गोरखपुर के एक पत्रकार की कलम से पत्तलकारों को खुली चुनौती

के. सत्येंद्र-

गोरखपुर : वर्तमान परिवेश में घट रही तमाम घटनाओं को देखकर यह सोचता हूँ कि महिला के साथ घटित अपराधों के मामले में जब किसी महिला के ही संलिप्त होने का प्रमाण सामने आने लगे तो इसे क्या कहूं? क्या एक महिला ही दूसरी महिला की शत्रु बन चुकी है? ठीक इसी तरह यदि पत्रकारों को फर्जी मामलों में फसाये जाने के प्रकरण में यदि अन्य पत्रकारों के नाम ही सामने आने लगे तो इसे क्या कहा जाए?

बहरहाल कुछ भी हो, वर्तमान परिवेश के संकेत बहुत घातक हैं। पिछली बार जब मैंने भड़ास को एक ऑडियो भेजा और जब भड़ास द्वारा उसे प्रसारित किया गया तो अच्छे अच्छों के माथे पर पसीना छलक आया था। उस ऑडियो में सुनाई दे रहा था कि किस तरह कुछ एक ऐसे पत्रकारों के खिलाफ गहरी साजिशें रची जाती हैं जो दलालों की गुलामी, पराधीनता, चाटुकारिता और समर्पण से इन्कार कर देते हैं।

आज इस पोस्ट को भेजते समय भड़ास के संपादक महोदय से यही निवेदन करूंगा कि इस पोस्ट अवश्य प्रकाशित करने की कृपा करें क्योंकि मैं अपने खिलाफ साजिश करने वालों को इस पोस्ट के माध्यम से खुली चुनौती देना चाहता हूँ कि आओ मेरे सामने बैठो, अपने कैमरे अपने दलालों की टोली के साथ बैठो, मुझसे सवाल करो, मुझसे जवाब लो, मेरे खिलाफ सबूत दिखाओ… सिर्फ बातों की चाशनी मत ढकेलो।

दम है तो एक पब्लिक डिबेट करो। पूरी पब्लिक के सामने मुझे नंगा करो या मैं तुम्हे नंगा करूंगा। ये अपना हजार रुपये में मिलने वाला झुनझुना लेकर सबूत सबूत मत चिल्लाओ क्योंकि सबूत क्या होता है, तुमने अभी जाना ही नहीं। कानून क्या होता है और कितना अंधा होता है, तुमने पहचाना ही नहीं।

हमने तो सब देखा है पर शायद तुमने अभी कुछ देख ही नहीं। हमे बार बार जेल भेजवाने की साजिश करने का कोई फायदा नहीं। कुछ और सोचो क्योंकि जेल क्या होता है, ये हमने 22 महीने बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। वर्दी की खोल में बैठे शैतान सच्चाई का बलात्कार कर कैसे निर्दोषों को फँसाते हैं, सब हमने बड़े करीब से महसूस किया है। बहुत बखूबी जनता हूँ कि जेल में गिनती कितनी बार होती है, खाना कितनी बार मिलता है, एक कटोरी दाल में कितने दाने दाल के होते हैं। बैठकी क्या होती है, पगली घण्टी कब बजती है, तन्हाई बैरक क्या होती है और जेल निरीक्षण के नाम पर जिम्मेदार अपना कोरम कैसे पूरा करते हैं।

यदि तुम जैसे दलालों को अभी भी ऐसा लगता है कि तुम हमे डरा लोगे तो तुम्हारी यह सोच कितनी तुच्छ है, शायद तुम्हें अंदाजा नहीं है। जो आज हम हैं उसे पैदा तुम्हारी दलाली और सुतियापे ने ही किया है। तुम पत्तलकार दलालों की तो ये औकात भी नहीं की छह महीने भी जेल काट सको, और तुम हमे डराने का ख्वाब देखते हो। हमारी पत्रकारिता में वो दम है कि हमने न्यायपालिका में उठ रही सड़ांध के विरुद्ध आवाज उठाई और आवाज सुनी गई। तुमसे इस बारे में लिखने दिखाने की उम्मीद करना तो ताड़ के पेड़ से दूध निकलने की उम्मीद करने जैसा है।

अब भी कुछ शर्म बची है तुम दल्लो में तो लगाओ अपने कैमरे, जनता के सामने मैं अकेला बैठूंगा लेकिन दावा है कि जनता के सामने बगैर कपड़ों के नंग धड़ंग होकर तुम जाओगे, हम नहीं। अपना कैमरा अपना लौंडा लेकर अपनी धुन पर अकेले अकेले ही भचड़ करोगे और नाचोगे क्या, नहीं हम भी नाचेंगे, वाद्य यंत्र तुम्हारा होगा गाना तुम्हारा होगा संगीत तुम्हारा होगा सब कुछ तुम्हारा होगा लेकिन जनता के सामने बारात भी तुम्हारी ही निकलेगी।

के. सत्येन्द्र
पत्रकार
गोरखपुर

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