राधे मां का इंटरव्यू प्राइम टाइम पर चलाने को लेकर सुधीर चौधरी ने किया ट्वीट

ABP, India Tv, Zee Hindustan और नेटवर्क18 पर प्राइम टाइम में चलाए गए राधे माँ के इंटरव्यू के बारे में Zee News के एडिटर सुधीर चौधरी ने यह व्यंग्य किया है कि देश में मीडिया के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि उन्हें TRP रेटिंग्स के लिए अब राधे माँ का इंटरव्यू का सहारा लेना पड़ रहा है।

सुधीर चौधरी के इस ट्वीट के बाद पूरे नोएडा में यह जबरदस्त चर्चा है कि जो व्यक्ति खुद 100 करोड़ के extortion चार्जेज में तिहाड़ जेल रह कर आया हो, क्या उसे ऐसे नैतिक भाषण देने का अधिकार है। अब इस सवाल का जवाब तो सुधीर चौधरी ही दे सकते हैं।

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.)

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आजतक का ‘क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी’ शो सुपरहिट साबित हुआ!

सुप्रिय ने सुधीर चौधरी को उन्हीं के हथियार से पीट दिया!

टीवी न्यूज चैनलों की टीआरपी में इस बार भी आजतक नंबर वन है। आजतक का नंबर वन होना नई बात नहीं है, नई बात ये है कि टीआरपी में कुछ हफ्ते पहले आजतक के करीब पहुंच चुका जी न्यूज अब 5.4 प्वाइंट के फासले पर बहुत नीचे खिसक चुका है। आजतक की इस हफ्ते की टीआरपी 18.7 है, जबकि जी न्यूज की 13.3। इसके साथ ये भी साबित हो गया कि आजतक के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद के मुकाबले में दूर दूर तक भी किसी चैनल का संपादक नहीं है। उनकी प्लानिंग, चौकस निगाहें और टीआरपी की समझ के आगे सभी संपादक पानी मांग रहे हैं। सब कन्फ्यूज हो रहे हैं कि क्या दिखाएं, लोग क्या देखना चाहते हैं।

करीब साल भर पहले तक प्राइम टाइम में जी न्यूज ने सुधीर चौधरी के प्रोग्राम डीएनए से काफी बढ़त ली थी, लेकिन सुधीर चौधरी को सुप्रिय ने उन्हीं के हथियार से पीट दिया। अब आजतक का नौ बजे का प्राइम टाइम शो ‘खबरदार’ जी न्यूज के कार्यक्रम ‘डीएनए’ से आगे निकल चुका है। जी न्यूज ने शाम पांच बजे के रोहित सरदाना के शो-‘ताल ठोंक के’ से बढ़त ली थी। आजतक समेत तमाम चैनल 5-6 के स्लॉट में पीछे हो गए थे। सुप्रिय ने मास्टर स्ट्रोक लगाते हुए एक नया शो प्लान कर दिया-‘क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी’। दिलचस्प बात ये है कि ‘क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी’ का इस्तेमाल पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कभी केजरीवाल के इंटरव्यू के बाद उनसे बातचीत के दौरान किया था। जिसका सोशल मीडिया ने बहुत मजाक बनाया तो जी न्यूज ने बाकायदा उस पर प्रोग्राम भी चलाया। जिसमें पुण्य प्रसून वाजपेयी के साथ साथ आजतक की भी खिंचाई की गई थी।

खैर, ‘क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी’ शो के लिए सुप्रिय प्रसाद न्यूज 24 से नवीन कुमार को ले आए। अपनी प्रखर लेखन शैली और शानदार वॉयस ओवर के जरिए इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बनाने वाले नवीन कुमार को खुलकर खेलने का मौका मिला। ‘क्रांतिकारी, बहुत क्रांतिकारी’ शो सुपरहिट साबित हुआ। टीआरपी की रेस में रोहित सरदाना का शो पिछड़ गया। इसके अलावा सुप्रिय ने सुबह 11 बजे का नया शो नई पैकेजिंग के साथ शुरू करवाया-‘एक और एक ग्यारह’। नए दौर की एंकर्स नेहा बाथम और मीनाक्षी कंडवाल के साथ। ये शो भी अपने स्लॉट में अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों से बहुत आगे है। जी न्यूज ने घेराबंदी शाम 5 बजे से शुरू की थी, सुप्रिय ने ये काम 4 बजे से शुरू कर दिया। बिल्कुल नए कॉन्सेप्ट के साथ 5 महिला एंकर्स के साथ नया शो लांच कर दिया-पांच का पंच। यहां ये भी बता दें कि शाम 7-30 के स्पोर्ट्स बुलेटिन, रात 8 से 9 बजे के स्पेशल रिपोर्ट और रात दस बजे के पुण्य प्रसून वाजपेयी के शो दस्तक की टीआरपी हमेशा सभी चैनलों की अपेक्षा सबसे ज्यादा है और रही है। सुप्रिय ने घेराबंदी वहां लगाई, जिस चंक में बाकी चैनल या तो चुनौती देते नजर आ  रहे थे या फिर आजतक से आगे निकल रहे थे।

सुप्रिय के इसी मास्टर प्लान की वजह से आजतक ने अपने सभी प्रतिद्वंद्वियों को काफी पीछे छोड़ दिया था। चाहे वो एबीपी न्यूज हो या फिर जी न्यूज। इंडिया टीवी हो या फिर न्यूज नेशन या फिर इंडिया न्यूज। दरअसल सुप्रिय न सिर्फ टीआरपी मास्टर हैं, बल्कि वो अपनी टीम के एक एक बंदे की काबीलियत पहचानते हैं, उन्हें पता है कि उनका कौन सा टीम मेंबर किस चीज का माहिर है। उनकी निगाहें जहां हर खबर और हर विजुअल पर होती हैं, तो अपनी टीम के हर सदस्य पर होती हैं। अपनी टीम के लोगों की काबीलियत के के हिसाब से ही सुप्रिय फील्डिंग लगाते हैं, नतीजा सबके सामने है।

करीब छह साल पहले जब सुप्रिय प्रसाद  दोबारा आजतक गए थे, तब आजतक टीआरपी की रेस में इंडिया टीवी और एबीपी न्यूज से पिटते हुए कभी दूसरे तो कभी तीसरे नंबर पर रहने लगा था। सुप्रिय के आने के बाद से आजतक तीन हफ्तों के भीतर फिर नंबर वन हुआ, तबसे लगातार नंबर वन बना हुआ है। सुप्रिय के पीछे उनकी पूरी टीम खड़ी है। दूसरे चैनलों की परेशानी ये भी है कि कई जगह कप्तान को आजादी नहीं है तो कहीं राजनीति हावी है। इंडिया टीवी में कई कौन असली बॉस है, पता ही नहीं चलता, वहां स्वतंत्र कबीले बने हैं, जहां कोई दखल नहीं दे सकता। जी न्यूज में हिटलरशाही है, सारा फोकस सुधीर चौधरी के शो डीएनए पर होता है। एबीपी न्यूज पूरी तरह कन्फ्यूज हो चुका है और टीआरपी के लिए वो कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। न्यूज से बिल्कुल डिफोकस हो चुका है। इस दौर में न्यूज 24 और न्यूज 18 इंडिया (पूर्व में आईबीएन-7) इन दोनों चैनलों ने रेस में जगह बनाई है। दिग्गजों के आपसी टकराव में इंडिया न्यूज का बेड़ा गर्क हो चुका है। सुप्रिय प्रसाद की अगुवाई में आजतक कॉन्सेप्ट, प्रेजेंटेशन, फॉरवर्ड प्लानिंग और अपनी मजबूत टीम के जरिए न सिर्फ टीआरपी में बढ़त हासिल किए हुए है, बल्कि मनोवैज्ञानिक रूप से भी दूसरे चैनलों को बैकफुट पर ढकेल दिया है।

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रंगदार संपादक और राष्ट्रवादी शोर : टीवी जर्नलिज्म आजकल….

मोदी के राज में कानून का डंडा बहुत सेलेक्टिव होकर चलाया जा रहा है…

Nitin Thakur : एनडीटीवी प्रमोटर पर छापे के दौरान ‘ज़ी’ अजीब सी खुशी के साथ खबर चला रहा था. शायद उन्हें इस बात की शिकायत है कि जब उनकी इज्ज़त का जनाज़ा निकल रहा था तब उनका साथ किसी ने नहीं दिया. ज़ी का दर्द एक हद तक सही भी है. तब सभी ने चौधरी और अहलूवालिया का स्टिंग बिना ऐसे कुछ लिखे चलाया था कि “ये पत्रकारिता पर हमला है”. अब ज़ी हर बार जश्न मनाता है. जब एक दिन के एनडीटीवी बैन की खबर आई तो भी.. जब छापेमारी की खबर आई तो भी. उसे लगता होगा कि कुदरत ने आज उसे हंसने का मौका दिया है तो वो क्यों ना हंसे. बावजूद इसके सच बदल नहीं सकता कि उनका मामला खबर ना दिखाने के लिए संपादकों द्वारा रंगदारी की रकम तय करने का था और ये सब एक बिज़नेसमैन की वित्तीय अनियमितता का केस है जिसमें बैंक का कर्ज़ ना लौटाना प्रमुख है.

दोनों मामलों की गंभीरता की तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. ज़ी के मामले में पत्रकारिता पर हमला तब माना जाता जब कैमरे पर जिंदल का आदमी खबर रोकने के पैसे तय करता और ज़ी के संपादक खुले आम कहते कि हम बिकनेवाले नहीं. वहां ऐसा कुछ नहीं था. हां, जब जिंदल ने स्टिंग सार्वजनिक कर दिया तब ज़रूर ज़ी ने कहा कि हम तो खुद मीडिया को खरीदने की इस चाल का पर्दाफाश करनेवाले थे. हालांकि ये कभी नहीं पता चला कि कैसे? सीबीआई ने विदेश से लौटते ही घंटों तक वर्तमान सांसद चंद्रा जी से पूछताछ की और उन्होंने सीबीआई की पूछताछ के तुरंत बाद अपने संपादकों की क्लास लेने वाले ढंग में बाइट भी दी. वो फिर अलग कहानी है कि कैसे संपादकों से मिलने के बाद चंद्रा जी हल्के पड़ते चले गए. सवाल आज भी कायम है कि क्यों?

खैर आगे चलकर संपादकों का ना सिर्फ प्रमोशन हुआ बल्कि एक को तो जनता में अपनी छवि चमकाने के लिए फ्री हैंड दिया गया कि वो अपने शो को भयानक राष्ट्रवादी बनाकर हीरो बन जाए. इसके लिए अलग से लोगों की भर्ती हुई. आज कर्मचारियों की पूरी फौज सारा दिन सिर्फ एक शो में चांद तारे जड़ने के लिए लगी रहती है. वो जानती है कि ये शो सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं बनता. ये टीम की अनवरत मेहनत का परिणाम है कि आज कोई भी उस “रंगदार संपादक” की बात नहीं करता. अब सबको राष्ट्रवादी शोर ने बहरा कर दिया है. स्वयं चंद्रा जी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए टीवी पर अमीर बनने के टिप्स बेचने शुरू किए.

कई साल तक उस बोरियत से भरपूर शो को चलाकर वो भी अंतत: करियर गुरू जैसी इमेज बनाने में कामयाब रहे. दोनों ही लोगों ने विश्वसनीयता के संकट से जूझते हुए टीवी का उपयोग अपने निजी छवि निर्माण में जिस तरह योजनाबद्ध ढंग से किया उस पर मैं कभी पीएचडी का शोध करना चाहूंगा. आज दोनों के पास अपना बचाव करने के लिए फैन्स का साथ है. यकीन ना हो तो फैन पेज देख आइए. संपादक जी के नाम से लगे होर्डिंग तो मैंने दिल्ली के पॉश इलाकों तक में पाए हैं. ये अभूतपूर्व है जब एक संपादक को कुछ लोग नेता की तरह प्रमोट कर रहे हैं.

अब तो कोई उनका स्टिंग कर दे तो पहले की तरह परेशानी नहीं होगी. वो उसे अपने स्तर से पत्रकारिता पर हमला कह कर या सीधा सीधा राष्ट्रवादी पत्रकारों पर हमला कह कर बच निकलेंगे. निजी हितों की लड़ाई को कैसे अभिव्यक्ति या विचार की लड़ाई में बदला जाए ये उसकी तैयारी है. क्रिकेट मैच का बायकॉट दरअसल अपने उसी खास रुझानवाले फैन को ये भरोसा दिलाने के लिए है कि जब सारे मीडिया के लिए देश से ऊपर क्रिकेट हो गया था तब हम अकेले भारतीय सेना का पराक्रम दिखा रहे थे. उससे उलट एनडीटीवी ऐसी कोई कोशिश कभी करता नहीं दिखा. उन्होंने सरकारों से सवाल पूछे. भले चैनल का प्रमोटर कोई वित्तीय खेल करता ही रहा हो तो भी चैनल के तेवर ने पत्रकारिता के बेसिक्स के साथ खिलवाड़ नहीं किया.

खिलवाड़ तब होता जब चैनल धीरे धीरे अपनी टोन डाउन करता ताकि उसके प्रमोटर को सरकार के कोप से किसी हद तक बचाया जा सके. इससे उलट वो टीआरपी में जितना पिछड़ा उसका तेवर ज़्यादा ही तल्ख होता गया. बैन का नोटिस भेजकर सरकार ने सोचा होगा कि चेतावनी देकर चैनल के सुर साध लेगी मगर रवीेश कुमार की काली स्क्रीन का मैसेज साफ था. चैनल बैन तो सरकार ने वापस लिया ही.. प्रतिरोध की बहार देखकर समझ आ गया कि भले ही मालिक पर हमला कर दो लेकिन चैनल से बचकर रहो. चैनल की लड़ाई जो चेहरा लड़ रहा है उसे देश के करोड़ों लोगों का भरोसा हासिल है. बीच में उसकी क्रेडिबिलिटी भी खत्म करने की साज़िश हुई. भाई पर छिछला सा आरोप लगा और ट्रोल रवीश को किया जाने लगा. उसके बाद सोशल मीडिया पर किसी रवीश की छोटी बहन को भी ट्रोल किया गया. ट्रोल करनेवालों को इस तथ्य से बहुत लेनादेना नहीं था कि रवीश की कोई बहन ही नहीं है. खैर.. दो चैनलों के पाप की तुलना से मीडिया का कोई भला नहीं होनेवाला.

मैंने ये लड़ाई पहली बार पाकिस्तानी चैनल्स पर देखी थी जहां एंकर खुलेआम ऑन एयर अपने प्रतियोगियों की खिंचाई करते हैं. भारत के चैनल इस मामले में बेहद अनुशासित रहे मगर पहली बार इस नियम को ज़ी ने ही तोड़ा. उसने ही सबसे पहले सेकुलर मीडिया जैसी बात कहके देश को समझाने की कोशिश की.. कि वो खुद बाकी सबसे अलग हैं और सेकुलर तो कतई नहीं हैं. उसने ये हरकत इतनी बार दोहराई कि एक बार तो चैनल के मालिक को ऑन एयर सफाई देनी पड़ी कि हम किसी पार्टी के साथ नहीं हैं. ये ऐतिहासिक सफाई वो तब दे रहे थे जब कुछ महीने पहले अपने ही चैनल पर एक पार्टी के लिए प्रचार करते और वोट मांगते दिखे थे. ज़ाहिर है उनकी सफाई कपिल की कॉमेडी की तरह मज़ेदार थी.

वैसे उनके विरोधी नवीन जिंदल तो और भी माशाअल्लाह निकले. उन्होंने ज़ी को घेरने के लिए एक चैनल ही खरीद डाला. ज़ी फिर भी किसी ज़माने में कभी शानदार पेशेवर चैनल था जिसने राजनीतिक खबरों को बेहद अच्छे ढंग से रखने में साख बनाई थी मगर जिंदल इस पेशे में सिर्फ इसीलिए उतरे क्योंकि उन्हें ज़ी के हमलों का जवाब उसी की भाषा में देना था. इस सबमें किस को कितना फायदा हुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन पत्रकारिता का नुकसान बहुत हुआ. विरोधी चैनल को अपने खिलाफ खबर चलाने का कानूनी नोटिस भिजवाने वाला खेल ये दोनों खूब खेलते रहे हैं. भारतीय पत्रकारिता ने दो बिज़नेसमैन की लड़ाई में अपना इतना खून कब बहाया था याद नहीं. इतने बड़े मामले की जांच कहां तक पहुंची आज ये कोई नहीं जानता. वैसे मोदी सरकार को इनकी लड़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है.

कोल ब्लॉक की जिस जंग में दोनों के हाथ काले हुए उस पर अब कोई बात नहीं करता. सरकार के पास वक्त और ऊर्जा लगाने के लिए आज खुद का एक शत्रु है और फिलहाल उसका फोकस पूरी तरह उसी पर है. फोकस ना होता तो वो इतने छिछले आरोप में सीबीआई को कभी नहीं उतारती. प्राइवेट बैंक का कर्ज़ ना लौटाने का केस और उसमें भी एक ऐसे आदमी की शिकायत जो कभी इसी ग्रुप का खास रहा है सब कुछ ज़ाहिर करने के लिए काफी है. आरोप तो इतना कमज़ोर है कि जिसकी हद नहीं. प्रणय रॉय के पास कर्ज़ चुकाने के कागज़ात मौजूद हैं. अलबत्ता कागजों के सही गलत का फैसला बाद की बात है. अब लगे हाथ बता दूं कि जिस फेमा के उल्लंघन में चैनल की अक्सर खिंचाई होती है ठीक वही मामला एक अन्य मीडिया संस्थान पर भी है लेकिन उसे सरकार के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री के बहुत करीबी होने का ज़बरदस्त फायदा मिल रहा है.

मोदी के राज में कानून का डंडा इतना सेलेक्टिव होकर चलेगा ये अंदाज़ा लगाना तब बेहद आसान हो गया था जब गुजरात की एजेंसियों ने सरकार बनने के बाद उन तीस्ता सीतलवाड़ पर औने पौने आरोप लगाए जिसने गुजरात दंगों के मामले में मोदी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया. आज जो हो रहा है वो सीबीआई से पहले भी कराया गया है. इस काम में अब उसे महारत हासिल है. खुद मोदी का वो वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद है जिसमें वो सीबीआई को कांग्रेस की कठपुतली बता रहे हैं.

आज देश किस आधार पर मान ले कि वो प्रधानमंत्री का तोता नहीं है? मीडिया के उस खेमे से उनकी खुन्नस यूं भी पूरानी है जो अक्सर उनसे गुजरात दंगों पर सवाल करता रहा है. वो तो लाल किले तक से मीडिया को पाठ पढ़ा चुके हैं. उनके लिए मीडिया को उसकी हैसियत दिखाना कितना ज़रूरी है ये इसी बात से समझिए कि तीन साल गुज़र गए उन्होंने कभी खुलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की.. अलबत्ता संपादकों से अलग मिलकर निर्देश और सलाह देते रहते हैं. आज सत्ता उनके पास है और उसके साथ सीबीआई दहेज की तरह मिलती है. अब ये प्रधानमंत्री के विवेक पर है कि वो सीबीआई का इस्तेमाल व्यापमं जैसे बड़े घोटालों में कायदे से करते हैं या फिर अपने पूर्ववर्तियों की तरह विरोधियों को निपटाने और ब्लैकमेल करने में करते हैं. देश उन्हें देख रहा है.. वो कहां देख रहे हैं??

फेसबुक के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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अनुभव मित्तल की ‘आनलाइन कंपनी’ से सुधीर चौधरी भी हो गए परेशान!

Sudhir Chaudhary : My personal phone suddenly started ringing non stop last night and since then it has not stopped even for a second. I am getting nonstop calls from hired online goons using prepaid shady numbers, all of them similar in nature.

All messages and callers are pressurising to show news in Ablaze Online Scam’s main accused Anubhav Mittal’s favour. It’s a new age online intimidation executed by paid trolls.

Even if I switch off my phone for some time, the bombardment of text messages and continuous calls start as soon as I start the phone again. I have been receiving intimating calls and messages earlier also in my career while different stories against high and powerful but have never ever faced such consistent nonstop trolling on phone in such a high volume.

Anubhav Mittal masterminded a big online scam and now I know he is actually a mastermind in online terrorism. It’s a new phenomenon for media and also for police and investigating agencies to be prepared for in future.

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी की एफबी वॉल से.

इस मामले में सुधीर चौधरी ने यूपी पुलिस से मदद मांगी और यूपी पुलिस ने उन्हें तुरंत वो सारे नंबर देने को कहा है जिससे उन्हें कॉल, मैसेज और ह्वाट्सएप आदि आ रहे हैं… देखिए ट्वीट…

Sudhir Chaudhary ‏@sudhirchaudhary 

Spoke to @Uppolice Giving them all the numbers of online goons propagating for Anubhav Mittal of Ablaze Scam. 1680 Whatsapp, 321SMS, 132 Calls


UP POLICE @Uppolice 

@sudhirchaudhary @sardanarohit Matter taken up with @uppstf. Pls report it at reportfraud@upstf.com Action will b taken against intimidators


Sudhir Chaudhary ‏@sudhirchaudhary 

Thanks @Uppolice for this quick response.

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सुधीर चौधरी को मिला स्टे, जेल न जाएंगे

Sudhir Chaudhary : Calcutta High Court gives a stay order on the proceedings on non bailable FIR against Zee News reporter Pooja Mehta, her cameraman and me for reporting about #Dhulagarh Riots in West Bengal.

I am grateful to all of you for standing by our team during this period while we haven’t even tried to get anticipatory bail all this while and could be arrested anytime.

Thanks for raising your voice for truth and injustice. It’s a clear signal for political leaders in power who believe their powers are limitless.

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी की एफबी वॉल से.

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गैर-जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर सुधीर चौधरी और उनकी रिपोर्टिंग टीम के खिलाफ मुकदमा

पश्चिम बंगाल के धुलागढ़ में सांप्रदायिक हिंसा की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग से नाराज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी, रिपोर्टर पूजा मेहता और कैमरामैन तन्मय मुखर्जी के खिलाफ FIR दर्ज करा दिया है. मुकदमा 153(A) जैसी गैर जमानती धाराओं में लिखा गया है. सुधीर चौधरी ने एफबी पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है- ”मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मीडिया के दमन की कोशिश कर रही है, वो लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा हैं. आगे से कोई भी मीडिया हाउस दंगों की कवरेज करने से बचेगा. ये पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की साजिश है.”

पश्चिम बंगाल के संकराइल थाना क्षेत्र स्थित धुलागढ़ इलाके में दो गुटों के बीच हिंसा हुई. एक धार्मिक जुलूस के रास्ते को लेकर दंगा हुआ था. अगले दिन एक समुदाय के उपद्रवियों ने धुलागढ़ के बनर्जी पाड़ा, दावनघाटा, नाथपाड़ा में दूसरे समुदाय के मकानों और दुकानों में तोड़फोड़ कर आग लगा दिया. हिंसा के दौरान अराजक तत्वों ने जमकर बमबारी की. उपद्रवियों की भीड़ ने दुकानों के साथ-साथ कई घरों में भी लूटपाट की. कई घरों और दुकानों को आग के हवाले भी कर दिया. इससे पूरे इलाके में दहशत है.

एफआईआर पर सुधीर चौधरी की पूरी प्रतिक्रिया इस प्रकार है-

Sudhir Chaudhary : Just to inform all of you Mamta Banerjee Govt has filed an FIR against me and ZeeNews reporter Pooja Mehta and cameraperson Tanmay Mukherjee for covering Dhulagarh Riots on Zee News.The FIR has non bailable sections which is enough to gauge their intentions to arrest me and my colleagues. Pooja Mehta is just 25 and got the taste of Mamta’s intolerance so early in life in the form of a non bailable FIR.This is what a young girl reporter getting to learn from a woman chief minister who claims to be the champion of democracy.It’s another low point in our democracy to see a democratically elected govt using police force to curb media in an effort to suppress uncomfortable facts and reality.When you can’t manage media,use the state machinery to conquer the media only to conceal the failures of your administration. It shows the intolerance of a chief minister who is using the state machinery as her personal fiefdom and acting like a feudal lord. I see the positive side of this blunder as a window for all free minds of this nation to act and show fascist forces their actual place. Or once again Selfish Politics will prevail? That’s my fear. #IntolerantMamta

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उगाही में जेल जा चुके किसी संपादक को किसी राष्ट्र प्रमुख से मिलवाने की ये पहली घटना होगी (देखें तस्वीर)

Vishwa Deepak : अगर ये तस्वीर हैदराबाद हाउस की है तो कहा जा सकता है कि आज हैदराबाद हाउस की धरती पवित्र हो गई. आज एक महान ‘संत’ के चरण इस धरती पर पड़े. आप सब पहचानते हैं इस ‘संत’ को. ऐसा सौभाग्य भारत के किसी प्रधानमंत्री को शायद ही मिला होगा. उगाही के चक्कर में तिहाड़ जेल की रोटी खाने वाले किसी संपादक को किसी राष्ट्र प्रमुख से मिलवाने की ये शायद पहली घटना होगी.

आज भारत का लोकतंत्र धन्य-धन्य हो गया. गांधी,अंबेडकर से लेकर गणेश शंकर विद्यार्थी तक हर किसी की आत्मा खुशी से नाच रही होगी. वो सब पत्रकार थे लेकिन ऐसा सौभाग्य किसी को नहीं मिला. इस तस्वीर को पत्रकारिता के पाठ्यक्रम का हिस्सा बना देना चाहिए.

मान गया कि साहेब का सीना 56 इंच का है. ऐसे ‘संत’ को अपनाने का साहस वही दिखा सकते हैं.  इस तस्वीर से एक नैतिक शिक्षा भी मिलती है दोस्तों. शिक्षा यह है कि लूटिए, खसोटिए, चोरी कीजिए, डाका डालिए, झूठ बोलिए, दलाली कीजिए, दंगे फैलाइए सिस्टम आपको सम्मानित करेगा. सिस्टम का बाप यानि की प्रधानमंत्री भी आपका स्वागत करेगा. लेकिन अगर आपने ईमानदारी की राह पकड़ी तो आपका मारा जाना तय है. अभी कल ही Uday Prakash बोल रहे थे कि नैतिकता का अंत हो चुका है. नई सभ्यता में अब ये कोई पैमाना नहीं रहा. मैं स्वीकारने में थोड़ा हिचक रहा था. आज दिख गया – एक लेखक ने सच कहा था.

जी न्यूज में कार्य कर चुके युवा पत्रकार विश्व दीपक की एफबी वॉल से.

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लाखों सेलरी पाने वाले भक्त संपादकों अरनब-सुधीर को Y कैटगरी देने पर मोदी की लानत-मलानत

Markandey Katju :Why should Arnab Goswamy be provided Govt. security, and that too of the Y category, which means 20 guards will be with him day and night. Who will pay the salaries of these guards? It will be the government, which really means the public, because these salaries come from the taxes we pay. So we will have to pay for Arnab’s security.

Arnab is surely getting a huge salary from his employer. Why should he not pay for his security from his own pocket? There are many private security agencies which provide armed guards. Why did Arnab not hire them? Or else his employer, which is a very affluent business house, could have done so I believe some other mediapersons wh,o toe the govt. line have also been provided similar security by the Govt. Is this not deplorable? Must the public for these hired ‘tattoos’ and buffoons?

Nadim S. Akhter : अरनब गोस्वामी रिटार्यड पाकिस्तानी फौजियों-विशेषज्ञों को अपने शो में बुलाकर खूब लताड़ते हैं, दूसरों से गरियावाते हैं और बदले में उन पाकिस्तानियों को अपने शो में शामिल होने की मोटी फीस देते हैं. वरना अरनब की गाली सुनने कौन पाकिस्तानी उनके शो में शामिल होगा? फिर वही अरनब को कोई धमकी दे देता है. पाकिस्तान वाला ही कोई होगा. और अरनब को Y कैटिगरी की सुरक्षा मिल जाती है. लेकिन भारत सरकार को कोई नुमाइंदा और अरनब को सुरक्षा देने वालों में से कोई ये बताएगा कि अरनब की जिन बातों को सुनकर पाकिस्तान वालों की तरफ से उन्हें धमकी मिली है, वही आतंकी पाकिस्तान में ही रह रहे उन रिटार्यड फौजियों-विशेषज्ञों को क्यों नहीं धमकाते कि खबरदार जो अरनब के शो में शामिल हुए तो!! अरनब के शो के गेस्ट तो वहीं रह रहे हैं, उन्हें धमकाना आसाना है. अरनब तो इंडिया में है, उन्हें धमकाना मुश्किल है.

आपका लड़का अगर गलत रास्ते पर चल पड़ेगा तो आप पहले उसे डांटेंगे-समझाएंगे या फिर मुहल्ले के उस दादा के धमकाएंगे कि खबरदार ! जो मेरे बेटे के साथ दुबारा दिखे तो !! पहले आप अपने बच्चे को ही समझाएंगे ना. फिर सीमा पार से धमकी देने वाले पहले अपने पाकिस्तानी भाइयों को ही समझाएंगे-धमकाएंगे ना कि भारत के किसी भी टीवी शो में पार्टिसिपेट ना करो. या फिर दंबूक लेकर भारत के टीवी एंकरों को ही धमकाना शुरू कर देंगे? सोचने वाली बात है. फिर भी अरनब डर गए. सरकार भी डर गई. झटपट अरनब को बड़ी वाली सुरक्षा दे दी गई. उनका शो जारी रहेगा. फुंक चुके पाकिस्तानी विशेषज्ञ उनकी शो की शान बढ़ाते रहेंगे, टाइम्स नाऊ उनकी खाली जेबें गर्म करता रहेगा और शो चलता रहेगा. सब फिक्स है. अरनब को अगर इतना ही खतरा है तो उनका संस्थान और वे खुद प्राइवेट सिक्युरिटी गार्ड क्यों नहीं रख लेते? गजब पतन हुआ है ई अरनब का. सारा किया-धरा मट्टी में मिलाई दिया रे. अब से उसे अरनब गोस्वामी नहीं, भक्त अरनब कह के बुलाया जाएगा.

जाने माने पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और पत्रकार नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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Zee News वाले Sudhir को एक पत्र : ये डिज़ाइनर पत्रकार क्या होता है चौधरी साब?

ज़ी न्यूज़ के एक प्रोग्राम डीएनए में सुधीर चौधरी बार बार डिज़ाइनर पत्रकार और सच्ची पत्रकारिता का जिक्र कर रहे थे. मन में उनसे कुछ पूछने की इच्छा जागी है. अगर आपके माध्यम से मेरी बात उन तक पहुँच सके तो आभारी रहूँगा.

Regards,
Karamvir Kamal
Editor
The Asian Chronicle
editor.theasianchronicle@gmail.com

ये डिज़ाइनर पत्रकार क्या होता है चौधरी साब?

मैं ज़ी न्यूज़ को उस समय से जानता हूँ जबसे वीरप्पन को जाना। दूरदर्शन के दौर में डीडी-1 पर आने वाले समाचार के बाद कुछ देखा तो ‘आज तक मे पेश है अभी तक की खबरें’ वाला ‘आज तक’ और ‘आँखो देखी’। वैसे तो वीरप्पन और ज़ी न्यूज़ का कोई आपस में लेना देना है नहीं, परंतु चैनल बदलते बदलते कब जी न्यूज के एक न्यूज शो ‘इनसाइड स्टोरी’ में चलाई जा रही वीरप्पन की जीवन गाथा पर जा रुका, पता ही नहीं चला। स्टोरी इंट्रेस्टिंग थी, सो पूरी देखी और जाना की कौन है वीरप्पन। तो इस तरह ज़ी न्यूज़ से मेरी पहचान हुई।

अब बात ज़ी न्यूज़ वाले चौधरी साहब आपकी। काफी समय से बल्कि कई सालों से आपका ये डीएनए रेगुलर ही देख रहा था। न्यूज़ के मामले में डीएनए के अलावा सिर्फ पुण्य प्रसून बाजपेयी का 10 तक ही पसंद है। रवीश की रिपोर्ट भी अच्छी ही लगती है। कभी मुझे ये तीनों ही न्यूज़ प्रोग्राम बेहतरीन लगते थे। चौधरी साहब पिछले काफी समय या शायद कुछ ही सालों से आप पत्रकारिता क्या होती है, अपने इस शो के माध्यम से सभी को सिखा रहे हैं। आपका ये तकिया कलाम था कि अब जी न्यूज़ बताएगा की सच्ची पत्रकारिता क्या होती है।

जरा कोई खबर आपने चालाई तो बोलने लगे कि अब ज़ी न्यूज़ दिखाएगा सच्ची पत्रकारिता। सुधीर जी, क्या होती है सच्ची पत्रकारिता? बाकी चैनल को भी तो सिखाओ। कैसे होती है सच्ची पत्रकारिता? आजकल आपने नए शब्द की खोज की है… “डिज़ाइनर पत्रकार।” क्या होता है ये डिज़ाइनर पत्रकार? ज़रा बताओ तो, है क्या इसकी परिभाषा। आज भी जब आपके शो मे ये डिज़ाइनर पत्रकार बार बार सुन रहा था को बड़ा चुभ रहा था।

कभी मुझे आपकी निष्पक्ष खबरें अच्छी लगती थीं, पर आजकल जबसे बड़े साहब कमल पर बैठ कर राज्य सभा गए हैं (ये और बात है कि इसमें विवाद हो गया है, और मामला जांच में चल रहा है) आप एक तरफा हो गए हो। बात बात पर पत्रकारिता सिखाने लगते हो, पाकिस्तान भेजने लगते हो।

ऐसा क्या हो गया कि आप बात बात पर सच्ची पत्रकारिता का जिक्र करने लगते हो? आपको बार बार ये क्यूँ साबित करना पड़ता है कि आप ही सच्ची पत्रकारिता करते हो या कर सकते हो। आपने भारत के पत्रकारों को पाकिस्तान में जा कर रिपोर्टिंग करने को बोला है। पत्रकारों की तो भारत में भी हत्या होती है सर जी। 2015 में 110 के करीब जर्नलिस्ट की हत्या हुई थी। भारत पत्रकारिता के लिहाज से खतरनाक देशों की सूची में खतरनाक पायदान पर है। आप भी आरएसएस और बीजेपी नेताओं की तरह बात बात पर लोगों को पाकिस्तान भेजने लगे हो। कोई ट्रांसपोर्ट का बिज़नस है तो…?? खैर छोड़िए इस बात को। मेरे पास पासपोर्ट नहीं है, बनवा दो और वीज़ा दिला दो तो देख लें हम भी गांधी जी के उस वक्त के हिंदुस्तान के उस हिस्से को भी, भगत सिंह के लाहोर को भी। भारत के बिछड़े और बिगड़े उसके भाई को भी।

बार बार डिज़ाइनर पत्रकार और सच्ची पत्रकारिता आपको याद आ रही है। कहीं ऐसा तो नहीं आपके दिल से अभी साल 2012 गया नहीं। जब कोल की कालिख के बीच 100 करोड़ी पत्रकारिता का डिज़ाइन चेंज हो गया था। सुधीर जी, पांचों उंगलिया एक समान नहीं होती, इसीलिए आप बार बार ये डिज़ाइनर पत्रकारिता और सच्ची पत्रकारिता का आलाप करना छोड़ दे, बाकी लोग भी आप ही की तरह मेहनत करते हैं।

कभी था आपका प्रशंसक
कर्मवीर कमल
Editor
The Asian Chronicle
editor.theasianchronicle@gmail.com

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सौ करोड़ की उगाही वाली सीडी में सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की ही आवाज

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में मान लिया है कि स्टिंग वाले वीडियो में सुधीर और समीर की ही आवाज है. इससे पूर्व सांसद नवीन जिंदल की कंपनी से 100 करोड़ रुपये की उगाही के आरोपी ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिज़नेस के संपादक सीईओ समीर अहलूवालिया की परेशानी बढ़ सकती है. फोरेंसिक जांच प्रयोगशाला सीएफएल ने स्टिंग ऑपरेशन की सीडी में चौधरी और अहलूवालिया की आवाज सही पाई है. उनके वकीलों, विजय अग्रवाल और अमन लेखी ने भी सीबीआई कोर्ट में स्वीकार किया कि इस मामले से जुड़े वीडियो में उनके मुवक्किलों की ही आवाज़ है.

संभव है कि ज़मानत पर रिहा सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया दोनों की जमानत रद्द हो सकती है और उन्हें फिर से जेल जाना पड़ सकता है. वहीं, कुछ दिन पहले आवाज़ का नमूना देने में आनाकानी कर रहे सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को कड़ी फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा जेल भेजने की चेतावनी दी थी. साथ ही यह भी कहा था कि वॉयस सैंपल का टेक्स्ट क्या होगा, ये मुलज़िम से नहीं जांच अधिकारी से तय होगा.

कुरुक्षेत्र के पूर्व सांसद नवीन जिंदल ने 2012 में ज़ी न्यूज़ पर आरोप लगाया था कि चैनल ने उनसे खबर न दिखाने के एवज में 100 करोड़ रुपये की मांग की थी. जिंदल के अनुसार चैनल ने कोयला घोटाले में जिंदल के शामिल होने से जुड़ी खबर न चलाने के लिए फिरौती के तौर पर ये रकम मांगी थी. जिंदल ने स्टिंग ऑपरेशन की खबर की सीडी जारी करते हुए कहा था,  “जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने हमारी टीम से कहा कि वे तब तक हमारे खिलाफ नकारात्मक खबरें दिखाते रहेंगे, जब तक कि हम उन्हें 100 रुपए का विज्ञापन देने पर सहमति नहीं जताते.”

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सुधीर चौधरी एंड कंपनी को सुप्रीम कोर्ट ने हड़काया- ”प्रोसीजर्स ठीक से फॉलो करो वरना दोबारा जेल में ठूंस देंगे”

पत्रकारि‍ता को दलाली बनाने के आरोपी सुधीर चौधरी एंड कंपनी को सुप्रीम कोर्ट ने जमकर लताड़ लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो प्रोसीजर्स हैं, उन्‍हें ठीक से फॉलो करो वरना दोबारा जेल में ठूंस देंगे। चौधरी एंड कंपनी पर दि‍ल्‍ली पुलि‍स ने भी जांच में सहयोग न करने का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन्‍हें अपनी आवाज का सैंपल देने को कहा है।

सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालि‍या पर 2012 में नवीन जिंदल ने खबर की आड़ में सौ करोड़ रुपए की दलाली मांगने का आरोप लगाया था। इसके बाद पुलि‍स ने इन्‍हें गि‍रफ्तार कर जेल में डाल दि‍या था। जेल जाने के बावजूद इनने दलाली से तौबा न की और जेएनयू प्रकरण में सत्‍ता पक्ष की जमकर दलाली की। इससे आहत एक पत्रकार वि‍श्‍व दीपक ने इस्‍तीफा भी दे दि‍या था।

हालांकि मोदी जी ने इनकी दलाली का इन्‍हें ईनाम दि‍या और इन्‍हें एक्‍स कैटेगरी की पर्सनल सीक्‍योरि‍टी मुहैया कराई। वैसे चौधरी साहब पहले भी अफवाह उड़ाने के आरोपों से न सिर्फ घि‍रे हैं, बल्‍कि दोषी भी पाए गए हैं। दि‍ल्‍ली में स्‍कूल टीचर उमा खुराना का केस अभी भी सबको याद है जि‍समें इनने फर्जी स्‍टिंग करके एक शि‍क्षि‍का पर वेश्‍यावृत्‍ति का आरोप मढ़ दि‍या था।

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‘सुधीर चौधरी ने पहली बार दिल से ट्वीट किया पर नमक का कर्ज याद आते ही डिलीट कर दिया’

Sunil Kumar Singh : @sudhirchaudhary deleted this tweet? because first time he tweeted from his heart instead of wallet. शायद पहली बार इन्होंने ट्वीट में दिल से बात कही थी लेकिन फिर नमक का कर्ज याद गया होगा इसलिए डिलीट करना पड़ा।

Sanjaya Kumar Singh : कल मैंने इस ट्वीट को साझा नहीं किया। दरअसल मुझे यह फर्जी लग रहा था। यकीन नहीं था, इसलिए चेक भी नहीं किया। अब जब डिलीट हो गया है तो आप इसे फर्जी या डिलीट किया हुआ ट्वीट मानकर ही पढ़िए लेकिन इसमें जो मनोरंजन है, उस पर कोई टैक्स नहीं है। बिल्कुल फ्री।

सुनील कुमार सिंह और संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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जब ‘राष्ट्रवादी’ संपादक सुधीर चौधरी अपने प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बदज़ुबानी कर गए!

Vineet Kumar : दाग़दार संपादक सुधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री की गरिमा को पहुँचायी चोट… जिस दाग़दार संपादक सुधीर चौधरी को प्रधानमंत्री के साथ पहली सेल्फी लेने का गौरव प्राप्त हो, वो प्रधानमंत्री किसी भारतीय मीडिया को इंटरव्यू न देकर विदेशी अख़बार को इंटरव्यू दे, ये पीड़ा आप और हम नहीं समझ सकते.

सेल्फी और कोयना सम्मान हासिल करने के बाद चौधरी संपादक का मंसूबा यहाँ तक रहा होगा कि वो उनके शो डीएनए को प्रधानमंत्री देश का राष्ट्रीय शो घोषित कर दें..अब ऐसे में उन्हें फरंगी शब्द इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ जाती है तो आप एक कटिबद्ध संपादक की पीड़ा का अंदाज़ा लगा पाना हमारे बूते की बात नहीं है..

आप बस इतना समझ लीजिए कि ऐसे राष्ट्रवादी संपादक जब प्रधानमंत्री के लिए बदज़ुबानी कर सकते हैं तो बाकी के लिए….लेकिन फ़िरंगी शब्द इस्तेमाल करने से पहले संपादक चौधरी को सोचना चाहिए कि वो देश के प्रधानमंत्री पर ही नहीं, उस ग्लोबल छवि पर भी चोट कर रहे हैं जिसका लोहा पूरी दुनिया मान रही है. लिहाज़ा इससे वैश्विक स्तर पर अच्छा संदेश नहीं जाएगा..

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मेरे बारे में सोशल मीडिया पर अफवाह उड़ाकर चरित्र हनन का काम सुधीर चौधरी ने किया था : ओम थानवी

Om Thanvi : जो लोग पत्रकारिता के पतन पर शोध करते हों, वे ज़ी न्यूज़ के प्रधान संपादक के कृत्यों में एक प्रसंग और जोड़ कर रख सकते हैं। इसका भुक्तभोगी मैं स्वयं हूँ। कुछ महीने पहले मेरे बारे में सोशल मीडिया में एक अफवाह उड़ी की महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी के कारण मुझ पर हमला हुआ या मेरे साथ मारपीट हुई। सचाई यह है कि किसी के साथ आज तक हाथापाई तक नहीं हुई है। वह दरअसल डॉ नामवर सिंह के जन्मदिन समारोह की घटना थी, जहाँ साहित्य और पत्रकारिता पर ही बात हो रही थी। किसी ने जाने क्यों (दुश्मन कम तो नहीं!) वह अफवाह उड़ाई। उस सरासर अफवाह को सच्ची घटना मानकर अपने सोशल मीडिया खाते (ट्विटर) पर किसी और पत्रकार ने नहीं, श्रीमान सुधीर चौधरी ने चलाया। यह चरित्र-हनन का प्रयास नहीं था तो क्या था?

मुझे कोई हैरानी न हुई कि ज़ी-संपादक ने जानने की कोशिश तक नहीं की (क्यों करते!) कि उस वक्त वहां हिंदी के अजीम लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह, विष्णु नागर और पंकज बिष्ट भी मौजूद थे। अफवाह उड़ने पर नागरजी ने फेसबुक पर लिखा कि हमले या मारपीट की बात झूठ है। देर से पता चला कि पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका समयांतर में ‘सोशल मीडिया की असामाजिकता’ शीर्षक से टिप्पणी लिखी। बिष्टजी ने लिखा: “पिछले दिनों एक घटना सोशल मीडिया को लेकर ऐसी घटी जिसे इसके दुरुपयोग की संभावनाओं का निजी अनुभव कहा जा सकता है। यह छिपा नहीं है कि इस मीडिया का, विशेष कर पिछले दो वर्षों से, विरोधियों को आतंकित करने, चुप करने, बदनाम करने और आम जनता को भ्रमित करने के लिए अत्यंत आक्रामक तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। विशेषकर भाजपा-आरएसएस समर्थकों ने इस काम में महारत हासिल कर ली है।”

यह किस्सा भी चौधरी के खाते में जमा रहे, इसलिए लिख दिया। सनद भी रहे।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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एक पत्रकार हमें भेड़ियों में बदल रहा है

Himanshu Pandya : यह तस्वीर एक शिक्षक उमा खुराना की है. 28 अगस्त,2007 को उनके तुर्कमान गेट स्थित सरकारी स्कूल के बाहर अचानक भीड़ इकठ्ठा हुई और उमा जी कुछ समझ पातीं, इसके पहले गुस्साई भीड़ ने उन्हें स्कूल के बाहर खींचकर सड़क पर न केवल जान से मारने का प्रयास ही किया बल्कि सरे राह उनके कपडे फाड़ कर नग्न तक कर दिया था. मौके पर पहुंची पुलिस पर भी भीड़ ने पथराव कर दिया. पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी गई.

भीड़ ‘लाइव इंडिया’ नामक एक चैनल पर दिखाई गयी खबर से भड़की हुई थी जिसमें एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिये उन्हें सेक्स रेकेट चलाने का दोषी करार दिया गया था. जांच के बाद यह पूरा स्टिंग ऑपरेशन फर्जी पाया गया. सुधीर चौधरी नामक दलाल पत्रकार ने उमा जी के कुछ दुश्मनों के कहने पर यह नकली स्टिंग किया था. इसमें जिस लडकी को स्कूली छात्रा के रूप में दिखाया गया था, वह दरअसल उसी चैनल की एक रिपोर्टर थी, जो छात्रा होने की एक्टिंग कर रही थी.

न्यूज़ चैनल पर एक महीने का प्रतिबन्ध लगा दिया गया. उमा जी पूरी तरह बेदाग़ साबित हुईं. यही सुधीर चौधरी आजकल अपने उसी फर्ज़ी वीडियो के पुराने हथकंडे से लोगों को देशद्रोही साबित करने में लगे हैं. इस बार वे भीड़ को लोगों को मार देने के लिए उकसा रहे हैं. उमा जी की जगह खुद को रखकर सोचियेगा एक बार. एक पत्रकार हमें भेड़ियों में बदल रहा है.

जेएनयू में पढ़े और राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर में Lecturer के बतौर कार्यरत हिमांशु पंड्या के फेसबुक वॉल से. हिमांशु की यह पोस्ट एफबी पर तेजी से वायरल हो रही है.

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सुधीर चौधरी की दंगाई पत्रकारिता पर अदालत, प्रेस परिषद और मीडिया संगठनों को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए

Krishna Kant : गौहर रजा की नज्में सुनीं. सुधीर चौधरी नामक पत्रकार पर अब तक निजी तौर पर मैंने कुछ नहीं लिखा था. अपनी टीआरपी छाप सनक में ये शख्स उमा खुराना के चीरहरण से लेकर उगाही राष्ट्रवाद तक पहुंचते पहुंचते पागल हो गया है. इसको हाई लेवल सिक्योरिटी की नहीं, अब पागलखाने की जरूरत है. मोदी सरकार को देशहित में यह काम जरूर करना चाहिए. इन भाई साहब ने पहले फर्जी स्टिंग करके एक महिला को वेश्या साबित करने की कोशिश की और इनका चैनल बंद हुआ. फिर इन्होंने रिपोर्ट के बदले उगाही खाने की कोशिश की और जेल की हवा खाकर आए. अब ये मीडिया के नाम पर राष्ट्रवादी दुकान खोलकर बैठ गए हैं. सोने में सुहागा कि इन्हें मोदी सरकार मिल गई है.

ये कवियों शायरों को अफजल प्रेमी गैंग बता रहे हैं. मुझे यकीन है कि इन्होंने अपने जीवन में पहली बार कोई कविता सुनी होगी. इनको कोई बताओ कि सबसे खराब दौर में शासन और सत्ता के खिलाफ कितनी तीखी कविताएं लिखी गई हैं. पाकिस्तान में फ़ैज़ आदि शायरों को जेल काटना पड़ा. हिंदुस्तान में लिखने के लिए लोगों को जेल में सिर्फ अंग्रेजों ने डाला. उसके बाद कुछ एक अपवाद हैं. इनको सत्ता की दलाली की ऐसी आदत लग गई है कि यह चैनल करीब करीब आदमखोर होता जा रहा है. जनता के टैक्स के पैसे से ही इस प्राणी को इंसान बनाने का प्रयास होना चाहिए. ऐसे लोग समाज के लिए खतरनाक हैं.

हम पत्रकारों को सिखाया गया था कि पत्रकारिता मतलब होता है सत्ता का प्रतिपक्ष. आपको संवैधानिक अधिकारों के तहत जनता की ओर से लगातार सरकार से सवाल पूछना होता है. किसी दुर्भावना से नहीं, बल्कि जनहित में. न्यायालय, विधायिका और कार्यपालिका के अलावा प्रेस सत्ता का संतुलन बनाने में मदद करता है. वह इन तीनों के विचलन पर निगाह रखता है. यह आजादी के पहले से चला आ रहा है.

यह व्यक्ति न सिर्फ सत्ता की ओर से जनता से सवाल करता है, बल्कि सारे पत्रकारीय दायित्यों को ताख पे रखका दुर्भावना और नफरत फैलाता है. यह फर्जी वीडियो प्रसारित करके किसी को भी आतंकी और देशद्रोही होने का प्रमाणपत्र बांट रहा है. यह देश किसी पार्टी या विचारधारा का नहीं है. यह देश इस देश की जनता का है जो संविधान से चलता है. मैं किसी विचारधारा से असहमत हूं लेकिन उसके मानने वालों को आतंकी, देशद्रोही आदि कैसे कह सकता हूं? क्या मुझसे असहमत लोग मुझसे कम नागरिक हैं? यह व्यक्ति संघ और भाजपा के लंपट तंत्र के साथ मिलकर इस देश के संविधान पर नंगा नाच रहा है. सुधीर चौधरी की दंगाई पत्रकार पर अदालत, प्रेस परिषद और मीडिया संगठनों को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए.

जन सरोकारी पत्रकार कृष्ण कांत के फेसबुक वॉल से.

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‘जी न्यूज’ के पक्ष में प्रदर्शन! सुधीर चौधरी हुए खुश, देखें तस्वीर

 

Sanjaya Kumar Singh : ज़ी न्यूज कार्यालय के बाहर इन युवकों ने ज़ी न्यूज की खबरों से एकजुटता दिखाते हुए प्रदर्शन किया और इसे जी न्यूज के रामनाथ गोयनका पुरस्कार विजेता, संपादक सुधीर चौघरी ने अपने फेसबुक पेज पर लगाया है। कैप्शन लिखा है:

Youngsters outside Zee News office to show solidarity with Zee News. It’s very heartening to see the young generation supporting a news channel which is very rare these. Thank you guys!

“यह देखकर बहुत अच्छा लग रहा है कि युवा पीढ़ी एक समाचार चैनल का समर्थन करे, जो इन (दिनों) बहुत दुर्लभ है। शुक्रिया गाइज।”

(अब गाइज की हिन्दी मैं जानबूझकर नहीं लिख रहा हूं। आप जो चाहें समझ लें)।

चार घंटे में इसे 431 शेयर, 4028 लाइक और 328 कमेंट मिल चुके हैं। है ना अच्छे दिन?

अब समाचार चैनल के पक्ष में युवा इस तरह एकजुटता दिखाएं और संपादक अपने चैनल के समर्थन को इस तरह फेसबुक पर प्रचारित प्रसारित करें तो टीवी पर बेचारा कपिल शर्मा क्या करेगा?”

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जिसने किया महिला टीचर का सम्मान तार-तार, उसे मिला रामनाथ गोयनका सम्मान

Vineet Kumar : जी न्यूज के दागदार संपादक सुधीर चौधरी को 16 दिसंबर 2012 में हुए दिल्ली गैंगरेप की पीडिता के दोस्त का इंटरव्यू करने के लिए साल 2013 का रामनाथ गोयनका सम्मान दिया गया. ये सम्मान सुधीर चौधरी के उस पत्रकारिता को धो-पोंछकर पवित्र छवि पेश करती है जिसके बारे में जानने के बाद किसी का भी माथा शर्म से झुक जाएगा. पहली तस्वीर में आप जिस महिला के कपड़े फाड़ दिए जाने से लेकर दरिंदगी के साथ घसीटने,बाल नोचने के दृश्य दे रहे हैं, ये शिक्षक उमा खुराना है. इन पर साल 2007 में लाइव इंडिया चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया और लोगों को बताया कि ये महिला शिक्षक जैसे पेशे में होकर छात्राओं से जिस्मफरोशी का धंधा करवाती है. चैनल ने इस पर लगातार खबरें प्रसारित की.

नतीजा ये हुआ कि दिल्ली के तुर्कमान गेट पर बलवाईयों ने इस महिला को घेर लिया..कपड़े फाड़ दिए और मार-मारकर बुरा हाल कर दिया. पुलिस की सुरक्षा न मिली होती तो इस महिला की जान तक चली जाती. बाकी देश के लाखों लोगों की निगाह में ये शिक्षक ऐसी गुनाहगार थी जिसका फैसला लोग अपने तरीके से करने लग गए थे. लेकिन जल्द ही पता चला कि चैनल के रिपोर्टर प्रकाश सिंह ने कम समय में शोहरत हासिल करने के लिए जिस स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया था वो पुरी तरह फर्जी है. उस वक्त चैनल के प्रमुख यही सुधीर चौधरी थे और उन्होंने अपने रिपोर्टर को क्रिमिनल बताते हुए साफ-साफ कहा कि इसने हमें धोखे में रखा और इस खबर की हमें पहले से जानकारी नहीं थी. चैनल एक महीने तक ब्लैकआउट रहा. प्रकाश सिंह थोड़े वक्त के लिए जेल गए..फिर छूटकर दूसरे न्यूज चैनल और आगे चलकर राजनीतिक पीआर में अपना करिअर बना लिया और इधर खुद सुधीर चौधरी तरक्की करते गए.

इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के देखने के बाद जनता ने शिक्षक उमा खुराना के साथ जो कुछ भी किया, उसकी कोई भरपाई नहीं हुई..अब वो कहां हैं, क्या करती हैं, किस हालत में है इसकी मीडिया ने कभी कोई खोजखबर नहीं ली लेकिन अब जबकि सुधीर चौधरी को महिलाओं के सम्मान के लिए ये अवार्ड मिला है तो कोई जाकर उनसे अपने चिरपरिचत अंदाज में पूछे कि आपको ये खुबर सुनकर कैसा लग रहा है तब आपको अंदाजा मिल पाएगा कि महिलाओं का सम्मान कितना बड़ा प्रहसन बनकर रह गया है. बाकी जी न्यूज के इस दागदार संपादक पर बोलने का मतलब देशद्रोही होना तो है ही. ‪

कथित दलाली मामले में जेल जा चुके संपादक को मिला रामनाथ गोयनका सम्मान… एक तरफ कथित दलाली मामले में जेल जा चुके ज़ी न्यूज़ के दागदार संपादक सुधीर चौधरी को भारतीय पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ रामनाथ गोयनका सम्मान मिला है तो दूसरी तरफ हर साल की तरह मेरे उन दोस्तों को जो मीडिया में रहते हुए मेनस्ट्रीम मीडिया के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे हैं. कायदे से तो ऐसे दागदार संपादक पर हमें बात करनी छोड़ देनी चाहिए. भई जिसे देश की एक बड़ी जमात उसे राष्ट्रवादी मीडियाकर्मी मानकर सम्मान से डीएनए शो देखती है तो दूसरी तरफ खुद मीडिया के भीतर के लोग उन्हें पुरस्कार से नवाजते हैं.लेकिन इन सबके बीच मेरे दिमाग में एक सवाल तो बार-बार उठता ही है- क्या पुरस्कार चयन समिति में वो मीडियाकर्मी भी शामिल रहे हैं जिन्होंने 100 करोड़ की कथित दलाली मामले में कभी सौ सुधीर चौधरी का विरोध किया था? बाकी ब्रांड के मेकओवर के लिए रामनाथ गोयनका अवार्ड तो असरदार विम लिक्विड है ही..सारे दाग-धब्बे साफ़

और हां, रामनाथ गोयनका सम्मान से मोदी और उनकी सरकार को कोई लेना-देना नहीं है… कुछ लोग जी न्यूज के दागदार संपादक सुधीर चौधरी को पुरस्कार दिए जाने पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं. प्लीज ऐसा न करें. इस पुरस्कार से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है. इस तरह की बातें करने से संदर्भ बदल जाते हैं और एक सीरियस बात मजाक में बदल जाती है. ये पुरस्कार इंडियन एक्सप्रेस समूह के संस्थापक रामनाथ गोयनका की याद में उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए दी जाती है और इसका पूरा खर्च समूह अपने ढंग से वहन करता है. हां ये जरूर है कि कार्यक्रम में रौनक लाने के लिए हर साल बड़े पैमाने पर राजनीतिक और सरकार से जुड़े लोगों को आमंत्रित किया जाता है लेकिन इस पुरस्कार के दिए जाने में उनकी कहीं कोई भूमिका नहीं होती.

युवा मीडिया विश्लेषक और ब्लागर विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


मूल खबर>

कुलदीप नैयर को लाइफ टाइम अचीवमेंट… इन 56 पत्रकारों को भी मिला रामनाथ गोयनका एवार्ड…

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शुक्र मनाइए सुधीर चौधरी सरकार के मीडिया सलाहकार नहीं हुए अन्यथा पुरस्कार लौटाने वाले तिहाड़ जेल में होते!

Vineet Kumar :  जिस संपादक/एंकर को सलाखों के पीछे होना चाहिए उसे मालिक ने प्राइम टाइम में देश की डीएनए टेस्ट करने के लिए बिठा दिया है. ऐसे में जाहिर है कि वो पत्रकारिता नहीं, शोले के डायलॉग बोलेगा. शुक्र मनाइए कि ऐसा संपादक अभी तक मीडिया सलाहकार नहीं हुआ है..नहीं तो उलटे पुरस्कार लौटानेवाले लेखक तिहाड़ जेल में होते. उनपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया जाता.

जी न्यूज के दागदार संपादक/एंकर सुधीर चौधरी हम जैसे की एफबी वॉल या अपने उपर लिखी स्टेटस पर मिली टिप्पणियों से गुजरते होंगे या कोई उन तक ये संदेश प्रेषित करता होगा तो पढ़कर भाव विह्वल( हायपर इमोशनल ) हो जाते होंगे. उनके समर्थन में जिस तरह से लोग टूट पड़ते हैं, उतना तो उऩके जेल जाने पर उनके मातहत काम करनेवाले मीडियाकर्मी तक खुलकर साथ नहीं आए थे.

किसी खास राजनीतिक दल की टीटीएम करने का क्या लाभ होता है, वो देखकर गदगद होते होंगे कि सैंकड़ों टीटीएमकर्मी बिना किसी पीआर एजेंसी की एफर्ट की फ्री ऑफ कॉस्ट मिल जाते हैं जो मातहत मीडियाकर्मी से कहीं ज्यादा बीच-बचाव कर सकते हैं. बाकी स्टेटस लिखनेवाले हम जैसे को बोनस में गालियां मिलती है, वो अकड़ने की अलग वजह बनती होंगी.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


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जो व्यक्ति अपने पेशे से गद्दारी करके जेलयात्रा कर चुका है वह साहित्यकारों को उपदेश दे रहा है!

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प्रो. नामवर सिंह की बाडी लैंग्वेज देखते हुए लगा कि ये आदमी अपने पारिवारिक जीवन में भी बहुत डेमोक्रेटिक नहीं है!

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मोदी भक्ति का फल! सुधीर चौधरी को एक्स श्रेणी की सुरक्षा

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी को मोदी भक्ति का फल मिल गया है. उन्हें एक्स कैटगरी की सुरक्षा केंद्र सरकार ने दी है. सुधीर चौधरी को नवीन जिंदल से सौ करोड़ रुपये की फिरौती मांगन के आरोप में गिरफ्तार कर तिहाड़ भेजा गया था. फिरौती मांगने का टेप जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड के चेयरमैन नवीन जिंदल ने जारी किया था.  सुरक्षा दिए जाने के बारे में बताया गया है कि सुधीर चौधरी को अंडरवर्ल्ड से धमकी भरा फोन काल आया है. एक्स श्रेणी की सुरक्षा के तहत अब सुधीर चौधरी चौबीसों घंटे दिल्ली पुलिस व अर्द्ध सैनिक बलों के जवानों की सुरक्षा में रहेंगे.

कहा जा रहा है कि जिंदल के निजी कर्मचारी ने हाल में ही दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर बताया कि सुधीर चौधरी पर अंडरवर्ल्ड का हमला होगा और चौधरी की हत्या में जिंदल को फंसा दिया जाएगा. उन्होंने दिल्ली पुलिस को बताया कि वह इस बारे में पहले से आगाह कर रहे हैं ताकि मामले में जरूरी कार्रवाई की जाए. उधर जिंदल स्टील के प्रवक्ता ने कहा कि जेएसपीएल कानून का पालन करने वाली कंपनी है इसलिए उसने आगे की जांच के लिए मामले की जानकारी संबंधित अफसरों को दे दी है ताकि किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं हो.

उधर, कुछ लोगों का कहना है कि नरेंद्र मोदी के पक्ष में लोकसभा चुनाव से पहले और चुनाव के बाद अब भी जिस तरीके से सुधीर चौधरी ने धुआंधार बैटिंग की, उसका फल उनको एक्स श्रेणी की सुरक्षा के रूप में मिल गया है. हर पत्रकार का काम तो हमेशा खतरे भरा होता है और आए दिन पत्रकारों को धमकियां मिलती रहती हैं. इस तरह से एक्स श्रेणी की सुरक्षा तो हजारों उन पत्रकारों को मिलनी चाहिए जिनको जानमाल की धमकी मिल चुकी है.

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सुधीर चौधरी ने कुमार विश्वास को ‘कामुक कविराज’ कहा तो कुमार ने सुधीर को ‘तिहाड़ी’ करार दिया!

ट्विटर पर जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और कवि व ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास के बीच जबरदस्त आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है. सुधीर चौधरी ने कुमार विश्वास को एक ट्वीट में ‘कामुक कविराज’ कहा तो कुमार विश्वास ने सुधीर चौधरी को ‘तिहाड़ी’ करार देते हुए पूछा कि उन्हें उनके घर के किस सदस्य ने कामुक जैसी गोपनीय जानकारी दी है. दोनों के आरोप-प्रत्यारोप संबंधी ट्वीट का स्क्रीनशाट यूं है…

ज्ञात हो कि सुधीर चौधरी तिहाड़ जेल की यात्रा कर आए हैं इसलिए उन्हें तिहाड़ी कहकर कुमार विश्वास ने चिढ़ाया. उधर, सुधीर चौधरी ने जी न्यूज पर कुमार विश्वास पर लगे आरोपों को लगातार दिखाकर उन्हें ‘कामुक कविराज’ साबित करने की कोशिश की. इस आरोप प्रत्यारोप में कुमार विश्वास ने फोकस न्यूज पर चली वो क्लिप शेयर कर दी जिसमें सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की जमानत रद्द करने को लेकर कोर्ट ने पूछा है. वीडियो लिंक यूं है: https://www.youtube.com/watch?v=rSJsNYP8zNU

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चौधरी साब ने बजा दिया बाजा : छठें नंबर का चैनल हुआ ‘जी न्यूज’

एक अच्छा खासा न्यूज चैनल नए जमाने की धंधेबाज पत्रकारिता की सोहबत में पड़ा और देखते ही देखते पतन के पराकाष्ठा तक पहुंच गया. जिस जी न्यूज चैनल को लोग नंबर वन न्यूज चैनल की तरह ट्रीट करते थे और इसे नंबर वन न्यूज चैनल आजतक का प्रतिद्वंद्वी मानते थे, वह जी न्यूज अब छठें नंबर का न्यूज चैनल बन चुका है. इस सारे पतन के पीछे सिर्फ एक शख्स का नाम लिया जा सकता है और वह हैं सुधीर चौधरी. चौधरी साहब एजेंडा पत्रकारिता यानि सुपारी पत्रकारिता यानि रंगदारी पत्रकारिता के बादशाह माने जाते हैं. कभी जिंदल ग्रुप तो कभी कुमार विश्वास. कभी केजरीवाल तो कभी कोई अन्य.

जिसके खिलाफ ये ठान लेते हैं, बस अभियान चलाने लगते हैं, चलाते ही जाते हैं, आंय बांय सांय कुछ भी… बिना दूसरे की सुने. जिंदल ग्रुप से खबर रोकने के मामले में रंगदारी मांगकर तिहाड़ हो आए सुधीर चौधरी ने नवीन जिंदल को जी न्यूज के दुष्प्रचार से बचाने और अपना पक्ष रखने के लिए फोकस न्यूज चैनल खरीदने चलाने पर मजबूर कर दिया तो इन्हीं चौधरी साहब ने पिछले कुछ समय से कुमार विश्वास को निशाने पर ले रखा है. कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया की ताकत का जमकर इस्तेमाल करते हुए जी न्यूज और सुधीर चौधरी को इस कदर जवाब दिया कि एलीट लोग यानि पढ़े लिखे लोग अब इस न्यूज चैनल यानि जी न्यूज को देखने से परहेज करने लगे हैं. ज्ञात हो कि कुमार विश्वास की फेसबुक से लेकर ट्विटर और यूट्यूब तक पर कुल मिलाकर करोड़ों की फालोइंग है. साथ ही इनका सोशल मीडिया में जबरदस्त दखल हैं. डा. कुमार विश्वास के चाहने वाले उनके खिलाफ एक शब्द नहीं सुनना चाहते. ऐसे में जी न्यूज ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया और खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली.

जाने क्या बात है कि सुभाष चंद्रा की नजर से सुधीर चौधरी गिरते ही नहीं. लोग कहते हैं कि डा. सुभाष चंद्रा को डर है कि कहीं सुधीर चौधरी सरकारी गवाह न बन जाएं. यानि अगर सुधीर चौधरी को सुभाष चंद्रा ने छेड़ा तो जिंदल रंगदारी प्रकरण में सरकारी गवाह बनकर सुभाष चंद्रा को जेल भिजवा सकते हैं सुधीर चौधरी. इस बड़े भय खौफ के मारे सुभाष चंद्रा तब तक सुधीर चौधरी के खिलाफ कुछ नहीं बोल कर कह सकते हैं जब तक कि जिंदल वाला मुकदमा निपट न जाए. अपने दो संपादकों के जेल जाने के दौरान सुभाष चंद्रा पर भी गिरफ्तारी और तिहाड़ जाने की तलवार लटकी थी लेकिन जाने किस किस तरह के मैनेजमेंट के खेल खेलते हुए चंद्रा साहब खुद को जेल जाने से बचा सके थे. ऐसे में सुभाष चंद्रा अब सुधीर चौधरी को छेड़कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते, भले ही चैनल की टीआरपी नंबर तीन से नंबर छह पर चली आए. जी न्यूज के अंदरूनी हालात भी काफी संकटग्रस्त है. जो पुराने, ईमानदार और संजीदा किस्म के लोग थे, उन्हें प्रताड़ित पीड़ित परेशान कर बाहर जाने को मजबूर कर दिया गया है. अब जो नए लोग हैं वे चौधरी साहब के पसंद हैं और इनका समर्पण पत्रकारिता या जी न्यूज के प्रति न होकर सिर्फ और सिर्फ चौधरी साहब के प्रति है. ऐसे में कंटेंट और विजन को लेकर सोचा जा सकता है कि यह चैनल किस तरफ जा रहा है. हां, इस पूरी कवायद में सुधीर चौधरी की अपनी ब्रांडिंग बड़ी और तगड़ी हो चुकी है, जी न्यूज रसातल में जाए तो जाए.

आइए, इस साल के 22वें हफ्ते की टीआरपी देखें जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान जी न्यूज को हुआ है….

Weekly Relative Share

Source: BARC, HSM, TG:15+,TB:0600Hrs to 2400Hrs, Wk 22

Aaj Tak 16.0 up 0.5
ABP News 15.5 up 1.5
India TV 13.8 up 0.5
News Nation 10.7 up 1.2
India News 9.7 up 0.3
Zee News 8.0 dn 1.9
Tez 7.3 dn 0.2
News24 7.0 dn 0.5
IBN7 5.8 dn 0.7
NDTV India 4.8 dn 0.7
DD News 1.5 same

TG: AB Male 22+

Aaj Tak 15.4 dn 0.1
India TV 15.2 up 0.9
ABP News 12.9 dn 0.2
India News 9.9 up 1.6
News Nation 9.2 up 0.6
Zee News 8.7 dn 0.4
News24 8.0 up 0.3
Tez 8.0 up 0.6
IBN 7 6.2 dn 1.1
NDTV India 4.7 dn 2.2
DD News 1.8 up 0.1


इसके पहले वाले सप्ताह की टीआरपी जानने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें…

टीआरपी 21वां सप्ताह : इंडिया टीवी नंबर तीन पर खिसका

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ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

Sheetal P Singh : क़रीब दो तीन बरस पहले जी न्यूज़ ने हफ़्तों कोयला घोटाले और उसमें जिन्दल ग्रुप की मिली भगत पर नान स्टाप कवरेज दी थी। आपको मालूम ही है कि बाद में एक स्टिंग सामने आया था जिससे पता चला था कि सुधीर चौधरी समेत जी न्यूज़ के आला अधिकारी और जी के मालिक सुभाष चन्द्रा नवीन जिन्दल से समाचार रोकने के लिये १०० करोड़ की राशि माँग रहे थे। उसमें मुक़दमा दर्ज हुआ। चौधरी लम्बे समय जेल में रहे, सुभाष चन्द्रा अग्रिम ज़मानत पर बचे और मुक़दमा जारी है।

चौधरी इसके पहले एक Orchestrated sting में एक शिक्षिका को वेश्यावृत्ति की किंगपिन बतलाने की फ़र्ज़ी कोशिश के अपराध के मुख्य नियंता पाये गये थे पर वह चैनल कोई दूसरा था। अब उसी तरह का अभियान दौसा के किसान गजेन्द्र सिंह की आत्महत्या पर उन्होंने ले लिया लगता है। बीजेपी ने सुभाष चन्द्रा को उ०प्र० से राज्यसभा देने का वादा किया हुआ है। यह नहीं पता कि उसमें कोई प्रतिद्वन्द्वी आ गया या कुछ उससे ज़्यादा की इच्छा या महज़ TRP पर अभियान असामान्य है।

इस अभियान में मरहूम गजेन्द्र के परिवारजन व रिश्तेदारों को जी न्यूज़ के रिपोर्टर coax करके मनमाफिक शब्द/वाक्य हासिल करने की कोशिश करते लगते हैं। थीम यह है कि गजेन्द्र के फ़सली नुक़सान से प्रभावित होने की बात को गोल कर दिया जाय, बताया जाय कि वह साफ़ा बाँध कर ही बहुत कमा लेते थे, सो फ़सल के ख़राब होने का कोई असर न था। दूसरे उन्हे सिसोदिया ने फ़ोन कर बुलाया था और वे सिसोदिया के संपर्क में थे और अन्त में इस घटना की ज़िम्मेदारी केजरीवाल की है। न राजस्थान सरकार की मुख्यमंत्री का नाम न मोदी के ज़मीन हड़प क़ानून की बात न ओलावृष्टि से फ़सल की बर्बादी! ये पत्रकारिता है और “चौधरी” पत्रकार हैं!

वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी शीतल पी. सिंह के फेसबुक वॉल से.

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नवीन जिंदल की शिकायत पर मानवाधिकार आयोग ने जी मीडिया की जांच के निर्देश दिए

नई दिल्ली । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय से उद्योगपति नवीन जिंदल के खिलाफ ज़ी मीडिया की ओर से कथित तौर पर चलाए जा रहे नकारात्मक अभियानों की जांच करने को कहा है। आयोग ने कहा कि मंत्रालय इस बात की जांच करे कि क्या जी मीडिया अपनी दुश्मनी निकालने के लिए नवीन जिंदल के खिलाफ झूठी और उनके सम्मान को चोट पहुंचाने वाली खबरें प्रसारित कर अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस का दुरुपयोग कर रहा है।

नवीन जिंदल ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजी अपनी शिकायत में कहा है कि जी मीडिया के चैनलों ने 20 मार्च से 2014 से 14 नवंबर 2014 के दौरान उनके खिलाफ 3162 बार आपत्तिजनक, गुमराह और मनगढ़ंत खबरों का प्रसारण किया। शिकायत में कहा गया है कि जी मीडिया और उसके संपादक सुधीर चौधरी ने जानबूझ कर उनके खिलाफ ऐसी खबरें प्रसारित कीं, जिनसे उनकी गरिमा को चोट पहुंचती है। ऐसा करके वे अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस का दुरुपयोग कर रहे हैं।

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जी न्यूज व जी बिजनेस के आरोपी संपादकों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी लाने का अनुरोध

पूर्व कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल ने बुधवार को आइटीओ स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय में पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी से मुलाकात की। शाम 5.30 बजे पुलिस मुख्यालय पहुंचे जिंदल ने बस्सी से मुलाकात कर जी न्यूज व जी बिजनेस के आरोपी संपादकों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया। साथ ही उन्हें शीर्ष न्यायालय के आदेश की प्रति भी सौंपी, जिसमें न्यायालय ने दिल्ली पुलिस से जांच आगे बढ़ाने की बात कही है।

करीब 30 मिनट बाद पुलिस मुख्यालय से बाहर निकले जिंदल ने मीडियाकर्मियों से बातचीत में कहा, सोमवार को सुधीर चौधरी ने अग्रिम जमानत वापस ले ली है। मैंने पुलिस आयुक्त से मिलकर कार्रवाई में तेजी लाने का अनुरोध किया है। पुलिस आयुक्त ने जल्द से जल्द कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। कोल ब्लाक आवंटन घोटाला मामले में जिंदल के खिलाफ कई दिनों तक खबरें दिखाए जाने पर पिछले साल उन्होंने दिल्ली पुलिस आयुक्त से जी न्यूज के दो संपादकों सुधीर चौधरी व समीर अहलुवालिया के खिलाफ शिकायत की थी। जिंदल ने उक्त दोनों संपादकों पर सरकारी दस्तावेजों से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया था। इस पर अपराध शाखा ने मामला दर्ज कर दोनों संपादकों को गिरफ्तार किया था। बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी। ।

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ब्रेकिंग न्यूज… सुधीर चौधरी की सेल्फी… ब्रेकिंग न्यूज… दीपक चौरसिया का हालचाल …

मैं आज के दिन को मीडिया के लिहाज से शर्मनाक दिन कहूंगा. पत्रकारिता के छात्रों को कभी पढ़ाया जाएगा कि 25 अक्टूबर 2014 के दिन एक बार फिर भारतीय राजनीति के आगे पत्रकारिता चरणों में लोट गई. धनिकों की सत्ता भारी पड़ गई जनता की आवाज पर. कभी इंदिरा ने भय और आतंक के बल पर मीडिया को रेंगने को मजबूर कर दिया था. आज मोदी ने अपनी ‘रणनीति’ के दम पर मीडिया को छिछोरा साबित कर दिया. दिवाली मिलन के बहाने मीडिया के मालिकों, संपादकों और रिपोर्टरों के एक आयोजन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए. देश, विदेश, समाज और नीतियों पर कोई बातचीत नहीं हुई. सिर्फ मोदी बोले. कलम को झाड़ू में तब्दील हो जाने की बात कही. और, फिर सबसे मिलने लगे. जिन मसलों, मुद्दों, नारों, आश्वासनों, बातों, घोषणापत्रों, दावों के नाम पर सत्ता में आए उसमें से किसी एक पर भी कोई बात नहीं की.

सुधीर चौधरी सेल्फी बनाने लगे. दीपक चौरसिया हालचाल बतियाने लगे. रिपोर्टरों में तो जैसे होड़ मच गई सेल्फी बनाने और फोटो खिंचाने की. इस पूरी कवायद के दौरान कोई पत्रकार ऐसा नहीं निकला जिसने मोदी से जनता का पत्रकार बनकर जनहित-देशहित के मुद्दों पर सवाल कर सके. सब गदगद थे. सब पीएम के बगल में होने की तस्वीर के लिए मचल रहे थे. जिनकी सेल्फी बन गई, उन्होंने शायद पत्रकारिता का आठवां द्वार भेद लिया था. जिनकी नहीं बन पाई, वो थोड़े फ्रस्ट्रेट से दिखे. जबसे नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, एक बार भी पूरी मीडिया के सामने नहीं आए और न ही सवाल जवाब का दौर किया. शायद इससे पोल खुलने, ब्रांडिंग खराब होने का डर था. इसीलिए नया तरीका निकाला गया. ओबलाइज करने का. पीएम के साथ फोटो खिंचाने भर से ओबलाइज हो जाने वाली भारतीय मीडिया और भारतीय पत्रकार शायद यह आज न सोच पाएं कि उन्होंने कितना बड़ा पाप कर डाला लेकिन उन्हें इतिहास माफ नहीं करेगा.

जी न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ सुधीर चौधरी ने पीएम के साथ सेल्फी बनाई. इंडिया न्यूज पर ब्रेकिंग न्यूज चलने लगी. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया का प्रधानमंत्री ने हालचाल पूछा. महंगाई, बेरोजगारी और बदहाली से कराह रही देश की जनता का हालचाल यहां से गायब था. दिवाली की पूर्व संध्या पर सुसाइड करने वाले विदर्भ के छह किसानों की भयानक ‘सेल्फी’ किसी के सामने नहीं थी. सबके सब प्रधानमंत्री से मिलने मात्र से ही मुस्करा-इतरा रहे थे, खुद को धन्य समझ रहे थे.

रजत शर्माओं और संजय गुप्ताओं जैसे मीडिया मालिकों के लिए पत्रकारिता पहले से ही मोदी परस्ती रही है, आज भी है, कल भी रहेगी. इनके यहां काम करने वालों से हम उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वो कोई सवाल करेंगे. खासकर तब जब ये और इन जैसे मीडिया मालिक खुद उपस्थित रहे हों आयोजन में. सुभाष चंद्राओं ने तो पहले ही भाजपा का दामन थाम रखा है और अपने चैनल को मोदी मय बनाकर पार्टी परस्त राष्ट्रीय पत्रकारिता का नया माडल पेश किया है. अंबानियों के आईबीएन7 और ईटीवी जैसे न्यूज चैनलों के संपादकों से सत्ता से इतर की पत्रकारिता की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते हैं. कुल मिलाकर पहले से ही कारपोरेट, सत्ता, पावर ब्रोकरों और राजनेताओं की गोद में जा बैठी बड़ी पूंजी की पत्रकारिता ने आज के दिन पूरी तरह से खुद को नंगा करके दिखा दिया कि पत्रकारिता मतलब सालाना टर्नओवर को बढ़ाना है और इसके लिए बेहद जरूरी है कि सत्ता और सिस्टम को पटाना है. होड़ इस बात में थी कि मोदी ने किसको कितना वक्त दिया. मोदी ने कहा कि हम आगे भी इसी तरह मिलते जुलते रहेंगे. तस्वीर साफ है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कभी कोई कड़ा बड़ा सवाल नहीं पूछा जा सकेगा. वो जो तय करेंगे, वही हर जगह दिखेगा, हर जगह छपेगा. वो जो इवेंट प्लान करेंगे, वही देश का मेगा इवेंट होगा, बाकी कुछ नहीं.

ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरियों और फिक्सर पत्रकार दीपक चौरसियाओं से हमें आपको पहले भी उम्मीद न थी कि ये जन हित के लिए पत्रकारिता करेंगे. दुखद ये है कि पत्रकारिता की पूरी की पूरी नई पीढ़ी ने इन्हीं निगेटिव ट्रेंड्स को अपना सुपर आदर्श मान लिया है और ऐसा करने बनने की ओर तेजी से अग्रसर हैं. यह खतरनाक ट्रेंड बता रहा है कि अब मीडिया में भी दो तरह की मीडिया है. एक दलाल उर्फ पेड उर्फ कार्पोरेट उर्फ करप्ट मीडिया और दूसरा गरीब उर्फ जनता का मीडिया. ये जनता का मीडिया ही न्यू मीडिया और असली मीडिया है. जैसे सिनेमा के बड़े परदे के जरिए आप देश से महंगाई भ्रष्टाचार खत्म नहीं कर सकते, उसी तरह टीवी के छोटे परदे के जरिए अब आप किसी बदलाव या खुलासे या जन पत्रकारिता का स्वाद नहीं चख सकते. दैत्याकार अखबारों जो देश के सैकड़ों जगहों से एक साथ छपते हैं, उनसे भी आप पूंजी परस्ती से इतर किसी रीयल जर्नलिज्म की उम्मीद नहीं कर सकते क्योंकि इनके बड़े हित बड़े नेताओं और बड़े सत्ताधारियों से बंधे-बिंधे हैं. दैनिक जागरण वाले अपने मालिकों को राज्यसभा में भेजने के लिए अखबार गिरवी रख देते हैं तो दैनिक भास्कर वाले कोल ब्लाक व पावर प्रोजेक्ट पाने के लिए सत्ताओं से डील कर अखबार उनके हवाले कर देते हैं.

ऐसे खतरनाक और मुश्किल दौर में न्यू मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. न्यू वेब में वेब मीडिया शामिल है. सोशल मीडिया समाहित है. न्यूज पोर्टल और ब्लाग भी हैं. मोबाइल भी इसी का हिस्सा है. इन्हें दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी. कार्पोरेट मीडिया, जिसका दूसरा नाम अब करप्ट मीडिया या पेड मीडिया हो गया है, इसको एक्सपोज करते रहना होगा. साथ ही, देश के सामने खड़े असल मुद्दों पर जनता की तरफ से बोलना लिखना पड़ेगा. अब पत्रकारिता को तथाकथित महान पत्रकारों-संपादकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. ये सब बिक चुके हैं. ये सब चारण हो गए हैं. ये सब कंपनी की लायजनिंग फिट रखने और बिजनेस बढ़ाने के प्रतिनिधि हो गए हैं. इतिहास बताता है कि इंदिरा ने मीडिया से झुकने को कहा था तो मीडिया वाले रेंगेने लगे थे. अब कहा जाएगा कि मोदी ने मीडिया को मिलन के बहाने संवाद के लिए कहा तो मीडिया वाले सेल्फी बनाने में जुट गए.

फेसबुक पर वरिष्ठ और युवा कई जनपक्षधर पत्रकार साथियों ने मीडिया की इस घिनौनी और चीप हरकत का तीखा विरोध किया है. वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक Om Thanvi लिखते हैं :  ”जियो मेरे पत्रकार शेरो! क्या इज्जत कमाई है, क्या सेल्फियाँ चटकाई हैं!

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dhananjay Singh बताते हैं एक किस्सा : ”एस.सहाय जी स्टेट्समैन के संपादक हुआ करते थे,उनके पास इंदिरा जी के यहाँ से कोई आया सूट का कपड़ा लेकर की खास आपके लिए प्रधानमंत्री ने भेजा है,साथ में टेलर का पता भी था.उन्होंने धन्यवाद के साथ उसे लौटा दिया.कुछ समय बाद प्रधानमंत्री ने बंगले पर संपादकों को डिनर दिया.सहाय जी के अलावा बाकी सभी क्रांतिकारी संपादक एक जैसे सूट में थे…सब एक दूसरे की तरफ फटी आँखों से देखने लगे … इंदिरा जी का अलग ही स्टाइल था……. समय बदला है अब तो खुद ही सब दंडवत हुए जा रहे हैं….. हाँ सहाय जी के घर रघु राय की उतारी एक तस्वीर दिखती थी की संसद की सीढ़ियों के पास एक भिखारी कटोरा लेकर खड़ा है (शायद तब सिक्योरिटी इतनी नहीं रही होगी)………… सहाय जी के पास अंतिम समय में खटारा फिएट थी और वो अपने बच्चों के लिए भी ‘कुछ भी’ छोड़ कर नहीं गए.

कई मीडिया हाउसों में काम कर चुके आध्यात्मिक पत्रकार Mukesh Yadav लिखते हैं: ”सवाल पूछने की बजाय पीएम साब के साथ सेल्फी लेने के लिए पत्रकारों, संपादकों में होड़ मची है!! शर्मनाक! धिक्कार! निराशा हुई! सवाल के लिए किसकी आज्ञा चाहिए जनाब?

सोशल एक्टिविस्ट और युवा पत्रकार Mohammad Anas कहते हैं: ”लोकतंत्र में संवाद कभी एक तरफा नहीं होता। एक ही आदमी बोले बाकि सब सुने। साफ दिख गया लोकशाही का तानाशाही में कन्वर्जन। मनमोहन ने एक बार संपादकों को बुलाया था, सवाल जवाब हुए थे। कुछ चटुकारों और दलालों ने पत्रकारिता को भक्तिकाल की कविता बना डाला है। वरना करप्टों, झूठों और जनविरोधियों के लिए पत्रकार आज भी खौफ़ का दूसरा नाम है।

कई अखबारों में काम कर चुके जोशीले पत्रकार Rahul Pandey सोशल मीडिया पर लिखते हैं :

आज पत्रकारों के सेल्‍फी समारोह के बाद पि‍छले साल का कहा मौजूं है… आप भी गौर फरमाएं

पत्रकार नहीं बनि‍या हैं
चार आने की धनि‍या हैं।
खबर लाएं बाजार से
करैं वसूली प्‍यार से
लौंडा नाच नचनि‍या हैं
पत्रकार नहीं, ये बनि‍या हैं।
चार आने की धनि‍या हैं।

करैं दलाली भरकर जेब
जेब में इनकी सारे ऐब
दफ्तर पहुंचके पकड़ैं पैर
जय हो सुनके होवैं शेर
नेता की रखैल रनि‍या हैं,
पत्रकार नहीं ये बनि‍या हैं,
चार आने की धनि‍या हैं।

वरिष्ठ अंग्रेजी पत्रकार Vinod Sharma लिखते हैं : ”Facebook flooded with selfies of media persons with our PM. A day to rejoice? Or reflect?

कई अखबारों में काम कर चुके पत्रकार Ashish Maharishi लिखते हैं :  ”हे मेरे देश के महान न्‍यूज चैनलों और उसके कथित संपादकों, प्रधानमंत्री ने आपको झुकने के लिए कहा तो आप रेंगने लगे। क्‍या देश में मोदी के अलावा कोई न्‍यूज नहीं है। ये पब्‍लिक है, सब जानती है…हमें पता है कि मोदी की न्‍यूज के बदले आपको क्‍या मिला है….

वरिष्ठ पत्रकार Arun Khare लिखते हैं :  ”मीडिया ने कलम को झाड़ू में बदल दिया –मोदी । मोदी जी आपने इस सच से इतनी जल्दी परदा क्यों उठा दिया । कुछ दिन तो मुगालते में रहने देते देश को।

फेसबुक पर एक्टिव जन पत्रकार Dharmendra Gupta लिखते हैं : ”जिस तरह से मीडिया के चम्पादक आज मोदी के साथ सेल्फी खिंचवा कर के उस को ब्रेकिंग न्यूज बना रहे है उस से लगता है की अब लड़ाई भ्रष्ट राजनीतिको के साथ भ्रस्ट मीडिया के खिलाफ भी लड़नी होगी.

संपादक और साहित्यकार गिरीश पंकज इन हालात पर एक कविता कुछ यूं लिखते हैं :

पत्रकारिता का सेल्फ़ीकरण
———–
कई बार सोचता हूँ
बिलकुल सही समय पर
मर गए पत्रकारिता के पुरोधा,
नहीं रहे तिलक और गांधी,
नहीं रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर
गणेश शंकर विद्यार्थी भी
हो गए शहीद
राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी
का भी हो गया अवसान।
आज ये ज़िंदा होते तो
खुद पर ही शर्मिन्दा होते
पत्रकारिता की झुकी कमर
और लिजलिजी काया देख कर
शोक मनाते
शायद जीते जी मर जाते
सुना है कि दिल्ली में
‘सेल्फिश’ पत्रकारिता अब
‘सेल्फ़ी ‘ तक आ गयी है
हमारी खुदगर्ज़ी
हमको ही खा गयी है

जो भक्त लोग हैं, उन्हें मोदी की हर स्टाइल पसंद है. वे मोदी की कभी बुराई नहीं करते और मीडिया की कभी तारीफ नहीं करते. इन्हें ऐसी ही चारण मीडिया चाहिए, जिसे गरिया सकें, दुत्कार सकें और लालच का टुकड़ा फेंक कर अपने अनुकूल बना सकें. सवाल उन लोगों का है जो आम जन के प्रतिनिधि के बतौर मीडिया में आए हैं. जिन्होंने पत्रकारिता के नियम-कानून पढ़े हैं और मीडिया की गरिमा को पूरे जीवन ध्यान में रखकर पत्रकारिता की. क्या ये लोग इस हालात पर बोलेंगे या मीडिया बाजार के खरबों के मार्केट में अपना निजी शेयर तलाशने के वास्ते रणनीतिक चुप्पी साधे रहेंगे. दोस्तों, जब-जब सत्ता सिस्टम के लालचों या भयों के कारण मीडिया मौन हुई या पथ से विचलित हुई, तब तब देश में हाहाकार मचा और जनता बेहाल हुई. आज फिर वही दौर दिख रहा है. ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम सब वह कहें, वह बोलें जो अपनी आत्मा कहती है. अन्यथा रामनामी बेचने और रंडियों की दलाली करने में कोई फर्क नहीं क्योंकि पैसा तो दोनों से ही मिलता है और दोनों ही धंधा है. असल बात विचार, सरोकार, तेवर, नजरिया, आत्मसम्मान और आत्मस्वाभिमान है. जिस दिन आपने खुद को बाजार और पूंजी के हवाले कर दिया, उस दिन आत्मा तो मर ही गई. फिर आप खुद की लाश ढोकर भले इनसे उनसे मिलते रहें, यहां वहां टहलते रहें, पर कहा यही जाएगा कि ”मिस्टर एक्स, आप बेसिकली हरामजादे किस्म के दलाल हैं, पत्रकारिता में तो आप सिर्फ इसलिए हैं ताकि आप अपनी हरमजदई और दलाली को धार दे सकें”.

शायद मैं कुछ ज्यादा भावुक और आवेश में हो रहा हूं. लेकिन यह भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को पत्रकारिता में ले आई. ये भावुकता और आवेश ही तो अपन लोगों को कारपोरेट और करप्ट मीडिया में देर तक टिका नहीं पाई. यह भावुकता और आवेश ही तो http://Bhadas4Media.com जैसा बेबाक पोर्टल शुरू करने को मजबूर कर गया और इस न्यू मीडिया के मंच के जरिए सच को पूरे ताकत और पूरे जोर के साथ सच कहने को बाध्य करता रहा जिसके नतीजतन अपन को और अपन जैसों को जेल थाना पुलिस कोर्ट कचहरी तक के चक्कर लगाने पड़े और अब भी यह सब क्रम जारी है. शरीर एक बार ही ठंढा होता है. जब सांसें थम जाती हैं. उसके पहले अगर न भावुकता है और न ही आवेश तो समझो जीते जी शरीर ठंढा हो गया और मर गए. मुझे याद आ रहे हैं पत्रकार जरनैल सिंह. सिख हत्याकांड को लेकर सवाल-जवाब के क्रम में जब तत्कालीन गृहमंत्री चिदंबरम ने लीपापोती भरा बयान दिया तो तुरंत जूता उछाल कर अपना प्रतिरोध दर्ज कराया. जरनैल सिंह अब किसी दैनिक जागरण जैसे धंधेबाज अखबार के मोहताज नहीं हैं. उनकी अपनी एक शख्सियत है. उन्होंने किताब लिखी, चुनाव लड़े, दुनिया भर में घूमे और सम्मान पाया. मतलब साफ है कि जब हम अपने दिल की बात सुनते हैं और उसके हिसाब से करते हैं तो भले तात्कालिक हालात मुश्किल नजर आए, पर आगे आपकी अपनी एक दुनिया, अपना व्यक्तित्व और अपनी विचारधारा होती है.

करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के इस दौर में पत्रकार की लंबाई चौड़ाई सिर्फ टीवी स्क्रीन तक पर ही दिखती है. उसके बाहर वह लोगों के दिलों में बौना है. लोगों के दिलों से गायब है. उनका कोई नामलेवा नहीं है. अरबों खरबों कमा चुके पत्रकारों से हम पत्रकारिता की उम्मीद नहीं कर सकते और यह नाउम्मीदी आज पूरी तरह दिखी मोदी के मीडिया से दिवाली मिलन समारोह में. बड़ी पूंजी वाली करप्ट और कार्पोरेट पत्रकारिता के बैनर तले कलम-मुंह चला रहे पत्रकारों से हम उम्मीद नहीं कर सकते कि वह अपनी लंबी-चौड़ी सेलरी को त्यागने का मोह खत्म कर सके. इसी कारण इनकी ‘सेल्फी पत्रकारिता’ आज दिखी मोदी के मीडिया मिलन समारोह में.

आज राजनीति जीत गई और मीडिया हार गया. आज पीआर एजेंसीज का दिमाग सफल रहा और पत्रकारिता के धुरंधर बौने नजर आए. आइए, मीडिया के आज के काले दिन पर हम सब शोक मनाएं और कुछ मिनट का मौन रखकर दलाल, धंधेबाज और सत्ता परस्त पत्रकारों की मर चुकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे दें.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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सुभाष चंद्रा, समीर अहलूवालिया, सुधीर चौधरी, रुबिका लियाकत पर सावित्री जिंदल ने लगाए गंभीर आरोप

भारत की सबसे अमीर महिलाओं में से एक सावित्री जिंदल ने जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा और जी न्यूज के सीईओ समीर अहलुवालिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने जी न्यूज पर आरोप लगाया है कि इस चैनल ने जानबूझकर ऐसी खबरें दिखाई जिनसे उनकी और उनके परिवार की छवि को खराब किया जा सके। 64 वर्षीय सावित्री जिंदल ने इलेक्‍शन क‌मीशन से शिकायत करते हुए कहा है कि जी न्यूज लगातार चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन कर रहा है। अपनी शिकायत में उन्होंने सुभाष चंद्रा, हिसार से बीजेपी उम्मीदवार कमल गुप्ता, सीईओ समीर अहलुवालिया और जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी के साथ टीवी एंकर रुबिका लियाकत का भी नाम लिखा है। अपनी शिकायत में जिंदल ने कहा है कि सुभाष चंद्रा ने अपने चैनल पर उनके और उनके परिवार के बारे में आधारहीन और अपमानजनक बातें कहीं हैं। सावित्री जिंदल का आरोप है कि यह सब उन्होंने भाजपा उम्मीदवार कमल गुप्ता के कहने पर किया।

सावित्री जिंदल का आरोप है कि चार से छह अक्टूबर के बीच गलत और भ्रमित करने वाली जानकारी के आधार पर चैनल ने कार्यक्रम प्रसारित किया जिसके लिए सुभाष चंद्रा के साथ समीर अहलुवालिया, सुधीर चौधरी, रुबिका और लियाकत जिम्मेदार हैं। सावित्री का आरोप है कि उनके राजनीतिक विरोधी कमल गुप्ता ने यह गलत जानकारी प्रिंट मीडिया तक भी पहुंचाई साथ ही अफवाह फैलाने की कोशिश की गई कि जिंदल परिवार भ्रष्ट है। उनका कहना है कि इलियट क्लब की जमीन कभी भी नवीन जिंदल के नाम नहीं रही। लेकिन इस गलत जानकारी पर आधारित खबर को लगातार प्रसारित किया जाता रहा। जबकि यह जमीन अभी भी हरियाणा सरकार के कब्जे में है। अपनी शिकायत में उन्होंने बताया है कि 2005 में उनके पति ओपी जिंदल की दुर्घटना में मौत के बाद हरियाणा सरकार ने उनके सम्मान में पार्क के निर्माण का फैसला किया ‌था।

सरकार ने ओपी जिंदल फाउंडेशन से भी इस पार्क के विकास के लिए मदद मांगी। ट्रस्ट ने पार्क में मनोरंजन और योगा केंद्र के निर्माण के लिए लगभग ग्यारह करोड़ रूपये खर्च किए। उनका कहना है कि जिंदल परिवार इससे पहले भी विकास के काम करता रहा है। ऐसे में उनके परिवार पर इस तरह का आरोप लगाना बेहद गलत है। गौरतलब है कि सावित्री जिंदल के पति ओपी जिंदल हरियाणा सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। 2005 में एक हेलीकाप्टर दुर्घटना मे उनकी मौत हो गई। सावित्री जिंदल 2005 और 2009 में हिसार से कांग्रेस विधायक रह चुकी हैं। बता दें कि सावित्री जिंदल के पति ने ओपी जिंदल ग्रुप की स्‍थापना की थी। इस ग्रुप के संस्‍थापक की पत्नी सावित्री जिंदल 9.5 अरब डॉलर की संपत्ति के साथ दुनिया की सबसे रईस लोगों की सूची में शामिल हैं। जिंदल ग्रुप स्टील और बिजली उत्पादन से जुड़ा हुआ है। फोर्ब्स द्वारा सितंबर 2014 में जारी सूची के अनुसार टॉप 100 भारतीय अरबपतियों में सावित्री ‌जिंदल का 12वां स्थान है।

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मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे

(File Photo Sanjay Kumar Singh)

Sanjaya Kumar Singh : कई मित्रों ने कहा कि राजदीप सरदेसाई की पिटाई पर मैंने नहीं लिखा। साथी Sumant ने कहा है, “…. हमारी खामोशी भी पत्रकारिता के गिरते स्तर की गुनहगार है संजय भाई …..।” सुमंत से असहमत होने का कोई कारण नहीं है। कैश फॉर वोट स्कैम और उसकी लापता सीडी का मामला आपको याद होगा। एक मामला मैं और याद दिलाता हूं। हर्षद मेहता ने एक कॉलम लिखना शुरू किया था और उसका हिन्दी अनुवाद मुझे हिन्दी के अखबारों में छपवाना था। उस समय कई संपादकों ने कहा था कि हर्षद मेहता का कॉलम नहीं छापेंगे। हर्षद मेहता होते तो आज अखबार या चैनल भी चला रहे होते और वो संपादक उनकी नौकरी बजा रहे होते। पर वो अलग मुद्दा है। उस समय इतनी नैतिकता तो थी इनमें।

पर अब? मुझे सुभाष गोयल उर्फ सुभाष चंद्रा याद आते हैं। सुना है अपने चैनल पर लोगों को उद्यम चलाना सीखा रहे हैं। ये कैसे पत्रकार? धंधेबाज हैं। पैसे कमाना लक्ष्य है। मार खाएं, घाटा हो जाए, फंस जाएं, सरकार बकाया निकाल दे तो पत्रकार हो जाएंगे। ऐसे पत्रकारों को मैं पत्रकार नहीं मानता। उनकी पिटाई को पत्रकार की पिटाई नहीं मानता। वैसे भी खिलाड़ी पिता का पत्रकार बेटा राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता की एक दुकान खड़ी करके उसे 4000 करोड़ रुपए में बेच चुका है। 4000 करोड़ रुपए का मालिक बनने के लिए उसने पत्रकारिता के साथ-साथ तमाम हथकंडे अपनाए होंगे। ऐसे को दुनिया पत्रकार माने तो माने मैं नहीं मानता। ऐसे लोगों की पिटाई के कई कारण हो सकते हैं, भले ही प्रत्यक्ष तौर पर पत्रकारिता दिखाई दे। रामनाथ गोयनका को पत्रकार माना जा सकता है पर राजदीप सरदेसाई और रजत शर्मा को पत्रकार मानना मुझे नहीं जम रहा। अब तो सुभाष गोयल भी पत्रकार हैं – सरकारी मान्यता से लेकर दिल्ली में बंगला झटक लें तो हम-आप क्या कर लेंगे। पर ये ऐसे पत्रकार हैं जो पत्रकारिता के साथ सारे धंधे करेंगे और पिटेंगे तो पत्रकार हो जाएंगे।

जनसत्ता अखबार में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. 


(File Photo Mukesh Yadav)

Mukesh Yadav :राजदीप मारपीट प्रकरण में अब दूसरे पक्ष का विडियो सामने आया है! अगर पहला विडियो राजदीप द्वारा प्रायोजित था तो दूसरा सुब्रामण्यम स्वामी (बीजेपी) द्वारा प्रायोजित नहीं होगा इस बात की क्या गारंटी है? गौरतलब है कि दोनो ही विडियो बस कुछ सेकंड के हैं! एक में राजदीप पर हमला होते हुए दिख रहा है तो दूसरे विडियो में राजदीप खुद हमलावर है! आखिर इस पूरे सिलसिले को समेटता हुआ मास्टर विडियो कहाँ है? बेशक इस मामले में अब थर्ड पार्टी इन्वेस्टीगेशन होना ही चाहिए, तब तक निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी…जो भी दोषी होगा मेरी तरफ से उसकी एडवांस में निंदा।

जो मित्र ‘दूसरे विडियो’ में राजदीप को आक्रामक मुद्रा में देख निष्कर्षत: उसे विलेन घोषित कर चुके हैं, वे जल्दबाजी में संभवत: अर्ध सत्य ही देख पा रहे हैं! उन्हें कुछ दूसरे विडियो खोजकर देखने चाहिए। इनमें एकदम साफ नजर आ रहा कि आरएसएस के स्वयं सेवकों ने किस कदर राजदीप की घेराबंदी की हुई है और लगातार अपमानित कर रहे हैं! अगर आप मुझसे सहमत नहीं हो तो क्या बोलने नहीं दोगे? सवाल नहीं पूछने दोगे? रिपोर्टिंग नहीं करने दोगे? उलटे लांछन लगाओगे?…तुम्हारी ऐस्सी की तैस्स..! बस यही हुआ था। राजदीप का दोष सिर्फ इतना है कि – ही जस्ट गेट प्रोवोक्ड बाय दोज फासिस्ट्स! मैडिसन स्क्वायर में हुई इस घटना के माध्यम से आरएसएस ने न्यूज़ मीडिया को साफ़ सन्देश दे दिया है- या तो आप हमारे और हमारी सरकार के साथ हैं या फिर आप कहीं नहीं हैं! और आपके साथ भी वही किया जाएगा, जो तुम्हारे इस बंधु (राजदीप) के साथ हुआ है!…समझे की नहीं!

मीडिया से जुड़े रहे पत्रकार मुकेश यादव के फेसबुक वॉल से.

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राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने अपने दाग और जी न्यूज के पाप धोने में जुटे सुधीर चौधरी

सौ चूहे खा के बिल्ली चली हज को… जी न्यूज पर पत्रकारिता की रक्षा के बहाने हाथापाई प्रकरण को मुद्दा बनाकर राजदीप सरदेसाई को घंटे भर तक पाठ पढ़ाते सुधीर चौधरी को देख यही मुंह से निकल गया.. सोचा, फेसबुक पर लिखूंगा. लेकिन जब फेसबुक पर आया तो देखा धरती वीरों से खाली नहीं है. युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने सुधीर चौधरी की असलियत बताते हुए दे दनादन पोस्टें लिख मारी हैं. विनीत की सारी पोस्ट्स इकट्ठी कर भड़ास पर प्रकाशित कर दिया. ये लिंक http://goo.gl/7i2JRy देखें. ट्विटर पर पहुंचा तो देखा राजदीप ने सुधीर चौधरी पर सिर्फ दो लाइनें लिख कर तगड़ा पलटवार किया हुआ है. राजदीप ने रिश्वत मांगने पर जेल की हवा खाने वाला संपादक और सुपारी पत्रकार जैसे तमगों से सुधीर चौधरी को नवाजा था..

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया द्वारा जिंदल समूह के नवीन जिंदल से कोल ब्लाक धांधली प्रकरण की खबर रोकने के एवज में करोड़ों रुपये मांगने से संबंंधित स्टिंग की खबर को सबसे पहले भड़ास ने पब्लिश किया था (देखें http://goo.gl/x5y9Bz ) . उसके बाद इंडियन एक्सप्रेस समेत दूसरे मीडिया हाउसेज ने खबर को तब उठाया जब दिल्ली पुलिस ने नवीन जिंदल की लिखित शिकायत और प्रमाण के रूप में सौंपी गई स्टिंग की सीडी को देखकर एफआईआर दर्ज कर ली. फिर तो ये प्रकरण बड़ा मुद्दा बन गया और चारों तरफ पत्रकारिता के पतन की कहानी पर चर्चा होने लगी. सुधीर और समीर तिहाड़ जेल भेजे गए. इनके आका सुभाष चंद्रा पर गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी, लेकिन वो जेल जाने से बच पाने की एलीट तिकड़म भिड़ाने में कामयाब हो गए.

उन दिनों राजदीप सरदेसाई ने भी सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 पर सुधीर चौधरी के ब्लैकमेलिंग में जेल जाने के बहाने पत्रकारिता के पतन पर गहरा आंसू बहाया था. अब समय का पहिया जब काफी चल चुका है तब राजदीप सरदेसाई अपनी गालीगलौज व हाथापाई वाली हरकत के कारण सबके निशाने पर हैं और इनकी करतूत के चलते पत्रकारिता की हालत पर दुखी होकर टपाटप आंसू बहा रहे हैं सुधीर चौधरी. सोचिए जरा. इस देश के आम आदमी को मीडिया का संपूर्ण सच भला कैसे समझ में आएगा क्योंकि उसे कभी राजदीप सरदेसाई में सच्चा पत्रकार दिखता होगा तो कभी सुधीर चौधरी पत्रकारिता के हनुमान जी लगते होंगे.

इस विचित्र और घनघोर बाजारू दुनिया में दरअसल जनता के लिए सच जैसी पक्षधरता / चीज पर कोई मीडिया वीडिया काम नहीं कर रहा. सब अपने अपने एजेंडे, अपने अपने राग द्वेष, अपने अपने मतलब पर काम कर रहे हैं और इसे जन पत्रकारिता का नाम दे रहे हैं. ब्लैकमेलिंग में फंसे सुधीर चौधरी हों या हाथापाई-गालीगलौज करने वाले राजदीप सरदेसाई. इन जैसों ने असल में केवल खुद की ब्रांडिंग की है और अपनी ब्रांडिंग के जरिेए अपने लालाओं और अपनी तिजोरियां भरी हैं. क्या गलत है, क्या सही है, इस पर हम लोग भले तात्कालिकता / भावुकता के शिकार होकर फेसबुक-ट्विटर पर एक दूसरे का सिर फोड़ रहे हों, एक दूसरे को समझा ले जाने या निपटा देने में जुटे हुए हों लेकिन सच्चाई यही है कि अंततः राजदीप, सुधीर, हम, आप… हर कोई अपनी सुरक्षा, अपने हित, अपने दांव, अपने करियर, अपनी जय-जय में जुटा हुआ है और जो फिसल जा रहा है वह हर हर गंगे कहते हुए खड़ा होने की कोशिश मेें जुट जा रहा है.

देखिए इन्हीं मोदी महोदय को. गुजरात के दंगों के दाग से ‘मुक्त’ होकर विश्व नायक बनने की ओर चल पड़े हैं. इनकी बातें सुन सुन कर अब तो मुझको भी लगने लगा है कि सच में भारत को बहुत दिनों बाद कोई कायदे का नेता मिला है जो देश को एकजुट कर, एक सूत्र में पिरोकर बहुत आगे ले जाएगा… लेकिन जब मोदी की विचारधारा, मोदी के भक्तों, मोदी के अतीत को देखता हूं तो सारा उत्साह ठंढा पड़ जाता है क्योंकि ये लोग अपने हित के लिए कुछ भी, जी हां, कुछ भी, बुरा से बुरा तक कर डालते हैं. पर, समय और हालात, दो ऐसी चीज हैं भाइयों कि इनके कारण बुरे से बुरे को अच्छे से अच्छा में तब्दील होते देखा जा सकता है और अच्छे से अच्छा को बुरे से बुरा बताया जा सकता है. ऐसे ही हालात में मिर्जा ग़ालिब साहब ने कहा होगा…

रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहाँ कोई न हो
हमसुख़न कोई न हो और हमज़बाँ कोई न हो

बेदर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिये
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाईये तो नौहाख़्वाँ कोई न हो

और अंत में… जाते-जाते…

जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की वो सीडी जरूर देखिए जिसकी खबर भड़ास पर आने के बाद तहलका मचा और बाद में इन दोनों संपादकों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में जेल जाना पड़ा… आज यही सुधीर साहब देश को जी न्यूज पर राजदीप सरदेसाई के धतकरम के बहाने सच्ची-अच्छी पत्रकारिता सिखा रहे थे… इस लिंक पर क्लिक करें… http://goo.gl/N96BR8

बाकी, सुधीर चौधरी और जी न्यूज की संपूर्ण कथा इस लिंक में है… http://goo.gl/6k7p41

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली में जेल जा चुके सुधीर चौधरी पत्रकारिता की नसीहत दे रहे हैं राजदीप सरदेसाई को!

(File Photo Vinit Kumar)

Vineet Kumar : जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली मामले में जेल जा चुके सुधीर चौधरी आज राज राजदीप सरदेसाई को पत्रकारिता कैसे की जाए, नसीहत दे रहे हैं. चैनल शाम से एकतरफा स्टोरी चला रहे हैं. ‪#‎shameaAbroad‬ को ट्रेंड बनाने की कोशिश में लोगों से प्रतिक्रिया मांग रहा है…. आलोक मेहता जैसे बुरी तरह साख गंवा चुके संपादक हां में हां मिला रहे हैं. मुझे राजदीप सरदेसाई के पक्ष में कुछ नहीं कहना है… बस अफसोस इस बात का है कि आप वरिष्ठ, अनुभवी मीडियाकर्मियों ने जिस तरह अपनी जुबान बंद रखी, गलत का खुलकर विरोध नहीं किया, कई बार सरोगेट ढंग से शह दिया तो ऐसे दिन देखना स्वाभाविक ही है.

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जी न्यूज के दागदार संपादक और दलाली मामले में बुरी तरह साख गंवा चुके सुधीर चौधरी को जिस दिन गिरफ्तार किया गया, उस रात की बुलेटिन में देश के न्यूज चैनल के बेहद ही विश्वसनीय आवाज और चेहरा पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा- आज देश के लिए काला दिन है, आज देश के लिए इमरजेंसी जैसा दिन है..वाजपेयीजी को जितना मैं जानता-समझता और पढ़ता हूं, ये बात कहने के बाद संभवतः भारी बोझ महसूस किया होगा और जी न्यूज छोड़ दिया..उनकी गिल्ट ऐसा करके कितनी कम हुई होगी, नहीं मालूम लेकिन तोड़-जोड़ करके, बीइए-एनबीए सबको धत्ता बताकर ये दागदार संपादक न केवल जेल से बाहर आ गया बल्कि पहले की तरह उसी बेशर्मी से मूल्यों, नैतिकता, सरोकार का ज्ञान दर्शकों को देने लगा. वाजपेयीजी बेहद सच्चे, संवेदनशील और सादगी पसंद टीवी पत्रकार हैं. ऐसे लोग टेलीवजन दुनिया में अब नहीं आते..उन्हें सुधीर चौधरी की गिरफ्तारी के लिए इमरजेंसी शब्द प्रयोग का शायद हमेशा अफसोस रहे लेकिन उनके जी न्यूज छोड़ देने के बावजूद इन्डस्ट्री के भीतर सडांध कम तो नहीं हो गयी. व्यक्तिगत स्तर का ये फैसला कुछ बदल तो नहीं ही पाया.

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आप अपने देश में रहकर खबर के नाम पर दलाली मामले में जेल जाइए ( जी न्यूज), जेल जाते समय पुलिस को धमकाइए कि तुम्हें पता नहीं है कि मैं कौन हूं..थप्पड़ खाकर गाल रगड़िए. फर्जी स्टिंग ऑपरेशन करवाकर एक शिक्षिका को देह व्यापार का धंधा करनेवाली बताइए( लाइव इंडिया फर्जी स्टिंग ऑपरेशन) लेकिन विदेश में जाने के बाद राष्ट्रभक्त हो जाइए…सुधीर चौधरी की इस अदा पर कौन नहीं मर मिटेगा दोस्तों.

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महिलाओं को शुरु से अपमानित करते आए हैं सुधीर चौधरीः पहले शिक्षिका उमा खुराना का, अब सागरिका घोष का…  साल 2007 में सुधीर चौधरी जिस लाइव इंडिया के संपादक थे, उनके एक नउसिखुए रिपोर्टर प्रकाश सिंह जो कि रातोंरात चमकना चाहते थे, दिल्ली के एक स्कूल की शिक्षिका का फर्जी स्टिंग किया और उन्हें अपनी स्कूली छात्राओं को देह व्यापार में धकेलने, दलाली करनेवाला बताया. नतीजा, दिल्ली के तुर्कमान गेट पर दहशत का माहौल बन गया. हजारों की भीड़ और शिक्षिका उमा खुराना को खींचते, कपड़े फाड़ते धकियाते लोग..उस दिन उमा खुराना को लोग जान तक से मार देते. जांच हुई. स्टिंग फर्जी पायी गयी. प्रकाश सिंह को निकाला गया. चैनल एक महीने तक ब्लैक आउट किए जाने का फैसला आया..इस पूरे मामले पर संपादक सुधीर चौधरी ने कहा- रिपोर्टर ने मुझे धोखे में रखा, मुझे इस स्टोरी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. इस मामले से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया. आज इसी सुधीर चौधरी को न केवल अपने चैनल, अमेरिका के चैनल एबीसी की, मोदी सरकार की पल-पल की खबर और जानकारी है बल्कि राजदीप सरदेसाई और मोदी भक्तों के बीच झड़प में राजदीप की पत्नी( उनके लिए सागरिका घोष की पहचान बस यही है, उनकी अपनी पहचान से कोई मतलब नहीं) के नाम को कैसे घसीटा जा सकता है?

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मोदी भक्त और राजदीप सरदेसाई के बीच झड़प में उनकी पत्नी की क्या भूमिका है? हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि राजदीप सरदेसाई पूरी तरह निर्दोष हैं..लेकिन राजदीप सरदेसाई पर लगातार सवाल कर रहे जी न्यूज से ये कौन पूछेगा कि इस झड़प में राजदीप की पत्नी सागरिका घोष की क्या भूमिका रही है ? सागरिका का नाम जी न्यूज जिस तरह अपनी बुलेटिन में लगातार घसीट रहा है, क्या उसी मीडिया की नैतिकता के दायरे में आता है जिसकी दुहाई दागदार और दलाली के आरोप में जेल जा चुके चैनल के संपादक सुधीर चौधरी, अलग-अलग बुलेटिन के एंकर और आलोक मेहता जैसे संपादक दे रहे हैं. राजदीप सरदेसाइ पर कांग्रेसी होने का ठप्पी लगाने के लिए सागरिका घोष को अलग से टारगेट करना जी न्यूज की किस पत्रकारिता की नैतिकता का नमूना है. आप इस पैकेज को देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि जो झड़प हुई है, उसके लिए राजदीप सरदेसाई न केवल सागरिका घोष से सलाह-मशविरा करके किया बल्कि इसलिए भी किया क्योंकि वो कांग्रेसी हैं..अगर राजदीप इतने दुराग्रही हैं तो जी न्यूज, सुधीर चौधरी तो महान दूरदर्शी ही हुए. https://www.youtube.com/watch?v=54xGasucqAc

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जी न्यूज ने पत्रकारिता की नई परिभाषा दी. चैनल का कहना है कि अगर आपके देश का प्रधानमंत्री भारत को ब्रांड बनाने की कोशिश में विदेश जाता हो तो आप लोगों से कोई ऐसा सवाल न करें कि जिससे कि देशभक्ति पर आंच आ जाये.. आलोक मेहता एंकर और सुधीर चौधरी के समर्थन में कह रहे हैं कि आप पहले भारतीय हैं, उसके बाद पत्रकार है. भारतीयता और मोदी भक्ति कैसे एक-दूसरे में इमर्ज किया जा रहा है, देखते जाइए. सवाल बहुत सीधा है कि अगर आपकी देशभक्ति इस बात से निर्धारित होती है कि विदेश में कोई आपके नेता, मंत्री या प्रभावशाली व्यक्ति से असहमति में बात न करे, खबर न दिखाए तो क्या यही बात आप दूसरे देशों के संदर्भ में बर्दाश्त करते हैं?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.


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जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के स्टिंग की सीडी, जिसके बाद ब्लैकमेलिंग के आरोप में ये दोनों संपादक जेल गए, देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें… http://goo.gl/N96BR8

 

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