जब सरकार तय करने लगे खबरें तब राजनीति में आना ही ठीक

Rajkumar Soni : जब सरकार तय करने लगे खबरें तब… राजनीति में आना ही ठीक… रूचिर गर्ग एक अखबार में संपादक थे, लेकिन जब उनके कांग्रेस प्रवेश की खबरें चली और उन्होंने कांग्रेस प्रवेश कर लिया तब सबने यहीं लिखा कि पत्रकार रूचिर गर्ग… उनके नाम के आगे- पीछे यदा-कदा ही संपादक लिखा गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि छत्तीसगढ़ ही नहीं देश के बहुत से लोगों का विश्वास संपादक नाम की संस्था से उठ गया है। Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रुचिर गर्ग ने पकड़ा राहुल गांधी का हाथ, देखें तस्वीर

Girijesh Vashistha : हमारे पुराने मित्र, साथी और बेहद भले आदमी रुचिर गर्ग राजनीति को प्राप्त हो गए हैं.उन्होंने राहुल गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस को धारण किया. लेकिन वो राजनीति में करेंगे क्या ? चाल-फरेब, झूठ धोखा-धड़ी, धन-संपदा, एक भी ‘सद्गुण’ नहीं है . मोटी चमड़ी भी नहीं है. चिंता होना स्वाभाविक है. इस चक्कर में शरीफ आदमी की शुगर न गड़बड़ा जाए. भगवान करे राजनीति का सतयुग आ गया हो और वो बहुत सफल हों. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी ने गोदी मीडिया से पूछा- ‘खुलकर लिख रहे आप लोग? या, कोई दबाव है? थोड़ा-सा!’, देखें वीडियो

अरुण जेटली के ब्लॉग से खबर बनाने वाले पत्रकार राहुल गांधी की हालिया प्रेस कांफ्रेंस में रखे गए तथ्यों से खबर बनाने में कांप गए… हमारा पप्पू ऐसा है कि पत्रकारों से आंख में आंख डाल कर पूछ लेता है- ”मूड कैसा है, कोई दबाव तो नहीं है”. व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी के साथ गोदी मीडिया कहता है कि राहुल पप्पू है…. पर उन जनाब को पप्पू नहीं कहता जो लिखे हुए सवालों के लिखे हुए जवाब छपवाते हैं, शायद पैसे देकर… राहुल गांधी की प्रेस कांफ्रेंस का ये शुरुआती वीडियो जरूर देखिए…

-संजय कुमार सिंह (संस्थापक, अनुवाद कम्युनिकेशन)

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी ने पत्रकारों से कहा- राफेल घोटाले पर भी बोलिए, रीढ़ की हड्डी तो दिखाइए! देखें वीडियो

Sanjaya Kumar Singh : राहुल गांधी तो गले लगने की अच्छी कीमत वसूल रहे हैं। श्रीमान 56 की ऐसी खिंचाई तो अभी तक हुई ही नहीं थी। उसपर से उनके ‘मित्र’ भी नहीं बख्शे जा रहे हैं। आज एक वीडियो दिखा जिसमें राहुल पत्रकारों से पूछ रहे थे आपलोग राफेल पर बात क्यों नहीं करते हैं? फिर कहा कि मैं समझता हूं, दबाव होगा पर थोड़ा तो बैकबोन (रीढ़) दिखाइए।

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी के आंख मारने पर लिखी गई बोधिसत्व की कविता हुई वायरल- ”कुछ भी मारो, बस आँख मत मारो!”

मर्यादावादियों के लिए एक नया राष्ट्रगान….

‘कुछ भी मारो, बस आँख मत मारो!

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तो राहुल गांधी ने ये तय कर लिया है कि अंबानियों की और उनके मीडिया की परवाह नहीं करनी है!

Prashant Tandon : बढ़िया धुलाई के बाद प्रेस भी – पूरा काम किया आज राहुल गांधी ने… राहुल गांधी ने मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर बेहतरीन भाषण दिया. राहुल ने आज वही बोला जो लोग सुनना चाहते थे. देश की तमाम समस्याओं, घटनाओं और सरकार की विफलताओं पर सरकार को जवाबदेह ठहराया और मोदी और अमित शाह को बड़ी होशियारी से बाकी बीजेपी से अलग खाने में भी डाल दिया. भाषण के बाद मोदी की सीट पर जाकर उन्हे गले लगा कर एक स्वस्थ्य संसदीय परंपरा भी निभाई. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी मोदी के गले मिले या गले पड़े! देखें तस्वीरें

शंभूनाथ शुक्ल : राहुल ने मोदी को गले लगाया अथवा धोबीघाट दाँव का इस्तेमाल किया। पप्पू ने बता दिया कि साठ साल का अनुभव सिखा गया है कि बीजेपी चाहे जितनी फुला जाए, पर रहेगी नीचे ही। राजनीति ऐसे की जाती है प्रधानमंत्री जी! सरकार आपकी, संसद आपकी और स्पीकर भी आपकी पार्टी की ही। लेकिन बैठे ही बैठे आप चित हो गए। अविश्वास प्रस्ताव लाना भी किसे था, संसद में सबके सामने आपको हैसियत जतानी थी, सो जता दी।

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी ने सच में भूकंप ला दिया, मोदी के लिए कहा- ये चौकीदार नहीं, भागीदार

Sanjaya Kumar Singh : चौकीदार नहीं, भागीदार… राहुल गांधी ने संसद में प्रधानमंत्री पर सीधा हमला बोला। नोटबंदी और जीएसटी से लेकर बिना एजंडा के चीन जाने और उसे चीन का एजंडा बताने से लेकर रक्षा मंत्री पर भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि फ्रांस के साथ राफेल विमान की कीमत नहीं बताने संबंधी कोई करार नहीं है।

संसद में भाजपा सरकार के खिलाफ आक्रामक भाषण देने के बाद मोदी के गले मिलते राहुल गांधी.

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता है?

संदीप ठाकुर

राहुल गांधी का नाम सुनते ही आपके जहन में सबसे पहले उनकी कौन सी छवि
उभरती है…पप्पू वाली या गंभीऱ। पप्पू वाली न। आप बिल्कुल सही हैं। इसके
बाद  उनकी कौन सी बात याद आती है। यदि में गलत नहीं हूं तो आपको याद आती
हाेगी, आलू की फैक्ट्री या नारियल जूस वाली कहानी। या फिर याद आती होगी
उनके ऊपर चल रहे सोशल मीडिया के जोक्स और भाजपा नेताओं द्वारा समय समय
पर किए गए कटाक्ष। जरा सोचिए, क्या इन बातों के आधार पर राहुल को जज
किया जा सकता है? सही मायने में राहुल गांधी पप्पू हैं? क्या राहुल
गांधी पॉलिटिकल मैटीरियल नहीं हैं? क्या राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता
नहीं है?

यह सवाल मेरे जहन में तब आया जब मैंने हाल ही में अमेरिका दौरे के
दौरान दिए गए उनके चंद भाषण सुने। आपको भी यूएस दौरे में दिए उनके
भाषणों पर एक नजर डालनी चाहिए.। वो इसलिए कि अगला सवाल जो मैं उठाने जा
रहा हूं उसे समझने में मदद मिलेगी। सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी ही
कांग्रेस पार्टी की कमान थामेंगे, ये तो तय है लेकिन कब? ये सवाल कई
सालों से फ़िज़ा में तैर रहा है। लेकिन अब राहुल की अध्यक्ष पद पर ताजपोशी
नहीं टल सकती क्योंकि चुनाव आयोग की फटकार के बाद कांग्रेस संगठन में
चुनावी प्रक्रिया ने रफ़्तार पकड़ ली है। ऐसे में प्रश्न यह है कि क्या
उन्हें देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की कमान  दी जा सकती है?
क्या वे इसके काबिल हैं? क्या राहुल गांधी राजनीति को पूरी तरह समझने
लगे है?

नोटबंदी और जीएसटी के सताए हुए करोड़ों लोगों के मन में उठ रहे इस
सवाल के जवाब को तलाशने का प्रयास करते हैं। शुरुआत साेशल मीडिया से
करते हैं जिसकी इनदिनों किसी को भी हीरो और जीरो बनाने में अहम्
भूमिका है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकप्रियता
बढ़ती नजर आ रही है। पिछले दो महीनों में उनके ट्विटर फॉलोवर्स की संख्या
करीब 10 लाख बढ़ कर 34 लाख हो गई है। लेकिन आज भी राहुल मोदी के
मुकाबले पीछे हैं। वे विश्वसनीय चेहरा न बन सके हैं। आप उनेस मिलें जो
नरेंद्र मोदी से खुश नहीं है, विकल्प की सोच रहे हैं। बदलाव चाहते हैं।
लेकिन वे सवाल करते हैं कि फिर दूसरा कौन है? राहुल गांधी और कौन? नाम
सुनते ही ऐसे लोगों का पहला रिएक्शन हाेता है राहुल गांधी उन्हें
उत्सा‍हित तो करते हैं लेकिन देश का चेहरा बनने योग्य नहीं दिखते।
दूसरे शब्दों में कहें तो छवि आड़े आ रही है। इसके लिए कौन जिम्मेदार
है। कांग्रेस के बड़े नेता, राहुल स्वंय या फिर मीडिया। राहुल गांधी ने
कई मौकों पर कुछ ऐसा बोल दिया और जब-तब कुछ ऐसा किया कि उनकी छवि
पप्पू वाली बन गई। रही सही कसर भाजपा नेताओं ने पूरी कर दी। कैसे? आइए
समझते हैं।

जब अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विराेधी आंदोलन अपने उफान पर
था, तब राहुल गांधी खामोश थे। जब पूरा देश उनकी ओर अपेक्षा भरी निगाहों
से देख रहा था, वे एक शब्द नहीं बोले। लोगों को लगा कि देश और
व्यवस्था को लेकर राहुल गांधी गंभीर नहीं हैं। साल 2014 के चुनाव में
हार के बाद वे तकरीबन 50 दिनों के लिए छुट्टी पर चले गए थे।  उनकी वह
छुट्टी आज भी रहस्य बनी हुई है। राष्ट्रपति चुनाव अंतिम स्तर पर था और
राहुल गांधी देश से गायब थे । किसानों का आंदोलन उग्र था। इस दौरान गत 9
जून को राहुल गांधी मंदसौर पहुंचे। बढ़ते कृषि संकट पर उन्होंने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया और एक नाटकीय घटनाक्रम के बाद
अंत में हिरासत में लिए गए। उनके साथी इस मुद्दे पर आंदोलन करते रहे और
सरकार को घेरते रहे। तीन दिन बाद 13 जून  को राहुल ने ट्वीट किया, कुछ
दिनों के लिए नानी के घर जा रहा हूं।  परिवार के साथ कुछ दिन बिताने को
लेकर उत्सुक हूं।  इसके बाद ट्वीटर पर वह ट्रोल किए जाने लगे। विपक्षी दल
उनका मजाक उड़ाने लगे। मंदसौर में उनके कदम की प्रशंसा करने वाले उनके
साथी हताश हो गए। एक कांग्रेस नेता ने कहा, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।
हर समय हम सोचते हैं कि मुद्दों पर हमारी पकड़ बन गई है। कार्यकर्ता
उत्साहित हो जाते है। लेकिन ऐन मौक पर राहुल  चले जाते हैं। ऐसे में
कैसे रिएक्ट करें कि देश में जब गंभीर मुद्दे हैं तो उनका नेता छुट्टी पर
चला गया है, वह भी उस समय जब देश में एक मजबूत विपक्ष नहीं है।
इन सब कारणों से राहुल पर की गई टिप्पणियों ने उनकी छवि को गंभीर
नहीं बनने दिया। मसलन, एक बार शीला दीक्षित ने कहा था कि कांग्रेस
उपाध्यक्ष राहुल गांधी अभी मेच्योर नहीं हुए हैं। उन्हें अभी और वक्त
दिया जाना चाहिए। हंगामा मचने पर वे अपने बयान से मुकर गई थीं। हरियाणा
में विधानभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह
ने तंज कसते हुए कहा था कि महात्मा गांधी चाहते थे कि कांग्रेस खत्म हो
जाए। गांधीजी का सपना राहुल पूरा कर रहे हैं। राहुल गांधी के हालिया यूएस
दौरे पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा था कि
राहुल की देश में कोई सुनता नहीं, इसलिए बोलने के लिए उन्हें विदेश जाना
पड़ता है। इन टिप्पणियों का कोई दमदार जवाब न राहुल ने दिया और न ही
कांग्रेस ने।

अपनी बात मज़बूत और तर्कसंगत ढंग से न कह पाना राहुल की सबसे बड़ी असफलता
है। नोटबंदी जैसी पॉलिसी जिसका हर भारतीय पर नकारात्मक असर पड़ा, उसे भी
मोदी काले धन और आतंकवाद के खिलाफ वरदान के रूप में प्रचारित करने में
सफल रहे। राहुल इसे भी नहीं भुना पाए। राहुल की राजनीति में उत्साहहीनता
और जनता के बीच भाषण देते समय सुस्ती साफ झलकती है। यह उनका दूसरा ड्रॉ
बैक है। राहुल की तीसरी बड़ी समस्या है युवा नेताओं पर अत्यधिक निर्भरता
और ज़मीनी कार्यकर्ता पर पकड़ नहीं होना। 2009 में यूपीए की सरकार आई
थी और राहुल गांधी को बढ़ाना शुरु किया गया। राहुल ने अपनी एक टीम बनाई
जो लैपटॉप, आईपैड से लैस थी। पूरी हाईटेक थी। फिर उन्होंने फैसले लेने
शुरू किए। पार्टी के फैसले को दरकिनार करते हुए राहुल ने चुनाव में एकला
चलो की नीति पर अमल करने का मन बनाया। राज्यां के चुनाव अकेले लड़े
और 2010 में बिहार और 2012 में यूपी बुरी तरह हारे। युवाओं को
नेतृत्व में आगे लाने के चक्कर में पुराने कई वरिष्ठ नेता दरकिनार कर दिए गए
और कई खुद पार्टी छोड़ कर चले गए। तब से लेकर आज तक कांग्रेस का हर
चुनाव में प्रदर्शन खराब होता चला गया है। इसके बाद वे 2017 में सपा के
साथ हाथ मिला यूपी विधानसभा का चुनाव लड़े। सपा से गठबंधन के बाद भी
रायबरेली और अमेठी के कांग्रेस के गढ़ को बचाने में पूरी तरह नाकामयाब
रहे। यहां पहली बार भाजपा ने कुल 10 में से 6 सीटों पर कब्जा कर लिया।
राहुल की अन्य कमजोरियां हैं कि वे लच्छेदार भाषण नहीं दे पाते। अपने
बयानों में कई बार गलतियां कर जाते हैं। कभी-कभार अपनी भाषा में अटक जाते
हैं। शायद अंग्रेजी में वो ज्यादा कंफर्टेबल महसूस करते हों, इसलिए
विदेशों में उनकी भाषणों की इतनी तारीफ भी हो रही है।
कांग्रेस पार्टी में  राहुल‘भक्त कई नेता ऐसे भी हैं जिन्हें राहुल के
नेतृत्व में कोई कमी नज़र नहीं आती। उनका मानना है कि राहुल गांधी को
कांग्रेस का अध्यक्ष बना देना चाहिए। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह
ख़ुद राहुल की ताजपोशी की वकालत कर चुके हैं। वैसे कैप्टन इज़ कांग्रेस,
कांग्रेस इज़ कैप्टन.., पंजाब चुनाव का यह नारा बताता है कि जीत वहां
किसकी हुई है। सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद गोवा में कांग्रेस की
सरकार बना पाने में नाकाम दिग्विजय सिंह भी राहुल गांधी को पार्टी की
कमान सौंपने के पक्ष में हैं। आलोचक यह सवाल उठाते है कि आखिर पार्टी की
कमान संभालने से राहुल को कौन रोक सकता है। अध्यक्ष न होते हुए भी राहुल
गांधी पार्टी तो चला ही रहे हैं। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि
राहुल के अध्यक्ष बन जाने के बाद संगठन में निर्णय तेज़ी से होंगे और नए
जोश के साथ कार्यकर्ता चुनावी तैयारी में लग जायेंगे। राहुल के सामने न
सिर्फ पार्टी के पुराने नेताओं से सामंजस्य बैठाने की बल्कि खुद को नेता
साबित करने की भी चुनौती है।

संदीप ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार
sandyy.thakur32@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

देश को ‘कांग्रेस मुक्त’ करने के मायने

श्रीगंगानगर। कांग्रेस मुक्त भारत। कांग्रेस मुक्त देश। बीजेपी के महापुरुष नरेंद्र मोदी के ये शब्द लगभग 3 साल से मेरे कानों मेँ गूंज रहे हैं। अकेले मेरे ही नहीं और भी ना जाने कितने करोड़ देश वासियों के कानों मेँ होंगे ये शब्द। किसी के कानों मेँ मिठास घोल रहे होंगे और किसी के जहर। इन शब्दों का मायने ना जानने वालों के लिए ये शब्द गुड़ है और जो समझ रहे हैं उनके लिए कड़वाहट है। चिंता भी है  साथ मेँ चिंतन भी।

देश को कांग्रेस मुक्त बनाना है… भारत को कांग्रेस से मुक्त करने का सपना है…. इन शब्दों को राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति के साथ इस प्रकार से जोड़ दिया गया कि यूं लगने लगा जैसे फिर किसी ने अंग्रेज़ो भारत छोड़ो का नारा बुलंद किया हो। देश  मेँ ना जाने कितनी राजनीतिक पार्टियां हैं। मगर देश को मुक्त केवल कांग्रेस से करना है। क्यों? क्योंकि मोदी जी कांग्रेस का अर्थ जानते हैं ! मोदी जी समझते हैं कि कांग्रेस क्या है! कांग्रेस के रहने के परिणाम से भी मोदी जी अंजान नहीं। मोदी जी के नेतृत्व वाली बीजेपी कांग्रेस से डरती है। मोदी जी जानते हैं कि मात्र कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसका भारत के हर गली कूचे मेँ प्रभाव है। जिसका नाम है।

यही एक पार्टी है जो किसी दिन उनकी सरकार को, बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की क्षमता रखती है। कांग्रेस ही है जिसमें गिर गिर के उठ जाने की अपार क्षमता है। कांग्रेस के अतिरिक्त कोई और चुनौती है ही नहीं। जब चुनौती देने वाला ही कोई नहीं रहेगा तब अपना राज, केवल और केवल अपना राज। कुछ भी करो, कोई विरोध नहीं। कुछ भी करो, कोई बोलने वाला नहीं। और, जब सरकार की नीतियों, निर्णयों का विरोध करने वाला ही ना रहे तो फिर लोकतन्त्र खतरे मेँ पड़ जाता है। शासक मनमर्जी करता है। क्योंकि उसे किसी राजनीतिक विरोध की चिंता ही नहीं रहती। पब्लिक का विरोध अर्थ हीन हो जाता है। मोदी जी जानते हैं कि जब बीजेपी 30 साल बाद 2 सीटों से यहां तक आ सकती है तो कांग्रेस क्यों नहीं?

बस, इस डर ने मोदी जी और उनके खास दो चार नेताओं ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इस प्रकार से उछाला कि यह देश प्रेम का प्रतीक हो गया। राष्ट्रवाद की पहचान बन गया। असल मेँ कांग्रेस मुक्त भारत का अर्थ है, विपक्ष का ना रहना। हालांकि लगभग हर स्टेट मेँ राजनीतिक पार्टी है, लेकिन मोदी जी और आज की बीजेपी ने कभी भारत को उनसे मुक्त करने का नारा नहीं दिया। जरूरत भी नहीं है, क्योंकि उनके साथ तो सत्ता का बंटवारा कर उनको अपने साथ लिया जा सकता है। किसी से विचार मिले ना मिले कोई खास बात नहीं। सिद्धांतों मेँ जमीन-आसमान का अंतर है, तब भी चलेगा।

सत्ता का सवाल है। उसे पाने और फिर उसे बनाए रखने की बात है। छोटे छोटे दलों की औकात ही कितनी है! सत्ता के लालच मेँ वे बीजेपी के साथ आने मेँ क्यों हिचकिचाएंगी। कश्मीर और अब बिहार इसके उदाहरण है। जब छोटे दलों को सत्ता का टुकड़ा मिल गया तो वे उसी मेँ मस्त हो जाएंगे और कांग्रेस रहेगी नहीं, तब! तब देश मेँ एक मात्र बीजेपी। बीजेपी मेँ एक मात्र मोदी जी और उनके अमित शाह। बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी नहीं कहा कि देश को कांग्रेस से मुक्त करना है। जे पी नारायण ने भी ऐसा तो नहीं कहा होगा। चूंकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उसको मार दो, उसके बाद राज अपना ही अपना।

असली लोकतन्त्र उसी देश मेँ है जहां विपक्ष मजबूत हो। लोकतन्त्र वहीं समृद्ध होता है जहां पक्ष के साथ साथ विपक्ष भी ताकतवर  हो। सत्ता के कामों का विश्लेषण करने वाला हो। उसको रोकने और टोकने वाला हो। परंतु मोदी जी एंड कंपनी ने राजनीति की परिभाषा ही बदल ही। बड़े विरोधी को खत्म कर दो, छोटे मोटे तो खुद शरणागत हो जाएंगे दंडवत करते हुए। कांग्रेसियों से कोई परहेज नहीं, बस देश को कांग्रेस मुक्त करना है। ताकि मोदी जी एंड कंपनी निष्कंटक राज कर सके। लोकतन्त्र ! जब राजनीति की नई परिभाषा गढ़ दी गई है तब लोकतन्त्र की परिभाषा भी तो बदलेगी ही। दो लाइन पढ़ो-

बिहार ने हरयाणा को साफ कर दिया
नितीश ने गिरगिट को मात कर दिया।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर (राजस्थान) के वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया हो या आरबीआई, सभी इस मोदी सरकार से थोड़ा डर कर चल रहे हैं : राहुल गांधी

राहुल गांधी का आज का भाषण उन्हें बहुत आगे ले जाएगा। उन्होंने दिल्ली में खड़े होकर जो लाइन कांग्रेस और बीजेपी के बीच खींची है अगर उसे कायम रख पाए तो कोई वजह नहीं कि कांग्रेस की अगली जीत के नायक वही हों। कई और ठीक-गलत बातों से हट कर उन्होंने आज जो बार-बार कहा, वो था ‘डरो मत’। ना राहुल ने यूपीए के विकास कार्य गिनाए, ना राहुल ने हिंदू-मुस्लिम की बात की, ना राहुल ने एनडीए के घोटाले बताए… उन्होंने जो कहा वो सिर्फ इतना था कि बीजेपी- संघ परिवार ‘डराओ’ की लाइन पर चलते हैं जबकि कांग्रेस का हाथ ‘डरो मत’ कहता है। वोटर ऐसी सीधी बात ही समझता है, जबकि सीधे-सादे इन दो शब्दों के अर्थ कहीं ज़्यादा गहरे और सच्चे हैं।

राहुल ने आज सुबह के भाषण में मीडिया का हवाला दिया था। दोपहर भी वही दोहराया। उन्होंने जो ऊपर-ऊपर कहा लेकिन समझा दिया वो इतना ही था कि पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखते हुए डरने लगा है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने जहां संस्थानों को इज़्ज़त दी और उनको बनाए रखा वहीं बीजेपी ने उनके अधिकार छीनकर उन्हें अपाहिज (बीजेपी के अपने शब्दकोष के मुताबिक दिव्यांग) बना दिया। मीडिया हो या आरबीआई सभी सरकार से थोड़ा डर कर चल रहे हैं। यही सब संस्थाएं कांग्रेस के शासन में भी थीं लेकिन इनका काम खुलकर जारी था। किसे याद नहीं कि मीडिया राहुल और सोनिया पर कैसे-कैसे तंज करता था। बिलो द बेल्ट जाकर सोशल मीडिया में कहानियां बांची जाती थीं। पर्सनल अटैक की तो कोई सीमा तय ही नहीं की गई। उस वक्त कोई पीएम पद की प्रतिष्ठा की बात करता ही नहीं था, सोनिया को भी महिला होने के नाते सम्मान नहीं दिया गया।

कांग्रेस लाठी-डंडे लेकर प्रभात फेरी और पथ संचलन नहीं करती थी। ना उसके कार्यकर्ता किसी खास दिन मारपीट करके बाज़ार बंद करवाने सड़कों पर उतरते थे। कोई भावना दुखने पर भी कांग्रेस के चमचे सोशल मीडिया पर गालियों की बाढ़ नहीं लाए। इनमें से किसी ने पत्रकारों और चैनलों के घटिया नाम नहीं रखे। असहिष्णुता का ऐसा माहौल नहीं था जिसमें कलाकार असहज महसूस करता हो। कौन सा फिल्म सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष उस वक्त संस्कारी बॉस बनकर कलाकारों की मेहनत पर कट मार रहा था? वो सरकार करप्ट होगी .. लेकिन उसने इस्तीफे भी लिए और मंत्री पद से हटाकर लोगों को जेल भी भेजा। हालांकि मैं फिर भी यूपीए को बरी नहीं करता पर उस वक्त आलोचना करनेवालों की तरफ आंखें नहीं तरेरी गईं।

कैग की रिपोर्ट तक सरकारी दबाव के बिना आती थी और सरकार की ही पोल खोल कर धर देती थी। हो सकता है ये इमरजेंसी लगाने का भूत रहा हो जिसने हर कांग्रेसी सरकार को संस्थानों का सम्मान करने के प्रति अधिक कॉन्शियस रखा जबकि बीजेपी वाले इसी ओवर कॉन्फिडेंस में दूसरों की आज़ादी कम करते चले गए कि हमसे ज़्यादा लोकतंत्र के लिए भला कौन लड़ा है ? राहुल ने जिस ‘डर’ की भावना को आज लफ्ज़ दिए हैं वो उनका कल्याण कर सकती है बशर्ते आगे भी वो भ्रम में ना पड़कर सीधी बात करें। विरोधी तो मज़ाक अब भी बनाएंगे लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो रहा है। लोकतंत्र में एक कमजोर विपक्ष अगर अब ताकत जुटा रहा है तो ये लोकतंत्र के लिए अच्छा ही है। वैसे भी किसी पार्टी का मुकाबला कोई पार्टी ही कर सकती है, एनजीओ या मीडिया नहीं।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी की ‘पप्पू’ छवि बनाने वाली भाषण कला के माहिर खिलाड़ी हैं मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में कभी मजाकिया लहजे में तो कभी आक्रामक अंदाज में राहुल गांधी को हमेशा निशाने पर रखते हैं। दरअसल, राहुल गांधी के मामले में अपने भाषणों में मोदी इन दिनों बहुत आक्रामक दिख रहे हैं। मतलब साफ है कि माफ करना उनकी फितरत में नहीं है। और बात जब कांग्रेस और राहुल गांधी की हो, तो वे कुछ ज्यादा ही सख्त हो जाते हैं।

-निरंजन परिहार-

वे मदमस्त अंदाज में मंच पर आते हैं। जनता उनके तेवर ताकती है। वे मंच के तीनों तरफ घूमकर अभिवादन के अंदाज में हाथ हिलाते हैं। लोग अपने आप को धन्य समझने लगते हैं। फिर वे माइक पर जाकर जिस मकसद से आए हैं, उस विषय पर भाषण शुरू करने के चंद मिनट बाद तत्काल ही अपने अगले निशाने का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। तो लोग उन्हें हैरत से देखते हैं। मूल भाषण से मुड़ते ही अब, वे अपने भाषण में सबसे पहले वे कंधे उचकाते हैं। फिर विशेष तरीके से गर्दन हिलाते हैं। और, अंत में मजाकिया लहजे में मुस्कराते हुए दोनों बांहें चढ़ाने का अंदाज दिखाते हुए सवालिया अंदाज में हैरत से जनता की तरफ झांकते हैं। तो साफ लगता है कि वे बिना नाम लिए ही सीधे राहुल गांधी की तरफ जनता को धकेल रहे होते हैं। फिर पब्लिक तो पब्लिक है। वह मन ही मन राहुल गांधी को याद करते हुए, जोरदार हंसी के साथ तालियां बजाकर उनकी खिल्ली उड़ाती नजर आती है।

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी पर प्रहार का अपना  अंदाज है। वे अकसर अपनी जनसभाओं में राहुल गांधी को इसी तरह एक नॉन सीरियस राजनेता के रूप में देश के दिलों में लगातार स्थापित करते जा रहे हैं। राहुल जब मोदी पर अपने तीर छोड़ते हैं, तो मोदी राहुल के शब्दों में ही अपने कुछ शब्द और जोड़कर तीर से भी तीखी धार बख्शते हुए राहुल के वार को पूरी कांग्रेस की तरफ उल्टा मोड़कर माहौल को हैरत में डाल देते हैं। तो, सारा देश राहुल गांधी पर फिर हंस पड़ता है। मोदी का यह अजब अंदाज गांव के आदमी को भी मुस्कुराहट देता है। और टीवी के दर्शक को खुशी बख्शता है। इस सबके बीच जो लोग उनके सामने बैठे होते हैं, वे और उनके भक्तगण मोदी के इस अभिनेता अंदाजवाले भाषणों के बीच  जोश के साथ मोदी – मोदी के नारे लगा रहे होते हैं। दुनिया के किसी भी लोकतंत्र का इतिहास उठाकर देख लीजिए, इतना आक्रामक प्रधानमंत्री और लगभग हर किसी के उपहास के पात्र के रूप में गढ़ दिया गया विरोधी पार्टी का नेता कहीं और नहीं मिलेगा।

पिछले कुछ समय के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों का आंकलन करें, तो मोदी कुछ ज्यादा ही ताकतवर अंदाज में देश भर में दहाड़ रहे हैं। हालांकि नोटबंदी के बाद राहुल गांधी भी हमलावर अंदाज में हैं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिल्कुल निश्चिंत। अपने ज्यादातर भाषणों में प्रधानमंत्री मोदी की कोशिश यही रहती है कि कैसे भी करके देश की जनता में राहुल गांधी सिर्फ और सिर्फ एक नॉन-सीरियस नेता के रूप में ही जाने जाएं। मोदी से पहले देश में कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं रहा, जिसने अपनी विपक्षी पार्टी के सबसे बड़े नेता को इतने लंबे समय तक इतना ज्यादा निशाने पर रखा हो, जितना वे राहुल गांधी को रखे हुए हैं। राहुल की छवि देश में हल्की बनी रहे, इसके लिए अपने हर भाषण के जरिए मोदी ने यह काम बखूबी किया है। मोदी के गढ़ गुजरात में जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर भ्रष्‍टाचार का सीधा आरोप लगाया तो बहुत वाजिब था कि पूरे देश को इसके जवाब का इंतजार था। लेकिन मोदी ने सीधे इसका कोई जवाब ही नहीं दिया।

कांग्रेस की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उसके नेताओं और लगभग पूरी पार्टी को बेईमानी के साथ जोड़ना मोदी के लिए बहुत आसान खेल है। इसीलिए, मोदी जब 70 साल की बात करते हैं, तो बिना नाम लिए ही देश का मन सीधे कांग्रेस की तरफ चला जाता है। लेकिन राहुल गांधी कोशिश करते भी हैं, और बीजेपी को भ्रष्ट पार्टी बताते हैं, तो कोई गंभीरता से नहीं लेता। मुंबई से लेकर बनारस, और पुणे से लेकर …….. हर शहर के मोदी के भाषण देख लीजिए, वे अपने भाषणों में अपने संस्‍कारों को ईमानदारी से जोड़ते हुए नोटबंदी का विरोध करने वालों के संस्‍कारों को बेइमानी से जुड़ा बताते हैं, तो हर कोई कांग्रेस को दिमाग में रखकर राहुल गांधी पर अविश्वास करने लगता है। तभी अगले ही पल, जब मोदी गरजते हैं – ‘मैं कभी सोच भी नहीं सकता था कि कुछ नेता और कुछ दल इतनी हिम्‍मत के साथ बेइमानों के साथ खड़े हो जाएंगे…’, तो मोदी कांग्रेस को बहुत सरलता के साथ बेइमानी से जोड़ देते हैं। वे अपने हर भाषण में कांग्रेस को घनघोर बेईमान साबित करने से नहीं चूकते।

हाल ही में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बुद्धिजीवियों के एक कार्यक्रम में मोदी नोटबंदी से शुरुआत करके सीधे सफाई अभियान की तरफ पहुंच गए। बोले – ‘देश में इन दिनों एक बड़ा सफाई अभियान चल रहा है…!’ सिर्फ इतना सा बोलकर चुप्पी के साथ वे थोड़ी देर हैरत से लोगों को देखते हैं। उनकी यह चुप्पी लोगों को ताली बजाने और मुस्‍कुराने का अवसर देती है। कांग्रेसी भले ही मानते हों कि भाषण कला के इस जादुई खेल की कलाबाजियों की कसावट राहुल गांधी भी सीख ही लेंगे, लेकिन अपन इसमें भरोसा नहीं करते। इससे पहले की एक सभा में लोग इंतजार करते रहे, लेकिन मोदी ने लोगों की उम्‍मीद के विपरीत राहुल गांधी पर सबसे आखिरी में निशाना साधा। मोदी सिर्फ इतना कहकर कुछ सैकंड के लिए रुक जाते हैं कि – ‘उनके एक युवा नेता हैं…!’ और पूरी सभा में हंसी फूट पड़ती है। मोदी पहले दुनिया को राहुल गांधी पर हंसने का मौका देते हैं। इसके बाद वे बोलते हैं – ‘वे अभी बोलना सीख रहे हैं।’ मोदी को पूरा अंदाजा रहता है कि उनके मुंह से राहुल गांधी का जरा सा जिक्र भी लोगों को बहुत आनंद देता हैं। वे अपने श्रोताओं को आनंद में गोते लगाने देने का मौका कहीं भी नहीं छोड़ते।

मोदी अपने भाषणों में भले ही कांग्रेस पर प्रहार करें, या राहुल गांधी पर, लेकिन वे स्थानीय मुद्दों से खुद को जोड़ने में देर नहीं लगाते। पुणे में मेट्रो की शुरूआत के मौके पर नोटबंदी की परेशानी में उलझे लोगों के बीच उन्होंने कहा कि शरद पवार के लिए मेरे मन में बहुत सम्मान है, तो तो लोग खुश हो उठे। इसी तरह बनारस में ‘हर-हर महादेव’ का घोष करते हुए मोदी कहते हैं कि भोले बाबा की धरती से गंदगी साफ करने की ताकत मिली है, तो लोग अपनी माटी की महक में खो जाते हैं। हाल ही में एक सभा में तो मोदी ने लोकसभा नहीं चलने देने के लिए विरोधियों के गठजोड़ को जेबकतरों की जमात के रूप में घोषित कर डाला। अब तक का सबसे तीखा हमला करते हुए मोदी बोले – ‘जेबकतरे जिस तरह से लोगों की जेब साफ करने के लिए आपसी तालमेल करके लोगों का ध्यान भंग करते हैं, उसी तरह विपक्ष सरकार का ध्‍यान दूसरी ओर खींच रहा है। ताकि काला कारोबार करने वाले अपना माल आसानी से ठिकाने लगा लें।’

भाषण कला के मंजे हुए खिलाड़ी मोदी अपने संबोधनों में जनता के सामने अकसर वो मिसालें देते हैं, जिससे देश बहुत नफरत करता है। इस कोशिश में वे कांग्रेस को पाकिस्तान की बराबरी में खड़ा करने से भी नहीं चूकते। नोटबंदी के मामले में कांग्रेस के आरोपों को मोदी अपने भाषणों में सीमा पर घुसपैठियों को फायदा पहुंचाने के लिए की जाने वाली पाकिस्तान की कवर फायरिंग से जोड़ते हैं। मोदी कहते हैं कि नोटबंदी का विरोध करके कांग्रेस बेईमान लोगों का समर्थन कर रही है। दरअसल, मोदी यह अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबंदी की सारी सफलता सिर्फ जनता की भावना से जुड़ी है। अगर लोग संतुष्‍ट रहेंगे, तभी उनका जलवा बरकरार रहेगा। सो, मुंबई में बीकेसी की सभा में वे लोगों के घंटों कतार में खड़े रहने की तकलीफ जानने की बात कहते हैं। फिर अगले ही पल, कालाधन रखनेवालों को धमकाते हुए कहते हैं – ‘ये सीधे सादे लोग तुम लोगों की वजह से कतार में परेशान हो रहे हैं। तुमको इसका भुगतान करना पड़ेगा।’ तो, लोग कतार में खड़े रहने के अपने दर्द को भूलकर खुशी में फिर ‘मोदी – मोदी’ के नारे लगाने लगते हैं। उसके तत्काल बाद बेईमानों की बरबादी के समय के प्रारंभ होने की बात कहते हुए मोदी जब बिना किसी का नाम लिए 70 साल तक मलाई खाने की बात करते हैं, तो फिर लोग इसे कांग्रेस पर प्रहार मानकर मजे से ‘मोदी – मोदी’ के नारे में झूम उठते हैं।

कोई पांच साल हो रहे हैं। देश के हर प्रदेश के हर शहर की हर सभा में करीब करीब ऐसा ही होता रहा है। प्रधानमंत्री जैसे बहुत ताकतवर पद पर आने की प्रक्रिया में समाहित होने से पहले गुजरात के अपने मुख्यमंत्री काल से ही मोदी ऐसा करते रहें हैं। याद कीजिए, जब सारे लोग राहुल गांधी को युवराज कहते थे, उस जमाने में भी मोदी शहजादा कह कर लोगों के बीच राहुल गांधी की नई शक्ल गढ़ रहे थे। तब से ही मोदी देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के इस सबसे चमकदार नेता को लगातार निशाने पर रखे हुए हैं। देश मोदी को लगातार ध्यान से सुन भी रहा है और उन पर भरोसा भी कर रहा है। वैसे, भाषण के मामले में मोदी को अटल बिहारी वाजपेयी की बराबरी खड़ा कर देनेवालों की संख्या भी हमारे देश में कम नहीं है। लेकिन यह बात खुद मोदी भी मानते हैं कि अटलजी की तरह उनके भाषण में न तो समा बांधने वाली ताल है और न ही लोगों को भावविभोर कर देनेवाली लयबध्दता। मगर, गैर हिंदी भाषी होने के बावजूद मोदी ने खुद को जिस आला दर्जे के वक्ता के रूप में दुनिया के दिलों में खुद को स्थापित किया है, वह अपने आप में बहुत अदभुत और अदम्य है। इसलिए किसी को भी यह मानने में कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए कि हमारे देश के ज्ञात इतिहास में अटलजी के बाद सबसे लोकप्रिय वक्ता के रूप में अगर कोई हमारे सामने है, तो वह सिर्फ नरेंद्र मोदी ही है। भले ही वे भाषण देते वक्त कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी के मामले में न केवल अत्यंत आक्रामक बल्कि बहुत क्रूर होने की हद तक चले जाते हैं। देखा जाए तो, मोदी को इस क्रूर अंदाज में लाने का श्रेय भी कांग्रेस और खासकर राहुल गांधी और उनकी माता सोनिया गांधी को ही जाता है, जिन्होंने मोदी को ‘लाशों का सौदागर’ से लेकर ‘शहीदों के खून का दलाल’… और न जाने क्या क्या कहा। फिर वैसे देखा जाए, तो लोकतंत्र में अपनी ताकत को ज्यादा लंबे वक्त तक जमाए रखने के लिए कुछ हद तक क्रूर और अत्यंत आक्रामक होना भी आज मोदी की सबसे पहली जरूरत है।

वैसे, मोदी के अंदाज देखकर राहुल गांधी को अब तक यह समझ में आ जाना चाहिए था कि भाषण देना भी कुल मिलाकर सिर्फ और सिर्फ एक कला है। और यह भी समझ में आ जाना चाहिए था कि अपने भाषण में धारदार शब्दों के जरिए ही विरोधी को कटघरे में खड़ा करके उसकी छवि का मनचाहा निर्माण किया जाता है। मोदी इस कला के माहिर खिलाड़ी हैं और राहुल गांधी की ‘पप्पू’ छवि को वे इतना मजबूत कर चुके हैं कि उससे पीछा छुड़ाना पूरी कांग्रेस के लिए भी कोई बहुत आसान काम नहीं है। कांग्रेस को यह भी मान लेना चाहिए कि मोदी जैसी भाषण देने की कला में पारंगत होना राहुल गांधी के बस की बात ही नहीं है। ज्यादा साफ साफ कहें तो कम से कम मोदी की तरह भाषण देने में पारंगत होने के लिए तो राहुल गांधी को नय़ा जनम लेना पड़ेगा। वैसे भी राहुल खुद स्वीकार कर चुके हैं कि राजनीति जहर है। और दुनिया तो खैर, यहां तक भी कहती है कि राजनीति राहुल गांधी के बस की बात है ही नहीं। आप भी कुछ कुछ ऐसा ही मानते होंगे!

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क- 09821226894

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तो अब प्रियंका गांधी के सहारे राहुल मजबूत होंगे?

कांग्रेस अब बदलाव की तैयारी में है। अपने 131वें स्थापना दिवस से पहले कांग्रेस प्रियंका गांदी को पार्टी में पद पर लाकर राहुल गांधी को मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। इससे पार्टी से युवा तो जुडेंगे ही, महिलाएं भी मजबूती से जुड़ेगी। जो, कि बीते दस साल में पार्टी से दूर होते गए हैं। मगर, ऐसा नहीं हुआ, तो फिर कांग्रेस की दशा और दिशा किधर जा रही होगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। मतलब साफ है कि नियुक्ति करे तो भी और नहीं करे तो भी, कांग्रेस फिलहाल सवालों के घेरे में है। वैसे, राजनीति अपने आप में एक सवाल के अलावा और है ही क्या?

निरंजन परिहार

कांग्रेस के भीतर अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा और देश की राजनीति ने कोई बहुत बड़ी करवट नहीं ली, तो आनेवाले साल से पहले, मतलब 31 दिसंबर 2016 से पहले राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष और प्रियंका गांधी पार्टी की महासचिव होगी। सोनिया गांधी ने इसके लिए अपनी हामी दे दी है और अब सिर्फ वक्त का इंतजार है। नोटबंदी के बाद राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता की परख हो चुकी है और पार्टी के भीतर जो हालात हैं, उनको देखकर साफ लगने लगा है कि राहुल और प्रियंका के सामूहिक नेतृत्व में ही कांग्रेस को आसानी से आगे बढ़ाया जा सकता है। जो नेता कांग्रेस की नीतियां तय करते हैं, उनमें से एक वरिष्ठतम नेता की मानें, तो पार्टी ने इसकी मानसिक तैयारी कर ली है। बहुत संभव है कि सोमवार यानी 26 दिसंबर के बाद इस बारे में कभी भी अधिकारिक ऐलान किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि राहुल गांधी फिलहाल उपाध्यक्ष के रूप में ही अध्यक्ष के सारे अधिकारों का उपयोग करने के लिए अधिकृत कर दिए जाएं और सोनिया गांधी पार्टी की सर्वेसर्वा बनी रहे। 28 दिसंबर को कांग्रेस का स्थापना दिवस है और बहुत संभव है, उसी दिन कांग्रेस देश को यह नई खबर दे दे। 

दरअसल, कांग्रेस की कमान पूरी तरह राहुल और प्रियंका के हाथ सोंपने की मंशा के पीछे पार्टी की मान्यता यह है कि कांग्रेस को इससे बहुत बड़ा फायदा होगा। सबसे पहली बात तो, युवा मतदाता, जो कि पिछले एक दशक में पार्टी से दूर हो चुका है, वह कांग्रेस से फिर से जुड़ेगा। और इससे भी बड़ा फायदा होगा, प्रियंका गांधी के पार्टी में ताकतवर होने से। माना जा रहा है कि प्रियंका के पार्टी में पद पर आने से महिलाओं को जोड़ने का जो काम सोनिया गांधी अब तक नहीं कर सकीं, वह काम बहुत आसानी से हो सकता है। प्रियंका की युवा वर्ग में तो अपील है ही, महिलाएं भी बड़ी संख्या में उन्हें पसंद करती है, जो कि कांग्रेस से फिर से जुड़ेंगी। दरअसल, इंदिरा गांधी के बाद महिलाओं को अपने से जोड़ने के काम में कांग्रेस कभी बहुत सफल नहीं रही। लेकिन वह काम प्रियंका के जरिए आसानी से हो सकता है, क्योंकि देश की जनता उनमें इंदिरा गांधी की छवि देखती है। पार्टी का एक धड़ा नता है कि राहुल गांधी को अभी भी नेतृत्व की अपनी योग्यता को साबित करना बाकी है। मगर, प्रियंका गांधी के पार्टी में पद पर आने के बाद यह काम आसानी से हो सकता है, क्योंकि तब राहुल गांधी अकेले नहीं होंगे। इस पूरी प्रकिया में, जहां तक सोनिया गांधी का सवाल है, उन्हीं के मार्गदर्शन में राहुल और प्रियंका पार्टी को नई दिशा देंगे। 

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की मानें, तो प्रियंका गांधी को पार्टी का महासचिव नियुक्त किए जाने के बारे में फैसला लगभग हो चुका है। दिल्ली के 10 जनपथ की दीवारों के दायरों का हाल जाननेवाले एक वरिष्ठ नेता की राय में देश के वर्तमान राजनीतिक हालात में कांग्रेस की हालत देखकर खुद प्रियंका गांधी भी पार्टी में अपनी नई भूमिका के लिए मन बना चुकी है। वैसे, इससे पहले भी प्रियंका को कांग्रेस  संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने की पेशकश तीन बार की गईं थी। लेकिन हर बार वे इसे टालती रहीं। और, राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने के लिए प्रियंका गांधी सोनिया गांधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली और राहुल गांधी की संसदीय सीट अमेठी तक ही खुद को सीमित रखे हुए रहीं। मगर, हाल ही में पंजाब और यूपी चुनाव में प्रचार के लिए प्रियंका के जिम्मेदारी लेने की हामी भरते ही कांग्रेस को लगा कि उन्हें पार्टी में पद पर आने का फिर से प्रस्ताव दिया जाना चाहिए। बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियों में प्रियंका को भी लगने लगा है कि उनको कोई तो फैसला घोषित करना ही पड़ेगा। इसीलिए उत्तरप्रदेश, पंजाब, गोवा और फिर गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें कोई फसला लेना ही होगा। यह सही अवसर है और खबर है कि सोनिया गांधी ने खुद उन्हें मनाया है। 

राहुल गांधी की उपाध्यक्ष से पदोन्नति के बारे में अंदर की खबर यह है कि फिलहाल उन्हें पार्टी अध्यक्ष के तौर पर पदोन्नति देने के मामले में कांग्रेस में मतभेद है। पार्टी नेताओं का एक बड़ा धड़ा यह मानता है कि 131 साल पुरानी किसी पार्टी के सर्वेसर्वा के रूप में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्रिक राष्ट्र में जो नेतृत्व परिपक्वता किसी नेता में होनी चाहिए, वह राहुल गांधी में हैं तो सही, लेकिन अब तक उभर कर सामने नहीं आ पाई है। इसलिए फिलहाल अध्यक्ष पद तो सोनिया गांधी ही सम्हाले। लेकिन पार्टी में युवा वर्ग के नेता मानते हैं कि राहुल गांधी सफलतम अध्यक्ष साबित होंगे। उनके अध्यक्ष बनने से देश का युवा वर्ग पार्टी से जुड़ेगा। महिलाओं का मामला प्रियंका गांधी सम्हाल ही लेंगी। सो, सहारा भी मिल जाएगा।   

आनेवाली 28 दिसंबर को कांग्रेस की स्थापना के 131 साल पूरे हो रहे हैं। देश भर में हर गां इकाई तक कांग्रेस का उत्सव मनेगा और पार्टी नए सिरे से नई ताकत के साथ देश भर में अपना बिगुल फूंकेगी। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व की तस्वीर में अगर कुछ भी नहीं बदला, तो इस उत्सव का कोई असर नहीं होगा। इसीलिए तस्वीर में ये दो नए फोटो फिट करने के बारे में निर्णय हुआ माना जा रहा है। खबर है कि 28 दिसंबर से पहले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों की ही नियुक्तियों का ऐलान किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि 131 साल बाद कांग्रेस फिर से नई उर्जा से समाहित होकर मैदान में उतरेगी। हर पार्टी खुद को मजबूत करने और लंबे चलने के लिए जो कोशिशें करती है, वहीं कांग्रेस भी कर रही है। तस्वीर साफ है कि प्रियंका को साथ लाकर राहुल को मजबूत करने की यह कोशिश है। लेकिन यह भी तय है कि ऐसा हुआ, तो कांग्रेस और कांग्रेसियों पर एक बार फिर वंशवाद को नमन करने के आरोप भी लगेंगे, जिनका किसी भी स्तर पर जवाब देना किसी के लिए भी कोई आसान खेल नहीं होगा ! और अगर बिना नियुक्ति हुए कांग्रेस में सब कुछ वैसा ही चलता रहा, जैसा कि फिलहाल चल रहा है, तो पार्टी का विकास कैसे होगा, युवा कैसे जुड़ेंगे, महिलाएं कैसे कांग्रेस के नजदीक आएंगी और संगठन की तस्वीर कैसे बदलेगी, ये सबसे बड़े सवाल हैं !

निरंजन परिहार
राजनीतिक विश्लेषक
niranjanparihar@gmail.com
09821226894

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सहारा पर मोदी की चुप्पी देशद्रोह! भड़ास के सवालों पर भी मौन है मोदी सरकार

राहुल गांधी ने सहारा पर मोदी से अपने सवालों का सीधा जवाब मांगा. भड़ास ने तो सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि आखिर क्यों जब सारे चिटफंडिये जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं तो सहारा और एक-दो चिटफंडियों पर रियायत क्यों? गरीबों के मसीहा बने मोदी सरकार क्यों इस मामले में दरियादिली दिखा रहे हैं. जबकि सहारा मीडिया कर्मचारी भी अपनी सैलरी के लिए सहाराश्री की पोल खोलते हुए सत्ता के तमाम दरवाजों को खटखटा चुके हैं.

अब राहुल गांधी ने फिर पूछा कि प्रधानमंत्री साफ करें कि सहारा से उन्होंने पैसे लिए या नहीं. प्रधानमंत्री को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए. भड़ास का स्टैंड राहुल गांधी से थोड़ा अलग है. हम प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहते हैं कि अदालतों को दोष देने से पहले बतायें कि किन प्रशासनिक विफलताओं की वजह से…

-चिटफंडियों के मसीहा समझे जाने वाले सहाराश्री जेल से बाहर कैसे आये?

-सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो पैसा सहारा कंपनी सेबी में जमा करा रही है वो पूंजी कहां से आ रहा है. कहीं गरीबों से फिर से वसूली जा रही रकम ही तो नहीं है.

-मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जरिए सहारा के ऑफिसों को क्यों पूरे देश में पैसे वसूलने की आजादी मिली है, जिसके कारण सही मायने में संचालित कोऑपरेटिव संस्थायें भी आने वाले समय में बदनाम होंगी.

-सहारा ग्रुप के ऑफिसों से ही मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं को संचालित किया जा रहा है, सूत्र बताते हैं कि इन संस्थाओं से सहाराश्री ने लिखित रुप से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखा है.

-कृषि मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जिम्मेदार पदों पर सुब्रत राय सहाराश्री ने अपनी कठपुतलियों को बैठाया है. कार्रवाई किसके दबाव में रूकी है?

-किस कारण सहाराश्री परिवार का अब एक भी सदस्य सहारा इंडिया परिवार का किसी भी अहम पद पर नहीं है, जबकि अच्छे दिनों में बेटा-बहु से लेकर भाई-भतीजा तक सहारा कर्तव्ययोगियों की सलामी (सहारा प्रणाम) लेते रहे हैं और आज भी लेते हैं.

-सहारा जिन मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं और बीमा कंपनी के जरिए पूंजी जुटा रही है, आखिर उस पूंजी के लेन-देन की दैनिक निगरानी क्यों नहीं की जा रही है जबकि सहाराश्री की गतिविधियां संदिग्धता के दायरे में आ चुकी हैं.

क्या मोदी सरकार उस समय जागेगी, जब गरीब जनता अपने पैसों के लिए फांसी पर झूलने के लिए मजबूर होने लगेगी और फांसी के लिए रस्सी कम पड़ना शुरू हो जायेगी. दबाव बनाने और बेजा फायदे के लिए मीडिया कंपनी खोले सुब्रत राय सहाराश्री की मनमानी के चलते ही सहारा मीडिया भारी घाटे में रीढ़हीन और पंगु दिखती है. सहारा मीडिया के कर्मचारी आज भी अपने एक साल से ज्यादा की सैलरी के लिए सहाराश्री की कृपा की बाट जोह रहे हैं. लेकिन सहाराश्री की मुख्य चिंता बकाये सैलरी से ज्यादा ग्लैमरस पार्टी में होती है.

भड़ास4मीडिया केवल इतना चाहता कि मोदी सरकार स्वीकार करे कि सहाराश्री को मिल रही रियायत के लिए अदालतों से ज्यादा उनकी प्रशासनिक नाकामयाबी है. देश की अस्मिता से जुड़ा सवाल है कि क्या ये फायदे सुब्रत राय सहाराश्री को मोदी सरकार ने लोकसभा चुनावों में पूंजी उपलब्ध कराने के एवज में दी है? अगर ऐसा है तो ये देशद्रोह है. अब बारी मोदी जी की है, तो मोदी जी… बोलिए, देश सुन रहा है…

संबंधित खबरें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सहारा समूह ने छह महीने में नौ बार दिए नरेंद्र मोदी को करोड़ों रुपये : राहुल गांधी

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिरकार बम फोड़ ही दिया. उन्होंने आज मेहसाणा (गुजरात) में आयोजित एक रैली में कहा कि सहारा समूह पर पड़े छापे के बाद छह महीने में सहारा समूह के लोगों ने नरेंद्र मोदी को नौ बार करोड़ों रुपए दिए. मोदी को सहारा के बाद बिड़ला ग्रुप के लोगों ने भी पैसे दिए. इसकी पूरी जानकारी तारीख-दर-तारीख और विस्तार से मौजूद है.

6 mahine mein 9 baar Sahara ke logon ne apni diary mein likha hai ki humne Narendra Modi ji ko paisa diya hai. The records are with IT Dept for last 2 and half years yet no action has been taken. An independent enquiry must be initiated. IT Department raided Sahara Company on 22 Nov, 2014. As per record with IT, Rs 2.5 cr was given to PM Modi on 30 Oct ’13; Rs 5cr on 12 Nov ’13; Rs 2.5 cr on 27 Nov ’13; Rs 5cr on 29 Nov ’13 : Rahul Gandhi

राहुल के इस सनसनीखेज आरोप से हड़कंप मच गया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज आखिर उस आरोप का खुलासा कर ही दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. मेहसाणा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. राहुल ने कहा कि पीएम मोदी ने गुजरात का सीएम रहने के दौरान सहारा कंपनी से 6 महीने में 9 बार पैसे लिए थे. आईटी के छापे में इसका खुलासा हुआ था. उन्होंने बकायदा रैली के मंच से चिट लहराते हुए ये आरोप लगाया.

राहुल ने कहा कि 2013 में पड़े आईटी के छापे के बाद सामने आया कि सहारा ने नरेंद्र मोदी को पैसा दिया. सहारा के लोगों ने अपनी डायरी में लिखा है कि हमने 6 महीने में 9 बार नरेंद्र मोदी जी को पैसा दिया है. आपने मुझे संसद में बोलने नहीं दिया. आप मेरे सामने खड़े होने को तैयार नहीं थे. पता नहीं क्या कारण था? कोई बिजनेस चलाता है तो वो उसका रिकॉर्ड रखता है. किसको कितने पैसे दिए कितने लिए. 22 नवंबर 2014 को सहारा पर रेड हुई. सहारा के रिकॉर्ड में जो लिखा था वो बताता हूं.

30 अक्टूबर 2013 को ढाई करोड़ मोदी जी को दिया गया. 12 नवंबर 5 करोड़ दिया गया. 29 नवंबर को 5 करोड़ लिखा था. 6 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 19 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 14 जनवरी 2104 को 5 करोड़. 28 जनवरी को 5 करोड़. 22 फरवरी को 5 करोड़ दिए गए.

राहुल ने कहा कि छह महीने में 9 बार सहारा ने मोदी जी को पैसा दिया है. ये जानकारी ढाई साल से आयकर के पास है. इस पर जांच होनी चाहिए. इस पर जांच क्यों नहीं हुई? ये सच है या झूठ, देश को बताइए मोदी जी. आपने पूरे देश को लाइन में रखा, उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाया. अब मैं देश की ओर से पूछ रहा हूं जो ये इनफार्मेशन इनकम टैक्स के पास है, क्या यह सच है और इसमें जांच कब होगी? ऐसा ही एक रिकॉर्ड बिरला कंपनी का है. मोदीजी आप प्रधानमंत्री हैं, आपके ऊपर सवाल उठाए जा रहे हैं अब आप देश को बताओ कि यह सच है कि नहीं? आप एक निष्पक्ष जांच इस मामले में कराइए. बिरला का भी रिकॉर्ड है. आप पीएम हैं, आप पर सवाल है. आयकर के साइन हैं. आप खुद बताइए कि यह सच है या नहीं?

इन्हें भी पढ़ें…

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

तो क्या राहुल गांधी ठिकाने लगा देंगे वरिष्ठ नेताओं को?

-निरंजन परिहार-
कांग्रेस के बड़े नेता भीतर ही भीतर भुनभुना रहे हैं। ये सब मान रहे है कि नोटबंदी के बाद राहुल गांधी की राजनीति तो चमकी हैं, लेकिन उन्हें यह भी लगने लगा है कि जल्दबाजी में राहुल गांधी नई आफत भी मोल लेते जा रहे हैं। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता राहुल के ताजा राजनीतिक रवैये से खुश नहीं हैं। मजबूरी यह है कि वे नाराजगी जाहिर नहीं नहीं सकते। अगर कर दें, तो राहुल गांधी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध भूचाल भले ही नहीं ला पाए, मगर राहुल के विरुद्ध पार्टी में भूकंप जरूर आ जाएगा। माना जा रहा है कि सही समय पर ये वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से इस मामले पर बात करेंगे। ये सारे पार्टी के बड़े नेता हैं, सो बाहर बोलें भी, तो बोलें कैसे। क्योंकि उनका यह आचरण पार्टी लाइन के विरुद्ध काम होगा।

बड़े लोग वैसे भी मामले संभालने के लिए होते हैं, बिगाड़ने के लिए नहीं। उनका मानना है कि राहुल गांधी के रणनीतिकार जो सलाह दे रहे हैं, वह तात्कालिक रूप से भले ही पब्लिसिटी दिलाने में सफल रही हो। लेकिन लंबी दूरी की रणनीति में राहुल का यह रोल कारगार साबित नहीं होगी और पार्टी को फायदे के बजाय नुकसान ही होगा। इसी कारण कांग्रेस के ये बड़े नेता मन ही मन नाराज से दिख रहे हैं। पार्टी की नई टीम के कुछ लोग इसे, राहुल गांधी द्वारा वरिष्ठ नेताओं के बजाय नई पीढ़ी को ज्यादा तवज्जोह देने से जोड़कर देख रहे हैं। वैसे यह घोषित तथ्य है कि राहुल गांधी नई पीढ़ी के नेताओं को लगातार मजबूत करते जा रहे हैं और उनके मुकाबले पुराने नेताओं को कोई बहुत भाव नहीं दे रहे हैं।  

तस्वीर साफ है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी कांग्रेस के सारे फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। अधिकारिक रूप से भले ही राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर नहीं है, फिर भी अध्यक्ष सोनिया गांधी की तरफ से उन्हें एक तरह से हर तरह के फैसले के लिए फ्री हेंड मिला हुआ है। पंजाब में अमरिंदर सिंह को आगे करने से लेकर उत्तर प्रदेश में राज बब्बर को ताकत बख्शने और समाजवादी पार्टी से दोस्ती का हाथ बढ़ाने जैसे सारे फेसले राहुल गांधी के अपने फैसले हैं। लेकिन हाल ही में संसद में प्रधानमंत्री से मिलने जाने के फैसले में राहुल गांधी से चूक हो गई, ऐसा माना जा रहा है। पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं की राय में प्रधानमंत्री से अकेले कांग्रेस को नहीं मिलना चाहिए था। क्योंकि इससे विपक्ष की एकता तो आघात पहुंचा है। इसके साथ ही राहुल गांधी ने मोदी के खिलाफ जो भूचाल लानेवाले सबूत पेश करने की बात कही थी। कहा था कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी भ्रष्टाचार के सबूत हैं। लेकिन उसके बाद राहुल ने चुप्पी साध ली। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल जैसों को भी इसी कारण कांग्रेस पर प्रहार का मौका मिल गया। केजरीवाल ने खुला चैलेंज देते हुए साफ साफ कहा कि राहुल गांधी ने मोदी से डील की है। केजरीवाल ने पूछा कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री से मिले थे और उसके तत्काल बाद राजनीतिक दलों को पुराने नोट बिना टैक्स और बिना जुर्माने के बैंकों में जमा कराने के फैसले की घोषणा की गई। केजरीवाल ने कहा कि राहुल गांधी इस डील का खुलासा करें। इससे पहले राहुल भ्रष्टाचार को लेकर मोदी पर बराबर आरोप लगा रहे थे। लेकिन उन्होंने इन आरोपों को सार्वजनिक नहीं किया। कांग्रेस के बड़े नेताओं का मानना है कि इससे कांग्रेस की मजबूत छवि को आघात पहुंचा है।

कांग्रेस के इन सीनियर नेताओं की राय में नोटबंदी पर राहुल गांधी शुरू शुरू में सही जा रहे थे। लेकिन अगर उनको वास्तव में कुछ कहना और करना ही था, तो उन्हें संसद में आखिर के दो दिनों में सदन के भीतर कुछ कर लेना चाहिए था। लेकिन उन्होंने सिर्फ पीएम का गुब्बारा फटने और भूकंप आने की बात कहने के बावजूद कुछ नहीं कहा। जिससे सारा गुड़ गोबर हो गया। इन नेताओं का राय में अब संसद का सत्र समाप्त हो चुका है, तो कोई बात नहीं। राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी के बारे में जो कुछ कहना चाहते थे, वह उनको प्रेस कॉन्फ्रेंस करके देश के सामने कह देना चाहिए। इन नेताओं की चिंता यह है कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो देश राहुल गांधी को बहुत हल्के में लेगा। और सरकार में बैठे लोग और बीजेपी कहेगी कि भूकंप लानेवालों और गुब्बारे की हवा निकालनेवालों की खुद ही हवा मिकल गई। ऐसे में, जितना समय निकलता जाएगा, उतना ही राहुल की व्यक्तिगत छवि पर असर पड़ता जाएगा। ये नेता राहुल गांधी के बैंक की लाइन में लगने को भी ठीक नहीं मानते। इनकी राय में अगर राहुल गांधी का यह कदम सही होता, तो देश के बाकी बहुत सारे बड़े नेता भी उनका अनुसरण करते। लेकिन कोई बैंक की कतार में नहीं लगा। जनता भी मोदी सरकार के खिलाफ खुलकर सामने नहीं आई। 

 

कुल मिलाकर राहुल गांधी की लीडरशिप के मजबूत होने के बावजूद पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक ठाक नहीं है। राहुल गांधी से सीधे पंगा मोल लेने की इन नेताओं की हिम्मत नहीं है। लेकिन नई पीढ़ी के नेताओं से घिरे राहुल गांधी के आहत नेताओं की ये मंडली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक अपनी भावना पहुंचा चुकी हैं। अब वे इस इंतजार में है कि सोनिया गांधी से कहें। हालांकि अपना मानना है कि कांग्रेस के बड़े नेता अकसर तभी पार्टी से ज्यादा प्रेम जताने लगते हैं, जब उन्हें कोई नहीं पूछता। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में  राहुल गांधी की काम करने की शैली से नाराज ये नेता इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि सोनिया गांधी उनकी बात सुन भी लेंगी, तो भी होगा तो वहीं, जो राहुल गांधी चाहेंगे। लेकिन ऐसा करने से वे पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष पार्टी के बारे में चिंता करनेवाले एवं राहुल गांधी के राजनीतिक कदमों की समीक्षा करनेवाले के रूप में तो जगह बना ही लेंगे। बात जो भी हो, लेकिन संकेत साफ है कि कांग्रेस में चाहे कोई कितना भी नाराज हो, राहुल गांधी को अब किसी की कोई खास परवाह नहीं है। उनसे निपटना और उन्हें निपटाना राहुल गांधी को अच्छी तरह आता है। क्योंकि राहुल गांधी यह भी जान गए हैं कि कांग्रेस में गुटबाजी से निपटने और गुटबाजी पैदा करनेवालों को निपटाने के लिए उन्हें कोई बहुत दिक्कत नहीं आएगी। भरोसा नहीं हो तो, देखते रहिए, कुछ ही दिन की तो बात है। राहुल गांधी पर भुनभुनानेवाले ये नेता आनेवाले दिनों में ठिकाने लग चुके नजर न आएं, तो कहना।

(लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी से मिलकर राहुल ने अपनी रही-सही इमेज का भी सत्यानाश कर लिया

Om Thanvi : राहुल अपनी पार्टी के नेताओं के साथ जाकर मोदी से मिल आए। संसद में पंद्रह विपक्षी दलों के सहयोग से पनपी एकता टूट गई। मुलाक़ात का फ़ायदा मोदी ने अपने हक़ की ख़बरों के प्रसार (‘हमें मिलते रहना चाहिए, राहुलजी’!) से उठाया है, जिसमें उनका प्रचार-तंत्र माहिर है। इससे कांग्रेस को क्या हासिल हुआ? क्या राहुल मोदी के ग़ुब्बारे की हवा निकालने जा रहे हैं? या अगले संसद सत्र (और फिर उससे अगले) का इंतज़ार करेंगे? तब तक तो मोदी कई ग़ुब्बारे और फुला चुके होंगे। भोले जन-मानस को ग़ुब्बारे पसंद हैं, जब तक वे फुस्स न हों।  अगर राहुल गांधी के पास ठोस तथ्य हैं तो संसद के कवच की परवाह न कर उन तथ्यों को जनता के सामने अविलंब रख देना चाहिए। भूचाल न सही, आँधी-तूफ़ान सही! वरना इतना शोर उठाकर अब ग़ुब्बारे से कतराना उनके ही गले की घंटी बन जाएगा।

Sanjaya Kumar Singh : राहुल गांधी का नरेन्द्र मोदी से मिलना – बहुत ही बचकाना है। भाजपा उसका फायदा उठा रही है। गलत संदेश फैलाया जा रहा है। जो नहीं हुआ वो बताया जा रहा है – तो इसकी जड़ मुलाकात में ही है। और इसके लिए सिर्फ और सिर्फ राहुल दोषी हैं। हालांकि, इससे राहुल के बारे में मेरी राय नहीं बदलेगी। पर राहुल का बचाव करना मेरा काम नहीं है। और मौके का फायदा भाजपा उठाये तो उसकी पोल खोलना मैं जरूरी नहीं समझता।

पत्रकार द्वय ओम थानवी और संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल गांधी सियासत का एक अवसरवादी चेहरा

अजय कुमार, लखनऊ

कांग्रेस के युवराज पूरा देश जीतने के लिये निकले हैं। इसके लिये उन्हें कुछ भी करने से परहेज नहीं है।  अपनी तकदीर बनाने के लिये वह देश की तस्वीर बदरंग करने से भी नहीं हिचकिचाते हैं।  आज की तारीख में राहुल गांधी अवसरवादी राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन गये हैं। वह वहां तुरंत पहुंच जाते हैं जहां से मोदी सरकार को कोसा जा सकता है। अभी तक की उनकी सियासत देखी जाये तो वह देश के किसी भी हिस्से में हुई दर्दनाक मौत पर खूब सियासत करते हैं। बुंदेलखंड में भूख से मरते किसानों, मुजफ्फनगर दंगा, अखलाक की मौत, हैदराबाद में एक दलित छात्र की आत्महत्या जैसे मामलों को हवा देने में राहुल को काफी मजा आता है।

संसद में भले ही राहुल नहीं बोल पाते हैं, लेकिन गांव-देहात, आदिवासियों, किसानों के बीच वह खूब बोलते हैं, जहां उनसे कोई सवाल-जबाव करने वाला नहीं होता है।  2014 में भले ही उनके अरमानों पर मोदी ने पलीता लगा दिया हो लेकिन 2014 न सही 2019 में तो पीएम बनने का सपना तो राहुल देख ही सकते हैं।  भले ही राहुल की काबलियत पर लोग उंगली उठाते हों, लेकिन जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया है, वहां काबलियत नहीं देखी जाती है। यह परिवार तो यही सोचता और समझता है कि वह देश पर राज करने के लिये ही पैदा हुआ है। ऐसा सोचना गलत भी नहीं है नेहरू-गांधी परिवार की तीन पीढ़िया तो पीएम की कुर्सी पर बैठ ही चुकी हैं तो फिर चौथी पीढ़ी के राहुल गांधी क्यों नहीं पीएम बन सकते हैं।  उनके(राहुल गांधी) पास तो और कोई काम भी नहीं है, जबकि उनके पिता राजीव गांधी तो हवाई जहाज उड़ाते-उड़ाते पीएम बन बैठै थे। 

राहुल महाभारत के उस अर्जुन की तरह आगे बढ़ रहे हैं जिसे सिर्फ चिड़िया की ऑख दिखाई देती थी। बस फर्क इतना है कि आज के अर्जुन राहुल गांधी चिड़िया की जगह  पीएम की कुर्सी नजर आती है। येन केन प्रकारेण वह इस कुर्सी को हासिल कर लेना चाहते हैं। इसके लिये वह हर हथकंडा अपना रहे हैं। इसके लिये वह अपनी निगेटिव सोच को आगे बढ़ाने से भी गुरेज नहीं करते हैं। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं रहती है कि अब जमाना बदल गया है।  किसी नेता को कोई दल जनता के ऊपर थोप नहीं सकता है। मुंबई के प्रबंधन कालेज में राहुल गांधी किस तरह उपहास के केन्द्र बने इसकी अनदेखी भी कर दी जाये तो भी राहुल की योग्यता पर प्रश्न चिंह लगता ही रहेगा। एप्पल के को फाउंडर स्टीव जोंब्स को माइक्रोसेफ्ट का बताने जैसी गलती राहुल अक्सर ही करते रहते हैं। मुंबई के जिस प्रबंधन कॉलेज में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कार्यक्रम को संबोधित किया था, वहां के छात्र-छात्राएं ही उनके  संबोधन से संतुष्ट नही दिखे। 

कुछ छात्रों ने कहा कि राहुल के भाषण में कुछ ज्यादा ही राजनीति थी। इन छात्रों का कहना था कि राहुल को राजनीति को लेकर अपने विजन पर विस्तार से बोलना चाहिए।  जीएसटी पर की गई राहुल की टिप्पणी पर एक छात्र ने कहा कि कुछ चीजें ज्यादा विस्तार से बताई जानी चाहिए थी।  जैसे कि यदि जीएसटी विधेयक दो वजहों से अटका है तो सरकार और विपक्ष को इसे आगे बढ़ाने के लिए कोई व्यवस्था तलाशनी चाहिए।  एक अन्य छात्र ने कहा कि एक आम आदमी के तौर पर मेरी दिलचस्पी राजनीति में नहीं है।  मैं (विधेयक पारित होने में देरी) से निराश हूं। वहीं एक दूसरे छात्र का कहना था कि भारत के नेताओं को ‘‘जैसे को तैसा’’ वाला रवैया छोड़ना चाहिए।  कोई देश जैसे को तैसा वाले रवैये से नहीं चल सकता। सवाल-जवाब सत्र में राहुल से सवाल करने वाली एक छात्रा ने कहा कि राहुल गांधी ने मनरेगा और इसकी प्रक्रिया पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया।  उन्हें तो हमसे अपने विजन के बारे ज्यादा बात करनी चाहिए थी।

कांग्रेस के युवराज के साथ दिक्कत यह है कि एक पॉव विदेश में और दूसरा पॉव उस जगह रहता है जहां जरा भी वोट की उम्मीद नजर आती है।  जो कांग्रेस 60 वर्षो में और राहुल दस वर्षो तक सत्ता में रहते नहीं कर पाये उसके लिये राहुल गांधी केन्द्र की मोदी सरकार को सूली पर लटका रहे हैं।  अपने हित साधने के लिये संसद में व्यवधान खड़ा कर रहे हैं।  उन सभी मुद्दों को हवा दे रहे हैं जिससे विकास के काम प्रभावित हो सकते हैं।  देश में तनाव का माहौल पैदा करने में भी राहुल गांधी की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। राहुल को न तो कोई टोकने वाला है न कोई रोकने वाला, जिस पार्टी के नेताओं की वफादारी की पहचान दस जनपथ में घुटने टेकने से तय होती हो, वहॉ भला कोई राहुल को कैसे बता सकते हैं कि वह जिस रास्ते पर चल रहें हैं उससे न तो देश का भला होने वाला है न कांग्रेस को कोई फायदा होगा।  राहुल सिर्फ दूसरों की आलोचना ही करते रहते हैं।  कभी किसी मुद्दे पर अपनी सोच स्पष्ट नहीं करते हैं। चर्चा गंभीर से गंभीर विषय पर चल रही हो,  राहुल इसे घूमा फिराकर मोदी, सूट-बूट की सरकार,  असहिष्णुता,  आरएसएस, दलित, मुसलमान साम्प्रदायिक सोच, न खाऊंगा, न खाने दूंगा के इर्दगिर्द ही ले आते हैं।  राहुल की बेतुकी बातों से बीजेपी के नेता और मोदी सरकार ही बेचैन नहीं होते हैं कांग्रेस के भीतर भी दबी जुबान से लोग राहुल की काबलियत पर प्रश्न चिंह लगाते हैं। राहुल की काबलियत पर इतना बढ़ा प्रश्न चिंह लग गया है कि जब वह सही भी होते हैं तो भी लोग उन्हें सही नहीं समझ पाते हैं। 

दरअसल, गांधी परिवार के कारण ही कांग्रेस देश की सबसे पुरानी पार्टी होने का गौरव हासिल कर पाई और इसी परिवार के कारण आज कांग्रेस हासिये पर पहुंच गई है।  कांग्रेस का अपना कोई काडर नहीं है। गांधी परिवार की नजर में जो व्यक्ति चढ़ गया वह राजा बनकर कांग्रेस में अपनी मनमर्जी चलाता है।  राहुल गांधी की पीढ़ा भी यही है कि जिन नये चेहरों को वे आगे लाने की कोशिश करते हैं, पुराने नेता उन्हें पनपने ही नहीं देते। यह स्थिति नेतृत्व के कमजोर होने के कारण उत्पन्न होती है।  राहुल  को एक दशक से ऊपर का समय सक्रिया राजनीति में आए हुए हो गया है।  इस एक दशक में वे उन कांग्रेसियों से मुक्त नहीं हो पाए जो सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द जमा रहते है।  अहमद पटेल का जलवा आज भी बरकरार है।  उनके गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस कुछ खास नहीं कर पाई है। कांग्रेस में यह परम्परा नई नहीं है।  इंदिरा गांधी के जमाने में भी आरके धवन जैसे नेता कांग्रेस को चलाते थे।  उस वक्त कांग्रेस दुर्गति से बच पाई तो सिर्फ इसलिए की कोई राजनीतिक दल कांग्रेस को चुनौती देने वाला नहीं था। बात आज के नेतृत्व की कि जाये तो सोनिया गांधी के साथ भाषा की दिक्कत है तो राहुल गांधी तमाम कोशिशों के बाद भी अपनी छवि एंग्री नहीं बना पाए हैं। इसकी वजह भी है। 

राहुल गांधी के पास न तो सोच है,  न ही ऐसे रणनीतिकार, जो उन्हें देश व्यापी स्वीकार्यता दिला सकें।  इसके अलावा राबर्ट वाड्रा,  सोनिया और राहुल  की कमजोरी बने हुए हैं।  मां-बेटे को यह डर सताता रहता है कि राजग सरकार कहीं वाड्रा को जेल नहीं भेज दें? डर स्वाभाविक भी है।  वाड्रा कांग्रेस शासनकाल में रातों-रात करोड़ पति कैसे बने गये,  इसका जबाव अभी मिलना बाकी है।  आरोप है कि हरियाणा से लेकर राजस्थान तक उन्होंने कांग्रेस की सत्ता का दोहन किया।  वाड्रा यदि विवाद में रहते हैं तो प्रियंका गांधी कांग्रेस का नेतृत्व करने के लिये आसानी से आगे नहीं आ सकती हैं। 

कई बार यह भ्रम भी पैदा होता है कि सोनिया गांधी चाहती ही नहीं है कि कांग्रेस के पुराने दिन लौटें।  राजनीति हमेशा उनके समझ से परे रही।  यदि उनमें राजनीति करने और नेतृत्व करने के गुण होते तो डा.मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री ही नहीं होते।  कांग्रेस के नेताओं पर कोई नियंत्रण न तो सोनिया गांधी का है और न ही राहुल गांधी का।  राज्यों में भी नेतृत्व सामने पहचान का संकट है।  राहुल गांधी खुद इसके लिये जिम्मेदार हैं।  कांग्रेस के जिन युवा नेताओं का प्रभाव अपने-अपने राज्यों में है,  उन्हें नेतृत्व देने का साहस दस जनपथ नहीं उठा पा रहा हैं।  सोनिया गांधी को भय सताता रहता है कि नयी पीढी के नेता राहुल गांधी को ओवरटेक न कर जायें।  थोड़ी बहुत कसर बाकी थी वह नेशनल हेरेल्ड केस में सोनिया-राहुल का नाम आने से पूरी हो गई। यह ऐसा मसला है जो लम्बे समय तक कांग्रेस के गले की फांस बना रह सकता है।

राहुल गांधी की नासमझी का आलम यह है कि वह एक तरफ देश फतह करना चाहते हैं और दूसरी तरफ उन्हें इस बात का अहसास ही नहीं है कि उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में संेध लग रही है।  यह लापरवाही राहुल की तरफ से तब हो रही है जबकि लोकसभा चुनाव में उनको जीत के लिये एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था और भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी ने राहुल कों जबर्दस्त टक्कर देते हुए राहुल की जीत का आंकड़ा काफी कम कर दिया था।  कई दशकों से यूपी का अमेठी संसदीय क्षेत्र कांग्रेस पार्टी का अभेद्य किला समझा जाता रहा है, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाला यह दुर्ग अब दरक रहा है। 

इसका नजारा हाल ही में तब देखने को मिला जब दिसंबर 2015 के आखिरी दिनों मे राहुल गांधी दो दिवसीय दौरे पर अमेठी पहुंचे।  लेकिन माहौल ऐसा नहीं था, जैसा आज से दस वर्ष पूर्व हुआ करता था।  जहां उनके आने की खबर मात्र सें कार्यकर्ताओं और लोगों का हुजूम लगा जाता था। वहां इस बार उनके कार्यक्रम में चंद लोग ही नजर आये। इतना ही नहीं, इसके अलावा भी वह जहां भी गए,  जिस गाँव से गुजरे लोगों में वह उत्साह नहीं दिखा।  जनसंपर्क के दौरान भी लोग नदारद थे।  स्थानीय लोगों के मुताबिक अब राहुल से कोई उम्मीद नहीं रह गई है।  उनका कहना था की उन्होंने कई बार राहुल के सामने अपनी समस्याएं रखी,  लेकिन उन्हें आश्वासन के अलावा कुछ भी नहीं मिला।  हालांकि कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि राहुल अभी भी अमेठी की जनता के दिलों में रहते हैं, जहां तक कार्यक्रम में भीड़ नहीं जुटने की बात है तो यह कार्यक्रम अचानक बना था इसीलिए लोगों को पता नहीं चल सका। अमेठी की जनता और राहुल के बीच दूरी तो बढ़ ही रही है, अमेठी में राहुल से जुड़े विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। 

मगर राहुल इन आरोप का सामना करने की बजाये मुंह सिले हुए हैं। अपनी कहना और दूसरे की न सुनने की महारथ रखने वाले कांग्रेस के युवराज अगर अमेठी में अपनी खराब होती छवि को लेकर चिंतित नहीं हैं तो इसकी दो वजह हैं या तो राहुल गांधी ने यह तय कर लिया है कि अब वह अमेठी से अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे (क्योंकि अमेठी में स्मृति ईरानी काफी तेजी से पांव पसार रही हैं) या फिर राहुल के पास उन आरोपों का जबाव नहीं हैं और इसीलिये वह इन मुद्दांे पर बोलकर अपनी और किरकिरी नहीं कराना चाहते हो।

उधर, राहुल के विरोधियों का कहना था कांग्रेस के युवराज को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि सिर्फ आश्वासन और चिकनी-चुपड़ी बातों  से जनता के दिल में जगह नहीं बनाई जा सकती है।  एक तरफ राहुल अमेठी को भूल पूरे देश की सुध ले रहे हैं तो दूसरी तरफ केन्द्रीय मंत्री और 2014 में अमेठी में राहुल को कड़ी टक्कर देने वाली स्मृति ईरानी लगातार अमेठी में दौरे पर दौरे कर रही हैं। वह अमेठी आने और यहां आकर राहुल गांधी को आईना दिखाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ती हैं। उनके दौरे के दौरान भीड़ भी जुटती है और वह क्षेत्रीय जनता का काम भी कर रही हैं। जनता से संवाद बनाने की कला में राहुल और स्मृति में जमीन-आसमान का फर्क है। राहुल युवराज वाली छवि से उभर ही नहीं पा रहे हैं, जिसका खामियाजा उनको उठाना पड़ सकता है। हद तो तब हो गई जब हाल ही में अमेठी से जिला पंचायत अंध्यक्ष के चुनाव में अमेठी के कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी कृष्णा चौरसिया ने पर्चा वापस लेकर समाजवादी पार्टी को वॉकओवर दे दिया। यही हाल सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में भी रहा जहां उनका जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रत्याशी जीत को तरस गईं। जिला पंचायत चुनाव चुनाव में कांग्रेस के 22 में से 21 प्रतियाशियों को हार का सामना करना पड़ा। 

अमेठी से लेकर पूरे देश में राहुल जिस तरह की राजनीति कर रहें है उससे पुराने कांग्रेसी काफी चिंतित हैं। इसी लिये  पार्टी के बाहर से ही नहीं भीतर से भी चंद नेता राहुल को आइना दिखाने का काम कर रहे हैं।  हाल ही में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को सलाह दी थी कि संसद में भाजपा को जवाब देने के लिए उन्हें ज्यादा आक्रामक होने की जरूरत है। चव्हाण का कहना था कि राहुल को संसद में ज्यादा बोलने के अलावा अपनी भावभंगिमा पर भी ध्यान देना चाहिए,  ताकि जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता बढ़ सके। संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है। ऐसे में राहुलजी को विषयों पर विस्तार से अपनी बात रखना चाहिए।  एक वाक्य बोलने से हमेशा काम नहीं चलता है।  उन्हें लगातार 45 मिनट से एक घंटे तक बोलना चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व के करीबी माने जाने वाले चव्हाण ने कहा कि विपक्ष के नेताओं के लिए संसद ही एकमात्र विकल्प है जहां वे मुद्दों को उठा सकते हैं।  पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि राहुल गांधी को संसद में व्यक्त किए गए विचारों के आधार पर ही जाना जाएगा।

बार-बार फजीहत

मुंबई के प्रबंधन कालेज में सेमिनार से पूर्व नवंबर 2015 में बेंगलुरु के माउंट कार्मल कॉलेज में राहुल का सवाल-जवाब सेशन हुआ था।  उनकी उस वक्त भी काफी किरकिरी हुई थी, जब उनके सवालों पर स्टूडेंट्स ने कहा-हां,  मोदी सरकार की पॉलिसीज काम कर रही हैं।  हालांकि,  इसके बाद राहुल ने चर्चा का रुख ही मोड़ दिया।  जानिए,  आखिर कैसे राहुल और स्टूडेंट्स के बीच सवाल-जवाब हुआ।

राहुल का पहला सवाल-क्या स्वच्छ भारत पर काम हो रहा है ?

स्टूडेंट्स का जबाव-हां।

राहुल का इसी से मिलता-जुलता दूसरा सवाल-मैं तो नहीं देख पा रहा हूं कि स्वच्छ भारत अच्छे से काम कर रहा है।  क्या आपको लगता है कि यह काम कर रहा है?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव-हां।

राहुल का तीसरा सवाल- मैं एक और सवाल पूछता हूं।  क्या मेक इन इंडिया से फायदा हुआ ?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव- हां।

राहुल- क्या आपको वाकई ऐसा लगता है ?

स्टूडेंट्स- हां।

राहुल का चौथा स्वाल- क्या देश में यंगस्टर्स को नौकरी मिल रही है ?

स्टूडेंट्स का फिर से वही जबाव- हां।

राहुल निरूत्तर हो गये और बोले- मेरे ख्याल से स्वच्छ भारत काम नहीं कर रहा।  मेक इन इंडिया भी काम नहीं कर रहा।  देश के लिए बीजेपी का विजन काम नहीं कर रहा। …खैर जो भी हो।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राहुल बाबा, जो मीडिया पक्षपाती है, वही आपका साथी है

: संदर्भ – राहुल गांधी का छत्तीसगढ़ दौरा : दूसरे अन्य दौरों की तरह ही कांग्रेस के युवराज तथा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के छत्तीसगढ़ दौरे ने भी खासी सुर्खियां बटोरी। पार्टी के रॉक स्टार बन चुके युवराज राहुल गांधी के दौरे का मकसद साफ था कि वे यहां उन आदिवासियों की व्यथा-कथा जानने पहुंचे थे जो जल, जंगल, जमीन, आजीविका और अपनी संस्कृति बचाने के लिए सालों से उस औद्योगिक-माफिया से लड़ रहे हैं जिसकी गिद्धदृष्टि लगभग 30 हजार हेक्टेयर में फैली कोयला और बाक्साइट जैसी प्राकृतिक संपदा है और जिसे वह कोल आबंटन जैसी सरकारी प्रक्रिया का ठप्पा लगवाकर आराम से लीलना चाहते हैं।

किसानों, गरीबों और आदिवासियों के नए मसीहा के तौर पर उभरे राहुल ने दो दिनों तक छत्तीसगढ़ के मदनपुर, कोरबा, जांजगीर में जनसभाएं ली, रोड शो किए तथा आदिवासियों से रूबरू होते हुए दोहराया और विश्वास दिलाया कि वे उनकी आवाज बनकर उभरेंगे। राहुल गांधी ने सबसे पहले मदनपुर में केन्द्र और राज्य सरकार को निशाने पर लिया और आरोप लगाया कि वह चंद उद्योगपतियों के हाथों का खिलौना बन चुकी है और आदिवासियों की जमीनें तथा प्राकृतिक संपदा को इनके हाथों बेच रही है लेकिन उनका अगला आरोप चौंकाने वाला था।

चिलचिलाती धूप में पसीना पोंछते हुए राहुल गांधी के दौरे को कवर करने के लिए दिल्ली और रायपुर का जो मीडिया वहां चौबीस घण्टे से मौजूद था, उसे आड़े हाथों लेते हुए कांग्रेस के युवराज ने कहा : वैसे यह काम तो मीडिया को करना चाहिए मगर वह आपकी (आदिवासियों) आवाज नहीं उठाता इसलिए मुझे यहां आना पड़ा। राहुल गांधी यही नही रूके बल्कि उन्होंने मीडिया को पक्षपाती बताते हुए आरोप लगाया कि देश का मीडिया सरकारों के गुणगान और चंद उद्योगपतियों के हितों तक सीमित होकर रह गया है।

टीआरपी के लालच में मीडिया ने अपना जो नया चरित्र पेश किया है, उसके मुताबिक राहुल का यह आरोप नया नही है लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष ना भूलें कि पक्षपाती कौन है? क्या वे इसका जवाब दे सकते हैं कि यूपीए सरकार के दौरान इस इलाके के तीन कोल ब्लॉक जब आबंटित हो रहे थे तब उन्हें आदिवासियोंं या प्राकृतिक संपदा की चिंता क्यों नहीं हुई? राहुल बाबा को अच्छी तरह याद होगा कि यह वही मीडिया है जिसने कोल आबंटन भ्रष्टाचार का मुद्दा इस कदर उठाया कि कांग्रेस को इतिहास की सबसे बुरी हार का सामना करना पड़ा था। यह भी छुपा हुआ नही है कि राहुल गांधी के असफल नेतृत्व को लेकर दर्जनों उंगलियां उनकी अपनी ही पार्टी में उठती रही हैं और लोकसभा चुनाव के परिणामों ने तो इस पर गहरी और विश्वसनीय मुहर लगाई है

लेकिन देश के मीडिया ने हमेशा राहुल गांधी को नये अवतार के तौर पर पेश किया। गुजरे लोकसभा चुनाव को ही देखिए। प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी बहुत हलके थे मगर मीडिया ने निष्पक्ष रहने की जिम्मेदारी दिखाते हुए राहुल गांधी को इस कदर प्रोजेक्ट किया था कि मायावी तौर पर ही सही, राहुल बाबा प्रधानमंत्री बनने का सपना पाल बैठे थे जो कांग्रेस के इतिहास की अब तक की सबसे बुरी हार के साथ ही जमींदोज हो चुका है।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल द्विवेदी के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

जिंदल के चैनल ‘फोकस’ ने राहुल गांधी को बीजेपी उपाध्यक्ष घोषित किया

लाइव इंडिया नामक न्यूज चैनल अपने मालिक के घर के पार्टी फंक्शन को लाइव प्रसारित करने के कारण बदनाम है तो फोकस नामक चैनल नवीन जिंदल के निजी खेल, समारोह, चुनाव आदि को दिन भर लाइव दिखाने के लिए कुख्यात हो चुका है. इसी जिंदल के फोकस नामक चैनल ने अब तो राहुल गांधी को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष घोषित कर दिया है. इतनी बड़ी गलती फोकस टीवी पर लाइव चली लेकिन किसी वरिष्ठ पत्रकार की नजर इस पर नहीं पड़ी.

लाखों रुपये सेलरी लेने वाले नामधारी पत्रकारों ने भी मान लिया है कि फोकस तो जिंदल के जिद पर चल रहा है इसलिए यहां पत्रकारिता करने या पढ़ने-लिखने से कोई मतलब नहीं है, सो जो कुछ चैनल पर चल दिख रहा है, उसे चलने दिखने दो. पर दर्शकों के पास कई आंख नाक कान होते हैं. भड़ास के पास कई दर्शकों ने मेल करके फोकस टीवी की गलती को मय तस्वीर भेजा है जिसे यहां प्रकाशित किया जा रहा है.

कहीं ऐसा तो नहीं कि आजकल टीवी चैनल वाले बीजेपी से इतने अधिक प्रभावित हैं कि चैनलों ने राहुल गांधी तक को भी बीजेपी का उपाध्यक्ष दिखाना शुरू कर दिया है. पिछले दिनों राहुल गांधी ने झारखंड में एक चुनावी रैली को संबोधित किया था लेकिन कांग्रेसी सांसद रहे और इन दिनों परेशान घूम रहे नवीन जिंदल के चैनल फोकस टीवी ने राहुल गांधी का परिचय बीजेपी उपाध्यक्ष के रूप में करा दिया. अब सवाल ये है कि जिस पार्टी से नवीन जिंदल संबंध रखते हैं अगर उसी पार्टी के मालिक का नाम ही सही नहीं दिखा सकते हैं तो इस चैनल में काम करने वाले लोग किसी काम के नहीं हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: