एबीपी न्यूज के पतन के कारण जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंचा

साल 2017 के दूसरे हफ्ते की टीआरपी में जी न्यूज नंबर तीन पर पहुंच गया है. ऐसा एबीपी न्यूज चैनल की टीआरपी में भयंकर गिरावट के कारण हुआ है. न्यूज24 लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और यह चैनल अब इंडिया न्यूज के काफी नजदीक पहुंच चुका है. इंडिया न्यूज की टीआरपी में भी सुधार है.

बुरा हाल न्यूज18 इंडिया का है जो पहले आईबीएन7 के नाम से जाना जाता था. लाख मेहनत करने के बावजूद अंबानी का यह चैनल उठ नहीं पा रहा है. यह अभी भी टाप टेन में नीचे से तीसरे स्थान पर है. यानि इसकी असल जगह नंबर सात है जो लगातार कायम है. देखें दूसरे सप्ताह के टीआरपी के आंकड़े…

Weekly Relative Share: Source: BARC, HSM, TG:CS15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 2′ 2017
Aaj Tak 17.0 up 0.1 
India TV 14.1 dn 0.2
Zee News 12.9 up 0.1 
ABP News 12.7 dn 1.4
India News 10.2 up 0.5
News 24 9.5 up 0.6
News Nation 8.9 up 0.4
News18 India 7.9 up 0.4
Tez 2.5 dn 0.2
NDTV India 2.4 same 
DD News 1.8 dn 0.2

TG: CSAB Male 22+
Aaj Tak 15.8 dn 0.3
India TV 14.9 dn 0.3
Zee News 13.3 up 0.1
ABP News 12.9 dn 1.2
News Nation 9.1 up 0.6
News18 India 8.9 up 0.5
India News 8.9 up 0.5
News 24 8.8 up 0.6
NDTV India 3.0 dn 0.1
Tez 2.7 dn 0.1
DD News 1.8 dn 0.2

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आईबीएन7 का नाम बदला, अब ‘न्यूज18इंडिया’ कहा जाएगा

कई सालों से पिटा हुआ चैनल आईबीएन7 नाम बदलकर टीआरपी पाने के टोटके को आजमाने जा रहा है. अंबानी का यह चैनल अब ‘आईबीएन7’ की बजाय ‘न्यूज18इंडिया’ कहा जाएगा. ‘नेटवर्क 18’ ग्रुप के इस हिंदी न्यूज चैनल का नाम बदलने के साथ साथ टैगलाइन, लेआउट, लुक एंड फील सब बदल दिया गया है.

इस चैनल के वेज सेक्शन को news18india.com के नाम से जाना जाएगा और इसे भी नए कलेवर में लांच किया गया है. इसी ग्रुप के अंग्रेजी न्यूज चैनल ‘CNN-IBN’ का नाम भी इसी साल अप्रैल महीने में बदलकर ‘सीएनएन न्यूज18’ किया जा चुका है.

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बिहार के जहानाबाद में आईबीएन7 संवाददाता पर प्राणघातक हमला

जिला युवा राजद अध्यक्ष धर्मपाल यादव पर हमले का आरोप

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद यूं तो अपराध में बढ़ोतरी हुई ही, अब पत्रकारों की भी जान सुरक्षित नहीं दिख रही। बुधवार को जहानाबाद नगर थाना क्षेत्र के टेनीबिगहा गांव में आईबीएन-7 के जिला संवाददाता मुकेश कुमार पर जानलेवा हमला किया गया। गंभीर रूप से घायल मुकेश ने हमले का आरोप अपने गांव टेनीबिगहा के ही रहने जिला युवा राजद के अध्यक्ष धर्मपाल यादव और उसके एक करीबी अनिल यादव पर लगाते हुए नगर थाना में भादवि की धारा 307, 341 व 323 के तहत प्राथमिकी (32/16) दर्ज करायी है।

मुकेश ने दोनों आरोपितों पर राइफल के कुंदे से प्रहार करने का आरोप लगाया है। इस घटना के बाद इस गांव में एक ही जाति के दो गुटों के बीच तनाव गहरा गया है। इधर आरोपितों ने भी नगर थाना में पत्रकार मुकेश के खिलाफ एक आवेदन देकर उसपर अपने साथियों के साथ घर पर चहड़कर गाली-गलौज और जान से मार देने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए थाने में एक शिकायत दर्ज कराई है।

जहानाबाद नगर थानाध्यक्ष नागेन्द्र कुमार ने बताया कि पत्रकार पर हमले के आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए देर रात टेनी बिगहा गांव में छापेमारी की गई पर दोनों आरोपित फरार निकले। इस घटना के विरोध में राजधानी पटना के पत्रकारों का एक दल आज शाम 3 बजे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर उनसे हमलावरों की अविलम्ब गिरफ्तारी की मांग करने वाले हैं। सूत्र बताते हैं कि गांव की ही एक छात्रा जो आरोपित अनिल की बेटी है से संबंधित समाचार के प्रसारण से दोनों मुकेश से खफा थे और पूर्व में भी मुकेश को मोबाइल पर धमकी मिली थी।

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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आईबीएन7 ने अमित शाह को उप राष्ट्रपति घोषित कर दिया!

हमारे हिंदी न्यूज चैनल जो न कर दिखाएं, वो कम है. आईबीएन7 न्यूज चैनल ने कल चैनल पर अमित शाह को उपराष्ट्रपति घोषित कर दिया. ऐसा चैनल की स्क्रीन पर चलने वाली पट्टी पर लिखाा हुआ आया जिसे एक सुधी दर्शक ने पकड़ लिया और मोबाइल से फोटो खींचकर भड़ास के पास भेज दिया. देखें आप भी उस तस्वीर को. नीचे की तस्वीर में बिलकुल नीचे लिखा हुआ है- ‘कार्यक्रम में उप राष्ट्रपति अमित शाह भी पहुंचे’.

क्या चैनल वालों को नरेंद्र मोदी और अमित शाह का ऐसा फोबिया हो गया है कि वो हर पद के साथ इन्हीं का नाम जोड़ दे रहे हैं? या यह सिर्फ एक मानवीय चूक भर है? जो भी हो, कम से कम अंबानी के चैनल में ऐसी गल्ती तो नहीं जानी चाहिए जहां लाखों के पैकेज लेकर सैकड़ों लोग कुर्सियां तोड़ रहे हैं.

अगर आप भी न्यूज चैनलों या अखबारों में जाने वाली गल्तियों को देख-पढ़ परेशान होते हैं तो उसे मोबाइल से फोटो खींच कर भड़ास तक भेज दें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

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ओमी महाराज को करारा थप्पड़ अरसे बाद किसी टीवी बहस में हुआ कोई शानदार काम है

Samar Anarya : कल आईबीएन7 की बहस में ज्योतिषी दीपा शर्मा का हिंदू महासभा के ओमी महाराज को मारा करारा थप्पड़ अरसे में किसी टीवी बहस में हुआ कोई शानदार काम है। मने, बहस करिये मगर ये क्या कि कौन पति से कितने साल से अलग रह रहा है गिनने लगिये। Deepa Sharma beating Hindu Mahasabha’s Omi Maharaj for a sexist jibe on IBN7 is best thing to happen in TV debates in a long time. Best way to tell a MCP that living separately from husband is no argument in a debate over a god- womam or anything else but for a court case on the same separation/divorce.

Sanjaya Kumar Singh : एक महिला का टीवी चैनल पर लाइव चर्चा के दौरान किसी पुरुष को थप्पड़ जड़ देना (और थप्पड़ खाना भी) विरोध ही है। यह कोई मार-पीट नहीं थी। ओमी महाराज जो बोल रहे थे उसका विरोध थप्पड़ रसीद करके ही किया जा सकता है। बोलकर उसका विरोध किया जाता तो दर्ज ही नहीं होता – अनसुना रह जाता। दीपा शर्मा ने बिल्कुल ठीक किया। कुछ लोग इसे जबरदस्ती संस्कार से जोड़ रहे हैं। मुझे लगता है उनके बारे में जो गैर जरूरी टिप्पणी की गई उसपर थप्पड़ मारना अच्छे संस्कारों में ही आएगा (इससे लोग संस्कार सीखेंगे)। कोई पुरुष किसी महिला को टीवी पर कहे कि वह पति के साथ नहीं रहती है – इसपर महिला की क्या प्रतिक्रिया होगी, इसका अनुमान एंकर कैसे लगा सकता है। वीडियो देखो, जब दीपा कुर्सी छोड़कर खड़ी होती हैं, माइक निकालती हैं तो कहीं नहीं लगता कि वे पिटाई करने जा रही है। एंकर मनुष्य होता है। ज्योतिष तो ये लोग हैं।

Priyadarshan Shastri : जो भी हुआ अशोभनीय था इसके लिए टीवी चैनल जिम्मेदार है क्योंकि कई बार बहस के दौरान बोलने वालों पर कोई नियंत्रण ही नहीं रखा जाता है या कई बार एंकर किसी एक विचारधारा से जुड़े लोगों का ही साथ देता दिखता है और सर ! क्या न्यूज एवं मुद्दों के नाम पर इन्द्राणी एवं राधे माँ ही बची है?

अविनाश पांडेय समर, संजय कुमार सिंह और प्रियदर्शन शास्त्री के फेसबुक वॉल से.


लाइव मार कुटाई का वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=xblYGUAUDCo

 

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आईबीएन7 के शो में मेहमानों के बीच हाथापाई

नेटवर्क18 के न्‍यूज चैनल आईबीएन7 के शो ‘आज का मुद्दा’ में रविवार को मेहमानों के बीच हाथापाई हो गई। दरअसल, राधे मां और उन पर लगने वाले आरोपों को लेकर एक गंभीर चर्चा हो रही थी। लाइव कार्यक्रम में दो मेहमानों ने मर्यादा तोड़ते हुए आपस में मारपीट करने लगे।

आईबीएन7 की तरफ से बयान जारी कर इस घटना की निंदा की गई। चैनल की ओर से कहा गया है, ‘रविवार शाम पांच बजे के कार्यक्रम में ओमजी महाराज और साध्वी दीपा शर्मा के बीच अचानक हाथापाई हो गई। इसकी उम्मीद हमने नहीं की थी। हम इस घटना की पुरजोर शब्दों में निंदा करते हैं। उनसे इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं थी। हम इसकी भर्त्सना करते हैं।’


लाइव मार कुटाई का वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें : https://www.youtube.com/watch?v=xblYGUAUDCo

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IBN7 पिछले साल सबसे तेजी से बढ़ने वाला खबरिया चैनल बना!

टीवी न्यूज चैनलों में गलाकाट प्रतियोगिता के बीच आईबीएन 7 लगातार अपनी स्थिति मजबूत बनाता जा रहा है। पिछले साल जुलाई में नए मैनेजमेंट ने कमान संभाली थी जिसके बाद हालात काफी बेहतर हुए हैं। आंकड़े गवाह हैं कि जुलाई 2015 में चैनेल 4 से 4.5 फीसदी की टीआरपी के साथ बुरी हालात में था जबकि पिछले मौजूदा दौर में आईबीएन7 की टीआरपी लगातार 6 फीसदी से ऊपर बनी हुई है। टीआरपी मीटर पर नजर डाले तो पिछले करीब एक साल में IBN-7 ने तकरीबन 40 फीसदी का उछाल दर्ज किया है जो अपने आप में बाजार में उसकी मजबूत होती स्थिति को बयान कर रहा है। यही नहीं पिछली जुलाई के आसपास IBN-7 न्यूज चैनेल्स की टीआरपी में 10वें नंबर पर हुआ करता था। टीआरपी मीटर में IBN 7 की हैसियत एनडीटीवी से भी कम हुआ करती थी जबकि मौजूदा दौर में IBN-7 सातवें नंबर पर लगातार जमा हुआ है।

नए मैनेजमेंट के कमान संभालने के बाद से IBN 7 का लुक और फील तकरीबन पूरी तरह से बदल दिया गया है। कांटेंट में भी धार और रफ्तार देखने को मिल रही है। चैनेल के प्राइम टाइम को और बेहतर बनाने के लिए कई बदलाव किए गए हैं। शाम पांच बजे का डीबटे प्रोग्राम आज का मुद्दा टीआरपी के हिसाब से लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहा है। इसके अलावा IBN 7 ने प्राइम-टाइम में अपने डीबेट प्रोग्राम को हम तो पूछेंगे नाम से री-ब्रांड किया है। इस प्रोग्राम को चैनेल के डिप्टी मैनेजिंग एडिटर और न्यूज इंडंस्ट्री के जाने माने चेहरे सुमित अवस्थी पेश करते हैं। BARC के आंकड़े बताते हैं पिछले कई हफ्तों से ये प्रोग्राम बड़े-बड़े चैनेल्स से प्राइम-टाइम में लोहा ले रहा है । हम तो पूछेंगे में जब पार्लियामेंट में सुषमा के बयान पर डीबेट चल रहा था तो उस दौरान IBN 7 को सभी चैनेल्स से ज्यादा देखा गया। टीआरपी में सेंध लगाने के लिए IBN 7 ने रात नौ बजे और दस बजे में भी काफी बदलाव किये हैं । इंडिया 9 बजे को न्यूज इंडस्ट्री के सबसे पुराने एंकर्स में से एक आकाश सोनी पेश करते हैं।
 
दर्शकों में अपनी पकड़ बनाने और चैनेल का परसेप्शन ठीक करने के लिए भी IBN 7 ने पिछले एक साल में काफी कोशिशें की है। इसी रणनीति के तहत चैनेल पर लगातार बड़े चेहरे बुलाए गए। हॉट सीट नाम का इंटरव्यू प्रोग्राम फिर से शुरु कराया गया जिसे भूपेंद्र चौबे पेश करते हैं। भूपेंद्र के पास पत्रकारिता का लंबा अनुभव है और माना जाता है कि राजनीतिक हलकों में उनकी  काफी अच्छी पकड़ है । भूपेंद्र के नेटवर्किंग से भी चैनेल को काफी फायदा पहुंच रहा है। IBN 7 ने मोदी सरकार के एक साल पूरा होने पर दिल्ली में बड़ा ग्राउंड इवेंट भी किया था उस दौरान IBN 7 के मंच पर तकरीबन केंद्र सरकार के सभी बड़े मंत्री मौजूद थे। दिल्ली समेत कई राज्यों के चुनाव हो, प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा या फिर नेपाल में भूकंप IBN 7 के कवरेज में पैनापन नजर आ रहा है और ये बदलाव अब टीआरपी में भी दिखाई देने लगी है।

दरअसल IBN 7 में जड़ हो चुकी व्यस्था को जड़ से ठीक करने को कोशिश जुलाई से ही शुरु हो गई थी। चैनेल के प्रेसिडेंट न्यूज बन कर आए उमेश उपाध्याय इलेंक्ट्रानिक मीडिया के काफी पुराने खिलाड़ी है और उनके नाम पर कई बड़े मीडिया समूह में काम करने वालों ने IBN 7 का रुख किया। उन्होने आजतक और जी समेत कई बड़े चैनेल्स के लोगो को IBN 7का हिस्सा बनाया। जाहिर ये बदलाव IBN 7 के लिए बेहतर साबित हुआ। ये बात अलग है कि चैनेल में अभी भी बहुत कुछ बेहतर किए जाने की गुंजाइश है।

भड़ास को भेजे गए एक पत्र पर आधारित.

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उमेश उपाध्याय ने आईबीएन7 का सत्यानाश कर दिया, कइयों को इधर-उधर फेंका, देखें लिस्ट

मुकेश अम्बानी के चैनल टेक ओवर करने के बाद ibn7 की टीआरपी दूरदर्शन के आसपास है। जबसे उमेश उपाध्याय ने इस आईबीएन7 चैनल की कमान संभाली है, उसकी पूरी कोशिश चैनल को बर्बाद करने की है। अगर आशुतोष और राजदीप ने सैकड़ों की नौकरी खाकर पेट पे लात मारी तो देश के सबसे बड़े बिज़नेस ग्रुप के चैनल ने एक-एक करके पत्रकारों से रोज़ी लेने का काम शुरू किया है। उदाहरण देकर बात करते हैं। ब्रिज दुग्गल 1.75 लाख रुपये प्रति माह की तनख्वाह लेकर पूरे असाइनमेंट का कामकाज सँभालते थे। उमेश ने उनका तबादला रांची कर दिया। जब दुग्गल ने पूछा कि क्या आप रांची में पौने दो लाख का रिपोर्टर रखेंगे तो उन्हें बोला गया- हाँ, हम इस चाहते हैं।

मज़ेदार बात ये है कि रांची में ibn7 के 25 हज़ार रूपए महीने की तनख्वाह लेने वाले जयशंकर को इसी चैनल ने इसलिए निकाल दिया था क्योंकि चैनल को वहां ब्यूरो नहीं स्ट्रिंगर की ज़रूरत थी। आलोक वर्मा नाम के एक क्राइम रिपोर्टर जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी दिल्ली पुलिस मुख्यालय के आसपास गुज़ारी, उनका तबादला बिहार के भागलपुर कर दिया गया। पूछने पर आलोक को बोला गया कि हमें बिहार में सीनियर लोगों को भेजना है। आलोक भागलपुर ज्वाइन किये। आलोक की तनख्वाह करीब 1 लाख रुपए है। किसी भी चैनल के पास भागलपुर में केवल स्ट्रिंगर ही हैं। आलोक के पास न गाड़ी है न ऑफिस है और न कैमरा है।

नीरज गुप्ता ibn7 के पोलिटिकल एडिटर थे। उनका तबादला पटना किया गया। नीरज की तनख्वाह करीब पौने दो लाख है। जब नीरज ने कहा कि इतना महंगा रिपोर्टर पटना क्यों भेज रहे हैं तो उन्हें बोला गया कि हमें बिहार मज़बूत करना है। यहाँ ये बताना ज़रूरी है कि पटना में काम करने वाले किसी भी चैनल चाहें वो हिंदी हो या इंग्लिश हो, की तनख्वाह नीरज के बराबर नहीं है। यहाँ ये भी बताना ज़रूरी है कि पटना में ibn7 के ब्यूरो चीफ चंद्रमोहन को मात्र 35000/- रूपए मिलते थे और उनको दिल्ली इसलिए बुला लिया गया क्योंकि ये भी तनख्वाह चैनल पर भारी पड़ रही थी। आप ही सोचिए- पौने दो लाख बनाम पैंतीस हज़ार।

चर्चा है कि आउटपुट से कुछ और लोगों का तबादला बिहार होना है। इसी क्रम में आउटपुट के तस्लीम खान को रिसर्च पर भेज दिया गया है और करीब तीन अन्य लोगों को बिहार भेजा जाना ज़रूरी है। जानकारों के मुताविक उमेश उपाध्याय की सारी कवायद एक जाति विशेष के लोगों को फ़ायदा पहुँचाने की है और हर वो शख्स जो उनकी जाति का नहीं है, वो उनका शिकार होगा। चैनल में विद्रोह का माहोल है। मालिक चैनल के लोगों से न मिलते हैं न उनकी पीड़ा को समझते हैं। करोड़ों अरबों के इस चैनल को ऐसे लोगों के हाथ सौंप दिया है जिनके ऊपर चैनल डुबाने की ही तोहमत लगी है। सूत्रों से खबर ये है कि चैनल के सीईओ पारिगी ने कोशिश की हालात बेहतर हों लेकिन वो उमेश के रसूख के चलते अभी तक कामयाब नहीं हो पाये। उमेश दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के भाई हैं  और दोनों दिल्ली में रिलायंस की पॉवर सप्लाई करने वाली कंपनी से धंधा करते हैं, जिसको लेकर केजरीवाल प्रेस में चीख चीख कर बयान दे चुके हैं। इतने ख़राब माहौल के बावजूद उमेश इसलिए बचे हैं क्योंकि उनको ibn में लाने वाले उनके मित्र रोहित बंसल रिलायंस बोर्ड के सदस्य हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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सतीश उपाध्याय, उमेश उपाध्याय और बिजली कंपनियों का खेल

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आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को दूसरे पत्रकार ने ‘Certified Modified journo’ करार दिया!

(वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह)

शीतल पी. सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में चौथी दुनिया की लांचिंग टीम के हिस्सा थे. इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं. अमर उजाला से अखबारी करियर शुरू करने से पहले शीतल सोशल और पोलिटिकल एक्टिविस्ट हुआ करते थे. देश समाज बदलने का जज्बा लिए ग्रासरूट लेवल यानि गरीबी के ग्राउंड जीरो पर काम किया करते थे. बाद में बिजनेस में आए और अपने उद्यम से आर्थिक रूप से समृद्ध हो गए. लेकिन इस भागमभाग में मीडिया कहीं पीछे छूट गया. अब फेसबुक और ट्विटर ने उन्हें फिर से लिखने कहने बोलने का माध्यम दे दिया है.

शीतल पी सिंह ने अपने फेसबुक वॉल पर आईबीएन7 के संपादक सुमित अवस्थी को Certified Modified journo करार दिया है. सुमित अवस्थी ने एक ट्वीट किया है जिसमें उन्होंने पीएम के डायरेक्ट आए मैसेज को दिखाया है और पीएम के एक साल पूरा होने पर उनकी तारीफ की है. दरअसल सुमित अवस्थी उसी आईबीएन7 के संपादक हैं जिसके मालिक मुकेश अंबानी हैं. मुकेश अंबानी ने लोकसभा चुनाव से पहले ही सबको कह दिया था कि इस बार मोदी का भरपूर सपोर्ट करना है. देखते ही देखते आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन से मोदी को लेकर क्रिटिकल रुख रखने वालों को भगा दिया गया और मोदी भक्त पत्रकारों की जमात को जोड़ा जाने लगा.

नतीजा ये कि अब इन चैनलों में कोई बहस नहीं होती, एकतरफा दुष्प्रचार किया जाता है. मोदी और अंबानी को महफूज रखते हुए बाकी सभी पर ये चैनल हमलावर रहते हैं. इस पूरे गेम को महीन नियंत्रण संचालन सुमित अवस्थी और अन्य इन्हीं जैसों द्वारा किया जाता है. इसके बाद से पूरे मार्केट में आईबीएन7 और सीएनएन-आईबीएन के संपादकों-पत्रकारों की हैसियत पर बट्टा लग गया है. देखिए सुमित अवस्थी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट और शीतल पी सिंह का स्टेटस.

Sheetal P Singh : Certified Modified journo exhilarating by his achievement…

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इतनी खुली दलाली 56 इंच के सीने से ही मुमकिन है…

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अंबानी के रिलायंस और नमो की सरकार के खिलाफ बोलने से क्यों कतरा रहे हैं बड़े मीडिया घराने

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आशू के आंसू : उस दिन तो साढ़े तीन सौ घरों के चूल्हे बुझ जाने पर भी नहीं रोए थे आशुतोष

जब आईबीएन7 से साढ़े तीन सौ लोग निकाले गए थे और इनके घरों का चूल्हा अचानक ठंडा पड़ गया था तब मैनेजिंग एडिटर पद पर आसीन आशुतोष के आंसू तो छोड़िए, बोल तक नहीं फूटे थे. धरना प्रदर्शन सब हुआ लेकिन आशुतोष चुप रहे. आजकल वे अक्सर टीवी शोज में कहते रहते हैं कि मैं नौकरी छोड़कर राजनीति में आया… पर हम लोगों को पता है कि आशुतोष को निकाला जाना था… कारपोरेट में एक वाक्य होता है स्मूथ एक्जिट. यानि लात मार कर निकाले जाने से पहले सम्मानजनक तरीके से खुद छोड़ देने की प्रक्रिया. 

तब आशुतोष ने यही किया था. बजाय नया चैनल खोजने के, वे केजरीवाल को खोज चुके थे, अन्ना आंदोलन पर किताब लिखकर केजरीवाल के गुडबुक में आ चुके थे, सो राजनीति में कूद पड़े. आशुतोष के करियर को ध्यान से देखें तो उसमें टर्निंग प्वाइंट तभी आया जब उनके साथ कोई हादसा घटिया हुआ या प्लान हुआ. एक बार बेडरूम में घुसने की कोशिश में तमाचा क्या पड़ा, पत्रकारिता में इनकी गाड़ी दौड़ पड़ी, सौजन्य से कांशीराम-एसपी सिंह. एक तमाचे से आशुतोष का पत्रकारीय करियर संवर गया. 

अब जबकि आशू की राजनीतिक गाड़ी गड़बड़ाई डगमगाई हुई है, बेतुकी बयानबाजी और ओवर रिएक्शन के कारण, तो उन्होंने बिलकुल सही समय पर बिलकुल सही चैनल चुना और फफक फूट कर आंसू बहाने लगे, लाइव.. पीपली लाइव में ये वाला लाइव ऐसा कि कुछ भावुक दर्शक भी रुमाल निकाल पड़े. जो शख्स दशकों तक टीवी, टीआरपी. लाइव और इमोशंस का मास्टर रहा हो, उसे खूब पता है कि वह क्या कर रहा है. और, उसे यह भी पता है कि यह भावुक देश उसके रोने के बाद उसके सारे पाप माफ कर देने की कूव्वत रखता है. 

सच कहूं तो सोनिया राहुल मनमोहन कांग्रेस और मोदी अमित शाह राजनाथ भाजपा के मुकाबले बहुत छोटे पापी हैं केजरीवाल, आशुतोष, सिसोदिया आदि इत्यादि लेकिन जब पूरा का पूरा कारपोरेट करप्ट मीडिया इन बड़े पापियों के हिसाब से संचालित होते हों, छोटे मोटे पापी पकड़कर गला दबाते हों तो तो छोटे मोटे पापियों को पाप धोने का देसी तरीका रुदालियों की तरह लोटपोट करके रोना छाती पीटना और माफी मांगना ही तो हो सकता है. इसलिए आशुतोष को आप लोग भी माफ करिए… लेकिन ध्यान रखते हुए कि इन सज्जन के संपादकत्व में सैकड़ों घरों के चूल्हे बुझे थे, पर इनकी आत्मा ने तब इन्हें झकझोरा नहीं, इनकी आंखों ने एक बूंद आंसू नहीं टपकाए, इनके मुंह से सांत्वाना के एक बोल नहीं फूटे… सो, आशू भाई… मैं तो यही कहूंगा… ”रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों…”

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

यशवंत का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

किसान की खुदकुशी और बाजारू मीडिया : कब तक जनता को भ्रमित करते रहोगे टीआरपीखोर चोट्टों….

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पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने बताई पंकज श्रीवास्तव टाइप क्रांतिकारियों की असलियत, आप भी पढ़ें….

(अभिषेक उपाध्याय)


Abhishek Upadhyay : बहुत शानदार काम किया। Well done Sumit Awasthi! Well done! सालों से सत्ता की चाटुकारिता करके नौकरी बचाने वाले नाकाबिल, अकर्मण्यों को आखिर रास्ता दिखा ही दिया। उस दिन की दोपहर मैं आईबीएन 7 के दफ्तर के बाहर ही था जब एक एक करके करीब 365 या उससे भी अधिक लोगों को आईबीएन नेटवर्क से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। चैनल के अंबानी के हाथों में चले जाने के बावजूद बेहद ही मोटी सैलरी लेकर चैनल का खूंटा पकड़कर जमे हुए उस वक्त के क्रांतिकारी मैनेजिंग एडिटर खुद अपने कर कमलों से इस काम को अंजाम दे रहे थे। एक एक को लिफाफे पकड़ाए जा रहे थे।

मैं उस वक्त उज्जवल गांगुली से मिलने वहां गया था। आईबीएन 7 के कैमरा मैन उज्जवल गांगुली उर्फ दादा उर्फ ददवा मेरे बेहद ही अज़ीज़ मित्र हैं और वो भी उस लिस्ट में शामिल थे जो उस वक्त अंबानी के चैनल में शीर्ष पर बैठी क्रांतिकारियों की पौध ने अपने हाथों से तैयार की थी और जिसमें बेहद कम सैलरी पर सुबह से लेकर रात तक चैनल के वास्ते खटने वाले “बेचारे” पत्रकारों की भीड़ थी। अधिकतर वही निकाले वही गए जिनकी सैलरी कम थी, जो किसी मैनेजिंग एडिटर के “लॉयल” नही थे, जो चाटुकार नही थे, जो काम के अलावा किसी दूसरे मजहब के अनुयायी नही थे। बाकी वामपंथ के नाम पर दिन रात भकर-भौं करने वाले, लाखों की सैलरी उठाकर, मंहगी गाड़ियों से आफिस पहुंचकर आफिस में सिर्फ बौद्धिक उल्टियां करने वाले, रात को वोदका पीकर और केंटुकी फ्राइड का चिकन भकोसकर सर्वहारा के नाम पर लगभग आत्महत्या की स्थिति तक व्यथित हो जाने वाले, हिमाचल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के बेटे अनुराग धूमल का अनंत प्रशस्ति गान करके, हिमाचल में शानदार होटल का लाइसेंस हथियाकर पत्रकारिता की दुकान सजाने वाले, सब के सब सुरक्षित थे। पूरा का पूरा “गैंग” सुरक्षित था। वेल डन सुमित अवस्थी! ये तो नैचुरल जस्टिस हुआ न! पोएटिक जस्टिस है ये तो! ये तो एक दिन होना ही था। अच्छा हुआ, ये आपके कर कमलों से हुआ। इतिहास याद रखेगा आपके इस योगदान को।

अच्छा! ये भी अदभुत है। क्रांतिकारिता की नई फैक्ट्री खुली है ये। चैनल को अंबानी खरीद ले। कोई फर्क नही। मोटी सैलरी उठाते रहो। बिना काम के ऐश करते रहो। चैनल में केजरीवाल का बैंड अरसे से बज रहा हो। कोई फर्क नही। बिग एम की तरह बजते रहो, बजाते रहो। सत्ता के तलुवे चाटते रहो। चैनल पर मोदी गान हो रहा है। होने दो। चैनल से भोले भाले मासूम कर्मी लात मारकर निकाले जा रहे हैं। पियो वोदका। और वोदका पीकर रात के 2.30 से 3.00 के बीच में, (जब पिशाब महसूस होने पर उठने का जी करे), तान लो मुठ्ठियां और कर दो मूत्र विसर्जन। मगर जब निज़ाम बदल जाए और नए संपादक से मामला “सेट” न हो जाए और जब ये तय हो जाए कि अब कटनी तय है तो उसी शाम एक मैसेज भेजो और खुद के क्रांतिकारी होने का मैग्नाकार्टा पेश कर दो। दरअसल ये सब मनुष्य नही, बल्कि प्रवृत्तियां हैं। कुंठा के मानस पुत्र हैं ये। इलाहाबादी हूं, इसलिए जब भी कुछ लिखता हूं, दुष्यंत कुमार अपने आप सामने खड़े हो जाते हैं। दुष्यंत ने ऐसी ही कुंठित प्रवृत्तियों के बारे में ये कहते हुए आगाह किया है कि-

“ये कुंठा का पुत्र
अभागा, मंगलनाशक
इसे उठाकर जो पालेगा
इसके हित जो कष्ट सहेगा
बुरा करेगा
प्राप्त सत्य के लिए
महाभारत का जब जब युद्ध छिड़ेगा
ये कुंठा का पुत्र हमेशा
कौरव दल की ओर रहेगा
और लड़ेगा।“

अव्वल तो इस बात के ही खिलाफ हूं कि जब समय खुद ही इन कुंठा पुत्रों को इनकी नियति की ओर भेज ही रहा है तो क्यों इस पर कलम तोड़ी जाए। मगर कल से आज तक कथित बड़े पत्रकारों के बीच जिस तरह का विधवा विलाप देख रहा हूं, लगा कि ऐसे तो नही चलने वाला है। ऐसे रो रही हैं कार्पोरेट पत्रकारिता के पैसो से अपनी अंटी गरम करके बौद्धिक उल्टियां करने वाली ये अतृप्त आत्माएं मानो गयी रात ही इनका सुहाग उजड़ गया हो। इस दौर में ये बहुत जरूरी है कि इस तरह के नकाबपोशों की पहचान हो। उसी कार्पोरेट पत्रकारिता के प्लेटफार्म से लाखों की सैलरी हर महीने उठाकर, और कार में फुल एसी चलाकर दफ्तर पहुंचने वाली ये आत्माएं रात ढ़लते ही हाथों को रगड़ते हुए बहुत कुछ टटोलती नजर आती हैं। बारी बारी से मंडी सज जाती हैं।

पहले चैनल पर मोदी का करिश्मा बेचो, स्वच्छ भारत अभियान बेचो। अपने मालिक के स्वच्छ भारत अभियान के ब्रैंड एंबैसडर होने की खबर बेचो। हाथो को टटोलो और उसे रगड़ते हुए कार्पोरेट पत्रकारिता का हर खंबा बेच डालो। और फिर रात ढलते ही, वोदका गटको और फिर शुरू हो जाओ। अबकी बारी फेस बुक पर आओ और गरीबों की भूख बेचो। विदर्भ के किसानो की आह बेचो। बुदेंलखंड के किसानो की आत्महत्या बेचो। आंसू बहाओ पत्रकारिता के पतन पर। रोओ कार्पोरेट पत्रकारिता के अंजाम पर। गरीबों, फटहालों की बदहाली की स्याही अपनी कलम में उड़ेलकर उसकी कूची बनाओ और फिर अपनी बौद्धिक छवि चमकाओ। सेमिनारों में जाओ। पोस्टर लगाओ। क्रांतिकारी बनो और इंटरव्यू को भी क्रांतिकारी बनाओ। मुझे लगता नही कि पत्रकारिता के दोगलेपन का इससे बड़ा भी कोई उदाहरण होगा।

आज रो रही हैं ये सारी की सारी पत्रकारिता की भोथरी तलवारें। कोई फर्क नही पड़ता कि जिस छत के नीचे आप काम कर रहे हों, जिस छत के एकाउंट सेक्शन से लाखों की सैलरी लेकर अपनी जेब गर्म कर रहे हों, उस छत के बारे में राम जेठमलानी से लेकर सुब्रहमण्यम स्वामी तक सभी खुले मंच पर ब्लैक मनी के घालमेल की कहानी बयां कर रहे हैं। वो भी एक नही दर्जनो बार। मय सबूत समेत। यहां तक इस मामले की आंच पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम तक पहुंच चुकी है। मगर आरोपों में घिरी इसी छत से लाखों की सैलरी और छप्पर फाड़ सुविधाएं उठाकर शुचिता और शुद्धता की बात करने वालों का विधवा विलाप यहां से भी सुनाई दे रहा है। यहां भी आईबीएन में हुई इस घटना की बाबत चुप्पी तोड़ने और साथ देने की हुंकार भरी जा रही है। खुद अपने ही संस्थान से कितने लोग और कितनी ही बार बिना किसी कसूर के छंटनी के नाम पर निकाल दिए गए, मगर ये बौद्धिक आत्माएं जोंक की तरह अपनी कुर्सी से चिपकी रहीं। मालूम पड़ा कि उस दौरान सांस की रफ्तार भी थोड़ी धीमी कर दी थी कि कहीं सांस की आवाज को लोग आह समझ बैठें और नौकरी पर खतरा आ जाए। यहां भी ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर सरपट रफ्तार से बड़ी कार दौड़ाते हुए फेस बुक पर गरीबों का दर्द शरीर से मवाद की तरह बह निकलता है। ये सबकी सब दोगली आत्माएं ऐसा लगता है कि जैसे धर्मवीर भारती के अंधायुग के अश्वात्थामा से प्रेरित हों—
अंधा युग में अश्वत्थामा कहता है..

“मैं यह तुम्हारा अश्वत्थामा
कायर अश्वत्थामा
शेष हूँ अभी तक
जैसे रोगी मुर्दे के
मुख में शेष रहता है
गन्दा कफ
बासी थूक
शेष हूँ अभी तक मैं..।”

वक्त बहुत निर्मम होता है। उसे आप अपने बौद्धिक आतंकवाद का शिकार नही बना सकते। वो जब पहचान लिखता है तो अश्वत्थामा की तरह से ही लिखता है। दरअसल ये सुविधाभोगी वामपंथियों की पौध है, जिनका ईमान इस तरह फुसफुसा और लिसलिसा है कि एक बार इनकी नौकरी पर आंच आने की नौबत हो, और अगर चरणों पर लोटने से भी रास्ता निकल जाए तो उसके लिए भी तैयार रहेंगे, ये भाई लोग। और जब सारे ही रास्ते बंद हो जाएँ तो एकाएक इनके भीतर का क्रांतिकारी सांप फन काढ़कर खड़ा हो जाएगा, मुठ्ठियां तानने की धमकियां देता हुए, हाथ रगड़ रगड़कर हवा में अपने ही चरित्र के वजन को टटोलता हुआ, ग्रेटर कैलाश की सड़कों पर कार के भीतर फुल एसी की मस्ती या फिर ब्लोअर के मस्ताने टंपरेचर में गुलाम अली को सुनते हुए, सोशल मीडिया पर रोता हुआ, गरीबों की आह महसूस करता हुआ। अगर इन कथित क्रांतिकारी पत्रकारों को दिसंबर-जनवरी की बस एक रात के लिए भारी कोहरे और नम जमीन के चारों और तने मुज़फ्फरनगर के दंगापीडि़तों या फिर कश्मीर के सैलाब पीड़ितों के एक चादर वाले फटे-चिथड़े टेंट में छोड़ दो, तो उसी रात इन्हें उल्टी और दस्त दोनो एक साथ हो जाएगा। इन्हें मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों के दर्द की बाबत भी फेसबुक पर कलम तोड़ने से पहले फुल स्पीड का ब्लोअर, रम के कुछ पैग और बंद गले का ओवरकोट चाहिए होगा, क्योंकि उसके बगैर तो उंगलियों से लेकर संवेदना तक सभी कुूछ जम जाएगा। खालिस बर्फ की तरह। आईबीएन 7 के स्टेट करेस्पांडेंट रहे और अपने बेहद अज़ीज़ गुरू सत्यवीर सिंह जो खुद इसी छंटनी का शिकार हुए थे, ने उसी दिन मुझे रात में फोन करके बोला था कि गुरु देखो आशुतोष ने अंबानी का बूट पहनकर हम सब के पेट पर लात मार दी। सत्यवीर सर, आज मैं कह रहा हूं कि, ये वक्त है। वक्त। ये पूरा का पूरा 360 डिग्री का राउंड लेता है, ये। ये एक चक्की है गुरू। चक्की। पिंसेगे तो सारे ही। कोई कल पिस गया। कोई आज पिस रहा है, और किसी की बारी आने ही वाली है।

दरअसल आज तो इनकी बात का दिन ही नही है। आज तो बात होनी चाहिए उन 365 कर्मचारियों की जो मोटी सैलरी पाकर बॉस की चाटुकारिता करने वाली इन्हीं कुंठित ताकतों की भेंट चढ़ गए। इनको इनकी नौकरी वापस होनी चाहिए। ये वे लोग हैं जो 15 हजार से लेकर 30 हजार महीने की सैलरी पर अपने परिवार का पेट पालते हैं। कुछ कुछ इससे भी कम पाते थे। बहुतों के बच्चों का स्कूल छिन गया। बहुतों के घर टूट गए। बहुत आज की तारीख में फ्री लांसिंस करके दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। ये सब एक बड़ी कार्पोरेट साजिश की भेंट चढ़ गए और जिनके साजिशकर्ता आज एमपी से लेकर एमएलए बनने की जुगत में उन्हीं कार्पोरेट ताकतों को गरिया रहे हैं जिनकी रोटी खाकर अपने खून का रंग लाल से नीला कर लिया है। पर इनकी बात तो आज होती ही नही है। सुमित अवस्थी, अगर कचरा साफ करने की इस प्रक्रिया से जो धनराशि बचे, उससे कुछ ऐसे ही मेहतनकश मगर अभागे (अभागे इसलिए क्योंकि ये किसी मैनेजिंग एडिटर के नजदीकी नही हो सके) लोगों को आप नौकरी दे सकोगे तो इतिहास और भी बेहतर शक्ल में याद रखेगा आपको। फिलहाल Keep up. As of now you are the instrument of poetic justice!

अभिषेक उपाध्याय तेजतर्रार पत्रकार हैं. अमर उजाला से लेकर इंडिया टीवी तक की यात्रा में कई चैनलों अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे. अभिषेक अपनी खोजी पत्रकारिता और विशेष खबरों के लिए जाने जाते हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Yashwant Singh पंकज श्रीवास्तव नामक हिप्पोक्रेट पत्रकार की अवसरवादी फ़िक्सर क्रांतिकारिता पर एक और पोल खोलक पोस्ट। निर्दोष किस्म के मूर्ख, भावुक, अति उत्साही और कार्यकर्ता मानसिकता वाले कामरेडों अब तो आँख खोलो….

Vikas Mishra इसे कहते हैं जिगर… जो अभिषेक तुमने दिखाया है। सच कहा और डंके की चोट पर सच कहा।

Sandeep K. Mishra ..कईयों के कंठ इस इंतजार में अभी भी सूख रहे होंगे कि कब तलवार-ए-सुलेमानी से उनका सामना होगा।। हालांकि साहब मीडिया हित में कई चैनलों में ऐसे अभियान की जरूरत है।। जहां सेटिंग वाले डिस्को और काम वाले खिसको जैसे हालात से दो-चार हैं।।।।।

Vishal Singh लिखने के लिए साहस होना चाहिए.. आपको साहस को सलाम…

Rashid Rumi Well done Abhishek sir.pahle Well done sumit awasthi dekga to laga k aap sumit ki tarif kar rahe ho k usne pankaj ko nikala. Magar pura padha to dil khush ho gaya. Journalists ko ye corporate wale tawayef bana k rakha haia.. we r not doing what we taught in journalism. Weal should stand against it.

Suneel Mishra Vo sadak par bhagne vale patrkaro ka support kar rate hai, aur daru peeke baudhik pelne vale editors ko aaina dikha rahe hai. Nice post Abhishek Upadhyay bhai.

Anoop Tripathi बहुत खूबसूरत सच और जवाब दिया आपने

Imran Siddiqui Patrakarita ke naam par dalali ki dukan chala rahe hain. Inka zameer mar chuka hai. Abhishek bhai apne accha jawab diya hai. Hope the situation will b change one day.

Rajshree Singh I remember ….apne kaha tha ki aap IAS nahi banna chahte…kyu ap kishi ke dabav me kaam nahi karna chahte the….kya kahi azadi nahi hai sach bolne aur likhne ki

Abhishek Upadhyay Rajshree Singh पत्रकार बनने के अपने फैसले से बेहद ही खुश हूं जिंदगी में बहुत कम ही ऐसे फैसले हैं जिनके बारे में सोचकर अच्छा लगता है। ये उनमें से एक है। रही बात सच बोलने की आजादी की तो वो हर जगह है और कहीं नहीं है। हम सब अपनी अपनी सीमाओं में इसी आजादी को explore करते हैं। जो जितना अधिक explore कर लेता या सकता है, वो उतना ही जयी होता है।

Riyaz Hashmi धो डाला भाई, ये है खरी खरी।

Ashish Chaubey क्या करेंगे भईया ये लडाई ही चाटुकारिता बनाम पत्रकरिता की हो गई है…. जिसमें चाटुकारिता चरम पर है…. दलालों ने पत्रकारिता को नेपत्य में ढकेल देने की मानों कसम खा ली हो… लेकिन पत्रकारिता को दबा पाना इतना आसान भी नहीं जितना इन दलालों लगता है….

Latikesh Sharma आप ने जो लिखा है उसे जानते सभी है , लेकिन उसे लिखने के लिए दम चाहिये। आप में दम है और आप ने लिखा भी है , इसलिए आप के साहस को सलाम !

Baljeet Singh Adv अभिषेक आपको शायद याद होगा, बहराइच जनपद में लोकरीति दैनिक हुआ करता था, उसके हम लोगों ने बन्द कर दिया। कारण यह है कि चाटुकारिता वाली पत्रकारिता नहीं हो पायी और लोकरीति को बन्द करना पड़ गया। वर्तमान समय में नेता, अभिनेता और अधिकारियों को अपने मतलब की खबर छापने/दिखाने वाले ही पसन्द है, शेष उनके दुश्मन।

Rahul Ojha बहुत सुन्दर भाई क्या लिखा है पूरे कपडे उतार लिया आशुतोष के मज़ा आ गया ।

Rishi Raj दिक्कत यही है कि हमने अपने ही कौम के बीच खाई बना दी है ।आपसी रंजिश को कभी न कभी तो त्यागना होगा वरना बजते रहिये या फिर भजते रहिये सरकार

Rinku Chatterjee स्नेही अनुज आज दी को तुम्हारा मस्तक चूमने का मन हो रहा है। मेरे आशीर्वाद से उठे हाथ को अपने सर पे महसूस करो। मुझे नाज़ है तुम पे।

Krishna Dev क्या लिखते हो मित्र, ग़ज़ब ।

Kishor Joshi एकदम सटीक आभिषेक जी!!! कहते हैं ना कि- जब शहादत कला बन जाती है, तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।

Rajanish Pandey “देखे है बहुत बाते बनाने वाले ,बाते वाले जनाब काम किधर करते” यही हाल था जनाब ‘ग्राउंड जीरो’ का।।

Ajay Pandey अभिषेक Boss आपसे शब्दश: सहमत हूं, खून का रंग कभी पानी नहीँ होता है, इंसान की मजबूरियां, गरीबी और लाचारी उसे पानी पर जीने को मज़बूर कर देती है। जिसके मन में दूसरे के लिए पीड़ा हो उसे मैं आम इंसान नहीं मानता हूं, आपके लिए दुआओं के हज़ारों हाथ उठेंगे।

Divakar Mishra Poori kadvi sachayi nikal kar rakh diye Abhishek Upadhyay jo shayad mere jaise bahut so log nahi jante the. Very well done..

आशुतोष बाजपेयी Bhai..kya badhia likhte ho! Maza aa gaya,, aapke jaise kuch log na ho to patrkarita se kab ka bharosa uth gaya hota

Abhishek Katiyar Sir.. Pahali bar maine itna lamba content read kiya hai kisi bhi post ka.. really aap bahut umda likhte hai.. itna bewak bilkul clear and i wish ke aapka ye outspoken attitude hamesha bana rahe.. U r simply superb Sir.. Heads off to you

Sudhanshu Tripathi शब्दशः सत्य कहा अभिषेक भाई। वक्त 360 डिग्री राउण्ड लेता है। सभी को इन्तहान देना पड़ता है। आज नहीं तो कल नम्बर तो सभी का आता है।

Abhishek Yadav Kya baat hai sirji, aapne to kaynaat hi dikha do aaj kal ki.

Alok Bhardwaj Es bat ko uchit forum me uthaya jaye maine pankaj ji bhi post padi thi …….bahut badi safai ki jarurat hi media me..nahi ek din aisa hoga jaise europe me church ki bhumika thi waise hi media khaskar e media ki yaha hogi

Abhishek Upadhyay दरअसल ये किसी सिद्धांत विद्धांत की लड़ाई नही, बल्कि खालिस सेटिंग गेटिंग की लड़ाई है जिसे बौद्धिकता की चासनी से सानकर सुशोभित कर दिया गया है, महज क्षुद्र स्वार्थ की खातिर।

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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आईबीएन7 और ईटीवी वालों ने स्ट्रिंगरों को वेंडर बना डाला! (देखें फार्म)

अंबानी ने चैनल खरीद लिया तो जाहिर है वह एक तीर से कई निशाने साधेंगे. साध भी रहे हैं. मीडिया हाउस को मुनाफे की फैक्ट्री में तब्दील करेंगे. मीडिया हाउस के जरिए सत्ता की दलाली कर अपने दूसरे धंधों को चमकाएंगे. मीडिया हाउस के जरिए पूरे देश में रिलायंस विरोधी माहौल खत्म कराने और रिलायंस पक्षधर दलाली को तेज कराने का काम कराएंगे. इस कड़ी में वे नहीं चाहते कि जिले से लेकर ब्लाक स्तर के पत्रकार कभी कोई आवाज उठा दें या रिलायंस की पोल खोल दें या बागी बन जाएं. इसलिए रिलायंस वाले खूब विचार विमर्श करने के बाद स्ट्रिंगरों को वेंडर में तब्दील कर रहे हैं. यानि जिले स्तर का आईबीएन7 और ईटीवी का स्ट्रिंगर अब वेंडर कहलाएगा और इस बाबत दिए गए फार्मेट पर हस्ताक्षर कर अपने डिटेल कंपनी को सौंप देगा.

इस वेंडरशिप के जरिए रिलायंस की योजना यह है कि जिले स्तरीय पत्रकार को वेंडर बनाकर उससे कंटेंट डिलीवर कराने के नाम पर समझौता करा लिया जाएगा. इस समझौते में कई अन्य पेंच भी हैं. लेकिन अंततः यह पूरा समझौता पत्रकारिता के बुनियादी नियमों के खिलाफ है. अब स्ट्रिंगर अपने को कंपनी चैनल का आदमी नहीं बता पाएगा. उसकी अपनी खुद की सारी जिम्मेदारी होगी. वह बस कंटेंट देगा और बदले में पैसे लेगा. इसके अलावा वह कहीं कोई क्लेम दावा नहीं कर सकता. आईबीएन7 और ईटीवी के स्ट्रिंगरों में इस बात की नाराजगी है कि अब तो उन्हें कंपनी वाले स्ट्रिंगर भी नहीं रहने दे रहे, वेंडर बना दिया है, जिसका पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है. सूत्रों का कहना है कि रिलायंस वाले पत्रकारों को वेंडर बनाने का काम सिर्फ आईबीएन7 और ईटीवी में ही नहीं कर रहे हैं बल्कि कंपनी के दूसरे न्यूज चैनलों में भी कर रहे हैं.

आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन और ईटीवी को जिस ढंग से इन दिनों चलाया जा रहा है, उससे अब सबको पता चल गया है कि आखिर कारपोरेट के चंगुल में आने पर पत्रकारिता का क्या हाल होता है. उमेश उपाध्याय जो कभी पीआर का काम देखा करते थे, इन दिनों कंटेंट हेड के बतौर चैनलों में डंडा चला रहे हैं. इनके भाई सतीश उपाध्याय बीजेपी के दिल्ली अध्यक्ष हैं. इन दोनों के बारे में कहा जाता है कि ये अंबानी के इशारे पर काम करने वाले हैं. अंबानी की लूट के खिलाफ आवाज उठाने वाले केजरीवाल व इनकी पार्टी के बारे में कोई भी सकारात्मक खबर, बाइट दिखाने पर चैनल में पाबंदी है. इस तरह ये मीडिया हाउस देखते ही देखते सत्ता तंत्र और मुनाफा तंत्र का औजार बन गया है. इसमें अब वही लोग काम करने के लिए बचे रहेंगे जिन्हें पत्रकारिता से नहीं बल्कि पैसा से मतलब है.

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मित्ररंजन भाई, आपने पागुरप्रेमी पंकज परवेज का पुख्ता बचाव किया है

: पंकज परवेज का विलाप और किसी की जीत के जश्न का सवाल : किसी मित्ररंजन भाई ने अपने मित्र पंकज परवेज मामले पर जोरदार बचाव किया है। बचाव में घिसे हुए वामपंथी रेटॉरिक और शाप देने वाले अंदाज में परवेज भाई के चेहरे से नकाब खींचने वालों की लानत मलामत की गई है। लेकिन परवेज भाई की पवित्र और पाक क्षवि पर सवाल उठाने वाले लोगों को भाजपाई और संघी कहने का उनका अंदाज उस लिथड़ी हुई रजाई की तरह हो गया है जिसकी रुई की कई सालों से धुनाई नही की गई है। पार्टी और संगठन में असहमति और आलोचना पर संघी होने का ठप्पा लगा देने की रवायत बहुत पुरानी रही है। लेकिन दुर्वासा शैली में कोसने और गरियाने के बावजूद इस संगठन और पीछे की पार्टी का स्वास्थ्य दिनोंदिन खराब होता जा रहा है। लेकिन कॉमरेड लोग हैं कि मुट्ठी तानने / मारने में मशगूल हैं।

पंकज परवेज ने फेलोशिप के पैसों से अपने दलिद्दर साथियों को पाला। उन पैसों से  भुखनंगों को दाल-भात भकोसने का इंतजाम किया, उनके लिए किताबें खरीदीं। घर पर अकूत संपत्ति होने के बावजूद पत्रकारिता करने के लिए अमर उजाला में दो कौड़ी की नौकरी की। 17 सालों तक संघर्ष किया और फिर दो लाख रुपये के छोटे से पैकेज पर पहुंचे। संघर्ष के दिनों में सपत्नीक मित्ररंजन भाई के घर पर बारहा हाजिरी लगाई। क्या इतना काफी नहीं है परवेज भाई को ‘लाल-रत्न’ घोषित कर देने के लिए ? कमाल करते हैं थेथर लोग। परवेज भाई पर तोहमत लगा रहे हैं कि किसी को नौकरी क्यों नहीं दिलवाई। ऐसे चिरकुट अपने करियर में ताउम्र प्याज छीलते रहे तो क्या इसके लिए परवेज भाई या संगठन जिम्मेदार है? अपनी ‘काहिली’ और ‘गतिशीलता’ में कमी के चलते उपजी दुश्वारियों का ठीकरा संगठन के सिर फोड़ लेने से ऐसे फरचट और चित्थड़ लोग क्या खुद अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएंगे?….गजब…जियो रजा बनारस..मजा आ गया।

परवेज भाई पर उठी हर उंगली पार्टी और संगठन पर उठी उंगली है, लिहाजा सभी चिलमचट्टू कामरेडों को चेतावनी दी जाती है कि अब अगर किसी ने परवेज भाई के कुर्ते की लंबाई एक बिलांग भी छोटी करने की कोशिश की तो उनको ‘मोदी आर्मी का सिपाही’ घोषित कर उनका श्राद्ध कर दिया जाएगा। फिर आप अखिलेंद्र प्रताप सिंह और लालबहादुर सिंह की तरह न घर के रहेंगे न घाट के। माना कि हमने संगठन के लिए ढपली बजाने के काम में आपको जोत दिया। माना कि आप दिन रात संगठन के लिए दरी-कनात बिछाते रहे और हमलोग उस पर जमकर प्रवचन भी करते रहे तो इसमें हमारा क्या दोष है। मजदूर मक्खी अगर रानी मक्खी बनने की कोशिश करेगी तो मक्खियों की वंशवेल कैसे बढेगी। मजदूर कामरेड अगर मालिक कामरेड बनने की कोशिश करेगा तब तो चल चुका संगठन। डिसीप्लीन सीखिए कामरेड…डिसीप्लीन।

‘डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म’ सवाल खड़ा करने वाला दुष्ट है, पापी है, खल है। ऐसे खलों की खाल से खंजड़ी बजाना पार्टी और संगठन का बुनियादी उसूल है। संगठन के पूज्यनीय साथियो में से एक ‘साथी शिरोमणि पंकज परवेज’ पर की गई टीका टिप्पणी से पार्टी और संगठन की आस्था पर चोट पहुंचती है। जनमानस में रची बसी उनकी छवि को धुलिसात करने पर संगठन ऐसे गरीब, टुटपूंजिया,  भगोड़े और अल्पज्ञ साथियों की दुर्दशा पर संतोष प्रकट करता है और अपने हरेक महामंडलेश्वर से प्रार्थना करता है कि उक्त श्रेणी के साथियों के साथ किसी प्रकार का कोई स्नेह न जताया जाए। जिस भी महामंडलेश्वर ने अपनी अभूतपूर्व ‘गतिशीलता’ से (येन केन प्रकारेण) किसी लाले की दुकान में कुर्सी हथिया ली है वो लाला के आगे लहालोट होकर कुर्सी से चिपक कर बैठे रहें और यदा कदा अपनी सहूलियत से संगठन के पक्ष में ‘मुखपोथी’ का पारायण करते रहें। इस दरम्यान उनका संगठन से पूर्व में जुड़े किसी भी किस्म के चिरकुट साथी से मेलजोल अपेक्षित नहीं है। अपितु स्पृहणीय तो यह होगा कि ऐसे गतिशील और जुगाड़ू साथी अपने आस-पास किसी नौकर श्रेणी के कामरेड को तो बिल्कुल भी न फटकने दें जिनकी संगत से उनकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है। ध्यान रहे ऐसे नौकर कामरेडों की जरूरत सिर्फ उस वक्त के लिए है जब स्टार साथी किसी मुसीबत में फंस जाएं। मुसीबत के वक्त बस आपको अपनी मुट्ठी को मीडिया की मुड़ेर पर टांग देना होगा। फिर देखिएगा कैसे रुदालियों का रेवड़ सियापा करते हुए आपके पृष्ठ भाग के भगंदर पर भौकाल काट देगा।

मित्ररंजन भाई आपने पागुरप्रेमी पंकज परवेज का पुख्ता बचाव किया है। लेकिन साथी, भकरभांय में वाममार्ग के वचनामृत वमन से आगे जहां और भी है। आपको पंकज परवेज पर प्रहार करने वालों की सोच पर तरस आता है कि संगठन को ये लोग प्लेसमेंट एजेंसी समझते रहे। मित्ररंजन भाई आप जिस दो कौड़ी के एनजीओ के जुगाड़ में लगे हैं वहां से आप इससे आगे सोच नहीं सकते, हम इस बात को समझते हैं। मित्र पहली बात तो ये कि आपने जिस टिप्पणी करने वाले का परिचय पूछा है वो मैं हूं। और दूसरी बात ये कि मैं कभी आपके प्यारे मित्र पंकज परवेज से नौकरी मांगने नहीं गया और ना उनको पैरवी करने के लिए कभी फोन किया। मैं अपने खुद के व्यवसाय से अपना जीवन जी रहा हूं। लेकिन मैं आज भी उन सच्चे साथियों की संगत में रहना पसंद करता हूं, जिन्हें मैने बेहद सुलझा और स्वाभिमानी पाया। उन लोगों से पंकज जैसे न जाने कितने पेंदी रहित पाखंडियों की कारगुजारियों के बारे में खबरें मिलती रहती हैं। कि कैसे फलां उस भगवा चड्ढी के सामने लंगोट उतारकर लोट लगा रहा है, कैसे ढिमाका उस कुक्कड़खोर कनकौए कांग्रेसी की कदमबोशी में झुका हुआ है। कुल जमा ये कि कामरेड लोग कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं और फेसबुक पर क्रांति पेल रहे हैं। कोई हर्ज नहीं है लगे रहिए, छककर छानिये फूंकिए लेकिन भाई जब पेंदे पर लात पड़की है तो “साथियों साथो दो” का नारा क्यो ?

लेखक के. गोपाल से संपर्क anujjoshi1969@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयों, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए!

: आईबीएन सेवन से पंकज श्रीवास्तव की बर्खास्तगी को लेकर मीडिया में चल रही बतकही के बीच :  ”बंद हैं तो और भी खोजेंगे हम, रास्ते हैं कम नहीं तादाद में” …ये पंक्तियाँ ही कहीं गूँज रही थीं पंकज भाई की बर्खास्तगी की खबर के बाद। … बनारस आने के बाद न जाने कितनी बार उनके साथ इन पंक्तियों को दुहराया होगा। …”हम लोग कोरस वाले थे दरअसल” .… इरफ़ान भाई के ब्लॉग पर आज उसी आवाज को फिर से सुनना बढ़िया लगा. कल प्रेस क्लब में थोड़ी देर के लिए मुलाकात भी हुई कई लोगों से.…

कई सन्दर्भों में पुराने दिनों की याद आई। विश्वविद्यालय में आने और छात्र राजनीति में शामिल होने के बाद सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के सपने संजोये, नव-स्फूर्ति और ऊर्जा से भरे हम किसी ऐसी राह पर चल रहे थे जिसके पड़ावों-मुकामों के बारे में ठीक-ठीक मालूम तो न था लेकिन ये जरूर था कि एक बेहतर समाज को गढने की दिशा में अपनी भूमिका जरूर समझ में आती थी…लोग कई बार कहते थे कि तुमलोग छात्र हो, यहां पढने आए हो राजनीति करने नहीं … लेकिन हम कहते कि हमारा नारा भी तो यही है … लडो पढाई करने को, पढो समाज बदलने को, यह सबके लिए मुकम्मल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार हासिल करने और प्रगतिशील, वैज्ञानिक एवं समता के मूल्यों पर आधारित समाज को रचने की जद्दोजहद थी। हममें से अधिकांश इसी भावना के तहत छात्र राजनीति में स्वतःस्फूर्त तरीके से सक्रिय हुए थे। और आज तक भी मुझे ये बात नहीं समझ में आई कि कोई भी पढाई-लिखाई करने वाला सचेतन, संवेदनशील मनुष्य बाकी समाज के दुख-दर्द से कटकर कैसे रह सकता है? खैर, समय के साथ लोगों की भूमिकाएं और प्राथमिकताएं भी बदलीं और जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लोगों ने पार्टी होलटाइमरी से लेकर नौकरी के विभिन्न रास्ते अख्तियार कर लिए। लेकिन, जिन लोगों ने नौकरियां कर लीं क्या उन सबके एक खास समय के योगदान को भुला दिया जाना चाहिए?

बहरहाल, मैं ये बातें सिर्फ इस संदर्भ में कह रहा हूं कि पिछले 2 दिनों से कई लोग ”भड़ास” निकालने में लगे हुए हैं कि पंकज ने कभी अपने से नीचे वालों के लिए आवाज नहीं उठाई पर आज खुद निकाले जाने पर विलाप कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि वे एक ”डील” के हिस्सा हैं जिसके तहत ये सब किया गया तो कोई कह रहा है कि उन्होंने काफी माल इकट्ठा कर रखा है और अब प्रेस वार्ता के जरिये खुद को शहीद घोषित कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वे बिलकुल नाकारा हो गये थे और सिर्फ फेसबुक और बातों में वक्त गुजारते थे जिसकी सजा पहले संजीव पालीवाल को और अब पंकज को मिली। मुझे नहीं मालूम कि एक चैनल के मुलाजिम के बतौर खुद पंकज जी की हैसियत किसी को निकालने-रखने में कितनी रही होगी। 1997 में सांगठनिक जिम्मेदारियों व सक्रिय राजनीती से मुक्त होने के बाद, अपनी पैतृक संपत्ति के बल पर कुछ करने के आसान रास्ते और घर से बुलावे के बावजूद उन्होंने मुसीबतों से भरी कठिन डगर चुनी थी. अमर उजाला में छोटी-सी नौकरी मिलने के बाद उत्साह से लबरेज पंकज-मनीषा का बनारस में साकेत नगर स्थित हमारे छोटे-से ठिकाने पर उनका आना आज भी याद है. मुफलिसी के दौर में अमर उजाला की दो हजार की नौकरी पकडने से लेकर तकरीबन 17 साल बाद अब आइबीएन सेवन के लाख रूपये के पैकेज तक पहुंचने में उन्होंने क्या गैर-वाजिब समझौते किये होंगे ये भी नहीं मालूम। लेकिन नौकरी करने के लिए कुछ समझौते जरूरी होते हैं ये सबको पता है जो विभिन्न नौकरियों में लगे हैं। समझौते किस हद तक ये एक अलग, किंतु जरूरी मसला है। यह भी शोध का विषय है कि अखबारी पत्रकारिता से चैनल पत्रकारिता में आने के क्रम में विगत १७ बरस में आज लाख रूपये माहवार की नौकरी तक पहुंचना क्या बहुत ज्यादा है। और क्या पंकज अपने पेशागत प्रभावों का उपयोग कर, राजनीतिक दांव-पेंच खेल कर, चैनल की तनख्वाह से इतर पैसे उगाहने का काम भी कर रहे थे जो उनके पास काफी माल-मत्ता इकट्ठा हो जाने पर मुहर लगाता हो। कम-से-कम मेरी जानकारी में तो नहीं है।

कुछ लोगों की अदालत में ये भी आरोप है उनपर कि उन्होंने कई कामरेडों की जिंदगियां बर्बाद कर दीं और उन्हें नौकरी दिलाने में मदद न कर सके। और ये कि उनसे काबिल कई कामरेड छोटे-छोटे काम करते हुए जिंदगी गुजार रहे हैं। ये एक अहम सवाल है मेरे हिसाब से। जरा बताइए कि क्या उन कामरेडों के पास अपनी कोई दृष्टि, सोच-समझ नहीं थी या किसी कमांडर के कहने पर लाचार-मजबूर सेना की तरह सबकुछ छोड़कर सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की कार्रवाइयों में कूद गये थे, ये सोच कर कि कम्युनिस्ट संगठन और पार्टी का नेतृत्व उनकी रोजी-रोटी व भविष्य का प्रबंध करेगा जबकि पार्टी अपने संसाधन जुटाने के सवाल आज तक हल न कर पाई हो और आम तौर पर वो जनसाधारण के चंदों से ही चलती हो। उन कॉमरेडों के खुद के सपने क्या थे? क्या उस वक्त वे खुद भी सामाजिक बदलाव की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे जिसके पीछे उनके आदर्शवादी मूल्य रहे हों या सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा। मुझे वाकई याद नहीं आ रहा कि पंकज ने किसी छात्र को छलावे में लेकर अपनी राजनीति की हो। उनकी छवि एक सौम्य, मृदुभाषी, सांस्कृतिक नेता की ही तरह थी जो मन के तारों को झकझोर देने वाली बुलंद आवाज में क्रांतिकारी गीत सुनाता था, कवितायेँ लिखता-पढता था, फिर राजनीती की बात करता था।  सबसे बड़ी बात कि वो अपने साथियों की परेशानियों का हमेशा ख्याल रखता था. उनके फ़ेलोशिप/वजीफे की रकम आने की खुशी और इंतजार उनसे ज्यादा साथियों को हुआ करती थी.उनके साथ रहने पर मनमानी किताबें खरीदी जा सकती थीं, बढ़िया खाना खाया जा सकता था और शायद न रहने पर साथियों की फीस भी भरी जा सकती थी. ये वो दिन थे.

तो  फिर उन पर लगाए जाने वाले ये आरोप किस कामरेड के हैं भाई? अगर हम अपने करियर में कोई अपेक्षित मुकाम हासिल न कर सके तो क्या हमारी आर्थिक दुर्दशा/बेहतरी के लिए पार्टी या संगठन जिम्मेदार है? क्या ऐसे कामरेडों ने यूपीएससी / एसएससी / बैंकिंग / सीए / पत्रकार / शिक्षक / प्रोफेसर बनने के ध्येय से कोचिंग लेने के लिए संगठन ज्वाइन किया था? तब तो वाकई ऐसे कामरेडों की समझ और दृष्टि पर तरस आता है। जो लोग अपने नेतृत्वकर्ता साथियों और संगठन को प्लेसमेंट एजेंसी की तरह देखते हैं उनके लिए ये बात सही हो सकती है लेकिन तब क्या उस दृष्टि का समर्थन हम भी करने लगेंगे? संगठन और पार्टी के भीतर कई कमियां हो सकती हैं जिनकी चर्चा होनी चाहिए, उन्हें सुधारा जाना चाहिए लेकिन अपनी काहिली, गतिशीलता में कमी, क्षमता का ठीक इस्तेमाल न कर पाने या अन्य परिस्थितिजन्य परिणामों के कारण उपजी जिंदगी की दुश्वारियों का ठीकरा संगठन या व्यक्तियों पर फोडकर हमें खुद सारी जिम्मेदारियों से ‘मुक्त’ हो जाना चाहिए।

असल सवाल ये है कि क्या पंकज वाकई नाकारा हो गये थे या चैनल की भाजपा समर्थक नीतियों व लाबी के वर्चस्च की खिलाफत के लिए उन्हें निकालना प्रबंधन की मजबूरी बन गई थी। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाकर और हिंदू-मुस्लिम नफरत की सियासत में समाज को झोंककर देश की राजनीति में अपना कद बढाने वाली सांप्रदायिक शक्तियों के नये उभार के इस स्वर्णिम दौर में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ सोशल मीडिया में आ रही पंकज की टीपें, उनकी कविताएं, उनका तल्ख स्वर क्या उनके दिनों-दिन नाकारा होते जाने के सबूत हैं? और उनके नाकारा होने की शुरुआत क्या अचानक से 16 मई, 2014 के बाद शुरू हो गई? ये सवाल उठाने वाले किसकी राजनीति का पक्षपोषण कर रहे हैं? दक्षिणपंथियों का या करवट बदल कर अपने राजनीतिक आकाओं की गोद में बैठने वाले कारपोरेट प्रबंधन का? इसमें कोई शक नहीं कि आईबीएन से निकाले गये तमाम पत्रकारों, कलमकर्मियों का मसला बेहद अहम था और है।  आइबीएन ही क्यों ऐसी हर छंटनी का विरोध होना चाहिए। लेकिन, पत्रकारिता संस्थानों व मीडिया के भीतर लगातार बढते जा रहे तानाशाही के दौर में अगर इस अवसर का उपयोग कतिपय कारणों से  कुछ कलमवीर अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने में करना चाहते हैं तो संकेत खतरनाक हैं। ये हद-से-हद यही साबित करता है कि दक्षिणपंथ अपने राजनीतिक एजेंडे में सफलता की राह पर है- घरवापसी, दंगों, स्वच्छता अभियान व श्रम-कानून में सुधारों जैसे उछाले गए भ्रामक एजेंडों की तरह। तो पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयो, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए।

लेखक मित्ररंजन कामरेड रह चुके हैं और इन दिनों एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क mitraaranjan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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एसएमएस, इस्तीफा, सोशल मीडिया, प्रेस कांफ्रेंस और प्रेस रिलीज… हिप्पोक्रेसी जारी आहे….

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!

अगर फिक्सिंग होती है तो हर कदम पर दिखने लगती है. नाकारापन और अकर्मण्यता के आरोपों में आईबीएन7 से निकाले गए पंकज श्रीवास्तव ने तयशुदा रणनीति के तहत अपने संपादक को एक मैसेज भेजा. उस मैसेज का स्क्रीनशाट लिया. उसे क्रांतिकारी भाषण के साथ फेसबुक पर लगा दिया. ‘आप’ वालों ने फेसबुक और ट्विटर पर पंकज को शहीद बताते हुए उनके मसले को वायरल करना शुरू किया. ‘आप’ नेता आशुतोष, जो कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं, ने पंकज के मसले को जोरशोर से सोशल मीडिया पर उठाया.

पंकज ने आज चार बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की. इसके पहले केजरीवाल ने आज दिन में दो बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की थी. लेकिन केजरीवाल ने ऐन वक्त, जब मीडिया के लोग प्रेस क्लब में जुट गए थे, अपनी प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी. इस तरह सारे मीडिया वालों के सामने पंकज श्रीवास्तव नमूदार हुए. आशुतोष भी आ गए. इनने अपनी-अपनी भड़ास निकाली. लंबे लंबे सिद्धांत पेले. देखते जाइए, चुनाव भर शहीद बनते घूमने के बाद पंकज श्रीवास्तव चुनाव बाद आम आदमी पार्टी के साथ सक्रिय हो जाएंगे और 2017 के यूपी विधानसभा इलेक्शन में विधायक का चुनाव लड़ जाएंगे.

इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या ने फेसबुक पर कुछ लिखा है, जो इस तरह है….

Samar Anarya : आप नेता आशुतोष आईबीएन7 से पंकज श्रीवास्तव भाई की बर्खास्तगी पर मार लालपीले हो रहे हैं. बाकी इनके अपने मैनेजर काल में 200 (पूरे समूह से 350) लोग निकाले गए थे तब भाई कुछ नहीं बोले थे! इधर वाली जनता अभी मोदिया नहीं हुई है आशुतोष भाई.

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Samar Anarya : पंकज श्रीवास्तव की आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्तगी दुखद है, पर न जाने क्यों इसी आईबीएन 7 (और नेटवर्क 7 समूह के बाकी चैनलों) से अगस्त 2013 में 320 से ज्यादा पत्रकारों को एक साथ निकाल दिया जाना याद आ गया.(अब) आप नेता आशुतोष के गुस्से भरे ट्वीट देखते हुए उनका इतनी बड़ी छंटनी के बाद सड़क पर आ गये पत्रकारों के बीच ऐम्बीअन्स मॉल में मद्रास कैफ़े का ‘प्रीव्यू’ देखना भी. ये मुट्ठियाँ तब भिंची होतीं तो शायद बात यहाँ तक न पंहुचती. अपने ऊपर न होने तक हमलों पर भी क्रांतिकारिता जागती तो बात यहाँ तक न पंहुचती, शायद. खैर, जब भी शुरू हो, लड़ाई में साथ देना बनता है. पर बहुत कुछ याद रख के. उस दौर के दो स्टेटस लगा रहा हूँ. ताकि सनद रहे वाले अंदाज में-
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201740504700560
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201728758446911

पूरी कहानी जानने के लिए इस मूल पोस्ट को पढ़ें….

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

(दयानंद पांडेय)


Dayanand Pandey : पत्रकारिता में गीदड़ों और रंगे सियारों की जैसे भरमार है। एक ढूंढो हज़ार मिलते हैं। जब लोगों की नौकरियां जाती हैं या ये खा जाते हैं तब तक तो ठीक रहता है। लोगों के पेट पर लात पड़ती रहती है और इन की कामरेडशिप जैसे रजाई में सो रही होती है। लेकिन प्रबंधन जब इन की ही पिछाड़ी पर जूता मारता है तो इन का राणा प्रताप जैसे जाग जाता है।

देखिए कि आईबीएन सेवेन के पंकज श्रीवास्तव कैसे तो अपनी मुट्ठी तानने का सुखद एहसास घोल रहे हैं। लेकिन जब अभी बीते साल ही जब सैकड़ो लोग आईबीएन सेवेन से एक साथ निकाल दिए गए थे तब इनकी यह तनी हुई मुट्ठियां इन के लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं। कमाल है! ऐसे हिप्पोक्रेसी के मार पर कौन न कुर्बान हो जाए! पढ़िए ये क्या लिख रहे हैं अपने फेसबुक वॉल पर…

”बहरहाल मेरे सामने इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का विकल्प भी रखा गया था। यह भी कहा गया कि दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की जाएगी। लेकिन मैंने कानूनी लड़ाई का मन बनाया ताकि तय हो जाये कि मीडिया कंपनियाँ मनमाने तरीके से पत्रकारों को नहीं निकाल सकतीं। इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिये। नैतिक भी और भौतिक भी। बहुत दिनों बाद ‘मुक्ति’ को महसूस कर रहा हूं। लग रहा है कि इलाहाबाद विश्वविदयालय की युनिवर्सिटी रोड पर फिर मुठ्ठी ताने खड़ा हूँ।”

भड़ास पर भी इनकी असलियत पढिए… यहां क्लिक करिए…

https://bhadas4media.com/edhar-udhar/3407-kachra-pankaj

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

साथ मिलेगा…भरपूर मिलेगा पंकज श्रीवास्तव उर्फ ‘पंकज परवेज’। आप बस जाकर मुट्ठी ताने रहिए मुट्ठीगंज में….सॉरी कर्नलगंज में। सुना है आप सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) में होल टाइमर थे। कब थे ये तो नहीं पता लेकिन “लाल फरेरे तेरी कसम, इस जुल्म का बदला हम लेंगे”…। लेकिन परवेज भाई अभी तो कुछ ही महीनों पहले आपने फेसबुक पर अपना नाम बदल लिया था, पंकज श्रीवास्तव से ‘श्रीवास्तव’ हटाकर ‘परवेज’ रख लिया था। आज देख रहा हूं कि बर्खास्तगी विलाप में आप ‘परवेज’ नाम को हटाकर दोबारा ‘वास्तव में श्री’ हो गए हैं। खैर मजाक छोड़िए अब तो हम आपको परवेज भाई ही कहेंगे।

लेकिन परवेज भाई हम आपकी कातर पुकार सुनकर मदद को दौड़े उससे पहले कुछ सवाल हैं जिनका जवाब अगर आप दे सकें तो कुछ गलतफहमियां दूर हो जाएं। पहला सवाल तो ये कि आपके ही वामपंथी छात्र संगठन के लिए अपना भविष्य चौपट कर देने वाले लोग लगातार आईबीएन-7 और तमाम दूसरे चैनलों में प्रताड़ना और छंटनी के शिकार हुए तब आपने क्या उनका साथ दिया ? आप ही के समकालीन और ‘आईसा’ में अपनी ऐसी-तैसी कराने वाले अधेड़ होते नौजवानों ने नौकरी पाने के लिए आपसे मदद की गुजारिश की, लेकिन आपने मदद तो दूर उनका फोन भी उठाना गंवारा नहीं समझा। माना कि नौकरी के लिए सिफारिश करना आपके सैद्धांतिक तेवर के खिलाफ था, तो क्या आपने अपने संस्थान में रिक्रूटमेंट के लिए परमस्वार्थी, आत्मकेंद्रित, कौवारोरकला निपुण चूतरचालाक आशुतोष जी के साथ मिलकर कोई पारदर्शी सिस्टम बनाया ? क्या आपने खुद पैरवी के जरिए अमर उजाला, स्टार न्यूज और आईबीएन-7 में जगह नहीं हथियाई ? कहिए तो नाम बता दूं…लेकिन जाने दीजिए आपके चक्कर में उन भले लोगों की इज्जत का कीमा क्यों बनाया जाय।

पंकज भाई न जाने कितने लोग आए दिन मक्कारों की मंडी मीडिया में नौकरी से निकाले जाते हैं। कई लोग तो सच में सीपीआई-एमएल में होलटाइमर रह चुके हैं लेकिन वो लोग इस कदर बर्खास्तगी विलाप तो नहीं करते। मैंने देखा है उन लोगों को भूखे रहकर दिन गुजारते लेकिन क्या मजाल कि दीनता उनके पास फटक भी जाए। क्या मजाल कि मजबूरी उन्हें किसी के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर सके। आपको नहीं पता लेकिन आपसे बहुत काबिल कई कॉमरेड अनुवाद और घोस्ट राइटिंग जैसे दोयम दर्जे के काम करते हुए इसी दिल्ली में गुजर-बसर कर रहे हैं। वही लोग जिनका बौद्धिक पंगु पालीवाल, अकर्मण्य-अहंकारी आशुतोष और पेंदी रहित पंकज परवेज ने अनुराग जैसे अंधभक्तों को शिखंडी बनाकर बध कर डाला। लेकिन वो लोग तो नहीं गए प्रेस क्लब के दरवाजे पर पेट्रोल की शीशी लेकर ‘आत्मदाद’ लेने।

शर्म कीजिए पंकज भाई सात-आठ सालों में ठीक-ठाक मालमत्ता बना लिया हैं, काहे नौटंकी कर पब्लिक के सामने खुद को नंगा कर रहे हैं। होलटाइमर रहे हैं और अब कोई आर्थिक संकट भी नहीं है, तो क्यों नहीं किसी कायदे के काम में लग जाते। आप कह रहे हैं कि मित्रों की प्रतिक्रिया देखकर हौसला बढ़ा है। कमाल करते हैं अपने चैनल के चेहरे पर ‘हौसला’ चिपकाकर उसका हौसला तो पस्त कर दिया और अब चले हैं खुद का हौसला बढ़ाने। 

लेखक के. गोपाल से संपर्क anujjoshi1969@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

एसोसिएट एडिटर पंकज श्रीवास्तव को नान-परफारमेंस में खुद की बर्खास्तगी का एहसास पहले से था. इसी कारण उन्होंने कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रहे और आजकल ‘आप’ के खास नेता बने घूम रहे आशुतोष से संपर्क साधा. आशुतोष के जमाने में ही पंकज श्रीवास्तव की भर्ती हुई थी. आशुतोष और पंकज की डील हुई. इसी डील के तहत यह तय हुआ कि ऐन चरम चुनावी प्रक्रिया के बीच पंकज श्रीवास्तव अपने नए मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को ‘आप’ और केजरीवाल को लेकर एक मैसेज करेंगे. सबको पता है कि टीवी में इस तरह के आंतरिक मैसेज का अंजाम क्या होता है. पंकज श्रीवास्तव को समय से पहले यानि चुनाव बाद तय बर्खास्तगी से पहले ही बर्खास्त कर दिया गया.

पंकज ने बर्खास्त होते ही पहले से तय रणनीति के तहत सुमित अवस्थी को भेजे गए मैसेज का स्क्रीनशाट फेसबुक पर लगा दिया और साथ ही बेहद क्रांतिकारी जोशीला भाषण लिख डाला. जो पंकज श्रीवास्तव अपने फेसबुक वॉल पर किसी भी पोस्ट के लिए अपने फ्रेंड्सलिस्ट से बाहर के लोगों के लिए कमेंट बाक्स बंद रखते हों, उन पंकज श्रीवास्तव की ये क्रांतिकारी पोस्ट देखते ही देखते सैकड़ों बाहर शेयर हो गई. इसके पीछे ‘आप’ नेता आशुतोष का हाथ था. उनके इशारे पर ‘आप’ की आईटी विंग ने धड़ाधड़ शेयर करना शुरू कर दिया.

पंकज श्रीवास्तव के मसले पर ‘आप’ नेता आशुतोष ने खेलना शुरू कर दिया, ट्विटर के जरिए, ताकि इस बर्खास्तगी का फायदा ‘आप’ को मिल सके और ‘भाजपा’ को डैमेज किया जा सके. आशुतोष ने जो फटाफट तीन ट्वीट किए हैं पंकज के मसले पर, उससे साफ जाहिर होता है कि उन्हें सब कुछ पता था और सब कुछ उनकी सहमति से हुआ.  आशुतोष के ट्वीट को आम आदमी पार्टी की तरफ से रीट्वीट किया गया और देखते ही देखते पूरा मामला वायरल हो गया. आशुतोष के तीन ट्वीट इस तरह हैं…

ashutosh ‏@ashutosh83B
IBN7 is owned by Reliance. Sacking of Pankaj shows BJP and Reliance can go to any extent to stop AAP in Delhi .

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj wrote an SMS to his editor at 8pm, his services was terminated by 1030. Editor Umesh Upadhaya is brother of Satish Upadhaya , cont..

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj Srivastav, associate Editor in IBN7 was sacked because he objected blackout of AAP and Kejriwal on channel . Cont…

चर्चा है कि पंकज श्रीवास्तव की आशुतोष से जो डील हुई है, उसके तहत पंकज 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में अपने गृह जनपद रायबरेली से ‘आप’ पार्टी के टिकट पर विधायक का चुनाव लड़ेंगे. इसी की पृष्ठभूमि के तहत पंकज को दिल्ली चुनाव से ठीक पहले शहीद की तरह पेश करने का फैसला लिया गया. अब जो कुछ हो रहा है उसी के तहत हो रहा है. पंकज श्रीवास्तव पहले से तय एजेंडे के तहत अब दिल्ली प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं और आम आदमी पार्टी इस प्रेस कांफ्रेंस व इस मामले को तूल पकड़ाने की तैयारी कर रही है. पंकज पूरे चुनाव तक यूं ही खुद को शहीद बनाकर घूमते बोलते बतियाते दिखेंगे.

ज्ञात हो कि जब आईबीएन7 में सैकड़ों कर्मचारियों को निकाला गया तब न तो आशुतोष एक शब्द बोले थे और न ही पंकज श्रीवास्तव. तब दोनों ही लाखों की सेलरी और अपनी अपनी कुर्सी के कारण चुप बैठे रहे. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव चुप बैठे रहे थे. एंकर तनु शर्मा के मसले पर जब फिल्म सिटी में प्रदर्शन हुआ तो पंकज श्रीवास्तव को इसमें शरीक होने के लिए इनकी कम्युनिस्ट पार्टी के साथियों ने मैसेज भेजा था, तब भी पंकज श्रीवास्तव आफिस से बाहर नहीं निकले थे. अब जब उनका आगे का करियर (राजनीति में) सेट हो गया है तो एक बार फिर हुंकार भरकर क्रांतिकारी बन गए हैं. क्या यह क्रांतिकारिता की फिक्सिंग नहीं है. जब इच्छा करे तब करियरिस्ट बनकर क्रांति पर चुप्पी साधे रहो और जब मौका अवसर दिखे राजनीति में पांव जमाने की तो क्रांतिकारी बनकर हुंकार भरने लगो. अंततः है तो मामला करियर और पापी पेट का ही.

इस पूरे मामले पर युवा और तेजतर्रार पत्रकार राहुल पांडेय कहते हैं: ”जब शहादत कला बन जाती है तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।”

आईबीएन7 में काम कर चुके Kishor Joshi कहते हैं: ”दुःख तब होता है जब अपने पर आ पड़ती है, आपने तो एकतरफा खबरों को दिखाने का मुद्दा उठाया और चैनल को वो गलत लगान और suspend कर दिया लेकिन कभी सोचा जब 300 लोग बिना गलती के एक साथ निकाले गए थे तब आपने कुछ कहा या विरोध जताया? अब जब अपने पर आ पड़ी तो आप शहीद का श्रेय लेने में चूक नहीं रहे हैं।”

अन्य जानकारियों के लिए इस मामले की मूल खबर को पढ़ सकते हैं, जिसका शीर्षक नीचे है…

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

आईबीएन7 न्यूज चैनल में कचरा हटाओ अभियान जोरों से जारी है. कई सालों से लाखों रुपये की सेलरी लेकर कुंडली मारे बैठे पत्रकार पंकज श्रीवास्तव को प्रबंधन ने बर्खास्त कर दिया है. पंकज श्रीवास्तव को संजीव पालीवाल की टीम का प्रमुख सदस्य बताया जाता है. चैनल का प्रबंधन नए हाथों में आने के बाद पुरानी टीम के लोगों को परफार्म करने के लिए छह महीने का वक्त दिया गया लेकिन पुराने लोगों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया जिससे चैनल की साख छवि रेटिंग सुधर सके. इस कारण सबसे पहले संजीव पालीवाल पर गाज गिराई गई. उसके बाद से ही कयास लगाया जा रहा था कि पंकज श्रीवास्तव भी जल्द नपेंगे. इस बारे में भड़ास ने पहले ही इशारों इशारों में संभावना जता दी थी.

पंकज श्रीवास्तव कामरेड रहे हैं. सीपीआईएमल लिबरेशन ग्रुप के लंबे समय तक होलटाइमर रहे हैं. साथ ही काफी समय तक थिएटर वगैरह भी किया. आईबीएन7 में काफी समय से हैं ये. इसके पहले ये स्टार न्यूज और अमर उजाला अखबार में काम कर चुके हैं. चैनल से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पंकज श्रीवास्तव का परफारमेंस शून्य था. केवल आफिस आना और बातों के जरिए टाइम पास करते हुए घर चले जाना इनका रुटीन बन गया था. काहिली और कामचोरी का माहौल खत्म करने के लिए प्रबंधन को सख्त निर्णय लेना पड़ा. इस फैसले से बाकी नाकारा लोगों में ये संदेश जाएगा कि परफार्म करो या फिर बर्खास्तगी के लिए तैयार रहो.

उधर, पंकज श्रीवास्तव हटाए जाने के बाद अपनी गल्ती से उंगली कट जाने पर बहता खून दिखाकर शहीद बताने वाली मुद्रा में आ गए हैं. उन्होंने फेसबुक पर खुद को आईबीएन7 से हटाए जाने को लेकर अपना पक्ष बेहद बौद्धिक, सैद्धांतिक और आकर्षक पैकेजिंग के साथ पेश किया है. असल में पंकज को पहले से अंदाजा था कि उनके जाने के दिन आ गए हैं. लेकिन बजाय खुद छोड़ देने के, वे खुद के हटाए जाने का इंतजार करते रहे. ऐसा किस लोभ में करते रहे, ये तो वही जानें लेकिन वे खुद को मानसिक रूप से तैयार कर चुके थे कि जब हटाए जाएंगे तो इनटरनल पत्राचार को सार्वजनिक कर और पूरे मामले को वैचारिक रंग देकर अपने को शहीद कहलवाएंगे. तभी तो बर्खास्तगी के बाद मुट्ठी ताने वाली भाषा वे लिखने लगे हैं.

पंकज की मुट्ठी तब नहीं तनी जब आईबीएन7 में सैकड़ों लोगों का कत्लेआम किया गया. तब उन्हें मुट्ठी की जगह कुर्सी पसंद थी. एक शब्द न कहीं लिखा न कहीं बोला. छंटनी के शिकार लोगों ने आईबीएन7 के सामने धरना प्रदर्शन किया, उस तक में यह ढोंगी शख्स पंकज श्रीवास्तव कहीं नजर नहीं आया. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव की मुट्ठी नहीं तनी. ऐसे दर्जनों सरोकारी प्रसंग इस चैनल के भीतर हुए हैं जहां किसी भी संवेदनशील और कामरेड किस्म के व्यक्ति को अपनी पक्षधरता खुलकर दिखानी जतानी चाहिए थी लेकिन पंकज श्रीवास्तव तब लाखों की सेलरी के कारण चुप रह गए.

अब जब उन्हें फाइनली बर्खास्त कर दिया गया है नान-परफारमेंस में तो केजरीवाल और ‘आप’ को ढाल बनाकर खुद को फिर से महान क्रांतिकारी बताने पेश करने में जुट गए हैं. समझदार किस्म के कामरेड ऐसा ही करते हैं. वर्षो बरस कंबल ओढ़कर घी पीते हैं और एक दिन अचानक खुद को भूखा प्यासा घोषित करते हुए खुद को सर्वहारा के मसीहा के रूप में पेश करने लगते हैं. पंकज के साथ ऐसा ही हो रहा है. ऐसा ही कुछ करके अवसरवादी आशुतोष आम आदमी पार्टी का नेता बन गया. ऐसा ही कुछ करके ढोंगी पंकज श्रीवास्तव भी आम आदमी पार्टी का नया नेता बन सकता है. दुनिया में अवसरवादियों और ढोंगियों के लिए हजार मौके हैं. नाकारापन के कारण निकाले जाने के बाद पंकज कुछ वैसी ही बयानबाजी कर रहे हैं जैसे कोई नेता किसी पार्टी से निकाल दिया जाए तो अचानक उसे पार्टी में ढेर सारी बुराई नजर आने लगे और पार्टी के नेताओं को नंगा करने के लिए एक के बाद एक बयान जारी करने लगे. ऐसे अमर सिंहों का हश्र सबने देखा है. ऐसे लोगों के कहे को कोई सीरियसली नहीं लेता. सब कुछ समय की मिट्टी तले दफन हो जाता है. आइए आप खुद पढ़िए, हटाए जाने के बाद पंकज खुद की बर्खास्तगी को किस एंगल से पेश कर रहे हैं…


Pankaj Srivastava : और मैं आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्त हुआ !!! सात साल बाद अचानक सच बोलना गुनाह हो गया !!!! कल शाम आईबीएन 7 के डिप्टी मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को दो मोबाइल संदेश भेजे। इरादा उन्हें बताना था कि चैनल केजरीवाल के खिलाफ पक्षपाती खबरें दिखा रहा है, जो पत्रकारिता के बुनियादी उसूलों के खिलाफ है। बतौर एसो.एडिटर संपादकीय बैठकों में भी यह बात उठाता रहता था, लेकिन हर तरफ से ‘किरन का करिश्मा’ दिखाने का निर्देश था।दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष सतीश उपाध्याय पर बिजली मीटर लगाने को लेकर लगे आरोपों और उनकी कंपनी में उनके भाई उमेश उपाध्याय की भागीदारी के खुलासे के बाद हालात और खराब हो गये।

उमेश उपाध्याय आईबीएन 7 के संपादकीय प्रमुख हैं। मेरी बेचैनी बढ़ रही थी। मैंने सुमित को यह सोचकर एसएमएस किया कि वे पहले इस कंपनी में रिपोर्टर बतौर काम कर चुके हैं, मेरी पीड़ा समझेंगे। लेकिन इसके डेढ़ घंटे मुझे तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया। नियमत: ऐसे मामलों में एक महीने का नोटिस और ‘शो काॅज़’ देना जरूरी है। पिछले साल मुकेश अंबानी की कंपनी के नेटवर्क 18 के मालिक बनने के बाद 7 जुलाई को ‘टाउन हाॅल’ आयोजित किया गया था (आईबीएन 7 और सीएनएन आईबीएन के सभी कर्मचरियों की आम सभा) तो मैंने कामकाज में आजादी का सवाल उठाया था। तब सार्वजनिक आश्वासन दिया गया था कि पत्रकारिता के पेशेगत मूल्यों को बरकरार रखा जाएगा। दुर्भाग्य से मैने इस पर यकीन कर लिया था।

बहरहाल मेरे सामने इस्तीफा देकर चुपचाप निकल जाने का विकल्प भी रखा गया था।यह भी कहा गया कि दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की जाएगी। लेकिन मैंने कानूनी लड़ाई का मन बनाया ताकि तय हो जाये कि मीडिया कंपनियाँ मनमाने तरीके से पत्रकारों को नहीं निकाल सकतीं । इस लड़ाई में मुझे आप सबका साथ चाहिये। नैतिक भी और भौतिक भी। बहुत दिनों बाद ‘मुक्ति’ को महसूस कर रहा हूं। लग रहा है कि इलाहाबाद विश्वविदयालय की युनिवर्सिटी रोड पर फिर मुठ्ठी ताने खड़ा हूँ।


पंकज श्रीवास्तव के उपरोक्त ‘क्रांतिकारी’ स्टेटस पर भावुक हृदय और इन्नोसेंट लोगों ने खूब ‘लाल सलाम, लाल सलाम’ किया है लेकिन कुछ ऐसे भी लोगों ने कमेंट किया है जिन्हें नौकरी से निकाले जाने के बाद क्रांति याद आने के निहितार्थ पता हैं… इन्हीं में से एक वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या का कमेंट पढ़िए….

Sumant Bhattacharya बधाई, लेकिन ना कहने में बहुत देर कर दी मित्र। यदि ल़ड़ाई निकाले जाने की है तो मामला बेहद निजी हो जाएगा। और यदि लड़ाई पत्रकारिता की शुचिता की है तो सोचा जा सकता है।


आगे की कथाएं पढ़िए, आखिर क्यों बागी बनने को राजी हुए परम करियरिस्ट पंकज श्रीवास्तव और इनके व्यक्तित्व का सच क्या है…

आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!


पढ़िए, भड़ास ने पहले ही संजीव पालीवाल के चेलों (खासकर कामरेड और थिएटर बैकग्राउंड वाले पंकज श्रीवास्तव) को हटाए जाने की घोषणा कर दी थी…

संजीव पालीवाल की आईबीएन7 से छुट्टी, इनके मोटी सेलरी वाले नाकारा चेले भी जाएंगे

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संजीव पालीवाल की आईबीएन7 से छुट्टी, इनके मोटी सेलरी वाले नाकारा चेले भी जाएंगे

एक बड़ी खबर बीमार न्यूज चैनल आईबीएन7 से आ रही है. कई वर्षों से मोटी सेलरी वाले नाकारा पत्रकारों को संरक्षण देने वाले पत्रकार संजीव पालीवाल को कार्यमुक्त कर दिया गया है. संजीव पालीवाल के कार्यकाल के दौरान ही सैकड़ों कम सेलरी वाले प्रतिभाशाली पत्रकारों को बिना कारण नौकरी से हटा दिया गया और नाकारा मोटी सेलरी वालों को बचा लिया गया. इसी का नतीजा है कि चैनल लगातार डूबता गया और अब भी डूब रहा है. नए मैनेजमेंट ने संजीव पालीवाल को छह माह का समय दिया काम कर साबित करने के लिए लेकिन वह साबित नहीं कर पाए. इस कारण उन्हें चैनल से निकाल बाहर किया गया.

माना जा रहा है कि अब चैनल से वे मोटी सेलरी वाले लोग हटाए जाएंगे जो कई वर्षों से जमे हैं और काम के नाम पर कोई एक खबर कर देते हैं या कोई एक शो बना देते हैं. बाकी शेष वक्त आंतरिक राजनीति बतियाने से लेकर वरिष्ठों की मक्खनबाजी करने में व्यतीत करते हैं. इनमें से कई कम्युनिस्ट बैकग्राउंड के लोग हैं जो अपना ज्यादातर वक्त फेसबुक पर बहसों में या गोष्ठियों-यात्राओं-छुट्टियों आदि में व्यतीत करते हैं. इनका चैनल से बस इतना लेना देना है कि नौकरी बची रहे, सेलरी बढ़ती रहे और बॉस खुश रहें. ये वो लोग हैं जिनके भीतर का प्रयोगधर्मी पत्रकार कब का मर चुका है और पुराने तौर-तरीके को उन्हीं घिसे पिटे शब्दों की चाशनी में लपेट कर नया बनाकर पेश करने की कोशिश करते रहते हैं.

संजीव पालीवाल के नेतृत्व में इन्हीं आधा दर्जन से ज्यादा लोगों ने पूरे चैनल पर कुंडली मार रखा है और नए लोगों को काम करने से रोकने व असफल साबित करने में पूरी उर्जा कई वर्षों से झोंक रखा है. इसी का नतीजा है कि अच्छे लोग या तो यहां आते नहीं या आते हैं तो इनकी आंतरिक राजनीति के शिकार हो जाते हैं. कई वर्षों से ये चर्चा है कि आईबीएन7 में वही टिकता है जो संजीव पालीवाल के खेमे में फिट हो जाता है तथा इनके चेलों (खासकर वामपंथी-थिएटर बैकग्राउंड वालों) को खुश रखने की बौद्धिक लफ्फाज कला सीख लेता है. संजीव पालीवाल के चेलों में कई ऐसे हैं जिन्होंने चैनल का फायदा उठाकर बाहर अपना समानांतर अलग किस्म का बिजनेस चला रखा है जिसके जरिए लाखों कमा रहे हैं. इस कमाई का बंटवारा आपस में चुपचाप कर लिया जाता है. ऐसे कई रहस्य हैं जिसे चैनल से जुड़े कई लोग नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं. 

सूत्रों का कहना है कि आईबीएन7 प्रबंधन बड़ा फैसले लेते हुए आजतक से आरसी शुक्ला को एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर इसीलिए ले आया है ताकि संजीव पालीवाल के जाने के बाद आरसी जड़ हो चुके पूरे सिस्टम की साफ-सफाई कर सकें. संजीव पालीवाल एक्जीक्यूटिव एडिटर आउटपुट थे. इसी पद पर आरसी शुक्ला ने ज्वाइन किया है. हालांकि चर्चा ये है कि संजीव पालीवाल खुद कुछ यूं पेश कर रहे हैं कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्तीफा दिया. पर सही बात ये है कि चैनल के लगातार असफल होने का बिलकुल सही कारण तलाश पाने में प्रबंधन सफल हुआ और संजीव पालीवाल को बाहर का रास्ता दिखा दिया. अगर ये सिलसिला यहीं रुक गया तो चैनल फिर अटक जाएगा.

अभी कम से कम आधा दर्जन से ज्यादा जड़, गतिहीन और लफ्फाज लोगों को बाहर निकालना पड़ेगा जिनका योगदान चैनल में न के बराबर है लेकिन ये चैनल पर कुंडली मारकर इस कदर बैठे हैं कि नया कोई काम करने आता है तो इन लोगों का सबसे पहला काम उसे हतोत्साहित करते हुए किसी गल्ती में फंसाने की की होती है. बाकी ये लोग हर वक्त बॉस के आगे अपनी मार्केटिंग कर अपने को सबसे ज्यादा चिंतित और सक्रिय साबित करते रहते हैं. जल्द ऐसे लोगों के नाम काम समेत उनका पोल खोला जाएगा ताकि आईबीएन7 चैनल का उद्धार हो सके.

आईबीएन7 में काम कर चुके एक युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.  अगर आप उपरोक्त बातों / तथ्यों / आरोपों से सहमत या असहमत हैं तो अपनी बात नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए सामने रख सकते हैं.

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आरसी शुक्ला ने आजतक छोड़ा, बने आईबीएन7 के एक्जीक्यूटिव एडिटर

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तेजतर्रार पत्रकार आरसी शुक्ला ने देश के नंबर वन चैनल आजतक से इस्तीफा दे दिया है। आजतक के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद के बेहद करीबी माने जाने वाले आरसी अब मुकेश अंबानी के चैनल आईबीएन-7 के एक्जीक्यूटिव एडिटर के तौर पर बहुत जल्द ही ज्वाइन करेंगे। पता ये भी चला है कि बतौर एक्जीक्यूटिव एडिटर आरसी चैनल के लुक एंड फील और कंटेट पर पूरी नजर रखेंगे। खबरों के मुताबिक आरसी शुक्ल बहुत मजबूत स्थिति में आईबीएन7 जा रहे हैं । माना जा रहा है उन्हें ढेर सारे अधिकार दिए जाने वाले हैं।

आरसी शुक्ला इससे पहले करीब तीन साल तक आजतक में एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के तौर पर आउटपुट में थे। आरसी इससे पहले भी आजतक में लंबी पारी खेल चुके हैं। आरसी आउटपुट के मास्टर माने जाते हैं। खबरों की प्लानिंग और तेजी के साथ खबरों को ऑन एयर करने में उन्हें महारत हासिल है। आरसी टेलीविजन पत्रकारिता की तमाम बारीकियों से वाकिफ हैं। आरसी शुक्ला का टेलीविजन पत्रकारिता में करीब 16 साल का अनुभव है। तीन साल उन्होंने सहारा समय में काम किया।

आजतक में अपनी पहली पारी में उन्होंने बतौर प्रोड्यूसर, एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर करीब पांच साल काम किया। आरसी शुक्ला ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रिपोर्टिंग भी की है। सहारा समय में उन्होंने चंडीगढ़ ब्यूरो चीफ के तौर पर भी काम किया था। इसके बाद उन्होंने आजतक ज्वाइन कर लिया था। आजतक में पांच साल काम करने के बाद आरसी ने सितंबर 2007 में सुप्रिय प्रसाद के साथ न्यूज 24 ज्वाइन किया था जहां वो डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर बने। न्यूज 24 में साढ़े तीन साल काम करने के बाद आरसी महुआ न्यूज में एक्जीक्यूटिव एडिटर के पद पर ज्वाइन किया, जहां उन्हें इनपुट हेड का प्रभार सौंपा गया। जब यूपी चैनल लांच हुआ, तो आरसी शुक्ला महुआ यूपी न्यूजलाइन के चैनल हेड भी बने। महुआ के बाद आरसी अक्टूबर 2012 में फिर आजतक लौट आए।

आरसी शुक्ल के पास अनुभव और तेजी दोनों है। उन्होंने सहारा, न्यूज 24 और महुआ न्यूज में एंकरिंग भी की है। महुआ में आरसी बहस लाइव के नाम से एक टॉक शो भी होस्ट करते थे। आरसी शुक्ला के आने से उमेश उपाध्याय की टीम को मजबूती मिलेगी। टीआरपी में नौवें नंबर पर पहुंच चुके आईबीएन-7 में वरिष्ठ सदस्यों की भरमार है, फिर भी चैनल लगातार गिर रहा है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि चैनल में टीमों का गठन फिर से होगा, कई वरिष्ठ सदस्यों पर गाज भी गिर सकती है।

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अमिताभ सिन्हा आजतक छोड़ आईबीएन7 पहुंचे, तुषार बनर्जी ने ‘बीबीसी’ और अभिषेक ने ‘खबर मंत्र’ छोड़ा

आजतक में कई वर्षों से कार्यरत पत्रकार अमिताभ सिन्हा ने दुखी मन से इस्तीफा दे दिया है. चर्चा है कि अमिताभ खुद की उपेक्षा से नाराज थे. पिछले तीन वर्षों से उनको प्रमोशन नहीं दिया गया था. वे भाजपा बीट कवर करते थे और नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू ले पाने में टीवी टुडे ग्रुप से अमिताभ सिन्हा ही सफल हो पाए थे. बताया जाता है कि नरेंद्र मोदी ने खुद इच्छा जताई थी कि वो अगर टीवी टुडे में किसी को इंटरव्यू देंगे तो वो अमिताभ सिन्हा होंगे.

अमिताभ सिन्हा ने जब अपना इस्तीफा चैनल प्रबंधन को भेजा तो कली पुरी से लेकर सुप्रिय प्रसाद तक उन्हें मनाने में जुट गए. भाजपा इन दिनों सत्ता में है और भाजपा बीट पर अमिताभ सिन्हा अच्छी पकड़ रखते हैं, इसलिए उन्हें खोने के लिए चैनल प्रबंधन तैयार न था. लेकिन अमिताभ सिन्हा नहीं माने. उनकी पहले ही बात आईबीएन7 में हो गई थी. उन्होंने राजनीतिक संपादक पद पर आईबीएन7 ज्वाइन किया है.

बीबीसी हिंदी आनलाइन में कार्यरत पत्रकार तुषार बनर्जी ने इस्तीफा दे दिया है. वे राघव बहल के नए लांच होने वाले आनलाइन न्यूज वेंचर के हिस्से हो गए हैं. तुषार ने बनारस स्थित बीएचयू से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कई संस्थानों के साथ कार्य किया. न्यूज और टेकनालजी की बेहतरीन समझ रखने वाले तुषार ने बीबीसी में कार्य के दौरान कई बड़ी खबरें ब्रेक की. बीबीसी में हुए विदाई समारोह के बारे में तुषार बनर्जी अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं: ”Big thanks to wonderful souls at the BBC for organising this lavish send-off…..My stint has been truly enriching and has helped me transform into a more professional individual. I will miss my office, colleagues, and those readers’ mails where I often got mentioned….But to move on is life….A short break awaits me before I take up the new responsibility at a newer place…Blessings awaited 🙂 ”

रांची के अखबार ‘खबर मंत्र’ से सूचना है कि अभिषेक कुमार राय ने सब एडिटर पद से रिजाइन दे दिया है. उन्होंने इस्तीफा देने के बाद अखबार के अंदर की तस्वीर को मेल के जरिए उजागर किया है. उन्होंने लिखा है कि एक बिल्डर अखबार का संपादक बनकर वहां अपने काले ब्लैक कारनामों को वाइट करने में जुटा है. चिरौंदी की जमीन, उसके द्वारा रैयतों को दिया गया चेक और उसमें गड़बड़ी, जमीन मामले में उनकी कंपनी को बचाने के लिए अखबार का यूज किया गया. जब सारा कुछ सध गया तो वे खुद संपादक बन बैठे हैं. अब वहां का माहौल काम करने लायक नहीं रहा है इसलिए प्रतिष्ठा के साथ वे बाहर आए गए, अपना त्यागपत्र देकर. अभिषेक ने लिखा है कि खबर मंत्र अब जी-हजूरी करनेवालों का दरबार बन गया है.

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देहरादून में आज तक और आईबीएन7 के रिपोर्टरों दिलीप सिंह राठौर व संजीव शर्मा पर मुकदमा दर्ज

देहरादून से एक बड़ी खबर आ रही है. दो न्यूज चैनलों के स्थानीय रिपोर्टरों पर मुकदमा दर्ज हो गया है. ये दो हैं आजतक के रिपोर्टर दिलीप राठौर और आईबीएन7 के रिपोर्टर संजीव शर्मा. आरोप है कि आज तक के रिपोर्टर ने बीते दिनों मीडिया सेंटर में एक-दूसरे व्यक्ति के साथ मार-पीट व गाली-गलोच कर दी थी.  बीच-बचाव करने आये दूसरे पत्रकारों को भी नहीं बख्शा. इस कारण कई लोग दिलीप से नाराज हो गए. पीड़ित विरेंदर सिंह द्वारा दी गई शिकायत पर धारा चौकी में पुलिस ने आजतक और आईबीएन7 के रिपोर्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है.  

पीड़ित विरेंदर सिंह ने भड़ास4मीडिया को बताया कि 10 नवंबर को दिए गए पार्थना पत्र पर आज तक के रिपोर्टर दिलीप सिंह राठौर और आईबीएन7 के संजीव शर्मा के दबावों के बावजूद पुलिस अधिकारियों ने घटना को सच मानते हुए मेरी रिपोर्ट दर्ज कर ली है. एफआईआर की कापी भड़ास को मेल से भेजी जा रही है.  विरेंदर ने बताया कि आजतक के राज्य संवाददाता दिलीप सिंह राठौर और आईबीएन7 के संजीव शर्मा  ने मुझे प्रताड़ित किया.  मेरे जमीन के मसले में मुझसे बार-बार पैसे मांगते हैं. पैसे न देने पर बंद करा देने की धमकी देते हैं. इन्ह लोगों ने मेरे साथ मारपीट और गाली गलौच की. जान से मरने की धमकी भी दी. विरेंदर ने आरोप लगाया कि आजतक और आईबीएन7 के दोनों रिपोर्टरों ने दो साल में बहुत से लोगों से पैसे ले रखे है और जब उनसे कोई वापस मांगता है तो उसे चैनल की धमकी देते हैं.  

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मुकेश अंबानी खरीदेंगे अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’!

मुकेश अंबानी ने ईटीवी, आईबीएन7, सीएनएन-आईबीएन समेत कई चैनलों-मीडिया कंपनियों को खरीदने के बाद अब अंतरराष्ट्रीय मीडिया का मोलभाव करना शुरू कर दिया है. ताजी सूचना के मुताबिक उनकी नजर अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार ‘फायनेंशियल टाइम्स’ पर है. भारत के साथ विदेशों में भी अपना मीडिया साम्राज्य फैलाने को लेकर लालयित अंबानी के एक प्रतिनिधि ने पियरसन समूह से संपर्क साधा है. अंतरराष्ट्रीय बिजनेस अखबार फायनेंशियल टाइम्स को प्रकाशित करने वाली कंपनी का नाम पियरसन समूह है. 

नेटवर्क 18 और ईटीवी पर कब्जा करने के बाद मुकेश अंबानी की नई सक्रियता चौंकाने वाली है. वह दुनिया के सबसे बड़े मीडिया मुगल बनने की आकांक्षा पाले हैं. ज्ञात हो कि एक जमाने में द संडे आर्ब्जवर और द आर्ब्जवर ऑफ बिजनेस एंड पॉलीटिक्स में भी रिलायंस समूह की हिस्सेदारी रही है लेकिन इन दोनों का प्रकाशन वर्ष 2000 में बंद हो गया था. इसी के साथ उस जमाने में मीडिया में आने की रिलायंस की कोशिशों ने दम तोड़ दिया था. ये कोशिशें नए सिरे से परवान चढ़ाई है धीरूभाई अंबानी के बेटे मुकेश अंबानी ने. फायनेंशियल टाइम्स करीब 120 साल पुरान बिजनेस अखबार है. 1957 में इस अखबार का पियरसन ने टेकओवर किया था. वर्ष 2012 में फायनेंशियल टाइम्स और उसके डिजिटल कारोबार की कुल कीमत 98.3 अरब रुपए थी.

फायनेंशियल टाइम्स के बिकने की खबर वर्ष 2012 में भी आई थी पर कंपनी के सीईओ मारजोरी स्कॉरडीनो ने इस खबर को गलत बताया था. लंदन स्थित पियरसन समूह के पास फायनेंशियल टाइम्स कुल स्वामित्व होने के साथ-साथ जानीमानी पत्रिका द इकॉनामिस्ट में 50 फीसदी और पेंग्विन रेंडम हाऊस में 47 फीसदी हिस्सेदारी है. वर्ष 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स का पीयरसन समूह के कुल बिजनेस में 8 फीसदी का योगदान था. 2013-14 में फायनेंशियल टाइम्स ने 449 मिलियन पौंड का कारोबार किया था. कंपनी को 55 मिलियन पौंड का फायदा भी हुआ था.

ज्ञात हो कि मुकेश अंबानी ने नेटवर्क18 और टीवी18 ब्रॉडकास्टर्स का इस वर्ष के शुरुआत में अधिग्रहण किया था. इसके तहत समाचार चैनल सीएनबीसी टीवी 18, सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन लोकमत और आईबीएन 7 के साथ-साथ एंटरटेनमेंट चैनल कलर्स, कॉमेडी सेंट्रल, एमटीवी अंबानी के नियंत्रण में हैं.

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IBN7 के कंटेंट से छेड़छाड़ के आरोपी की पहचान, गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम सक्रिय

नई दिल्ली। सोशल मीडिया का दुरूपयोग कर भ्रम फैलाने वाले अब टीवी चैनलों को भी अपना निशाना बना रहे हैं। ऐसे ही एक मामले में IBN7 के कंटेंट के साथ छेड़छाड़ कर और चैनल के लोगो का दुरुपयोग कर सोशल मीडिया में दुष्प्रचार करने के मामले में नोएडा पुलिस ने राजस्थान के तपन मेघावत के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। पुलिस ने आईटी एक्ट और कॉपीराइट एक्ट के तहत उस शख्स को इस मामले में आरोपी बनाया है। सोशल मीडिया में चैनल के नाम के दुरूपयोग की बात सामने आने के बाद आईबीएन7 ने इसकी शिकायत नोएडा पुलिस से की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फरीदाबाद चुनावी रैली को लेकर सात अक्टूबर को फेसबुक और ट्वीटर पर आईबीएन7 के नाम से भ्रामक खबर फैलाई गई। इसमें कहा गया कि मोदी की फरीदाबाद रैली में भीड़ नहीं जुटी। फेसबुक और ट्वीटर हैंडल से इस भ्रामक खबर को फैलाने के लिए आबीएन7 न्यूज चैनल के फर्जी स्क्रीन शॉट का सहारा लिया गया।

आईबीएन7 की तस्वीर से छेड़छाड़ कर गलत खबर सोशल साइट पर अपलोड करने वाला तपन मेघावत नाम का शख्स सोशल साइट पर खुद को नेशनल कांग्रेस ब्रिगेड के यूथ सेल का नेशनल को-ऑर्डिनेटर बताता है और वो राजस्थान का रहने वाला है। एक जिम्मेदार चैनल होने के नाते सोशल मीडिया के इस दुरुपयोग और चैनल को बदनाम करने की साजिश के खिलाफ आईबीएन7 ने नोएडा पुलिस से शिकायत की।

शिकायत मिलने के बाद नोएडा के एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने इस मामले की जांच कराई और जांच में आईबीएन7 का आरोप सही पाया। पुलिस ने सोशल साइट पर आईबीएन7 के खिलाफ भ्रामक खबर अपलोड करने को लेकर राजस्थान के इस शख्स के खिलाफ 14 अक्टूबर को मुकदमा दर्ज किया। उसके खिलाफ नोएडा के सेक्टर 20 थाने में 66 आईटी एक्ट और 62 कॉपीराइट एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

एसएसपी प्रीतिंदर सिंह ने इस मामले की जांच नोएडा पुलिस के क्राइम ब्रांच की साइबर सेल को सौंपी। इस मामले में ट्वीटर और फेसबुक से ईमेल के जरिए जानकारी मांगी है कि ये भ्रामक खबर और फेक तस्वीर किस आईपी अड्रेस से और कहां से सोशल साइट्स पर अपलोड की गई। बहरहाल, नोएडा पुलिस ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और पुलिस की ये कोशिश है कि वो जल्द से जल्द आरोपियों तक पहुंच जाए। (साभार- आईबीएनलाइव डाट इन)

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परसों यानि 19 अक्टूबर से बदल जाएगा आईबीएन7, स्मिता शर्मा गईं हेडलाइंस टुडे

आईबीएन7 को परसों यानि 19 अक्टूबर को री-लांच किया जाएगा. आशुतोष और राजदीप सरदेसाई के जाने के बाद आईबीएन7 की कमान पूरी तरह रिलायंस के हाथों आ गई है. मुकेश अंबानी ने अपने आदमियों के हवाले चैनल को कर दिया है. उमेश उपाध्याय और सुमित अवस्थी चैनल को री-लांच करा रहे हैं. बदलाव के क्रम में आईबीएन7 अपनी नई टैग लाइन ‘हौसला है’ के साथ सामने आएगा. चैनल का कहना है कि एक नया और सकारात्मक दृष्टिकोण, रिपोर्टरों की समर्पित टीम, नए शो, तेज और स्पष्ट ग्राफिक्स कड़े मुकाबले वाले हिंदी न्यूज जैनर में आईबीएन7 को एक अलग और मजबूत मुकाम पर ले जाएंगे.

चैनल की तरफ से जारी खबर के मुताबिक देशभर में 2000 से भी ज्यादा रिपोर्टरों का साथ, चैनल की कवरेज के दायरे को इतना विस्तार देगा जिसकी बराबरी कोई दूसरा नेटवर्क नहीं कर सकता. चैनल का फोकस ज्यादा से ज्यादा न्यूज देने पर होगा, न कि व्यूज या ओपीनियन पर जो कि आज अधिकतर चैनलों के लिए एक नियम जैसा बन चुका है.  चैनल में ये बदलाव सुमित अवस्थी, ऋचा अनिरुद्ध और आकाश सोनी के नेतृत्व में और नवज्योत कौर, तेजस्वी चंडोक नैयर, पायल भुयान, हिमानी नैथानी, पंकज भार्गव, अमृत आनंद व चैनल के युवा तथा भरोसेमंद पत्रकारों-रिपोर्टरों की टीम के सहयोग से किए जा रहे हैं.

अपने रिलांच के तहत आईबीएन7 कई नए शो आरंभ करेगा। ‘देश दिन भर’ में जहां देश के हर कोने और हिस्से की खबरें होंगी, वहीं ‘राजधानी एक्सप्रेस’ में बड़े शहरों की बड़ी खबरें. सोशल मीडिया की ताजा हलचलों और ट्रेंड पर आधारित शो ‘आईन्यूज’ दिखेगा. आईबीएन7 की प्राइम टाइम प्रोग्रामिंग में भी बदलाव कर उसे और बेहतर किया गया है. नए शो ‘आठ बजे’ में न सिर्फ दिन भर की खबरों का राउंडअप होगा बल्कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहराई से तफ्तीश-विश्लेषण भी किया जाएगा. ‘इंडिया नौ बजे’ में संक्षिप्त खबरें, पैकेज और दिन की चर्चित हस्ती के इंटरव्यू होंगे तो ‘क्राइम न्यूज’ में अपराध जगत की खबरें.

रिलांच पर टिप्पणी करते हुए नेटवर्क18 के प्रेसिडेंट (न्यूज) उमेश उपाध्याय ने कहा कि आईबीएन7 का रिलांच चैनल के लिए मील का पत्थर साबित होगा. उन्होंने कहा कि समाचार चैनलों के लिए ये बेहद महत्वपूर्ण है कि वे दर्शकों के लिए प्रासंगिक-सुसंगत बने रहें. व्यूज के बजाय खबरों पर बढ़ता हमारा फोकस, क्लीन लुक, कवरेज की व्यापकता और कड़े पत्रकारीय मानदंडों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता हिंदी न्यूज दर्शकों द्वारा पसंद की जाएगी. हमारे पास पहले से ही वरिष्ठ पत्रकार संजीव पालीवाल और एम के झा की अगुवाई वाली एक बेहद ही सशक्त टीम है जो नए सदस्यों के जुड़ने से और ज्यादा मजबूत, स्पंदित और विश्वसनीय हो चुकी है.

उधर, आईबीएन7 से ही मिली एक अन्य सूचना के मुताबिक तेजतर्रार एंकर और रिपोर्टर स्मिता शर्मा ने इस्तीफा देकर हेडलाइंस टुडे ज्वाइन कर लिया है. स्मिता को हेडलाइंस टुडे में डिप्टी एडिटर बनाया गया है.

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सुमित अवस्थी ने जी न्यूज से इस्तीफा दिया, आईबीएन7 का नया चैनल हेड बनने की चर्चा

खबर है कि जी न्यूज से सुमित अवस्थी ने रिजाइन कर दिया है. उनके आईबीएन7 का नया चैनल हेड बनने की चर्चा है. सुमित जी न्यूज में रेजीडेंट एडिटर के पद पर कार्यरत थे. उन्होंने जी न्यूज के साथ पारी की शुरुआत 2013 अक्टूबर में की थी. उसके पहले वह आजतक में हुआ करते थे और उससे भी पहले आईबीएन7 में. अब दुबारा उनके आईबीएन7 जाने की संभावना है.

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