कमलनाथ ने सीएम पद की शपथ लेते ही किसानों का दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कमलनाथ ने बड़ा फैसला किया… उन्होंने किसानों की कर्जमाफी फाइल पर दस्तखत कर दिए… शपथ लेने के बाद कर्जमाफी फाइल पर दस्तखत के बाद कमलनाथ ने जो राजाज्ञा जारी किया उसमें कहा गया है कि 2 लाख रुपये तक का किसानों का कर्जा माफ किया जाता है.

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किसान विरोधी पत्रकारों से अपील, वायरल हो चुके इस कार्टून व परचे को न देखें-पढ़ें!

दिल्ली आज किसानों की हो चुकी है. हर ओर किसान. रंग-बिरंगे झंडों से लैस किसान. कर्ज माफी और फसलों का वाजिब मूल्य इनकी मुख्य मांगें हैं. लेकिन मीडिया खामोश है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि ये गोदी है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि यह पेड है. मीडिया इसलिए खामोश है क्योंकि बाजारू हो चुका यह चौथा खंभा भ्रष्ट सत्ताधारियों से कुछ टुकड़े पाने की लालसा में तलवे चाटने को बाध्य है. Continue reading

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TOI को पता है कि कोई किसान टाइम्स आफ इंडिया नहीं पढ़ता, इसलिए वह किसान विरोधी छापता है! देखें

Vibhuti Pandey : आप चाहे कितनी भी बार कह लें, चाहे टाइम्स के संपादक तक आप की बात से सहमत हों, लेकिन The Times of India अपना उच्च मध्यम वर्गीय चरित्र नहीं छोड़ेगा. कल किसान कवरेज पर टाइम्स की हेडलाइन पढ़िए. परसों सोशल मीडिया पर हिट शेयर के लिए इन्होंने जो भी किया हो लेकिन कल किसान और सुरक्षाकर्मियों की भिड़न्त की जो दोनों फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, दोनों ही टाइम्स ऑफ इंडिया ने नहीं छापी हैं.

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नाकारा सरकारें और आत्महन्ता किसान

अनेहस शाश्वत

लाख दावों प्रति दावों के बावजूद आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ खेती ही है। आधुनिक अर्थव्यस्था में इस स्थिति को पिछड़ेपन का द्योतक मानते हैं। बावजूद इसके अपने देश के किसानों ने देश के अनाज कोठार इस हदतक भर दिये हैं कि अगर तीन साल लगातार देश की खेती बरबाद हो जाये तो भी अनाज की कमी नहीं होगी। गौर करें यह तब जब भारत की आबादी लिखत-पढ़त में 125 करोड़ है यानी वास्तविक आबादी इससे ज्यादा ही होगी।

साथ ही गौरतलब यह भी है कि ऐसा करने वाला भारत का किसान लगभग रोजाना स्वतंत्र भारत में आत्महत्या करने के लिए मजबूर है। यही दोनों आंकड़े यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सदियों पुराने खेतिहर संस्कारों की वजह से किसान आज भी तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भरपूर मात्रा में अनाज पैदा कर रहा है। लेकिन नाकारा सरकारें किसान को मानवोचित गरिमा के अनुरूप जीवन देने में लगातार असमर्थ हो रही हैं जो कि सरकारों का संवैधानिक दायित्व है।

इस समस्या की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन अफसोस की बात यह है कि देश के स्वतंत्र होने के बावजूद देश की खेती-किसानी पर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था। वह तो भला हो 1965-66-67 में पड़े अकाल, का जिसने सरकारों को खेती-किसानी पर थोड़ा बहुत ध्यान देने पर मजबूर किया। उस थोड़ी बहुत सरकारी कृपा और अपने सदियों पुराने संस्कारों की मदद से किसानों ने न केवल विशाल आबादी का पेट भरा बल्कि आपातकाल के लिए भी कोठारों में अनाज भर दिया। यह अवधि भी हालांकि थोड़े दिन ही रही, कुल करीब ड़ेढ दशक तक यानी 1965 से 1980 तक।

1980 का साल भारत में निर्याणक परिवर्तन का साल रहा। इंदिरा गांधी काफी धूम-धड़ाम के साथ फिर से प्रधानमंत्री बनीं। साथ ही उनके नहीं चाहने के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था पर पूंजीपतियों व वर्ल्ड बैंक का शिकंजा मजबूत होने लगा। इनकी प्रमुख मांग उद्योगों और उद्योगपतियों को अधिक से अधिक सुविधा देने की थी। दूसरी तरफ आकार ले रहा देश का विशाल मध्यम वर्ग था जिसकी जरूरतों को पूरा करने की सरकार की मजबूरी थी। क्योंकि उस समय सबसे बड़ा और संगठित वोट बैंक वहीं था। जाहिर सी बात है गाज खेती और किसानों पर गिरनी थी और गिरी। बाजार ने किसान को कभी भी उसकी उपज का लाभप्रद मूल्य नहीं दिया। उसकी भरपाई के लिए कृषि उपज को सरकारों ने खरीदना शुरू किया लेकिन इतना ध्यान रखा कि सरकारी खरीद की वजह से मूल्य इतना नहीं हो जाय कि मध्यम वर्ग की रसोई का खर्च उसको खटकने लगे।

आज भी आप चाहे तो खुद ही गणना करके देख लें, एक सामान्य मध्यम वर्ग परिवार की रसोई का खर्च माहवारी 8-10 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होता जबकि आमदनी 60 हजार से एक लाख रुपये प्रति माह होती है। बहरहाल किसान इस समस्या से जूझ ही रहा था कि देश में उदारीकरण का दौर शुरू हो गया। इसने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी। आमदनी बढ़ाने के चक्कर में देश का किसान परम्परागत खेती के साथ ही तमाम नई तकनीकों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के द्वारा शुरू की गई नई योजनायें अपनाने लगा। जैसा कि अपने देश का रिवाज है, किसानों को नये सिरे से प्रशिक्षित करने के लिए न तो सरकारी एजेंसियां थीं और न ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों  ने प्रशिक्षण में कोई दिलचस्पी ली। वे केवल अपना माल और तकनीक बेचने में व्यस्त रहीं। फलस्वरूप बाजार की विवशताओं और बैंकों के कर्जों की वजह से कई बार किसान को फसल का लागत मूल्य मिलना भी दूभर हो गया। नतीजे में अब आत्महत्या के सिवाय किसान के पास कोई चारा भी नहीं रहा।

यह सब तो हुआ ही, यह भी हुआ कि भारतीय उद्योगपतियों और सरकारी अमले की  अयोग्यता और धूर्तता के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में इतने रोजगार पैदा नहीं कर पाई जिसमें बढ़ी हुई कृषि आबादी को समायोजित किया जा सके। इस वजह ने भी खेती पर अतिरिक्त बोझ डाला जो किसानों की आत्महत्या का कारण बना। ऐसा नहीं है कि सरकारे इस वजह को जानती नही है लेकिन जान बूझकर आंखे मूंद रखी हैं क्योंकि उदारीकरण के इस दौर में प्रभुवर्ग के स्वार्थ और अधिकारो में किसी तरह की कटौती नही कर सकतीं। मध्यम वर्ग से सबसे ज्यादा वसूली के बाद अगर इस वर्ग की रसोई का खर्च भी बढ़ गया तो जीत के 30-35 फीसदी वोटों के सहारे सरकार बना पाना किसी भी राजनैतिक दल के लिए मुश्किल होगा।

अब रह गयी विशाल निर्धन आबादी तो वह तो पहले से ही मनरेगा के हवाले है और वैसे भी यह आबादी फिलहाल राजनैतिक जागरूकता के लिहाज इस हद तक बिखरी हुई है कि कोई भी राजनैतिक दल जिसे राष्ट्रीय स्तर पर सरकार बनानी है इस आबादी पर जोखिम मोल नहीं लेगा। इस आबादी का एक पहलू और भी है, इसके तहत वे अकुशल मजदूर और खेतिहर मजदूर आते है जिनकी समाज में कोई हैसियत नहीं है। यह तो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूरी है कि उनका न्यूनतम ध्यान रखा जाये, वही हो रहा है। ऐसे में यह कड़वा सच है कि भारतीय किसान की त्रासदी अभी रुकने वाली नहीं, बल्कि बढ़ने की आशंका ज्यादा है। साथ ही भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था अब ऐसी जगह जाकर फंस गयी है, जहां उद्योग-धन्धे हैं नहीं, खेती नष्ट हो रही है और सेवा क्षेत्र भी बेहतर नहीं कहा जा सकता। नतीजे में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अकुशल मजदूरों और डिग्रीधारी अप्रशिक्षित बेरोजगारों की भरमार है। ऐसे में सरकारें मर रहे किसानों पर ध्यान देगी, ऐसा लगता तो नहीं, खासतौर से तब जब इस विकराल समस्या से निपटने की कोई इच्छाशक्ति और योजनाएं भी सरकारों के पास नहीं हैं।

लेखक अनेहस शाश्वत सुल्तानपुर के निवासी हैं और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. मेरठ, बनारस, लखनऊ, सतना समेत कई शहरों में विभिन्न अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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कमाल ख़ान की इस एक रिपोर्ट से हिल गया हूं : रवीश कुमार

Ravish Kumar : कमाल ख़ान की एक रिपोर्ट से हिल गया हूं। यूपी के सीतापुर में कर्ज़ रिकवरी वाले एक किसान के घर गए। रिकवरी एजेंट ने किसान को ट्रैक्टर से ही कुचल कर मार दिया और ट्रैक्टर लेकर फ़रार हो गए। मात्र 65,000 रुपये कर्ज़ था।

ज्ञानचंद ने पांच लाख लोन लेकर ट्रैक्टर ख़रीदा था। अधिकांश चुका दिया था। 65000 ही बाकी था। इसी कर्ज़ को चुकाने के लिए ज्ञान चंद दूसरे की खेत जोत रहे थे। रिकवरी वाले खेत पर गए और ट्रैक्टर छीन लिया। ज्ञानचंद रोकने लगे तो उनके ऊपर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। किसान की हड्डियां चूर चूर हो गईं। आइये इस देश के किसानों के लिए कुछ देर मौन रहते हैं। कितना बोलेंगे। किसी को तो फर्क पड़ता नहीं है। किसान सिर्फ जय जवान जय किसान के नारे के लिए याद आता है। इस नारे ने देश के किसानों को मरवा दिया।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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वित्तीय पूंजी ने किसानों के सभी तबकों को तबाह किया है

किसान आंदोलन की नयी शुरुआत :  बैंक पति, स्टाक एक्सचेंज अधिपति जैसे वित्तीय अभिजात वर्ग के शासन में किसानों की अर्थव्यवस्था और जीवन का संकट उनकी आत्महत्याओं के रूप में चैतरफा दिख रहा है। यह वो दौर है जिसमें कारपोरेट पूंजी ने राजनीतिक सम्प्रभुता और आम नागरिकों के जीवन की बेहतरी के सभी पक्षों पर खुला हमला बोल दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार पर भी वित्तीय पूंजी का गहरा हमला है लेकिन सबसे अधिक इसकी चोट अनौपचारिक आर्थिक क्षेत्र खासकर खेती-किसानी पर दिख रही है। पचास फीसदी से अधिक देश की आबादी खेती पर निर्भर है और आर्थिक संकट का भयावह चेहरा यहाँ खुलकर दिख रहा है।

आजादी के पहले उन्नीसवी शताब्दी में ढेर सारे किसान संघर्ष हुये लेकिन 1917 का गांधी जी के नेतृत्व में हुए चम्पारन सत्याग्रह ने राष्ट्रीय रंगभूमि में किसान आन्दोलन के बतौर राजनीतिक तौर पर अपनी दस्तक दी। नील खेती के विरूद्ध आन्दोलन देर तक नहीं चला लेकिन निलहे साहबों को नील की खेती को बन्द करना पड़ा। उसी तरह गुजरात का खेड़ा आन्दोलन भी राजनीतिक प्रभाव बनाने में सफल रहा। 1921 के असहयोग आन्दोलन में भी गांधी ने किसानों से सरकार को कर न देने की अपील की थी। दूसरा महत्वपूर्ण आन्दोलन किसानों का सहजानन्द सरस्वती की अगुवाई में बिहार में किसान सभा के माध्यम से दिखा जो अपने चरित्र में पूरी तौर पर रेडिकल था। 1927 में गठित इस किसान सभा ने सहजानन्द की अगुवाई में 1934 में गांधी जी से अपना सम्बन्ध विच्छेद कर लिया।

इस आन्दोलन ने समाजवादियों, कम्युनिस्टों और सुभाष चन्द्र बोस को अपना पूरा सहयोग दिया और कांग्रेस के तमाम विरोध के बावजूद इसकी संख्या 1935 में लगभग 80,000 थी, जो 1938 में बढ़कर 250000 हो गयी। चर्चित किसान आन्दोलनों में जिसका राजनीतिक महत्व था उसमें गुजरात का बारदोली मालाबार का मोपला, बंगाल का तेभागा किसान आन्दोलन चर्चित रहा हैं। तेलंगाना की बात ही कुछ और थी वह भारत की राजनीति दिशा बदल देने का विशेष किस्म का किसान संघर्ष था। विकास का किसान बनाम कारपोरेट रास्ता इस आन्दोलन की अन्र्तवस्तु में था। तेलंगाना किसान आन्दोलन के बाद अस्सी के दशक का किसान आन्दोलन आमतौर पर राजनीति विरोधी दिखता है और गैर पार्टी स्वतंत्र किसान आन्दोलन की वकालत करता है।

इस किसान आन्दोलन में एक घड़ा शरद जोशी का रहा है जो मूलतः किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने और विश्व व्यापार से किसानों के उत्पादन को जोड़ने की वकालत करता है। ग्रामीण विकास पर विशेष जोर देते हुए शरद जोशी भारत बनाम इण्डिया के प्रवक्ता बने। कर्नाटक के नन्जन्डूस्वामी का किसान आन्दोलन अन्य फार्मर आन्दोलन से राजनीतिक तौर पर विकसित दिखता है। महेन्द्र सिंह टिकैत किसानों के उत्पादन के लिए सस्ते दर पर संसाधनों की उपलब्धता की वकालत करते थे। सब मिलाकर फार्मर आन्दोलन अपना प्रभाव छोड़ते हुए भी अपनी राजनीतिक दिशा नहीं तय कर पाया। अस्सी के दशक में ही फार्मर आन्दोलन के विपरीत बिहार का किसान संघर्ष खेतिहर मजदूर उनके साथ गरीब निम्न मध्यम किसानों में राजनीतिक प्रभाव बनाने में एक हद तक सफल रहा है। बिहार का किसान आन्दोलन सर्वागीण भूमि-सुधार पर ज्यादा जोर देता था, लेकिन हरित क्रांति से उत्पन्न संकट के सवाल पर भी हस्तक्षेप का पक्षधर रहा है।

आज दौर में भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ दादरी, कलिंग नगर, पोस्को, रायगढ़, पलाचीमाड़ा आदि में किसानों का सशक्त आन्दोलन खड़ा हुआ और यूपीए सरकार को मजबूर होकर अंग्रेजों के 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून की जगह 2013 में नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाना पड़ा। मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही कारपोरेट घरानों के पक्ष में भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में संशोधन की कोशिश की थी जिसके खिलाफ पूरे देश में किसानों के आंदोलन हुए और किसानों के दबाव में उसे संशोधनों से पीछे हटना पड़ा।
आज हजारों किसानों की आत्महत्याओं के बावजूद देश के वित्तमंत्री, रिजर्व बैंक के गर्वनर व अन्य सत्ता प्रतिष्ठान किसानों के कर्जा माफी इंकार कर रहे है और तर्क दे रहे है कि इससे वित्तीय घाटा बढेगा।

वित्तीय घाटा का तर्क कारपोरेट का है। यदि सरकार वित्तीय घाटा को बढ़ने से रोकने के प्रति ईमानदार है तो उसे बताना चाहिए कि परितोषिक के नाम पर कारपोरेट घरानों का लाखों करोड़ रूपया टैक्स का क्यों हर साल माफ किया जा रहा है, सरकार ने कारपोरेट घरानों की आय पर टैक्स का स्लैब क्यों घटा दिया, लाखों करोड़ों के कारपोरेट घरानों के एनपीए के नाम पर पड़े बैकों के कर्ज की वसूली क्यों नहीं हो रही और कारपोरेट घरानों की सम्पत्ति पर कर क्यों नहीं लगाती। दरअसल कारपोरेट घरानों के मुनाफे की अर्थव्यवस्था ने वित्तीय घाटा को बढाने का काम किया है। इसलिए इसे किसानों और जनता के मत्थे मढ़ने के सरकार की कोशिशों का हर स्तर पर प्रतिवाद करना होगा।

मध्य प्रदेश के मंदसौर में 6 किसानों की हत्या का राष्ट्रीय प्रतिवाद हुआ है और देश भर के अधिकांश किसान आन्दोलन और किसान आंदोलन की पक्षधर ताकतों ने मिलकर कर्जमाफी और लागत मूल्य के डेढ़ गुना दाम के लिए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति बनाकर आन्दोलन शुरू किया है। 6 जुलाई से इस समन्वय समिति ने मंदसौर से किसान मुक्ति यात्रा शुरू की है जो छः राज्यों से होकर 18 जुलाई को दिल्ली पहुंचेगी जहां किसान जंतर-मंतर पर धरना शुरू करेंगे। भाजपा की मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने पूरे प्रदेश में रासुका लगाकर और यात्रा में शामिल किसान नेताओं को गिरफ्तार कर यात्रा को रोकने की कोशिश की थी पर भारी दबाब में सरकार को पीछे हटना पड़ा और यात्रा जारी है। बहरहाल यह किसान आन्दोलन का नया दौर है इस समन्वय समिति में समाजवादी, कम्युनिस्ट किसान संगठनों की भी अच्छी भागीदारी है। हालांकि कुछ किसान संगठन जो किन्हीं कारणों से अभी भी समन्वय समिति में शामिल नहीं हो सके है उन्हें जोड़ने की जरूरत है।

वित्तीय पूंजी ने किसानों के सभी तबकों को तबाह किया है। इसलिए वित्तीय पूंजी के खिलाफ व्यापक किसानों को उनके ज्वलंत मुद्दों को क्रमशः समाहित करते हुए गोलबंद करना वक्त की जरूरत है। आज के दौर के किसान आन्दोलन की दिशा और नीति को वित्तीय पूंजी की तानाशाही, जिसको केन्द्रीय स्तर पर एनडीए की सरकार स्थापित करने में लगी है, के खिलाफ संगठित और विकसित करने की जरूरत है। जब देश में मौजूद विपक्ष कोई कारगर भूमिका नहीं निभा रहा है किसान आंदोलन को अपने इर्द गिर्द वित्तीय पूंजी के हमलों से पीड़ित सभी तबकों को गोलबंद करना होगा। मोदी सरकार की अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के खिलाफ प्रतिकार में उतरे सामाजिक नागरिक आंदोलनों के साथ कायम एकता किसान आंदोलन को राजनीतिक तौर पर मजबूती प्रदान करेगा।

अखिलेन्द्र प्रताप सिंह
राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य
स्वराज अभियान

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किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं

सरकार को केवल किसानों की चिंता है…  लगता है कोई और तबका इस देश में रहता ही नहीं…

श्रीगंगानगर। पटाखा फैक्ट्री मेँ आग से दो दर्जन से अधिक व्यक्ति मारे गए। एमपी मेँ सरकारी गोली से आंदोलनकारी 6 किसानों की मौत हो गई। दो दर्जन से अधिक संख्या मेँ मारे व्यक्तियों का जिक्र कहीं कहीं है और किसानों के मरने का चप्पे चप्पे पर। राजनीतिक गलियारों मेँ। टीवी की डिबेट मेँ। अखबारों के आलेखों मेँ। संपादकीय में। बड़े बड़े कृषि विशेषज्ञ लेख लिख रहे है। उनकी इन्कम का लेख जोखा निकाला जा रहा है। उनके कर्ज माफ करने की चर्चा है। उस पर चिंतन और चिंता है। कुल मिलाकर देश का फोकस किसानों पर है।
लगता है कोई और तबका इस देश मेँ रहता ही नहीं।

किसानों को छींक भी आ जाए तो सरकारें कांपने लगती हैं। राजनीतिक दलों मेँ हल चल मच जाती है। नेताओं के दौरे शुरू होते हैं। किसानों के अतिरिक्त किसी की चिंता नहीं। कमाल है! हद है! बड़े शर्म की बात है इस लोकतन्त्र मेँ, जो केवल एक वर्ग की बात करता है। मात्र एक तबके पर अपना पूरा ध्यान लगाता है। सबसिडी किसानों को। कर्ज माफ किसानों का। फसल खराब तो मुआवजा किसान के खाते मेँ। टैक्स की फुल  छूट किसानों को। सस्ती बिजली किसानों को।

कोई पूछने वाला हो इनसे कि ऐसा क्यों! करो माफ किसानों के कर्ज, क्योंकि आधे से अधिक विधायक, सांसद के प्रोफाइल में किसान लिखा मिलेगा। अपने क्षेत्र मेँ देख लो, पूर्व मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ किसान। पूर्व मंत्री गुरमीत सिंह कुन्नर किसान। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर, संतोष सहारण, विधायक राजेन्द्र भादू किसान। पूर्व विधायक गंगाजल मील किसान। मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी, डॉ राम प्रताप किसान….अनगिनत हैं इस लिस्ट मेँ। देश मेँ कितने होंगे! कोई भी कल्पना करके देख ले। कर दो इन सबके कर्जे माफ। क्योंकि ये सब के सब बेचारे हैं। हालत के मारे हैं। इससे बड़ा मज़ाक कोई और हो भी सकता है क्या!

एक दुकानदार को घाटा हो गया। कर्ज नहीं चुका सका। बैंक वाले आ गए ढ़ोल लेकर। उसके घर के सामने खूब बजाए। उस बंदे की इज्जत का तो हो गया सत्यानाश। कोई मुसीबत का मारा नहीं चुका सका कर्ज, कर दिया उसका मकान नीलाम। आ गया बंदा सड़क पर। क्योंकि ये किसान नहीं थे। ये बड़े लोग नहीं थे। देश मेँ हर प्रकार की छूट किसान को। हर प्रकार का टैक्स कारोबारी पर । व्यापारियों से टैक्स लेना, चंदा लेना और फिर इसी तबके को बात बात पर चोर कहना। इससे अधिक अपमान किसी तबके का इस देश मेँ क्या होगा! जो सरकार, अफसरों और नेताओं का पेट भर रहा है वह तो चोर और जिनको सरकार हर प्रकार की सुविधा दे रही है, वे बेचारे। कभी इन का रहन सहन भी देख ले सरकार।

बड़े बड़े नेता बेचारे हो जाते हैं, क्योंकि ये किसान कहलाते हैं और गली मोहल्ले मेँ छोटे छोटे दुकानदार, जो जीएसटी की परिभाषा पूछते घूम रहे हैं वकीलों के पास, वे धनवान है। जो किसान ईमानदारी से लिया कर्ज वापिस कर देते हैं, उन पर क्या गुजरती है, कर्ज माफी से।  वे मूर्ख कहलाते हैं। इस कर्ज माफी से सरकारों पर कितना बोझ पड़ता है, इसका आंकलन करने की योग्यता इन शब्दों मेँ तो है नहीं। सरकार कोई खेती थोड़ी ना करती है जो बोझ को वहन कर लेगी। वह जनता पर टैक्स लगाएगी। कोई नई तरकीब निकालेगी।

कमजोर का कल्याण सरकार की प्राथमिकता हो, परंतु उसे केवल इसलिए पोषित किया जाए कि वह किसान है, ये गलत है। जो मदद का हकदार है, मदद उसकी होनी चाहिए। ताकि किसी दूसरे का मन ना दुखे। उसे ऐसा ना लगे कि उसके अपने ही देश मेँ उसके साथ भेदभाव किया जा रहा है। इस देश मेँ तो यही हो रहा है। दो लाइन पढ़ो-

परिंदे ने तूफान से पूछा है
मेरा आशियाना क्यों टूटा है।

लेखक गोविंद गोयल Govind Goyal राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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किसानों के पेशाब पीने के बाद भी नहीं पिघलेगी मोदी सरकार

Nitin Thakur : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस दिन कंगारुओं के प्रधानमंत्री के साथ अक्षरधाम में पिकनिक मना रहे थे, क्या उन्हें इल्म है कि ठीक उसी दिन नॉर्थ एवेन्यू पर इस देश के चार किसान नंग धड़ंग होकर प्रदर्शन कर रहे थे? वो पागल नहींं थे.. और ना ही वो किसी पब्लिसिटी के लिए आए थे.. वो तो बेचारे तमिलनाडु के अपने गांवों से हज़ारों किलोमीटर दूर पत्थर के इस शहर में अपनी गुहार लगाने पहुंचे थे।

28 दिनों तक वो बेचारे प्रदर्शन के लिए सरकारों द्वारा तय की गई जगह जंतर मंतर पर पड़े रहे। उन्हें लगा कि चेन्नई ना सही मगर दिल्ली उनकी आवाज़ ज़रूर सुनेगी। 28 दिनों तक तथाकथित प्रधानसेवक के दफ्तर से कोई उनसे बात करने जंतर मंतर नहीं आया। सब्र टूटा तो किसान खुद ही प्रधानमंत्री के दफ्तर जा पहुंचे लेकिन मैले-कुचैले और गंदे-से दिखनेवाले इन जीवों की वहां भला क्या बिसात.. आखिर वो लकदक और चमकदार नेताओं और साहब लोगों का गढ़ है। खैर, पुलिसवाले जीप में ठूंसकर इन किसानों को जंतर मंतर पर ही पटकने के लिए चल दिए। बस तभी मौका पाकर चारों जीप से कूदे और कपड़े उतारकर नारेबाज़ी करने लगे। उस दिन तो उन्हें किसी तरह घेरकर जंतर मंतर ले आया गया लेकिन आज वही लोग चारों तरफ से थक हार कर अपना पेशाब पीकर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

इससे पहले वो नरमुंड लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। दिखावे के इस लोकतंत्र में किसानों का ये झुंड पूरे अहिंसक तरीके से प्रदर्शन कर रहा है लेकिन ना बेशर्म मंत्री के पास इनकी बात सुनने का वक्त है और ना ही उनके नेता के लिए ये ज़रूरी हैं। हां तमिलनाडु में चुनाव होता तो ये ही प्रधानसेवक इन किसानों के ही नाम पर रोने का ढोंग करके ‘मेरे किसान भाइयों को मत मारो’ कहकर हमदर्दी और वोट लूट लेता। आजकल वो सूरत में हीरे के कारखानों का उद्घाटन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा वक्त निकालकर गुजरात के बड़े पूंजीपतियों के पुराने अहसान चुका रहे हैं। उनके 5 स्टार हॉस्पिटल के फीते काट रहे हैं जिन्होंने पुराने वक्त में फंड देकर करियर बनाने में मदद की।

मोदी जुलाई में इज़रायल जाने के लिए सामान पैक करने में जुटे हैं लेकिन चंद किलोमीटर पर खुदकुशी से चार कदम दूर किसानों से मिलने का उनके पास ना वक्त है और ना मन। मुझे नहीं लगता कि किसानों के पेशाब पीने से भी कोई सरकार पिघलेगी। वैसे बता दूं कि कंगारुओं के पीएम ने हमारे पीएम के साथ पिकनिक मनाई और सेल्फी तो ली… लेकिन फिर अपने देश में पहुंचते ही वो वीज़ा खत्म कर डाले जिनके सहारे हिंदुस्तान से लाखों बेरोज़गार ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करते थे। समझ से परे है कि खुद को प्रधानसेवक (ये शब्द भी नेहरू से चुराया है) कहने वाला ये शख्स आखिर सेवक है किसका? क्या सिर्फ उनका जिनको ऑस्ट्रेलिया में ठेके दिलाने के लिए वो टर्नबुल को मेट्रो में घुमाकर पटा रहा था?

Arun Khare : तमिलनाडु के किसान कर्ज माफी की मांग को लेकर पिछले सैतीस दिन से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं आज 22 तारीख को इन किसानों ने सरकार की अनदेखी के विरोध में मूत्रपान कर देश के जनमानस को हिला दिया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली की सरकार आंख कान बंद कर अन्नदाता को विरोध के ऐसे तरीकों के लिए मजबूर कर रही है । सरकार की इस चुप्पी और किसानों से आज तक बात न करने की घोर निंदा की जानी चाहिए।

इसी के साथ उत्तर भारत के उन किसान संगठनों की भी कडी और घोर निंदा की जानी चाहिए जो अपने दक्षिण भारतीय किसानों के इस संघर्ष में चुप बैठे हुए हैं। कहां है दिल्ली को किसानों से भर देने वाले किसान संगठन? क्या उनके आंदोलन किसी राजनीतिक दलों के हित साधक होते थे ? यदि नही तो ये तथाकथित बडे किसान संगठन क्यों नहीं तमिलनाडु के किसानों के साथ खडे नजर नहीं आ रहे । देश भर के किसानों को आपने स्तर पर अपने अपने तहसील और जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर दक्षिण भारतीय किसानों की मांग का समर्थन करना चाहिए।

Priyamvada Samarpan : ”आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को?” हरिओम पवार जी के वीर रस की ये पंक्तियां उन्हें कैसे सोने देती होंगी? कविवर जंतर-मंतर पर से ऐसी ही हुंकार का वक्त है… अगर आप किसानों के साथ स्वर देंगे तो देश आपके साथ सुर मिलाएगा. सनद रहे अगर खामोश रह गए तो किसी भी मंच पर कोई बेबाक आईना दिखा देगा. कसम से तब नंगे नजर आएंगे. चुप्पी तोड़िए हुजूर.

Pankaj Chaturvedi : तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए, जिसमे प्रमुख सम्पूर्ण कर्जा माफी की है, के लिए गत 40 दिन से जतन कर रहे है। कभी आत्महत्या कर चुके किसानों के नर मुंड के साथ तो कभी नग्न हो कर। दिल्ली शहर नगर निगम पर कब्जे की जंग का कुरुक्षेत्र बना है और किसान का दर्द उसके लिए कोई मायने नही रखता। आज किसानों ने अपना ही मूत्र पिया और कल विष्ठा खाएंगे। मीडिया के लिए उसका महज फोटो जरूरी है। मेरी अपील है छात्रों, स्वयमसेवी संगठनों, युवाओं, लेखकों, पत्रकारों से कि वे इस प्रदर्शन को तमाशे के रूप में ना लें। उनके साथ खड़े हों। उनकी मांगों को समाज और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाएं और उन्हें मल खाने जैसा विरोध करने से रोकें। आज मूत्र पान की खबर के बाद मन व्यथित है। यकीन मानिए, लंच नही किया। सोचें कि आपका अन्न दाता पेशाब पी रहा है। घर से निकले। एक रविवार जंतर मंतर पर बिताए। उस नॉटंकी अन्ना और केजरी के पीछे तो बहुत भृमित हुए थे। इन किसानों में खुद को देखें।

पत्रकार नितिन ठाकुर, अरुण खरे, प्रियंवदा और पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

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किसानों की वायरल हुई ये दो तस्वीरें ‘मोदी गान’ में रत टीवी और अखबार वालों को न दिखेंगी न छपेंगी

Mahendra Mishra : ये तमिलनाडु के किसान हैं। दक्षिण भारत से दिल्ली पीएम मोदी के सामने अपनी फरियाद लेकर आये हैं। इनमें ज्यादातर के हाथों में ख़ुदकुशी कर चुके किसानों की खोपड़ियां हैं। बाकी ने हाथ में भीख का कटोरा ले रखा है। पुरुष नंगे बदन हैं और महिलाओं ने केवल पेटीकोट पहना हुआ है। इसके जरिये ये अपनी माली हालत बयान करना चाहते हैं। इन किसानों के इलाकों में 140 वर्षों बाद सबसे बड़ा सूखा पड़ा है।

ये किसान चाहते हैं कि उन्हें सूखे में खराब हुई फसलों का मुआवजा मिले। साथ ही उनके कर्जे माफ़ कर दिए जाएं। और बुजुर्गों के लिए सरकार पेंशन की व्यवस्था करे। पीएम आवास की तरफ मार्च कर रहे इन किसानों को पुलिस ने रास्ते में ही रोक दिया। और फिर इन्हें जंतर-मंतर पर लाकर पटक दिया। इनका कहना है कि अब ये लौटकर जाने से रहे। क्योंकि इनके पास वहां खाने के लिए कुछ नहीं बचा है। भले उन्हें यहां भीख ही क्यों न मांगनी पड़े ये यहीं रहेंगे।

देश के लोगों का पेट भरने वाले किसान के हाथ में अगर भीख का कटोरा आ गया है। तो यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि हालात किस कदर बदतर हो गए हैं। ऊपर से अपनी बदहाली दिखाने के लिए अगर उसे अपने परिजनों की कब्रें खोदकर उनकी खोपड़ियां हाथ में लेनी पड़े तो समझिए सरकारी संवेदना पाताल के किस हिस्से में पहुंच गई है। कहां तो हम दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहे हैं। लेकिन सामाने की हकीकत है कि उसे देखना ही नहीं चाहते। या फिर देखकर भी अनदेखा कर देना चाहते हैं।

महेंद्र मिश्रा सहारा समय, न्यूज एक्सप्रेस समेत कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं.


Satyendra PS : ये​ हरियाणा के किसान हैं,खेतों के लिए पानी मांग रहे थे। नहर का काम पूरा कराए जाने का वादा था वही पूरा कराना चाहते थे ! इस चेहरे में अपना चेहरा देखें, पिता, चाचा, भाई का चेहरा देखें। उन सबका चेहरा देखें जो सरकार से कुछ उम्मीद करते हैं, जो सरकार से कुछ छोटी मोटी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। लोकतंत्र लहूलुहान है। अपने रक्त में नहाया यह देश का किसान है!

सत्येंद्र प्रताप सिंह बिजनेस स्टैंडर्ड हिंदी अखबार के दिल्ली एडिशन में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं.


उपरोक्त तस्वीरों पर कुछ टिप्पणियां…

Anil Mishra पानी मांग रहे थे तो सिर्फ लाठी खाये। अगर सरकार इनकी जमीन मांगती तो गोली खाते। इसमें कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा का कोई लेना देना नहीं। यही परम्परा है। लोकतंत्र धोखा है। असल लड़ाई पूँजीवाद वर्सेस सर्वहारा है। गरीब को मार ही खाना है। सरकार किसी की भी हो।

Mahendra K. Singh लोग इस समय “राष्ट्रवाद” की अफीम खाकर मस्त हैं, वे इस तस्वीर में अपने पिता, चाचा, भाई का चेहरा तब तक नहीं देख पाएंगे जब तक उन के चाचा, पिता, भाई खुद इस जुल्म का शिकार न हो जाएँ। वैसे राष्ट्रभक्तों का यह मानना है कि खेती बारी आम लोगों के बस की बात नहीं है, इन लोगों को अपने खेत “राष्ट्रभक्त कॉर्पोरेट” जैसे अम्बानी और अडानियों को सौंप देने चाहिए, वे सेठ लोग फिर इन्ही गरीब लोगों को अपना मज़दूर बना कर उन्ही के खेतों में खेती करवाएंगे, फिर नफे-नुक्सान की कोई चिंता नहीं रह जायेगी, इन सब लोगों को एक निश्चित तनख्वाहें मिलेंगी और फिर सब खुश। अमेरिका में बड़ी-बड़ी कंपनियों ने यही किया, छोटे-छोटे किसानों के खेत खरीद लिए अब उन पर बड़े पैमाने पर खेती करवाते हैं – जैसे चिप्स बनाने वाली कंपनियां लाखों एकड़ बड़े खेतों में आलू के खेती, ब्रेड बनाने वाली कंपनियां ऐसे ही मीलों तक फैले खेतों में गेहूं की खेती। वही मॉडल भारत में लाकर मोदी जी देश का विकास करना चाहते हैं और इस किसान जैसे कुछ “राष्ट्रद्रोही” मोदी की योजना पर पानी फेरना चाहते हैं – कपार तो फूटना ही चाहिए ऐसे “राष्ट्रद्रोहियों” का।

Shaukat Ali Chechi मैं तहे दिल से लानत भेजता हूं ऐसी सरकारों पर अगर इस देश में ईमानदार है खून पसीने की खाता है गरीब है 70 परसेंट देश को चला रहा है देश की सरहदों की रक्षा करने में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जिनको सरकार के मंत्री कायर कहते हैं वह है किसान हमारे पूर्वजों ने नारा दिया था जय जवान जय किसान आज उनकी यह हालत उनकी दुर्गति उनका अपमान जो देश का भी पेट भरता है पशु पक्षियों का भी पेट भरता है उसके पैदा करे हुए माल से देश की पहचान व तरक्की है आखिर इनका कौन सा गुनाह है कोई देशवासी तो बताएं

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अमिताभ ने किसान चैनल से पैसे नहीं लिए तो करोड़ों रुपये कौन डकार गया?

Samarendra Singh : ‘किसान’ चैनल से पैसे नहीं लेकर अमिताभ बच्चन ने अपना मान बढ़ाया है. उनके जैसे किसी भी बड़े आदमी से इसी तरह के व्यवहार की उम्मीद की जाती है. अमिताभ बच्चन पहले से ही इतने ऊंचे मुकाम पर हैं कि वहां पहुंचना किसी फिल्मी सितारे के बस की बात नहीं. और आज इस फैसले से बिग बी का कद और अधिक बढ़ा है. अब यह पता चलना चाहिए कि बिग बी ने पैसे नहीं लिए तो लिंटास ने उनके नाम पर पैसे कैसे लिए?

अगर लिंटास और अमिताभ बच्चन के बीच रकम को लेकर कोई औपचारिक करार नहीं हुआ था तो दूरदर्शन ने इतनी बड़ी रकम, वो भी अमिताभ के खाते की रकम लिंटास को किस आधार पर दी? और लिंटास ने किस आधार पर यह राशि स्वीकार की? सवाल यह भी है कि वो दूरदर्शन जो कार्यक्रम बनाने वाली कंपनियों और छोटे प्रोड्यूसरों को एक-डेढ़ लाख रुपये के भुगतान में महीनों लगाता है… उस दूरदर्शन ने इतनी बड़ी रकम पहले ही कैसे जारी कर दी?

अमिताभ बच्चन का योगदान एक कलाकार की हैसियत से बहुत बड़ा है. समाज और देश के व्यापक मायने होते हैं और सिनेमा इसी समाज और देश का हिस्सा है. भारतीय सिनेमा में अमिताभ का योगदान बहुत ज्यादा है. देश के असंख्य सपनों को उन्होंने विस्तार दिया है. यही वजह है कि हम अमिताभ से एक कलाकार से अधिक की उम्मीद करते हैं. यह उम्मीद करते हैं कि सिनेमा का यह महानायक सिनेमा से बाहर निकल कर कुछ अतिरिक्त योगदान देगा. अतिरिक्त की यह उम्मीद बहुत से लोगों को अमिताभ को लीजेंड मानने से मना करती है. यह उनकी सोच की व्यापकता है और ऐसा सोचने का उन्हें हक है. लेकिन जब देश में ज्यादातर अहम पदों पर बैठे लोग (नेता, अफसर और न्यायाधीश) अपनी तय भूमिका भी सही से नहीं निभा रहे हों वहां अमिताभ को हर बार उन्हीं अतिरिक्त उम्मीदों के आधार पर तोला जाए यह सही नहीं है. वैसे हमारे तोलने और नहीं तोलने से कोई लीजेंड आम नहीं हो जाएगा. अमिताभ बतौर कलाकार एक लीजेंड हैं और रहेंगे. वहां तक पहुंचने में दूसरे अभिनेताओं को जमाना लगेगा.

आखिर में. यह देश किसी तरह मैनेज हो रहा है. अब देखिये मानसून सत्र चल रहा है और संसद मैनेज हो रही है. न्यायाधीश मैनेज हो रहे हैं. गौर से देखिये तो कितना कुछ मैनेज हो रहा है. लगता है सबकुछ मैनेज ही हो रहा है…

एनडीटीवी में काम कर चुके तेजतर्रार पत्रकार समरेंद्र सिंह के फेसबुक वॉल से.

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दूरदर्शन का किसान चैनल लॉन्च

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को पूरी तरह कृषि क्षेत्र को समर्पित दूरदर्शन का किसान चैनल लॉन्च किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा – हमारे यहां कहावत थी उत्तम खेती, मध्यम बान, निषिध चाकरी भीख निदान। इस कहावत को एक बार फिर सच कर दिखाने की जरूरत है। 24 घंटे चलने वाला यह चैनल किसानों के हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

विज्ञान भवन में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि, जैसे खेल के चैनलों से खेलों में रुचि बढ़ी, उसी प्रकार किसान चैनल से किसानों को फायदा होगा। किसान चैनल पर कृषि संबंधी जानकारी के साथ साथ मंडियों के भावों , वायदा बाजार और मौसम से जुड़ी जानकारी प्रसारित की जायेगी। चैनल पर विशेषज्ञों की मदद से किसानों को फसलों के वैकल्पिक पैटर्न तथा पशु पालन के बारे में भी बताया जायेगा। सरकार की बेटी बचाओं– बेटी पढ़ाओ– और स्वच्छ भारत जैसी योजनाओं के बारे में भी चैनल पर कार्यक्रम प्रसारित किये जायेंगे।

प्रधानमंत्री ने कहा कि इस चैनल के लांचिंग पर कई लोगों को लग रहा होगा कि इतने चैनल तो हैं ही फिर इस चैनल का क्या फायदा, लेकिन सच्चाई यह है कि चैनल का फायदा है। आज हमारे देश में कई स्पोर्ट्स चैनल हैं, जिसके कारण युवाओं की रुचि विभिन्न खेलों में बढ़ रही है. वे अब खेल को कैरियर के रूप में अपनाने लगे हैं. स्पोर्ट्स चैनल का बड़ा फायदा मिला है, क्योंकि यह एक बड़ी अर्थव्यवस्था को जन्म दे चुका है। अगर देश को आगे ले जाना है, तो गांवों को आगे लाना होगा और अगर गांव को आगे ले जाना है , तो किसानों को आगे लाना होगा। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने किसानों का स्वाभिमान जगाया था और जय जवान और जय किसान का नारा दिया था। 

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राज ठाकरे ने इतनी सक्रियता विदर्भ में खुदखुशी कर रहे किसानों के लिए नहीं दिखाई

मनसे राज ठाकरे का राजनीतिक वजूद ख़त्म हो चुका है। राज ठाकरे का राजनीतिक भविष्य अधर में अटका है। मनसे चीफ ने जनसरोकार से जुड़े मुद्दो को कभी उठाते नहीं। नफरत की राजनीति करना यही उनका मूल एजेंडा रहा है। राज ठाकरे की छवि एक पेज – ३ नेता जैसी है। 

सलमान खान बॉलीवुड के सुपरस्टार है। बेशक वो बेहतर एक्टर है। बॉलीवुड में उनके योगदान को कोई नकारता भी नहीं। किन्तु हिट एंड रन में सेशन कोर्ट द्वारा उन्हें सजा सुनाई गई है। इसीलिए कानून की नजर में वो मुजरिम है। बॉलीवुड और उनके फेन्स के नजरिये से वो सुपरस्टार है।  बॉलीवुड इंडस्ट्री एवं फेन्स  का सलमान खान के बारे में सॉफ्ट कॉर्नर रखना समझ में आता है। प्रशंसक रहना या फेन्स रहना एक अलग बात है। 

मैं भी सलमान खान के एक्टिंग का प्रशंसक हु। राज ठाकरे एक राजनीतिक पार्टी के मुखिया हैं। आम सरोकार, मराठी माणूस और महाराष्ट्र विकास की लम्बी लम्बी बातें अपने भाषणों में करते हैं। कल राज ठाकरे सलमान खान के घर गैलक्सी अपार्टमेंट में मिलने गए। राज ठाकरे ने जितनी हड़बड़ी सलमान खान को मिलने में दिखाई, उतनी हड़बड़ी कभी विदर्भ में खुदखुशी कर रहे किसानों पर नहीं  दिखाई। बड़ा सवाल है, राज ठाकरे पेज – ०३ वालों के नेता हैं या आम जनता के ?

लेखक सुजीत ठमके से ई-मेल संपर्क : sthamke35@gmail.com

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दूरदर्शन के किसान चैनल में एडवाइजर (प्रोग्राम एंड प्रोडक्शन) बने आलोक रंजन

वरिष्ठ पत्रकार और पत्रकारिता जगत में 25 साल के अनुभव को देखते हुए आलोक रंजन को दूरदर्शन के किसान चैनल में एडवाइजर (प्रोग्राम एंड प्रोडक्शन) के तौर पर नियुक्त किया गया है। एक मई यानी शुक्रवार से उन्होंने अपना कार्यभार भी संभाल लिया है। 90 के दशक में आलोक रंजन ने लोकमत में सब एडिटर के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। उसके बाद दूरदर्शन (फर्स्ट एडिशन, मेट्रो न्यूज) से जुड़े रहे, अलग-अलग कार्यकर्मों के जरिए।

1996 में जी न्यूज के कोर टीम से जुड़े। आज के जी न्यूज की कल्पना जब 20 साल पहले की जा रही थी तो आलोक रंजन भी उस टीम में थे। छह साल तक जी न्यूज को शुरुआती दिनों में खड़ा करने में आलोक रंजन के योगदान को कोई भूल नहीं सकता। 6 साल काम करने के बाद सहारा से जुड़े। 2003 में जब सहारा (एसाइनमेंट हेड) से जुड़े तो उन्होंने सहारा को बड़े चैनलों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया था। 12 साल तक महत्वपूर्ण दायित्व निभाने के बाद अब आलोक रंजन किसान चैनल से जुड़ गए हैं।

किसानों के लिए मोदी सरकार ने किसान चैनल की शुरुआत की और आलोक रंजन इस चैनल में कार्यक्रमों की गुणवत्ता को निखारने का काम करेंगे। प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया में अनेक शीर्ष पदों पर उनका लंबा अनुभव रहा है। अब किसान टीवी में एडवाइजर (प्रोग्राम एंड प्रोडक्शन) के तौर पर अपना दायित्व निभाएंगे।

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दूरदर्शन में किसान चैनल के संपादकीय सलाहकार बने कुमार आनंद

देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार कुमार आनंद ने भारतीय दूरदर्शन के किसान चैनल में संपादकीय सलाहकार (एडिटोरियल कंसल्टेंट) के पद पर ज्वॉइन किया है। इससे पहले प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अनेक शीर्ष पदों पर उनका लंबा अनुभव रहा है। 

कुमार आनंद ने प्रारंभ में हिंदी दैनिक ‘जनसत्ता’ में सब-एडिटर के रूप में कार्य प्रारंभ कर 13 वर्षों तक ब्यूरो चीफ तक का दायित्व संभाला। उसके बाद कुमार आनंद ने अपने अनुभव संपन्न करियर में कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वह देश के प्रमुख अंग्रेजी अखबार ‘पायनियर’ में पॉलिटिकल करेस्पॉन्डेंट, न्यूज चैनल ‘सहारा समय’ में चार साल तक  कार्यपालक संपादक (एक्सक्यूटिव एडिटर), दैनिक हिंदुस्तान में समन्वय संपादक, ‘नेशनल दुनिया’ में ग्रुप एडिटर एवं प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) में भी छह वर्षों तक महत्वपूर्ण दायित्व निभाते रहे हैं।

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गुस्से में किसान : 20 को देशव्यापी विरोध, पांच मई को संसद पर प्रदर्शन, 14 मई को रेल-सड़क रोकेंगे, जेलें भरेंगे

उत्तर प्रदेश किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष कामरेड इम्तेयाज बेग ने कहा कि पूरे देश में ख़ास तौर से उत्तरी भारत में असामायिक वर्षा, ओले, आंधी और बाढ़ के चलते हजारो किसानों के मरने के साथ ही लगभग 20 से 30 हजार करोड़ की रवि की फसलो की बर्बादी के बाद भी केंद्र व प्रदेश सरकारों के अगुवा कुम्भकर्णी नीद में पड़े हैं। किसानो की कोई चिंता नहीं। आईएएस लॉबी किसानों की मौत को स्वाभाविक बता रही है। बीमा कम्पनियां और बैंक किसानों से पैसा लेकर फसल बीमा नहीं करते हैं। केंद्र और प्रदेश सरकारें किसानो की बर्बादी पर राहत के नाम पर मुआवजा पहले नौ हजार रुपये प्रति हेक्टेयर, अब बढ़ाकर साढ़े तेरह हजार रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया है। यह किसानों के साथ सरकारों का क्रूर मजाक है, क्योकि एक बिस्से की पूरी फसल बर्बाद होने पर 142 रूपये या पचास फीसदी बर्बाद होने पर 71 रूपये का चेक मिल रहा है, क्या यह किसानों के साथ खिलवाड़ नहीं है, सरकार बताये ?

प्रदेश और देश की दोनों सरकारे साम्राज्यवाद के दबाव में काम कर रही हैं और वह चाहती हैं कि किसानों को इतना जलील और परेशान कर दिया जाए कि वह अपनी खेती व अपनी मातृभूमि को कौड़ी के दाम बेचकर निराश्रित मजदूर बन जाएं क्योंकि सरकारों की मंशा यही है कि वो पूंजीपतियों और कारपोरेट सेक्टर को सस्ता और कुशल मजदूर मुहैया करा सकें। इसके पीछे की हकीकत यह है की इन कारपोरेट सेक्टरों में इन बड़े नताओ का भरपूर पैसा लगा हुआ है और इन पैसो की देखभाल करने वाले इनके नाते रिश्तेदार हैं। 

अगर आप वर्तमान परिदृश्य को देखें तो पायेंगे की सत्ता शासन में बैठे मंत्री संतरी व ब्यूरोक्रेट्स आम – आवाम के हक़ हुकूक के हिस्से काटकर बड़े कारपोरेट घरानों को दे रहे हैं। अगर सरकारें समय रहते खेती और किसानी पर विशेष ध्यान नहीं देतीं तो देश के अन्दर ”मरता क्या न करता ” वाली कहावत चरितार्थ होती नजर आएगी। देश में गृह युद्ध जैसे आसार दिखाई दे रहे हैं। जिस किसान की खेती जबरदस्ती विवश करके उससे हथियायी जाएगी, वो मजबूर होकर हथियार उठाने को विवश होगा। यह स्थितियां बड़े पैमाने पर उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वोत्तर उड़ीसा, पंजाब तक बनायी जा रही हैं। 

उत्तर प्रदेश किसान सभा प्रदेश और देश की सरकार से मांग कर रही है कि किसानों की बर्बाद हुई फसलों का मुआवजा प्रति एकड़ 15 हजार रुपये दिया जाए। किसानों के सभी कर्जे सहकारी व सरकारी बैंकों के माफ़ किये जाएं। उनके बिजली के बिल माफ़ किए जाएं। खरीफ की फसल के लिए खाद और बीज मुफ्त दिए जाएं। अगर ऐसा सरकार नहीं करती है तो बीस अप्रैल को पूरे देश के जिला मुख्यालयों पर धरना प्रदर्शन कर जिलाधिकारी के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति को मांगपत्र दिया जाएगा पांच मई को अखिल भारतीय किसान सभा संसद पर प्रदर्शन करेगी। उस पर भी अगर किसानों की मांग नहीं मानी गयी तो 14 मई को 2015 को पूरे देश में रेल रोको, सड़क रोको, जेल भरो आन्दोलन चलाया जाएगा |

कबीर के फेसबुक वॉल से

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स्थायी समाधान नहीं है कर्ज और माफ़ी

यह बड़े दुख की बात है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश के किसान लगातार आत्महत्या की ओर प्रवृत हो रहे हैं. आश्चर्य की बात तो यह कि पिछली सरकार के कृषिमंत्री यह कहते रहे कि उन्हें यह  नहीं मालूम कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 31 मार्च 2013 तक के आंकड़े बताते हैं कि 1995 से अब तक 2,96 438 किसानों ने आत्महत्या की है. 2014 में किसानों की आत्महत्या का ब्यौरा जून महीने तक ज्ञात हो सकेगा. जानकार इस सरकारी आकंडे को काफी कम कर आंका गया बताते हैं.

यह देखा गया है कि गत एक वर्ष  में अधिकांश फसलों की क़ीमतों में भारी गिरावट दर्ज की गई. नतीजतन किसानों की आय कम हुई है. वहीं उनकी आमदनी में इज़ाफ़ा होने वाला कोई बड़ा क़दम सरकार ने नहीं उठाया. एक साल के भीतर ही किसानों को दो -दो प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ा. कमज़ोर मॉनसून के चलते खरीफ़ का उत्पादन गिरा, वहीं फ़रवरी से लेकर अप्रैल के पहले सप्ताह तक जिस तरह बेमौसम की बारिश, ओले और तेज़ हवाओं ने किसानों की तैयार फसलों को बर्बाद किया उसका झटका किसान नहीं झेल पाए. इस प्राकृतिक आपदा के बाद राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में जिस तरह से किसानों ने आत्महत्याएं कीं, उससे साफ़ है कि आर्थिक रूप से उनका बहुत कुछ दांव पर लगा था जो बर्बाद हो गया. जहाँ पहले देश में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र से ही आती थीं, वहीं अब इसमें चौतरफा विस्तार हुआ है. इनमें बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाक़े ही नहीं, बल्कि देश की हरित क्रांति की कामयाबी में अहम भूमिका वाले हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य भी शामिल हो गए हैं.

औद्योगिक और कृषि विकास के आंकड़ों में रिकॉर्ड बनाने वाले संपन्न गुजरात के क्षेत्र भी शामिल हैं क्योंकि वहां किसानों ने दूध को आय का एक मज़बूत स्रोत बना लिया था. लेकिन अब वहां हालात बदल गए हैं. फसल बर्बाद होने के कारण हो रहे भारी नुकसान से किसान की बढ़ती हताशा उसे आत्महत्या की ओर ले जा रही है. इस तरह की आपदा के बाद किसानों को राहत के लिए दशकों पुरानी व्यवस्था और मानदंड ही जारी हैं. अक़्सर सूखे का सामना करने वाले राजस्थान में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें प्रायः नहीं आती थीँ. राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान भी अब आत्महत्या जैसे घातक क़दम उठा रहे हैं. पर क्यों? सीधा जवाब यह है कि खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है. इस देश की सरकार ने इस व्यवस्था को व्यवहारिक बनाने और वित्तीय राहत प्रक्रिया को तय समयसीमा में करने के लिए कभी उचित क़दम नहीं उठाए. कृषि प्रधान देश की सरकार जो विकास के नाम पर एक औद्योगिक ढांचा खड़ा करने को प्राथमिकता बना चुकी  है. किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रहीं आत्महत्याओं के कारणों की वजहें  जानना सरकार आवश्यक नहीं समझती।

क़रीब पांच साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में कुछ केस स्टडीज के आधार पर किसान आत्महत्याओं की वजह जानने की कोशिश की थी. इसमें सबसे बड़ी वजह किसानों पर बढ़ता कर्ज़ और उनकी छोटी होती जोत बताई गई. इसके साथ ही मंडियों में बैठे साहूकारों द्वारा वसूली जाने वाली ब्याज की ऊंची दरें बताई गई थीं. लेकिन यह रिपोर्ट भी सरकारी दफ़्तरों में दबकर रह गई. दूसरी ओर, अब भी सरकार के साढ़े आठ लाख करोड़ रुपए के कृषि कर्ज़ के बजटीय लक्ष्य के बावजूद आधे से ज्यादा किसान साहूकारों और आढ़तियों से कर्ज़ लेने को मजबूर हैं. ये किसानों के लिए घातक साबित होता है. राजनीतिक पार्टियों द्वारा किसानों को ज़्यादा कर्ज़ की वकालत करने और कर्ज़ माफ़ी की बात उठना भी किसानों के बढ़ते संकट का एक बहुत बड़ा कारण है. एक ओर कर्ज के बोझ से किसान दबा जा रहा है दूसरी ओर कर्ज माफी की उम्मीद में निराशा से. लेकिन यह कोई स्थायी उपाय नहीं है. अगर ऐसा होता तो 2008 की साठ हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद किसान आत्महत्याएं बंद हो जातीं. इसलिए इसका उपाय किसान की आय बढ़ाने में है न कि कर्ज़ माफ़ी. अब प्रधानमंत्री ने बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि से प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए दो घोषणाएं की हैं. उन्होंने कहा कि लागत सब्सिडी पाने के लिए पहले किसानों की 50 फ़ीसद या उससे अधिक फसल का बर्बाद होना ज़रूरी था. अब इस मानक को घटाकर 33 फ़ीसद कर दिया गया है.

क्या यह पर्याप्त है ? असल में खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों की गिरती क़ीमत किसानों की निराशा की सबसे बड़ी वजह है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे इलाक़ों में किसानों की लागत में बहुत तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. इसमें सबसे अधिक बढ़ोतरी सिंचाई सुविधाओं पर होने वाले ख़र्च में हुई है. भूजल स्तर में भारी गिरावट के चलते ब्लैक स्पॉट में शुमार इन इलाक़ों में बोरवेल की लागत कई गुना बढ़ गई है और इसके लिए कर्ज़ का आकार बढ़ रहा है. तेलंगाना में जब आत्महत्या के आंकड़े बढ़े तो बोरवैल पर कर्ज़ इनकी बड़ी वजह थी. नीचे गिरते जल स्तर के चलते वहां बोरवैल पर प्रतिबंध लग गया था और इसके लिए बैंकों से कर्ज़ नहीं मिलने से किसान साहूकारों के पास जा रहे थे. पिछले साल उत्तर प्रदेश से किसानों की आत्महत्यों की खबरें आई तो उसकी वजह वहां किसानों का चीनी मिलों पर हज़ारों करोड़ रुपए का बकाया था.

उसके बाद हालात और बदतर हुए हैं.अभी भी उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर किसानों का करीब आठ हज़ार करोड़ रुपए का बकाया है. बड़ी तादाद में ऐसे किसान हैं जिनकी जोत दो एकड़ या इससे भी कम है, लेकिन उनको दो साल से गन्ना मूल्य का आंशिक भुगतान ही हो सका है. चीनी पर किसानों के फ़र्स्ट चार्ज के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ जब चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट गईं थीं तो सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के पक्ष में फ़ैसला दिया था. जबकि भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल बैंकों के पक्ष में खड़े थे. इस तरह के उदाहरण सरकार की मंशा ज़ाहिर करते हैं कि वह किसान के साथ नहीं खड़ी है. यही वे संदेश होते हैं जो किसान की उम्मीद तोड़ते हैं. सरकार   किसानों को आश्वस्त नहीं कर पा रही है. भूमि अधिग्रहण विधेयक लाने के बाद से स्थितियां बदतर हुई हैं. इसके पक्ष में सरकार भले ही कितनी भी सफाई क्यों न दे किसान भरोसा नहीं कर पा रहा है. अतः उसका विश्वास अर्जित करने के लिए कर्ज देना और माफ करना ही पर्याप्त उपचार नहीं है बल्कि इसका वास्तविक और ठोस खाका बनाकर किसान की आय स्थायी रूप से बढ़ाने के लिए शीघ्र समुचित प्रयास किए जाने की जरुरत है. लेकिन अब तक तो ऐसा लग रहा है कि सरकार इस दिशा में कुछ सोच नहीं रही है.

शैलेंद्र चौहान

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किसानों और महिलाओं की चीख को दबाना चाहता है यूपी का शासन-प्रशासन

उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का नारा देने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में ठीक विपरीत परिणाम आता नजर आ रहा है। अपराध और भ्रष्टाचार के बिन्दुओं पर तुलना की जाये, तो आज उत्तर प्रदेश बिहार से ज्यादा बदनाम नजर आ रहा है। कानून व्यवस्था को लेकर हालात इतने दयनीय हो चले हैं कि आम आदमी को कोई सांत्वना तक देने वाला नजर नहीं आ रहा, लेकिन खास लोगों के अहंकार को ठेस न पहुंचे, इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है। 

फेसबुक की मामूली पोस्ट को लेकर इतने बड़े स्तर पर कार्रवाई की जाती है कि उच्चतम न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा- 66(ए) समाप्त करना ही उचित समझा, इसके बावजूद सरकार की कार्यप्रणाली में कोई अंतर आता नजर नहीं आ रहा। प्रदेश के अधिकाँश जिलों के हालात लगभग एक समान ही हैं। यौन शोषण, हत्या, लूट, राहजनी जैसी जघन्यतम वारदातों को लेकर प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में आम आदमी दहशत में हैं। बारिश और तेज हवाओं के प्रकोप से प्रदेश के किसान तबाह हो चुके हैं और लगातार आत्म हत्या कर रहे हैं। महिलायें घर के दरवाजे से बाहर कदम रखने से डरने लगी हैं। एसिड अटैक के मामलों में उत्तर प्रदेश का देश में पहला नंबर है, यहाँ वर्ष- 2014 में 185 बेकसूर महिलायें एसिड अटैक का शिकार हो चुकी हैं। बाल शोषण की भी ऐसी ही स्थिति है, अर्थात प्रदेश का हर वर्ग पूरी तरह त्रस्त नजर आ रहा है, लेकिन दबंग, माफिया व अपराधी मस्त नजर आ रहे हैं, वहीं सरकार खेल में व्यस्त है।

आयोजन सरकारी नहीं है, फिर भी सरकार राजधानी लखनऊ में चल रहे इंडियन ग्रामीण क्रिकेट लीग (आईजीसीएल) को बड़ी उपलब्धि मान रही है, जबकि सवाल यह है कि जीवन रहेगा, तभी तो कोई विकास करेगा? हाल-फिलहाल प्रदेश के हालत ऐसे हैं कि यहाँ लोगों का जीवन ही दांव पर लगा हुआ है, जिसे बचाने को सरकार को जैसे प्रयास करने चाहिए, वैसे प्रयास करती सरकार नजर नहीं आ रही।

असलियत में सरकार को जनता के हितों और उसकी भावनाओं से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। प्रदेश जब दंगों की आग में झुलस रहा था और प्रदेश के साथ समूचे देश में आलोचना हो रही थी, तब भी सब कुछ नजर अंदाज़ करते हुए सरकार सैफई महोत्सव का आनंद लेती नजर आ रही थी, इसलिए इंडियन ग्रामीण क्रिकेट लीग (आईजीसीएल) में व्यस्तता पर आश्चर्य नहीं होता, लेकिन स्तब्ध कर देने वाली बात यह है कि सरकार की राह पर ही प्रशासन भी चल पड़ा है। बदायूं में हाहाकार मचा हुआ है और बदायूं का जिला प्रशासन बदायूं महोत्सव आयोजित कर शोषित वर्ग की चीखों को दबाने का प्रयास करता नजर आ रहा है।

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनके परिजन इटावा के बाद बदायूं जिले को अपना दूसरा घर मानते हैं। मुलायम सिंह यादव सहसवान व गुन्नौर विधान सभा क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं। वे व प्रो. रामगोपाल यादव संभल लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रह चुके हैं। वर्तमान में बदायूं लोकसभा क्षेत्र से उनके भतीजे धर्मेन्द्र यादव सांसद हैं, उन्होंने 11 अप्रैल को जिला प्रशासन द्वारा आयोजित तीन दिवसीय बदायूं महोत्सव का दीप प्रज्ज्वलित कर शुभारंभ किया। इससे पहले शासन-प्रशासन की मदद से अफसरों और कर्मचारियों के साथ जिले भर के धनपतियों, माफियाओं और व्यापारियों से बड़े स्तर पर उगाही की गई। विभिन्न सरकारी मदों और उगाही से मिले धन से खेल-कूद, कुश्ती, निशानेबाजी, रंगोली, साईकिल मैराथन, मुशायरा, कवि सम्मेलन और म्यूजिकल नाइट के नाम पर चंद लोग तीन दिन जमकर मस्ती करेंगे।

हालाँकि महोत्सव को प्रशासन साहित्यिक आयोजन करार देता है, लेकिन महोत्सव में शकील बदायूंनी का जिक्र तक नहीं किया जाता, जबकि दुनिया के तमाम देशों में बदायूं को विश्व प्रसिद्ध गीतकार शकील के कारण जाना जाता है, इसी तरह शौकत अली फानी का भी कोई नाम नहीं लेता और हाल ही के वर्षों में शरीर त्यागने वाले विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ब्रजेन्द्र अवस्थी के नाम तक का कोई उल्लेख नहीं करता, ऐसे में बदायूं महोत्सव को साहित्यिक आयोजन कैसे कहा जा सकता है?

बदायूं जिले के हालातों की बात करें, तो बदायूं जिला उत्तर प्रदेश के उन जिलों में शीर्ष पर है, जिन जिलों में कानून व्यवस्था की स्थिति सर्वाधिक दयनीय है। कटरा सआदतगंज कांड के चलते देश को विश्व पटल पर शर्मसार होना पड़ा था, इसी तरह थाना मूसाझाग और कोतवाली उझानी परिसर में सिपाहियों द्वारा किशोरियों के साथ की गई यौन उत्पीड़न की वारदातों से भी प्रदेश की छवि खराब हो चुकी है, इन चर्चित घटनाओं के अलावा बदायूं जिले में हर दिन किसी न किसी क्षेत्र में जघन्यतम वारदात घटित होती ही रहती है। चार दिन पूर्व हुई वारदात के चलते तो जिले भर के लोग दहशत में हैं। बदायूं शहर के मोहल्ला ब्राह्मपुर में रहने वाले सेवानिवृत अभियंता वीके गुप्ता (72) और उनकी पत्नी शन्नो देवी (68) के 8 अप्रैल की रात में उनके घर में शव बरामद हुए थे। पति-पत्नी घर में अकेले रहते थे और दोनों को चाकू व रॉड से गोद कर मार दिया गया, जिसका खुलासा पुलिस अभी तक नहीं कर पाई है, जबकि मृतक चर्चित मुकुल हत्या कांड में वादी थे।

बता दें कि 30 जून 2007 को बरेली में एएसपी के पद पर तैनात प्रशिक्षु जे. रवीन्द्र गौड़ के नेतृत्व में बरेली जिले के फतेहगंज पश्चिमी क्षेत्र में एक मुठभेड़ हुई, जिसमें बदायूं निवासी एक युवा मुकुल गुप्ता को मार दिया गया था। पुलिस ने उसे खूंखार अपराधी बताया था, जबकि मुकुल बरेली में साधारण कम्प्यूटर ऑपरेटर था। पुलिस की कहानी को वीके गुप्ता ने झूठा बताया था और उन्होंने अदालत में प्रार्थना पत्र देकर मुठभेड़ करने वाले पुलिस कर्मियों के विरुद्ध एफआईआर लिखाने की गुहार लगाई थी, जिस पर अदालत ने मुकदमा लिखने का आदेश दे दिया, लेकिन पुलिस ने मुदकमे में फाइनल रिपोर्ट लगा दी थी, इसके बाद बदायूं शहर के उस वक्त के विधायक महेश चंद्र गुप्ता ने इस मामले को विधान सभा में उठाया था, जिस पर शासन ने सीबीसीआईडी जांच कराने के आदेश दे दिए थे, पर सीबीसीआईडी जांच में भी कुछ नहीं हुआ। हार कर बुजर्ग वीके गुप्ता ने हाईकोर्ट का सहारा लिया था और 26 फरवरी 2010 को हाईकोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच करने के आदेश दिए थे।

सीबीआई ने इस मामले में आईपीएस जे. रविन्द्र गौड़ के साथ दस आरोपी बनाये और जे. रविन्द्र गौड़ के विरुद्ध सुबूत जुटा कर शासन से अभियोजन की अनुमति मांगी, लेकिन शासन ने अनुमति नहीं दी है। मृतक अपने बेटे को न्याय दिलाने की जंग लड़ रहे थे, लेकिन स्थानीय प्रशासन न उनकी सुरक्षा कर सका और न ही अब तक उनके हत्यारों को खोज पाया है।

बारिश और तेज हवाओं ने समूचे प्रदेश में कहर बरपाया है, लेकिन सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में बदायूं जिला शीर्ष पर है, यहाँ अब तक दस से अधिक किसान आत्म हत्या कर चुके हैं, जिनके आश्रित जड़वत नजर आ रहे हैं। बर्बाद किसानों के परिवारों में कोहराम मचा हुआ है, उनकी आँखों का पानी सूख चुका है और शरीर में इतनी शक्ति नहीं बची है कि मुंह से आह भी निकल सके, उनकी हालत देख कर हर आँख नम है, लेकिन जिला प्रशासन इतना अमानवीय हो चला है कि उन्हें सांत्वना देने की जगह जश्न मना रहा है।

बी.पी. गौतम, स्वतंत्र पत्रकार

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अलवर के किसानों को रोड पर लाने की शुरुआत!

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अलवर में जापानी कम्पनी को 500 एकड़ जमीन देंगी। क्यों? क्योंकि इस जमीन में जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित होगा! इसमें सैरेमिक्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फॉक्स होगा। लेकिन सरकार को यह भी बतलाना चाहिए कि क्या उक्त निर्णय/घोषणा से पूर्व इस तथ्य का आकलन किया गया है कि इस कारण कितने किसान हमेशा को बेरोजगार हो जाएंगे?

यदि ऐसा नहीं तो क्यों नहीं किया गया? जिन किसानों की बेसकीमती उपजाऊ जमीन जापानी कम्पनी/कार्पोरेट को दी जाएगी, उनके स्थाई पुनर्वास की क्या कोई जमीनी योजना है या नहीं? इस बारे में राजस्थान सरकार को खुलासा करना होगा। स्थानीय किसान नेता होने का दावा करने वाले वर्तमान, निवर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों को इस बारे में सजग होकर सामने आना होगा। अन्यथा केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून (काले कानून) की आड़ में अगले चार सालों में न जाने कितने किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर किया जाएगा? जो भी पाठक सरकार की इस मनमानी को शोषण, अन्याय और अत्याचार मानते हैं, अपने विचार जरूर लिखें। 

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक़ रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन

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फसल ऊपरवाला ले गया, नौकरी अखिलेश और जमीन मोदी

सात रुपये का चेक। किसी किसान को मुआवजे के तौर पर अगर सात रुपये का चेक मिले तो वह क्या करेगा। 18 मार्च को परी ने जन्म लिया। अस्पताल से 3 अप्रैल को परी घर आई। हर कोई खुश । शाम में पोती के होने के जश्न का न्योता हर किसी को। लेकिन शाम में फसल देखने गये परी के दादा रणधीर सिंह की मौत की खबर खेत से आ गई। समूचा घर सन्नाटे में। तीन दिन पहले 45 बरस के सत्येन्द्र की मौत बर्बाद फसल के बाद मुआवजा चुकाये कैसे। आगे पूरा साल घर चलायेंगे कैसे। यह सोच कर सत्येन्द्र मर गया तो बेटा अब पुलिस भर्ती की कतार में जा कर बैठ गया।

यह सच बागपत के छपरौली के है। जहां से किसानी करते हुये चौधरी चरण सिंह देश के पीएम बन गये और किसान दिवस के तौर पर देश चरण सिंह के ही जन्मदिन को मनाता है। लेकिन किसान का हितैषी बनने का जो सियासी खेल दिल्ली में शुरु हुआ है और तमाम राज्यों के सीएम अब किसानों के हक में खड़े होने का प्रलाप कर रहे है, उसकी हकीकत किसानों के घर जाकर ही समझा जा सकती है। खासकर बागपत। वही बागपत जो चरण सिंह की राजनीतिक प्रयोगशाला भी रही और किसान के हक में आजादी से पहले खड़े होकर संघर्ष करने की जमीन भी। 1942 में पहली बार छपरौली के दासा दगांव में किसानो के हक के लिये संघर्ष करते चरण सिंह को गिरफ्तार करने अग्रेजों की पुलिस पहुंची थी। तब सवाल लगान और खेती की जमीन ना देने का था। दासा गांव के बडे बुजुर्ग आज भी 1942 को यादकर यह कहने से नहीं चूकते कि तब उन्होंने चौधरी साहब को गिरफ्तार होने नहीं दिया था। और उसके बाद किसी ने उनकी जमीन पर अंगुली नहीं उठायी। क्योंकि छपरौली का मतलब ही चौधरी चरण सिंह था। जहां खेती के लिये सिंचाई का सवाल उठता रहा। जहां खाद के कारखाने को लगाने की बात उठी। जहां मुआवजे को लेकर किसान को हाथ फैलाने की जरुरत न पड़ी। लेकिन हालात कैसे किस तरह बदलते गये कि पहली बार खुशहाल गांव के भीतर मरघट सी खामोशी हर किसी को डराने लगी है। 

खामपुर गांव हो या धनौरा गांव या फिर रहतना गांव या जानी गांव। कही भी चले जाइये किसी के घर का भी सांकल खटखटा दीजिये और नाम ले लिजिये चौधरी चरण सिंह का। और उसके बाद सिर्फ यह सवाल खड़ा कर दीजिये कि चौधरी होते तो अब क्या कर लेते । सारे सवालों के जबाब बच्चो से लेकर बडे बुजुर्ग तक बिना सांस रोके लगातार देने लगेंगे। और यह सवाल छोटा पड़ जायेगा कि किसानों के लिये सरकार करें क्या जिससे किसान को राहत मिल जाये। किसान को अपनी फसल की कीमत तय करने का अधिकार होना चाहिये। खेती की जमीन पर क्रंकीट खड़ा करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करना चाहिये। खेतीहर किसान परिवारो के बच्चों के लिये शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिये। समर्थन मूल्य का आकलन फसल की बाजार की कीमत से तय होना चाहिये। लेकिन सच है क्या । गन्ना किसानों के घर में मिल मालिकों की दी हुई पर्चियों के बंडल हैं। जिसमें लिखा है कि इतना गन्ना दिया गया। इतने पैसों का भुगतान होगा। कब होगा , कोई नहीं जानता। अब चीनी मिल ने गन्ने की एवज में रुपया देने के बदले पचास फीसदी रकम की चीनी बांटनी शुरु कर दी है। ले जाइये तो ठीक नहीं तो चीनी रखने का किराया भी गन्ना किसान की रकम से कट जायेगा। धान कल तक यूपी से हरियाणा जा सकता था। लेकिन हरियाण में सत्ता बदली है तो अब धान भी हरियाणा की मंडी में यूपी का किसान वही ले जा सकता है। 

और धान की मंडी बागपत के इर्द गिर्द कही है नहीं। 1977 में बागपत से चुनाव जीतने के बाद चौधरी चरण सिंह ने धान मंडी लगाने की बात जरुर कही थी। लेकिन उसके बाद तो कोई सोचता भी नहीं। टुकड़े में बटें खेतों की चकबंदी चौधरी चरण सिंहने शुरु कराई लेकिन अब आलम यह है कि बागपत के सोलह गांव में बीते 32 बरस में सिचाई के लिये अलग अलग एलान हुये। दासा गांव की सिचाई योजना पर 62 करोड़ खर्च हो गये लेकिन पानी है ही नहीं।

जमीन के नीचे 123 फीट तक पानी चला जा चुका है। जो दो सौ फीट तक पानी निकाल लेता है वह यह कह कर खुश हो जाता है कि असल मिनरल वाटर तो उसके खेत या घर पर है। दिल्ली जिस भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के जरीये विकास का सपना संजो रही है, उसके उलट बागपत के किसान उसी थ्योरी पर टिका है जिसे चरण सिंह कह गये यानी जमीन पर किसान का मालिकाना हक बढाने पर जोर दिया जाना चाहिये। बागपत के लड़के नये प्रयोग कर डिब्बा बंद गन्ने का जूस की फैक्ट्री लगाने को तैयार हैं। लेकिन उनके पास पैसा है नहीं और सरकार तक वह पहुंच नही सकते। सरकार उनतक पहुंचती नही तो गन्ना जूस की टेकनालाजी घर में पडी बर्बाद फसलों के बीच ही सड़-गल रही है। रहतना गांव के गुलमोहर की मौत के बाद गुलमोहर के परिवारवालों को लग रहा है कि ना काम है। ना दाम । तो आगे वह करें तो क्या करें । लेकिन सरकार ने जगह जगह दीवारों पर नारे लिख दिये गये हैं कि गांव गांव को काम मिलेगा। काम के बदले दाम मिलेगा। लेकिन किसानों का सच है कि सिर्फ दशमलव तीन फीसदी लड़के नौकरी करते हैं। बाकि हर कोई खेती या खेती से जुडे सामानों की आवाजाही के सामानो की दुकान खोल कर धंधे में मशगूल है। रोजगार के लिये सबसे बडी नौकरी पुलिस भर्ती की निकली है। 

लेकिन वह भी जातीय आधार पर सैफई और मैनपुरी में सिमटी है तो बागपत के गांव दर गांव में पुलिस भर्ती का विरोध करते किसानो के बेटे सड़क किनारे नारे लगा रहे हैं। बैंक, कोओपरेटिव और साहूकार। अस्सी फिसदी किसान इन्हीं तीन के आसरे खेती करते है । जिन्हे हार्ट अटैक आया । जो बर्बाद फसल देखकर मर गये। उन परिवारों समेत बागपत के बीस हजार किसान औसतन दो से पांच लाख कैसे लौटेंगे। और ना लौटाने पर जो कर्ज चढ़ेगा वह अगले बरस कैसे तीन से नौ लाख तक हो जायेगा। इसी जोड़ घटाव में सोचते सोचते हर किसान के माथे पर शिकन बडी होती जा रही है।

फिर मुआवजे को लेकर तकनीकी ज्ञान सबको लेकर उलझा है क्योंकि मुआवजा तो पटवरी, तहसीलदार,एसडीएम, डीएम,कमिश्नर, सीएण और फिर दिल्ली। यानी मुआवजे का रास्ता इतना लंबा है कि हर हथेली आखिरी तक खाली ही रहती है इसलिये मुआवजे का एलान लखनउ में हो या दिल्ली में उम्मीद या भरोसा किसी में जागता नहीं है। दासा गांव के रणधीर सिंह की मौत तो यह सोच कर ही हो गई कि कोपरेटिव का पैसा ना लौटाया और बैंक का कर्ज चढ़ता चला गया तो फिर घर का क्या क्या बिकेगा। उन्नीस प्राइवेट स्कूल के प्रिंसिपल ने बच्चों को कहा है कि अपने पिता से लिखवाकर लाये कि फीस दो महीने तक माफ की जा सकती है। उसके बाद माफ की कई महीनो की फीस भी चुकानी पड़ेगी। अभी तक कोई आदेश-निर्देश तो किसानों के घर नहीं पहुंचा लेकिन फसल बर्बाद होने के बाद डर ऐसा है कि हंसता-खिलखिलाता गांव सन्नाटे में नजर आने लगा है। और तमाम सवालों को उठाने पर हर जुबां पर बिखरे बिखरे शब्दो के बीच यह सोच है कि फसल ऊपर वाला ले गया । नौकरी अखिलेश ले जा रहे हैं। जमीन मोदी ले जायेंगे।

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सियासत तले दबे किसानों का दर्द कौन समझेगा ?

किसानों के हक में है कौन, यह सवाल चाहे अनचाहे भूमि अधिग्रहण अध्यादेश ने राजनीतिक दलों की सियासत तले खड़ा तो कर ही दिया है। लेकिन देश में किसान और खेती का जो सच है उस दायरे में सिर्फ किसानों को सोचना ही नहीं बल्कि किसानी छोड़ मजदूर बनना है और दो जून की रोटी के संघर्ष में जीवन खपाते हुये कभी खुदकुशी तो कभी यू ही मर जाना है। यह सच ना तो भूमि अध्ग्रहण अध्यादेश में कही लिखा हुआ है और ना ही संसद में चर्चा के दौरान कोई कहने की हिम्मत दिखा रहा है। और इसकी बडी वजह है कि 1991 के आर्थिक सुधार के बाद से कोई भी राजनीतिक दल सत्ता में आयी हो किसी ने भी कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर कोई समझ दिखायी नहीं और हर सत्ताधारी विकास की चकाचौंध की उस धारा के साथ बह गया जहा खेती खत्म होनी ही है । फिर संयोग ऐसा है कि 91 के बाद से देश में कोई राजनीतिक दल बचा भी नहीं है, जिसने केन्द्र में सत्ता की मलाई ना खायी हो।

वाजपेयी के दौर में चौबिस राजनीतिक दल थे तो मनमोहन सिंह के दौर में डेढ दर्जन राजनीतिक दलों के एक साथ आने के बाद यूपीए की सरकार बनी। लेकिन पहली बार कोई गैर कांग्रेस पार्टी अपने बूते सत्ता में आयी तो वह भी विकास के उसी दल दल में चकाचौंध देखने समझने लगी जिसकी लकीर आवारा पूंजी के आसरे कभी मनमोहन सिंह ने खींची थी। खेती को लेकर देश देश की अर्थव्यवस्था के पन्नों को अगर आजादी के बाद से ही पलटे तो 1947 में भारत कृषिप्रधान देश था । उस वक्त देश में 141 मिलियन हेक्टर जमीन पर खेती होती थी। देश में ग्यारह करोड़ किसान थे। साढे सात करोड खेत मजदूर । 1991 में खेती 143 मिलियन हेक्टेयर जमीन पर होने लगी। लेकिन किसानो की तादाद ग्यारह करोड से घटकर दस करोड़ हो गयी और खेत मजदूर की तादाद बढकर साढे नौ करोड़ पहुंच गई। 1991 में आर्थिक सुधार की हवा बही और उसके बाद ट्रैक वन, ट्रैक टू और ट्रैक थ्री करते हुये हर राजनीतिक दल ने सर्विस सेक्टर और इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर उघोगों के लिये खेती की जमीन हथियाने के जो नायाब प्रयोग शुरु हुये उसका असर 2014 तक पहुंचते पहुंचते यह हो गया कि खेती की जमीन घटकर 139 मिलियन हेक्टेयर पर आ गई और किसान घटकर 9 करोड़ पर आ गये। जबकि खेत मजदूर की तादाद बढकर 11 करोड़ हो गयी । यह वह किसान और मजदूर है,जो सीधे खेती से जुड़े हैं।

इसके अलावे करीब आठ करोड किसान मजदूर परिवार ऐसे है, जिनके पास जमीन भी नहीं है और वह मजदूरी किसानों के लिये भी नहीं करते है बल्कि खेती की जमीन पर जो ठेकेदार खेती करवाता है इनके मातहत ये 8 करोड परिवार काम करते है और जिन्दगी चलाते हैं । इनकी तादाद आजादी के वक्त करीब 75 लाख थी। अब यहां से आगे का बडा सवाल यही पैदा होता है कि हर राज्य में औघोगिक विकास निगम बनाया गया । हर राज्य में औद्योगिक क्षेत्र की जमीन पर उघोग लगाने के लिये बैको से कर्ज लिये गये । इनमें से सिर्फ बीस फीसदी उद्योग ही उत्पादन दे पाये। बाकि बीमार होकर बैको के कर्ज को चुकाने से भी बच गये। और देश को बीस लाख करोड रुपये से ज्यादा का नुकसान हो गया। लेकिन किसी सरकार के कभी सवाल नहीं उठाया। जबकि इसी दौर में उन्हीं उद्योगों की जमीन पर रियल स्टेट का धंधा पनपना शुरु हुआ। जो उघोग बीमार हो चुके थे । रियल स्टेट के धंधे में पचास लाख करोड़ से ज्यादा की रकम सफेद और काले को मिलाकर लगी । लेकिन उसे रोकने के लिये कोई रास्ता किसी सरकार ने नहीं उठाया । ध्यान दें तो जिस सोशल इंडेक्स का जिक्र समाजवादी और वामपंथी हमेशा से करते रहे उनके सामने भी कोई दृष्टि है ही नहीं कि आखिर कैसे बाजार में बदल रहे भारत में उपभोक्ताओं की जेब देखकर विकास की बिसात ना बिछायी जाये या फिर उपभोक्ताओ की कमाई ज्यादा से

ज्यादा कैसे हो इसकी चिंता में कल्याणकारी राज्य को स्वाहा होने से रोका जाये। यानी सुप्रीम कोर्ट का वकील एक पेशी के लिये 20 से पचास लाख रुपये ले तो भी सरकार को फर्क नहीं पडता और बिना इंशोरेन्स इलाज कराने कोई निजी अस्पताल में जाये तो औसतन दो लाख से 10 लाख देने पड़ जाये तो भी फर्क नहीं पड़ता और शिक्षा के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरफ खुल रहे संस्थानों की ट्यूशन फीस औसतन 6 लाख रुपये सालाना हो तो भी फर्क नहीं पड़ता। यानी कोई शाइनिंग इंडिया में खोये। कोई एसआईजेड के नाम पर औघोगिक विकास का नारा लगाने लगे । कोई किसानों की सब्सिडी खत्म कर किसानो को मुख्यधारा से जोडने की थ्योरी दे दें। तो कोई कारपोरेट को टैक्स में राहत देकर अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट टैक्स के बराबर होने का नारा लगाये। तो कोई उद्योगों को कई तरीके से टैक्स में राहत देकर किसानो की सब्सीडी से तीन गुना ज्यादा सब्सिडी की लकीर खींच दे। तो कोई यह कहने से ना चुके की भारत के बाजार में निवेश कराने के लिये मेक-इन इंडिया जरुरी है और उससे निकले पैसे को आखिर में किसान-मजदूर-गरीबों में ही तो बांटना है। कोई इन सबका विरोध करते हुये सत्ता में आये और फिर वह भी उसी रास्ते पर चल पड़े तो जनता करेगी क्या। यह सवाल संयोग से कांग्रेस विरोधी हर सत्ता के दौर में उभरा है और हर सत्ता की दिशा भी ट्रैक टू के जरीये कांग्रेस के पीछे ही चल पड़ी है, इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता । मनमोहन सिंह के दौर में सेज के लाइसेंस का बंदर बांट किसे याद नहीं होगा लेकिन जितनी जमीन सेज के नाम पर ली गई उसका साठ फिसदी हिस्सा बिना उपयोग आज भी जस का तस है लेकिन सरकार उस जमीन को मेक-इन इंडिया के लिये उपयोग में नहीं लाती है। बंजर जमीन का उपयोग कैसे हो कोई ब्लू प्रिट किसी सरकार के पास नहीं है। खेती की जमीन पर दिये जाने वाले चार गुना मुआवजा के बाद भी किसान की हालत औसतन आठ से दस बरस बाद मजदूर से भी बदतर क्यों हो जाती है। यह सवाल ऐसे है जिसके जबाब में कोई सरकार नहीं फंसती। जबकि 1947 के बाद से खेती की जमीन पर तीन गुना बोझ बढ चुका है लेकिन किसानी छोड़ किसी दूसरे रास्ते किसानो के बच्चे कैसे जाये इसके लिये कोई ब्लू प्रिट कभी किसी सरकार ने नहीं दिया। मौजूदा वक्त में भी किसानों के खातों तक सरकारी पैसा सीधे बिना बिचौलिये के कैसे पहुंच जाये इसे ही उपलब्धि मान कर हर कोई अपनी पीठ ठोंकने से नहीं चूक रहा जबकि सच यह है कि संसद के भीतर ही नोबल से सम्मानित बांग्लादेश के मोम्मद युनुस ने ग्रामीण बैंक का पूरा पाठ हर सांसद को समझाया। और बांग्लादेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर भी ले आये। मोम्मद युनुस ने भारत के संसद में जब यह जानकारी दी कि अनुदान के जरिए गरीबी से नहीं निपटा जा सकता । दान से निर्भरता बढ़ती है और गरीबी का दुष्चक्र चलता रहता है । कर्ज से लोगों को आय प्राप्ति के नए जरिए मिलते हैं और खासकर गरीब,अशिक्षित और महिलाओं को माइक्रोफाइनेंस के जरिए मुख्यधारा में लाया जा सकता है । तो हर किसी ने तालिया पीटी थी ।

लेकिन अब यह जानते हुये भी राजनेताओ की आंख नहीं खुल रही है कि बांग्लादेश ने इन्हीं उपायों से बीते बीस बरस में बीपीएल परिवारों की तादाद बीस फीसदी तक कम कर दी। 91-92 में 60 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे थी वह अब 40 फीसदी तक आ गई। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि बांग्लादेश में 1990-91 में 3 करोड 60 लाख लोग भूख की मार झेलते थे, जो अब 2.62 करोड़ रह गए हैं। लेकिन भारत तो विकास के नाम पर चकाचौंध की बेफ्रिक्री में कुछ ऐसा खोया है कि उसे किसानों की खुदकुशी या फसल बर्बाद होने पर कोई राहत या मुआवजा दिया जाना चाहिये इसपर ठोस नीति बनाने  के बदले चार दिन पहले संसद ने हवाई यात्रा करने वालो के लिये नीतिगत फैसला ले लिया कि अब हवाई यात्रा के दौरान मरने वालो को 75 लाख की जगह 90 लाख रुपये मिलेंगे।

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महत्वपूर्ण कौन… किसान या क्रिकेट?

यह कतई आश्चर्य की बात नहीं है कि आजकल अखबार व दृश्य श्रव्य मीडिया का पहला समाचार क्रिकेट है, फिर राजनीतिक उठापटक और अपराध या फ़िल्मी सितारों की चमक दमक वगैरह। जंतर मंतर पर लाखों किसान देश के दूर दराज इलाकों से आकर अपनी समस्याएं बताना चाहते हैं लेकिन मीडिया लोकसभा और राज्यसभा में किसानों के चिंतकों की बात तो सुन रहा है परन्तु यहां मौजूद किसानों की नहीं। खड़ी फसलों की भयानक तबाही क्या महज एक खबर है ? यह बात एक किवदंती सी बहु-प्रचलित है कि देश में सत्तर प्रतिशत किसान हैं लेकिन मीडिया में उन पर चर्चा एक प्रतिशत से भी कम होती है।

गरीब मजदूर किसान के लिए इस मालामाल खेल का क्या अर्थ है ? इसमें अरबों खरबों रुपये का कारोबार है जबकि एक मजदूर को चाहिए सौ, दो सौ, तीन सौ रुपये अपने और अपने परिवार के भरण पोषण के लिए। क्रिकेट के प्रति दीवानगी का आलम यह है कि मैच वाले दिन सबका मनोरंजन क्रिकेट ही है। मैच देखने के अलावा कोई भी दूसरा कार्य संपन्न हो पाना संभव नहीं है। हमारी कार्य संस्कृति में खेल के बहाने इस विलासिता ने हमारी सामुदायिक उर्जा को प्रभावित किया है। क्रिकेट के प्रति मध्यवर्गीय जनों के पागलपन को देखकर लगता है जैसे यह खेल, खेल न होकर कोई पौराणिक अथवा अध्यात्मिक आस्था का प्रसंग हो। मीडिया के लिये क्रिकेट का मसला आज चर्चा में किसी भी राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे से अधिक महत्वपूर्ण मसला है। साहित्य, कला, संस्कृति वगैरह अब मूल्यविहीन हो चुके हैं। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में क्रिकेट को प्राणवायु अथवा धड़कन के रुप में बाजार द्वारा एक जरुरत बनाकर कुछ इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि लोग आते जाते खाते पीते सोते उठते इस पर दीवानगी की हद तक फिदा हैं। आईपीएल के आपराधिक प्रसंग से यह बात स्पष्ट हो चुकी है लेकिन राजनेताओं और पूंजीपतियों के पक्के गठजोड़ के कारण  इसको रफा दफा कर दिया गया।

हमारी रुचि में यह बाजारवाद / उपभोक्तावाद   की घुसपैठ है, अतिक्रमण है। व्यवस्था से जुड़े सारे लोग क्रिकेट पर फिदा है और इसे किसी भी दृष्टि से नुकसानदायक नहीं माना जाता। हजारों लाखों लोग एक साथ एक ही समय में इस बहाने ठहर जाते हैं, क्या यह कार्य संस्कृति का ह्रास नहीं है? क्या हमारे इस कृत्य से वक्त का एक बड़ा हिस्सा या अवसर जाया नहीं होता? गर्व करने वाले  इस देश में चरित्र निर्माण से ही हमारी दृष्टि भटक जाये, इसे सदी का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

हाल ही में कर्नाटक के कोलार जिले में रेत माफिया के खिलाफ अभियान चलाने वाले एक आईएएस अधिकारी डीके रवि को बेंगलुरू में अपने आधिकारिक फ्लैट में मृत पाया गया।  इसके विरोध में कर्नाटक में जबर्दस्त रोष है और प्रतिरोध जारी है। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में एक बहत्तर वर्षीय नन गैंग रेप का मामला सामने आया। दिल्ली में एक युवती के सामूहिक बलात्कार के बाद देश भर में लोगों का ग़ुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था। तिहाड़ जेल में उसपर बनी  डॉक्यूमेंट्री पर खूब  विवाद हुआ। ऐसे बहुत से मामले हैं जिन्हें लेकर कुछ समय तो बहुत हंगामा होता रहा लेकिन धीरे-धीरे वो लोगों के मानसपटल से हट गए। अब सब क्रिकेटमय  हैं। उस देश में जहां हर 21 मिनट में बलात्कार की एक घटना होती है, वहां भयंकर से भयंकर अपराध को भी लोग जल्द ही भूल जाते है। इसकी यादें बची रहती हैं तो सिर्फ़ पीड़ित के परिवार वालों या सगे-संबंधियों के दिल में। तो गरीब किसानों की बात कौन तो करे ! प्रश्न यह है कि क्यों हो हल्ला और शोर शराबा होने पर ही सरकार और प्रशासन की नींद खुलती है ? इन प्रश्नों पर भी जन हित में विचार आवश्यक है। मीडिया किसी भी गंभीर मसले पर दस पंद्रह दिन हो हल्ला करने के बाद गहरी नींद सो जाता है। उसे अपने आर्थिक हित जो साधने हैं यही उसकी प्राथमिकता भी है। भारतीय नागरिक कदम कदम पर अपमानित होता है क्या इसी लोकतंत्र के लिए हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थे, इतने बलिदान दिए थे ? मीडिया को इन बातों से कोई अंतर नहीं पड़ता। क्योंकि वह जनहित का पक्षधर माध्यम नहीं है।

एक ओर लोग बुनियादी जरूरतों के लिए परेशान हैं। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में अपराध रुक नहीं पा रहे हैं तो दूसरी ओर अय्यासी और मनोरंजन पर करोड़ों रुपये बहाये जा रहे हैं।  गरीबों के प्रति प्रेस और मीडिया का रवैया क्या है आईये एक बर्ग व्यक्ति मदन लाल की बी बी सी पर छपी प्रतिक्रिया से आपको अवगत करते हैं। “आज देश की जो हालत है, उसके बारे में सोचता हूँ तो अफ़सोस होता है। पहले ये हालात नहीं थे. यह मेरा देश है, ऐसा नहीं लगता। किसी भी ग़रीब आदमी के लिए कहीं कोई ठिकाना नहीं है. कोई भी ग़रीब अगर कहीं एक झोपड़ी डालकर रह रहा है तो उसे उजाड़ दिया जाता है। अमीरों की आँखों में ग़रीब खटकने लगा है. हमने नहीं सोचा था कि देश की ऐसी हालत हो जाएगी। आज मीडिया से भी कोई आस नहीं है। आप लोग बड़े लोगों से और नेताओं से तो बात करते हो पर ग़रीब की बात करने वाला और लाचार लोगों को सहारा देने वाला कोई नहीं है. आप जो काम कर सकते हैं, वो भी नहीं कर रहे। लोगों पर ज़ुल्म हो रहा है पर सरकार कुछ नहीं कर रही है. देश की सरकार ही बेकार है। हाँ, जब वोट माँगने की बारी आती है तब नेताओं को याद आता है कि यह ग़रीबों की भी देश है। हम जैसे लोगों का भी देश है। तब उन्हें यह बुजुर्ग दिखाई देता है। पुलिस और अधिकारियों का रवैया भी लोगों के साथ इंसानों वाला नहीं है। उन्हें सामने वाला इंसान नज़र नहीं आता है. यह हमारा देश है और हम इसके लिए लड़ रहे हैं पर देश ही हमें ख़त्म करने पर तुला है।”
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रारूप ने भारतीय मीडिया की अधकचरी संस्कृति को ओढ़ने-बिछाने वाले एक छोटे से तबके को भले ही कुछ ऐसा दे दिया हो जो उन्हें नायाब दिखता होगा, एक आम भारतीय समाज के लिए उसका कोई मूल्य या महत्व नहीं। यह ‘क्लास’ का मीडिया ‘मास’ का मीडिया बन ही नहीं सकता।

संजय कुमार के अनुसार “भारतीय मीडिया में दलित आंदोलन के लिए कोई जगह नहीं है. वह तो, क्रिकेट, सिनेमा, फैशन, तथाकथित बाबाओं, राजनेताओं, सनसनी, सेक्स-अपराध, भूत-प्रेत और सेलिब्रिटीज के आगे-पीछे करने में ही मस्त रहती है. इसके लिए अलग से संवाददाताओं को लगाया जाता हैं जबकि जनसरोकार एवं दलित-पिछड़ों सेसंबंधित खबरों को कवर करने के लिए अलग से संवाददाता को बीट देने का प्रचलन लगभग खत्म हो चुका है। इसे बाजारवाद का प्रभाव माने या द्विज-सामंती सोच ! मीडिया, सेक्स, खान-पान, फैशन, बाजार, महंगे शिक्षण संस्थान के बारे में प्राथमिकता से जगह देने में खास रूचि दिखाती है. ऐसे मैं दलित आंदोलन के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बचती ? अखबार हो या खबरिया चैनल, दलित आंदोलनकभी मुख्य खबर नहीं बनती है। अखबारों में हीरो-हीरोइन या क्रिकेटर पर पूरा पेज छाया रहता है, तो वहीं चैनल पर घण्टों दिखाया जाता है. दलित उत्पीड़न कोबस ऐसे दिखाया जाता है जैसे किसी गंदी वस्तु को झाडू से बुहारा जाता हो ?  समाज के अंदर दूर-दराज के इलाकों में घटने वाली दलित उत्पीड़न की घटनाएं, धीरे-धीरे मीडिया के पटल से गायब होती जा रही है। एक दौर था जब रविवार, दिनमान, जनमत आदि जैसी प्रगतिशी ल पत्रिकाओं में रिपोर्ट आ जाती थी. खासकर, बिहार व उत्तर प्रदेश में दलितों पर होते अत्याचार को खबर बनाया जाता था. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत की दलित उत्पीड़न से जुड़ी कई रिपोर्ट उस दौर में छप चुकी हैं, वे मानते हैं कि ‘आज मुख्यधारा की मीडिया, दलित आंदोलन से जुड़ी चीजों को नहीं के बराबर जगह देती है। पत्र-पत्रिकाएं कवर स्टोरी नहीं बनाते हैं। जबकि घटनाएं होती ही रहती हैं। हालांकि, एक आध पत्र-पत्रिकाएं है जो कभी-कभार मुद्दों को जगह देते दिख जाते हैं।’ साठ-सत्तर के दशक में दलितों, अछूतों और आदिवासियों, दबे-कुचलों की चर्चाएं मीडिया में हुआ करती थी। दलित व जनपक्षीय मुद्दों कोउठाने वाले पत्रकारों को वामपंथी या समाजवादी के नजरिये से देखा जाता था. लेकिन, सत्तर के दशक में गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों ने राष्ट्रीय मीडिया को बदलाव में धकेलना शुरू कर दिया जो अंततः सत्ता विमर्श का एक हिस्सा बन गया. दबे-कुचले लोगों के ऊपर दबंगो के जुल्म-सितम की खबरें, बस ऐसे आती है जैसे हवा का एक झोंका हो! जिसका असर मात्र क्षणिक भी नहीं होता. साठ-सत्तर के दौर में ऐसा नहीं था। सामाजिक गैर बराबरी को जिस तेवर के साथ उठाया जाता था उसका असर देर सबेर राजनीतिक, सामाजिक और सत्ता के गलियारे में गूंजता रहता था।‘

पिछले कुछ सालों में महिलाएं कई क्षेत्रों में आगे आयी हैं। उनमें नया आत्मविश्वास पैदाहुआ है और वे अब हर काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करने लगी हैं। अब महिलाएं सिर्फ चूल्हे-चौके तक ही सीमित नहीं रह गयी हैं, या फिर नर्स, एयर होस्टेस यारिसेप्शनिस्ट नहीं रह गयी हैं, बल्कि हर क्षेत्र में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है।चाहे डॉक्टरी-इंजीनियरी या प्रशासनिक सेवा का पेशा हो कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी काक्षेत्र हो, विभिन्न प्रकार के खेल हो पुलिस या वकालत का पेशा हो, होटल मैनेजमेंट,बिजनेसमैनेजमेंट या पब्लिक रिलेशन का क्षेत्र हो, पत्रकारिता, फिल्म और विज्ञापन का क्षेत्र हो या फिर बस में कंडक्टरी या पेट्रोल पंप पर तेल भरने का काम हो या टैक्सी-ऑटो चलाने की ही बात हो, अब हर जगह महिलाएं तल्लीनता से काम करती दिखाई देती हैं।अब हर वैसा क्षेत्र जहां पहले केवल पुरुषों का ही वर्चस्व था, अब वहां स्त्रियों को काम करतेदेखकर हमें आश्चर्य नहीं होता है। यह हमारे लिए अब आम बात हो गयी है। महिलाओं में इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया है कि वे अब किसी भी विषय पर बेझिझक बात करती हैं। धरना-प्रदर्शन में भी आगे रहती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अब कोई भी क्षेत्र महिलाओं से अछूता नहीं रहा है।उन्हें अब सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं माना जाता है। लेकिन चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो, स्त्रियों के प्रति मीडिया की सोचमें कोई बदलाव नहीं आया है। मीडिया अब भी स्त्रियों के प्रति वर्षों पुरानी सोच पर कायम है। मीडिया आज भी स्त्रियों को घर-परिवार या बनाव-श्रृंगारतक ही सीमित मानती है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, टेलीविजन धारावाहिकों, समाचार चैनलों और टेलीविजन   विज्ञापनों ने महिला की एक दूसरी छवि बनाई है। इनमें एक नई किस्म की महिलाओं को दिखलाया जाता है जो परंपरागत शोषण और उत्पीड़न से तो मुक्त दिखती हैं लेकिन वह स्वयं पुरुषवादी समाज के लिएउपभोग की वस्तु बनकर रह जाती हैं। इन दिनों हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मुक्त महिला का जो रूप दिखाता है, वह उपभोक्ता महिला का ही रूप है जो सिगरेट पीती है, शराब पीती है और जुआ खेलती है। इनमें अधिकतर उच्च मध्य वर्ग की महिलाओं की इसी छवि को दिखाया जाता है। मीडिया विज्ञापनों, धारावाहिकों और फिल्मों के भीतर महिला का निर्माण करते हुए यह भूल जाता है कि भारत की शोषित, दमित महिला की मुक्ति का लक्ष्यबाजार में साबुन   बेचने वाली महिला नहीं हो सकती। महिलाओं के मामले में समाचार पत्रों का भी हाल कोई जुदा नहीं है। आप कोई भी अखबार उठा लें, गांव में, खेत-खलिहानों में, परिवार में, नौकरी में,महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव की चर्चा, उससे लड़ने की आवश्यकता पर लेख/रिपोर्ट मिले या नहीं, सुंदरता बढ़ाने के उपायों पर विस्तृत लेखअवश्य मिलेंगे।

मेधा पाटकर, किरण बेदी की चर्चा हो या नहीं, ऐश्वर्य राय, कैटरीना कैफ आदि का गुणगान अवश्य मिल जायेगा। प्रगतिशील और आंदोलनी तेवर वाली महिलाओं, आधुनिक विचारधारा वाली, अन्याय और शोषण के खिलाफ आंदोलन करने वाली, सड़कों पर नारे लगाते हुए जुलूस निकालने वाली, धरना देने वाली, सभाएं और रैलियां करने वाली समाचार-पत्रों में महिला अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली,कल-कारखानों और खेतों में काम करने वाली, पुलिस, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रशासन में ईमानदारी के साथ काम करने वाली महिलाओं कीजितनी चर्चा समाचार पत्रों में होती है उससे कई गुणा अधिक चर्चादेह एवं अपने सौंदर्य की तिजारत करने वाली अभिनेत्रियों एवं मॉडलों की होती है। प्रिंट मीडिया में महिलाएं अब भी सिर्फ हाशिये की ही जगह पाती हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियों का रूप  लिए जा रहे इन समाचार माध्यमों में क्या कोरपोरेट हित के अलावा भी कोई बात होती है, जन सरोकारों की बात भी आपको पढ़ने-देखने-सुनने को मिलती है ? नहीं  ! अगर कुछ समूह गांव-गरीब-किसान की कभी बात करते भी हैं तो स्वाभाविक तौर पर नहीं बल्कि लोकतंत्र को कमज़ोर करने वाले भ्रष्ट तत्वों द्वारा प्रायोजित-प्रभावित हो कर ही जैसा कि फिलहाल हम भूमि अधिग्रहण बिल की बहस में साफ दिख रहा है।

लेखक शैलेंद्र चौहान से संपर्क ’34/242, सेक्टर -3, प्रतापनगर, जयपुर -302033′ के जरिए किया जा सकता है.

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मीडिया का मोतियाबिंद : इसके आपरेशन का समय आ गया है…

Ambrish Kumar : कल जंतर मंतर पर जन संसद में कई घंटे रहा. दस हजार से ज्यादा लोग आए थे जिसमें बड़ी संख्या में किसान मजदूर थे. महिलाओं की संख्या ज्यादा थी. झोले में रोटी गुड़ अचार लिए. मंच पर नब्बे पार कुलदीप नैयर से लेकर अपने-अपने अंचलों के दिग्गज नेता थे. अच्छी सभा हुई और सौ दिन के संघर्ष का एलान. बगल में कांग्रेस का एक हुल्लड़ शो भी था. जीप से ढोकर लाए कुछ सौ लोग. मैं वहां खड़ा था और सब देख रहा था. जींस और सफ़ेद जूता पहने कई कांग्रेसी डंडा झंडा लेकर किसानों के बीच से उन्हें लांघते हुए निकलने की कोशिश कर रहे थे जिस पर सभा में व्यवधान भी हुआ.  एक तरफ कांग्रेस में सफ़ेद जूता और जींस वालों की कुछ सौ की भीड़ थी तो दूसरी तरफ बेवाई फटे नंगे पैर हजारों की संख्या में आये आदिवासी किसान थे.

दिल्ली में व्यस्तता के चलते लिखने का मौका नहीं मिला. सोचा आज कहीं से खबर देख लूंगा. पर अफ़सोस, लाखों की प्रसार संख्या वाले दिल्ली के बीस बड़े अखबारों में यह खबर नहीं आई. ऐसा एक मित्र ने बताया. दो चार हजार प्रसार वाले अखबार की बात मैं नहीं कर रहा हूं. मुख्यधारा के बड़े अखबारों की बात कर रहा हूँ. यह मीडिया का वह मोतियाबिंद है जिसके आपरेशन का समय आ गया है. कांग्रेस के हुल्लड़ किस्म के कुछ सौ लोगों के शो की बड़ी खबर जनसत्ता के पहले पेज पर है. बाकी, चैनलों से ज्यादा उम्मीद कोई करता भी नहीं है. 

वैकल्पिक मीडिया से तो हम सभी जुड़े हैं और लिखते भी हैं पर अभी उसकी व्यापक राजनैतिक ताकत नहीं बनी है. दूसरे ज्यादातर सामग्री बिना संपादन की होती है. इसके अलावा तथ्यों के आधार पर गंभीर रपट कम लिखी जाती है. निजी हमलों पर ज्यादा जोर रहता है. इसके चलते अभी इसकी वह साख नहीं बन पा रही है. पर बनेगी धीरे धीरे.

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Abhishek Srivastava : जमीन लूट अध्‍यादेश के खिलाफ़ 24 फरवरी को हुई रैली में सिर्फ अन्‍ना को प्रोजेक्‍ट किया गया, लाल झंडे छोटे परदे पर सिरे से ब्‍लैकआउट कर दिए गए। कल संसद मार्ग पर AIPF की जन संसद थी, लेकिन ऐन मौके पर कांग्रेस ने प्रदर्शन कर दिया और एक बार फिर वही हुआ। सब चैनलों ने कांग्रेस की रैली दिखायी, लाल झंडे नदारद। कल शरद यादव बीमा विधेयक के खिलाफ़ लगातार बोलते रहे लेकिन उसमें से चार मिनट के हिस्‍से को उठाकर बवाल खड़ा कर दिया गया। हर चैनल ने उनके खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया लेकिन मूल संदर्भ ही गायब। आज बंगाल के एक सांसद ने नन से हुए बलात्‍कार की चर्चा करते हुए लोकसभा में जैसे ही बीजेपी द्वारा बनाए जा रहे सांप्रदायिक माहौल का जिक्र किया, उन्‍हें बैठा दिया गया। उलटे वेंकैया नायडू को यह बोलने का मौका दिया गया कि बीजेपी सांप्रदायिक नहीं है।

संसद के बाहर गोली मारी जा रही है, बलात्‍कार हो रहे हैं और सारे जेनुइन विरोध को टीवी चैनल पचा जा रहे हैं। लोकसभा के भीतर स्‍पीकर केंद्र सरकार के एजेंट का काम कर रही हैं और विरोधियों को बोलने नहीं दे रही हैं। किसी ने नहीं पूछा कि कल नागपुर में आरएसएस की प्रतिनिधि सभा की जो बैठक संपन्‍न हुई, उसमें बीजेपी से कौन-कौन गया था। कोई हमें और आपको नहीं बताएगा कि तीन दिन तक चली इस बैठक में एक शब्‍द इस्‍तेमाल किया गया है, ”प्रैक्टिकल हिंदू राष्‍ट्र”। हिसार से लेकर बंगाल तक हालांकि प्रैक्टिस जारी है, इतना तो दिख ही रहा है। अब हमें भारत की राजनीतिक व्‍यवस्‍था को संसदीय लोकतंत्र कहना बंद करना चाहिए। यह एक ”प्रैक्टिकल हिंदू राष्‍ट्र” है, जिसे ”संवैधानिक हिंदू राष्‍ट्र” बनाने का संकल्‍प कल नागपुर में पारित किया जा चुका है।

इसका एंटी-क्‍लाइमैक्‍स यह है कि आरएसएस की सालाना रिपोर्ट में कैलाश सत्‍यार्थी से मोहन भागवत की मुलाकात का जि़क्र करते हुए उन्‍हें बधाई भेजी गई है और मरहूम कामरेड गोविंद पानसरे व नरेंद्र दाभोलकर को भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई है। बहरहाल, ये सिर्फ सूचनाएं भर हैं। मैं किसी को लघु प्रेम कथाओं और बेदाद-ए-शादी का जश्‍न मनाने से थोड़े रोक रहा हूं। जाइए जश्‍न-ए-रेख्‍ता में, चिपकाइए अश्‍लील तस्‍वीरें, गाइए चैता, पादिये शायरी…। मैं अब कुछ नहीं कहूंगा।

वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार और अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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बैसाखी पर किसान टीवी लांच करेगी सरकार

नई दिल्ली। किसानों को समर्पित टेलीविजन चैनल ‘किसान टीवी’ को हिन्दी पंचांग के नववर्ष बैसाखी के अवसर पर लांच किया जाएगा। पंजाब सहित देश के कई हिस्सों में इस दौरान फसल की कटाई एवं अन्न संग्रह का समय होता है। सरकार ने संसद में रखे गये अपने 2015-16 के बजट पेपर में इस चैनल के लांच की तिथि की घोषणा की है।

 बताया गया है कि चैनल की साफ्ट लांचिंग 23 मार्च तथा फर्म लांचिंग 13-14 अप्रैल को की जानी है। कृषि एवं संबंधित क्षेत्र को समर्पित चैनल किसानों को नई खेती की तकनीक, जल संरक्षण, जैविक खेती तथा अन्य सम-सामयिक सूचनाएं एवं जानकारियां उपलब्ध कराएगा। नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल के जुलाई के बजट में दूरदर्शन पर इस प्रकार के चैनल को प्रस्तावित किया था एवं इसके लिए सौ करोड़ रूपये निर्धारित किए थे। इस साल के बजट में वित्त एवं सूचना तथा प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने देश के सार्वजनिक सेवा प्रसारण प्रसार भारती को 45 करोड़ रुपये का अनुदान उपलब्ध कराया है। चौबीस घंटे संचालित किए जाने वाले चैनलों में से एक किसान टीवी की रूपरेखा के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को कई सुझाव दिए गये, जिनमें से किसानों के लिए ‘क्विज शो‘, देश के विभिन्न हिस्सों में खेती की सर्वश्रेष्ठ प्रथाओं से साक्षात कराना, कृषि विशेषज्ञों सहित जमीनी एवं उच्च स्तर पर प्रयास कार्यक्रम बनाने के लिए सुझावों का आमंत्रण तथा कृषि वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों के साथ प्रतिक्रिया भी शामिल थी। वर्तमान में प्रसार भारती डीडी वन पर ‘कृषि दर्शन‘ कार्यक्रम प्रसारित करता है। यह 26 जनवरी 1967 को लांच किया गया था।

 

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जेपी की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान जान की परवाह किये बिना किशन ने लाठी-गोली के बीच जीवंत तस्वीरें खींची

: बिहार में फोटो पत्रकारिता के जनक थे किशन : पूर्वी भारत के अग्रणी छाया-पत्रकारों में शुमार रहे कृष्ण मुरारी किशन के असामयिक निधन पर रामजी मिश्र मनोहर मीडिया फाउंडेशन की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने उन्हें मरणोपरान्त पद्मश्री से सम्मानित करने की मांग की है।  बिहार चैम्बर ऑफ कॉमर्स कान्फ्रेंस हॉल में आयोजित श्रद्धांजलि सभा को संबोधित करते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री श्री सुशील कुमार मोदी ने कहा कि बिहार फोटोग्राफी में नवीनतम तकनीक का प्रयोग कृष्ण मुरारी किशन ने किया था। सही मायने में किशन बिहार में छाया पत्रकारिता के जनक थे। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की स्व0 कृष्ण मुरारी किशन के तमाम चित्रों का संकलन प्रकाशित करे।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डा0 जगन्नाथ मिश्र ने स्व0 किशन के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करते हुए कहा कि किशन जितने देश में लोकप्रिय थे उतने प्रदेश में। देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में उनके असंख्य चित्र प्रकाशित हुए, जिससे बिहार का गौरववर्धन भी हुआ। बिहार विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता नंदकिशोर यादव ने कहा कि कृष्ण मुरारी के फोटो खींचने का कोण सर्वथा भिन्न था। हर उम्र के बीच उनकी लोकप्रियता का राज उनका हंसमुख व्यवहार रहा। उनकी स्मृतियां हमेशा जीवंत रहेंगी। फोटोग्राफी के दौरान भी वे मंचासीन लोगों को ऊंगलियों पर नचाते थे। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडेय ने कहा कि कृष्ण मुरारी किशन के निधन से पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। शून्यता की पूर्ति निकट भविष्य में संभव नहीं है। संसद सदस्य अश्विनी कुमार चौबे अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति के दौरान जान की परवाह किये बिना किशन ने लाठी-गोली के बीच जीवंत तस्वीरें खींची।

विधान पार्षद श्रीमती किरण घई ने उनके दुर्लभ चित्रों के प्रकाशन पर बल दिया। बिहार चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष ओपी साह ने केन्द्र सरकार से आग्रह किया कि वह कृष्ण मुरारी किशन को पद्मश्री से सम्मानित करे जिसका समर्थन चैम्बर के पूर्व अध्यक्ष श्री युगेष्वर पांडेय ने किया। बिहार विधान सभा में विरोध दल के मुख्य सचेतक अरूण कुमार सिन्हा ने कहा कि बहुआयामी व्यक्ति के धनी व्यक्ति थे कृष्ण मुरारी किशन। मंच का संचालन फाउण्डेशन के सचिव श्री प्रदीप जैन ने किया।

इस अवसर पर पटना जैन संघ के अध्यक्ष तन्सुख लाल बैद, बिहार इन्डस्ट्रीज एसोसिएषन की ओर से मनीष तिवारी, बिहार ललित कला अकादमी की ओर से विरेन्द्र कुमार सिंह और फाउण्डेशन के कोषाध्यक्ष अमर कुमार अग्रवाल ने भी स्व0 किशन के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त की। फाउण्डेशन के न्यासी श्री पंकज वत्सल ने फाउण्डेशन के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजन को सफल बनाने में वरिष्ठ पत्रकार श्री ज्ञानवर्धन मिश्र सहित स्व0 किशन के परिजन एवं कई पुराने मित्र सक्रिय रहे।

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कृष्ण मुरारी किशन के नाम पर ‘फोटो जर्नलिस्ट एवार्ड’ शुरू करने के लिए मुख्यमंत्री मांझी को पत्र लिखा

सेवा में, श्री जीतन राम मांझी, माननीय मुख्यमंत्री,

बिहार सरकार, पटना

विषय- राज्य सरकार की ओर से पटना निवासी प्रख्यात छायाकार स्व.कृष्ण मुरारी किशन जी के नाम पर प्रति वर्ष ‘के एम किशन पत्रकारिता/छायाकार सम्मान एवार्ड’ देने के आग्रह के संदर्भ में,

मान्यवर,

फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में पूरे देश में कई दशक से बिहार का नाम रौशन करने वाले स्व. कृष्ण मुरारी किशन जी फोटो पत्रकारिता के क्षेत्र में युवाओं के आदर्श तो रहे ही हैं देश-विदेश में इन्होंने अपनी कला की धूम मचायी है। इनकी खींची तस्वीरों के लोकनायक जयप्रकाश नारायण सहित देश व बिहार के राजनेता कायल रहे हैं। स्व. किशन जी एक व्यक्ति नहीं बल्कि खुद में संस्था माने जाते रहे हैं। अपनी बेजोड़ बेजोड़ और अकल्पनीय फोटो पत्रकारिता के माध्यम से स्व.कृष्ण मुरारी किशन जी ने जिस तरह बिहार को लगातार गौरवान्वित किया है सरकार को चाहिए कि वह कृष्ण मुरारी जी के कार्यो को सदा याद रखने के लिए कुछ ऐसा निर्णय ले जिससे युवा और नई पीढ़ी के पत्रकारों में एक नई उर्जा का संचार हो।

मैं आपसे निवेदन करता हूं कि कि राज्य मंत्री परिषद की बैठक कर प्रति वर्ष 16 नवम्बर को मनाए जाने वाले ‘प्रेस दिवस’ के अवसर पर राज्य सरकार पत्रकारो/छायाकारों को स्व. कृष्ण मुरारी किशन जी की याद में ‘के एम किशन पत्रकारिता/छायाकार सम्मान एवार्ड’ देने का निर्णय ले। इसके लिए राज्य के तमाम पत्रकारों की ओर से मैं आपका अनुगृहित रहूंगा।

विश्वासी
विनायक विजेता
पत्रकार
111, शिव-सरस्वती अपार्टमेंट
नियर शिव मंदिर, शिवपुरी, बेऊर, पटना
मो.-9431297057

प्रतिलिपि- श्री विनय बिहारी, माननीय कला-संस्कृति मंत्री, बिहार सरकार
2. श्री नीतीश कुमार, पूर्व मुख्यमंत्री, बिहार सरकार

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बजट के महीने में देश का वित्त मंत्री दिल्ली चुनाव के लिये बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठने को क्यों है मजबूर

: दिल्ली फतह की इतनी बेताबी क्यों है? : बजट के महीने में देश के वित्त मंत्री को अगर दिल्ली चुनाव के लिये दिल्ली बीजेपी हेडक्वार्टर में बैठना पड़े… केन्द्र के दर्जन भर कैबिनेट मंत्रियों को दिल्ली की सड़कों पर चुनावी प्रचार की खाक छाननी पड़े… सरकार की नीतियां चकाचौंध भारत के सपनों को उड़ान देने लगे… और चुनावी प्रचार की जमीन, पानी सड़क बिजली से आगे बढ़ नहीं पा रही हो तो संकेत साफ हैं, उपभोक्ताओं का भारत दुनिया को ललचा रहा है और न्यूनतम की जरूरत का संघर्ष सत्ता को चुनाव में बहका रहा है।

दोनों खेल एक साथ कैसे चल सकते हैं या दो भारत को एक साथ जीने की कला जिस महारथी में होगी, वही मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर राजनेता होगा। सरकार उसी की होगी। क्योंकि यह वाकई कल्पना से परे है कि दिल्ली चुनाव के हर मुद्दे बिजली, पानी, सड़क, घर, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर कैबिनेट मंत्री हर प्रेस कान्फ्रेंस करने के लिये उपलब्ध है और महीने भर बाद जिस बजट का इंतजार देश कर रहा है, उस बजट से उस भारत को कुछ भी लेना देना नहीं होता है जो चुनाव में जीत हार तय करता है। और जो मंत्री दिल्ली के रायसीना हिल्स पर नार्थ या साउथ ब्लाक में बैठकर दुनिया को जिस भारत से रुबरु कराता है वही मंत्री जब चुनाव के लिये सड़क पर प्रचार के लिये उतरता है तो उसकी भाषा उस दुनिया से बिलकुल अलग होती है, जिस दुनिया के बीच भारत चहक रहा है। तो संकेत साफ है कि चुनावी जीत सरकार का पहला धर्म है. चुनाव की जीत हार देश के लिये मर मिटने की सियासत है। यानी सत्ता की ताकत सत्ता में बने रहने के उपाय खोजने से आगे जायेगी नहीं। यानी भारत में राजनीतिक सत्ता के आगे सारा ज्ञान बेमानी है और चुनाव जीतना ही ज्ञान के सागर में डुबकी लगाना है।

इस हाल दुनिया भारत की मुरीद हो और सत्ता हर जगह चुनावी जीत हासिल कर रही हो तो फिर एक भी हार कितनी खतरनाक साबित हो सकती है, यह डेढ़ बरस पहले दिल्ली में शीला दीक्षित सरीखे सीएम की हार के बाद काग्रेस का समूचे देश में लड़खड़ाने से भी समझा जा सकता है और मौजूदा वक्त में दिल्ली जीतने के लिये सरकार ही सड़क पर है इससे भी जाना जा सकता है। इन सारे अंतर्विरोध के बावजूद अगर दुनिया भारत की सत्ता पर लट्टू है तो दो संकेत साफ हैं। पहला, भारत की मौजूदा सत्ता जनादेश के आसरे कोई भी निर्णय लेकर उसे लागू कराने में सक्षम है जो 1991 के बाद से कभी संभव नहीं हुआ था। और दूसरा भारत का बाजार अमेरिका सरीखे देश की आर्थिक मुश्किलों को भी दूर कर सकता है।

भारत के भीतर बसने वाले इस दो भारत का ही कमाल है कि भारत दुनिया का एकमात्र देश है जहां आने वाले वक्त में रेलवे में 5 से 10 लाख करोड़ का निवेश होना है। सड़क निर्माण में 2 लाख करोड़ से ज्यादा का निवेश होना है। बंदरगाहों को विकसित करने में भी 3-4 लाख करोड़ लगेंगे। इसी तरह सैकडों एयरपोर्ट बनाने में भी 3 से 4 लाख करोड़ का निवेश किया जाना है। वहीं भारतीय सेना की जरुरत जो अगले दस बरस की है, वह भी करीब 130 बिलियन डॉलर की है। यानी पहली बार भारत सरकार की आस विदेशी निवेश को लेकर लगी है तो दुनिया की आस भारत में पैसा लगाने को लेकर जगी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने खुले संकेत दिये है कि भारत विकास के रास्ते को पकड़ने के लिये आर्थिक सीमायें तोड़ने को तैयार है और दुनिया भर के देश चाहे तो भारत में पूंजी लगा सकते हैं। असल में यह रास्ता मोदी सरकार की जरुरत है और यह जरुरत विकसित देशो को भारत में लाने को मजबूर करेगा। क्योंकि विकसित देशों की मजबूरी है कि वह अपने देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर का काम पूरा कर चुके हैं और तमाम विदेशी कंपनियों के सामने मंदी का संकट बरकरार है।

यहां तक की चीन के सामने भी संकट है कि अगर अमेरिका की आर्थिक हालात नहीं सुधरे तो फिर उसके यहा उत्पादित माल का होगा क्या। ऐसे में “मेक इन इंडिया” का रास्ता विदेशी निवेश के लिये खुलता है तो अमेरिका, जापान, फ्रांस या चीन सरीखे देश कमाई भी कर सकते है। अब जरा कल्पना कीजिये दुनिया के तमाम ताकतवर या कहें जो विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं, उनके आसरे दिल्ली की झुग्गी बस्तियों का कोई रास्ता निकलेगा नहीं। बिजली, पानी, सडक की लड़ाई थमेगी नहीं। बल्कि इसके बाद देश में खेती और ग्रामीण भारत के सामने अस्तित्व का संकट जरूर मंडराने लगेगा। क्योंकि मौजूदा सरकार जिस रास्ते पर निकल रही है उसमें वह गरीब भारत या फिर किसान, मजदूर या ग्रामीण भारत की जरुरतों को पूरा करने की दिशा में कैसे काम करेगी, यह किसी बालीवुड की फिल्म की तरह लगता है। क्योंकि फिल्मों में ही नायक तीन घंटे में पोयटिक जस्टिस कर देता है। वैसे यह तर्क दिया जा सकता है कि दुनिया की पूंजी जब भारत में आयेगी तो उसके मुनाफे से ग्रामीण भारत का जीवन भी सुधारा जा सकता है। यानी मोदी सरकार का अगला कदम गरीब भारत को मुख्यधारा से जोड़ने का होगा। और असल परीक्षा तभी होगी। लेकिन यह परीक्षा तो हर प्रधानमंत्री ने अपनी सत्ता के लिये दी ही है। और उसे कटघरे में खड़ा भी किया गया है।

नेहरु ने लालकिले से पहले भाषण में नागरिक का फर्ज सूबा, प्रांत, प्रदेश, भाषा, संप्रदाय, जाति से ऊपर मुल्क रखने की सलाह दी। और जनता को चेताया कि डर से बडा ऐब/ गुनाह कुछ भी नहीं है। वहीं 15 अगस्त 1947 को कोलकाता के बेलीघाट में अंधेरे घर में बैठे महात्मा गांधी ने गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को यह कहकर लौटा दिया कि अंधेरे को रोशनी की जगमग से दूर कर आजादी के जश्न का वक्त अभी नहीं आया है। सत्तर के दशक में जिन खनिज संसाधनों को इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय संपत्ति माना उसे सोनिया गांधी के दौर में मनमोहन सिंह ने मुनाफे के धंधे के लिये सबसे उपयोगी माना। बाजार सिर्फ जमीन के नीचे ही नहीं बना बल्कि उपर रहने वाले ग्रामीण आदिवासियों, खेतिहर किसानों और मजदूरों को भी लील गया। लेकिन ताकतवर राजनीतिक सत्ता ने इसे दुनिया के बाजार के सामने भारत को मजबूत और विकसित करने का ऐसा राग छेड़ा कि देश के तीस फीसद उपभोक्ताओं को खुले तौर पर लगने लगा कि बाकि ७० फिसदी आबादी के जिन्दा रहने का मतलब क्या है। सरोकार तो दूर, संवाद तक खत्म हुआ। मोदी सरकार कुछ कदम और आगे बढी। लेकिन पहली बार उसने इस हकीकत को समझा कि चुनावी जीत से बड़ा कोई आक्सीजन होता नहीं है और चुनावी जीत ही हर कमजोरी को छुपाते हुये सत्ता का विकल्प कभी खड़ा होने नहीं देती है।

यानी बीते ६७ बरस की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का ना सिर्फ बढ़ाना है बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मानना भी है। असर यही है कि 1947 में भारत की जितनी जनसंख्या थी उसका तीन गुना हिन्दुस्तान 2015 में दो जून की रोटी के लिये राजनीतिक सत्ता की तरफ टकटकी लगाकर देखता है। असर इसी का है कि दिल्ली में जो भी सरकार बने या जिस भी राजनीतिक दल को जनता वोट दे । हर किसी को केन्द्र की सत्ता के पलटने के हर अंदाज तो याद है। फिर २०१४ के चुनाव में जिस जनादेश का गुणगान दुनिया भर में हो रहा है उसी जनादेश से बनी सरकार की सांस चुनाव के न्यूनतम नारों को पूरा करने में क्यों फूल रही है। और दिल्ली में न्यूनतम जरुरते पूरी हो जायेगी यह कहने के लिये और कोई नहीं उसी मोदी के कैबिनेट मंत्री और खुद प्रधानमंत्री मोदी चुनावी मैदान में क्यों उतर रहे हैं। जिन्हें सत्ता सौपी ही इसलिये गई कि वह विकास की नयी धारा देश में बहा कर अच्छे दिन ला दें।

जाने-माने पत्रकार और आजतक न्यूज चैनल के संपादक पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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किसान मर रहे हैं, मोदी सपने दिखाते जा रहे हैं, मीडिया के पास सत्ता की दलाली से फुर्सत नहीं

Deepak Singh :  प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री बनने के बाद कौन सुध लेता हैं किसानों की? महाराष्ट्र में और केंद्र में दोनों जगह भाजपा की सरकार पर हालत जस के तस। यह हाल तब हैं जब नरेंद्र मोदी को किसानों का मसीहा बता कर प्रचार किया गया। आखिर क्यों नई सरकार जो दावा कर रही हैं की दुनिया में देश का डंका बज रहा हैं पर उस डंके की गूंज गाँव में बैठे और कर्ज के तले दबे गरीब और हताश किसान तक नहीं पहुँच पाई? क्यों यह किसान आत्महत्या करने से पहले अपनी राज्य सरकार और केंद्र सरकार पर भरोसा नहीं कर पाया की सरकार आगे आएगी और कुछ मदद करेगी?

क्या यह सरकार की नाकामी नहीं हैं? क्या मोदी सरकार से नहीं पूछा जाना चाहिए पूंजीपतियों पर करोड़ों रुपये फूंकने से पहले हमारे अन्नदाता किसान की सुध क्यों नहीं ली जाती? क्या यह मीडिया के लिए शर्मनाक नहीं हैं? खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जो सुबह-शाम सिर्फ एक दल विशेष के प्रचार तंत्र की तरह काम करने लगा हैं? इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए सेंसेक्स का ऊपर जाना ही मतलब रखता हैं, किसान आत्महत्या कर ऊपर जाए तो मीडिया के दलालों को अब क्या फर्क पड़ता हैं। अब ऐसी खबर किसी रद्दी के कोने में छप मात्र जाती हैं तो कुछ एक-दो लोग जान पाते हैं। अब किसान की मौत पर न्यूज़ चैनल पर बहस नहीं होती, अब बहस होती हैं की कौन रामजादा हैं तो कौन हरामजादा!! शर्मनाक!! बेहद शर्मनाक !!

दीपक सिंह के फेसबुक वॉल से.

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किसान चैनल साकार करेगा धरती से दौलत पैदा करने का सपना

भोपाल 12 सितम्बर । दूरदर्शन द्वारा प्रारम्भ किया जा रहा किसान चैनल धरती से दौलत पैदा करने का सपना साकार करेगा। हमारे देश में पुरातनकाल से यह मान्यता है कि किसान समृद्ध होगा तो देश समृद्ध होगा। खेती लाभ का धंधा बने, समस्त कृषि आधारित कार्यों को किसान से जोड़कर एक बड़ी इंडस्ट्री खड़ी की जा सके, किसानों को कृषि के संबंध में शिक्षा, सूचना एवं ज्ञान प्राप्त हो सके, ऐसे सभी प्रयासों में दूरदर्शन का किसान चैनल महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। यह विचार माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क मंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल ने व्यक्त किये। वे विश्वविद्यालय द्वारा प्रसार भारती एवं मेपकॉस्ट के सहयोग से आयोजित “दूरदर्शन किसान चैनल: स्वरूप एवं रचना”  विषयक संविमर्श में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

हाल ही में केन्द्रीय बजट में दूरदर्शन किसान चैनल प्रारम्भ करने की घोषणा की गई है। किसान चैनल का स्वरूप, रचना एवं उसकी विषयवस्तु किस तरह हो? इस पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय, प्रसार भारती एवं मेपकॉस्ट  के संयुक्त तत्वावधान में संविमर्श का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बोलते हुये श्री शुक्ल ने कहा कि किसानों को समृद्ध करने के लिए खेती को लाभ का धंधा बनाना होगा। इस दिशा में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा विशेष प्रयास किये जा रहे हैं। इसके अंतर्गत किसानों को बीज, खाद, बिजली, पानी तथा ऋण संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध कराने का संकल्प लिया गया है। शीघ्र ही फसल बीमा योजना के माध्यम से मिलने वाली राशि का वितरण किसानों को किया जायेगा। मध्यप्रदेश ने तीव्र कृषि विकास दर हासिल करते हुये “कृषि कर्मण पुरस्कार” प्राप्त किया है। यह मध्यप्रदेश में कृषि की प्रगति का परिचायक है। किसान चैनल हमारे प्रदेश के साथ-साथ पूरे देश के कृषि विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।

कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुये दूरदर्शन के ए.डी.जी. श्री मनोज पटैरिया ने कहा कि भारत सरकार द्वारा प्रारम्भ किया जा रहा 24 घंटे का किसान चैनल हमारे किसान भाईयों को समर्पित होगा। किसान चैनल का स्वरूप, रचना एवं विषयवस्तु किस तरह की हो इस पर 4 अगस्त 2014 को दिल्ली में कंसल्टेशन मीट का आयोजन किया गया था। इस कंसल्टेशन मीट में यह निर्णय लिया गया कि देश के विभिन्न हिस्सों में जाकर इस तरह की कंसल्टेशन मीट आयोजन की जायेगी। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं बुंदेलखंड को सम्मिलित कर मध्य क्षेत्र की यह कंसल्टेशन मीट पत्रकारिता विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित की जा रही है। इस मीट के दो मुख्य पहलू है- नोलेज एवं  कम्युनिकेशन। किसान चैनल का जो स्वरूप अभी निर्धारित किया गया है, उसके अनुसार किसान चैनल चार प्ले टफॉर्म – राष्ट्रीय नेटवर्क, क्षेत्रीय चैनल, नैरोकास्टिंग तथा सोशल मीडिया पर काम करेगा। प्रयोगशालाओं एवं विज्ञान केन्द्रों का कार्य जमीनी स्तर पर आम आदमी तथा किसान तक पहुँच सके, यह प्रयास किसान चैनल द्वारा किया जायेगा। चैनल की विषय सामग्री हिन्दी के अतिरिक्त अन्य भारतीय भाषाओं में भी होगी। किसान को केवल कृषि संबंधी कार्यों से जोड़कर देखना एक संकुचित दृष्टिकोण हो सकता है। किसान को कृषि के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, मार्केटिंग, बैंकिंग, प्रोडक्शन आदि जानकारियों की आवश्यकता होती है। यह जानकारी किसान का वेल्यु एडीशन करती है। किसान चैनल ऐसे प्रयास करेगा कि कृषक को विभिन्न क्षेत्रों की अधिक से अधिक जानकारी मिल सके।

कार्यक्रम के दो सत्रों में किसान चैनल के स्वरूप एवं रचना पर विचार किया गया। प्रथम सत्र किसान कौन? उसकी सूचना आवश्यकता तथा द्वितीय सत्र किसान चैनल की प्रस्तावित रूपरेखा पर आधारित था। कार्यक्रम में पधारे केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के प्रतिनिधि श्री नरेश सिरोही ने कहा कि किसान चैनल हमारी कृषि एवं हमारी कला संस्कृति को नये स्वरूप में प्रस्तुत करेगा। कृषि कार्य पर चिंतन करते हुये छोटे कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना तथा स्थानीय प्रतिभाओं को सामने लाना इस चैनल का कार्य होगा। विज्ञान भारती के महासचिव श्री जयकुमार ने कहा कि किसान चैनल कृषकों के निर्माण एवं उन्हें विकसित करने के उद्देश्य से प्रारम्भ किया जा रहा है। यह युवाओं को कृषि की ओर आकर्षित करने का प्रयास करेगा। स्कूली विद्यार्थियों को हमारे देश की कृषि परम्परा की जानकारी हो, ऐसे प्रयास इस चैनल के माध्यम से किये जाएँगे। यह प्रयास किया जायेगा कि कृषकों के साथ यह आम आदमियों के लिए भी रोचक एवं मनोरंजन कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाला चैनल बन सके। मेपकॉस्ट के महानिदेशक श्री प्रमोद कुमार वर्मा ने कहा कि परम्परागत एवं आधुनिक तकनीकों के समावेश से कैसे कृषि कार्य का विस्तार किया जा सके यह इस चैनल का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। “अपना पानी, अपना बीज, अपनी खाद, अपना स्वाद” टैग लाईन से सुसज्जित इस चैनल को कृषि पर आधारित सक्सेज स्टोरीज़ प्रसारित करना चाहिए। क्लाइमेट चेन्ज, पर्यावरण आदि विषयों पर भी इस चैनल में कार्यक्रम देने चाहिए।

द्वितीय सत्र में ग्राम भारती विश्वविद्यालय, इलाहाबाद के कुलपति श्री के.बी.पाण्डेय ने कहा कि नौजवानों को खेती से दूर जाने से किस तरह रोका जाये यह मुख्य रूप से प्रसारित होना चाहिए। कृषि को पेशा या धंधा न मानकर उपासना या साधना की तरह लिया जाना चाहिए। किसान चैनल को जमीन का मालीकाना हक रखने वाले किसान के साथ-साथ उसकी भी चिंता करनी चाहिए जो जमीन पर मालीकाना हक न होने के बाद भी कृषि कार्य में लगा हुआ है। जबलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री आनंद स्वरूप तिवारी ने कहा कि आधुनिक एवं पुरानी कृषि तकनीकों पर संतुलन के साथ रोचक विषय सामग्री किसान चैनल पर प्रसारित होना चाहिए। वरिष्ठ जनसंपर्क अधिकारी श्री देवेन्द्र जोशी ने कहा कि शासकीय योजनाओं की विशेषकर कृषि आधारित योजनाओं का अधिकाधिक जानकारी किसान चैनल से प्रसारित होना चाहिए।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने कहा कि कृषकों को केन्द्र में लेकर प्रारम्भ किया जा रहा किसान चैनल एक सुखद अनुभव है। किसान चैनल को युगानुकूल एवं देशानुकूल बनाने की आवश्यकता है। कृषि का संबंध व्यापक संदर्भों में हमारी संस्कृति से है। कृषि चैनल की विषयवस्तु का निर्धारण करने से पूर्व नीड असेसमेंट की आवश्यकता है। किसान चैनल सही अर्थों में किसान का, किसानों द्वारा संचालित चैनल होना चाहिए। यह चैनल लोक प्रसारक के रूप में दूरदर्शन चलाये अथवा इसका अपना रेवेन्यू मॉडल हो, यह भी विचार किया जाना चाहिए। लोक प्रसारक के रूप में इस चैनल का संचालन सही अर्थों में इसकी उद्देश्य पूर्ति में सहायक होगा। विश्वविद्यालय शीघ्र ही कृषि चैनल के संबंध में सुझाव आमंत्रित करने के लिए एक पोर्टल बनायेगा। इस पोर्टल पर आ रहे सुझावों से प्रसार भारती को अवगत कराया जायेगा।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में देश के विभिन्न भागों से पधारे कृषि विशेषज्ञ, कृषि विश्वविद्यालयों के शिक्षक पदाधिकारी, कृषि संस्थाओं से जुड़े अधिकारी, स्वेच्छिक संगठनों के प्रतिनिधि, मीडियाकर्मी, कृषक महिला-पुरुष तथा पत्रकारिता विश्वविद्यालय के शिक्षक एवं अधिकारी उपस्थित थे।

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बकाएदार किसान को बेइज्जती की हवालात, आरोपी डाक्टर को सम्मान की कुर्सी, दैनिक जागरण का खबरों के साथ भेदभाव

: ये तस्‍वीरें बयां करती हैं देश के सत्‍ता-सिस्‍टम और बिके दैनिक जागरण की असलियत : चंदौली (यूपी) : कहते हैं कि एक तस्‍वीर की जुबां कई लाख शब्‍दों पर भारी होती है. चंदौली तहसील में दो-तीन दिन पहले खींची गई दो तस्‍वीरें एक साथ सत्‍ता, सिस्‍टम, मीडिया, न्‍याय, अमीरी-गरीबी सभी का पोल खोल गईं, जिसे शायद हम लाखों शब्‍द के जरिए भी उतने अच्‍छे बयां नहीं कर पाते. ये तस्‍वीरें यह बताने के लिए काफी हैं कि एक आम नागरिक, किसान, गरीब के साथ सत्‍ता-सिस्‍टम और मीडिया किस तरह का व्‍यवहार करता है, और अमीरों के साथ उसके व्‍यवहार में कितना परिवर्तन आ जाता है.

सलाखों के पीछे किसान

नीले पैंट और आसमानी शर्ट में डाक्‍टर राजीव

चंदौली जिले से जुड़े इस कहानी का प्‍लाट चंदौली तहसील है. इसमें दो मुख्‍य कैरेक्‍टर हैं, एक किसान और दूसरा डाक्‍टर. किसान ने खेती के लिए कुछ लाख रुपए का लोन लिया था, जो चुका ना पाने के कारण वह 4 लाख रुपए हो गया था. इस किसान को सरकारी कारिंदे कानून का हवाला देते हुए उठा लाए और एसडीएम कोर्ट में बने हवालात में डाल दिया. उसकी कोई बात नहीं सुनी गई. उस पर कोई दया भाव नहीं दिखाया गया, क्‍योंकि यहां कानून का पालन करना सरकारी महकमे का दायित्‍व था. मजबूर किसान को सलाखों के पीछे ढकेल दिया गया. किसान सूनी आंखों में अपनी बेबसी लिए सलाखों के पीछे अपनी किस्‍मत पर रोने को विवश था.

दूसरे करेक्‍टर डाक्‍टर साहब पर भी 56 लाख रुपए का बकाया था. गलत इलाज करने पर उपभोक्‍ता फोरम ने 56 लाख रुपए मरीज को चुकाने का फैसला सुनाया था. डाक्‍टर साहब की गलती से एक 14 वर्षीय बच्‍ची ने अपना पैर ही गंवा दिया था. 56 लाख का बकाया ना देने वाले डाक्‍टर को पकड़ कर नहीं लाया गया था बल्कि इज्‍जत के साथ बुलाया गया था. यह डाक्‍टर जब तहसील कार्यालय पहुंचा तो अधिकारी से लेकर चपरासी तक इसकी आगवानी में बिछ गए. 56 लाख के बकाएदार को बैठने के लिए तहसील में कुर्सी दी गई. इनके लिए कानून का पालन कराया जाना सरकारी कारिंदों की कोई मजबूरी नहीं थी. ये पैसे वाले थे, लिहाजा इन पर कोई भी कानून-कायदा लागू नहीं होता था.

सत्‍ता-सिस्‍टम के बाद अब अपने आप को खुद से चौथा खंभा कहने वाले मीडिया की. तमाम अखबारों ने खबर प्रकाशित की, लेकिन डाक्‍टर की इज्‍जत बचाते हुए. किसी ने दो बकाएदार को जेल भेजने की कहानी लिखी तो देश का सबसे महाभ्रष्‍ट और शोषक घराना माने जाने वाला दैनिक जागरण ने खबर ही नहीं प्रकाशित की. इस खबर को सबसे बेहतर ढंग से पेश किया राष्‍ट्रीय सहारा, हिंदुस्‍तान, डेली न्‍यूज ऐक्टिविस्‍ट समेत कुछ अखबारों ने. जिले के कुछ चुनिंदा पत्रकारों मसलन आनंद सिंह, अशोक जायसवाल, प्रदीप शर्मा, महेंद्र प्रजापति ने बिना किसी डर भय के सत्‍ता-सिस्‍टम के इस भेदभाव की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की.

लेकिन खुद को विश्‍व का, देश का सबसे बड़ा अखबार बताने वाले समूह दैनिक जागरण ने इस खबर को प्रकाशित ही नहीं किया, क्‍योंकि डाक्‍टर से उसको गाहे-बगाहे विज्ञापन मिलता है. पैसे की बदौलत मीडिया को गिरवी रखने वाले जागरण समूह के बेशर्म पत्रकारों ने इस मामले में एक शब्‍द भी नहीं लिखा. आम लोगों की उम्‍मीदों का भी कुछ ख्‍याल नहीं किया. हालांकि इस बिके हुए समूह की इस कारगुजारी की जिले के लोग निंदा कर रहे हैं. इस एक घटना ने बता दिया कि देश आजादी के बाद भी अंग्रेजों के दमनात्‍मक कानूनों के सहारे चल रहा है, बस इसकी डोर अब काले अंग्रेजों के हाथ में आ गई. बाकी आजादी से पहले से लेकर अब तक कुछ भी नहीं बदला है. दमन वैसे ही जारी है. गरीबों के लिए अलग कानून, अमीरों के लिए अलग कानून.

चंदौली से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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