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उत्तर प्रदेश

सहाराकर्मी सुसाइड केस में सहारा कर्मचारी यूनियन के नेताओं को ही फंसाकर जेल भेज दिया गया!

वाह रे योगीराज की पुलिस!

सहारा ग्रुप में जो न हो जाए, वह कम है और लखनऊ में शासन-सत्ता की नाक के नीचे जो न हो जाए, वो कम है. सहारा समूह के लखनऊ मुख्यालय के नवीं फ्लोर से एक सहाराकर्मी ने प्रबंधन की नीतियों और आर्थिक संकट के चलते कूद कर जान दे दी. इस मामले में बजाय प्रबंधन पर कार्रवाई के, प्रबंधन ने पुलिस से मिलीभगत कर सहारा कर्मियों के यूनियन के नेताओं को ही गिरफ्तार करा के जेल भिजवा दिया. न तो सहारा कर्मी के सुसाइड की खबर अखबारों में छपी और न सहारा यूनियन के नेताओं को फर्जी मामलों में फंसा कर जेल भेजे जाने की खबर. अखबार-चैनल सहारा के एहसान से दबे हैं, सो हर ओर मौन है.

सहारियन कामगार संस्थान के पदाधिकारियों को सहाराकर्मी के सुसाइड मामले में जबरदस्ती फंसाया गया और इनके खिलाफ सहारा प्रबंधन के इशारे पर झूठी एफआईआर लिखकर जेल भिजवा दिया गया. इस काम में पुलिस के कुछ इंस्पेक्टरों पर आरोप है कि इन्होंने ठीकठाक पैसे खाए हैं. सहारा यूनियन के जिन लोगों को फंसाया गया है, उनके नाम हैं- राम तिवारी (महामंत्री) और एलिसन आरके (उपाध्यक्ष). सहारियन कामगार यूनिय के अरुण दीक्षित (कोषाध्यक्ष), सुनील तिवारी (मंत्री) और ऋषि द्विवेदी (अध्यक्ष) लखनऊ के बाहर होने के कारण गिरफ्तार होने से बच गए. राम तिवारी और एलिसन आरके को धोखे से आलमबाग थाने बुलाया गया और इन्हें यहीं अरेस्ट कर जेल भेज दिया गया. सहारा प्रबंधन पर वैसे भी ये आरोप आम है कि मीडिया और पुलिस-प्रशासन उनकी जेब में रहते हैं.

सहारा प्रबंधन की कोशिश है कि सहारा में बढ़ रहे संकटों को लेकर आवाज उठाने वाली यूनियन को ही खत्म कर दिया जाए. इसी कारण सहारा प्रबंधन से दुखी सहाराकर्मी के सुसाइड मामले में सहारा यूनियन के लोगों को फंसा दिया गया ताकि एक पंथ दो काज हो जाए. सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. कहां तो सुसाइड करने वाले कर्मी के आरोपों की जांच कर सहारा प्रबंधन को अरेस्ट किया जाना चाहिए और कहां अब सहारा प्रबंधन के इशारे पर पूरे सुसाइड प्रकरण को दूसरा मोड़ देकर पीड़ितों की आवाज उठाने वाले सहारा यूनियन के पदाधिकारियों को ही जेल भेज दिया गया. वाह रे योगीराज की पुलिस. सत्ता शासन के नाक के नीचे इतनी अंधेरगर्दी!

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1 Comment

1 Comment

  1. इंसाफ

    July 6, 2019 at 11:02 am

    भारत का लोकतंत्र यही है. पैसा फेंको तमाशा देखो. योगी के राज में भोगियों की चल रही है. ज्यादा लिखे बोले पर जेल. राष्ट्रीय सहराकर्मियों का करोरों वेतन बकाया है. पर मजाल कि कोई बकाया मांग दे. किसका कितना बकया है. कोई बताने के लिए तैयार नहीं. पत्रकारिता के नाम पर भादुअगिरी चल रही है. वरिष्ठ टी ए /डी ए /मीटिंग से बना रहे है.

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