सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया को लेकर मीडियाकर्मियों की लड़ाई को लेबर कोर्टों के हवाले किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिया साफ संदेश- ”मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लेबर कोर्ट में लड़िए”. मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं करने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज जो फैसला सुनाया है उसका स्पष्ट मतलब यही है कि आगे से इस मामले में कोई भी सुप्रीम कोर्ट न आए और जिसे अपना हक चाहिए वह लेबर कोर्ट जाए. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंजन गोगोई व जस्टिस नवीन सिन्हा की खंडपीठ से मीडियाकर्मियों ने जो उम्मीद लगाई थी, वह दोपहर तीन बजे के बाद मुंह के बल धड़ाम से गिरी. दोनों जजों ने फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि वेजबोर्ड से जुड़े मामले संबंधित लेबर कोर्टों में सुने जाएंगे. वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर समेत वेतन भत्ते संबंधित मामले लेबर कोर्ट या अन्य कोर्ट में ही तय किए जाएं. संबंधित कोर्ट इन पर जल्दी से जल्दी फैसला लें.

वेज बोर्ड में सबसे विवादित बिंदू 20-जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 20-जे को लेकर एक्ट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है, इसलिए इसका फैसला भी संबंधित कोर्ट ही तय करेगी. कोर्ट ने कहा कि अवार्ड को गलत समझने के चलते मीडिया संस्थानों पर अवमानना के मामले नहीं बनते. अवमानना याचिकाओं में दायर ट्रांसफर, टर्मिनेशन व अन्य प्रताडऩाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश नहीं दिए. कोर्ट ने वेजबोर्ड से संबंधित एरियर वेतन भत्ते कर्मचारियों की प्रताडऩा आदि से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी लेबर कोर्ट पर डाली है. अब लेबर कोर्ट ही पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मामले में फैसला देगा. 36 पेजों में दिए फैसले में कोर्ट ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना को नहीं माना. ढाई साल से वेजबोर्ड के लिए देश के हजारों पत्रकार व गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे. पर नतीजा आज पूरी तरह मीडिया मालिकों के पक्ष में रहा.

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एनडीटीवी ने मजीठिया मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भ्रामक खबर चलाई

एनडीटीवी ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर केवल मीठी मीठी खबर ही अपने यहां चलाई ताकि मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी दी जा सके. भड़ास में जब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सारांश प्रकाशित कर इसे एक तरह से मीडियाकर्मियों की हार और मीडिया मालिकों की जीत बताया गया तो देश भर के मीडियाकर्मी कनफ्यूज हो गए. वे चर्चा करने लगे कि किस खबर को सच मानें? एनडीटीवी की या भड़ास की? एनडीटीवी ने जोर शोर से टीवी पर दिखाया कि सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया लागू करने के निर्देश दिए हैं. कोई उनसे पूछे कि भइया मजीठिया लागू करने का निर्देश कोई नया थोड़े है और न ही यह नया है कि ठेके वालों को भी मजीठिया का लाभ दिया जाए.

(आज हुए फैसले पर एक वेबसाइट पर छपी मीठी-मीठी खबर)

(एनडीटीवी पर चली मीठी-मीठी पट्टी.)

कांग्रेस के जमाने वाले केंद्र सरकार की तरफ से पहले ही मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को कानून बनाकर नोटिफाई कर दिया गया था और इसके खिलाफ वर्षोंं चली सुनवाई के बाद मीडिया मालिकों की आपत्ति को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के आदेश दे दिए थे. ये सब पुरानी बातें हैं. ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मजीठिया न देने के खिलाफ अवमानना याचिका का था. फिलहाल जो मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में चल रहा था वह यह था कि मीडिया मालिक मजीठिया वेज बोर्ड को लागू नहीं कर रहे हैं इसलिए उन्हें अवमानना का दोषी माना जाए और उनके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए, संभव हो तो जेल भेजा जाए ताकि आगे से ऐसी हिमाकत न कर सकें.

सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी नहीं माना. दूसरा मामला यह था कि जिन हजारों मीडियाकर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उनके संस्थानों ने नहीं दिया, उनको लाभ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कई बड़ी पहल करे, आदेश करे. जैसे एक संभावना यह थी कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की तरह नेशनल मजीठिया ट्रिब्यूनल बना दिया जाए और यह ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में डे टुडे सुनवाई करके सारे क्लेम को अंजाम तक पहुंचाकर मीडियाकर्मियों को न्याय दिलाए. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने सारी जिम्मेदारी लेबर कोर्टों पर डालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली.

अरे भाई, लेबर कोर्ट तो पहले से ही मीडिया मालिकों से फिक्स थे और हैं. लेबर विभाग और कोर्ट मीडिया मालिकों के इशारे पर काम करते हैं, यह कोई नई बात नहीं है. कायदे से सुप्रीम कोर्ट को दोषी लेबर कमिश्नरों को टांगना चाहिए था जो इतने समय बाद भी मीडियाकर्मियों को उनका क्लेम नहीं दिलवा सके. एनडीटीवी की तरफ से फैसले के नतीजे को बताने की जगह मीडियाकर्मियों को फर्जी खुशी देने के लिए केवल मीठी मीठी बातें ही प्रकाशित प्रसारित की गई.

भड़ास का मानना है कि तथ्यों को सही तरीके से और पूरे सच के साथ रखना चाहिए ताकि हकीकत और हालात की पूरी तरह समीक्षा के बाद संबंधित पक्ष अपनी-अपनी अगली और रायलीस्टिक रणनीति तय कर सकें. जो मीडियाकर्मी सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे थे, उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए हैं. लेबर कोर्टोंं में सबको लड़ना है और अच्छे से लड़ना है, बड़े वकीलों द्वारा बनाई गई रणनीति (इस बारे में शीघ्र खबरें भड़ास पर प्रकाशित होंगी या सभी को मेल कर बता दिया जाए) के तहत लड़ना है और मीडिया मालिकों को हराकर अपना हक लेना है. अगर लेबर कोर्ट और लेबर डिपार्टमेंट दाएं बाएं करेंगे तो उनको टांगा जाएगा, उनकी कुंडली निकाली जाएगी और उन्हें नंगा किया जाएगा ताकि वह किसी भी प्रलोभन या दबाव में मीडिया मालिकों का पक्ष न लेकर पूरे मामले में सच और झूठ का फैसला कर न्याय करें.

मूल खबर…

इस लड़ाई के अंजाम के बारे में भड़ास संपादक यशवंत ने पिछले साल अगस्त में ही ये लिख दिया था…

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मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई मीडियाकर्मी हारे, मीडिया मालिकों के पक्ष में खड़ा हो गया सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के प्रिंट मीडिया के कर्मियों को निराश किया है। मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज दिए फैसले में सारे चोर मीडिया मालिक साफ साफ बच गए। सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मीडिया मालिक को अवमानना का दोषी नहीं माना। वेजबोर्ड के लिए लड़ने वाले पत्रकारों को लेबर कोर्ट जाने और   रिकवरी इशू कराने की सलाह दे डाली।

एक तरह से ऐसा लग रहा जैसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह मीडिया मालिकों के पक्ष में एकतरफा फैसला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद देश भर के मजीठिया क्रांतिकारियों में मायूसी छाई है। अब सबको अपनी अपनी निजी लड़ाई लेबर कोर्ट जाकर लड़नी पड़ेगी। जजों ने लंबे चौड़े फैसले में मीडिया मालिकों को अवमानना का दोषी न मानने के पक्ष में लंबी चौड़ी दलीलें पेश की हैं लेकिन मीडियाकर्मियों के खून के आंसू इन न्यायाधीशों को नहीं दिखे। कहा जा सकता है कि आज मीडियाकर्मी नहीं हारे बल्कि लोकतंत्र हारा है, कानून की हार हुई है, न्याय व्यवस्था की हार हुई है, हक़ के लिए लड़ाई की हार हुई है। फैसले पर मीडियाकर्मियों के वकीलों ने भी निराशा जाहिर की है।

इस लड़ाई के अंजाम के बारे में भड़ास संपादक यशवंत ने पिछले साल अगस्त में ही ये लिख दिया था…

आज के फैसले को लेकर कुछ अन्य खबरें यूं हैं…

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मजीठिया वेज बोर्ड : काशी में कटी पहली 50 लाख की आरसी

बाबा भोलेनाथ की नगरी काशी से एक बड़ी खबर आ रही है। यहाँ नार्दन इंडिया पत्रिका यानि एनआईपी के खिलाफ मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 50 लाख की रिकवरी सार्टफिकेट जारी की गयी है। यहाँ मजीठिया की लड़ाई की अगुवाई करने वाले समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन को पहली बड़ी सफलता मिली है।

यूनियन के महामंत्री अजय मुखर्जी के मुताबिक एनआई पी के पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य, महेश सेठ व फोटोग्राफर दिनेश के जस्टिस  मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाया वेतन अंतरिम के वसूली के लिए लगभग 50 लाख की आरसी जारी हो गयी है। मजीठिया वेतन आयोग के अनुसार बकाये वेतन की वसूली के लिए वाराणसी परिक्षेत्र में यह पहली आरसी है। आरसी जारी होना इस लड़ाई में शामिल साथियों के लिए सफलता का पहला कदम है। साथियों को बधाई ।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया पर आज आएगा कोर्ट का फैसला, जागरणकर्मियों ने बैठक कर एकजुटता दिखाई

आज माननीय सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेतन आयोग को लेकर फैसला आना है। इस वेतन आयोग के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अपना फैसला सुनाया था और अख़बार मालिकानों से स्पष्ट कहा था कि वर्कर की राशि एक साल में 4 किश्तों में दें, लेकिन मालिकान 20 जे का बहाना बनाते रहे और आज तक कर्मचारियों को फूटी कौड़ी भी नहीं दी। तरह तरह से परेशान किया सो अलग। जिन्होंने मजीठिया की मांग की, कंपनियों ने उनका तबादला किया। निलंबन और सेवा समाप्ति का फरमान सुना दिया सो अलग। बावजूद इसके वर्कर हारे नहीं और अपनी लड़ाई लड़ते रहे। इस लड़ाई का कल अंतिम दिन होगा, जब माननीय सुप्रीम कोर्ट का फैसला आएगा।

कल दैनिक जागरण के वर्कर्स की मीटिंग नोएडा के सेक्टर 62 स्थित डी पार्क में हुई, जिसमे सैकड़ों वर्कर शामिल हुए। यह मीटिंग सुप्रीम कोर्ट में आने वाले फैसले को लेकर एकजुटता दिखाने के मकसद से थी। मीटिंग में कोर्ट के आने वाले फैसले को लेकर बहुत सी बातें हुईं। बैठक में श्री विवेक त्यागी, श्री पवन उप्रेती, श्री के के पाठक, श्री महेश कुमार, श्री राजेश निरंजन और रतन भूषण ने आशा, आशंका और अनुभूति के आधार पर इस बारे में बात कही।

पवन जी ने कहा कि एकता हमारी ताकत है और हम कंपनियों से इसी दम पर अपना पाई पाई का हिसाब लेंगे। फैसला निश्चित रूप से हमारे पक्ष में आएगा। विवेक त्यागी का कहना साफ था कि वर्करों के बुरे दिन आज से ख़त्म, मालिकानों के बुरे दिन शुरू।हमारे हक़ को अब कोई नहीं मार सकता। चूँकि कल फैसला सुनाया जायेगा, तो उसमें वकीलों की रहने की जरूरत तो है, पर वे वहाँ कुछ बोल नहीं सकते।अगर उन्हें ऑर्डर को लेकर कुछ कहना होगा, तो उसकी प्रक्रिया अलग है और वह बाद में अपनायी जाएगी।हम किसी भी सूरत में हार नहीं सकते। उन्होंने हमारे मार्गदर्शक आदरणीय श्री के के पुरवार की बात भी दोहरायी कि वर्कर चाहकर भी मजीठिया के केस को हार नहीं सकता।

केके पाठक ने साफ कहा कि रात में कंपनी के कुछ लोगों से बात हुयी है, वे सब परेशान हैं इस बात को लेकर कि अंदर वालों को बरगलाया जा रहा है कि जागरण मजीठिया जुलाई से लागू कर रहा है। लेकिन सच यही है कि यह सब मैनेजमेंट की मीठी गोली है। इस बात से पर्दा कल के बाद उठ जायेगा कि सही में जागरण क्या करने जा रहा है। राजेश निरंजन और महेश कुमार का कहना हुआ कि अगर कंपनी सभी को मजीठिया का लाभ देती है, तो अच्छी बात है लेकिन यह जागरण की सोच के हिसाब से सही नहीं लगता। अगर कंपनी अच्छी होती तो 4 वेतन आयोग को हड़प नहीं कर जाती।

रतन भूषण का कहना हुआ कि कल का दिन अख़बार के कर्मचारियों के लिए सुनहरा दिन होगा। वर्करों की सारी समस्या कल ख़त्म हो जायेगी। मालिकानों की नींद हराम होगी साथ ही उनके प्यादों की भी, क्योंकि मालिकान फ्लॉप प्यादों को अब नहीं रखने वाले। वर्करों के पास हारने के लिए है क्या? हारना तो मालिकों को है और उनकी हार सुनिश्चित है, क्योंकि एक्ट हमारे साथ है और एक्ट हमारा संविधान है, जिससे देश चलता है।

उन्होंने आगे कहा, इस केस के कई रंग दिखे और ये रंग दिखाने वाले थे कुछ वकील जो इस केश में थे। सभी को पता है कि वर्करों के वकीलों में श्री प्रशांत भूषण, श्री कोलिन घोंसाल्विस, श्री परमानंद पांडेय, श्री उमेश शर्मा, श्री आश्विन वैश्य और श्री विनोद पांडेय मुख्य थे, लेकिन इस टीम में जब तक श्री प्रशांत भूषण की एंट्री नहीं हुई थी, केस को कॉलिन साब नाव की तरह मझधार में डगमगाते रहते थे। उनका रवैया कभी चित तो कभी पट वाला होता रहता था, जिसको लेकर हमारे मन में शंकाएं आती थीं। यहाँ हमारी मज़बूरी भी थी। दरअसल कॉलिन सीनियर थे तो कोर्ट उन्हें ही सुनती थी। किसी और को सुनती ही नहीं थी। ऐसी स्थिति में इन उपरोक्त वकीलों की टीम बेकार साबित होती थी। कुछ समय कॉलिन को झेलने के बाद हमने अपने साथियों के साथ निर्णय लिया कि अब प्रशांत भूषण जी को ही लाना होगा, नहीं तो कोर्ट की सुनवाई का यह सिलसिला पता नहीं और कितने साल चलेगा। कॉलिन साहब पता नहीं इसमें और क्या क्या मुद्दे उठवायेंगे। श्री प्रशांत सर का आभार की उनके दो बार कोर्ट में जाने और अपनी बात रखने के बाद हम इस मुकाम पर आ गए। कल आर्डर आएगा।

साथियों के मन में आर्डर को लेकर क्या चल रहा है मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैं आशस्वस्त हूँ कि फैसला हमारे पक्ष में आना है। कल 20 जे का अंत होना है। टाइम बाउन्ड भी हो सकता है और पिछले आर्डर में दिए गए समय से सब में कम होगा, जैसे एक साल को 6 माह, 4 किश्त को 2 या 10 दिन के अंदर सब ख़त्म करने की बात भी हो सकती है।
अंत में आगे बड़ी तरक्की है, जीत हमारी पक्की है…. जय हो

मजीठिया क्रान्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण के फेसबुक वॉल से.

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हिन्दुस्तान का सालाना सकल राजस्व 1294 करोड़, फिर भी छठी कैटेगिरी

हिन्दुस्तान समाचार पत्र लगातार झूठ पर झूठ बोलने पर आमादा है। हिन्दुस्तान ने मजीठिया का लाभ देने से बचने के लिए अपने को गलत व मनमाने तरीके से 6वीं कैटेगिरी में दर्शाया है जबकि ये अखबार नंबर वन कैटेगिरी में आता है। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के संबंध में भारत सरकार से जारी गजट के पृष्ठ संख्या 11 पर खंड 2 के उपखंड (क) में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि किसी भी समाचार पत्र प्रतिष्ठान की विभिन्न इकाइयों/शाखाओं/कंपनियों को समाचार पत्र की एकल इकाई ही माना जाएगा, चाहे उनके नाम अलग-अलग ही क्यों न हों।

इसके बावजूद हिन्दुस्तान अखबार कंपनी का Classification गलत व मनमाने तरीके से अपने आप करने Lower कैटेगिरी में दर्शा रहा है। उदाहरण के तौर पर हिन्दुस्तान की बरेली यूनिट 10 अक्टूबर 2009 को खुली। मजीठिया मामले में कंपनी केवल अपनी इसी यूनिट के राजस्व के आधार पर कैटेगिरी निर्धारित कर रही है। यानि वर्ष  2008-09 का 72 लाख, वर्ष 2009-10 का 2.72 करोड़ सकल राजस्व दर्शा रही है।

जबकि हिन्दुस्तान अखबार की मदर संस्था एचटी मीडिया लिमिटेड के वर्ष 2007-08, वर्ष 2008-09 व वर्ष 2009-10 के सकल राजस्व के औसत राजस्व से हिन्दुस्तान समाचर पत्र की कैटेगिरी तय होगी। एचटी मीडिया लिमिटेड ने FORM 23 ACA जो प्रत्येक वर्ष दाखिल किया है, उसमें वर्ष 2007-08 का 1226 करोड़ 91 लाख 84 हजार, वर्ष 2008-09 का 1355 करोड़ 77 लाख 17 हजार, वर्ष 2009-10 का 1299 करोड़ 11 लाख 60 हजार सकल राजस्व प्राफिट एंड लॉस एकाउंट में दर्शाया है। इस आधार पर कंपनी का सकल राजस्व 1294 करोड़ 60 लाख 20 हजार 333 रुपये होता है। कंपनी नंबर वन कैटेगिरी में आती है।

मजीठिया देने से बचने के लिए हिन्दुस्तान अखबार को अपने को अमर उजाला से एक पायदान नीचे 6वीं कैटेगिरी का बताने में भी कोई शर्मिंदगी नहीं है। अमर उजाला भी अपनी सभी यूनिटें अलग-अलग कंपनी की दर्शाकर 5वीं कैटेगिरी में दर्शाकर कर्मचारियों के हकों पर डाका डालने पर आमादा है।

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भास्कर पर भारी पड़े पत्रकार धर्मेंद्र : कामगार आयुक्त ने भास्कर प्रबंधन को बकाया एरियर देने का निर्देश दिया

मजीठिया के अनुसार बकाया नहीं देने पर हो सकती है कुर्की…

(दैनिक भास्कर मुंबई के जुझारू पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह)

मुंबई के दैनिक भास्कर अखबार से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह सहित दो महिला कर्मचारियों के मामले में पहली बार कामगार आयुक्त महाराष्ट्र के कार्यालय ने लंबी सुनवाई के बाद डीबी कॉर्प को साफ़ निर्देश देते हुए नोटिस भेजा है कि पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह, कर्मचारी लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख का जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार बकाये का दावा सही है और आपको निर्देश दिया जाता है कि आप इन तीनों कर्मचारियों का बकाया राशि का जल्द भुगतान करें अन्यथा आपके खिलाफ वसूली आदेश जिलाधिकारी को निर्गत कर दिया जाएगा।

ज्ञात हो कि ऐसे मामलों में वसूली जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा बिलकुल उसी तरह की जाती है जैसे जमीन के बकाये की वसूली होती है। इसमें कुर्की की कार्रवाई तक भी शामिल है। यह आदेश सहायक कामगार आयुक्त महाराष्ट्र सरकार नीलांबरी भोसले ने 6 जून 2017 को जारी किया है। दैनिक भास्कर मुम्बई ब्यूरो के प्रिंसिपल कर्सपांडेन्ट धर्मेंद्र प्रताप सिंह, रिशेप्सनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया शेख ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट के दिशानिर्देशानुसार पिछले साल जून 2016 में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त कार्यालय में 17 (1) के तहत अपने बकाये राशि की वसूली के लिए क्लेम किया था।

यह सुनवाई पूरे एक साल सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले के समक्ष चली। इस दौरान डी बी कॉर्प की पूरी एचआर टीम और उनके वकील ने तरह तरह के दांव पेंच का इस्तेमाल किया। धर्मेंद्र प्रताप सिंह और लतिका आत्माराम चव्हाण का ट्रांसफर भी काफी दूर कर दिया गया। बाद में धर्मेंद्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर अदालत ने रोक लगा दी मगर फिर भी कंपनी प्रबंधन ने उन्हें काम पर नहीं रखा जिसके बाद धर्मेंद्र ने कंपनी प्रबंधन के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला दायर करा दिया। फिलहाल धर्मेंद्र के जुझारू तेवर और कामगार आयुक्त कार्यालय की नोटिस के बाद डी बी कॉर्प प्रबंधन में हड़कंप का माहौल है। वे इस नोटिस पर हाईकोर्ट से स्टे लेने का प्रयास कर रहे हैं मगर धर्मेंद्र ने वहां भी प्रबंधन का रास्ता रोक कर केविएट लगा दिया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया प्रगति रिपोर्ट पर श्रम शक्ति भवन दिल्ली में आयोजित शीर्ष बैठक से पहले जुझारू मीडियाकर्मियों ने सौंपा ज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से ठीक पहले आयोजित इस बैठक के निकाले जा रहे हैं कई मायने

नई दिल्‍ली, (शुक्रवार, 17 जून, 2017)। श्रम शक्ति भवन नई दिल्‍ली में कल मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को लेकर आहूत बैठक के मद्देनजर कर्मियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में दैनिक जागरण, भास्‍कर, राजस्‍थान पत्रिका व अन्‍य अखबारों के प्रतिधिनियों को भी वार्ता में शामिल होने करने का अनुरोध किया गया। जिससे उत्‍पीड़न के शिकार हजारों अखबार कर्मियों का पक्ष रखा जा सके। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से ठीक पहले आयोजित इस बैठक के कई मायने निकाले जा रहे हैं।

जैसा कि आपको ज्ञात है कि भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने कल सुबह 11 बजे जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड मामले में प्रगति रिपोर्ट जानने के लिए सभी राज्यों के कामगार आयुक्तों के साथ एक बैठक आयोजित की थी। बैठक से ठीक पहले अखबार कर्मियों के एक प्रतिधिनिमंडल ने श्रम शक्ति भवन पहुंच कर श्रम मंत्री और श्रम सचिव के नाम लिखा एक ज्ञापन सौंपा। बताया जा रहा है कि यह ज्ञापन उसी समय बैठक कक्ष में भेज दिया गया। ज्ञापन में अखबारों मालिकानों द्वारा चलाये जा रहे दमन चक्र का जिक्र करते हुए अखबार कर्मियों के प्रतिधिनिमंडल को वार्ता में शामिल करने का अनुरोध किया गया। इससे उत्‍पड़ित कर्मियों के पक्ष को भी सामने लाया जा सके और उनको न्‍याय मिल सकें।

ज्ञापन में मजीठिया वेजबोर्ड को लागू न किए जाने का जिक्र करते हुए पत्रकारों की आर्थिक दुर्दशा का बयान किया गया है। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर कर्मचारियों को बर्खास्‍त करने का जिक्र करते हुए उनकी बहाली की भी मांग की गई है। साथ ही कर्मियों के वकील की तरफ से श्रम आयुक्‍तों की जांच रिपोर्ट की ओर उंगली उठाती सुप्रीम कोर्ट में जमा रिपोर्ट की कापी भी सौंपी गई। ज्ञापन सौंपने वालों में दैनिक भास्‍कर से अलक्षेन्‍द्र सिंह नेगी, हिंदुस्‍तान टाइम्‍स से पुरुषोत्‍तम सिंह, राष्‍ट्रीय सहारा से गीता रावत व अजय नैथानी, दैनिक जागरण से विवेक त्‍यागी, त्रिलोकीनाथ उपाध्‍याय और राजेश निरंजन शामिल थे।

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इसी 19 जून को आएगा मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीमकोर्ट का एतिहासिक फैसला

मीडिया मालिकों की नींद उड़ी, मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर…

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इंतजार की घड़ी खत्म होने को है. देश भर के प्रिंट मीडिया के कर्मियों के लिये न्याय का दिन आ गया है.  सुप्रीमकोर्ट की तरफ से 19 जून को फैसला सुनाया जाएगा. जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आर-पार का दिन होगा 19 जून 2017 की तारीख. अखबार मालिकों ने जो लंबे जुल्म ढाए हैं अपने मीडियाकर्मियों पर, जो भयंकर शोषण किया है, उसका हिसाब आने वाला है. इसी तारीख को तय हो जाएगा कि यह देश कानून, संविधान और नियम से चलता है या फिर कुछ मीडिया मालिकों, सत्तासीन नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों की मिलीभगत से.

पहले तो मीडिया मालिक सुप्रीम कोर्ट इसलिए गए कि मजीठिया वेज बोर्ड से उनका धंधा तबाह हो जाएगा. कोर्ट में लंबी चली सुनवाई के बाद मालिकों के खिलाफ फैसला आया कि तुम लोगों को हर हाल में अपने कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से लाभ देना ही पड़ेगा. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद जब मीडिया मालिकों ने अपनी मोटी चमड़ी दिखाते हुए मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ तरह तरह के बहानों के जरिए नहीं दिया तो सैकड़ों मीडियाकर्मियों ने अपने अपने संस्थानों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में डालीं. उन्हीं याचिकाओं का निबटारा 19 जून को होना है. 

19 जून को अवमानना मामले में सुप्रीमकोर्ट की तरफ से ऐतिहासिक फैसला सुनाया जाएगा. यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायाधीश रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की खंडपीठ सुनायेगी. यह ऐतिहासिक फैसला 19 जून दिन सोमवार को सुप्रीमकोर्ट में दोपहर तीन बजे कोर्ट नंबर तीन में सुनाया जायेगा. देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा ने भी मीडियाकर्मियों के पक्ष में फैसला आने की उम्मीद जताई है.

सुप्रीमकोर्ट के फैसले की तिथि की घोषणा होते ही देश भर के मीडियाकर्मियों में खुशी की लहर है. वहीं अखबार मालिकों के खेमें में बेचैनी बढ़ गयी है. इस मामले की सुनवाई में मीडियाकर्मियों की तरफ से वरिष्ठ एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस, उमेश शर्मा, परमानंद पांडे और दिनेश तिवारी ने मीडियाकर्मियों का जोरदार तरीके से पक्ष रखा. अब सबकी नजरें 19 जून को सुप्रीमकोर्ट के एतिहासिक फैसले पर होगी. इस फैसले की तिथि की जानकारी पाते ही देश भर के पत्रकार नयी दिल्ली के लिये कूच करने की तैयारी कर रहे हैं.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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देश के 745 अखबारों ने नहीं लागू किया मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश

सबसे ज्यादा पंजाब और झारखण्ड में ठुकराया गया सुप्रीम कोर्ट का आदेश, महाराष्ट्र चौथे, उड़ीसा पांचवे स्थान पर फिसड्डी, मध्य प्रदेश के एक भी अख़बार ने नहीं लागू किया वेज बोर्ड

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश को देश भर के 745 अखबार मालिकों ने खुलेआम हवा में उड़ा दिया और दम्भ के साथ सुप्रीमकोर्ट की ओर मुंह करके अट्टाहास कर रहे हैं। ये जता रहे हैं, देख लो सुप्रीमकोर्ट, तुम नहीं, हम सबसे बड़े हैं। माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना करने के मामले में नंबर वन पर है पंजाब।

यहाँ 531 अखबारों में सिर्फ 4 अखबारों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू किया जबकि 93 अखबारों ने इस वेज बोर्ड की सिफारिश को नहीं लागू किया और इस तरह माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना किया। यहाँ 434 ऐसे अखबार हैं जो एक आदमी द्वारा संचालित हैं। ये विस्फोटक जानकारी भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय नयी दिल्ली के सूत्रों ने मजीठिया क्रांतिकारी और पत्रकार तथा आर टी आई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह को उपलब्ध कराई है।

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू न करने के मामले में दूसरे नंबर पर है झारखंड। यहाँ 154 अखबारों में सिर्फ 2 अखबार संस्थानों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया जबकि 91 ऐसे अखबार हैं जिन्होंने इस सिफारिश को नहीं लागू किया। यहाँ 61 ऐसे अखबारों को मजीठिया के दायरे से बाहर रखा गया है जो एक आदमी द्वारा संचालित होता है। माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना के मामले में मध्य प्रदेश तीसरे नम्बर पर है। यहाँ 140 अखबारों का प्रकाशन होता है। यहाँ एक भी अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया। सिर्फ 3 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया वो भी सिर्फ आंशिक रूप से जबकि 72 अखबारों ने इस सिफारिश को नहीं लागू किया। यहाँ 65 अखबार एक आदमी द्वारा संचालित है।

माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवमानना करने के मामले में महाराष्ट्र चौथे नंबर पर है। यहाँ सबसे ज्यादा 2762 अखबार प्रकाशित होते हैं जिनमे 43 अखबार मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू कर दिया। सूत्र बताते हैं कि इन 43 अखबार मालिकों ने भी फर्जीवाड़ा किया है। यहाँ 21 अखबार ऐसे हैं जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश आंशिक रूप से लागू किया है जबकि 65 अखबार मालिकों ने वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं लागू किया। महाराष्ट्र में 2633 अखबार एक आदमी द्वारा संचालित है।

इस सूची में पांचवे नंबर पर आता है उड़ीसा यहाँ 179 अख़बारों का प्रकाशन होता है जिसमे सिर्फ 14 अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया जबकि 62 अखबारों ने इसे पूरी तरह ठुकरा दिया। इस सूची पर नजर डाले तो आंध्र प्रदेश ऐसा एकमात्र स्थान है जहाँ सभी 27 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया है। देश की राजधानी दिल्ली से 81 अखबार निकलते हैं जिसमे 10 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह, 15 ने आंशिक रूप से लागू किया जबकि 29 अखबार मालिकों ने इस वेज बोर्ड की सिफारिश को नहीं माना।

बिहार से 44 अखबार निकलते हैं। यहाँ 12 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया जबकि 32 अख़बारों ने इस वेज बोर्ड को नहीं माना। उत्तर प्रदेश से 70 अखबारों का प्रकाशन होता है। यहाँ 24 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश पूरी तरह लागू कर दिया जबकि 4 ने आंशिक रूप से लागू किया। यहाँ 39 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश नहीं माना। राजस्थान से सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा आया है। यहाँ 893 अखबारों में से 28 अखबारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दिया है। उत्तराखंड में सिर्फ एक अखबार ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया है। गुजरात में 60 अख़बारों ने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू नहीं किया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322412335

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केन्द्र सरकार ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर 16 जून को बैठक बुलाई

देश भर के कामगार आयुक्तों को हाजिर होने का निर्देश… आखिरकार केंद्र सरकार नींद से जग गई लेकिन बहुत देर बाद… देश भर में हजारों प्रिंट मीडियाकर्मी इन दिनों केंद्र सरकार की थू थू करने में लगे हैं, सोशल मीडिया पर… मीडिया मालिकों को कानून और न्याय की धज्जियां उड़ाने की खुली छूट देने वाली केंद्र सरकार ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में 16 जून को बैठक बुलाई है.  बताया जा रहा है कि बैठक में मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर बातचीत की जाएगी. इस बैठक में देश के सभी राज्यों के कामगार आयुक्त हिस्सा लेंगे. बैठक में मजीठिया वेज बोर्ड मामले में प्रगति रिपोर्ट पर चर्चा होगी.

इस बैठक के बारे में जानकारी मिलने पर देशभर के प्रिंट मीडियाकर्मियों में उत्सुकता है. हालांकि ज्यादातर मीडियाकर्मी मोदी सरकार की मीडिया मालिकों से मिलीभगत को देखते हुए बैठक से कुछ सकारात्मक निकलने को लेकर आशंकित हैं. इस बैठक में देश के सभी राज्यों के जो कामगार आयुक्त हिस्सा लेंगे, इनके बारे में जितना कहा जाए कम है. इन्हीं कामगार आयुक्तों ने मीडिया मालिकों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में गलत रिपोर्ट भेजी.

बैठक का आयोजन भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा श्रम शक्ति भवन, रफी मार्ग नयी दिल्ली के मुख्य कमेटी कक्ष में 16 जून को सुबह 11 बजे से किया गया है. इस बैठक में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के क्रियान्यवयन पर केंद्रीय स्तर पर गठित मानिटरिंग कमेटी अपना पक्ष रखेगी। भारत सरकार के कामगार मंत्रालय के सचिव समीर कुमार दास ने इस बावत सभी राज्य के कामगार आयुक्तों, संयुक्त सचिवों को पत्र भेजकर बैठक की जानकारी दी है।

इस पत्र में साफ कहा गया है कि पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिये गठित वेज बोर्ड के क्रियान्यवयन और प्रगति समीक्षा के लिये यह बैठक बुलायी जा रही है। इस बैठक में श्रम एवं रोजगार सचिव और उनके सलाहकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव, मुख्य कामगार आयुक्त और उपमहानिदेशक (डब्लूबी) शामिल होकर वेज बोर्ड के प्रगति की समीक्षा करेंगे। आपको बता दें कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर अवमानना प्रकरण में अखबार मालिकों के खिलाफ माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई पुरी हो चुकी है और इस पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख दिया है। यह फैसला जल्द और कभी भी सुनाया जा सकता है. पत्रकारों की तरफ से इस मामले को एडवोकेट कोलिन गोंसाल्विस, उमेश शर्मा और परमानंद पांडे ने सुप्रीम कोर्ट में लड़ा.

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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अख़बार मालिकानों और मैनेजमेंट का नया खेल शुरू हो गया है…. संदर्भ : मजीठिया वेज बोर्ड

Ratan Bhushan : साथियों, अख़बार मालिकानों और मैनेजमेंट का नया खेल शुरू हो गया है। उन्होंने अब फैसले का समय नजदीक आते देख मजीठिया के केस से जुड़े कुछ अहम् लोगों से संपर्क करना शुरू कर दिया है।उनकी मंशा अब साफ है कि आंदोलनकारियों का हिसाब अगर कर दिया जाय, तो क्या वे टी ओ आई के लोगों की तरह अपना केस वापस ले लेंगे? अब हम बात यह है कि ऐसा क्यों किया जा रहा है? यह बात मैनेजमेंट के लोगों द्वारा की गई बातचीत से स्पष्ट होती है कि जैसे जैसे माननीय सुप्रीम कोर्ट से आर्डर के आने की तारीख नजदीक आ रही है, जिसकी जुलाई में किसी भी तारीख को आने की संभावना है, वैसे वैसे मालिकानों के हाथ पांव फूल रहे हैं।

बात करें दैनिक जागरण की, तो इनके कानपूर में बैठने वाले अहम लोगों ने अब हार मन ली है। जो लोग अभी तक जागरण के संपादक और सी इ ओ संजय गुप्ता को किनारे लगाए हुए थे और उसकी नहीं सुन रहे थे, अब उससे यह कह दिया है कि तुम इस समस्या का हल जैसे चाहो, वैसे निकालो। हम तुम्हारे साथ हैं। सूत्र यह भी बताते हैं कि मालिकानों द्वारा लिए गए इस निर्णय के बाद से मैनेजमेंट के लोगों ने कर्मचारियों में से कुछ लोगों से बात की और राय भी लिया। दूसरी ओर अख़बार की हर यूनिट के मेन लोगों को यह खबर फ़ैलाने के लिए कहा कि जो लोग अंदर हैं और काम कर रहे हैं, उन्हें चिंता करने की कोई बात नहीं। वे आर्डर के आने का इंतज़ार करें, उन्हें पैसा जरूर मिलेगा। वे लोग इसी मुगालते में जी रहे हैं और मालिकानों के चमचों की बात माने बैठे हैं, लेकिन होना कुछ और है।

दरअसल उनके ऐसा करने की वजह साफ है कि उनकी यूनिट में बवाल न हो और उनका अख़बार छपता रहे और मैनेजर, सीनियर्स की नौकरी बची रहे। वर्कर इसी मीठी गोली में मस्त रहें। दूसरी ओर इनका खेल चल रहा है कि आर्डर आने से पहले ही ये मालिकान वर्करों को उनका पैसा देकर राजीनामा ले लें और कोर्ट में उसे टी ओ आई की तरह पेश कर दें। ऐसा करने से वे सभी वर्कर को पैसे देने से बच जाएंगे।

याद रहे कि कोर्ट रूम में माननीय जज श्री रंजन गोगोई ने कई बार यह कहा है कि जिन्होंने केस नहीं किया है वे केस करें। इस बात से भी समझा जा सकता है कि आगे क्या हो सकता है। यहाँ उल्लेखनीय बात यह भी है कि जो दैनिक जागरण फैसला आने के बाद 8000 लोगों के बकाये का भुगतान करेगा, वह आर्डर आने से पहले मात्र 400 वर्करों से सेटलमेंट करके अपनी ढेर सारी राशि नहीं बचाना चाहेगा। अगर कंपनी इन 400 लोगों को मनचाही राशि भी देती है, तो भी उसे बहुत फायदा होगा। फिर जब केस ही ख़त्म हो जायेगा, तो अंदर बैठे कर्मचारी की देनदारी भी ख़त्म, क्योंकि उन्होंने केस ही नहीं किया है।अगर वे केस भी करेंगे, तो अब सुप्रीम कोर्ट में नहीं कर सकते, डी एल सी से शुरुआत करनी होगी और जो कर्मचारी अपनी बात अपने सीनियर के आगे नहीं रख सकता, वह मालिक से केस लड़ेगा, यह बात सोचनीय है।

सूत्र और एक जानकार का यह भी कहना है कि मालिक ऐसा करके ही अपनी जान बचा सकता है, वर्ना उसे कोई नहीं बचा सकता।अगर वह ऐसा नहीं करेगा, तो वर्कर को सारे पैसे तो देगा ही, तमाम वर्कर की ज़िन्दगी भर की देनदारी में फंसेगा सो अलग। तो कौन मालिक ऐसा काम करेगा? समझा जा सकता है।अंदर बैठे लोग मुगालते में जीते हैं, तो उन्हें ऐसा करने का हक़ है, वे शौक से करें।

सूत्र यह भी कहता है कि अगर मालिकान इस काम को जल्द से जल्द करें, उनके लिए यह उतना ही अच्छा होगा।दूसरी ओर लड़ाकू कर्मचारियों की बात है, तो उनके दोनों हाथ में लड्डू है। अगर मालिक सबको देता है, तो और अच्छा, अगर नहीं देता है तो यह उनकी किस्मत है, जो अंदर बैठे जगे में सपना देख रहे हैं। लड़ाकू साथियों को आज नहीं तो कल उनकी राशि मिलनी तय है वह भी सूद के साथ।

इन सब बातों के मद्देनजर ही मालिकानों ने अब वर्करों से बातचीत में रूचि लेनी शुरू की है और जल्द ही कुछ ऐसा हो जाये, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। जागरण की बात करें तो मालिकानों के पास कंपनी का कोई दमदार बिचौलिया नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि वह अब बाहर से किसी व्यक्ति को लाना चाहता है और यही वजह है कि कानपूर एंड कंपनी ने अपना पाला अब संजय गुप्ता की गर्दन पर डाल दिया है कि अब तुम जो चाहो, करो, हम तुम्हारे साथ हैं।अब इस संजय की दिव्यदृष्टि कहाँ तक जाती है, यह देखने वाली बात होगी। याद दिला दें कि इसी संजय ने बातचीत में कहा था, नौकरी मैं देता हूँ, सुप्रीम कोर्ट नहीं….., सुप्रीम कोर्ट मेरा कुछ नहीं कर सकता, मैं उसकी बात नहीं मानूँगा…, मुझसे वेज बोर्ड कोई नहीं दिलवा सकता…..। उनकी बातें सुनने के बाद मैंने कहा था, फिर आपमें और आतंकवादी में फर्क क्या? संविधान को वे भी नहीं मानते और आप भी नहीं….। फिर मैं निशाने पर आ गया और आज मजे में हूँ। चैन उनकी छिन गई। वे बेकरार हैं….। दोस्तो, इसे ही वक़्त कहते हैं। अंत में…., चैन से सोना है तो जाग जाओ……

दैनिक जागरण के डिप्टी न्यूज एडिटर और मजीठिया क्रांतिकारी रतन भूषण की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार इतनी डरपोक है कि पत्रकारों के न्याय के लिए आगे नहीं आई

जैसे हैं कपिल सिब्बल और सलमान खुर्शीद, वैसे ही निकले नरेंद्र मोदी…. पत्रकार का दर्द कौन सुने…. उसे तो अंदर बाहर हर ओर से गाली और शोषण का शिकार होना है… पत्रकार बिकाऊ है या कपिल सिब्बल व सलमान ख़ुर्शीद… यह सोचने की बात है… भारत सरकार तो ऐसी है जो ना अपना भला बुरा जानती है, ना समाज का और ना ही देश का। मैं बात करना चाहूंगा पत्रकारिता की। पत्रकार वही है जो कम वेतन में काम करने को तैयार हो। बाकि ना उसकी शैक्षणिक योग्यता देखी जाती है ना अक्षर ज्ञान। नतीजन कोई भी पत्रकार बन सकता है।

ये मीडिया हाउसों की देन है कि वे कम वेतन देने के साथ ना परिचय पत्र देते, ना सैलरी स्लिप, ना अवकाश कार्ड, ना पीएफ। फिर भी सरकार, कोर्ट, पुलिस, श्रम विभाग प्रेस मालिकों के तलवे चाटने को मजबूर हैं। फिर यही पत्रकार समाज को उपदेश देते हैं तो समाज और देश कितना जागरूक होगा। पत्रकार के वेतन और नौकरी का कोई ठिकाना नहीं होता। संपादक और प्रेस मालिक के मुंह में रखा रहता है तो आप जाइए।

राजनैतिक दल क्यों कोसते हैं?… ऐसे में समाज और सरकार एक पत्रकार से कैसे उम्मीद कर सकता है कि वह हमारी लड़ाई लड़ेगा। एक सच्ची बात समाज में रखेगा। वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल, सलमान ख़ुर्शीद जब मजीठिया वेज बना तो केंद्र में मंत्री थे। जब पत्रकारों ने वेज बोर्ड की मांग की तो पत्रकारों को मजीठिया वेज न दिया जाय इसके लिए उन्होंने प्रेस मालिकों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की। अब वही नेता और उसी पार्टी के लोग प्रेस पर ये आरोप लगाते हैं कि मीडिया बिकाऊ है, सिर्फ़ मोदी का गुणगान कर रहा है, हम कुछ कहते हैं तो उसे नहीं छापा जाता।

सरकार और कोर्ट…  न्याय व्यवस्था के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल तक प्रेस मालिकों को ख़ूब लाभ पहुंचाया। अब भी फैसला सुरक्षित है लेकिन मुझे नहीं लगता की प्रेस मालिक सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला मानेंगे। इधर मोदी सरकार इतनी डरपोक है कि पत्रकारों के न्याय के लिए आगे नहीं आई। पत्रकार गिड़गिड़ाते रहे न्याय की भीख मांगते रहे लेकिन सरकार ने गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं किया। अब सरकार चाहती है कि भारत और मोदी की महानता पत्रकार पूरे विश्व में गाएं। ध्यान से देखिए… सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल और नरेंद्र मोदी में क्या फर्क है… कुछ नहीं.. ये तीनों मीडिया मालिकों के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं…

मतलब संविधान के मानक चौथे स्तंभ की माँ बहन करने में किसी ने कोई कमी नहीं छोड़ी। फिर भी उन्हीं के कंधों का सहारा चाहिए। पता नहीं हम (सरकार और कोर्ट) पत्रकारों से गद्दारी कर रहा है या ख़ुद और समाज से।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार
maheshwari_mishra@yahoo.com

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मजीठिया वेज बोर्ड : हे पत्रकार साथियों! बर्खास्‍तगी, तबादले की धमकी से ना डरें और ना ही दें जबरन इस्‍तीफा

साथियों, हम सभी जहां बेसब्री से सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं और वहीं समाचार पत्र प्रबंधन लगातार कर्मचारियों के उत्‍पीड़न पर लगा हुआ हैं और दूसरों के हक की आवाज उठाने वाली हमारी कौम आज अपने हक के‍ लिए ढंग से आवाज तक भी नहीं उठा पा रही है। इसके पीछे हमारा खुद का डर, अपने कानूनी हकों के प्रति अज्ञानता, निजी स्‍वार्थ, हमारे साथ तो नहीं हो रहा… ऐसी सोच के साथ-साथ कर्मचारियों के लिए ईमानदारी से संघर्ष करने वाली यूनियनों की संख्‍या में लगातार होती कमी भी है। भास्‍कर व दैनिक जागरण जैसे बड़े अखबारों में यूनियनों का ना होना और जिनमें हैं भी उनका दायरा लगातार सिमटता जाना भी। इसी का फायदा ये समाचार मालिक उठा रहे हैं। इसी का नजीता है कि वे जबरन इस्‍तीफा मांगते हैं और हम आसानी से उन्‍हें अपना इस्‍तीफा सौंप देते हैं। शायद इतनी आसानी से हिरण भी शेर का शिकार नहीं बनता, जितनी आसानी से हम बन जाते हैं।

अभी तीन चार महीने पहले ही हिंदुस्‍तान नोएडा ने अपने मशीन के 15-16 कर्मचारियों से बर्खास्‍तगी और ग्रेच्‍युटी आदि रोकने की धमकी देकर जबरन इस्‍तीफा ले लिया और कई अन्‍य पर इस्‍तीफा देने का दबाव बनाया हुआ है। जबरन इस्‍तीफा देने वाले वे साथी अब सड़क पर हैं या कोई छोटा-मोटा काम कर गुजर बसर कर रहे हैं। वहीं, भास्‍कर ने भी जबरन इस्‍तीफा अभियान चलाया हुआ है, यहां बस इतना ही अंतर है कि जिन साथियों के इस्‍तीफे लिए गए हैं उनमें से ज्‍यादातर अभी संस्‍थान में ही कार्यरत हैं। इनके इस्‍तीफों का कहां और कैसे इस्‍तेमाल होगा किसी को नहीं पता। ऐसा ही कुछ अन्‍य संस्‍थानों में भी चल रहा है या चल चुका है। आज समाज जैसे कुछ समाचार-पत्रों में तो स्‍थायी कर्मियों को तीन साल के अनुबंध पत्र दे दिए गए।

क्‍या खो रहे हैं आप

प्रबंधन एक सोची समझी नीति के तहत काम कर रहा है। उसे पता है 7 फरवरी 2014 में मजीठिया वेजबोर्ड और वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 को खत्‍म करने को लेकर सिविल पिटिशन 246/2011 के साथ सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी अन्‍य सभी याचिकाएं खारिज हो गई थी। उसके बाद उनकी रिव्‍यू पिटिशन भी खारिज हो गई। ऐसे में उनको अपने संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड आज नहीं तो कल लागू करना ही पड़ेगा और उन्‍हें अपने कर्मियों को मजीठिया के अनुसार वेतन और एरियर का भुगतान करना ही पड़ेगा। ऐसे में व़ह मजीठिया वेजबोर्ड के तहत आने वाले कर्मियों की संख्‍या में कमी करके भविष्‍य में अपने ऊपर आने वाले आर्थिक बोझ को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

यहां आने वाले बोझ शब्‍द का इस्‍तेमाल इसलिए किया गया है, क्‍योंकि जिन कर्मियों का वह इस्‍तीफा नहीं ले पाएगा उन्‍हें उसे मजीठिया के अनुसार एरियर तो देना ही पड़ेगा वहीं, फि‍टमैन और प्रमोशन के अनुसार व़ेजबोर्ड के सभी लाभ देने पड़ेंगे तब तक जब तक की वह नौकरी पर रहता है। यानि मजीठिया के अनुसार जो वेतन बनता है वो देना पड़ेगा। आपको समझाने के लिए नीचे एक उदाहरण दे रहे हैं-

मजीठिया के अनुसार नवंबर 2011 में ग्रेड ए के समाचार पत्र में एक्‍स श्रेणी के शहर में भर्ती सीनियर सब एडिटर रमेश का 17,000 रुपए बेसिक के हिसाब से 37,761 रुपए वेतन बनता है। जो कि बढ़ते-बढ़ते मई 2017 में 63,163 रुपये हो जाता है। इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है।

ऐसे में रमेश का नवंबर 2011 से मई 2017 तक का औसत वेतन 25 हजार रुपये प्रतिमाह मान लिया जाए तो ऱमेश को कम से कम 15 लाख रुपये का एरियर संस्‍थान को देना पड़ेगा (इसमें लगभग डेढ़ लाख रुपये के करीब रात्रि भत्‍ता और पीएफ, एलटीए आदि का अंतर शामिल नहीं है)। इसके अलावा इसका बढ़ा हुआ वेतन अर्थात कम से कम 63,163 रुपये हर माह देने पड़ेंगे और इसके अलावा ना चाहते हुए भी मजीठिया के अनुसार हर साल वेतन में बढ़ोतरी और हर पांच साल में एक विशेष एक्रीमेंट और हर दस साल में एक प्रमोशन देना पड़ेगा। प्रबंधन जानता है कि वेजबोर्ड के अंतर्गत आने वाले रमेश जैसे कर्मियों का वेतन कुछ समय बाद लाख रुपये से ऊपर पहुंच जाएगा। ऐसे में उनकी ग्रेच्‍युटी और पीएफ का एमाउंट भी बढ़ता जाएगा।

इसलिए वे जबरन इस्‍तीफा अभियान चलाए हुए हैं कि एरियर से नहीं बच सकते तो कम से कम बढ़ते हुए वेतनमान पर तो कैंची चला दी जाए। कैसे इसे भी उदाहरण देकर समझाते हैं। संस्‍थान ने रमेश के साथ ही उसी तिथि और पद पर भर्ती ओम से मई 2017 में जबरन इस्‍तीफा ले लिया। अब जब संस्‍थान को मजीठिया वेजबोर्ड लागू करना पड़ेगा तो रमेश अपने 15 लाख रुपये के एरियर के साथ कम से कम 21510 के बेसिक पर 63,163 रुपये वेतनमान के रुप में प्राप्‍त करेगा (रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं)। वहीं, ओम के हाथ लगेंगे एरियर के केवल 15 लाख रुपये। यदि कंपनी ओम को उसी पद पर नई भर्ती दिखाकर नौकरी पर रखती भी है तो, उसका 17,000 के बेसिक के अनुसार वेतनमान 50,129 रुपये होगा (इसमें रात्रि भत्‍ता शामिल नहीं है)। यानि कि हर महीने कम से कम 13 हजार रुपये और पीएफ, ग्रेच्‍युटी, एलटीए, प्रमोशन आदि में नुकसान, जोकि समय के साथ-साथ तेजी से बढ़ता ही जाएगा। और यदि हिंदुस्‍तान के साथियों की तरह नौकरी पर नहीं रखती हैं तो अब आप खुद समझ सकते हैं आपका कितना बड़ा नुकसान हो रहा है।

ना दें जबरन इस्‍तीफा

उपरोक्‍त उदाहरणों से आपको वस्‍तुस्थिति समझ में आ गई होगी। हिंदुस्‍तान के कुछ साथियों ने ग्रेच्‍युटी की मामूली सी राशि रुकने के डर से और कुछ ने अन्‍य कारणों से इस्‍तीफा दे दिया। संस्‍थान ने इस्‍तीफा लेने के बाद उन्‍हें तुरंत बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। ऐसे में इस्‍तीफा देकर क्‍या आप भी उनकी श्रेणी में आना चाहते हैं। इसलिए यदि आपसे संस्‍थान जबरन ग्रेच्‍युटी रोकने, बर्खास्‍तगी, तबादले आदि की धमकी देकर इस्‍तीफा मांगता है तो कतई न दे और कानूनी उपायों को अपनाने की तरफ कदम बढ़ाए।

क्‍या करें

ऐसा नहीं है सुप्रीम कोर्ट इससे अनजान है, सुनवाई के दौरान यह मुद्दा हमारे वकीलों द्वारा कई बार उठाया जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2016 की सुनवाई के बाद दिए ऑर्डर में उल्‍लेख किया है… It has been brought to our notice by the learned counsels for some of the contesting parties that in case of some establishments, details of which need not be specifically mentioned herein, employees have been retrenched/terminated and in respect of certain other establishments the employees have been forced/compelled to sign undertakings which were later on used as to make out declarations that the employees do not desire to be covered by the Wage Board reommendations.

जबरन इस्‍तीफे के एक मामले का उल्‍लेख मध्‍यप्रदेश श्रमायुक्‍त द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर रिपोर्ट में भी है। जिसमें पेज नंबर 20 पर भास्‍कर के साथी sanjay kumar chuhan के Forced Resignation का मामला इंदौर उप श्रमायुक्‍त द्वारा लेबर कोर्ट को रेफर करने का जिक्र है।

इसके अलावा कुछ अन्‍य साथियों ने भी अलग-अलग राज्‍यों में जबरन इस्‍तीफा देने के बाद उप श्रमायुक्‍त कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज करवाने के साथ रिकवरी भी लगा रखी है, जिनपर सुनवाई जारी है। इसलिए हमारा उन सभी साथियों से अनुरोध है जिनका जबरन इस्‍तीफा प्रबंधन ने लिया है, वे पुलिस में एफआईआर दर्ज कराएं। हम जानते हैं एफआईआर दर्ज कराने में आपको कई दिक्‍कतों का सामना करना पड़ेगा, क्‍योंकि प्रभावशाली समाचार पत्र प्रबंधन के कारण पुलिस आपकी एफआईआर दर्ज करने से इनकार कर सकती है। ऐसे में यदि आपके राज्‍य में ऑनलाइन पुलिस शिकायत दर्ज कराने की सुविधा है तो वहां ऑनलाइन एफआईआर दर्ज करवाएं। नहीं तो केस लड़ रहे अपने साथियों से संपर्क कर उनकी मदद मांगे। इसके बाद आप रिकवरी बनवाकर और किसी कानून के जानकार से मैटर लिखवाकर डीएलसी में 17(1) और जबरन इस्‍तीफे के खिलाफ अलग-अलग केस लगवाएं। डीएलसी में दायर 17(1) की रिकवरी और इस्‍तीफे के खिलाफ लगवाए गए केस की प्रतिलिपि पर मोहर लगवाना व साइन करवाना न भूलें।

हम आपकी सुविधा के लिए मजीठिया केस से जुड़े कुछ वकीलों का संपर्क नंबर दे रहे हैं, आप इनसे बेहिचक बात कर सकते हैं।

वरिठ वकील परमानंद पांडेय जी 09868553507

वरिठ वकील उमेश शर्मा जी 9868235388

दिनेश तिवारी जी (प्रभात खबर प्रबंधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से स्‍थानांतरण पर स्‍टे लेने वाले वकील) 9210004761

इनके अलावा आप इन साथियों से भी संपर्क कर सकते हैं- Vinod Kohli ji  – 09815551892

रविंद्र अग्रवाल जी
9816103265
ravi76agg@gmail.com

राकेश वर्मा जी
9829266063

शशिकांत सिंह जी
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

महेश कुमार जी
9873029029
kmahesh0006@gmail.com

प्रदीप गौड़ जी
9928092537

पुरुषोत्‍तम जी
9810718633

महेश साकुरे जी
8275284645

शारदा त्रिपाठी जी
9452108610

मयंक जैन जी
9300124476

इस राइटअप को मजीठिया आंदोलनकारियों ने मिलकर तैयार किया है ताकि ट्रांसफर या इस्तीफे का तनाव-दबाव झेल रहे मीडियाकर्मियों को सही तरीके से गाइड किया जा सके.

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भास्कर ब्यूरो चीफ अनिल राही बाहर हुए, सुनील कुकरेती और उमेश कुमार उपाध्याय का ट्रांसफर

देश के सबसे चर्चित समाचार पत्रों में से एक माने जाने वाले दैनिक भास्कर अखबार में कर्मचारियों का खूब शोषण होता है। अगर साफ़-साफ़ कहें तो दैनिक भास्कर में किसी की भी नौकरी सुरक्षित नहीं है, भले ही वह कितना भी बड़ा तुर्रम खां क्यों ना हो, तो गलत न होगा! दैनिक भास्कर के मुम्बई के एंटरटेनमेंट ब्यूरो से खबर आ रही है कि यहाँ करीब 22 साल तक इस अखबार में नौकरी करने वाले ब्यूरो चीफ अनिल राही को कंपनी ने एक ही झटके में बिना ठोस नोटिस दिए बाहर का रास्ता दिखा दिया।

ज़रा सोचिए, इस अखबार के लिए अपने जीवन का अमूल्य समय (22 साल) देने वाले अनिल राही को उम्र (करीब 57 वर्ष) के इस पड़ाव में डी बी कॉर्प ने बाहर का रास्ता दिखा दिया तो दूसरों का ये कंपनी क्या कर सकती है। आपको बता दें कि अनिल राही ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस को चेंज कर एक फोटो अपनी कुर्सी की डाली है, जिस पर वे 22 साल तक बैठते रहे। साथ ही उन्होंने अपनी केबिन तथा ऑफिस के अंदर गलियारे की तस्वीरें डालकर साफ़ लिखा है- ‘मेरा आश्रय, मेरा स्वर्ग और मेरा नर्क भी’। अनिल राही को बाहर का रास्ता दिखाने पर मुम्बई के फिल्म पत्रकार भी सकते में हैं और वे भास्कर प्रबंधन की जम कर निंदा कर रहे हैं !

मुम्बई के एंटरटेनमेंट ब्यूरो से ही खबर आ रही है कि यहाँ सीनियर रिपोर्टर सुनील कुकरेती का कंपनी ने ट्रांसफर कर दिया है। हालांकि सुनील को मुंबई के ही दूसरे कार्यालय (बांद्रा-कुर्ला कॅाम्प्लेक्स) में ट्रांसफर किया गया है, जहां अभी तक मार्केटिंग और फाइनेंस डिपार्टमेंट का ही स्टाफ बैठता आया है, संपादकीय विभाग का कोई भी नहीं। वैसे एंटरटेनमेंट ब्यूरो के ही रिपोर्टर-कम-सब एडिटर उमेश कुमार उपाध्याय का भी कंपनी ने ट्रांसफर कर दिया है।

उमेश को मुम्बई से रांची भेजा गया है। खबर तो यहाँ तक है कि उमेश जब एच आर मैनेजर अक्षता करंगुटकर से अपने ट्रांसफर की वजह पूछने गए थे, तब उन्हें फ़िल्मी स्टाइल में जवाब दे दिया गया कि मेरी मर्जी। यहां बताना जरूरी है कि इन तीनों ही महानुभावों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपने बकाये वेतन के लिए क्लेम नहीं लगाया था। अब इन पर कंपनी ने गाज गिरा दी है।

यही नहीं, खबर तो ये भी है कि दैनिक भास्कर की पोलिटिकल यूनिट में भी छंटनी और ट्रांसफर की गाज जल्द गिरने वाली है। मराठी अखबार दिव्य मराठी से प्रमोद चुंचुवार सरीखे सीनियर और सुलझे पत्रकार को जिस तरह जलील करके बाहर का रास्ता दिखाया गया, उससे स्पष्ट है कि यहां किसी को भी अपनी अगले दिन की नौकरी का भरोसा नहीं है। बेशक, आप खुद को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस का लाडला बताएं या समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का चहेता, आप अपनी तस्वीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ हाथ मिलाते दिखाएं, लेकिन आप बचने वाले नहीं हैं।

गौरतलब है कि देश भर में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाये का क्लेम सबसे ज्यादा दैनिक भास्कर और डी बी कॉर्प के ही खिलाफ लगाए गए हैं। मुंबई में प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, रिसेप्शनिस्ट लतिका चव्हाण और आलिया इम्तियाज़ शेख के अलावा आईटी विभाग के वरिष्ठ अॅस्बर्ट गोंजाल्विस ने भी डी बी कॉर्प प्रबंधन के खिलाफ जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में विभिन्न अदालतों सहित सुप्रीम कोर्ट में भी शिकायत कर रखी है।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट

9322411335

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दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक्शन लेने / मुकदमा लिखने में यूपी के आईएएस-आईपीएस अफसरों के हाथ-पैर कांपते हैं!

कार्रवाई तो दूर, एसएसपी ऑफिस में गायब हो जाता है डीएम का पत्र!

नोएडा : डीएम ऑफिस से एसएसपी कैंप कार्यालय की दूरी कुल 10 कदम होगी। लेकिन इस दूरी तक डीएम की चिट्ठी पहुंचना तो दूर, दो बार गायब हो चुकी है। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इसी प्रकार गौतमबुद्धनगर के न जाने कितने फरियादी आए दिन पुलिस से निराश हो रहे होंगे। इस उदाहरण से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार पुलिस अधिकारी मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को फेल करने में लगे हैं।

दैनिक जागरण के मुख्‍य उपसंपादक श्रीकांत सिंह ने 24 फरवरी 2015 को नोएडा के सेक्‍टर-26 स्थित वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के कैंप कार्यालय में दैनिक जागरण प्रबंधन के खिलाफ एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक डॉक्‍टर प्रीतेंद्र सिंह ने मामले की जांच का आदेश दिया था और उस समय के दैनिक जागरण के एचआर मैनेजर श्री रमेश कुमावत को बुलाकर पूछताछ की गई थी। उसके बाद मामला ठंडे बस्‍ते में चला गया।

तीन एसएसपी आए और गए, लेकिन मामला ठंडे बस्‍ते में ही पड़ा रहा। जबकि तत्कालीन दूसरे अधिकारी कहते रहे- ”दैनिक जागरण के खिलाफ कार्रवाई करने की मेरी औकात नहीं है। आप अदालत जाएं, तभी मामला दर्ज हो सकता है।” अंत में थक हारकर उन्‍होंने तत्कालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश भी दिया। लेकिन एसएसपी आफिस में बताया गया कि वहां ऐसा कोई पत्र मिला ही नहीं है।

पिछले 21 अप्रैल को उन्‍होंने दोबारा जिलाधिकारी एनपी सिंह से मुलाकात की और उनसे फिर पत्र (डिस्‍पैच नंबर-3004/एचडी 4117-21-04-17) लिखवाया। इस बार उन्‍होंने पत्र की फोटो कॉपी भी ले ली। जैसी कि आशंका थी, जिलाधिकारी का पत्र न मिलने की बात दोबारा बता दी गई। उस पत्र को यहां अपलोड भी किया जा रहा है।

इससे पहले भी उन्‍होंने तत्कालीन मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से मेल के जरिये संपर्क किया था, जिन्‍होंने कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन उस समय भी अधिकारियों ने आदेश को ठंडे बस्‍ते में डाल दिया था। इसके अलावा आरटीआई के जरिये भी उन्‍होंने एफआईआर की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी, जिसका गोलमोल जवाब दे दिया गया था।

अब हालत यह है कि गूगल करेंगे तो वहां आपको गौतमबुद्धनबर के एसएसपी का कोई फोन नंबर नहीं मिलेगा। इस हाल में आखिर अपराध पर नियंत्रण कैसे और क्‍यों हो पाएगा। पुलिस अधिकारी इसी तरह से अन्‍यायी दैनिक जागरण प्रबंधन के अपराधों को इग्‍नोर करेंगे तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश कैसे मानेगा और अपने कर्मचारियों को प्रताडि़त करने से कैसे बाज आएगा। इस मुद्दे पर जनमत तैयार न किया गया और उसे मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के समक्ष न रखा गया तो आम जनता इसी प्रकार उत्‍पीड़न और अन्‍याय झेलने को बाध्‍य होगी।

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मजीठिया वेज अवॉर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अचंभित करने वाला होगा

एक बार फिर सन्‍नाटे का आलम है। हर कंठ ने चुप्‍पी-खामोशी का उपकरण धारण कर रखा है। यह म्‍यूट यंत्र उन आवाजों पर भी हावी है जो कभी सर्वोच्‍च अदालत, वकीलों, केस करने के अगुआ लोगों और उनके समर्थकों-संग चलने वालों के हर रुख, हर कदम, हर पहल, हर चर्चा की केवल और केवल आलोचना करते रहते थे। उन्‍हें केवल खराबी-बुराई ही नजर आती थी-आती रही है। मीन-मेख निकालना जिनका परम कर्त्‍तव्‍य रहा है। लेकिन अंदरखाते इन केसों की सकारात्‍मक उपलब्धियों पर दावा जताने, अपना हक जताने, उसे पाने की चाहत रखने की मरमर भी उनके कंठों से अविरल-अनवरत फूटती रही है।

उन आवाजों का विराम तो समझ आता है जिन्‍होंने मजीठिया वेज अवॉर्ड पाने के लिए न जाने कितनी मुसीबतें सही-झेली हैं। न जाने कितने धक्‍के खाए हैं, कितने अपमान सहे हैं, कितने खर्चे किए हैं। लेकिन मौकापरस्‍त निंदकों की जुबान पर ताला लगना (तात्‍कालिक तौर पर) अनेकानेक अनुमानों के बावजूद अनुमानेतर है। बहरहाल, जिन्‍होंने मजीठिया पाने के लिए अपने भरसक कठोर प्रयास किए हैं और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के केस किए हैं, उनमें पसरी शांति सहज समझ आने वाली है। क्‍योंकि उनका संघर्ष एक मुकाम पर पहुंच गया है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सुनवाई पूरी कर ली है और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। संघर्ष करने वाले मीडिया साथी इत्‍मीनान की सांस ले रहे हैं। वे शांतिपूर्वक इस चिंतन में मगन हैं कि उन्‍हें वेज बोर्ड की संस्‍तुतियों के हिसाब से कितना मिलेगा। उनके अखबार मालिकान कितना और कैसे देते हैं, देते भी हैं कि नहीं, इस उधेड़-बुन में लगे हुए हैं।

वैसे निंदकों की जमात भी नए वेज स्‍ट्रक्‍चर के हिसाब से बढ़ी सेलरी पाने-लपक लेने की कम जुगत नहीं लगा रही है। वह बगैर कुछ लगाए, बगैर मेहनत मशक्‍कत किए, धक्‍के खाए, अपमान-जिल्‍लत झेले ज्‍यादा सेलरी-सुविधाएं बटोर लेने के शॉर्टकट निकाल लेने में तल्‍लीन है। इसके अलावा प्रिंट मीडिया मालिकों-मैनेजमेंट की जमात भी माथे पर बल डालकर उन रास्‍तों को निकालने-बनाने में मशगूल है जिससे उन्‍हें वेज बोर्ड की संस्‍तुतियों को उनके प्रतिष्‍ठानों की कुल सालाना आमदनी के अनुसार कर्मचारियों को सेलरी-बकाया-सुविधाएं न देनी पड़े। हालांकि मालिकों की कर्मचारियों को विभिन्‍न तरीकों से प्रताडि़त करने, नौकरी से निकालने, तबादला करने, निलंबित करने, मिल रही मौजूदा सेलरी भी न देने, गाली-गलौच, मारपीट, अपमानित इत्‍यादि करने की अमानवीय-शैतानी हरकतें पूर्ववत जारी हैं। उनको अभी भी लगता है कि सुप्रीम कोर्ट उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे सर्वोच्‍च न्‍यायपीठ को वैसे ही अंगूठा दिखाते रहेंगे जैसे वर्षों से दिखाते आ रहे हैं। इसी ढींठपने, मनबढ़ी, बेअंदाजी, बदमाशी, या कहें गुंडागर्दी का नतीजा है कि वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुरक्षित हो जाने के बावजूद कर्मचारियों का उत्‍पीड़न जारी रखे हुए हैं।

हां, एक चीज जरूर है कि इन शैतानी शक्‍लों के नीचे छुपी भीरुता-डर-खौफ की परतें-लकीरें भी छिप नहीं पा रही हैं। या कि मीडिया कारोबारी दानव इन्‍हें छिपा नहीं पा रहे हैं। उदाहरण है दैनिक जागरण मैनेजमेंट, हिंदुस्‍तान टाइम्‍स मैनेजमेंट और अन्‍य अखबारी मैनेजमेंट का विभिन्‍न प्रदेशों के मुख्‍यमंत्रियों से मिलना और सुप्रीम कोर्ट के कहर से निजात दिलाने की गुहार करना। इस सिलसिले में सबसे ज्‍यादा राक्षसी स्‍वरूप राजस्‍थान पत्रिका और दैनिक भास्‍कर का है। इनके मालिकान न्‍याय अधिष्‍ठाताओं की आंखों में सरेआम धूल झोंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। पत्रिका के मालिक की बयानबाजी-भाषणबाजी किसी से छिपी नहीं है और भास्‍कर का मैनेजिंग डायरेक्‍टर सुधीर अग्रवाल कॉस्‍ट कटिंग करने और डीबी कॉर्प की कमाई बढ़ाने के लिए कर्मचारियों को हड़काने-धमकाने की हरकतों में पूर्ववत संलग्‍न है। पिछले दिनों चंडीगढ़ इसीलिए धमका था।

बीते साढ़े तीन साल से ज्‍यादा समय तक सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया वेज अवॉर्ड से जुड़े अवमानना केसों की सुनवाई की है। इस दौरान मेरे सरीखे अनगिनत मीडिया कर्मी तकरीबन हर बार कोर्ट रूम में मौजूद रहे हैं और दोनों पक्षों के वकीलों की बहसें-दलीलें-जिरह-आर्गूमेंट-कानूनी नुक्‍तों के ब्‍योरे, उनमें निहित भावों-अर्थों की विवेचना होते देखी-सुनी है। और उसी के अनुसार अनेकानेक धारणाओं को अपने मस्तिष्‍क पटलों पर अंकित किया है। कर्मचारियों के वकीलों ने अपने विधिक पांडित्‍य का प्रदर्शन करते हुए कर्मचारियों का पक्ष बेहद मजबूती से अदालत पटल पर पेश किया और कोर्ट को सैटिस्‍फाई करने में में कोई कसर नहीं छोड़ी। वहीं मालिकों-मैनेजमेंट की ओर से हायर किए गए मोटी फीस लेने वाले सीनियर वकीलों ने केवल, और केवल कानूनी अड़चनों-अवरोधों को ही खड़ा करने की कोशिश की। और उनका औचित्‍य बताने के लिए दलीलों का आडंबर ही खड़ा करने का प्रयत्‍न किया। ऐसा कोई सबूत-साक्ष्‍य  प्रस्‍तुत करने में उनको कामयाबी मिलती नहीं दिखी जिससे लगे कि उन्‍होंने अपने पक्ष में मजबूत धरातल बना लिया है। इसकी बानगी उस सीनियर वकील का कोर्ट रूम से यह बुदबुदाते हुए बाहर निकलना है कि ‘ सब गुड़ गोबर हो गया ‘।

मालिकान पक्ष की दशा-दिशा क्‍या रही है और क्‍या है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्‍होंने या उनकी ओर से वकील तकरीबन हर तारीख पर बदलते रहे हैं। एक से एक धुरंधर सीनियर वकील कोर्ट रूम में प्रकट और तद्नुरूप लुप्‍त होते रहे हैं। जहां तक याद आता है, इन वकीलों की कुल मिलाकर यही कोशिश रही है कि मामले को अनंत काल तक लटकाया जाए। लेकिन ये महानुभाव लोग भूल गए कि ये साधारण-सामान्‍य मुकदमें नहीं बल्कि अवमानना के हैं। सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के। सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश का उल्‍लंघन करने के। यह जरूर है कि इस केस को अंतिम पड़ाव तक पहुंचने में अपेक्षा से जयादा वक्‍त लग गया। लेकिन हमें यह भी तो देखना-समझना चाहिए कि नौ की दहाई तक केस हैं और ज्‍यादातर में अलग-अलग मसले-समस्‍याएं हैं। इन पर विचार करना, इनकी राह की अड़चनों का निवारण करना जाहिरा तौर पर बड़ी चुनौती रही है।

बहरहाल, चालू नए साल में जिस तरह से तारीख पड़ने के लाले पड़ गए थे, उसी तर‍ह से एक झटके में सुनवाई भी पूरी हो गई और जजमेंट रिजर्व हो गया। इसमें भी हमारे वरिष्‍ठ वकीलों और कई मीडिया साथियों की भूमिका-कोशिश-प्रयास रहा है। फिर तारीख लगनी शुरू हुई और लगातार दो तारीखों में ही फैसले के मुकाम तक पहुंच गए अवमानना के समस्‍त केस। बात फैसले तक पहुंची तो अनुमानों, उम्‍मीदों, अटकलों, बतंगड़ों की एक तरह से आंधी चल पड़ी है। जितने मुंह उतनी टीका-टिप्‍पणी, कयास, पूर्वाभास। तरह-तरह के ख्‍याली-स्‍वप्निल पुलाव-पकवान, लजीज डिसेज। यह स्‍वाभाविक भी है। आज के जो हालात हैं, महंगाई का जो आलम है, मिलने-पाने वाली पगार-सेलरी-मजदूरी का जो निम्‍न–बेहद कम स्‍तर है, मतलब गुजारे के सामानों के आसमान से भी ऊंचे दामों की बनिस्‍बत मिलने वाली सेलरी का जो स्‍तर है, वह तो चीख-चीख कर कहता है कि हम मीडिया कर्मियों को मजीठिया वेज बोर्ड से संस्‍तुत सेलरी-सुविधा एवं सारा बकाया हर हाल में मिलना ही चाहिए। अपने मीडिया प्रॉडक्‍ट को बेतहाशा ऊंचे दामों पर बेचने और विज्ञापनों से अकूत कमाई करने वाले मीडिया मालिकों को हमारा हक देने के लिए मजबूर कर दिया जाना चाहिए।

इसका तरीका क्‍या होता है, कैसे-किस तरह हम मीडिया कर्मचारियों को हमारा वास्‍तविक हक मिलता है, यह सब न्‍याय मंदिर में तय होना है। इस बारे में, जैसा कि अनेक प्रतिक्रियाएं, टीका-टिप्‍पणियां  पढ़ने-सुनने को मिली हैं, उनका मेरी समझ से कोई औचित्‍य नहीं है। फैसले का कोई फार्मेट नहीं बनाया जा सकता, बनाना भी नहीं चाहिए। क्‍योंकि अब तक का हमारा जो अनुभव है वह यह है कि हम कोर्ट रूम में अपने साथ अनुमानों का पुलिंदा लेकर जाते थे, पर वहां बहुधा अचंभित करने वाली सकारात्‍मक बातें-चीजें होती थीं। और हम नई सोच, नए विचारणीय सवाल लेकर बाहर निकलते थे।

बहरहाल, समर वैकेशन के बाद फैसला आ जाएगा, यह अनुमान तो सबका है। पर स्‍वरूप क्‍या होगा, इस पर अनुमान लगा पाना कम से कम मेरे जैसों के वश की बात नहीं है। हां, यह जरूर है कि फैसला होगा तो अचंभित करने वाला, हैरान करने वाला, सोचने-चिंतन करने पर विवश करने वाला। और बन जाएगा लाजवाब नजीर। अरे भई, एक दशक से ज्‍यादा हो गया इस वेज बोर्ड को बने। अभी तक लागू नहीं हो पाया। ऐसे में नए वेज बोर्ड को लेकर क्‍या होगा, इस पर मंथन करते रहिए ! जय मजीठिया !

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
चंडीगढ़
bhupendra1001@gmail.com
9417556066

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में ‘हिंदुस्तान’ अखबार को क्लीनचिट देने वाली शालिनी प्रसाद की झूठी रिपोर्ट देखें

यूपी में अखिलेश यादव सरकार के दौरान श्रम विभाग ने झूठी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एचटी मीडिया और एचएमवीएल कंपनी यूपी में अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ की सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रही है. श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है.

इसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है. रिपोर्ट में बताया गयाहै कि यूपी में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं जिनमें 955 कर्मचारी हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 कर्मचारी हैं. यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है. रिपोर्ट नीचे दिया जा रहा है. पढ़ने के लिए संबंधित स्क्रीनशाट पर क्लिक करें दें…











पूरे मामले को समझने के लिए इस शीर्षक पर क्लिक करें :

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सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार का झूठा हलफनामा, कहा- हिंदुस्तान की दसों यूनिटों में मजीठिया लागू है

देश के अन्य राज्यों में भले ही प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान और एरियर न मिल रहा हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में एचटी मीडिया कंपनी का अखबार ‘हिन्दुस्तान’ अपनी सभी यूनिटों में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करके सभी कर्मचारियों को इसका लाभ देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूरी तरह अनुपालन कर रहा है। भले ही यह खबर मीडिया जगत के लिए चौंकाने वाली हो, हकीकत इससे परे है, मगर उत्तर प्रदेश में तत्कालीन अखिलेश सरकार के समय बनी श्रम विभाग की रिपोर्ट तो यही दर्शा रही है।

श्रम विभाग की यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने 06 जून 2016 को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में अखबार मालिकों के विरुद्ध विचाराधीन अवमानना याचिका संख्या- 411/2014 में सुनवाई के दौरान शपथपत्र के साथ दाखिल की है, जिसके मुताबिक यूपी में सिर्फ हिन्दुस्तान अख़बार ने ही मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कर न्यायालय के आदेश का अनुपालन किया है।

उत्तर प्रदेश में हिन्दुस्तान की कुल दस यूनिटें हैं, जिनमें 955 कर्मचारी होना दर्शाया गया है। शासन की रिपोर्ट के मुताबिक हिन्दुस्तान लखनऊ में 159, मेरठ में 75, मुरादाबाद में 68, गोरखपुर में 51, अलीगढ़ में 48, बरेली में 82, नोएडा में 224, वाराणसी में 84, इलाहाबाद में 47, कानपुर में 117 यानि कुल मिलाकर 955 कर्मचारियों को हिन्दुस्तान अखबार मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से लाभान्वित कर रहा है।

आइए जानते हैं, श्रम विभाग के रीजनल कार्यालय  के किस अधिकारी ने हिन्दुस्तान की किस यूनिट में कब जाकर जाँच-पड़ताल करके स्टेट्स रिपोर्ट तैयार की। वर्ष 2015 में 15 सितम्बर को डॉ. हरीशचंद्र ने लखनऊ, 17 सितम्बर को रामवीर गौतम ने मेरठ, 20 अगस्त को बी.पी. सिंह ने मुरादाबाद, 20 अगस्त को अमित प्रकाश सिंह ने गोरखपुर, 30 दिसंबर को एस.पी. मौर्या व एस.आर. पटेल ने अलीगढ़, 17 सितम्बर को राधेश्याम सिंह, बालेश्वर सिंह व ऊषा वाजपेयी की टीम ने नोएडा, 21 सितम्बर को आर.एल. स्वर्णकार ने वाराणसी, 04 जुलाई को एस.एन. यादव, आर.के . पाठक और अन्य तीन अधिकारियों की टीम ने इलाहाबाद, 13 अगस्त को सहायक श्रमायुक्त रवि श्रीवास्तव ने कानपुर यूनिट में जाकर पड़ताल की।

यूपी की तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद की ओर से कोर्ट में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के मुजफ्फरनगर का अखबार शाह टाइम्स अपने 22 और लखनऊ में इंडियन एक्सप्रेस अपने सात कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दे रहा है। रिपोर्ट में यहां तक कहा गया कि शाह टाइम्स ने अपने सभी कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक बकाया एरियर का भी भुगतान कर दिया है। अमर उजाला ने आंशिक लागू कर बकाया एरियर 48 समान किस्तों में देने का कर्मचारियों से समझौता कर लिया है। दैनिक जागरण ने 20जे के तहत वेज बोर्ड उनके संस्थान पर लागू न होना बताया।

उत्तर प्रदेश में मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर शासन की सर्वाधिक चौंकाने वाली स्टेट्स रिपोर्ट हिन्दुस्तान समाचार पत्र की है। यही वजह है कि हिन्दुस्तान प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर निश्चिंत नजर आ रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश का श्रम विभाग उनको पहले ही क्लीन चिट दे चुका है, वह यदि परेशान है, तो उन कर्मचारियों को लेकर है, जिन्होंने हाल ही में श्रम विभाग में मजीठिया वेज बोर्ड के मुताबिक वेतनमान और बकाया एरियर न मिलने का क्लेम ठोंक कर हिन्दुस्तान प्रबंधन की आरसी जारी करा दी हैं। हिन्दुस्तान के खिलाफ आगरा से 11 और बरेली से 3 आरसी कटने के बाद से प्रबंधन की चूलें हिली हुई हैं। बरेली में एक और आरसी कटने के कगार पर है। इसके अलावा लखनऊ के 16 कर्मचारी भी ताल ठोकर हिन्दुस्तान प्रबंधन के खिलाफ मैदान में कूद पड़े हैं।

इन आरसी के कटने से जहां एक और श्रम विभाग की हिन्दुस्तान के पक्ष में कोर्ट में दाखिल स्टेट्स रिपोर्ट झूठी साबित हो रही है, वहीं हिन्दुस्तान प्रबंधन को यदि इन क्लेमकर्ताओं को पैसा देना पड़ा, तो अन्य कर्मचारियों में जबरदस्त असंतोष फैलेगा। उस गंभीर स्थिति से निपटना प्रबंधन के लिए बेहद मुश्किल भरा होगा।

तत्कालीन श्रमायुक्त की स्टेट्स रिपोर्ट वायरल होते ही हिन्दुस्तान में अभी भी मजीठिया का लाभ मिलने की आस में नौकरी कर रहे कर्मचारियों में अब अंदर ही अंदर असंतोष बढ़ रहा है। इस खुलासे के बाद अब उनकी यह आस भी खत्म होने लगी है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने पर हिन्दुस्तान प्रबंधन उनको मजीठिया का कोई लाभ देगा।

क्या योगी सरकार करेगी कार्रवाई :

उत्तर प्रदेश में श्रम विभाग के रीजनल कार्यालय के जिन अफसरों ने हिन्दुस्तान में मजीठिया वेज बोर्ड लागू होने की स्टेट्स रिपोर्ट श्रमायुक्त को सौंपी, क्या उनको खरीदा गया? अगर नहीं तो इस तरह की रिपोर्ट बनाने का उन पर किसका दबाव था, यह जांच की विषय है। हालांकि सभी दसों यूनिटों की एक जैसी ही रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि हिन्दुस्तान के बारे में ऐसी ही रिपोर्ट मांगी गई। हिन्दुस्तान प्रबंधन ने किसको धनलक्ष्मी से मैनेज किया? तत्कालीन श्रमायुक्त शालिनी प्रसाद ने किस वजह से इतना बड़ा महाझूठ देश की सर्वोच्च अदालत में शपथ पत्र देकर बोलना पड़ा? हालांकि उस समय की तत्कालीन सरकार के मुखिया अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव की हिन्दुस्तान अखबार के समूह संपादक शशि शेखर और लखनऊ के प्रादेशिक संपादक केके उपाध्याय से नजदीकियां और गलबहियां भी किसी से छिपी नहीं है।

ये भी संभव है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव में मदद देने के नाम पर मुलायम-अखिलेश की शशि शेखर और केके उपाध्याय से डील हुई हो? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब उत्तर प्रदेश की मौजूदा योगी आदित्यनाथ सरकार ही कोई उच्चस्तरीय जांच बैठाकर तलाश सकती है। अगर ऐसा होता है तो अखबार मालिकों के हाथों की कठपुतली बने श्रम विभाग का बदनुमा चेहरा उजागर हो जाएगा। उधर, केंद्र की मोदी सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में तैनात अतिरिक्त सचिव शालिनी प्रसाद की भी मुश्किलें बढ़ जाएंगी।हालाँकि हिंदुस्तान के समूह संपादक शशिशेखर और लखनऊ के संपादक केके उपाध्याय जब से योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली है, तभी से उनकी गणेश परिक्रमा कर सैटिंग में लगे हुए हैं।

कल भड़ास पर अपलोड होगी मजीठिया मामले में उत्तरप्रदेश श्रम विभाग की शर्मनाक स्टेट्स रिपोर्ट. पढ़ते रहिए भड़ास.

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जागरण के पत्रकार पंकज के ट्रांसफर मामले को सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना मामले से अटैच किया

दैनिक जागरण के गया जिले (बिहार) के मीडियाकर्मी पंकज कुमार के ट्रांसफर के मामले पर आज सोमवार को माननीय सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई हुई। इस मुकदमे की सुनवाई कोर्ट नम्बर 4 में आयटम नम्बर 9, सिविल रिट 330/2017 के तहत की गई। न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सुनवाई करते हुए इस मामले को भी मजीठिया वेज बोर्ड के अवमानना मामला संख्या 411/2014 के साथ अटैच कर दिया है। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे ही अन्य मामलों पर निर्णय आने वाला है, लिहाजा याचिका का निपटारा भी इसी में हो जाएगा।

पत्रकार पंकज कुमार के ट्रांसफर मामले में उनका पक्ष सुप्रीमकोर्ट में पटना हाई कोर्ट के रिटायर मुख्य कार्यकारी न्यायाधीश नागेंद्र राय ने रखा और राज्य सरकार के साथ साथ दैनिक जागरण को भी इस मामले में पार्टी बनाया गया। यह सुनवाई सुप्रीमकोर्ट में न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत में हुई। उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सुनवाई को पूरा करके इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है। बिहार गया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुमार का तबादला मजीठिया मांगने के कारण दैनिक जागरण प्रबन्धन द्वारा जम्मू कर दिया गया था। इसके खिलाफ भड़ास4मीडिया में विस्तृत रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया जिसके बाद पूरे देश में खलबली मची।

पंकज कुमार सामाजिक सरोकार के व्यक्ति हैं और गया जिले में मगध सुपर थर्टी के संचालन से जुड़े हैं। इसमें प्रतिभावान गरीब छात्र छात्राओं को गुरुकुल परंपरा के तहत निशुल्क आवास, भोजन तथा पठन पाठन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। इस संस्थान से निकले सैकडों छात्र छात्राएं आईआईटी, एनआईटी तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं।

उग्रवाद प्रभावित मगध क्षेत्र से आने वाले युवा भी इसके माध्यम से आज अपना जीवन संवार रहे हैं और समाज को राह दिखा रहे हैं। पंकज कुमार के साथ दैनिक जागरण द्वारा किये गए व्यवहार की खबर जैसे ही भड़ास पर प्रकाशित हुई, इन सैकडों युवाओं तथा पंकज कुमार के परिचितों ने भड़ास का लिंक लगाकर पीएम तथा केन्द्रीय मंत्रियों को टैग करके ट्वीट किया। पंकज कुमार की इमानदारी का ही फल था कि उच्चतम न्यायालय में बिहार पटना उच्च न्यायालय के रिटायर्ड कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश श्री नागेन्द्र राय जी उनसे बिना कोई फीस लिए मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया वीरों को समर्पित बरेली के मजीठिया क्रांतिकारी मनोज शर्मा एडवोकेट की कविता

अब जीत न्याय की होगी…

-मनोज शर्मा एडवोकेट-

आ गया समय निकट अब जीत न्याय की होगी

इतिहास में दर्ज कहानी मजीठिया वीरों की होगी

मुश्किलें सहीं पर अन्याय, अनीति के आगे झुके नहीं

भामाशाहों की घुड़की के आगे कदम कभी रुके नहीं

उनके धैर्य और साहस की गाथा अमर रहेगी

हम न रहेंगे, तुम न रहोगे बस बातें अमर रहेंगी

धूर्त, कायरों को आने वाली नस्लें धिक्कारेंगी

स्वाभिमान बेचने वालों को उनकी संतानें धिक्कारेंगी

अपने हक की आवाज उठाने का जिसमें साहस ना हो

वह कैसा है पत्रकार जिसका आचरण बृहनला जैसा हो

अतीत झांक कर देखो कलम तुम्हारी क्रांति बीज बाेती थी

चाहे जितनी हो तलवार तेज गुट्ठल होकर रह जाती थी

वही कलम आज कुछ पैसों की खातिर दासी लगती है

पत्रकारिता तो अब लाला बनियों की थाती लगती है

हमने अपना श्रम बेचा है जमीर का तो सौदा किया नहीं

खबरदार सदा मौन रहने का व्रत तो है हमने लिया नहीं

न्यायालय की नाफरमानी की सजा भुगतने को तैयार रहो

शोषण करने वालों काल कोठरी में रहने को तैयार रहो

देखेंगे धन बल, सत्ताबल कितना काम तुम्हारे आता है

कौन है वह माई का लाल जो तुम्हें बचाने आता है

-मनोज शर्मा, एडवोकेट

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मजीठिया वेतनमान : 6 माह के लिए सभी प्रेसों में हो सरकारी नियंत्रण

3 मई को मजीठिया वेतनमान की सुनवाई पूरी हो गई। अब सभी की निगाहें फैसलें पर है। लेकिन बात वही आती है कि सुप्रीम कोर्ट कोई भी फैसला देगा तो क्या प्रेस मालिक आज्ञाकारी शिष्य की तरह मान लेंगे? नहीं। जब वे मजीठिया वेतनमान देने के आदेश को नहीं माने तो सुप्रीम कोर्ट का कोई आदेश उनकी समझ में तब तक नहीं आएगा जब तक उनके हाथ से वित्तीय अधिकार नहीं छिनेंगे। जेल भी होगी तो अधिनस्तों की होगी और संपादक, मुद्रक प्रकाशक को इसीलिए ऊंचा वेतन दिया जाता है कि कंपनी के पाप झेलने की क्षमता हो। इसलिए 6 माह की सजा भोगने में क्या ऐतराह जब हजारों करोड़ वारे न्यारे हो रहे हो।

ऊंची पहुंच व साख दांव पर
कहा जाता है कानून मनीमैन लोगों का खेल है। जहां आम आदमी को दिलासा देने के लिए कानून-कानून खेला जाता है। यह बीमारी लगभग पूरे विश्व में है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन यह मामला पत्रकारों का है। लिखित कानून से परे कोई भी फैसला कैसे मान्य होगा? क्या पत्रकार इसे सहज स्वीकार कर लेंगे? जैसे कई सवाल हैं।

पत्रकारों के पक्ष में कानूनी बातें
चूंकि जर्नलिस्ट एक्ट में उन सारी बातों का उल्लेख है जिसके तहत प्रेस मालिक बचने का प्रयास करेंगे। इसमें संविदा कर्मचारी, अनुबंधित कर्मचारी, पार्ट टाइम कर्मचारी तक का उल्लेख है। और साफ कहा गया है कि इससे कम वेतन किसी भी हालत में स्वीकार नहीं होगा इससे अधिक वेतन पर आपत्ति नहीं। तो 20 जे का मुद्दा जर्नलिस्ट एक्ट में ही खत्म हो जाता है। और आईडी एक्ट के 20 जे को माने भी तो कोई न्यूनतम वेतन से कम वेतन नहीं दे सकता। और पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतनमान वेजबोर्ड माना गया है। कर्मचारी स्थाई नियोजन अधिनियम 1946 की धारा 38 साफ इस बात को परिभाषित करती है कि कर्मचारी से कई भी गैर कानून अनुबंध मान्य नहीं होगा। तो बचाव के रास्ते लिखित कानून के अनुसार बंद हैं।

क्या-क्या हो सकता है फैसला
अवमानना अधिनियम के तहत ऐसे मामलों में कोर्ट जिम्मेदार अधिकारी व मालिक को सीधे जेल भेज सकती है। कंपनी मामलों में माफी की गुंजाईश कम होती है। या फिर कोर्ट कंपनी का लाइसेंस रद्द कर सकता है। संपत्ति अटैच कर सकता है। कंपनी का विवाद खत्म होने तक कंपनी की प्रशासनिक जिम्मेदारी सरकार के आधीन कर सकती है। 6 माह बाद यदि विवाद पूरी तरह नहीं खत्म हुआ तो सरकारी अधीनता 6 माह के लिए और बढ़ सकती है।

हालांकि कुछ जज अपने विशेषाधिकार का फायदा उठाकर खुद संसद व राष्ट्रपति बनने का प्रयास करते हैं और लिखित संविधान से बाहर नया संविधान लिख देते हैं। कानून को अपने ढ़ंग से परिभाषित कर ऐसा फैसला दे देते हैं जो ना तो संविधान में लिखा हो ना एक्ट में लिखा हो। यह बीमारी ब्रिटेन के अलिखित संविधान से आई है जो आज भी लिखित संविधान पर भारी है। यदि कानून की नई व्याख्या करना ही है तो संविधान पीठ किसलिए है। जज तो जो कानून में लिखा होता है उसका पालन कराने के लिए होता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मजीठिया मामले में जेल जाने के खौफ से जागरण प्रबंधन ने की योगी से मुलाकात!

महाराष्ट्र में भी सीएम और उनकी बीबी से मिलने का अखबार मालिक लगा रहे हैं जुगाड़… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट की अवमानना को लेकर देश भर के अखबार मालिकों में खौफ का माहौल है। सूत्रों का दावा है कि सुप्रीमकोर्ट के सख्त तेवर के बाद सभी अखबार मालिक अब अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पटाने में लगे हैं। दैनिक जागरण से सूत्रों ने खबर दी है कि सुप्रीम कोर्ट के बुधवार को अपनाए गए कड़े तेवर के बाद लखनऊ में दैनिक जागरण प्रबंधन की एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गयी। उसके बाद जागरण के आला अधिकारियों ने गोपनीय रूप से राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात की।

सूत्रों का तो यहाँ तक दावा है कि योगी आदित्यनाथ से जागरण प्रबंधन ने मंगलवार को भी मिलने का प्रयास किया था मगर योगी आदित्यनाथ ने उन्हें मंगलवार को समय नहीं दिया। उसके बाद बुधवार को जागरण प्रबंधन की योगी आदित्यनाथ से बैठक हुई। हालांकि अभी तक सूत्रों के इस दावे की पुष्टि नहीं हुई है। सूत्रों का तो यहाँ तक दावा है कि मुख्यमंत्री से मुलाक़ात की योजना को जागरण प्रबंधन ने काफी गुप्त रखा। यहाँ तक कि जागरण के मालिकों ने गाड़ी चलाने वाले अपने पुराने ड्राइवरों की जगह मुख्यमंत्री से मिलने के लिए जाते समय बाहरी ड्राइवरों की सेवाएं ली। महाराष्ट्र से भी खबर आ रही है कि यहाँ कई अखबार मालिक जहाँ मुख्यमंत्री से मुलाक़ात के लिए समय मांग रहे हैं वही कई अखबार मालिक तो मुख्यमंत्री की श्रीमती जी से ही मिलकर अपनी समस्या उन्हें बताने वाले हैं। कई अखबार मालिक तो मुख्यमंत्री की श्रीमती जी के सम्मान समारोह आयोजित करने का जुगाड़ लगाकर अपनी बात उन तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।

ज्ञात हो कि देश के मीडिया संस्थानों द्वारा जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों लागू नहीं करने और सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर देश भर के पत्रकारों व गैर पत्रकारों की ओर से दायर अवमानना याचिकाओं पर चल रही सुनवाई बुधवार को पूरी हो गई है। दोनों पक्षों मीडिया संस्थानों और पत्रकार-गैर पत्रकारों की तरफ से बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिकाओं पर जारी सुनवाई बंद कर दी है और इस मसले पर फैससा रिजर्व रखने के आदेश दिए हैं।

बुधवार को भी वेजबोर्ड व अवमानना की लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों-गैर पत्रकारों के एडवोकेट कॉलिन गोंजाविलश, परमानंद पाण्डे, प्रशांत भूषण की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में जोरदार पैरवी करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मीडिया संस्थान अपने पत्रकारों व गैर पत्रकारों को वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप एरियर व वेतनमान नहीं दे रहे हैं। बल्कि वेजबोर्ड की मांग करने वाले कर्मचारियों को प्रताडि़त किया जा रहा है। उन्हें टर्मिनेट, संस्पेंड और ट्रांसफर करके प्रताड़ित किया जा रहा है। इस संबंध में कोर्ट के समक्ष कर्मचारियों के हलफनामे व कंपनी की बैलेंसशीट भी पेश की गई। साथ ही वकीलों ने ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना नहीं करने वाले मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई करने, जस्टिस मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों को मीडिया संस्थानों में लागू करवाने और प्रताडि़त किए गए कर्मचारियों को रिलीफ दिलवाने की गुहार की है। मीडिया संस्थानों के वकीलों ने भी 20जे की आड़ लेते हुए कोर्ट से कहा कि कर्मचारी अपनी स्वेच्छा से बेजबोर्ड नहीं लेने की लिखकर दे रहे हैं। मीडिया संस्थानों ने कोई अवमानना नहीं की है और ना ही कर्मचारियों पर दबाव व प्रताडऩा की गई है। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस रंजन गोगई की पीठ ने सुनवाई बंद करने और फैसला रिजर्व करने के आदेश दिए। आज की सुनवाई में देशभर से बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

यह है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी, 2014 को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मियों को वेतनमान, एरियर समेत अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुरुप नवम्बर 2011 से एरियर और अन्य वेतन परिलाभ देने के आदेश दिए हैं, लेकिन इस आदेश की पालना मीडिया संस्थानों नहीं की। देश के नामी गिरामी अखबार समूह राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान टाइम्स, नवभारत टाइम्स, पंजाब केसरी जैसे अखबारों में वेजबोर्ड लागू नहीं किया गया। मीडिया संस्थानों ने वेजबोर्ड देने से बचने के लिए मीडियाकर्मियों से जबरन हस्ताक्षर करवा लिए कि उन्हें मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतन परिलाभ नहीं चाहिए। जिन कर्मचारियों ने इनकी बात नहीं मानी, उन्हें स्थानांतरण करके प्रताड़ित किया जा रहा है और कईयों को नौकरी से निकाल दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों, श्रम विभाग और सूचना व जन सम्पर्क निदेशालयों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के लिए जिम्मेदारी तय की है, लेकिन वे इसकी पालना नहीं करवा रहे हैं। वेजबोर्ड लागू नहीं करने पर पत्रकारों व गैर पत्रकारों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिकाएं दायर की। देश भर से सभी बड़े अखबारों के खिलाफ अवमानना याचिकाएं लगी।

फैसले में क्या होगा…

पत्रिका के वकील ने 20J का हवाला देते हुए अवमानना से बचने की गुहार की। चलो ये मान लें कि इस आधार पर अख़बार मालिक अवमानना से बच जाते हैं पर अब सवाल यह है कि जिन लोगों ने 20J पर हस्ताक्षर नहीं किये उनको भी मजीठिया का लाभ नहीं दिया गया इस आधार पर क्या अख़बार मालिक बच जायेंगे? अब देखना ये है कि कोर्ट क्या फैसला सुनाता है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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मजीठिया पर सुनवाई के बाद मीडिया मालिकों का एक दिग्गज वकील बुदबुदाया- ‘आज तो सब गुड़-गोबर हो गया!’

मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट में कल सुनवाई के बाद जब अदालत ने पूरे मामले पर सुनवाई खत्म होने के ऐलान करते हुए फैसला सुरक्षित रख लिया तो मानों मीडिया मालिकों के वकीलों को सांप सूंघ गया. अखबार प्रबंधन के वकील सिर्फ एक रणनीति पर लंबे समय से काम कर रहे थे. किसी भी तरह अदालत का वक्त जाया करो और पूरे प्रकरण को गलत दिशा में घुमाओ ताकि कनफ्यूजन बना रहे और डेट पर डेट मिलती रहे.

लेकिन पिछली कुछ सुनवाई के दौरान अदालत ने सब कुछ भांप लिया और मसले को ज्यादा लटकाने की जगह फैसलाकुन दौर में ले जाने को सोच लिया. इसी के तहत पिछले दो सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के वकीलों की बातों दलीलों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखने का ऐलान किया. कोर्ट रूम से बाहर निकल रहे मीडिया मालिकों के एक वकील ने सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखे जाने के घटनाक्रम पर भुनभुनाते हुए टिप्पणी की- ‘आज तो सब गुड़-गोबर हो गया.’ 

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दैनिक जागरण के दर्जनों संघर्षरत मीडियाकर्मियों की तरफ से पवन उप्रेती भी कोर्ट रूम में मौजूद थे. उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के लिए लड़ रहे मीडियाकर्मियों के ह्वाट्सएप ग्रुप ‘मजीठिया क्रांतिकारी’ में अपने आब्जवरशेन को शेयर किया है, जो इस प्रकार है-

मैं अदालत कक्ष में मौजूद था। माननीय न्यायाधीश ने वर्कर्स और प्रबंधन के सभी वकीलों को बहुत ध्यान से सुना और दोनों न्यायाधीशों ने सुनवाई के दौरान आपस में काफी समय तक चर्चा भी की। हमारे एडवोकेट्स ने मुद्दों को बेहद सधे हुए ढंग से उठाया। शुरू से ही ऐसा लग रहा था कि जस्टिस गोगोई साहब मन बनाकर बैठे हैं कि उन्हें आज इस चैप्टर को क्लोज करना है। उन्होंने इस बारे में कहा भी था। कुल मिलाकर अखबार मालिकानों की इस मामले को लंबा खींचने की सारी कोशिशें नाकाम हो गई क्योंकि आज वे किसी भी कीमत पर डेट लेना चाहते थे। ये कह सकता हूँ कि अदालत से हमारे पक्ष में अवश्य अच्छा फैसला आएगा। एक निवेदन हम सभी साथियों से यह है कि माननीय अदालत का फैसला आने से पहले इस सम्बन्ध में टीका टिप्पणी ना की जाए। एक बार फैसला आने पर अखबार मालिकान पैसा ना देकर अवमानना कर चुके हैं, अब दोबारा ऐसा करने की उनकी हिम्मत होगी, मैं नहीं मानता। 20 जे ख़ारिज होते ही हम पैसा लेने के हकदार होंगे और पैसा दिलवाने के लिए माननीय न्यायालय कैसा मैकेनिज्म बनाता है, यह भी फैसला आने पर ही पता चलेगा। याद रखिये, 10 दिन पहले हम, उसमें भी सबसे पहले मैं सोच रहा था कि आखिर तारीख क्यों नहीं लग रही है, मन आशंकाओं से घिरा हुआ था। केवल 10 दिनों में भी तारीख भी लगी और सुनवाई भी पूरी हुई। हम अपने हक़ के लिए और ताकत के साथ लड़ेंगे और पैसा लेंगे वो भी ब्याज सहित।

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मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित, कई मालिक नपेंगे

बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट से आ रही है. प्रिंट मीडिया के कर्मियों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ न देने पर चल रही अवमानना मामले की सुनवाई आज पूरी हो गई. कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है. इसके पहले जस्टिस रंजन गोगोई की अदालत के सामने मीडिया मालिकों व मीडियाकर्मियों के पक्षों के वकील उपस्थित हुए और अपने अपने तर्क रखे. पूरी सुनवाई के बाद विद्वान न्यायाधीश ने सुनवाई पूरी होने और फैसला सुरक्षित किए जाने की घोषणा की.

अब देखना है कि ये फैसला कब आता है. पीड़ित मीडियाकर्मियों में इस बात की तो खुशी है कि सुनवाई पूरी हो गई. लेकिन वे आशंकित हैं कि कहीं फैसला आने में महीनों न लग जाए. सैकड़ों मीडियाकर्मियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड अवमानना मामले की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि अदालत का फैसला जल्द आएगा और इस फैसले में कुछ अखबार मालिकों को टांगे जाने के आदेश भी हो सकते हैं.

श्री शर्मा के मुताबिक कई राज्यों के श्रम आयुक्तों ने बड़े अखबार मालिकों के हित को ध्यान में रखते हुए मेनुपुलेटेड रिपोर्ट बनाई है जिसके कारण संभव है दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण जैसे समूहों के मालिक बच जाएं.

हालांकि ये भी संभव है कि कुछ लोगों को अवमानना मामले में दंडित करने के साथ साथ कोर्ट कोई कमेटी गठित कर दे जिसमें आगे आने वाले और वर्तमान के मामलों की केस टू केस बेसिस पर सुनवाई हो सके. एडवोकेट शर्मा कहते हैं कि फैसला जो आएगा वह मूलत: मीडियाकर्मियों के ही हित में होगा लेकिन अदालत यह भी ध्यान रखेगी कि कहीं उसके फैसले से मीडिया प्रबंधन का इतना नुकसान न हो जाए जिससे अखबारों के प्रकाशन पर असर पड़े.

कुल मिलाकर ऐसा प्रतीत होता है कि फैसला थोड़ा मीडियाकर्मियों और थोड़ा मालिकों के पक्ष में होगा. लेकिन उन मीडियाकर्मियों को सीधा और पूरा लाभ मिलेगा जिन्होंने केस किया हुआ है और क्लेम किया हुआ है.

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया मामले के निपटारे को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमेटी बनाए जाने की उम्मीद : एडवोकेट उमेश शर्मा

मजीठिया मामले में तीन मई को आरपार की उम्मीद…. देश भर के मीडियाकर्मियों के लिये माननीय सुप्रीमकोर्ट में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकट उमेश शर्मा का मानना है कि अखबार मालिकों के खिलाफ चल रही अवमानना मामले की यह लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है और तीन मई को इस मामले में आरपार होने की उम्मीद है। यह पूछे जाने पर कि इस लड़ाई का निष्कर्ष क्या निकलने की उम्मीद है, एडवोकेट उमेश शर्मा का कहना है कि लड़ाई मीडियाकर्मी ही जीतेंगे लेकिन जहां तक मुझे लग रहा है, सुप्रीमकोर्ट इस मामले में एक कमेटी बना सकती है।

यह कमेटी अखबार मालिकों से साफ कहेगी कि आप कर्मचारियों की लिस्ट और इनकम टैक्स विभाग में जमा कराया गया अपना 2007 से 2010 तक की बैलेंसशीट लेकर आईये। यह कमेटी फाईनल कर देगी कि आपने वेज बोर्ड की सिफारिश लागू किया या नहीं। यह कमेटी दस्तावेज देखकर तुरंत बता देगी कि अखबार मालिकों ने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ कर्मचारियों को दिया है या नहीं। इससे काफी कुछ साफ हो जायेगा।

लीगल इशूज के मामले पर उमेश शर्मा ने कहा कि मैं बार बार कहता हूं कि लीगल इशूज कोई गंभीर मुद्दा नहीं हैं। इसके जरिये कुछ लोग सिर्फ भ्रम फैला रहे हैं और अखबार मालिक भी सुप्रीमकोर्ट को भ्रमित कर रहे हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में श्री शर्मा ने कहा कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले का सही निराकरण कमेटी बनाकर ही हो सकता है और कमेटी बनी तो हम केस जीत भी जायेंगे। नहीं तो, लीगल इश्यू में फसेंगे तो फंसते ही जायेंगे।

उमेश शर्मा कहते हैं- अरे भाई साफ बताईये, हम अ्वमानना की सुनवाई में गये हैं तो इसमें लीगल इश्यू कहां से आ गया। लीगल इश्यू के ज्यादा चक्कर में पड़ेंगे तो हमें जिन्दगी भर लेबर कोर्ट का चक्कर ही काटना पड़ेगा। मैं आज भी अपने इस बात पर कायम हूं। लीगल इश्यू जो फ्रेम हुये हैं, सुप्रीम कोर्ट अगर सुनवाई के बाद यह बोल दे कि २० जे का मामला विवादित है और ये हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता तो हम इस पर कुछ नहीं कर सकते हैं।

दूसरी चीज अगर सुप्रीम कोर्ट यह बोल दे कि कंटेंप्ट के तहत यह स्पष्ट नहीं हो रहा कि मालिकों ने जान बूझ कर अवमानना की है, तो हो गया ना सबको नुकसान। इसका तरीका यह है कि पहले जांच कमेटी बनाने पर जोर दिया जाता फिर जांच कमेटी के सामने २० जे व अन्य समस्याओं के बारे में तथ्य इकट्ठा कर सुप्रीम कोर्ट के सामने लाया जाये तो सुप्रीमकोर्ट भी इसे गंभीरता से लेती। मैं फिर कह रहा हूं कमेटी बनाना ही एक मात्र उचित विकल्प होगा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
९३२२४११३३५

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पत्रकारों का हक नहीं दिला पाएगी मोदी सरकार, वजह बता रहे पीटीआई के पत्रकार प्रियभांशु रंजन

Priyabhanshu Ranjan : पत्रकारों का हक दिला पाएगी मोदी सरकार? कल मैंने लिखा था कि श्रम मंत्रालय का एकमात्र काम EPF की ब्याज दरें घटाना-बढ़ाना रह गया है। लगता है मेरी बात श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को चुभ गई। बंडारू साहब ने आज बयान दिया है कि मोदी सरकार न्यूज़ चैनलों और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों को भी Working Journalists Act के दायरे में लाने के कदम उठा रही है और जरूरत पड़ी तो कानून में संशोधन किया जाएगा। अभी Working Journalists Act के दायरे में सिर्फ प्रिंट मीडिया के पत्रकार आते हैं।

अगर मोदी सरकार वाकई न्यूज़ चैनलों और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों को Working Journalists Act के दायरे में ले आती है और उन्हें Wage Board की सिफारिशों का पूरा लाभ मिलने लगता है तो ये पत्रकारों की Job Security की दिशा में बड़ा कदम होगा। लेकिन मुझे शक है कि मंत्री जी की बातें हकीकत बन पाएंगी। जैसे ही सरकार ऐसा कदम उठाने की दिशा में बढ़ेगी, आप देख लीजिएगा कि आज मोदी-मोदी जप रहे सारे बड़े मीडिया हाउस इस सरकार के खिलाफ खबरें दिखाने लगेंगे।

यूपीए सरकार ने जब पिछला Wage Board गठित किया और फिर उसकी सिफारिशों को अधिसूचित (Notify) किया तो आपने देखा ही था कि कैसी-कैसी निगेटिव खबरें मनमोहन सरकार के खिलाफ आने लगी और हालत ये है कि आज भी उस सरकार के बारे में निगेटिव फीडबैक ही मिलती है। साल 2014 में जब कांग्रेस लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारी थी, तो केंद्रीय मंत्री रह चुके वीरप्पा मोइली ने कहा था कि जस्टिस मजीठिया Wage Board की सिफारिशें अधिसूचित करना यूपीए सरकार की बड़ी गलती थी और ये भी एक बड़ी वजह थी कि मीडिया मनमोहन सरकार के खिलाफ चला गया।

खैर, पिछले Wage Board की सिफारिशें लागू कराने के लिए Journalists और Non-Journalists को अपने मैनेजमेंट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़नी पड़ी और तब जाकर PTI सहित कुछ अखबारों और न्यूज एजेंसियों ने इसे लागू किया। लेकिन आज भी कई बड़े अखबारों ने इसे लागू नहीं किया है। जिसने लागू किया उसने भी बहुत सारे कानूनी तिकड़म के साथ लागू किया।

आजकल प्रिंट मीडिया के पत्रकारों को Wage Board के दायरे से बाहर करने के लिए कई मीडिया हाउस तरह-तरह के तिकड़म कर रहे हैं। पत्रकारों का Designation यानी पद का नाम ऐसा-ऐसा गढ़ा जा रहा है कि वो न Working Journalists Act के दायरे में रहें और न ही Wage Board से मिलने वाले फायदे क्लेम कर सकें।

पिछले दिनों The Times of India ने तो बाकायदा एक संपादकीय लिखकर कहा था कि नोटबंदी और Wage Board ने भारतीय प्रिंट मीडिया इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी। आप खुद सोचिए कि जब ऐसे-ऐसे खून चूसने वाले मीडिया हाउस रहेंगे तो कैसे मिलेगा पत्रकारों को उनका वाजिब हक?

प्रतिष्ठित न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया में कार्यरत पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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इस पत्रकार ने योगी को शशि शेखर से किया सचेत

गोरखपुर। हिंदुस्तान अखबार में काम कर चुके, “हिंदवी” (सीएम योगी का अखबार, जो अब बंद हो चुका है) के पूर्व विशेष संवाददाता और इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय वेद प्रकाश पाठक ने एक ट्वीट के माध्यम से सीएम योगी को सतर्क किया है। वेद ने ट्वीट के जरिये सीएम को आगाह किया है कि वे शशि शेखर जैसे संपादक से सतर्क रहें, जो पत्रकारों का मजीठिया वेज बोर्ड का एरियर व वेतन निगल चुके हैं। यह ट्वीट वेद ने उन मुलाकातों को देखते हुये किया जो इन दिनों हिंदुस्तान अखबार प्रबन्धन क्राइसिस मैंनेजमेंट के लिये कर रहा है।

दरअसल, अखबार प्रबन्धन के खिलाफ दो दर्जन से ज्यादा आरसी जारी हो चुकी हैं। ये सभी आरसी लखनऊ, आगरा और बरेली के श्रम विभाग से जारी हुई हैं। प्रबन्धन इन्हें री-कॉल कराने की तैयारी में है। ये सभी आरसी मजीठिया वेज बोर्ड के नान-इम्प्लीमेंटेशन से जुड़ी हैं। री-कॉल के बाद प्रभाव का इस्तेमाल कर प्रबन्धन आरसी रद्द करवाना चाहता है। बगैर शासन और सरकार के सहयोग के यह कार्य संभव न होगा।

इस काम के लिये अखबार प्रबन्धन बड़ी चालाकी से यूपी के नये सीएम योगी आदित्यनाथ की खुशामद में जुटा हुआ है। यहां से कई संपादक योगीजी से मिल चुके हैं। मकसद सिर्फ एक है कि योगीजी को भ्रामक सूचनाएं देकर अपने फर्जीवाड़े पर पर्दा डाला जाए और हजारों पत्रकारों को उनके अधिकारों के प्रति हतोत्साहित किया जाए। सीएम को किये गये ट्वीट में वेद प्रकाश पाठक ने उन्हें यह भी बताया है कि संपादक शशि शेखर का मकसद यूपी में हिंदुस्तान अखबार के खिलाफ लगभग 40 वादों को प्रभावित करना है।

योगी से कौन कौन संपादक आज सुबह मिला है, डिटेल दे रहे हैं भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह… नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने दिए ‘प्रात:काल’ के फर्जीवाड़े की जांच के आदेश

महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त ने मुंबई सहित देश के पांच अन्य शहरों से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक प्रात:काल द्वारा अपने यहाँ कार्यरत पत्रकारों, गैर-पत्रकारों और अन्य विभागों के कर्मचारियों से सम्बंधित गलत एफिडेविट देने की शिकायत पर जाँच करने के आदेश दिए हैं। जांच का दायित्व कामगार उपायुक्त श्री बागल को सौंपा गया है। हिंदी दैनिक प्रात:काल द्वारा श्रम आयुक्त को दिए एफिडेविट में फर्जीवाड़े के पुख्ता सबूत मिले हैं। इस जांच के आदेश के बाद ‘प्रात:काल’ प्रबंधन को फर्जी एफिडेविट देने के मामले में जेल भी हो सकती है।

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे ‘मजीठिया संघर्ष मंच’ के पदाधिकारियों ने 13 अप्रैल 2017 को आरटीआई एक्सपर्ट पत्रकार शशिकांत सिंह के नेतृत्व में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त यशवंत केरूरे से उनके कार्यालय में जाकर मुलाकात की और प्रात:काल हिन्दी दैनिक द्वारा दिए गए फर्जी एफिडेविट मामले को उनके संज्ञान में लाया। साथ ही इसी समाचार पत्र के मुख्य उपसंपादक द्वारा दिए गए शिकायती पत्र की प्रति सौंपी। इस शिकायती पत्र के साथ एफिडेविट फर्जी होने के पूरे पुख्ता सबूत दिए गए। जिसके बाद कामगार आयुक्त ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल जांच करने का आदेश उपायुक्त श्री बागल को दिया। आपको बता दें कि प्रात:काल द्वारा दिए गए एफिडेविट में निम्नलिखित फजीर्वाड़े के पुख्ता सबूत मिले हैं-

1- प्रात:काल ने अपने एफिडेविट में बताया है कि उसके पास कुल आठ कर्मचारी हैं, जिसमें दो श्रमिक पत्रकार एक प्रधान संपादक सुरेश गोयल और एक स्थानीय संपादक महीप गोयल हैं। एक डीटीपी हेड और 5 प्रबंधन के सदस्य हैं। जबकि प्रात:काल समाचार पत्र के कार्यरत पत्रकार के रूप में शिरीष गजानन चिटनिस प्रतिनिधि (मुंबई/१४१६), महीप गोयल-स्थानीय संपादक (मुंबई/१४१७), विष्णु नारायण देशमुख छायाचित्रकार (मुंबई/१६७४), हरिसिंह राजपुरोहित चीफ कोरेस्पोंडेंट  (मुंबई/१८१९) को महाराष्ट्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त अनुभवी पत्रकारों को दिया जाने वाला अधिस्वीकृति पत्र (एक्रिडेशन कार्ड) प्रदान किया गया है। यह पत्र संबंधित संस्थान द्वारा प्रदत्त दस्तावेजों (जैसे- नियुक्ति पत्र, अनुभव प्रमाण, सेलरी स्लीप, पहचान पत्र, निवास प्रमाण पत्र, संकलित / लिखित समाचारों एवं फोटो आदि कटिंग, शैक्षणिक डाक्यूमेंट्स आदि) की पुष्टि तथा पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही जारी किए जाते हैं।

2- मुम्बई श्रम आयुक्त को दिए एफिडेविट में प्रात:काल अखबार ने शिरीष गजानन चिटनीस और हरिसिंह राजपुरोहित को अपना कर्मचारी ही नहीं बताया है जबकि इन्हें अपना प्रतिनिधि दिखाकर सरकार से इन दोनों को एक्रिडेशन दिलवाया है। 12 पृष्ठों के इस अखबार में न तो कोई रिपोर्टर, न कोई समाचार संपादक, मुख्य उप संपादक, उपसंपादक, प्रूफ रीडर और न ही कोई दूसरा डीटीपी आॅपरेटर बताया गया है। एफिडेविट के अनुसार ‘प्रात:काल’ में आउट सोर्सिंग और ठेके से काम भी नहीं कराया जाता है।

3- ‘प्रात:काल’ द्वारा श्रम आयुक्त कार्यालय में दिए गए एफिडेविट में विष्णु नारायण देशमुख को मैनेजर बताया गया है तथा उनकी नियुक्ति तिथि १२.११.२०१४ को बताई गई है। जबकि ‘प्रात:काल’ ने ही इनको अपने यहां छाया चित्रकार बताकर 2013 से पहले ही अधिस्वीकृत पत्र (एक्रिडेशन कार्ड नं.- मुंबई/१६७४) दिलवाया है।

4- प्रात:काल ने श्रम आयुक्त कार्यालय में एफिडेविट देकर बताया है कि उस समाचार पत्र के मालिक 72 वर्षीय सुरेश गोयल हैं। आश्चर्य की बात है कि इसी एफिडेविट में उन्हें इसी संस्थान में वेतनभोगी संपादक भी बताया गया है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
09322411335

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Supreme Court Declines Early Hearing of Majithia Case

The bench consisting of Chief Justice J.S. Khehar, Justice D.Y. Chandrachud and Justice Sanjay Kishan Kaul today declined the request for early hearing of the Majithia Wage Boards case. The Chief Justice said that more pressing cases were pending therefore the request for advancing the hearing of the Majithia case could not be conceded.

Advocate Parmanand Pandey first went to the bench of Justice Ranjan Gogoi and mentioned for the early hearing but Justice Gogoi asked him to go to the court of the Chief Justice as per the new procedure of the Registry, decisions in such matters could be taken only by the CJI.

It may be noted here that the last hearing of the Majithia Wage Board case was on 10.01.2017 before the bench of Justice Gogoi and Ashok Bhushan. The bench had then passed the order for further hearing on 17.01.2017. However, the case has not been listed even after more than three months’ have passed.

The newspaper employees who have filed their cases of contempt against the proprietors are feeling frustrated over this delay by the judiciary. Shri Pandey also pointed out to the Chief Justice that thousands of newspapers employees across the country have been are looking towards the Hon’ble Supreme Court with very high hopes of getting justice but the delay was distressing. Shri Pandey has decided to again mention the case to draw the attention of the Chief Justice over pathetic plight of the newspaper employees.

Rinku Yadav
Treasurer-IFWJ

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