसचिव पद पर होने वाला साक्षात्कार इसलिए टलवा दिया कि आगे उसे पुनः विज्ञापित कर वे एक बेरोजगार युवा को नियुक्त कर सकें और उसकी शादी के मार्ग में आने वाली बाधा दूर कर सकें।

सूत्र बताते हैं कि स्क्रूटिनी कर्ता नागपुर के एक पूर्व प्रोफ़ेसर ने उसका नाम साक्षात्कार के योग्य नहीं पाया था। इससे युवक को अपना दामाद बनाने के लिए तत्पर एक प्राध्यापक स्क्रूटिनीकर्ता से नाराज हो गए। विभूति ने उन प्राध्यापक महोदय को दो साल पहले ही प्रोफ़ेसर बनाया है और अब उनके घर और बेटी की भी चिंता कर रहे हैं– है न महानता ! अब भाई लोग इसमें भी विभूति, प्रोफ़ेसर और युवक की जाति देखने लगें , उनकी कुण्डली मिलाने लगें तो यह उनकी निकृष्टता होगी। निकृष्ट तो वे तब भी थे जब ' छिनाल प्रकरण' के दौरान विभूति के पक्ष में बाहर -भीतर सक्रिय लोगों की वे जाति देखते रहे।

विभूति महान हैं , तो हैं, मुझे और मेरे जैसों को मान लेना चाहिए। हम व्यर्थ ही कुलसचिव महोदय की चिंता में मरे जा रहे हैं, जो फरवरी में रिटायर हो रहे हैं और अपने अमरावती कनेक्शन से 'छिनाल प्रकरण ' के दौरान विभूति की जान बचाने की कीमत के तौर पर अपने बेटे की नियुक्ति इस पद पर चाह रहे थे और सूत्रों के अनुसार बेरोजगार युवक का नाम स्क्रूटिनी से हटवाने की साजिश में शामिल थे। विभूति अपने ऊपर किये गए उपकार का बदला उन्हें जरूर चुकायेंगे . उन्होंने क्या अपने ऊपर पी एच डी करने वाली महिला के पति को प्रोफ़ेसर नहीं बनाया है ! क्या अपने किताब का असमिया अनुवाद करने वाले को उन्होंने सहायक कुलसचिव नहीं बनाया है …! विभूति कृतज्ञ है, विभूति महान हैं, हम जैसे उनके विरोधी ही उनके खिलाफ व्यर्थ साजिश करने में लगे रहते हैं। जाते साल में मेरा आत्मज्ञान कैसा लग रहा है आपको ….. देर आयद दुरुस्त आयद ……

संजीव चंदन के फेसबुक वॉल से साभार. लेफ्ट अंबेडकराइट विचारधारा रखने वाले संजीव चंदन वर्धा में ही रहते हैं. उनके संपर्क 09850738513 के जरिए किया जा सकता है. फेसबुक पर उन्हें www.facebook.com/sanjeev.chandan के जरिए पा सकते हैं.

आवारा फक्कड़ घुमक्कड़ सेवा साधु संत महंत उर्फ रामेश्वर पुरी से एक मुलाकात (वीडियो इंटरव्यू)

गया था गाजीपुर. अपने गांव. लौटते वक्त एक दिन बनारस में रुका. महंत रामेश्वर पुरी से मुलाकात हुई. एक मित्र ले गए थे मिलाने. मैंने पहले ही बता दिया था कि मैं नास्तिक हूं. आडंबर, पाखंड, दर्शन आदि से दूर रहता हूं. हां, स्प्रिचुवल जरूर हूं. उस सुपर कंप्यूटर में भरोसा करता हूं जो यूनीवर्स, स्पेस, गाड पार्टिकल्स आदि इत्यादि को मैनेज करता है और जिस तक पहुंचने की कोशिश तन-मनधारी मानुष लोग कर रहे हैं. बनारस में काशी विश्वनाथ वाली पतली-पतली गलियों के मुंह पर ढेर सारे पुलिसवाले तैनात रहते हैं.

इन्हीं में से एक गली के जरिए घुसते हुए अन्नपूर्णा मठ मंदिर में प्रवेश किया. भूतल पर मंदिर में दर्शन के लिए श्रद्धालुओं-दर्शनार्थियों की कतार, उपर प्रथम तल पर महंत रामेश्वर पुरी विराजमान. शुरुआती परिचय के बाद बातचीत शुरू हुई तो महंत जी जोरदार आदमी लगे. उनसे बातचीत को तब रिकार्ड करना शुरू किया जब उन्होंने अपने आवारगी और फक्कड़पन के बारे में बताने लगे. फक्कड़ कौन होता है, इसकी परिभाषा सुनकर आनंद आया. फिर बातों को सिलसिला चला तो रुका नहीं. बातों ही बातों में हम लोगों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर लिया और महाकुंभ में मिलने का तय करके विदा हुए.

महंत जी से जब मैंने बताया कि मैं भी संन्यास के बारे में सोच रहा हूं तो उन्होंने कई प्रश्न – प्रति प्रश्न किए. मेरा यही कहना था कि मैं बहुत जल्द चीजों से उब जाता हूं और नया करने के लिए बेचैन हो उठता हूं.  अब तक सबसे लंबा जो प्रयोग, काम किया वह भड़ास ही है. लगभग पांच साल हो गए. दैनिक जागरण और अमर उजाला की नौकरी इसलिए दशक भर से ज्यादा कर पाया कि हर साल दो साल में शहर बदलता रहा, जिससे मन लगा रहा. दिल्ली में तो स्थिर होकर भड़ास भड़ास खेलने का काम लगातार पिछले पांच साल से हो रहा है.

अब तन-बदन में घुमक्कड़ी और अध्यात्म की अनोखी दुनिया में रमने, शामिल होने की उत्तेजना है. संभव है, वहां भी उब जाऊं, लेकिन अगर अभी मन कर रहा है वह सब करने का तो कर लेना चाहिए. बात आई घर परिवार की जिम्मेदारी आदि को लेकर तो मेरा जवाब था कि मेरा पैशन ही प्रोफेशन हो जाता है और उसी से जीने खाने भर जो मिल जाता है उसमें मेरा परिवार भी चल जाता है. परिवार केंद्रित होकर न कभी जिया और न सोचा, इसी कारण नए प्रयोग कर सका, कर सकूंगा. हालांकि ये सब बातचीत वीडियो इंटरव्यू का पार्ट नहीं है पर आप लोगों को इसलिए बताया ताकि बाबाओं के वीडियो इंटरव्यू पर नाक-भौं न सिकोड़ें. महंत जी से तो मेरी दोस्ती हो गई है. उनसे मुलाकात बात होती रहेगी. वैसे भी मुझे एक गुरु की तलाश है. देखता हूं मेरा गुरु कब मिलता है मुझे. फिलहाल आप महंत रामेश्वर पुरी से बातचीत का आनंद लीजिए. नीचे वीडियो लिंक है.

-यशवंत

एडिटर, भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

वीडियो लिंक

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/650/interview-personality/annapurna-math-mandir-varanasi-ke-mahant-rameshwar-puri-se-ek-mulakat.html

”बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता… और यही इसकी तार्किक परिणति है”

: एक अनाम बलात्कृता का बयान : बलात्‍कार इसलिए होते हैं क्‍योंकि अधिकतर लोगों को इसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता।  ऐसा कहना कि बलात्‍कार की शिकार औरतें इसे समझती हैं, उनके बारे में कुछ ज्‍यादा ही बड़ी राय बना लेने जैसा होगा। इसका तात्‍कालिक असर बस एक गहरा और अदृश्‍य घाव है। सालों तक काउं‍सलिंग के बावजूद जो दर्द देता है। एक हदस सी बनी रहती है। इसके आगे दुनिया की सब ताकतें, इंसानी हों या रूहानी, छोटी पड़ जाती हैं। शायद ही कभी इस अपराध की शिकायत दर्ज होती होगी। औरतों को मजबूत बनाने के बजाय हमारा कानूनी तंत्र इतने कम मामलों में सज़ा सुनाता है कि वह खुद सबसे बड़ा अपराधी बन जाता है।

ऐसा अपराध करने वाले, यानी बलात्‍कारी भी, बलात्‍कार के बारे में उतना ही कम या बराबर जानते हैं जितना कि पीडि़त। वे गिरफ्तारी से, लोगों की नज़र से, शर्मिंदगी से बच निकलते हैं, और यही बात उनके मनोविकार को बढ़ावा देती है। शायद वे जानते हों, या शायद नहीं भी, कि बलात्‍कार सेक्‍स का नहीं, दरअसल सत्‍ता का मसला है।

कानून बनाने वालों को नहीं पता कि ऐसे मामलों में क्‍या करना है। दुनिया की सबसे प्रबुद्ध सरकारें भी बलात्‍कार की सबसे कम सज़ा सुनाती हैं।

मीडिया इसे लेकर उतना ही उत्‍तेजित रहता है जितना और चीज़ों के बारे में। लेकिन उसकी सारी रिपोर्टिंग, सारा एक्टिविज्‍म किसी काम का नहीं है, उससे कुछ नहीं होगा क्‍योंकि वह जल्‍द ही दूसरे मसलों में उलझ जाएगा।

प्रदर्शनकारी बलि का बकरा तलाश कर संतुष्‍ट हो जाते हैं। कभी-कभार उन्‍हें कामयाबी मिल जाती है, अकसर नहीं भी। वे खराब कानून व्‍यवस्‍था का मुद्दा उछालते हैं और उन पर आंसू गैस छोड़ दी जाती है क्‍योंकि सरकार को लगता है वे अशांति फैला रहे हैं।

बलात्‍कार की शिकार जानती हैं कि उनके ज़ख्‍म कभी नहीं भरने वाले (बशर्ते वे ज़ख्‍मों के चलते दम न तोड़ दें या फिर खुदकुशी न कर बैठें)। बलात्‍कार उनके ऊपर, उनके रिश्‍तों पर, बच्‍चों पर कितने तरीकों से असर डालता है, यह समझने में ही उन्‍हें बरसों लग सकते हैं। अपराधी को मिला दंड उनके लिए सांत्‍वना पुरस्‍कार जैसा होता है। यह बात अलग है कि अपराध के आंकड़ों के मुताबिक कुछ साल ऐसे रहे जब दर्ज कराए गए मामलों में आधे से कम में ही सज़ा हो पाई।

कुछ ज्‍यादा गुस्‍साए हुए लोगों का मानना है कि फांसी की सज़ा इसका एक हल हो सकती है, लेकिन यह बलात्‍कार के खिलाफ कारगर हो, ऐसा नहीं है। मसलन, एक चार साल की बच्‍ची का बलात्‍कार आप नहीं रोक सकते यदि बलात्‍कारी परिवार के भीतर ही बैठा हो क्‍योंकि ऐसी हालत में उस बच्‍ची को शिकार होने से कोई नहीं बचा सकता। फांसी की सज़ा ऐसे किसी आदमी को नहीं रोक सकती जो बरसों की दमित यौन इच्‍छा और यौन शिक्षा के अभाव के चलते महिलाओं को उपभोग की वस्‍तु के रूप में देखता हो। यह मनोविकार हालांकि सामाजिक रूप से हमारे यहां स्‍वीकार्य है। भले ही उस आदमी को आप जेल भेज दें, लेकिन दरअसल उसे अंदाज़ा ही नहीं है कि वह किस किस्‍म का अपराध कर रहा था। दुर्भाग्‍य से उसके बाद की पीढ़ी के आदमी और औरत भी इस बात को नहीं समझ पाएंगे। चूंकि इंसाफ शायद ही कभी होता दिखता है, इसलिए फांसी पर लटकाना किसी भी दूसरी सज़ा के बराबर ही साबित होगा। कुछ लोग शायद इस बात से खुश हो सकते हैं, भले ही हमें एक भी राक्षस से छुटकारा मिले या न मिले।

महिलाएं अपने बलात्‍कारी बेटों, पिताओं, और कभी-कभार पतियों को बचाती ही रहेंगी। वे जानती हैं कि परिवार के भीतर एक दुराचारी आदमी के खिलाफ खड़ा होना सभी के लिए सब कुछ को हमेशा के लिए बदल देगा, और उन्‍होंने अपने प्रशिक्षण से जो सीखा है वह दरअसल इसका ठीक उलटा है। वो यह, कि लंबी दौड़ में चीज़ों को नज़रंदाज़ करना, उनसे मुंह मोड़े रखना ही शायद सब के लिए बेहतर है- और शायद ऐसा ही है भी। और इस तरह, अन्‍याय का दुश्‍चक्र पूरा हो जाता है।

इस दुनिया में बेशक ऐसे आदमी हैं (इस देश की बात छोडि़ए) जो शायद जानते हैं कि अपनी बीवियों और बेटियों के मुकाबले अपनी कारों और पालतू जानवरों के साथ बेहतर व्‍यवहार कैसे किया जाता है।  

बलात्‍कार कभी रुक नहीं सकता… और यही इसकी तार्किक परिणति है।

लेखिका ने अपना नाम नहीं उजागर किया है. वे बलात्कार की दरिंदगी को भोग चुकी हैं. साभार- काफिला

इस सड़ी व्यवस्था को चाहिए ढाई किलो का घूंसा

एक फिल्म में सनी दियोल का डायलॉग खूब चला था 'तारीख पर तारीख'… यह संवाद देश के लोगों ने इसलिए पसंद किया था क्योंकि यह संवाद आम भारतीयों के जीवन का हिस्सा बन गया है। देश की न्याय व्यवस्था बस 'तारीख पर तारीख' है। ऐसी व्यवस्था पर सनी दियोल का ढाई किलो का घूंसा भी अच्छा लगेगा, क्योंकि हम सब देश की सडिय़ल व्यवस्था से आक्रांत हैं और इस सडिय़ल व्यवस्था पर घूंसा चलाने की हमारी औकात नहीं है। आप देखिए न, दिल्ली की सड़कों पर चलती हुई बस में वीभत्स तरीके से किसी लड़की के साथ दुराचार किया जाता रहा और हम इस व्यवस्था का एक बाल भी बांका नहीं कर पाए। एक सिपाही मारा गया तो इतना हल्ला मचा। जबकि सिपाही अपनी शारीरिक वजहों से मारा गया, लेकिन इस पर मचाया गया बावेला देश का मौलिक चरित्र है।

यह नहीं होता तो दुनिया को कैसे पता चलता कि एक युवती के साथ हुए बलात्कार की लोमहर्षक घटना पर साबित हुए सत्ताई नाकारेपन को लेकर भारतवर्ष में किस तरह झूठ बोला जाता है और उसे परोसा जाता है। इस झूठ को परोसने के लिए कैसे-कैसे आडम्बरी चेहरे आ रहे हैं सामने, वह देख रहे हैं न। अब पीडि़त छात्रा को सरकार ने आनन-फानन एयर एम्बुलेंस के जरिए सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल भेज दिया। आप किसी भ्रम में न रहें, यह युवती के इलाज के लिए नहीं बल्कि यह सब आंदोलन का इलाज करने के लिए है। घटना को लेकर देशभर में व्याप्त जन-आक्रोश का इलाज करने के लिए है। जब झूठ और भ्रष्टाचार की बुनियाद पर टिकी केंद्र की सरकार सिपाही की हत्या का कुचक्र फैलाने में कामयाब नहीं हो पाई और तथाकथित हत्याकांड प्रामाणिक तौर पर टांय-टांय-फिस्स हो गया तो फौरन युवती को सिंगापुर भेजने की जरूरत याद आ गई। सरकार नई-नई पेशबंदियां कर रही है, देशवासियों को इसके बारे में सतर्क रहने की जरूरत है।

युवती को सिंगापुर के लिए बड़े ही गोपनीय तरीके से रवाना करने के बाद सफदरजंग अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक बीडी अथानी जिस तरह युवती के स्वास्थ्य की अद्यतन जानकारियां दे रहे थे, उसे आप गौर से देखते सुनते और गुनते तो आप इसे कल रात ही युवती की मौत के बुलेटिन के रूप में देख लेते। ईश्वर करे, युवती सिंगापुर से सही-सलामत लौटे और इस लोमहर्षक आपराधिक वारदात का कानूनी अध्याय आगे बढ़ सके। लेकिन हृदय विदारक घटना के बाद जिस तरह सरकार अपना आचरण दिखा रही है, उससे पूरी दुनिया को यह भ्रम हो गया है कि केंद्र की सरकार बलात्कारियों के साथ है या भुक्तभोगी के साथ? जो घटना प्रामाणिक है, उसकी जांच और प्रति-जांच की जरूरत ही क्या है? यह कोई राजनीतिक मसला था कि जांच की जांच के लिए जांच आयोग का गठन किया जा रहा है। सरकार समझती है कि वह देश के लोगों को झांसा पट्टी दे रही है, जबकि सरकार अपनी असलियत का पर्दाफाश करा रही है। अगर देश की जनता को जरा भी शर्म होगी तो समय आने पर ऐसी सरकारों, ऐसे नेताओं और ऐसी पार्टियों का हिसाब-किताब चुकता कर लेगी।

अपराध पर परदा डालने और न्याय की मांग करने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक कुचक्र में सरकार के शामिल रहने का उदाहरण भारतवर्ष में ही मिल सकता है। इस घटना के बाद तो सड़कों पर यह चर्चा आप सुन लेंगे कि अगर अमेरिका में ऐसी घटना होती और नाराज नागरिक व्हाइट हाउस घेर लेते तो अमेरिकी राष्ट्रपति क्या करते! अमेरिकी राष्ट्रपति बाहर आते, नाराज लोगों से बातें करते, उनके साथ शोक में शरीक होते, आंसुओं से रोते और अपनी प्रशासनिक नाकामियों को कबूल करते हुए अमेरिकी जनता से माफी मांगते। लेकिन यह भारतवर्ष में नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री या नेता का नैतिक रूप से मजबूत होना सबसे अधिक जरूरी है। नैतिकता से हीन लोगों की जमात भारतीय लोकतंत्र की अलमबरदार है, तो उनसे आप नैतिक और साहसिक कदम की अपेक्षा करने की बेवकूफी कैसे कर सकते हैं! हमारे नेता इतने छद्मी और आडम्बरी हैं कि उन्हें जनता के बीच आना सम्मान के खिलाफ लगता है।

दरअसल, भारतवर्ष का नेता हीनभावना का शिकार है, वह कुएं का मेढ़क है और कुएं को ही अपना संसार मानता है। उसी कुएं में गंदगी फैलाता है, उसी गंदगी को खाता है और उसी में अन्य मेढ़कों के साथ सियासत करता है। बाहर झांके तब तो उसे पता चले कि व्यक्तित्वों का कैसा आभामंडल है! यूपी की छात्रा के साथ दिल्ली में जघन्य अपराध करने वाले लोग जिस चरित्र और स्तर के हैं, ऐसे ही लोग अधिकांशत: जब संसद में भी हों तो कैसा व्यक्तित्व और कैसा चरित्र। यह बातें सामान्य नाराजगी में नहीं कही या लिखी जा रही हैं, यह बातें अब दस्तावेजी प्रमाण की तरह हैं। वैसे, नेताओं का व्यवहार अपने आप ही ऐसी दुश्चरित्रता का प्रमाण दे देता है। राजपथ और जनपथ पर प्रदर्शन कर रही महिलाओं पर जब लाठियां बरस रही थीं, तब यही प्रमाण तो देशवासियों के जेहन पर मुहर लगा रहा था…

वरिष्‍ठ पत्रकार प्रभात रंजन दीन के फेसबुक वॉल से साभार.

एबीपी समूह लांच करेगा पंजाबी न्‍यूज चैनल

एबीपी न्‍यूज समेत तीन चैनलों का संचालन करने वाला आनंद बाजार पत्रिका समूह अब एक और चैनल लांच करने जा रहा है. एबीपी अब पंजाबी समूह में रीजनल चैनल लांच करने जा रहा है. यह इस समूह का तीसरा रीजनल चैनल होगा. इसके पहले एबीपी समूह एबीपी आंनदा नाम से बंगाली तथा एबीपी माझा नाम से मराठी चैनल का संचालन कर रहा है. जबकि एबीपी न्‍यूज इस समूह का नेशनल चैनल है. बताया जा रहा है कि यह समूह के विस्‍तार योजना की रणनीति का हिस्‍सा है.

सूत्रों का कहना है कि अगले साल की शुरुआती महीनों में इस चैनल को विधिवत लांच कर दिया जाएगा. इसके लिए भर्ती प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है. उल्‍लेखनीय है कि बड़े अखबारों की तरह चैनलों में भी राज्‍य तथा भाषा स्‍तर पर स्‍थापित होने की परम्‍परा बढ़ रही है. इसी का परिणाम है कि तमाम चैनल रीजनल स्‍तर पर कई भाषाओं में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. पंजाब में चैनल का मार्केट अभी पूरी तरह खाली है. पीटीसी न्‍यूज समेत कुछेक अन्‍य चैनलों को छोड़ दें तो इस भाषा में न्‍यूज चैनलों के लिए बाजार मौजूद है. 

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ के हालात खराब, सैलरी को लेकर कर्मचारी भी नाराज

: पिछले पांच महीनों से कटी है बिजली : बसपा शासन काल में बसपा मुखपत्र माना जाने वाला जनसंदेश टाइम्‍स अखबार के हालात बहुत ही खराब हैं. हालात तो सभी यूनिटों के खराब हैं लेकिन ताजा खबर लखनऊ से है. बताया जा रहा है कि यहां पिछले कई महीने की सैलरी अब तक कर्मचारियों को नहीं मिली. उन्‍हें एडवांस के तौर पर कुछ कुछ करके पैसे दिए जा रहे हैं. नवम्‍बर महीने की सैलरी का इंतजार करते करते कर्मचारियों का सब्र भी टूटने लगा है. कारण अगर उन्‍हें नवम्‍बर माह की सैलरी नहीं मिली तो नया साल निश्चित रूप से बिगड़ने का अंदेशा जताने लगा है.

खबर है कि एडिटोरियल के लोग तो अभी विरोध करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहे हैं पर मशीन पर काम करने वाले कर्मचारियों का सब्र जवाब दे गया है. अगर सूत्रों की खबर पर भरोसा करें तो सैलरी ना मिलने से नाराज कर्मचारियों ने मशीन चलाने से इनकार कर दिया था. लगभग दो घंटे के हड़ताल के बाद प्रबंधन के लोगों के समझाने तथा आश्‍वासन देने के बाद कर्मचारी दुबारा मशीन चलाने को तैयार हुए. खबर है कि इन लोगों ने चेताया है कि अगर नए वर्ष से पहले सैलरी नहीं मिली से तो ये लोग मशीन को फिर से ठप कर देंगे.

वैसे भी भारी बिल बकाया होने के चलते अखबार के कार्यालय और प्रिंटिंग यूनिट की बिजली काट दी गई है. किसी तरह जनरेटर चलाकर काम चलाया जा रहा है. फोन और फैक्‍स भी जवाब दे चुके हैं. आफिस की लीज लाइन भी कटी हुई है. बताया जा रहा है कि पिछले कई दिनों से अखबार भी ठीक से प्रकाशित नहीं हो पा रहा है. कब तक अखबार इस तरीके से चलेगा बताया नहीं जा सकता. अखबार में ज्ञानेंद्र जी के इस्‍तीफा देने के बाद से किसी ने यहां पर संपादक के रूप में ज्‍वाइन भी नहीं किया. सीईओ का नाम ही संपादक के रूप में जा रहा है. हालात देखकर लगता है कि जल्‍द ही इस अखबार के कार्यालय पर ताला लग जाएगा.

प्रेस क्‍लब रिपोर्टर्स कप चैम्पियन बनी प्रभात वार्ता की टीम

कोलकाता। प्रभात वार्ता की टीम ने गत दो वर्षों की चैम्पियन टीम प्रतिदिन को हराकर प्रेस क्लब रिपोर्टर्स 2012-13 कप पर कब्जा कर लिया। कलकत्ता रेफरीज एसोसिएशन ग्राउंड पर शुक्रवार को आयोजित इस फुटबाल प्रतियोगिता में विभिन्न मीडिया समूहों की 16 टीमों ने भाग लिया। प्रभात वार्ता की टीम ने इस प्रतियोगिता में पहली बार भाग लिया और अपनी खेल प्रतिभा से सभी को चकित करते हुए विजेता के रूप में उभरी।

फाइनल में गत दो वर्षों की विजयी टीम प्रतिदिन की ओर से गोल करने के लिए जी-तोड़ कोशिश की गई लेकिन प्रभात वार्ता के गोलरक्षक राजेश यादव रुपी दीवार के भेदने में नाकाम रही। कोलकाता के पत्रकारों के लिए आयोजित इस प्रतियोगिता में शुरू से ही प्रभात वार्ता की टीम ने अपना दबदबा बनाये रखा। प्रतियोगिता के पहले मुकाबले में चैनल10 को एक गोल से पराजित कर टीम ने अपनी अपका इरादा जाहिर कर दिया था। दूसरे मैच में प्रयाग की टीम को पेनाल्टी शूट आउट में हराने में भी गोलकीपर राजेश यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जीतेश गुप्त ने सनसनाते हुए गोल दागकर विरोधी टीम के गोलकीपर को हतप्रभ कर दिया।

प्रभात वार्ता टीम के सदस्यों में कंचन राज मिठौलिया, उपकप्तान लोकनाथ तिवारी, अशोक बोस, अमित तिवारी, हृदयनारायण सिंह, गोलरक्षक राजेश यादव, जीतेश गुप्त, अमित मुखर्जी और शुभ मालिक शामिल थे। इस प्रतियोगिता की मुख्य प्रायोजक कोल इंडिया लिमिटेड थी। कोलकाता प्रेस क्लब खेल समिति के संयोजक राकेश दुबे ने विजयी व उपविजेता टीम को बधाई दी तथा खेल के सुचारु तौर पर सम्पन्न करने में सहयोग के लिए सभी को धन्यवाद दिया।

हिंदुस्तान के नोएडा ब्यूरो में फिर घमासान

एक खबर मेल के जरिए भड़ास के पास आई है. इसकी सत्यता को लेकर कोई दावा नहीं किया जा सकता क्योंकि अंदरखाने चलने वाले वाद-विवाद की सच्चाई के संबंध में प्रमाण कम ही मिल पाते हैं. पर यह भी सच है कि आग वहीं है जहां धुआं है. अगर संबंधित पक्षों को कुछ कहना या बताना हो तो वे मेल कर सकते हैं या नीचे दिए गए कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं. -एडिटर, भड़ास4मीडिया

रिपोर्टरों के लिए काल बन चुके हिंदुस्‍तान, नोएडा के न्‍यूज एडिटर सुनील द्विवेदी और ब्‍यूरो चीफ चेतन आनंद के बीच लड़ाई हो गई. इस बार लड़ाई का कारण नोएडज्ञ के सेकेंड इंचार्ज महकार सिंह ढिल्‍लन बने हैं. सुनील द्विवेदी ऑफिस और व्‍यक्तिगत काम महकार ढिल्‍लन को बताते हैं. ऑफिस के कामकाज में दखल से चेतन आनंद को परेशानी हो रही थी. पूरे ब्‍यूरो में बात हो रही है कि सुनील अब महकार को ब्‍यूरो चीफ बनाना चाहते हैं.

चार दिसम्‍बर को सुबह की मीटिंग में चेतन आनंद ने इसका विरोध किया, जिस पर सुनील द्विवेदी और चेतन आनंद के बीच जमकर विवाद हुआ. चेतन आनंद बीमारी की छुट्टी लेकर चले गए. सुनील द्विवेदी ने अपने सरपरस्‍त एडिटर प्रताप सोमवंशी से शिकायत की. बताया कि चेतन आनंद ने उनके साथ बदतमीजी की है. इस पर प्रताप सोमवंशी ने चेतन आनंद को बुलाया और हफ्ते की फोर्स लीव पर भेज दिया. तब से लगातार चेतन आनंद की छुट्टियां बढ़ाई जा रही हैं. सुनील द्विवेदी और प्रताप सोमवंशी ही चेतन आनंद को नईदुनिया से लेकर आए थे.

इतना ही नहीं चेतन आनंद नईदुनिया में सब एडिटर थे लेकिन सुनील द्विवेदी की सिफारिश पर सीधे चीफ सब एडिटर भर्ती किया गया. गाजियाबाद का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया. नोएडा आने के बाद सुनील द्विवेदी ने महकार ढिल्‍लन को भी अमर उजाला से लाकर हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन करवाया. इसी कारण महकार को ब्‍यूरो चीफ बनाने की जुगत में हैं. करीब 16 महीने पहले सुनील ने नोएडा में ज्‍वाइन किया. इन्‍हीं की वजह से अब तक लगातार लोग हिंदुस्‍तान छोड़ कर जा रहे हैं. चेतन आनंद इस कड़ी में बारहवें व्‍यक्ति होंगे.

दैनिक ट्रिब्यून के नए संपादक संतोष तिवारी के बारे में कुछ बातें

चार एडीशन वाले देश के सर्वाधिक पुराने अखबार दैनिक ट्रिब्‍यून में अब रिपोर्टिंग की तूती बजेगी। हालांकि नये सम्‍पादक संतोष तिवारी अपना कामधाम पहली जनवरी-13 से सम्‍भालेंगे, लेकिन उन्‍होंने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। ट्रस्‍ट–स्‍वामित्‍व से निकलने वाले देश के प्रमुख तीन अखबारों में ट्रिब्‍यून का नाम दैनिक हिन्‍दू के बाद है। खालिस पत्रकारिता के झंडाबरदार इस अखबार ने हमेशा आंचलिकता, भाषा और आम आदमी के प्रति अपने सरोकारों के साथ ही खबरों का समर्थन किया, पाठकों को जबरिया सनसनीखेज खबरें पहुंचाने के बजाय।

पत्रकारिता में “एसपी सिंह स्‍कूल ऑफ थॉट” से निकले संतोष तिवारी को मूलत: रिपोर्टर ही माना जाता है। बेसिकली न्‍यूज-वर्कर माने जाते हैं संतोष तिवारी, जिनकी धार सन नवम्‍बर-77 में तब से सान पर चढ़ने लगी,  जब कलकत्‍ता वाली आनंद बाजार पत्रिका की “रविवार” मैग्‍जीन में उन्होंने कानपुर से बतौर स्ट्रिंगर काम शुरू किया। इसी स्‍कूल ऑफ थॉट में बाद में उदयन शर्मा जैसे शख्‍स ने इस धारदार वाली पत्रकारिता की गद्दी सम्‍भाली थी। कानपुर के एकसाथ दो मोहल्‍लों के रहने वाले संतोष ने अपनी शुरूआत में ही कानपुर की स्‍वदेशी कॉटन मिल कांड से लेकर बेहमई कांड जैसे मुद्दों पर जमकर काम किया। जल्‍दी ही संतोष का नाम चमक गया।

अंग्रेजी के “ संडे ” में भी दर्जनों खबरें छपीं। अगला दायित्‍व मिला टाइम्‍स ग्रुप के साप्‍ताहिक “ दिनमान ” में। तैनाती दिल्‍ली में हुई तो आसमान और बड़ा मिल गया। न्‍यू बैंक इंडिया और गोल्‍डेन जुबली करप्‍शन जैसे मामलों के खुलासों से संतोष की धाक जम गयी। 87 में संतोष दैनिक हिन्‍दुस्‍तान से जुड़े। उन्‍हें चंडीगढ और हरियाणा स्‍टेट प्रमुख बनाया गया। पहचान की पताका जल्‍दी ही पिथौरागढ़ से आगरा को मिला कर बनायी गयी नयी टेरिटेरी के प्रमुखी उनके हाथों में आयी। पद था सीनियर करेंस्‍पोंडेंट।

सन 93 में उन्‍हें फिर दिल्‍ली रवानगी मिली। यह पद था डेल्‍ही डिप्‍टी चीफ। उनके सीनियर थे रमाकांत गोस्‍वामी जो आजकल दिल्‍ली सरकार में उद्योग मंत्री हैं। चार साल बाद यानी 16 अगस्‍त-98 को संतोष डेल्‍ही चीफ बनाये गये।उस समय हिन्‍दुस्‍तान को पेशेवर रंग देने में जुटे संपादक आलोक मेहता ने इस जिममेदारी के लिए संतोष को चुना।लेकिन वे खूब जानते थे कि यह एक बड़ी चुनौती थी। एक नये तरीके की। खुद के लिए भी। वजह आफिस में ठस-पने का बोलबाला था। दफ्तर के हर कोनों पर यही हालत।

मसलन, पूरे ब्‍यूरो में कांग्रेसी मानसिकता,  पुरानी सोच के भारी पत्‍थर-रोड़े, प्रोफेशनलिज्‍म पहुंचाने वाली सारी खिड़कियां नदारत और तुर्रा यह कि यूनियन के मोटे-मजबूत जंगले या गहरी-खतरनाक खाईंयां। बदलावों की शुरूआत होते ही बदलाव उबलने लगा। संतोष बताते हैं कि एक वक्‍त ऐसा भी आया जब उन्‍हें सिक्‍यूरिटी गार्ड लेकर चीफ रिपोर्टरी करनी पड़ी।। बकौल संतोष:- यह मेरा टर्निंग प्‍वाइंट था। संतोष तिवारी ने आखिरकार डेढ़ साल में ही पूरे रिपोर्टिंग में कम्‍प्‍यूटराइजेशन करा ही दिया।

इसी बीच अजय उपाध्‍याय ने “ हिन्‍दुस्‍तान ” सम्‍भाला। बेहतर रणनीति बनने लगीं। दिल्‍ली संस्‍करण को चार हिस्‍सों में बांटा गया। दिल्‍ली में पूरब,  पश्चिम,  दक्षिण और उत्‍तर के अलावा नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव और सोनीपत। अब तक संतोष डेढ़ सौ लोगों की टीम का मुखिया बन चुके थे। नाम मिला था सिटी एडीटर। यह रणनीति इतनी सफल रही और विकेंद्रित समाचार तंत्र के बूते हिन्‍दुस्‍तान का प्रसार उछल गया। नतीजा, नयी समूह-सम्‍पादक मृणाल पांडेय ने संतोष तिवारी के सफल प्रयोग और क्रियेटीविटी को पहचानते हुए उन्‍हें फीचर की ओवरहॉलिंग की जिम्‍मेदारी सौपी। वे एसोसियेट एडीटर और चीफ फीचर बने। कुछ नया तूफानी करने की अपनी शैली के तहत संतोष ने रिमिक्‍स शुरू किया। साथ में फेस्‍ट भी लागू किया। जल्दी ही उन्‍हें हिन्‍दुस्‍तान समूह में आउट स्‍टैंडिंग परफारमेंस और कंट्रीब्‍यूशन के लिए “ एचटी स्‍टार अवार्ड “ मिल गया।

20 साल तक हिन्‍दुस्‍तान में झंडा गाड़ने के बाद एक दिन अचानक इंडिया टीवी के रजत शर्मा का आफर मिला। सामने की दीवार पर कैलेंडर था मई-07 का। तब तक यह चैनल तीसरे से पहले स्‍थान पर आने की जद्दोजहद में था, टीम वर्क ने गुल खिलाया और अगले दस महीने में ही उसे पहला स्‍थान मिल गया। लेकिन संतोष ने जल्‍दी ही टीवी को अलविदा कह दिया। क्‍यों, संतोष बताते हैं:- मुझे लगा कि टीवी मेरी दुनिया नहीं है। यहां केवल रफ्तार है। यहां रफ्तार पहले हैं, विचार बाद में। केवल भागादौड़ी में आप कैसे खुद को विचारवान बनाये रख सकते हैं। संतोष बताते हैं:- रफ्तार विचार पर दबाव बनाता है। दोष किसी पर कैसे थोपा जाए। हर शैली की अपनी शर्तें होती हैं। देखिये,  बदलते वक्‍त में मीडिया अब एक जबर्दस्‍त ताकत बनती जा रही है। लेकिन हमें यह तो देखना ही पड़ेगा कि हम किस मीडिया को अपनाएं और किस पर विश्‍वास व आस्‍था रखें। लगा कि मुझे हमारी धरती बुला रही है, जहां मैं खेला, पला और सीखा। आखिर वही तो मेरा निजी परिवार था। यानी प्रिंट। जहां हम कहते नहीं, छाप कर प्रमाणित भी करते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि संतोष का अगला पड़ाव बना दैनिक जागरण। यहां डिप्‍टी एडीटर का काम मिला। सातों दिन चुनौतियां। दैनिक जागरण के फीचर सेक्शन पर पकड़ बनाने के साथ ही कदम मजबूत होते गए और दक्षता ने उपजा मैनेजमेंट का विश्वास, जिसके चलते दायरा पदनाम की जिम्मेदारियों तक सिमटा न रहा। शीघ्र ही जागरण समूह खासकर सखी की संपादक प्रगति गुप्ता की पहल पर एक न्यू यूथ प्रोडक्ट लांच हुआ डेल्ही डिजायर। इसकी प्रोफेशनल लीडरशिप संतोष तिवारी के ही नाम रही। यहां वे तराशे किसी चमकदार रिपोर्टर जैसे तो नहीं रहे, लेकिन बकौल संतोष:- दूसरे हीरों को तराशने का काम, मैं समझता हूं कि, शायद इससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण होता है। संतोष बताते हैं कि दैनिक जागरण से विछोह ठीक वैसी तरह है जैसे बेटी विदा हो रही हो।

संतोष अब दैनिक ट्रिब्‍यून में संपादक बन गये हैं। यह पहला चयन है इस अखबार में। ट्रस्‍ट से संचालित देश के तीन बड़े अखबारों में हिन्‍दू सर्वश्रेष्‍ठ माना जाता है। हिन्‍दी में ट्रिब्‍यून श्रेष्‍ठ है। जालंधर, भटिंडा, चंडीगढ़ और नई दिल्‍ली संस्‍करणों से छपने वाले ट्रिब्‍यून का 131 बरसों का इतिहास है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति एसएस सोढ़ी की अध्‍यक्षता वाले इस ट्रस्‍ट में, जम्‍मू-कश्‍मीर के राज्‍यपाल एनएन वोहरा, पूर्व आईएएस अधिकारी आरएस तलवार और पश्चिमी कमांड के सेनाध्‍यक्ष रहे पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एसएस मेहता के अलावा मीडिया की कद्दावर हस्‍ती नरेश मोहन सदस्‍य हैं।

2 फरवरी-1881 को लाहौर से शुरू ट्रिब्‍यून अब शिमला और अम्‍बाला और चंडीगढ के बाद दिल्‍ली में वट-वृक्ष बन चुका है। निजी स्‍वामित्‍व से बरी और पत्रकारिता के शीर्ष मापदंडों पर अडिग ट्रिब्‍यून का मतलब है जनता की आवाज। ऐसी आवाज जो आंचलिक भाषा, संस्‍कार और लोगों के सरोकारों के साथ खबरें परोसता है, सनसनीखेज खबरों और राजनीतिक-आर्थिक मक्‍खन से दूर। अपने नये दायित्‍व पर संतोष प्रसन्‍नता है। वे कहते हैं कि पहले तो मैं इस अखबार और उसके सहयोगियों को समझूंगा। आखिरकार वे बाहरी नहीं,  हमारे ही अपने हैं। मुझे तो जोश है, क्‍योंकि मैं वहां जा रहा हूं। लेकिन हो सकता है कि कुछ लोगों को कोई आशंका हो,  तो इसे दूर करने की कोशिश पहली होगी। ज्‍यादा काम तो चंडीगढ़ में होगा, लेकिन मैं खास ध्‍यान रिपोर्टिंग का रखूंगा। रोविंग रिपोर्टर की तरह, हा हा हा।

अब अंत में बात उनके परिवार पर। सहज, सरल संतोष तिवारी की बेटी साक्षी दिल्‍ली के बिग एफ-एम 92.7 में म्‍यूजिक मैनेजर व रेडियो जौकी है और बेटा अमन मुंबई में म्‍यूजिक प्रोडक्‍शन में। पत्‍नी आशा का नाम बेहतरीन लैंड-स्‍केपिंग डिजाइनरों में है। उन्‍होंने कंस्‍टीट्यूशन क्‍लब, हाईकोर्ट मल्‍टीलेबल पार्किंग और मेट्रो के कई स्‍टेशनों की भी बेहतरीन लैंड-स्‍केपिंग की हैं।

कुमार सौवीर की रिपोर्ट.

आम लोगों में भी दिखा पुलिस के खिलाफ आक्रोश, पत्रकारों का रायबरेली बंद सफल

रायबरेली में पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में गुरुवार को पूरा शहर बंद रहा. इस बंद से लोगों के मन में पुलिस एवं प्रशासन के खिलाफ पनप रहा गुस्‍सा साफ नजर आया. पत्रकारों के समर्थन में आयोजित यह बंद लगभग पूरी तरह सफल रहा. पुलिस की असंवेदनशीलता ने आग में घी का काम किया और लोग स्‍वर्स्‍फूत तरीके से बंद में शामिल होकर पत्रकारों को अपना समर्थन दिया. पत्रकारों की मांग थी कि जिले के एसपी तथा कोतवाल को हटाया जाए.

पेट्रोल पंपों, दवाखानों और अस्‍पतालों में तो सांकेतिक बंदी का ऐलान किया था, जबकि खुदरा बाजारों में ज्‍यादातर शटर दरवाजे बंद रहे. बंदी में आटो मोबाइल्‍स विक्रताओं और आटो-चालकों ने अपने चक्‍के जाम रखने के ऐलान पर अमल किया. जिले के दोनों बार ने भी इस बंदी को अपना पूरा समर्थन दिया. इनके अलावा जिले भर के चार दर्जन से अधिक संगठन पत्रकारों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर इस बंद को सफल बनाने में अपना योगदान दिया. राजनैतिक दल के लोगों ने भी इस बंद को अपना समर्थन देकर पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज की निंदा की तथा पुलिस व प्रशासन की असंवेदनशील रवैया की आलोचना की.

गौरतलब है कि पुलिस की हरामखोरी तथा लापरवाही के चलते यह मामला इतना तूल पकड़ लिया है. पुलिसवालों ने एक पत्रकार के भतीजे को जमकर मारपीट कर घायल कर दिया. पत्रकार जब न्‍याय की उम्‍मीद लेकर कोतवाली पहुंचे तो कोतवाल ने पत्रकारों के साथ बदतमीजी की तथा फर्जी फंसाने की धमकी दी. पत्रकार जब इस अभद्रता की जानकारी देने के लिए एसपी को फोन किया तो उन्‍होंने फोन नहीं उठाया, जिससे मामला और बिगड़ गया. जिसके बाद पत्रकार सड़क जाम करने लगे और पुलिस ने एसपी के आदेश पर लाठियां भांजनी शुरू कर दी. इसमें कई पत्रकार घायल हुए. इसके बाद पुलिस ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए पत्रकार के भतीजे तथा पत्रकारों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर लिया, जिससे स्थिति और अधिक बिगड़ गई.

श्री मीडिया में बदलाव : पुराने पद खतम, पांच लोग सीओओ बनाए गए

समूह संपादक के रूप में अजय उपाध्‍याय के जुड़ने के बाद ब्रांड के रूप में तब्‍दील होते जा रहा श्री मीडिया वेंचर ने अपने अंदरूनी स्‍ट्रक्‍चर में कई बदलाव किए हैं. कई लोगों की जिम्‍मेदारियां बदली गई हैं. कई पद समाप्‍त कर दिए गए हैं. संस्‍थान में नए सिरे से जिम्‍मेदारियों को परिभाषित किया जा रहा है. खबर है कि कंपनी ने मीडिया डिविजन को अब अलग कर लिया है. कंपनी अब तक श्री मीडिया समूह के नाम से कंपनी का संचालन कर रही थी. अब सूचना है कि इसका नाम बदलकर श्री समूह (आर्गेनाइजेशन) कर दिया गया है.

इस बदलाव के साथ पहले सारे पदों को भी खतम कर दिया गया है. नए समूह में मनोज द्विवेदी फिर से चेयरमैन बने हैं, जबकि वरिष्‍ठ पत्रकार अजय उपाध्‍याय कंपनी में एक्‍जीक्‍यूटिव डाइरेक्‍टर होने के साथ एडिटर इन चीफ बनाए गए हैं. अजय उपाध्‍याय के पास इस समूह के अखबार, चैनल तथा पोर्टल तीनों की जिम्‍मेदारी होगी. सारे काम उनके ही निर्देशन में स‍ंचालित किए जाएंगे. इसके साथ ही पांच लोगों को सीओओ की जिम्‍मेदारी दी गई है. इसमें समूह के तीनों विंग के लोग शामिल किए गए हैं.

चैनल से आलोक अवस्‍थी, प्रशांत द्विवेदी एवं एलविना कासिम, पोर्टल से अभय केसरवानी तथा प्रिंट से पंकज वर्मा को सीओओ की जिम्‍मेदारी दी गई है. समूह में इन सातों लोगों की भूमिका महत्‍वपूर्ण होगी. इसके साथ ही अब तक प्रधान संपादक की भूमिका निभा रहे अशोक सिंह को संपादक बना दिया गया है. प्रधान संपादक या समूह संपादक के रूप में अजय उपाध्‍याय का नाम प्रकाशित होगा. कंपनी को पूरी तरह रिफार्म किया जा रहा है. कंपनी का हेड ऑफिस नोएडा में बनाने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं. मीडिया समूह का संचालन वहीं से किया जाएगा. 25 दिसम्‍बर से सभी जिम्‍मेदारियां लागू हो गई हैं. कर्मचारियों को मेल से इस बदलाव के बारे में सूचित भी कर दिया गया है.

समूह अब दिल्‍ली से भी अपने अखबार श्री टाइम्‍स के प्रकाशन की तैयारियां कर रहा है. सूत्रों का कहना है कि अगले एकाध महीने में दिल्‍ली से भी अखबार का प्रकाशन शुरू करा दिया जाएगा. हालांकि अभी इसकी टाइमलाइन तय नहीं की गई है. इन बदलावों के बाद माना जा रहा है कि अंदरखाने भी बड़ी हलचल मचेगी. अंदरुनी खबर है कि समूह में दो खोमचे बन गए हैं, जो एक दूसरे को निपटाने की कोशिश लगातार करते रहे हैं. अब जो भी खेमा इन बदलावों के बाद भारी पड़ेगा, वो दूसरे पर हमला करने से नहीं चूकेगा. इसलिए माना जा रहा है कि यहां कई लोग बाहर होंगे तो कई नए लोगों की इंट्री भी होगी. 

गैस एजेंसी के कर्मचारियों ने दी पत्रकार राजीव को जान से मारने की धमकी, मामला दर्ज

यूपी में पत्रकारों के साथ लगातार बदतमीजी, धमकी देने तथा मारपीट करने की घटनाएं आम हो गई हैं. यूपी के चंदौली जिले के मुगलसराय से खबर है कि दी रेलवे मेन्‍स कोऑपरेटिव इंडेन गैस एजेंसी में केवाईसी फार्म जमा करने गए पत्रकार राजीव गुप्‍ता के साथ एजेंसीकर्मियों ने न सिर्फ अभद्रता एवं गाली ग्‍लौज की बल्कि जान से मारने की धमकी भी दी. जिसके बाद भयभीत पत्रकार ने कोतवाली में आवेदन देकर जानमाल के रक्षा की गुहार लगाई. पुलिस ने एनसीआर में मामला दर्ज कर लिया है.

जानकारी के अनुसार उक्‍त गैस एजेंसी में आम उपभोक्‍ताओं के साथ पहले से ही अभद्रता करने की शिकायतें आती रही हैं. रेलवे परिसर में स्थित इस कोआपरेटिव सोसाइटी के सदस्‍य ज्‍यादातर एक ही परिवार के लोग हैं, लिहाजा सारी गड़बडि़यों के बाद भी तमाम चीजें बाहर नहीं आ पाती हैं. स्‍थानीय दबंग होने के चलते यहां के कर्मचारी भी आम लोगों से आए दिन अभद्रता भी करते रहते हैं. इसी क्रम में आज राजीव गुप्‍ता इनकी अभद्रता के शिकार बन गए.

राजीव गुरुवार की दोपहर लगभग तीन बजे केवाईसी फार्म जमा करने कोऑपरेटिव इंडेन गैस एजेंसी गए थे. जब उन्‍होंने वहां पर फार्म जमा करने का निवेदन किया तो वहां मौजूद कर्मचारी संजय राय ने फार्म लेने से इनकार कर दिया. राजीव ने जब नियमों का हवाला दिया तथा कहां कि नियमानुसार शाम पांच बजे तक फार्म जमा होना चाहिए फिर आप लोग फार्म क्‍यों नहीं जमा कर रहे हैं. इतना सुनते ही संजय राय व जितेंद्र सिंह राजीव से उलझ गए. संजय राय खुद को भाजपा का नेता भी बताता है, ने राजीव को दलाल, फर्जी पत्रकार कहते हुए मां-बहन की गालियां देनी शुरू कर दी. राजीव ने जब विरोध किया तो उनको जान से मारने की धमकी भी दी गई.

इतना से ही संजय राय का मन नहीं भरा तो उसने कहा कि यह पब्लिक प्‍लेस है नहीं तो तुम्‍हे आज तुम्‍हारी औकात दिखा देता. इसके बाद धमकी देते हुए कहा कि साले यहां से भाग जाओ नहीं तो जान से जाओगे. इस घटना से अपमानित एवं पीडि़त राजीव ने इसकी सूचना तत्‍काल मंडल रेल प्रबंधक अनूप कुमार से मिलकर दी. उन्‍होंने इंडेन गैस सर्विसेज के कस्‍मर केयर नम्‍बर पर भी अपनी शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद इस घटना से हतप्रभ राजीव ने कोतवाली में तहरीर दी, जिसके बार पुलिस ने एनसीआर दर्ज कर लिया. पर माना जा रहा है कि आरोपी दबंग तथा पहुंच वाले हैं, जिसके चलते पुलिस शायद ही इनके खिलाफ कोई कड़ा एक्‍शन ले.

वैसे भी कोआपरेटिव पर यह कोई पहली घटना नहीं है. इसके पहले भी उपभोक्‍ताओं से बदतमीजी, गाली-ग्‍लौज तथा मारपीट होती रही है. पर कर्मचारी इन लोगों की शिकायत करने की बजाय वहां से हट जाने में ही अपनी भलाई समझता है, जिसके चलते इन लोगों का मन और अधिक बढ़ गया है. आरोप यह भी है कि यहां कोई भी काम नियम से नहीं होता. प्रबंधन से जुड़े लोगों की जो मर्जी होती है वही करते हैं. अगर आप अपना काम कराने जाएं तो यहां काम होना संभव नहीं है जब तक कि किसी की सिफारिश ना हो.

वरिष्‍ठ पत्रकार चैतन्‍य भट्ट को हीरालाल गुप्‍त पत्रकारिता सम्‍मान

जबलपुर : जबलपुर के वरिष्‍ठ पत्रकार तथा दैनिक हरिभूमि के संपादक चैतन्य भट्ट को स्व. हीरालाल गुप्त पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया. श्री भट्ट के अलावा इस आयोजन में सृजन सम्मान से साहित्यकार अमरेन्द्र नारायण तथा सव्यसाची प्रमिला बिल्लोरे सम्मान से राजेश पाठक प्रवीण को सम्मनित किया गया. जबलपुर में हुये एक गरिमामय आयोजन में मुख्य अतिथि कालीदास अकादमी के पूर्व निदेशक आचार्य कृष्‍णकांत चतुर्वेदी ने कहा कि समाज और राष्‍ट्र की मूलधारा से जुड़ी होती है पत्रकारिता. पत्रकारिता एक साधना है और जिसने इसे साध लिया उसका स्मरण पीढियां करती हैं.

अध्यक्षता कर रहे पूर्व उपमहाधिवक्ता आदर्श मुनि त्रिवेदी ने कहा कि आज समाज में टूटन है. व्यक्ति धन की दौड में उलझा हुआ है, ऐसे में स्‍व. गुप्त जी को स्मरण करना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी. स्‍व. हीरालाल गुप्त पत्रकारिता से सम्मानित वरिष्‍ठ पत्रकार श्री चैतन्य भट्ट ने अपने सम्मान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुये कहा कि मुझे यह सम्मान पाकर गौरव की अनुभूति हो रही है. कार्यक्रम में अमरेन्द्र नारायण तथा राजेश पाठक प्रवीण को भी सम्मनित किया गया. आयोजन में शहर के साहित्यकार और पत्रकार बडी संख्या में उपस्थित रहे.

देश में बढ़ रही है हिंदी भाषी प्रकाशनों की ताकत (पढ़े रिपोर्ट)

देश में हिंदी अखबारों का बाजार लगातार बढ़ रहा है. पिछले दो दशक में हिंदी अखबारों की प्रगति ने इसे साबित भी किया है. इन सालों में अंग्रेजी मीडिया का वर्चस्‍व भी कम हुआ है. तमाम बड़े हिंदी  मीडिया ब्रांडों के रीजनल स्‍तर पर पहुंच जाने से यह मार्केट और बड़ा होता जा रहा है. तमाम विसं‍गतियों के बीच हिंदी की ताकत बढ़ रही है. इसी हिंदी की ताकत थी कि जी न्यूज को संचालित करने वाले एस्‍सल ग्रुप ने अमर उजाला में बड़ा स्‍टेट खरीदने की कोशिश की थी. इसके पहले नईदुनिया अखबार को खरीदकर जागरण प्रकाशन ने अपनी ताकत बढ़ाई.

लगभग 19,100 करोड़ की न्‍यूज पेपर इंडस्‍ट्री में हिंदी का मार्केट मुश्किल से 30 फीसदी है, वो भी तब जब पिछले पांच सालों में 10 फीसदी बढ़ोत्‍तरी हुई है. अब टॉप टेन अखबारों में भी हिंदी की स्थिति मजबूत हुई है. टॉप टेन में पांच से सात अखबार हिंदी के छाए रहते हैं. डीबी कारपोरेशन के डाइरेक्‍टर गिरीश अग्रवाल कहते हैं कि आज से सात साल पहले तक विज्ञापन बाजार में 60 फीसदी पर अंग्रेजी का कब्‍जा था. शेष 40 फीसदी में अन्‍य भाषाओं के पब्लिकेशन शामिल रहते थे, पर अब इसका उल्‍टा हो चुका है. अब साठ फीसदी पर हिंदी का कब्‍जा है. आप भी पढि़ए बिजनेस स्‍टैंडर्ड कें प्रकाशित हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर यह रिपोर्ट.


The rising power of Hindi

Last month, Essel Group, the company that owns India’s largest media group, Zee, moved the Delhi High Court to restrain the shareholders of Amar Ujala Publications (it publishes Amar Ujala, the hugely popular Hindi newspaper) from entering into any agreement for the sale of the company till December 31. That is when Essel’s memorandum of understanding (MoU) to buy a majority stake in Amar Ujala expires. Acting on the plea, the court passed a restraining order about a month ago. So, the end of this year will determine who eventually controls one of India’s biggest Hindi dailies: Subhash Chandra’s Essel Group or Jagran Prakashan, the other reported bidder and publisher of Dainik Jagran, or some other publishing firm? There were, at last count, several in the fray.

Amar Ujala, the Hindi newspaper with editions in 12 states, is an asset that any media firm would like to own. With a readership of roughly 8.6 million, it leads in three states: Jammu & Kashmir, Uttarakhand and Himachal Pradesh. Dainik Jagran is the largest-read Hindi daily and is present in 15 states. However, it leads on readership only in Uttar Pradesh. Taking over Amar Ujala can give it leadership in five key states, including Delhi.

“The combination (of Amar Ujala and Dainik Jagran) will also ensure that rivals such as Dainik Bhaskar and Hindustan (published by HT Media) are miles behind in the national ranking,” says A S Raghunath, a media consultant. For Zee, the paper has synergies with its Hindi television news business and its English paper, DNA

This fight for Amar Ujala underscores the importance of Hindi to any publishing firm’s national ambitions. Of the Rs 19,100-crore newspaper industry, Hindi is roughly 30 per cent, up from 20 per cent only five years back (see table). That is when the first flush of investor money had come into the sector. As they scrambled to meet investor expectations on scale and profitability, the three publishers listed on the stock market, Dainik Jagran, Dainik Bhaskar and Hindustan, have been expanding rapidly. And so are the closely-held ones such as Rajasthan Patrika and Amar Ujala, which are defending their territories and getting into new ones. Most are discovering that the fragmented Indian newspaper business makes for a nightmarish market for mergers and acquisitions. There are more than 32,000 Hindi publications (a bulk of them newspapers) in India. Most are irrelevant. Many of the good brands — Amar Ujala, Rajasthan Patrika or Prabhat Khabar — are not really interested in selling. Others such as Nai Dunia have already been snapped up (by Jagran earlier this year).

Widening their horizons

The battle for scale, however, is not just that. As advertising growth slows to single digits and price wars eat up what was once healthy subscription revenue, bulking up on readership and circulation numbers in each state is critical. That is the only way to get the best ad rates and keep the cash coming. “The only state for which Dainik Jagran can command its own ad rates is Uttar Pradesh. For all the other states it has to negotiate,” says one media analyst. Even in Uttar Pradesh, Dainik Jagran now faces a new threat: HT Media’s Hindustan.

The paper is racing ahead of Dainik Jagran in key towns of the state, such as Lucknow. “The Amar Ujala acquisition would have helped Dainik Jagran keep Hindustan in check,” says another media consultant. Sanjay Gupta, the editor and CEO of Jagran Prakashan, did not respond to our request for an interview.

Girish Agarwal, director of DB Corporation, which publishes Dainik Bhaskar, says the tide is turning in favour of the regional (non-English) media. About seven years back, metros, and therefore, English papers, got 60 per cent of all the print media advertising in India. The rest of India, which means all other Indian languages, got the remaining 40 per cent. That ratio now stands reversed. “The potential, size and vibrancy of the market are now getting reflected,” says Agarwal.

He is right. As middle-class families in small towns prosper, advertisers want to reach out to them. While this has led to a boom in all Indian languages, Hindi happens to be the biggest beneficiary. The language, spoken by roughly 500 million Indians across 13 states and Union Territories, offers a Rs 6,200-crore newspaper market growing at just over 10 per cent, way above the national average. All other Indian languages put together get the same revenues as the Hindi market.

Now, take a look at the other side of this rosy picture. At almost 64 million readers, Hindi papers have over three times the audience English ones do. Yet, the ad rates that an English paper commands are about five times more than Hindi. It perhaps reflects the superior purchasing power of the English readers. But, the Hindi readers are catching up. The current ratio of 5 is better than that of 10-12 seven years back because the “perception of advertisers” towards the Hindi newspapers is very positive today, points out Arvind Kalia, national head of marketing, Patrika Group (it publishes Rajasthan Patrika). Therefore, as literacy increases and small towns in the Hindi heartland continue to grow at a brisk pace, more growth will come from improving rates vis-à-vis the declining English newspaper market.

But, this will happen only for brands that can deliver the Hindi market en bloc. For instance, even if Dainik Bhaskar doesn’t lead in all the cities in Madhya Pradesh, as long as it is the overall leader in the state, advertisers will include it in their plan. The same goes for Hindustan, the leader in Bihar. But, when it comes to a national ad plan, then Dainik Bhaskar, which has more editions across the Hindi belt than Hindustan, which focuses only in four states, wins. That explains why everyone is in a rush to expand, organically as well as inorganically.

When five really big brands want to expand at the same time, price cuts are inevitable. “The big trouble is they are entering into each other’s market. As a result, circulation revenues for Hindi print have fallen from 25-30 per cent of sales to 20 per cent over the past five years,” says Vikash Mantri, vice-president of ICICI Securities. Traditionally, Indian language papers have had healthy subscription revenues, unlike the 10 per cent that English gets. So, this drop in annuity income worries investors. It did not matter till last year when advertising was growing at 10-12 per cent. But, as ad growth slumps to an estimated 7 per cent this year and newsprint costs rise by 20 per cent thanks to a depreciating rupee, margins are being squeezed. Price wars make it a triple whammy on the bottom-line.

Way forward

The easy solution is to stay put and consolidate. Hindustan, which in the past five years has doubled revenues and grown operating profits 10 times, is a good case in point. It has consciously stuck to four states: Bihar, Jharkhand, Uttar Pradesh and Uttarakhand. It has now covered Uttar Pradesh more or less completely. Hindustan does not plan to go outside of these states, for now. “In a state that already has three or more players, it is not easy for a new player to build scale and it could also be very expensive,” says Amit Chopra, the CEO of Hindustan Media Ventures. He points out that it could take more than five years for a daily to achieve breakeven in a new state. The other option is to acquire newspapers and scale up fast, which is turning out to be messy. Given the fragmented market and egotistical owners, this may not happen through buyouts but through distress sales as margin squeezes hit smaller players. “More than consolidation, it is a question of attrition. Many of these (small) brands will die out, but will not sell,” says Ajay Upadhyay, consulting editor, Amar Ujala.

Does any of this matter when the internet is taking away large chunks of audiences? While that is true for the metro-English speaking market, “in the Hindi belt, newspapers are the last word on anything,” says Chopra. The aspirational value of newspapers and the fact that they have right of way into homes, unlike the internet, make them powerful media vehicles, much like English papers were in Mumbai or Delhi in the ’90s. Besides, Hindi papers reach barely 20 per cent of a market where literacy is about 65 per cent. So, the headroom for growth is significant. As one media baron puts it, “Indian language papers’ fight for acquisitions will continue because they want real estate (brands that could give them large geographies).” Wait then for some more skirmishes.

पत्रिका से इस्‍तीफा देकर गंगेश एवं रवींद्र नईदुनिया पहुंचे

पत्रिका, रायपुर से खबर है कि गंगेश द्विवेदी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे रिपोर्टिंग कर रहे थे और नगर निगम बीट के माहिर माने जाते थे. गंगेश ने अपनी नई पारी रायपुर में ही नईदुनिया के साथ शुरू की है. इन्‍हें यहां भी रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी दी गई है. गंगेश का इस्‍तीफा पत्रिका के लिए झटका माना जा रहा है. गंगेश इसके पहले भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

गंगेश के साथ ही रवींद्र ठेंगड़ी ने भी पत्रिका से इस्‍तीफा दे दिया है. वे रीजनल डेस्‍क पर कार्यरत थे. रवींद्र ने भी अपनी नई पारी नईदुनिया के साथ शुरू की है. उन्‍हें यहां भी डेस्‍क की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. रवींद्र भी अन्‍य संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. पत्रिका, रायपुर से कई और पत्रकार नईदुनिया जाने की तैयारी में है. खबर है कि सिटी से चार रिपोर्टर जल्‍द ही सेंट्रल डेस्‍क और जस्‍ट रायपुर से नईदुनिया ज्‍वाइन करने वाले हैं. इसके पीछे पत्रिका की पॉलिसी को कारण बताया जा रहा है.

ना कानून बेबस है ना लाचार, लचर है तो ढीला और डरपोक सिस्टम

राजधानी की बस में सामूहिक दुराचार और उसकी प्रतिक्रया में उपजे युवा आंदोलन की एक परिणीति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधिपति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में बने आयोग के रूप में सामने आई है। आयोग महिलाओं पर अत्याचार रोकने के लिए कानून में संशोधन के सुझावों के लिए गठित हुआ है। आयोग ने 5 जनवरी 2013 तक सुझाव मांगे हैं ताकि एक महीने की तय समयावधि में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर सके।

माफ कीजिएगा यह देश का ध्यान भटकाने और आंदोलनकारियों के प्रति अपनाई जाने वाली तुष्टिकरण की नीति से अधिक कुछ नहीं है। जस्टिस वर्मा और आयोग के अन्य सदस्यों की योग्यता, कर्मठता, ईमानदारी पर अपने को कोई शक नहीं है। इसमें भी संदेह नहीं कि सुझावों पर मनन और उनके आधार पर समुचित सिफारिशों के काम को वे बखूबी अंजाम देंगे। अपनी राय में देश के मौजूदा मूल कानूनों खासकर अपराधियों को सजा दिलाने से जुडे़ कानूनों में इतनी तो खामी नहीं है कि उन्हें हम पूरी तरह नकारा मान बैठें। भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के प्रावधान किसी भी अपराधी को सजा दिलाने और इस देश में अपराधों की रोकथाम के लिए पर्याप्त है। फिर दोष कहां हैं ? दोष हमारी व्यवस्था का है। अपन आंदोलनकारी युवाओं को दोष नहीं देते और ना ही उनकी मांग पर एतराज करते हैं।

दरअसल कानूनी समझ के लिहाज से वे मासूम हैं। उन्हें ऐसा लगता है कि देश में पर्याप्त कानून नहीं है। हकीकत ठीक इसके उलट है। कानून इतने बेबस और लाचार नहीं है कि अपराधी को सजा नहीं दी जा सके। दोषी अगर कोई है तो वह है लचर व्यवस्था। ढीला और डरपोक सिस्टम। कौन बुराई ले या अपने को क्या की टालू प्रवृत्ति के हम लोग इस हद तक आदी हो चुके हैं कि उससे अपराध और अपराधियों के हौंसले बढ़ रहे हैं। लार्ड थॉमस बेबिंग्टन मैकाले और उनकी टीम ने करीब 29 साल की मशक्कत के बाद भारतीय दंड संहिता बनाई जो 1 जनवरी 1862 को देश में लागू हुई। इसे लागू होना था 1 मई 1861 को परंतु आठ महीने सिर्फ इसलिए टाला गया ताकि उस समय के न्यायाधीश और प्रशासनिक अफसरान इसको भलीभांति समझ सकें। रेल और वायुयान से जुडे़ अपराधों को छोड़कर भारतीय दंड संहिता में सभी अपराधों का जिक्र है। रेल और वायुयान उस समय थे नहीं वरना उनसे जुड़े अपराधों का भी जिक्र होता। हत्या, देश के खिलाफ युद्ध आदि अपराधों के लिए आज भी फांसी की सजा का प्रावधान है।

सवाल उठ सकता है। उठ सकता है क्यों बल्कि उठना भी चाहिए। अगर कानून पर्याप्त है, तो फिर देश में अपराध क्यों बढ़ रहे हैं? अपराधी अदालत से छूट क्यों जाते हैं? जवाब सवाल में ही खोजा जाना बेहतर रहेगा। अंग्रेजों के जमाने में भी तो यही कानून थे फिर उस समय कानून का डर क्यों था? कानून वही है, अफसर बदल गए। अफसरों की इच्छा शक्ति नहीं है। राजनीतिक हस्तक्षेप पुलिस और बहुत हद तक अदालतों पर भी हावी हो गया है। ब्रिटिश राज में पूरे देश में एक कानून था अब राज्यों ने अपनी-अपनी सुविधाओं से उनमें संशोधन कर लिए। भारतीय दंड संहिता में महिला से दुराचार के लिए सात साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। गैंग रेप, नाबालिग या पागल से रेप यहां तक कि अपनी नाबालिग पत्नी से भी जबरन सहवास को रेप माना गया है। परंतु सजा कितनों को होती है? जो लोग अपने अधिकारों के लिए अदालत की शरण में जाते हैं, एक स्टेज पर उन्हें पछतावा होने लगता है। हमारा सिस्टम उन्हें ऐसे हालात में पहुंचा देता है कि उन्हें लगने लगता है, अदालत आकर उन्होंने कोई गलती कर दी है। लगता है उनसे खुद से कहीं अपराध हो गया है। मुकदमे के पक्षकारों को तो छोड़िए अगर आप किसी मुकदमे में गवाह हैं तो आपसे अदालत में ऐसा व्यवहार किया जाता है कि आप क्रोध और ग्लानि से भर उठते हैं। जबकि गवाह होने के नाते आप कानून की, न्याय व्यवस्था की और अदालत की मदद कर रहे होते हैं।

राजस्थान में महिलाओं से जुड़े अपराधों के लिए महिला पुलिस थाने गठित किए गए हैं। वहां महिला थानेदारों और महिला सिपाहियों की नियुक्ति को वरीयता दी जाती है। दहेज प्रताड़ना से जुड़े मामलों में लड़की का पीहर पक्ष हो या ससुराल वाले, एक को दहेज का सामान दिलाने और दूसरे को जेल और इज्जत का डर दिखाने की ऐसी-ऐसी भयावह तस्वीरें खींची जाती है और इतनी ब्लैकमेलिंग की जाती है कि दोनों ओर से सौदा हजारों नहीं बल्कि लाखों रुपए में पटता है। महिला थानेदार करोड़पति हैसियत रखती हैं। गोद में बच्चे लटकाए, पीहर वालों के दुखी परेशान चेहरे और अंधे भविष्य की दहलीज पर खड़ी महिलाओं के साथ जो हालात होते हैं वह उनके साथ हो रहा बौद्धिक बलात्कार नहीं तो और क्या है?

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-309 कहती है, जज चाहे तो कारण लिखते हुए मुकदमे की सुनवाई टाल कर अगली तारीख दे सकते हैं। इसी की आड़ लेते हुए पूरे देश की आपराधिक अदालतों का ढांचा चरमरा गया है। इसी धारा में आगे कहा गया है कि मुकदमे में एक बार गवाही शुरू हो जाए तो फिर वह दिन-प्रतिदिन तब तक चलनी चाहिए जब तक सभी गवाहों के बयान पूरे ना हो जाए परंतु हम ना तो इसे पढ़ने में रूचि रखते हैं और ना ही इसके पालन में। धारा-309 का एक हिस्सा हम जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं और बाकी हिस्से को जानबूझकर भुला चुके हैं।

अपराधी की कोशिश होती है कि किसी भी तरह से एक बार जमानत पर छूट जाए फिर किसी ना किसी बहाने मुकदमे में तारीख पेशियां लेकर मुकदमा लम्बा खींचा जाता है। गवाहों की खरीद फरोख्त से लेकर उन्हें डराने, धमकाने यहां तक की जान से मार देने तक को अंजाम दिया जाता है। कई दफा तो मुकदमा इतना पुराना हो जाता है कि गवाह को ठीक से याद तक नहीं रहता कि वारदात क्या थी। दिन, तारीख, साल, मौसम, समय, कपड़ों के रंग आदि ऐसे-ऐसे उल्टे-पुल्टे सवाल पूछे जाते हैं कि उसे झूठा साबित कर दिया जाता है। सिस्टम सुधारना है तो गंभीर मामलों के अपराधियों को जमानत पर रिहा करने और उनकी अग्रिम जमानत मंजूर करने जैसी धाराएं 437, 438, 439 दंड प्रक्रिया संहिता से हटा क्यों नहीं दी जाती? अगर हटाई नहीं जा सकती तो इन्हें इतना लचीला क्यों बना दिया गया है कि पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगने लग गए?

हाईकोर्ट्स में मुकदमों की सुनवाई खासकर जमानत और दीवानी मामलों में स्टे के लिए न्यायाधीशों का रोस्टर होता है जो पहले से तय नहीं होता। इसे बेंच बदलना कहते हैं। जब भी पहला सवाल जमानत या स्टे का आता है तो दूसरा सवाल आता है किस जज की बेंच चल रही है? न्यायपालिका के प्रति अपन पूर्ण सम्मान रखते हैं और किसी की अवमानना का कोई इरादा भी नहीं है फिर भी यह कड़वी हकीकत बताने की मजबूरी है कि हाईकोर्ट में वकील खुद यह कहते नजर आते हैं अभी जमानत की अर्जी नहीं लगाएंगे या स्टे पिटीशन दाखिल नहीं करेंगे क्योंकि बेंच उनके मतलब की नहीं है। अपने मतलब की बेंच का मतलब क्या है? क्यों जरा सी हैसियत वाला अपराधी अपराध करने के बाद छाती ठोंक कर दो दिन में जमानत पर छूट आने या नाकारा, भ्रष्ट सरकारी अधिकारी अपने सस्पेंशन पर स्टे ले आने का दावा करता है और वे ऐसा कर भी दिखाता है। ऐसी बातें क्यों कर अब फिल्मों के डॉयलाग बन चुकी हैं।   

पुलिस, सीआईडी, सीबीआई वगैरह-वगैरह ठोक बजाकर और हर पहलू, नजरिए, बारीकी से अपराध की जांच कर, अपराधी को गिरफ्तार कर अदालत के सामने मुकदमा पेश कर देती है, बाद में वही अपराधी जांच की खामियों की आड़ लेकर बरी, सॉरी बरी नहीं, ‘बाइज्जत बरी’ कैसे हो जाता है? जांच करने वाली एजेंसी और उसके काबिल जांच अफसरों की जवाबदेही क्यों नहीं तय की जाती? इस सवाल का जवाब क्यों नहीं ढूंढा जाता है कि अगर अपराध हुआ है तो फिर अपराधी कहां हैं। जो बाइज्जत बरी हो गया, जाहिर है उसे अदालत ने अपराधी नहीं माना तो फिर अपराधी है कौन? उसे ढूंढा क्यों नहीं जाता? उन काबिल पुलिस अफसरों से यह सवाल क्यों नहीं किया जाता कि हत्या, मारपीट, बलात्कार के जिस अपराधी को वे पकड़कर लाए थे उसे अपराधी साबित नहीं किया जा सका तो फिर असली अपराधी कौन है? ब्रिटिश जज ऐसे मामलों में उस जांच अधिकारी को दोषी ठहराते थे, उसकी जिम्मेदारी तय करते थे, अपराधी के छूटने को जांच अधिकारी की नौकरी से जोड़ा जाता था? अब ऐसा क्यों नहीं होता?

दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन के पहले सन् 1972 तक जो अफसर मुकदमे की जांच करता था, उसे ही अदालत में उस मुकदमे को साबित करना होता था। बाद में यह स्थिति बदल दी गई। अब जांच अधिकारी लीपापोती कर मुकदमे का चालान पेश कर देता है, उसे पता है मुकदमा पिटेगा परंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा। सरकारी वकील यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से हट जाता है कि जांच में खामी रही इसलिए अपराधी बरी हो गया। भुगतना पीड़ित को पड़ता है जो पहले से ही भुगत रहा होता है। अंग्रेजों के जमाने में पुलिस का गवाह अगर अपने बयानों से अदालत में मुकर जाता था, कानूनी भाषा में होस्टाइल हो जाता था तो जज उसके खिलाफ झूठी गवाही का मुकदमा दर्ज करने में चूकते नहीं थे। ऐसे मुकदमों में जज को खुद परिवादी बनना पड़ता है और दूसरी अदालत में गवाह के कटघरे में खड़े़ होकर बयान देने पड़ते हैं। आज आए दिन झूठी गवाहियों के कारण अपराधी बरी हो रहे हैं। यहां तक कि सरकारी कर्मचारी और पुलिस कर्मचारी तक बयान से पलट जाते हैं परंतु सिस्टम को अपराधियों का बरी होना मंजूर है झूठे गवाहों के खिलाफ कार्रवाई मंजूर नहीं है।

कानून में हर अपराध की सजा का प्रावधान है। उदाहरण के लिए पहले षड़्यंत्र यानि साजिश, फिर अपराध की तैयारी, फिर अपराध करना आदि-आदि। ऐसे में साजिश के लिए अलग सजा होगी, तैयारी के लिए अलग और अपराध के लिए अलग। हमारे यहां सजा देने के बाद फैसले में एक लाइन और लिख दी जाती है ‘सभी सजाएं एक साथ चलेंगी’ यानि अगर साजिश के लिए सात साल, तैयारी के लिए दो साल और अपराध के लिए दस साल सजा दी गई है तो अपराधी अधिकतम दस साल की ही सजा भुगतेगा। अमेरिका जैसे कई देशों में ऐसा नहीं है। वहां सजाएं एक के बाद एक चलेगी यानि ऐसे मामले में अपराधी को उन्नीस साल की सजा भुगतनी पड़ती है। क्या वक्त नहीं आ गया जब हमारे यहां भी सजाएं साथ चलने की परिपाटी को तिलांजलि देनी चाहिए और सजाएं एक के बाद एक भुगतने की व्यवस्था करनी चाहिए। किसी भी शब्दकोश में उम्रकैद का मतलब आजीवन कैद से अलग कुछ नहीं होगा। अंग्रेजी में लाइफ इम्प्रिसनमेंट, इसके बावजूद ना जाने कैसे हमारे यहां उम्र कैद का मतलब 14 साल से निकाल लिया गया और उसी आधार पर उम्र कैद की सजा पाए अपराधी को 14 साल बाद रिहा करने की परिपाटी बन गई।

आजकल हर बड़ा अपराधी पैसा और प्रभाव रखता है। अव्वल तो वह अपने द्वारा किए या करवाए गए अपराध में फंसता नहीं। फंस जाता है तो बहुत जल्द जमानत पर बाहर आ जाता है। जमानत पर आने के बाद वह ऐसा चक्कर चलाता है कि उसके खिलाफ जो चालान पेश होता है, वह इतना कमजोर होता है कि अदालत उसे डिस्चार्ज यानि सुनवाई से पहले ही छोड़ देती है। अगर उसे डिस्चार्ज नहीं किया जाता तो वह गवाहों को तोड़ मरोड़कर, सबूतों को नष्ट करवाकर बरी हो जाता है। अगर बरी होने में कामयाब नहीं होता तो वह सजा की अपील कर जल्द से जल्द जेल ये बाहर आ जाता है। अगर अपील में नही छूट पाता तो पैसे, प्रभाव और रसूखात के दम पर वह पैरोल पर छूट जाता है और अपने मुकदमे की समीक्षा करवाकर उसे राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष फांसी है तो उम्र कैद में बदलवाने में, उम्र कैद है तो उसे पांच-दस साल करवाने में और पांच-दस साल की सजा है तो उसे जितना समय रह चुका है, यानि भुगती हुई सजा के आधार पर ही रहम के नाम पर रिहा होने में कामयाब हो जाता है।

देश में फास्ट ट्रैक अदालतों की बड़ी तारीफ हो रही है। कानून में फेरबदल के नारेबाजी में एक नारा फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का भी है। नारा लगाते समय हम भूल जाते हैं कि फास्ट ट्रैक अदालतों के लिए कोई नहीं भारतीय दंड संहिता, नई दंड प्रक्रिया संहिता या नया साक्ष्य अधिनियम नहीं लाया गया था। वही कानून थे जो पहले थे और आज भी हैं। सिर्फ अदालतों की सोच बदली गई थी। अनावश्यक तारीखपेशी देने पर रोक लगा दी गई थी और हर महीने चौदह मुकदमे अनिवार्य रूप से तय करने की बाध्यता लागू कर दी गई थी। अंग्रेजों द्वारा बनाए गए, अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए और अंग्रेजों द्वारा इन्हीं कानूनों के आधार पर मुकदमे निपटाकर अपराधों पर अंकुश लगाने की बात को एकबारगी छोड़ दीजिए तो फिर याद कीजिए पिछले दस सालों में फास्ट ट्रैक अदालतों के कामकाज को। इन्हीं कानूनों के जरिए आपराधिक मुकदमे निपटाने और बहुत कम ही सही किसी हद तक तो अपराधों पर काबू करने में भी सफलता के उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे में क्यों नहीं हम सोच और सिस्टम बदलने की बात करें, कानून में संशोधन की मांग करेंगे तो सरकारें आयोग बनाएंगी। सरकारों को पता है, जनता की याददाश्त काफी कमजोर होती है। रिपोर्ट आते-आते आएगी और आएगी तब आएगी और लागू की जाएगी तब की जाएगी फिलहाल तो उनका पीछा छूट जाता है। 

लेखक राजेंद्र हाड़ा अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

‘बलात्कारी’ हनी सिंह को प्रमोट कर रहे अनुराग कश्यप को शेम-शेम कहें

घटिया, गाली-गलौज वाले और महिला विरोधी गीत गाने वाले थर्ड ग्रेड सिंगर हनी सिंह को चर्चित फिल्मकार अनुराग कश्यप का कंधा मिल गया है. जिन दिनों महिलाएं अपनी अस्मिता और अधिकार के लिए सड़कों पर लड़ रही हैं, उन्हीं दिनों में अनुराग कश्यप जैसा संवेदनशील फिल्मकार बलात्कार और महिला हिंसा को प्रमोट करने वाले घटिया गायक हनी सिंह को प्रमोट कर रहा था. दोनों की तस्वीर नीचे है. दोनों ने एक साथ स्टेज शेयर किया.

दी गैंग आफ वासेपुर और देव डी जैसी फिल्मों के निर्देशक अनुराग कश्यप और 'मैं हूं बलात्कारी' जैसा महिला विरोधी गीत गाने वाला हनी सिंह, साथ मिलकर कुछ प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. इस मिलन पर वो सारे लोग अचंभित हैं जो अनुराग कश्यप को ठीकठाक आदमी मानते थे. प्रथमेश जाधव अपने ब्लाग क्रैक्टिविस्ट पर इस मिलन के बारे में विस्तार से लिखते हैं, साथ ही हनी सिंह के गाने 'मैं हूं बलात्कारी' की लाइनें भी बताते हैं जिसे पढ़ते हुए एक मिनट के लिए आप सन्न रह जाते हैं कि कोई आदमी ऐसा भी गा-कह सकता है…


The Gangs of Wasseypur Director was so fascinated by the popular singer’s rebellious persona that he actually went on to produce a film for him…


Anurag Kashyap joins hands with HIP HOP Rapist Yo Yo Honey Singh

PRATHAMESH JADHAV

We could not believe our eyes when we saw filmmaker Anurag Kashyap sharing stage with popular singer Yo Yo Honey Singh at the launch party of the latter’s recently released album Satan. Kashyap is known for making intense films and hardly does he attend music concerts and shows which happen in the city quite regularly. So we were taken by surprise when we saw the Dev D director chatting away with Singh. But then, we quickly realised that Anurag actually produced the album (Satan) and he even went on to make a film with Yo Yo Honey Singh to promote the album.

The film is directed by David Zennie who had earlier directed the singer’s popular music videoInternational Villager. And now Kashyap has produced the recent video that got nearly 300,000 hits in just one day.

We all know Kashyap’s penchant for dark cinema. Right from Black Friday to Dev D and from Gulal toGangs Of Wasseypur, the intelligent filmmaker has explored the dark side of human psyche and life in general. No wonder then that he took a special interest in producing Honey Singh’s recent album which too has dark shades in it.

Looks like Kashyap and Singh have a lot of dark matter to share and the duo want to stimulate some grey cells with their ‘demonic’ creations!

Honey Singh’s brazenly pornographic and abusive anti-women songs glorifying rape and violence against women

MAIN HOON BALATKAARI !!!!

Raat ko nikali naari

hui gadi pe savaari

par voh raat usko pad gayi bhari.

Peeche se aaya main

utari uski saari

kachchi phadi

lungi gaadi

aur g***d maari.

Kyunki main……….

Kyunki main……….

Kyunki main hoon ek balatkari

Kyunki main……….

Kyunki main……….

Kyunki main hoon balatkari


इस बारे में फेसबुक पर अनुराग कश्यप Anurag Kashyap लोगों द्वारा शेम शेम किए जाने पर कहते हैं- How do you know I have signed honey Singh.. And satan is a music video..and ohh weed is such a bad word.. And kractivist is going to spend her life trying to prove I am anti woman and a sexist.. Sanjivan S Lal sir, do you really want me to react to this bull shit.. Next five years I am making ugly, Bombay velvet and doga.. You are in the business. you know better.. Rest I have no time to react to this…

राजस्थान पत्रिका में जिनेश जैन, संदीप राठौड़, जयप्रकाश सिंह के दायित्व में फेरबदल

राजस्थान पत्रिका में काफी फेरबदल हुए हैं। पत्रिका कोटा में संपादक जिनेश जैन को हटा कर भोपाल में लगाया गया है। कोटा में संदीप राठौड़ को लगाया गया है। वहीं कोटा में चीफ रिपोर्टर रहे जयप्रकाश सिंह को अब भीलवाडा में संपादक बना दिया गया है। जयप्रकाश सिंह बेहद कर्मठ और इमानदार पत्रकार रहे हैं।

रिपोर्टर के रूप में जय प्रकाश सिंह को अनेक पुरस्कार मिले हैं। उनके जाने से भीलवाडा संस्करण की किस्मत बदलने की उम्मीद जताई जा रही है। वे पत्रिका में भुवनेश जैन गुट के खास माने जाते हैं।  

मीडिया से जुड़ी सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

किशोर चौधरी की किताब ”चौराहे पर सीढि़यां” वर्ष 2012 की बेस्ट सेलर

पिछले दिल्ली विश्व पुस्तक मेला में हमारे प्रकाशन की 4 पुस्तकों के साझे-लोकार्पण के दौरान जब भड़ास4मीडिया के मॉडरेटर यशवंत सिंह ने यह कहा था कि देखिएगा, एक दिन हिंदी का बेस्ट-सेलर यहीं से पैदा होगा, तो कम से कम मुझे ऐसा बिलकुल नहीं लगा था कि उनकी भविष्यवाणी को सच होने में इतना कम समय लगेगा।

अक्टूबर 2012 में किशोर चौधरी (Kishore Choudhary) की पहली किताब 'चौराहे पर सीढ़ियाँ' पर हमने काम करना शुरू किया और दिसम्बर के शुरू में ही यह किताब साल 2012 की बेस्ट-सेलर किताब हो गई। आलम यह कि हम एक नये कलेवर में बहुत जल्द इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित कर रहे हैं। दूसरे और परिवर्धित संस्करण की प्री-बुकिंग शुरू हो गई है।

शैलेश भारतवासी Shailesh Bharatwasi के फेसबुक वॉल से.

संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिनेश कुमार ने फिर एक लड़की से की बदसलूकी

संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के एसएचओ दिनेश कुमार ने फिर एक लड़की से बदसलूकी की है. पहले उसे गैर कानूनी ढंग से डिटेन किया गया फिर इस बारे में ट्वीट करने पर धमकाया गया और माफी मांगने के लिए कहा गया. एसएचओ दिनेश कुमार पहले भी वहाँ मौजूद प्रदर्शनकारियों से बदसलूकी करते रहे हैं. 24 दिसंबर की रात हमारे साथी आलोक दीक्षित को भी इसी तरह डिटेन किया गया था. और जब हम छुडाने पहुचे तो हमसे भी बदतमीजी की और धमकियां दीं. साथ ही बड़बोलेपन के साथ बयान दिया कि जब चाहेंगे तुम लोगों को कुचल देंगे जैसे इंडिया गेट पर हुआ था. ऐसे धूर्त पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्यवाही होने की ज़रूरत है, जो आम जनता को कीड़े मकौड़े की तरह समझते हैं. मेरे हिसाब से तो उनके खिलाफ हमें संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में ही एफ आई आर लिखानी चाहिए. बताइये दोस्तों क्या किया जाए. ये है द हिंदू अखबार में प्रकाशित एक खबर…

It was a three-hour ordeal for them at Delhi police station

Devesh K. Pandey

Usha Saxena, who along with her daughter and several other young men and women were detained and allegedly ill-treated by the police at the Parliament Street station here on Tuesday after they went to rescue those detained from the protest venue at Jantar Mantar, has written to Delhi Chief Minister Sheila Dikshit narrating her ordeal.

Ms. Saxena has also lodged a complaint at the same station seeking action against the guilty policemen. In a letter to the Chief Minister, she recounted the almost three-hour horror she, her daughter and several others were subjected to. However, the police have denied the charges.

“We were also detained on Humayun Road and kept at the Mandir Marg police station for six hours on December 24. My daughter Shambhavi and I, and a colleague of mine, Reema Ganguly, went to Jantar Mantar on December 25 to take part in a peaceful gathering there against the gang rape. Around 4 p.m. two girls came running to us in tears and said the police had dragged away their female friends to the Parliament Street police station… The three of us joined nine other women and we went there,” she said.

At the station, they saw a woman constable at the help-desk; the rest were male policemen. The group demanded immediate release of the detainees. “The policemen rudely and aggressively tried to chase us out. We refused to leave without those three women and so one male cop ordered some female cops to arrest all of us. We linked our arms and were being dragged away when I saw a female constable dragging a girl by her hair,” alleged Ms. Saxena, who works with a non-government organisation.

Ms. Saxena’s daughter Shambhavi, a student of the Lady Shri Ram College for Women and a volunteer activist with Greenpeace India, said: “I ran to help her, at which, a female cop started beating me. A male officer, who we later identified as the Station House Officer [SHO], pulled me by my hair and slammed my head against a wall.”

Her mother said that she then extricated herself, ran towards the girls and managed to get them away. “We were then pushed into a small room where we found four other women,” alleged Ms. Saxena in her complaint.

While they were locked up, Shambhavi kept updating her friends through her twitter account seeking help. However, she was accused by many on the social media as a liar.

“I was initially angry after being detained, but later it turned into fear,” said Shambhavi, a resident of neighbouring Gurgaon. Her mother said a woman from NGO Deep Jyoti finally met them and asked them to apologise and give their phone numbers and addresses to the police.

“We all collectively decided to give other names fearing what the police would do with our contact information.”

They were leaving the police station when they saw some cops rushing out demanding to know who Shambhavi was, as she was the one who had informed the media about the detention and ill-treatment meted out by the police.

Ms. Saxena alleged that late on Tuesday night, she received a call threatening to arrest her and her daughter if they did not tender an apology to the SHO.

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से.

खबर रुकवाने के लिए पैसा मांग रहा है टीवी100 का पत्रकार

देहरादून : पत्रकारिता की आड़ में दलाली की चादर ओढ़कर उत्तराखण्ड में पत्रकारिता को शर्मसार किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि यह वाकया पहली बार अंजाम दिया जा रहा हो। मीडिया के नाम पर दलाली व भांड़गिरी करने वाले कई इलेक्ट्रानिक चैनल व प्रिंट मीडिया के दलाल लोगों से वसूली कर पत्रकारिता को बदनाम कर चुके हैं और अभी भी कई लोग इस गोरखधंधे को मोटी रकम वसूल कर अंजाम दे रहे हैं।

ताजा मामला उत्तराखण्ड के उधमसिंह नगर के गदरपुर क्षेत्र से जुड़ा हुआ सामने आ रहा है, जिसमें गदरपुर से टीवी 100 के पत्रकार अमित तनेजा के खिलाफ ब्लैकमेल कर रुपये मांगने के आरोप तराई विद्यापीठ प्रेमनगर प्रधानाचार्य द्वारा लगाए गए हैं। इतना ही नहीं स्कूल के प्रधानाचार्य ने तथाकथित पत्रकार के खिलाफ खबर रोकने के नाम पर रुपये मांगे जाने का आरोप लगाया है। इस खबर से क्षेत्र में हड़कंप मचा हुआ है। उन्होंने चैनल के निदेशक को लिखे गए पत्र में इस बात का भी हवाला दिया है कि गदरपुर क्षेत्र के कई अन्य विद्यालयों में अध्यापकों को मानसिक उत्पीड़न को उक्त पत्रकार द्वारा अंजाम दिया जा रहा है, जिससे विद्यालयों में शैक्षिक कार्य भी प्रभावित हो रहा है।

प्रभारी प्रधानाचार्य का यह भी कहना है कि इसके अलावा उक्त तथाकथित पत्रकार द्वारा सूचना अधिकार अधिनियम के माध्यम से भी विद्यालयों के अध्यापकों के खिलाफ जानकारियां मांगी जा रही हैं, जिसके बाद कई जगहों से रंगदारी वसूले जाने की जानकारी भी मिल रही हैं। उत्तराखण्ड में मीडिया के नाम पर भांडगिरी करने वाले ऐसे कई संगठन सक्रिय हैं, जो उधमसिंह नगर के साथ साथ राजधानी देहरादून, हरिद्वार व अन्य जगहों पर अपनी परिवार की गुजर बसर के लिए मालिकों की तनख्वाह पर टिके नहीं रहते, बल्कि उनका गुजर बसर पुलिस की पॉकेट के साथ-साथ प्रापर्टी डीलरों व नेताओं से हो जाता है। पत्रकारिता की बाढ़ में ऐसे दलाल पत्रकारों को किस तरह टीवी चैनल अपने संस्थानों में जगह दे देते हैं, जो उनकी साख को खराब करने के साथ-साथ पत्रकारिता को भी बदनाम कर देते हैं। यह उधमसिंह नगर के गदरपुर में पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी तथाकथित पत्रकारों द्वारा कई जगहों से अवैध धन की वसूली की जा चुकी है।

देहरादून से नारायण परगाईं की रिपोर्ट.

”क्‍या इससे पत्‍नी की इच्‍छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध स्‍थापित करने वालों की संख्‍या में कमी आएगी?”

लगातार फांसी और castration की मांग करने वालों से मेरे कुछ सवाल हैं : बलात्कार के दोषियों के लिए अगर फांसी जैसा एक कड़ा कानून बना भी दिया जाए तो क्या उसके बाद बंद दरवाजों के पीछे हुए वो मामले जिनकी लोक लाज की वजह से रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई जाती, जिसमे एक पति का अपनी पत्नी की इच्छा के विरूद्ध उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करना भी आता है, क्या इनकी संख्या में कमी आएगी?

आंकड़ों के हिसाब से भी भारतीय बच्चों के एक बहुत बड़े वर्ग को शारीरिक शोषण से गुज़रना पड़ता है, और ये करने वाले 90 प्रतिशत से भी ज्यादा मामलों में उनके सगे रिश्तेदार ही होते हैं, क्या कड़े कानून बन जाने से इन मामलों में कमी आएगी?

भारतीय पुरुष जो महिलाओं को देख सीटी बजाते हैं, अश्लील टिपण्णी करते हैं, जिनकी भाषा का अहम हिस्सा वो गालियाँ होती हैं जो माँ बहन से शुरू होती हैं, क्या इस प्रवृति में सुधार होगा?

हम अरब देशों में लागू किये कड़े कानूनों से सीख लेने को कहते हैं, क्या सचमुच हम अपने देश में एक तानाशाही रवैये को खुद प्रचारित करेंगे? वहां कड़े क़ानून होने के बावजूद भारत, बांग्लादेश जैसे देशों से मानव तस्करी में जिन लड़कियों को हरम में पहुंचा दिया जाता है, क्या आपको ये मालूम नहीं?

पुलिस, न्यायपालिका और सरकार को सवाल करने से पहले हम में से कितने लोगों ने खुद से सवाल किया है की क्या फांसी ही आखिरी रास्ता है?

क्या इसके बाद बालात्कार के मामले कम हो जायेंगे?

क्या ये एक न्याय पिछले और आगे होने वाले सारे ऐसे मामलों में तर्कसंगत है?

क्या आपके घर में गाली-गलौज करते वक़्त आपने सामने वाले को रोका?

क्या जब आपका कोई दोस्त किसी लड़की के लिए अश्लील टिपण्णी करता है तो आप उसे डांटते हैं?

क्या आप अपने पिता, भाई, जीजा, चाचा को घर की महिलाओं पर हिंसा करने से रोकते हैं?

हम जब सफाई की बात करते हैं, तब सबसे पहले अपनी सफाई करते हैं, तो कैसे आप एक ऐसी मानसिकता जिसे खुद शुद्धिकरण की ज़रूरत है, उस पर काम किये बिना, शासन और न्यायपालिका से देश की सफाई की मांग कर कर रहे हैं?

इला जोशी के फेसबुक वॉल से साभार.

जी समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा पॉलीग्राफ टेस्‍ट के लिए तैयार

The Delhi police crime branch is busy finalising an elaborate questionnaire for the proposed polygraph test on Zee Group chairman Subhash Chandra, an accused in the case involving alleged extortion of `100 crores from the Jindal group. Crime branch sources said their probe was progressing rapidly and they were confident of a foolproof case.

The police plans to grill Mr Chandra again through a lie detector test. Mr Chandra and his son Puneet Goenka have already been subject to marathon questioning by the crime branch. A city court earlier directed the police to give Mr Chan-dra adequate notice before the polygraph test, subject to approval by his doctors. The police plans to confront Mr Chandra with certain new developments and information that emerged since he was last questioned. (Courtesy : Asian age)

”छह बलात्‍कारियों से घिर गई तो समर्पण क्‍यों नहीं कर दिया?”

खरगोन : दिल्‍ली में हुए गैंगरेप से जहां राजधानी समेत पूरा देश नाराज है. लोग गुस्‍से में हैं, वहीं मध्‍यप्रदेश में एक महिला कृषि वैज्ञानिक के बयान ने सबको हतप्रभ और स्‍तब्‍ध कर दिया है. मध्य प्रदेश के खरगौर जिले में पुलिस विभाग द्वारा महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता पर एक सेमीनार रख गया था. इसमें एक महिला कृषि वैज्ञानिक डॉ. अनीता शुक्ला, जो लायंस क्लब की अध्यक्ष भी हैं, को भी निमंत्रित किया गया था. पर उन्होंने इस सेमीनार में बोलते हुए दिल्ली गैंगरेप मामले में पीडि़ता को ही जिम्मेदार ठहरा दिया. उन्होंने कहा छह लोगों से घिरने पर लड़की ने चुपचाप समर्पण क्यों नहीं कर दिया? कम से कम उसकी आंतें निकालने की नौबत तो न आती. अनीता शुक्ला इतने पर ही नहीं रुकीं उन्‍हों ने कहा कि महिलाएं ही पुरुषों को उकसाती हैं.

उन्होंने और भी सवाल उठाए. उनका सवाल था 10 बजे रात को लड़की घर से बाहर क्या कर रही थी? वह भी अपने ब्वॉयफ्रैंड के साथ. अगर इतनी देर रात तक लड़कियां ब्वॉयफ्रैंड के साथ घुमेंगी तो यही होगा. पुलिस कहां तक देख-रेख करेगी? उन्होंने पीडि़ता के प्रतिरोध को भी उसका दुस्साहस बताया. उन्‍होंने कहा कि हाथ पांव में दम नहीं, हम किसी से कम नहीं. जब डॉ. अनीता से पूछा कि पूरा देश जिस मामले को लेकर इतना संवेदनशील है, तब आप ऐसा क्यों कह रही हैं? उन्होंने फिर वही बातें दोहराईं और कहा-देखिए, मेरी उस पीडि़ता के प्रति पूरी संवेदना है लेकिन ऐसी घटनाओं को महिलाएं ही समझदारी दिखाकर रोक सकती हैं. वहां अधिकारी भी मौजूद थे किसी ने इस महिला को रोकने की कोशिश नहीं की.

ये रहा न्‍यूजवीक का पहला और आखिरी एडिशन

मीडिया में समय चक्र तेजी से घूम रहा है. नई तकनीक पुराने दौर पर हावी होता जा रहा है. प्रिंट मीडिया के अगले पांच दशकों में क्‍या भविष्‍य होगा, इस पर चर्चाएं चल रही हैं. कुछ लोगों का कहना है कि प्रिंट मीडिया पर कोई आंच नहीं आए वहीं कुछ लोग नई तकनीकों के लगातार अपग्रेडेशन को देखते हुए प्रिंट मीडिया के भविष्‍य के प्रति खतरा जता रहे हैं. इन चर्चाओं को और अधिक मुखर किया है 'न्‍यूजवीक' के बंद हो जाने की खबर ने. न्‍यूज वीके ने इस साल के आखिरी सप्‍ताह में अपना आखिरी एडिशन प्रकाशित किया है.

द न्‍यूजवीक का पहला अंक 17 फरवरी 1933 में प्रकाशित हुआ था. लगभग आठ दशक पुराना यह अखबार अब बंद हो जाएगा. हालांकि प्रबंधन ने घोषणा की है कि इस साप्‍ताहिक अखबार का प्रिंट एडिशन भले ही बंद हो जाए पर इसका ऑनलाइन एडिशन लगातार प्रकाशित होता रहेगा. अगले साल फरवरी महीने से डिजिटल न्‍यूजवीक का प्रकाशन शुरू कर दिया जाएगा. आप भी देखिए न्‍यूजवीक का पहला और आखिरी प्रिंट एडिशन.  

द हिंदू के सुरेंद्र ने दिखाया देश का हालात ‘ठीक है’

दिल्‍ली में गैंगरेप में पूरे देश में उबाल के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी चुप्‍पी तोड़ी. तमाम चैनलों पर उनके रिकार्डेड बयान चलाए गए, पर लास्‍ट में एक गड़बड़ी हो गई कि वे बोल गए 'ठीक है'. ये ठीक है ने मीडिया-सोशल मीडिया हर जगह उनकी इज्‍जत खराब कर रखी है. लोग अपने अपने तरीके से चुटकियां ले रहे हैं. इसी क्रम में कार्टूनिस्‍ट भी पीएम के 'ठीक है' पर अपनी कूंची चला रहे हैं. द हिंदू के कार्टूनिस्‍ट सुरेंद्र ने भी अपनी कूंची 'ठीक है' तरीके से उकेरा है. 

ऋषि का नोएडा तबादला, मंगल कलश टीवी से चार का इस्‍तीफा

अमर उजाला, शाहजहांपुर से खबर है कि ऋषि श्रीवास्‍तव का तबादला नोएडा के लिए कर दिया गया है. वे रिपोर्टर के रूप में अखबार को अपनी सेवाएं दे रहे थे. उन्‍हें नोएडा में प्रमोशन करके भेजा गया है. वे शाहजहांपुर में पांच सालों से काम कर रहे थे तथा प्रशासन बीट देख रहे थे. इसके पहले ऋषि अमर उजाला के लखीमपुर खीरी के ब्‍यूरोचीफ की जिम्‍मेदारी भी निभा चुके हैं. अमर उजाला से पहले वे दैनिक जागरण को अपनी सेवाएं दे रहे थे. 

मंगल कलश टीवी से खबर है कि विनीत श्रीवास्‍तव, अनिल कुमार, अनिल चौरसिया एवं विनीत माथुर का संबंध समाप्‍त हो गया है. बताया जा रहा है कि प्रबंधन से विवाद होने के बाद इन लोगों ने इस्‍तीफा दे दिया. ये लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू कर रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है.

अभिसार शर्मा आजतक से गए

अभिसार शर्मा अब आज तक पर नहीं दिखेंगे. उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. वे डिप्टी एडिटर के पद पर कार्यरत थे. वे प्रतिभाशाली और चर्चित एंकरों में शुमार किए जाते हैं. अभिसार के मुताबिक वे किताब लिख रहे हैं. अभिसार के इस्तीफे को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं. अभिसार 17 वर्षों से मीडिया में हैं और रामनाथ गोयनका पुरस्कार भी पा चुके हैं.

अभिसार ने 1996 में करियर की शुरुआत मैग्जीन न्यूज ट्रैक से की. बाद में वे जी टीवी से जुड़े. बाद में अभिसार लंदन गए जहां बीबीसी में प्रोड्यूसर बने. बीबीसी से अलग होने के बाद अभिसार एनडीटीवी संग आए. वे 2007 में आज तक के हिस्से बने. पिछले साल अभिसार की किताब 'द आई ऑफ़ द प्रिडेटर'  प्रकाशित हुई.

 
 

भड़ास जांच दल की रिपोर्ट : पुलिस की हेकड़ी से रायबरेली में भड़का पत्रकारों का गुस्‍सा

: रायबरेली के पत्रकार लाठीचार्ज प्रकरण की जांच के लिए कुमार सौवीर के नेतृत्‍व में दो सदस्यीय भड़ास जांच दल की रिपोर्ट : भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह भी थे जांच दल में : रायबरेली में पत्रकारों पर लाठीचार्ज के प्रकरण का सच जानने के लिए भड़ास4मीडिया का एक जांच दल वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार सौवीर के नेतृत्‍व में रायबरेली गया। वहां पुलिस और पत्रकार, दोनों पक्षों से बात कर मामले की जानकारी प्राप्‍त की। वहां पर साफ नजर आया कि पत्रकारों में गुस्सा पुलिस की असंवेदनशीलता के कारण है। इसी असंवेदनशीलता का असर है कि पत्रकार तो पत्रकार अब आम आदमी भी पुलिस से नाराज है। अगर पुलिस ने तनिक भी दूरदर्शिता दिखाई होती तो शायद इस तरह की नौबत नहीं आ पाती।

पुलिस एवं प्रशासन की हेकड़ी ने पत्रकारों का गुस्‍सा और भड़का दिया है। साथ ही कई पत्रकारों पर मुकदमा लिखे जाने से पूरे रायबरेली में आक्रोश है।  रायबरेली में झगड़ा के दो पहलू सामने आये हैं। पत्रकारों के अनुसार मामला कुछ इस तरह है। 19 तारीख की दोपहर 11 बजे इंडिया टीवी के रिपोर्टर शिवप्रसाद यादव का भतीजा नितिन स्‍टेट बैंक की सिटी ब्रांच में अपने खाते में 40 हजार रुपये जमा कराने गया था। मुम्‍बई में मर्चेंट नेवी की पढ़ाई कर रहे नितिन को यह रकम अपने पढ़ाई के लिए उसकी मां ने दिया था। इन रुपयों को वो मुम्‍बई नकद ले जाने के बजाय यह रकम अपने खाते में डालनी चाही। उस समय शिक्षक अर्हता परीक्षार्थियों का प्रवेश फार्म जमा कराने वालों की भीड़ थी। वहां मौजूद पुलिसवालों ने नितिन को सीधे फार्म जमा करने वाली लाइन में लगाने को कहा।

इस पर नितिन ने बताया कि यह रकम उसे अपने खाते में जमा करना है, सीईटी के लिए नहीं। इस पर वहां परीक्षार्थियों की भीड़ से निपट रहे सिपाही को शायद यह बात समझ में नहीं आयी और उसने कॉलर घसीट कर झापड़ मार दिये और धक्‍का देकर जमीन पर गिरा दिया। इस पर नितिन ने भी विरोध किया। बात बढ़ गयी तो पुलिसवाले नितिन को लेकर कोतवाली ले गये जहां उसकी डेढ़ घंटों तक जमकर पिटाई की गयी।

उधर पुलिस में दर्ज करायी गयी एफआईआर में सिपाही ललित सागर ने कहा है कि नितिन समेत 2-3 लोग जबरन लाइन में घुस रहे थे। ललित ने ऐतराज किया तो उसे जातिसूचक गाली देते हुए उनकी नेमप्‍लेट नोंच डाली। ललित के आरोप के अनुसार वहां मौजूद होमगार्ड हरीराम को भी गालियां दी गयीं। आरोप के अनुसार विवाद बढ़ने पर ललित को उसके साथियों ने सुरक्षित कोतवाली पहुंचाया।

उधर, रायबरेली प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष ओमप्रकाश मिश्र का कहना है कि बैंक में हुई घटना की खबर मिलने पर दर्जनों पत्रकार कोतवाली पहुंचे। लेकिन न तो कोतवाल संतोष द्विवेदी ने और न ही सीओ पंकज पांडेय ने कोई संतोषजनक जवाब दिया। इन अधिकारियों ने पत्रकारों को बताया कि ऐसा कोई मामला कोतवाली में अभी तक आया ही नहीं है। लेकिन पत्रकारों को अचानक पता चला कि नितिन को पुलिसवाले कोतवाली में बुरी तरह पीट रहे हैं। नितिन को बरामद करने की मांग अब तेज हो गयी। पत्रकारों ने कोतवाली के सामने धरना शुरू कर दिया। करीब 2 घंटे बाद पुलिसवालों ने नितिन को छोड़ा। दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के प्रभारी अखिलेश बताते हैं कि कोतवाली से निकाले गये नितिन बेहोशी की हालत में था। उसके शरीर पर गहरी चोटें भी आयीं थी। एबीपी न्‍यूज के रामेंद्र के अनुसार जब इस पर अपर अधीक्षक राहुल राज से बात की गई तो उन्‍होंने खुद के जेल निरीक्षण पर होने की बात कही, जबकि लगातार चार घंटों तक पुलिस अधीक्षक प्रेम नारायण ने पत्रकारों का फोन तक नहीं उठाया। एसपी के घर और दफ्तर से लगातार यही बताया गया कि साहब जरूरी काम में व्‍यस्‍त हैं।

जनसंदेश टाइम्‍स के उपमेंद्र सिंह बताते हैं कि नितिन की बुरी हालत और पुलिस से कोई सुनवाई नहीं होने के कारण पत्रकारों ने इलाहाबाद-लखनऊ राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर मामा चौराहे पर जाम लगा दिया। यह शाम चार बजे का वक्‍त था। जाम के चलते यह पूरा राष्‍ट्रीय मार्ग पर गाडि़यों की कतारें लग गयीं। पुलिस कंट्रोल पर खबर प्रसारित होने के बावजूद पुलिस मौके पर नहीं पहुंची। लेकिन अचानक साढ़े पांच बजे भारी पुलिस के साथ एसपी मौके पर पहुंचे और वहां मौजूद पत्रकारों से बातचीत करने के बजाय सीधे लाठीचार्ज का आदेश दे दिया। रामेंद्र का आरोप है कि एसपी शराब के नशे में थे और पत्रकारों को गालियां देते हुए पुलिस को कहा कि मारो सालों को। अभी इन हरामजादों का दिमाग ठीक करता हूं। खैर, बाद में कोतवाल की तरफ से दर्ज करायी गयी एफआईआर में लिखा गया कि यह दर्जनों पत्रकार राजमार्ग पर अराजकता फैला रहे थे। एफआईआर में दस पत्रकारों को नामजद तथा कई अज्ञात बताते हुए पुलिस ने उन पर 7-क्रिमिनल लॉ एमेंडमेंट एक्‍ट समेत सात अन्‍य धाराएं भी थोप दीं।

कुछ भी हो, रायबरेली का माहौल बेहद तनावपूर्ण है। सीडीओ डॉक्‍टर अख्‍तर रियाज प्रभारी जिलाधिकारी का चार्ज देख रहे हैं, लेकिन पुलिस के मामले में कोई भी हस्‍तक्षेप नहीं करना चाहते। चर्चाएं तो यहां तक है कि प्रदेश सरकार के स्‍वास्‍थ चिकित्‍सा मंत्री अहमद हसन का खुद को भांजा बताने वाले रियाज अब किसी भी बात पर अपने शेर-शायरी की तुकबंदी पेश करते हैं, जो प्रधानों को जबरिया बेची गयीं किताबों में दर्ज है। इस किताब के लेखक भी रियाज ही है। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि डीएम भी अवकाश पर रियाज के चलते ही गए हैं। एसपी प्रेम नारायण का कहना है कि गुंडई करने वाला कोई भी शख्‍स अपराधी है। वे खारिज करते हैं कि पुलिस ने पत्रकारों पर लाठीचार्ज किया था। हम तो केवल जाम हटाने के लिए वहां गये थे, जो हमारी प्राथमिकता है। प्रेम नारायण का आरोप है कि इस पूरे मामले में कुछ लोगों की साजिशें हैं, हम ऐसे लोगों को कैसे छूट दे सकते हैं।

अब चाहे भाजपा हो, कांग्रेसी या सपाई अथवा कम्‍युनिस्‍ट, इस हादसे पर पुलिस के खिलाफ है। एक प्रमुख व्‍यापार मंडल के अध्‍यक्ष आशीष द्विवेदी साफ कहते हैं कि हमें नहीं पता है कि शुरुआती गलती पुलिस ने की या पत्रकारों ने। लेकिन बुद्धिजीवियों पर इस तरह का लाठीचार्ज अब कैसे बर्दाश्‍त किया जा सकता है। सेंट्रल बार एसोसियेशन के अध्‍यक्ष ओपी यादव कहते हैं कि पूरा मामला हमारे सामने है और इसीलिए हम जिले की सारी अदालतों पर तब से ही लगातार काम बंद किये हैं। फौजदारी की कोर्ट खुलने पर वहां भी हड़ताल रहेगी। इंडियन मेडिकल एसोसियेशन के स्‍थानीय नेता सीबी सिंह बताते हैं कि हम सांकेतिक हड़ताल कर रहे हैं। लेकिन इतना पूरा हंगामा होने के बावजूद प्रभारी डीएम ने इस पूरे मामले में हस्‍तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि यह पूरा मामला पुलिस का है, वह ही इससे निपटेगी। यानी जनता और पुलिस-प्रशासन के बीच रस्‍साकशी का माहौल अभी बना रहेगा। जाहिर है कि इसमें पीसी जाएगी केवल जनता।

‘ठीक है’ : गलती एएनआई की और सजा दूरदर्शन कर्मी को!

: कानाफूसी : गैंगरेप के बाद दिल्ली और पूरे देश में आठ दिनों तक जारी हंगामे के बाद जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चुप्पी तोड़ी तो उस पर और ज्यादा बवाल मच गया। प्रधानमंत्री ने अपने रिकार्डेड स्पीच में गैंगरेप पीड़िता के प्रति सहानुभूति जताते हुए लोगों के गुस्से को जायज ठहराया। लेकिन उसी स्पीच के रिकार्डेड आखिरी दो शब्द ‘ठीक है’ टेलीकास्ट होने के बाद प्रधानमंत्री का भाषण ही उनके लिए गले की हड्डी बन गया है। सोशल मीडिया, फेसबुक से लेकर ट्विटर पर और समाचार पत्रों में मनमोहन सिंह की तीखी आलोचना हुयी है।

इसके बाद बलि का बकरा दूरदर्शन के पांच कर्मियों को बनाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि गलती एएनआई की और सजा दूरदर्शनकर्मी को क्यों? प्रधानमंत्री ने अपना भाषण एएनआई को रिकार्ड कराया और उसी में आखिरी शब्द ‘ठीक है’ भी रिकार्ड हो गया। एएनआई ने ‘ठीक है’ शब्द को बिना एडिट किये ही प्लेआउट कर दिया, जो एक ही साथ देश के तकरीबन 41 चैनलों पर चला। इसके बाद प्रधानमंत्री का भाषण मजाक का पात्र बन गया है। लेकिन एएनआई के गलती की गाज पीएमओ ने दूरदर्शन के पांच कर्मियों पर गिरा दी। गलती के तत्काल बाद एएनआई ने अपनी तरफ से सफाई भी जारी की। लेकिन एएनआई की सफाई से पीएमओ का गुस्सा कम नहीं हुआ है।

एएनआई को दूरदर्शन की तरह ही दूसरा सरकारी डिपार्टमेंट माना जाता है। दूरदर्शन पर चलने वाले कई प्रोग्राम एएनआई में बनते हैं। इस हालत में एएनआई की गलती को प्रधानमंत्री कार्यालय पचा नहीं पा रहा है। वहीं एएनआई में इस गलती को लेकर अच्छी खासी गहमागहमी है। मीडियाकर्मियों के गॉसिप पर भरोसा करें तो ‘ठीक है’ के टेलीकास्ट के सूत्रधार एएनआई के इनपुट हेड और कंपनी के मालिक के बेटे को माना जा रहा है।

उपरोक्त विश्लेषण एक मीडियाकर्मी ने भड़ास को मेल से भेजा है. उन्होंने अपना नाम गोपनीय रखने का अनुरोध किया है. अगर आप इस प्रकरण पर कोई और विचार रखते हैं तो नीचे कमेंट बाक्स का सहारा ले सकते हैं या फिर bhadas4media@gmail.com के जरिए भड़ास तक मेल कर सकते हैं

IWPC PANEL DISCUSSION : REPORTING ON RAPE

Was the media insensitive or irresponsible while reporting the brutal rape of a 23 year-old on December 16; did excessive coverage fuel a mass frenzy or did it force the government to address the issue? To discuss this and other issues related to the media coverage of the rape, the Indian Women's Press Corps is organising a discussion.

REPORTING ON RAPE

at 3.00 pm, on Saturday, December 29, 2012,

5, Windsor Place, Janpath Roundabout.

Participants include:

Pamela Philipose, Editor-in-Chief of the Women's Feature Service,

Nivedita Menon, Centre for Comparative Politics, Jawaharlal Nehru University and closely associated with the political and social blog, kafila.org,

Ravish Kumar, Executive Editor, NDTV India,

Vinod Mehta, Founding-Editor and Chairman, Outlook and

Ashis Nandy, political psychologist and sociologist, Centre for the Study of Developing Societies

This is the first in a series of debates on the December 16 incident. Following discussions will focus on the Law and Rape and the Politics of Rape.

Warm Regards,

T.K. Rajalakshmi                          
(President)     
Mannika Chopra  
(General Secretary)

PR

पत्रकार योगराज ने सेव गर्ल चाइल्ड विषय पर आठ मिनट की फिल्म बनाई

नई दिल्ली। ए2जेड न्यूज चैनल के डिप्टी न्यूज हेड व आज की दिल्ली मैग्जीन के संपादक योगराज शर्मा ने सेव गर्ल चाइल्ड विषय पर 8 मिनट की एक शार्ट फिल्म बनाई है। नाम है- 'परी की पुकार'। इसे यूट्यूब व फेसबुक लांच कर दिया गया है। बेटी बचाओ का संदेश देती इस फिल्म को काफी मार्मिक तरीके से लिखा व फिल्माया गया है।

फिल्म निर्माण में स्पलैश वाटर पार्क, ए2जेड न्यूज चैनल का विशेष सहयोग रहा। पूरी फिल्म का बेस्ट पार्ट इसका विशेष गीत है जो लास्ट में नंबरिंग के दौरान है।

http://www.youtube.com/watch?v=lszjWo9a4uM&feature=youtu.be

बेटियों का बाप हूं, शहर में डर लगता है

काले शीशे के पीछे
जब कोई हरकत होती है
तब डर लगता है,
इस शहर का हर चेहरा
अब बर्बर लगता है।

इंसानों की भीड़ में
इंसानियत कहीं दिखती नहीं
भीड़ का एक एक चेहरा
पहले से बदतर लगता है।

खौफ में है हर मासूम
बेबस है सरकार
सिर्फ कातिल ही इस शहर में
बेफिक्र और निडर लगता है।

रात के अंधेरे में तो
डरते थे पहले भी
दिन का उजाला भी बन गया दुश्मन
अब तो सिसकियों और चीख से भरा
हर पहर लगता है।

हजारों मासूम आंखें
पूछती हैं सवाल हमसे
क्यों बेअसर हैं बाबुल की दुआएं
क्यों बेजुबान है हमारी संसद
जो मंदिर था लोकतंत्र का वही
अब भूतों का खंडहर लगता है।

हर आहट कातिलों के आने की सूचना देती है
दर ओ दीवार पर उसकी तस्वीर दिखती है
रहनुमा भी मुखौटों में कैद हैं
अपना घर भी अब घर नहीं लगता।

डंडे लाठी फांसी गोलियां
हमें डराने को काफी हैं
‘शिकार’ पर निकले दरिंदों के लिए
ये हथियार भी बेअसर लगता है।

डरा सहमा सा है आज
इस शहर का हर आदमी
दहशत में सारा शहर लगता है।
दो बेटियों का पिता हूं
अब इस शहर में डर लगता है।

वरिष्‍ठ पत्रकार किशोर मालवीय की कविता, जो उन्‍होंने दिल्‍ली में पिछले दिनों हुए घटनाक्रम पर कटाक्ष करते हुए लिखी है. यह कविता उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग गुस्‍ताखी माफ पर लिखी है, जिसे वहीं से लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

न्‍यूज चैनलों के लिए 9 जनवरी को जारी होंगे टैम के आंकड़े

टेलीविजन के दर्शकों की संख्या की निगरानी करने वाली एकमात्र भारतीय एजेंसी टैम मीडिया समाचार चैनलों के व्यूअरशिप के आंकड़े 9 जनवरी को जारी करेगी। इससे पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने रेटिंग एजेंसी से समाचार चैनलों के व्यूअरशिप आंकड़ों को जारी नहीं करने के लिए कहा था। एजेंसी इससे पहले 7 अक्टूबर 2012 के बाद से सभी प्रकार के कार्यक्रमों से जुड़े व्यूअरशिप आंकड़ों को जारी करने वाली थी।

यह फैसला सोमवार को इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ), एडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एएएआई) और इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाइजर्स (आईएसए) के बीच हुए समझौते के बाद लिया गया। न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन पहले से ही लंबित अवधि के लिए व्यक्तिगत तौर पर चैनलों के व्यूअरशिप आंकड़ों को जारी किए जाने के मामले में अपनी सहमति दे चुकी है। (बीएस)

मीडिया अपनी हद को समझे : मनीष तिवारी

नई दिल्ली। वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने जहां बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में राजमार्ग पर हुई मीडिया के प्रति पुलिसिया कार्रवाई की निंदा करते हुए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ से माफी मांगी। वहीँ, सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने घटना की आलोचना के साथ ही साथ मीडिया पर भी निशाना साधा और मीडिया को गाइड लाइन तक याद दिला डाली। मनीष तिवारी ने कहा कि मीडिया को विरोध प्रदर्शन के दौरान पैदा हुई हिंसा की स्थिति की संवेदनशीलता को समझना चाहिए था। साथ ही इस पर भी विचार करना चाहिए था कि इण्डिया गेट और राजमार्ग का आलम क्या था और वहां की परिस्थितियां कैसी हो गई थीं।

उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया पर हुए हमले को तरजीह देने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि पुलिस कार्रवाई के दौरान लोगों को जो चोटें आईं, उससे दिल्ली पुलिस के काम में भी दखल हुआ। कुछ लाठियों का शिकार हुए और कुछ अन्य घायल होने से बच गए। उन्होंने कहा, ''इस सबके लिए मैं माफी मांगता हूं, मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप भी बड़प्पन और बड़ा दिल दिखाते हुए इस घटना को अब भूल जाएं और लोगों को शांत करने में हमारी मदद करें।'' (पर्दाफाश)

न्‍यूजवीक का आखिरी प्रिंट एडिशन प्रकाशित

वाशिंगटन : अमेरिकी साप्ताहिक समाचार पत्रिका `न्यूजवीक` ने सोमवार को अपना अंतिम मुद्रित अंक जारी किया। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर मिडटाउन मैनहट्टन में स्थित न्यूजवीक की पुरानी इमारत की श्वेत-श्याम तस्वीर प्रकाशित की गई है। साथ ही मुखपृष्ठ पर लिखा है, `लास्ट प्रिंट इशु`। पत्रिका की प्रधान सम्पादक टीना ब्राउन ने सोमवार को एक वक्तव्य जारी कर कहा था, ‘आपके हाथों में यह `न्यूजवीक` का अंतिम मुद्रित अंक होगा।’

उन्होंने कहा, ‘पत्रिका का अगला अंक जनवरी के पहले सप्ताह में आपके आईपैड या फोन पर जारी होगा। फरवरी के अंत तक डिजिटल `न्यूजवीक ग्लोबल` का प्रकाशन शुरू हो जाएगा, वर्तमान में इसे विकसित किया जा रहा है।’ ब्राउन ने अक्टूबर में घोषणा की थी कि साल के अंत तक पत्रिका अपने मुद्रित अंक का प्रकाशन बंद कर देगी और उसे डिजिटल उत्पाद के नए रूप में पेश करेगी। पत्रिका के प्रकाशन में यह फेरबदल तब आया है जब यह फरवरी में अपनी 80वीं वर्षगांठ मनाने की तैयारी कर रही है। यह पत्रिका ऐसे प्रिंट न्यूज मीडिया का सबसे नया उदाहरण है जो व्यवसाय में बने रहने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि अब ज्यादातर विज्ञापनदाता इंटरनेट की ओर चले गए हैं। (एजेंसी)

पुलिसिया आतंक के खिलाफ पत्रकार एवं आमजन लामबंद, 27 दिसम्‍बर को बंद रहेगा रायबरेली

रायबरेली : रायबरेली में जनता के खिलाफ पुलिस लामबंद हो गयी है। पुलिस की लाठियों की करतूतों के खिलाफ रायबरेली में गुरुवार को हड़ताल रहेगी। पेट्रोल पंपों, दवाखानों और अस्‍पतालों में तो सांकेतिक बंदी का ऐलान हुआ है, जबकि खुदरा बाजारों में शटर-दरवाजे बंद रहेंगे। बंदी में आटो मोबाइल्‍स विक्रताओं और आटो-चालकों ने अपने चक्‍के जाम रखने का ऐलान किया है। अदालतों में तो पहले से ही हड़ताल चल रही है। जिले में अब तक करीब 55 संगठनों ने पूर्ण हड़ताल की घोषणा कर दी है। लेकिन तदर्थवाद पर खड़ा जिला प्रशासन और पुलिस अब तक लगातार अपने अडि़यल रवैये पर है। पुलिस अधीक्षक ने साफ तौर पर कह दिया है कि यह आंदोलन स्‍थानीय चंद साजिशों का नतीजा है और ऐसी हालत में उसके सामने झुकने का कोई औचित्‍य नहीं।

19 दिसम्‍बर को दिनभर चले एक शर्मनाक घटनाक्रमों के बाद से रायबरेली में भूचाल खड़ा हो चुका है। फिरोज गांधी डिग्री कालेज चौराहे पर अनिश्चितकालीन धरना और प्रदर्शन चल रहा है। पहली बार तख्‍ता-पलट करते हुए जिले में विधायक बने समाजवादी पार्टी के सभी चारों विधायकों ने भी आंदोलन का समर्थन कर दिया है। और अब 27 तारीख को पूर्ण हड़ताल का ऐलान हो गया है। लेकिन प्रशासनिक विकलांगता की हालत यह है कि जिलाधिकारी 3 महीने से छुट्टी पर हैं। प्रभारी जिलाधिकारी के रूप में काम संभाल रहे सीडीओ पूरे मामले से अपना पल्‍ला झाड़ चुके हैं। पुलिस अधीक्षक ने खुले तौर पर कह दिया है कि यह पूरा मामला साजिश है और उसके सामने घुटना नहीं टेकेंगे।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के जाने माने और वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क kumarsauvir@yahoo.com या kumarsauvir@gmail.com या 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

हवाला आरोपों में अपने उत्‍तर से संतुष्‍ट नहीं कर सका एचएसबीसी, आरबीआई से दुबारा शिकायत

एचएसबीसी बैंक ने आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा ‘आप’ कन्वेनर अरविन्द केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोपों के सन्दर्भ में प्रेषित शिकयतों को पूरी तरह गलत बताया है. इन आरोपों में एचएसबीसी द्वारा स्विस बैंकों में काला धन जमा करने में मदद करना, देश में हवाला रैकेट चला कर टैक्स चोरी कराना शामिल हैं. यह भी आरोपित किया गया कि एचएसबीसी, दुबई और जिनेवा के पास भारत में बैंकिंग कार्य करने के लाइसेंस नहीं हैं और उनके भारतीय ऑपरेशन अवैध हैं.

इन आरोपों के आधार पर अमिताभ और नूतन ने आरबीआई को इनकी जांच कर सत्यता पाए जाने पर बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम 1949 की धारा  22(4) के अंतर्गत लाइसेंस निरस्त करने का अनुरोध किया था. आरबीआई ने एचएसबीसी से इन शिकायतों पर तीस दिनों में उत्तर देने को आदेशित किया. इस पर बैंक की मुख्य नोडल अधिकारी सीमा मेहता ने 20 दिसंबर 2012 के अपने पत्र में कहा कि बैंक बहुत गंभीरता से सभी कानूनों का पालन करता है और पिछले साल एक नए वैश्विक लीडरशिप टीम और नयी नीति के बाद से उसने कानूनों का परिपालन कराने को ठोस कदम उठाये हैं.

चूँकि इस पत्र में शिकायतों में उठाये गए किसी भी मूल मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गयी थी, अतः अमिताभ और नूतन ने आरबीआई के गवर्नर को पुनः पत्र भेज कर इन आरोपोंकी जांच करने और उचित विधिक कार्यवाही किये जाने की मांग की है.


Second letter to Governor, RBI-

To,
Dr. D. Subbarao
Governor  
Reserve Bank of India  
Central Office  
Mumbai 400 001

Subject- Enquiry and necessary action as regards allegations against Hong Kong and Shanghai Banking Corporation Ltd. (HSBC)
 
Dear Sir,
1. That the petitioners No 1 and 2, Amitabh Thakur and Dr Nutan Thakur had presented a very serious matter associated with black money and hawala transactions in assistance with Hong Kong and Shanghai Banking Corporation Ltd. (HSBC) through their representation No- AT/HSBC/01 dated- 10/11/2012 based on the Press Note of Sri Kejriwal and Sri Bhushan in their Press Conference in New Delhi dated 09/11/2012 where they made some very serious allegations against many persons and the HSBC Bank.

2. That based on this representation, the Reserve Bank of India through its letter dated 21/11/2012 has directed the Nodal Officer to enquire into the matter and take necessary action within a period of 30 days and to intimate the petitioners.

3. That the petitioners got a letter dated 20/12/2012 from Ms Seema Mehta, acting Chief Nodal Officer, HSBC which said that the Bank takes compliance with the law very seriously and with a new senior global leadership team and a new strategy since last year, it takes concrete steps to strengthen compliance, risk management and culture. (Copy of the letter being attached)

4. That from this response, it can be easily seen that the core issues in the compliant are still completely untouched and unanswered and the alleged party has only given a cursory answer to the matter in a few good-sounding words which do not seem to have any meaning.

5. That hence all the allegations as regards facilitating in black money transaction, operating in India without licence and other facts related with allegations of a July 2011 list of roughly 700 people having bank accounts in HSBC, Geneva received by the Indian Government, statements of three persons Shri Parminder Singh Kalra, Shri Praveen Sawhney and Shri Vikram Dhirani revealing that HSBC is openly and brazenly running a hawala racket in India and the October 2011 report sent by Director of Investigations, Delhi to Director General of Investigations, Delhi saying that HSBC officials were indulging in hawala and also encouraging tax evasion in India have not even been touched.

6. That similarly, the allegation that HSBC, Dubai and Geneva do not have a license from RBI to conduct banking operations in India and their operations in India are completely illegal has not been given any consideration, nor has it been explained in the response of the HSBC dated 20/12/2012.

7. That in such conditions, being completely dissatisfied with the response, the petitioners are left with no option than to further pursue this extremely important and sensitive issue related with the country’s financial well-being.

8. That the petitioners were directed by the RBI letter dated 21/11/2012 to approach the Banking Ombudsman, Kanpur in case they do not feel satisfied with the response.

9. That but for various reasons, being explained hereunder the petitioners are not approaching the Banking Ombudsman and are again directly approaching you for necessary action.

10. That this is because the Banking Ombudsman Scheme 2006 was introduced with the object of enabling resolution of complaints relating to certain services rendered by banks and to facilitate the satisfaction or settlement of such complaints. Its prime focus is on ‘award’ and ‘settlement’ defined in Clause 3 of this Scheme. ‘Banking Ombudsman’ means any person appointed under Clause 4 of the Scheme while as per clause 3(6), ‘Complaint’ means a representation in writing or through electronic means containing a grievance alleging deficiency in banking service as mentioned in clause 8.

11. That Clause 8 provides for the Grounds of Complaint. All the grounds are associated with alleged deficiency in banking like non-payment or inordinate delay in the payment or collection of cheques, drafts etc, non-acceptance of notes, coins etc, non-adherence to prescribed working hours, failure to provide or delay in providing a banking facility, refusal to open or close deposit accounts without any valid reason, levying of improper charges, forced closure of deposit accounts; non-adherence to the fair practices code or Reserve Bank guidelines etc. Similarly, a complaint can be made alleging deficiency in banking service in respect of loans and advances regarding non-observance of Reserve Bank Directives on interest rates; delays or non-acceptance of application in sanction and disbursement of loan applications; non-adherence to fair practices codes and Reserve Bank guidelines.

12. That only as regards the above kinds of complaints, the Banking Ombudsman endeavours to promote a settlement of the complaint by agreement between the complainant and the bank through conciliation or mediation as per provisions of Clause 11 or if a complaint is not settled by agreement within a period of one month, he passes an Award or rejects the complaint as per the given facts as per Clause 12 of the Ombudsman Scheme 2006.

13. That the same fact has been reiterated in Clause 7(2) related with Power and jurisdiction of the Ombudsman which says- “The Banking Ombudsman shall receive and consider complaints relating to the deficiencies in banking or other services filed on the grounds mentioned in clause 8 and facilitate their satisfaction or settlement by agreement or through conciliation and mediation between the bank concerned and the aggrieved parties or by passing an Award in accordance with the Scheme.”

14. That it is very obvious that the complaints presented by the petitioners are not related to “the deficiencies in banking or other services” nor do they come among any of the grounds mentioned in clause 8

15. That hence the petitioners find it completely inappropriate on the part of the RBI to have asked them to approach the Banking Ombudsman, in case dissatisfied with HSBC’s response.

16. That instead it is a matter that needs to be taken up and enquired into either at your end or by someone directly deputed by you.

17. That as regards this extremely serious matter presented before you by the petitioners, the minimum that seems to be needed is to get the matter enquired immediately under you personal instructions

18. That as complainants and as people regularly in touch with investigative matters, the petitioners feel that the enquiry shall consist of going through the allegations made by Sri Arvind Kejriwal and Sri Prashant Bhushan, getting their statements as regards the facts presented by them, requesting them to provide the documents on which they based their allegations and contacting the concerned Government Ministry/Department/Agencies mentioned in the statements of Sri Kejriwal and Sri Bhushan, which needs to be followed by seeking explanation from the concerned Bank.

19. That the petitioners feel that instead of passing over the matter to the Banking Ombudsman, without even looking into the fact whether the Ombudsman has an authority over such cases or not, the matter should be taken up with utmost seriousness and all necessary steps be taken to go deep into the matter and to find out the truth as regards the extremely serious and damaging allegations made against HSBC, which are directly related with the financial security and economic well-being of the country and its people.

20. That thus the petitioners once again pray before you to take cognizance of this representation and the accompanied Annexure (Press Note by Sri Kejriwal and Sri Bhushan) to enquire into the matter immediately and to cancel the licence granted to Hong Kong and Shanghai Banking Corporation Ltd, in case the allegations as contained in the annexed Press Note are found to be true

 
Lt No-AT/HSBC/01         Yours,
Dated- 26/12/2012
        1. Amitabh Thakur

2.Nutan Thakur

Correspondence Address-

         Amitabh Thakur,
        5/426, Viram Khand,
        Gomti Nagar,  
        Lucknow- 226010
        # 94155-34526, 94155-34525
        email- amitabhthakurlko@gmail.com  
        nutanthakurlko@gmail.com

Copy to-
1. The Secretary, Department of Financial Services, Ministry of Finance, Government of India, New Delhi
2. The Principal Secretary, Prime Minister’s Office, Government of India, New Delhi


 

खिलाफ गवाही देने पर शिबू की विधायक बहू सीता ने अपने पीए का अपहरण कराया!

रांची से खबर है कि शिबू सोरेन की विधायक बहू सीता सोरेन ने अपने पीए विकास पांडेय का अपहरण करा दिया. बाद में पुलिस ने विकास को आधी रात के समय मुक्त कराया. विकास के परिवार ने सीता के खिलाफ एफआईआर लिखा दी है. रांची की मीडिया पर दबाव डाला गया है कि यह प्रकरण प्रचारित प्रसारित न हो. पूरा वाकया यूं है…

Sita Soren, JMM MLA and Doughter in law of Shibu Soren Kidnaps her ex PA vikas pande on Monday. In a high Voltage Drama Ranchi Police rescued Vikas pande in midnight…Vikas's family has lodged FIR against MLA Sita Soren…There is huge pressure on ranchi media not to broadcast this news but some has already broadcasted it…Vikas had told media on record that he has co-operated with CBI in cash for vote scandal which has rocked Jharkhand Politics…Kidnapping was done to pressurize him note to be witness against Sita Soren, JMM MLA from Jaama , Jharkhand…

दामिनी के जीवन-मौत को लेकर फेसबुक पर चर्चा शुरू

Ashish Kumar 'Anshu' : दिल घबरा रहा है, ''दामिनी नहीं रही.''  लेकिन यह आधिकारिक जानकारी नहीं है. हे! ईश्वर दामिनी को कुछ हुआ ना हो. क्या मीडिया की तरफ से एक प्रतिनिधिमंडल को एक बार दामिनी से मिलने नहीं जाना चाहिए? क्योंकि आम आदमी का विश्वास सरकार या सरकारी दलालों से उठ गया है.

    Kumud Singh नो कामेंट। आपसे नहीं, मनीष तिवारी से डर लगता है साहेब।
 
    Rangnath Singh हद है, बिना पूरी जानकारी के ऐसी संवदेनशील बात कहना गैर-जिम्‍मेदाराना
    और असंवदेनशील है।
 
    Zulaikha Jabeen Allaah raham ……Khuda kare wo sehatmand hokar wapas aaye
   
    Kamini Gupta exactly, media should be given the authority..!!!
    
    Neelam Sharma oh no
     
    Kaushal Jha Agree… Ashish Bhai…
     
    Deenbandhu Singh abhi abhi mere pass bhi khbar aayi hai… aaj subah se sabkuchh theek nahi tha.
     
    Ashish Kumar 'Anshu' Rangnath Singh : असंवेदनशील कहने से पहले थोडा सफदरजंग में अपने सोर्स टटोल लीजिए …. एक गैर सरकारी सोर्स बताइए, जिसने उस बच्ची को देखा हो.वैसे मैं मीडिया की तरफ से एक प्रतिनिधि मंडल ले जाने की ही बात कर रहा हूँ. इसमें क्या गलत है?
 
    Ernest Albert kash….kaash….kaaash ye khabar sahi na ho ….Oh my God ! I have been praying for her like many others.
 
    Kamini Gupta sir its not at all wrong..it is our right to know the full information truly without any police statements…
 
    Yashwant Singh अंशु भाई, आपने बिलकुल सही तरीके से सही मामला उठाया है…

आशीष कुमार अंशु के फेसबुक वॉल से साभार.

दिल्‍ली में पत्रकारों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में कैथल में रोष मार्च

कैथल। दिल्ली में दामिनी दुष्कर्म मामले में कवरेज कर रहे पत्रकारों पर पुलिस द्वारा किये लाठीचार्ज के विरोध में कैथल में पत्रकारों ने मीडिया सेन्टर पर प्रदर्शन किया और पुलिस द्वारा पत्रकारों पर किए गए लाठीचार्ज की घोर निंदा की। इस मामले में दोषी पुलिस कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करते हुए पत्रकारों ने दिल्ली के उपराज्यपाल के नाम एक ज्ञापन भी फैक्स से भेजा है। इससे पूर्व मीडिया क्लब के सदस्यों ने रोष स्वरूप दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार के विरुद्ध नारेबाजी की। रोष प्रदर्शन की अध्यक्षता मीडिया क्लब कैथल के अध्यक्ष पंकज आत्रेय ने की।

पंकज ने कहा कि पुलिस द्वारा बेकसूर लोगों, छात्र, छात्राओं और पत्रकारों पर बर्बरतापूर्वक की गई लाठीचार्ज गैर कानूनी और अलोकतांत्रिक कार्रवाई है। उन्होंने कहा कि लाठीचार्ज का आदेश देने वाले अधिकारी और लाठीचार्ज करने वाले पुलिसियों के विरुद्ध उचित धाराओं के तहत केस दर्ज किए जाने चाहिए। क्लब के सचिव रमेश गोयल ने कहा कि छात्राओं पर पुरुष पुलिस कर्मियों ने लाठियां चलाई और उन्हें जानवरों की तरह घसीटा। इससे पुलिस की गुंडई साफ झलकती है। मंच संचालन करते हुए उप प्रधान राजीव परूथी ने कहा कि शीला सरकार पत्रकारों की हिफाजत करने में नाकाम साबित हुई है और अब बात बढ़ने पर सारी नाकामी का ठीकरा अकेले पुलिस के सिर फोड़ना चाहती है। वरिष्ठ पत्रकार नवीन मलहोत्रा, प्रदीप हरित, सेवा सिंह, ललित शर्मा, जोगेन्द्र सहित कई पत्रकारों ने अपने विचार रखे।

पुलिस ने जब मुझ पर लाठियां चलाईं तो बिजली की तेज़ी से वो घूमी और मेरे ऊपर आ कर लेट गई

Mayank Saxena : उस सुबह को भूलना मुश्किल है…और उस चेहरे को भी…वो हमारे साथ शाम से थी…राष्ट्रपति भवन पर हमारा अकेला 100 लोगों का ग्रुप बचा था…रात भर 5 डिग्री पारे के बीच हम कभी कागज़ तो कभी मोमबत्तियां जला कर बैठे थे…मेरे हर गाने पर सबसे आगे आगे वो गाती थी…हां अलबत्ता हिंदी और उर्दू उसकी ज़ुबान तो न थीं…पर वो भोजपुरी गीत पर भी झूम कर गाती थी…फिर उससे बातचीत होने लगी…वो बोली, "नॉर्थ ईस्ट के लोग भी इसी देश के लोग हैं…मैं यहां इसलिए हूं क्योंकि मैं ये बताना चाहती हूं कि हम लोग भी आपके भाई बहन हैं…दिल्ली में पूर्वोत्तर की लड़कियों के साथ जिस तरह का व्यवहार होता है…जिस नज़र से उनको देखा जाता है…उसके खिलाफ़ मैं यहां आई हूं…" मैं सुन रहा था और शर्मिंदा था…

फिर काफी देर Ila Joshi से उसकी बात होती रही…घर के बारे में…परिवार के बारे में…और न जाने क्या क्या…वो बेहद संजीदा थी…बेहद भावुक…और बेहद समझदार…और फिर हम दोबारा गाने गाने लगे…सुबह हो रही थी और तभी सूरज उगने से ठीक पहले करीब सुबह 6 बजकर 20 मिनट पर…400 के करीब पुलिसवाले आ गए…

उसने मेरा हाथ पकड़ लिया…मैंने इला का…इला ने एक बिहार के लड़के का…अमित मुझसे लिपट गया…और फिर इला के बाल पकड़ के उनको खींच लिया गया…मैंने उनके पैर पकड़ लिए तो मेरे हाथों पर डंडे बरसाए गए…लेकिन उसने मुझे नहीं छोड़ा…जैसे कोई मां अपने बच्चे से चिपक जाती है…Amit Srivastava भी पुलिस की गिरफ्त में था…लेकिन मैं और वो वहीं थे…पुलिस ने जब मुझ पर लाठियां चलाईं तो बिजली की तेज़ी से वो घूमी और मेरे ऊपर आ कर लेट गई…मेरी ढाल बन गई…लाठियां खाती रही…मुंह से एक शब्द नहीं निकला…मैं चीखा कि अरे बेरहमों एक महिला को पुरुष मिलकर पीट रहे हो…तब महिला कांस्टेबल आगे आई…और उसे खींच कर अलग किया…उसे भी बहुत चोटें आई थीं…लेकिन वो हमारे साथ रही…हम दिल्ली के बाहर छोड़े गए…वहां से फिर इंडिया गेट पहुंचे और फिर हमें और उसे पुलिस ने पीटा…दोपहर में उसके सिर पर चोट आई…लेकिन पट्टी करवा कर वो फिर वापस लौटी…और अगले दिन हमने देखी वो तस्वीर जिसमें पाउलिन सुभाष तोमर का सिर अपनमी गोद में रखे बैठी थी…

पाउलिन…हमें आप पर नाज़ है…आप सी हिम्मती लड़कियां हमने नहीं देखीं, सिर्फ सुना है कि मणिपुर की बहनें बेहद बहादुर हैं…हम जानते हैं कि ये मणिपुर की बहनों की बड़ी लड़ाई का एक छोटा और अहम हिस्सा है…पाउलिन हम सब पिछले 3 दिन से आपका इंतज़ार कर रहे हैं…मैं, इला, पुष्पा, मोहित और न जाने कौन कौन…पाउलिन हम आपको सलाम करते हैं…हमने पिछले 5 दिनों में इस बड़े शहर में एक छोटा भारत तैयार किया है…हम सिर्फ और सिर्फ इसके लिए भी जान देने को तैयार हैं…

सलाम दोस्त…सलाम पाउलिन…सलाम…


        Sanjay Kumar Singla सलाम आप सब के लिए मयंक भाई जी ..

         Urmila Madhav wah..!! paulin wah…sachmuch aapko naman..
   
        Rakesh Srivastava आह…पाउलिन को सलाम…आप सबके हौसले को सलाम…. पूरे देश की स्‍वतंत्रता की चेतना का पूर्वोत्‍तर से दर्द का रिश्‍ता है…आप जैसे बहादुर लोग ही न जाने कितनी कडि़यों को जोड़ने के आवश्‍यक कॅटलिस्‍ट बनेंगे….हम आपके साथ हैं…
 
        Abhinav Dixit salute to paulin….n you brother as i had seen she was beaten up by police persons……when all of us were brutally thrown in bus…..
 
        Sunil Dentist police kisi ko nahe chorage.aap sb ko alag alag terrorize kia jayga..fake cases krnge..bt desh ko naaj hai apne youth generation per…..
   
        Sunil Dentist khair bhai …britishers k waqt me bhartiya faujio ne bhartio ko mara …aaj wohi repeat ho raha hai..govt to andhe hai he bt in policewalo ka imaan b khtm ho chuka hai..
    
        Falana Dhimaka Salute to u all !!
    
     
        Dileepkumarsingh Singh Salute to u all
     
        Neelam Nagpal Madiratta Salute to all….
      
        Chanchala Pathak thanks n salute ! what d great optimistic waves ! india ! u r in our hearts!
       
        Manil Mayank Mishra Bharat ek hai.Bharat ki beti ne yeh saabit kiya.. Paolin ki koshish aur jazba avismarniya rahega..HAMESHA.. Aap is sab ke sakshi bane Mayank.Garv ki baat hai..!
        
        Mayank Baudh मयंक आपके जज़बे को सलाम . . . भारतीयता कि परिभाषा में . . .आप सब ने नये परिवर्तन कर दिये है . . .ये बेहद खुशी का एहसास है ।
       
        विजय कृष्ण पांडेय : पाउलिन की जीजिविषा को नमन, आप लोगोँ की भावनाओँ को वंदन, जय श्रीराम

पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.

डीएनए से एडिटर आदित्‍य सिन्‍हा का इस्‍तीफा, रवि जोशी मुंबई के आरई बनाए गए

अंग्रेजी अखबार 'डीएनए' से खबर है कि आदित्‍य सिन्‍हा ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अखबार के एडिटर इन चीफ थे. वे पिछले दो सालों से डीएनए के साथ जुड़े हुए थे. इसके पहले वे संडे हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के संपादक थे. उनके इस्‍तीफे के बाद रवि जोशी को डीएनए, मुंबई का आरई बना दिया गया है. इसके पहले वे बंगलूरु में अखबार के आरई की भूमिका निभा रहे थे. खबर आ रही है कि आदित्‍य अभी किसी संस्‍थान से जुड़ने के इच्‍छुक नहीं हैं और लेखन में कुछ समय देना चाहते हैं. आदित्‍य सिन्‍हा ने अपने पत्रकारीय करियर की शुरुआत 1987 में की थी. उन्‍होंने देश-विदेश में भी रिपोर्टिंग की.

वहीं रवि जोशी ने अपने करियर की शुरुआत द टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ दिल्‍ली में की थी. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे हिन्दुस्तान टाइम्स ज्‍वाइन कर लिया. इसके बाद इंडिया टुडे को भी अपनी सेवाएं दीं. यहां से इस्‍तीफा देने के बाद द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को भी अपनी सेवाएं दीं. वे डीएनए में पिछले दो सालों से कार्यरत हैं.

सीएनईबी न्यूज के नाम पर यूपी में ‘ठग’ चला रहे हैं भर्ती अभियान!

जो चैनल बंद हो चुका है. उसका नामोनिशान मिट चुका है, उसे रि-लांच करने की बात कहते हुए कुछ लोग उत्तर प्रदेश में भर्ती अभियान चलाए हुए हैं. दरअसल आजकल लोगों को चैनलों से जोड़ना मुनाफे का धंधा हो चुका है. अगर आपको किसी जिले में किसी चैनल का प्रतिनिधि बनना है तो आपको अपनी जेब से दस हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक देना पड़ेगा. एक तरह से जिलेवार ढंग से चैनल की माइकआइडी की नीलामी होती है.

सीएनईबी न्यूज के नाम पर यूपी में चल रही है भर्ती
तो, संभव है कुछ लोग बंद हो चुके सीएनईबी न्यूज चैनल के नाम पर झूठे वादे करके लोगों से लाखों रुपये बटोर लें. इस बारे में जब सीएनईबी के लखनऊ में ब्यूरो चीफ रह चुके एक सज्जन से जब बात की गई तो उन्होंने भी यही कहा कि भर्ती का दावा जो लोग कर रहे हैं, वे पूरी तरह फ्राड लोग हैं. इनके बहकावे में आने की किसी को जरूरत नहीं है.

उपेंद्र राय के भाई की शादी में सहाराश्री ने करोड़ों रुपये बहाए!

कानाफूसी ये है कि भले ही उपेंद्र राय से मीडिया का काम छीन लिया गया हो लेकिन सहारा समूह में उनकी हैसियत कम नहीं हुई है. कुछ रोज पहले उपेंद्र राय के सगे भाई की शादी हुई. इस शादी में सहाराश्री सुब्रत राय सहारा ने करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए. शादी का आयोजन बनारस के ताज होटल में किया गया. बनारस का एक और स्टार होटल बुक था. गांव के लोग फाइव स्टार होटलों में रुकवाए गए. जमकर आवभगत की गई.

शादी होने के बाद रिसेप्शन का आयोजन दिल्ली में किया गया. इसमें लालकृष्ण आडवाणी, राजीव शुक्ला समेत दर्जनों बड़े नेता, नौकरशाह, उद्यमी शरीक हुए. शैंपेन की नदियां बही. खुद सहाराश्री सुब्रत राय सहारा यहां घंटों बैठे रहे. विरोधियों के एक गुट ने प्रचार करना शुरू किया कि शादी-रिसेप्शन पर इतना खर्च कहां से हुआ, इसकी जांच होनी चाहिए. लेकिन जब उन्हें पता चला कि यह सब सहारा की तरफ से ही प्रायोजित था, तो सबको सांप सूंघ गया.

कहने वाले कहते हैं कि सहाराश्री सुब्रत राय सहारा की यही अदा उन्हें औरों से अलग करती है. वे कभी किसी को कमतर नहीं आंकते. सबको पटा कर और चढ़ा कर रखते हैं. सहारा के समक्ष जितने तरह की चुनौतियां हैं, उससे निपटने के लिए उन्हें ढेर सारे उपेंद्र राय चाहिए. तो, मीडिया की जिम्मेदारी छीन लिए जाने से किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उपेंद्र राय की हैसियत कम हो गई. उपेंद्र राय का जलवा कायम है, उनके भाई की शादी से यही एहसास हुआ. उपेंद्र राय के भाई की शादी में सहाराश्री ने करोड़ों रुपये बहाए!

पहली जनवरी को इंडिया न्यूज समूह ज्वाइन करेंगे दीपक चौरसिया और पुण्य प्रसून बाजपेयी

इंडिया न्यूज से जुड़े सूत्रों पर भरोसा करें तो खबर सौ फीसदी सच है. इंडिया न्यूज समूह में दीपक चौरसिया और पुण्य प्रसून बाजपेयी ज्वाइन करने जा रहे हैं. दिन तय किया गया है पहली जनवरी सन 2013. दीपक की हैसियत मालिकों वाली होगी. उन्हें इंडिया न्यूज समूह के कई चैनलों में हिस्सेदारी मिल रही है. पुण्य प्रसून भी अच्छे खासे पैकेज व पद पर ज्वाइन करने जा रहे हैं.

दीपक और पुण्य के इंडिया न्यूज में आने के बाद हिंदी न्यूज चैनलों की दुनिया में बड़ा उठापटक होगा. अब तक हाशिये का चैनल इंडिया न्यूज दीपक व पुण्य के जुड़ने से देश के प्रमुख चैनलों में शुमार हो जाएगा और अगर इन दोनों को काम करने की पूरी आजादी मिली, जो कि मिलनी ही है, तो यह चैनल आजतक, इंडिया टीवी, स्टार न्यूज आदि के लिए सरदर्द साबित हो जाएगा.

इंडिया न्‍यूज में दीपक चौरसिया के नजदीकियों के जुड़ने का सिलसिला जारी

इंडिया न्‍यूज में बदलाव की सुगबुगाहट तेज होती जा रही है. दीपक चौरसिया के आने की चर्चाओं के बीच उनके कई लोग इंडिया न्‍यूज से जुड़ते जा रहे हैं. जिससे कयास लगाए जा रहे हैं कि नए साल पर कोई बड़ा धमाका जरूर हो सकता है. इंडिया न्‍यूज एमपी-सीजी में पहले ही दीप्ति चौरसिया के रूप में दीपक की बहन मौजूद हैं. दीप्ति एमपी की ब्‍यूरोचीफ हैं. इसके अलावा दीपक की नजदीकी माने जाने वाली निधि कौशिक भी इनपुट हेड के रूप में अपनी जिम्‍मेदारी निभा रही हैं.

सहारा से आए राकेश कुमार को एमपी-सीजी का चैनल हेड बना दिया गया है. खबर है कि अपने आने से पहले दीपक अपने लोगों को इंडिया न्‍यूज में फिट करेंगे. उसके बाद वे आने या बाहर से ही मोर्चो संभालने का निर्णय लेंगे. पुण्‍य प्रसून के भी जुड़ने की चर्चाएं हो रही हैं. इस बीच आजतक से भी एक एंकर समेत कुछ लोगों के इंडिया न्‍यूज जाने की चर्चा है, पर वो इस बात से इनकार कर रही हैं. 

आंदोलन में शामिल होने से खफा सरकार ने जनरल वीके सिंह की जेड प्लस सुरक्षा हटा दी

खबर आ रही है कि इंडिया गेट आंदोलन में शरीक होने के कारण जनरल वीके सिंह को मिली सुरक्षा केंद्र सरकार ने हटा दी है. पूर्व आर्मी चीफ जनरल वीके सिंह को जेड प्लस सुरक्षा मिली हुई है. वीके सिंह दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ हुए आंदोलन में शामिल हुए थे. आदेश मिलने के बाद आर्मी हेडक्वार्टर के लोग जेड प्लस सुरक्षा कवर हटाने की कवायद में जुट गए हैं.

वीके सिंह को दिल्ली कैंटोनमेंट में जेड प्लस सुरक्षा कवर वाला सरकारी निवास रहने के लिए मिला हुआ है. यह छह महीने के लिए एलाट किया गया था. अब सरकार से आदेश मिलने के बाद सुरक्षा कवर हटाया जा रहा है. सरकार के लोगों को यह पसंद नहीं आया कि जनरल वीके सिंह जनता के आंदोलन में शरीक हों.
 

चतरा में लैपटॉप और स्‍कूटर देकर पटाए जा रहे हैं पत्रकार!

चतरा के मीडियाजगत में एक खबर बड़ी तेजी से चर्चा में बनी हुई है. स्‍थानीय नक्‍सल संगठन से जुड़े रहे गंगेश गंजू और सुधांशु सुमन की खबर हिंदुस्‍तान और प्रभात खबर अखबार में हर दिन छप रही है. हालांकि खबर का छपना कोई बड़ी घटना नहीं है, पर जो आरोप लग रहे हैं वे सचमुच गंभीर हैं. हिंदुस्‍तान के ब्‍यूरोचीफ ठाकुर धीरेंद्र प्रसाद एवं प्रभात खबर के ब्‍यूरोचीफ दीनबंधु पर आरोप लगा है कि इन लोगों को उपहार और पैसे देकर ओबेलाइज किया गया है, जिसके चलते इन दोनों लोगों के प्रत्‍येक छोटे-बड़े कार्यक्रम को व्‍यापक कवरेज मिल रहा है.

सुधांशु सुमन जो कभी पत्रकारिता करते थे, अब समाज सेवी हो गए हैं. वहीं गणेश गंजू झामुमो से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं. चर्चा है कि गणेश फिर से चुनाव में ताल ठोंकने की तैयारी कर रहे हैं इसलिए वे अखबारों में व्‍यापक कवरेज चाह रहे हैं. गणेश के इसी चाहत को सुधांशु सुमन पूरी करवा रहे हैं. तमाम तरीके से सेवा करने अलावा ये भी आरोप लग रहे हैं कि दीनबंधु को लैपटॉप और पैसा देकर तथा धीरेंद्र प्रसाद को स्‍कूटर और पैसा देकर ओबेलाइज किया गया है. इन्‍हें दिल्‍ली टूर पर भी जे जाया गया.

हालांकि दोनों अखबारों के ब्‍यूरोचीफों पर आरोप लगने का बहुत बड़ा कारण गणेश गंजू और सुधांशु सुमन की छपने वाली खबरें और फोटो हैं. जिसे ये दोनों अखबार तो जमकर छाप रहे हैं लेकिन भास्‍कर और दैनिक जागरण जैसे अखबारों में इन्‍हें उतनी जगह नहीं मिल रही है. हालांकि अब बताया जा रहा है कि वहां भी मैनेज करने की कोशिशें चल रही हैं. दीनबंधु पर लग रहे आरोपों के संबंध में जब उनसे पूछा गया कि तो उनका कहना था कि कुछ लोग जानबूझ कर बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं. नहीं छापते तो दूसरा आरोप लगा दिया जाता. ऐसी बातों का कोई प्रूफ तो होता नहीं है. दिल्‍ली भी हम किसी के इलाज के लिए गए थे.

दूसरी तरफ ठाकुर धीरेंद्र प्रसाद का कहना है कि अगर वे लोग कंबल बांट रहे हैं. गांव में जाकर मीटिंग कर रहे हैं तो खबर देना तो हमारी मजबूरी है. अगर कोई कुछ कर रहा है तो हम उसे कवरेज दे रहे हैं इसमें बुराई क्‍या है. और रही स्‍कूटर की बात तो हम अपना पुराना स्‍कूटर बेचकर एक्‍सचेंज ऑफर में नया स्‍कूटर लिए हैं. इस पर भी आरोप लग रहा है. आरोप लगाने वाले साबित कर सकते हैं कि इसे मैंने नहीं लिया किसी और ने दिया है. आप काम करते हैं तो इस तरह के आरोप लगते रहते हैं.

सैलरी न मिलने से प्‍लानमैन मीडिया के पत्रकारों की हालत खराब, अरिंदम नए साल के जश्‍न की तैयारी में

मैनेजमेंट के बड़े बड़े गुण सिखाने वाले तथा टीवी चैनलों तथा अखबारों में विज्ञापन के साथ छपने के शौकीन अरिंदम चौधरी अपने खुद की मीडिया कंपनी प्‍लानमैन मीडिया का ही मैनेजमेंट नहीं संभाल पा रहे हैं. पिछले दो सालों से प्‍लानमैन मीडिया के कर्मचारी अरिंदम चौधरी के आश्‍वासनों से परेशान हैं. संडे इंडियन समेत कई अंग्रेजी मैगजीन प्रकाशित करने वाली अरिंदम की प्‍लानमैन मीडिया के लगभग पांच सौ कर्मचारी सैलरी ना मिलने से मुश्किलों में हैं.

संडे इंडियन समेत सभी पत्रिकाओं में कार्यरत पत्रकारों को अगस्‍त के बाद की सैलरी अब तक नहीं मिली है. जबकि दिसम्‍बर का महीना भी बीतने जा रहा है. प्‍लानमैन मीडिया के अनप्‍लान रवैये से इन कर्मचारियों का नया साल भी बुरा बीतने वाला है. अरिंदम चौधरी के यहां काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारी उधार की जिंदगी जी रहे हैं क्‍योंकि सैलरी के चार महीने लेट चलने की वजह से वे इधर उधर से पैसा लेकर अपना काम चला रहे हैं. पिछले दिनों एक कर्मचारी को चंदा देकर सहयोगियों ने बेघर होने से बचाया था.

बातों में लम्‍बी चौड़ी फेंकने और हांकने वाले अरिंदम चौधरी सैलरी के मुद्दे पर अपने कर्मचारियों से मिलना भी पसंद नहीं करते हैं. बताया जा रहा है कि नए साल से पहले सैलरी को लेकर कुछ कर्मचारी अरिंदम चौधरी के घर गए थे, परन्‍तु अरिंदम ने उनसे मुलाकात नहीं की. वहां मौजूद कुछ लोगों ने बस आश्‍वासन देकर टरका दिया. कर्मचारियों का कहना है कि अरिंदम इतना असंवेदनशील हो गया है कि इधर कर्मचारियों की चार महीने से सैलरी नहीं मिली और वो अपने परिवार के साथ मौज मस्‍ती करने कार्बेट पार्क जा रहा है.

पिछले दो सालों से अस्थिर सैलरी से परेशान कर्मचारी अब आंदोलन के मूड में आ चुके हैं. अपने ही वादों पर खरा नहीं उतरने के चलते अरिंदम के मैनेजमेंट स्‍कूल का ग्राफ भी काफी गिरा है. उसका असर भी प्‍लानमैन मीडिया पर पड़ा है. इसके चलते ही संडे इंडियन के कई इश्‍यू साप्‍ताहिक से मंथली कर दिए गए थे. इसके बाद भी प्‍लानमैन मीडिया की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, जिसका खामियाजा मीडियाकर्मियों को भुगतना पड़ रहा है. यहां काम करने वालों का कहना है कि अगर जल्‍द उन लोगों की सैलरी नहीं दी गई तो वे अब सांग‍ठित होकर लड़ाई करने की तैयारी करेंगे.

ए2जेड पहुंची अर्चना यादव, प्रवीण अमर उजाला से बाहर

लखनऊ से खबर है कि अर्चना यादव ने ए2जेड न्‍यूज चैनल ज्‍वाइन कर लिया है. उन्‍हें यहां रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. अर्चना इसके पहले लाइव टुडे को अपनी सेवाएं दे रही थीं, जहां उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया. यहां भी वे रिपोर्टिंग की जिम्‍मेदारी निभा रही थीं. अपने छोटे से करियर में ही अर्चना ने अपनी एक अलग पहचान बना ली है. लाइव टुडे से पहले वे कई समाचार पत्रों को भी अपनी सेवाएं दे चुकी हैं.

सोनभद्र से खबर है कि ओबरा गेस्‍ट हाउस कांड में नाम आने के बाद अमर उजाला प्रबंधन ने अपने फोटोग्राफर प्रवीण कुमार को बाहर का रास्‍ता दिखा दिया है. प्रवीण लम्‍बे समय से अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. प्रवीण ने अभी कहीं ज्‍वाइन नहीं किया है.

साधना चैनल में चीफ न्‍यूज कोआर्डिनेटर बने दिनेश आनंद

सीएनईबी के ब्‍यूरोचीफ रहे दिनेश आनंद के बारे में खबर है कि उन्‍होंने अपनी नई पारी साधना न्‍यूज के साथ शुरू की है. दिनेश को प्रबंधन ने चीफ न्‍यूज कोआर्डिनेटर कम एडमिनिट्रेटर की जिम्‍मेदारी सौंपी है. वे पटना में ही अपनी जिम्‍मेदारी संभालेंगे. दिनेश पिछले एक दशक से ज्‍यादा समय से बिहार की पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्‍हें मंगलवार को अपना पदभार ग्रहण किया. दिनेश आर्यवर्त, इंडियन नेशन, दैनिक जागरण, जनमत टीवी, आजाद न्‍यूज, इंडिया न्‍यूज, ताजा टीवी और सीएनईबी को लम्‍बे समय तक अपनी सेवा दी है. बिहार के तेजतर्रार पत्रकारों में शुमार दिनेश को बिहार के सीएम ने डा. फणीभूषण प्रसाद मीडिया सम्‍मान से भी सम्‍मानित किया है.

एनडीटीवी पर चश्‍मदीद का खुलासा : दौड़ते समय खुद ही गिर पड़े थे सुभाष तोमर!

नई दिल्ली : दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर की मौत कैसे हुई इसपर अब विवाद गहराता जा रहा है। अब एक लड़का सामने आया है जिसका कहना है कि उसने सुभाष तोमर गिरते को देखा था। इसके बाद उसने पुलिस की मदद से उन्हें अस्पताल भी पहुंचाया। योगेंद्र नाम के इस लड़के के मुताबिक सुभाष तोमर को किसी प्रदशर्नकारी ने पीटा नहीं था जबकि दिल्ली पुलिस के सीपी का कहना था कि सुभाष तोमर को गर्दन छाती और पेट पर चोट के निशान थे। इस बीच इंतज़ार है पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का जिससे तस्वीर साफ होगी।

कॉन्स्टेबल सुभाष तोमर जिनकी मौत की वजह को लेकर तमाम सवाल खड़े हुए थे, इस पर एक प्रत्यक्षदर्शी के बयान के बाद नया मोड़ आ गया है। कॉन्सटेबल तोमर 22 तारीख़ को इंडिया गेट प्रदर्शन के दौरान ड्यूटी पर थे। तस्वीरों में कॉन्स्टेबल को संभाल रहे इस युवक के मुताबिक तोमर को चोट नहीं आई और दौड़ते-दौड़ते वह अचानक गिर पड़े। योगेंद्र नाम के इस युवक और उसकी सहयोगी ने कॉन्स्टेबल को पुलिस की मदद से अस्पताल पहुंचाया था।

उधर, दिल्ली पुलिस के आला अफ़सर योगेंद्र के बयान पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं। पुलिस योगेंद्र के बयान को सच मानने को तैयार नहीं है। पुलिस के आला अफ़सर यह दावा भी कर रहे हैं कि सुभाष के शरीर पर चोट के निशान हैं। योगेंद्र के दावे से लगता है कि सुभाष की मौत पत्थरबाज़ी के दौरान नहीं हुई लेकिन हक़ीकत तो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बाद ही पता चल पाएगी। (एनडीटीवी)

सोशल मीडिया के जरिए खड़े आंदोलन क्‍या वास्‍तव में जन आंदोलन है?

सोशल मीडिया अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का एक अच्छा माध्यम है। इसमें अपनी बात कहने के लिए न तो धन या संसाधन की जरूरत है, न ही स्थापित मीडिया संस्थानों की सेवा लेने की। लोकतंत्र में मुद्दे पहचानना, उन पर जन-मानस को शिक्षित करना व इस प्रक्रिया से उभरी जन-भावना के जरिये सिस्टम पर दबाव डालना लोकतंत्र की गुणवत्ता के लिए बेहद जरूरी होता है। सोशल मीडिया इस काम को ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकता है, फिर मुनाफा कमाने के लिए चल रहे मीडिया को लेकर कुछ आशंकाएं भी बनी रहती हैं।

पिछले दिनों देश में हुए विभिन्न आंदोलनों में सोशल मीडिया की भूमिका जबर्दस्त थी। लेकिन क्या सोशल मीडिया के जरिये खड़े किए गए आंदोलन को वास्तव में जन-आंदोलन माना जा सकता है? और इसमें जोखिम क्या हैं? तथ्यों की अल्प जानकारी, तर्क-शास्त्र की कमजोर समझ और भावनात्मक अतिरेक में बहने की आदत कई बार सोशल मीडिया के इस्तेमाल में भयंकर गलती का सबब बन जाते हैं। मई महीने में बुलंदशहर के एक युवा ने फेसबुक पर किसी संप्रदाय विशेष के बारे में कुछ लिख दिया, नतीजा यह हुआ कि अगले दिन मेरठ में सांप्रदायिक दंगे की नौबत पैदा हो गई।

अमूर्त और गैर-जिम्मेदार सोशल मीडिया का एक पहलू तो बेहद खतरनाक है। इस मीडिया के सहारे दुनिया भर में कहीं भी बैठा कोई भी एजेंट किसी भी देश में दंगे भड़काने का काम कर सकता है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल लोगों को बहकाने और भरमाने के लिए हो सकता है। पारंपरिक मीडिया भले ही मुनाफा कमाने के लिए काम कर रहा हो, मगर सत्य से हटने या न दिखाने अथवा असत्य दिखाने से दर्शकों-पाठकों द्वारा वह अंत में खारिज कर दिया जाता है। खारिज होने के बाद न तो उसे विज्ञापनदाता पूछता है, न ही सरकार उसका संज्ञान लेती है। बाजार के सिद्धांत के तहत भी उसे जाने-अनजाने जन उपयोगी बनना ही पड़ता है। फिर औपचारिक मीडिया स्थूल है।

टेलीकास्ट लाइसेंस या अखबार का रजिस्ट्रेशन व्यक्ति के नाम होता है और वह देश के तमाम कानूनों से बंधा होता है। जो कुछ भी कहा, लिखा या दिखाया जा रहा है, उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी संपादक पर होती है। सोशल मीडिया पर इस तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह न तो मूर्त होता है, और न ही उस पर अंकुश लगाए जा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में बलात्कार की घटना को पूरी तरह सोशल मीडिया ने ही उठाया। पहले इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया ने अपनी सार्थकता और प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसे दो दिनों  तक जबर्दस्त रूप से छापा और दिखाया। तब जाकर सोशल मीडिया के जरिये इस पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं। लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया के जरिये एक इतना बड़ा आंदोलन खड़ा हुआ उससे अब और ज्यादा सतर्क होने की जरूरत महसूस होने लगी है।  

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना न्‍यूज समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रह चुके हैं. संप्रति वे ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव हैं. उनका यह लेख हिंदुस्‍तान में प्रकाशित हो चुका है.

आपकी बेटियों को दिल्ली की बसों से कब साबका पड़ता है!

देश का तर्कशास्त्र कितना पोच हो गया है! पुलिस कमिश्नर, गृहमंत्री और अब प्रधानमंत्री भी कहते हैं कि वे दर्द समझते हैं क्योंकि उनके भी बेटियां हैं। तो जिनके बेटियां नहीं हैं, वे? और कोई पूछे कि आपकी बेटियों को दिल्ली की बसों से कब साबका पड़ता है! "दर्द" समझते हैं, तो राजपथ पर पूस की शाम ठंडे पानी से पिटते लड़के-लड़कियों को देख क्यों दर्द नहीं उमड़ा? पुलिस आपा खोकर लाठी-गोले उठा ले, हाथ-पाँव तोड़ दे, कैमरे फोड़ दे तो फर्ज; प्रदर्शनकारी नियंत्रण खोकर पत्थर उठा लें तो असामाजिक-अराजक तत्त्व, उपद्रवकारी, यहाँ तक कि hoolingans अर्थात गुण्डे! इसलिए, विरोध के रास्ते भी करो बंद! न्याय माँगा था, लो दिया न्याय! …. चाहे बलात्कार का हादसा हो, चाहे राजपथ का पुलिस राज — दोनों से एक ही सन्देश मिलता है: विफल शासन, विफल प्रशासन।

वरिष्‍ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

मथुरा में फर्जी पत्रकारों की बाढ़, पुलिस ने शुरू की जांच

: फर्जी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर एसएसपी से मिले मीडियाकर्मी : मथुरा में पत्रकारों की बाढ़ ने जहाँ प्रशासन की नाक में दम कर दिया है वहीं मीडिया से जुड़े लोग भी खासे परेशान हैं. ये लोग कुछ न होते हुए भी मथुरा में धड़ल्ले से पत्रकार बन कर अपने छोटे-बड़े वाहनों पर प्रेस लिख कर चल रहे हैं. पुलिस चेकिंग के दौरान पुलिस कर्मियों को अपने अर्दब में लेकर अपने मकसद में कामयाब हो जाते हैं. ये लोग खबर लिखने में भले ही कहीं नजर ना आते हों लेकिन ये थाना और चौकियों में दलालों की तरह बराबर सक्रिय रहते हैं. जिसके चलते आम आदमी को जहां न्‍याय मिलने में कठिनाई होती है वहीं सही मायने वाले पत्रकार बदनाम होते हैं.

इस तरह के पत्रकार मथुरा में कई अख़बारों के और चैनलों का नाम लेकर भोले भाले लोगों को चूना लगा चुके हैं. पर पत्रकारों का नाम सुनते ही लोग इनकी शिकायत करने से बचते हैं. ऐसे कई मामले जब पत्रकारों के समक्ष आया तो बृज प्रेस क्लब के बैनर तले इस मुद्दे को उठाते हुए अध्‍यक्ष कमलकान्त उपमन्यु के नेतृत्‍व में मथुरा के एसएसपी से मिले और एक ज्ञापन देकर फर्जी पत्रकारों के खिलाफ अभियान चला कर दण्डित करने की मांग की.  

इस दौरान एसएसपी ने पत्रकारों के प्रतिनिधि मण्डल को आश्वासन दिया कि फर्जी पत्रकों के खिलाफ अभियान चला कर प्रेस लिखे वाहनों की बड़े पैमाने पर चेकिंग कराई जाएगी. जो फर्जी पाए जाएंगे उनके खिलाफ कार्रवाई करवाई जाएगी. पत्रकारों ने कहा कि फर्जी पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई होने के बाद ही बृज प्रेस क्‍लब शांति से बैठेगा. कमलकांत उपमन्‍यु ने कहा कि फर्जी पत्रकारों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा और पकड़े जाने पर उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी. पत्रकारों की इस मुहिम से अपने वाहनों पर फर्जी तरीके से प्रेस लिखने वालों में हडकम्‍प मच गया है. मीटिाग के बाद तत्‍काल हुए चेकिंग में लगभग दो दर्जन से अधिक वाहनों पर प्रेस लिखा पाया गया, जिनका पुलिस ने चालान कर दिया.

एसएसपी से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में कमलकांत उपमन्यु, पवन गौतम, मोहन श्याम शर्मा, प्रकाश सिंह, सोमेंदर भारद्वाज, संजीव गौतम, हिमांशु त्रिपाठी, अनूप शर्मा, महेश रावत, मुकुल गौतम, मातुल शर्मा, रवि चौधरी, सुरेश सैनी सहित दो दर्जन से अधिक टीवी चैनल और प्रतिष्ठित अख़बारों के ब्‍यूरोचीफ और पत्रकार मौजूद थे.

न्‍यूज11 से सेल्‍स हेड रवींद्र सहाय का इस्‍तीफा

न्‍यूज11, रांची से खबर है कि रवींद्र सहाय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सेल्‍स एवं मार्केटिंग हेड थे. रवींद्र पिछले तीन सालों से न्‍यूज11 को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि वे चैनल की आंतरिक स्थितियों से खुश नहीं थे,‍ जिसके चलते उन्‍होंने बाय कर दिया. रवींद जल्‍द ही किसी चैनल के साथ अपनी नई पारी शुरू करने जा रहे हैं. माना जा रहा है कि वे 14 जनवरी के बाद कहीं ज्‍वाइन करेंगे. न्‍यूज11 से पहले भी वे कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. रवींद्र का जाना न्‍यूज11 के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है.

वरिष्‍ठ पत्रकार डा. श्‍याम निर्मम का निधन

वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, कवि, नवगीत के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर डा. श्याम निर्मम का सोमवार को निधन हो गया। वे 62 वर्ष के थे। वे पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनका दिल्‍ली के एक अस्‍पताल में पिछले एक महीने से इलाज चल रहा था। गाजियाबाद में हिण्‍डन नदी के किनारे उनका अंतिम संस्‍कार किया गया। उनके अंतिम संस्कार के समय ख्यातिनाम साहित्यकार, पत्रकार, कवि, समाजसेवी, उद्यमी तथा विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संगठनों से जुड़े पदाधिकारी मौजूद थे। वे लम्‍बे समय तक पालिका समाचार के संपादक भी रहे। देश के सभी प्रतिष्ठित मंचों, आकाशवाणी और दूरदर्शन से काव्यपाठ करने वाले डा. निर्मम ने नवगीत को एक नई पहचान दी। वे अपने पीछे तीन पुत्र और धर्मपत्नी छोड़ गये हैं।

इंटरव्यू : निशांत चतुर्वेदी (चैनल हेड, न्यूज एक्सप्रेस टीवी)

वे ट्रांसपैरेंसी के प्रबल पक्षधर हैं. साफ बोलना और साफ सुनना उन्हें बहुत अच्छा लगता है. चापलूसी, दिखावा और आडंबर से चिढ़ है. काम है तो वे पूरी रात और पूरे दिन जुटे रहेंगे. किसी वक्त काम नहीं हुआ तो वे पढ़ने और महसूस करने में खुद को झोंक देते हैं. उनके अंदर अपार उर्जा है. वे इसे आध्यात्मिकता से कनेक्ट करते हैं और वहीं से हासिल कर अपनी टीम के सदस्यों में थोड़ा थोड़ा बांट देते हैं. ये हैं निशांत चतुर्वेदी. न्यूज एक्सप्रेस चैनल के हेड.

निशांत ने पहली बार इतना बड़ा दायित्व संभाला है. टीम लीडर बने हैं. इसके पहले वे कई चैनलों में विभिन्न पदों पर रहे. उन्हें तेजतर्रार एंकर्स में शुमार किया जाता है. वे इंडीविजुवली बेस्ट परफारमर रहे हैं. वे दुनिया के कई हिस्सों में रिपोर्टिंग के मकसद से जा चुके हैं. कभी जापान तो कभी अमेरिका. कई तरह के गौरव भी उन्हें हासिल हैं. कम उम्र में उन्होंने पत्रकारिता के विविध रंग-रूपों को जिया, देखा, महसूस किया है. बतौर टीम टीम लीडर, उन्होंने न्यूज एक्सप्रेस में नई शुरुआत की है.

निशांत दिल्ली में ही पले-बढ़े और अपने दम पर पत्रकारिता में मुकाम हासिल किया. उन्होंने हिंदी टीवी जर्नलिज्म के बुरे पक्षों और बुरे लोगों को नजदीक से देखा है. सो, उनकी कोशिश होती है कि वे बतौर चैनल हेड वैसा कुछ न करें जैसा उन्होंने झेला है. इसी कारण वे चैनल हेड के बतौर कई तरह के प्रयोग करते रहते हैं. सबकी सुनते हैं. सबको समझाते हैं. खुद पर सारा फोकस करने की जगह वह टीम के फंक्शन में भरोसा करते हैं, टीम वर्क पर यकीन रखते हैं, कलेक्टिव क्रिएशन का सम्मान करते हैं, सो इनके साथ जुड़े लोगों का सैटिसफेक्शन लेवल काफी उंचा होता है.

निशांत से कई बार फोन पर बातचीत हुई. कुछ एक बार मिले भी. इसी दौरान लगा कि निशांत के सोचने, काम करने और जीने के तरीके के बारे में लोगों को बताना चाहिए. उसी प्रक्रिया में ये वीडियो इंटरव्यू बातों-बातों में कर लिया. पहली नौकरी कैसे मिली, संयुक्त राष्ट्र संघ में रिपोर्टिंग करने के दौरान क्या हासिल हुआ, आज की पत्रकारिता और संपादकों की हालत पर क्या सोचते हैं… ढेरों सवाल उनसे पूछा. निशांत बिना रुके, बिना झिझके लगातार बोलते बताते गए.

निशांत को देखकर यकीन होता है कि भारत में हिंदी टीवी जर्नलिज्म में सहज और सकारात्मक संपादकों की एक नई पीढ़ी आगे आ रही है. रुका और गंधाता पानी हटाने को स्वच्छ जल की एक नई धारा रफ्तार पकड़ चुकी है. आप इस वीडियो इंटरव्यू को देखें और फिर सोचें कि क्यों न हिंदी टीवी जर्नलिज्म में लंबे समय से कायम जड़ता और मठाधीशी को खत्म करने के लिए निशांत जैसे युवा चैनल हेड्स को सपोर्ट किया जाए.  निशांत तक आप अपनी बात उनके फेसबुक एकाउंट www.facebook.com/nishant.chaturvedi के जरिए या फिर उनकी मेल आईडी nishantchaturvedi@newsexpresstv.net के जरिए पहुंचा सकते हैं.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com


वीडियो इंटरव्यू का लिंक… क्लिक करें…

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/649/interview-personality/nishant-chaturvedi-head-news-express-tv.html


…इंटरव्यू के दौरान कुछ तस्वीरें….

Nishant Chaturvedi, Channel Head, News Express TV

प्रेस क्लब आफ इंडिया में पत्रकारों की बैठक और विरोध प्रदर्शन की कुछ तस्वीरें

पत्रकारों पर बर्बर लाठीचार्ज और प्रेस क्लब में घुसकर पत्रकारों को पीटने जैसी घटनाओं के खिलाफ कल सोमवार को प्रेस क्लब आफ इंडिया में  पत्रकारों ने मीटिंग की और फिर विरोध प्रदर्शन निकाला. इस मौके की कुछ तस्वीरें–

सड़क पर बैठकर जाम लगाते पत्रकार…

सड़क पर नारेबाजी करते पत्रकार

सैकड़ों पत्रकारों ने मार्च निकाला

कई बार पुलिस से गुत्थमगुत्था हुए पत्रकार

हर पत्रकार के चेहरे पर गुस्सा दिखा

मीडिया वालों के विरोध प्रदर्शन को मीडिया के साथियों ने कवर भी किया

प्रेस क्लब में बैठक के दौरान उपस्थित पत्रकार

पुलिस उत्पीड़न की दास्तां बयान करतीं एक वरिष्ठ महिला पत्रकार

एएनआई के रिपोर्टर आशुतोष को पुलिस ने इतना पीटा कि वे ठीक से चल नहीं पा रहे थे. बावजूद इसके, रिपोर्टिंग का काम जारी रखा…

आवाज दो… हम एक हैं….

पुलिस को चुनौती देते पत्रकार साथी… पुलिस ने एक बार लाठीचार्ज भी किया…


मूल खबर