महाराष्ट्र में पत्रकार पर धारदार हथियारों से हमला

 

पीटीआई की खबर के मुताबिक महाराष्ट्र के बीड जिले में हथियारों से लैस चार लोगों ने एक पत्रकार पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया। 
 
पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार शनिवार रात चार नकाबपोश लोगों ने एक राष्ट्रीय समाचार एजेंसी एवं एक स्थानीय अखबार से जुड़े संजय मलानी पर हमला किया। 
 
हमले के कारणों का पता नहीं चल पाया है। संजय को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। जिलाधिकारी सुनील केंद्रेकर ने कहा कि हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

गोवा में गांव वालों ने तीस पत्रकारों को बंधक बनाया

 

गोवा के कुरपेम गांव में स्थानीय लोगों ने करीब 30 पत्रकारों को बंधक बना लिया. ये पत्रकार एक समारोह में कवरेज करने गए थे.
 
आजीविका के लिए खनन पर निर्भर स्थानीय लोगों ने पणजी से करीब 80 किलोमीटर दूर कुरपेम गांव में शुक्रवार को करीब 30 पत्रकारों को बंधक बना लिया.
     
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायर्नमेंट (सीएसई) और गोवा मराठी पत्रकार संघ की ओर से आयोजित तीन दिवसीय कार्यशाला में हिस्सा लेने के लिए पत्रकार वहां गए हुए थे.
     
आयोजकों में शामिल एक पत्रकार राजू नायक ने कहा कि करीब 80 लोगों के एक समूह ने हमें रोका और हमें दो घंटे तक बंधक बनाए रखा.
     
नायक ने कहा कि पुलिस को सूचित किया गया और पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने के बाद ही पत्रकार वहां से रवाना हुए.
     
स्थानीय लोग शायद इस बात से क्षुब्ध थे कि पूरे राज्य के खदानों में फिलहाल काम नहीं हो रहा है.
     
गोवा भारत में लौह अयस्क का बड़ा निर्यातक है. बहरहाल पिछले कुछ वर्षों से अवैध उत्खनन एवं पर्यावरणीय नुकसान चिंता का विषय बन गया है. (समय)

सहारा के मीडियाकर्मियों को फरमान, क्यू शॉप से ही खरीदो सामान!

: कानाफूसी : सहारा मीडिया में आजकल एक मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है. इस मुद्दे को जन्म दिया है सहारा ग्रुप की ओर से जारी एक आंतरिक सरकुलर ने. इस सरकुलर में कहा गया है कि सहारा मीडिया से जुड़े लोग अब क्यू शॉप की दुकान से ही आटा चावल दाल उर्फ घरेलू सामान खरीदें. इसके लिए सभी कर्मियों को उनकी सेलरी हैसियत के मुताबिक अलग-अलग कीमत के कूपन जारी किए गए हैं और कूपन में उल्लखित कीमत उनकी सेलरी से काटी जाएगी.

आपको भी पता होगा कि सहारा ग्रुप ने भी आटा चावल दाल तेल की दुकान खोल ली है, क्यू शॉप नाम से, कई शहरों में एक साथ. सहारा ने पहले लोगों को डराया, फिर दुकान खोलने की ओर कदम बढ़ाया. डराया, ये कि देश दुनिया में जो कुछ बिक रहा है, सब नकली है, जानलेवा है, इसलिए हे मनुष्यों, इधर आओ, बिलकुल पाकसाफ आइटम सहारा की क्यू शाप से खरीद ले जाओ. और, जब दुकान खुल गई तो खरीदार भी चाहिए, थोड़े बहुत नहीं बल्कि ज्यादा खरीदार चाहिए ताकि दुकान चलती नजर आए. इसलिए सहारा ग्रुप ने एक फरमान जारी कर दिया.

फरमान ये कि सहारा मीडिया के लोग अपना अन्न चावल दाल तेल घी आदि इसी क्यू शॉप से खरीदें. इसके लिए सहारा ने पच्चीस हजार रुपये नेट सेलरी पाने वाली की तनख्वाह से एक हजार रुपये और पच्चीस हजार से ज्यादा सेलरी पाने वाले के वेतन से तीन हजार रुपये काटने की घोषणा कर दी. इन रुपयों की जगह क्यू शॉप से खरीदारी के कूपन मिलेंगे और इस प्रकार सहारा मीडिया का कर्मी इन कूपनों का इस्तेमाल करने को मजबूर होगा.

इस फरमान के आने के बाद सहारा में हड़कंप मचा हुआ है. खासकर जो पच्चीस हजार रुपये से नीचे नेट सेलरी पाने वाले हैं, वे ज्यादा हाय हाय कर रहे हैं. इनका कहना है कि पहले ही कट पिट कर काफी कम तनख्वाह हाथ में आती थी, अब एक और चीज के लिए इन लोगों ने पैसे काट लिया. इनके मुताबिक, अगर कोई मीडियाकर्मी अपने गांव घर के खेत से उपजे अन्न आदि को लाकर खाता पकाता है तो वह क्यों भला क्यू शॉप से खरीदने जाए. यह तो सरासर ज्यादती है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

अगर आप भी इस मुद्दे पर कुछ कहना चाहते हैं या मीडिया जगत से जुड़ी किसी होनी-अनहोनी को शेयर करना चाहते हैं तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मीडिया की नजर बस इसी पर रही कि संजय जोशी से कौन मिलता है, कौन नहीं

Pankaj Jha : घिन आती है ऐसी पत्रकारिता पर. जितनी नफरत की जाय ऐसी लुच्ची पत्रकारिता से, कम है. कल भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री संगठन श्री संजय जोशी का रायपुर में एक कार्यक्रम था. स्टोरी लिखने वाले लोग भी बेहतर जानते हैं कि संजय जोशी जी छत्तीसगढ़ के एक-एक भाजपा कार्यकर्ता के दिल में बसते हैं. दायित्व में होने या नहीं होने से ऐसे शिल्पियों के सम्मान में कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन कल के कार्यक्रम को कवर ऐसे किया गया है मानो सबकी नज़र इसी बात पर लगी हो कि कौन जोशी जी से मिलता है कौन नहीं. गोया जोशी जी किसी अलग 'गुट' का प्रतिनिधित्व करते हों.

भाई मेरे …तुम्हें जितना लुच्चाई करना है करते रहो. चाह कर भी अपनी कुंठा यहां भाजपा पर नहीं थोप सकते. पार्टी एक है और रहेगी भी. जोशी जी का कल भी वही सम्मान था जो आज है और कल भी रहेगा. बस ऐसी-ऐसे कहानियां बना कर अपनी जात का परिचय देते हो और कुछ नहीं…देते रहो…डिस्गस्टिंग.

भाजपा से जुड़े पत्रकार पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार.

शुक्रिया ‘शुक्रवार’, लगा कि लोग पढ़ रहे हैं : आनंद प्रधान

Anand Pradhan : अपने लिखे हुए के प्रभाव पर भरोसा कुछ डिगने सा लगा था…कुछ भी लिखिए, कोई फर्क नहीं पड़ता!! लेकिन इधर साप्ताहिक पत्रिका “शुक्रवार” में दो लेख लिखे और कोई दो सप्ताह से उत्तर भारत के कई छोटे शहरों/कस्बों से बिलकुल अनजान लोगों ने फोन करके उनकी तारीफ़ की और कहा कि आपने आर्थिक सुधारों के बारे में बिलकुल सही लिखा है…इतनी प्रतिक्रियाएं आईं कि हैरान और खुश दोनों हूँ…

क्या इतनी प्रतिक्रियाएं इसलिए आईं कि ‘शुक्रवार’ लेख/टिप्पणी के साथ फोन नंबर भी छापता है?…कारण चाहे जो हो लेकिन इससे पता लगा कि छोटे शहरों/जिलों/कस्बों में न सिर्फ लोग पढ़ रहे हैं बल्कि व्यग्र और बेचैन भी हैं…लगा कि लिखने का अर्थ और प्रभाव अब भी है…शुक्रिया ‘शुक्रवार’… वैसे अखबारों/पत्रिकाओं में लेख/टिप्पणियां लिखते हुए कोई १७ साल हो गए…हालाँकि ‘दिनमान’, ‘जनसत्ता’ और ‘समकालीन जनमत’ में घटनाओं/समस्याओं की इन-डेप्थ रिपोर्टिंग/विश्लेषण १९८५ से शुरू कर दी थी. उससे पहले इंटर-मिडीएट के विद्यार्थी के बतौर १९८३-८५ तक ‘आज’ (रांची) के लिए हजारीबाग से स्ट्रिंगर की तरह खबरें भेजता था…

लेकिन जब लेख/टिप्पणियां लिखनी शुरू कीं तो शुरूआती वर्षों में लोगों की खासकर अपने मित्रों की काफी प्रतिक्रियाएं मिलती थीं…अच्छा लगता था..अब कभी-कभार प्रतिक्रियाएं मिलती हैं…इसलिए ही अपने लिखे पर शक होने लगा था लेकिन ‘शुक्रवार’ के लेखों पर आए फोन काल्स ने उत्साह बढ़ा दिया है… मतलब लोग पढ़ रहे हैं और लिखने का असर होता है…एक टिप्पणीकार को और क्या चाहिए?

आनंद प्रधान के फेसबुक वॉल से साभार.

जी न्यूज के सीईओ बने आलोक अग्रवाल

जैसा कि भड़ास4मीडिया पर प्रसारित खबर में बताया गया था कि बरुन दास के इस्तीफे के बाद सीईओ की कुर्सी पर आलोक अग्रवाल के आसीन होने की संभावना है, वैसा ही हुआ. इस बारे में द हिंदू बिजनेस लाइन में समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से खबर प्रकाशित हुई है. पूरी खबर इस प्रकार है….

Alok Agrawal to be new CEO of Zee News

New Delhi, Sept 30 : Zee News on Sunday said its Chief Executive Officer Barun Das has stepped down after a stint of five years. The channel has appointed Alok Agrawal as the new CEO. He will take charge on October 1, Zee News said in a statement.

“Over last four years, Barun has contributed immensely to the growth of Zee News and taken the company to greater heights. We wish him the best for his future endeavour,” Zee News Managing Director Punit Goenka said.

“We welcome Alok into the Zee News family. His rich experience in the media domain would help us take Zee News to the next level of growth,” he added. An alumnus of IIT Kanpur and IIM Bangalore, Agrawal has over 22 years of experience. PTI

लखनऊ में हुआ हिंदी दैनिक ”अवध प्रांत” का लोकार्पण

हिंदी दैनिक समाचार पत्र ''अवध प्रान्त'' का लोकार्पण लखनऊ महानगर से दिनांक २६-०९-१२ को किया गया. इस अखबार के संपादक उत्कर्ष सिन्हा और विज्ञापन विभाग की जिम्मेदारी शैलेश पाण्डेय को दी गयी है. अखबार का सीईओ डॉ. मधु पाठक को बनाया गया है. लोकार्पण कार्यक्रम में कई गणमान्य लोग मौजूद थे.

कार्यक्रम में महापौर लखनऊ दिनेश शर्मा, प्रख्यात कवि एवं लेखक गोपाल दास नीरज, कुलपति किंग जार्ज मेडिकल कालेज प्रो. डी. के. गुप्ता, अखबार के संरक्षक के.एन. खरवार और प्रधान सम्पादक जन्मेजय खरवार ने समाचार पत्र के सम्बन्ध में अपनी अवधारणा व्यक्त की. कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात व्यंग्यकार सर्वेश अस्थाना ने किया. मौके पर आए सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.

जी न्यूज के सीईओ बरून दास का इस्तीफा

सुभाष चंद्रा की कंपनी जी न्यूज लिमिटेड के चीफ एक्जीक्यूटिव आफिसर बरुन दास ने इस्तीफा दे दिया है. वे पिछले पांच साल से कंपनी के साथ कार्यरत थे. चर्चा है कि जी न्यूज के नए सीईओ आलोक अग्रवाल बनेंगे. बरुन दास ने जी न्यूज के साथ पारी वर्ष 2007 में शुरू की थी. तब उन्हें किसी भी न्यूज चैनल का सबसे युवा सीईओ माना गया.

बरुन दास आईआईटी मद्रास से बीटेक हैं. आईआईएम कोलकाता से पीजी डिप्लोमा की डिग्री उन्होंने ली है. वे इंडिया टुडे ग्रुप समेत कई कंपनियों में काम कर चुके हैं. चर्चा है कि बरुन दास अब अपना खुद का काम शुरू करने वाले हैं.
 

बिकाश द हितवाद पहुंचे, अनिल जांदू ‘सीमा संदेश’ में

अनिल जांदू पत्रकारिता में फिर सक्रिय हो गए हैं. पारिवारिक व्यस्तता के कारण वे सक्रिय पत्रकारिता से एक साल दूर रहे. उस समय अनिल दैनिक सीमा सन्देश में ब्‍यूरोचीफ और राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के हनुमानगढ़ जिलाध्यक्ष के रूप में कार्यरत थे. फिर से वे उसी अख़बार से वापसी कर रहे हैं.  अनिल का कहना है कि इस अख़बार में मात्र 12 साल की उम्र से ही समाचार भेजने शुरू कर दिए थे. मैं आज जो कुछ भी हुं, सीमा सन्देश और प्रधान संपादक, मेरे पत्रकारिता क्षेत्र के गुरु ललित जी शर्मा के मार्गदर्शन के कारण ही हूँ.

बिकाश कुमार शर्मा ने नवभारत, बिलासपुर से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने हिंदी को बाय बोल अंग्रेजी पत्रकारिता के साथ कदमताल शुरू किया है. बिकाश ने नई पारी की शुरुआत इंग्लिश डेली द हितवाद के साथ रायपुर में की है.

संपादक को गिरफ्तार कराने वाले विधायक ने अब अखबार का विज्ञापन बंद कराया

: दबाव में आकर राजस्थान के डीआईपीआर ने ''मरु लहर'' समाचार पत्र के विज्ञापन बंद किए :  जयपुर। लगता है राजस्थान सरकार का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग इतना बौना हो गया है कि वह एक विधायक के इशारों पर नाच रहा है तथा उसी की शिकायत पर बिना कोई पूर्व सूचना दिये पश्चिम राजस्थान के बाड़मेर, जोधपुर, सिरोही, सांचौर और पाली मारवाड़ से प्रकाशित दैनिक मरु लहर समाचार में राजकीय विज्ञापन बंद कर दिये हैं.

गौरतलब है कि मरु लहर के संपादक ने विधायक के कारनामों को लेकर कई खबरें प्रमुखता से छापी तथा खबरों पर कोई कार्यवाही नहीं होते देख सम्पादक महावीर जैन ने विधायक सहित कइयों के खिलाफ नामजद जनहित याचिका राजस्थान उच्च न्यायालय मे दायर की. इसकी लगातार सुनवाई के बाद संबंधितों को जबाव पेश करने को लेकर हाईकोर्ट की ओर से नोटिस जारी कर दिया गया. इससे वहां का विधायक घबराया हुआ है. येन केन प्रकारेण मरु लहर के सम्पादक के खिलाफ साजिश रच रहा है. ऐसी ही साजिश के शिकार मरु लहर के सम्पादक को जुलाई माह में होना पड़ा जब उन्हें ब्लैकमेलिंग के झूठे मुकदमें में पुलिस से गिरफ्तार करवाया गया. बाद में उन्हें हाईकोर्ट से जमानत लेनी पड़ी.

अब विधायक की उस कथित एफआईआर को क्वेश करवाने के लिये हाईकोर्ट में चैलेंज किया हुआ है जिसकी लगातार सुनवाई हो रही हैं. झुठी एफआईआर खारिज होने के भय से घबराये एमएलए ने खुद अपने चहेतों से मरुलहर के खिलाफ डीआईपीआर को शिकायते भेजनी शुरू कर दी। इस पर डीआईपीआर ने विधायक के दबाब के आकर बगैर पूर्व सूचना के एक एकतरफा आदेश दिनांक 18 सितम्बर को जारी कर समस्त संस्कणों को राजकीय विज्ञापन तत्काल प्रभाव से बंद कर दिये।

हाईकोर्ट के आदेश को किया दरकिनार

महावीर जैन को विधायक एवं उनके गुर्गों की साजिश की आशंका के चलते जीवन सुरक्षा याचिका हाईकोर्ट में दायर की जिसमें हाईकोर्ट ने जान माल सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश राजस्थान सरकार को दिया। इन्हीं शिकायतों को लेकर महावीर जैन के वकील ने जुलाई में डीआईपीआर को विधिक नोटिस जारी कर आगाह किया था कि किसी भी प्रकार की कार्यवाही अमल में लाने से पूर्व हमे सुना जाये बावजूद इसके राजस्थान के डीआईपीआर ने विज्ञापन स्थगन का आदेश जारी कर हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना की।

यशवंत सिंह पर अत्याचार के खिलाफ महाराष्ट्र में गूंजी आवाज, गृह मंत्री बोले- जांच कराएंगे

मुंबई : महाराष्ट्र के पत्रकारों ने भड़ास4मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह समेत देश भर के पत्रकारों का पुलिस प्रशासन द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई. मुंबई के आजाद मैदान पर पत्रकारों ने पिछले दिनों धरना प्रदर्शन किया. सीएम या डिप्टी सीएम या गृह मंत्री में से किसी एक के द्वारा वार्ता न किए जाने और मांगें न माने जाने की स्थिति में सड़क पर उतरकर जाम लगाने की धमकी भी पत्रकारों ने दे डाली.

इससे घबराए प्रशासन ने पूरे इलाके को पुलिस के घेरे में ले लिया और किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी कर डाली. देखते ही देखते आजाद मैदान के इर्द गिर्द सैकडो़ं की संख्या में महिला व पुरुष पुलिसकर्मी तैनात हो गए और पत्रकारों को एक तरह से घेर लिया गया. पर उसी वक्त ये सूचना आई कि महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने पत्रकारों को बातचीत के लिए बुलाया है. पत्रकारों का एक दल गृह मंत्री से मिला और अपना ज्ञापन सौंपा. लंबी बातचीत के बाद गृह मंत्री पत्रकारों की सात में से छह मांग मानने को तैयार हो गए. इनमें भड़ास4मीडिया के यशवंत सिंह पर आपराधिक मुकदमें वापस लेने की मांग भी शामिल है.

आजाद मैदान पर धरना प्रदर्शन के मुख्य अतिथि भड़ास4मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह थे. उन्होंने पत्रकारों को संबोधित भी किया. इस आयोजन के बारे में संपूर्ण डिटेल नीचे दी गई प्रेस रिलीज में है, जिसे पढ़ने के लिए प्रेस रिलीज के उपर क्लिक कर दें. साथ में आयोजन की कुछ तस्वीरें.

((अगर उपरोक्त विज्ञप्ति पढ़ने में न आए तो विज्ञप्ति के उपर क्लिक कर दें))



संबंधित अन्य खबरों के लिए यहां क्लिक करें… Yashwant Singh Jail

”मथुरा प्रेस क्लब नहीं, ब्रज प्रेस क्लब की बात हुई थी, ये रहे प्रमाण”

यशवंत जी, एडिटर, भड़ास4मीडिया, महोदय, आपके यहां एक खबर प्रकाशित हुई है (मथुरा के डीएम ने प्रेस क्लब शीघ्र बनाने की घोषणा की) जिसमें ब्रज प्रेस क्लब बनाने की बात को नकारने की कोशिश की गई है और इसकी जगह मथुरा प्रेस क्लब की डिमांड की गई है. इस संदर्भ में आपको सूचित करना चाहता हूं कि सबसे पहले ब्रज प्रेस क्लब की ही मांग की गई और इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोषणा की. प्रमाण स्वरूप खबर और तस्वीरें यहां दी जा रही हैं, कृपया इसे प्रकाशित कर तथ्यों को सामने लाने का कष्ट करें. -मथुरा का एक पत्रकार

मथुरा में पत्रकारों के लिए बनाएंगे भव्य ब्रज प्रेस क्लब : मुख्यमंत्री

: उपजा प्रदेश उपाध्यक्ष व ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु ने सौंपी प्रेस क्लब की पत्रावली : उपमन्यु ने पत्रकारों की ओर से मुख्यमंत्री को स्मृति चिन्ह व उžत्तरीय ओढ़ाकर किया स्वागत : मथुरा। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मथुरा के पत्रकारों की लम्बे समय से चली आ रही ब्रज प्रेस क्लब की मांग को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। उन्होंने कहा कि वह प्रेस क्लब बनने में कानूनी तौर पर आईं अड़चनों को दूर कर जल्द ही भव्य प्रेस क्लब की स्थापना कराएंगे।

मुख्यमंत्री श्री यादव वृंदावन में अक्षय पात्र संस्था द्वारा आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत कर रहे थे। इसी दौरान मंच पर उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष व ब्रज प्रेस क्लब अध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु ने पत्रकारों की ओर से ब्रज प्रेस क्लब से संबंधित पत्रावली मुख्यमंत्री श्री यादव को सौंपी। मंच पर ही श्री उपमन्यु ने मुख्यमंत्री को प्रेस क्लब की स्थापना में अब तक चली प्रक्रिया के बारे में समझाते हुए बताया कि पूर्व में दस फरवरी 2007 को प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं उनके पिता मुलायम सिंह यादव मथुरा में पत्रकारों की मांग पर ब्रज प्रेस क्लब की स्थापना की घोषणा कर चुके हैं। मथुरा में पत्रकारिता के उत्थान के लिए प्रेस क्लब की महती आवश्यकता है।

श्री उपमन्यु ने इसके साथ ही पत्रकार कालोनी के लिए एमवीडीए से रियायती दर पर भूखंड एवं निर्मित मकान सुलभ कराने, पत्रकारों के साथ कोई भी दुर्घटना होने पर 20 लाख रुपये की आर्थिक सहायता राशि प्रदान करने एवं मृतक के परिवारीजनों को सरकारी नौकरी देने के अलावा गम्भीर घायल को सरकारी खर्चे पर इलाज, राज्य की सभी सरकारी बसों में कस्बा, तहसील स्तर के पत्रकारों को नि:शुल्क यात्रा सुविधा देने व रेल यात्रा पूर्णत: नि:शुल्क कराने के संबंध में केन्द्र सरकार से वार्ता कर कदम उठाने, सरकारी समितियों में तथा नगर क्षेत्र, पालिका क्षेत्र, निकायों में पत्रकारों के मनोनयन को महत्व देने, जेल विजिटर एवं विद्युत परामर्श समिति तथा शिक्षा समितियों में सदस्य शामिल करने एवं राष्ट्रीय राजमार्ग, यमुना एक्सप्रेस वे के टोल टैक्स के अलावा प्रदेश के अन्य मार्गों के टोल पत्रकारों के लिए मुफ्त करने की मांगे उठाईं।

इस पर सम्बोधन के बाद फिर से माइक सम्भालते हुए मुख्यमंत्री ने घोषणा करते हुए कहा कि ब्रज प्रेस क्लब की नेताजी मुख्यमंत्री रहते घोषणा कर चुके हैं। उनकी सरकार जल्द ही पत्रकारों के लिए प्रेस क्लब निर्माण कराने का काम करेगी। इसके अलावा पत्रकारों की अन्य मांगों पर विचार कर उन्हें पूरा करने का भी आश्वासन दिया। इससे पहले मंच पर कांग्रेस विधान मंडल दल के नेता प्रदीप माथुर ने पत्रकारों की चली आ रही प्रेस क्लब की मांग को मुख्यमंत्री से पूरा करने और प्रेस क्लब के निर्माण के लिए 5१ लाख की धनराशि जारी करने की मांग भी की। विधायक ठा. तेजपाल सिंह, पूरन प्रकाश के अलावा सपा के वरिष्ठ नेता संजय लाठर एवं सपा जिलाध्यक्ष ठा. किशोर सिंह ने भी मुख्यमंत्री के समक्ष ब्रज प्रेस क्लब की पुरजोर पहल करते हुए मांग पूरी करने को कहा।

इस मौके पर श्री उपमन्यु ने पत्रकारों की ओर से मुख्यमंत्री श्री यादव को श्री बांकेबिहारी जी की प्रतिमा एवं उतरीय ओढ़ाकर स्वागत भी किया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार अनंतस्वरूप वाजपेयी देशभक्त, संजीव गौतम, हिमांशु त्रिपाठी, राजेश मिश्रा, चन्द्रप्रताप सिंह सिकरवार, राकेश चौधरी, सोमेन्द्र भारद्वाज, कृष्णचंद अग्रवाल, योगेश खत्री, महेश वाष्र्णेय, कन्हैया लाल उपाध्याय, नितिन गौतम, हरेन्द्र चौधरी, मदन गोपाल शर्मा, मोहनश्याम शर्मा, पवन गौतम, मुकुल गौतम, प्रकाश ठाकुर, मनोज श्रीवास्तव, मधुसूदन शर्मा, भारतेंदु सिंह, विजय आर्य विद्यार्थी, किशन गर्ग, अशोक चौधरी आदि सहित बड़ी तादाद में पत्रकार मौजूद थे।

इटावा के पत्रकार देवेश शास्त्री को अपराधी ने दी जान से मारने की धमकी

इटावा। इटावा के स्थानीय समाचार पत्र दैनिक देशधर्म के पत्रकार देवेश शास्त्री को एक अपराधी ने जान से मरने कि धमकी देकर हडकंप मचा दिया है। रविवार की रात लालपुरा चौक में मंजूकांड का आरोपी कैंका पुत्र धर्मेन्द्र शराब पीकर सरेआम व्यापारी नेता सुनील जैन और पत्रकार देवेश शास्त्री को मां बहन की गालियों के साथ ठिकाने लगाने (जान से मारने) की धमकी देते हुए उपद्रव मचाता रहा। सोमवार की सुबह व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष अनंत अग्रवाल, डा. आशीष दीक्षित आदि करीब आधा दर्जन लोग एकत्र हुए। सभी ने एफआईआर करने पर जोर दिया, इस बीच रामबाबू बाकर लेकर आ गये, और अनुनय विनय करने लगे।

अंततः इस चेतावनी के साथ एफआरआई न करने का निश्चय हुआ कि भविष्य में ऐसी दबंगई या उपद्रव हुआ तो खैर नहीं। जैसे ही व्यापारी नेता अपने अपने घर चले गये। थोड़ी देर में देवेश शास्त्री ड्यूटी पर देशधर्म प्रेस जाने को निकल रहे थे। सुनील जैन भी अपनी दूसरी मंजिल की बालकनी से गली की ओर देख रहा थे इतने में धर्मेन्द्र का वही बेटा कैंका चेहरे पर रूमाल लपेटे श्री शास्त्री व श्री जैन को घूरते हुए गालियां देता हुआ निकला।

बीतीरात के उपद्रव की सूचना सुनील जैन ने तत्काल अपने व्यापार मंडल के पदाधिकारियों की, रात में कोई नहीं पहुंचा मगर सोमवार की पौ फटते ही समूचा व्यापार मंडल श्री शास्त्री व श्री जैन की हिमायत में लालपुरा चौक में आ गये। वे हालचाल ले ही रहे थे, और एफआईआर की लिखापढी की भूमिका बना ही रहे थे, आरोपी कैंका के ताऊ तथाकथित वकील व्यापारी नेता अनंत को अकेले में ले जाकर वातचीत करने लगे। इसके बाद नगर के संभ्रान्तजन प्रतिमाशंकर दीक्षित की बैठक में चाय पी रहे थे तभी बुजुर्ग बर्तन व्यापारी रामबाबू बाकर लेकर लड़खड़ाते हुए आ घमके और नाती के खिलाफ रिपोर्ट न लिखाने की प्रार्थना करने लगे, ‘‘मेरी पत्नी हार्ट रोग से पीड़ित हैं। यदि रपट हुई, पुलिस आई तो वे मर जायेंगी।’’इस वाक्य को सुनकर संवेदनशीलता का परिचय देते हुए तय हुआ कि फिलहाल इस अशिष्टता को माफ किया जाये मगर आगे ऐसी खुराफात नहीं होनी चाहिए। ये सारी वार्ता मौखिक रही।

अभी कुछ ही मिनट हुए थे, तथाकथित वकील अपने वृद्ध पिता को लेकर कोतवाली गया और इधर आरोपी कैंका उसी अंदाज में श्री शास्त्री व श्री जैन को गरियाता हुआ निकला। उल्लेखनीय है उस वक्त उसका तथाकथित वकील और वृद्ध बाबा कोतवाली में बैठे थे, सबाल उठता है कि आखिर क्यों? ज्ञात हो कि होली पर जब घरों में ईंट पत्थर फैंके गये थे और श्री शास्त्री ने वरिष्ट पुलिस कप्तान को प्रार्थना पत्र दिया तो अस्तल चौकी पुलिस को रकम देकर उल्टे शास्त्री को ही 107/116 में पाबंद करा दिया गया था। आज भी इसी तरह के भेलगुंजे में कोतवाली में जाकर पेशबंदी निश्चित की गई होगी। इस बात का खुलासा तब हुआ जब स्वयं रामबाबू ने व्यापारी नेताओं के सामने कहा ‘‘हम तो बर्वाद हो चुके हैं 28 लाख रुपये खर्च हो चुके हैं।’’

मंजूकांड के गवाह पत्रकार देवेश शास्त्री सीधे आरोपियों के निशाने पर हैं। चूंकि मुहल्ले के बहुसंख्यक जैन परिवारों द्वारा मजबूरी अथवा स्वार्थवश उक्त आरोपी बर्तन व्यवसाई परिवार की हां में हां मिलाकर सत्यनिष्ठ श्री शास्त्री के खिलाफ वातावरण बनाने के कुत्सित मनोभाव के उत्साह को बढ़ाते रहते हैं। जबकि व्यापारी नेता सुनील जैन तटस्थ रहकर उनसे दूरी बनाकर जीवन यापन करता है, उसपर मनोवैधानिक दबाव बनाने के लिए दबंगई दिखाई जा रही है।

इटावा से दिनेश शाक्य की रिपोर्ट.

यशवंत की गिरफ्तारी से हैरानी नहीं हुई, केवल डर लगा

यशवंत की गिरफ्तारी की खबर भड़ास से मिली लेकिन अरसे बाद ऐसा हुआ कि रोज के बजाए तीसरे दिन भड़ास खोला। ऐसे पौड़ी जिले के सीमांत क्षेत्रों की यात्रा के कारण हुआ जहां मेरे पास इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। लेकिन जानकारी होने के बाद प्रतिक्रिया के लिए हमेशा की तरह ही मेरे पास इस बार भी शब्द नहीं थे। लेकिन दो चीजें जरूर हुई। एक तो यह कि मुझे यशवंत की गिरफ्तारी पर आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन अजीब किस्म की बैचेनी और भय लगा।

यह कल रात यानी कि 1 जुलाई की रात 11 बजे की बात है। तुरंत किसी से शेयर भी नहीं किया। वैसे देहरादून शहर के तमाम पत्रकारों को मुझसे पहले ही यह बात पता चल चुकी थी।  कल और आज के हिन्दुस्तान में इस मामले की खबरें प्रकाशित हुई हैं। पहले में उन दो कारणों पर आता हूं कि क्यों मुझे यशवंत की गिरफ्तारी पर आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन भय लगा और बैचेनी हुई। आश्चर्य इस कारण नहीं हुआ कि मैं यशवंत को हमेशा से ही संपादक, पत्रकार, फक्कड़ से ज्यादा बागी मानता रहा हूं। यशवंत की बगावत भले ही मीडिया पर ही केन्द्रित रही हो लेकिन यह समझना बेहद जरूरी है कि भारत में मीडिया अब कोई छोटा मोटा कारोबार नहीं रह गया है। हजारों करोड़ के इन मीडिया मालिकों की सच्चाई सामने लाने वाले यशवंत से लगभग हर मीडिया घराना और ऊंचे पदों पर बैठे मीडिया मैनेजर चिढ़े हुए हैं। इसी टकराव के चलते यह बागी गिरफ्तार हुआ है।

कापड़ी ने जो भी किया यह तो यशवंत के खिलाफ पनप रही मनोदशा का एक हिस्सा है। एक सवाल यह भी मेरे मन में है कि इस तरह का प्रकरण होने पर अगर यशवंत की जगह कोई और होता तो क्या कापड़ी रिपोर्ट दर्ज कराने की इतनी ही जल्दी दिखाते या इस गलतफहमी को बातचीत के जरिए हल करने की गुजांइश बनती। दूसरी बात थी कि मुझे आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन डर लगा। यह डर इस कारण था कि यशवंत बच गया और उसकी गिरफ्तारी सार्वजनिक हो गई नहीं तो शायद कुछ भी हो सकता था।

एक और बात मुझे कहनी है कि अगर यशवंत ज्यादा ही मनमौजी है तो भी यह घटना शायद उसके जीवन को नियोजित करेगी। लेकिन अगर मामले को ज्यादा तूल देकर इस मोड़ तक पहुंचाया गया है तो इसका अंजाम भी सबके सामने होगा। बहस इस बात पर कतई नहीं है कि यशवंत पर जो आरोप हैं वह सही हैं या गलत लेकिन यह बात जरूर है कि यशवंत की गिरफ्तारी ने साफ कर दिया है कि न्यू मीडिया भी मीडिया के ठेकेदारों के निशाने पर आ गया है। वे नहीं चाहते कि उनकी बुराई कहीं छपे-दिखे, क्योंकि उन्हें लगता है दिखाने-छापने का ठेका तो सिर्फ उनके पास है, तो भला उनके उपर कौन उंगली उठा सकता है। मीडिया ठेकेदारों की गल्तियों पर सार्वजनिक तौर पर उंगली उठाने का दुस्साहस किया है यशवंत ने।

यहां देहरादून में पत्रकार, यशवंत की गिरफ्तारी से न सिर्फ हैरान हैं बल्कि इस मामले में सारी सच्चाई को सामने देखना चाहते हैं। वैसे गिरफ्तार होना और जेल जाना किसी भी प्रतिरोध की बढ़ती ताकत का ही तो संकेत है। एक और बात जो इस मौके पर कचोट रही है वह यह कि जिन तमाम पत्रकारों का हौसला अनेक रूपों में यशवंत समय समय पर बढ़ाते रहे हैं, वह इस समय कहां हैं? जरूरी नहीं कि सब साथ हो जाएं लेकिन यह चुप्पी भी हैरान कर देने वाली है।

प्रवीन कुमार भट्ट

पत्रकार

देहरादून

praveen.bhatt@rediffmail.com


(प्रवीन कुमार भट्ट ने अपनी यह टिप्पणी भड़ास के पास दो जुलाई को मेल किया लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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रफ्तार न्यूज में काम करना है तो दस हजार रुपये सिक्योरिटी दें, सुनिए आडियो रिकार्डिंग

भ्रष्टाचार दीमक की तरह इंसान को चाटता जा रहा है. मीडिया क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा. अभी तक तो सुना था कि पैसों से वोट खरीदे व बेचे जाते हैं लेकिन अब कुछ न्यूज़ चैनल अपनी लोगो आई.डी. व आई.कार्ड मंडी में सब्जी की तरह बेच रहे हैं. उनका कहना है कि अगर आपको चैनल में काम करना है तो कम से कम 10,000/ रुपये की security जमा करनी पड़ेगी.

हम आपको बता दें कि ये जो audio recording है इसमें raftaar news के senior पद पर बैठे अधिकारी आर.एल. गौतम हैं जो कि चैनल में नियुक्ति करने के नाम पर 10,000/ रुपये security जमा करने की बात कर रहे हैं जिसमें वे चैनल के managing director के द्वारा भी पैसे मांगे जाने का हवाला दे रहे हैं. सुनिए पूरी रिकार्डिंग…

 

 

राहुल शर्मा

पत्रकार

फिरोजाबाद

rahulfzd.media@gmail.com


(सुनें)

प्रेम की परिभाषा की तलाश है “मैं मुहब्बत” : डॉ. काशीनाथ सिंह

बनारस, 27 सितंबर। "मैं मुहब्बत" उपन्यास प्रेम की खोज का उपन्यास बल्कि कहिए की प्रेम की परिभाषा कि खोज का उपन्यास है। ये विचार प्रख्यात साहित्यकार और साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित डॉ. काशीनाथ सिंह ने बनारस के काशी विद्यापीठ में सैयद जैगम इमाम के उपन्यास के लोकार्पण के दौरान रखे।

उन्होंने कहा कि इसे पढ़ने के दौरान मैंने महसूस किया कि अगर कोई भी इस उपन्यास को उठाए और पढ़ना चाहे तो बीच में नहीं रूक सकता। पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता चले जाए। आजकल जो लिखा जा रहा है अपाठ्य लिखा जा रहा है, पढ़ने का साहस जुटाना पड़ता है। मैं मुहब्बत अगर पढ़ना शुरू करें तो मैं दावा तो नहीं कर सकता लेकिन मजबूरी में ही अगर आप छोड़ेंगे तो छोड़ेंगे नहीं तो चाहेंगे कि बगैर छोड़े पढ़ते चले जाएंगे ये खासियत है इस उपन्यास में। डॉ. काशीनाथ सिंह ने जैगम को नई पीढ़ी और गंगा जमुनी तहजीब का विशिष्ट लेखक बताया।

सैयद जैगम इमाम बनारस के सीमावर्ती चंदौली के रहने वाले हैं और फिलहाल मुंबई में बीएजी फिल्म्स के साथ बतौर क्रिएटिव राइटर जुड़े हुए हैं इससे पहले वो अमर उजाला न्यूज 24 और आज तक को सेवाएं दे चुके हैं। इस मौके पर डॉ. काशीनाथ सिंह भावुक भी हो गए और कहा कि नामवर तो गए दिल्ली इमाम भी गए मुंबई मैं अकेला छूट रहा हूं अपने जनपद का लेकिन जब इन्होंने कहा कि इस किताब का लोकार्पण मैं बनारस में करना चाह रहा हूं तो मुझे लगा कि मेरा घर ये है। मुझे गर्व का एहसास हुआ।

ये उपन्यास मुस्लिम लेखकों की परंपरा से बिल्कुल हटकर है। ज्यादातर मुस्लिम लेखकों ने लिखा है, सांप्रदायिक समस्याओं के बारे में जो बहुत सहती रही हैं एक फार्मूले की तरह। ये उपन्यास कई अर्थों में अलग है। बनारस से शुरू होता है और एक त्रिकोण बनाता है। बनारस, नोएडा, दिल्ली। उपन्यास लोकार्पण के इस मौके पर कई प्रतिष्टित समाचार पत्रों के संपादक और बनारस के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

”जब यशवंतजी रंगदारी मांग रहे हैं तो अश्लील एसएमएस क्यों भेजेंगे?”

दोस्तों, यशवंत जी की गिरफ्तारी के बारे में जो भी बातें सामने आ रही हैं, उनमें गहराई से जाने पर कई तकनीकी पेंच सामने आते हैं। एक तरफ तो कापड़ी जी खुद से रंगदारी मांगने के आरोप लगा रहे हैं, दूसरी ओर उनकी पत्नी को अश्लील एसएमएस भेजने की शिकायत कर रहे हैं। कापड़ी जी ने यशवंत जी की गिरफ्तारी के लिए जिस तरह से ताकत लगाई है उससे साफ है कि वे कोई दीन-हीन नहीं जिनसे कोई भी राह चलता रंगदारी मांग ले। रंगदारी का तकाजा करने वाले मोटरसाइकिल सवारों का सच सामने लाने के लिए भी यदि वे सच्चे हैं तो अब उन्हें ही प्रयास करने होंगे। 

चलिए मान लेते हैं कि यशवंत जी ने उनसे रंगदारी मांगी थी, लेकिन उनका ऐसा क्या कारनामा था जिसके लिए वह ब्लैकमेल हो रहे थे, यह सच्चाई भी उन्हें सबके सामने रखनी चाहिए। कुछ लोगों ने पहले भी यशवंत जी पर नाजायज तरह के आरोप लगाए हैं, लेकिन आज तक कोई साबित नहीं कर पाया। यशवंत जी ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें जिंदगी में कोई ज्यादा लालसा नहीं है और वे जो भी अच्छा बुरा करते हैं डंके की चोट पर करते हैं। जिन लोगों ने यशवंत जी के रहन-सहन और उनके परिवार को कभी देखा नहीं, वे कोई भी आरोप लगाने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।

चलिए मुद्दे पर आते हैं, कापड़ी जी ने एक ओर रंगदारी की बात कही है तो दूसरी ओर उनकी पत्नी को अश्लील एसएमएस करने की शिकायत की है। इस आरोप में भी कई तरह शंकाएं पैदा होना लाजिमी है। जब यशवंत जी रंगदारी की मांग कर रहे हैं तो अश्लील एसएमएस क्यों भेजेंगे।

दोस्तों महाभारत में शिखंडी नामक पात्र की आड़ में हुए एक वध का वाकया सभी को याद होगा, कहीं ऐसा तो नहीं एक बार कलियुग में पात्र बदलकर साजिश रची गई हो। बहरहाल आरोप लगाने वालों को आने वाले दिनों में अपने आरोपों की सच्चाई साबित करने के लिए अदालत उचित अवसर देगी और यशवंत जी को भी खुद को पाक साफ साबित करने का मौका मिलेगा।

(उपरोक्त अखबार अगर पढ़ने में नहीं आ रहा है तो अखबार के उपर ही क्लिक कर दें )


फिलहाल इन सभी आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच कापड़ी जी को भी पहल करते हुए पूरा मामला साफ करने के लिए आगे आना चाहिए। किसी भी तरह की रंजिश में एक-दूसरे को हराने की बात करने की बजाए सामाजिक तौर पर यह एक मानवतावादी दृष्टिकोण रहा है कि गलती करने वाले को उसकी गलती का एहसास कराया जाए। कापड़ी जी के पास यदि ऐसे कोई तथ्य हैं तो उन्हें सार्वजनिक करने में उन्हें कोई हिचक नहीं दिखानी चाहिए। कापड़ी जी से बड़प्पन दिखाने की अपेक्षा रखते हैं।

राकेश शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

कुरूक्षेत्र


(राकेश शर्मा का लिखा यह आलेख भड़ास को दो जुलाई को प्राप्त हुआ लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा था और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया है तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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”विनोद कापड़ी ने बताया… विनोद कापड़ी के अनुसार… कापड़ी ने कहा…”

: मानो विनोद कापड़ी न हों, स्वयं ईश्वर ने आकर सब कुछ सही-सही घटनाक्रम बयान किया हो : इस एकतरफा खबर पर हिंदुस्तान अखबार पर मानहानि का मुकदमा ठोकना चाहिये : सेवा में, भड़ास4मीडिया, हिन्दुस्तान के नोएडा स्थित कार्यालय संवाददाता की डेटलाइन से जो खबर आज यानि सोमवार 2 जुलाई मेरठ संस्करण के पेज नम्बर 9 पर छपी है उसका शीर्षक है ‘अभद्र एसएमएस पर हुई यशवंत की गिरफ्तारी’. एकतरफा अर्थात एक पक्षीय खबर लिखने का जो मानदंड अपने को राष्ट्रीय अखबार घोषित करने वाले इस समाचार समूह ने स्थापित किया है, उसका उदाहरण विरला ही मिलता है।

पूरी खबर विनोद कापड़ी के हवाले से प्रकाशित है तथा प्रत्येक पैराग्राफ इसी पंक्ति से शुरू होता है- विनोद कापड़ी ने बताया, विनोद कापड़ी के अनुसार, कापड़ी ने बताया…. मानो विनोद कापड़ी न हों, स्वयं ईश्वर ने आकर सब कुछ सही-सही घटनाक्रम बयान किया हो। अंत में 10 प्वाइंट बोल्ड शीर्षक में लिखा गया है- न्यायिक हिरासत में जेल गया यशवंत। इसमें कहीं भी किसी पुलिस अधिकारी का बयान नहीं लिया गया है, यशवंत के वकील को कहीं उद्धृत नहीं किया गया है, एफआईआर का कोई जिक्र नहीं है और न ही यह जानने की कोशिश की गयी है कि किसी चैनल के ‘प्रबंध संपादक’ की शिकायत पर ‘पत्रकारों से जुड़ी’ सोशल वेबसाइट के ‘संपादक’ के खिलाफ की गयी कार्रवाई किसी साजिश, रंजिश अथवा प्रतिद्वंद्विता का परिणाम तो नहीं है।

होना तो यह चाहिए कि यशवंत के वकील को ‘मुकदमे से पहले’ ही किसी व्यक्ति के बयान के आधार पर दूसरे के खिलाफ एकतरफा खबर लिखने के लिये अखबार के मालिक, प्रकाशक, मुद्रक, संपादक और संवाददाता के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कायम कर देना चाहिये। अगर यह मामला यशवंत का न होकर किसी पूंजीपति, कोई नेता अथवा किसी व्यापारी, कोई शिक्षक, कोई वकील, कोई सैन्य अधिकारी अथवा चिकित्सक का होता तब भी इस खबर को इसी तरह एकतरफा बयान के आधार पर छाप दिया जाता। कम से कम मैंने तो अपने पूरे पत्रकारीय जीवन में इस तरह की खबर किसी अखबार में इतने बड़े स्पेस के साथ छपती हुई नहीं देखी।

न्यू मीडिया के प्रति बड़े समाचार समूहों का रवैया भले ही नकारात्मक, उपेक्षापूर्ण अथवा हिकारत भरा हो लेकिन न्यू मीडिया को सिरे से ही नकार देना अथवा इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को पत्रकार न मानना अव्वल दर्जे की बेवकूफी नहीं तो और क्या है? मीडिया के अंदर की बुराई रूपी कैंसर को सार्वजनिक प्लेटफार्म पर जाहिर करना पत्रकारिता को व्यवसाय बना चुके पूंजीपतियों को चिंतित तो करता ही होगा, उन्हें चिंतित होना स्वाभाविक भी है लेकिन पत्रकारिता जैसे पेशे से जुड़े नामचीन संपादक, पत्रकार जब न्यू मीडिया की सफलता को व्यक्तिगत रंजिश मानकर चलते हैं तो इस बात की चिंता हर उस शख्स को होनी चाहिए, जो एक मिशन के रूप में पत्रकारिता से अपने जुड़ाव को महसूस करता है।

मीडिया हाउस के अंदर की खबर छापना निश्चित ही सैद्धांतिक रूप से उचित नहीं माना जाता लेकिन जब तक आम जनता के हितों की दुहाई देने के नाम पर अखबार और चैनल स्वयं पत्रकारों का शोषण करते रहेंगे और पत्रकारिता के कपड़े उतारकर उसे बाजार में बेचने के लिये नंगा खड़े करते रहेंगे, तब तक यशवंत जैसा कोई दिलेर, दुःसाहसी नौजवान अपने करियर, अपने जीवन और अपना परिवार दांव पर लगाकर इन दलालों की पोल खोलता रहेगा। इस मिशन में यशवंत अकेला नहीं है।

तमाम बुराइयों और विरोधाभासों के बावजूद यशवंत ने स्वतंत्र मीडिया लेखन का जो प्लेटफार्म तैयार किया है, यह उनके उद्यमशीलता का ही प्रतिफल है। तमाम व्यवसायिक दुष्वारियों के बावजूद पिछले चार वर्षों से वह ‘भड़ास’ को न केवल चला रहे हैं बल्कि जी भी रहे हैं और इसमें तमाम पत्रकारों का सहयोग भी उन्हें मिल रहा है।

उम्मीद है कि मामूली आरोपों के अन्तर्गत न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के बावजूद यशवंत जल्द ही हमारे समाने वापस आयेंगे और अपने खिलाफ लगाये गये आरोपों का सिलसिलेवार ढ़ंग से जवाब देंगे, जैसा कि वो पहले भी करते आयें हैं। हमें सिर्फ होशियार रहना होगा पूंजीपतियों की, जो पत्रकारों को कामगार मानते हैं और पत्रकारिता को व्यवसाय, इस चाल से कि न्यू मीडिया जैसे संप्रेषण के माध्यमों को दबाने, समाप्त कर दिया जाय और पत्रकारों की आवाज को हमेशा के लिये दफन कर दिया जाय।

आप सभी से आह्वान है कि सभी साथ आयें ताकि यशवंत सकुशल हमारे और अपने परिवार के साथ जुड़ जायें। ईश्वर यशवंत से चिढ़ने वालों कारपोरेट एडिटर्स को सद्बुद्धि दे।

ए. निखिल

मेरठ

nikhilagarwal707@gmail.com

(ए. निखिल का लिखा यह आलेख भड़ास को दो जुलाई को प्राप्त हुआ लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण इसे प्रकाशित नहीं किया जा सका. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त महीने में कुछ लिखकर भड़ास के पास भेजा था और उसका प्रकाशन नहीं हो पाया है तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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झूठ को सच बनाने की कला के पारंगत खिलाड़ी माने जाते हैं विनोद कापड़ी

: क्या बेनकाब होंगे इस साजिश के सूत्रधार? : आज नेता, ब्यूरोक्रेट व अपराधी और कहीं कहीं तो न्यायपालिका भी मीडिया से घबराती नज़र आती है, किंतु मीडिया स्वछंद है। वह किसी से नहीं डरता। जो चाहे उटपटांग खबरें दिखाओ। भूत-प्रेत की झूठी कहानी बनाओ। दुनिया खत्म होने का दिन तय कर लोगों को डराओ। बिना बात की खबरों को घंटों या दिनों तक क्या, महीनों तक दिखाओ या फिर जिसे चाहे हीरो बनाओ, जिसे चाहे बर्बाद करो। यहां तक कि मीडिया घराने अपने ही पत्रकारों तक के साथ कैसा बर्ताव करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। मीडिया घरानों की इन्हीं मनमानियों के खिलाफ उठी आवाज को बुलंद करने का दुस्साहस किया भाड़ास4मीडिया ने।

मीडिया शक्तिशाली है और जो मीडिया जितना बड़ा है वह और भी शक्तिशाली है। यशवंत सिंह ने जो लड़ाई छेड़ी है, वे उसके नायक हैं। हीरो हैं। सीमा पर खड़ा जवान जानता है कि एक न एक दिन दुश्मन की गोली उन्हें छलनी करेगी। हाल ही में शिमला जेल में हुए एक कार्यक्रम में उन्होंने इस बात की आशंका व्यक्त की थी कि वे कभी भी गिरफ्तार हो सकते हैं। किंतु उन्होंने न टूटने और न झुकने का अपना वादा दोहराया। विनोद कापड़ी झूठ को सच बनाने की कला में पारंगत खिलाड़ी माने जाते हैं।

उन्होंने आरोप लगाए कि उन्हें जान से मारने की धमकी दी गई और उनसे 20 हजार रूप्ए मांगे गए तो पुलिस ने बिना जांच के सच मान लिया और उनके खिलाफ प्रकरण भी दर्ज हो गया। अब उन पुलिसकर्मियों व अधिकारियों पर सबकी निगाहें टिक गई हैं जिन्होंने इस झूठे मामले को सच का लबादा ओढ़ाने की कवायद रची। जाहिर है प्रकरण की जांच लंबी चलेगी। दूध का दूध पानी का पानी होगा। और अधिकारियों व पुलिसकर्मियों के निलंबन भी होंगे। षड़यंत्रकारियों को बेनकाब होना होगा किंतु यशवंत भाई द्वारा छेड़ी गई यह लड़ाई अब क्रांति की मशाल की भांति जलती रहनी चाहिए।

आज हम सब का दायित्व है कि इस प्रकरण के पूरे षड़यंत्र का पर्दाफाश करवाएं। इस कार्यवाही में बरती गई अनियमितताओं को गंभीरता से लें। सभी पत्रकार भाई अपने-अपने क्षेत्रों में प्रदर्शन कर नोएडा पुलिस के खिलाफ कार्यवाही की मांग करें तथा दोषी पुलिस कर्मियों को बर्खास्त करने की मांग करें। सोशल मीडिया पर इस साजिश को बेनकाब करें। सभी पत्रकार भाई यशवंत जी को तन-मन-धन से सहयोग करने के लिए तैयार रहें। मैंने यशवंत जी की इस गिरफ्तारी के खिलाफ अपनी वेब साईट पेनन्यूज़ डाट इन पर अभियान छेड़ दिया किंतु षड़यंत्रकारियों की नीचता की हदें देखिए कि उसे कल हैक कर दिया गया। यशवंत जी के खिलाफ की जा रही साजिशों का पर्दाफाश हर हाल में होगा।

गोपाल शर्मा

editorinchieflivetoday@gmail.com

08054310441


(गोपाल शर्मा का लिखा यह आलेख भड़ास को दो जुलाई को प्राप्त हुआ लेकिन तत्कालीन आपाधापी के कारण प्रकाशित नहीं हो सका था. अगर आपने भी जुलाई-अगस्त के दो महीनों में कुछ लिखकर भड़ास पर भेजा था और उसका प्रकाशन नहीं हो सका तो उसे फिर से भड़ास के पास bhadas4media@gmail.com के जरिए भेज दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)


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चिन्मयानंद का साथ छोड़ अपने पत्रकार पति के पास लौटीं चिदर्पिता

एक नाटकीय घटनाक्रम के तहत बहुचर्चित साध्वी चिदर्पिता गुरुवार शाम सामान समेत अपने बदायूं निवासी पत्रकार पति बीपी गौतम के पास लौट आईं। करीब डेढ़ महीने पहले वो गौतम का दामन छोड़ हरिद्वार के परमार्थ आश्रम वापस चली गई थीं। इस आश्रम के अध्यक्ष पूर्व गृहमंत्री स्वामी चिन्मयानंद हैं, जिनपर वो पहले अपहरण और बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा चुकी थीं। देर शाम एसपी मंजिल सैनी के निर्देश पर पुलिस ने साध्वी और गौतम से पूछताछ की।

शाहजहांपुर के मुमुक्ष आश्रम के शिक्षण संस्थान की प्रबंधक रहीं साध्वी का नौ अगस्त की रात पति बीपी गौतम से विवाद इतना बढ़ गया था कि उनके दांपत्य जीवन में दरार आ गई थी। साध्वी ने गौतम के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया और हरिद्वार के परमार्थ आश्रम में शरण ली। इस बीच गौतम ने एसपी समेत आईजी को शिकायती पत्र देकर चिदर्पिता के साथ अनहोनी की आशंका भी जताई थी।

 
उधर हरिद्वार से खबर है कि साध्वी चिदर्पिता एक बार फिर अपने गुरु परमार्थ आश्रम के परमाध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानंद के आश्रम से भाग निकलीं। करीब सवा महीने पहले अपने पति की प्रताड़ना से तंग होकर वह आश्रम में वापस आ गई थीं। इस दौरान वह ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में भी रहीं। वहा उनका शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के लिए इलाज चला था। चंद रोज पहले उन्हें ऋषिकेश में घूमते भी देखा गया। दो दिन पहले वह हरिद्वार के परमार्थ आश्रम पहुंची थीं। गुरुवार अलसुबह सफेद रंग की ज़ायलो गाड़ी (यूपी 24-डी-7576) पर सवार होकर चली गई। वापस न लौटने पर आश्रम प्रबंधन ने वहां सप्तऋषि थाने में इसकी सूचना दी थी। 
 

दैनिक भास्कर ने राजस्थान में की दो संपादकों की अदला-बदली

 

दैनिक भास्कर ने राजस्थान में अपने दो एडीशनों के संपादकों की अदला बदली कर दी है। भीलवाड़ा में स्थानीय संपादक रहे राजेश रवि को अब अलवर संस्करण का संपादक बना दिया गया है। अलवर में अबतक संपादक रहे प्रदीप भटनागर को भीलवाड़ा संस्करण की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।
 
दोनों ही संपादकों ने इस खबर की तस्दीक की है, लेकिन इसे रुटीन ट्रांस्फर बताया। राजेश रवि अलवर के ही रहने वाले हैं जबकि प्रदीप भटनागर इलाहाबाद के निवासी हैं और पत्रकारिता का लंबा कैरीयर है। वे पिछले बारह वर्षों से दैनिक भाष्कर ग्रुप से जुड़े रहै हैं और इसके विभिन्न संस्करणों में अलग-अलग पदों पर रह चुके हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रदीप भटनागर राजस्थान में भास्कर को स्थापित कर ने वाले कुछ चोटी के पत्रकारों में से एक हैं।

 

लड़कियों को एंकर बना देते हैं लेकिन लड़कों से मजदूरों की तरह काम लेते हैं…

: कानाफूसी : एक्सवाईजेड कहने को तो धार्मिक चैनल और न्यूज चैनल है…लेकिन न्यूज चैनल जैसा यहां कुछ भी नहीं….2 साल बाद सैलरी बढ़ाते है वो भी भेदभाव करके….किसी को 500 रूपए तो किसी को 1000 रूपए….ढोल पीटते है कि हमने 3000 तक का इनक्रीमेंट किया है….लेकिन यहां भी कर्मचारियों के साथ तगड़ा खेल खेला गया…कोई नीचे जाकर टेशू बहाकर आया तो किसी ने चापलूसी के जरिए सैलरी बढ़ा ली…बीच में मारे गए वो कर्मचारी…जिन्हें ये सब काम नहीं आता….

लड़कियों को एंकर बना देते हैं लेकिन लड़कों से मजदूरों की तरह काम लेते है….6 महीने पहले चैनल अच्छी स्थिति में था…लेकिन 6 महीने जब से भोगराज आया है उस दिन से चैनल गर्त में चला गया है…लड़कियां अपनी अदा दिखा दे तो पागल हाथी बन जाता है….और नीचे बॉस के पास सिफारिश लेकर पहुंच जाता है…जिसके बाद वो एंकर बन जाती हैं…वहीं, कुछ लड़कियां यहां एंकर बनने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं…सीईओ खेद कहता है कि ऑफिस की लड़की को एंकर नहीं बनाएंगे लेकिन कोई लड़की चापलूसी करे तो एंकर बन जाती है…इसकी जीती जागती मिसाल है एक्सवाईजेड न्यूज…एंकर गोरा रंग देख कर बनाया जाता है ना कि नॉलेज देखकर। मेरी आपसे विनती है कि आप ये लेख जरूर छापे।

एक दुखिया

एक्सवाईजेड न्यूज चैनल

कानाफूसी कैटगरी की खबरें चर्चाओं, गासिप पर आधारित होती हैं इसलिए इस पर भरोसा करने से पहले एक बार खुद के स्तर पर तथ्यों की पड़ताल कर लें. उपरोक्त कानाफूसी में चैनल व चरित्रों का नाम बदल दिया गया  है. अगर रीयल लाइफ में कहीं कोई समानता नजर आती है तो उसे संयोग माना जाए.

एक संपादक का तबादला, दूसरे का इस्तीफा

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने सागर संस्करण के स्थानीय संपादक नरेंद्र सिंह अकेला को हटा दिया है. उनके स्थान पर नेशनल न्यूज रूम टीम के विपुल गुप्ता को नियुक्त किया गया है. अकेला को अंबाला भेजा गया है. अकेला के सागर का प्रभारी संपादक बनते ही सबसे पहले तत्कालीन सिटी डेस्क इंचार्ज संजय करीर ने इस्तीफा दिया था.

इसके बाद  बीना प्रभारी ओपी ताम्रंकार, सागर के क्राइम बीट रिपोर्टर बसंत सेन, दमोह प्रभारी ओपी सोनी, छतरपुर ब्यूरो आशीष खरे,सब एडीटर सागर संजय पांडे, सिटी इंचार्ज सागर अजय खरे और फिर सीनियर रिपोर्टर सागर सतीश लिखारिया को न चाहते हुए भी भास्कर का दामन छोड़ना पड़ा। दैनिक भास्कर सागर संस्करण को एक ब्यूरो से संस्करण के मुकाम तक पहुंचाने वाले सबसे सीनियर और रीजनल इंचार्ज प्रहलाद नायक को सागर छोडकर रतलाम जाना पडा था।

चौथी दुनिया उत्तर प्रदेश उत्तराखंड के प्रबंध सम्पादक श्रीनिवास गुप्ता के इस्तीफा देने की सूचना है. श्रीनिवास गुप्ता को चौथी दुनिया प्रबंधन ने किस आधार पर रखा था और किस बात के लिए उनसे इस्तीफा देने को कहा गया, इसको लेकर तरह तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं.

जागरण भूल गया मानवता और कानून : बलात्कार पीड़िता का नाम पता तक छाप डाला

नंबर एक होने का दावा करने वाला दैनिक जागरण अपनी गलतियों के लिए तो जाना ही जाता है, पर ताजा मामले में जागरण ने ऐसी हरकत की है जिसे भूला नहीं कहा जा सकता। जागरण के पंजाब संस्करण में होशियारपुर से एक ऐसी घिनौनी हरकत की गई है जो न तो कानून की नजर में सही है और न ही किसी भी तरह से पत्रकारिता के उसूलों के अनुरूप है। अखबार में बलात्कार पीड़िता से पुलिस की बदसलूकी की खबर छपी है। यही खबर अखबार के इंटरनेट संस्करण पर भी है। खबर में लिखने वाले ने न सिर्फ बलात्कार पीड़िता का नाम बल्कि उसके पिता का नाम और घर का पता गांव तक लिख डाला है।

यही नहीं पिता की मौत के बाद से वह अपने ननिहाल में कहां रह रही है, उस गांव तक का भी पता अखबार ने बड़े चाव से छापा है। माना कि खबर भेजने वाला रिपोर्टर भांग खाए बैठा होगा, लेकिन ब्यूरो में इस खबर को एडिट करने वाले जुगाड़ू क्या भाड़ झोंक रहे थे कि पीड़िता को इस तरह सरे बाजार शर्मसार करने में उन्हें रत्ती भर भी गुरेज नहीं हुआ। इसके बाद खबर जब डेस्क पर पहुंची तो डेस्क पर बैठे जुगाड़ू क्या नींद में खबरें देखते हैं कि किसी को यह दिखा नहीं। उस पर से दूसरों को बिना जान पहचान के ही 'अच्छे आदमी नहीं हैं' बताने वाला खुद टेस्ट फेल संपादक क्या कर रहा था, जिसके नाक के नीचे से यह सब गुजर गया। इंटरनेट संस्करण पर इस चूतियापे की खबर देखने के लिए क्लिक कीजिए।
http://www.jagran.com/punjab/hoshiarpur-9419435.html

पढ़ने के लिए ये है पूरी खबर…

नाबालिग से दुष्कर्म करने वाले दो युवकों पर केस दर्ज
29 Jun 2012

संवाद सहयोगी, माहिलपुर

दुष्कर्म की शिकार नाबालिगा ने थाना पुलिस माहिलपुर की एक महिला पुलिस कर्मी पर उसे जलील करने व थप्पड़ मारने का आरोप लगाया है। सूचना पाकर तुरंत डीएसपी गढ़शंकर हरप्रीत सिंह मंडेर जांच के लिए थाना पहुंचे। पुलिस ने दुष्कर्म के आरोपी दोनों युवकों के खिलाफ केस दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

सुदेश पुत्री प्रीतम लाल निवासी गुगलेड़ (हिप्र.) पिता की मृत्यु के बाद अपने नौनिहाल थाना माहिलपुर के तहत आते गांव लसाड़ा में आकर रह रही है। पीड़िता ने आरोप लगाया कि 24 जून को गांव का ही युवक सुरिंद्रपाल अपने साथी काका निवासी जेजों के साथ मिलकर उसे बहला फुसला कर ले गया। दोनों उसे धमका कर हिमाचल प्रदेश के ज्वाला जी ले गए। इस दौरान रास्ते में ही सुरिंद्र ने उसके साथ मुंह काला किया और ज्वाला जी में छोड़कर वहां से खिसक गया। उन्होंने उसके नाक व कान की सोने की बालियां तक उतरवा लीं। उसने किसी तरह से अपने पास 350 रुपये बचाकर रखे थे जिसके चलते वह बस में बैठकर चिंतपूर्णी आ गई और बद्दी की बस में सवार हो गई वहां आकर उसने सारी कहानी पुलिस को बताई। पुलिस ने लड़की के घरवालों को सूचित किया। इस संबंध में लड़की के मामा ने पहले ही पुलिस के पास शिकायत दर्ज करा रखी थी। लड़की को बयानों के लिए यहां लाया गया तो उससे बार-बार उल्टे सीधे प्रश्न पूछकर जलील किया गया। इतना ही नहीं एक महिला कर्मी ने पीड़िता के मुंह पर सात-आठ थप्पड़ तक जड़ दिए। थाना माहिलपुर पुलिस भूल गई कि ऐसे क्राइम में पीड़िता को थाने ले जाने की बजाय उसके घर में ही बयान दर्ज किए जाते हैं परंतु यहां तो 15 वर्ष 3 महीने की पीड़िता को थाने में जलील किया गया। इस संबंध में डीएसपी हरप्रीत सिंह मंडेर ने बताया कि मामले में कार्रवाई करते हुए माहिलपुर थाना पुलिस ने काका पुत्र जगदीश निवासी जेजों व उसके मित्र सुरिंदरपाल पुत्र महिंदर लाल निवासी पुराणा लसाड़ा के खिलाफ दुष्कर्म, बहला फुसला कर ले जाने, उसके जेवरात चोरी करने, धमकियां देने और उसके साथ साजिश करने का मामला दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू कर दी है।

(उपरोक्त खबर भड़ास के पास एक पत्रकार ने 1 जुलाई 2012 के आसपास भेजा था. भड़ास संचालकों-संपादकों की गिरफ्तारी, जेल भेजा जाना और फिर घर-आफिस पर छापेमारी के कारण इस खबर का प्रकाशन रुका रहा. कृपया इसे देर से प्रकाशित खबर मानें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)

उस दिन वाकई लगा कि बिक गए हैं मीडिया संस्थान, पूरा वाकया सुनें

सबसे पहले यशवंत जी को प्रणाम जिन्होंने लोगों को अपनी बात रखने के लिए ये मंच दिया है जिसका नाम है भडास4मीडिया. कुछ दिल में था, जिसे शब्दों के माध्यम से बयां करने जा रहा हूं। जब से छत्तीसगढ़ में रमन सरकार आयी है, तबसे तो छत्तीसगढ में मीडिया का रोल ही खत्म हो गया है. प्रदेश की मीडिया मैनेज हो चुकी है. ऐसा नही है कि यहां के सारे पत्रकार बिके हों लेकिन यह जरूर है कि कलम उनकी है, पर स्याही मालिक की जो अखबार या न्यूज चैनल का मालिक कहे, वही खबर चले। जहां प्रदेश की सरकार इन प्रादेशिक चैनलों को सालाना करोड़ों का विज्ञापन देती है तो वहीं कुछ प्राइवेट संस्थान भी विज्ञापन की मोटी रकम देते हैं और चैनल व संस्थान के बीच हो जाता है करार।

अब संस्थान चाहे जो कुछ भी अच्छा या बुरा करे, अखबार और चैनल सिर्फ उसकी अच्छाई दिखाएंगे। एक मामला बताता हूं जो छत्तीसगढ की न्यायधानी बिलासपुर से जुड़ा हुआ है।  27 जून को भोपाल से संचालित एक न्यूज चैनल में लगभग दो से ढाई बजे एक खबर ब्रेक होती है कि बिलासपुर के करगी रोड कोटा स्थित सीवी रमन यूनिवर्सिटी से पीजीडीसीए के सी प्लस प्लस का पर्चा लीक हो गया है। इस खबर पर चैनल के पत्रकार का फोनो भी होता है। मैं उस समय टीवी देख रहा था तो स्वाभाविक था कि मैं खबर की पुष्टि के लिए दूसरे चैनल भी देखूंगा। लगभग दस मिनट तक किसी चैनल में ऐसी कुछ खबर नहीं दिखी। फिर थोड़ी देर बाद एक और प्रादेशिक चैनल में वो खबर तीन बजे ब्रेक हुई।

मैंने फिर वही पहले वाला चैनल लगाया जिस पर ये खबर पहले ब्रेक हुई थी। इस चैनल पर पूरी खबर दिखाई जाती है कि कैसे इस न्यूज चैनल ने दलाल के माध्यम से जो इग्जाम दो बजे से होने वाला है उसका पेपर एक बजे ही सिर्फ तीन हजार रुपये में खरीद लिया। फिर जब दो बजे इग्जाम चालू हुआ तब चैनल के पत्रकार द्वारा उसी पर्चे को मिलाया गया तो पाया गया कि दोनों में एक जैसे ही प्रश्न आये थे। इतने में लाइट बंद हो गई और मैं मार्केट चला गया।

शाम को मैंने सोचा कि सीवी रमन विश्वविद्यालय में इतनी बडी गड़बड़ी हुई है तो भले ही थोड़ी देर से चले, सभी चैनलों में खबर तो आएगी ही। यही सोच कर मैं शाम 7 बजे से 10 बजे तक बार बार चैनल बदलता रहा लेकिन ये खबर सिर्फ दो चैनलों पर दिखी। फिर मैं यही सोचते हुए सो गया कि आखिर क्यों ये खबर छत्तीसगढ प्रदेश के नम्बर वन चैनल जो कहता है कि सवाल आपका है, उसमें क्यों नही चली?

मुझे बात समझ में नहीं आ रही थी क्योंकि मैं हमेशा रात 10 बजे से 11 बजे तक यही चैनल देखता हूं। और इसकी खबर देखे बिना सोता नही हूं। मैं सो गया। सुबह हो गई। घर पर अखबार आया। मैंने सभी अखबारों में देखा मगर सीवी रमन की खबर सिर्फ एक अखबार में दिखी। जो कि शुरू से ही सरकार के विरोध में खबर छापने के नाम से जाना जाता है।

मैंने अपने दोस्त से इस बारे में चर्चा की तो उसने बताया कि भाई बिलासपुर में मीडिया विज्ञापन के आगे खबरों को कोई जगह नहीं देती। सीवी रमन सभी चैनल और अखबारों को लाखों का सालाना विज्ञापन देती है तो कोई थोड़े ही उसके विरोध में छापेगा। अब मुझे बात समझने में देर न लगी क्योंकि अब मैं समझ चुका था कि मीडिया भी मैनेज हो सकती है।

मै पत्रकारों की बड़ी इज्जत करता हूं मेरा मकसद किसी की बुराई करना या किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है लेकिन आशा करता हूं कि देश का हर पत्रकार अपनी जिम्मेदारियों का सतत निर्वहन करते हुए देश का नाम रोशन करेंगे क्योंकि देश के लोगों को पत्रकारों से बड़ी उम्मीदे और विश्वास है.

आपका

महेश सिंह गहलोत

एडवोकेट, हाईकोर्ट

बिलासपुर, छत्तीसगढ़

(उपरोक्त आलेख भड़ास के पास 1 जुलाई 2012 को आया था. भड़ास संचालकों की गिरफ्तारी, जेल भेजा जाना और फिर घर-आफिस पर छापेमारी के कारण इस आलेख का प्रकाशन रुका रहा. कृपया इसे देर से प्रकाशित किया गया आलेख मानें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया)

मथुरा के डीएम ने प्रेस क्लब शीघ्र बनाने की घोषणा की

: जिलाधिकारी ने पत्रकारों से भूमि तलाशने को कहा : मथुरा। उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के बैनर तले पत्रकारों के एक प्रतिनिधि मण्डल ने यूनियन के मण्डल समन्वयक संतोष चतुर्वेदी के नेतृत्व में जिलाधिकारी मथुरा को प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम मथुरा में प्रेस क्लब की स्थापना की वृन्दावन में की गयी घोषणा के लिये ज्ञापन सौंपा।

ज्ञापन में मथुरा में एक व्यक्ति विशेष व बसपा नेता द्वारा किसी बृज प्रेस क्लब के नाम से
भ्रामक प्रचार किया गया, इसकी भी शिकायत की गयी। पूर्व में 22.12.2003 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा इण्डियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के एक कार्यक्रम में वृन्दावन के हरगोविन्द आश्रम के सभागार में देश के लगभग ढाई हजार प्रबुद्ध पत्रकारों के मध्य मथुरा में प्रेस क्लब निर्माण कराने की घोषणा की थी। ज्ञापन में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का सभी पत्रकारों ने तहेदिल से आभार प्रकट किया है कि उन्होंने मथुरा में प्रेस क्लब की घोषणा करके पत्रकारों का मनोबल बढाया है।

प्रेस क्लब की स्थापना के लिए रजिस्टर्ड संस्था ''प्रेस क्लब आफ मथुरा'' वर्ष 1988 से निरन्तर इसके लिये प्रयासरत है। पूर्व में शासन व नगर पालिका परिषद मथुरा के प्रेस क्लब के प्रस्ताव से सम्बंधित सभी कागजात ज्ञापन के साथ संलग्न किये गये।

जिलाधिकारी मथुरा समीर वर्मा ने उपस्थित पत्रकारों से ज्ञापन लेते हुये कहा व स्वीकार किया कि मा0 मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मात्र प्रेस क्लब मथुरा की घोषणा की है न कि किसी बृज प्रेस क्लब की। यदि किसी ने इस प्रकार की बृज पे्रस क्लब के नाम से भ्रान्ति फैलायी है तो वह पूर्णतया गलत है।

जिलाधिकारी ने पत्रकारों को प्रेस क्लब निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढाने का पूर्ण आश्वासन देते हुये कहा कि पत्रकार बन्धु स्वंय इसके लिये जिला मुख्यालय के निकटवर्ती उपयुक्त भूमि की तलाश कर बतायें एवं उन्होंने कहा कि मैं भी अपने स्तर से इसके लिये भूमि तलाशने का प्रयास करूंगा।
जिलाधिकारी के प्रयासों की पत्रकारों ने भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुये प्रेस क्लब निर्माण का शुभ कार्य उन्ही के हाथों एवं उन्हीं के कार्यकाल में सम्पादित कराने की अपील की।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार माता प्रसाद शर्मा, सुनील कुमार शर्मा, मो0 उमर कुरैशी, हरवेन्द्र कुमार चतुर्वेदी, दिनेश आचार्य, सुरेश पचहरा, प्रवेश चतुर्वेदी, गिरीश कुमार, गजेन्द्र सिंह, राकेश कुमार, श्याम जोशी, विजय नागपाल, खलील अहमद, हरीश माहौर, विनोद चौधरी, आशीष बैन्दिल, जीवनदीप, शिवा तौमर, आकाश अग्रवाल, रमेशचन्द्र, मोहन शर्मा, रवि सोनी, सोनू चौधरी, हरीओम भैया, अनिल चौधरी, अजीम कुरैशी, जाहिद, गिरधरलाल, राम कुमार, तेजपाल सिंह, किशन कुमार गर्ग, कपिल शर्मा, लोकेश कुमार, आदि दर्जनों पत्रकार बन्धु मौजूद थे।

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अमर उजाला के जिला संवाददाता आनंद सड़क हादसे में घायल

कैमूर में कार्यरत अमर उजाला अखबार के जिला संवाददाता आनन्द कुमार सिंह सड़क दूर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए. हादसा 26 सितम्बर की रात में बेतरी गांव के पास हुआ. आनंद को बेहतर इलाज के लिए पटना भेजा गया है. बताया जाता है बांया पैर की हड्डी पूरी तरह टूट गई है. उन्हें नार्मल होने में करीब 6 महीने का वक्त लग सकता है.

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आईपीएस अलंकृता सिंह की क्यों तारीफ कर बैठे डीजीपी अंबरीश चंद्र शर्मा?

: अश्‍लील एसएमएस, एमएमएस और फोन कॉल्‍स के खिलाफ जेहाद की ब्रांड-एम्‍बेसेडर बन चुकी हैं अलंकृता : लखनऊ : बाली उम्र की एक पुलिस कप्‍तान अचानक ही बड़ी सुर्खियों में आ गयीं जब सीधे राजधानी में बैठे पुलिस महानिदेशक ने उनके प्रयासों की सराहना कर डाली। जुम्‍मा-जुम्‍मा चार साल की नौकरी वाली अलंकृता सिंह अब महिलाओं-युवतियों को अश्‍लील एसएमएस, एमएमएस और अवांछनीय फोन कॉल्‍स के खिलाफ जेहाद की यूपी में ब्रांड-एम्‍बेसेडर बन चुकी हैं।

डीजीपी अम्‍बरीश चंद्र शर्मा ऐसे प्रयासों को अनूठा बताते हैं। कहा गया है कि उन्‍हीं की तर्ज पर ही ऐसे प्रयासों को प्रदेश भर में लागू करने के लिए ऐसे मामलों के लिए एंटी-आब्‍सीन कॉल सेल बनाया जाए। जिला प्रभारियों से लेकर सारे आईजी इस बारे में तत्‍काल कार्रवाई करें। इतना ही नहीं, इन अधिकारियों से कहा गया है कि ऐसी सेल को प्रभावी बनाने और उसकी कोशिशों-नतीजों की खबर मुख्‍यालय को नियमित भेजेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि यह पहला मौका है, जब इतनी कम उम्र वाली किसी पुलिस अधिकारी की कोशिशों को डीजीपी स्‍तर से प्रदेश भर के पुलिस अफसरों में नजीर की तरह पेश किया गया।

वाणिज्‍य कर के अपर आयुक्‍त रहे पिता एसएस गंगवार और मां विनय की बेटी अलंकृता मूलत: बरेली की हैं। शुरुआती शिक्षा के बाद उन्‍होंन 2002 में इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय से गणित एमएससी किया। सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान वे पीसीएस भी पास हुईं लेकिन सन 08 में तीसरी कोशिश ने उन्‍हें आईपीएस पुलिस की वर्दी पहना दिया। बरेली वाले घर में तो उनकी एक छोटी बहन है, लेकिन शादी के बाद बिहार के सीवान वाले घर में भरा-पूरा संयुक्‍त परिवार मिला। पति विद्याभूषण पड़ोसी अमेठी के जिलाधिकारी हैं।

नौकरी की शुरूआत ट्रेनिंग के दौरान नोएडा से हुई। एनसीआर का इलाका होने के चलते महिलाओं के साथ ऐसी समस्‍याएं खूब दिखीं। ज्‍यादा मामलों में महिलाओं इसे इग्‍नोर कर ही देती हैं, लेकिन बाकी लड़कियां अपने घरवालों को बता भी देती हैं। शादी-शुदा होने पर कुछ लोग अपने पति की मदद लेती हैं। ऐसे अपराधों के खिलाफ दिल्‍ली में काफी सख्‍ती है। एनसीआर होने के बावजूद नोएडा जैसे सीमांत इलाकों के लोगों की अपेक्षा दिल्‍ली जैसी ही होती है। जबकि संसाधनों आदि मामलों में दिल्‍ली के

अलंकृता सिंह
अलंकृता सिंह
मुकाबले नोएडा-गाजियाबाद जैसे इलाके कमतर हैं। लेकिन नोएडा के एसएसपी अमिताभ यश से बात की और उनकी झंडी मिलते ही वे जुट गयीं। प्रचार-प्रसार के मोर्चे पर एयरसेल ने मदद की।

खुद एक महिला होने के चलते बचपन से ही अलंकृता को खूब अहसास था कि बेहूदा और अश्‍लील कॉल्‍स और फोन संदेश महिलाओं पर कितने भारी पड़ते हैं। वक्‍त-बे-वक्‍त बजने वाले फोन की घंटी किसी न किसी अनिष्‍ट की आशंका से महिलाओं के रोंगटे खड़ी कर देती है। कभी बेहूदा, अश्‍लील प्रस्‍ताव, गंदे एमएमएस, वगैरह-वगैरह। अलंकृत बताती हैं कि हर युवती को कभी न कभी कमोबेश ऐसी समस्‍याओं का साबका पड़ता ही रहता है। सामाजिक ताना-बाना इतना जटिल होता है कि ऐसी शिकायतें, युवतियों पर अक्‍सर उनपर ही उल्‍टी पड़ने लगती हैं। कई बार तो माता-पिता तक यह शिकायत वे करना चाहती हैं तो उनके अभिभावक उनपर भड़क पड़ते हैं डांट-फटकार उल्‍टे उनके खाते में जुड़ जाती है। नसीहत यह भी मिलती है कि छोड़ो पढ़ाई-लिखाई, तुम्‍हें कौन नौकरी करना है। शादी करो और अपना घर सम्‍भालो। कई बार तो ऐसा भी होता है कि पति से शिकायत करने पर वे उल्‍टे-पुल्‍टे सवाल कर तनाव और बढ़ा देते हैं। अक्‍सर घरवालों में भी ऐसी शिकायतों के चलते गंभीर मानसिक तनाव से जूझना पड़ता है। जाहिर है कि, सिर्फ यह सोच कर कि कौन झंझट करे, ज्‍यादातर युवतियां ऐसी हरकतों की शिकायत न करने के, खुद को खामोश ही कर देती है। जिन्‍दगी भर। लेकिन अलंकृता का मकसद ऐसी घटनाओं से जूझना था।

अलंकृता को सुल्‍तानपुर में पहली बार पुलिस प्रमुख की जिम्‍मेदारी मिली थी। नोएडा में जो सोच पनपी थी, वह यहां ठोस करने का वक्‍त मिला। नोएडा के मुकाबले सुल्‍तानपुर बहुत पिछड़ा इलाका है। हालांकि सोच को लागू करने के लिए आर्थिक संसाधनों की कमी थी। लेकिन स्‍कूल और कालेज वगैरह के बीच सीधे पहुंच बनाने की कोशिश की गयी। बीएसए और डीआईओएस के सहयोग से प्राचार्यों के साथ बैठकें की गयीं जिनमें महिलाओं और खासकर लड़कियों को जानकारियों और उससे निपटने के लिए पुलिस तक पहुंचने की कोशिशें दी गयीं।
अलंकृता ने अपने रूटीन निरीक्षण के दौरान भी कालेजों से सम्‍पर्क करने का अभियान शुरू किया था। लेकिन वे हैरत में पड़ गयीं जब लम्‍भुआ के एक कालेज के प्राचार्य ने ऐसे अभियान के दौरान सीधे लड़कियों पर ही बंदिशों की वकालत शुरू कर दी। मसलन, आज-कल के माहौल से बचने के लिए उनकी नसीहत थी कि लड़कियों को सिर से पैर तक पूरी तरह ढंका-छिपा रहना चाहिए। लेकिन इससे अलंकृता का हौसला कम नहीं हुआ। परचे बांटे गये, फोर्स को इस मसले पर संवेदनशील बनाने का भी काम किया और महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराध से निपटने की मुहिम शुरू हो गयी। पौने दो म‍हीने में 160 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 150 का निपटारा किया गया। तरीका था कि पुलिस सीधे ऐसे कॉलर्स से सम्‍पर्क करे और चेतावनी दे। जहां मामले बालिग लड़कों से जुड़े हों, वहां उनके अभिभावकों से सम्‍पर्क किया जाए। जहां दिक्‍कत जहां हो, वहां अंतिम अस्‍त्र चलाया जाए। मतलब, सीधे जेल। एक मामले में तो 26 साल के एक व्‍यक्ति को पुलिस ने जेल भेजा है।

केवल महिला-उत्‍पीड़न नहीं, अलंकृता सिंह संगठित अपराधियों से भी जूझ चुकी हैं। सुल्‍तानपुर पहुंचते ही उनका सामना लुटेरों-राजनीतिकों और उनके समर्थकों से पड़ा। लुटेरों ने एक युवा व्‍यवसायी पियूष सिंह से लाखों की लूट की थी। पुलिस ने जब लुटेरों को पकड़ा तो सैकड़ों शराबी उपद्रवियों ने उनके सामने ही तांडव करते हुए डीएम की कार को नदी में फेंक दिया। पहले तो वे हतप्रभ थीं, लेकिन जल्‍दी ही आक्रामक हुईं और उपद्रवियों से इतर-बितर करते हुए 350 से ज्‍यादा लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाया। पियूष बताते हैं कि यूपी में उद्योग शुरू करने की ख्‍वाहिश पर इस हादसे ने बज्रपात कर दिया था, लेकिन अलंकृता के कार्रवाई ने वापस विश्‍वास जमाया। अलंकृता के तौर-तरीकों के किस्‍से और भी खूब हैं।

अलंकृता का मकसद तो अपराध-शास्‍त्र को ही अपनाने का ही है।  लेकिन वे इसके लिए अपने मूल गणित-विषय के बजाय अब मनोविज्ञान और उससे भी पहले समाजशास्‍त्र का अध्‍ययन करना चाहती हैं ताकि जटिल मानवीय समस्‍याओं को मनो-सामाजिक गणितीय-सूत्रों के बल पर हल कर सकें। पुलिस बल में कल्‍याण योजनाओं को लागू करना भी उनका मकसद है। दरअसल, उनका कहना है कि केवल ईमानदारी ही नहीं, बल्कि ईमानदारी में क्रियाशील प्रोफेशनलिज्‍म की जरूरत होती है। यह पूछने पर कि यदि उनका पति कभी महिलाओं के उत्‍पीड़न के मामले पर उदासीन हुआ तो उन्‍हें कैसा महसूस होगा, अलंकृता का तपाक भरा जवाब था कि ऐसा हो ही नहीं सकता। फोर्स में शामिल महिलाओं की भाषा-बोली में अक्‍सर भद्दी गालियां शामिल होती जा रही हैं, अलंकृता का जवाब है कि अक्‍सर मौकों पर कभी ऐसी जरूरत अनिवार्य तौर पर हो जाती है।

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. सौवीर से संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.

सड़क के नाम पर नोएडा को ही नीलाम कर दिया गया

850 स्क्वायर फुट की ज़मीन की भला गांव में क्या कीमत है? इतनी ज़मीन तो गांव में किसी मजदूर को झोपड़ी डालने के लिए कोई यूं ही दे देता है. लेकिन 850 स्क्वायर फुट के कारपेट एरिया पर नोएडा के एक्सप्रेस वे पर बना एक फ्लैट आज 65 लाख रुपये से ज्यादा का है. 450 स्क्वायर फुट का एक कमरे वाला फ्लैट तो एक्सप्रेस वे पर 35 से 45 लाख रुपये में बिक रहा है. एक्सप्रेस वे अभी बसा नहीं है लेकिन यह सड़क क्‍योंकि ग्रेटर नोएडा जा रही है इस लिए दो गज ज़मीं भी यहां गजराज के दाम बिक रही है.

दिलचस्प बात ये है कि यह 850 या 450 स्क्वायर फुट के फ्लैट 20 से 40 मंजिल की इमारतों पर धरे गए हैं. यानी भूकंप में धराशायी हुए तो फ्लैट के मालिक ये भी न बता पाएंगे कि उनका उजड़ा आशिआना कहां टंगा था. ख़ैर मेरा इरादा किसी बिल्डर की टांग खींचने का नहीं है. मेरा इरादा यह भी साबित करना नहीं है कि आप और हम अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से आज एक्सप्रेस वे पर एक छोटा सा फ्लैट भी नहीं खरीद सकते. दरअसल मेरा इरादा तो आज यह बताने का है कि 1976 में जब यूपी सरकार ने नोएडा को जन्म दिया था तो जनता से ये वायदा किया था कि यहां रोजगार और रिहाइश का मौका हर तबके को दिया जायेगा. इसलिए नोएडा अथॉरिटी को तेज़ी से फैसले लेने के खास अधिकार नोएडा एक्ट के तहत दिए गए.

20-25 साल तो सब कुछ ठीक चला. अथॉरिटी ने सस्ती दरों पर हर किसी को रहने के लिए छत मुहैया कराई. लेकिन फिर सरकार उन वायदों को भूलने लगी जहां नोएडा एक्ट 1976 के तहत फैसले जनहित में लेने का वचन दिया गया था. अगर सरकार की नीयत ही बिगड़ने लगे तो नियम तोड़ने या मरोड़ने में वक्त कितना लगता है. और बदनीयती के इस खेल में नेता और नौकरशाह दोनों निर्लज्ज हो जाएं तो क्या कहने. लिहाजा एक 'महा सड़क' बनाने के नाम पर हज़ारों-लाखों एकड़ ज़मीन कौडि़यों के भाव नीलाम की गयी. दरअसल इस सड़क की आड़ में ही सरकार ने नियमों की बलि चढ़ा दी. यूपी सरकार की दलील थी की सड़क बनाने के पैसे राजकोष में नहीं हैं और न ही इस प्रोजेक्ट को फाइनेंस करवाने का क्रेडिट है. लिहाजा सड़क के बदले ठेकेदार/बिल्डर को सरकार उतने मोल की ज़मीन दे सकती है. नीयत सड़क बनाना नहीं बल्कि सड़क के बदले ज्यादा से ज्यादा ज़मीन लुटाने की थी.

शायद इसलिए जनहित को ताक पर रख, सरकार ने मोल भाव किया ही नहीं. नियमत: सरकार के पास अगर सड़क बनाने का पैसा नहीं था तो कायदे से उतनी ही ज़मीन देनी चाहिए थी जितनी की सड़क बनाने की कीमत हो. लेकिन यहां तो हिस्सा बांट हो रही थी. लिहाजा सड़क के नाम पर नोएडा ही नीलाम कर दिया गया.

लूट का एक दरवाज़ा खुला तो फिर दूसरा दरवाज़ा खुलने में देर कहां थी. मास्टरप्लान में बदलाव हुए और अब बारी नॉएडा एक्सटेंशन की थी. शहर का एक और बड़ा हिस्सा लुटाया गया. इस लूट का आलम यह था की 30 साल से आम लोगों के लिए रियाअती मकान बना रही नोएडा अथॉरिटी मकान बनाना ही भूल गयी. उधर सरकार ने नोएडा के दो और बेशकीमती सेक्टर अपने मनपसंद शराब माफिया को बेच दिए. जिस इलाके में ज़मीन दो लाख रुपये गज हो वहां 10 परसेंट पर 80 हज़ार रुपये गज पर सौदा हुआ. ज़मीन लूटने की यूपी में यह मिसाल आपको डाकू प्रभावित एटा और मैनपुरी जिलों में भी नहीं मिलेगी.

मुझे इससे ज्यादा घबराहट और बेचैनी यह सोच कर हो रही है कि तत्कालीन सरकार के इन लूट भरे फैसलों पर जिन नेताओं ने सदन चलने नहीं दिया और सीबीआई जांच की मांग की, जब उन नेताओं की सरकार बनी तो उन्होंने जांच कराने की जगह लुटेरे बिल्डरों से ही हाथ मिला लिए. बहरहाल आपके अरमानों की इस लूट पर फिर तफसील से लिखेंगे लेकिन एक शेर भोले भाले बहुजन समाज के लिए….

मेरा मुंसिफ ही मेरा कातिल है
मेरे हक में फैसला क्या देगा.

लेखक दीपक शर्मा जानेमाने खोजी पत्रकार हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में आतंकी नेटवर्क और माफिया गिरोहों के विषय में वो गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं. दीपक ने वर्ष 2002 में विशेष संवाददाता के रूप में आज तक ज्‍वाइन किया और वर्तमान में वो एडीटर के रूप में आज तक में विशेष खोजी टीम का नेतृत्‍व करते हैं.

फिरोजाबाद जिले में कई पत्रकारों के इस्तीफे और नई पारी

अमर उजाला, फिरोजाबाद से पत्रकार गौरव लहरी ने इस्तीफा देकर आगरा से प्रकाशित सी एक्सप्रेस को ज्वाइन कर लिया है. दैनिक जागरण, फिरोजाबाद में प्रशासन बीट देख रहे राहुल ने भी इस्तीफा दे दिया है. वे हिन्दुस्तान, आगरा में कार्य कर रहे हैं. फिरोजाबाद में सी एक्सप्रेस के जिला संवाददाता का कार्य देख रहे दिनेश कुमार की जगह अब सिरसागंज के पत्रकार मुकेश मणि कंचन को नया जिला संवाददाता बना दिया गया है.

आगरा में दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार रुपेश कुमार चौधरी को फिरोजाबाद जनपद का दैनिक जागरण का जिला संवाददाता बना दिया गया है. यहाँ लगभग पच्चीस वर्षों से कार्य कर रहे शैलेन्द्र गुप्त की छुट्टी तय मानी जा रही है. लेकिन शैलेन्द्र गुप्त अभी ऑफिस आ रहे हैं लेकिन कोई काम नहीं देख रहे हैं.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं. भेजने वाले का नाम पता पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

ये हैं दुनिया के सात महापाप और सात महापुण्य

दुनिया के सात आश्चर्य की तर्ज पर सात महापाप भी एनाउंस कर दिया गया है. ये महापाप पश्चिमी दुनिया के दार्शनिकों ने अपने हिसाब से तय किया है. सात महापापों को अंग्रेज़ी में सेवेन डेडली सिंस (Seven deadly sins) या कैपिटल वाइसेज़ (Capital vices) या कारडिनल सिंस (Cardinal sins) भी कहा जाता है. ये सात इस प्रकार हैं:

1- लस्ट (Lust) : यानी लालसा, कामुकता, कामवासना (Intense or unrestrained sexual craving)- ये मनुष्य को दंडनीय अपराध की ओर ले जाते हैं और इनसे समाज में कई प्रकार की बुराईयां फैलती हैं. विशेषण में इसे लस्टफुल (lustful) कहते हैं

2- ग्लूटनी (Gluttony) : यानी पेटूपन. इसे भी सात महापापों में रखा गया है. जी हां दुनिया भर में तेज़ी से फैलने वाले मोटापे को देखें तो यह सही लगता है कि पेटूपन बुरी चीज़ हैं और हर ज़माने में पेटूपन की निंदा हुई है और इसका मज़ाक़ उड़ाया गया है. ठूंस कर खाने को महापाप में इस लिए रखा गया है कि एक तो इसमें अधिक खाने की लालसा है और दूसरे यह ज़रूरतमंदों के खाने में हस्तक्षेप का कारण है. मध्यकाल में लोगों ने इसे विस्तार से देखा और इसके लक्षण में छह बातें बताईं जिनसे पेटूपन साबित होता है. वह इस प्रकार हैं… eating too soon, eating too eagerly, eating too expensively, eating too daintily, eating too much, eating too fervently

3- ग्रीड (Greed) : यानी लालच, लोभ. यह भी लस्ट और ग्लूटनी की तरह है और इसमें अत्यधिक प्रलोभन होता है. चर्च ने इसे सात महापाप की सूची में अलग से इस लिए रखा है कि इसमें धन-दौलत का लालच शामिल है (An excessive desire to acquire or possess more than what one needs or deserves, especially with respect to material wealth)

4- स्लौथ (Sloth) : यानी आलस्य, सुस्ती और काहिली (Aversion to work or exertion; laziness; indolence). पहले स्लौथ का अर्थ होता था उदास रहना, ख़ुशी न मनाना. इसे महापाप में इसलिए रखा गया था कि इसका मतलब था ख़ुदा की दी हुई चीज़ से परहेज़ करना. इस अर्थ का पर्याय आज melancholy, apathy, depression, और joylessness होगा. बाद में इसे इसलिए पाप में शामिल रखा गया क्योंकि इसकी वजह से आदमी अपनी योग्यता और क्षमता का प्रयोग नहीं करता है.

5- रैथ (Wrath) : ग़ुस्सा, क्रोध, आक्रोश. इसे नफ़रत और ग़ुस्से का मिला जुला रूप कहा जा सकता है जिसमें आकर कोई कुछ भी कर जाता है. ये सात महापाप में अकेला ऐसा पाप है जिसमें आपका अपना स्वार्थ शामिल न हो (Forceful, often vindictive anger)

6- एनवी (Envy) : यानी ईर्ष्या, डाह, जलन, हसद. यह ग्रीड यानी लालच से इस अर्थ में अलग है कि ग्रीड में धन-दौलत ही शामिल है जबकि यह उसका व्यापक रूप है. यह महापाप इसलिए है कि कोई गुण किसी में देख कर उसे अपने में चाहना और दूसरे की अच्छी चीज़ को सहन न कर पाना.

7- प्राइड (Pride) : यानी घमंड, अहंकार, अभिमान को सातों माहापाप में सबसे बुरा पाप समझा जाता है. किसी भी धर्म में इसकी कठोर निंदा और भर्त्सना की गई है. इसे सारे पाप की जड़ समझा जाता है क्योंकि सारे पाप इसी के पेट से निकलते हैं. इसमें ख़ुद को सबसे महान समझना और ख़ुद से अत्यधिक प्रेम शामिल है.

पुराने ज़माने में ईसाई धर्म में इन सबको घोर पाप की सूची में रखा गया था क्योंकि इनकी वजह से मनुष्य सदा के लिए दोषी ठहरा दिया जाता था और फिर बिना कंफ़ेशन के मुक्ति का कोई चारा नहीं था. अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध नाटककार क्रिस्टोफ़र मारलो ने अपने नाटक डॉ. फ़ॉस्टस में इन सारे पापों का व्यक्तियों के रूप में चित्रण किया है. उनके नाटक में यह सारे महापाप pride, greed, envy, wrath, gluttony, sloth, lust के क्रम में आते हैं.

सात महापाप की ही तरह दुनिया के सात महापुण्य भी बना दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं.

1- Chastity पाकीज़गी, विशुद्धता

2- Temperance आत्म संयम, परहेज़,

3- Charity यानी दान, उदारता,

4- Diligence यानी परिश्रमी,

5- Forgiveness यानी क्षमा, माफ़ी

6- Kindness यानी रहम, दया,

7- Humility विनम्रता, दीनता, विनय

उपरोक्त सात महापुण्य को ध्यान से देखें तो वे सात महापाप के ठीक विलोम हैं. या यूं कहें कि सात महापुण्य का जो विलोम है, वो सात महापाप हैं.

(इनपुट – बीबीसी)

दंगे भड़काने वाली विवादित फिल्म के कई दृश्य दिखाकर भारत में फंसा एक चैनल, भड़ास पर पूरी खबर शीघ्र

विवादित फिल्म 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' के कई दृश्यों का प्रसारण भारत में भी किया जा चुका है. यह काम एक गंभीर माने जाने वाले चैनल ने अंजाम दिया है. भरोसेमंद सूत्रों से भड़ास4मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार उस चैनल पर जब एक कार्यक्रम का हिस्सा बनाकर विवादित फिल्म इनोसेंस आफ मुस्लिम्स के कई दृश्यों को दिखाया जाने लगा तो देश के कई हिस्सों से उस चैनल के मैनेजमेंट व शीर्ष अधिकारियों के पास फोन आने लगे.

तब जाकर आनन-फानन में कार्यक्रम का प्रसारण रुकवाया गया. लेकिन जिन लोगों ने ये कार्यक्रम बनाया और चलाया, उनके खिलाफ इसलिए कोई कार्रवाई नहीं हो रही है क्योंकि वे काफी प्रभावशाली परिवारों से ताल्लुक रखते हैं और उनके परिजनों की केंद्रीय सत्ता में शीर्ष पर पकड़ है. जाहिर है, ये लोग सोर्स-सिफारिश के बल पर चैनल में घुसे और इनकी हनक देखते हुए इन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दे दी गईं.

फिलहाल चैनल का शीर्ष प्रबंधन पूरे मामले की लीपापोती में जुटा है. संबंधित कार्यक्रम के वीडियो को चैनल की वेबसाइट से भी हटा दिया गया है. भड़ास4मीडिया के पास पूरे प्रकरण के सभी दस्तावेज जल्द आने वाले हैं, आते ही चैनल के नाम और उनके इस काम से संबंधित पूरी खबर का प्रकाशन प्रसारण किया जाएगा.

इसे भी पढ़ें- विवादित फिल्म इनोसेंस आफ मुस्लिम्स से जुड़े निकोला बासिल अरेस्ट

विवादित फिल्म ‘इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स’ से जुड़े निकोला बासिल अरेस्ट

विवादित फिल्म 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' से जुड़े निकोला बासिल पकड़ लिए गए हैं. उन्हें लॉस एंजेल्स में अरेस्ट किया गया. एक अदालत ने उन्हें जेल की सज़ा सुनाई है. हालांकि अफसरों का कहना है कि उन्हें भड़काऊ वीडियो के संबंध में नहीं बल्कि एक अन्य मामले में अरेस्ट किया गया है. निकोला बासिल को बैंक धोखाधड़ी के एक मामले में वर्ष 2011 में जेल से रिहा किया गया था.

प्रोबेशन के नियमों के उल्लंघन मामले में उनकी पड़ताल की गई थी. उन पर प्रोबेशन के दौरान अधिकारियों की अनुमति के बिना इंटरनेट का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगाया गया था जिसका उन्होंने उल्लंघन किया. इससे पहले ओबामा प्रशासन ने गूगल से विवादित वीडियो को यू-ट्यूब से हटाने का आग्रह किया था. लेकिन गूगल ने ये कहते हुए इनकार कर दिया था कि इस फिल्म से किसी नियम का उल्लंघन नहीं होता है.

लॉस एंजेल्स स्थित यूएस अटॉर्नी के कार्यालय ने निकोला बासिल को गिरफ्तार करने की पुष्टि की थी. कार्यालय के प्रवक्ता थोम रोज़ेक ने कहा, ''निकोला बासिल को प्रोबेशन अधिकारी के इस आरोप पर गिरफ्तार किया गया था कि उन्होंने रिहाई की शर्तों का उल्लंघन किया है.'' वीडियो के जारी होने के बाद से ही निकोला कहीं छिपे हुए थे. अमरीका में बनी 'इनोसेंस ऑफ मुस्लिम्स' फिल्म की अरबी भाषा में डबिंग की गई. फिल्म में पैगंबर मोहम्मद को अपमानजनक तरीके से प्रदर्शित किया गया है.

इसकी वजह से मुस्लिम देशों में इस फिल्म और अमरीका के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए हैं. बहुत कम बजट में बनी इस फिल्म पर अमरीका का कहना है कि ये किसी अमरीकी क़ानून का उल्लंघन नहीं करती है क्योंकि अमरीका में संविधान के पहले ही संशोधन ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है. इस फिल्म की क्लिप को यू-ट्यूब पर जुलाई में अपलोड किया गया था लेकिन हिंसक प्रदर्शनों की शुरूआत 11 सितंबर से हुई. हिंसा की सबसे प्रमुख घटना लीबिया के बेनगाज़ी शहर में हुई जहां अमरीकी दूतावास पर हमले में अमरीकी दूत क्रिस स्टीफेंस समते चार अमरीकी मारे गए.

फिल्म में काम करने वाले कुछ कलाकार सामने आए हैं जिनका कहना है कि उन्हें गुमराह किया गया है. उनका कहना है कि उन्हें डेज़र्ट वॉरियर नामक एक फिल्म के लिए लिया गया था जिसकी पटकथा में इस्लाम या पैगम्बर मोहम्मद का ज़िक्र नहीं था.

बीबीसी हिंदी को नए एडिटर की तलाश, देखें विज्ञापन, करें आवेदन

बीबीसी हिंदी सेवा को नया एडिटर चाहिए. इस बाबत एक विज्ञापन प्रकाशित कराया गया है. बीबीसी हिंदी सेवा के प्रमुख पद से अमित बरुआ के इस्तीफे के बाद यह पद अस्थाई तौर पर नील करी के पास है.  नील करी स्थायी संपादक चुनने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे. नया संपादक मिलने के बाद वे वापस लंदन लौट जाएंगे. बीबीसी की वेबसाइट पर बीबीसी हिंदी सेवा के लिए संपादक की तलाश से संबंधित विज्ञापन जारी कर दिया गया है. अप्लाई करने की अंतिम तारीख 7 अक्टूबर 2012 है.

ये है बीबीसी हिंदी सेवा के एडिटर के लिए विज्ञापन…

BBC WORLD SERVICE – JOB SPECIFICATION

Designation: Editor, Hindi Service

Reports to: Head of Journalism, WS Languages

Department: WS Languages

Directorate: BBC World Service

Location: Delhi

Grade: Local terms and conditions

Closing date for applications : 7 October 2012 at 11:59pm

AIM OF THE JOB

To lead the development of the BBC Hindi service and its staff across all output and platforms and to provide editorial and strategic direction for BBC Hindi and contribute to the direction of the BBC as a whole in India.

KEY RESPONSIBILITIES

To be responsible for all Hindi Service journalism, on all platforms and in all languages and to ensure editorial and production excellence throughout.

To contribute to the editorial understanding of India across the BBC as a whole.

To commission and originate compelling output relevant to key audiences and with a full understanding of the BBC’s global reach and agenda.

To re-launch bbc.hindi.com, with a global India agenda to have increased impact in the market and bring the BBC to a new generation of the Hindi audience

Working closely with Head of Journalism and the WS Language Management team and along with the Controller, Digital & Technology and Head of Business Development, Asia Pacific lead BBC Hindi strategy across all platforms, in this fast moving and competitive market.

Work closely with the Newsgathering Bureau Editor, Delhi on the further development of the BBC News India operation and on the further integration of the newsgathering operation.

Working with World Service Languages News and Deployments Editor and Planning Editor, establish effective systems for delivery of Hindi Service journalism to the rest of the BBC.

To develop the BBC Hindi team, to meet the challenges of new output and new platforms, leading them in making a greater contribution to the rest of the BBC’s output in English. To be responsible for assessment, training and development of staff. To set objectives and appraise the team.

To lead the Hindi reporting staff in the field and to develop the skills needed to provide content for a changing agenda and multi platform, multi lingual offer to the audience.

Lead the plans for the development of a BBC Hindi TV offer.

Work with Head of Business Development, Asia Pacific on growing and developing Hindi Service partnerships across platforms.

To manage and monitor programme expenditure within the Business Plan so as to meet financial targets in close consultation with the Business Manager
 
To provide advice to other BBC departments on relevant target area affairs. This may involve participation in the output of other World Service or BBC departments
 
To follow closely technological development affecting the Hindi Service operations
 
To work in close co-ordination with counterparts in the region

KNOWLEDGE AND EXPERIENCE

Fluent spoken and written Hindi and English
 
Proven experience of top level journalism in the digital field and digital production skills.

Experience of high impact original journalism.
 
A thorough understanding of the BBC’s Global agenda and of India’s international role.

Fair knowledge and understanding of India’s digital media market

Experience of leading a sizeable team through considerable change, e.g. platform changes, acquiring new skills etc.

Experience of managing budgets and the commitment to achieving the most efficient and cost effective use of resources
 
Has the personal characteristics to advocate the BBC’s values and behaviours; and provide the inspiration for staff commitment around these values

COMPETENCIES

The following competencies (behaviours and characteristics) have been identified as key to success in the job. Successful candidates are expected to demonstrate these competencies.
 
Editorial Judgement – demonstrates balanced and objective judgment based on a thorough understanding of BBC editorial guidelines, target audience, programme and department objectives. Makes the right editorial decisions, taking account of conflicting views where necessary.

Strategic Thinking – Can identify a vision along with the plans which need to be implemented to meet the end goal. Evaluates situations, decisions, issues, etc. in the short, medium and longer-term.

Analytical Thinking – Able to simplify complex problems, processes or projects into component parts, explore and evaluate them systematically. Able to identify causal relationships, and construct frameworks, for problem-solving and/or development

Decision Making – Is ready and able to take the initiative, originate action and be responsible for the consequences of the decision made.

Imagination / Creative Thinking – Is able to transform creative ideas/impulses into practical reality. Can look at existing situations and problems in novel ways and come up with creative solutions.

Planning and Organisation – Is able to think ahead in order to establish an efficient and appropriate course of action for self and others. Prioritises and plans activities taking into account all the relevant issues and factors such as deadlines, staffing and resources requirements.

Leadership – Ability to create a vision and inspire others to realise it irrespective of circumstances.

Resilience – Can maintain personal effectiveness by managing own emotions in the face of pressure, set backs or when dealing with provocative situations. Can demonstrate an approach to work that is characterised by commitment, motivation and energy.

Influencing and Persuading – Ability to present sound and well-reasoned arguments to convince others. Can draw from a range of strategies to persuade people in a way that results in agreement or behaviour change.

Communication – The ability to get one’s message understood clearly by adopting a range of styles, tools and techniques appropriate to the audience and the nature of the information.

Talent Management – Is able to recognise potential (managerial, professional, artistic or otherwise) and is willing to foster the development of that potential. Creates a climate in which potential can be realised.

Change Management – Can understand and anticipate the need for change. Builds frameworks to plan and manage the continuous process of change.

Business Management – Is able to understand commercial imperatives and trading relationships, appropriately applies business principles in terms of costs, the market and added value.

Managing relationships – Able to build and maintain effective working relationships with a range of people.

Self Development – Is able to identify and apply opportunities for learning and development.

(A job specification is a written statement of the essential characteristics of the job, with its principal accountabilities, incorporating a note of the skills, knowledge and experience required for a satisfactory level of performance. This is not intended to be a complete, detailed account of all aspects of the duties involved.)

अप्लाई करने के लिए यहां क्लिक करें– बीबीसी वैकेंसी सर्च एंड अप्लाई

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाएं.

चुनाव आयोग ने अमर उजाला को दिया नेशनल मीडिया अवार्ड

नेशनल इलेक्शन कमीशन ने अपने नेशनल मीडिया अवार्ड की घोषणा कर दी है. इसे प्रिंट में अमर उजाला ने हासिल किया है और इलेक्ट्रानिक में जी न्यूज ने. दो बड़े मीडिया घरानों प्रिंट मीडिया से अमर उजाला और इलेक्ट्रानिक मीडिया से जी न्यूज को पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनावों में मतदाताओं को जागरूक करने व कैंपेन चलाने के लिए नेशनल मीडिया अवार्ड ऑन वोटर एजुकेशन अवार्ड से सम्मानित किया गया है.

इलेक्शन कमीशन ने घोषणा की थी कि आयोग उन सभी मीडिया घरानों को सम्मानित करेगा जो मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने में बेहतर भूमिका निभाएंगे. जी न्यूज और अमर उजाला को तीसरे राष्ट्रीय मतदाता दिवस यानि 23 जनवरी 2013 को इस सम्मान से सम्मानित किया जाएगा. चुनाव आयोग ने अब यह तय किया है कि आगामी सभी चुनावों में इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया के लिए अलग-अलग कैटगरी में यह सम्मान दिया जाएगा.

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न्यूज 24 से कई विकेट गिरे, सस्ते कर्मियों की तलाश तेज

केंद्रीय मंत्री राजीव शुक्ला के न्यूज चैनल न्यूज24 से खबर है कि कई लोगों ने इस्तीफा दे दिया है. प्रबंधन अब ऐसे सस्ते लोगों की तलाश कर रहा है जो कम सेलरी में ज्यादा से ज्यादा काम दे सकें. इस्तीफा देने वालों में मनीष, अनूप, अखलाक, नीरज, ब्रजेश आदि नाम प्रमुख हैं. मनीष डिप्टी ईपी पद पर थे. वे आजतक गए हैं. एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर अनूप पांडे भी टीवी टुडे ग्रुप के साथ जुड़े हैं. वे तेज चैनल में काम करेंगे.

पैनल प्रोड्यूसर अखलाक अब्दुल्ला भी इस्तीफा देकर तेज के साथ कदमताल करेंगे. एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर नीरज पांडे के बारे में चर्चा है कि वे अल्फा चैनल के साथ जुड़ गए हैं. एसोसिएट प्रोड्यूसर ब्रजेश चतुर्वेदी भी अल्फा के हिस्से बने हैं. इनके अलावा कुछ और लोगों के भी न्यूज24 से जाने की खबरें हैं. सूत्रों का कहना है कि न्यूज24 में प्रबंधन कम पैसा देता है और इतना ज्यादा काम लेता है कि वहां कार्यरत आदमी मौका मिलते ही दूसरे जगह भाग लेता है. इसी कारण पहले भी न्यूज24 को लोग छोड़कर जाते रहे हैं. फिलहाल जो भगदड़ शुरू हुई है उसका बहुत बड़ा कारण कम सेलरी देना और बहुत ज्यादा काम लेना है. हालांकि प्रबंधन अपनी नीति में बदलाव करने के मूड में नहीं है. जो लोग गए हैं उनकी जगह पर उनसे भी सस्ते लोगों की तलाश शुरू कर दी गई है.

अगर आपके पास भी न्यूज24 को लेकर कोई जानकारी, खबर या संस्मरण हो तो भड़ास के साथ शेयर करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

पंजाब केसरी के मालिक को फिर झटका : फर्जी खबर छापने पर लगा जुर्माना

उत्तर भारत के हिंदी समाचार ग्रुप पंजाब केसरी के मालिक विजय चोपड़ा को एक कोर्ट ने मुजरिम करार देते हुय 5000 रुपए का जुर्माना किया है. केसरी के मालिक को यह जुर्माना एक पीपीएस अधिकारी के खिलाफ झूठी और फर्जी खबर छापने के आरोप पर कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए लगाया.

दुनिया भर की खबरें छापने दिखाने वाले अखबारों चैनलों ने पंजाब केसरी के मालिक पर कोर्ट द्वारा लगाए गए जुर्माने की खबर नहीं छापी और न ही दिखाई. इस खबर को सिर्फ दैनिक सवेरा नामक अखबार ने फ्रंट पेज पर प्रकाशित किया है. दैनिक सवेरा के मालिक शीतल विज हैं. उन्हें इस साहसिक काम के लिए बधाइयां मिल रही हैं. उधर, जिस मामले में चोपड़ा को सजा हुई है, उसके अपीलकर्ता का कहना है कि कोर्ट ने सजा कम दी है, वे इस मामले में फिर से अपनी तरफ से अपील दायर करके ज्यादा सजा देने की मांग करेंगे.

अभी बीते 18 सितम्बर को भी एक कोर्ट ने विजय चोपड़ा को तथ्यों से भ्रमित खबर छापने के आरोप में सजा सुनाई थी. तब भी सिर्फ दैनिक सवेरा में ही खबर छपी. पंजाब केसरी के मालिक को गलत खबर छापने के कारण 10 दिन के भीतर यह दूसरा झटका है.

जालंधर से अरुण की रिपोर्ट.

इसे भी पढ़ें- पंजाब केसरी के विजय चोपड़ा को छह महीने कैद और जुर्माना

बंद करो न्यूज़ चैनल, कुछ और लगा दो… दिमाग पक गया है

अब शाम 6 बजे के बाद न्यूज़ चैनल देखने का मन नहीं करता। ये मेरा निज़ी विचार भी है और कुछ यार दोस्तों के मन में भी कुछ ऐसा ही है.. वज़ह, उन नेताओं को शाम को न्यूज़ की जगह राजनीतिक बहस में बिठा दिया जाता है जो देश लूटने के भागीदार हैं। जनता उन्हें देखना पसंद नहीं करती उनकी जनसभाओं में जाना पसंद नहीं करती, जनता का बस चले तो इनका हाल बुरा कर देती। क्या हमने ये ही सब देखने के लिए न्यूज़ चैनल्स को पैसा दिया है? माफ़ करना अब करीब-करीब सभी राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स मुफ्त में नहीं देखे जा रहे। केबल टीवी की भाषा में ये पेड चेनल हैं।

शाम की बहस में कांग्रेस, बीजेपी, सपा बसपा और अन्य कई दलों के नेता चीख-चीख कर कान ख़राब कर देते हैं। बेचारा एंकर… उसी पर तरस आता है कि अपनी नौकरी बचाने के लिए उसे इन नेताओं के साथ वक्त बर्बाद करना पड़ रहा है। न्यूज़ चैनलों ने अपनी कॉस्ट कटिंग की वज़ह से खबर से ध्यान हटा कर नेताओं की बहस पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। शाम होते ही हर न्यूज़ चैनल ऐसा कर रहा है, लिहाज़ा दर्शक खीज रहा है खबर की तलाश में दर्शक लोकल चैनल की तरफ रुख कर रहा है.. जहां शहर, प्रदेश की खबर तो कम से कम दिखलाई देती है। कितने दर्शक ऐसे होंगे जो इन बेईमान नेताओं की बहस को सुनना चाहते होंगे। देश बेचने में लगे इन नेताओं की सुबह शाम अपनी कुर्सी बचाने में लगी रहती है। इन नेताओं से कब छुटकारा मिलेगा? उफ़्फ..

 
राष्टीय न्यूज़ चैनल वालों, दर्शको पर रहम करो। एक आध घंटा तो ठीक है, पर तीन चार घंटे दिमाग नहीं झेल पा रहा, दिमाग का दही बन जा रहा है, न्यूज़ चैनल वालों हम आपका न्यूज़ चैनल देखने का पैसा देते हैं। फ्री में नहीं देख रहे, कुछ तो रहम करो.. एंकर को देखना अच्छा लगता है पर ये संजय निरुपम, जगदम्बिका पाल, मुख़्तार अब्बास, मनीष तिवारी और हाँ आँख बंद 
 
कर चिल्ला कर बोलने वाले कांग्रेसी नेता शकील अहमद.. इनसे कब निज़ात दिलाओगे..? खबर दिखाओ… बहस नहीं… अब बात कर लें फटाफट न्यूज़ की, स्पीड न्यूज़ की, गोली से रफ़्तार से तेज़ खबर की.. ट्वेंटी ट्वेंटी, शतक खबर की… ऐसी चलती शॉट कोई और आवाज कोई और… क्या मज़ाक है… एक खबर को चार बार दिखा कर शतक पूरा किया जा रहा है तो फिर सौ खबरें कैसे हुईं..? विद्वान संपादक बताईये ना.. जिम्मेदारी आपकी ही तो है…ऐसी भी क्या कॉस्ट कटिंग…
 
एक टिकर तीन दिन तक चलता है कि भारत ने पाकिस्तान को हराया। अरे भाई जीत गया आप भी 10 घंटे चला दो… सब को पता चल गया, अब कोई दूसरी खबर की टिकर चला दो ना… एक ही लाइन तीन-तीन दिनों तक कोई कैसे सहन करेगा… ये भी क्या दर्शक बताएगा?
 
पहले टिकर का अपना असर होता था अब ये भी बेअसर हो गया है ..समझ  में नहीं आता कि टिकर बदल कर चलाने में क्या खर्चा आता है? एक दौर था जब अपराध, नाग नागिन ,ज्योत्षी खबरें देख कर उबकाई आने लगती थी अब इन कांव-कांव करते नेताओं को देख कर टीवी स्क्रीन फोड़ने का मन करता है… अरे भाई खबर दिखलाओ जरा  ये तो बताओ सोनिया गाँधी ने यूएसए जाकर कौन सी बीमारी का इलाज करवाया, कहाँ करवाया?
 
जनता जानना चाहती है… बताओ ना चुप क्यों हो गए…? क्या कोई पाबन्दी है? खबर कहाँ है? क्या है? क्या ये भी दर्शक बताएगा, संपादक .और उनकी टीम क्यों चुप हो जाती है? क्या नौकरी का डर है या बाज़ारवाद हावी हो गया है खबर दिखलाने के लिए मोटी तनख्वाह जरूरी नहीं होनी चाहिए… मोटी तनख्वाह वाले संपादकों, रिपोर्टरों  का क्या हाल हुआ है? कुछ गर्त में चले गए या लापता हो गए… नाम आप भी जानते हैं… बताने की जरूरत नहीं… खबरों में सुधार करने के लिए क्या क्या करना है आप से बेहतर कोई नहीं जानता कॉस्ट कटिंग इसका हल नहीं है ..खबर दिखाना… दर्शक को अपने चैनल से ना जाने देना ही इसका हल है।
 
कॉस्ट कटिंग करनी है तो अपनी मोटी तन्खवाह में से करो… कंपनी से मिलने वाली दामादों वाली सुविधाओ में करो… क्यों साबुन तेल के बिल लगा देते हो, अपने कपड़ों को प्रेस करने, बच्चों को स्कूल भेजने में कम्पनी की कार का इस्तेमाल करते हो… याद रखो जब तक नौकरी है तब तक मज़े है कहीं ये मज़े आपकी नौकरी लेने कि वज़ह ना बन जाएं.. बहरहाल, हम रास्ता न भटक जाएँ, सीधे खबर पर चले जाएँ तो ज्यादा बेहतर होगा। 
 
खबर… सधे शब्दों में हार्ड न्यूज़… जो सरकार हिला दे… शासन में अफरातफरी ला दे… रिपोर्ट देख दर्शक कहें, "वाह ये है खबर…" न कि न्यूज़ चैनल्स  पर इन नेताओ को देख ये कहे… "कुछ और लगा दो… दिमाग पक गया है…"
 
लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं.

कार की टक्कर से लुधियाना के पत्रकार की मौत

लुधियाना से खबर है कि पत्रकार हनी सिक्का (27) की सड़क हादसे के कारण मौत हो गई है. वे मोटरसाइकिल पर सवार होकर फोकल प्वाइंट स्थित एक फैक्ट्री जा रहे थे. रास्ते में एक तेज रफ्तार कार ने टक्कर मार दी. जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई. हनी सिक्का फोकल प्वाइंट स्थित एक निजी फैक्ट्री में काम करते थे और साथ में एक दैनिक समाचार पत्र में बतौर पत्रकार भी कार्यरत थे.

मौके पर पुलिस के पहुंचने से पहले ही हनी ने दम तोड़ दिया था. जांच अधिकारी ने बताया कि पुलिस जल्द ही वाहन चालक का पता लगा लेगी. पोस्टमार्टम कराने के बाद सिविल लाइन स्थित श्मशानघाट में हनी सिक्का का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हनी की मौत पर कई धर्मिक, सामाजिक व राजनीतिक लोगों ने हनी के पारिवारिक सदस्यों के साथ शोक व्यक्त किया.

जोहांसबर्ग में हिंदी के उन्नीस भारतीय विद्वान सम्मानित

: इनमें प्रभात खबर के संपादक हरिवंश और वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय भी : दक्षिण अफ्रीका के जोहांसबर्ग में हुए विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी भाषा को देश दुनिया में प्रोत्साहित और संवर्धित करने के लिए भारत के 19 विद्वानों को सम्मानित किया गया. इनमें प्रभात खबर के संपादक हरिवंश और वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय के नाम भी शामिल हैं.

सम्मान पाने वाले अन्य भारतीय विद्वानों में हिमांशु जोशी, राजेन्द्र प्रसाद मिश्र, कैलाश चंद्र पंत, एम पियोंग तेजमन जमीर, प्रोफेसर सी ई जीनी, डा रामगोपाल शर्मा दिनेश, प्रोफेसर जाबिर हुसैन, प्रोफेसर मधुसूदन त्रिपाठी, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रोफेसर बीवाई ललिताम्बा, उषा गांगुली, डा के वंजा, डा गिरिजा शंकर त्रिवेदी, जियालाल आर्य और प्रोफेसर वाई लक्ष्मीप्रसाद शामिल हैं.

दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी भाषा की अलख जगाने वाले 22 विदेशी हिंदी विद्वानों को भी उनके योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया. इनमें आस्ट्रेलिया के डॉ पीटर गेराल्ड फ्रेडलान्डर, रुस के प्रोफेसर सेर्गेई सेरेबिरयानी, चेक गणराज्य के डॉ डगमार मार्कोवा, इटली के मार्को जोली, चीन के प्रोफेसर ल्यू अन्वूक, मारीशस की डा बूधू, थाइलैंड के बमरुंग खाम एक, श्रीलंका के प्रोफेसर उपुल रंजीत हेवाताना गामेज , बुल्गारिया की वान्या जार्जिवा गंचेवा, अफगानिस्तान के जबुल्लाह ‘फीकरी’, उक्रेन की कैटरीना बालेरीवा दोवबन्या, ब्रिटेन के डॉ कृष्ण कुमार, जर्मनी के इंदुप्रकाश पांडेय, जर्मनी की ही डॉ बारबरा लार्डत्स , मारीशस के सत्यदेव टेंगर, जापान के प्रोफेसर टिकेदी इशिदा और डॉ तोरमाचो किकुची , ब्रिटेन के विजय राणा, सूरीनाम के भोलानाथ नारायण, दक्षिण अफ्रीका के रामभजन सीताराम तथा अमेरिका के वेदप्रकाश बदुक शामिल हैं.

विश्व हिंदी सम्मेलन में लोकतंत्र और मीडिया की भाषा के रुप में हिंदी विषय पर आयोजित सत्र में विभिन्न विद्वानों ने कहा कि अन्य भाषाओं के प्रति शत्रुता के भाव को त्यागने से ही हिंदी का भला होगा. इस विषय पर बोलते हुए नया ज्ञानोदय के संपादक रविन्द्र कालिया ने कहा कि हिंदी के नाम पर टसुए बहाने और गौरवान्वित होने का आज माहौल बना हुआ है. उन्होंने कहा कि भारत में आजादी के बाद हिंदी के जो शब्द बने, वे हमारी भाषा के लिए और भी खतरनाक साबित हुए. पहले पारिभाषिक शब्द और बाद में आकाशवाणी की हिंदी ने हिंदी की दुर्दशा में खतरनाक भूमिका निभायी. उन्होंने कहा कि हिंदी को पानी की तरह बहने देना चाहिए और इसके साथ ही जरुरी है कि अन्य भाषाओं के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखा जाए. हम बोलियों को मजबूत करेंगे तो हिंदी और मजबूत होगी.

हिंदुस्तान के प्रधान संपादक शशि शेखर ने अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी की शुरुआत मशहूर शायर कैफी आजमी की नज्म की इन पंक्तियों से की 'आज की रात गर्म हवा चलती है, आज की रात फुटपाथ पर नींद नहीं आएगी, तुम उठो, तुम सब उठो, कोई खिडकी इस दीवार में उठ जाएगी.' उन्होंने आशाभरे शब्दों में कहा कि वह गिलास को आधा भरा देखते हैं, खाली नहीं. उन्होंने एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें भविष्यवाणी की गयी है कि 2043 में संसार का आखिरी अखबार छपेगा.
 

हिंदी वालों के लिए अच्छी खबर है डिस्कवरी साइंस का हिंदी में भी शुरू होना

अभी तक केवल अंग्रेजी में प्रसारित हो रहा डिस्कवरी साइंस एक अक्टूबर हिंदी में भी प्रसारित होगा. नई व्यवस्था के तहत पहले अंग्रेजी और हिंदी के कार्यक्रम बारी-बारी से प्रसारित होगा. डिस्कवरी साइंस के कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय हैं और उनकी लोकप्रियता को देखते हुए प्रबंधन ने हिंदी भाषी क्षेत्रों में अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए यह फैसला लिया है.

डिस्कवरी साउथ एशिया के सीनियर वाइस प्रेसीडेंट राहुल जौहरी हैं. इन्होंने बताया कि अपनी लॉन्चिंग के बाद से ही ‘डिस्कवरी साइंस’विज्ञान को बेहद सरल ढंग से लोगों के बीच पहुंचा रहा है और यही इसकी लोकप्रियता की वजह भी है. उन्होंने कहा कि दर्शकों के उत्साह को देखते हए ही हम हिंदी भाषा में इसे लाना चाहते हैं क्योंकि आज भी यह माना जाता है कि हिंदी में विज्ञान कथाओं का अभाव है. डिस्कवरी इंडिया के मार्केटिंग वाइस प्रेसीडेंट राजीव बख्शी के मुताबिक डिस्कवरी की पहुंच तकरीबन 20 मिलियन घरों में हो गई है. हिंदी में शुरू करने के बाद दर्शक संख्या में इजाफा होगा.

फोकस व हमार टीवी के कर्मियों के चेक बाउंस, पीएफ पी गया प्रबंधन

मतंग सिंह और कमला सिंह पर आरोप है कि इन लोगों ने अपने मीडिया ग्रुप के कर्मियों का पीएफ पी लिया है. इनकी कंपनी पाजिटिव मीडिया ग्रुप के दो चैनलों फोकस टीवी और हमार टीवी का प्रसारण बंद होने के बाद यहां कार्यरत कर्मियों को बकाया चार महीने की सेलरी का चेक मिला था. लेकिन लोगों के चेक बाउंस हो गए. अभी तक पीएफ का भुगतान नहीं किया गया है. कहा जा रहा है कि प्रबंधन पीएफ के नाम पर काटे गए पैसे को डकार गया है.

फोकस व हमार टीवी पर 20 अप्रैल 2012 के बाद से किसी तरह का कोई प्रसारण नहीं हो रहा है. ग्रुप से करीब 70 लोगों ने इस्तीफा दिया. इन्हें पीछे से बकाया चार महीने की सेलरी दी गई और पीएफ देने आश्वासन दिया गया था. पर सेलरी चेक बाउंस हो गए और पीएफ मिलने के आसार नहीं हैं. जो लोग अब भी संस्थान के साथ हैं, उन्हें एक महीने की सेलरी दी गई लेकिन ये चेक भी बाउंस हो गए. चैनलों के मैनेजिंग डायरेक्टर कमला प्रसाद का कहना है कि वे लोग समस्या का हल तलाशने में जुटे हैं. अगर वे लोग चैनल नहीं चला पाए तो कर्मचारियों को फोर्स लीव पर भेज देंगे.
 

अंशुमान का इस्तीफा, दिलीप वेंकटरमन बने सीईओ, पारितोष की नई पारी

अंशुमान मिश्रा ने ‘टर्नर एशिया-पैसिफिक’ के नेटवर्क एंड कंटेंट डिस्ट्रीब्यूशन के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद से इस्तीफा दे दिया है. वे 12 अक्टूबर को रिलीव होंगे. मिश्रा पिछले 14 सालों से संगठन के साथ काम कर रहे थे. मिश्रा वर्तमान में हांगकांग में रह रहे हैं. वे बीबीसी वर्ल्ड (इंडिया) में भी काम कर चुके हैं. अंशुमान ने कहा है कि मैं कंपनी में अपने काम से संतुष्ट हूं लेकिन मुझे अपने अच्छे मित्रों से विदा लेने का दुख है. टर्नर इंटरनेशनल एशिया-पैसिफिक के प्रेसिडेंट और मैनेजिंग डायरेक्टर स्टीव मार्कोपोटो का कहना है कि अंशुमान हमेशा हमारे प्रमुख सहयोगी और भरोसेमंद साथी रहे हैं. हम सभी उनके कॅरियर में आगे की सफलता के लिए शुभकामना करते हैं.

एक अन्य समाचार के मुताबिक सीएनएन के एन दिलीप वेन्कटरमन ने ग्रुप-18 के आईबीएन7 के विस्तार का कार्यभार देख रहे पीयूष जैन का स्थान लिया है. अब वे सीईओ के अतिरिक्त आईबीएन-7 और सीएनएन दोनों की विस्तार स्ट्रेटेजिज को नया रंग देंगे. दिलीप वेन्कटरमन को 2010 में आईबीएन-सीएनएन का सीईओ बनाया गया था. दिलीप वेन्कटरमन के नये कार्यभार ग्रहण करने के अवसर पर सीएनएन-आईबीएन, आईबीएन-७, आईबीएन-लोकमत के एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई मौजूद थे. वेन्कटरमन का दो दशकों से भी ज्यादा का कारपोरेट क्षेत्र में अनुभव है. वे इन्डिया टुडे और जी नेटवर्क ग्रुप के साथ भी काम कर चुके हैं.

इंडिया टीवी ने पारितोष जोशी को अपना नया रणनीतिकार नियुक्त किया है. अप्रैल 2012 तक जोशी स्टार सीजे नेटवर्क के सीईओ के तौर पर कार्यरत थे. जोशी इंडिया टीवी के मौजूदा बिजनेस और आने वाले वेंचर्स के लिए रेवेन्यू बढ़ाने का काम करेंगे. इंडिया टीवी की एमडी एंड सीईओ रीतु धवन ने पारितोष को नई पारी के लिए शुभकामनाएं दी. उधर, जोशी का कहना है कि रजत शर्मा जैसे इंडस्ट्री के वरिष्ठ सहयोगियों के साथ काम करने का मौका मिलना उनके लिए खुशी की बात है. जोशी के पास 27 वर्षों का अनुभव है.

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रणबीर और प्रियंका ने लांच किया भास्कर.कॉम का ऑनलाइन यूपी एडिशन

दैनिक भास्कर.कॉम ने उत्तर प्रदेश का ऑनलाइन एडिशन लांच किया है. प्रबंधन का कहना है कि भारत और हिंदी में यह पहला प्रयोग है जब एक अखबार समूह ऑनलाइन संस्करण के जरिए उस क्षेत्र तक पहुंच रहा है, जहां उसका प्रिंट एडिशन फिलहाल नहीं है. बॉलीवुड स्टार रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा ने यह खास सेक्शन मुंबई में लांच किया. प्रबंघन के मुताबिक उप्र की खबरों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए हर समय उपयोगी सामग्री रहेगी.

यूपी मांगे जवाब…थीम के साथ दैनिक भास्कर.कॉम का फोकस राज्य के खास जन मु्द्दों पर होगा. राज्य के चुनिंदा शहरों में तैनात रिपोर्टर्स इस एडिशन के जरिए पाठकों को ब्रेकिंग न्यूज, लाइव तस्वीरों और वीडियो के जरिए अपडेट रखेंगे. यूपी की खबरों का यूआरएल दैनिकभास्कर.कॉम/यूपी है. उल्लेखनीय है कि दैनिक भास्कर अभी दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, छत्तीसगढ़, हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र और गुजरात के लिए स्पेशल वेब सेक्शन संचालित कर रहा है.
 

लखनऊ के बाद अब एनसीआर से लांच होगा लोकमत

लोकमत प्रकाशन का हिंदी दैनिक समाचार पत्र लोकमत बीकानेर, जयपुर और लखनऊ के बाद अब नोएडा से प्रकाशित होने की तैयारी कर रहा है. अखबार के प्रकाशक अशोक माथुर हैं. अखबार प्रबंधन लोकमत को नोएडा में छापकर दिल्ली सहित एनसीआर के पाठकों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है.  लोकमत प्रकाशन समूह की स्थापना 1947 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अंबर लाल माथुर ने की थी. नोएडा इस समूह का चौथा एडिशन होगा.

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‘ए1 तहलका’ न्यूज चैनल लाएंगे हरविंदर मलिक

ए1 न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से जल्द ही हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लिए इंफोटेनमेंट चैनल आने जा रहा है. चैनल का नाम होगा- ''ए1 तहलका''. इसके संपादक हरविंदर मलिक हैं. संपादक हरविंदर का दावा है कि यह चैनल हिन्दी और हरियाणवी भाषा का पहला इंफोटेनमेन्ट चैनल होगा. इसमें 60 फीसदी न्यूज और 40 फीसदी मनोरंजन से जुड़ा कंटेन्ट होगा. चैनल के लिए टीम बनाई जा रही है. चैनल का हेड आफिस चंडीगढ़ में बनाया गया है.

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मीडिया के पतन पर काफी चिंतित हैं राजीव शुक्ला

राजीव शुक्ला आजकल बड़े चिंतित हैं. उनकी चिंता मीडिया के पतन व इसके गिरते स्तर को लेकर है. उन्होंने अपनी चिंता, पीड़ा और नाखुशी का इजहार एक कार्यक्रम के दौरान किया. उन्होंने अपनी चिंता को शब्द देते हुए कहा कि मीडिया को लंबे समय तक पवित्र गाय नहीं माना जा सकता, क्योंकि अब पत्रकार पत्रकार के दायरे से बाहर निकल कर सीईओ, बिजनेस हेड व चैनल मालिक बन रहा है.

उन्होंने कहा कि मीडिया बाजार में खड़ा हो इस पर कोई हर्ज नहीं है, लेकिन मीडिया के माध्यम से अन्य धंधे चमकाए जा रहे हैं, बड़ा संकट तो यह है.  शुक्लाजी फाउंडेशन फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स की ओर से आयोजित क्रोनी जर्नलिज्म विषय पर आधारित सेमिनार में बोल रहे थे. शुक्लाजी भी पहले पत्रकार थे लेकिन बाद में कई तरह के रास्तों पर चलते हुए इन दिनों केंद्रीय मंत्री बन गए हैं.

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि एक बिल्डर अपना न्यूज चैनल क्य़ों ला रहा है क्योंकि उसे अपनी जमीन भी सरकार से पास करवानी है, नक्शा भी पास करवाना है. कई तरह के लाभ लेने हैं. और यह लाभ लेने का रास्ता उसे पत्रकार ही सुझा रहा है. यही वजह है कि एक मीडिया कंपनी है उसके पास न्यूज चैनल भी है. चीनी मिल भी है और भी कई धंधे. न्यूज चैनल घाटे में जा रहा है तो क्या हुआ, चीनी मिल और दूसरे धंधे तो फल-फूल रहे हैं. राजीव शुक्ला ने कहा कि मर्यादा और लक्ष्मण रेखा जैसे शब्दों की उम्मीद करना बेमानी है. हर पत्रकार इस दलदल में नहीं है, लेकिन जो लोग हैं उन्होंने सबका नाम फंसा रखा है.

सेमिनार में राजीव शुक्ला के अलावा मीडिया विश्लेषक दिलीप चेरियन, वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता, वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगजीन, वरिष्ठ पत्रकार टी के अरुण व वरिष्ठ पत्रकार इंदर मलहोत्रा ने भी अपने विचार रखे.
 

बीबीसी में कई बदलाव, जिम इगान व रिचार्ड पोर्टर को नया काम

बीबीसी ने कई बदलावों की घोषणा की है. बीबीसी के मल्टी मीडिया जर्नलिस्ट ब्रॉडकास्ट और डिजिटल आउटपुट पर एक साथ मिलकर काम करेंगे. इसे 27 भाषाओं में प्रसारित किया जाएगा. जल्द ही बीबीसी को नये ऑफिस में ट्रांसफर किया जा रहा है. एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हाईडिफिनिशन ट्रांसमीशन लगाया गया है.

बीबीसी न्यूज़ वेबसाइट की ख़बरें स्मार्ट फोन पर भी उपलब्ध होगी. बीबीसी वित्त पोषित, बीबीसी.कॉम / न्यूज़ और बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ सर्विस को मिलाकर बीबीसी ग्लोबल न्यूज़ लिमिटेड का गठन किया गया है. जिम इगान को नए गठित बीसीसी ग्लोबल न्यूज़ लिमिटेड का चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर बनाया गया है. जिम के साथ रिचार्ड पोर्टर को भी जिम्मेदारी दी गई है और वे बीबीसी ग्लोबल न्यूज़, अंग्रेजी के संपादकीय जिम्मेदारी निभायेंगे.
 

दिलीप जावलकर एवं अन्य के विरूद्ध शिकायत पर कार्यवाही शुरू की प्रेस काउंसिल ने

देहरादून। उत्तराखण्ड शासन, तत्कालीन जिलाधिकारी दिलीप जावलकर, तत्कालीन एडीएम विनोद कुमार सुमन, तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट मेहरबान सिंह बिष्ट के विरूद्ध की गई शिकायत का भारतीय प्रेस परिषद ने संज्ञान लेते हुए कार्यवाही प्रारंभ कर दी है।

उत्तराखण्ड पत्रकार संयुक्त संघर्ष समिति के संरक्षक एंव उत्तराखण्ड एटीएर्स एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष श्री एसपी सबरवाल को भारतीय प्रेस परिषद के अनुभाग अधिकारी बीएस सैनी ने पत्र भेजकर सूचित किया है कि उनके द्वारा की गई शिकायत को पंजीकृत कर लिया गया है। प्रतिपक्षियों को प्रति उत्तर देने हेतु नोटिस जारी कर दिया गया है। पत्र में कहा गया है कि प्रतिपक्षियों से प्रति उत्तर प्राप्त होने पर उसकी एक प्रति अग्रिम कार्यवाही हेतु उनके पास भेज दी जायेगी। पत्रकार संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक अनिल वर्मा ने भारतीय प्रेस परिषद द्वारा शिकायत के संज्ञान लेने पर आभार जताया है।

साहित्यश्री सम्मान समारोह में मृदुला समेत कई लोग सम्मानित

‘दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ द्वारा हिन्दी भवन, नई दिल्ली (मंगलवार, 25 सितंबर, 2012) में आयोजित साहित्यश्री सम्मान समारोह में वर्ष 2011-12 का ‘साहित्य मनीषा सम्मान’ सुपसिद्ध लेखिका और हिन्दी मासिक पत्रिका ‘पाँचवाँ स्तंभ’ की संपादक श्रीमती मृदुला सिन्हा को पूर्व न्यायधीश सर्वोच्च न्यायालय, न्यायमूर्ति श्री विकास श्रीधर सिरपुरकर जी के करकमलों द्वारा प्रदान किया गया।

इस अवसर पर न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) श्री विकास श्रीधर सिरपुरकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह चिंता की बात है कि देश की आजादी के छह दशक बाद हम अभी भी हिन्दी को न्यायिक प्रक्रिया में उपयोग नहीं कर रहे हैं। अगर किसी ने न्यायपालिका में हिन्दी का उपयोग करने का प्रयास किया तो दूसरों द्वारा उन्हें रोक दिया जाता है। देश के हर कोने में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए उन्होंने सुझाव दिया। हिन्दी के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी पदोन्नत किये जाने पर उन्होंने बल दिया। न्यायिक प्रक्रिया और मध्यम एवं प्राथमिक स्कूल में अध्ययन के लिए हिन्दी को एक माध्यम के रूप प्रयोग करने की जरूरत पर बल दिया।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता, प्रोफेसर विजय कुमार मल्होत्रा ​​ने कहा कि अन्य देशों की तरह सरकारी स्कूलों में विशेष रूप से देश में प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा (हिन्दी) में प्रदान की जानी चाहिए। राजधानी में नगर निगम के फैसले के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलने के बजाय, निगम को शुरूआत में बच्चों को हिंदी में शिक्षा प्रदान करना चाहिए और कुछ वर्षों बाद अंग्रेजी माध्यम में भी बच्चों को शिक्षित करना चाहिए।

श्रीमती मृदुला सिन्हा के अतिरिक्त समारोह में श्री रघुनंदन शर्मा को ‘साहित्यकार सम्मान’, डा. हरगुलाल गुप्ता को ‘आंचलिक उपन्यास साहित्य सम्मान’, डा. मधु भारतीय को ‘गीतकार सम्मान’, श्री राधेश्याम बंधु को ‘गीतकार सम्मान’, डा. सविता चड्ढा को ‘कथाकार सम्मान’, श्री दीनानाथ बत्रा को ‘विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान’, डा. जे लक्ष्मी रेड्डी को ‘हिन्दीतर भाषी सम्मान’, डा. अमर नाथ ‘अमर’ को ‘पत्रकारिता सम्मान’ और डा. रमाशंकर श्रीवास्तव को ‘व्यंगकार सम्मान’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। समारोह का कुशल संचालन श्री महेशचन्द्र शर्मा, अध्यक्ष (दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन) ने किया। समारोह में डा. रामकृपाल सिन्हा (पूर्व मंत्री, भारत सरकार), हिन्दी भवन के मंत्री एवं कवि डा. गोविन्द व्यास, डा. रवि शर्मा, गजेन्द्र सोलंकी, इन्दिरा मोहन सहित देश के विविध क्षेत्रों के गण्यमान्य लोग उपस्थित थे।

इस प्रेस विज्ञप्ति की प्रस्तुति गौरबेश सिंह की है.

क्या इस फ्रॉड के लिए दैनिक जागरण के मालिक और सूचना विभाग के अफसर जेल भेजे जाएंगे?

: दैनिक जागरण के अपंजीकृत हल्द्वानी संस्करण पर मेहरबान शासन और प्रशासन, दैनिक जागरण के मालिकों ने गलत जानकारी के आधार पर लाखों रुपये का विज्ञापन लेकर सरकार को लगाया चूना : रुद्रपुर। बड़े लोगों के सामने शासन और प्रशासन हमेशा से झुकता आया है। उनको लाभ पहुंचाने के लिए सरकारें और प्रशासन के लोग नियमों, कायदे-कानूनों का परवाह नहीं करते। उत्तराखण्ड का शासन और प्रशासन भी इसी ढर्रे पर काम कर रहा है। यह नियमों को धता बता कर पिछले करीब 9 सालों से दैनिक जागरण के अपंजीकृत हल्द्वानी संस्करण पर मेहरबान है। शासन और प्रशासन नियमों की अनदेखी कर इसे लाखों के विज्ञापन दे चुका है और दे रहा है। यही नहीं, उत्तराखंड सरकार का सूचना एवं लोक संपर्क विभाग दैनिक जागरण के पंजीकृत होने की झूठी सूचना देकर सबको भ्रमित कर रहा है और एक तरह से धोखाधड़ी कर रहा है। इस लेखक ने खुद जब आरटीआई के तहत जानकारी मांगी तो मुझ आवेदक को जागरण के हल्द्वानी संस्करण के पंजीकृत होने की झूठी सूचना दी गई।

इस (2012) साल जुलाई के अंतिम सप्ताह तक दैनिक जागरण हल्द्वानी में प्रिंटलाइन में देहरादून से प्रकाशित होने और हल्द्वानी में मुद्रित होने की जानकारी छप रही थी। बिहार में कई जगहों से अपंजीकृत संस्करणों की खबर मीडिया में आने के बाद हल्द्वानी के अपंजीकृत संस्करण को पंजीकृत कराने की सुधि दैनिक जागरण प्रबंधन को आई होगी, इसलिए 27 जुलाई 2012 से प्रिंटलाइन लाइन बदलकर छापी जाने लगी और पहले से छप रही देहरादून संस्करण की पंजीयन संख्या की जगह एक नई पंजीयन संख्या छापी जाने लगी।

उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के नियमानुसार केवल पंजीकृत समाचार पत्र / पत्रिकाओं को ही विभागीय विज्ञापन दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन इस नियम के विपरीत विभाग ने लाखों रुपये के विज्ञापन दैनिक जागरण हल्द्वानी को निर्गत किए। इसके अलावा कुमाऊं मंडल के छह जिलों के विभिन्न सरकारी विभागों के लाखों रुपये के विज्ञापन इस संस्करण में छापे गये। हल्द्वानी संस्करण की वर्षगांठ पर भी हर साल विभिन्न सरकारी विभागों से लाखों रुपये के विज्ञापन दैनिक जागरण हल्द्वानी संस्करण प्रबंधन लेता है। इस संबंध में जब सूचना एवं लोक संपर्क विभाग से सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत यह जानकारी देते हुए कि दैनिक जागरण हल्द्वानी संस्करण पंजीकृत नहीं है, पूछा गया कि ऐसे में उसके खिलाफ क्या कार्यवाही की जाएगी, तो दिनांक 03 सितंबर 2012 को विभाग के लोक सूचना अधिकारी/संयुक्त निदेशक श्री राजेश कुमार ने आवेदक को बताया कि उक्त संस्करण पंजीकृत है, और पंजीयन संख्या 08916 है। यह झूठी सूचना इसलिए है क्योंकि यह पंजीयन संख्या हल्द्वानी की नहीं बल्कि देहरादून संस्करण की है। स्वयं अखबार अपने आपको 27 जुलाई 2012 से वर्ष 1 अंक के साथ अपंजीकृत प्रदर्शित कर रहा है और भारत के समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय, नई दिल्ली के लोक सूचना अधिकारी/सहायक प्रेस पंजीयक श्री शिवदास सरकार ने मिसिल संख्या 612/412/2012-13/आर.एन.आई/एन.पी.सी.एस. दिनांक 04.09.2012 के द्वारा दैनिक जागरण के हल्द्वानी संस्करण को अपंजीकृत बताया गया है।

यह मामला आंख मूंदकर दैनिक जागरण हल्द्वानी को आर्थिक मदद करने का है। इसमें नियमों की अनदेखी कर सरकारी खजाने को लाखों रुपये का चूना लगाया गया है। यह उत्तराखण्ड सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के अफसरों की अंधेरगर्दी और दैनिक जागरण के फ्राड का एक नमूना है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि क्या इस बड़े आर्थिक अपराध, धोखाधड़ी, चार सौ बीसी और गलत जानकारी देने के लिए दैनिक जागरण के मालिकों और सरकारी विभाग के अफसरों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी? क्या इन्हें जेल भेजा जाएगा? शायद इनके खिलाफ कुछ नहीं होगा क्योंकि ये आर्थिक रूप से बड़े और सत्ता से जुड़ने के कारण प्रभावशाली लोग हैं। नियम-कानून तो सिर्फ आम आदमी और आम पत्रकारों के लिए होते हैं जिन्हें सच्ची बात कहने के कारण फर्जी मामलों में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है। पर जो लोग वाकई फ्राड, धोखाधड़ी और चार सौ बीसी करते हैं, उनका कुछ नहीं बिगड़ता, शासन प्रशासन उनके कदमों में झुका रहता है।

-प्रेषक-

अयोध्या प्रसाद ‘भारती’

((रुद्रपुर जनपद ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड, मो.- 09897791822))


खबर से संबंधित दस्तावेज नीचे दिए जा रहे हैं…

यूपी में फिर जेल भेजा गया एक पत्रकार, दूसरे की तलाश

: अबकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप : यूपी के भदोही जिले से खबर है कि यहां एक पत्रकार को जेल भेज दिया गया है. एक स्थानीय पत्रिका में विवादित लेख छापने और लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला कोतवाली पुलिस ने अपराध संख्या २२८/१२ धारा 153 व 295 के तहत दर्ज किया है.

पत्रिका के प्रभारी संपादक डॉ. शैलेश पाठक को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. मुख्य आरोपी और पत्रिका के प्रकाशक / संपादक सुनील कुमार उर्फ़ गंगाधर को पुलिस जेल भेजने के लिए तलाश रही है. बताया जाता है कि पुलिस ने मैग्जीन की 130 से ज्यादा प्रतियां स्टेशन रोड स्थित एक कार्यालय से जब्त कर लिया.

नौसिखिये पत्रकारजी भी पेशेवर होंगे

जनसंवाद माध्यम के विविध पक्षों पर पर तो खूब चर्चा होती है, लेकिन इन चर्चाओं में ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े लोग व उनकी कार्यशैली पर चर्चा कम होती है। तकनीक के ढेरों साधन की सुविधा पा चुके जनसंवाद माध्यमों ने जहां महानगरीय क्षेत्रों में पत्रकारों की गतिशिलता बढ़ा दी है, वहीं ग्रामीण क्षेत्र में इसकी पहुंच होते हुए अभी कृष्णपक्षीय स्थिति है।

तकनीक के आने से पहले से ही ग्रामीण पत्रकार उपेक्षित थे। शोषित थे। बड़े शहरों में तो समय के साथ पत्रकारों की स्थिति में कुछ बदलाव हुआ है, लेकिन गंवई पत्रकार अभी भी शहर में स्थित मीडिया संस्थानों से एक मामूली राशि का मानदेय पाने के लिए महीनों उम्मीद के साथ पसीना बहाते है। जो चतुर थे, उन्होंने समय पर मीडिया मालिक के शोषण के नजरिये को ताड़ लिया। लिहाजा, मेहनत वाली खबरों पर पसीना बहाना छोड़ दो-चार सौ रुपये की जुगाड़ वाली खबरों पर मेहनत करना शुरू कर दिया। पत्रकारिता छोड़ प्रभावशाली लोगों के पिछलग्गू बन गए। लिहाजा, अब ग्रामीण पत्रकारिता के नाम पर ही कुछ खास लोगों व संस्थानों के गतिविधियों की खबरे आती है।

कहने वाले कहते हैं कि जिला संवाददाता पूरी तरह दलाल होते हैं। वे बिना लेन-देन के अनेक खबरों को मुख्य मीडिया हाऊस तक जाने ही नहीं देते हैं। पर जिला संवाददाता और ग्रामीण संवाददाता को दलाल की संज्ञा देने वाले कभी इस बात की जिरह नहीं करते कि उनके मानदेय से ज्यादा कुछ मिलना चाहिए। मानदेय से ज्यादा की बात छोड़िये जो फैक्स, ई-मेल अथवा पेट्रोल आदि का खर्च है, वही मानदेय के रूप में तय समय में मिल जाए। विज्ञापन में आगे पंगु पत्रकारिता के हित की बात करने वाले को भी भारतीय गांवों की पत्रकारों में पिछड़ा माने जाने लगा है। विशेष आयोजन पर दिग्गज पत्रकार भले ही गाल बजा लें, लेकिन कभी मौका रहते उन्होंने भी इस हालात को बदलने की कोई कोशिश नहीं की।

संस्थानों में उपेक्षित ग्रामीण डेस्क पत्रकारिता के पेशे में अधिक्तर पत्रकार एक दूसरे को मूर्ख और खुद को तीसमारखां समझते हैं। लेकिन कभी भी अपनी तीसमारखाईं दिखाने के लिए स्वयं पहल करके ग्रामीण डेस्क की जिम्मेदारी उठाने की नहीं सोचते। जब कभी संस्थान के वरिष्ठकर्मी अपने किसी सहयोगी से दु:खी होते हैं तो उसे ग्रामीण डेस्क पर भेजने का दंड देते हैं। जो लोग प्रिंट की पत्रकारिता में डेस्क पर कार्य कर चुके हैं, वे यदि संवेदनशील हो तो इस बात को समझ सकते हैं कि यह डेस्क कितना उपेक्षित रहता है। उसे कितनी हेय दृष्टि से देखा जाता है। हालांकि कार्य-कौशल दिखाने की असली गुंजाईश ग्रामीण डेस्क पर ही होती है।

ऐसा कई बार होता है, जब गांव का पत्रकार एक बेहतरीन खबर को बेतरतीब शैली में महज सूचना के रूप में लिख कर भेजता है। उसे नये सिरे से शब्दों में संजों कर बेहतरीन खबर बनाई जा सकती है। ऐसा कई बार हुआ है, जब ऐसी बेतरतीब लिखी खबर को अच्छे से लिखी गई और वह पहले पेज की खबर बनी। उस खबर से प्रशासन जगा और संबंधित गड़बड़झाले का संज्ञान लेते हुए प्रशासन ने कारर्वाई भी की। ऐसे खबरों के लिए ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन रोजमर्रा की दिनचर्या में फिर से ग्रामीण पत्रकारों के महत्व और ग्रामीण डेस्क को उपेक्षित कर दिया जाता है। काम का अंतर ग्रामीण डेस्क पर कम समय में ज्यादा काम होता है। अमूमन ग्रामीण पेज समाचारपत्रों के डाक संसस्करणों में होते हैं।

दूर-दराज के डाक संस्करण रात 10.30 से 11.30 तक छूट जाते हैं। शहर संस्करण के लिए रात एक बजे तक का भी समय चल जाता है। यदि अखबार का प्रसार कम हो तो कई बार दो बजे तक भी खबरों में बदलाव हो जाते हैं। लेकिन डाक संस्करणों में ऐसा नहीं होता। ग्रामीण पेज जब पहले बनते हैं तो जाहिर सी बात है खबर भी पहले चाहिए। लेकिन महानगरीय पत्रकारों की कार्यशैली से उलट ग्रामीण पत्रकारों की कार्य दिनचर्या होती है। वे पूरी तरह से पत्रकार नहीं होते हैं। जब मीडिया संस्थानों की ओर से उन्हें समय पर मानदेय नहीं मिलता है तो वे जीविका के लिए निर्भर दूसरे व्यावसायों से जुड़े रहते हैं। लिहाजा, उनकी प्राथमिकता में खबरों के लिए भागना नहीं होता है। पहले वे उनक कार्य को देखते हैं, जिससे उनकी रोजी सुनिश्चित होती है। उसी के साथ-थोड़ी बहुत दैनिक खबरों की सूचनाएं जुटाते हैं।

अधिकतर अखबारों में अमूमन शाम पांच से आठ बजे तक ग्रामीण खबरों की बाढ़ होती है। सैकड़ों खबरों के संपादन के लिए ग्रामीण डेस्क पर पर्याप्त सहयोगी नहीं होते हैं। लिहाजा, अक्सर वे जल्दी और सरसरी तौर पर खबरों को देख कर पेज के लिए जारी कर देते हैं। ढ़ेरों खबरों के दबाव के कारण कई बार उन्हें न चाहते हुए कि प्रूफ की छोटी मोटी गलतियों की अनदेखी करनी पड़ती है। क्योंकि डाक संस्करण को समय पर छोड़ने का बड़ा दबाव होता है, यदि वह समय पर अखबार का बंडल संबंधित स्थान तक जाने वाले वाहन में नहीं लदा तो वह बंडल वहीं पड़ा रह जाएगा।

सामान्य कई बार छोटी-बड़ी खबरों के लिए ग्रामीण संवाददाता सौदेबाजी कर लेते हैं। ऐसा कार्य उनका है, जो पेशेवर पत्रकार नहीं है। ऐसे लोगों के कारण ही कुछ काम करने वाले ग्रामीण पत्रकार बदनाम हैं। ऐसे पत्रकारों के हालात में सुधार तो नहीं हुआ, लेकिन सौदेबाजी करके अवसरवादी पत्रकारों ने बिना किसी मानदेय के संपन्न हो गए। ऐसे कई पत्रकार मतलब की खबरों से स्थानीय प्रशासन में पैठ जमा चुके हैं और ग्रामीणों के छोटे-मोटे काम थोड़े-बहुत पैसे के दम पर करवाते हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसे पत्रकार प्रभावशाली हो गए हैं। लेनदेन के मामले को संभल कर निपटाते हैं। स्थितियों के अनुसार बिना लेनदेन की खबर भी देते हैं। ऐसे ग्रामीण पत्रकार ज्यादा सफल हैं। उसे स्थानीय स्तर पर थोड़ा बहुत सम्मान भी है। वहीं कई बार कम अनुभव वाला हर स्थिति में लेनदेन की प्रवृत्ति वाला पत्रकार ऐसी स्थितियों में कई बार गच्छा खा जाते हैं। कभी जनता से मार पड़ती है तो कभी प्रशासन उन पर दमन का डंडा चलाता है। ऐसे प्रशासनिक दमन से पीड़ितों में ज्यादातर छोटे बैनर से जुड़े पत्रकार होते हैं।

आरटीआई से मजबूती भी आई
पत्रकारिता सूचनाओं का संचार है। सूचना के अधिकार कानून लागू होने के बाद ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति में थोड़ी-बहुत करवट ली है। हालांकि इसे अभी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन जिला संवाददाताओं के माध्यम से गांवों की अनेक खबरें राज्य स्तर तक सुखिर्यों में आने लगी है। ऐसे खबरों में विशेषकर मनरेगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन, बिजली आदि केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं में अनियमितता एवं घपलेबाजी का उजागर है। हालांकि आरटीआई से सूचना लेकर भी कई बार पत्रकार मामले को सौदेबाजी से निपटाये हैं। लेकिन हर मामले में सौदेबाजी नहीं चल पाती है। जब आरटीआई या कोई अन्य एक ही खबर कइ पत्रकारों के हाथ में लग जाती है तब मामले को दबाना मुश्किल हो जाता है। उसे प्रकाशित या प्रसारित नहीं होने पर संबंधित मीडिया संस्थान उस क्षेत्र के संवाददाता से जवाब-तलब करेगा।

जमाना हाईटेक हो गया। मीडिया भी अनेक तकनीक से लैस हो चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तेज रफ्तार से राष्ट्रीय स्तर की खबरों तो दिनभर सुखिर्यों में प्रसरित होती रहती है। इसके साथ ही समाचार पोटर्लों पर भी सबसे पहले और बेहतरीन खबरों को प्रसारित करने की होड़ चल पड़ी है। लिहाजा, दिन पर में अमूमन तीन चार खबरे समाचार चैनलों व ऑनलाइन मीडिया में इतनी प्रसारित हो जाती है कि पाठकों के एक बड़े वर्ग के लिए दूसरे दिन यह खबर पूरानी जैसी है। लिहाजा, अनेक समाचारपत्रों ने इस स्थिति को देखते हुए राज्यस्तरीय और स्थानीय खबरों को प्रमुखता देना शुरू कर दिया है। इस दृष्टि से यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि आने वाले दिनों में ग्रामीण पत्रकारिता के हालात सुधरने की उम्मीद है। गांवों के नौसिखीये पत्रकारजी भी पेशेवर होंगे।

पत्रकार संजय स्वदेश का विश्लेषण

प्रसिद्ध समाजवादी गांधीवादी नेता बनवारी लाल शर्मा का निधन

प्रसिद्ध समाजवादी गांधीवादी नेता बनवारी लाल शर्मा जी का चंडीगढ़ में देहान्त हो गया। वे इस परंपरा के उन आखिरी स्तम्भों में थे, जिन्होंने देश को साम्राज्यवाद और भूमंडलीकरण के चंगुल से बचाने में अपनी पूरी जिन्दगी लगा दी। इलाहाबाद में तो वे एक व्यक्ति से ज्यादा संस्थान के रूप में उपस्थित थे, जिनके होने का मतलब भूमण्डलीकरण विरोधी गोष्ठियों, शिविरों, फिल्म समारोहों और मीडिया वर्कशाप का लगातार होते रहना तो था ही, उनके होने का पर्याय यह भी था कि आप बिना रासायनिक खादों से उपजे अनाज और तेल भी उनके आजादी बचाओ आंदोलन के कार्यालय से प्राप्त कर सकते थे।

आज़ादी बचाओ आंदोलन के प्रणेता डॉ बनवारी लाल शर्मा जी का ह्रदय गति रुकने से चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में निधन हुआ। चंडीगढ़ में एक सभा को संबोधित करते हुए कल उन्हें कुछ तकलीफ के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले कुछ महीनों से उनके स्वास्थ्य को लेकर परेशानी बढ़ गयी थी फिर भी वे निरंतर जन आंदोलनों की मदद और साम्राज्यवादी ताकतों से लड़ने की रणनीति पूरे देश भर घूमकर बनाते रहे। इंदौर में आगामी नवंबर महीने में आज़ादी बचाओ आन्दोलन के वार्षिक अधिवेशन की तैयारी को लेकर वे इन दिनों काफी व्यस्त चल रहे थे।

अपना पूरा जीवन उन्होंने विदेशी कंपनियों के विरोध में और स्वदेशी विचार के प्रचार में लगाया। ५ जून १९८९ को प्रो. रघुनाथ जी, राम धीरज और अन्य साथियों के साथ मिलकर आज़ादी बचाओ आन्दोलन की स्थापना इलाहाबाद में की जिसको एक विधिवत ढांचा सेवाग्राम के अधिवेशन में दिया गया। बनवारी लाल जी ७० के दशक में जे पी आन्दोलन में बहुत ही करीब से जुड़े रहे और लाखों लोगों के साथ जेल भी गए। गांधीवादी विचारों के साधक – असहयोग और सीधी कार्यवाई में विश्वास रखने वाले बनवारीलाल जी ने स्वार्थ रहित और सादगी भरा जीवन व्यतीत किया। अपनी धुन के पक्के नब्बे के शुरूआती दशक में जब आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हो रहा था तब अन्य जन आंदोलनों – सर्व सेवा संघ, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (NAPM), छोटे उद्योगों के संगठन आदि के साथ मिलकर GATT, WTO, विश्व बैंक आदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों और प्रक्रियाओं का पुरजोर विरोध किया। कोका कोला, मोंसंतो, कारगिल और अन्य विदेशी कंपनियों के सामने उन्होंने जबरदस्त मोर्चा पूरे देश में खोला।

इसी सिलसिले में एक फरवरी २००१ को ३०० किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला इलाहाबाद से वाराणसी, वाराणसी से जौनपुर और जौनपुर से इलाहाबाद का आयोजन किया, जिसमे स्कूल के बच्चों, शिक्षकों के अलावा अन्य कार्यकर्ता और आम जन शामिल हुए। मानव श्रृंखला ने सथारिया के पेप्सी प्लांट और रजातालाब में कोका कोला के प्लांट को घेरा जो कि बढ़ते वैश्वीकरण और उपभोक्तावाद के प्रतीक थे।

भारत के परमाणु हथयार के कार्यक्रम और परमाणु उर्जा के संयत्र का उन्होंने हमेशा विरोध किया और परस्पर लोगों को लामबंद करने और साथ लाने की कोशिश की। पिछले कुछ सालों में उन्होंने विभिन्न यात्राओं के द्वारा जैतापुर, कूदंकुलम, फतेहाबाद, चुट्खा परमाणु परियोजनों के खिलाफ वहाँ चल रहे संघर्षों को समर्थन ही नहीं दिया बल्कि सरकार के ऊपर एक दवाब भी बनाया। अन्याय के प्रति लड़ने को हमेश तत्पर बनवारी लाल जी ने शांति और न्याय यात्रा के जरिये छत्तीसगढ़ में हो रही हिंसा के विरोध में भी आवाज़ उठाई और शांति की पहल की।

NAPM के साथ बनवारी लाल जी का शुरूआती दौर से ही साथ रहा। शुरुआत के दिनों में वे राष्ट्रीय समनव्यक भी रहे और एनरोन विरुद्ध संघर्ष, पलाचिमादा कोका कोला संघर्ष, नर्मदा बचाओ आंदोलन आदि कई संघर्षों में साथ रहे और हाल में जन संसद की प्रक्रिया में साथ साथ रहे।

बनवारी लाल जी एक समाजसेवी के साथ साथ गणित के माने हुए विद्वान भी थे। यही कारण भी है कि अपने पीछे वे एक तैयार की हुई कार्यकर्ताओं की पूरी टोली छोड़े जा रहे हैं। बलाश नाम से वे 'नई आज़ादी' मुखपत्र में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में लिखते और जन संसाधनों के सुरक्षा और समुदायों के हक़ के लिए लड़ते। साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन में बढ़ चढ़ कर उन्होंने अपनी भूमिका निभाई।

 

सेबी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा- सहारा समूह नहीं मान रहा कोर्ट का आदेश

नई दिल्ली : बाजार नियामक सेबी ने सहारा समूह पर न्यायालय के आदेश का पालन नहीं करने का आरोप लगाते हुए बुधवार को उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) का दरवाजा खटखटाया। सेबी ने न्यायालय में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि सहारा समूह की जिन दोनों कंपनियों को निवेशकों को 24 हजार करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया गया था वह मांगे गए सारे दस्तावेज उसे (सेबी को) उपलब्ध नहीं करा रही है। याचिका में सेबी ने कहा है कि 10 सितंबर तक नियामक को दस्तावेज नहीं मिले।

न्यायालय ने 31 अगस्त को कहा था कि अगर सहारा समूह की कंपनियां ‘सहारा इंडिया रीयल इस्टेट कारपोरेशन (एसआईआरईसी) तथा सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन (एसएचआईसी) रिफंड करने में विफल रहती हैं तो सेबी इन कंपनियों की संपत्ति जब्त कर सकता है तथा बैंक खातों पर रोक लगा सकता है।

न्यायालय ने सहारा समूह से कहा था कि वह अपने पास सारे दस्तावेज नियामक को उपलब्ध कराए। न्यायालय ने कंपनियों से यह भी कहा था कि वह निवेशकों को तीन महीने के भीतर उनके पूरे पैसे सालाना 15 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाये। न्यायालय ने सहारा समूह को यह भी आदेश दिया था कि वह अपने पास उपलब्ध सभी दस्तावेज नियामक को उपलब्ध कराए।

न्यायालय ने इस मामले में अपने एक सेवानिवृत न्यायधीश न्यायमूति बीएन अग्रवाल को सेबी द्वारा सहारा समूह की दोनों कंपनियों के खिलाफ की जाने वाले कारवाई पर निगरानी रखने के लिये नियुक्त भी किया। पीठ ने कहा कि कंपनी पर इस तरह के आर्थिक अपराधों में संलिप्त होने पर फौजदारी और आपराधिक मामला होना चाहिए।

sebi sahara

 

हिना के इश्क की ख़बर छपी तो पति हुए चौकन्ने, मंगवाई कॉल डिटेल

 

पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और पाकिस्तान पीपुल्‍स पार्टी (पीपीपी) के अध्‍यक्ष बिलावल भुट्टो के 'रोमांस' के मामले में नया मोड़ आ गया है। पाकिस्‍तान में जहां इस 'अफवाह' पर चटखारे लिए जा रहे हैं, वहीं खबर आ रही है कि हिना के पति ने मामले को गंभीरता से लिया है। 

 
हिना के अरबपति शौहर फिरोज गुलजार ने मंगलवार को फेडरल इनवेस्टीगेटन एजेंसी में दो 'संदिग्ध' नंबरों की कॉल डिटेल निकालने के लिए आवेदन किया। गौरतलब है कि बांग्लादेशी सप्ताहिक टैबलॉयड ब्लिट्ज ने हिना और बिलावल के रोमांस और शादी करने की कथित योजना के बारे में बताया था।
 
इसके बाद से इस रोमांस को लेकर चर्चाओं का बाजार गरम है। सोशल मीडिया में भी इस पर चर्चा जोरों पर है। सूत्र बताते हैं कि हिना के पति इस बात की पुष्टि करना चाहते हैं कि हिना-बिलावल रोमांस की मीडिया में चल रही खबरें सही है या गलत। 
 
इस बीच खबर यह भी है कि बिलावल भुट्टो ने अपने पिता यानी पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी को दो-टूक कह दिया है कि अगर उनकी शादी हिना रब्बानी से नहीं होती है तो वह पार्टी छोड़ देंगे। सूत्रों के मुताबिक यह दावा किया जा रहा है कि जरदारी अपने बेटे के इस रोमांस और उनकी मांग से बेहद खफा है और उन दोनों में मनमुटाव चल रहा है।
 
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो के रोमांस की खबरों पर इंटरनेट पर खूब चुटकियां ली जा रही हैं। सोशल मीडिया और कुछ समाचार वेबसाइटों के मुताबिक बिलावल और हिना रब्बानी का इश्क परवान चढ़ रहा है। बांग्लादेशी टैबलाएड 'ब्लिट्ज' ने इस खबर का खुलासा किया।  
 
'वीकली ब्लिट्ज डॉट नेट' वेबसाइट ने रविवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया था कि बिलावल हिना रब्बानी से शादी करने की जिद पर अड़े हैं और यही जिद उनके और पिता जरदारी के बीच तनाव भी पैदा कर रही है।
 
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो के रोमांस की खबरों पर इंटरनेट पर खूब चुटकियां ली जा रही हैं। सोशल मीडिया और कुछ समाचार वेबसाइटों के मुताबिक बिलावल और हिना रब्बानी का इश्क परवान चढ़ रहा है। बांग्लादेशी टैबलाएड 'ब्लिट्ज' ने इस खबर का खुलासा किया।
 
'वीकली ब्लिट्ज डॉट नेट' वेबसाइट ने रविवार को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया था कि बिलावल हिना रब्बानी से शादी करने की जिद पर अड़े हैं और यही जिद उनके और पिता जरदारी के बीच तनाव भी पैदा कर रही है।
ब्लिट्ज ने पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के हवाले से कहा है कि बिलावल और हिना रब्बानी के बीच चल रहे रोमांस ने जरदारी और बिलावल के बीच तनाव पैदा कर दिया है। 
 
ब्लिट्ज ने खबर में तो यहां यहां तक दावा किया है कि हिना से शादी करने की अपनी बेटे की जिद से परेशान होकर जरदारी ने पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी की मदद से यह खबर फैलाई कि गैलेक्सी टेक्सटाइल मिल्स ने 7 करोड़ पाकिस्तानी रुपये के बिल में फर्जीवाड़ा किया है। यह कंपनी खार के पति फिरोज गुलजार चलाते हैं। मीडिया में भी खबरें आती रही हैं कि खार और उनके पति ने विवादास्पद एनआरओ कानून की मदद लेकर भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को बचाया है।
 
टैबलायड ने यह दावा भी किया है कि अपने पिता के कड़े प्रतिरोध के चलते बिलावल ने पीपीपी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने तक की बात कह डाली है। 
 
बिलावल के हिना से शादी करने के फैसले से जरदारी नाराज बताए जा रहे हैं। हिना भी फिरोज गुलजार से अपनी शादी खत्म करना चाहती हैं। टैबलायड का दावा है कि जरदारी नहीं चाहते कि बिलावल दो बच्चों की मां हिना से शादी करें। खबर के मुताबिक जरदारी को डर है कि बिलावल का यह फैसला न न केवल बिलावल के राजनीतिक कॅरियर के लिए घातक साबित होगा, बल्कि उनकी पार्टी पीपीपी के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। 
 
खबरों के मुताबिक बिलावल ने जरदारी से कह दिया है कि वे हिना और उनकी बेटियों के साथ स्विट्जरलैंड में सेटल हो जाएंगे। बाद में यह भी कहा गया कि बिलावल ने जरदारी को जानकारी दी कि हिना तलाक के बाद अपनी बेटियों को भी छोड़ने के लिए तैयार हैं। टैबलायड ने दावा किया है कि जरदारी को बिलावल और हिना के रोमांस के बारे में तब पता चला जब राष्ट्रपति के आधिकारिक आवास में बिलावल और हिना को आपत्तिजनक हालत में रंगे हाथ पकड़ लिया गया था। बाद में जरदारी ने दोनों के फोन कॉल का ब्योरा मंगवाकर चेक किया और पाया कि दोनों के बीच रिश्ता है। 
 
बिलावल 24 साल के हैं और हिना 35 की। इसी 21 सितंबर को बिलावल ने अपना 24वां जन्मदिन मनाया है। ब्लिट्ज ने दावा किया है कि हिना ने बिलावल के जन्मदिन पर 21 सितंबर को उन्हें एक ग्रीटिंग कार्ड भी भेजा था।
 
बिलावल की मां बेनजीर जब पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी थी तब वो तीन महीने के थे। अप्रैल 1999 में वो अपनी मां के साथ पाकिस्तान छोड़कर चले गए थे। उनके पिता आसिफ अली जरदारी भ्रष्टाचार के आरोपों में 1996 से 2004 तक पाकिस्तान की जेल में थे। बिलावल ने अपना बचपना दुबई और लंदन में बिताया है। बिलावल ताईक्वांडो में तो ब्लैक बेल्ट हैं लेकिन वो क्रिकेट खेलना चाहते थे जो वो नहीं खेल पाए। बिलावल ने साल 2007 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के क्राइस्ट चर्च कॉलेज से मेट्रिक की पढ़ाई पूरी की लेकिन साल 2007 में ही अपनी मां के कत्ल के बाद वो वापस पाकिस्तान लौट आए। बिलावल इस समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के चैयरमैन है।
 
पाकिस्तान की 26वीं और पहली महिला विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का जन्म 19 नवंबर 1977 को पाकिस्तान के एक ताकतवर राजनीतिक परिवार में हुआ था। हिना रब्बानी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत साल 2002 में की थी। वो प्रधानमंत्री शौकत अजीज की सरकार में विदेश राज्य मंत्री और वित्त राज्य मंत्री रहीं। 2008 में हिना फिर से चुनाव जीती और साल 2010 में कुछ दिनों के लिए वित्त मंत्री भी रही। हिन्ना रब्बानी खार जुलाई 2011 में पाकिस्तान की विदेश मंत्री बनी।
 
पंजाब प्रांत के मुल्तान में जन्मी हिना रब्बानी खार ने शुरुआती शिक्षा स्थानीय स्कूल से ही हासिल की। फिर उन्‍होंने लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट साइंस से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गईं।
 
उनके पिता नूर रब्बानी खार पंजाब प्रांत के बड़े जमींदार और राजनेता हैं। उनके मामा गुलाम मुस्तफा खान पंजाब के गवर्नर रह चुके हैं। उनके परिवार के पास पंजाब में काफी जायदाद है। हिना रब्बानी खार की शादी व्यवसायी फिरोज गुलजार से हुई है और उनकी दो बेटियां हैं। (भास्कर) 

नोएडा में होमगार्ड ने और औरैया में नेता ने पत्रकारों को पीटा,

नोएडा से सूचना है कि एक होमगार्ड ने एक पत्रकार को पीट दिया. भंगेल में रहने वाले अरविंद ठाकरे मेरठ के एक अखबार में पत्रकार हैं. रविवार तड़के अरविंद मेरठ से घर लौट रहे थे. यहां अरविंद बस से भंगेल के पास उतरे और पैदल घर जाने लगे. इस बीच 2 होमगार्डों ने अरविंद को भंगेल चौकी के पास रोक लिया और पूछताछ करने लगे.

आरोप है कि चेकिंग के दौरान होमगार्ड राजेश गुप्ता अरविंद से बदतमीजी करने लगा. अरविंद ने इसका विरोध किया तो होमगार्ड राजेश गुप्ता ने उन्हें पीट दिया. पीडि़त ने तुरंत इसकी शिकायत फेज टू थाना इंचार्ज को दी. इसके बाद मौके पर पहुंचे दारोगा ने होमगार्ड के खिलाफ शिकायत लेकर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है.

उधर, औरैया से सूचना मिली है कि अजीतमल में मंगलवार को एक नेता ने एक अखबार के पत्रकार को जमकर पीटा.  आरोप है कि पत्रकार नशे में धुत होकर नेता के साथ गाली गलौज कर रहा था. इसी दौरान वहां पहले से बैठै नेता के साथियों ने मारपीट कर दी.

शंभू दयाल वाजपेयी, आशीष, अंकित, अविनाश, कपिल का इस्तीफा

आज समाज, अंबाला से सीनियर सब एडिटर आशीष दीक्षित ने इस्तीफा देकर लोकमत ज्वाइन कर लिया है. अंकित शर्मा भी आज समाज से चले गए हैं और दैनिक भास्कर, लुधियाना के साथ नई पारी शुरू की है. वे सब एडिटर के रूप में कार्यरत थे. आज समाज, अंबाला से ही अविनाश झा ने इस्तीफा देकर पत्रिका, बिलासपुर ज्वाइन किया है. शिवानी और तरुण ने भी यहां से इस्तीफा दिया है. कई अन्य लोग इस्तीफा देने वाले हैं और ''पंजाब की शक्ति'' के संपर्क में हैं.

बरेली से सूचना है कि दैनिक जागरण से लंबे समय से जुड़े रहे चन्द्र कांत त्रिपाठी (सीकेटी) के ''नमस्कार बरेली'' के संपादक शंभू दयाल वाजपेयी के बारे में चर्चा है कि इन्होंने लांचिंग के अगले दिन ही इस अखबार से नमस्ते कर लिया.

आगरा से खबर है कि डिगी महाराजा न्यूज के एक और रिपोर्टर कपिल अग्रवाल ने चैनल से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने यह कदम अपने चैनल के अन्य साथियों की चैनल में वापसी न होने के विरोध में उठाया है.

लोकलइंदौर डाट काम का उदघाटन आडवाणी ने किया

इंदौर : इंदौर के एक युवा विकास यादव ने फेसबुक पर इंदौर के समाचार देने का काम शुरू किया था. इसकी सफलता को देखते हुए उसने अब ''लोकल इंदौर'' नामक एक न्यूज साइट का निर्माण किया है. localindore.com का शुभारम्भ देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया.

इस अवसर पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान, उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय, स्वास्थ्य मंत्री अजय विश्नोई, सांसद सुमित्रा महाजन के अतिरिक्त इंदौर प्रेसक्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल, उपाध्यक्ष नवनीत शुक्ला सहित अन्य गणमान्य नागरिक उपस्थित थे. श्री आडवाणी और मुख्यमंत्री श्री चौहान ने वेबसाइट संचालक विकास यादव को शुभकामनाएं दीं. लोकल इंदौर डाट काम से जुड़ी किसी अन्य जानकारी के लिए localindore@gmail.com या फिर 08989600286 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

टीवी के समाचारों और इन चैनलों का सम्पादक कौन है, यह हम नहीं जानते : ओम थानवी

: जरूरी चीजों का चुनाव टीआरपी से नहीं किया जा सकता : दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला : दिल्ली : मीडिया पर अब पूंजी का दबदबा साफ़ दिखाई दे रहा है. जब मीडिया व्यापार की वस्तु होगा तो वहां भाषा पर व्यापार का असर कैसे रोका जा सकता है. सुपरिचित लेखक और जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी ने हिन्दू कालेज में आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि हमें यह ध्यान देना होगा कि जूते के कारोबार और अखबार में फर्क है क्योंकि सिर्फ सूचना देना ही मीडिया का काम नहीं बल्कि पाठकों की समझ बढ़ाना भी मीडिया की जिम्मेदारी है.

हिन्दी साहित्य सभा द्वारा वार्षिक दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला श्रृंखला में 'मीडिया : साहित्य और संस्कृति ' विषय पर थानवी ने कहा कि अपराध की जानकारी से ज्यादा प्रस्तुतीकरण पर जोर ही मीडिया के उद्देश्य को स्पष्ट कर देता है.

उन्होंने सम्पादक संस्था के ह्रास पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि टीवी के समाचारों और इन चैनलों का सम्पादक कौन है, यह हम नहीं जानते. मीडिया और भाषा के संबध पर विस्तार से चर्चा करते हुए थानवी का कहना था कि अच्छी भाषा के बाद ही संस्कृति-कला और साहित्य की बात आती है.  साथ ही उन्होंने साहित्य और अखबार की भाषा का भेद बताते हुए कहा कि साहित्य का गृहीता अलग है और अखबार का अलग, अत: भाषा यहाँ हमेशा जिम्मेदारी का बर्ताव मांगती है.

उन्होंने बोलचाल की भाषा का मीडिया लेखन में जोरदार पक्ष लेते हुए कहा कि हिन्दी भाषा की जगह अंग्रेजी का बढ़ता प्रयोग गलत है. उन्होंने कहा कि जिस देश में केवल एक प्रतिशत लोग अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हों वहां यह भ्रम है कि अंग्रेजी भारत की संपर्क भाषा है. व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों के सवालों के उत्तर देते हुए थानवी ने टी आर पी को भी भ्रामक एवं रूचि को विकृत करने वाला बताया. उन्होंने कहा कि 'शोले' के मुकाबले 'पाथेर पांचाली' दर्शक कम हो सकते हैं लेकिन जरूरी चीजों का चुनाव टी आर पी से नहीं किया जा सकता.

इससे पहले साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ. पल्लव ने सभा के छात्र पदाधिकारियों एवं वार्षिक गतिविधियों का परिचय दिया. सभा के अध्यक्ष एम ए के छात्र भीमसेन ,शैलेश शुक्ल और असीम अग्रवाल ने दीप प्रज्ज्वलन कर आयोजन का शुभारम्भ किया. ओम थानवी का परिचय छात्रा चंचल गौर ने दिया. विभाग की प्रभारी डॉ. रचना सिंह ने दीपक सिन्हा के व्यक्तित्त्व को रेखांकित किया. संयोजन श्वेतांशु शेखर और प्रियव्रत मिश्रा ने किया.  अंत में सभा के महासचिव शैलेश शुक्ल ने आभार ज्ञापित किया. आयोजन में बड़ी संख्या में युवा विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित थे.

हिन्दू कालेज के हिन्दी साहित्य सभा के मीडिया प्रभारी नितिन मिश्रा द्वारा जारी प्रेस रिलीज.

साधना ग्रुप में कई बदलाव- राकेश शर्मा, नवीन कुमार, राकेश शुक्ला और ब्रृज मोहन को बड़ी जिम्मेदारी

साधना ग्रुप के चेयरमैन दिनेश गुप्ता की तरफ से जारी एक इंटरनल मेल में कई बदलावों की जानकारी दी गई है. इस मेल में कहा गया है कि साधना न्यूज टीवी नेटवर्क के एडिटर एनके सिंह को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, इसलिए साधना ग्रुप के लोग रुटीन के कामकाज के लिए अपने अपने चैनल हेड को रिपोर्ट करें, मेल में नए लोगों और उनकी नई जिम्मेदारी को डिफाइन किया गया है. राकेश शर्मा, नवीन कुमार, राकेश शुक्ला, बृज मोहन, प्रकृति, संजीव झा, दिग्विजय सिंह को क्या जिम्मेदारी मिली है, उसे जानने के लिए साधना के इंटरनेल मेल को पढ़ें जिसकी एक प्रति भड़ास4मीडिया के पास भी है.

Dear All, It gives me an immense pleasure in announcing that Mr. NK Singh, Editor of Sadhna News TV Network has taken a bigger assignment to play his pivotal role. Henceforth, all the staff members of Sadhna News are requested to report to their respective Channel Heads with their daily inputs/reports under CC marked to Mr. Mayank Gupta who has joined us as a Director and in case the matter is of utmost importance then the same has to be brought to the notice of Management. Any issue pertaining to the NOIDA Office will be entertained/redressed by the Director (Admin) only.
You will appreciate the point that the restructuring of the various channels under Sadhna News TV network are taking place in full swing and your active participation, cooperation and support in making our Sadhna News brand successful is highly solicited.

Apart from the above, I, on behalf of entire Prabhatam Group would like to extend my heartiest felicitations for the new look of the channel setup. I would also like to mention that in case any employee having any complaint may feel free to contact me or Mr. Mayank either through our email or phone anytime.

Dinesh Gupta

Chairman

PFA: new structuring

New Structuring and associated responsibilities

Rakesh Sharma (ceo)  – coordination and controlling of overall activity

Naveen Kumar(spl programmes)-  production of all weekly programmes namely crime, one to one, infrastructure , agriculture etc. Auditing of technical part for all channels

Rakesh Shukla(state head BH/JH) – overall responsible for the BH/JH channel and its team

Brij Mohan(state head UP/UK)  – overall responsible for the UP/UK channel and its team

Sanjeev Jha (technical)-  overall coordination of technical dept in Noida and states

Prakriti(hr)- responsible for managing human resource ,day to day  communication of policy related decisions by the management and follow up for all weekly and monthly reports from all concerns

Digvijay Singh(admin Noida)-  administration in Noida and assisting the editorial and marketing team for smooth functioning

जानेमन जेल (तीन) : मैं हूं शहंशाह ए डासना… जिसके छूटने की आस ना….

जेल में एक बंदी मिले. दिल्ली पुलिस में दीवान. शर्मा जी नाम से उनकी पहचान. उनसे कब दोस्ती हो गई, पता ही नहीं चला. हम लोग एक ही बैरक में थे. वे सुबह योगा करने जाते, दोपहर में कंप्यूटर सीखने. पूरी दिनचर्या उनकी दुरुस्त और अनुशासित. खूब सारा सीख लेने की लालसा-तमन्ना से भरे हुए. बैरक के बाहर जब वे टहलते तो हर बार कोई नया शख्स उन्हें प्रणाम करके उनके साथ टहल रहा, बतिया रहा होता. दीवान जी का चेहरा मोहरा आकर्षक और दोस्ती का संदेश देता हुआ. मुझे याद नहीं कैसे हम दोनों का परिचय हुआ लेकिन वे मेरे बारे में मुझसे आमने-सामने परिचय होने के पहले से जान चुके थे.

दरअसल बैरक में अगर कोई ठीकठाक शकल या ठीकठाक क्राइम वाला और अखबार में छप चुपे प्रकरण वाला बंदा आता तो जेल में रह रहे पुराने बंदी उसके बारे में एक दूसरे को इशारों इशारों या कानाफूसी करके जानकारी दे दिया करते. इस तरह सबको बिना कहे पता हो जाता कि फलां आदमी फलां केस में अंदर आया है. दीवान जी से मैंने भी योगा में शामिल होने की इच्छा जताई. उन्होंने मुझे उत्साहित किया और रास्ता बताया. सुबह खुंटी पर पेश हो जाओ और कह दो कि योगा में मेरा नाम लिख दिया जाए. मैंने ऐसा ही किया.

जेल जाने के दसवें दिन मैंने योगा क्लास ज्वाइन करने के लिए खुंटी पर आवेदन दिया. सुबह के वक्त उन बंदियों का नाम लिखा जाता है जो पेश होने को इच्छुक हैं. मैंने भी नाम लिखा दिया था. सभी को समूह में खुंटी पर ले जाया गया. जब हम लोगों की बैरक की बारी आई तो सबको डिप्टी जेलर व जेलर के सामने खाली छोटे पार्क में जोड़े से बिठा दिया गया. फिर एक एक करके उनके सामने पेश किया जाने लगा. बंदी अपनी अपनी दिक्कत परेशानी बताने लगे. ज्यादातर बंदी किसी दूसरे बैरक में बंद अपने परिचित या परिजन से मिला देने की बात कहते.

इन लोगों की इच्छा तत्काल पूरी की जाती और बताए गए बैरक से उनके जानने वाले को वहीं बुलवाकर पांच दस मिनट के लिए मिलवा दिया जाता. इस सिस्टम का इस्तेमाल मैंने भी किया था जब भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह दैनिक जागरण की कृपा से अंदर आ गए. पहले मैं कोशिश करता रहा कि अनिल मेरे ही बैरक में मेरे साथ रहें लेकिन जेल प्रशासन जाने क्यों अड़ा हुआ था कि दोनों को एक साथ नहीं रखना है, सो उन्हें किसी दूसरी बैरक में कर दिया गया. इस कारण उनसे मिलने और उनकी परेशानी-समस्या जानने हेतु एक दिन खुंटी पर पेश होकर अनिल से मिलने का अनुरोध किया था और तब अनिल को वहीं बुलाकर मुझसे मिलवा दिया गया. मैंने मुस्कराते अनिल के कंधे पर हाथ रखकर शाबासी दी- ''चिंता ना करो, तुम्हारा नाम भी भ्रष्ट कारपोरेट मीडिया से लड़ने वाले न्यू मीडिया के स्वतंत्रता सेनानियों की लिस्ट में दर्ज हो चुका है, लोग कई दशक तक पत्रकारिता करते रहते हैं और जेल जाने की नौबत तक नहीं आ पाती, क्योंकि वे ऐसा कुछ लिख पढ़ नहीं पाते, ऐसा कुछ हंगामेदार कर नहीं पाते कि उन्हें भ्रष्ट लोग और भ्रष्ट सिस्टम जेल भेज पाता. हम लोगों ने कम ही समय में ऐसा लिखा पढ़ा और ऐसा तूफान खड़ा किया कि देश के भ्रष्ट मालिकों, हरामी मीडिया कलाकारों, देश के नंबर वन अखबार आदि की फट गई और हम लोगों को उलजुलूल मामलों में फंसाकर उसे जेल भिजवाना पड़ा. और, महान लोगों पर आरोप हमेशा घटिया ही लगाए जाते हैं, जूलियन असांजे को देख लो. अमेरिका उसे परेशान करने के लिए किस किस तरह के मामले उस पर जड़ मढ़ रहा है. इसलिए हे सच्चे मन-मस्तिष्क वाले नौजवान, इस चरम उपलब्धि का आनंद लो और इसके लिए मेरी बधाई स्वीकारो. अब आप इस चरम सफलता पर पहुंचने के बाद दिल्ली से चैन से विदा ले सकेंगे.''

दरअसल अनिल व मेरे बीच दो महीने पहले यह तय हो गया था कि नए सेशन यानि जुलाइ से अनिल चंदौली या बनारस या लखनऊ में रहकर काम करेंगे. ऐसा इसलिए कि अनिल का दिल्ली में मन लग नहीं रहा था. साथ ही यहां खर्चे ज्यादा थे. पर उनके जाने से पहले मैं जेल चला गया और फिर पीछे पीछे अनिल खुद जेल चले आए सो सारा प्रोग्राम कुछ समय के लिए स्थगित हो गया. इसी कारण अनिल को मैंने कहा कि आप अब दिल्ली से जब विदा लेंगे तो यह भाव मन में रखकर विदा लेंगे कि आपने पत्रकारिता के उस चरम को छू लिया है जिसके लिए बाकी पत्रकार तरसते हैं यानि अपनी लेखनी के कारण प्रभावशाली लोगों की पोल खोलना और प्रभावशाली लोगों का विरोध झेलना… ये प्रभावशाली लोग शासन सत्ता का सहारा लेकर पोल खोलने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न करते हैं और उन्हें तरह तरह के मामलों में फंसाते हैं और जेल की हवा तक खिलवा देते हैं. अनिल मेरे इस तर्क से खासे खुश व उत्साहित दिखे. साथ ही जेल आने के कारण अनिल को एक आनंद यह आया कि यहां कुछ करना धरना नहीं था, टेंशन फ्री लाइफ थी, खाना-पढ़ना और सोना. बाहर रहने के दौरान वह मेरे मुकदमों में जमानत के लिए भागदौड़ करना, उसके बाद साइट पर खबर अपलोड करने की व्यवस्था यानि आफिस देखना, मेरे घर और अपने घर के घरेलू कामकाज व दिक्कतों-तनावों को मैनेज करना…  ऐसे ढेरों काम में इतने परेशान रहते कि जीना भूल गए थे. उस आफत व भागादौड़ी से उन्हें मुक्ति मिल गई थी, इसका चैन उनके चेहरे पर था. लोग पता नहीं क्यों नहीं समझते कि आप जिस चीज को दूसरों के लिए परेशानी का बड़ा कारण मानते-समझते हो, वही चीज हम जैसे संतों के लिए सुख का सबब बन जाया करती हैं…. मेरे और अनिल के मामले में जेल जीवन ऐसा ही साबित हुआ. अदभुत आनंद और अविस्मरणीय अनुभवों वाली जगह.

मैं योगा वाले प्रकरण के बारे में बात कर रहा था. खुंटी पर जब मेरी बारी आई तो मैं जेलर मनीष कुमार से मुखातिब था. उन्होंने पूछा- बताओ, क्या बात है. मैंने कहा- सर, मुझे योगा क्लास ज्वाइन करा दें. जेलर मनीष कुमार ने एक लंबरदार को निर्देश दिया कि इनका नाम योगा में लिखवा दिया जाए. लंबरदार ने मेरा नाम बैरक नंबर आदि नोट किया और मुझे बैरक में जाने को कह दिया. वह पर्ची लेकर योगा क्लास वालों के पास गया और मेरा नाम इनरोल करा दिया. अगले दिन सुबह आठ बजे एक राइटर बैरक में चिल्लाया– ''खुंटी पर पेश होने वालों, अस्पताल जाने वालों, योगा क्लास वालों…. चलो रे…. नाम लिखवा लो….'' यह डेली का रुटीन था. सुबह जिन्हें अस्पताल जाना होता, वे पहले ही अपना नाम लिखा देते. जिन्हें पेश होना होता अफसरों के सामने, वे भी अपना नाम लिखा देते. और योगा वालों के योगा जाने का टाइम डेली आठ बजे होता. उन्हें भी बैरक में नाम नोट कराना होता कि फलां फलां लोग योगा गए हैं… तो, सबके नाम एक साथ पुकारे जाते.

दिल्ली पुलिस वाले दीवान जी मेरे फट्ठे पर आए और मुझे योगा चलने का मुस्कराते हुए इशारा किया. मैं खुशी खुशी चल पड़ा. सफेद गमछा गले में डाले, हाफ पैंट नीचे और बनियान उपर पहने. अमूमन मेरा ड्रेस यही रहा जेल के अंदर. जब कोई मुलाकात करने आता तो बनियान के उपर टीशर्ट या शर्ट डाल लेता वरना बाकी समय बनियान में रहता. बेहद आराम की मुद्रा. योगा क्लास पहुंचा तो वहां का माहौल देखकर अच्छा लगा. योगा क्लास और लाइब्रेरी, दोनों एक साथ. ढेर सारी किताबें. आठ दस लोग योगा करते हुए. कोई नाक से तेज तेज आवाज निकाल रहा तो कोई गले से. कोई लेटा हुआ हाथ पैर फेंक रहा तो कोई पेट के बल हाथ पैर उठाए हुए. कोई सूर्य नमस्कार की मुद्रा में तो कई शीर्षासन कर रहा. कोई ऊं का जाप कर रहा तो कोई अजीब अजीब किस्म की आवाज नाक व मुंह से निकाल रहा. यह सब देख पहले तो मुझे अंदर से हंसी आई लेकिन हंसी को बाहर नहीं निकलने दिया. बेहद साफ सुथरी और पेड़ पौधों से घिरी हुई जगह. नीचे मोटी दरी, फिर उसके उपर कई चद्दर. बगल में जिम वालों के साजो सामान थे. जिम वाले अपनी बाडी बनाने व फिट रखने के लिए पसीना बहाते रहते. हीमैन सरीखी उनकी बाडी देख मैं भी सोचता कि यार जेल में रहकर कम से कम बाडी शाडी ही बना लिया जाए लेकिन बाद में पता चला कि बाडी बनाना मुश्किल नहीं, उसे मेनटेन रखना बेहद मुश्किल है और ज्यादा एक्सरसाइज का असर बाद में पड़ता है जब कई अंग दर्द करने लगते हैं. मैंने मन ही मन हीमैन भाइयों को प्रणाम किया और सिर्फ योगा में ही दिल लगाने का खुद से वादा किया.

मैं नया नया था. योगा वगैरह पहले कर चुका था लेकिन यहां के लिए नया था. सो नया ही दिखना चाहता था. दीवान जी ने योगा शुरू किया तो उनके सामने खड़े होकर मैंने उन्हीं की तरह कापी करना शुरू कर दिया. शुरू में खड़े होकर उछलकूद करना. फिर बैठकर कपालभांति, अनुलोम-विलोम समेत कई तरह के एक्सरसाइज करना. पूरे एक घंटे तक दर्जनों एक्सरसाइज करते रहे. दूसरे दिन योगा गुरु मेरे सामने प्रकट हुए. बाद में पता चला कि इनकी उम्र सत्तर के आसपास है लेकिन दिखते हैं बिलकुल नौजवान और छरहरे. आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं. पैरोल पर बीच में कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे. पर उनका स्थायी घर एक तरह से जेल हो चुका है.

योगा गुरु ने मुझे कई आसन सिखाए. उनका सिखाना असरकारी था क्योंकि वे आसन करने के तरीके, सावधानियां, इसके फायदे सब कुछ विस्तार से बताते सिखाते. कुछ आसन शुरू में मुझे काफी कष्टप्रद लगते जैसे पीठ के बल लेटकर दोनों पैर को उपर उठाते हुए सिर के पीछे ले जाकर जमीन से सटा देना. पीछे जमीन से टिका देने जैसे सुख को हासिल करने में मुझे कई रोज लग गए. इस काम में करीब बीस दिन बाद तब सफल हुआ जब योगा गुरु ने इसका ट्रिक सिखाया. उन्होंने कहा कि आखिर में सांस छोड़कर बेहद धीमे धीमे सांस लेते छोड़ते रहे और तब आखिरी प्रयास करो. ऐसा किया तो दोनों पैर की उंगलियां धरती छू गईं. हम लोग जब सुबह योगा करने आते तो योगा गुरु उस समय तरह तरह के पौधों का पेय तैयार कर रहे होते. अंकुरित चनों व अन्य चीजों का मिक्सचर तैयार कर रहे होते. ये सब बीमार बंदियों, जेल अफसरों आदि के लिए बनता. कई बार योगास्थल पर आकर कुछ चीफ साहब या कुछ लंबरदार लोग भी इसे पी लेते. योगा गुरु अपने आप में आयुर्वेद के संस्थान दिखे, दवा से लेकर योगा तक, सब कुछ के एक्सपर्ट.

एक दिन हम लोगों ने उनके घोले गए प्राकृतिक घोल को पीने की इच्छा जताई तो उन्होंने सहर्ष टेस्ट कराने का वादा किया और अगले दिन सबके लिए एक एक गिलास एक्स्ट्रा घोल तैयार करके पिला दिया. यह घोल कई पौधों की पत्तियों से तैयार किया जाता जो उम्र बढ़ाने वाला, पाचन ठीक रखने वाला, हृदय रोगों से बचाने वाला होता. मैंने मन ही मन तय किया कि जब जेल से बाहर निकलूंगा तो यह सब पेय तैयार कराकर पियूंगा. लेकिन जबसे बाहर निकला हूं तब से नया कुछ बेहतर करने की बजाय पुराना जेल वाला जो अच्छा था, वह सब एक एक करके छूटता जा रहा है.

एक बार श्री श्री रविशंकर के लोग योगा कराने आए. उन लोगों ने शुरुआती आसनों के बाद 'सोहम' नामक कैसेट लगा दिया. रवि शंकर की आवाज में सोहम के उतार चढ़ाव पर हम लोगों को सांस लेना और छोड़ना होता. इस एक्सरसाइज में मैं इतना लीन हुआ कि जब इसके चरम पर पहुंचकर लेट जाने को कहा गया तो जाने क्यों मेरी बंद आंखों से खुद ब खुद पानी गिरने लगा. मैंने खुद को बेहद ढीला छोड़ रखा था. पूरी तरह आसन में लीन था. बाद में मुझे समय़ में आया कि जब आप शरीर को वैज्ञानिक तरीके से उर्जान्वित करके ढीला सहज बनाते हैं तो एक समय ऐसा आता है जब आप खुद से अलग हो चुके होते हैं और आनंद की अवस्था में पहुंच चुके होते हैं. श्री श्री रविशंकर के जादू का अनुभव मैंने जेल में किया. मुझे समझ में आया कि यूं ही नहीं रविशंकर की इतनी फालोइंग है. मुझे अच्छा लगा कि जेल में रविशंकर के ''सोहम'' को समझ सका. आगे भी इसे करने की इच्छा है, भले ही इसके लिए रविशंकर के ग्रुप को ज्वाइन करना पड़े.

योगा खत्म करके जब हम लोग बैरक के लिए चले तो खुंटी के एक तरफ भजन मंडली सुर लय ताल बिखेर रही थी, खुंटी की दूसरी ओर एक बंदी की लंबरदार पिटाई करने में जुटे थे. मतलब एक तरफ अच्छा सा भजन चल रहा था और दूसरी ओर पीटे जाने से निकल रही चिल्लाहट व कराह. अजीब कंट्रास्ट था. भजन मंडली वाले इस सबसे बेपरवाह गाने बजाने में जुटे थे, जैसे यह सब उनके लिए रुटीन था. उधर, पीटने वाले और पिटाई खाने वाले भी भजन से अनजान अपने अपने काम में जुटे थे, जैसे यह सब उनके लिए भी रुटीन था. मैंने पता करने की कोशिश की कि आखिर इस बंदी का क्या अपराध है? जो पता चला, वह दिल दहला देने के लिए पर्याप्त था. इस बंदी ने रात में कट्टन के बल पर एक नए बंदी के साथ गलत काम किया था. रात में तो वह बंदी नहीं बोल पाया लेकिन सुबह उसने खुंटी पर आकर कंप्लेन की. उसने पांच-छह लोगों के नाम बताये जिन्होंने धमकाकर गलत काम करने की कोशिश की.
मेरे मुंह से निकल पड़ा- ओ माई गॉड!

खैर, भजन और रुदन के संयुक्त कार्यक्रम को देखते हुए मैं अपने बैरक में घुस चुका था. देर तक सोचता रहा. जो कांट्रास्ट सामने था, वह निकल नहीं पा रहा था. इस जेल में पिटाई अब बहुत कम होती थी. पुराने बंदी बताते हैं कि पहले के समय में यहां रोज दर्जनों लोगों की पिटाई होती, छोटी छोटी गल्तियों पर तलवा परेड की जाती. लेकिन अब सिर्फ गंभीर और बड़े अपराध पर ही दंड दिया जाता ताकि बंदी अनुशासन न तोड़ें. ज्यादातर कंप्लेन सुल्फा (एक नशा जिसे सिगरेट में भरकर पिया जाता है) की होती. अगर कोई सुल्फा पीते हुए पकड़ गया तो पहले उसे बैरक इंचार्ज चीफ साहब यानि जेल के सिपाही के यहां पेश किया जाता. ज्यादातर मामलों में चीफ साहब मामले को अपने स्तर से रफा दफा करने की कोशिश करते. लेकिन अगर बंदी उनकी बात नहीं मानते तो वह सुल्फाई को लेकर खुंटी पर चले जाते और जेल अफसरों से शिकायत करते. तब जेल अफसर उस नशेड़ी बंदी को दंडित करते. दंडस्वरूप कई बार उसका बैरक बदल दिया जाता या फिर उसे भंडारे काम करने के लिए भेज दिया जाता.

जेल में भंडारे का बहुत खौफ रहता बंदियों में. भंडारा वह जगह जहां सभी बंदियों कैदियों के लिए खाना बनता. एक बंदी के लिए औसत छह रोटी सुबह और छह रोटी शाम का तय है. मतलब सिर्फ रोटी रोटी की बात करें तो चार हजार बंदियों कैदियों के लिए चौंसठ हजार रोटियां बनानी होतीं. इतनी रोटी बनाने के लिए कितना आटा माड़ना पड़ता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. हालांकि आंटा माड़ने की मशीन भी वहां होती लेकिन गर्मी के समय में बड़े-बड़े चूल्हों के बगल में रोटी सेंकना, रोटी बेलना, दाल-चावल-सब्जी आदि पकाना कष्टप्रद काम होता. इस काम में ज्यादातर उन बंदियों कैदियों को लगाया जाता जो गरीब हैं, जो काम करना चाहते हैं ताकि उन्हें मजदूरी मिले. इनमें से कई लोग अगर भंडारे से निकल कर किसी बैरक में रहने को जाना चाहते तो उन्हें जेल अधीक्षक के सामने पेश होना होता है. खोड़ा का एक युवक मेरे सामने जेल में आया, भंडारे गया. उससे मुलाकात व परिचय नोएडा कोर्ट में पेशी के दौरान हुई. उसने भंडारे की तकलीफ बयान की. बाद में वह मेरे बैरक में दिखा. उसने बताया कि रांची से उसके परिजन आए और जब वो अधिकारियों से मिले तब जाकर भंडारे से मुक्ति मिली.

भंडारे में उन लोगों को भी भेजा जाता जो जेल में गलत काम करते हुए पकड़े जाते. जैसे, सुल्फा पीने, किसी से मारपीट करने, किसी के साथ दुष्कर्म का प्रयास करने जैसे अपराधों में भी सजा के तौर पर दोषियों को भंडारे भेज दिया जाता. इलाहाबाद के एक मिश्रा जी का फट्ठा हम लोगों के फट्टे के सामने था. वे टाइम्स आफ इंडिया अखबार पढ़ने के लिए मंगाते. किसी पढ़े लिखे व ठीकठाक परिवार के नौजवान लगते. एक दिन उनसे मैंने परिचय किया. उन्होंने बताया कि वे एक कंपनी में साफ्टवेयर इंजीनियर थे. सब कुछ ठीक चल रहा था. उन्हें आमतौर पर गुस्सा नहीं आता, लेकिन जब आता तो वे आउट आफ कंट्रोल हो जाते. ऐसी ही एक मनःस्थिति में उन्होंने घर का ताला उठाकर पत्नी की तरफ दे मारा और वह ताला पत्नी के सिर पर लगा. वहीं आन स्पाट डेथ हो गई. मिश्रा जी इस घटना से इतने सदमें में आ गए कि उनका हाथ पैर कांपने लगा. जेल में भी वे नार्मल नहीं रह पाते. अक्सर सोचते सोचते वे डिप्रेशन में चले जाते और हाथ पैर कांपने लगता, आवाज लड़खड़ाने लगती. वे बताते हैं कि पत्नी से मामूली कहासुनी तो हर घर में होती है, उनके यहां भी कभी कभार बातचीत में गर्मागर्मी हो जाती लेकिन उस दिन जाने क्या मेरे सिर पर भूत चढ़ा कि उसकी बात बर्दाश्त न कर पाया और गुस्से में ताला उठाकर उसकी तरफ फेंक दिया. वह ताला एकदम से उसके माथे पर लगा और उसकी मौके पर ही डेथ हो गई. कई साल हो गए जेल में. जमानत नहीं हुई. क्या सपने संजोए थे और क्या हो गया, कहां आ गया.

हम लोगों के बगल में एक नौजवान रहता. रिंकू. कोई कहता वह सोनू पंजाबन गिरोह का सदस्य रहा है तो कोई कहता वह छोटा मोटा क्राइम करने वाला भटका हुआ युवक है. रिंकू से उसके परिजनों ने लगभग नाता तोड़ लिया था. उससे कोई मिलने नहीं आता और न ही कोई उसे पैसे देकर जाता. सो, उसने मजबूरन पैसे वाले कुछ बंदियों के फट्टे को संभालने का काम ले लिया और इसके बदले उसका जेल जीवन ठीक से बीत जाता, किसी चीज की कोई कमी नहीं पड़ती. रिंकू जेल लाइफ के टिप्स बताता. जैसे ये कि यहां हर कोई समय काटता है, शेर से लेकर सियार तक, और सब चुपचाप समय काटते हैं, कोई किसी पर नहीं गुर्राता. इसलिए सबसे अच्छा तरीका है कि अपने काम से काम रखो, और टाइम काटो. उसकी बातें किसी बड़े बुजुर्ग सी लगतीं.

एक सज्जन जो करीब छह साल से जेल के भीतर थे, एक दिन शाम को बेहद उदास से बैठे दिखे. मैंने उन्हें छेड़ा और उदासी का सबब पूछा तो वे फूट पड़े. कहने लगे- जिंदगी बड़ी मुश्किल हो गई है यशवंत भाई, किसी भी तरह यहां से निकलने का मन करता है. मुझे अब निकलवा दो यहां से. मुझे जिंदगी की कीमत पता चल रही है. पूरी जवानी जेल में गुजर गई. बाइस साल की उम्र में आया था. 29 का हो गया. ये सात साल कैसे लौटेंगे. अब यहां एक पल नहीं कटता. मैं उनकी बातें सुनकर अवाक. उन्हें मैं हर रोज नहाकर पावडर व खुशबूदार तेल लगाते देखता तो सोचता कि इन लोगों का जीवन जेल में भी कितना नार्मल और सुंदर है. लेकिन आज देख रहा हूं कि इस नामर्ल व सुंदर लग रहे जीवन के पीछे कितना दर्द छिपा है.

एक सज्जन ने एक दिन बताया कि इस बैरक के जो सबसे ताकतवर कैदी हुआ करते थे, जो अब छूट गए हैं, और उन्हें बैरक का सीओ बोला जाता था, ने जाड़े की एक रात कंबल में मुंह ढंककर काफी आंसू बहाए. उनका कंबल उपर से हिलता लगा तो उनसे धीरे से पूछा कि भाई क्या हो गया, तब उन्होंने अंदर ही मुंह करके कहा- अब नहीं जिया जाता यहां, जिंदगी झांट हो गई है, किसी तरह यहां से बाहर निकलवाओ भाई. उन सीओ साहब की पूरी बैरक में तूती बोलती थी. उनकी भारी व रोबीली आवाज ऐसी और उनका अंदाज ऐसा कि जैसे वही जेल के जेलर हों. पर उस सख्त से दिखने वाले शख्स के भीतर कितना भावुक दिल था, यह उस रात उनके पड़ोसी सज्जन ने जाना. वही पड़ोसी सज्जन मुझे इस घटना के बारे में बता रहे थे.

दिल्ली पुलिस वाले दीवान जी से एक रोज उनके जेल में आने के बारे में पूछ बैठा. उन्होंने बताया कि उन पर पत्नी की हत्या का आरोप लगाया गया है. लेकिन वास्तविकता यह है कि जिस वक्त पत्नी ने मेरे घर पड़े रिवाल्वर से खुद को गोली मारकर सुसाइड किया उस समय मैं शहर में एक सरकारी आफिस में बैठा था और इसके प्रमाण स्वरूप उस आफिस के सीसीटीवी फुटेज हैं. आपसी कहासुनी के एक मामले के कारण पत्नी ने गुस्से में उस समय सुसाइड कर लिया जब घर पर कोई नहीं था. उस वक्त मां स्कूल से आ रहे बच्चों को लेने बस स्टाप गई हुई थीं. पर पूरे मामले को ससुराल वालों ने मर्डर का रंग दे दिया है. ससुराल वाले केस खत्म करने के लिए अब उनसे ज्यादा से ज्यादा पैसे ऐंठने की फिराक में है पर दीवान जी का कहना है कि एक तो मेरी पत्नी गई, बच्चे अकेले रह रहे हैं, मैं जेल में हूं, अब किस बात के पैसे ससुराल वालों को दूं? दीवान जी नौ महीने से ज्यादा समय से जेल में हैं. छोटे छोटे कई बच्चे हैं उनके. उन बच्चों के प्रति बेहद चिंतित और संवेदनशील. खुद की सोशल लाइफ और अपना सोशल रेपुटेशन खत्म हो जाने की चिंता से कई बार व्यथित हो जाते. कई तरह के ग़मों में घुलते पिघलते दीवान जी ज्यादातर वक्त अपनी जमानत के बारे में सोचते बतियाते रहते हैं. उन्होंने खुद को जेल में हर तरह से इंगेज रखा हुआ है. अंग्रेजी की मोटी डिक्शनरी के डेली यूज वाले शब्दों को वे अलग कापी पर उसके अर्थ समेत लिखते हैं. एक राम नाम की पुस्तिका बना रखी है जिसपे वे राम राम लिखते रहते हैं. योगा के अलावा वे कंप्यूटर क्लास करते हैं. इस तरह उनके जेल जीवन में वक्त नहीं बचता डिप्रेशन के लिए. वे सुबह चार बजे उठ जाते और फ्रेश हो नहा धोकर तैयार हो जाते. उनकी अनुशासित दिनचर्या से मैं काफी प्रभावित होता. जब वे बैरक के बाहर मेरा हाथ पकड़कर टहल रहे होते और बातें कर रहे होते तो वे उस दौरान वे मेरे पंजे की एक एक उंगली को अपने हाथ से चटका रहे होते. इससे मुझे बहुत आराम मिलता. बाद में मैंने खुद ब खुद दूसरा हाथ उनके पंजे में देना शुरू कर दिया ताकि इसकी भी सेवा हो जाए.

दीवान जी मेरे मामले में खूब रुचि लेते. मैं उनसे हमेशा यही कहता कि जेल तो अपन का घर है, यहां से कहां जाना. इस पर वे चौंकते और हंसते. वे कहते कि तुम मन से ये बात नहीं कहते. मैं कहता- सीना फाड़कर नहीं दिखा सकता कि अंदर क्या है लेकिन सच यही है कि मुझे यहां बहुत अच्छा लगता है. उन्हें मैं समझाने लगा. अगर बाहर की जिंदगी में मेरा ऐसा कोई कारोबार होता जो कि मेरे जेल में आने से ठप हो रहा होता, करोड़ों का नुकसान हो रहा होता, तो लगता कि जेल में मैं परेशान हूं. मेरे लिए बाहर की दुनिया में रहना ज्यादा मुश्किल था और जेल में रहना ज्यादा आसान लग रहा है तो कैसे कह दूं कि जेल में मन नहीं लग रहा. रही परिवार की बात तो मैंने परिवार की कभी परवाह नहीं की. हां, जेल में रहूं चाहें जहां रहूं, परिवार वालों को आर्थिक संकट नहीं होने दूंगा, इतने दोस्त यार शुभचिंतक तो हैं ही मेरे.

दीवान जी मेरी बात सुनकर हंसने लगते.

प्रतिदिन सुबह जब गिनती के लिए बैरक का दरवाजा खुलता तो मैं बाहर निकलकर आंख मींचते हुए नारा लगाता…. जेल का दसवां दिन जिंदाबाद. जेल का 11वां दिन अमर रहे. जेल का बारहवां दिन लांग लिव. जेल का तेरहवां दिन मार्च आन. जेल का 14वां दिन जिंदाबाद. मेरी नारेबाजी से ढेर सारे बंदी कैदी परिचित हो गए थे. बाद के दिनों में अगर किसी के कान तक मेरी नारेबाजी की आवाज नहीं जा पाती तो वे आकर पूछ जाते कि आपने नारा क्यों नहीं लगाया. मैं बताता कि नारा तो लग गया, सुनने के लिए आप आसपास थे ही नहीं. महीने डेढ़ महीने जेल में गुजरने के बाद दीवान जी कहने लगे कि आजकल आप सुबह नारे नहीं लगाते, लगता है कि थक गए हैं या जेल में मन नहीं लग रहा है. तब मैं उन्हें वास्तविक स्थिति बताता कि जेल में ही नहीं, बाहर भी मैं कोई काम नियमित नहीं कर पाता. उब जाता हूं. अगर महीने भर यहां नारा लगा दिया तो समझो एक काम बहुत दिनों तक नियमित कर गया. बाद के दिनों में मैं बात बात पर एक बात बोल देता, वह यह कि- ''कभी कभी दिल में खयाल आता है कि जिंदगी लौंड़े लग गई.'' इस लाइन को बोलने के पीछे अपन की कोई पीड़ा वजह नहीं, बल्कि दूसरों की पीड़ा को वनलाइनर बनाने का आनंद व इसके जरिए मजा लेने की तमन्ना. इसे सुनकर दूसरे बंदी कैदी भाई मुस्करा देते और बाद के दिनों में वे लोग ज्यादा इस लाइन को बोलते और मैं अपने वनलाइनर के हिट हो जाने को देखकर मुस्कराता. उसी तरह कई सारे लोगों ने ''जेल का फलां दिन जिंदाबाद'' करके नारा भी लगाना शुरू कर दिया. मतलब कि जेल आते वक्त जो डर था, अब उसके उलट जेल को इंज्वाय कर रहा था.

हर बंदी कैदी मुझसे बात करना चाहता. मैं लोगों की कहानी सुनता और सभी को जेल से बाहर निकलकर नकारात्मक कुछ भी न करने की सलाह देता. जेल में बंद नब्बे प्रतिशत से ज्यादा बंदी कैदी रिवेंज यानि बदले की भावना से भरा हुआ है. कोई उस दरोगा को निकलते ही गोली मार देने की तैयारी किए बैठा है जिसने उसे गलत फंसाकर जेल भेज दिया है. कोई उस गवाह को गोली मारने की तैयारी किए बैठा है जो लगातार गवाही दिए जा रहा है और जिसके कारण उसे जेल की सजा संभव होती दिख रही है. कोई उस दोस्त को सबक सिखाने की तैयारी किए हुए है जो जेल आने के बाद मिलने नहीं आता और उसी की दोस्ती यारी में कांड करने के कारण जेल आना हुआ. कोई ससुरालियों को सबक सिखाने के लिए कसम खाए बैठा है जिनके कारण वह लंबे समय से दहेज हत्या के फर्जी मामले में जेल काट रहा है. ऐसे बदला लेने वालों को मैं समझाता कि जिंदगी सिर्फ बदला लेना और जेल काटना नहीं. आप बदला लेने का काम प्रकृति पर छोड़ दीजिए. प्रकृति ने ऐसा सिस्टम बना रखा है कि हर कोई दुख के पहाड़ के नीचे दबता है और वही आपका बदला है. बड़े से बड़ा आदमी अपने एकांत में अपने कई सारे दुखों तनावों के कारण रोता डरता कलपता है. वह बाहर से खुद को ताकतवर दिखाता है. सो, आप काहे को भगवान या प्रकृति का काम अपने हाथ में लेते हो. आप तो अपनी जिंदगी जियो, आनंद लो, घूमो, यह देश कई देशों का समुच्चय है. केरल जाओ, गोवा जाओ. हर जगह की अलग अलग जिंदगी, संस्कृति, खानपार को जियो, महसूसो. लाइफ आनंद लेने का नाम है, बदला लेकर फिर जेल में आ जाने और फिर डिप्रेशन में रहने का नाम नहीं है. अगर आपको आनंद लेना आता तो आप यहीं जेल में भी आनंद लेते, देखो मुझे, मैं सच में कह रहा हूं कि मुझे जेल में आनंद आ रहा है. सामूहिक जीवन का ऐसा आनंद पहली बार जिया है मैंने. रात में जब नौ दस बजे के बीच में सोने की कोशिश करता हूं तो दौ सौ लोगों वाली इस बैरक से लोगों की बातचीत का शोर कुछ यूं कानों में घुलता है जैसे कोई संगीत बज रहा हो, कोई कोरस सुला रहा हो… इन आवाजों के बीच में खुद को बेहद सुरक्षित और संतुष्ट मानता हूं और तुरंत नींद आ जाती है. सच बता रहा हूं, इतनी जल्दी नींद मुझे बाहर कभी नहीं आती. कई बार तो रात गुजर जाती है और सोचने का काम बंद नहीं होता. लेकिन यहां जाने क्या जादू है कि नींद तो जैसे आसपास डांस की मुद्रा में हो और मेरे आंख बंद करते ही मेरे भीतर प्रवेश कर जाए. मेरी बातों का पता नहीं बंदियों कैदियों पर कितना असर होता लेकिन मुझे लोग पत्रकार मानने लगे थे. उनकी नजर में पत्रकार वही जो खूब बोले और खूब समझाए.

मेरा नाम वहां भड़ासजी पड़ चुका था. लोग मुझे यशवंत नाम से कम, भड़ास जी नाम से ज्यादा बुलाने लगे थे. लोगों को यह मालूम हो चुका था कि भड़ास नामक कंप्यूटर पर दिखने वाली एक चीज के जरिए इस भड़ास जी ने बड़े बड़े लोगों से पंगा ले रखा है और बड़े लोगों ने इनका काम लगा दिया है, फंसा कर जेल भिजवा दिया है, और जमानत न हो पाए, इसके लिए भी बड़े लोगों ने ऐड़ी चोटी का जोर लगा दिया है. पूरी बैरक मेरी दास्तान से परिचित थी, बस मैं ही अपनी दास्तान को जेल से बाहर छोड़कर जेल में नई कहानी जानने-बूझने-रचने में लगा हुआ था. जेल में मेरी गायिकी फेमस हो गई थी. रात में खाना खाने के बाद एक राउंड गायिकी का होता था. फिल्मी से लेकर गैर फिल्मी और ग़ज़ल-भजन तक का दौर चलता…. सबसे ज्यादा डिमांड पंडित छन्नू लाल मिश्रा के इस भजन का था…

ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी…

छोटा सा तूं कितने बड़े अरमान हैं तेरे
मिट्टी के तन सोने के सामान हैं तेरे

मिट्टी की काया मिट्टी में जिस दिन मिलाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सज धज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

करमों का परताप तूने पाया मानव तन
पाप में डूबा है पापी देखो तेरा मन
ये पाप की लंका तुम्हें जिस दिन जलाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा…. ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

पंछी है तू तोड़ पिजड़ा तोड़ के उड़ जा
माया महल के सारे बंधन छोड़ के उड़ जा
दिल की धड़कन में मौत जिस दिन गुनगुनाएगी…
उस दिन…
ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी….
सजधज के जिस दिन मौत की शहजादी आएगी….

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फिल्मी गाने पूरे याद नहीं थे, केवल दो दो लाइन गाकर लोगों का और अपना मनोरंजन करता… और इन गानों के कारण बंदियों कैदियों की नीरस दुनिया काफी सरस व सजीव हो जाती, ये महसूस करता…. बाद में लोग मुझसे टाइम बेटाइम फरमाइश करते और मैं खुशी खुशी गाकर सुनाता क्योंकि मेरे एक गीत से अगर उनका मन प्रसन्न हो जाता तो मुझे यह करते हुए बेहद खुशी होती… फिल्मी गीत जो मैं गाता और उन लोगों को भाता…. वे इस प्रकार हैं….

तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे
कि मर जाएंगे और क्या हम करेंगे…

किसी दिन हमें आजमाए ये दुनिया
मुहब्बत की कीमत बताए ये दुनिया

मुहब्बत की कीमत अदा हम करेंगे….
कि मर जाएंगे और क्या हम करेंगे…

xxxxx

मेरे प्यार की उमर हो इतनी सनम
तेरे नाम से शुरू, तेरे नाम से खतम

बिन तेरे एक पल भी मुझे रहा नहीं जाए
ये दूर दूर रहना अब सहा नहीं जाए
हाजिर है जान जानेमन, जान की कसम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

मेरे सपने गुलाबी नीले हो गए जवां
लो आके तेरी बाहों में मैं खो गई कहां
तेरे प्यार भरे बाहों में ही निकलेगा दम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

एक छोटा सा घर हो, रहे दोनों जहां
जहां प्यार से मिले ये धरती आसमां
टूट जाए ना कहीं मेरे प्यार का भरम
तेरे नाम से शुरू तेरे नाम से खतम…

xxxx

जिंदगी की ना टूटे लड़ी प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी
ओ लंबी लंबी उमरिया को छोड़ो
प्यार की इक घड़ी है बड़ी
प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी

उन आंखों का हंसना भी क्या
जिन आंखों में पानी ना हो
वो जवानी जवानी नहीं
जिसकी कोई कहानी ना हो
जीने मरने की किसको पड़ी….
प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी….

xxxxxx

ऐसे ही ढेरों गाने गाए जाते और लोग झूमते, गुनगुनाते, अपने ग़मों को भूलते. बाद में तो मैं इतना लोकप्रिय हुआ कि बैरक में टहलते कोई सज्जन आते और मुझे गवाने के लिए एक कोने में ले जाते और अनुरोध करते कि भाई साहब, वो वाली लाइन फिर गाकर सुना दीजिए… तब मैं गाता…. जीने मरने की किसको पड़ी…. प्यार कर ले घड़ी दो घड़ी… उन आंखों का हंसना भी क्या, जिन आंखों में पानी न हो…. वो जवानी जवानी नहीं जिसकी कोई कहानी ना हो… एक बार नोएडा पेशी पर हम लोग जा रहे थे तो पूरे रास्ते गाते गए…. बाहर वालों की जाम में फंसी भागती हांफती दौड़ती जिंदगी देखकर उन पर तरस आ रहा था, जैसे बाहर वालों को हम लोगों की मुर्गियों की तरफ कैद, फंसी, अंटकी, भुगतती जिंदगी देखकर तरस आता….

बैरक में सुबह गिनती के वक्त बैरक से बाहर पार्क में निकलने पर कई लोग बैरक की दीवार पर बने महाभारत के एक दृश्य में खड़े कृष्ण के पैरों में हाथ जोड़कर देर तक प्रणाम करते. दीवार पर महाभारत का वह सीन पेंट किया गया है जिसमें अर्जुन को भगवान कृष्ण युद्ध करने के लिए उपदेश दे रहे हैं और सेनाएं आमने सामने मैदान में डंटी हुई हैं. इस पेंटिंग को रियाज नामक किन्हीं बंदी पेंटर ने बनाया है, रियाज ने अपने दस्तखत बेहद करीने से पेंटिंग के कोने में किए हुए हैं. मैं सोचता कि बाहर हिंदू मुस्लिम के नाम पर कितनी मारकाट मची रहती है लेकिन जेल में कितना भाईचारा है. जिस बैरक में मैं रहा, वहां पूरे रमजान भर मुस्लिम भाई नमाज पढ़ते और उनके खाने पीने के लिए विशेष इंतजाम जेल प्रशासन द्वारा किया जाता. ईद के दिन सबसे गले मिलकर अच्छा लगा. एक सामूहिक कार्यक्रम भी जेल प्रशासन द्वारा कराया गया जिसमें सबने मिलकर नमाज अता की. रमजान के अलावा भी कई मुस्लिम भाई रुटीन में पांचों वक्त की नमाज अदा करते. वे एक जगह इकट्ठे हो जाते और एक साथ नमाज अदा करते. मेरा भी मन कई बार करता कि मैं भी यहां नमाज अदा करना सीख लूं लेकिन अपनी इच्छा व्यक्त करने की हिम्मत नहीं कर पाया. हां, नमाज अदा करने वाले सभी साथियों से मैंने जान-पहचान अच्छी कर ली थी. उनमें से कई साथियों के साथ मैं शतरंज खेला करता.

उधर, शाम की गिनती शुरू होने के बाद बैरक में आते ही पूरे बैरक में दो जगह लोगों को जमावड़ा हो जाता और भजन गायन का दौर शुरू हो जाता. यह कार्यक्रम आधे घंटे के करीब चलता. इस वक्त ऐसा लगता जैसे हम किसी मंदिर में बैठे हों और तरह तरह के धुनों पर भजन गाए जा रहे हों. हम लोगों के हाथ पांव खुद ब खुद हिलते रहते. अंत में प्रसाद वितरण होता और मैं भी पूरे चाव से प्रसाद खाकर शतरंज का नया दौर शुरू करता. जब जीत जाता तो मैं चिल्लाकर कहता…. मैं हूं शहंशाह ए डासना… जिसके छूटने की आस ना…. । यह तकिया कलाम बहुत लोगों को याद हो गया…. कई बार तो जीतता मैं और नारा लगाते हारने वाले सज्जन कि… भड़ासजी हैं शहंशाह ए डासना…. जिनके छूटने की आस ना…. ।।

इस धारावाहिक उपन्यास के लेखक यशवंत सिंह 68 दिनों तक डासना जेल में रहकर लौटे हैं. उन्हें जेल यात्रा का सौभाग्य दिलाने में इंडिया टीवी और दैनिक जागरण प्रबंधन का बहुत बड़ा योगदान रहा है क्योंकि ये लोग भड़ास पर प्रकाशित पोलखोल वाली खबरों से लंबे समय से खार खाए थे, इस कारण फर्जी मामलों में फंसाकर पहले थाने फिर जेल भिजवा दिया. लेकिन यशवंत जेल में जाकर टूटने की जगह जेल को समझने बूझने और उसके सकारात्मक पक्ष को आत्मसात करने में लग गये. इसी कारण ''जानेमन जेल'' शीर्षक से उपन्यास लिखने की घोषणा उन्होंने जेल में रहते हुए ही कर दी. वे इस उपन्यास के जरिए बंदियों-कैदियों-जेलों की अबूझ दुनिया की यात्रा भड़ास के पाठकों को कराएंगे. पाठकों की सलाह आमंत्रित है. आप यशवंत तक अपनी बात yashwant@bhadas4media.com के जरिए पहुंचा सकते हैं. उनसे संपर्क 09999330099 के जरिए भी किया जा सकता है.


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Yashwant Singh Jail

पाकिस्तानी अख़बार का शिगूफ़ा: करीना कुबूलेंगी इस्लाम

सैफ-करीना के बारे में अपने देश के अखबार तो कयास लगा कर थक गये, लेकिन अब एक शिगूफ़ा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के एक उर्दू अखबार 'नया अखबार' ने छोड़ा है। उसने अपने पहले पन्ने पर प्रकाशित खबर में दावा किया है कि करीना कपूर ने इस्लाम कुबूल करने का फैसला कर लिया है। अखबार में छपी रिपोर्ट के मानें तो करीना सैफ के कहने पर इस्लाम कुबूल करने के लिए तैयार हुई हैं।

रिपोर्ट के कहा गया है कि, 'सैफ ने करीना के सामने शादी के लिए यही शर्त रखी थी कि वे इस्लाम धर्म कुबूल करने को राजी हों जाएं। सैफ ने करीना के सामने यही बात कही कि वे उनकी मां शर्मीला टैगोर की राह पर चलते हुए इस्लाम धर्म को स्वीकार करें। इसके बाद करीना कपूर ने इस्लाम अपनाने के लिए हामी भर दी।'

 
दिलचस्प बात यह है कि कई भारतीय अखबारों ने भी पाकिस्तानी अखबार के इस शिगूफे को आधार बना कर अपने यहां खबरें प्राकाशित कर दी हैं। यानी अब तक अपने देश के पत्रकारों से बचती रही करीना को अब पाकिस्तानी मीडिया के शिगूफ़े पर सफाई देनी होगी। हालांकि, अभी तक करीना कपूर या उनके किसी करीबी ने इस बात की न तो पुष्टि की है और न ही खंडन कि उन्होंने इस्लाम कुबूल कर लिया है या नहीं।
 
गौरतलब है कि शर्मीला टैगोर ने 1969 में मंसूर अली खान पटौदी से शादी के लिए इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया था और अपना नाम बेगम आयशा सुल्ताना रख लिया था।

आर लक्ष्मीपति होंगे पीटीआई के नये अध्यक्ष

 

तमिल दैनिक दिनमालार के प्रकाशक आर लक्ष्मीपति को आज यहां प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) के निदेशक मंडल का अध्यक्ष चुन लिया गया। उन्हें पीटीआई की वाषिर्क महासभा (एजीएम) के बाद अध्यक्ष चुना गया। 
 
पहले भी दो बार पीटीआई के चेयरमैन रह चुके लक्ष्मीपति मातृभूमि अखबार समूह के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक एम पी वीरेंद्र कुमार की जगह लेंगे। 
 
के एन संत कुमार (डेक्कन हेराल्ड) को बोर्ड का उपाध्यक्ष चुना गया है। 

कारपोरेट मीडिया, आम पत्रकार, यशवंत और भड़ास

आज के दौर में कारपोरेट मीडिया घरानों का आम जनता की आवाज कहे जाने वाली मीडिया पर पूरी तरह कब्ज़ा हो चुका है. सरकार भी इन्हीं के साथ खड़ी है. ऐसे में यशवंत जैसे वीर पुरुष यदि किसी तरह से पोर्टल बनाकर मीडियाकर्मियों के दुखों को उजाकर कर रहे हैं, तो निश्चित ही बवंडर का सामना करना होगा, जैसा हम लोगों ने देखा कि कुछ लोग कूट रचना करके यशवंत जी को जेल भेज दिए.

जहाँ तक मैं जानता हूँ, भाई यशवंत एक संघर्षशील पुरुष हैं, इनके ऊपर इन साजिशों का कोई असर नहीं होगा, मगर हम मीडिया के लोगों को सोचना होगा कि ऐसी स्थिती में हम लोगों को क्या करना चाहिए, कम से कम एक आन्दोलन तो खड़ा कर सकते हैं. कुछ लोगों ने किया भी जो बधाई के पात्र हैं लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है. अब इस तरह के आन्दोलन की नहीं बल्कि क्रांति यानी मीडिया क्रांति की जरूरत है. भविष्य में ऐसा संभव भी है.

अब मीडिया मंडी सरकारों की चाटुकारिता कर रही है और विज्ञापन के लिए या यूँ कहे हड्डी पाने की चाहत में कितने निचले स्तर पर गिर जाएगी, इसका कोई अंत नहीं है. पत्रकार भाई कुछ अच्छा लिखने और पर्दाफाश करने के लिए मचल रहे हैं, मगर मीडिया का प्रबंधतंत्र कुंडली मारकर बैठा हुआ है. वह कुछ करने नहीं देना चाहता है. बड़े-बड़े मीडिया घराने के लोग तो मौज काट रहे हैं. लेकिन आम पत्रकार शोषण का शिकार है. इनका कोई पुरसाहाल नहीं है. सरकार भी इनकी माली हालत पर नज़र नहीं दौड़ा रही है कि इनको भी कुछ सरकारी सुविधाएँ चाहिए या ये भी इंसान हैं, इनका भी घर परिवार है. आखिर इनको कोई सुविधा क्यों नहीं दी जा रही है? जब भी जहाँ भी कोई चाहता है, इन्हें शोषित कर लेता है. इनकी कोई सुनवाई भी नहीं होती है. इनके लिए कोई भत्ता नहीं, पेंशन नहीं. घर मकान लेने में कोई फेसिलिटी नहीं. यहाँ तक लोन लेने के लिए भी कोई अनुदान नहीं है. आखिर क्यों नहीं? जुनून में समाज सेवा के लिए अखबार कोई आम आदमी निकाल रहा है तो उसके अखबार के लिए कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं है, उल्टे उसके अखबार का डीएवीपी नहीं होने दिया जाता है ताकि यह आगे न बढ़ सके. उसके पग-पग पैर यही लोग कांटे ही कांटे बिछाते हैं. इतना ही नहीं, विज्ञापन में घोटाला है, यहाँ भी दलाली है, चाटुकारिता है.

आप सोच सकते हैं कि भाई यशवंत किस हालात में अपनी वेबसाइट चला रहे हैं. तिस पर इन्हें मगरमच्छों से लड़ना भी पड़ रहा है. और तो और, बड़े बड़े महाजन जो देश के उद्योगपति हैं, वह भी केवल नेताओं को ही चंदा देते हैं, राजनीतिक दलों को करोड़ों का चंदा दिया जा रहा है. आखिर ये लोग मीडिया के छोटे कर्मचारियों के कल्याण के लिए कोई फंड क्यों नहीं बनाते हैं. सरकारें क्यों नहीं सोचती हैं. एक सरकारी आदमी की दुर्घटना में मौत हो जाए तो उसके परिवार के लिए नौकरी से लेकर सभी कुछ दी जाती है मगर एक मीडियाकर्मी की मौत समाचार कवरेज के दौरान हो जाये तो उसकी मौत पर आंसु बहाने संस्थान का मालिक तक नहीं आता है, कुछ देने की बात ही कुछ और है.

सरकार तो कभी कुछ सोचती ही नहीं है. आखिर क्यों? क्या आपने कभी सोचा? अगर नहीं तो अब सोचना होगा, सरकारों को मजबूर करना होगा. इसके लिए एक आन्दोलन की नहीं, क्रांति और कुर्बानी की जरूरत है. मित्रों आज भाई यशवंत के साथ यह अन्याय हुआ, कल आपके साथ होगा, इसे रोकने के लिए आपको आगे आना होगा. इसी क्रम में आप सबको अवगत कराना है कि एक संस्थान का गठन होने जा रहा है. आप सभी मित्रों से अपील है इस क्रांति के रथ को आगे बढ़ाने में आपना योगदान सुनिश्चित करें.

जय हिंद जय भारत

अजीत कुमार पांडेय

AJIT KUMAR PAMDEY

ajitmediaajit@gmail.com


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लखनऊ के बड़े पत्रकार को भाजपा नेता ने बुरी तरह धुन दिया

लखनऊ : लखनऊ के एक बड़े पत्रकार को भाजपा के एक नेता ने बुरी तरह धुन दिया। राजधानी में सरकार के बड़े अफसरों और कद्दावर पत्रकारों से अटी-पड़ी कैसरबाग कालोनी में सरेआम हुई इस घटना की रिपोर्ट पुलिस में कर दी गयी है। लेकिन चार दिन बाद भी पुलिस ने हस्‍तक्षेप नहीं किया। इतना ही नहीं, पत्रकारों की सारी यूनियनें और पत्रकार-नेता भी इस हादसे पर पूरी तरह चुप्‍पी साधे हुए हैं।

यह हादसा इसी महीने की 20 तारीख सुबह करीब सात बजे हुई। दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के अनिल के अंकुर नामक वरिष्‍ठ पत्रकार सुबह बैडमिंटन खेल कर लौट रहे थे। पुलिस में लिखी गयी रिपोर्ट के अनुसार अंकुर जैसे ही अपने फ्लैट की पोर्टिको के पास पहुंचे, आधा दर्जन लोगों ने उन्‍हें दबोचा और जमकर पीट दिया। रिपोर्ट के अनुसार इन हमलावरों को इस फ्लैट में पड़ोसी और भाजपा के नेता दयाशंकर सिंह ने बुलाया था। दयाशंकर सिंह लखनऊ विश्‍वविद्यालय छात्रसंघ में उपाध्‍यक्ष थे और भाजपा में मौजूदा प्रदेश मंत्री। इतना ही नहीं, दयाशंकर सिंह इस सरकारी कालोनी में काबिज मकान में पिछले दस बरस से कब्‍जा रखे हैं।

अंकुर के मुताबिक लात-घूसों से पीटने के बाद दयाशंकर सिंह ने अपनी पिस्‍टल अंकुर के चेहरे पर रखा और धमकी दी कि पूरे परिवार को जान से मार दिया जाएगा। अंकुर के बच्‍चे इस हादसे के बाद से ही सदमे में आ चुके हैं। इस घटना के बाद से ही अंकुर का परिवार और कालोनी वाले दहशत में हैं लेकिन हादसे के चार दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने कोई कार्रवाई करने की जरूरत ही नहीं समझी। अंकुर के मुताबिक कालोनी के गेट पर ही बनी पुलिस-चौकी के इंचार्ज ने साफ कह दिया कि जब तक जांच नहीं की जाएगी, किसी भी हमलावर पर कार्रवाई नहीं की जाएगी।

दयाशंकर सिंह ने बताया है कि अनिल के अंकुर पिछले एक साल से मेरे निजी और घरेलू मामलों में हस्‍तक्षेप कर रहे हैं। दयाशंकर का आरोप है कि अंकुर के चलते ही उनके घर भारी पारिवारिक और दाम्‍पत्‍य संकट आ गया था। इतना ही नहीं, अंकुर को इस मामले से बाहर रहने की हिदायत दी गयी, लेकिन अंकुर अपनी करतूतों से बाज नहीं आये। दयाशंकर का कहना है कि मेरे साले के पारिवारिक संबंध तोड़ने और उसके तलाक पर भी उनका हाथ था और मेरे तमाम विरोधों के बावजूद यह तलाक करा दिया गया। मेरे ससुराल वाले पूरा प्रपंच अंकुर के घर पर ही करते थे। यह सब सहन कैसे किया जा सकता है। मेरे ठेकेदार ससुर को ठेके दिलाने में भी अंकुर सहयोग करते थे। घटना के समय वे पीजीआई से लौटे थे और इसी बीच उनसे कहासुनी हो गयी। अंकुर के साथ मारपीट की वारदात से दयाशंकर सिंह पूरी तरह खारिज करते हैं और पुलिस में रिपोर्ट में लिखी गयी बातें मनगढंत हैं। दयाशंकर सिंह का कहना है कि अंकुर को समझाने के लिए उन्‍होंने ब्रजेश शुक्‍ला और सुभाष मिश्र नामक पत्रकारों से बात भी की थी।

इस पूरे प्रकरण में कालोनी के निवासियों का नजरिया दयाशंकर सिंह के खिलाफ है। एक अध्‍यासी ने बताया कि दयाशंकर सिंह और उनकी पत्‍नी के बीच पिछले कुछ बरसों से मारपीट शुरू हो गयी थी। यह मार-पिटाई अक्‍सर बर्बरता की सीमा तक पार हो जाती थी। बताते हैं कि एक बार तो दयाशंकर सिंह ने अपनी पत्‍नी को लाठियों से पीट दिया और उस हादसे में उनकी पत्‍नी बेहोश हो गयी थीं। कालोनी के लोग दयाशंकर सिंह को नेता जानकर मामले में बोलते ही नहीं थे, लेकिन तब अंकुर ने ही हस्‍तक्षेप किया था। वैसे दयाशंकर सिंह की छवि शुरू से ही हथछुट छात्र-नेता सरीखी ही रही है। कई बार तो शादी जैसी पार्टियों में दयाशंकर सिंह ने कई लोगों को बुरी तरह पीटा था। कालोनी में रहने वाले एक पत्रकार ने बताया कि दयाशंकर सिंह मूलत: आपराधिक चरित्र का शख्‍स है। एक अन्‍य निवासी को आश्‍चर्य होता है कि दयाशंकर जैसे शख्‍स के साथ अंकुर की निकटता और घनिष्‍ठता कैसे हुई।

दरअसल, दयाशंकर सिंह और अंकुर के बीच कभी बेहद प्रगाढता थी। कुछ साल पहले एलटी शिक्षकों की भर्ती के परीक्षापत्र को लीक कराने का आरोप जब दयाशंकर सिंह पर आया था तो अंकुर ने ही दयाशंकर को बचाने के लिए हरचंद कोशिशें की थीं। इस घटोले में करोड़ों रुपयों की लूट हुई थी और भाजपा समेत कई दलों के नेताओं का हाथ शामिल था। पुलिस ने तब उत्‍तर प्रदेश समेत कई प्रदेशों से बड़ी गिरफ्तारी की थी। जानकार बताते हैं कि अंकुर ने तब दयाशंकर सिंह से अपनी मित्रता निभाते हुए हवाईअड्डे तक उसे छिपा कर पहुंचाया था। मुख्‍य राजनीति में दयाशंकर सिंह को ढंग से पटरी पर लाने के लिए भी अंकुर ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अंकुर की पत्‍नी और दयाशंकर सिंह की पत्‍नी गहरी सहेलियां हैं। लेकिन हाल ही में जब दयाशंकर सिंह के निजी घरेलू रिश्‍तों में खटास-खमीर उठा, तो दयाशंकर के साथ दोस्‍ती अंकुर की दोस्‍ती भस्‍मीभूत हो गयी। दुश्‍मनी दो महीना पहले तब भड़क गयी जब आपसी मारपीट की घटना के बाद दयाशंकर सिंह की पत्‍नी अपने दो बच्‍चों के साथ मायके चली गयीं।

अंकुर बताते हैं कि दयाशंकर सिंह इस कालोनी में पिछले दस-ग्‍यारह बरसों से अवैध रूप से काबिज हैं। पहले इस कालोनी में दयाशंकर सिंह के कब्‍जे में दो मकान थे, लेकिन एक विवाद के बाद दयाशंकर सिंह ने एक मकान को खाली कर दिया था। लेकिन हैरत की बात है कि सरकारी मकान पर अवैध रूप से 11 बरसों से काबिज दयाशंकर सिंह को इस भवन को खाली कराने की जरूरत राज्‍य सम्‍पत्ति विभाग ने नहीं समझी। उधर पुलिस चौकी इंचार्ज का कहना है कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के निर्देशों के मुताबिक जब तक किसी मामले की जांच पुलिस नहीं करती है, तब तक किसी भी वांछित आरोपित पर कार्रवाई करा पाना पुलिस के लिए सम्‍भव नहीं है।

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर की रिपोर्ट. कुमार सौवीर से संपर्क kumarsauvir@yahoo.com और 09415302520 के जरिए किया जा सकता है.


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यूपी में मुख्यमंत्री की मीटिंग में ये क्या हो रहा है? देखें तस्वीर

यशवंत जी नमस्कार, काफी लम्बे समय बाद आपसे बात हो रही है, पत्रकारिता के लंबरदारों के विरूद्ध आपकी जंग सर्वथा उचित है. कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण नहीं होता. बुराइयां सभी में होती है किन्तु किसी कि कुछ बुराइयों के कारण उसकी अधिसंख्य अच्छाइयों को नज़रंदाज़ करना नितांत मुर्खता है. चलिए अब ओखली में सर दिया ही है, तो क्या डर मूसलों का. आपके प्रकरण में जो कुछ हुआ उसमें लंबरदारों और बाबुशाही का एक गठजोड़ साथ-साथ काम करता  दिखा.

बाबूशाही १५ मार्च २०१२ के बाद से एकदम निरंकुश हो गई है. मुख्यमंत्री को गुमराह कर सिर्फ अपना उल्लू सीधा कर रही है. युवा मुख्यमंत्री को राजनैतिक विरोधियों से लड़ने की बजाय अपनी ऊर्जा अपने नाकारा अधिकारियों से काम निकलवाने में खर्च करनी पड़ रही है.
 
आज मुख्यमंत्री मण्डी परिषद जैसे अहम विभाग की समीक्षा कर रहे थे. मुख्य सचिव, कृषि उत्पादन आयुक्त जैसे बड़े-बड़े अफसर बैठक में थे किन्तु जरा देखिये इस फोटो में, क्या कहीं से भी लग रहा है कि मुख्यमंत्री की समीक्षा बैठक में ये अधिकारी बैठे हैं. एक अधिकारी फ़ोन पर बतकही करने में मशगूल हैं. दूसरा किसी अधिकारी से बात कर रहा है. एक सज्जन फाइल निपटा रहे हैं और इन सबसे अलग मुख्यमंत्री बेचारगी से सबका मुंह ताक़ रहे हैं.
 
याद करिये मायावती की बैठकों को जहां अफसरों को फोन पर बात करना तो दूर बैठक में फ़ोन ले जाने तक की अनुमति नही थी. तो क्या निरंकुश नौकरशाही ऊर्जावान युवा मुख्यमंत्री की सज्जनता और सहृदयता का नाजायज फायदा उठा रहे हैं? शायद हाँ!

क्रान्ति किशोर मिश्र

ब्यूरो प्रमुख

सुदर्शन टीवी न्यूज़

लखनऊ (उत्तर प्रदेश)

आलोक का कहानी संग्रह लोकार्पित, ज़ैग़म का उपन्यास 27 को होगा लोकार्पित

जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में नौवें विश्व हिंदी सम्मलेन के दूसरे दिन चित्रा मुद्गल और उदय प्रकाश ने कवि-पत्रकार आलोक श्रीवास्तव के पहले कहानी संग्रह 'आफरीन' का विमोचन किया. मानवीय रिश्तों पर आधारित कहानियों के इस संग्रह को राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है और इसकी भूमिका डॉ नामवर सिंह ने लिखी है.

उधर, पत्रकार ज़ैग़म इमाम के दूसरे उपन्यास "मैं मुहब्बत" का 27 सितंबर को बनारस के काशी विद्यापीठ में लोकार्पण है। डॉ. काशीनाथ सिंह इसे लोकार्पित करेंगे। ज़ैग़म ने अनुरोध किया है कि इस कार्यक्रम में लोग ज्यादा से ज्यादा संख्या में शिरकत करें.
 

सपा सरकार में ईमानदारी और मेहनत का ईनाम तबादला!

समाजवाद की राह पर चलने और सामाजिक न्याय दिलाने का ढिंढोरा पीटने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार में ईमानदार और मेहनतकश अधिकारियों को ईनाम के रूप में तबादला हासिल हो रहा है। इसका जीवंत उदाहरण उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार द्वारा सोनभद्र के जिलाधिकारी सुहाष एल.वाई को उनके पद से हटाकर प्रतीक्षारत सूची में डालना है। उत्तर प्रदेश सरकार ने शुक्रवार को सुहाष एल.वाई. को सोनभद्र के जिलाधिकारी पद से हटा दिया। शासन के इस कदम से जनपद के मूल बाशिंदों को मायूसी हाथ लगी है, जबकि खनन माफियाओं और उनके संरक्षक सफेदपोशों के चेहरे खिल उठे हैं।

गौरतलब है कि कुपोषण, भुखमरी, प्रदूषण और पेयजल की किल्लत आदि समस्याओं से जूझ रहे सोनभद्र के बाशिंदों को सुहाष एल.वाई. के रूप में अरसे बाद एक जिलाधिकारी मिले थे, जो अपनी ईमानदारी और मेहनत के बल पर कम समय में ही उनके दिलों में अपनी जगह बना ली थी। 27 फरवरी, 2012 को जनपद के बिल्ली-मारकुंडी खुनन क्षेत्र में स्थित शारदा मंदिर के पीछे हुए हादसे में करीब एक दर्जन मजदूरों की मौत के बाद सुहाष एल.वाई ने जिस तरह से अवैध खनन के खिलाफ अपना रुख अख्तियार किया, वह आम आदमी के बीच प्रशंसा का विषय बन गया था, लेकिन खनन माफियाओं और उनको संरक्षण प्रदान कर रहे सफेदपोशों के लिए सिरदर्द। ऐसे सफेदपोशों में प्रदेश की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी के कुछ बड़े राजनेता भी शामिल हैं। इनमें कुछ तो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के रिश्तेदार भी हैं। हालांकि वे इन दोनों नेताओं के खुद के परिवार के नहीं हैं।

सुहास एल.वाई. के तेवर को देखकर खनन माफियाओं और उनको संरक्षण प्रदान कर रहे सफेदपोशों की चिंताएं बढ़ गई थीं और वे उनपर शासन से दबाव बना रहे थे।
जैसे-जैसे खनन हादसे की जांच आगे बढ़ रही थी, वैसे-वैसे खनन माफियाओं और उनके संरक्षक नौकरशाहों व सफेदपोशों के दिलों की धड़कनें तेज हो रही थीं। ऐसे नौकरशाहों में एक लखनऊ के पंचम तल में बैठे सोनभद्र के पूर्व जिलाधिकारी पनधारी यादव भी हैं, जिनके कार्यकाल में यहां पत्थर की खदानें मौत का कुआं बन गईं और जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड सरीखी कंपनियां सैकड़ों एकड़ वनभूमि की मालिक।

सोनभद्र की खनिज संपदा को लूटने वाले भू-माफियाओं, खनन माफियाओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और उनके संरक्षक सफेदपोशों का गुट हर हालत में सुहाष एल.वाई. को सोनभद्र के जिलाधिकारी पद से हटाकर जनपद में अवैध खनन के कारोबार को शुरू कराना चाहता था, जिसे फरवरी महीने में हुए खनन हादसे के बाद बंद कर दिया गया था। आखिरकार शुक्रवार को वे अपने मंसूबे में कामयाब हो गए। गरीबों और किसानों को हितैषी बताने वाली समाजवादी पार्टी की सरकार ने शुक्रवार को सुहाष एल. वाई को सोनभद्र के जिलाधिकारी पद से हटा दिया, क्योंकि अगर सरकार 30 सितंबर, 2012 तक उनको नहीं हटा पाती तो चुनाव आयोग के निर्देशानुसार उन्हें उस समय तक नहीं हटा पाती जबतक राज्य में निर्वाचन आयोग का अभियान चलता। अखिलेश सरकार ने अपने इस कदम से यह साफ कर दिया है कि वास्तव में एक ईमानदार और कर्मठ अफसर पर माफिया और पूंजीपति भारी हैं।

सोनभद्र से शिव दास की रिपोर्ट

सी एक्सप्रेस और सी न्यूज चैनल में वेतन मिलने में देरी

आगरा से प्रकाशित हिन्दी दैनिक द सी एक्सप्रेस में अगस्त माह का वेतन करीब २० दिन की देरी से मिलने पर कर्मचारियों में आक्रोश है. कुछ लोगों का कहना है कि संस्थान नुकसान में है और बंद होने के कगार पर है. ऐसे में कर्मचारियों ने नए संस्थानों की ओर रुख करना शुरू कर दिया है.

कमोबेश यही हाल सीटीवी और सीन्यूज चैनल का भी है. वहां भी वेतन भुगतान में देरी को लेकर कर्मचारियों द्वारा अटकलें लग रही हैं. वहां से भी कई कर्मी डेन केबल की ओर जाने की तैयारी में हैं. मजे की बात यह है कि २२ सितंबर तक द सी एक्सप्रेस के एनई और ब्यूरो कर्मियों का वेतन भुगतान नहीं हो पाया है. इससे ब्यूरो रिपोर्टरों ने कार्य करने में असमर्थता जताई है. संस्थान प्रमुख इस मामले में हर बार कर्मियों को गोली दे रहे हैं.

सी एक्सप्रेस के एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

महुआ न्यूज, झारखंड के स्ट्रिंगर पेमेंट के लिए हड़ताल पर!

महुआ न्यूज़, झारखण्ड के स्ट्रिंगरों के हड़ताल पर जाने की सूचना है. प्रबंधन द्वारा पिछले १० माह से वेतन न दिए जाने से नाराज झारखण्ड के स्ट्रिंगरो ने रांची कार्यालय में धरने पर बैठने और काम न करने का निर्णय लिया है. महुआ न्यूज़ के मालिक पीके तिवारी के जेल चले जाने के बाद महुआ न्यूज़ की हालत पतली हो गयी है और झारखण्ड के स्ट्रिंगरो के पैसे कौन देगा,  इसका जबाब न तो प्रबंधन के पास है, न ही महुआ न्यूज़ में काम कर रहे कार्यालय में बैठे बड़े अधिकारियों के पास.

झारखण्ड के स्ट्रिंगरो में इस बात को भी लेकर नाराजगी है कि उनके वेतन को रोक कर बिहार के स्ट्रिंगरों को दो महीने का वेतन दिया गया जबकि झारखण्ड के  स्ट्रिंगरों का वेतन १० महीने से रोक कर रखा गया है. इससे पहले भी महुआ न्यूज़लाइन के कर्मचारियों ने नोएडा कार्यालय में धरना देकर अपनी मांगें मंनवाई थी और बकाया वेतन लिया था. अब इसी तर्ज पर झारखण्ड के स्ट्रिंगरो ने भी प्रबंधन से आरपार की लड़ाई लड़ने की ठानी है. इस बाबत कुछ दिन पहले स्ट्रिंगरों ने अपनी हालत से संबंधित एक पत्र झारखंड के ब्यूरो हेड अरविंद पांडे को लिखा. नोएडा आफिस के वरिष्ठों का भी ध्यान आकर्षित किया गया है. पर किसी की तरफ से कोई रिस्पांस नहीं है. ऐसे में स्ट्रिंगरों ने हड़ताल की तैयारी कर ली है.

सांध्य दैनिक नभ छोर को रोहतक से हुड्डा ने किया लांच

रोहतक : हिसार का सांध्य दैनिक नभ छोर अब रोहतक से भी लांच हो गया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एक समारोह में इस अखबार के रोहतक के पहले अंक का विमोचन किया। नभ छोर सांध्य दैनिक का हरियाणा के बाकी जिलों में भी विस्तार की योजना है। इसके तहत पहले रोहतक का अंक लांच किया गया है।

इस अखबार के कर्ताधर्ता मुख्य संपादक ऋषि सैनी हैं, जो पहले एक अंग्रेजी अखबार होम पेजिज भी निकाल चुके हैं। रोहतक में इस अखबार के समाचार संपादक की जिम्मेदारी सोमदेव कौशिक को सौंपी गई है, जो दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर समेत अनेक अखबारों में अपनी कार्यक्षमता दिखा चुके हैं। इसके अलावा उनकी रिपोर्टिंग टीम में मनोज प्रभाकर, महेश चुघ व रत्न चंदेल आदि शामिल हैं। नभ छोर समाचार पत्र के मैनेजिंग डायरेक्टर पुष्पेंद्र सेठी ने मुख्य अतिथि सहित सभी अंगतुकों का स्वागत व आभार व्यक्त किया।

रोहतक से दीपक खोखर की रिपोर्ट

नया गांव के ग्रामीण अब दैनिक जागरण अखबार नहीं पढ़ेंगे

: प्रदूषण की खबर न छापने पर ग्रामीणों ने जागरण अखबार को सरेआम जला दिया :  मुंगेर (बिहार) : आईटीसी लिमिटेड (सिगरेट बनानेवाली देश की प्रमुख कंपनी) के कारण आसपास के गांवों में विद्यमान जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण से परेशान नया गांव के ग्रामीणों के प्रदर्शन की खबर नहीं छापने पर क्रोधित ग्रामीणों ने मुंगेर शहर के गुलजार पोखर मोहल्ला स्थित दैनिक जागरण कार्यालय के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया और दैनिक अखबार के पक्षपातपूर्ण रवैया की भर्त्सना की।

ग्रामीणों ने दैनिक जागरण कार्यालय के समक्ष दैनिक जागरण अखबार की सैकड़ों प्रतियों को सरेआम विरोध स्वरूप जला दिया। अखबार जलाने के बाद कोतवाली पुलिस भी घटनास्थल पर पहुंचकर जांच शुरू कर दी है।

क्रोधित ग्रामीण नारा  लगा रहे थे–'दैनिक जागरण प्रबंधन ग्रामीणों की मांगों की उपेक्षा बन्द करे', 'दैनिक जागरण मुर्दाबाद' आदि। ग्रामीणों ने घोषणा की है कि चूंकि दैनिक जागरण ने ग्रामीणों की जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की पीड़ा से जुड़ी खबरों को अखबार में जगह नहीं दिया, इसलिए ग्रामीण भविष्य में दैनिक जागरण का बहिष्कार करेंगे। नया गांव के ग्रामीण अब से दैनिक जगारण अखबार नहीं पढ़ेंगे।

ग्रामीण शंकर चैधरी और शंकर साव ने बताया कि आईटीसी कंपनी की गलत नीति के कारण आसपास के ग्रामीण प्रदूषित जल पी रहे हैं। चापाकल का पानी हरा रंग का हो गया है। कंपनी के पाताल बोरिंग के कारण आसपास के अनेक गांवों के सभी चापाकल बेकार हो गये हैं। 21 सितंबर को क्रुद्ध ग्रामीणों ने आईटीसी लिमिटेड के मुख्य गेट को दो घंटे तक जाम कर दिया था और जल प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण से ग्रामीणों को निजात दिलाने की मांग की थी।

इस प्रकरण की खबरें दैनिक जागरण ने नहीं प्रकाशित की क्योंकि कहा जा रहा है कि यह अखबार आईटीसी कंपनी के प्रभाव में है और उसे कंपनी से काफी पैसा खिलाफ खबरें न छापने के लिए मिलता है। साथ ही कंपनी कई अन्य रूप में दैनिक जागरण को लाभ देती है, इसलिए जागरण प्रबंधन कंपनी के विरोध में कोई खबर नहीं छापता।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट

आज समाज से इस्तीफा देकर आशुतोष कल्पतरु एक्सप्रेस से जुड़े

आज समाज, अम्बाला के डिप्टी न्यूज एडिटर (डीएनई) आशुतोष प्रताप सिंह ने बीते दिनों इस्तीफ़ा दे दिया. खबर है कि इन्होंने अब आगरा से प्रकाशित होने वाले हिंदी दैनिक ''कल्पतरु एक्सप्रेस'' में बतौर वरिष्ठ समाचार संपादक ज्वाइन कर लिया है. आशुतोष ने कैरियर की शुरुआत पंजाब के एक अख़बार अजीत समाचार से की थी. उसके बाद ९ माह तक भास्कर में रहे और फिर आज समाज, अम्बाला में.

अपनी सूचनाएं भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाएं.

साधना न्यूज से एंकर रोहित पुनेठा का इस्तीफा, टोटल टीवी पहुंचे

साधना न्यूज में आने-जाने का दौर जारी है. सूचना है कि साधना न्यूज के एंकर-प्रोड्यूसर रोहित पुनेठा ने इस्तीफा दे दिया है. ये साधना ग्रुप से वर्ष 2008 से जुड़े हुए थे. रोहित ने नई पारी की शुरुआत टोटल टीवी में एंकर और प्रोड्यूसर के रूप में की है.

अगर आपने भी कहीं ज्वाइन किया है, कही से इस्तीफा दिया है तो भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

इंडिया न्यूज, राजस्थान से नितिन शर्मा का इस्तीफा

कोटा : इंडिया न्यूज, राजस्थान की लांचिंग से जुड़े संवाददाता नितिन शर्मा ने 22 सितंबर को संस्थान को अपना इस्तीफा सौंप दिया है. नितिन कोटा में सवांददाता के तौर पर काम कर रहे थे और इस दौरान उन्होंने कोटा शहर में कई बड़े स्टिंग आपरेशन किए.

युवतियों की खरीद फरोख्त का मामला, थर्मल में चल रहा राख का खेल, बीज गोदाम के घोटालों को नितिन ने ही उजागर किया था. प्रदीप आजाद के बाद नितिन का संस्थान से जाना संस्थान के लिए नुकसान के रूप में देखा जा रहा है, खासतौर से कोटा सेंटर से.

खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता का मुहतोड़ जवाब देना होगा

हाल ही में छतीसगढ़ में चैदह लोगों को माओवादी बता कर गोलियों से छलनी कर दिया गया। थोड़ा पीछे जाएं तो गुजरात में इशरत जहां का वो फर्जी इनकाउंटर याद कीजिए। सिर्फ यही दो घटनाएं नहीं बल्कि देश भर में फेक इनकाउंटर हो रहे हैं। कहीं आदिवासियों को माओवादी कहकर मारा जा रहा है तो कहीं मुसलमानों को आतंकी कह कर गोलियों से भूना जा रहा है। ठीक चार साल पहले दिल्ली के बाटला हाउस में भी ऐसे ही मुस्लिम युवकों को पुलिस की गोली का शिकार होना पड़ा था।

वही बाटला हाउस इनकाउंटर जिसको कांग्रेस के ही महासचिव दिग्गविजय सिंह ने फर्जी इनकाउंटर बताया है। लेकिन इस इनकाउंटर के बाद भी पूरे देश से निर्दोष मुसलमान नौजवानों को पुलिस द्वारा पकड़ा जाना बंद नहीं हुआ है। सिर्फ आजमगढ़ से सात नौजवानों को गायब कर दिया गया तो वहीं बिहार के दरभंगा से लगातार नौजवानों को पकड़ा जा रहा है। यहां तक कि एक नौजवान कतील सिद्दकी की पूने जेल में हत्या भी कर दी गयी। वहीं भारतीय खुफिया एजेंसियों ने दरभंगा बिहार के रहने वाले इंजीनियर फसीह महमूद को सउदी अरब के उनके घर से उनकी पत्नी निकहत परवीन के सामने से उठा लिया। जिन पर कोई तार्किक आरोप तक भारत सरकार नहीं लगा पायी है। बावजूद इसके भारत सरकार उनकी पत्नी को फसीह महमूद से मिलने तक नहीं दे रही है। इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में सीबीआई ने आईबी की भूमिका को जांच के दायरे में लाने का काम किया।

सरकार या कहें कि खुफिया एजेंसियों का सबसे दुखद और दमनकारी चेहरा उस समय सामने आता है जब इन फर्जी गिरफ्तारियों का विरोध कर रहे पत्रकार एसएमए काजमी को आतंकी कहकर पकड़ लिया जाता है। इसी तरह हाल ही में इन सवालों को लेकर काम कर रहे मानवाधिकार संगठन आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों का रिहाई मंच की ओर से बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ की चैथी बरसी पर लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में आयोजित कांग्रेस-सपा और खुफिया एजेंसियों की साम्प्रदायिकता के खिलाफ सम्मेलन को पुलिसिया दबाव बना के विफल करने की कोशिश की गई। हालांकि अपने नापाक मंसूबे में वे कामयाब नहीं हो पाए। लेकिन फिर भी सवाल उठना लाजिमी है कि जिस कार्यक्रम के बारे में लगभग सभी अखबार, मुख्यमंत्री से लेकर तमाम बड़े अफसर और नेताओं को पहले से जानकारी भेजी जाती हो, जो कार्यक्रम सार्वजनिक जगह यूपी प्रेस क्लब में हो रहा हो वहां इतनी संख्या में पुलिस की तैनाती की क्यों जरुरत आन पड़ी। पुलिस को जवाब देने की जरुरत है कि आखिर ऐसी कौन सी आफत आन पड़ी कि एक पूरी तरह से अहिसंक और शहर के सम्मानित बुद्धिजिवियों की उपस्थिति वाले इस कार्यक्रम में पुलिसिया पहरा बिठाना पड़ा। पुलिसिया पहरा न सिर्फ प्रेस क्लब के भीतर था बल्कि क्लब के आसपास और सामने वाले पार्क में भी भारी संख्या में पुलिस मौजूद थी। कार्यक्रम में हिस्सा लेने आए लोगों को ये पुलिस वाले ऐसे देख रहे थे मानों कितने बड़े गुनहगार हैं यह सब।

इसी कार्यक्रम में एक प्रस्ताव भी पास किया गया जिसमें कहा गया कि खुफिया एजेंसियों के द्वारा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों पर दी जा रही रिपोर्ट को आरटीआई के दायरे में लाया जाय। इस स्थिति में ये बहुत हास्यास्पद स्थिति है कि खुफिया विभाग के साम्प्रदायिकता के खिलाफ किये जा रहे सम्मेलन में खुद खुफिया विभाग के लोग मौजूद थे और फिर यही लोग सरकार को इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी सौपेंगे। ऐसे में उस रिपोर्ट की निष्पक्षता पर कितना विश्वास किया जा सकता है। दरअसल ये पूरा मामला सत्ता के टेकओवर का है। आज स्थिति ये है कि देश की सत्ता को खुफिया विभाग वालों ने टेकओवर कर रखा है। देश के खुफिया विभाग को कोई जनतांत्रिक सरकार नहीं चलाती बल्कि ये सीआईए, मोसाद और इन्टरपोल से सीधे संचालित होने लगीं हैं और सुरक्षा संबंधी आन्तरिक नीतियों को वैसे ही नियंत्रित करने लगीं हैं जैसे देशी-विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियां हमारी आर्थिक नीतियां नियंत्रित करती हैं। जिसका नजारा बारबार हम कोडनकुलम, छतीसगढ़, झारखण्ड से लेकर नर्मदा घाटी में देख सकते हैं। तब यह मांग उठना जायज ही है कि इन खुफिया एजेंसियों को मिलने वाले आर्थिक लाभ की भी जांच होनी चाहिए। भारतीय मीडिया भले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को व्यव्सथा बिगाड़ू चरित्र का बताती हो। सच्चाई ये है कि खुद भारतीय खुफिया एजेंसियां भी उसी चरित्र की हैं। इन्हीं के दबाव में देशद्रोह जैसे काले कानून को हटाने का साहस कोई भी सरकार नहीं कर पायी है।

लेकिन कुछ है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी, कि चाहे लाख कोशिश कर लो दबाने की हमें। सम्मेलन के आरम्भ में ही रिहाई मंच के राजीव यादव ने पुलिस के सामने ही उन्हें ललकारने के तेवर के साथ जब खुफिया एजेंसियों और पुलिस विभाग को बेनकाब करना शुरु किया तो सम्मेलन कक्ष में मौजूद पुलिस वाले बगले झांकने लगे और थोड़ी देर में ही कक्ष से बाहर खिसक लिये। फिर भी ये सवाल मौजूं है कि क्या हम सच में एक फासिस्ट और हिटलरशाही वाले लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं?

लेखक अविनाश कुमार चंचल मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल से जुड़े हुए हैं.

पटियाला में गठित हुआ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एसोसिएशन

 

गुरुद्वारा श्री दुख निवारण साहिब में शनिवार को इलेक्ट्रानिक मीडिया कर्मियों की एक बैठक हुई। इस दौरान पटियाला इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोसिएशन गठित कर पदाधिकारियों का चयन किया गया।
 
इस दौरान कुलवंत सिंह प्रधान, रवि आजाद सीनियर उपप्रधान, सुभाष पटियालवी व अनिल ठाकुर उप प्रधान, बलविंदर सिंह महासचिव, इंदरजीत सिंह व अवतार सिंह सहायक सचिव, रमनीश घई प्रेस सचिव, इरविंदर सिंह व मुनीश कौशल वित्त सचिव चुने गए।
 
इसके अलावा रविंदर, मनोज शर्मा, जसपाल, अविनाश कंबोज, वरिंदर सैनी और तेजिंदर सिंह विभिन्न पदों के लिए चुने गए। पूर्व एसजीपीसी अध्यक्ष किरपाल सिंह बडूंगर ने सभी पदाधिकारियों को मुबारकबाद व शुभकामनाएं भी दीं। (दैनिक जागरण)
 

हिंदुस्तान, देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार अविकल थपलियाल का इस्तीफा

लगभग दो दशक से दैनिक हिंदुस्तान में कार्यरत रहे अविकल थपलियाल ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे सभी को चौंका दिया। तेज-तर्रार रिपोर्टर में शुमार अविकल थपलियाल ने शुक्रवार को इस्तीफा दे दिया। हिंदुस्तान के लिए ये एक गंभीर झटका माना जा रहा है। अविकल थपलियाल एक दशक से देहरादून में हिंदुस्तान की रीढ़ बने हुए थे, और स्टाफ कर्मियों में भी काफी सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे हैं। हिंदुस्तान के पटना, लखनऊ और देहरादून में अपनी विशिष्ट लेखन शैली के जरिए अपना एक विशेष पाठक वर्ग बना लिया था, १९९६ में लखनऊ एडीशन की लॉचिंग टीम के भी खास सहयोगी रहे। हिंदुस्तान का लखनऊ एडीशन सुनील दुबे ने लांच किया था।

वर्तमान में अविकल थपलियाल देहरादून एडीशन में ब्यूरो चीफ की पोस्ट पर थे, थपलियाल एक त्यागपत्र से हिंदुस्तान एडीटोरियल और प्रबंधन में भारी हलचल देखी जा रही है। २००८ में देहरादून एडीशन की लॉचिंग में थपलियाल ने अहम भूमिका निभायी थी। अपने हाई पॉलिटिकल और ब्यूरोक्रेटिक रिलेशन के चलते अविकल थपलियाल ने एचटी मैनेजमेंट के कई जटिल कार्य आसानी से करवा दिए थे, एचटी यूनिवर्सिटी के लिए अविकल ने तत्कालीन सीएम खंडूड़ी को मनाने में भी मुख्य रोल अदा किया था। थपलियाल की कोशिशों के बाद के बाद ही तत्कालीन सीएम खंडूड़ी और शशि शेखर की मुलाकात हो पायी थी। इसके अलावा मैनेजमेंट के ओर से दिए गए सभी बड़े और छोटे काम के लिए अविकल थपलियाल का ही सहारा लिया जाता रहा है।

२०११ में लखनऊ से आने के बाद थपलियाल ने खास खबरों के जरिए हिंदुस्तान को कम समय में ही पाठकों के बीच लोकप्रिय बना दिया था। उजाला और जागरण ने भी कई बार थपलियाल को अपने पाले में खींचने की कोशिश की थी लेकिन थपलियाल की निष्ठा हिंदुस्तान के साथ ही बनी रही।

थपलियाल के नाम दर्जनों सटीक पॉलिटिकल भविष्यवानियों का रिकार्ड है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के १० विधायक के टिकट कटने की खबर थपलियाल ने ही ब्रेक की थी। इसके अलावा इसी साल विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री होने, पूर्व विधायक नारायण पाल राजकुमार के कांग्रेस में शामिल होने और मुन्ना और मधु चौहान के बीजेपी में शामिल होने समेत कई खबरे पहले ही प्रकाशित कर दी थी। लखनऊ में कतरन और देहरादून में राजदरबार कॉलम के मुख्य पत्र चैतू के जरिए सत्ताधारियों व ऊंचे पदों पर बैठे लोग और आम जनता को खूब झकझोरा।

अविकल थपलियाल अपनी नयी पारी कहां से शुरू करेंगे इस पर चर्चाएं चल रही है। फिलहाल अविकल थपलियाल प्रिंट मीडिया से जुड़ने के बहुत इच्छुक नहीं जताए जा रहे हैं। सूत्र बता रहे हैं कि आजकल थपलियाल स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं।

झूठे हैं पाकिस्तानी अख़बार, अब नहीं बिकेंगे अफगानिस्तान में

अफ़ग़ानिस्तान हुकूमत ने पाकिस्तान से वहां पहुंचने वाले सारे अख़बारों पर प्रतिबंध लगा दिए हैं. आंतरिक मंत्रालय ने पुलिस को हुक्म दिया है कि वो मुल्क के पूर्व में पाए जाने वाले सभी पाकिस्तानी अख़बारों की कापियां ज़ब्त कर ले.

 
मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तानी समाचारपत्र "तालिबान के प्रवक्ताओं के विचारों को फैलाने का एक ज़रिया हैं." अफ़ग़ानिस्तान ने अख़बारों के ख़िलाफ़ ये क़दम तब उठाया है जब पाकिस्तान के साथ उसके रिश्तों में पहले से ही तनाव है.
 
अफ़ग़ान आंतरिक मंत्रालय ने पुलिस से कहा है कि वो तोरखाम सीमा प्रवेश पर विशेष रूप से ध्यान रखे. तोरखाम एक व्यस्त बार्डर है. मंत्रालय ने पुलिस को कहा है कि वो तीन पूर्वी प्रांतो नंगरहार, कुनार, और नूरिस्तान में पाकिस्तानी अखबारों ज़ब्त कर ले.
 
मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तानी अखबारों में ख़बर "वास्तविकता पर आधारित नहीं है और यह हमारे देश के पूर्वी प्रांतो में रह रहे शहरियों के लिए चिंता पैदा कर रही हैं."
 
संवाददाताओं का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में सीमा पार से होने वाली हिंसा एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बन गया है, ख़ासतौर पर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान और तालिबान के संबंध पुराने हैं.
 
गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री ज़ल्माई रसूल ने कहा कि सीमा पार से हुए हमलों में काफ़ी नागरिकों की मौतें हुई हैं.
 
 
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सीमा के आरपार हुई गोलाबारी से लगभग 4,000 विस्थापित हो गए हैं. पिछले महीने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करज़ई और उनके पाकिस्तानी समकक्ष आसिफ अली जरदारी ने गोलीबारी की जांच के लिए एक संयुक्त सैन्य प्रतिनिधिमंडल भेजने पर सहमति जताई थी.
 
पाकिस्तान का कहना है कि उसके इलाक़े में हिंसा तालिबान के उस समूह के ज़रिए की जा रही हैं जिसने अफ़ग़ानिस्तान में पनाह ले रखी है. उसका कहना है कि वो उन चरमपंथियों को निशाना बना रहा है जिन्होंने पड़ोसी मुल्क में ठिकाने बना लिए हैं. (बीबीसी)

मेरे पसंदीदा अभिनेता रहे हैं दिनेश ठाकुर जी

: कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है : रजनीगंधा में उन पर फ़िल्माया गया वह गीत भी मेरा पसंदीदा गीत है। कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है, मन तोड़ने लगता है अनजानी प्यास के पीछे, अनजानी आस के पीछे.., मन दौड़ने लगता है…. इस गीत में बेपरवाही से उन का सिगरेट पीना, और विद्या सिनहा का हाथ छूने की बेपरवाह कोशिश… पर वह उन का हाथ तो क्या टैक्सी की सीट पर पसरा पल्लू भी नहीं छू पाते, मन भागता रहता है।

जब-जब लगता है कि वह अब हाथ छूने में सफल हो रहे हैं तभी-तभी विद्या सिनहा अचानक हाथ उठा लेती हैं, अनायास ही। कई-कई बार ऐसा होता है। चलती टैक्सी में एक हाथ से सिगरेट पीते और दूसरे हाथ से हवा से रह-रह लहराते विद्या सिनहा के आंचल और हाथ को बार-बार छूने की उन की कोशिश का वह अछूता और अनूठा अभिनय अभी भी संकोच की उस इबारत को मन से उतरने नहीं देता। पहले प्यार की आकुलता आदमी को कैसे तो भला जीवन भर आग के हवाले किए रहती है। कि आदमी एक स्पर्श भर की प्यास लिए आजीवन उस की आग में तिल-तिल कर जलता रहता है। मुकेश के गाए इस गाने में दिनेश ठाकुर ने इसी आग को जिया था। पूरे संकोच और पूरी शिद्दत के साथ। जो भुलाए नहीं भूलती।

मन्नू भंडारी की कहानी यही सच है पर बनी बासु चटर्जी निर्देशित इस फ़िल्म के नायक भले अमोल पालेकर थे पर याद तो दिनेश ठाकुर, विद्या सिनहा और यह गाना ही रहा। उन के सिगरेट पीने का वह अंदाज़ जैसे मन में कई-कई तनाव के तार बो देता था। यह सत्तर का दशक था। सत्तर के दशक का आखिर ! सिगरेट, मुकेश का गाया वह गाना और दिनेश ठाकुर का वह बेतकल्लुफ़ अंदाज़ ! उन की वह मासूम अदा हमें भी तब भिगो देती और सिगरेट के धुएं में हम भी अपनी जानी-अनजानी आग और अपनी जानी-अनजानी प्यास के पीछे भागने से लगते। मन की सीमा टूटने सी लगती। बार-बार टूटती।

रजनीगंधा के बाद वह फिर दिखे घर में रेखा और विनोद मेहरा के साथ। सामूहिक बलात्कार की शिकार रेखा के इलाज के लिए एक संवेदनशील डाक्टर के रुप में। फिर रेखा, ओम पुरी और नवीन निश्चल के साथ आस्था में। जितनी कम फ़िल्में उन के पास हैं, उतने ही कम दृष्य भी उन के पास फ़िल्म में होते थे। पर सीमित और संक्षिप्त भूमिका में भी वह प्राण फूंक देते थे। थिएटर उन का फ़र्स्ट लव था। इसी लिए वह फ़िल्में कम करते थे।' थिएटर में ‘जिन लाहौर नही वेख्या’ से वह चर्चा के शिखर पर आ गए थे। हो सकता है कि उन को बहुत कम लोग जानते हों पर हमारे जैसे थोड़े से जो लोग उन्हें जानते है, दिल से जानते हैं। अभी जब उन के निधन की खबर मिली तो दिल धक से रह गया।

कई बार यूं ही देखा है, ये जो मन की सीमा रेखा है का तनाव जीते हुए ही हम जवान हुए थे। आज अधेड़ होने पर भी यह गाना जब कभी सुनने को मिल जाता है तब भी सचमुच मन फिर से अनजानी प्यास और अनजानी आस के पीछे दौड़ने लगता है और एक तनाव-तंबू मन में पसर जाता है। उन को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि !

लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

”साक्षी” के विमोचन के बहाने दयानंद पांडेय का यात्रा वृत्तांत

: बबूल के समुद्र की चुभन, साक्षी, पुष्कर और ख्वाज़ा की दरगाह उर्फ़ पधारो म्हारो देश! : बहुत सुनता था यह गाना, 'पधारो म्हारो देश!' तो गया अबकी राजस्थान भी। बुलावे पर ही। उदयपुर की शकुंतला सरुपरिया की सलाह पर भीलवाड़ा के अमिताभ जोशी ने बुलाया था। शकुंतला जी मेरे ब्लाग सरोकारनामा की दीवानी हैं। और वहीं मुझे पढ़ती रहती हैं। पढ़-पढ़ कर अपने तनिमा अखबार में छापती रहती हैं मेरी नई-पुरानी टिप्पणियां आदि। और फ़ेसबुक पर बताती रहती हैं।

शकुंतला जी की सलाह पर एक बार बीती मई में अजमेर में भी एक सम्मेलन में बुलाया गया था। मैंने रिज़र्वेशन भी करवा लिया था आने-जाने का। मन में था कि उनका सम्मेलन भी अटेंड कर लूंगा और अजमेर के पुष्कर में सरोवर और ब्रह्मा जी के दर्शन कर ख्वाज़ा साहब की दरगाह पर मत्था भी टेक आऊंगा। पर अचानक जाना मु्ल्तवी करना पड़ा। वो कहते हैं न कि जब तक ख्वाज़ा साहब का बुलावा न आ जाए, कोई जा नहीं पाता। शायद इसीलिए तब नहीं जा पाया। पर लगता है कि अब की ख्वाज़ा साहब ने बुला लिया। तो भले जयपुर होते हुए भीलवाड़ा गया और बीच में अजमेर भी पडा़। पर जाते वक्त अजमेर से गुज़र गया। ट्रेन से उतरा नहीं। क्योंकि दूसरे दिन भीलवाडा़ में अमिताभ जोशी द्वारा आयोजित कार्यक्रम था। उनकी साक्षी का विमोचन था। साक्षी पत्रिका है कि किताब? वह यह खुद भी तय नहीं कर पा रहे थे। वह कभी किताब बोलते थे कभी पत्रिका। हालांकि पुस्तकाकार रूप में वह पत्रिका ही थी, क्योंकि उस में विज्ञापन भी भरपेट था।

खैर जब उतरा भीलवाडा़ स्टेशन पर तो एक युवा लड़के ने मुझे रिसीव किया। मैं अभी इधर-उधर देख ही रहा था कि वह लड़का मेरे पास भागा-भागा आया और पूछा कि, 'आप पांडेय जी हैं?' तो मैं चौंक पड़ा। बोला कि, 'हां। पर क्यों?' वह लड़का बोला, 'मैं आप को लेने आया हूं। अमिताभ जी ने भेजा है।' कह कर उसने मेरी अटैची उठा ली। कार जब गंतव्य की तरफ चल पड़ी तो मैंने उस नौजवान से कौतूहलवश पूछा कि, 'मुझे कैसे पहचान लिया?' तो वह बोला, 'गूगल पर आपकी फ़ोटो देखी थी।' उस ने जैसे जोड़ा, 'सरोकारनामा पर है ना आप की फ़ोटो।'

'ओह अच्छा हां।' मैंने कहा और पूछा कि, 'तुम सरोकारनामा पढ़ते हो?' तो वह बोला, 'हां।' मैं चक्कर में पड़ गया। फिर उसने बताया कि अमिताभ जी ने इस के बारे में बताया था। और मुझसे कह कर उन्होंने ही गूगल पर सर्च करवाया था। मैं समझ गया कि यह आयोजक की मुझे जानने की एक औपचारिकता भर है। सरोकारनामा पढ़ने-पढाने से उसका कोई वास्ता या रिश्ता नहीं है। वैसे भी वह लड़का जिस का नाम मयंक पारिख है, उदयपुर में टैक्सटाइल की पढा़ई कर रहा है, साहित्य या पढ़ने जैसी और चीज़ों से उस का बहुत नाता-रिश्ता है नहीं। है तो बस इतना ही कि मंगलेश डबराल की तरह ही उस का अटक-अटक कर बोलना। बस! खैर, भीलवाडा़ शहर के एक बाइपास पर बने अग्रवाल धर्मशाला में ले जा कर उस लड़के ने मुझे ठहरा दिया। और बताया कि कल का कार्यक्रम भी इसी जगह होगा। धर्मशाला नई बनी हुई थी। सो साफ-सुथरी थी। होटल के कमरों जितनी ही सुविधाओं से चाक चौबंद। ए. सी. वगैरह सब। बस कहने भर को ही धर्मशाला थी। पर किसी पांच सितारा होटल से भी ज़्यादा खुला-खुला और रौनकदार। बस कारपेट नहीं थी और वेटर भी नहीं थे। बाकी सब।

अभी नहा धो कर बैठे ही थे कि भीलवाड़ा में दैनिक भास्कर के संपादक प्रदीप भटनागर मय दल-बल के आ गए। एक बुके लिए हुए। बडी़ आत्मीयता से मिले। प्रदीप भटनागर ठेठ इलाहाबादी हैं। मैं जब लखनऊ में स्वतंत्र भारत में था तब प्रदीप जी स्वतंत्र भारत में इलाहाबाद के संवाददाता थे। इलाहाबाद में अमिताभ बच्चन का चुनाव कवर करने के उत्साह से लबालब वह मुझे पहली बार लखनऊ में ही मिले थे। प्रदीप जी उन थोडे़ से रिपोर्टरों में तब शुमार थे जो लिखने-पढने में दिलचस्पी रखते थे। और इसी लिए स्वतंत्र भारत के तब के संपादक वीरेंद्र सिंह उन्हें बहुत प्यार करते थे। और उन की रिपोर्टें उछाल कर छापते थे। वीरेंद्र सिंह जी मुझे भी बहुत प्यार करते थे बल्कि दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ मुझे वह ही ले भी आए थे। तो यह एक एका भी था मुझ में और प्रदीप भटनागर में। जो इलाहाबाद और लखनऊ की दूरी को मिटा देता था। यह १९८५ की बात है। बाद में वीरेंद्र सिंह जी स्वतंत्र भारत से गए तो धीरे-धीरे हम लोग भी विदा हुए। मैं तो स्वतंत्र भारत से अगस्त, १९९१ में विदा हुआ। लखनऊ में ही नवभारत टाइम्स चला गया। प्रदीप जी बाद में स्वतंत्र भारत से विदा हुए। तब जब स्वतंत्र भारत अपनी गरिमा, अपने पंख और अपनी मर्यादा बिसार तार-तार हो गया। मैं ने हालां कि लखनऊ नहीं छोड़ा। तमाम मुश्किलों, विपरीत स्थितियों और नौकरी में अपमान जीते-भुगतते भी लखनऊ में पडा़ हुआ हूं। अब तो रोज-रोज ही नौकरी करना सीखने की बात हो चली है। तो भी ओ अपने उस्ताद कह गए हैं न कि कौन जाए दिल्ली की गलियां छोड़ कर। तो यहां भी वही हो गया है कि कौन जाए लखनऊ की गलियां छोड़ कर! सो पडा़ हुआ हूं लखनऊ में। हूं गोरखपुर का पर लखनऊ की गलियों ने मोह रखा है। जाने नहीं देतीं कभी, कहीं ये गलियां। बीच में एक बार थोड़े दिनों के लिए दिल्ली वापस गया भी पर लखनऊ की गलियों ने फिर पुकार लिया। वापस आ गया। पर प्रदीप जी ने रोजी रोटी के फेर में इलाहाबाद छोड़ दिया। जैसे कि तमाम मित्रों ने अपने-अपने शहर छोड़ दिए। और बैतलवा फिर डाल पर गुहराते हुए अपने शहर आते-जाते रहते हैं। घर-परिवार के फेर में। प्रदीप जी भी शहर दर शहर बदलते हुए अभी डेढ़ महीने पहले अलवर से भीलवाड़ा पहुंचे हैं। वह जब अलवर में थे तब भी बुलाते रहते थे कि आइए कभी घूम जाइए। पर प्रदीप जी के बार-बार इसरार पर भी नहीं जा पाया अलवर। अब की जब भीलवाडा़ जाने की बात हुई तो एक दिन शाम को प्रदीप जी का फ़ोन आया कि क्या आप भीलवाड़ा आ रहे हैं? मैं ने ज़रा हिचकते हुए बताया कि आ तो रहा हूं, पर आप को कैसे पता चला? तो वह बोले कि एक विज्ञप्ति आई है, उसी में बताया गया है कि आप मुख्य वक्ता हैं।

खैर जब प्रदीप जी मिलने आए तो तमाम बातें हुईं। नई-पुरानी। व्यक्तिगत भी और राजनीतिक, सामाजिक भी। बात ही बात में कब उन के एक सहयोगी नरेंद्र जाट बातचीत को नोट कर इंटरव्यू लिख बैठे, पता ही नहीं चला। दूसरे दिन भास्कर अखबार में वह इंटरव्यू देख कर पता चला। खैर थोडी़ देर में अमिताभ जोशी भी आ गए। और बात खत्म हो गई। प्रदीप जी अपने साथियों के साथ चले गए। यह वादा ले कर कि कल की शाम भास्कर दफ़्तर में उन के सहयोगियों के साथ बिताऊं। खाना खाने के लिए अमिताभ जोशी अपने घर ले गए। बीच-बीच में वह अपनी तमाम योजनाएं बताते रहे। दूसरे दिन साक्षी का विमोचन हुआ। स्त्री विमर्श पर मुझे विषय प्रवर्तन करना था। मैं भाषण लिख कर ले गया था। पर वहां माहौल व्याख्यान, विमर्श या सेमिनार का न हो कर व्यक्तिगत-पारिवारिक कार्यक्रम का हो गया। माइक सिस्टम भी साथ नहीं दे रहा था। एक हैंडसेट माइक था। जो जब-तब आवाज़ पकड़ता-छोड़ता रहता था। बीच-बीच में स्वागत और औपचारिकताएं होती रहीं। ऐसे गोया कोई मुहल्ला स्तर की रामलीला हो। जिस भी किसी के हाथ में माइक आ जाए अपने को ज़माने में लग जाए। कार्यक्रम का औपचारिक संचालन उदयपुर से आई शकुंतला सरुपरिया जी कर रही थीं। पर बीच-बीच में अजमेर से आईं वर्तिका जी भी आ जाती थीं, संचालन के लिए। अमिताभ जोशी भी जब-तब कूद पड़ते थे। जयपुर से आई कोई एक ज्योति जोशी थीं, जब-तब संचालन कर रही शकुंतला जी को दर्शक दीर्घा से ही बोल-बोल कर निर्देश देती रही थीं कि यह नहीं यह करिए। ऐसे करिए, वैसे करिए। अजीब हौच-पौच था। कोई भी वक्ता विषय पर बोलने को उत्सुक नहीं था। न ही किसी की तैयारी दिखी। इसी बीच शकुंतला जी ने बिटिया पर एक गीत सस्वर पढा। मन में मिठास घुल गई। इस पर एक सज्जन इतना बह गए कि बाकायदा फ़िल्मी गाना गाने लगे। और लोगों ने उस पर खूब तालियां भी बजाईं। सिर्फ़ एक नूर ज़हीर ही विषय पर बोलीं। वह भी संक्षिप्त। ज़्यादा बोलने की गुंजाइश ही नहीं थी। नूर ज़हीर अब रहती हैं गज़ियाबाद कि दिल्ली में। पर लखनऊ की ही हैं। उर्दू के मशहूर लेखक सज़्ज़ाद ज़हीर की बिटिया हैं। जिन को हम लोग अब भी बन्ने मियां और बन्ने भाई कह कर याद करते हैं। इस पूरे कार्यक्रम में नूर ज़हीर और शकुंतला सरुपरिया जी से मिलना ही सार्थक रहा बाकी तो सब बदमगजी ही रहा।

साक्षी जिस का कि विमोचन मैं ने भी किया सब के साथ। पर अब उस का क्षोभ भी है। एक नज़र में देखने पर लगता है कि अमिताभ जोशी ने बडा़ क्रांतिकारी काम किया है। कि तमाम-तमाम काम करती हुई सामाजिक सरोकार से जुड़ी कोई ३५ महिलाओं की तमाम फ़ोटो सहित उन की उपलब्धियों का बखान साक्षी के पृष्ठों पर वर्णित है। उन में दो आई.ए.एस. और एक पी.सी.एस. स्त्रियां भी हैं। डाक्टर, कारोबारी और तमाम ऐसी ही औरतें हैं जो साक्षी के पृष्ठों पर सामाजिक काम के मद्देनज़र अवतरित हैं। मैं यह देख कर पहली नज़र में बहुत खुश हुआ। और अपने आधे-अधूरे भाषण में अमिताभ जोशी को बधाई देते हुए कहा भी कि इस काम को वह राजस्थान से बाहर भी ले जाएं। पर बाद में जब साक्षी के आखिरी पृष्ठों की तरफ़ नज़र गई तो देखा कि जिन महिलाओं का गुण-गान साक्षी के पृष्ठों पर है, उन्हीं के विज्ञापनों से भी लदी फनी है साक्षी। खेल साफ समझ में आ गया। कि पेड न्यूज़ का यह एक्सटेंशन है। अफ़सर और कारोबारी महिलाएं, डाक्टर आदि इस आयोजन में आई भी नहीं थीं। वैसे भी इस साक्षी की छपाई, कागज़, फ़ोटो आदि जितना दिव्य है, प्रूफ़ और भाषा की गलतियां भी उतनी ही दिव्य हैं। वाक्य विन्यास, ले-आऊट आदि भी पानी मांगते हैं। मैं ने इस तरफ़ अमिताभ जोशी जो इस साक्षी के लेखक और प्रधान संपादक भी हैं का जब ध्यान दिलाया तो उन्हों ने बताया कि चूंकि सारा काम उन्हों ने अकेले-दम पर किया है तो कुछ गलतियां रह गई होंगी। फिर वह बताने लगे कि आप के उत्तर प्रदेश के राज्यपाल जोशी जी हमारे भीलवाडा़ के ही हैं। और जब उन्हें पता चला कि मैं जनसत्ता, दिल्ली में भी रहा हूं तो वह बताने लगे कि हरिशंकर व्यास भी यहीं भीलवाड़ा के हैं। फिर वह उन की पुरानी विपन्नता के दिन भी बताने लग गए। लेकिन वह साक्षी की कमियों के बाबत कुछ सुनना नहीं चाहते थे। और कि उन को लग रहा था कि उन्हों ने हल्दी घाटी बस चुटकी बजाते ही जीत ली है। इसी रौ में वह पत्रकारिता का स्कूल भी खोलने की बात करने लगे। ऐसे ही वहां पहुंचने के पहले जब उन्हों ने फ़ोन पर मुझे भीलवाडा़ आने का निमंत्रण दिया तो फ़ोन पर ही उन के बारे में कुछ पूछना चाहा तो वह बोले कि बस जान लीजिए मैं खुद अपने आप में एक संस्था हूं। मुझे खटका तभी लगा। और जाना मुल्तवी करने की सोची। पर उदयपुर से शकुंतला सरुपरिया जी का इसरार जब ज़्यादा हो गया कि पधारो म्हारो देस ! का तो जाना ही पडा़। गया। तो भी ज़रा भी अंदेशा होता कि मामला घुमा कर ही सही नाक पकड़ने का है, खुल्लम-खुल्ला पेड न्यूज़ के एक्सटेंशन का है तो नहीं गया होता। मेरा ख्याल है कि नूर ज़हीर भी शकुंतला जी के इसरार पर ही वहां आई रही होंगी। नहीं वहां तो ज़रुरत जुमलेबाज़ों, फ़तवेबाज़ो और गलेबाज़ों की ही थी। ऐसे कार्यक्रमों में होती ही है। तिस पर अमिताभ जोशी की आत्म-मुग्धता तो और परेशान करने वाली थी। ठीक वैसे ही जैसे जयपुर से भीलवाडा़ के रास्ते दो तिहाई से अधिक ज़मीन पर मीलों-मील बबूल का विस्तार चुभता है और परेशान करता है। ऐसे गोया बबूल की खेती हो। बबूल का समुद्र हो। बताइए कि इतनी सारी ज़मीन बेकार पड़ी है पर हमारे उद्योगपति सिंगूर और नंदीग्राम जाते हैं उपजाऊ खेती में उद्योग लगाने। किसानों से उन की मां छीनने। क्यों नहीं आते राजस्थान उद्योग लगाने?

बहरहाल अमिताभ जोशी जैसे लोग यहां पेड न्यूज़ का उद्योग लगा बैठे हैं। पता चला कि यह साक्षी उन का दूसरा उपक्रम है। इस के पहले भी वह यह काम कर चुके हैं नारायणी नाम की पत्रिका निकाल कर। बतौर लेखक, अन्वेषक और प्रधान संपादक बन कर कई स्वनाम-धन्य स्त्रियों को नारायणी के पृष्ठों पर अवतरित कर के।

कार्यक्रम के बाद शाम ६ बजे ही आमंत्रित लोगों का भोजन भी शुरु हो गया। पर मैं चला गया भास्कर दफ़्तर। प्रदीप भटनागर के सहयोगियों के साथ बैठ कर कोई दो घंटे विभिन्न मसलों पर बात हुई। प्रदीप भटनागर भी साथ थे। उन की केबिन में ही बात हुई। नवीन जोशी, जसराज ओझा, नरेंद्र जाट, ज्ञान प्रकाश, प्रदीप व्यास, भूपेंद्र सिंह, पवन, और तेज़ नारायन जैसे युवा साथियों के साथ। चिंता वहां के साथियों में भी यही थी कि पत्रकारिता के बिगड़ते स्वरुप को कैसे बचाया जाए? मैं ने उन्हें दो टूक बताया कि किसी भी अखबार में चाहे कितने भी समझौते क्यों न हों, सामाजिक सरोकार से जुड़े रह कर ही पत्रकारिता को साफ-सुथरा रख कर बचाया जा सकता है। सामाजिक सरोकार से जुड़े़ मसलों पर मालिकों, मैनेजमेंट, सत्ता या अफ़सरों आदि का कभी कोई दबाव आदि भी नहीं होता। समाज में इस की स्वीकार्यता भी होती है। अखबार और पत्रकारिता की विश्वसनीयता और साख भी बनती है। और फिर जब समाज बदलेगा तो राजनीति आदि भी बदलेगी ही, सिस्टम भी बदलेगा ही। भ्रष्टाचार, पेड न्यूज़, प्रभाष जोशी, अन्ना, रामदेव, एफ़.डी.आई., मंहगाई आदि पर भी बात हुई। भास्कर के साथियों से यह बतियाना सुखद लगा। अखबार छोड़ने की गहमागहमी थी, नहीं हम लोग और बैठते। कुछ साथियों ने दूसरे दिन भी बैठने की बात की। पर मुझे दूसरे दिन सुबह ही निकलना था अजमेर के लिए। इस लिए उन से क्षमा मांग ली।

दूसरे दिन नाश्ता कर के अजमेर के लिए चला।

रास्ते में फिर वही बबूल के समुद्र और वही चुभन पीछा करते रहे, मिलते रहे। दिन के कोई ११-३० बजे अजमेर पहुंचा। स्टेशन पर आटो और रिक्शा वालों ने वही अफ़रा-तफ़री दिखाई जो सभी शहरों में टूरिस्टों के साथ वह दिखाते हैं। होटल ले जाने की उन्हें बडी़ जल्दी होती है। किराए से ज़्यादा उन्हें होटल से मिलने वा्ले कमीशन की परवाह होती है। प्रदीप जी ने यहां भास्कर के संपादक जय रमेश अग्रवाल से बात कर ली थी। अग्रवाल जी ने रिपोर्टर निर्मल जी से कह कर डाक बंगला में एक कमरा दिलवा दिया। जैसे डाक बंगले होते हैं, वैसा ही था यह भी। अव्यवस्था और बदमगजी के शिकार। कदम-कदम पर लापरवाही। शिकायत करने पर चौकीदार और बाबू ने तज़वीज़ दी की फिर तो मैं सर्किट हाऊस ही चला जाऊं। वहां साफ-सफाई भी है और सारी सहूलियत भी। खैर एक्सीयन से फ़ोन पर कह कर साफ-सुथरा ए.सी. कमरा किसी तरह मिल गया। सामान रख कर, एक रेस्टोरेंट में खाना खा कर मैं पुष्कर के लिए निकल पडा़। अजमेर से थोडी़ देर का सफ़र है पुष्कर। बिलकुल सुहाना सफ़र। पहाड़ियों को चीरती हुई बस ने अपनी ऊंचाई से पूरे अजमेर शहर को दिखाना शुरु कर दिया। आना सरोवर की सुंदरता और निखर गई। बस ने जल्दी ही पुष्कर पहुंचा दिया।

पुष्कर ने पुश-पाश की तरह बांध लिया। जैसे किसी बागीचे के सुंदर फूल आप को बांध लें। पहाड़ियों से घिरे सरोवर की सुंदरता और सफाई ने मन मोह लिया। विदेशी जोड़ों को देख कर अपने बनारस की याद आ गई। पंडों की कपट भरी बातों ने, उन की पैसा खींचने की अदा ने वृंदावन और विंध्याचल की याद दिला दी। हालां कि सीज़न न होने के चलते बहुत भीड़-भाड़ नहीं थी तो भी पंडा लोगों ने कोई कोर-कसर छोडी़ नहीं। पूजन की दक्षिणा के बाद ज़बरिया रसीद कटवाने की बात भी आई। हां यह बदलाव भी ज़रुर था कि जींस पहने भी कुछ पंडा लोग मिले। नहाने की तैयारी से मैं गया भी नहीं था सो आचमन कर के ब्रह्मा जी के मंदिर दर्शन के लिए चल पडा़। सड़क पर छुट्टा गाय और सांड़, जगह-जगह गोबर और सजी धजी दुकानें किसी गांव के से मेले का भान करा रही थीं। पर यह कोई गांव तो नहीं था। पुष्कर था। ज़्यादातर कपडों की दुकानें। और झोले आदि की। राजस्थानी महक कम, चीनी महक ज़्यादा। मतलब चीनी स्टाइल के कपडे़ ज़्यादा। क्या जेंट्स, क्या लेडीज़ सभी कपड़ों पर चीनी तलवार लटकी हुई थी। हां, वैसे यहां राजस्थानी पगड़ी, राजस्थानी तलवार और ढाल भी कुछ जगह बिकती देखी। मंदिर और धार्मिक स्थल पर तलवार और ढाल की भला क्या ज़रुरत? पर सोच कर ही चुप रह गया। किस से और भला क्या पूछता? वैसे भी सीज़न न होने के कारण दुकानों पर गहमागहमी की जगह सन्नाटा सा था। एक नींद सी तारी थी भरी दोपहर में पूरे पुष्कर में। बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर सा नज़ारा यहां भी था मंदिर के बाहर का। कि अगर जूता-चप्पल, मोबाइल आदि सुरक्षित रखना है तो प्रसाद और फूल संबंधित दुकान से लेना अनिवार्य है। प्रसाद दस रुपए से लगायत पचास रुपए तक के थे। खैर विश्वनाथ मंदिर की तरह न तो यहां भारी भीड़ थी न अफरा-तफरी। न ही पुलिस की ज़्यादतियां, बेवकूफियां और न बूटों की तानाशाही। आराम से दर्शन हुए। मंदिर की तमाम सीढ़ियों पर तमाम नाम दर्ज़ थे। उन नामों को कुचलते हुए सीढ़ियों पर से गुज़रना तकलीफ़देह था। इन सीढ़ियों के पत्थरों पर अपना या अपने परिजनों का नाम लिखवाने वालों ने क्या कभी यह भी सोचा होगा कि उन के नामों पर लोगों के अनगिनत पैर पड़ेंगे? या कि ताजमहल फ़िल्म के लिए साहिर के लिखे गीत की याद रही होगी कि पांव छू लेने दो, फूलों को इनायत हो्गी/ हम को डर है कि ये तौहीने मोहब्बत होगी। क्या पता? खैर, ज़्यादातर श्रद्धालु हर जगह की तरह यहां भी निम्न वर्ग के ही लोग थे। कुछ मध्यम वर्ग के भी। पर पूरी श्रद्धा में नत। मंदिर परिसर में फ़ोटो खींचने पर एक सुरक्षाकर्मी आया और बडे़ प्यार से बोला, 'आप का कैमरा जमा करवा लिया जाएगा। फ़ोटो मत खींचिए।' कैमरा हम ने अपनी ज़ेब में रख लिया। फिर बाहर आ कर फ़ोटो खिंची।

मंदिर परिसर से बाहर आते समय सीढ़ियों से सटी एक दुकान के लोग अपनी दुकान में आने का विनयवत निमंत्रण दे रहे थे। इस दुकान में किसिम-किसिम की मूर्तियां थीं। छोटी-बड़ी सभी आकार की। विभिन्न धातुओं की। राजस्थानी कला से जुड़ी और तमाम चीज़ें। कपड़े, जयपुरिया रजाई आदि। पर इतने मंहगे कि बस पूछिए मत। तीन हज़ार से शुरु पचास हज़ार, लाख तक की मूर्तियां। छोटी-बड़ी। हर तरह की। खैर आगे बढे़। कहा जाता है कि पूरी दुनिया में ब्रह्मा और गायत्री का यही इकलौता मंदिर है। खैर यहां भगवान नरसिंह का भी मंदिर है खूब ऊंचा। पर जाने क्यों यहां लोग बहुत नहीं जाते। मैं जब गया इस मंदिर में तो जाते-आते अकेला ही रहा। पुष्कर की समूची सड़क लगभग बाज़ार है। सड़क भी बड़ी है और बाज़ार भी। बनारस की तरह तमाम घाट भी हैं यहां। वृद्ध लोग सीढ़ियां चढ़ते उतरते थक जाते हैं। यही हाल बाज़ार का भी है। समूचा बाज़ार घूमना वृद्धों के वश का है नहीं। और तीर्थ, मंदिर ज़्यादातर वृद्धों और स्त्रियों से ही गुलज़ार रहते हैं। उन की मिज़ाज़पुर्सी में ही युवा उन के साथ होते हैं। सो वृद्ध लोग बाज़ार के बाहर वाले रास्ते से आटो से आते-जाते हैं, जिन की सामर्थ्य होती है। यहां मैं ने देखा कि फूलों की खेती भी अच्छी है। एक दुकान पर देखा कि एक व्यक्ति अपने साथ की स्त्रियों के साथ साड़ियां खरीदने में लगा था। वह ठेंठ गंवई राजस्थानी ही था। मोल-तोल कर ढाई-ढाई सौ की कुछ साड़ियां खरीदने के बाद वह दुकानदार से पक्की रसीद मांगने लगा। तो दुकानदार ने उसे समझाया कि रसीद लोगो तो पैसा बढ़ जाएगा। टैक्स लग जाएगा। तो वह खरीददार बोला कि मैं जानता हूं कि टैक्स एक साथ जहां से सामान आता है, वहीं लग जाता है। तो दुकानदार भी एक घाघ था। बोला कि टैक्स तो लग जाता है पर वैट और सर्विस टैक्स यहीं लगता है। बोलो दोगे? दूं रसीद? वह बिना रसीद के चला गया। ज़ाहिर है कि साड़ियों में शिकायत की गुंज़ाइश थी और वह आदमी लोकल लग रहा था, वापस आ सकता था शिकायत ले कर। बाहरी तो था नहीं कि वापस नहीं आ सकता था। सो रसीद होती तो विवाद बढ़ सकता था। सो उस ने रसीद नहीं दी। आखिर ढाई सौ में चमकीली साड़ी निकलेगी भी कैसी? आसानी से जाना जा सकता है। बनारस की तरह यहां भी दुकानदारों द्वारा विदेशी जोड़ों को भरमाने की कवायद बदस्तूर दिखी। यहां एक हलवाई की दुकान पर रबड़ी का मालपुआ देशी घी में लिखा देख मुह में पानी आ गया। पर उस का सब कुछ खुला-खुला देख कर हिम्मत नहीं हुई। बीमार पड़ने का खतरा था। मन को काबू करना पड़ा।

शाम हो चली थी। एक और मंदिर दिखा। यहां भी भीड़ मिली। यहां भगवान जी को घुमाया जा रहा था। बाकायदा पुजारी लोग पालकी में ले कर घुमा रहे थे। आरती का दिया भी घूम रहा था। चढ़ावा लेने के लिए। आरती ली, फ़ोटो खिंची और चल दिए। बस स्टैंड के ठीक पहले एक जगह एक स्त्री घास बेचती मिली। वहीं कुछ गाय झुंड में घास खा रही थी। वह स्त्री आते-जाते लोगों से गुहार लगाती रहती थी कि गाय को घास खिलाते जाइए। पांच रुपए में, दस रुपए में। कुछ लोग उस स्त्री की सुन लेते थे, कुछ नहीं। इसी तरह पुष्कर झील के किनारे भी एक जगह गऊ घाट भी दिखा था। वहां शायद गऊ दान होता हो। मैं देखते हुए ही चला आया था। गया नहीं। वापसी के लिए बस स्टैंड पर आ गया। एक बस सवारियों से भर चुकी थी। दूसरी के इंतज़ार में बैठ गया। थोड़ी देर में दूसरी बस भी आ गई। और तुरंत भर गई। पर अभी चली भी नहीं थी कि पता चला कि पंक्चर हो गई। हार कर उस पहली ही बस में आना पड़ा।

जब अजमेर शहर करीब आ गया तो कंडक्टर से मैं ने कहा कि, ' दरगाह जाना है सो वहां जाने के लिए जो करीब का स्टापेज़ हो बता दीजिएगा उतरने के लिए।' उस ने बता दिया कि, 'आगरा गेट पर उतर जाइएगा।' मैं ने कहा कि, 'यह भी आप को बताना पड़ेगा कि आगरा गेट कहां है?' कंडक्टर शरीफ़ आदमी था। उस ने हामी भर दी। पर मेरी सीट के पीछे बैठे एक दो लोग मेरी पड़ताल में लग गए। यह कहते हुए कि, 'आ रहे हो पुष्कर से और जा रहे हो दरगाह?' उन्हों ने नाम पूछा। और बोले, 'पंडत हो कर भी दरगाह?' मैं ने कहा कि, 'हां।' फिर, 'कहां से आए हो?' पूछा। मैं ने बताया कि, 'लखनऊ से। ' तो वह बोले, 'तब तो तुम्हें जाना ही है। यह तुम्हारा दोष नहीं लखनऊ का है। पर क्यों पुष्कर का सारा पुण्य दरगाह में जा कर भस्म कर देना चाहते हो?' इस के बाद वह और उस का एक साथी नान स्टाप फ़ुल वाल्यूम में जितना और जैसा भी ऊल-जलूल बक सकते थे बकते रहे। पहले तो मैं ने टाला। पर जब ज़्यादा हो गया तो मैं कुछ प्रतिवाद करने के लिए मुंह खोल ही रहा था कि बगल में बैठे व्यक्ति ने मेरा हाथ पकड़ कर दबाया और कुछ न बोलने का संकेत किया। मुझे भी लगा कि प्रतिवाद में बात बढ़ सकती है सो चुप लगा गया। बस में उस व्यक्ति की बात के समर्थन में कुछ और लोग भी बोलने लगे। अंट-शंट। आपत्तिजनक। खैर तभी आना सरोवर के पास से बस गुज़री तो मुझे गौहाटी में ब्रह्मपुत्र की याद आ गई। पर बात को बदलने की गरज़ से मैं ने उस लगातार बोलते जा रहे आदमी से पूछा कि, 'यह आना सरोवर है ना !'

'हां है तो।' वह ज़रा रुका और बोला, 'नहाओगे क्या?' वह ज़रा देर रुका और बोला, 'अरे शहर का सारा लीवर-सीवर यहीं गिरता है।' फिर वह एक श्मशान घाट की प्रशंसा में लग गया और कहने लगा कि कुछ मांगने जाना ही है तो वहां जाओ। कोई निराश नहीं लौटता। आदि-आदि। और वह फिर मुझे समझाने में लग गया कि, 'पंडत पुष्कर का पुण्य दरगाह में जा कर मत नष्ट करो ।' कि तभी कंडक्टर ने बताया कि, 'आगरा गेट आने वाला है, गेट पर चले जाइए।'

मैं आगरा गेट पर उतर गया।

चला पैदल ही दरगाह की ओर। लोगों से रास्ता पूछते हुए। पहले दिल्ली गेट और फिर थोडी़ देर में दरगाह की मुख्य सड़क पर आ गया। एक मौलाना से पूछ भर लिया। कि, 'क्या यही दरगाह है?'
'जी जनाब !' कह कर वह भी शुरु हो गए। नान स्टाप। वहा की बदइंतज़ामी पर, सड़कों में जगह-जगह गड्ढे दिखाते हुए। गंदगी दिखाते हुए। कहने लगे कि, 'लूट मचा रखी है !'
'किस ने?' मैं ने पूछा।
'अफ़सरान ने !' वह बोले, 'कलक्टर से लगायत सब के सब। नहीं कितना पैसा गवर्नमेंट देती है, बाहर से फ़ंड आता है, पर सब लूट कर खा जाते हैं यह सब ! आप जाइए पुष्कर ! फिर देखिए कि वहां क्या चमाचम सड़कें है। क्या इंतजामात हैं, सफाई है। पर यहां तो अंधेरगर्दी है लूट है।' मौलाना जैसे फटे पड़ रहे थे। उन की शिकायतों का कोई अंत नहीं था।
थोडी देर बाद मैं ने बात बदलने के लिहाज़ से कहा कि, 'यहां सवारी नहीं आती?'
'बादशाह अकबर यहां पैदल आए थे !' वह बड़े नाज़ से बोले, 'चलिए पैदल ! हर्ज़ क्या है?' और वह फिर शुरु हो गए। जल्दी ही हम दरगाह के मुख्य दरवाज़े पर आ गए। यहां भी काशी में विश्वनाथ मंदिर की तरह और पुष्कर में ब्रह्मा-गायत्री मंदिर की तरह जूते-चप्पल रखने के लिए फूल, प्रसाद, चढ़ाने के लिए चद्दर आदि लेना अनिवार्य था। लेकिन चढ़ाने के लिए चद्दर, अगरबत्ती और प्रसाद मैं पहले ही ले चुका था। अब यहां सिर्फ़ फूल लेना बाकी था। खैर मुख्य दरवाज़े के बगल में जूता-चप्पल जमा करने की एक जगह थी। पांच रुपए जोड़ा की दर से। मैं ने वहीं जमा किया। अंदर भी जा कर सब सामान मिल रहे थे। तो मैं ने फिर एक टोकरी फूल लिया। और चला मत्था टेकने ख्वाज़ा साहब की दर पर। पर भीतर जाते ही गुमान यहां भी टूटा। पंडे यहां भी थे, खादिम के रुप में। रसीद कटवाने के लिए फ़रेब और दादागिरी यहां भी थी। पैसे चढ़ाने की पुकार यहां भी थी और लाज़िम तौर पर। चिल्ला-चिल्ला कर। एक खादिम तो बाकायदा चिल्लाते हुए कह रहे थे गल्ले का पैसा यहां जमा करो। और हाथ से चादर, फूल सब झपट कर खुद पीछे की तरफ़ फेंक देते थे। और लोगों को भेड़-बकरी की मानिंद हांक देते थे कि, 'उधर चलो !' ज़बरदस्ती। हमारे लखनऊ में खम्मन पीर बाबा की मज़ार पर तो ऐसा कुछ भी नहीं होता। भीड़ वहां भी खूब होती है। खैर यहां मैं ने ऐतराज़ किया और कहा भी उन से कि, ' पुलिस वालों जैसा सुलूक तो मत करिए।' और ज़रा तेज़ आवाज़ में ऐतराज़ दर्ज़ करवाया। तो वह थोडे़ नरम पड़े। और जब मैं ने कहा कि, 'देखिए उस तरफ़ तो लोग खुद फूल और चादर चढ़ा रहे हैं। और यहां आप ने हम जैसों को खुद फूल और चादर चढ़ाने नहीं दिया।' तो वह हिकारत से बोले, 'ध्यान से देखो, वह भी खादिम लोग ही हैं।' कह कर वह फिर भेंड़-बकरी की तरह सब को हांकने में लग गए। भीड़ हालां कि ज़्यादा नहीं थी आफ़ सीज़न के चलते। पर कम भी नहीं थी। कोई आधा घंटा से ज़्यादा लग गया दो कदम की दूरी चल कर मत्था टेकने में। वी. आई.पी. ट्रीटमेंट होता है हर जगह । हर मंदिर, हर दरगाह में। यहां भी था। उसी दिन पूर्व मंत्री और भाजपा नेता शाहनवाज़ भी चादर चढ़ाने गए थे। और भी बहुतों की फ़ोटो देखी थी मैं ने वहां चादर चढा़ते हुए। पर हमारी चादर और फूल चढाई नहीं गई बस पीछे फेंक दी गई खादिम के द्वारा। और सब की ही तरह। पर मत्था टेकने और सिर झुकाने का सुख मिला, सवाब मिला, इसी से संतोष किया। बाहर आ कर फ़ोटो भी खिंची। फ़ोटो खींचने पर किसी को ऐतराज़ भी नहीं हुआ। बस एक आदमी ने सलाह दी और ज़रा डपट कर दी कि पीठ ख्वाज़ा साहब की तरफ़ कर के खडे़ हो कर फ़ोटो मत खिंचवाइए। यह खादिम नहीं, हमारी तरह श्रद्धालु थे। तो भी मुझे हंसी आई और वह शेर याद आ गया कि:
जाहिद शराब पीने दे मस्ज़िद में बैठ कर
या वो जगह बता जहां खुदा न हो !

पूरे परिसर में खूब रोशनी और चहल-पहल है। लोग-बाग भी खूब हैं। औरत-मर्द, बूढे-बच्चे सभी। श्रद्धा में नत और तर-बतर। कोई नमाज़ पढ़ता, कोई आराम करता और परिवारीजनों से बतियाता हुआ। हाथ पैर धोता सुस्ताता हुआरास्ते में एक रेस्टोरेंट में खाना खा कर लौट रहा हूं बरास्ता दिल्ली गेट, आगरा गेट डाकबंगला। आ कर सो जाता हूं। सवाब और सुख से भरा-भरा। सुबह ११ बजे लखनऊ वापसी की ट्रेन है। गरीब-नवाज़ है। कूपे में अजमेर से अकेला हूं। अजमेर छूट रहा है। जयपुर से बाटनी के प्रोफ़ेसर स्वर्णकार श्रीमती स्वर्णकार के साथ आ गए हैं हैं। इधर-उधर की बातचीत है। बबूल की चुभन की उन से बात करता हूं। वह कहते हैं कि हां बहुत सारा डेज़र्ट है तो। बात जयपुर के गुलाबीपन की होती है। बात ही बात में वह बताते हैं कि राजस्थान के बाकी हिस्से तो कंगाल हैं। खास कर मेवाड़ वगैरह। लड़-भिंड़ कर खजाना खाली कर दिया। वह जैसे तंज़ पर आ जाते हैं और कहते हैं कि पर जयपुर के राजा लोग लड़ने-भिड़ने में कभी यकीन नहीं किए। चाहे जय सिंह रहे हों या मान सिंह। मुगल पीरियड रहा हो या ब्रिटिश पीरियड। सो खज़ाना हमेशा भरा रहा। वह हंसते हैं। उन के बच्चे सेटिल्ड हो गए हैं और वह हरिद्वार जा रहे हैं। शाम को हरकी पैड़ी पर आरती का आनंद लेने की योजना बना रहे हैं। राजस्थान छूट रहा है धीरे-धीरे। हरियाणा आ रहा है। हरियाणा छूट रहा है। दिल्ली आ रहा है। प्रोफ़ेसर स्वर्णकार को दिल्ली में ट्रेन बदलनी है। वह उतर जाते हैं। एक जैन साहब आ जाते हैं। व्यापारी हैं। खाना हम दोनों खा रहे हैं। वह घर का लाया खाना खा रहे हैं। बता रहे हैं कि बाहर का खाना नहीं खाते वह। लहसुन प्याज वाली दिक्कत है। अमरीका तक में वह महीने भर रहे पर बचा गए। देशी घी वाला खाना है, बताना नहीं भूलते वह। अब दिल्ली छूट रही है। जाते वक्त ट्रेन आगरा के रास्ते राजस्थान ले गई थी, भरतपुर, बांदीकुई वगैरह होती हुई जयपुर, अजमेर, भीलवाड़ा। अब की राजस्थान छूटा अलवर होते हुए, हरियाणा, दिल्ली के रास्ते। सोते हुए। गए थे जागते हुए। भरतपुर में तब नींद टूटी थी। अब की वापसी में शाहजहांपुर में टूटी है। कुछ परिवार हैं जो अजमेर से लौटे हैं सबाब ले कर। उतरते वक्त खामोशी के बजाय हलचल मचाते हुए उतर रहे हैं। भोर के पौने तीन बजे हैं। लोग उतर रहे हैं। सोए हुए बच्चों और सामान को हाथ में लिए हुए। सवाब का सुकुन चेहरे पर है ज़रुर पर बोल रहे हैं कि अपना मुल्क ही अपना मुल्क होता है। अपने मुल्क की बात ही कुछ और है। तो क्या अजमेर उन का दूसरा मुल्क था? क्या रघुवीर सहाय इसी लिए, इसी तलाश और तनाव में लिख गए हैं दिल्ली मेरा परदेस ! याद आता है कि साक्षी के कार्यक्रम में रोमिला ने स्त्रियों के संदर्भ में एक वाकया सुनाया था। कि एक कुम्हार घड़ा बना रहा था। घडा़ बनाते-बनाते वह किन्हीं खयालों में खो गया। कि तभी मिट्टी बोली कुम्हार-कुम्हार यह क्या कर रहे हो? घड़े की जगह मुझे सुराही क्यों बना रहे हो? कुम्हार ने कहा कि माफ़ करना मेरा विचार बदल गया। मिट्टी तकलीफ़ से भर कर बोली तुम्हारा तो सिर्फ़ विचार बदला, पर मेरी तो दुनिया बदल गई।

तो यहां अजमेर से शाहजहांपुर की यात्रा में इन लोगों का मुल्क बदल गया। अपने मुल्क आने की खुशी में वह लोग भूल गए कि हमारे जैसे लोगों की नींद भी टूट गई है। बशीर बद्र याद आ गए हैं :
वही ताज है, वही तख़्त है, वही ज़हर है, वही जाम है
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है, ये वही बुतों का निज़ाम है

वापस जा कर सोने की कोशिश करता हूं। सोने में ट्रेन कहीं लखनऊ से आगे न निकल जाए, यह सोच कर सो नहीं पाता हूं। पर कब सो गया पता नहीं चला। आगे की यात्रा करने वाले लोग आ गए हैं। नींद उन के आने से टूट गई है। सुबह हो गई है। लखनऊ आ गया है। गरीब-नवाज़ छूट रही है। आमीन !

अजमेर में ख्वाजा साहब की दरगाह पर लेखक दयानंद पांडेय


लेखक दयानंद पांडेय यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा

‘गुजरात समाचार’ और ‘संदेश’ का प्रबंधन अपने रीजनल न्यूज चैनल लाने में जुटे

: कानाफूसी : गुजरात के दो बड़े प्रिंट मीडिया हाउस गुजरात समाचार और संदेश दोनों ही अपने अपने रीजनल न्यूज चैनल लाने में जुट गए हैं. इनके चैनल दो अक्टूबर के आसपास आनएयर हो जाएंगे. इस बड़े कदम से पूरे गुजरात के मीडिया जगत में हलचल मची हुई है. गुजरात समाचार के बारे में जहां चर्चा है कि वह इंडिया न्यूज की फ्रेंचाइजी लेकर इंडिया न्यूज गुजरात नाम से चैनल ला रहा है तो वहीं संदेश समूह ने ट्रांसमीडिया के साथ पचास फीसदी की भागीदारी की है.

संदेश के चैनल में हेड के लिए आजतक वाले धीमंत पुरोहित और टीवी9 वाले विवेक भट्ट का नाम चल रहा है. गुजरात समाचार के चैनल में लोकेश कुमार लिए गए हैं. लोकेश इससे पहले गुजरात में जी अल्फा और टीवी9 में हेड रह चुके हैं. संदेश के चैनल में टीवी9 और ईटीवी गुजराती से ढेर सारे लोग आए हैं. गुजरात समाचार और संदेश के इलेक्ट्रानिक मीडिया में एक साथ आने से माना जा रहा है कि इनकी आपसी होड़ अब टीवी पर भी दिखेगी. ये दोनों समूह एक दूसरे पर कीचड़ उछालते रहते हैं और इससे पाठकों को खूब आनंद आता है. अब इनकी लड़ाई टीवी के माध्यम से भी प्रकट होगी. संभव है, ये समूह एक दूसरे का स्टिंग आपरेशन करके अपने अपने न्यूज चैनलों पर दिखाएं.

भड़ास तक खबर पहुंचाने के लिए संपर्क सूत्र- bhadas4media@gmail.com

SC’s suggestions on wages for journalists, non-journalists

New Delhi (PTI) The Supreme Court today decided to hear from January 8 next for final disposal petitions challenging the Majithia Wage Boards’ recommendations for journalists and non-journalists and asked managements to consider additional payments in the interim.

A number of media organisations have challenged before the apex court the recommendations of the wage boards for journalists and non-journalists notified by the union government on November 11, 2011.  They have also sought a stay of the notification.

When the matter came up in the court today a bench of justices Aftab Alam and Ranjana Prasad Desai suggested that the managements should show some “large heartedness” and give a serious though to making additional payments in the interim.

The bench asked senior counsel Fali Nariman, who was appearing for some media houses, to consider these suggestions and get back with the response of the managements by Oct 8 when it will pass a direction.

“Without any order we want to know, can you do something,” the bench asked the senior counsel.

While Nariman was making his submissions, the bench told him that without passing any order it wants to know whether the media houses “could sdo something” for the employees during pendency of the petitions.

“We have made a suggestion to Mr Nariman. He will get back to us withing a week or two,” it said.

When Nariman sought further time to respond to the counter affidavits filed by the employee unions and the Union Government, senior advocate Colin Gonsalves, appearing for the employees, said that without any delay the hearings should be started.

He submitted that the court should allow full and immediate implementation of the wage boards subject to the outcome of the pending writ petitions.

Senior counsel M N Krishnamani told the bench that for the past 13 years there was no wage revision for the suffering employees and it was imperative that some arrangement be granted immediately.

हिमाचल में स्टेट प्रेस क्लब का गठन, कृष्ण भानु अध्यक्ष बने

शिमला : प्रदेश की राजधानी शिमला में राज्य स्तरीय प्रेस क्लब का गठन किया गया है। इसका नाम स्टेट प्रेस क्लब ऑफ़ हिमाचल प्रदेश रखा गया है। इस राज्य स्तरीय प्रेस क्लब में प्रदेश भर के पत्रकार सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं। इससे पूर्व प्रदेश में ऐसा राज्य स्तरीय प्रेस क्ल्ब उपलब्ध नहीं था, जिसमें समूचे सूबे के पत्रकार सदस्य बन पाते। जिला स्तर पर अनेक प्रेस क्लब स्थापित हैं, लेकिन उनमें केवल शहर अथवा जिला के पत्रकार ही सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं।

राजधानी शिमला के वरिष्ठ पत्रकारों की बैठक में राज्य स्तरीय प्रेस क्लब का गठन किया गया है। बैठक में दैनिक भास्कर के समाचार संपादक संदीप उपाध्याय, पंजाब केसरी के ब्यूरो प्रमुख राजीव पत्थरिया, आपका फैसला के संपादकीय सलाहकार विजय पुरी, दैनिक ट्रिब्यून के ब्यूरो प्रभारी शशिकांत शर्मा, आज समाज के ब्यूरो प्रमुख डा.शशिभूषण शर्मा, हिमाचल आजकल समाचार पत्र के मुख्य संपादक कृष्ण भानु, जी.टी.वी. के हिमाचल प्रभारी संजीव शर्मा, पत्रकार भूपेंद्र शर्मा, खुशहाल सिंह और भूपेंद्र चौहान आदि शामिल हुए। बैठक की अध्यक्षता पंजाब केसरी के विशेष संवाददाता व वरिष्ठ पत्रकार सीताराम खजूरिया ने की।

स्टेट प्रेस क्लब ऑफ़ हिमाचल प्रदेश के चुनाव में कृष्ण भानु को अध्यक्ष चुना गया। वरिष्ठ उपाध्यक्ष के पद पर विजय पुरी और उपाध्यक्ष संदीप उपाध्याय की ताजपोशी हुई। राजीव पत्थरिया को मुख्य महासचिव और संजीव शर्मा को सचिव चुना गया, जबकि शशिकांत शर्मा वित्त सचिव होंगे। भूपेंद्र चौहान को संगठन सचिव बनाया गया है। सीताराम खजूरिया व डा. शशिभूषण शर्मा को क्लब का सरंक्षक मनोनीत किया गया है।

चुनावों के बाद अध्यक्ष कृष्ण भानु और मुख्य महासचिव राजीव पत्थरिया ने कहा कि अक्तूबर 2012 में स्टेट प्रेस क्लब ऑफ़ हिमाचल प्रदेश का विस्तार किया जाएगा। इसमें समूचे प्रदेश के पत्रकारों को जोड़ा जाएगा। साथ ही जिला स्तर पर संचालित प्रेस क्लबों के साथ भी तालमेल स्थापित कर पत्रकारों का सशक्त संगठन खड़ा किया जाएगा।

शिमला से राकेश कुमार की रिपोर्ट

नेटवर्क10 के हिमाचल प्रदेश के स्टेट हेड बने वरिंदर राणा

कुछ दिन पहले दैनिक भास्‍कर को अलविदा कहने वाले सीनियर रिपोर्टर वरिंदर राणा ने ''पंजाब की शक्ति'' की लांचिंग से पहले ही इसे बाय बाय करते हुए नेटवर्क 10 ज्‍वाइन कर लिया है। वह चैनल में हिमाचल प्रदेश के बतौर स्‍टेट हेड सेवाएं देंगे तथा शिमला से पूरे प्रदेश का कामकाज चलाएंगे। बताया जा रहा है कि उत्‍तराखंड के बाद नेटवर्क10 चैनल अब हिमाचल, पंजाब व हरियाणा में एक साथ लांच किया जा रहा है।

वरिंदर राणा भास्‍कर की बठिंडा यूनिट लांचिंग टीम के सदस्‍य थे। लेकिन इसके बाद से बिगडते माहौल व कुछेक खास लोगों को ही हाईलाइट किए जाने के कारण होती बेइंसाफी देख भास्‍कर छोड दिया था। फिर उनकी ज्‍वाइनिंग ''पंजाब की शक्ति'' अखबार के बठिंडा इंचार्ज के तौर पर होने की भी चर्चा चली थी लेकिन अब उन्‍होंने अपने फेसबुक एकाउंट पर नेटवर्क 10 ज्‍वाइन करने का खुलासा किया है। उधर, लांचिंग से पहले ही वरिंदर राणा जैसे सीनियर रिपोर्टर के साथ छोडने से ''पंजाब की शक्ति'' को बड़ा झटका माना जा रहा है क्‍योंकि अब उन्‍हें बठिंडा में अपना नया इंचार्ज ढूंढना होगा।

इंदौर प्रेस क्लब में रिसर्च सेंटर की स्थापना शीघ्र

इंदौर। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की व्यक्तिगत रुचि और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दिलचस्पी के चलते आने वाले समय में देश के सर्वाधिक सक्रिय प्रेस क्लबों में शुमार इंदौर प्रेस क्लब में रिसर्च सेंटर की स्थापना होगी।

पिछले दिनों श्री गडकरी इंदौर प्रेस क्लब के प्रेस से मिलिये समारोह में भाग लेने इंदौर आए थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने इंदौर प्रेस क्लब की गतिविधियों से प्रभावित होकर यहां रिसर्च  सेंटर स्थापित करने का सुझाव दिया था और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को इस सेंटर की स्थापना के लिए हरसंभव सहयोग करने को कहा था। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने भी इस संदर्भ में त्वरित कार्रवाई करते हुए इंदौर प्रेस क्लब को रिसर्च  सेंटर की कार्ययोजना बनाकर प्रस्तुत करने को कहा है।

इंदौर प्रेस क्लब ने भोपाल में माधवराव सप्रे संग्रहालय और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का दौरा किया। प्रेस क्लब पदाधिकारियों ने इन दोनों राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों में चल रहे रिसर्च  कार्यों का एवं इंतजामों का जायजा लिया। दोनों ही संस्थानों के प्रमुखजनों से यह भी जानने की कोशिश की कि एक आधुनिक रिसर्च सेंटर में क्या-क्या संसाधन और कार्य होने चाहिए।

सप्रे संग्रहालय के कर्ताधर्ता वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर एवं निदेशक डॉ. मंगला अनुजा ने तीन दशकों से किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी एवं बताया कि  संग्रहालय में सभी चीजों को पुरखों की धरोहर की तरह सहज कर रखा गया है। माखनलाल चतुर्वेदी विवि में डॉ. चंदर सोनाने, पुष्पेंद्रपाल सिंह, संजय द्विवेदी, राघवेंद्र सिंह, आशीष जोशी, प्रो. रामदेव भारद्वाज, दीपक शर्मा ने विस्तार से सुझाव दिए कि एक आदर्श रिसर्च  सेंटर में क्या-क्या सुविधाएं होना चाहिए। प्रेस क्लब पदाधिकारियों ने इस मामले में जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राकेश श्रीवास्तव एवं अपर संचालक सुरेश तिवारी से भी विचार मंथन किया।

इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने बताया कि मुख्यमंत्री के निर्देश अनुसार एक माह के भीतर रिसर्च सेंटर की स्थापना के लिए कार्ययोजना प्रस्तुत कर दी जाएगी। इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार शशीन्द्र जलधारी को रिचर्स सेंटर का समन्वयक बनाया गया है।

प्रदेश के बुजुर्ग पत्रकारों को श्रद्धानिधि देने की शुरुआत इंदौर से होगी, इंदौर प्रेस क्लब ने किया मुख्यमंत्री एवं जनसंपर्क मंत्री का अभिनंदन

इंदौर। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आश्वस्त किया है कि प्रदेश के बुजुर्ग पत्रकारों को श्रद्धानिधि देने की शुरुआत इंदौर से होगी। जनसंपर्क विभाग शीघ्र ही इस योजना का क्रियान्वयन आरंभ करने जा रहा है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने यह आश्वासन इंदौर प्रेस क्लब प्रतिनिधिमंडल को दिया। बुजुर्ग पत्रकारों को प्रतिमाह पांच हजार रुपयों की श्रद्धानिधि दिए जाने के निर्णय पर इंदौर प्रेस क्लब प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं जनसंपर्क मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का अभिनंदन किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त जनसंपर्क राकेश श्रीवास्तव, संयुक्त संचालक डॉ. भूपेंद्र गौतम, संयुक्त संचालक मंगलाप्रसाद मिश्रा, उपसंचालक संजय जैन भी मौजूद थे।

इंदौर प्रेस क्लब ने मुख्यमंत्री एवं जनसंपर्क मंत्री से अनुरोध किया कि श्रद्धानिधि देने के मामले में कुछ नियमों को शिथिल किया जाए ताकि अधिक से अधिक वरिष्ठ पत्रकारों को इस योजना का लाभ मिल सके। इंदौर प्रेस क्लब ने श्रद्धानिधि भेंट करने की शुरुआत इंदौर से करने की मांग भी रखी, जिसे मुख्यमंत्री सहर्ष स्वीकार कर लिया।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लगातार तीसरी मर्तबा इंदौर प्रेस क्लब का अध्यक्ष बनने पर प्रवीण कुमार खारीवाल को मिठाई खिलाकर शुभकामनाएं दी। मुख्यमंत्री ने प्रेस क्लब के नवीन पदाधिकारियों को भी बधाइयां दी। प्रतिनिधिमंडल में उपाध्यक्ष अमित सोनी, सचिव संजय लाहोटी, कोषाध्यक्ष कमल कस्तुरी, कार्यकारिणी सदस्य हेमंत शर्मा, बालकृष्ण मूले, योगिता जायसवाल एवं पूर्वाध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी शामिल थे। श्री जलधारी ने मुख्यमंत्री को अपने नवीन काव्यसंग्रह की प्रति भी भेंट की। प्रतिनिधिमंडल ने माधवराव सप्रे संग्रहालय, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जनसंपर्क विभाग-माध्यम का भी दौरा किया।

पंजाब में सरकारी अध्यापक नहीं कर सकेंगे पत्रकारिता

पंजाब सरकार ने एक आदेश जारी कर सरकारी अध्यापकों पर पत्रकारिता करने की पाबन्दी लगा दी है। इस संबंध में शिक्षा विभाग के डायरेक्टर जनरल सेकंडरी एजुकेशन और शिक्षा मंत्री सिकन्दर सिंह मलूका ने बयान जारी किया है। एक अनुमान के अनुसार पंजाब भर में दो से तीन हजार सरकारी अध्यापक पार्ट-टाइम पत्रकारिता कर रहे हैं।

पत्रकारिता से जुड़े करीब सभी अध्यापक यह सब अपने संबंधित शिक्षा अधिकारियों की लिखित अनुमति से कर रहे हैं।  अधिकतर तो ऐसे हैं कि जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करते दशकों बीत चुके हैं। अब सवाल यह उठता है कि विभाग ने जिन अध्यापकों को लिखित अनुमति दे रखी है, उनको किस नियम के तहत पत्रकारिता करने से रोक रहा है।   
 

नईदुनिया में स्टाफ को सरेआम अपशब्द बोल रहे हैं श्रवण गर्ग!

नईदुनिया को हिंदी अख़बारों की दुनिया में एक सुसंस्कृत, सभ्य और सामाजिक अखबार माना जाता था. इस अखबार ने खबरों की विश्वसनीयता का ऐसा शिखर खड़ा किया था, जिसे कई बरसों तक कोई हिला तक नहीं सका था. आज हालात ये हैं कि यहाँ प्रधान संपादक श्रवण गर्ग स्टाफ को सरेआम अपशब्द बोल रहे हैं. कुछ दिन पहले एक सीनियर गश खाकर गिर पड़ा. नईदुनिया में इन दिनों वही माहौल बनता जा रहा है, जिससे बचकर नईदुनिया कि नीव कड़ी की गई थी.

इस अखबार के बनने और बर्बाद होने की अजीब दास्ताँ है. इसकी शुरुवात हुई थी २००६ से. २००६ के बाद ऐसा दौर आया कि धीरे-धीरे सबकुछ ध्वस्त हो गया. विनय छजलानी के हाथ में नईदुनिया की बागडोर आते ही चमचागिरी, भाटराग और खबरों के नाम पर ऐसा प्रयोग चला कि नईदुनिया की विश्वसनीयता की धज्जियाँ उड़ गई. ये दौर भी २००६ से २००९ तक कुछ हदतक संभला कर रहा, जब तक इसकी कमान ग्रुप एडीटर उमेश त्रिवेदी के हाथ में रही. अखबार की समझ वाले इस संपादक ने नईदुनिया की साख को काफी हदतक संभालकर रखा. २००९ में जब विनय छजलानी ने नईदुनिया के इंदौर संस्करण का स्थानीय संपादक जयदीप कर्णिक को बनाया तो इस अखबार का बंटाधार हो गया. नईदुनिया को घाटे की तरफ लुढकाने में उनके सलाहकारों ने भी अच्छी भूमिका निभाई. इनमें आलोक मेहता भी एक हैं जिन्होंने दिल्ली संस्करण के बहाने नईदुनिया को जबरदस्त घाटे मे डुबो दिया. रिलायंस से कर्जा भी विनय छजलानी ने इसी दौर में लिया. २०११ के मध्य में नईदुनिया को बेचने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा और २०१२ के मार्च में नईदुनिया का मालिकी हक जागरण प्रकाशन का हो गया.

आज नईदुनिया को उसकी ऊंचाई तक पहुँचाने वाले अभय छजलानी गुमनामी में हैं और अपने खेल शौक के बहाने 'अभय प्रशाल' में टेबल टेनिस के नए खिलाड़ियों को तैयार होते देख रहे हैं. महेंद्र सेठिया ने एक बड़ा सा स्कूल खोल लिया है. बाकी समय वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मध्य प्रदेश क्रिकेट की राजनीति करते हैं. विनय छजलानी इन दिनों आयकर के छापों में उलझे हैं. जयदीप कर्णिक अपने मूल काम वेबदुनिया से फिर जुड़ गए. ये वो कहानी है जिसका क्लाइमेक्स अभी बाकी है.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आलोक पुंज नक्षत्र टीवी के बिहार हेड बने, डिजी केबल आगरा से कई गए

आलोक पुंज के बारे में सूचना है कि उन्होंने नक्षत्र टीवी में बिहार हेड के रूप में ज्वाइन किया है. इससे पहले आलोक दिल्ली में आस्था चैनल में डायरेक्टर प्रोग्रामिंग के रूप में काम कर चुके हैं. वे जी न्यूज के लिए दरभंगा, बिहार से रिपोर्टिंग भी कर चुके हैं.

आगरा के डिजी केबल में बदलाव का दौर जारी है. एक नई टीम के लिए पुरानी टीम के लोगों को हटाने का सिलसिला जारी है. इस कारण पुरानी टीम के सदस्य एडिटिंग टीम से अक्षय जैन, मयंक द्विवेदी, प्रशांत सिंह ने इस्तीफा दे दिया. इन लोगों का इस्तीफा देने का कारण चार कैमरामैन और उनके साथ अनूप चौधरी को निकालना रहा.

जिला संवाददाता ने चैनल हेड को लिख भेजा इस्तीफानामा

आदरणीय यशवंत जी, मैं आज अपना इस्तीफा मौर्य टीवी को भेजा हूँ, और मैंने मौर्य के साथ मिले अनुभवों को भी लिखा है. जो सोच कर मैंने इस क्षेत्र को चुना था, वह यहां नहीं मिला. जब इस मीडिया की मंडी को समझ पाया तो मैंने निर्णय ले लिया, जिसे प्रेषित कर रहा हूँ. आशा है आप इसे प्रमुखता से लेंगे. -मुकेश कुमार, समस्तीपुर


|| वन्दे मातरम ||

सेवा में,

आदरणीय मनीष झा

चैनल हेड

मौर्य टी.वी., पटना

विषय :- समस्तीपुर जिला संवाददाता से इस्तीफा के सन्दर्भ में

प्रिय महोदय ,

पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार के युवाओं को अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से हिंदी सिनेमा में वर्चस्व कायम करने वाले महारथी आदरणीय प्रकाश झा जी ने अपने गृह राज्य की राजधानी में मौर्य टी.वी. की शुरुआत की| इस चैनल में काम करने वाले लोगों के समूह को परिवार का संज्ञा दिया गया| लेकिन परिवार के मुखिया को उनके अन्य सहयोगी से सिर्फ काम लेने तक ही मतलब, मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि काम की बात तो हमेशा किया जाता रहा, लेकिन जब मेहनत के प्रतिफल की बात जब भी की गई, इसे टाला जाता रहा|

भला टाला भी क्यूं न जाए, चैनल के अधिकारियों को तो वातानुकूलित कक्ष और गाड़ियों में रहने की आदत है, और महीने के अंत में पगार भी आसानी से उपलब्ध है| लेकिन धुल गर्दा, बारिस, धुप को बर्दाश्त कर खबर देने वाले रिपोर्टर को क्या मिलता है, डांट-फटकार और भुखमरी| मैं अपनी बात लिख रहा हूँ जो मेरे साथ हुआ है| पैसे की तंगी के कारण मेरी पत्नी ने मेरे मोबाईल से चैनल के एक अधिकारी का नम्बर लेकर फोन किया तो तो मुझे मौर्य टी.वी. से निकाल देने की धमकी दी गयी|

जब मैं बीमार हुआ तो चैनल के मेरे मित्रों चन्दन और अभय जी के द्वारा हालचाल पूछा गया| मुझे बताया गया कि मेरे एकाउंट में दस हजार भेजे गए हैं, लेकिन वो पैसा आज तक एकाउंट में नहीं आया|

जिला के रिपोर्टरों के साथ जो अन्याय हो रहा है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है| दुर्व्यवहार करने वाले लोगों का नाम यहां नहीं लिख रहा। उनसे बस यही कहूंगा कि एक बार जरूर अपनी आत्मा से पूछें कि वे ऐसा क्यों करते हैं| मैं अपना इस्तीफा दे रहा हूं, मैंने जब तक कार्य किया पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ किया|

धन्यवाद ||

आप का विश्वासी

मुकेश कुमार

समस्तीपुर

बिहार

पत्रकारों के उत्पीड़न के खिलाफ मुंबई में 24 को धरना-प्रदर्शन

मुंबई के आजाद मैदान में 24 सितंबर को धरना प्रदर्शन होगा. देश भर में पत्रकारों के उत्पीड़न के खिलाफ यह धरना प्रदर्शन किया जाएगा. धरने का आयोजन इंटरनेशनल प्रेस कम्युनिटी की तरफ से किया गया है. कम्युनिटी के नेशनल प्रेसीडेंट डा. परमिंदर पांडेय की तरफ से देश भर के पत्रकारों से अपील किया गया है कि वे लोग 24 सितंबर को मुंबई के आजाद मैदान में पहुंचें और दिन में बारह बजे से 4 बजे तक इस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लें.

कम्युनिटी के राष्ट्रीय प्रवक्त विनय पाठक ने बताया कि धरना प्रदर्शन के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को एक ज्ञापन दिया जाएगा. विनय पाठक के मुताबिक हाल के दिनों में महाराष्ट्र समेत पूरे देश में पत्रकारों के उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं. भड़ास के संस्थापक यशवंत और संपादक अनिल को यूपी पुलिस ने झूठे आरोपो में फंसाकर जेल भेज दिया था. ऐसे ही कई अन्य पत्रकारों को सिस्टम से प्रताड़ना मिल रही है. इन्हीं सबके खिलाफ धरना प्रदर्शन का आयोजन किया गया है.

आज समाज, फरीदाबाद के ब्यूरो चीफ बने शकुन रघुवंशी, हरिंदर स्वामी की नई पारी

शकुन रघुवंशी ने एनबीटी, फरीदाबाद को छोड़कर आज समाज, फरीदाबाद के लिए नयी पारी शुरू की है. वह आज समाज, फरीदाबाद में ब्यूरो चीफ के रूप में काम करेंगे. शकुन करीब 15 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. शकुन ने आज समाज ज्वाइन करने की पुष्टि की है.

दूसरी और हरिंदर स्वामी ने भी इंडिया न्यूज़ के मार्केटिंग टीम में बतौर असिस्टंट मैनेजर, गुडगाँव ज्वाइन किया है. वह पिछले 7 साल से विभिन्न अख़बारों के मार्केटिंग कर रहे थे.

दिग्विजय मिश्रा इंडिया न्यूज में, चंदन राय फिर पहुंचे चैनल वन

दिग्विजय मिश्रा को इंडिया न्यूज चैनल की तरफ से पूर्वी उत्तर प्रदेश का पोलिटिकल एडिटर नियुक्त किया गया है. इनफारमेशन टीवी प्राइवेट लिमिटेड की तरफ से दिग्विजय को नियुक्ति पत्र जारी कर दिया गया है.

चंदन राय फिर से चैनल वन के साथ जुड़ गए हैं. वे पहले भी चैनल वन में थे लेकिन बीच में वे हमार टीवी के साथ वेस्ट यूपी चीफ के रूप में जुड़ गए थे. चंदन कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं.

 

यूपी में पत्रकार का दिनदहाड़े अपहरण

अलीगढ़ से खबर है कि कासिमपुर के एक पत्रकार का अपहरण कर लिया गया। पत्रकार ने मित्र के फोन पर मैसेज भेज कर मदद की गुहार की है। बाद में उनकी लोकेशन अलवर, राजस्थान में मिली। मूल रूप से कायमगंज फर्रुखाबाद निवासी अभय गंगवार दिल्ली से प्रकाशित एक समाचारपत्र से संबद्ध हैं। वह पत्‍‌नी प्रीति और डेढ़ वर्ष का बेटा शौर्य के साथ जवां थाना क्षेत्र के कासिमपुर में रह रहे हैं। अभय गंगवार कुछ साल पहले तक कासिमपुर पावर हाउस में एक ठेकेदार के साथ काम करते थे। ठेकेदार से ठनी तो उन्होंने साथ छोड़ दिया और अखबार से जुड़ गए।

बताया जाता है कि अभय ने अपने पत्रकार मित्र के मोबाइल फोन पर मैसेज भेजा कि वह मुसीबत में हैं, कुछ लोग उनका अपहरण करके ले जा रहे हैं। फिलहाल वह राजस्थान में हैं। मित्र ने जवां के एसओ ओपी राणा को फोन पर मिले मैसेज से अवगत करा दिया है। एसओ का कहना है कि अब तक की पड़ताल से मालूम हुआ है कि कि लाल रंग की कार पर सवार कासिमपुर के दो युवक राजस्थान में टेंडर दिलाने के बहाने गंगवार को अपने साथ ले गए थे। दोपहर को वह अपनी ससुराल दिल्ली से ये कहकर चले थे कि घूमने जा रहा हूं। उनकी पत्‍‌नी प्रीति का कहना है कि शाम सात बजे बात हुई थी, तब बताया था कि वह अलवर में हैं। बाद में देर रात तक मोबाइल फोन पर उनसे संपर्क नहीं हो सका।
 

न्यूड वीडियो रिकॉर्डिंग के शक में अमृता प्रीतम का बेटा नवराज क्वात्रा!

मुंबई। मशहूर पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम के बेटे नवराज क्वात्रा के मर्डर के राज पुलिस को पता चल गए हैं। इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पकड़े गए लोगों में 21 साल की सविता गुप्ता, 24 वर्षीय उसका बॉयफ्रेंड विनय बोस, 17 साल का उसका भाई सिद्धात (बदला नाम) और विनय का 21 साल का दोस्त गौराक खवले शामिल हैं। 65 साल के नवराज का मर्डर 14 सितंबर को बोरिवली की एलआईसी कालोनी स्थित वाइल्डरनेस बिल्डिंग के उनके फ्लैट में कर दिया गया था।

पुलिस ने नवराज के मर्डर की वजह लूट बताई है। लेकिन इस मामले की जांच कर रही मुंबई क्राइम ब्रांच का कहना है कि नवराज सविता गुप्ता के साथ छेड़छाड़ करता था, तभी उसका खून कर दिया गया। क्राइम ब्रांच ने सवाल उठाया कि लूट के लिए किए गए हत्याकांड में सविता का भाई और बॉयफ्रैंड दोनों क्यों शामिल थे? पुलिस और क्राइम ब्राच की छानबीन में पता चला है कि सविता मुंबई के वर्ली इलाके की रहने वाली है और बीपीओ में काम करती है। यहीं मुलाकात होने के बाद उसका अफेयर विनय से हुआ। विनय गोरेगाव के एक होटल में काम करता है।

पुलिस के मुताबिक, विनय ने सविता को 50,000 रुपए की जरूरत के बारे में सविता को बताया, तो सविता ने नवराज को लूटने की तरकीब दी। विनय, गौरांक और सविता के भाई सिद्धांत के साथ 14 सितंबर को दो बार वाइल्डनेस बिल्डिंग गया, जहां नवराज रहता था। लेकिन पहली बार आरोपी अपने इरादे में कामयाब नहीं हो पाए। दरअसल उस समय नवराज का कंप्यूटर इंजीनियर वहीं मौजूद था। लेकिन कंप्यूटर इंजीनियर के निकलते हुए आरोपियों ने घर में घुसकर नवराज का कत्ल कर दिया। वे घर से 55,000 रुपए और एक कैमरा ले गए।

हालाकि, मुंबई क्राइम ब्रांच की कहानी अलग है। क्राइम ब्रांच से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सविता नवराज की असिस्टेंट थी। इसे 7,000 रुपए पगार मिलती थी। नवराज घर में अक्सर उससे अलमारी से अच्छे कपड़े निकाल कर पहन लेने को कहते थे। सविता के कपड़े चेंज करने जाने पर नवराज उसे सीसीटीवी पर देखता था।

सविता को इस बात का बिलकुल भी इल्म नहीं था कि नवराज के घर में जगह-जगह सीसीटीवी कैमरा लगे हुए हैं। बाद में पता चलने पर सविता को शक हुआ कि नवराज ने उसकी न्यूड वीडियो रिकॉर्डिग कर ली है। यह बात उसने अपने भाई और बॉयफ्रैंड को बताई, जिसके बाद इन दोनों ने नवराज का कत्ल कर दिया।

दिल्ली से ताल्लुक रखने वाला नवराज करीब 10 साल पहले से मुंबई रहने लगा। इस मर्डर मिस्ट्री की गुत्थी नवराज के मोबाइल से सुलझी। डीसीपी महेश पाटील, इंस्पेक्टर वेले, संतोष दलवी और रविराज जाधव की टीम ने पिछले एक सप्ताह में 65 साल के नवराज के मोबाइल नंबर के प्रिंट आउट्स की पड़ताल की, तो उन्हें उनमें से 296 लड़कियों के नंबर मिले। इन्हीं 296 में से करीब 100 को फिर पूछताछ के लिए बुलाया गया और फिर उसी में 21 साल की सविता गुप्ता पर शक सबसे ज्यादा गहरा गया। (दैनिक जागरण)

दंगे भड़काता, आग लगाता पश्चिमी मीडिया

 

चाहे सोशल मीडिया हो या मेन-स्ट्रीम, पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका में दोनों ही पर इनदिनों दंगे भड़काने के आरोप लग रहे हैं। इतना ही नहीं, कुछ देशों में इसका जवाब भी मीडिया से ही देने की कोशिश जारी है। इस्लाम पर बनी फिल्म से मचा हंगामा अभी ठंढा भी नहीं पड़ा है कि इस बीच फ्रांस की एक पत्रिका में पैगंबर मोहम्मद के मज़ाक उड़ाते कार्टून छापे जाने को लेकर दुनिया के कई देशों में हिंसा की आशंका बढ़ गई है. इन देशों में एहतियाति क़दम उठाए जा रहे हैं.
 
जहां एक ओर अरब मीडिया पैगंबर पर छपे कार्टून की खबरों को संभल कर जारी कर रहा है वहीं ट्यूनिशिया में मामला भड़कने के डर से सभी फ्रांसीसी स्कूल बंद कर दिए गए हैं. समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक फ्रांस के खिलाफ़ हिंसा भड़कने के डर से दुनिया भर के 20 से ज्यादा अरब देशों में फ्रांसीसी दूतावास, स्कूल और सामुदायिक-सांस्कृतिक केंद्र बंद कर दिए गए हैं. 
 
मिस्र में मुस्लिम ब्रदरहुड की फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी ने फेसबुक के अपने पन्ने पर कार्टूनों की आलोचना करते हुए भड़काऊ प्रदर्शनों से दूर रहने की अपील की है वहीं सल्फी समुदाय के कुछ लोगों की ओर से प्रदर्शनों की अपील को अखबारों ने पहले पन्ने पर नहीं बल्कि दूसरे-तीसरे पन्नों पर ही जगह दी है.
 
गुरुवार को सौ से ज्यादा लोगों ने ईरान की राजधानी तेहरान में इस मुद्दे पर फ्रांस के दूतावास के सामने प्रदर्शन किया. इसके बाद सुरक्षा कारणों से दूतावास को बंद कर दिया गया. ईरानी मीडिया ने इस मामले को तूल न देने के नज़रिए से संतुलित रिपोर्टिंग की है. ईरान के कट्टरपंथी अखबार जम्हुरियते-इस्लामी ने इस विवाद के लिए अमरीका को ज़िम्मेदार बताया और कहा है कि फ्रांस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दोहरे मापदंड अपनाने की गुनहगार है क्योंकि वो अपने देश में मुसलमानों के इस अपमान के खिलाफ़ प्रदर्शन नहीं नहीं होने दे रहा है. वहीं पाकिस्तान में इस मुद्दे के खिलाफ़ 21 अगस्त को राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की गई है.
 
इस्लाम पर बनी फिल्म ‘इनोसेंस ऑफ़ मुस्लिम्स’ के विरोध के लिए शुक्रवार का दिन 'पैंगंबर के सम्मान' को समर्पित किया जाएगा. वहीं पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक ने ईश निंदा के खिलाफ़ संयुक्त राष्ट्र की ओर से नियम-कानून बनाए जाने की मांग की है. इस मामले पर हिंसा भड़कने के डर से सिंगापुर ने गूगल से मांग की है कि यू-ट्यूब पर इस फिल्म पर रोक लगा दी जाए.
 
उधर रूस की मीडिया ने कहा है कि फ्रांस में छपे कार्टूनों के मामले में ईश-निंदा से जुड़ा फैसला अदालतों पर छोड़ देना चाहिए वहीं सड़कों पर हो रहे हिंसक प्रदर्शन सही नहीं हैं. रूसी प्रेस ने ये सवाल भी उठाया है कि डचेज़ ऑफ़ कैंब्रिज की टॉपलेस तस्वीरें छापना अगर विनम्रता के लिहाज़ से सही नहीं है तो यही नियम पैगंबर मोहम्मद के कार्टूनों पर लागू क्यों नहीं होता? (बीबीसी)

टूट गई टीम-अन्ना, मीडिया से कहा: “क्यों मार रहे हो?”

 

करीब सवा साल पहले मीडिया के सहारे स्टार बने अन्ना हजारे का मोह अब उन्हें प्रचारित करने वालों से भंग होता दिख रहा है। अन्ना ने राजनीतिक पार्टी न बनाने का फैसला लिया है, लेकिन इसके ऐलान के कुछ ही देर बाद उन्होंने बाबा रामदेव के साथ गुप्त मीटिंग की। महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बैठक के बारे में वे किसी को कुछ भी बताने को तैयार नहीं हैं। हमेशा लोकशाही और पारदर्शिता की बात करने वाले अन्ना हजारे इस मुलाकात के सवाल पर ही चुप्पी साध लेते हैं।
 
बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। अन्ना अपनी बैठक के बारे में खबरें आने के बाद मीडिया से खासे नाराज नजर आ रहे हैं। कल तक कैमरा देखकर जोश से भर जाने वाले अन्ना जहां अपने आंदोलन की सफलता का श्रेय मीडिया को देते नहीं थकते थे वहीं अब वो मीडिया को देखकर ही गुस्सा हो जाते हैं। सवालों को टालते हुए कहते हैं, "क्यों मार रहे हो… क्यों मार रहे हो?"
 
सवाल ये उठता है कि अन्ना आहत हैं या नाराज़ या भड़के हुए? क्या उनकी और रामदेव की गुप्त मुलाकात की खबरें उछालने वाला मीडिया अब उन्हें विलेन नज़र आ रहा है या फिर वो इस खबर को दबाना चाहते थे? बाबा रामदेव के साथ उनकी मीटिंग के दौरान संघ के करीबी एक कारोबारी भी मौजूद थे। ऐसा माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद अन्ना और संघ को लेकर उठ रहे नए सवालों से वो व्यथित हैं।
 
उन्होंने कल तक अपने हनुमान माने जाने वाले अरविंद केजरीवाल से भी किनारा कर लिया है। उन्होंने केजरीवाल से अपने ब्रांडनेम इस्तेमाल करने से भी मना कर दिया है। अब आंदोलन से अलग सियासत की जमीन पर नए विकल्प तलाश रहे अरविंद केजरीवाल अन्ना हजारे के खुद के यूं किनारा करने से व्यथित हैं। घंटों बाद चुप्पी तोड़ते हुए वो बोले कि अन्ना का फैसला अप्रत्याशित है। 
 
झटके से उबरते हुए अरविंद अब अन्ना के बिना भी उनके ब्रांडनेम का इस्तेमाल कर राजनीतिक पार्टी बनाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। उन्होंने 'टीम अन्ना' के सदस्य प्रशांत भूषण, संजय सिंह, कुमार विश्वास और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की और बाद में बोले, "अन्ना भले ही अपनी तस्वीर के इस्तेमाल की इजाजत न दें लेकिन अन्ना की तस्वीर हमारे दिल में रहेगी। उनका आशीर्वाद हम हमेशा लेते रहेंगे। वे हमारे गुरु हैं, पिता हैं। अन्ना के पांच सिद्धांत हमारी बुनियाद बनेंगे।"
 
उधर, अन्ना खेमा भी किलेबंदी में जुट गया है। किरण बेदी ने महाराष्ट्र सदन में अन्ना से मुलाकात की। किरण राजनीतिक पार्टी बनाने के अरविंद के फैसले के सख्त खिलाफ थीं। उनकी तल्खी साफ झलकी। उन्होंने कहा कि अरविंद ने खुद ही कहा था कि अन्ना कहेंगे तो पार्टी नहीं बनाएंगे। अब क्यों बना रहे हैं ये उन्हीं से पूछिए।

जीएम ने दिया गाली तो हड़ताल पर गए ”स्वतंत्र चेतना” के कर्मचारी

गोरखपुर। हिन्दी दैनिक स्वतंत्र चेतना गोरखपुर के प्रधान कार्यालय के सभी पत्रकार, लोकल डेस्क, कम्प्यूटर आपरेटर, विज्ञापन प्रतिनिधि मंगलवार 18 सितम्बर को चेतना मसाले के महाप्रबंधक मुहम्मद याकूब खां (एमवाई खां) द्वारा सम्पादकीय में बैठकर वहां के सभी कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से भद्दी-भद्दी गालियां दिये जाने व वेतन न दिये जाने से नाराज होकर हड़ताल कर दिया। इससे लोकल प्रभारी को पुरानी खबरों से पेज भरकर काम चलाना पड़ा। कर्मचारियों के इस हड़ताल से अधिकारियों में हडकम्प मच गया। देर रात तक मामला मैनेज करने की कोशिश महाप्रबन्धक करते रहे लेकिन सफल नहीं हो पाये।

सूत्रों की माने तो बीते रविवार को देर रात चेतना मसाले और संस्था के महाप्रबंधक कार्यालय पहुंचे। वह उस समय काफी गुस्से में थे क्योंकि कार्यालय से कुछ सामान गायब हो गया था। तैश में आकर उन्होंने पूरे स्टाफ को भद्दी-भद्दी गालियों से नवाजना शुरू कर दिया। इससे पूरे स्टाफ में आक्रोश व्याप्त हो गया। सुत्रों की माने तो एक पत्रकार निर्भय गुप्ता ने अपना लिखित इस्तीफा प्रधान सम्पादक के टेबल पर रख दिया है। अन्य पत्रकारों और कर्मचारियों में काफी रोष है। उनका कहना है कि संस्थान में वेतन समय से नहीं मिलता है। इससे वहां के कर्मचारी भुखमरी के कगार पर है। जैसे तैसे वह अपना जीवन यापन कर रहे है।

”पंजाब की शक्ति” पंजाब से पहले हिमाचल में लांच

''पंजाब की शक्ति'' अखबार 17 सितम्बर को हिमाचल प्रदेश में लांच कर दिया गया. इसकी पुष्टि अख़बार के जीएम राजेश शर्मा ने की है. नए अखबार की लांचिंग पर प्रबंधन व पत्रकारों को कई तरफ से बधाइयाँ भी आ रही हैं. हिमाचल में सिर्फ दो जिलों अम्ब व हमीरपुर में अख़बार की लांचिंग हुई है, वहीं दूसरी ओर पंजाब में अपनी शक्ति दिखाने में यह अखबार अभी सफल नहीं हो सका है.

पंजाब में अभी तक बुकिंग और लांच करने की तैयारियों के दावे ही किए जा रहे हैं. पंजाब में इस अखबार की लांचिंग के बारे में पहले 30 सितम्बर कहा गया. अब लांचिंग डेट 16 अक्टूबर बताई जा रही है. बताया जाता है कि पंजाब में लांचिंग की तारीख में यह तब्दीली पांचवी बार हुई है. इस कारण पंजाब में गठित टीम भी खुल कर काम करने को तैयार नहीं है. पंजाब की शक्ति से जुड़े कई लोगों को प्रबंधक बाहर का रास्ता दिखा चुके हैं और कुछ उनकी नीति से नाखुश होकर अपने आप ही किनारा कर गये हैं. 

जालंधर से अरुण की रिपोर्ट.

चौथी दुनिया के वरिष्ठ कापी एडिटर महेंद्र अवधेश का घर शराब कारोबारी ने कब्जाया

ये हाल है यूपी में लॉ एंड आर्डर का. कामन मैन की कौन कहे, पत्रकारों के घर तक सुरक्षित नहीं हैं. ताजा मामला चौथी दुनिया हिंदी वीकली के सीनियर कापी एडिटर महेंद्र अवधेश का है. उन्होंने एक ग्रुप मेल भेजकर अपनी पीड़ा को बयान किया है. लीजिए, उनके मेल को पढ़िए और संबंधित अटैच्ड दस्तावेज देखिए. अगर लगे कि आपको महेंद्र अवधेश के लिए कुछ करना चाहिए तो जो भी कर सकते हैं, मेल, फोन, ज्ञापन, खबर, मुलाकात, दबाब…. जरूर करिए, वरना एक दिन आप भी इसी तरह के किसी चपेटे में आएंगे और आपके लिए भी कोई खड़ा होने वाला नहीं मिलेगा. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


महोदय, मैंने कानपुर स्थित अपने मकान पर एक शराब कारोबारी द्वारा अवैध कब्जे के सम्बन्ध में एक प्रार्थना पत्र मुख्यमंत्री समेत उत्तर प्रदेश शासन के विभिन्न अधिकारियों को भेजा है. मुख्यमंत्री कार्यालय से जाँच के आदेश हो चुके हैं लेकिन शराब कारोबारी रामू जैसवाल अब मेरा एक दूसरा हिस्सा भी कब्जाने की कोशिश कर रहा है. हम दिल्ली में हैं, हमारी मदद कीजिये. अटैचमेंट आपके अवलोकनार्थ प्रेषित है और सहायता की प्रार्थना है. मैंने श्रीप्रकाश जायसवाल को भी पत्र भेजा लेकिन उनहोंने कोई जवाब नहीं दिया और मदद नहीं की.

धन्यवाद सहित

महेंद्र अवधेश

वरिष्ठ कॉपी संपादक-चौथी दुनिया साप्ताहिक

पंजाब केसरी के विजय चोपड़ा को छह महीने कैद और जुर्माना

: दैनिक सवेरा ने प्रकाशित की पंजाब केसरी के मालिक को सजा की खबर : पंजाब केसरी अखबार के मालिक को तथ्यों से भ्रमित खबर छापने के एक मामले में कोर्ट ने छह माह की सजा सुनाई है. अखबार मालिक को सजा सुना दी जाए और इसकी खबर किसी बड़े अखबार में छप जाए, आप कल्पना नहीं कर सकते. यह मालिकों का आपसी गठजोड़ है. लेकिन नए अखबार हिम्मत करके इस गठजोड़ को तोड़ने में जुटे हैं जिसकी सराहना की जानी चाहिए.

विजय चोपड़ा को सजा की खबर को लीड न्यूज़ बनाकर दैनिक सवेरा नामक अखबार ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है. बताते हैं कि पंजाब केसरी और दैनिक सवेरा के बीच पुरानी तनातनी है. जालंधर से प्रकाशित पंजाब केसरी ग्रुप और उद्योगपति शीतल विज के बीच शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला बहुत पुराना है. जालंधर में होने वाले हर धार्मिक व सामाजिक समागमों में दोनों ही ग्रुप समय समय पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहते हैं.

शीतल विज प्रसिद्ध शक्ति पीठ देवी तलब मंदिर के कर्ताधर्ता बने हैं और पंजाब केसरी के खिलाफ मीडिया पैठ की कमी को दैनिक सवेरा लांच करके पूरी कर दी. बीते दिनों जब शीतल की एक फैक्ट्री ध्वस्त हुई थी और शीतल पुलिस हिरासत में थे तब केसरी ग्रुप ने पूरी निष्ठा से मामले को तूल दिया था जिसकी रंजिश शीतल के मन में बनी हुई थी. अब कोर्ट ने 2003 से चल रहे एक झूठी खबर मामले में ग्रुप के मुख्य संपादक विजय चोपड़ा को छह माह की कैद की सजा सुनाई तो इस खबर को पूरी तसल्ली से दैनिक सवेरा ने फ्रंट पेज पर छापा. जो भी हो, खबर छाप कर दैनिक सवेरा ने साहस का काम किया है और इसके लिए शीतल विज बधाई के पात्र हैं. ये है पूरी खबर… पढ़ने में न आए तो खबर की तस्वीर के उपर क्लिक कर दें…

जालंधर से अरुण की रिपोर्ट.

बिहार वित्त अंकेक्षण विभाग ने 2006 में ही अरबों का ”हिन्दुस्तान विज्ञापन घोटाला” उजागर कर दिया था

: लेकिन नेताओं-अफसरों-संपादकों की तिकड़ी ने कार्रवाई नहीं होने दी, फाइल को ही दबा दिया : दैनिक हिन्दुस्तान के लगभग दो सौ करोड़ के सरकारी विज्ञापन घोटाले के बारे में नित नई जानकारियां सामने आ रही हैं. बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग ने वित्तीय वर्ष 2005-06 में ही बिहार में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना की मिलीभगत से दैनिक हिन्दुस्तान द्वारा किए जा रहे सरकारी विज्ञापन के फर्जीवाड़े को उजागर किया था.

यही नहीं, दैनिक हिन्दुस्तान से अवैध ढंग से सरकारी विज्ञापन के प्रकाशन के मद से लगभग एक करोड़, पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपए की वसूली की सिफारिश भी की थी. इस तथ्य को मुंगेर के पुलिस अधीक्षक पी. कन्नन के निर्देशन में हुई जांच की रिपोर्ट में सहायक साक्ष्य के रूप में जोड़ा गया है. पुलिस उपाधीक्षक अरूण कुमार पंचालर ने अपनी पर्यवेक्षण टिप्पणी के पृष्ठ-05 और 06 में बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन (संख्या-195।2005-06) के मूल तथ्य को उद्धृत किया है.

पुलिस उपाधीक्षक ने पर्यवेक्षण टिप्पणी में लिखा है –‘अनुसंधान में प्रगति-पर्यवेक्षण के क्रम में अभियोजन पक्ष की तरफ से निम्नांकित दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। (1) बिहार सरकार के वित्त अंकेक्षण विभाग के पत्रांक -178। वि0अं0, दिनांक 08-05-2006 जिसके माध्यम से  अंकेक्षण प्रतिवेदन संख्या निर्गत है। इसके अवलोकन से विदित होता है कि अंकेक्षण के दौरान अंकेक्षण दल ने यह पाया कि हिन्दुस्तान दैनिक को पटना संस्करण के अतिरिक्त मुजफफरपुर  तथा भागलपुर मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन दिखाकर उनके विज्ञापन के लिए अलग दर पर वर्ष 2002-03 एवं 2003-04 में कुल एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रुपये का अवैध भुगतान किया गया था जबकि मुजफफरपुर तथा भागलपुर कोई स्वतंत्र प्रकाशन या संस्करण नहीं है, वरन् पटना संस्करण के केवल मुद्रण केन्द्र हैं। इनके लिए अलग से कोई पंजीयन संख्या आर0एन0आई0 से नहीं प्राप्त हुआ था। पटना संस्करण की पंजीयन संख्या-44348।1986।पटना। ही इनका पंजीयन के रूप में अंकित था। अंकेक्षण के क्रम में उक्त दोनों मुद्रण केन्द्रों को स्वतंत्र प्रकाशन होने का कोई प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं पाया गया, क्योंकि इनके लिये अलग से कोई प्रिंट लाइन नहीं थी और न अलग पंजीयन था।

अंकेक्षण के दौरान पाया गया कि मुजफफरपुर और भागलपुर लाइन से कोई प्रकाशन नहीं होता है। इस बात की पुष्टि अंकेक्षण के दौरान हिन्दुस्तान दैनिक के प्रतिनिधियों द्वारा भी किया गया कि मुजफ्फरपुर एवं भागलपुर के लिये पंजीयन एवं मास्ट हेड वही है जो पटना के लिए है। इस आधार पर केवल मुजफ्फरपुर या भागलपुर में विज्ञापन छापने के लिए हिन्दुस्तान दैनिक तैयार नहीं था एवं संयुक्त रूप से पटना, मुजफफरपुर तथा भागलपुर तीनों में छापने के लिये सरकार को बाध्य किया।

अंकेक्षण के दौरान यह पाया गया कि दिनांक 28-03-2001 से मुजफफरपुर एवं दिनांक 03 अगस्त, 2001 से भागलपुर में मुद्रण केन्द्र प्रारंभ किया गया। प्रेस पुस्तक पंजीयन  अधिनियम-1867 के तहत प्रकाशन का कार्य प्रारंभ करने के पूर्व जिलाधिकारी के समक्ष विहित प्रपत्र में घोषण करना, कंपनी रजिस्ट्रार से अनुमति प्राप्त करना और भारत सरकार के समाचार पत्र पंजीयक से पंजीयन कराना अनिवार्य था, जो नहीं कराया गया।

सभी अभियुक्तों के विरूद्ध प्रथम दृष्टया आरोप प्रमाणित

मुंगेर पुलिस ने कोतवाली कांड संख्या-445।2011 में सभी नामजद अभियुक्त ।1। शोभना भरतिया, अध्यक्ष, दी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली ।2। शशि शेखर, प्रधान संपादक, दैनिक हिन्दुस्तान, नई दिल्ली ।3। अकु श्रीवास्तव, कार्यकारी संपादक, हिन्दुस्तान, पटना संस्करण ।4। बिनोद बंधु, स्थानीय संपादक, हिन्दुस्तान, भागलपुर संस्करण और ।5। अमित चोपड़ा, मुद्रक एवं प्रकाशक, मेसर्स हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड, नई दिल्ली के विरूद्ध भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420।471।476 और प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट, 1867 की धाराएं 8।बी0।,14 एवं 15 के तहत लगाए गए सभी आरोपों को अनुसंधान और पर्यवेक्षण में ‘सत्य‘ घोषित कर दिया है। देश के सांसद और बिहार के विधायक इस विज्ञापन घोटाले को आगामी संसद सत्र व बिहार विधानसभा और विधान परिषद में उठाने की तैयारी कर रहे हैं।

दुर्भाग्य की बात है कि आर्थिक अपराधियों के विरूद्ध युद्ध चलाने की घोषणा करने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की सरकार के उंचे पदों पर विराजमान अधिकारियों ने वित्त अंकेक्षण विभाग  की अंकेक्षण रिपोर्ट को कूड़ेदान में डाल दिया है। कालांतर में वित्त अंकेक्षण विभाग की आपत्तियों को रहस्यमय ढंग से विलोपित कर दिया गया। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, पटना ने वित्त अंकेक्षण विभाग की एक करोड़ पन्द्रह हजार नौ सौ पचपन रूपए के अवैध भुगतान की हिन्दुस्तान से वसूली की सिफारिश को भी कूड़ेदान में डाल दिया। केन्द्र और राज्य सरकार की सभी जांच एजेंसियों और सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों के लिए यह जांच का विषय है कि किन-किन लोगों ने किन-किन स्तर पर दैनिक हिन्दुस्तान के सरकारी विज्ञापन घोटाले की संचिकाओं को जमीन के अन्दर गाड़ने का काम किया?

प्रिंट मीडिया के आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त होने के पर्याप्त कागजी साक्ष्य आने के बाद भी 2006 से 2012 तक किसी भी स्तर से सरकारी जांच एजेंसियों ने दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक जागरण के सरकारी विज्ञापन घोटालों की जांच शुरू नहीं की। जांच शुरू नहीं होने से आम लोगों की आस्था केन्द्र और राज्य सरकारों की घोषणाओं पर से उठती जा रही है। बिहार सरकार को हर स्तर पर कागजात के साथ दैनिक हिन्दुस्तान के विज्ञापन घोटाले में कानूनी कार्रवाई का अनुरोध किया गया, परन्तु सरकार ने 2006 से लेकर अब तक अपने स्तर से दोषी कारपोरेट प्रिंट मीडिया के मालिकों और संपादकों के विरूद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की। अंत में हार कर सामाजिक कार्यकर्ता मन्टू शर्मा ने मुंगेर में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के न्यायालय में परिवाद पत्र दायर किया और न्यायालय ने पूरे मामले में अनुसंधान का आदेश मुंगेर कोतवाली को दिया। इस कांड के पर्यवेक्षण में अभियोजन पक्ष ने वित्त अंकेक्षण विभाग के अंकेक्षण प्रतिवेदन -195।2005-06 को जांच कर रहे पुलिस अधिकारी के समक्ष सहायक साक्ष्य के रूप में पेश कर दिया।

मुंगेर से श्रीकृष्ण प्रसाद की रिपोर्ट.


इससे संबंधित पिछली सभी रिपोर्टों को पढ़ने के लिए आगे दिए गए रंगीन शीर्षक पर क्लिक करें- हिंदुस्तान अखबार ने बिहार में किया अरबों का घोटाला

दैनिक भास्कर के इशारे पर जयपुर में हॉकर यूनियन के बुज़ुर्ग नेता की पिटाई

कुछ महीना पहले जयपुर में हॉकरों ने कमीशन बढ़ाने को लेकर हड़ताल कर दिया था और पांच दिन तक कोई भी अखबार नहीं बांटा. इस कारण अखबार में कार्यरत कर्मचारियों को अखबार बांटने पड़े. हड़ताल को भास्कर ने दिल से लगा लिया और हॉकरों में फूट डालने की ठान ली.  योजना बनाकर हॉकर यूनियन महासंघ के अध्यक्ष मूलचंद प्रजापति को एक जाति विशेष के हॉकरों को आगे कर अखबारों की मंडी में ही पिटवा दिया.

खबर है कि भास्कर को यह डर सता रहा था कि दीवाली का त्यौहार आने वाला है, उस समय यह लोग कुछ गड़बड़ कर सकते हैं. आरोप है कि भास्कर के सीओ मनोज अग्रवाल ने अपने कुछ कर्मचारियों को आगे कर उनके रिश्तेदारों से मूलचंद को पिटवा दिया. जब मूलचंद की पिटाई हो रही थी तब भास्कर के कर्मचारी भी पीटने वालों के साथ थे, पिटाई के बाद जब प्रजापति माणक चौक थाने रिपोर्ट दर्ज कराने गए तो काफी मशक्कत करनी पड़ी.

बाद में पीटने वाले ग्रुप ने भी मूलचंद व उनके बेटे सोहन के अलावा कुछ लोगों पर एसटी एससी का केस बनवाने की कोशिश की लेकिन उनकी रिपोर्ट अभी दर्ज नहीं हुई है. पुलिस जाँच कर रही है. बताया जाता है कि मूलचंद पत्रिका के समर्थक हैं, लेकिन पांच दिन की हड़ताल में उसने पत्रिका भी नहीं बंटने दिया, इसके बाद भी पत्रिका मैनेजमेंट को मूलचंद से कोई शिकायत नहीं है.

लेकिन भास्कर के वीपी विनय माहेश्वरी, सीओ मनोज अग्रवाल और स्टेट हेड एसएमडी प्रवीण माथुर ने मूलचंद से पक्की दुश्मनी बना ली है, क्यूंकि तीनों अधिकारियों को मालिकों की तगड़ी डांट खानी पड़ी है. उसी के बाद से एमडी सुधीर अग्रवाल दो-तीन बार राजस्थान का दौरा कर चुके हैं. मूलचंद पर हमले की घटना से जयपुर के हॉकरों में आक्रोश बढ़ गया है. कुछ पुराने हॉकरों का कहना है कि हमारे नेता के साथ भास्कर ने जो किया है उसका भुगतान उसे ज़रूर करना पड़ेगा. अस्सी साल के बुज़ुर्ग नेता के साथ मारपीट की घटना बहुत ही शर्मनाक और आपत्तिजनक है. नीचे संबंधित लोगों के मोबाइल नंबर दिए जा रहे हैं. उनसे बात करके पूरे प्रकरण के बारे में जानकारी ली जा सकती है….

जयपुर समाचार पत्र वितरक संघ के अध्यक्ष मूलचंद प्रजापति का मोबाइल नंबर है-09351329275

वीएनसी सेंटर के अध्यक्ष राजेंद्र सिंह कछावा का मोबाइल नंबर है- 09928936633 

सांयकालीन समाचार पत्र वितरक संघ के अध्यक्ष सांवरिया छीपा का मोबाइल नंबर है-09352925663

दलित सरपंच को मटका नहीं छूने देता सवर्ण ग्राम सेवक!

: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की दो दिवसीय जनसुनवाई के सामने उजागर हुए दलित अत्याचार के मामलों में उपेक्षा के कारनामे : ‘मैं गांव का सरपंच हूं परंतु मेरा ग्राम सचिव जो मेरे अधीन है, मुझे पानी का मटका छूने तक नहीं देता, क्योंकि वह ब्राम्हण है और मैं नीची जात का दलित।’गिरधारीलाल मौर्य की यह बात सुनते ही उस मीटिंग हाल में सन्नाटा छा गया। गिरधारी लाल मौर्य राजस्थान की राजधानी जयपुर की जमवारामगढ़ तहसील की ग्राम पंचायत खरकड़ा का सरपंच है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सुनवाई कार्यक्रम में उसे भी अपनी व्यथा सुनाने का मौका मिला था। आयोग अध्यक्ष न्यायमूर्ति केजी बालाकृष्णन समेत आयोग के सदस्य और राजस्थान के मुख्य सचिव सीके मैथ्यू समेत आला अधिकारी उसकी बात सुनकर अवाक रह गए।

गिरधारी ने आगे बताया, ‘उंची जात वालों सवर्ण की रसोई में कुत्ते-बिल्ली जाकर खा-पी सकते हैं, परंतु दलितों को आज भी अंदर झांकने तक नहीं दिया जाता। आजादी के 66 साल बाद भी दलित उनके मटके से पानी नहीं पी सकते। उनकी मौजूदगी में खाट पलंग या चारपाई पर बैठना अपराध है। ऐसे कई मामले हैं अगर हममें से कोई जात-पांत भेदभाव या छूत-अछूत की बात कहता है तो हमारे खिलाफ सरकारी कामकाज में बाधा के झूठे मुकदमे दर्ज करवाकर थाने में बंद करवा देते हैं।’

मानवाधिकार आयोग अपनी पूर्व निर्धारित दलितों की जनसुनवाई में 13 व 14 सितंबर 2012 को लगातार दो दिन राजस्थान की ऐेसी कई दर्दनाक हकीकतों से रूबरू हुआ जो इस तथ्य का जीता जागता सबूत थीं कि सदियों से कुछ नहीं बदला है। सुनवाई हरीशचंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान में आयोजित की गई थी। इसके लिए अखबारो में विज्ञापन के जरिए 25 जुलाई तक राजस्थान के दलितो से सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए अत्याचार या उनके द्वारा अत्याचार रोकने में बरती गई लापरवाही की शिकायत मांगी गई थी।

यदि और कोई अवसर होता या किसी और वर्ग पर अत्याचार की बात होती तो शायद मीडिया आधा पेज से ज्यादा कवरेज देता और टीवी चैनल के लिए गिरधारी लाल की बात ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन जाती परंतु यह सुनवाई मीडिया की उपेक्षा की शिकार का उदाहरण बन गई। राजस्थान पत्रिका जैसे अखबार के मालिक गुलाब कोठारी जो हर हफते अपने अखबार में मानवीय संवेदना और संस्कृति की लम्बी-चैड़ी बातें लिखते हैं परंतु आरक्षण को लेकर अपनी सवर्ण मानसिकता छिपा नहीं पाते ने भी इस सुनवाई को लगभग पूरी तरह उपेक्षित कर अपनी मानसिकता जाहिर कर दी।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले जोधपुर के शेरगढ़ उपखंड के जेठानिया गांव के सात परिवारों ने हुक्का-पानी बंद होने की व्यथा सुनाई। मिनी बस की टक्कर से एक युवक की मौत के बाद उसके रिश्तेदारों ने बस वाले से जुड़े सात परिवारों का सामाजिक बहिष्कार करवा रखा है। हालांकि पुलिस ने दुर्घटना के आरोप में ड्राईवर समेत तीन लोगों को गिरफतार कर जेल में डाल दिया फिर भी वे पांच लाख रूपए मुआवजे की मांग पर अड़ गए। जब देने में असमर्थता बताई गई तो उन पर दूसरे तरीके से अत्याचार शुरू कर दिए गए।

पीड़ित पक्ष के शुगर मरीज बाबूलाल की तबियत बिगड़ने पर कोई उन्हें इलाज के लिए जोधपुर अस्पताल ले जाने के लिए तैयार नहीं हुआ, परिणामस्वरूप 31 अगस्त को 40 साल के बाबूलाल ने दम तोड़ दिया। इतना ही नहीं 36 घंटे तक गांव में अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया, उसकी लाश पड़ी रही। आखिरकार 42 किलोमीटर दूर चतुरपुरा गांव जाकर दाह-संस्कार करना पड़ा। सामाजिक बहिष्कार के चलते गांव के 12 बच्चों को शिक्षकों ने स्कूल में पढ़ाने से मना कर दिया है। इस मामले में पीडि़तो की ओर से 42 लोगों के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाया हुआ है परंतु पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही क्योंकि विधायक बाबू सिंह राठौड़ आरोपियों के साथ हैं।

राजधानी जयपुर के फागी उपखंड के रामेदव बैरवा के मामले में जयपुर के जिला कलेक्टर नवीन महाजन ने कहा कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री रद्द कराने के लिए अलग कानून है। आयोग सदस्य सत्यव्रत पाल ने पूछा, कौन सा कानून है? तो महाजन जवाब नहीं दे सके। सांभर तहसील में भूमि आंवटन के मामले में फटकार के बाद कलेक्टर महाजन ने माना कि गलत आवंटन हो गया है। अपने नंबर बढ़वाने आए राज्य के श्रम आयुक्त राजेश यादव का नंबर आया तो उनसे पूछा गया कि मुक्त कराए गए बंधुआ मजदूरों की जाति क्या है? तो वे बोले कि ऐसी सूचना नहीं रखी जाती। दलित मजदूर होने का जिक्र आया तो आयोग सदस्य ने यादव को कानून पढ़कर मुआवजे की राशि बताई।

राजधानी जयपुर से सटे जिले दौसा की श्रीमती सजना देवी के पति की छह साल पहले हत्या हो गई थी। दर-दर भटकने के बावजूद उसे आज तक सरकारी मदद नहीं मिल पाई है। आयोग सदस्य बीसी पटेल के सामने जब यह मामला आया तो उन्होंने दौसा कलेक्टर आरएस जाखड़ की जमकर खिंचाई की। उन्होंने इस ढिलाई पर नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन पर कानून का मखौल उड़ाने और मामला ठंडे बस्ते में डाल देने आरोप लगाया। इस पर कलेक्टर जाखड़ ने मृतक के बच्चों की पढ़ाई और विधवा को तीन हजार महीना पेंशन के इंतजाम की बात कही।

पाकिस्तान से सटे बालोतरा निवासी गणपत लाल ने बताया कि पश्चिमी राजस्थान में नाई दलितों के बाल नहीं काटते। गोपाल केशावत ने कहा कि सांसी, नट, कंजर, बावरिया आदि जाति के महिला-पुरूषों को पुलिस आए दिन गिरफतार कर थाने में बंद कर देती है।
राजस्थान में किस हद तक दलित अत्याचार है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयोग को सुनवाई के लिए करीब 300 शिकायतें मिलीं परंतु उन्होने 114 का ही चयन किया। इन 114 में भी आयोग को सुनवाई के लिए 17 सदस्यीय दल लाना पड़ा जिनकी दो बैंच बनानी पड़ी और राजस्थान के 32 जिलों में से 25 जिलों के पुलिस अधीक्षक और 17 जिले के कलेक्टरों को दलित अत्याचार के मामले में सुनवाई के दौरान उपस्थित रहने, जवाब देने और समाधान करने के लिए बुलाना पड़ा।

हैरानी की बात है कि सुनवाई के पहले आयोग अध्यक्ष मुख्य न्यायाधिपति ने यह रहस्योद्घाटन किया कि राजस्थान में दलित अत्याचार की दर राष्ट्रीय औसत दर से करीब तीन गुना अधिक है। मुख्य सचिव सीके मैथ्यू ने भी माना कि प्रदेश में दलितों पर अत्याचार के मुकदमे अधिक दर्ज हो रहे हैं जबकि सजा की दर काफी कम है। 

राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के अजमेर के निवासी हैं. करीब दो दशक तक सक्रिय पत्रकारिता में रहे. अब पूर्णकालिक वकील हैं. यदा-कदा लेखन भी करते हैं. लॉ और जर्नलिज्म के स्टूडेंट्स को पढ़ा भी रहे हैं. उनसे संपर्क 09549155160, 09829270160 के जरिए किया जा सकता है.

क्या एनएमटीवी फर्जी न्यूज चैनल है?

मुंबई के एक वकील व पत्रकार हैं विनोद गंगवार. किसी न किसी मुद्दे पर वे मेल भेजो अभियान चलाए रहते हैं. इन दिनों उन्होंने एक चैनल एमएनटीवी को निशाने पर लिया है. एक मेल के जरिए उन्होंने बताया है कि नवी मुम्बई एवं मुम्बई में एनएमटीवी नाम का अवैध न्यूज टीवी चैनल पिछले दस सालों से बेरोकटोक चल रहा है. इनके मुताबिक भारत सरकार ने एनएमटीवी नाम से कोई लाइसेंस कभी जारी नहीं किया,

बावजूद इसके इस चैनल के मालिक और फर्जी पत्रकार रवि सुबईया और जेबा वारसिया नवी मुंबई और मुंबई में अपना टीवी चैनल चला रहे हैं. और ना सिर्फ चला रहे हैं बल्कि पत्रकारिता के नाम पर कहीं भी पहुंच जाते हैं. विनोद गंगवार ने रवि सुबइया और जेबा वारसिया पर तमाम तरह के आरोप लगाए हैं. विनोद गंगवार के मुताबिक इनके पास केबल ऑपरेटर का लायसेंस है और इसी लायसेंस के सहारे चैनल चला रहे हैं और मुख्यमंत्री तक का भी ले लेते हैं इंटरव्यू.

गंगवार के मुताबिक फर्जी पत्रकार रवि सुबईया और जेबा वारसिया ने एक केबल ऑपरेटर का लायसेंस महज दिखावे के लिये ले रखा है, और इसी की आड़ में इन्होंने अवैध पत्रकारिता की अपनी दुकान खोल रखी है. ये दोनों पत्रकारिता के नाम पर कहीं भी पहुंच जाते है और वहीं से शुरु हो जाता है ब्लेकमेलिंग और हफ्तावसूली का खेल. इनके खिलाफ पिछले साल ही गजरा बिल्डर ने दो करोड रुपयों के एक्सटॉर्शन यानि वसूली की शिकायत खारघर पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई थी. केबल ऑपरेटर के लायसेंस की आड में यह दोनो आम जनता को दिखाते है कि वो एक टीवी चॅनल के मालिक व पत्रकार हैं. कोई भी अगर इनके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसको बदनाम कर दिया जाता है. ये दोनों इस आपराधिक पत्रकारिता के धंधे में पिछले कई सालों से लगे हैं और इसी के चलते इन्होंने एक तरफ तो शानदार काली कमाई के जरिये काफी दौलत बटोरी है और दूसरी तरफ कई दिग्गज नेताओं, सरकारी अफसरों, और बिल्डरों तक से करीबी रिश्ते बना लिये हैं.

गजरा बिल्डर की तरफ से लगाए गए आरोप का वीडियो देखने के लिए क्लिक करें…

http://www.bhadas4media.com/video/viewvideo/629/man-and-struggle/gajara-builder-saying-nmtv-demanded-rs-two-crore-extortion.html

इनके क्रिमिनल और पॉलिटिकल कनेक्शन का ही कमाल है कि अदालत के आदेश के बाद भी नवी मुंबई और मुंबई में इस भ्रष्ट पत्रकार रवी सुबईया का न्यूज चैनल आज भी बदस्तूर चालू है. जबकि इनके पास भारत सरकार के किसी भी विभाग द्वारा नियमानुसार न्यूज चैनल चलाने की इजाजत नहीं है और इनके पास सिर्फ केबल ऑपरेटर का ही लाइसेंस है.

वकील एवं पत्रकार विनोद गंगवाल का कहना है कि उन्होंने इस कथित पत्रकार के बारे में एवं इसके अवैध चैनल के बारे में शिकायत की और इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच की मांग की तो इस फर्जी पत्रकार ने अपने अवैध चैनल के बारे में जानकारी और सफाई देने के बजाये विनोद गंगवाल पर ही बेबुनियाद आरोप लगाने शुरू कर दिये तथा उनके बारे में गलत, आधारहीन और भ्रामक जानकारी अपने न्यूज चैनल के जरिये प्रसारित करनी शुरू कर दी.

ये है विनोद गंगवार द्वारा जारी किया गया पोस्टर…..

भंडाफोड़india.com न्यूज वेबसाइट विधिवत लांच

दिल्ली/गुडग़ांव : भंडाफोड़india.com न्यूज वेबसाइट की विधिवत लाउंचिंग हो गई। साथ ही नई दिल्ली महिपालपुर एवं गुडग़ांव स्थित कार्यालयों का भी उद्घाटन किया गया। उक्त दोनों ही कार्य डिप्टी मेयर परमिंदर कटारिया व मंगत राम बागड़ी के हाथों संपन्न हुआ।

इस अवसर पर डिप्टी मेयर कटारिया ने कहा कि आज के समय में मीडिया की जिम्मेदारी बढ़ गई है। पत्रकार अपनी जान पर खेलकर समाचारों का संकलन करते हैं और भ्रष्टाचार या अन्य बुराइयों से पर्दा उठाकर जनता के सामने लाते हैं। ऐसे में भंडाफोड़india से लोगों की उम्मीदें और भी बढ़ गई है।

पार्षद मंगतराम बागड़ी ने अपने संबोधन में कहा कि भंडाफोड़ इंडिया न्यूज वेबसाइट से हम सभी को बहुत ज्यादा उम्मीद है। भ्रष्टाचारियों से पर्दा उठाकर उन्हें बेनकाब करके ही समाज सुधारा जा सकता है। जब तक भ्रष्टाचारी बचते रहेंगे तब तक इस देश का भला नहीं होने वाला है। इस वेबसाइट को नाम के हिसाब से काम कर मिशाल कायम करना होगा। आज के इस शुभ अवसर पर उन्होंने भंडाफोड़india परिवार को ढेर सारी शुभकामनाएं दी।

आजतक गुडग़ांव के संपादक सतबीर भारद्वाज ने कहा कि भंडाफोड़india का प्रयास सराहनीय है। सफलता जरूर मिलेगी। उन्होंने पत्रकारों को सलाह दी कि खबरों को लिखते समय किसी विद्वेष को सामने नहीं आने दें, क्योंकि इससे एलो पत्रकारिता को बल मिलता है। भंडाफोड़ इंडिया वेबसाइट के समूह संपादक कुमार मधुकर व चीफ रिपोर्टर रामबीर शर्मा ने प्रोजेक्टर के माध्यम से उपस्थित लोगों भंडाफोड़ इंडिया के बारे में विस्तृत जानकारी दी।

इस अवसर पर इस अवसर पर पत्रकार उमाशंकर, मनोजधर द्विवेदी, गौरव तिवारी, भगवत, समाज सेवी मूलचंद शर्मा, ब्यूरोचीफ विनय चौधरी, पत्रकार अश्वन ऐलावादी, नरेश शर्मा, धर्मेंद्र शर्मा, डा. विनय यादव, पंकज त्यागी, सतपाल,  हितेष राय,मनोज गंभीर के अलावा समाज सेवी और पत्रकार उपस्थित थे।

सीएम और गवर्नर को सरेआम गालियां देता है शिबू सोरेन का पीए

झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन की गिरती हालत के सामने उनके पीए विवेक के रसूख का क्या आलम है? यदि आपको इसका आंकलन करना है तो शिबू सोरेन उर्फ गुरुजी के मोहराबादी स्थित सरकारी आवास चले जाइये। विवेक शुरुआती दौर में गुरुजी के बड़े पुत्र स्व. दुर्गा सोरेन का ड्राइवर था। उसके बाद छोटे पुत्र हेमंत सोरेन (अब वर्तमान उप मुख्यमंत्री) का ड्राइवर बन गया। उसके बाद गुरुजी की शरण में चला आया।

फिर क्या था गुरुजी जी की सत्ता की चाशनी लदबद होकर झारखंड विधान सभा में नौकरी पा ली। अब न जाने गुरुजी के परिवार में उसकी क्या औकात थी कि वह सेटिंग-गेटिंग कर राज्य के एक बड़े दल के सुप्रीमो सह भाजपा नीत मुंडा सरकार संचालन समिति के अध्यक्ष यानि गुरुजी का ही सरकारी पीए बन गया।

बस इतना सा ही सफर है विवेक का। यह कभी भी झामुमो पार्टी का किसी छोटे या बड़े पद पर नहीं रहा। लेकिन आज इसका बोलबाला देखिये कि ये शख्स सरेआम सीएम और गवर्नर को गालियां देता है। डिप्टी सीएम को दलाल शब्द से विभूषित करता है। वरीय पार्टी कार्यकर्ताओं को भींगे कपड़ों की तरह निचोड़ डालता है।

देखिये सबसे बड़ा आश्चर्य। वह गाल ठोक कर करता है। वह भी तब, जब सामने गुरुजी बैठे हों और सब कुछ करीब से सुन रहे हों। फिर भी कोई रोक ठोक नहीं। मानो गुरुजी इस विधानसभा कर्मी के सामने बिल्कुल लाचार और असहाय हो गये हों।

कहने वाले यहां तक कहते हैं कि कभी चाकरी करने वाले विवेक ने गुरुजी को मानसिक तौर पर गुलाम बना लिया है। पार्टी में भी वही होता है, जैसा विवेक चाहता है। उसकी महात्वाकांक्षा चुनाव लड़ने की है।
विशेष, अब जरा संलग्न विडियो को गौर से देखिये और खुद आंकलन कीजिये:

http://bhadas4media.com/video/viewvideo/628/society-concern/shibu-pa.html

रांची से मुकेश भारतीय की रिपोर्ट.

काशी पत्रकार संघ का चुनाव सम्पन्न : केडीएन अध्यक्ष, राजेन्द्र रंगप्पा महामंत्री निर्वाचित

वाराणसी : रविवार को काशी पत्रकार संघ के द्विवार्षिक (वर्ष 2012-14) के चुनाव में कृष्णदेव नारायण राय 163 मत पाकर अध्यक्ष पद पर निर्वाचित हुए, वहीं महामंत्री पर राजेन्द्र रंगप्पा 142 मत पाकर विजयी घोषित हुए। उपाध्यक्ष पद पर क्रमशः कमल नयन मधुकर (129), पवन कुमार सिंह (124), और प्रमिला तिवारी (115) निर्वाचित घोषित हुयीं। मंत्री पद पर देव कुमार केशरी (163) और दीनबन्धु राय (153) विजयी हुए। कोषाध्यक्ष पद पर बृजबिहारी यादव (बी॰ बी॰ यादव) 134 मत पाकर निर्वाचित घोषित हुए।

सदस्य कार्यसमिति पद के पर राधेश्याम कमल (191), सियाराम यादव (169), शंकर चतुर्वेदी (163), प्रदीप कुमार (154), सुशील कुमार मिश्र (143), विमलेश चतुर्वेदी (113),  दिलीप कुमार (113), राजेश गुप्त (112), आनन्द कुमार मौर्या (110) तथा मिर्जा अतहर हुसैन (108) निर्वाचित घोषित हुए।

अध्यक्ष पद की होड़ में दूसरे स्थान पर रहे डा॰ दयानन्द को 54 मत मिले और सरोज सिनहा को मात्र 14 मत मिले। उपाध्यक्ष पद पर जयप्रकाश श्रीवास्तव को 112 और वीरेन्द्र श्रीवास्तव को 88 मत मिले। महामंत्री पद के प्रत्याशी रामात्मा श्रीवास्तव को 88 मत मिले। कोषाध्यक्ष पद पर सुभाष चन्द्र सिंह को 92 मत मिले तथा मंत्री पद पर मुन्ना लाल साहनी को 83 मत मिले। सदस्य कार्यसमिति पद पर अरविन्द कुमार को 107, अमित शर्मा को 103 तथा सुधीर गणोरकर को 91 मत मिले।

निर्वाचन मण्डल में चुनाव अधिकारी जगत नारायण शर्मा के साथ चुनाव सम्पन्न कराने में वाराणसी प्रेस क्लब के अध्यक्ष डा॰ अत्रि भारद्वाज, काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष संजय अस्थाना व वरिष्ठ पत्रकार बद्री विशाल तथा रमेश कुमार सिंह ने सहयोग किया। विजयी प्रत्याशियों को निर्वातमान अध्यक्ष योगेश कुमार गुप्त, प्रेस क्लब के अध्यक्ष डा॰ अत्रि भारद्वाज, मंत्री जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव व कोषाध्यक्ष पंकज त्रिपाठी ने बधाई दी। समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने भी विजयी प्रत्याशियों को शुभाकानाएं दी।

निर्वाचन अधिकारी जगत नारायण शर्मा की तरफ से जारी प्रेस रिलीज.

यह है अपने देश में मीडिया का चरित्र, देखें तस्वीर

फेसबुक पर यह तस्वीर इन दिनों खूब लोकप्रिय है. मीडिया का चरित्र बताने वाले इस चित्र को लोग आपस में साझा कर रहे हैं. पैसे और पूंजी की गुलाम हो चुकी मीडिया का काम अब झूठ को सच बताना और सच को उजागर न करना हो चुका है. इसी कारण मीडिया और इससे जुड़े लोगों की प्रतिष्ठा बहुत तेजी से गिरी है. कामन मैन तक अब कहने लगा है कि मीडिया में पैसे के बल पर जो चाहें वो छपवा लो.

लोगों का मानना है कि मीडिया अब सत्ता-सिस्टम में बैठे लोगों की भाषा बोलता है और उन्हीं जैसा करप्ट कैरेक्टर हो चुका है. इस चित्र को आप देखिए और अपने दोस्तों से भी साझा करिए. चित्र को भड़ास तक पहुंचाने के लिए संजय जी का आभार. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

‘द हिंदू’ ग्रुप की मैग्जीन ‘फ्रंटलाइन’ को उपराष्ट्रपति ने किया रीलांच

‘द हिंदू’ ग्रुप की पाक्षिक मैगजीन ‘फ्रंटलाइन’ आज से पाठकों को नये तेवर और कलेवर के साथ पढ़ने को मिलेगी. इस मैगजीन को आज उपराष्ट्रपति, हामिद अंसारी ने नई दिल्ली में री-लॉन्च किया है. री-लॉन्च की गई मैगजीन की पहली कॉपी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर रोमिला थापर को दी गई.

उप-राष्‍ट्रपति ने बदले हुए समय में नये पाठकों के लिए पत्रिका की प्रासंगिकता को बनाए रखने की इस पहल के लिए सम्‍पादकों और प्रकाशकों की सराहना की. उन्‍होंने विचारशील पाठकों की सेवा में ‘फ्रंटलाइन’ की लगातार सफलता की कामना की. इस अवसर पर उन्‍होंने कहा कि फ्रंटलाइन हमेशा से हर मुद्दे पर अच्‍छी पठन सामग्री प्रदान करने के अलावा उनका ज्ञानवर्धन करती रही है. इसलिए बॉलीवुड की भाषा में इसमें रीमिक्‍स की जरूरत नहीं है और न ही अनुमानों के साथ इसमें रोमांच डालने की जरूरत है.

उन्‍होंने कहा कि नये अवतार में पत्रिका में कला, संस्‍कृति, परम्‍परा, वन्‍यजीव, पर्यावरण और भूमि तथा लोगों के बारे में आकर्षक तस्‍वीरों के साथ लेख देखने को मिलेंगे. इसमें मीडिया और साहित्‍य, भारत के विकास संबंधी तस्‍वीरें, विज्ञान पत्रिका के अलावा सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर गहरा विश्‍लेषण पढ़ने को मिलेगा.

उप-राष्‍ट्रपति ने कहा कि हिन्‍दू समूह की समृद्ध विरासत है और उसने निष्‍पक्षता और न्‍याय के अपने शुरूआती आदर्श वाक्‍य को बनाए रखा है. फ्रंटलाइन भी इसे आगे जारी रखेगी. श्री अंसारी ने कहा कि आज के युग में दृश्‍य–श्रव्‍य मीडिया, करेंट अफेयर से जुड़ी खबरों संस्‍कृति और मनोरंजन की खबरों के लिए प्रमुख माध्‍यम बन गया है, इसके बावजूद महत्‍वपूर्ण विषयों पर गंभीर प्रकाशनों की वास्‍तविक और लोकप्रिय मांग बनी हुई है, जिसका स्‍थान ब्रेकिंग न्‍यूज़ की संस्‍कृति और इलैक्‍ट्रोनिक मीडिया की कतरने नहीं ले सकती.

री-लॉन्चिंग समारोह में “प्रजातंत्र में, संप्रभुता, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता” विषय पर एक बहस का ओयजन भी किया गया है जिसमें कांग्रेस नेता दिग्गविजय सिंह, लेखक-पत्रकार अरूण शौरी, कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य सीताराम येचुरी और जेएनयू के रिसर्च फेलो प्रभात पटनायाक हिस्सा लेंगे. इस सेशन को ‘फ्रंटलाइन’ और ‘द हिंदू’ के पूर्व संपादक एन राम मॉडरेट करेंगे.

इसके अलावा एनडीए के चेयरमैन लाल कृष्ण आडवाणी, कम्युनिस्ट पार्टी के प्रकाश करात और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी आयोजन में शामिल होंगे. यह आयोजन इंडियन हैबिटेट सेंटर में आज किया जा रहा है.

मैग्जीन में कुछ नई चीजें जोड़ी जा रही हैं जिनमें वर्ल्डव्यू होगा जिसमें पूरे विश्वभर की सारी घटनाओं का जिक्र किया जायेगा. नेशनल में पूरे देश भर की घटनाओं का जिक्र होगी. साइंस नोटबुक में विश्वभर की साइंस और टेक्नॉलोजी पर लिखा जायेगा. इसके साथ ही मीडिया और साहित्य पर नये कॉलम और कुछ प्रोफाइल्स होंगी. इस समारोह के अलावा ‘द हिंदू’ दुर्लभ फोटोग्राफ की प्रदर्शनी भी लगाई जायेगी.

‘फ्रंटलाइन’ की शुरुआत दिसंबर 1984 में की गई थी. प्रबंधन के अनुसार ‘फ्रंटलाइन’ एक बहुआयामी पाक्षिक पत्रिका है जिसमें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अलावा, साहित्य, इकॉनोमी, विकास, इन डेप्थ-फीचर्स, कला, सिनेमा, प्रकृति के अलावा उन सब मुद्दों को उठा जाता है जिससे ना केवल इंडिया या एशिया के देशों के लोग बल्कि पूरे विश्व के लोग प्रभावित होते हैं. प्रबंधन का दावा है कि इस समय मैनस्ट्रीम मैगजीन ने अपना रूख लाइफ-स्टाइल की तरफ मोड़ लिया है तब भी फ्रंटलाइन आम आदमी से जुड़े मुद्दे उठाती है.

अमरीश पाठक कार्यमुक्त, केपी तिवारी का तबादला, शाहनवाज और सरबजीत की नई पारी

दैनिक भास्कर, सागर आफिस में कार्यरत मार्केटिंग हेड अमरीश पाठक को कार्यमुक्त कर दिया गया है. बताया जाता है कि उनका विवाद यूनिट हेड सुरेंद्र राय के साथ चल रहा था.

अमर उजाला, बाराबंकी से खबर है कि ब्यूरो चीफ केपी तिवारी को हटाकर वापस लखनऊ आफिस से अटैच कर दिया गया है. बाराबंकी ब्यूरो चीफ का काम देखने के लिए इंदुभूषण पांडेय को प्रादेशिक डेस्क से भेजा गया है.

दैनिक जागरण में उत्पीड़ित किए गए सब एडिटर शाहनवाज अली के बारे में सूचना है कि उन्होंने शामली जिले में नए लांच हुए अखबार दैनिक प्रयाण सवेरा में बतौर ब्यूरो चीफ काम शुरू कर दिया है. जागरण में शानवाज को बेहतर काम के इनाम के तौर पर तबादले के नाम पर इस्तीफा ले लिया गया था.

एक अन्य खबर के मुताबिक अंग्रेजी दैनिक डीएनए में सरबजीत चटर्जी को मार्केटिंग का वाइस प्रेसिडेंट नियुक्त किया गया है. चटर्जी इससे पहले, ‘नियो स्पोर्ट्स’ में काम करते थे.

सतीश जैकब ने नई नौकरी खोज ली, श्री न्यूज में बगावत के बाद कइयों का इस्तीफा

वरिष्ठ पत्रकार सतीश जैकब ने नई नौकरी तलाश ली है. अब वे विनोद शर्मा वाले मीडिया हाउस में पहुंच गए हैं. वे इस ग्रुप की न्यूज एजेंसी ''न्यूज वायर सर्विस'' का काम देखेंगे. यहां वे संपादक बनाए गए हैं. सतीश जैकब इसके पहले पी7न्यूज में थे. वे बीबीसी में लंबे समय तक काम कर चुके हैं. जैकब द स्टेटमेन, द पैट्रियाट में भी काम कर चुके हैं.

उल्लेखनीय है कि न्यूज वायर सर्विस का नाम पहले सी वोटर ब्राडकास्ट हुआ करता था. सीवीबी के मालिक यशवंत देशमुख थे जिन्होंने इसे विनोद शर्मा वाले मीडिया हाउस आईटीवी को बेच दिया. बाद में सीवीबी का नाम बदल एनडब्ल्यूएस अर्थात न्यूज वायर सर्विस कर दिया गया. अब इसकी जिम्मेदारी सतीश जैकब को दी गई है. दावा है कि न्यूज एजेंसी एनडब्ल्यूएस का न्यूज एजेंसी एएफपी के साथ अनुबंध हुआ है.

एक अन्य खबर के मुताबिक न्यूज चैनल ''श्री न्यूज'' में बगावत हो चुका है. इस चैनल के मैनेजिंग एडिटर एसएन द्विवेदी सहित कई लोगों ने संस्थान से इस्तीफा दे दिया है. रियल एस्टेट कंपनी श्री इंफ्राटेक के मीडिया वेंचर का नाम श्री मीडिया वेंचर प्राइवेट लिमिटेड है और इसके न्यूज चैनल का नाम श्री न्यूज है. चैनल के कई विभागों के हेड ने अपने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है. चैनल के मैनेजिंग एडिटर एसएन द्विवेदी, टेक्निकल हेड पीसी पांडे, आउटपुट हेड शाहिद, एचआर हेड अमिताभ, रिपोर्टर रजत राकेश टंडन और नज़ीब मलिक ने चैनल को अलविदा कह दिया है. फिलहाल चैनल के एग्जीक्यूटिव एडिटर राजेंद्र प्रसाद मिश्रा चैनल को हेड कर रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि मैनेजमेंट से टकराव के कारण इन लोगों ने बगावत का बिगुल बजाया है. प्रंबधन ने सभी के इस्तीफे स्वीकार कर लिये हैं. लाइव इंडिया के सीनियर रिपोर्टर संतोष पाठक श्री न्यूज के साथ जुड़ गए हैं. कई अन्य लोगों के भी जुड़ने की खबर है. श्री न्यूज 24 मार्च 2012 को लॉन्च किया गया था. इसके एमडी और चेयरमैन मनोज द्विवेदी हैं. इस ग्रुप का अखबार श्री टाइम्स नाम से लखनऊ से प्रकाशित होता है.

अगर आपको मीडिया में चल रही अंदरुनी उठापटक के बारे में कोई नई जानकारी है तो मीडिया की खबरों के बेबाक मंच भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाएं.

न्यूज़-11 के न्यूज़रुम में हंगामा, एडीटर ने प्रोड्यूसर को कहा, “खतम करवा दूंगा”

तनख्वाह नहीं मिलने पर कर्मचारियों में मालिक के प्रति असंतोष आम बात है, लेकिन कुछ स्वामी-भक्त कर्मचारी इसे निज़ी मामला मान कर दुश्मनी भी मोल ले लेते हैं। झारखंड के संकट में घिरे चैनल न्यूज़-11 में इनदिनों ऐसा ही माहौल है। खबर है कि चैनल के संपादक स्तर के एक अधिकारी ने तीन महीने से रुकी तनख्वाह मांग रहे प्रोड्यूसर को जम कर हड़काया और जान से मारने की धमकी तक दे डाली।

बताया जाता है कि खुद को झारखंड का सबसे कद्दावर पत्रकार मानने वाले संपादक जो इन दिनों न्यूज़-11 चैनल में अपनी सेवाएं दे रहे है, स्वामी-भक्ति में इस क़दर बह गए हैं कि तनख्वाह मांगने वाले कर्मचारियों को निज़ी तौर पर हड़काने में जुटे हैं। ग़ौरतलब है कि चैनल की आर्थिक हालत बुरी तरह गड़बड़ाई हुई है और अधिकतर मीडियाकर्मियों को तीन महीने से तनख्वाह नहीं मिली है। अपने वेतन को लेकर परेशान एक प्रोड्यूसर ने जब काम करने से मना कर दिया तो एडीटर महोदय ने उसे खूब भला-बुरा कहा। एडीटर महोदय ने तैश में आकर यहां तक कह दिया कि वो प्रोड्यूसर को 'उठवा कर खतम करवा' सकते हैं।

 
हालांकि प्रोड्यूसर भी मूल रूप से बिहार का ही रहने वाला है, लेकिन कुछ साल दिल्ली और दूसरे राज्यों में नौकरी कर चुका है। उधर संपादक महोदय स्थानीय अखबारों में नौकरी करने के साथ-साथ सरकारी ओहदे पर भी रह चुके हैं। बताया जाता है कि उन्हें अपने बाहर न जा सकने का खासा मलाल है और वे 'बाहरी' लोगों पर इसकी खुन्नस निकालते रहते हैं। उन्होंने प्रोड्यूसर को ठेठ गुंडों वाले अंदाज़ में अपने 'लोकल' होने का रुआब झाड़ा और कहा कि वो बाहर से आकर उनसे ऊंची आवाज़ में बात न करे।
 
बात ज्यादा न बिगड़े ये देख कर न्यूज़रुम में मौज़ूद लोगों ने बीच-बचाव कर मामला शांत किया। बाद में गुस्सा ठंढा पड़ने पर संपादक महोदय ने प्रोड्यूसर से हंसी-मज़ाक भी किया और अपने क्रोध पर काबू न रख पाने के लिये शर्मिंदगी भी जताई। अब चैनल में कोई इस मामले पर कुछ भी बताने से बच रहा है।

इंटरनेट पर दुनिया के सबसे लोकप्रिय क्रिकेटर हैं सचिन

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर की लोकप्रियता भारत ही नहीं, दुनिया भर में नए रिकॉर्ड बना रही है। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर दुनिया के नामचीन खिलाड़ियों की लोकप्रियता पर नजर रखने वाली एक प्रमुख वेबसाइट फेमकाउंट ने 'महासेंचुरी' ठोकने वाले भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर को सोशल मीडिया के 10 सर्वकालिक लोकप्रिय खिलाड़ियों की सूची में शामिल किया है।

 
सचिन की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फेमकाउंट द्वारा जारी इस ताजा सूची में वह एकमात्र क्रिकेट खिलाड़ी हैं जो शीर्ष 10 में जगह बनाने कामयाब हुए हैं। बेबसाइट ने तेंडुलकर को सातवें पायदान पर रखा है। फेमकाउंट के मुताबिक, सोशल मीडिया में शीर्ष 10 लोकप्रिय खिलाड़ियों में पांच फुटबाल और चार बास्केटबॉल से हैं।
 
इस सूची में पहले स्थान पर पुर्तगाल के स्टार फुटबाल खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो हैं। रोनाल्डो के फेसबुक पर 48,624,597 प्रशसंक, माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर 13,209,767 फॉलोवर हैं। उनके सबसे बड़े यूट्यूब अकाउंट को अब तक 7,754,910 लोगों ने देखा है। फेसकाउंट के मुताबिक रोनाल्डो के सोशल मीडिया में 27 करोड़ से अधिक प्रशंसक हैं।
 
अर्जेंटीना के फुटबाल खिलाड़ी लियोनेल मेसी सोशल मीडिया में लोकप्रियता के मामले में दूसरे नंबर पर हैं। वेबसाइट के मुताबिक सोशल मीडिया में मेसी के 17 करोड से अधिक प्रशंसक हैं। फेसबुक पर उनके सबसे बड़े अकाउंट पर 38,204,281 प्रशसंक हैं और ट्विटर पर उनके 1,189,547 फॉलोवर हैं। यूट्यूब पर उनके अकाउंट को 4,146,072 लोगों ने देखा है।
 
फेमकाउंट के मुताबिक सूची में तीसरे नंबर पर इंग्लैंड के स्टार फुटबाल खिलाड़ी डेविड बैकहम हैं जिनके सोशल मीडिया पर 12 करोड़ से अधिक प्रशंसक हैं। सूची में चौथे स्थान पर ब्राजील के दिग्गज फुटबाल खिलाड़ी रिकार्डो 'काका' हैं जिनके सोशल मीडिया में 11 करोड़ से अधिक चाहने वाले हैं।
 
वेबसाइट के अनुसार पांचवें स्थान पर अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी माइकल जॉर्डन, छठें स्थान पर अमेरिकी बास्केट बॉल खिलाड़ी ले बारोन रयमोन, सातवें स्थान पर सचिन तेंडुलकर, आठवें स्थान पर स्पेन के फुटबाल खिलाड़ी अंदेस इनयेस्ता, नौवें स्थान पर अमेरिकी पेशेवर बास्केट बॉल खिलाड़ी कोबे बीन और 10वें पायदान पर अमेरिकी पेशेवर बास्केट बॉल खिलाड़ी दवायने वाडे हैं।
 
फेमकाउंट के मुताबिक तेंडुलकर के सोशल मीडिया पर पांच करोड़ से अधिक प्रशंसक हैं। वेबसाइट के मुताबिक 'लिटिल मास्टर' के फेसबुक पर 8,861,454 प्रशंसक हैं और ट्विटर पर 27 लाख से अधिक फॉलोवर हैं। उसने कहा कि भारतीय क्रिकेट स्टार तेंडुलकर, दुनिया के महानतम बल्लेबाजों में शामिल किए जाते हैं। 
 

सहारा का विज्ञापन ‘गलतियों से भरा’ और उटपटांग

सहारा समूह के 'क्यू शॉप्स' का विज्ञापन विवादों में घिरता जा रहा है। विज्ञापन न सिर्फ भाषाई अशुद्धियों से भरा है बल्कि एक गैर सरकारी संगठन ने तो  बाकायदा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से इसके प्रसारण पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। जहां विशेषज्ञ इसे गलतियों से भरा बता रहे हैं वहीं संगठन का आरोप है कि इस विज्ञापन के द्वारा लोगों के अंदर भय पैदा किया जा रहा है।

सहारा ने अपनी नयी महत्वाकांक्षी योजना के तहत रिटेल आउटलेट क्यू शॉप्स यानि क्वालिटी की चीजें बेचने के नाम पर शुरु करने की सोची है और इसके लिये जोर-शोर से प्रचार अभियान भी जारी है। टीवी पर जारी इसके कमर्शियल विज्ञापन में वीरेंद्र सहवाग और सचिन तेंदुलकर समेत कई नामी क्रिकेटर शामिल हैं। लेकिन पता नहीं इसके विज्ञापन की विषयवस्तु और भाषा पर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया।

विज्ञापन के दूसरे दृश्य में ही कंकड़ को 'कंकर' लिखा गया है जो कई भाषाविदों के नजरिये से गलत है। 'कंकड़' पत्थर के छोटे टुकड़ों को कहते हैं जिसे कुछ दाल विक्रेता मिलावट के तौर पर इस्तेमाल में लाते हैं। इसके बदले 'कंकर' शब्द का प्रयोग अपभ्रंश और क्षेत्रीय भाषा में लिखे कुछ दोहों में जरूर हुआ है लेकिन हिंदी में इस शब्द का कोई अर्थ नहीं है। आश्चर्य की बात ये है कि सहारा समूह के इतने सारे टीवी चैनलों और अखबारों के तथाकथित विद्वानों ने इस मामूली भूल या नासमझी को नजरंदाज़ कैसे कर दिया। आगे देखने पर भी कई भाषायी अशुद्धियां चुभती हैं।
 
इसके अलावा इस विज्ञापन का कॉन्सेप्ट भी कई लोगों के गले से नहीं उतर रहा। उदय नाम के एक गैर सरकारी संगठन ने तो सूचना एवं प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी एवं नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स को पत्र लिखकर इस विज्ञापन के खिलाफ उचित कदम उठाने की मांग भी की है।
 
विज्ञापन में क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर को अंतिम क्रिया की तैयारी करते दिखाया गया है जबकि एक परिवार नाश्ता कर रहा होता है। इस विज्ञापन में युवराज सिंह और वीरेंद्र सहवाग को भी दिखाया गया है। चिकित्सक के परिधान में एक व्यक्ति मिलावटी खाद्य पदार्थ के सेवन से कैंसर, किडनी सम्बंधित रोग एवं मस्तिष्क की क्षति होने जैसी चेतावनी देता है। संगठन के मुताबिक, ''हाल ही में टीवी पर सहारा 'क्यू शॉप्स' के प्रसारित हो रहे विज्ञापन अपना उत्पाद बेचने के लिए लोगों में भय पैदा कर रहे हैं।'' ग़ौरतलब है कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई पहले ही क्रिकेट खिलाड़ियों का प्रयोग करने के कारण सहारा के विज्ञापन पर नाखुशी जाहिर कर चुका है।