राष्ट्रीयता, मीडिया और विज्ञान का भगवाकरण

"मैं अपने धर्म की शपथ लेता हूँ, मैं इसके लिए अपनी जान दे दूंगा. लेकिन यह मेरा व्यक्तिगत मामला है. राज्य का इससे कुछ लेना-देना नहीं. राज्य का काम धर्मनिरपेक्ष कल्याण, स्वास्थ्य , संचार, आदि मामलों का ख़याल रखना है, ना कि तुम्हारे और मेरे धर्म का." – महात्मा गाँधी

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, ऐसा हमारे संविधान में कहा गया है. संक्षेप में कहे तो धर्मनिरपेक्षता का अर्थ होता है धर्म का राज्य से अलग होना. कई बार इस धर्मनिरपेक्षता शब्द का कोई अर्थ नहीं रह जाता है जब राष्ट्रीयता, मीडिया और विज्ञान के मामलों में देश के बहुसंख्यक धर्म का विशेष ख़याल रखा जाता है. आज से लगभग दस साल पहले भाजपा के शासन वाली सरकार में एनसीईआरटी के इतिहास के किताबों से छेड़छाड़ कर उनका भगवाकरण करने की कोशिश की गयी थी. जिसका देश भर के शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने विरोध किया था. इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ा था. समय के साथ दक्षिणपंथी समूहों और उनके “इतिहासकारों” और “बुद्धिजीवियों” द्वारा हिंदुत्व का प्रचार और भगवाकरण की कोशिशें बढ़ी हैं.  

भारत माता, जो एक हिन्दू देवी दुर्गा का प्रतिरूप लगती है, को दक्षिणपंथी समूहों ने एक “राष्ट्रीय” प्रतीक के रूप में लगभग स्थापित कर लिया है. भारत माता गौरवर्णा है. भारत माता का रंग-रूप से लेकर उनका पहनावा तक एक हिन्दू देवी की तरह है, जो आधे से अधिक भारतीय महिलाओं के रंग-रूप और पहनावे से मेल नहीं खाता. वह दुर्गा की तरह शेर पर सवार है. दिलचस्प बात यह है कि देश का एक प्रमुख दक्षिणपंथी संगठन भारत माता की इस छवि को अपने प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करता आया है. भारत माता की जय के नारे हिन्दू संगठनों के कार्यक्रमों से लेकर भारतीय सेना में समान रूप से गूँजते है.

मीडिया का जितना कवरेज हिन्दू धर्म के पर्व-त्योहारों को मिलता है, उतना कवरेज दूसरे धर्मों के पर्व-त्योहारों को शायद ही नसीब होता है. हिन्दू पर्व-त्योहारों के समय प्रमुख हिंदी अखबार अपने ‘मास्टहेड’ को उन पर्व-त्योहारों के रंग से रंग देते हैं. त्योहार विशेष पृष्ठों और खबरों से अखबारों को भर दिया जाता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी बहुसंख्यक धर्म के त्योहारों में पूरी तरह डूब जाती है. वैसे भारतीय मीडिया सालभर हिन्दू धर्मग्रंथों के पात्रों और मिथकों को उद्धृत करती रहती है. भीम जैसे धार्मिक पात्रों को लेकर कार्टून-शो बनाए जाते हैं. हिंदी फिल्मों के नायक भी अधिकतर हिन्दू पात्र ही होते हैं, भले ही उस पात्र को निभाने वाले अभिनेता किसी दूसरे धर्म के हो. हाल ही में इतिहास से छेड़छाड़ का एक और उदाहरण देखने को मिला. टीवी पर शुरू हुए एक नए “ऐतिहासिक” कार्यक्रम में जानबूझकर अकबर को एक मुस्लिम आक्रान्ता और खलनायक के रूप में दिखाने की कोशिश की गयी है. यह अकबर जैसे उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष शासक का गलत चित्रण कर नयी पीढ़ी को भ्रमित करने की कोशिश है.

दूसरी तरफ हमारे शासक वर्ग ने (खासकर भाजपा के शासन-काल के दौरान) विज्ञान, स्वदेशी तकनीक और आविष्कारों को हिन्दू धर्म के प्रचार-प्रसार का साधन बना दिया. भारत में विकसित तकनीकों और मिसाइलों का नामकरण हिन्दू मिथकों और पात्रों के नाम पर किया जाने लगा.  “अग्नि”, “इंद्र”, “त्रिशूल”, “वज्र”, “पुष्पक” आदि इसके उदाहरण हैं. दिलचस्प बात यह है कि हिन्दू मिथकों के नाम पर रखे गए इन मिसाइलों के विकास और निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले ‘मिसाइलमैन’ डॉ कलाम एक अल्पसंख्यक समुदाय से है.

इतना ही नहीं, खेल के क्षेत्र में मिलने वाले पुरस्कारों के नाम “अर्जुन”, “द्रोणाचार्य” आदि भी हिन्दू धर्मग्रंथों से लिए गए हैं.  मध्यप्रदेश में “गो-रक्षा कानून” जैसे अनूठे कानून लागू है. अब वहाँ निचली कक्षा के बच्चों को स्कूलों, मिशिनिरियों और मदरसों में गीता पढ़ाये जाने की कोशिश की जा रही है. यहाँ यह सवाल उठाना बेकार है कि यह कृपा सिर्फ हिन्दू धर्मग्रंथों पर ही क्यूँ की जा रही है? ईसाई और मुस्लिम धर्म के धर्मग्रंथों पर यह कृपा क्यूँ नहीं की जा रही? जब नरेन्द्र मोदी खुद के हिन्दू राष्ट्रवादी होने की घोषणा करते है तो हम भारतीयों को आश्चर्य नहीं होता क्योंकि यह देश तो पहले ही आधे हिन्दू-राष्ट्र में बदल चुका है. सावरकर और गोलवलकर के “हिन्दू-राष्ट्र” की संकल्पना को यथार्थ में बदलने की पूरी कोशिश की जा रही है.

दुर्भाग्य है कि बुद्धजीवियों और वैज्ञानिकों का एक वर्ग आधे-अधूरे और बेबुनियाद तथ्यों के आधार पर हिन्दू मिथकों को स्थापित करने और हिंदूत्व का प्रचार-प्रसार करने का प्रयास कर रहा है. हाल ही में मीडिया और विज्ञान के भगवाकरण का एक बेमिसाल उदाहरण देखने को मिला. दिनांक 29-07-2013, सोमवार के दैनिक भास्कर, झारखंड संस्करण में पृष्ठ संख्या 12 को ‘सोमवारी’ विशेष पृष्ठ बना दिया गया था[1]. दूसरे पृष्ठों पर भी श्रावण महीने में शिव अराधना और सोमवारी से जुड़ी ख़बरें हैं, लेकिन इस विशेष पृष्ठ पर “विशेषज्ञ” शिव और शिव-अराधना के महत्व का बखान कर रहे हैं. एक विशेषज्ञ जहाँ शिव की उपासना विधि बता रहे है वहीँ दूसरी तरफ एक दूसरे विशेषज्ञ यह दावा कर रहे है कि “शिवजी की उपासना से अपमृत्यु योग से मिल सकता है छुटकारा”. इस तरह के विशेष पृष्ठ और विशेषज्ञ विश्लेषण दूसरे धर्मो के त्योहारों के लिए नहीं दिखते हैं.

सबसे दिलचस्प लेख तो इस पृष्ठ के निचले भाग पर “एक वैज्ञानिक विश्लेषण” के रूप में है. शायद अखबार ने दूसरे लेखों की अवैज्ञानिकता को संतुलित करने के लिए इस “वैज्ञानिक विश्लेषण” को जगह दी है, हालांकि यह लेख भी दूसरे लेखों की ही तरह अवैज्ञानिक है. इस लेख का शीर्षक है “न्यूक्लियर रिएक्टर की बनावट है शिवलिंग के जैसा”. आश्चर्य नहीं कि इस तरह के बेसिरपैर की खबरों के कारण हिंदी मीडिया की यह दुर्गति हुई है. अंग्रेजी के शब्द “न्यूक्लियर रिएक्टर” के लिए हिंदी में दो प्रचलित शब्द है “नाभिकीय संयत्र” या “परमाणु संयंत्र”, जो कि इतने कठिन शब्द भी नहीं हैं कि इनका प्रयोग हिंदी के अखबार ना कर पाए. फिर भी अखबार “न्यूक्लियर रिएक्टर” शब्द का प्रयोग कर शायद खुद को “आधुनिक” दिखाने की कोशिश कर रहा है. इस लेख को लिखने वाले रांची के एक जाने माने भूवैज्ञानिक डॉ. नीतीश प्रियदर्शी है. उन्होंने शिवलिंग और परमाणु संयंत्र में समानता स्थापित करने के लिए अजीबोगरीब तथ्य दिए हैं. जैसे कि परमाणु संयंत्र और शिवलिंग की सरंचना बेलन की तरह होती है. यह साबित करने के लिए लेखक ने भाभा परमाणु संयंत्र का उदाहरण दिया है. लेकिन लेखक यह बताना भूल गए कि विश्व के लगभग सभी परमाणु संयंत्रों की बनावट बेलन की तरह ही होती है. इससे यह साबित नहीं हो जाता कि परमाणु संयंत्रों का शिवलिंग से कोई  रिश्ता है. अगर ऐसा होता तो परमाणु संयंत्र का आविष्कार विदेश की जगह भारत में किसी शिवभक्त ने किया होता. ऐसे कामचलाऊ विश्लेषण को वैज्ञानिक विश्लेषण बोल कर आप खुद अपनी फ़जीहत करवा रहे है. लेखक आगे कहते है कि नाभिकीय संयंत्र में भी जल का प्रयोग किया जाता है और शिवलिंग पर भी जल प्रवाहित की जाती है. नाभिकीय संयंत्र में जल का प्रयोग नाभिकीय छड़ों को ठंडा करने के लिए किया जाता है. वहीँ शिवलिंग पर जल के अलावा दूध भी डाला जाता है, लेकिन ये सब शिवलिंग को ठंडा करने के लिए तो नहीं किया जाता. लेखक महोदय भी ऐसा कोई दावा करते नज़र नहीं आते.

यह लेख बेबुनियाद तथ्यों और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है, जिसका एक ही उद्देश्य है- हिन्दू धर्म और इसके “इतिहास” की श्रेष्ठता को साबित करना. लेखक "स्यामंतक" नाम के किसी “रेडियोएक्टिव” पत्थर का जिक्र भी करते है जो सोमनाथ मंदिर में हुआ करता था. लेखक ने यह बताने की जरुरत नहीं समझी कि उस “रेडियोएक्टिव” पत्थर के संपर्क में आने वाले लोग कैंसर का शिकार होकर मरे थे या नहीं?

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी के ब्लॉग पर और भी दिलचस्प चीजें मिलती हैं. इस लेख के अखबार में छपने के दिन ही डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने ब्लॉग पर एक स्लाइड शो डालते है. प्राचीन “भारतीय” संस्कृति में नाभिकीय हथियारों के प्रयोग पर उनके शोध पर आधारित लगभग तेरह मिनट की इस स्लाइड शो का नाम है “डीड इंडिया हैव द एटॉमिक पॉवर इन एन्शिएन्ट डेज?” (क्या भारत के पास प्राचीन काल में परमाणु शक्ति थी?)[2]. अपने शोध से वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि महाभारत के युद्ध में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग हुआ था. वह अपने इस इस स्लाइड शो की शुरुआत कणाद द्वारा अणु के अस्तित्व को लेकर खोज से करते है. इस स्लाइड शो में वह हिन्दू धर्मग्रंथों से ऐसे हथियारों के उदाहरण देते है जिसका नाभिकीय हथियारों से कोई संबन्ध नहीं दिखता. जैसे राम द्वारा शिव का बाण तोड़ा जाना, मोहनास्त्र, आग्नेयास्त्र, ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, इंद्र का वज्र, आदि. इस स्लाइड शो में पौराणिक कथाओं के नागास्त्र, जिसके प्रयोग से नागों की बारिश होती थी, के जैविक हथियार होने की संभावना व्यक्त की गयी है. डॉ. नीतीश प्रियदर्शी यहाँ हिन्दू संस्कृति की महानता और श्रेष्ठता सिद्ध करने के चक्कर में कुछ जरुरी सवालों का जवाब देना भूल जाते हैं. क्या इन अस्त्रों में नाभिकीय पदार्थों का प्रयोग हुआ था? सिर्फ कुछ मन्त्रों के सहारे आप नाभिकीय अस्त्र कैसे बना सकते है? अगर महाभारत के युद्ध में नाभिकीय हथियारों का प्रयोग हुआ भी था तो पांडव और दूसरे लोग जीवित कैसे बच गए? अगर कोई जीवित बचा भी तो विकिरण का प्रभाव आनेवाली पीढ़ियों पर रहता, कई तरह की अनुवांशिक बीमारियाँ और विकृतियाँ होती. जिस कुरुक्षेत्र में इन नाभिकीय हथियारों का इस्तेमाल हुआ था, वह जगह रहने लायक नहीं रहती, विकिरण का प्रभाव हजारों सालों तक रहता है. इन ग्रंथों में परमाणु हथियार या परमाणु संयंत्र बनाने की विधि लिखी होनी चाहिए थी. अपने इस शोध में डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति को भी नहीं छोड़ा है जिनका हिन्दू सभ्यता-संस्कृति से कोई रिश्ता नहीं है. इस स्लाइड शो के अंत में डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने इस शोध की जिम्मेदारियों से खुद को बचाते हुए नज़र आते है. वह बड़ी चालाकी से यह कह कर निकल जाते है कि इस शोध से उन्होंने कुछ साबित करने की कोशिश नहीं की है, यह शोध उन्होंने कुछ इंटरनेट वेबसाइटों और किताबों की मदद से किया है. हालांकि वह उन इंटरनेट वेबसाइटों और किताबों का कोई संदर्भ नहीं देते है. डॉ. नीतीश प्रियदर्शी इन धर्मग्रंथों का वैज्ञानिक और तार्किक विश्लेषण करने की जगह इनका महिमामंडन करते दिखते है.

डॉ. नीतीश प्रियदर्शी अपने एक दूसरे हालिया “शोध” में झारखंड के आदिवासी गाँवों में राम-लक्ष्मण के “पद-चिन्ह” खोज रहे है, जिसकी खबर झारखंड के एक अंग्रेजी अखबार ने छापी है. [3] उनके इस “शोध” का तरीका भी हिन्दू धर्मग्रन्थों के अध्ययन तक सीमित है.  इस “शोध” में वह गाँव में प्रचलित महाभारत और रामायण से जुड़ी किवदंतियों का जिक्र भी करते है. यहाँ पेंच यह है कि आदिवासियों के खुद के आदि-धर्म हैं, उनका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं तो फिर ये महाभारत और रामायण की किवदंतियाँ कहाँ से आई? इस बाबत जब डॉ. नीतीश प्रियदर्शी से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वह भूवैज्ञानिक है और वहाँ पत्थरों और “पद-चिन्हों” पर शोध करने गए थे, उन्होंने गाँववालों से ज्यादा बातचीत नहीं की.

“अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” जैसे जुमलों को उछालने वाले यह आसानी से भूल जाते हैं कि इस देश में बहुसंख्यक धर्म का तुष्टिकरण कैसे कई स्तरों पर होता रहता है. इस मामले में मीडिया, बुद्दिजीवी, प्रशासन तो अपनी भूमिका निभाते ही हैं, यहाँ तक कि अदालतें भी कई बार हिन्दू मिथकों के आधार पर फैसलें सुनाती है.

लेखक अतुल आनंद ने रांची से जनसंचार में स्नातक किया है और अभी वह टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.

कंवल भारती पर आईटी एक्ट भी लगा दिया गया

रामपुर से खबर है कि आइएएस दुर्गाशक्ति नागपाल निलंबन मामले में फेसबुक पर प्रदेश सरकार के खिलाफ कमेंट करने वाले साहित्यकार कंवल भारती पर पुलिस ने आइटी एक्ट में भी मुकदमा दर्ज कर लिया है.  संसदीय कार्य एवं नगर विकास मंत्री आजम खां के मीडिया प्रभारी की शिकायत पर भारती के खिलाफ सिविल लाइंस कोतवाली पुलिस ने पांच अगस्त को धारा 153ए (टिप्पणी कर धार्मिक भावनाओं को आहत करना) और 295 ए (धार्मिक स्थल पर टिप्पणी करना) में मुकदमा दर्ज किया था. अब आईटी एक्ट की नई धारा बढ़ा दी गई है.

मामले की विवेचना क्राइम ब्रांच की इन्वेस्टिगेशन सेल कर रही है. सेल के इंस्पेक्टर एसपी शर्मा ने बताया कि विवेचना के दौरान कंवल भारती को आइटी एक्ट की धारा 66ए (ऐसी टिप्पणी करना जिससे उन्माद या घृणा पैदा हो) का भी दोषी पाया गया है. उन पर यह धारा बढ़ा दी गई है. इस धारा में छह साल की सजा का प्रावधान है. उधर, भारती ने बताया कि वह मुकदमा खारिज कराने के लिए हाईकोर्ट जाएंगे.

उधर, दलित चिंतक कंवल भारती के फेसबुक पर कमेंट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी की अखिलेश सरकार को नोटिस जारी किया है. शुक्रवार को कंवल भारती की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है. कोर्ट ने यूपी सरकार को नोटिस भेज चार हफ्ते में जवाब देने को कहा है. गौरतलब है कि प्रदेश के मंत्री आजम खान ने भारती के उपर रासुका लगाए जाने की धमकी दी थी. इन सब घटनाओं के बाद मामला कोर्ट तक पहुंच गया था. वहीं इस मामले की जांच अखिलेश सरकार क्राइम ब्रांच को सौंप चुकी है. 

भारती ने इससे पहले एक प्रेस कान्फ्रेंस में आरोप लगाते हुए कहा था कि सरकारें धीरे-धीरे अभिव्यक्ति की आजादी पर तानाशाही रवैया अपना रही है. पहले महाराष्ट्र और अब यूपी में फर्जी मामले दर्ज करवा मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. वहीं दूसरी तरफ, लेखक संगठनों ने भी कंवल भारती की गिरफ्तारी पर एक होकर इसका विरोध जता रहे हैं. मामला यहां तक आ गया है कि सभी लेखक एक-दूसरे से अपील कर रहे हैं कि यूपी सरकार से पुरस्कार प्राप्त करने वाले लेखक अपना पुरस्कार सम्मान विरोध जताते लौटा दें.

जंग के महानायकों को आजतक की श्रद्धांजलि, कल रात देखें ‘वंदे मातरम्’

देश का नंबर वन न्यूज चैनल आजतक अपने आपमें एक अनोखा और बड़ा शो ला रहा है, जिसका नाम है- वंदे मातरम्। इस शो में दास्तान होगी उन वीर जवानों की, उन महानायकों की, जिन्होंने दूसरे देशों के साथ युद्ध में अपनी जान की बाजी लगा दी, लेकिन देश की आन बान और शान पर कोई आंच नहीं आने दी। 'वंदे मातरम' का प्रीमियर 17 अगस्त को हो रहा है। इस शो के होस्ट हैं मशहूर अभिनेता कबीर बेदी और इस शो में अपनी आवाज दी है जाने माने वायस ओवर आर्टिस्ट और अभिनेता रजा मुराद ने।

वंदे मातरम् आपके सामने लाएगा युद्ध की वो सारी दास्तान। उन भारतीयों की वीरता की वो अनकही कहानियां, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी। ये शो दर्शकों को जंग की दास्तान की गहराई में ले जाएगा। कैसे दुश्मन देश की सेना से हमारे सैनिक लड़े, किस हाल में लड़े, कैसे मुश्किल लड़ाई जीती। किसने अपनी शहादत देकर देश की आन बचाई, कैसे हार के करीब पहुंचकर भी अपने खून से लिखी जीत की दास्तान। ये सारी दास्तान दर्शकों में न सिर्फ देशभक्ति की भावना का संचार करेंगी, बल्कि ये शो आपको उस दौर में ले जाएगा जब की ये दास्तान हैं।

वंदे मातरम् का पहला एपीसोड पाकिस्तान के खिलाफ 1971 की जंग पर आधारित है। पहले एपीसोड में आप देखेंगे 1971 की जंग की अनकही दास्तान और उस जंग की जमीनी हकीकत। कैसे हुई जंग की तैयारियां, कैसे बनी जंग की रणनीति, कैसे लड़े हमारे योद्धा ये सब युद्ध की वास्तविक तस्वीरों और बेहतरीन ग्राफिक्स के साथ आप देखेंगे। इस शो के लिए खास तौर पर स्टूडियो बनवाया गया है। वार रूम के सेट बनाए गए हैं। चमत्कृत कर देने वाले विजुअल इफेक्ट का इस्तेमाल किया गया है। बेहतरीन रिसर्च के साथ ये शो बना है, ताकि आप जंग की हकीकत से रूबरू हों, साथ ही इस शो का आनंद भी ले सकें।

इस शो की लांचिंग के मौके पर आजतक के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद ने कहा- 'वंदे मातरम् देशवासियों की देशभक्ति की भावना से प्रेरित है। ये शो दर्शकों को युद्ध की सच्चाइयों के नजदीक ले जाएगा। भारतीय टेलीविजन इतिहास का ये अपनी तरह का पहला शो होगा, जो जंग के तमाम राज से परदा उठाएगा। ये शो देश के उन जांबांज शहीदों के लिए श्रद्धांजलि होगा, जो देश के लिए लड़े और देश की रक्षा में देश पर कुर्बान हो गए।'

वंदे मातरम् 17 अगस्त शनिवार को आजतक पर रात 10 बजे प्रसारित होगा। एक घंटे का ये शो रविवार सुबह दस बजे और रात 10 बजे फिर से प्रसारित होगा।

भारत की पत्रकार गुंजन शर्मा जर्मनी के प्रतिष्ठित जर्मन डेवलपमेंट मीडिया अवार्ड से सम्मानित

भारत की पत्रकार गुंजन शर्मा को जर्मनी के प्रतिष्ठित जर्मन डेवलपमेंट मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया है. भारत के मानसिक अस्पतालों पर उनकी रिपोर्ट को एशिया की सर्वश्रेष्ठ रिपोर्ट चुना गया. जर्मन सरकार के लगभग 40 साल पुराने इस प्रतिष्ठित पुरस्कार को जीतने के बाद भारत की द वीक पत्रिका के लिए काम करने वाली गुंजन शर्मा ने कहा, "इस पुरस्कार से मुझे पत्रकार के तौर पर बहुत उत्साह मिला है कि मैं इस तरह के विषयों को उठाती रहूं, उनके बारे में और लिखूं. लोगों और सरकार को इन मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाऊं क्योंकि ये मुद्दे नजरअंदाज किए जाते हैं." वह अवार्ड हासिल करने जर्मन राजधानी बर्लिन में थीं.

शर्मा ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत के सरकारी मानसिक अस्पतालों में मरीजों के साथ कैसा व्यवहार होता है. उनकी रिपोर्ट के मुताबिक, "मरीजों को चार गुना पांच फीट की कोठरी में रहना पड़ता है. कई बार तो उन्हें अपने ही शरीर से निकला मैला खाने पर मजबूर होना पड़ता है." शर्मा का कहना है कि इस तरह के पुरस्कार "भारत और दूसरे देशों की सरकारों के लिए संवेदना पैदा करने के लिए" भी जरूरी है. भारत के मानसिक अस्पतालों की दिल दहला देने वाली हालत बयां करती रिपोर्ट में कहा गया है कि किस तरह रिश्तेदार ही अपने घर के मानसिक रोगियों को "ट्रक ड्राइवरों के हवाले कर देते हैं, ताकि उन्हें जंगलों में अकेला छोड़ दिया जाए. और ट्रक ड्राइवर महिला मरीजों को जंगल में छोड़ने से पहले उनका बलात्कार करते हैं."

पुरस्कार समारोह में जर्मनी के आर्थिक सहयोग और विकास मंत्री डिर्क नीबेल ने कहा, "कुछ देशों में पत्रकार सबसे खतरनाक काम कर रहे हैं. उनके काम पर प्रतिबंध लग रहे हैं और उन्हें ट्रेनिंग नहीं मिल रही है. इसके बाद भी वे अपने काम के प्रति कृतसंकल्प हैं." उन्होंने कहा कि जर्मन मीडिया अवार्ड "उनके इस काम की पहचान करता है" क्योंकि जर्मनी की विकास सहयोग नीति के तहत अभिव्यक्ति की आजादी बेहद जरूरी है. पुरस्कार में उन विषयों को तवज्जो दी जाती है, जिन पर आम तौर पर रिपोर्टिंग नहीं होती है.

1975 में शुरू हुए इस पुरस्कार के पैट्रन जर्मन राष्ट्रपति हैं. यह जर्मनी की आर्थिक सहयोग और विकास मंत्रालय बीएमजेड और डॉयचे वेले द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जाता है. भारत की शर्मा के अलावा अफ्रीका, लातिन अमेरिका, मध्य पूर्व, पूर्वी यूरोप, जर्मनी और लोगों की पसंद के आधार पर दुनिया भर के छह और पत्रकारों को मानवाधिकार और विकास की रिपोर्टिंग के लिए ये पुरस्कार दिए गए. उन्हें स्वतंत्र जूरी ने चुना और पुरस्कार के तौर पर उन्हें 2000 यूरो (करीब 1,60,000 रुपये) मिलेंगे. बर्लिन में पुरस्कार समारोह में डॉयचे वेले के महानिदेशक एरिक बेटरमन ने कहा, "जर्मनी के अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर होने के नाते हमें पता है कि कई देशों में पत्रकारों को किन हालात का सामना करना पड़ता है. इस बार हमने जो इंट्री देखी और सुनी, वे बेहद शानदार रहे."  ज्यादातर इंट्री प्रिंट मीडिया से थी, जबकि ऑनलाइन और रेडियो पत्रकारों ने भी अपनी रिपोर्टें भेजी थीं. गुंजन शर्मा के अलावा भारत की दूसरी रिपोर्टों ने भी आखिरी दौर तक जगह बनाई.

साभार- डायचेवेले

राजदीप और आशुतोष को छोड़ना मत दोस्तों, इन हिप्पोक्रेटों को नंगा करो, जंतर-मंतर चलो

सैकड़ों लोगों की छंटनी हो गई पर इन कथित महान संपादकों के मुंह से आवाज तक नहीं निकल रही. राजदीप सरदेसाई देश दुनिया के मसलों पर बड़े बेबाक तरीके से बोलते कहते लड़ते दिख जाते हैं पर जब उनके खुद के साथियों के साथ अन्याय हो रहा, खुद के घर में अत्याचार का मसला सामने आया है तो उनकी न्याय दिलाने, अन्याय के खिलाफ मुहिम चलाने वाला तेवर गायब हो चुका है. यही हाल आशुतोष का है.

वैसे तो ये चैनल पर, स्क्रीन पर चिल्लाते, दहाड़ते दिख जाते हैं पर अब ये कुछ नहीं बोल रहे. ये पत्रकार कल भी खुद को महान बताते रहेंगे. विभिन्न मंचों से भाषण देते मिलेंगे. नेताओं से सही-गलत के बारे में पूछते नजर आ जाएंगे. पर इनकी बोलती आज बंद है क्योंकि इनके ही अधीन काम करने वाले बड़ी बेदर्दी से निकाल दिए गए. वो भी एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों.

कायदे से अगर इन दोनों पत्रकारों में तनिक भी नैतिकता होती तो वे पहले खुद इस्तीफा देते, फिर छंटनी के शिकार लोगों का नेतृत्व करते हुए देशव्यापी आंदोलन खड़ा करते, उसके बाद अंबानी और रिलायंस के शोषण व लूट की दास्तान को मुद्दा बनाते और इस बहाने अंबानियों-रिलायंस के देश पर कसते दैत्याकार पंजे की पकड़ ढीली कराते और देश की जनता को राहत देते. पर ये लोग ऐसा कुछ नहीं करेंगे क्योंकि यह सब करने के लिए जिगर चाहिए, साहस चाहिए, नैतिक बल चाहिए.. जो लोग करोड़ों-अरबों के धंधे में लग गए, वो पत्रकार कहां के रह गए, वे तो सही मायने में न व्यापारी हुए और न पत्रकार. वे पत्रकारिता के एलियंस हैं जो किसी और ग्रह से आए लगते हैं.

ऐसे में छंटनी के शिकार सभी साथियों से अनुरोध है कि वे जंतर-मंतर पर धरने की तैयारी करें. मुद्दे को देशव्यापी बनाने की तैयारी करें. इस दौर के बड़े मुखौटों की असलियत को सामने लाएं. बिन लड़े कुछ नहीं मिलता. अगर कोई सहयोग चाहिए तो भड़ास तैयार है. जगह बुक कराने से लेकर, हाल बुक कराने से लेकर, झंडा-डंडा तैयार कराने से लेकर, भीड़ जुटाने से लेकर… कोई भी काम करने के लिए भड़ास तैयार है, बस आपमें से कुछ साथियों को पहल करनी चाहिए और आपस में एकजुटता की शुरुआत करनी चाहिए.

इसके लिए सबसे आसान तरीका है एक मेल आईडी का क्रिएट किया जाना और उस मेल आईडी से सभी छंटनी के शिकार कर्मियों को जोड़ना. हाल की ही बात है जब आउटुलक में तीन-तीन मैग्जीन बंद कर लोगों को सड़क पर ला दिया गया तो कई साथी कोर्ट गए और स्टे ले आए. आखिरकार मैनेजमेंट को घुटने के बल बैठना पड़ा और कर्मियों के साथ बराबरी पर बात कर सम्मानजनक हल निकालने को बाध्य होना पड़ा.

भड़ास से संपर्क bhadas4media@gmail.com के जरिए कर सकते हैं. भड़ास के एडिटर यशवंत से संपर्क 09999330099 के जरिए कर सकते हैं.


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अभी अभी मिली एक सूचना के मुताबिक आईबीएन7 के मुंबई ब्यूरो से करीब 24 लोगों को निकाला गया है… इंटरटेनमेंट ब्यूरो से भी लोगों को निकाला गया है… यह सूचना भड़ास के पास एक मेल के जरिए पहुंची है. इधर, नोएडा के आईबीएन7 आफिस के बाहर चाय की दुकान पर सैकड़ों पत्रकार जमा हैं. कई लोग नम आंखों के साथ अपने घर चले गए. पर कई लोग यहीं जमा हैं. इनके भीतर काफी आक्रोश है.

आज आईबीएन7 नोएडा में बड़ी संख्या में लोगों की छंटनी की गई है. पूरे ग्रुप से बताया जाता है कि 320 लोग निकाले गए हैं. आज आईबीएन7 पर डंके की चोट पर आशुतोष इस मुद्दे पर कतई नहीं बात करते नजर आएंगे. वे देश दुनिया के दूसरे मुद्दों पर डंका पीटते और डकार लेते तो नजर आएंगे पर अपने साथियों के दुख-दर्द के मुद्दे पर भूल से भी एक वाक्य नहीं बोलेंगे.

राजदीप सरदेसाई जो बहुत बड़े डेमोक्रेटिक और बहुत बड़े पत्रकार माने जाते हैं, आज भी मजे में खाना खाएंगे और चैनल पर बड़े बड़ों से गपियाते नजर आएंगे. पर उनके साथ लंबे समय से काम कर रहे सैकड़ों लोग अचानक सड़क पर ला दिए गए, इस मुद्दे पर वह कोई बयान नहीं जारी करेंगे, कोई वक्तव्य नहीं देंगे, कोई खबर नहीं चलाएंगे.

इस छंटनी के पीछे की रामकहानी अगर आपको पता हो तो भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचाइए, मेल भेजने वालों का नाम गोपनीय रखा जाएगा.

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बारह वीडियो एडिटर्स, बाइस कैमरामैन, पूरा ग्राफिक, एडिटोरियल से बाइस… सैकड़ों हुए बेरोजगार

प्रिय यशवंत जी… और वो दिन आ ही गया जिसका इंतजार पूरे मीडिया हाउस को था. सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 से करीब ढाई सौ लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. सैकड़ों लोगों को रातों रात सड़क पर ला दिया गया. 12 वीडियो एडिटर्स, दस कैमरामैन, 22 एडिटोरियल स्टाफ, पूरा ग्राफिक डिपार्टमेंट, इंटरटेनमेंट, नेशनल लेवल के रिपोर्टर, पूरा एसाइनमेंट… ये सब छंटनी के शिकार हुए हैं..

लेकिन एक बात समझ नहीं आई कि अगर कंपनी को कास्ट कटिंग ही करनी थी तो छोटों को निकाल कर क्या मिला उनको? बड़ी सेलरी वाले तो आज भी वहीं पर हैं. कुछ समझ में नहीं आया. जरा पड़ताल करिए…

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


मूल खबर…

सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों में कल से शुरू होगी 30 प्रतिशत छंटनी

रिलायंस के दबाव में टीवी18 के कई चैनलों से 320 लोगों की छंटनी

छोटे सैन्य अफसरों को चार और बड़ों को चौदह बोतल दारू क्यों? सेना में सस्ती शराब के खिलाफ पीआईएल

आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने सैन्य बलों तथा बीएसएफ, सीआरपीएफ, आईटीबीपी जैसे अर्ध-सैनिक बलों में काफी सस्ती दरों पर दी जा रही शराब के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में पीआईएल दाखिल किया है.   याचिकाकर्ता के अनुसार जहाँ वे इन लोगों की मुश्किल परिस्थितियों और देश के प्रति इनके योगदान के मद्देनज़र इनके लिए खाद्य सामग्री, घरेलू सामानों आदि में छूट का स्वागत करते हैं वहीँ सरकारी टैक्स माफ करके सस्ती शराब दिये जाने का प्रबल विरोध करते हैं क्योंकि एक तो यह सरकारी धन का दुरुपयोग है, ऊपर से इसके कोई निश्चित कारण नहीं दिखते और इसके कई दुष्परिणाम अलग से दिख जाते हैं.

अमिताभ और नूतन ने पद के आधार पर सस्ती शराब दिये जाने पर भी प्रश्न उठाये हैं जहाँ सेना में अधीनस्थ अधिकारियों को महीने में 4 बोतल और वरिष्ठ अधिकारियों को पद के हिसाब से 10 या 14 बोतल मिलते हैं. उनके अनुसार इस प्रकार का भेदभावपूर्ण वितरण यह साबित कर देता है कि सस्ती शराब  किसी जरूरत के हिसाब से नहीं है बल्कि मात्र एक अतिरिक्त अवांछनीय लाभ है. अतः इन दोनों ने एक उच्च-स्तरीय समिति द्वारा इस पूरे मामले का नए सिरे से अध्ययन कर इस अध्ययन के आधार पर सभी अनावश्यक सस्ती शराब का वितरण रोके जाने की प्रार्थना की है.

रिलायंस के दबाव में टीवी18 के कई चैनलों से 320 लोगों की छंटनी

अगर आप आज शाम नोएडा स्थित फिल्म सिटी जाएंगे तो आपको वहां हर एक की जुबान पर आईबीएन7 में चल रही छंटनी की चर्चा सुनने को मिलेगी. आज का दिन रोज के दिन की तरह नहीं था. बेहद मनहूस दिन. लोग नौकरियां करने पहुंचे पर उन्हें एचआर ने बुलाकर लिफाफा पकड़ाया और बाहर जाने के लिए कह दिया गया. आईबीएन7 से दर्जनों लोग निकाले गए हैं जिनमें कुछ वरिष्ठ और कई सारे कनिष्ठ हैं.

बात सिर्फ आईबीएन7 तक  ही सीमित नहीं है. टीवी18 के सारे चैनलों पर छंटनी की गाज गिराई गई है. सीएनएन-आईबीएन, सीएनबीसी-आवाज, कलर्स समेत सारे चैनलों पर गाज गिराई गई है. सब मिलाकर 320 लोग निकाले गए हैं या निकाल दिए जाएंगे. इसके बाद भी सौ लोगों की एक लिस्ट तैयार हो रही है. इस बड़ी छंटनी के खिलाफ कहीं से कोई विरोध की आवाज नहीं उठ रही. मुकेश अंबानी के नेतृत्व में नेटवर्क18 के आने के बाद राघव बहल और राजदीप सरदेसाई जैसे कम शेयर वाले मालिक भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं. मुकेश अंबानी के रिलायंस वाले मीडिया मैनेजर अब इन चैनलों को चलाने लगे हैं.

बड़े बड़े क्रांतिकारी, वामपंथी, रंगकर्मी, नक्सलवादी, घनघोर चिंतक टाइप शूरमा इन चैनलों में कार्य कर रहे हैं पर वे अपने आसपास हो रहे इस उत्पीड़न, कत्लेआम, छंटनी, गुंडागर्दी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल रहे क्योंकि अंततः उनका सारा चिंतन, उनकी सारी क्रांतिकारिता उनके पापी पेट के आगे पानी भरने चली जाती है. वे सब गजब की चुप्पी साधे हैं. इनके पास एक शब्द भी नहीं है बोलने के लिए. ये न तो फेसबुक पर इस संबंध में कोई बात लिख पाएंगे और न ही अपने आफिस में इस पर कोई बात बोल पाएंगे.

लेकिन यही कथित क्रांतिकारी आपको अन्य मसलों पर, जीवन, देश, दुनिया को लेकर अच्छे-बुरे के बारे में खुलकर चर्चा करते, प्रवचन देते दिख जाएंगे. पर अब जब वाकई इनके सामने हो रहे अच्छे-बुरे में से किसी एक का साथ, पक्ष लेने का वक्त आया है तो ये नपुंसक चुप्पी, शिखंडी कायरता दिखाते हुए दाएं बाएं से आंख बचाकर निकल जाएंगे. फिलहाल आज टीवी न्यूज इंडस्ट्री में कोहराम मचा हुआ है. बड़े पैमाने पर हो रही इस छंटनी से पत्रकार समुदाय दहशत में है.

मूल खबर…

सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों में कल से शुरू होगी 30 प्रतिशत छंटनी

समर, स्नेहा के बाद अब अनस का भी एफबी एकाउंट बारह घंटों के लिए ब्लॉक

Syed Mohammad Altamash Jalal : भास्कर.काम की पोर्न पत्रकारिता के खिलाफ लिखने लड़ने वालों में से एक Mohammad Anas को भी भास्कर वालों ने फेसबुक पर रिपोर्ट करके, शिकायत करके बारह घंटों के लिए ब्लाक करा दिया है. हिट्स की आड़ में पोर्न परोसने वाले वेब पोर्टल कम पोर्न साईट भास्कर डाट काम के खिलाफ जंग की शुरुआत इलाहाबाद महाकुम्भ से करने वाले युवा पत्रकार मोहम्मद अनस को भास्कर ने डर की वजह से बारह घंटे के लिए कहीं भी कमेन्ट, लाइक और शेयर करने पर बैन लगवा दिया है.

अनस और समर जैसे साथी लगातार पत्रकारिता के नाम पर अश्लीलता फैलाने वाले इस संस्थान के खिलाफ लामबंद हैं. आप सब से निवेदन है कि इस लड़ाई में आगे आएं ताकि पत्रकारिता की सुचिता और उसकी गंभीरता को बचाया जा सके. भास्कर.काम जो कर रहा है वह जर्नलिज्म नहीं बल्कि पोर्नाजिम है…

सैय्यद मोहम्मद अल्तमश जलाल के फेसबुक वॉल से.

दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी को नौ सीटें मिलेंगी

दिल्ली : इंडिया टुडे एवं सी वोटर के सर्वे में देश में आने वाले विधानसभा चुनावों पर भी सर्वे किया गया है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान में साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। सर्वे के अनुसार इन चुनावों में कांग्रेस विरोधी लहर का सीधा फायदा भाजपा को ही मिल रहा है।

मध्यप्रदेश में भाजपा को २१ सीटें भले कम मिलेंगी लेकिन १२२ सीटें पाकर शिवराज सरकार जीत तय दिख रही है। राज्य में विधानसभा की कुल २३० सीटें हैं। साल २००८ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ७१ सीटें मिली थीं। इस बार उसकी सीटें बढ़कर ९२ हो जाएंगी लेकिन बहुमत से वह पीछे ही रहेगी।

राजधानी दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कांग्रेस-भाजपा का खेल बिगाड़ती दिखाई दे रही है। ७० सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस-भाजपा दोनों को ही २८-२८ सीटें मिलने की संभावना है। कांग्रेस को १५ सीटों का नुकसान हो रहा है। केजरीवाल की पार्टी के खाते में ९ सीटें जाएंगी। दिल्ली की टक्कर में भाजपा को ज्यादा फायदा नहीं मिल रहा है और केजरीवाल की पार्टी उसके वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो रही है। छत्तीसगढ़ में जनता का विश्वास रमन सरकार पर कायम है। २००८ के मुकाबले ५ सीटों के नुकसान के साथ भाजपा को ४५ सीटें मिलने की संभावना है। कांग्रेस को ४ सीटों के फायदे के साथ ४२ सीटें मिलेंगी। सर्वे के अनुसार मुताबिक राजस्थान में वसुंधरा राजे की वापसी हो रही है। कांग्रेस १७ सीटों के नुकसान के साथ ७९ पर सिमट रही है। और भाजपा १९ सीटों के फायदे के साथ ९७ की संख्या छूनेजा रही है। राज्य विधानसभा में कुल सीटें २०० हैं। बसपा को इस बार ५ और अन्य को १९ सीटें मिलने की संभावना है।

लोकसभा चुनाव हुए तो यूपीए और एनडीए दोनों की हालत पतली, तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की संभावना

दिल्ली । इंडिया टुडे एवं सी वोटर के सर्वे में कोई भी गठबंधन स्पष्ट बहुमत के पास नहीं पहुंच रहा है। जिसके कारण लोकसभा चुनाव के बाद राजनैतिक अस्थिरता सबसे ज्यादा रहेगी। अगस्त माह में हुए सर्वे के अनुसार यूपीए गठबंधन को २०१३ में यदि लोकसभा के चुनाव होते हैं तो १३७ सीटें मिलने का अनुमान है।

वहीं तीसरे मोर्चे के दलों को २५१ मिलने की संभावना सामने आई है। इस सर्वेक्षण में भारत की ५४२ लोकसभा सीटों को शामिल किया गया था। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस तथा भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहीं क्षेत्रीय राजनैतिक दलों की स्थिति बेहतर होने के कारण केंद्र में सरकार बनाने के लिए चुनाव परिणामों के बाद नये गठबंधन बनेंगे। उनमें क्षेत्रीय दलों की सौदेबाजी से ही केंद्र में सरकार का गठन संभव होगा।

अगर आज चुनाव हो जाएं तो जनादेश क्या होगा यह जानकार आपको आश्चर्य हो सकता है। यदि अभी चुनाव कराया जाए तो यूपीए और एनडीए गठबंधन २०० का आंकड़ा भी पार नहीं कर पा रहे हैं। थर्ड फ्रंट की सरकार बनने के ज्यादा आसार हैं। आश्चर्य है कि यूपीए के लिए नकारात्मक स्थिति होने के बावजूद एनडीए को लाभ नहीं मिल रहा है। अगस्त २०१३ में आम चुनाव होने पर मोदी की अगुवाई में भी एनडीए को कामयाबी मिलती दिखाई नहीं दे रही है। सर्वे के अनुसार यूपीए-कांग्रेस विरोधी लहर का फायदा अन्य क्षेत्रीय दलो को मिल रहा है जिसके खाते में २५१ सीटें जाएंगी।

२००९ के आम चुनाव में यूपीए को २५९ सीटें मिली थीं लेकिन अगस्त २०१३ में लोकसभा चुनाव हों तो यूपीए की यह संख्या घटकर १३७ सीटें पर आ जाएगी। यूपीए को १२२ सीटों का भारी नुकसान होता दिख है। सर्वे के अनुसार यूपीए को नुकसान होने से एनडीए को भी फायदा नहीं मिल रहा है। एनडीए को १५५ सीटें मिलने की संभावना है जबकि २००९ के चुनाव में उसे १५९ सीटें मिली थीं। अब जेडीयू एनडीए का हिस्सा नहीं है जो कि एक बड़ा कारण है।
सर्वे के अनुसार अभी के हालात में तीसरे मोर्चे को सफलता मिलेगी। इसमें, क्षेत्रीय दलों को २५१ सीटें मिलने का अनुमान है। ऐसा होने पर सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका अहम होगी।
 

राम बहादुर राय ला रहे हैं पाक्षिक पत्रिका ‘यथावत’, कई जुड़े, लोकार्पण बीस को

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय फिर एक पत्रिका से जुड़ गए हैं. नाम है 'यथावत'. यह पत्रिका पाक्षिक होगी. यथावत का लोकार्पण 20 अगस्त को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में होगा. लोकार्पण के मौके पर नामवर सिंह, विनोद राय, अच्युतानंद मिश्र आदि मौजूद रहेंगे. यथावत पत्रिका के असली मालिक हैं आरके सिन्हा जो एसआईएस सिक्योरिटी चलाते हैं.

इस मैग्जीन में संपादक के रूप में कार्य करेंगे वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय. इसके पहले रामबहादुर राय प्रथम प्रवक्ता के संपादक थे. इस मैग्जीन का आफिस आईटीओ पर है. यथावत मैग्जीन की टीम में संजीव कुमार, ब्रजेश झा, मीतू, संदीप द्विवेदी, प्रदीप सिंह आदि शामिल हैं.

अजमेर के पत्रकार सुरेंद्र जोशी और संजय कटारिया सम्‍मानित

अजमरे के केकड़ी में पिछले दिनों हुए सांप्रदायिक तनाव को प्रशासन के साथ मिलकर उसे वापस सौहार्द की दिशा देने में अपना अहम योगदान निभाने वाले निर्भीक पत्रकार सुरेन्द्र जोशी को जिला स्तर पर सम्मनित किया गया. इस बारे में प्रकाश शर्मा फेसबुक पर लिखते हैं-

''सुरेन्द्र सर से इलाके के विधायक महोदय को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। जो काम एमएलए नहीं कर पाया वो आपने किया उसके लिए ये सम्मान तो क्या और सम्मान भी कम हैं। नेताजी आप से नसीहत ले सकें तो अच्छा हो। आग लगाना आसान होता है बुझाना मुश्किल ,सुरेन्द्र जी ने नेतागिरी की आग में सुलगते शहर को बचाने का जो काम किया उसके लिए प्रशंसा के लिए शब्द नहीं।''

वरिष्‍ठ पत्रकार संजय कटारिया सम्‍मानित : दैनिक नवज्‍योति के वरिष्‍ठ पत्रकार संजय कटारिया को पत्रकारिता के क्षैत्र में उच्‍च कोटि की कर्तव्‍य परायणता के लिये जिला परिषद में आयोजित समारोह में जिला प्रमुख सुशील कंवर पलाडा द्वारा सम्‍मानित किया गया.

लखनऊ प्रेस क्लब, चाइना बाजार, मुर्गा गली, महफिल और पत्रकारों की पिटाई

लखनऊ में मुर्गा गली के नाम से मशहूर हो चुके उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब के आस पास चाइना बाजार गेट इलाके में अराजकता चरम सीमा पर है। इस अराजकता का ताजा शिकार बने हैं वरिष्ठ पत्रकार व प्रेस क्लब के पूर्व सचिव सुरेश बहादुर सिंह। परसों रात कुछ अराजक तत्वों ने सुरेश बहादुर सिंह को प्रेस क्लब के गेट के बाहर बुरी तरह से मारा पीटा। हमले में सुरेश बहादुर को गंभीर चोटे आयी हैं। उनके सिर पर कई टांके लगे हैं।  शराबियों के जमघट के चलते यहां आए दिन हिंसक वारदाते हो रही हैं। प्रेस क्लब में आने वाले कई वरिष्ठ पत्रकार भी इन घटनाओं की चपेट में आ चुके हैं।

बुधवार की रात प्रेस क्लब के गेट के बाहर नान वेज का होटल चलाने वाले उत्तम सोनकर के होटल पर कुछ छात्रों ने नान वेज के पैसे को लेकर हंगामा किया। मौके पर पहुंची पुलिस ने छात्रों की शिकायत पर उत्तम सोनकर को जिप्सी में बैठा लिया। ठीक उसी समय रात 10.30 बजे सुरेश बहादुर प्रेस क्लब के गेट से बाहर निकल रहे थे। उनके साथ सोनभद्र के पत्रकार सुल्तान शहरयार खान भी थे। सुरेश बहादुर ने पुलिस से उत्तम को थाने ले जाने को लेकर कड़ा एतराज जताया और दोनो पक्षों पर समान कारवाई की मांग की। सुरेश बहादुर के एतराज के बाद भी पुलिस उत्तम सोनकर को लेकर चली गयी और इसके बाद वहां मौजूद छात्रों व मुफ्तखोरों के गुट ने सुरेश बहादुर पर हमला बोल दिया। हमले में सुरेश बाहदुर को सर पर चोटे आयीं और गिर जाने के बाद उन पर लातों, जूतों से प्रहार किया गया।

हैरतंगेज बाद यह है कि उपर प्रेस क्लब की महफिल में मौजूद पत्रकार पीटीआई के राकेश पांडे, यूएनआई के पूर्व प्रमुख सुरेंद्र दुबे, ठेकेदार संजीव रतन, पत्रकार घनश्याम दुबे, राज बहादुर आदि सूचना दिए जाने के बाद भी मौके पर सुरेश बहादुर सिंह को बचाने नही पहुंचे। कुछ पत्रकार तो लैट्रिन मे घुस गए। बाद में राकेश पांडे, सुरेंद्र दुबे, संजीव रतन, सुल्तान शहरयार आदि प्रेस क्लब के चपरासियों के साथ बलरामपुर अस्पताल सुरेश बहादुर को लेकर पहुंचे जहां उनका इलाज हुआ। इस मामले में सुरेश बहादुर की ओर से अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गयी है। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले इसी होटल पर मारपीट में हस्तक्षेप करने पर पीटीआई के वरिष्ठ संवाददाता अभिषेक बाजपेई की भी पुलिस ने पिटाई कर दी थी। बाद मे आरोपी पुलिस वालों को लाइनहाजिर करने व माफी मांगने पर मामला शांत हुआ था।

मूल खबर…

आजादी की पूर्व संध्या पर लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह बुरी तरह पिटे

कुमार समीर सिंह नेशनल दुनिया दिल्ली के मेट्रो प्रभारी बने, ललित मोहन की नई पारी

वरिष्‍ठ पत्रकार कुमार समीर सिंह ने दिल्‍ली में नई दुनिया के साथ अपनी नई पारी शुरू की है. उन्‍हें अखबार का मेट्रो प्रभारी बनाया गया है. इसके पहले वे दैनिक भास्‍कर, यूपी के साथ समाचार संपादक के रूप में जुड़े हुए थे. वे पिछले 23 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. फ्रीलांसिंग से करियर की शुरुआत करने वाले कुमार समीर जाने-माने पत्रकार आलोक तोमर के साथ करेंट न्‍यूज में काम कर चुके हैं.

राष्‍ट्रीय सहारा में लगभग 16 साल तक अपनी सेवा देने के बाद कुमार समीर पॉजिटिव मीडिया के चैनलों से जुड़ गए थे. यहां पर उन्‍हें नेशनल इनपुट हेड बनाया गया था. पॉजिटिव मीडिया से इस्‍तीफा देने के बाद वे दैनिक भास्‍कर, यूपी के साथ अपनी नई पारी शुरू की थी.

अमर उजाला, मुगलसराय से खबर है कि ललित मोहन पांडेय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर रिपोर्टर की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे. उन्‍होंने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया है. वे अब अच्‍छी सैलरी के साथ दूसरे विभाग में नौकरी करने लगे हैं.

दैनिक नवभारत मुंबई के मीडियाकर्मियों को तीन महीने से वेतन नहीं मिला, भगदड़

मुंबई। मुंबई से प्रकाशित हिंदी दैनिक नवभारत के कर्मचारी इन दिनों बेहद परेशान है। महगाई के इस दौर में उन्हें तीन तीन महीने बाद वेतन मिल रहा है। वेतन मिलने में देरी की शुरुवात एक डेढ़ महीने से बढ़ कर अब तीन महीने तक पहुंच गयी है। इसकी वजह से पिछले कुछ महीनो में मार्केटिंग और सम्पादकीय विभाग के करीब 10 लोग नौकरी छोड़ चुके हैं।

नवभारत के एज़ीऍम रहे मनीष राणे के साथ मार्केटिंग के 6 लोग एक साथ नवभारत छोड़ कर मराठी अख़बार प्रहार में चले गए। यहाँ काम करने वालों की माने तो इस अख़बार को कंपनी के तीन चार लोग दोनों हाथों से लूट रहे हैं जिसकी वजह से यह आर्थिक संकट पैदा हुआ है। इसका असर अख़बार के सर्कुलेशन पर भी पड़ रहा है। मुंबई शहर में दिन प्रतिदिन यह अख़बार गायब होता जा रहा है।

सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 न्यूज चैनलों में कल से शुरू होगी 30 प्रतिशत छंटनी

कल से एक बड़ी छंटनी शुरू हो रही है. उन दो न्यूज चैनलों में जिसके मालिक मुकेश अंबानी हैं. जिसके एक अन्य मालिक राघव बहल हैं. जिसके एक अन्य मालिक राजदीप सरदेसाई हैं. इन दो न्यूज चैनलों के नाम हैं, सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7. इन दोनों न्यूज चैनलों से करीब तीस प्रतिशत स्टाफ की छंटनी करने के लिए लिस्ट तैयार हो चुकी है. लिफाफा देना और खुलना कल से शुरू हो जाएगा.

इन लिफाफों में रखी होगी कंपनी से छंटनी कर दिए जाने की सूचना. देश-दुनिया में होने वाले अन्याय की खबर लेने वाले पत्रकार, मीडियाकर्मी अपने साथ होते अन्याय को चुपचाप सह लेंगे और पतली गली से निकल लेंगे. राजदीप सरदेसाई, आशुतोष जैसे पत्रकार भी कुछ नहीं बोलेंगे, अपनी आंखों के सामने अपने सहकर्मियों को छंटनी के नाम पर निकाले जाते देखकर. सैकड़ों की संख्या में स्किल्ड जर्नलिस्ट फिर दर-दर भटकने, इनका-उनका दरवाजा खटखटाने और नौकरी तलाशने को मजबूर होंगे.

ऐसे में अचानक दूसरे न्यूज चैनलों के संपादकों के भाव उंचे हो जाएंगे. वे सबको दिलासा देंगे, भविष्य के लिए नौकरी का वादा करेंगे. हो सकता है, वे कुछेक को रख भी लें, हालांकि इसके चांसेज कम इसलिए है क्योंकि हर जगह प्रबंधन 'कम पैसा खर्च करो, कम से कम स्टाफ रखो' का दबाव डाले रहता है. कई काबिल लोग बेहद कम सेलरी में कहीं भी ज्वाइन करने के लिए तैयार हो जाएंगे. पर इस सबको लेकर कहीं कोई शोर, आवाज, चर्चा की गुंजाइश नहीं क्योंकि ये पत्रकारिता का मामला नहीं बल्कि अब पापी पेट का मामला हो गया है, ईएमआई देते रहने के लिए पैसा पाते रहने को कुछ भी करने के लिए तैयार रहने का मामला हो गया है.

सूत्रों का कहना है कि दोनों न्यूज चैनलों से उन लोगों को हटाया जा रहा है जो पिछले एक साल के दौरान नियुक्त किए गए हैं. साथ ही कई वरिष्ठों को भी निकाला जा रहा है. भड़ास4मीडिया के पास दोनों न्यूज चैनलों से निकाले जाने वाले लोगों की लिस्ट पहुंच चुकी है. पर उसका प्रकाशन इसलिए नहीं किया जा रहा है क्योंकि नौकरी से निकाले जाने से पहला नाम निकाल देना नैतिक आधार पर ठीक नहीं है.

आइए हम आप, उन मीडियाकर्मियों के लिए दुआ करें जो कल से अचानक सड़क पर आना शुरू होंगे और उनकी ज़िंदगी में जद्दोजहद, आशंकाओं, तनावों, असुरक्षाओं का एक नया दौर, एक नया अध्याय शुरू होगा. वो मजबूर होंगे अपनी लड़ाई न लड़ पाने के लिए… वे मजबूर होंगे खुद के साथ हुए अन्याय के बारे में किसी और से न बता पाने के लिए… वे मजबूर होंगे अपने परिजनों का पेट पालने के लिए किसी भी स्तर पर झुक जाने के लिए… और, इस तरह से वे मजबूर होंगे खबरों का सौदा, खबरों का धंधा करने वालों का साथ देने के लिए…

इस छंटनी के पीछे की रामकहानी अगर आपको पता हो तो भड़ास को जरूर बताइए, ताकि सबको बताया जा सके. मेल करें bhadas4media@gmail.com पर.

यशवंत

एडिटर

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

डासना जेल में हुआ ‘जानेमन जेल’ किताब का विमोचन, यशवंत ने गाया मंच से भजन

Yashwant Singh : 'जानेमन जेल' का आज डासना जेल में विमोचन हो गया.. लोकार्पण के बाद जब मुझे कुछ वाक्य बोलने के लिए कहा गया तो मंच से मैंने साढ़े चार हजार कैदियों को गा कर सुनाया..''ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी.. सज धज कर जिस दिन मौत की शहजादी आएगी.. ''

जेल के ढेर सारे पुराने परिचित कैदियों-बंदियों से मिला, उन्हें गले लगाया… 'जानेमन जेल' किताब देखकर सब इसकी एक प्रति मांग रहे थे पर सीमित कापियां ले जाने के कारण जितना दे सका, सबको दिया.. और, ताकीद कर दी कि सब मिल बांट कर पढ़ना और यहां वैसे ही मस्त रहना, जैसे मैं रहा…

सच में, मुझे जेल से प्यार हो गया है… अब तक दो बार जेल के उन दर्जनों कैदियों को कई मित्रों के आर्थिक सपोर्ट की वजह से छुड़वा चुका हूं, जो जुर्माना न भरने की वजह से छोटे-मोटे मामलों में सजा काट रहे थे और जिनका चाल-चलन व बैकग्राउंड सही था.. जेल के भीतर बंद कई सज्जन पुरुषों से गाहे-बगाहे मिलने जाता रहता हूं और उनकी खुशी खैर पूछ कर उनके परिजनों तक पहुंचाता रहता हूं…

लगता है, जैसे जमाने का ग़म मेरा है और मेरा तो कभी कोई ग़म ही नहीं रहा…

डासना जेल के भीतर आज पंद्रह अगस्त के दिन आयोजित समारोह के दौरान 'जानेमन जेल' किताब की लांचिंग के मौके पर इस बुक के प्रकाशक Shailesh Bharatwasi भी मौजूद थे. उनके लिए जेल के इतना भीतर जाना और इतने सारे कैदियों-बंदियों की दुनिया को देखना पहला व अनोखा अनुभव रहा…

जेल की दुनिया में जी रहे हजारों लोगों के चेहरों व दिलों में ढांढस-सुख-साहस का संचार करने वाले जेल अधीक्षक डा. वीरेश राज शर्मा Viresh Raj का दिल से आभार धन्यवाद साधुवाद…डा. वीरेश ने सिस्टम व तंत्र की सीमाओं-बाध्यताओं के बीच अपने निजी सोच व प्रयासों से जेल में आम कैदियों-बंदियों के लिए जो प्रयोग किए हैं, जो कनसर्न दिखाया है, वह तारीफ के काबिल है.

डासना जेल में 'जानेमन जेल' के लोकार्पण की तस्वीरें उपलब्ध होते ही जल्द आप सभी के समक्ष शेयर की जाएंगी.

'जानेमन जेल' किताब को पढ़ने के दौरान आप जेल जीवन के सुख-दुख को संपूर्णता में समझ पाएंगे. 'जानेमन जेल' किताब की जिन-जिन लोगों ने अग्रिम बुकिंग करा ली है, उनके यहां किताब भेजे जाने का सिलसिला कल से शुरू हो जाएगा. अगर आपने बुक नहीं कराया है तो अभी या कल या परसों, जब वक्त मिले, बुक करा सकते हैं. प्री-बुकिंग बेहद आसान है और सस्ता भी. इसेक लिए प्रकाशक की तरफ से भेजी गई जानकारी नीचे शेयर कर रहा हूं.

जय हो आप सभी की.

-यशवंत

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यशवंत की जेल डायरी 'जानेमन जेल' की अग्रिम बुकिंग चल रही है. प्रीबुकिंग में अधिकतम छूट के साथ मिलेगी यशवंत द्वारा हस्ताक्षरित प्रति. प्रीबुकिंग में आपको तुरंत कोई पैसा नहीं देना होता. किताब जब घर पहुंच जाएगी तभी भुगतान करना है. प्री-बुकिंग यानि बिना पैसा दिए अग्रिम बुकिंग कराने के लिए नीचे दिए गए लिंक में से किसी एक पर क्लिक करें. सबसे सस्ता इस वक्त होमशाप18 की तरफ से दिया जा रहा आफर है. सिर्फ 68 रुपये में, डिलीवरी चार्ज समेत. अग्रिम बुकिंग के दौरान जब पेमेंट का आप्शन आए तब आप सिर्फ प्रीबुकिंग पर क्लिक कर दें, पेमेंट बिलकुल ना करें. किताब आपके पते पर पहुंच जाएगी, तभी पैसा देना है.

बुकिंग के लिए पांच विकल्प इस प्रकार हैं..

  1. Homeshop18 से खरीदें : मात्र रु 68 में, पेमेंट किताब मिलने पर करें : डिलीवरी चार्ज शून्य : खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यहां क्लिक करें..  http://tinyurl.com/l24qs3k
  2. Infibeam से खरीदें : मात्र रु 67 में, पेमेंट किताब मिलने पर करें : डिलीवरी चार्ज अलग से : खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यहां क्लिक करें…   http://tinyurl.com/o593v9n
  3. Snapdeal से खरीदें : मात्र रु 65 में, पैसा किताब मिलने पर दें : डिलीवरी चार्ज अलग से : खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यहां क्लिक करें…  http://tinyurl.com/lkxbjkd
  4. BookAdda से खरीदें : मात्र रु 90 में, पैसा किताब मिलने पर दें : डिलीवरी चार्ज अलग से : खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यहां क्लिक करें…  http://tinyurl.com/osavp99
  5. Rediff Books से खरीदें : मात्र रु 91 में, पैसा किताब मिलने पर दें : डिलीवरी चार्ज अलग से : खरीदने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए यहां क्लिक करें…  http://tinyurl.com/qjta9hq

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((अगर बुक करने में परेशानी आए तो अपना पता, पिन कोड एवं मोबाइल नंबर सहित, sampadak@hindyugm.com पर ईमेल से भेजें या 9873734046 पर SMS करें.))


भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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Yashwant Singh Jail

आजादी की पूर्व संध्या पर लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह बुरी तरह पिटे

लखनऊ से खबर है कि वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह को कई लोगों ने प्रेस क्लब के ठीक बाहर काफी पीटा. उन्हें सिर में कई टांके आए हैं. उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है और अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी गई है. कई पत्रकारों ने सुरेश बहादुर के यहां जाकर उनकी खैर खबर पूछी. बताया जाता है कि प्रेस क्लब में बैठकी के बाद कहीं जाने के लिए सुरेश बहादुर जब क्लब गेट से बाहर निकले तो वहां चिकन-कबाब आदि की दुकानों के सामने कई लड़कों में विवाद हो रहा था.

बताया जाता है कि ये विवाद खाने पीने को लेकर चल रहा था. इसी दौरान सुरेश बहादुर ने कुछ आपत्ति की तो लड़के उन पर टूट पड़े. उन्हें नाली में गिरा दिया और सिर पर राड से मारा. पूरा सिर फट गया है और शरीर में कई जगह बुरी तरह चोट आई है. इस घटना को लेकर लखनऊ के पत्रकारों में जितने मुंह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं.

क्लब गेट के बाहर जब सुरेश बहादुर सिंह की पिटाई चल रही थी, उस दौरान क्लब के अंदर कई पत्रकार जमे हुए थे. उन्हें जब इस घटना की खबर की गई तो वो बजाय बचाने के लिए नीचे आने को, वहीं बैठे रहे. जब लोग नीचे आए तब तक हमलावर भाग चुके थे और सारा घटनाक्रम घटित हो चुका था.  सुरेश बहादुर सिंह प्रेस क्लब से लंबे समय से जुड़े हुए हैं और उन्हें आसपास सब जानते हैं. पर इतना सब कुछ होने के दौरान कोई उन्हें बचाने नहीं आया. बताया जाता है कि पिटाई करने वाले युवक छात्र थे.

बीएचयू में राष्ट्र ध्वज के साथ मजाक, शूट कर रहे कैमरापर्सन के साथ बदतमीजी

Santosh Ojha : बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के मल्टीपरपज मैदान में आज वो शर्मनाक घटना घटी जिससे देख किसी भी राष्ट्र भक्त का दिल तार तार हो जाये. अपनी अलग पहचान रखने वाली BHU शिक्षा के क्षेत्र में अपना भले ही खास महत्त्व रखता हो लेकिन आज के झंडातोलन के दौरान उसने देश की शान में बड़ा दाग लगाया. एक बार नहीं दो बार नहीं बल्कि तीन बार ध्वज का अपमान सबने देखा.

पहली बार ध्वज के फहराने के दौरान ध्वज जमीन पर आ गिरा. बात यही नहीं रुकी. एक बार फिर जैसे तैसे ध्वज को फहराया गया लेकिन वो भी उलटा. शर्मनाक तो यह भी रहा कि यह सब रिकार्ड कर रहे कैमरापर्सन अभिषेक के साथ धक्का-मुक्की कर शाट बनाने से रोकने का प्रयास भी हुआ. लेकिन BHU प्रशासन ने अपनी कमी छिपाने के प्रयास में देरी कर दी थी. कैमरे में वो सब आ चुका है जो हम सब के लिए शर्मनाक ही नहीं, देश के आन बान शान के साथ भद्दा मजाक भी है, जिसका किसी को अधिकार नहीं.

संतोष ओझा के फेसबुक वॉल से.

भास्कर डाट काम के पोर्नकारों ने मुझे फेसबुक पर ब्लाक करवा दिया था : स्नेहा चौहान

Sneha Chauhan : तो आखिरकार मुझे आज सुबह १२ घंटे के बाद फेसबुक ने आज़ाद कर ही दिया. भास्कर डाट कॉम के पोर्नकारों ने कल मुझे ब्लॉक करवा दिया था. ये लोग कितनी नीचता पे उतर आये हैं, जबकि मेरे आर्टिकल में मैंने अभी तक किसी पोर्न पत्रकार का नाम नहीं लिया है.

आज आलम ये है कि जब सबके नाम सामने आने लगे तो माफ़ी मांग रहे हैं, कॉल कर-कर के। खबर बनाने के पहले अपनी इमेज का ख्याल क्यों नहीं आता इन पत्रकारों को, क्या इतना बेच दिया है अपने ज़मीर को उन मालिको के हाथ, शर्म आनी चाहिए। सोचो जरा।

कहने के लिए आजादी की ६७ साल की सालगिरह मना रहे हो पर आज भी तुम सब का जमीर कैद है, खुद का कुछ भी नहीं, जिस देश में आप जैसे लोग हैं, उस देश का या उस विभाग का कुछ नहीं हो सकता। … मुबारक हो तुम सब पोर्नकारों को, तुम्हारी ज़मीर की गुलामी बनाम भीख में मिली आजादी…HAPPY INDEPENDENCE DAY…।

स्वतंत्र पत्रकार स्नेहा चौहान के फेसबुक वॉल से.

अखबारों के बाद टीवी, टीवी के बाद अब नेट पत्रकारिता ने नए किस्म की रिपोर्टिंग शुरू की है

Sanjaya Kumar Singh : अखबारों के बाद टीवी पर खबरें आना शुरू होने के बाद जिस तरह खबरों की परिभाषा बदल गई और लाइव रिपोर्टिंग के नाम पर मरने वालों के परिवार से पूछा जाने लगा, “आपको कैसा लग रहा है”, और “नोएडा में एक स्कूल बस की दूसरे वाहन से भयंकर टक्कर हुई। ये देखिए घटना स्थल से लाइव तस्वीर। इसमें बुहत सारे बच्चे मरे होंगे” (इस दुर्घटना में कोई नहीं मरा था जो बच्चे घायल हुए थे उन्हें मामूली उपचार के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी) जैसी खबरें आने लगीं वैसे ही अब नेट पत्रकारिता ने नए किस्म की रिपोर्टिंग शुरू की है।

हांगकांग में रहने वाले बस्ती, उत्तर प्रदेश के Samar Anarya ने दैनिक भास्कर की पोर्न पत्रकारिता के खिलाफ अभियान छेड़ा तो उनका फेसबुक प्रोफाइल 24 घंटे के लिए ब्लाक करवा दिया गया। समर भी कहां मानने वाले थे Samar Avinash नया प्रोफाइल बना लिया और लिखा, “दैनिक पोर्न भास्कर सोचता है कि एक प्रोफाइल रिपोर्ट करवा के वह प्रतिरोध रोक देगा. अच्छा सोचता है. पर वह यह क्यों सोचता है? इसलिए कि नीचे दिए चार लिंक्स में किसी को क्लिक करिये. उसे बीते दस दिन में उसकी यह सबसे हार्डसेलिंग पोर्न स्टोरीज़ (जिन्हें वह खबर कहता है) हटानी पड़ी हैं. आप इनमे से कोई क्लिक करेंगे तो नहीं खुलेगी. और कुछ पोर्नकार कह रहे थे कि उनकी टीआरपी बढ़ रही है. खैर.. हम चंद लोग उन्हें इस हद तक बैकफूट पर ला सकते हैं तो सब मिल के क्या कर सकते हैं? दैनिक पोर्न भास्कर की पोर्नकारिता की दुकान बंद करवा सकते हैं.”

मेरा ख्याल यह जरूरी भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा और भी अखबारों की साइटें कर रही हैं पर एक-एक कर निपटना ही ठीक रहेगा। हिन्दी वालों के बीच अगर इंटरनेट को लोकप्रिय बनाना है तो यह बिल्कुल जरूरी है वरना आम लोग वैसे ही इंटरनेट मतलब पोर्न मानते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

मुझे गर्व है मैंने कभी कोई समझौता नहीं किया, भले ही नौकरियां छोड़नी पड़ीं हों : मुकेश कुमार

Mukesh Kumar : टेलीविज़न की दुनिया में आज मेरे बीस वर्ष पूरे हो गए। बीस बरस पहले आज के ही दिन (15 अगस्त, 1993) गुलमोहर पार्क स्थित परख के दफ़्तर में श्री विनोद दुआ से बात हुई और बतौर संवाददाता काम शुरू कर दिया। हालाँकि पिछले एक-डेढ़ महीने से आना-जाना हो रहा था और मैंने इस नए माध्यम को देखने-समझने का काम शुरू कर दिया था, लेकिन नियमित रूप से काम करने का सिलसिला आज के दिन ही शुरू हो सका।

इस बीच बहुत से लोगों ने डराया और समझाया भी कि प्रिंट में ही लगे रहो, मगर मन कह रहा था कि भविष्य के इस माध्यम को जानना चाहिए और मैंने मन की ही सुनी। इस नौकरी से छह महीने की बेरोज़गारी भी दूर हुई थी। कुछ ही महीनों बाद दुआ साहब ने मुझे कार्यक्रम का संपादकीय प्रमुख बना दिया। करीब सौ कड़ियाँ मेरी देखरेख में ही तैयार हुईं। दो साल बाद जब परख बंद हुआ तो अलग होना पड़ा, लेकिन इस दौरान दुआ साहब से बहुत कुछ सीखने को मिला। उनका आभार।

इन बीस सालों में मैंने बहुत कुछ सीखा-जाना। बहुत कुछ हासिल भी किया। सफलता-असफलता के बहुत से मुकाम आए। कई उपलब्धियाँ भी दर्ज़ हुईं। इस बात की खुशी है और गर्व भी कि कोई समझौता नहीं किया, भले ही इस वजह से कितनी ही नौकरियाँ क्यों न छोड़नी पड़ीं हों। अपनी तईं कोई ग़लत काम नहीं किया और न ही किसी को करने दिया। आज़ादी मिली तो बहुत सारे प्रयोग किए। कामयाबी भी ठीक-ठाक ही मिली। ख़ैर अभी हिसाब करने का वक़्त नहीं आया है, क्योंकि अभी तो बहुत सा सफ़र बाक़ी है। बहरहाल, आगे बढ़ने से पहले इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि अभी तक की यात्रा में जिन लोगों का साथ मिला और जिन्होंने साथ दिया (फेहरिस्त बहुत लंबी है), उन सबका बहुत-बहुत आभार।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण, मुरादाबाद से डीएनई मृगांक पांडेय का इस्तीफा

दैनिक जागरण के मुरादाबाद एडिशन से खबर है कि यहां कार्यरत डिप्टी न्यूज एडिटर मृगांक पांडेय ने इस्तीफा दे दिया है. वो कहां जा रहे हैं, इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है. मृगांक लंबे समय से मुरादाबाद जागरण में काम कर रहे थे. उनका इस्तीफा जागरण के लिए झटका माना जा रहा है.

संतकबीर नगर से प्रकाशित अख़बार दैनिक गोपनीय खबर से फैज़ हसन खान को गोरखपुर का ब्यूरो प्रमुख नियुक्त किया गया है. इससे पहले वह स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य कर रहे थे.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

रेल घूस कांड के आरोपियों की याचिका पर सभी मीडिया हाउसों को नोटिस

नई दिल्ली : रेलवे घूस कांड के आरोपी महेश कुमार व सह आरोपी संदीप गोयल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की मीडिया रिपोर्टिग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। इस पर न्यायमूर्ति वीके जैन ने सभी मीडिया हाउसों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अब इस मामले की सुनवाई 26 अगस्त को होगी।

दिल्ली उच्च न्यायालय में महेश कुमार व संदीप गोयल ने अधिवक्ता गोरंग कठ के माध्यम से याचिका दायर की है कि इस मामले में मीडिया द्वारा एकतरफा रिपोर्टिग की जा रही है। इससे उनके केस पर प्रभाव पड़ रहा है और उनके मूलभूत एवं संवैधानिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में मीडिया रिपोर्टिग पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यही नहीं, अदालत में उनके मामले की सुनवाई में विभिन्न कॉल रिकार्डिग संबंधी बातों और गवाही आदि के संबंध में खबरें प्रसारित करने या छापने पर प्रतिबंध लगाया जाए।

ज्ञात हो कि सीबीआइ ने 2 जुलाई को आरोप पत्र दायर कर रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य महेश कुमार, पूर्व रेलवे मंत्री पवन बंसल के भाजे विजय सिंगला व आठ अन्य को आरोपी बनाया था। सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश रचने व भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला बनाया गया है। अदालत ने 4 जुलाई को आरोप पत्र पर संज्ञान ले लिया था। सीबीआइ का आरोप है कि सिंगला ने रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य महेश को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाने के लिए दस करोड़ रुपये मागे थे। 3 मई को सिंगला ने 90 लाख रुपये लिए थे। सीबीआइ ने चंडीगढ़ से आरोपियों को गिरफ्तार कर रुपये बरामद किए थे। (साभार- दैनिक जागरण)

जब आप ख़बर के नाम पर, पत्रकारिता के नाम पर नंगी तस्वीरे परोसेंगे तो हम आपको टोकेंगे और रोकेंगे भी

Mohammad Anas : आप पोर्न दिखाएं हमें तकलीफ नहीं, लेकिन जब आप ख़बर के नाम पर, पत्रकारिता के नाम पर नंगी तस्वीरे परोसेंगे तो हम आपको टोकेंगे और रोकेंगे भी. इस रोक टोक का सिलसिला इस बार इलाहाबाद महाकुम्भ से शुरू हुआ था ,भास्कर.काम नाम की वेबसाईट ने गंगा में स्नान कर रही महिलाओं की तस्वीरे लगाई और हम सबको लगा की ये चलन ठीक नहीं ,ऐसा नही था की भास्कर.काम कुम्भ से पहले पोर्न नही परोसता था, परोसता था और जमकर बेचता था लेकिन नज़र में तो आना ही था ,पाप का घड़ा भरना ही था सो भरा और जनाब फूटा भी.

ऐसा बहुत कम हुआ की इतना बड़ा मीडिया संस्थान नाक के बल गिर पड़ा हो अपने विरोध को लेकर, लेकिन भास्कर गिरा और उसने लगातार विरोध के चलते अपनी अश्लील तस्वीरों वाली 'पोर्निया क्लिक्स' को हटाया ,लेकिन अफ़सोस इन मीडिया परचुनियों की आदत नहीं छूटी, रोज़ विरोध होता और रोज़ नई तरह की ‘पोर्निया क्लिक्स’ सामने आ जाती. कई बार बहस व्यक्तिगत हुई, कई बार फोन पर धमकियाँ, कोर्ट से लेकर कचहरी, महिला आयोग से लेकर प्रेस काउंसिल तक बात गयी, लेकिन पैसा हर जगह बोलता है.

सो साहब इस पूरे मामले में भी खूब सिक्कों की छनकार छनकी, कार्यवाई के नाम पर सब कुछ सिफर रहा पर जनता की अदालत में जनता इस बार जज बन गयी है, कहीं और से कुछ ना होता देख हम सबने अपने अपने स्तर से भास्कार.काम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बात आभासी दुनिया की थी इसलिए फेसबुक पर भास्कर.काम की ईंट से ईंट बजाने का सारा इंतजाम @समर अनार्य और बाकी के साथियों ने कर दिया.

फिलहाल इस लड़ाई में @आशीष महर्षि नाम के कुंठित पोर्नकार (जो की मेरा सीनियर रह चुका है, माखनलाल पत्रकारिता विवि) ने जयपुर में परिवार के संग पिकनिक मना रहे कुछ लोगों की अश्लील तस्वीर भास्कर.काम पर डाली और उसका मज़ा लेने लगा. यह इतना नीच और घिनौना इंसान है की इसके साथ काम करने वाले लोग इससे दस कदम दूर रहते हैं. इसकी 'पोर्निया लिंक्स' और इसके नाम की जब भद पिटनी शुरू हुई तो इस पोर्नकार ने @समर अनार्य और @स्नेहा चौहान को अपनी फर्जी प्रोफाइलों से (पक्की सूचना है की यह कुंठित लड़कियों के नाम से प्रोफाइल बना कर खुद के पोस्ट और फोटो लाइक करता है) रिपोर्ट अब्यूज करवा चौबीस घंटे के लिए कुछ भी शेयर करने से ब्लोक करवा दिया है.

हो सकता है इसे लिखने के बाद मैं भी ब्लोक हो जाऊं. इसने एक बार माखनलाल की एक छात्रा के नाम से बनी फर्जी प्रोफाइल की खबर भास्कर.काम में लगाई थी और हेडिंग्स दी थी ‘माखनलाल बना सेक्स का अड्डा’. समर अनार्य की नई प्रोफाइल बन कर तैयार है Samar Avinash नाम से. उन्हें एड करने के लिए यहां क्लिक करें: www.facebook.com/Samar.Avinash

मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.

कुमार सुरेंद्र की बीमारी व मौत : बड़े अखबार में खबर नहीं, नेताओं ने झांका तक नहीं

भूख-प्यास छोड़ कर राजनीतिक दलों की खबरों के पीछे-भागने व संकलित करने के बाद अखबार के संस्करण छुटने के पहले, उसमें  देने की जीतोड़ कोशिश पत्रकारों का दैनिक कार्य ही नहीं फर्ज भी है। ऐसे में राजनेताओं व राजनीतिक दलों के बीच एक रिश्ता कायम हो जाता है। राजनेता व राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए पत्रकारों को बड़ी सफाई से इस्तेमाल  करने से नहीं चूकते हैं। मीडिया व राजनीतिक हल्कों में प्रायः देखा जाता है कि नामी-गिरामी पत्रकार के बीच का संबंध निजी भी हो जाता है। वहीं ईमानदार पत्रकार को यह सब नसीब नहीं होता।

वह जब मरता है तब राजनेताओं व राजनीतिक दलों की वह दौड़ नहीं दिखती, जो नामी-गिरामी पत्रकार के लिए दिखती है। हालांकि पत्रकार इस ललक में काम नहीं करता कि कोई राजनीतिक दल या राजनेता उसके सुख-दुख में भागीदार बने। लेकिन, एक मानवीय दृष्टिकोण, महत्व जरूर रखता है। ऐसा ही कुछ घटित  हुआ बिहार की पत्रकारिता जगत में।

बिहार की राजधानी पटना से प्रकाशित एक उर्दू दैनिक  क़ौमी कामी तंजीम के वरीय संवाददाता कुमार सुरेन्द्र को जब नौ अगस्त को ब्रेन हैम्रेज हुआ और उसी दिन उन्हें देर रात अस्पताल में भर्ती कराया गया और उनका आपरेशन भी हुआ।

कुमार सुरेंद्र
कुमार सुरेंद्र
लेकिन, दुखद घटना यह हुई की 14अगस्त की सुबह लगभग आठ बजे उनका निधन हो गया। पत्रकारों की एक जमात ने 12अगस्त को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर बीमार पत्रकार के इलाज के लिए समुचित आर्थिक सहयोग की अपील की थी।

वर्षों से बिहार विधानमंडल की गतिविधियां और राजनीतिक खबरों को शब्दों में पिरो कर उर्दू अखबार के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने वाले कुमार सुरेन्द्र के बीमार पड़ने व उनके निधन की घटना की अवधि में एक भी राजनीतिक दल के नेताओं ने सुध तक नहीं ली। शोक में दो शब्द क्या, ना तो बीमारी में देखने गये और ना किसी तरह की सहायता दी। यही नहीं उनके मरने के बाद अंतिम दर्शन के लिए अस्पताल की ओर कदम भी नहीं उठे। कुमार सुरेन्द्र के करीबी कहते हैं अल्पसंख्यों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए राजनीतिक दल व नेतागण कुमार सुरेन्द्र की चिरौरी किया करते थे।

पत्रकार कुमार सुरेन्द्र की मौत कई सवाल छोड़ गया है। बिहार की मीडिया में कुमार सुरेन्द्र एक ईमानदार छवि के पत्रकार के रूप में जाने जाते थे। नौकरशाही डाट काम के संपादक इरशादुल हक कहते हैं कि सुरेन्द्र जी एक उर्दू अखबार को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। देवनागरी लिपि जाने वाले उर्दू की पत्रकारिता में आ कर लोगों को हैरत में डाल दिया था। कौमी तंजीम से जड़े सुरेन्द्र जी का हौसला संपादक असरफ फरीद ने बढ़ाया। फारसी लिपि सिखने में उन्हें थोड़ा समय लगा। लेकिन, धीरे धीरे उर्दू पढ़ने और बोलने लगे। कौमी तंजीम के अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन से जुड़े रहे। एक ईमानदार और संर्घषशील पत्रकार के सारे गुण उनमें थे।

उर्दू पत्रकारिता की हालत हिन्दी से ज्यादा खराब है। यह सब जानते हैं। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होते हुए भी उन्होंने उर्दू पत्रकारिता को छोड़ा नहीं। बिहार विधानमंडल सत्र के दौरान अपनी पैनी नजर खबरों पर रखते थे। राजनीतिक हलको की खबरें उर्दू पाठकों तक पहुंचाते थे। 09 अगस्त यानी ईद के दिन सुरेन्द्र जी को ब्रेन हैम्रेज हुआ, उन्हें पटना के उदयन सुपर स्पेसलीटी अस्पताल में भर्ती कराया गया। पत्रकार शशिभूषण ने बताया कि जब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया तब अस्पताल के डाक्टरों ने आपरेशन की सलाह दी। अचानक पैसों का बंदोबस्त सामने आया। लेकिन पत्रकारों के कहने पर अस्पताल ने सहयोंग किया। कुमार सुरेन्द्र का आपरेशन किया गया। कौमी तंजीम के संपादक ने भी बढ़ कर आर्थिक मदद की।

बिहार की मीडिया में कुमार सुरेन्द्र की बीमार होने की खबर कुछ अखबारों में आयी। लेकिन, एक बड़ा अखबार एक लाइन की खबर प्रकाशित तक नहीं की। पत्रकार संगठनों ने मुख्यमंत्री से 12 अगस्त को मिल कर आर्थिक मदद की गुहार लगायी। मदद तो नहीं पहुंची लेकिन 14 अगस्त को कुमार सुरेन्द्र ने दम तोड़ दिया। पत्रकार साथी ही मौके पर पहुंचे। अफसोस इस बार भी, सरकार ना ही राजनीतिक दलों का नुमाईनदा अस्पताल पहुंचा और शोक व्यक्त किया। इसे लेकर पत्रकारों के बीच गहमा-गहमी देखी गयी। एक कतरा आंसू बहाने तक कोई नहीं आया, जिसके लिए वे खबरे गढ़ते रहे वहीं, उनके जनाजे में नदारत दिखें।

खबर के लिए फोन पर फोन कर पत्रकारों को अपने रिझाने वाले राजनेताओं-दलों की असलियत सामने आ गयी। वहीं, कुमार सुरेन्द्र के लिए कौमी तंजीम के संपादक का बढ़-चढ कर सहयोग करना-मदद करना हिन्दी मीडिया के मुंह पर तमाचा भी रहा। पिछले दिनों  पटना हिन्दुस्तान के पत्रकार गंगेश श्रीवास्तव का सड़क हादसे में निधन हो गया था। हिन्दुस्तान ने अपनी तरफ कोई मदद नहीं की। सिवा ग्रुप बीमा के। वहीं, हिन्दुस्तान के पत्रकारों ने एक दिन का वेतन देकर गंगेश के परिवारों को मदद पहुंचाई। सवाल उठता है कि दिन-रात अखबार के लिए दौड़-भाग कर, जाखिम उठा कर खबर लाने वाले पत्रकारों के साथ यह व्यवहार क्यों ? अपने खून को जला कर अखबारों के मालिकों के तिजोरी भरने वाले पत्रकार के हिस्से में जाता क्या है। वहीं किसी बड़े मीडिया हाउस के मालिक/संपादक को कुछ हो जाये तो फिर देखिये, राजनीतिक दलों व नेताओं की लाइन लग जाती है।

लेखक संजय कुमार इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े हैं.

पाकिस्तान, मीडिया उन्माद और युद्ध की भाषा : हकीकत क्या है?

मीडिया पर आरोप लगना इस बात का प्रमाण है कि प्रजातंत्र में इसकी भूमिका बढ़ रही  है. आम जनता का शिक्षा स्तर, आर्थिक मजबूती और तार्किक शक्ति बढ़ने पर डिलीवरी करने वाली संस्थाओं से, वे औपचारिक हो या अनौपचारिक, अपेक्षाएं भी बढ़ती हैं. ऐसे में लाज़मी है कि जब संस्थाएं जन-अपेक्षाओं पर उतनी खरी नहीं उतरतीं तो आरोप लगते हैं.

जो ताज़ा आरोप मीडिया पर लग रहें हैं उनमें प्रमुख है भारत-पाकिस्तान सीमा पर हुई ताज़ा घटनाओं पर न्यूज़ चैनलों में होने वाले स्टूडियो डिस्कशन को लेकर. यह माना जा रहा है कि मीडिया पाकिस्तान को लेकर जनाक्रोश को हवा दे रही है और देश को युद्ध के कगार पर धकेल रही है याने यह भाव पैदा कर रही है कि जो इस आक्रोश में शामिल नहीं वह राष्ट्रीयता के खिलाफ है.

भारत की मीडिया पर आरोप पहले भी लगते रहे हैं  और हकीकत यह है कि मीडिया इन आरोपों का संज्ञान भी लेती रही है भले हीं इसका प्रचार वह ना करती हो. मीडिया में  एक सुधारात्मक प्रक्रिया  बगैर किसी शोर –शराबे के चल रही है. यही वजह है कि आज से चार साल पहले जो न्यूज चैनल शाम को भी प्राइम टाइम में ज्योतिषी , भूत-भभूत और भौडे मनोरंजन के कार्यक्रम परोश रहे थे आज जन-मुद्दों को उठा रहे हैं, उन पर डिस्कशन करा रहे है. उनका यह हौसला तब और बढ़ने लगा जब  दर्शकों के एक वर्ग ने मनोरंजन के भौंडे कार्यक्रमों से हट कर इन स्टूडियो चर्चा को देखना शुरू किया. दरअसल इस परिवर्तन के लिए दर्शक स्वयं बधाई के पात्र हैं.

ऐसे में मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने बेहद जनोपादेय स्टूडियो डिस्कशन को गुणात्मक तौर  पर बेह्तार करे. प्रजातंत्र में इन चर्चाओं के जरिये  मीडिया जन चेतना को बेहतर  करती है लोगों की पक्ष-विपक्ष के तर्कों को सुन कर फैसले  लेने की क्षमता बढाती है और जन-धरातल में मूल-मुद्दों  पर भावना-शून्य पर बुद्धिमत्तापूर्ण संवाद का मार्ग प्रशस्त  करती है. प्रजातंत्र में शायद मीडिया की ऐसी  भूमिका पहले देखने को नहीं मिलती थी. लेकिन एक डर जरूर इन आरोपों को निरपेक्ष भाव से देखने पर मिलता है. कहीं मीडिया इन मुद्दों पर परस्पर विरोधी तथ्यों को देने के नाम  परस्पर-विरोधी राजनीतिक दलों के लोगों को बैठा कर खाली “तेरे नेता, मेरा नेता, तेरा शासन मेरा शासन “ का तमाशा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री तो नहीं मान ले रही है?

अगर ऐसा है तो जो दर्शक मनोरंजन का भौंडा मजाक छोड़ कर न्यूज़ चैनलों को तरफ मुड़े है वे जल्द हीं मानने लगेंगे कि अगर यही देखना है तो “द्व्यार्थक भौंडे मजाक में क्या बुराई है”. लिहाज़ा मीडिया में स्टूडियो डिस्कशन को लेकर खासकर इसके फार्मेट को लेकर एक बार गहन विचार की ज़रुरत है. शालीन, तर्क-सम्मत, तथ्यों से परिपूर्ण चर्चा किसी शकील-लेखी झांव-झांव से बेहतर होगी. फिर यह भी सोचना होगा  कि क्या जिन राजनीतिक लोगों को इन चर्चाओं में बुलाया जाता है वे स्वयं अपनी पार्टी की नीति और तथ्यों से पूरी तरह वाकिफ होते भी हैं या वे केवल लीडर –वंदना कर अपने नेता की नज़रों में अपना नंबर बढाने आते हैं.

दूसरा क्या जिन विषयों का चुनाव किया जाता है वे उस दिन के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे होते हैं. क्या यह सच नहीं कि गरीबी , अभाव, अशिक्षा और राज्य अभिकरणों के शाश्वत उनींदेपन को लेकर ग्रामीण भारत की समस्याएँ इन चर्चाओं का मुख्य मुद्दा बनाने चाहिए? मोदी ने क्या कहा, मुलायम कब पलट गए सरीखे मुद्दों से ज्यादा ज़रूरी है कि सत्ता पक्ष को यह बताया जाये कि देश में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति इतनी दयनीय क्यों है और क्यों जहाँ विश्व में धनाढ्य लोगों की लिस्ट में भारत के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है वहीं गरीबी –अमीरी की खाई भी.    

लेकिन इसका यह मतलब यह नहीं कि मीडिया की वर्तमान  भूमिका को सराहा न जाये. क्या यह सच नहीं है कि अन्ना  आन्दोलन पर मीडिया की भूमिका सामूहिक जन-चेतना में  गुणात्मक परिवर्तन लाने के लिए अप्रतिम रही? क्या यह सच नहीं कि शीर्ष पर बैठे सत्ता पक्ष के भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही? क्या बलात्कार को लेकर सरकार के उनीदेपन से झकझोरने में मीडिया की भूमिका नज़रअंदाज की जा सकती है?

लेकिन तब आरोप लगता है कि मीडिया “कैंपेन पत्रकारिता” कर रही है जिसका मतलब वह “बायस्ड” है. दरअसल आरोप लगने वाले यह भूल जा रहे हैं कि एक ऐसी शासन व्यवस्था, जो जन-संवादों को ख़ारिज करने का स्थाई भाव रखती हो, को जगाने में शुरूआती दौर में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

सीमा-पार से हुई  हाल की घटनाओं को लें. यह बात  सही है कि पडोसी देश को लेकर भारत में एक अलग संवेदना  है. इसके पीछे १९४७ से लेकर आज तक के अनचाहे युद्ध का इतिहास रहा है. क्या यह सच नहीं है कि १९८० से लेकर आज तक पाकिस्तान  छद्म लेकिन निम्न तीव्रता (लो इंटेंसिटी ) का युद्ध करता रहा है और पाकिस्तान इंटेलिजेंस एजेंसी — आई एस आई –भारत में  आतंकी घटनाओं का जिम्मेदार  आज भी है? स्वयं इस एजेंसी के मुखिया जावेद अशरफ काजी ने पाकिस्तान के सीनेट में सन २००३ में कबूला कि कश्मीर में हीं नहीं भारत में के पार्लियामेंट पर हमले में, विदेशी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या में और मुशर्रफ पर हमले में जैस और जमात का हाथ रहा है. इसका उल्लेख स्वयं पाकिस्तान के लेखक अहमद रशीद ने अपनी किताब “पाकिस्तान, पतन के कगार पर” में बे लाग-लपेट किया है.

पाकिस्तान को लेकर हाल  में चैनलों में हुई चर्चाओं  को लेकर कहा गया कि मीडिया स्वयं “युद्ध की भाषा” बोलने लगा. दरअसल यह आरोप इसलिए लगा कि कुछ एंकर तटस्थता का भाव न रख कर स्वयं एक पक्ष के वकील होते दिखे. शायद मीडिया से अपेक्षा यह रहती है कि एंकर किसी पक्ष का नहीं होता बल्कि वार्ता को आगे बढाने की हीं भूमिका में होता है, बगैर अपना संयम और धैर्य खोते हुए. लेकिन ध्यान रखे कि हाल हीं में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कई बार सत्य उजागर कराने के लिए भी जज उग्र भाव या ऐसे आक्षेप एक या दूसरे पक्ष पर मौखिक रूप से लगाते हैं. इसका मतलब यह नहीं होता कि वे फैसला दे रहे हैं. फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इन चर्चाओं में सभी पक्ष के लोगों का समावेश होता है. लिहाज़ा दर्शकों को हर पक्ष का तर्क परोस दिया जाता है. फैसला उन पर छोड़ दिया जाता है.

अगर सीमा पर हुई गोलीबारी में भारत के पांच सैनिक  मारे जाते है और फिर भी देश  के प्रतिरक्षा मंत्री संसद में अपने बयान में सेना के औपचारिक बयान को बदल  कर “पाकिस्तानी सैनिकों की वर्दी पहने” के भाव में रहते हैं तो मीडिया को कुछ “एक्स्ट्रा मील” चलना पड़ता है शासक वर्ग को सचेत करने और जन-भावना से अवगत करने के लिए. इसका मतलब यह नहीं होता कि मीडिया युद्ध कराने में दिलचस्पी रखता है. यह इसलिए होता है कि अन्ना-आन्दोलन को लेकर सरकार शुरू में “जंतर –मंतर पर ऐसे आन्दोलन तो रोज हीं होते हैं” के भाव में रही या दिसम्बर १६ के बलात्कार को लेकर पहले दिन  “डिनायल मोड” में रही. यह मीडिया का दबाव या “कारपेट कवरेज” था जिसने सरकार को रवैया बदलने को मजबूर किया.        

लेखक एनके सिंह देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं और ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के महासचिव हैं. उनका यह विश्लेषण दैनिक भास्कर में प्रकाशित हो चुका है.

‘लोकमत टाइम्स’ के लिए अंग्रेजी पत्रकारों की जरूरत, करें आवेदन

LOKMAT, the premier publishing house of Maharashtra with an impressive growth record and excellent work environment, requires the following personnel to be based at Mumbai, Nagpur, Aurangabad & Nashik for its English daily LOKMAT TIMES.

SUB-EDITORS (FOR MUMBAI, NASHIK, NAGPUR & AURANGABAD)

The candidate should have the ability to make pages independently, edit reports in an effective manner and should be abreast with the issues at local, state, national and international levels. Candidate should be a graduate, preferably with diploma in journalism and relevant experience of minimum 3 years. (Those who have applied earlier should not re-apply)

REPORTERS (FOR NASHIK, NAGPUR & AURANGABAD)

The candidate should be a graduate, preferably with diploma in journalism, and relevant experience of at least 3 years. (Those who have applied earlier should not re-apply)

SENIOR SUB-EDITORS (FOR MUMBAI, NASHIK, NAGPUR & AURANGABAD)

The candidate should have a good grasp of local, state, national and international issues. He/She should make and produce pages independently, edit and rewrite in a professional manner. Candidate should be a graduate, preferably with diploma in journalism and relevant experience of at least 7 years. (Those who have applied earlier should not re-apply)

TRANSLATORS (FOR NASHIK, NAGPUR & AURANGABAD)

The candidate should be able to translate news and feature reports from Marathi to English. He/She should have good command over these 2 languages.

Candidates are requested to send their resume to lt.info@lokmat.com
 

नवभारत के स्थानीय संपादक को एसडीएम ने फोन पर धमकाया, पत्रकारों में रोष

बिलासपुर : हाल में कोटा एसडीएम के पद पर पदस्थ हुए राजेंद्र गुप्ता द्वारा एक समाचार को लेकर नवभारत प्रेस के स्थानीय संपादक निशांत शर्मा को मोबाइल पर धमकी देने को लेकर पत्रकारों में जबरदस्त आक्रोश है. 8 अगस्त को नवभारत में प्रकाशित एक समाचार को लेकर गुप्ता ने मोबाइल पर पहले तो अभद्र भाषा में बात की फिर धमकी भरी भाषा में उतर आए. उन्होंने शर्मा को देख लेने की धमकी की.

एसडीएम के इस बर्ताव की जानकारी होते ही पत्रकारों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई. इस मामले को लेकर दिनांक 9 अगस्त को बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों की एक आपात बैठक बुलाई गई जिसमें बड़ी संख्या में प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार मौजूद थे.

वहां उपस्थित सभी पत्रकारों ने एसडीएम गुप्ता द्वारा दी गई धमकी को सम्पूर्ण समाचार पत्र जगत के खिलाफ धमकी मानते हुए उसकी घोर निंदा की. बैठक में सभी पत्रकारों ने गुप्ता के खिलाफ जुर्म दर्ज करने सहित कड़ी कार्यवाही करने की मांग शासन से की ताकि ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो. साथ ही बैठक उपरांत पत्रकारों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्ट्रेट जाकर कलेक्टर की अनुपस्थिति में प्रभारी कलेक्टर अवनीश शरण से भेंट की एवं उन्हें एक ज्ञापन भी सौंपा. उक्त ज्ञापन में मांग की गई है कि इस मामले में सात दिनों के अंदर कोटा के एसडीएम गुप्ता के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाए. साथ ही यह भी चेतावनी दी गई कि कार्यवाही न होने की स्थिति में पत्रकार इसके विरुद्ध आंदोलन करने को बाध्य होंगे.

वहीं पुलिस अधीक्षक रतनलाल डांगी को भी इस घटना के बारे में जानकारी देकर उनसे भी मामले में राजेंद्र गुप्ता के खिलाफ जुर्म दर्ज करने की मांग की गई. प्रेस क्लब में हुई बैठक में आलोक प्रकाश पुतुल, निशांत शर्मा, प्रवीण शुक्ला, सुनील गुप्ता, शशिकांत कोन्हेर, कमलेश शर्मा, अभिताभ तिवारी, कमलेश शर्मा, विनोद सिंह सहित करीब 50 पत्रकार मौजूद थे.

श्याम बाबू लगातार तीसरी बार आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय कोषाअध्यक्ष चुने गये

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन (आईएफडब्ल्यूजे) के चुनाव परिणाम में वरिष्ठ पत्रकार श्याम बाबू लगातार तीसरी बार राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष चुने गये. चुनाव परिणाम रिटर्निंग ऑफिसर हिमांशु चट्टर्जी ने घोषित किया. श्याम बाबू लखनऊ मुख्यालय में दैनिक जागरण के विशेष संवाददाता हैं. वे लम्बे समय से प्रिंट मीडिया से जुड़े हैं.

जालौन में जन्मे श्याम बाबू क्रिकेट खिलाड़ी भी रहे. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से स्नातक के बाद upcc जैसे कई खेल संगठनों से भी जुड़े रहे और जुड़े हैं. इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रय राव, राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पांडे, राष्ट्रीय कोषाअध्यक्ष श्याम बाबू हैं. संगठन का अगला चुनाव अब वर्ष 2016 में होगा.

भड़ास तक आप अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

मेहनताना हड़पने वाला विजय दीक्षित हर तीन-चार दिन में सिमकार्ड क्यों बदलता है?

न जाने वो कौन सा नक्षत्र था जिसमें मैंने एस वन चैनल को ज्वाइन किया। ठोकर तो पहले कदम से ही लगनी शुरू हो गए थी। इनपुट हेड से लेकर चैनल हेड तक तमाम ठोकरों के बाद भी गधा ‘गाजर’ के लालच और अहंकार के लिए दौड़ता रहा। एसवन के मालिक विजय दीक्षित ने गधे की खून-पसीने की कमाई के नौ लाख की गठरी बनाई और गधे के पिछवाड़े पर जोर की जमा दी। नौ लाख तो इसलिए कह रहा हूं कि मोटी-मोटी रकम मुझे मालूम है।

विजय दीक्षित की जेल यात्रा के दौरान, एसवन चैनल के साथ अपने अस्तित्व और लगभग सौ-सवा सौ लोगों का भविष्य संवारने के भ्रमजाल में जो भिक्षाटन किया, उसका तो कोई हक-हिसाब है ही नहीं। सुबह एक राउंड घूमकर जनरेटर के डीजल के लिए पैसे इकट्ठा करने होते थे। फिर टेप, कैब-कैमरा-कनेक्टर और मशीन-मिक्सर का इंतजाम कराना होता था।

विजय दीक्षित ने कभी यह जानने की जुर्रत भी नहीं की कि ये सारे इंतजाम कहां से और कैसे हुए। किसी के पैसे की वापसी भी करनी है, यह तो विजय दीक्षित ने सपने में भी नहीं सोचा। विजय दीक्षित डायमंड रिंग खरीदते हैं, विजय दीक्षित सौ करोड़ का फार्म हाउस खरीदते हैं। विजय दीक्षित मर्सिडीज वैंस खरीदते हैं। किसी के पेट में पल रहे अय्याश औलाद के पाप को धो डालने के लिए पच्चीस-पच्चीस लाख का हरजाना दे सकते हैं। सुबूत मिटवाने और मुंह बंद करने के लिए लाखों दे सकते हैं, लेकिन कर्मचारियों के वेतन, पीएफ और ईएसआई का पैसा नहीं चुका सकते।

विजयमदशमी के नीलकंठ की तरह दुर्लभ हैं विजय दीक्षित के दर्शन। हर दो चार दिन बाद नया सिमकार्ड बदल लेते हैं। जैसे-तैसे नम्बर हासिल करो तो महीने की 30 तारीख को बैठ कर हिसाब करने की गाजर लटका देते हैं। न जाने कितनी 30 तारीखें आई और चलीं गईं। आज तक हिसाब नहीं हो पाया है। तरह आखिरी ठोकर इतनी ज़ोर की लगेगी यह मालूम न था।

बहरहाल, एसवन की तनख्वाह मिलने में देरी का सिलसिला 2007 में ही शुरू हो गया था। पहली बार कुछ दिन देर तनख्वाह

विजय दीक्षित
विजय दीक्षित
मिली। फिर दिन से महीना, दो महीने, चार महीने, और फिर छह-छह महीने बाद तनख्वाह के दर्शन होते। फिर टुकड़ों में तनख्वाह आने लगी। यह भी याद रखना मुश्किल होता था कि कौन से महीने की तनख्वाह के टुकड़े मिल रहे हैं। पांच-पांच हजार रुपये महीने पर काम करने वाले साथियों के चेहरे देख कर मैं अपने टुकड़े कभी घर नहीं ले जा पाया।

नतीजा यह हुआ कि मुझे अपनी पुरानी इस्टीम कार बेचनी पड़ी, फिर मोटर साइकिल बिकी। रात को ऑफिस से छूटने के बाद नोएडा सेक्टर 32 से गुड़गांव जाकर फ्रीलॉंसिंग से करने लगा। फ्रीलॉसिंग, इसलिए कह रहा हूं कि वो अतिरिक्त काम मैंने पैसे कमाने की इच्छा से ही किया था। वरना, आचार्य पंडित इंदु प्रकाश मिश्रा (मेरे आध्यात्मिक गुरु) के काम आना, उनके प्रति मेरी गुरु दक्षिणा का एक अंश मात्र हो सकता था। मैंने उनके लिए काम किया वो भी फ्रीलॉसिंग समझ कर।

सोचा तो यह था कि एसवन से तनख्वाह के पैसे एक न एक दिन तो मिल ही जाएंगे। तो सब कुछ बराबर कर दूंगा। फ्रीलांसिंग से जो मिलता वो भी कर्ज से ली गई मारूति के पेट्रोल और मोबाइल फोन को रीचार्ज कराने में पूरा हो जाता। ये अलग बात है कि मारूति कि किश्तें टूट गईं और बैंक से तकादे शुरु हो गए। कार का पहिया घूम रहा था, इसलिए सहयोगियों और अधिनस्थों को भी लगता था कि आज कैसा भी हो ‘कल सुनहरा’ जरूर होगा।

मनरेगा में कंसलटेंट छोटे भाई का जिक्र छोड़ भी दूं तो भी मुझे अपने सीनियर रवींद्र शाह (जो सूक्ष्म में आज भी मेरे साथ हैं) के अलावा अमित तिवारी और नेहा विजय का जिक्र तो करना ही पड़ेगा (गैर जर्नलिस्ट संबंधों का जिक्र इसलिए नहीं क्योंकि उन्होंने मना किया है) जिन्होंने पर्दे के पीछे रह कर मुझे धन और मन से कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। आपात परिस्थितियों में ये लोग हमेशा मेरे साथ खड़े नजर आए।

शाह सर और अमित तिवारी ने एसवन छोड़ दिया था लेकिन एसवन का अस्तित्व बचाए रखने के लिए वो अपने-अपने स्तर का सहयोग मुझे देते-दिलाते रहे। यहां यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि वो एसवन के लिए नहीं, मेरी जिद, प्रतिष्ठा और अस्तित्व के लिए ऐसा करते रहे। सुधीर, सुरेश, सतेन्दर और अरुण तिवारी तो एसवन में मेरा साया बन कर रहे।

मेरी जिद थी कि जब तक शरीर में ताकत दिल और दीमाग में सोच व हिम्मत है तब तक एसवन चैनल की स्क्रीन ब्लैक न हो। बहुत बार तो ऐसा हुआ है कि सुधीर, सुरेश और सतेन्दर कई-कई दिन-रात बिना नहाए-धोए, खाए-पिए सर्वर रूम और टेलीपोर्ट पर इस लिए गुजार देते कि कोई फॉल्ट होने की दशा में चैनल ब्लैक न हो जाए। इंजीनियर को बुलाना पड़े तो व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर उसे तुरंत बुलाया जा सके।

इंजीनियरों को चैनल लाने और पहुंचाने का जिम्मा खुद उठाते, कम से कम पैसों में काम हो जाए, इसलिए रात को काम करवाते…और वो पैसा भी अक्सर अपने एटीएम एकाउंट्स से निकाल कर दे देते। मैं इन लोगों का आज भी कर्जदार हूं। मशीनरी की वजह से एसवन में तब तक कभी ब्लैक आउट नहीं हुआ जब तक में ये तीनों एसवन में साथ रहे। कर्मचारी चाहे वो जर्नलिस्ट हों या नॉन जर्नलिस्ट, टेक्निकल या नॉन टेक्निकल अपनी शिफ्ट पूरी करते थे। तंगी में झुंझलाहट और गुस्सा तो दिखाया, लेकिन किसी ने कभी काम करने से इंकार नहीं किया। विजय दीक्षित ने इन लोगों के साथ भी बेईमानी की।

विजय दीक्षित कर्मचारियों की तनख्वाह से पीएफ और ईएसआई का पैसा काटते रहे, लेकिन पीएफ और ईएसआई के खातों में पैसा जमा ही नहीं किया गया। विजय दीक्षित ने एक बार नहीं कई बार एसवन चैनल को बेचा। पैसा लिया और हड़प कर गए। चैनल में पैसा लगाया ही नहीं। इसरो का पैसा नहीं दिया। आज भी इसरो का कई करोड़ बकाया है। आखिरी दिनों में इसरो ने फ्रीक्वेंसी डाउन कर दी। फिर भी चैनल इन हाउस चलता रहा। एक बार ‘नागपाल’ जी को चैनल विजिट करवाया। 20 करोड़ में चैनल की डील कर डाली। चैनल में बीस कौड़ी भी नहीं लगाई। इसके अलावा ‘पप्पू जी’ से भी करोड़ों रुपये लेकर खा लिए। ‘पप्पू जी’ का रसूख सत्ता और बाहर सब तरफ रहा है, इसलिए मॉल और चैनल के पेपर ‘पप्पू जी’ को सौंप कर विजय दीक्षित अपने आप को ‘फ्री’ समझ रहे हैं।

यह बात अलग है कि मॉल का मालिकाना हक विवादित है और न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए 1994 से निर्माणाधीन मॉल आज तक मॉल चालू नहीं हो पाया है। दर्जनों लोगों से मॉल और चैनल के नाम पर कई सौ करोड.रुपये हजम कर चुके हैं विजय दीक्षित लेकिन ज्यादातर पैसा बेनामी है, इसलिए कोई आज तक कुछ खास नहीं कर पाया है। कुछ मुकदमे चल रहे हैं। कुछ में गैर जमानती वारंट हैं। एक आध बार जेल हो आए हैं। लेकिन विजय दीक्षित ने किसी को पैसे वापस नहीं किए हैं। यह अपवाद ही है कि विजय दीक्षित ने ‘पप्पू जी’ को चैनल और मॉल के कागज और ‘कनोडिया’ को शांतिनिकेतन वाली कोठी सुपुर्द की है।

…जारी….

लेखक राजीव शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों व न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.


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कौमी तंजीम, पटना के वरीय संवाददाता कुमार सुरेन्‍द्र का निधन

कौमी तंजीम, पटना के वरीय संवाददाता कुमार सुरेन्‍द्र के बारे में सूचना मिली है कि ब्रेन हैमरेज के कारण उनका निधन हो गया. 9 अगस्त को सुरेंद्र का ब्रेन हैमरेज हुआ. उन्हें सीवान से पटना लाया गया. कौमी तंजीम के एडिटर अजमल फरीद ने उन्हें उदयन हास्पिटल में भर्ती कराया. इलाज के दौरान ही उनका निधन हो गया.

कौमी तंजीम अखबार ने सुरेंद्र के इलाज का पूरा खर्च वहन किया. यही नहीं, अखबार ने उनके परिवार को आर्थिक सहायता भी दी है. देवनागरी लिपि जानने वाला पत्रकार अगर उर्दू की पत्रकारिता करे तो यह बड़ी बात है. उर्दू अखबार की चुनौती स्वीकार करना सुरेंद्र जैसे विरले लोग ही करते हैं.

मीडिया जगत की सूचनाएं भड़ास तक bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अरविंद, श्रीधर राजू, अनिल, आमिर, सतीश, अमित, संजय, सुनील के बारे में सूचनाएं

पंजाब के बठिंडा से दैनिक जागरण ब्यूरो चीफ अरविंद श्रीवास्तव का लुधियाना शहर में तबादला कर दिया गया है। उनकी जगह लुधियाना के ही ब्यूरो चीफ श्रीधर राजू को बठिंडा में भेजा जा रहा है। श्रीधर राजू इससे पहले भी बठिंडा में सेवाएं दे चुके हैं। करीब दो सालों के बाद श्रीधर राजू को फिर से बठिंडा में अपनी सेवाएं देने के लिए भेजा गया है।

बकाये के लेन-देन को लेकर लम्बे समय से चले विवाद के बाद आखिरकार जनसंदेश टाइम्स मुख्यालय ने लखीमपुर में ब्यूरो के पद पर तैनात अनिल सिंह राणा को प्रभारी पद से हटा दिया। उनकी जगह कमान आमिर रजा को सौंपी गयी है।

प्रभात खबर दरभंगा के ब्यूरो चीफ सतीश कुमार को हटा कर उनके जगह पर अमित रंजन को प्रभारी बनाया गया है. अमित रंजन मुजफ्फरपुर कार्यालय में अभी तक कार्यरत थे. उधर, बेतिया के ब्यूरो चीफ संजय कुमार सिंह का तबादला प्रबंधन ने बगहा किया है. बगहा के ब्यूरो चीफ सुनील आनंद को बेतिया का प्रभार दिया गया है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

तो क्या अब गुंडागर्दी करेगी भोजपुरी अकादमी?

बनारस। बिहार भोजपुरी अकादमी के अब तक के सबसे विवादास्पद, और पहले असाहित्यिक (जिनका भोजपुरी साहित्य से कोई लेना-देना नहीं हो) अध्यक्ष, जिनका कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है, ने जाते-जाते ना सिर्फ बिहार सरकार को, बल्कि बिहार के माननीय राज्यपाल को भी सवालों के कटघरे में खडा कर दिया है। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं रवि कांत दुबे की, जिनकी नजर में भोजपुरी अकादमी का काम भोजपुरी साहित्य का विकास नहीं, बल्कि अध्यक्ष की फोटो रोज अखबारों में छपवाना है, और उस फोटो को फेसबुक पर लगाकर वाहवाही लूटना है।

भोजपुरी भाषा और साहित्य के विकास के प्रति यह व्यक्ति कितना चिंतित है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि इनके तीन साल के कार्यकाल के दौरान अकादमी से भोजपुरी की एक भी किताब प्रकाशित नहीं हुई। अखबारों में नाम छपवाने के सिवा भोजपुरी साहित्य के उत्थान का कोई प्रयास नहीं किया गया, लेकिन अध्यक्ष जी की तस्वीरें रोजाना अखबारों की शोभा बढाती रहीं। और जब अंतत: उनका कार्यकाल समाप्त होने पर था, त तब उन्होंने एक शानदार कार्यक्रम कराने का निर्णय लिया, और इस से पहले भोजपुरी अकादमी की कार्यकारिणी की एक बैठक कराने की भी कोशिश नहीं की।
 
किसी भी सरकारी कार्यक्रम में किसी को सम्मानित करने से पहले उसके लिये कार्यकारिणी की अनुशंसा पर एक कमिटी बनाई जाती है, जो सम्मानित होने वाले लोगों के लिये मापदंड तय करती है, फिर उसी आधार पर उनके नामों की अनुशंसा की जाती है, लेकिन यहाँ तो हालत यह है कि भोजपुरी अकादमी की कार्यकारिणी के सदस्यों को सम्मानित होने वाले लोगों का नाम तक नहीं पता है, और सारी परंपराओं तो धत्ता बताते हुए कई ऐसे लोगों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने बदले में अध्यक्ष जी को भी सम्मानित किया है। सम्मानित होने वालों की लिस्ट में डा. शुक्ला मोहंती, डा. नर्मदेश्वर पाण्डेय, कुलदीप श्रीवास्तव, बी. एन. तिवारी समेत कई ऐसे नाम हैं, जिनका भोजपुरी साहित्य या कला जगत में कोई योगदान नहीं है। इनमें से कई लोग तो ऐसे भी हैं, जिन्हें आजतक कभी सार्वजनिक रुप से भोजपुरी बोलते भी नहीं देखा गया। लेकिन हाँ, इन लोगों ने कई बार अकादमी के अध्यक्ष को अपने मंच पर जरुर सम्मानित करवाया है। हद तो तब हो गई जब अपने ही कार्यक्रम के मंच पर रविकांत दुबे ने खुद को, और उसी कार्यक्रम के संयोजक बी. एन. तिवारी को राज्यपाल के हाथों सम्मानित करवा लिया।
 
क्या शारदा सिन्हा, भरत शर्मा, मनोज तिवारी और अन्य कलाकार इस लायक नहीं थे?
 
इस के बाद एक कदम आगे बढते हुए रवि कांत दुबे ने बकायदा अवधी और बुंदेलखंडी गायिका मालिनी अवस्थी को भोजपुरी अकादमी की ओर से भोजपुरी का ब्राण्ड एम्बैसडर घोषित कर दिया। रवि कांत दुबे की हर मनमानी को लगातार झेलते आ रहे भोजपुरिया समाज को यह बात काफी नागवार गुजरी। अखिल विश्व भोजपुरी विकास मंच के महामंत्री प्रदीप कुमार सिंह के अनुसार – "जब भोजपुरी में शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व मनोज तिवारी समेत एक से बढकर एक दिग्गज कलाकार हैं, तो फिर आखिर बाहर से एक गायिका को इम्पोर्ट करके लाने की क्या जरुरत थी? तो क्या अब यह मान लिया जाये कि कल भोजपुरी अकादमी किसी चीनी, जापानी या जर्मन गायक को अपना ब्राण्ड एम्बैस्डर घोषित कर सकती है…? अकादमी को यह जबाब देना चाहिए की सम्मानित हुए लोगों ने चयन का मापदंड क्या था, और आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि पटना में हुए इस कार्यक्रम में पद्मश्री शारदा सिन्हा को बुलाने की भी जरुरत नहीं समझी गई। और इन्हें यह जबाब देना ही होगा, क्यों कि यह किसी का निजी कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सरकारी कार्यक्रम था, और माननीय राज्यपाल के हाथों किसी को सम्मानित करवाने से पहले कोई बडी वजह जरुर होनी चाहिए। अगर भोजपुरी भाषी होना ही एकमात्र मापदंड है, तो फिर शायद 34 करोड लोगों को बिहार के माननीय राज्यपाल सम्मानित के हाथों करवाना पडेगा।"

भोजपुरी अकादमी के इस नकारात्मक रवैये से नाखुश प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायक भरत शर्मा और प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता तथा गायक मनोज तिवारी ने भोजपुरी अकादमी को सम्मान वापस करने का फैसला किया है। वैसे खबर तो यह भी आ रही है कि कुछ और लोग भी अपना सम्मान वापस करने का मन बना रहे हैं, और उसकी घोषणा किसी भी समय हो सकती है।  

क्या कहते हैं भरत शर्मा ?
पिछले 3-4 दशकों में भोजपुरी गायकी का पर्याय बन चूके भोजपुरी लोक गायक भरत शर्मा भोजपुरी अकादमी के निर्णय पर सवाल उठाते हुए पुछते हैं कि आखिर जब भोजपुरी में शारदा सिन्हा जी, व मुन्ना सिंह जी सरीखे दिग्गज मौजुद थे, तो फिर एक अवधी गायिका को बुलाकर यह सम्मान देने की क्या जरुरत थी? इस बात से कहीं ना कहीं यह मैसेज जा रहा है कि भोजपुरी में काबिल लोगों की कमी है, और हमें एक ब्राण्ड एम्बैस्डर तक बाहर से बुलाना पड रहा है। भोजपुरिया समाज में अकादमी के इस फैसले को लेकर खासा आक्रोश है, और इस मुद्दे पर हम समाज के साथ खडे हैं।
 
क्या कहते हैं मनोज तिवारी ?
प्रसिद्ध भोजपुरी अभिनेता और गायक मनोज तिवारी से जब हमने इस संबंध में बात करने की कोशिश की तो उनके सब्र का बाँध टूट पडा – "भोजपुरी भाषा, कला और संस्कृति का एक गौरवशाली इतिहास रहा है, और हमारे पास शारदा सिन्हा जी, तथा भरत शर्मा जी जैसे कलाकार हैं, जिन्होंने अपने हजारों गीतों के माध्यम से भोजपुरी लोकगीतों की गौरवशाली परंपरा को सींचने का काम किया है, तो फिर ऐसे कलाकारों के रहते एक अवधी गायिका को भोजपुरी का ब्राण्ड एम्बैसडर बनाना ना सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि मेरी नजर में यह भोजपुरिया समाज का अपमान है।"

तो क्या अब गुंडागर्दी करेगी भोजपुरी अकादमी ?
इसी मामले में भोजपुरी अकादमी के अध्यक्ष रवि कांत दुबे पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुये भोजपुरी लोकगायक भरत शर्मा 'ब्यास' ने भोजपुरिया डॉट कॉम को बताया कि उनके द्वारा भोजपुरी अकादमी का सम्मान लौटाने की बात कहने पर नाराज होकर दुबे ने उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी। भरत शर्मा के अनुसार दुबे ने तीखे लहजे में उन्हें धमकी देते हुए कहा कि "आपके भी कई पत्र और कई राज मेरे पास हैं, और मैं उन्हें सार्वजनिक कर दुँगा।" हद तो तब हो गई, जब उन्होंने भरत शर्मा को बताया कि मुझे एक महिला को ही यह सम्मान देना था, इस पर श्री भरत शर्मा ने उन्हें शारदा सिन्हा जी का नाम सुझाया, उस पर पलट कर दुबे से जबाब दिया – "शारदा सिन्हा उस लायक नहीं थी।"
 
वाह दुबे जी वाह, एक चोरी से किताब लिखने वाले लेखक से (जिसकी पत्नी उसके खिलाफ मुकदमा लड चुकी हो, जिसका पिता उसके खिलाफ लिख चुका हो, और जिसका झुठे मुकदमों का इतिहास रहा हो) इसी बात की उम्मीद की जा सकती है, और आप इस उम्मीद पर पूरी तरह से खरे उतरे। अब यह बिहार सरकार को सोचना है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद की गरिमा से खिलवाड करने वाले ऐसे व्यक्ति का क्या किया जाय? और भोजपुरिया समाज को विचार करना है कि ऐसी घटिया मानसिकता वाले लोगों के साथ कैसा सलूक किया जाय। कुल मिलाकर इस घटनाक्रम को भोजपुरी अकादमी के गौरवशाली इतिहास में एक काले पन्ने के तौर पर दर्ज किया जायेगा।

प्रवीण सिंह
praveenjbb@gmail.com

टेस्ट ड्राइव के नाम पर बदमाशों ने पत्रकार की कार लूटी

यूपी के शाहजहांपुर से खबर है कि बदमाशों ने एक पत्रकार की कार को टेस्ट ड्राइव के नाम पर लिया और लेकर फरार हो गए. थाना क्षेत्र खुटार के निवासी टीवी जर्नलिस्ट विमलेश कुमार की बैगनआर कार को उनका चालक मुकेश कुमार हवा भरवाने के लिए वन्डा चौराहे ले गया. तीन बदमाशों ने हवा भराते समय चालक से पूछा कि क्या कार बिकाउ है. चालक ने जब हां कहा तो बदमाशों ने उससे कहा कि पहले कार का टेस्ट ड्राइव – ट्रायल करके देखेंगे. चालक राजी हो गया. चालक ने अपने साथी मोहित मिश्रा निवासी मो. नरायनपुर कस्वा व थाना खुटार को बुलाया और दोनों पीछे की सीट पर बैठ गये.

तीनों बदमाशो में से एक कार चलाने लगा और एक बदमाशा चालक के पीछे तथा दूसरा बदमाश अगली सीट पर बैठ गया. ट्रायल करते हुए तीनों बदमाश पुवायॉ रोड पर आये और रूजहॉ कलॉ गाव के पास कार रोक दी. बदमाश ने चालक के साथी से कहा कि बोनट खोलकर देखो, इंजन से आवाज आ रही है. चालक का साथी मोहित मिश्रा जैसे ही कार से नीचे उतरा तो बदमाशों ने कार आगे बढा दी. इसके बाद बदमाशों ने दो किमी की दूरी पर चालक मुकेश के कनपटी पर तमन्चा लगा कर जान से मारने की धमकी देते हुए चलती हुई कार से नीचे फेक दिया. चालक ने खुटार आकर कार मालिक विमलेश कुमार को घटना की जानकारी दी. कार मालिक ने तीन बदमाशों के खिलाफ थाने मे लिखित सूचना दी. इस सम्बन्ध में एसओ संजय यादव ने बताया कि जांच की जा रही है.
 

आपके पास काम न हो तो एक काम करें, किसी स्थापित व्यक्ति को रोज सवेरे जी भर गाली बकें

Ram Janm Pathak : नाम कमाने का तरीका… अगर आपके पास अपना कोई आधार न हो, अपनी कोई जमीन न हो, अपना कोई ईमान न हो, अपनी कोई पढ़ाई-लिखाई और पहचान न हो, तो एक काम कीजिए, किसी स्थापित व्यक्ति को रोज सवेरे उठकर मुंह भर कर गाली बकिए। बताइए कि उसके कार के पहिए में गोबर लगा हुआ था। जोर- जो से चिल्लाइए कि उस आदमी ने कमीज के नीच बनियान उल्टी पहनी हुई है।

आपको यह भी तो साबित करना है कि आप आलोचक है और नजर गहरी और सूक्ष्म है तो बीच-बीच में यह तरकीब भी अपना सकते हैं-जैसे कहिए कि उस स्थापित आदमी के गुप्तांग पर एक तिल है। इस बात का बड़ा मजा बनेगा। लोग कहेंगे कि बंदा अंदर तक की जानकारी रखता है, पहुंचा हुआ है। भई गजब का आलोचक है। कहां से खोजी रिपोर्ट निकाल कर लाया। कोई शक जताए कि कैसे तुम्हें पता चला तो मंद-मंद मुस्कराइए। इससे आपके हरामीपन की धाक जमेगी।

इन दिनों फेसबुक पर कुछ ऐसे नाम कमाने वाले कथित वामांगी सक्रिय हैं। जो तमाम जगह से धकिया कर निकाले गए हैं। कोई योग्यता नहीं है। कहीं नौकरी नहीं पाते। जहां-तहां कार्यक्रमों में लड़कियों पर लार टपकाते, समोसे पर झपटते और रतजगे के लिए चुल्लूभर दारू के लिए रिरियाते हुए फिरते हैं। फेसबुक खोलते ही परमवीर हो जाते हैं। आता-जाता सालों को कुछ है नहीं, तब बताते हैं कि चांद मुंह का मुंह टेढ़ा है। खुद पड़ोस की दुकान का पांच सौ कर्जा पांच महीने से चुका नहीं पाए हैं, लेकिन संसद की गरिमा को लेकर उनकी चिंताए अगाध हैं।

लेकिन, ऐसे भी नाम होता है प्यारे।
काम का हो या न हो।

Rising Rahul : साथि‍यों, देखि‍ए ब्राह्म्‍णवाद कैसे फूट फूटकर बह नि‍कला है। ये आप ही हैं, जि‍न्‍होंने इसको ऐसे बह नि‍कलने के लि‍ए प्रेरि‍त कि‍या है। जमकर लि‍खें साथि‍यों। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कम पढ़े लि‍खे हैं और आपके पास ब्राह्म्‍णों की तरह शब्‍दों की पैनी धार नहीं है। आपके पास जि‍तना भी है, उसी से ब्राह्म्‍णवाद की चड्ढी गीली और बनि‍यान उलटी होने लगी है। बकौल Dilip C Mandal अब इनके दि‍न ज्‍यादा दि‍न नहीं। और ये इनके रूदन से स्‍पष्‍ट है। और हां, इनकी पार्टियों में बड़ी संख्‍या में पहुंचे और सारे समोसे खत्‍म कर दें। एक भी समोसा इन ब्राहम्‍णवादि‍यों के लि‍ए बचना नहीं चाहि‍ए। जय भीम।

Ram Janm Pathak : कोई राइजिंग राहुल हैं और भारत सिंह। बीस किलो घी खाकर निकले हैं। बहसातुर. मुनादी कर दो। सरनेम देख कर सबका 'वाद' पकड़ रहे हैं। इनसे बचके रहना। इनके लिए निराला ब्राह्मणवादी थे, और प्रेमचंद कायस्थवादी और गांधीजी बनियावादी। मैं तो चला, आप संभालिए इन वीरों को। नकली बाना, नकली ताना।

Rising Rahul : राम जनम पाठक। जनसत्‍ता में काम करते हैं और खुद को प्रगति‍शील कहलवाने का खासा शौक है इन्‍हें। ये कि‍तने प्रगति‍शील और लोकतांत्रि‍क हैं, ये इस स्‍टेटस पर होने वाली बहस से पता चल जाएगा, बशर्ते इन्‍होंने बहस में हि‍स्‍सा लि‍या। देर से आने वाले मेरी प्रोफाइल पर जाकर इनका पहले लि‍खा हुआ पढ़ सकते हैं जि‍समें इस प्रगति‍शील ब्राह्म्‍ण ने भारत के मास को कि‍स ब्राह्म्‍णवादी तरीके से कोसा है।

Ram Janm Pathak : टुकड़खोर नरक मचाए हैं।

Rising Rahul : हा हा हा.. अयोग्‍यता से बचने के लि‍ए ब्राह्म्‍ण इसी तरह से जनेऊ उमेठ के धोती समेट के भागा है। इसमें क्‍या नई बात है। जाते जाते ये भी बोल जाता है कि बचे खुचे ब्राह्म्‍णों, दम है तो नि‍पटो इन असुरों से। वैसे पाठक जी, आपने टुकड़ाखोरों का इति‍हास नहीं बताया। और आपकी फ्रेंड लि‍स्‍ट में ये अनि‍ल सिंह जैसे अब्राह्म्‍ण कैसे शामि‍ल हैं। या फि‍र पंकज श्रीवास्‍तव जैसे अब्राह्म्‍ण। आपका स्‍टेटस शेयर कर रहे हैं क्‍योंकि आपका दायरा उतना बड़ा नहीं, जि‍तना हमारा है। हि‍म्‍मत है तो आइये वहीं। आइये भई पाठक जी। कब तक फाटक बंद कर रजाई में घुसे रहेंगे। हमारी प्रोफाइल पर आइये ताकि दुनि‍या देखे और जाने। आपके 290 दोस्‍तों से अच्‍छा आप हमारी योग्‍यता की परीक्षा हजारों दोस्‍तों के बीच लीजि‍ए।

Bharat Singh अब गलती से निकल गया होगा मुंह से टुकडाखोर, शायद अवचेतन मन से, उसपे तो किसी का बस है नहीं ना, वो तो रंगे हाथों धरा देता है. सैकड़ों सालों से सत्ता पर कब्ज की तरह जमे कॉमरेडों को भी जब लगता है कि संपत्ति का बंटवारा हो रहा है तो वो ब्राह्मणवाद की शरण में पहुँचते हैं. जय श्री राम…
 
Rising Rahul इन्‍हीं जैसों के लि‍ए तो लि‍खी थी..
    कामरेड कारमेड,
    दि‍ल्‍ली आके बढ़ गया पेट,
    पलंग के नीचे रखा रुपया,
    छत पे जाके लड़ता पेट।
    वैसे ये फतवा भी दे रहे हैं प्रेमचंद और नि‍राला के बारे में। पक्‍के पंडि‍त हैं ये तो।
 
Hemlata Shrivastav जब आँख के अंधे नयनसुख कहलाने का आनन्द लेना चाहते हैं तो लेने दीजिये न रामजनम जी. यही आज के विभाजित भारत की अफसोसजनक कहानी है.

जनसत्ता में कार्यरत राम जनम पाठक और दैनिक भास्कर में कार्यरत राहुल पांडेय व भारत सिंह के फेसबुक वॉल से.

लगता है सूर्यकांत द्विवेदी पैसा हड़पना चाहते हैं! (शोभना भरतिया को लिखा पत्र पढ़ें)

संदीप कुमार नागर मेरठ के मवाना कस्बे में रहते हैं. अखबारों से जुड़कर पत्रकारिता का कार्य भी करते हैं. संदीप की खुद की माली हालत अच्छी है क्योंकि इनके पास खेती-बारी-बाग-बगीचे काफी हैं. कभी इनके सूर्यकांत से अच्छे संबंध हुआ करते थे. पर जबसे सूर्यकांत ने इनसे पैसे लिए और लौटाए नहीं तबसे संदीप नागर दुखी हो गए और अपने पैसे की वापसी की लड़ाई लड़ रहे. बेशर्म हिंदुस्तान प्रबंधन न तो सूर्यकांत के खिलाफ कोई एक्शन ले रहा और न ही नागर को उनके पैसे दिला रहा. क्या राजनीति की तरह अब मीडिया भी दागियों की आखिरी शरणस्थली बन चुकी है? नागर ने दुखी होकर हिंदुस्तान की मालकिन शोभना भरतिया को पत्र लिखा है जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

भड़ास तक आप अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.


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वोडाफोन कंपनी झुकी, ग्राहक को भेजेगी हिंदी में मोबाइल फोन बिल

मुंबई : वोडाफोन विश्व के १८ देशों में परिचालन करती है, भारत को छोड़कर अन्य सभी देशों में कंपनी अपने ग्राहकों को सभी जानकारी, फॉर्म, ईमेल, वेबसाइट, मोबाइल बिल आदि की सुविधा सम्बंधित देश की भाषा में ही उपलब्ध करवाती है परन्तु हमारे देश में कंपनी ग्राहकों को ज़्यादातर सेवाओं की जानकारी, बिल आदि केवल अंग्रेजी में और कहीं-२ थोड़ी बहुत जानकारियाँ किसी एक भारतीय भाषा में उपलब्ध करवाती है.

कंपनी का कहना कि भारत में ऐसा को विधिक प्रावधान नहीं कि ग्राहक को किस भाषा में सूचना दी जाये, इसलिए हम पर कोई बाध्यता नहीं है कि हम अपने ग्राहकों को हिन्दी अथवा किसी अन्य भारतीय भाषा में बिल, पत्राचार, ईमेल, वेबसाइट आदि की सुविधा प्रदान करें.

हालाँकि भारत सरकार भारतीय  दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (भादूविप्रा) के माध्यम से दूरसंचार कंपनियों को नियंत्रित करती है. यह वही भारत सरकार है जिसके संविधान में लिखा है कि भारत सरकार की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है. पर भादूविप्रा ने आज तक किसी भी मोबाइल अथवा दूरसंचार कंपनी से नहीं कहा कि ग्राहकों को उनकी भाषा में जानकारी भेजी जाए, ऐसा कोई नियम भी नहीं बनाया.  देश में अच्छी अंग्रेजी जानने वाले केवल ३% लोग हैं यानी लगभग ४ करोड़, कामचलाऊ अंग्रेजी जानने वाले ६-७ करोड़ यानी बचे बाकी एक सौ पंद्रह करोड़ लोग. जनगणना २०११ के अनुसार देश में हिंदी को अच्छे से जानने वाले  ७० करोड़ से भी ज्यादा हैं (जिसमें ५७ करोड़ की तो मातृभाषा हिंदी है)

भारत में २२ वृत्तों (हल्कों) में कार्यरत इस कंपनी के पंद्रह करोड़ से अधिक मोबाइल ग्राहक हैं. कंपनी इस बात को अच्छे जानती है कि इन १५ करोड़ ग्राहकों में ८०% ग्राहक हिंदी अच्छे से जानते हैं पर अंग्रेजी जानने वाले गिनचुने ही हैं पर यह कम्पनी फॉर्म, बिल, ईमेल आदि ग्राहकों को केवल अंग्रेजी में भेजती है, एसएमएस भी केवल अंग्रेजी में. यानी कि ग्राहक को उसकी अपनी भाषा में जानकारी नहीं दी जाती, कंपनी का आदर्श वाक्य है 'हैप्पी टू हैल्प" पर कम्पनी हिंदी के नाम पर ग्राहकों दूर भागने लगती है. अभी हाल ही में एक पोस्टपेड ग्राहक ने इस सम्बन्ध में वोडाफोन को लिखा और ज़ोरदार ढंग से इस बात को कम्पनी के उच्चाधिकारियों के सामने रखा. क्यों कि मामला किसी नियम कानून का नहीं बल्कि ग्राहक संतुष्टि का है इसलिए कम्पनी को झुकना पड़ा और कहना पड़ा कि कंपनी अपने ग्राहक को हिंदी में भी बिल भेजेगी. यदि भारत के सभी आम नागरिक इन कंपनियों से अपनी भाषा में जानकारी मांगने लग जाएँ तो सारा परिदृश्य बदलते देर नहीं लगेगी.

प्रवीण कुमार जैन
कम्पनी सचिव एवं विधिक सलाहकार
वाशी नवी मुंबई ९८१९०११८२८

Vodafonecare Mum (MUM) (vodafonecare.mum@vodafone.com)
उत्तरापेक्षी: vodafonecare.mum@vodafone.com
प्राप्तकर्ता: cs.praveenjain@gmail.com

Dear Mr. Jain,

Thank you for your email dated 08/08/13, regarding Bill in Hindi for your Vodafone mobile number 9819983708.

Further to our conversation dated 09/08/13, we wish to inform you that we have updated your request for Bill in Hindi and the same will be processed within 2 hours.

We wish to inform you that the Physical Bill in Hindi will be delivered to you within 10 working days from the bill generation date 18/08/13 on below mentioned address:

A-103 1st FLR ADISHWARA CHS
PLOT-1&2 SECTOR-9-A VASHI
NR JAIN TEMPLE
NAVIMUMBAI 400703

Mr. Jain, given below is the Service Request reference number for your request in case you need to check the status on the same, you can share this number with us.

Service Request Number: 1386211848

Also, the interaction reference number is mentioned in the subject of the email; in case you wish to write to us for the same query again, please do mention this number in your email subject line. This will help us trace your previous communications.

In case you need any further assistance, please do call or email us. We’ll do our best to help you.

Happy to help,

Rosy Thomas
Vodafone Care
Contact numbers

———- अग्रेषित संदेश ———-
प्रेषक: प्रवीण कुमार Praveen (cs.praveenjain@gmail.com)
दिनांक: 9 अगस्त 2013 1:08 pm
विषय: बिल एवं पत्राचार हिन्दी में भेजिए _मेरे पास ३ पोस्टपेड नंबर हैं
प्रति: vodafonecare.mum@vodafone.com

प्रति,
वोडाफोन ग्राहक सेवा अधिकारी
वोडाफोन इण्डिया प्रा. लि.
लोअर परेल, मुंबई

महोदय.

आज आपकी कंपनी का फोन आया और आपने हिंदी में बिल भेजने की स्वीकृति दी है. इसके लिए आपका धन्यवाद. मेरे तीनों पोस्टपेड नंबरों के लिए मुझे हिंदी में ही सभी बिल एवं ईमेल आदि भेजने की कृपा करें :

981**-83708
809**-18400
922**-60373

आम जनता के हित में मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि वोडाफोन अपने ग्राहकों को नए पोस्टपेड एवं प्रीपेड, ब्रौडबैंड कनेक्शन के फॉर्म, सेवा शर्तें आदि भी सभी ग्राहकों को द्विभाषी (बाई लिंगुअल) रूप में उपलब्ध करवाए तभी सच्चे मायनों में 'हैप्पी तू हैल्प" की सही सिद्ध होगी. सभी बिल की शब्दावली लगभग सभी ग्राहकों के लिए एक सी होती है तो एक बार हिंदी सहित भारत की भाषाओं में इन्हें तैयार करवा लीजिए और हर महीने भेजते रहिए, तभी "पावर टू यू" का जुमला लिखने का मतलब है.

आपको एकबात और बता दूं कि देश में अच्छी अंग्रेजी जानने वाले केवल ३% लोग हैं यानी लगभग ४ करोड़, कामचलाऊ अंग्रेजी जानने वाले ६-७ करोड़ यानी बचे बाकी एक सौ पंद्रह करोड़ लोग.  जनगणना २०११ के अनुसार देश में हिंदी को अच्छे से जानने वाले  ७० करोड़ से भी ज्यादा हैं (जिसमें ५७ करोड़ की तो मातृभाषा हिंदी है). आपके जो लोग ग्राहक हैं उनमें भी कमोवेश यही प्रतिशत होगा, अब आपको तय करना है कि आपको अपने कनेक्शन बेचने हैं अथवा अंग्रेजी. भारत के जिस-जिस राज्य में कंपनी  अपना प्रचालन करती है उस-२ राज्य की राजभाषा में ग्राहकों को जानकारी दी जानी चाहिए .
 

रोबर्ट वाड्रा पीआईएल में अगली सुनवाई 19 अगस्त को

लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा दायर भारत सरकार के स्तर पर डीएलएफ की मदद कर रोबर्ट वाड्रा को लाभ पहुँचाये जाने के आरोपों की जांच कराये जाने सम्बंधित रिट याचिका की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने इस सम्बन्ध में ठाकुर द्वारा पूर्व में की गयी पीआईएल की पत्रावली तलब की. जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस विनय कुमार माथुर की बेंच ने मुकदमे की सुनवाई सोमवार (19 अगस्त) नियत की. 

याचिका के अनुसार ठाकुर ने 09 अक्टूबर 2012 को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को इन आरोपों के सम्बन्ध में जांच कराने हेतु प्रत्यावेदन दिया जिस पर कोई कार्यवाही नहीं होने पर उन्होंने  इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच में रिट याचिका 8596/2012 दायर की गयी जो 03 मार्च 2013 को निस्तारित की गयी. ठाकुर को पीएमओ द्वारा आरटीआई में बताया गया कि उनका प्रत्यावेदन कार्यवाही हेतु विधि मंत्रालय भेजा गया है जिस पर ठाकुर ने 22 मार्च 2013  को विधि मंत्रालय को पत्र लिख कर कार्यवाही की मांग की. इसके बाद भी पीएमओ और विधि मंत्रालय के स्तर से कोई कार्यवाही नहीं हुई और इनके द्वारा आरटीआई में सूचना दिये जाने से भी लगातार इनकार किया जाता रहा. अब ठाकुर ने वाड्रा के खिलाफ आरोपों की जांच करा कर कानूनी कार्यवाही कराये जाने के लिए हाई कोर्ट से प्रार्थना की है.
 

चुनावी आहट से नेताओं की तर्ज पर मीडिया दलाल हुए सक्रिय

गुडगांव : चुनावी आहट से नेताओं की तर्ज पर मीडिया दलाल सक्रिय हो चुके हैं। ये मीडिया एक्सपर्ट अब खबरों का मोल भाव करने लगे हैं। जैसे जैसे केंद्र के चुनावों की आहट तेज होती जा रही है वैसे ही मीडिया दलालों की सक्रियता भी तेज हो रही है। दलाल धीरे-धीरे अपनी रंगत में लौटने लगे हैं और अपने दलाली के कारोबार को फैलाने में जुट गए हैं। हालांकि इन दलालों में आपसी मेलजोल भी नहीं है लेकिन पैसे कमाने के चक्कर में अपने मन-मुटाव को भूल रहे हैं। इन दिनों एक नेशनल हिन्दी न्यूजपेपर नेताओं के विचार छापने लगा है।

इस पेपर का दावा रहता था कि वह नेताओं को जगह नहीं देता है। पहले इस नेशनल न्यूज पेपर के ऑफिस में राजनीतिक की वही न्यूज छपती थी जिसमें धरना प्रदर्शन हुआ हो या फिर मुख्यमंत्री या केंद्र सरकार का कोई मंत्री पहुंचा हो। लेकिन इन दिनों यह न्यूज पेपर भाजपा के नेता व पूर्व मंत्री और इनेलो के पार्षद के हर क्रियाकलाप को बड़ी तवज्जो दे जा रहा है। इन दिनों राजनीति में अपना रुतबा बढ़ाने के लिए शहर में दर्जनों नेता प्रचार में लगे हैं लेकिन उनका कभी नाम नहीं दिया गया। दुनिया जानती है कि ये सब पेड न्यूज होता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लोकसभा चुनाव तक खबर छपवाने के लिए इस पेपर से पूर्व मंत्री का कांट्रेक्ट हुआ है कि वह प्रत्येक न्यूज पर लेन-देन करता रहेगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

किसानों की तरह मीडियाकर्मियों को भी अनिवार्य रूप से पांच लाख का दुर्घटना बीमा हो

कुशीनगर : किसानों की भांति अनिवार्य रूप से मीडियाकर्मियों को भी अनिवार्य रूप से पांच लाख का दुर्घटना बीमा करवाने समेत विभिन्न पांच सूत्रीय मांगों को लेकर जर्नलिस्ट वेलफेयर आर्गनाईजेशन के सदस्यों ने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन एसडीएम सदर को सौंपा। मंगलवार को कलेक्ट्रेट पहुंचे उक्त संगठन के मीडिया कर्मियों ने कहा पत्रकारिता आज के दौर में जोखिम भरा कार्य है। पत्रकारों की सुरक्षा का शासन की ओर से कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है।

मीडियाकर्मियों ने प्रदेश भर के पत्रकारों को किसानों की भांति अनिवार्य रूप से पांच लाख रुपये का बीमा करवाने, ग्रामीण व शहरी पत्रकारों को राज्य स्तरीय मान्यता प्रदान किए जाने, बस, ट्रेन के अलावा स्वास्थ्य की निश्शुल्क सुविधा प्रदान करने की मांग की।

एसडीएम सदर को सौंपे गए ज्ञापन में प्रदेश के प्रत्येक जिला मुख्यालयों पर पत्रकारों के पुनर्वास की व्यवस्था करने, मीडिया कर्मियों के आश्रितों को उच्च व तकनीकी शिक्षा संस्थाओं में अतिरिक्त सुविधा मुहैया कराने, पत्रकार संगठनों को कार्यालय भवन मुहैया कराने की मांग की गयी। ज्ञापन सौंपने वालों में जय कुमार त्रिपाठी, शंभू शरण मिश्र, अजय कुमार त्रिपाठी, ज्योतिभान मिश्र, मृत्युंजय सिंह, प्रेम शंकर सिंह सूर्यवंशी, अजय मिश्रा, हरि गोविंद चौबे, परमेश्वर यादव, ओम प्रकाश शर्मा, संतोष वर्मा, संतोष मिश्र, अफजल अंसारी, सुनील तिवारी मो. नईम आदि शामिल रहे।
 

यूपी में सरकार से बड़ा है खनन माफियाओं का तंत्र

लखनऊ : उत्तर प्रदेश में खनन माफियाओं का तिलिस्म कभी कोई सरकार नहीं तोड़ पाई या यह कहा जाये कि राजनैतिक दलों के आकाओं ने जानबूझ कर इस ओर से अपनी आंखें बंद करके रखीं तो गलत नहीं होगा। भले ही अवैध खनन के मामले में यूपी कई अन्य राज्यों से थोड़ा पीछे हो लेकिन यहां भी समय के साथ यह धंधा बढ़ता जा रहा है। नदी किनारे, पहाड़ी इलाकों का कोई भी जिला ऐसा नहीं बचा है जो अवैध खनन माफियाओं से बचा हो।

बात यहीं तक सीमित नहीं है। इससे आगे जाकर देखा जाये तो खनन माफिया राजनेताओं के ही संरक्षण मे फलफूल रहे हैं। वाइन किंग के नाम से दौलत और शोहरत बटोरने वाले पोंटी चड्ढा (अब दिवंगत) ने मुलायम और माया की मेहरबानी से अवैध खनन में खूब नाम कमाया था। आज भी उसके ही कारिंदो की यहां तूती बोलती है। कई सांसद और विधायक तो सीधे तौर पर इस धंधे में जुड़े हैं। बसपा के पूर्व नेता और मंत्री रह चुके बाबू सिंह कुशवाह का तो सीधे तौर पर अवैध खनन में नाम आ चुका है। शायद ही कोई खनन माफिया होगा जो सफेदपोश संरक्षण के बिना आगे बढ़ रहा हो।

राज्य में प्रति वर्ष अरबों रूपये का अवैध खनन का कारोबार होता है। इस धंधे से अफसरों से लेकर नेताओं तक को और चंदे के रूप में राजनैतिक दलों को आर्थिक लाभ मिलता है। ऐसा नहीं है कि खनन माफियाओं पर नकेल कसने के लिये कानूनों की कमी हो, लेकिन हरे-हरे नोटों के कारण सब कानून ताक पर रख दिये जाते हैं। अक्सर देखने में यही आया है कि सरकार से बड़ा साबित होता है माफियाओं का तंत्र। समय-समय पर अवैध खनन का धंधा खूनी भी हो जाता है। गैंगवार होती है तो खून-खराबा होता है। अवैध खनन के खिलाफ कोई आवाज उठाता है तो उसे मौत की नींद सुला दिया जाता है। नोयडा में अवैध खनन का विरोध करने वाले किसान पाले राम की हत्या इस बात का ताजा प्रमाण है। प्राकृतिक संसाधनों का अवैध खनन रोकने के लिये अदालतें हमेशा सख्त रहती हैं, इसके बाद भी कभी भी खनन माफियाओं के हौसले पस्त नहीं हुए। अगर कभी अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई होती भी है तो वह महज खानापूरी से अधिक नहीं होती।

कहने को तो यूपी के युवा सीएम खनन माफियाओं के प्रति काफी सख्त दिखने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनका जिला इटावा ही जब खनन माफियाओं का गढ़ बना हो तो हालात समझे जा सकते हैं। खनन माफियाओं के कारण चंबल, यमुना समेत कई नदियों का स्वरूप बदल रहा है। लाखों रूपये प्रतिदिन खनन माफिया ‘दान’ में बांट देते हैं। इटावा के आसपास पर्यावरण का काम करने वाले ‘फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर’ के सचिव डा राजीव चौहान कहते हैं कि सत्तारूढ दल के लोग बंदूकों की नोक पर खनन का काम करते हैं। इटावा में कई विकास के काम चल रहे है, जिसके लिये बालू की व्यवस्था इन्हीं खनन माफियाओं से हो जाती है।

नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट बताती है कि झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में पिछले पांच वर्षो में 3,200 करोड़ रुपये की राजस्व हानि उठानी पड़ीं थी। सीएजी इस संबंध में कहती है कि राज्य में बड़े-बड़े हाइवे बन गये और उसके लिये बड़े-बड़े पहाड़ों को खत्म कर दिया गया। इसके बाद भी खनन विभाग सोता ही रहा। सीएजी रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश में करीब साढ़े चार सौ मामलों में जिलाधिकारियों ने एनओसी जारी की थी, लेकिन खनन का राजस्व नहीं दिया। इससे भी सरकार को 238 करोड़ के करीब नुकसान हुआ।

आईएएस दुर्गा शक्ति का मामला सुर्खियों में आने के बाद अखिलेश सरकार और उनके करीबी नौकरशाहों ने डैमेज कंट्रोल के तहत खनन माफियाओं के खिलाफ कुछ सख्त कदम जरूर उठाये हैं। कई जगह अभियान भी चलाया जा रहा है। अवैध खनन रोकने के लिये लखनऊ में टास्क फोर्स का भी गठन किया गया है। मगर यह सब कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं। वैसे चर्चा को खनन माफिया तक ही सीमित करना उचित नहीं होगा। यूपी में करीब एक दर्जन किस्म के माफियाओं की समय-समय पर बसपा-सपा सरकार में तूती बोलती रही है। दवा, भू, जंगल, पत्थर, तेंदू, लौह, कोयला, लाल बालू, अनाज, शराब, मिट्टी आदि तमाम तरह के माफिया समय-समय पर चर्चा में रहते हैं। परीक्षा का समय होता है तो शिक्षा माफियाओं की चांदी हो जाती है।

सरकारी ठेके हासिल करने के लिये तो माफियाओं के बीच जंग का इतिहास काफी पुराना है। पूर्वांचल के अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, अखंड सिंह, ब्रजेश सिंह, मुन्ना बजंरगी, धनंजय सिंह आदि का यहां नाम हमेशा सुर्खियां में रहा है। वर्तमान में पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला भदोही के विधायक और बसपा नेता नंद गोपाल नंदी पर हमले के अरोपी विजय मिश्रा, गाजीपुर के मुख्तार अंसारी, आजमगढ़ के अखंड और कुंटू सिंह, बनारस के विनीत सिंह और सुशील सिंह का पूरा गुट एकजुट होकर अवैध खनन से लेकर अन्य तमाम वैध-अवैध धंधों में एक छत्र राज कर रहा है। इसके गुट के आका का नाम विधायक विजय सिंह बताया जाता है। इन लोगों के नाम पर ही अरबों रूपये का कारोबार होता है। बागपत से लेकर सोनभद्र तक इस गुट का दबदबा है। बात पुरानी है लेकिन अनदेखी नहीं की जा सकती है। माफियाओं ने कभी मिर्जापुर  सोनभद्र में एक लाल पत्थर के पहाड़ को इस बेदर्दी से तराश डाला कि पूरा का पूरा पहाड़ ही ध्वस्त हो गया। गोरखपुर में इन दिनों रेलवे माफिया के नाम से मशहूर सुभाष दुबे का दबदबा चल रहा है। उसके ऊपर 45 मामले दर्ज हैं। दूबे रेलवे में कर्मचारी है और बिहार के रेल माफिया राजन तिवारी का दाहिना हाथ बताया जाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खनन माफिया के साथ-साथ सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे, रंगदारी चीनी मिल मालिकों से जबरन वसूली का धंधा इन दिनों जोरों पर है। चर्चित माफिया गिरोहों में मुजफ्फर नगर के सुशील मूंछ, मेरठ के बदन सिंह बद्दो और बागपत के धर्मेन्द्र किरठल की दबंगई इस समय काफी तेजी पर है। बुलंदशहर के सपा विधायक गुड्डू पंडित का नाम भी माफिया सूची में टॉप पर है। नोयडा में अवैध  खनन के धंधे में लिप्त नरेन्द्र भाटी और उनके साथियों की चर्चा तो हो ही रही है। कानपुर में गंगा के किनारे से अवैध खनन, चमड़ा व्यापारियों से वसूली, सुपारी लेकर हत्या के मामले में अतीक पहलवान जेल से ही अपना गैंग संचालित करता है। इस गैंग को पुलिस रिकार्ड में डी-टू का कोड मिला हुआ है। इलाहाबाद में बीएसपी विधायक कपिल मुनि करवरिया उनके भाई भाजपा विधायक उदय करवरिया का बालू के अवैध खनन में कोई सानी नहीं है।

बुंदेलखंड में बाबू सिंह कुशवाह का दबदबा घटने के बाद यहां पर झांसी के सपा नेता चन्द्र पाल यादव और सपा के ही घनश्याम अनुरागी के गुर्गो ने पूरी बेतवा नदी पर ही कब्जा कर रखा है। यहां से निकली महीन और मोटी मौरंग की मांग पूरे देश है। यह जानकार आश्चर्य होगा कि बाजार में चालीस हजार रूपये प्रति ट्रक बिकने वाली मौरंग का 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खनन के समय ही इन गुर्गों द्वारा वसूल लिया जाता है। बेतवा से मौरंग का अवैध खनन करने के बाद ट्रकों को माफिया के लोग सुरक्षित रूप से 50 से सौ किलोमीटर के दायरे तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी लेते हैं। सुल्तानपुर में सोनू सिंह और मोनू सिंह का अपना सशक्त गिरोह है। सोनू सिंह हाल में ही भाजपा में शामिल हुए हैं। इलाहाबाद में संत ज्ञानेश्वर हत्याकांड में भी दोनों जेल में बंद रहे थे। सुल्तापुर, फैजाबाद, अंबेडकर नगर में इस गैंग खनन से लेकर अनेक अपराधों में तूती बोलती है। सत्ता की हनक और राजनैतिक दंबगई के बल पर गोंडा में बृजभूषण शरण, रायबरेली के अखिलेश कुमार सिंह, बलरामपुर के जहीर, लखनऊ के अरूण कुमार शुक्ला उर्फ अन्ना महाराज,रामचन्द्र प्रधान,उन्नाव के बृजेश पाठक भी अवैध धंधों का साम्राज्य स्थापित किये हुए हैं।

बात खूनी खेल की कि जाये तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसकी दस्तक पहली बार सुनाई दी। गोरखपुर में पूर्वोत्तर रेलवे में 70-80 के दशक में स्क्रैप और रेलवे के अन्य ठेकों को लेकर हरी शंकर तिवारी और वीरेन्द्र प्रताप शाही गुट के बीचं जंग शुरू हुई थी। इसी जंग के बाद जातीय आधार पर यह दोनों माफिया नेता बन कर भी सामने आए। इसी के बाद शुरू हुआ डान कहलाने वाले लोगों का विधायक और सांसद बनने का सिलसिला। यह लोग कितने ताकतवर थे इस बात का अहसास एक घटना से हो जाता है जब कोयला माफिया के सरताज कहलाने वाले सूर्यदेव सिंह के ऊपर गाज गिरी तो प्रधानमंत्री रहते हुए चंद्रशेखर उनके पक्ष में खड़े दिखाई दिए।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने 1998 में तत्कालीन गुह विभाग से प्रदेश में सक्रिय माफियाओं की बाकायदा सूची तैयार करवाई थी, जिसके अनुसार, उस समय उत्तर प्रदेश में 744 माफिया गिरोह सक्रिय थे और तब उनका सालाना टर्न ओवर दस हजार करोड़ रूपये का था। तब ही पहली बार अधिकृत रूप से यह पता चला था कि यूपी में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचा था, जिसमें माफिया सक्रिय न हो। कल्याण के इशारे पर इन माफियओं के सफाए के लए ‘स्पेशल टास्क फोर्स‘ का गठन हुआ था, कई माफिया सरगना मारे गए। इसके बावजूद माफियाओं के हौसले पस्त नहीं पड़े। 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माफियाओं के संबंध में सरकार से सरकार से रिपोर्ट मांगी तो खुलासा हुआ कि कि सभी आर्थिक क्षेत्र में माफियाओं का दखल है।

बात अवैध खनन के प्रभावों की कि जाये तो अवैध खनन का प्रभाव जगह-जगद दिखने लगा है। फैजाबाद के गुप्तारघाट के निकट बने बांध को खतरा पैदा हो गया है। यही हाल फैजाबाद के उमरपुर गांव का है, जहां धड़ल्ले से अवैध खनन किया जा रहा है। अंबेडकर नगर मेंघाघरा के तट पर अवैध खनन कर माफिया जहां राजस्व की तगड़ी चपत लगा रहे, वहीं इससे भूस्खलन और कछार के इलाकों में कटान का खतरा भी उत्पन्न हो गया है। अंबेडकर नगर के ही जहांगीरगंज थाना क्षेत्र के मांझा इसौरी नसीरपुर का है। गत 26 मार्च को यहां अवैध खनन की सूचना पर आलापुर तहसील के तत्कालीन तहसीलदार रामजीत मौर्य अमले के साथ मौके पर जा पहुंचे। इन्होंने अवैध खनन रोकते हुए कार्रवाई का निर्देश दिया तो कुछ ही पल में माफिया और उनके गुर्गे आ धमके। इन लोगों ने असलहे के बल पर तहसीलदार को बंधक बना लिया। खनन माफिया के चंगुल से छूटने के बाद तहसीलदार ने जहांगीरगंज थाने में आरोपियों आलापुर थाना क्षेत्र के पड़रौना निवासी नरेंद्र सिंह बुजेश सिंह व दो अज्ञात के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करा दी।

जिला बलरामपुर में खनन के चलते पहाड़ी नाले धीरे धीरे नदी में तब्दील हो रहे हैं। खनन के चलते कई  गांव तबाही के मुहाने पर हैं। प्रशासन का दावा है खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन रेत का काला कारोबार यहां धड़ल्ले से चल रहा है। जैसे जैसे रात का अंधेरा बढ़ता है, अवैध खनन से जुड़े लोग सक्रिय हो जाता हैं यहां हर माह अवैध खनन से लगभग एक करोड़ रूपए का वारा न्यारा हो रहा है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

अरिहंत के बाद आ गया विक्रांत, स्वदेशी तकनीक ने गाड़ दिए कामयाबी के झंडे

रक्षा क्षेत्र में महज तीन दिनों के भीतर दो बड़ी कामयाबियों ने एक नया इतिहास बना दिया है। शनिवार को विशाखापट्नम (आंध्र प्रदेश) में स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी आईएएनएस अरिहंत के परमाणु रिएक्टर चालू कर दिए गए। इस परियोजना को नौसेना की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है। क्योंकि, यह परमाणु पनडुब्बी नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएगी, तो नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा हो जाएगा।

इस कामयाबी से देश की रक्षा जरूरतों पर विकसित देशों की निर्भरता की मजबूरी भी नहीं रहेगी। सोमवार को कोच्चि (केरल) में पूर्ण रूप से स्वदेशी डिजाइन एवं तकनीक से बनाया गया विमानवाहक पोत आईएएनएस विक्रांत का भी जलावतरण किया गया। सैन्य दृष्टि से कई विशेषताओं वाला यह भारी-भरकम पोत 2018 तक पूरी तौर पर तैयार होगा। इसके बाद ही इसे नौसेना को सौंपा जाना है।

करीब 40,000 टन का वजनी एअर क्राफ्ट करियर अपने में बेमिसाल खूबियों वाला है। कोच्चि शिप यार्ड से इसे सोमवार को समुद्र में उतारा गया। इस अवसर पर रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने यही कहा था कि नौसेना के इतिहास में आज का दिन हमेशा याद किया जाएगा। क्योंकि, भारत ने अपनी तकनीक से कामयाबी के एक बड़ी मंजिल हासिल की है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन व फ्रांस के बाद भारत ऐसा छठा देश बन गया है, जिन्हें ऐसे पोत वाहक डिजाइन करने और बनाने की तकनीक में कामयाबी मिली है। 2016 से इस पोत वाहक विक्रांत के कई गहन परीक्षण शुरू हो जाएंगे। उम्मीद की जा रही है कि 2018 तक यह नौसेना के बेड़े में शामिल हो जाएगा। इस पोत वाहक में 30 लड़ाकू विमान खड़े करने की जगह है।

इस पोत में अभी तक 18,000 टन स्टील लग चुका है। 2018 तक इसमें 37,500 टन स्टील प्लेट्स लगने का अनुमान है। तय कार्य योजना के अनुसार, इस पोत की लॉन्चिंग (जलावतरण) में करीब डेढ़ साल की देरी हुई है। नौ परिवहन मंत्री जी. के. वासन के अनुसार इस पोत निर्माण के लिए जरूरी खास किस्म की स्टील आयात की जा रही थी। लेकिन, इस स्टील के आपूर्तिकर्ता दो देशों ने हीला-हवाली शुरू की थी। इसी वजह से स्टील की सप्लाई का काम ‘सेल’ को दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र की इस भारतीय कंपनी ने अच्छी गुणवत्ता वाला स्टील उपलब्ध करा दिया है। रक्षा मंत्री एंटनी ने उम्मीद जाहिर की है कि विक्रांत के बाद कोच्चि के शिप यार्ड में लगातार नए पोतों का निर्माण होता रहेगा। क्योंकि, भारतीय वैज्ञानिकों ने विक्रांत की खूबियों से यह जता दिया है कि हम किसी से कम नहीं हैं।

भारतीय नौसेना के पास पहला युद्ध पोत 1961 में रूस से आया था। इसका नाम भी आईएएनएस विक्रांत ही था। 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध के दौर में यह विमान वाहक पोत काफी मददगार साबित हुआ था। 1997 में इस पोत करियर को नौसेना से विदाई दी गई थी। इसके बाद नेवी में आईएएनएस विराट आया। जो कि 28,000 टन वाला एअर क्राफ्ट करियर है। नए विमान वाहक पोत का नाम भी आईएएनएस विक्रांत रखा गया है। यह पोत देश में बना अब तक का सबसे बड़ा विमान वाहक पोत है। रक्षा मंत्री का दावा है कि इसकी लॉन्चिंग से भारत भी उन छह देशों में शामिल हो गया है, जिनके पास इस क्षमता वाले विमान वाहक पोत बनाने की तकनीक है। सैन्य सूत्रों के अनुसार, आईएएनएस विक्रांत अपने वजन के हिसाब से दुनिया का चौथा भारी विमान वाहक पोत होगा। क्योंकि, अमेरिकी नौसेना के पास परमाणु शक्ति से चलने वाला 1 लाख टन वजन का विमान वाहक पोत है। जबकि फ्रांस, ब्रिटेन व रूस के पास 60 हजार टन श्रेणी वाले विमान वाहक पोत हैं।

भारतीय नौसेना के पास रूस में निर्मित आईएएनएस विक्रमादित्य विमान वाहक पोत है। जो कि 44 हजार टन का है। लेकिन, इसमें नए बन रहे आईएएनएस विक्रांत जैसी खूबियां नहीं हैं। चीन भी विमान वाहक पोत बनाने में जुटा है। उसका पहला विमान वाहक पोत बर्याग करीब 55 हजार टन की श्रेणी वाला है। आईएएनएस विक्रांत की लॉन्चिंग को लेकर चीन के रक्षा विशेषज्ञों ने भी कहा है कि भारतीय नौसेना की यह महत्वपूर्ण सफलता है। चीन के एक रक्षा जर्नल में कहा गया है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने जिस तरह से विक्रांत को विकसित किया है, उससे भारतीय नौसेना की ताकत काफी बढ़ जाएगी।

स्वदेशी पनडुब्बी आईएएनएस अरिहंत के परमाणु रिएक्टर सक्रिय कर दिए गए हैं। जमीन और हवा   के बाद अब समुद्र के भीतर भी परमाणु हमला करने की देश की क्षमता इस स्वदेशी पनडुब्बी की कामयाबी से बढ़ गई है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि समुद्र के भीतर से कहीं भी दुश्मन पर किसी जगह से परमाणु हमला किया जा सकता है। नौसेना और भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) ने मिलकर इसे विकसित किया है। इसमें मध्यम दूरी के परमाणु प्राक्षेपास्त्र बीओ-5 को भी तैयार किया गया है, जो कि किसी भी दिशा में 700 किमी तक निशाना साध सकता है। इसकी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रयास जारी हैं। इस तरह की परमाणु पनडुब्बी अभी तक अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस व चीन के पास ही हैं। इस तरह से भारत दुनिया का छठा देश हो गया है कि जो कि परमाणु पनडुब्बी बनाने में कामयाब रहा है।

पिछले वर्षों में तीनों सेनाओं की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि हथियारों और जरूरी संसाधनों की खरीद में अनावश्यक देरी की जा रही है। विदेशों से होने वाले हथियार सौदों में दशकों का समय लग जाता है। इससे कई बार सुरक्षा के मामलों में जोखिम लेना पड़ रहा है। कई दशकों तक पनडुब्बियों के विकास और आधुनिकीकरण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। 80 के दशक में जर्मनी के साथ हुआ एचडीडब्ल्यू पनडुब्बी निर्माण योजना का करार रद्द कर दिया गया था। जबकि इस परियोजना में भारत के करीब 15 करोड़ डॉलर खर्च भी हो गए थे। दरअसल, राजनीतिक रूप से यह हल्ला मच गया था कि इस करार में बड़ी कमीशनखोरी हुई है। इसी के चलते यह परियोजना रद्द हो गई थी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना रद्द नहीं होती, तो पनडुब्बी निर्माण के क्षेत्र में देश काफी आगे निकल गया होता।

भारत की तटीय सीमा काफी लंबी है। ऐसे में, समुद्री सीमा सुरक्षा की अहम जरूरत है। 2008 में मुंबई में आतंकी हमला समुद्र के रास्ते से ही हुआ था। इस हमले के बाद तटरक्षा की जरूरतों पर सरकार का ध्यान गया है। परमाणु पनडुब्बी अरिहंत को इस दिशा में बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। सोमवार को ही ओडिशा के चांदीपुर टेस्ट रेंज से परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम पृथ्वी-2 का सफल परीक्षण किया गया। यह मिसाइल जल्द ही सेना में शामिल कर ली जाएगी। इसका पहला टेस्ट पिछले साल दिसंबर में किया गया था। यह मिसाइल 350 किमी तक निशाना साधने में सक्षम है। इस मिसाइल में 500-1000 किलो हथियार साथ ले जाने की ताकत है। टारगेट तक ले जाने के लिए इसमें आधुनिक गाइडेंस सिस्टम लगाए गए हैं। रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने अनौपचारिक बातचीत में मीडिया से कहा है कि सैन्य मोर्चे पर उनका मंत्रालय पूरी तौर पर सक्रिय है। तमाम व्यवधानों के बावजूद रक्षा अनुसंधान कामों के लिए पर्याप्त बजट दिया जा रहा है। क्योंकि, हमारी सरकार सुरक्षा मामलों के किसी मोर्चे पर पीछे नहीं रहना चाहती। एंटनी का दावा है कि डीआरडीओ के वैज्ञानिक विकसित देशों के मुकाबले कहीं कम संसाधनों में बेहतर परिणाम दे रहे हैं। इस बात का गर्व पूरे देश को होना चाहिए।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

भास्कर वालों ने पोर्न का विरोध कर रहे समर को फेसबुक पर ब्लाक करा दिया!

पॉर्न भास्‍कर.कॉम के पत्रकारों ने जयपुर में एक होटल में हुई पारि‍वारि‍क पार्टी में युवा जोड़ों के अन्तरंग क्षणों की दर्जनों तस्‍वीरें पॉर्न भास्‍कर.कॉम पर प्रकाशि‍त कर दीं। इतना ही नहीं, पॉर्न भास्‍कर.कॉम में प्रकाशि‍त उक्‍त समाचार में डि‍स्‍क्‍लेमर तक नहीं लगाया कि ये लोग यहां क्‍यों इकठ्ठा हैं। पार्टी की पति-पत्‍नी के अंतरग पलों की तस्‍वीरें लाल घेरा बनाकर प्रकाशि‍त की गई।

जब अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या ने उक्‍त समाचार को नि‍जता का हनन बताते हुए अपनी प्रोफाइल पर पोस्‍ट कि‍या तो भास्कर डाट काम वालों ने पहले तो तुरंत सारी तस्वीरें हटा लीं और फिर समर अनार्या की पोस्ट को एब्यूज रिपोर्ट कर दी. इस अनैतिक हरामखोरी के बारे में आप क्या कहेंगे? खैर, नैतिकता के दावे करने वाले इन पोर्नकारों की हकीकत तो खुली. समर ने जानकारी दी है कि इन पोर्नकारों ने अपने साथी पोर्नकारों को कह कह के उनकी विरोध स्वरूप पोस्ट को रिपोर्ट करवाया है सो 24 घंटे के लिए ब्लाक हूँ.

‘द संडे इंडियन’ की स्टोरी को ‘टाइम्स आफ इंडिया’ ने टीपा!

गौतमबुद्ध नगर में बालू के अवैध खनन पर पत्रकार अनिल पांडे ने अप्रैल, 2013 के प्रथम सप्ताह में संडे इंडियन-हिंदी में एक इनवेस्टीगेटिव स्टोरी की थी. तब इनके सहयोगी अभिषेक कुमार और उमेश पाटिल ने अपने खुफिया कैमरे में इस अवैध कारोबार को कैद भी किया था. अप्रैल, 2013 के प्रथम सप्ताह में यह स्टोरी द संडे इंडियन के हिंदी संस्करण में प्रकाशित हुई थी (देंखे, नीचे दिया गया पहला लिंक). इसके बाद 17-24 अप्रैल, 2013 के अंग्रेजी संस्करण में भी यह स्टोरी प्रकाशित हुई, (देखें दूसरा लिंक).

इस स्टोरी में गौतमबुद्ध नगर जिले में बालू के बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन पर प्रकाश डालते हुए यह बताया गया था कि किस तरह से बालू के अवैध खनन के चलते यमुना एक साल में रास्ता बदल कर नोएड़ा की तरफ आधा किलोमीटर यानी 500 मीटर खिसक गई है. स्टोरी में सिंचाई विभाग के एक्ज्यूक्यूटिव इंजीनियर का डीएम को लिखा वह पत्र भी प्रकाशित किया गया था जिसमें यमुना के खिसकने और और बाढ़ के समय इसकी वजह से होने वाली तबाही के लिए आगाह किया गया था. जिस पर उत्तर प्रदेश के सीएम आफिस में तैनात सचिव आलोक कुमार ने तब जांच का आदेश भी दिया था.

इसके बाद नागपाल के निलंबन का मामला जब चर्चित हुआ तो अनिल पांडेय ने एक पूरक स्टोरी की कि गौतमबुद्ध नगर जिले में बड़े पैमाने पर बालू के अवैध खनन की वजह से कैसे यमुना अपना रास्ता बदल कर शहर को तबाह कर सकती है और नोएडा केदारनाथ बन सकता है. यह स्टोरी द संडे इंडियन अंग्रेजी के 4 से 10 अगस्त, 2013 के अंक में प्रकाशित हुई (देखें तीसरा लिंक). इसके बाद द टाइम्स आफ इंडिया ने 10 अगस्त, 2013 को Sand mining moves Yamuna course 500m, Noida at risk शीर्षक से इसे पहले पेज की लीड स्टोरी के रूप में प्रकाशित किया और उसी पत्र का हवाला दिया जिसे द संडे इंडियन ने चार महीने पहले ही प्रकाशित कर दिया था (देखे चौथा लिंक). यह पत्र द संडे इंडियन की वेबसाइट पर मौजूद है. टाइम्स में खबर छपने बाद कई चैनलों ने भी इस पर स्टोरी की.

अक्सर बड़े अखबार व टीवी चैनल और उनके बड़े पत्रकार दूसरे अखबारों व वेबसाइटों से खबर चुरा लेते हैं और फिर उसे प्रकाशित-प्रसारित कर वाहवाही लूटते हैं. टीवी में तो यह बड़े पैमाने पर होता है. जिस पत्रकार की स्टोरी उठाई जाती है, वह बेचारा मुंह देखता रह जाता है और श्रेय कोई और ले जाता है. बाद में बड़े पत्रकार इसी चुराई स्टोरी पर पुरस्कार भी प्राप्त कर लेते हैं. "लीपली लाइव" के पत्रकार देशभर में मौजूद हैं, जो ग्रामीण और आंचलिक पत्रकारों की स्टोरी पर खबर पर डाका डाल कर वाहवाही लूट लेते हैं.

अंग्रेजी के दो वरिष्ठ पत्रकारों की टीपने की आदत की वजह से नौकरी जा चुकी है और यह वाकया खूब खबरों में भी रहा. इस बारे में द संडे इंडियन में एक्जीक्यूटिव एडिटर के बतौर कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अनिल पांडेय कहते हैं- ''यह कोई पहला वाकया नहीं है.  करीब पांच साल पहले दिल्ली में बड़े पैमाने पर गुम हो रहे बच्चों पर द संडे इंडियन में कवर स्टोरी की थी. तब करीब दो महीने तक दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में घूम कर गुमशुदा बच्चों का ब्यौरा तैयार किया और यह मामला उठाया. लेकिन द संडे इंडियन में स्टोरी प्रकाशित होने के बाद इसे लेकर दूसरे अखबारों और चैनलों ने स्टोरी की. ऐसे में बड़े अखबार इसका श्रेय हड़प जाते हैं. भला हो फेसबुक और मीडिया वेबसाइटों का, जिसकी वजह से अब ऐसे मामले उजागर होने लगे हैं. ऐसी मेरी कई स्टोरी है जिस पर लोगों ने फालोअप किया. एक पत्रकार के नाते यह जरूर खुशी होती है कि मैं जो स्टोरी करता हूं बड़े अखबारों के बड़े पत्रकार उनका फालोअप करते हैं.''

ये हैं चारों लिकं…

शुरुआती तीन लिंक The Sunday Indian के…

http://www.thesundayindian.com/hi/story/many-firs-but-mining-are-continue/13/19633/

http://www.thesundayindian.com/en/story/operation-floods/25/47306/

http://www.thesundayindian.com/en/story/will-noida-become-another-kedarnath/24/47966/

और ये चौथा लिंक Times Of India का…

http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-08-10/noida/41266073_1_illegal-sand-dredgers-sand-mining-sand-mafia

कपिल नायक ब्यूरो चीफ बने, इनक्रीमेंट से दुखी रविकांत का इस्तीफा

यूपी के ललितपुर जिले से सूचना है कि कपिल नायक ने यहां ब्यूरो चीफ के पद पर ज्वाइन किया है. इसके पहले कपिल 'जन-जन जागरण' अखबार के स्पेशल करेस्पांडेंट, बुंदेलखंड के रूप में कार्यरत थे. कपिल दैनिक भास्कर, पत्रिका न्यूजपेपर में भी काम कर चुके हैं.

भास्कर गंगानगर से खबर है कि रविकांत ने इस्तीफा दे दिया है. दैनिक भास्कर श्रीगंगानगर (राजस्थान) की टीम घटती जा रही है. भूपिंदर सिंह के इस्तीफे व सुंदर मिश्र के सेवानिवृत्त होने सहित एक अन्य कर्मचारी के जाने के बाद से तीन पद अभी खाली थे कि डेस्क से रविकांत शर्मा ने इस्तीफा दे दिया है.

डिप्टी न्यूज़ एडिटर तरुण शर्मा के गंगानगर छोड़ एनबीटी जाने के बाद यहां अलवर से आए नीरज खत्री के रवैये से लोग काफी परेशान हैं. रविकांत के इस्तीफे का कारण उनसे उनका पद छीनना भी माना जा रहा है. तीन महीने इंतजार के बाद जब इंक्रीमेंट लेटर बंटा तो सभी के होश उड़ गए.

भड़ास से संपर्क करने या सूचना देने के लिए आप bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

बस्ती में लैपटाप वितरण के दौरान पत्रकार से बदसलूकी

यूपी के बस्ती जिले में बस्ती मण्डी परिषद में आयोजित लैपटाप वितरण कार्यक्रम में पीएसी के एक जवान ने टीवी के एक पत्रकार (News24) के साथ उस वक्त अभद्रता कर दी जब वह कवरेज के लिये कार्यक्रम स्थल पर प्रवेश कर रहा था। मेटल डिटेक्टर मशीन के पास तैनात पीएसी के जवान विनीत कुमार यादव ने मीडिया कर्मी को अंदर जाने से रोका और कुर्सी फेंककर मारा भी।

इस घटना के बाद पत्रकारों ने जब उक्त जवान से इस तरह की हरकत करने के बाबत पूछा तो पीएसी के जवानों ने कहा- जाइये जो करना है, कर लीजिये,  मगर मीडिया को अंदर नहीं जाने दिया जायेगा। इस बारे में टेलीफोन पर पत्रकारों ने एसपी और डीएम को जानकारी दी जिसके बाद एसपी ने तत्काल दोषी जवान को वहां से हटा दिया और जांच कर कार्यवाही करने की बात कही।

शातिर अपराधी हथकड़ी सहित चलती ट्रेन से कूदकर फरार

यूपी में देवरिया जिला जेल में बन्द पूर्वांचल का एक ईनामी शातिर अपराधी पुलिस कर्मियों की लापरवाही से चलती ट्रेन से हथकड़ी सहित कूदकर कर फरार हो गया। इस सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक ने तीन सिपाहियों को निलम्बित कर दिया है। बताया जा रहा कि फरार अभियुक्त पूर्वांचल का शातिर अपराधी है तथा इस पर कई जिलों की पुलिस ने ईनाम घोषित कर रखा है। पुलिस सूत्रों के अनुसार फरार अपराधी द्वारा अपने फरारी के दौरान किसी बड़े अपराध की घटना को अन्जाम भी दिया जा सकता है।

घटना के सम्बन्ध में पुलिस अधीक्षक रविशंकर छवि ने बताया कि सोमवार को अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह पुत्र दीनानाथ सिंह, निवासी ग्राम कुशहरा, थाना चिलुआताल, जनपद गोरखपुर जिला कारागार, देवरिया में थाना दुधारा, जनपद संत कबीर नगर में पंजीकृत मु0अ0सं0-603/2011 धारा 3/25 आयुध अधिनियम में निरूद्ध था। अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह को न्यायालय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, संत कबीर नगर में विचाराधीन उपरोक्त अभियोग में पेशी हेतु मुख्य आरक्षी स0पु0 राजेन्द्र प्रसाद, आरक्षी स0पु0 सुकेश सिंह एवॅ आरक्षी स0पु0 राहुल शर्मा की अभिरक्षा में जिला कारागार, देवरिया से भेजा गया था।

पेशी के उपरान्त उक्त तीनों पुलिस कर्मी अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह को डेमो पैसेन्जर ट्रेन से लेकर देवरिया आ रहे थे कि जनपद देवरिया की सीमा में बैतालपुर रेलवे स्टेशन एवॅ देवरिया सदर रेलवे स्टेशन के बीच में एफ0सी0आई0 गोदाम के पास अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह ने लघुशंका के लिये जाने की बात कही।

पुलिस अधीक्षक के अनुसार अभियुक्त के स्कोर्ट में लगे आरक्षी सुकेश सिंह एवं राहुल शर्मा अभियुक्त को ट्रेन के शौचालय में लघुशंका के लिये लेकर जाने लगे। ट्रेन के दरवाजे के पास पहुंचते ही अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह आरक्षी सुकेश सिंह को धक्का देकर सोमवार को समय रात्रि लगभग 8-30 बजे चलती ट्रेन से कूदकर फरार हो गया। अभियुक्त को पकड़ने हेतु आरक्षी सुकेश सिंह भी चलती ट्रेन से कूद गया, किन्तु अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह भागने में सफल रहा। अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह के हाथ में हथकड़ी एवं रस्सी लगी है। चलती ट्रेन से कूदने के कारण आरक्षी सुकेश सिंह के सिर एवं कमर में गम्भीर चोटें आयी हैं जिसे उपचार हेतु मेडिकल कालेज, गोरखपुर रेफर किया गया है।

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि घटना के सम्बन्ध में थाना जी0आर0पी0, देवरिया सदर में मु0अ0सं0-113/2013 धारा 223/224 भा0द0वि0 पंजीकृत कराया गया है। अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह की गिरफ्तारी हेतु जनपदीय पुलिस की टीमें भी लगायी गयी हैं। अभियुक्त चन्दन सिंह उर्फ देवकीनन्दन सिंह को पेशी हेतु ले जाने वाले उपरोक्त तीनों पुलिस कर्मियों को ड्यूटी में लापरवाही बरतने के आरोप में निलम्बित कर दिया गया है।

OUTLOOK STAFF REACH OUT-OF-SETTLEMENT

: Press Club backs employees strongly :  Employees of PEOPLE magazine in Mumbai negotiated with the Outlook management, to arrive at a peaceful financial settlement last week.As a result all 17 employees led by Editor Saira Menezes who had taken the management to the Mumbai Labour Court later withdrew their case.

The employees were satisfied that the settlement had been done as per the process of law directed by the honourable Labour Court presided by Mr P K Chitnis. The Outlook management had in the last week of July announced the closure of its international franchise brands PEOPLE, Marie Claire and GEO.

The announcement was first conveyed to the trade and public through an official statement issued by Outlook President Indranil Roy through social media. Only the following day  the employees of PEOPLE were informed officially by him. Fearing termination and a delay in arrears and dues, PEOPLE employees in Mumbai had approached the Labour Court in Bandra seeking a stay on the likelihood of termination till dues are paid.

Their appeal had been upheld by the court which directed the Outlook management to follow the process of law. Several media bodies including the Press Club Mumbai had expressed solidarity with the employees of PEOPLE who had approached the court. In a strongly worded letter to the Outlook management, the Press Club, Mumbai  had sought immediate steps from the Outlook management to resolve the matter. The court had kept August 6 as the date for hearing and had also  summoned the management with its response. One day before the scheduled hearing, on August 5,   the Outlook management met the PEOPLE employees and resolved the matter resulting in the case being withdrawn.

Secretary

Press Club, Mumbai

खराब हो रहे गेहूं की फोटो खींचने पर कर्मियों ने पत्रकारों को धमकाया

पंजाब के गुरदासपुर से खबर है कि अनाज मंडी में बारिश से खराब हो रही गेहूं की फोटो खींचने पर पनसप के कर्मचारी आग बबूला हो गए और उन्होंने पत्रकारों को देख लेने की धमकियां तक दे डालीं। कुछ पनसप कर्मियों का कहना था कि यदि वह पत्रकारों को महीना भरते हैं तो खबर लगाने की हिम्मत किसकी? शांतिमय ढंग से करवेज कर रहे पत्रकारों के कैमरों पर भी हाथ डाला गया। कुछ पत्रकार 15 अगस्त की रिहर्सल की कवरेज कर रहे थे कि उन्हें दाना मंडी में किसी तरह की बदबू महसूस हुई। जब उन्होंने मंडी के पीछे जाकर देखा तो वहां पर गले-सड़े गेहूं के ढेर लगे हुए थे जिनमें से बड़ी बदबू उठ रही थी।

पत्रकारों ने जब खराब हो रहे गेहूं की फोटो खींची तो वहां पर मौजूद पनसप के एक इंस्पेक्टर ने उन्हें फोटो खींचने से मना किया व फोटोग्राफर का कैमरा छीनने के लिए भागा। इसी बीच उसने अपने दो अन्य सहयोगियों को भी बुला लिया। जब अधिकारियों से खराब हो रहे गेहूं के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि वह फोटो नहीं खींच सकते क्योंकि पत्रकारों को महीना भरा जा रहा है। उक्त अधिकारियों ने पत्रकारों को जानी व माली तौर पर नुकसान पहुंचाने की धमकियां भी दीं। इस घटना के बाद एकत्रित हुए पत्रकार भाईचारे का एक शिष्टमंडल डीसी गुरदासपुर डा. अभिनव त्रिखा से मिला और उन्हें लिखित रूप में शिकायत की। पत्रकारों ने डीसी को यह आग्रह भी किया यह बात सामने लाई जाए कि कौन पत्रकार हैं जिन पर महीना भरे जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। डीसी गुरदासपुर ने उक्त शिकायत पर तुरंत कार्रवाई करने का आश्वासन देते हुए मामले की जांच का जिम्मा एसडीएम गुरदासपुर को सौंप दिया है।

देवेश वशिष्ठ, तनवीर हुसैन, अखिलेश तिवारी की नई पारी

ए2जेड न्‍यूज चैनल से एंकर देवेश के. वशिष्ठ ने इस्‍तीफा दे दिया है. बताया जा रहा है कि वे लाईव इंडिया न्यूज चैनल के साथ दुबारा जुड़ गए हैं. देवेश ए2जेड न्‍यूज चैनल में एंकर कम प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत थे. देवेश इंडिया न्‍यूज,  लाईव इडिंया, चैनल वन न्यूज, MH1 न्यूज, voice of india आदि में काम कर चुके हैं.

एक अन्य सूचना के मुताबिक तनवीर हुसैन ने चैनल वन न्यूज़ छोड़ दिया है. उन्होंने साधना न्यूज़ स्टेट हेड उत्तर प्रदेश के बतौर ज्वाइन किया है. तनवीर हुसैन इससे पहले 4रियल न्यूज़ और चैनल वन न्यूज़ के ब्यूरो चीफ उत्तर प्रदेश रह कर चैनल को सेवाएं दे चुके हैं.

आगरा हिंदुस्तान से खबर है कि अखिलेश तिवारी ने इस्तीफा दे दिया है. सूत्रों का कहना है कि इनके साथ काफी दिनों से ज्यादती हो रही थी. एक के बाद एक बीट वापस लेकर लगातार नीचा दिखाने की कोशिश हो रही थी. आखिर इन्होंने ही हिंदुस्तान का दामन छोड़ दिया.  वे एक अन्य प्रमुख अखबार में जा रहे हैं.

शैलेंद्र भदौरिया जी, पीएफ और टीडीएस का पैसा तो जमा करवा दीजिए!

भड़ास को एक मीडियाकर्मी ने मेल करके सूचित किया है कि शैलेंद्र भदौरिया अपने नेशनल दुनिया अखबार की जैसी तस्वीर पेंट कर रहे हैं, असली तस्वीर इससे बिलकुल उलट है. इनका मेरठ एडिशन बंद होने की कगार पर है. आंतरिक राजनीति और खराब कंटेंट की वजह से अखबार बुरी तरह पिट चुका है. जयपुर में प्रिंट आर्डर पच्चीस हजार का था लेकिन बिकी सिर्फ बाइस सौ कापियां. दिल्ली में अखबार सिर्फ प्रतीकात्मक उपस्थिति दर्ज कराने के लिए निकल रहा है.

अखबार का न तो सर्कुलेशन है और न ही कंटेंट में कोई दम. यही नहीं, दिल्ली में कार्यरत मीडियाकर्मियों का टीडीएस और पीएफ मैनेजमेंट ने काटा लेकिन इसे आजतक जमा नहीं किया गया है. इस ग्रुप के मीडियाकर्मियों की शिकायत है कि इन्हें समय पर वेतन नहीं दिया जाता. ऐसे में शैलेंद्र भदौरिया से अपील है कि वे जहां चाहें वहां से अपना अखबार निकालें लेकिन कम से कम जो मीडियाकर्मी उनके साथ जुड़े हुए हैं, उनसे तो अन्याय ना करें.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


अगर आपको भी किसी मीडिया संस्थान से कोई शिकायत हो तो अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.


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निशिकांत से सटे तो नपे, एनसीआर से गैंग के सफाई का अभियान तेज

बेचारे निशिकांत ठाकुर. मानकर बैठे थे कि ताउम्र वे ही राज करेंगे और जिसे चाहे अखबार के भीतर या अखबार के बाहर हीरो बना देंगे या जीरो कर डालेंगे. पर जब जब ऐसी गलतफहमी जिन जिन ने पाली, उनके घमंड अहंकार का नाश हुआ. निशिकांत के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. बुढ़ापा, खराब सेहत और ढेर सारे आरोपों से घिरे निशिकांत ठाकुर के करीबियों का एक एक कर विकेट गिर रहा है. अब तो लोग भी निशिकांत से मिलने-जुलने में घबराने लगे हैं क्योंकि दैनिक जागरण, नोएडा और इससे जुड़े लोगों में यह चर्चा आम हो गई है कि जो भी निशिकांत ठाकुर से सटा, समझो वो नपा.

उगते सूरज को प्रणाम करने वाली इस दुनिया में लोग माहौल बदलते देख खुद की निष्ठा बदलने में पल भर देर नहीं लगाते. जो लोग कल तक खुद को सीजीएम निशिकांत का करीबी बताते हुए संपादक विष्णु त्रिपाठी के खिलाफ यहां वहां ढेर सारा जहर उगलते मिल जाते थे, वे लोग अब निशिकांत से दूरी बना चुके हैं और विष्णु त्रिपाठी की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं.

ताजी सूचना के मुताबिक कविलाश को डेस्क पर भेजे जाने का बाद दिल्ली लोकल का प्रभारी सौरभ श्रीवास्तव को बना दिया गया है. ग्रेटर नोएडा की जिम्मेदारी मनोज त्यागी को दिए जाने की सूचना है. पूर्वी दिल्ली की जिम्मेदारी सुधीर कुमार को दी गई है. अगर इन बदलावों के बारे में आपको पक्की सूचना हो तो भड़ास को सूचित करें, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके. मेल भेजने वाले का नाम गोपनीय रखा जाएगा.

प्रभात शुंगलू किस चैनल और किस सक्षम पत्रकार की बात कर रहे हैं?

प्रभात शुंगलू पढ़ने लिखने वाले पत्रकार हैं. आईबीएन7 से विदा होने के बाद प्रभात ने कई नौकरियां पकड़ी और छोड़ी. वे खाली समय में किताब लेखन से लेकर घूमने-फिरने समते कई तरह के क्रिएटिव काम करते हैं. उन्होंने फेसबुक पर एक चैनल के बारे में इशारा करते हुए कई बातें कही हैं. प्रभात शुंगलू की छवि एक सीरियस जर्नलिस्ट की है. उनकी बात में दम होता है. तो, उन्होंने जो कुछ कहा है, उसे पढ़कर यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर किस चैनल और उस चैनल के किस शख्स के बारे में प्रभात शुंगलू बातें कर रहे हैं.

हालांकि प्रभात शुंगलू को चाहिए था कि वे नाम के साथ लिखें, क्योंकि ऐसा न करने पर उनसे खुद सवाल पूछा जाएगा कि आपको किसका डर जो आप नाम लिखने से डर रहे और जब आप नाम लिखने से डर रहे तो कैसे माना जाए कि आप गलत का भरपूर विरोध करने की ताकत हैसियत रखते हैं? वैसे, कुछ लोगों का कहना है कि ये प्रभात शुंगलू की निजी भड़ास भी हो सकती है, वजह ये कि कभी वो इस चैनल में काम किया करते थे और एक दिन उन्हें इस चैनल से अचानक जाने को कह दिया गया है. फिलहाल यहां प्रभात शुंगलू का फेसबुकी स्टेटस और उस पर आए कमेंट प्रकाशित हैं.

अगर आपको पता हो कि प्रभात जी किस चैनल और किस शख्स के बारे में ये बातें कर रहे हैं, तो प्लीज मुझे भी बताइएगा. वैसे, एक पत्रकार ने फोन कर बताया कि जो डर प्रभात शुंगलू को चैनल व चैनल के आदमी का नाम नहीं खोलने दे रहा, वही डर चैनल के उस सक्षम आदमी को छंटनी करने से रोक देने का साहस नहीं पैदा करने दे रहा. ये अलग बात है कि डर कई प्रकार के होते हैं और डर काम करने लगे, इसके लिए इसकी मात्रा हर आदमी के लिए अलग-अलग होती है.

-यशवंत सिंह, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Prabhat Shunglu :  एक टॉप टेन में आने वाले हिंदी चैनल में छंटनी होने वाली है। लिस्ट बनाने का काम उन संपादक टाइप लोगों को सौंपा गया है जिनकी वजह से चैनल की पिछले सात सालों में ये गत हुई है। यानि कि गुनहगार बच जाएंगे। जो वाकई सक्षम हैं और संपादक टाइप लोगों की चाकरी नहीं करते वो जल्द चैनल से बाहर होंगे। किंतु एक आदमी ऐसा होने से रोक सकता है। लेकिन वो चुप रहेगा। जैसा कि वो पिछले सात सालों में चैनल की छीछालेदर होते देखता रहा मगर चुप रहा। वो बहुत ही भला मानूस है।
 
    Shravan Kumar Shukla हां! आईबीएन7 जैसे चैनल की यही हालत है प्रभात जी!
 
    Raju Sajwan सर, बेशक आप एक चैनल की बात कर रहे होंगे, लेकिन जिस भी चैनल या प्रिंट में छंटनी होती है, उस सबमें भी ऐसा ही होता है
   
    Nishant Goel सर इस तरह की पत्रकारिता का कोई सरोकार है क्या?
    
    Suman Pal प्रभात जी, अच्छी प्रतिभा सस्ते में बाजार में उपलब्ध होने वाली है।
     
    Mohammad Faizan Tahir Sir ji kahin wo chehra apka to nahi h
     
    Recha Bajpai Hamam me sab nange hai sir….nobody is clear n honest…m sry for my cmnt but its a reality of few news channel
     
    Sidharth Singh You r right channel ho ya news paper chaplusi har kahi havi ho gai h…
     
    Abhishek Upadhyay Mera qatil hi mera munsif hai. Kya mera haq main faisala dega :):)
 
    Girijesh Vashistha चैनल हमेशा मैनेजमेंट के गलत फैसलों से ही गिरते हैं । कर्मचारी तो बस बेरोजगार हो जाते हैं
 
    Rohit Ghosh Chataai har keemat per…
   
    Maheep Maheepkumarsingh sir media me jayada tar log gunahgar aur chaploosh logon ki wajah se hi ye ho raha hai gunehgar hamesha bachh jata hai… patrakarita kam chatukarita jayada ho gayi hai sir
     
    Ajay Tiwari Khub Bhalo…….
     
    Shaquib Khan भाई प्रभात ज़रा भले मानुष का नाम भी तो बताएये ।
     
    Ganesh Sharma Bhurtel ek bechara mass communication karke 15000/ paane ke liye aatur hai toh dusra mitthaai bechne wala 100000/ ke kareeb panhuncha hua hai…………ye sab HOD ki dein hai mere bhai…… gita saar padho aur sab bhul jao………… bas ek samay hi balwaan hai.
     
    Ganesh Sharma Bhurtel HODs ki manmaani hi channel ko kha jaati hai….

(प्रभात शुंगलू के फेसबुक वॉल से.)

मैंने आज आईएएस सूर्य प्रताप सिंह को बर्खास्त करने की याचिका दायर की है

Sanjay Sharma : मैंने आज हाईकोर्ट में प्रमुख सचिव अवस्थापना एवं ओद्योगिक विकास सूर्य प्रताप सिंह को बर्खास्त करने की याचिका दायर की। मुझे इस बात का बहुत आश्चर्य था कि अगर कोई सामान्य कर्मचारी बिना बताये एक साल नौकरी से गायब हो जाता है तो उसे तत्काल बर्खास्त कर दिया जाता है मगर आईएएस के लिए मानो सारे गुनाह माफ़ होते है। सूर्य प्रताप सिंह पिछले 9 सालों से गायब थे और जैसे ही बापस आये तो सबसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात हो गए.

क्या इनके लिए कोई नियम, कोई संविधान नहीं है? इनसे किसी ने नहीं पूछा कि इतने सालों तक अमेरिका में क्या करते रहे? खर्चा कैसे चला? क्या इतने साल बाद बापसी किसी विदेशी इशारे पर तो नहीं हुई ? अभी भी प्रदेश के कई आईएएस सालों से गायब है। मेरी याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई होगी। मैंने केंद्र सरकार को भी नोटिस देकर कहा है कि इन अफसरों का लेखा जोखा रखने बाले डीओपीटी को निर्देशित करे कि स्टडी लीव पर जाने बाले सभी अफसरों का पूरा विबरण अपनी वेबसाईट पर प्रकाशित करे।

बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है यह। हमारे प्रदेश में अफसर कम है और यहाँ के अफसर बिना बताये विदेश में सालो तक घूमते है। जमकर पैसा कमाते है और यहाँ आकर बची हुई तन्खाव्ह ले लेते है। मेरी जानकारी के मुताविक सूर्य प्रताप सिंह को भी इतने सालों की तन्खवाह लगभग एक करोड़ रुपया भी दे दिया जायेगा। धन्य है हमारा सिस्टम।

    Ashwini Singh Commendable Work Sanjay Sharma ji.
 
    Abhinav Pandey http://ibnlive.in.com/news/journalist-files-plea-in-hc-seeking-proper-rules-for-ias-officers-study-leave/413943-3-242.html
    Journalist files plea in HC seeking proper rules for IAS officers' study leave
    ibnlive.in.com
    A writ petition was on Tuesday filed in the Allahabad High Court seeking directi…See more
 
    Sanjay Sharma Ashwini Singh..Thnx Sir ..
   
    Sanjay Sharma @Abhinav pandey ..Shukriya ..
    
    Abhinav Pandey चलो कोई तो खुल कर सामने आया, बधाई आपको ऐसे अधिकारीयों की सुध लेने के लिए… हमारे भॊले मुख्यमंत्री जी को शायद सिंह साहब के बारे में ये न पता हो।See Translation
     
    Sanjay Sharma Abhinav Pandey..शुक्रिया भाई ..सही कह रहे है आप ..मुख्यमंत्री जी बहुत व्यस्त रहते है .See Translation
     
    Acharya Sushil Gangwar jai ho
     
    Mohtashim Khampur sharma sahab bahut acha kam kiya h
     
    Sanjay Sharma Acharya Sushil Gangwar , Mohtashim Khampur..Thnx.
     
    Riaz Khan Thamk you sanjay ji,aap ye karya bada sarhaniya hai
     
    Afzal Rana good job sir
     
    Shubh Shubhs Remarkable step . . . Good job done and best of luck for the case
     
    Sanjay Sharma Riaz Khan, Afzal Rana…Thnx..
     
    Sanjay Sharma Shubh Shubhs…Shukriya .
     
    Vikrant Mendiratta bhaiya well done bhaiya.hats off
     
    Sanjay Sharma Vikrant Mendiratta…Thnx Sir..
     
    Manish Pandey bahut acha kiya yaar
     
    Sanjay Sharma Manish Pandey…Shukriya Bhai.
     
    Pankaj Sharma Bhai kam kamal kia hai.
     
    Sanjay Sharma @Pankaj Sharma..TAHNX.
     
    Ankit Mall wow sir !!!
     
    Being Ankit Kanaujia Good spirit 4the people.
    Atlest koi to honest person mila. Thnx4ths.
 
    Sanjay Sharma Being Ankit Kanaujia…Thnx Bhai..
 
    Sneh Madhur वाह, संजय शर्माजी, बधाई आपको। लगता है कि आप भी नौकरशाही में सफाई के अभियान में जुट गए हैं। जब कलम का लिखा प्रदेश के मुखिया को न दिखाई दे तो सक्रिय पत्रकार को भी अपने को सही साबित करने के लिए कोर्ट की ही शरण लेनी पड़ती है। अब कोर्ट ही बताए कि नियम-कानून के अनुसार कौन सही है?

     Shaminder Sehdev bahut badiya… kisi ko to safai karni hi padegi.
   
    Janki Sharan Dwivedi srahniy kadam
    
    Sanjay Sharma Sneh Madhur..शुक्रिया स्नेह भाई ..हालात देख कर रुका नहीं जाता .See Translation
     
    Sanjay Sharma Shaminder Sehdev..शुक्रिया ..सही कहा आपने .See Translation
     
    Sanjay Sharma Janki Sharan Dwivedi..Thnx.
     
    DrAshish Vashisht ऐसे चंद नौकरशाहों की वजह से दूसरे ईमानदार अफसरों को मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, बढिय़ा मुद्दा आपने उठाया है। सरकार को नौकरशाहों की ऐक्टिविटी की पूरी जानकारी रखनी चाहिए, इन्हें बेलगाम छुट्टा छोडऩा ठीक नहीं है। अगर नौकरशाहों को पढऩे और पढ़ाने का इतना ही शौक है तो वो आईएएस या इसके समकक्ष सर्विस में आकर सीट न खराब करें।
     
    Sanjay Sharma DrAshish Vashisht..अगर बास्तव में पढ़ रहे हो तो भी ठीक है मगर यहाँ तो पढाई के नाम पर बस….
 
    Ranvirsingh Sengar Aap Sanjayji ko Mera full support
 
    Sanjay Sharma Ranvirsingh Sengar Aap…Shukriya Bhai..
   
    Syed Javed Husain No body is above the law !!!
    
    Brijesh Singh sir sahi point out kiya aapne iska jawab milna chahiye m wid you
     
    Nutan Thakur बहुत अच्छा संजय जी, यह आपने बहुत समुचित मुद्दा सामने रखा है. आप इसके लिए बहुत बधाई के पात्र हैं. बहुत जरूरी बात आपने कही है इस रिट में
     
    Abbas Bahadur kam log takkar layte hai
     
    Rajesh Kumar thanks for this
     
    Anurag Saxena ye bahut sahi isue uthaya hai aapne, IAS apne ko law se uper samajhne lage hai netao ki tarah
     
    Brijesh Singh इस तरह के मामले जनता तक पहुँच ही नहीं पाते है। शुक्रिया जन जागरण के लिए…See Translation
     
    Sanjaya Kumar Singh पहले जो काम एक खबर से हो जाता था उसके लिए अब पत्रकारों को अदालत की शरण लेनी पड़े तो डूब मरें अखबार वाले। एक याचिका इसके लिए भी होनी है, शायद मैं ही करूं। आखिर खबर क्या है – यह तय तो हो।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा के वॉल से.


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जिस आईएएस को बर्खास्त होना चाहिए था, वो सपा सरकार में वीवीआईपी बन गया, पीआईएल दायर

जिस आईएएस को बर्खास्त होना चाहिए था, वो सपा सरकार में वीवीआईपी बन गया, पीआईएल दायर

प्रिय महोदय, मैंने आज हाईकोर्ट में प्रमुख सचिव अवस्थापना एवं ओद्योगिक विकास सूर्य प्रताप सिंह को बर्खास्त करने की याचिका दायर की। मुझे इस बात का बहुत आश्चर्य था कि अगर कोई सामान्य कर्मचारी बिना बताये एक साल नौकरी से गायब हो जाता है तो उसे तत्काल बर्खास्त कर दिया जाता है मगर आईएएस के लिए मानो सारे गुनाह माफ़ होते है। 

सूर्य प्रताप सिंह पिछले 9 सालों से गायब थे और जैसे ही वापस आये तो सबसे महत्वपूर्ण पद पर तैनात हो गए, क्या इनके लिए कोई नियम, कोई संविधान नहीं है। इनसे किसी ने नहीं पूछा कि इतने सालों तक अमेरिका में क्या करते रहे? खर्चा कैसे चला? क्या इतने साल बाद वापसी किसी विदेशी इशारे पर तो नहीं हुई? 

अभी भी प्रदेश के कई आईएएस सालों से गायब हैं। मेरी याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई होगी। मैंने केंद्र सरकार को भी नोटिस देकर कहा है कि इन अफसरों का लेखा जोखा रखने बाले डीओपीटी को निर्देशित करे कि स्टडी लीव पर जाने वाले सभी अफसरों का पूरा विवरण अपनी वेबसाईट पर प्रकाशित करे। बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है यह। 

हमारे प्रदेश में अफसर कम है और यहाँ के अफसर बिना बताये विदेश में सालो तक घूमते हैं। जमकर पैसा कमाते हैं और यहाँ आकर बची हुई तन्खाव्ह ले लेते हैं।  मेरी जानकारी के मुताविक सूर्य प्रताप सिंह को भी इतने सालों की तन्खवाह लगभग एक करोड़ रुपया भी दे दिया जायेगा। धन्य है हमारा सिस्टम।

संजय शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार

लखनऊ

मोबाइल-  09452095094


मूल खबर :

भगोड़े आईएएस सूर्य प्रताप सिंह को अखिलेश ने प्रमुख सचिव बना दिया!

पीसीआई में गंभीर बहस-विमर्श का दौर शुरू, मानव तस्करी का मुद्दा लोकसभा तक पहुंचा

दिल्ली में रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया में इन दिनों गंभीर बहस और सेमिनार का दौर शुरू हो चुका है. प्रेस क्लब मैनेजिंग कमेटी की सदस्य और डिस्कसन कमेटी की हेड पत्रकार विनीता यादव के प्रयासों से बीते तीन अगस्त दिन शनिवार को मानव तस्करी पर एक डिस्कशन प्रेस क्लब आफ इंडिया में रखा गया था. ह्यूमन राइट्स की तरफ से 2005 में भारत में मानव तस्करी पर एक रिपोर्ट का प्रकाशन किया गया था.

विनीता यादव
विनीता यादव
आठ साल बाद अब संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ से पहली बार भारत में मानव तस्करी पर रिपोर्ट तैयार कर इसे जारी किया गया. प्रेस क्लब में 'सैटरडे टॉक' के लिए तीन अगस्त को यही विषय रखा गया. इसमें भारत सरकार की तरफ से विनोद टिक्टू (एनसीपीसीआर), मानव तस्करी पर सुप्रीम कोर्ट पैनल के सदस्य रविकांत, एचएक्यू की तरफ इनाक्षी गांगुली ने विमर्श में हिस्सा लिया. इसमें वक्ताओं ने बताया कि भारत में मानव तस्करी का मुख्य केंद्र दिल्ली बन चुका है. इस डिस्कशन पर लंबी चौड़ी खबरें अखबारों में छपीं और कुछ चैनलों पर दिखाई गईं. मानव तस्करी ऐसा विषय है जिस पर हर शख्स को जागरूक होना जरूरी है, खासकर दिल्ली में रहने वालों को, ताकि इस बेहद घृणित धंधे पर लगाम लग सके.

एबीपी न्यूज की तेजतर्रार पत्रकार विनीता यादव के प्रयासों से आयोजित इस विमर्श को सफल बनाने में प्रेस क्लब महासचिव अनिल आनंद ने भी महती भूमिका निभाई. डिस्कशन में देश विदेश के सैकड़ों पत्रकार मौजूद थे और बेहद सफल आयोजन रहा. इसकी सफलता का आंकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि इस डिस्कशन के बाद मीडिया में मानव तस्करी को लेकर आई रपटों के बाद लोकसभा में कई सांसदों ने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया और इस खौफनाक धंधे को बंद कराने के लिए उचित कार्यवाही की मांग की.

‘ओम’ के उच्चारण से सेक्स लाइफ पर सकारात्मक प्रभाव!

बेहतर सेक्स लाइफ और सेक्स के दौरान ऑर्गेज्म की स्थिति तक पहुंचना अगर आपके निजी जीवन की सबसे बड़ी गुत्थी रही है तो इसे सुलझाने का बेहद आसान और सेहतमंद उपाय आप जरूर जानना चाहेंगे। हाल में 51 वर्षीय हॉलीवुड अभिनेत्री कैरन लॉरी का दावा है कि उन्होंने रोज ध्यान के दौरान 'ओम' के उच्चारण से एक दिन में 11 बार ऑर्गेज्म का अनुभव किया है। उनका मानना है, 'ओम के उच्चारण का प्रभाव न सिर्फ मस्तिष्क पर पड़ता है बल्कि हार्मोन और भावनाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।

कई शोधों में यह माना गया है कि हर दस में से एक महिला सेक्स के दौरान ऑर्गेज्म का अनुभव नहीं कर पाती है लेकिन दिन में 15 मिनट भी अगर ओम का उच्चारण करें तो सेक्स लाइफ बहुत बेहतर हो सकती है।' हॉलीवुड फिल्मों में अभिनय के अलावा पूर्व प्लेबॉय की मॉडल व सुपर मॉडल रह चुकीं लॉरी का मानना है वह पिछले 20 सालों से ध्यान के दौरान ओम का उच्चारण कर रही हूं और उम्र के इस पड़ाव पर भी मैं इससे बेहद संतुष्ट हूं। उनकी प्रशिक्षक निकोल डेडोन का मानना है कि रोज ध्यान के दौरान ओम का उच्चारण करने से शरीर अधिक संवेदनशील हो जाता है जिसका हमारी सेक्स लाइफ पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

चारा घोटाला में नहीं बदलेंगे जज, सुप्रीम कोर्ट से लालू को झटका

चारा घोटाला मामले में आरोपी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के अध्यक्ष लालू प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने लालू प्रसाद की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आरजेडी सुप्रीमो ने मामले की सुनवाई कर रहे जज को बदले जाने की मांग की थी. चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के सामने लालू प्रसाद यादव के वकील ने दलील दी थी कि चारा घोटाले के मुकदमे की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश पी के सिंह उनके साथ पक्षपात कर सकते हैं क्योंकि वह नीतीश कुमार सरकार में शिक्षा मंत्री पी के शाही के रिश्तेदार हैं.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम, न्यायमूर्ति रंजन प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने कहा कि किसी जज का मंत्री से रिश्तेदारी होना उसे बदलने की वजह नहीं हो सकता. मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को अपनी दलील रखने के लिए पांच दिन का और बचाव करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया है. अगर लालू यादव इस मामले में दोषी पाए जाते हैं. वो अगला चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. गौरतलब है कि लालू प्रसाद ने अपने खिलाफ इस मामले को झारखंड स्थित सीबीआई की अदालत से किसी भी अन्य सक्षम अदालत में स्थानांतरित किए जाने के लिए नौ जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.
 

पाक ने आज आठवीं बार तोड़ा सीजफायर, भारतीय चौकियों पर की गोलीबारी

पाकिस्तानी सैनिकों ने पिछले चार दिन में आठवीं बार मंगलवार को सुबह फिर से संघर्ष विराम का उल्लंघन किया और जम्मू-कश्मीर के सांबा जिले में भारतीय सीमा चौकियों को निशाना बनाकर गोलियां चलाईं। इसके बाद वहां दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई। सीमा सुरक्षा बल के एक अधिकारी ने बताया कि आज सुबह साढ़े सात बजे सांबा जिले के रामगढ़ की नारायणपुर अग्रिम सीमा चौकी पर पाकिस्तानी रेंजरों ने गोलियां चलाईं। उन्होंने बताया कि ये गोलियां पाकिस्तान की अशरफ चौकी से चलाई गईं। सीमा की सुरक्षा कर रहे सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों ने इसका करारा जवाब दिया, जिसके बाद दोनों ओर से भारी गोलीबारी हुई।

उन्होंने बताया कि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ है। गोलीबारी की घटना के मद्देनजर जवानों को सतर्क रहने को कहा गया है। पाकिस्तान की ओर से बार-बार किए जा रहे सीजफायर के उल्लंघन और गोलीबारी को देखते हुए बीएसएफ के महानिदेशक सुभाष जोशी ने कल जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित अग्रिम इलाकों का दौरा किया और सुरक्षा हालात का जायजा लिया। जोशी ने जम्मू में खुफिया ब्यूरो के अधिकारियों के साथ ताजा हालात के बारे में बातचीत की और अपने फील्ड कमांडरों के साथ संचालनात्मक मुद्दों पर गहन चर्चा की। पाकिस्तानी सैनिकों की ओर से सीमा चौकियों पर बार-बार की जा रही स्निपर फायरिंग और संघर्ष विराम का लगातार किया जा रहा उल्लंघन उनकी बातचीत के केंद्र में रहा। पिछले 36 घंटे में पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा किया गया यह संघर्ष विराम का चौथा उल्लंघन है और पिछले चार दिन में आठवां।

वाड्रा ने बिना बिजनेस स्कूल गए हजारों करोड़ कमाने के गुर सीखे

नई दिल्ली : रॉबर्ट वाड्रा के भूमि सौदों की जांच की मांग कर रहे सांसद आज लोकसभा और राज्यसभा में जमकर हंगामा कर रहे हैं। दोनों सदनों में हंगामें के कारण कामकाज ठप है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और सांसद यशवंत सिन्हा ने लोकसभा में बिना किसी का नाम लिए कहा कि देश में तमाम बिजनेस स्कूल ऐसे हैं, जहां पर पैसा कमाने और मुनाफा बनाने के गुर सिखाए जाते हैं, लेकिन हमारे देश में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों से जुड़ा एक आदमी ऐसा भी है जिसने बिना बिजनेस स्कूल गए ही हजारों करोड़ कमाने की कला सीखी है।

इसी के चलते लोकसभा की कार्यवाही को पहले 12 बजे तक के लिए और फिर 2 बजे तक के लिए स्थगित करना पड़ा। वहीं राज्यसभा की कार्यवाही को 12 बजे तक के लिए स्थगित किया गया। फिलहाल राज्यसभा में कार्यवाही जारी है। उधर, बीजेपी सांसदों के हंगामें के बीच राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने वाड्रा मामले पर चर्चा करवाने से इनकार कर दिया। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्यसभा में किसी कानून पर अमल नहीं हो रहा। हर कानून को तोड़ा जा रहा है। सदन अराजक तत्वों को संघ हो गया है। कुछ सदस्य संसद में आज किश्तवाड़ और नवादा हिंसा को लेकर भी हंगामा कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सोमवार को हरियाणा के कांग्रेसी के नेता राव इंद्रजीत सिंह ने गुड़गांव जमीन खरीद विवाद में राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि मामला रॉबर्ट वाड्रा का नहीं है, राज्य सरकार ने कई नेताओं को और उनके रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया है। इस मामले की जांच होनी चाहिए और जो भी दोषी हो उसे सजा मिलनी चाहिए।

अभिसार शर्मा एबीपी न्यूज के साथ शुरू करेंगे नई पारी, जी न्यूज को कहा गुडबॉय

प्रतिभावान एंकर अभिसार शर्मा ने जी न्यूज से इस्तीफा दे दिया है. वे नई पारी की शुरुआत एबीपी न्यूज के साथ 19 अगस्त को करेंगे. ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब अभिसार आजतक से इस्तीफा देकर जी ग्रुप के साथ जुड़े थे. वे टीवी टुडे ग्रुप में लंबे समय से थे. वहां से जी न्यूज आने के बाद माना जा रहा था कि उनकी यहां लंबी पारी चलेगी.

पर एबीपी न्यूज के साथ ठीकठाक सेवाशर्तों पर बातचीत फाइनल हो जाने के बाद उन्होंने जी ग्रुप को गुडबाय बोल दिया. वे 19 अगस्त को एबीपी न्यूज के साथ जुड़ेंगे. अभिसार ने जी से अपने इस्तीफे और एबीपी न्यूज ज्वाइन करने की पुष्टि की है.

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लो जी, राडिया टेप के बाद अब सुप्रीम कोर्ट की टेप रिपोर्ट भी लीक, कोर्ट खफा

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही ओर से नियुक्त एक जांच टीम की रिपोर्ट लीक होने को सोमवार को गंभीरता से लिया। इस जांच टीम ने पूर्व कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया की कॉरपोरेट शख्सियतों, नेताओं और अन्य लोगों से हुई बातचीत के टेप की लिखित प्रतिलिपि का विश्लेषण किया था। न्यायालय ने कहा कि जब कभी इस मामले की सुनवाई होगी, उस वक्त वह सार्वजनिक हो रहे विषय-वस्तु के मुद्दे को देखेगा।

न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी और न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा की पीठ ने कहा कि हम इस मामले को देखेंगे। पीठ ने इस बात पर रोष प्रकट किया कि यह साफ कर दिया गया था कि रिपोर्ट की विषय-वस्तु गुप्त रखनी है पर इसके बावजूद ये चीजें मीडिया में आ गई। पीठ ने कहा कि हम हर रोज सील लगा रहे हैं। वरना कर्मियों पर भी संदेह होगा।

यदि ऐसा हो रहा है तो बेहतर है कि हम इससे सील हटा लें। न्यायालय ने कहा कि यदि अखबारों के हाथ यह रिपोर्ट लग जाती है तो वे निश्चित तौर पर इसे छापेंगे। हम सब वजह तो जानते ही हैं। यह मामला अदालती कार्यवाही खत्म होने तक सुनवाई के लिए पीठ के पास नहीं आया था पर वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने रिपोर्ट लीक होने की तरफ न्यायाधीशों का ध्यान दिलाया। साल्वे ने कहा कि कुछ गंभीर बात तो हुई है। जब रिपोर्ट सीलंबद है तो इसे शनिवार को प्रकाशित कर दिया गया। जिन अधिकारियों ने ये रिपोर्ट लीक की है वे अदालत के प्रति जवाबदेह हैं।

सुभाष, सुधीर व समीर ने जांच में सहयोग नहीं किया, सबूतों को नष्ट किया

नई दिल्ली : जिंदल स्टील से उगाही की कोशिश मामले में अभियुक्त जी समूह के चेयरमैन सुभाष चंद्रा, संपादक समीर आहलूवालिया व सुधीर चौधरी ने जांच में सहयोग नहीं किया और साक्ष्यों को नष्ट कर दिया। चंद्रा ने अपना मोबाइल जांच एजेंसी को सौंपने की बजाए उसके गुम होने का तर्क रखा। पुलिस द्वारा इन तीनों के खिलाफ दायर आरोप पत्र में ऐसे कई तथ्यों का खुलासा हुआ है। आरोप पत्र में कहा गया है कि इस मामले में शिकायत दर्ज होने के बाद तीनों ने स्वयं को बचाने के लिए साक्ष्यों को नष्ट करने का पूरा प्रयास किया।

जांच के दौरान चंद्रा से वह फोन व सिम कार्ड मांगा गया, जिसके जरिए वे सितंबर व अक्तूबर 2012 में विदेश में रहते हुए समीर व सुधीर से बात रहे थे। मगर चंद्रा ने तर्क रखा कि उनका फोन फरवरी 2013 में सिम सहित गुम हो गया। जांच अधिकारी ने जब उनसे फोन गुम होने की रिपोर्ट की प्रति मांगी, तो वह पेश नहीं कर पाए।

जांच अधिकारी के अनुसार, चंद्रा ने माना कि वह उक्त फोन का प्रयोग विदेश रहते समय कर रहे थे। इतना ही नहीं, चंद्रा ने कहा कि वे लैपटॉप का प्रयोग नहीं करते थे और न ही उन्होंने विदेश रहते हुए संपादकों को कोई ई-मेल किया था। आरोपपत्र के अनुसार, इस बात के पूरे साक्ष्य हैं कि वे सितंबर व अक्टूबर के दौरान संपादकों से संपर्क में थे और जिंदल कंपनी के अधिकारियों से हुई वार्ता की पूरी जानकारी ले रहे थे। इसी प्रकार संपादक समीर व सुधीर ने अपने फोन से सितंबर-अक्टूबर 2012 का डाटा हटवा दिया, जो एक महत्वपूर्ण साक्ष्य था।

जांच अधिकारी के अनुसार, सीएफएसएल की रिपोर्ट से भी यह स्पष्ट हुआ है कि दोनों संपादकों ने कंपनी के चेयरमैन नवीन जिंदल का साक्षात्कार लेने के बावजूद उनका पक्ष नहीं दिखाया। दोनों संपादक न्यूज चलाने के लिए जिम्मेदार हैं। आरोप पत्र में पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 384, 120बी, 511, 420, 201 के तहत आपराधिक उगाही, उगाही के लिए षड्यंत्र, धोखाधड़ी व साक्ष्य नष्ट करने के अपराध में कानूनी कार्रवाई का आग्रह किया है। इन धाराओं में दोषी पाए जाने पर उन्हें आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। (साभार- अमर उजाला)

सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 के सीईओ दिलीप का इस्तीफा

टीवी18 ग्रुप के दो न्यूज चैनलों सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन7 के सीईओ एन. दिलीप वेंकटरमन ने इस्तीफा दे दिया है. वे इस ग्रपु के साथ आठ वर्षों से जुड़े हुए थे. दिलीप टीवी18 से पहले इंडिया टुडे ग्रुप और जी नेटवर्क में काम कर चुके हैं.  बताया जा रहा है कि दिलीप वेंकटरमन अब कुछ निजी कामकाज शुरू करने जा रहे हैं और इसी निजी प्रोजेक्ट में जुट गए हैं.

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दैनिक भास्कर, जबलपुर के संयुक्त संपादक बन गए अजीत सिंह

मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार अजीत सिंह के बारे में सूचना है कि उन्होंने 10 अगस्त को दैनिक भास्कर, जबलपुर के साथ नई पारी की शुरुआत कर दी. इसके पहले वे भोपाल से प्रकाशित जन जन जागरण समाचार पत्र में संपादक थे. अजीत सिंह प्रदेश के सभी महत्वपूर्ण अखबारों में महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. दैनिक भास्कर, जबलपुर में उनका पद संयुक्त संपादक का बताया जा रहा है.

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मेरे पिता अनशन पर थे और उस समय मीडिया इतना बाजारू नहीं हुआ था

: (संस्मरण – पार्ट 5) :1996 में अटल विहारी वाजपेयी की सरकार का तेरह दिन में ही शीघ्र पतन हो जाने के फलस्वरूप कर्णाटक के मुख्य मंत्री हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवे गौडा अकस्मात प्रधानमंत्री बन बैठे. जनता दल के अन्य बड़े नेता ठिकाने लग गए थे. लालू प्रसाद यादव चारे की चिरकुटई में फंस चुके थे. शरद यादव जैन हवाला कांड की चपेट में आकर स्वीकार कर चुके थे कि हाँ, मैंने जैन से पैसा खाया है. कर्नाटक के ही एक और बड़े नेता राम कृष्ण हेगड़े चुनाव में ही खेत रहे थे, सो देवेगौड़ा को लाल किले से भाषण देने का अवसर मिल गया. न तो वह उत्तर भारत की राजीति और सामजिक ढाँचे से अवगत थे, और न उत्तर भारत उनसे परिचित था.

उत्तर भारत की वर्चस्व वादी राजनीति के मद्दे नज़र यह अच्छा लक्षण था कि दक्षिण के किसी व्यक्ति को प्रधान मंत्री बनने का अवसर मिले. लेकिन इससे पहले दक्षिण के ही पामुल्रापति व्यंकट नरसिम्हा राव ने जो गंद फैलाई, उससे सब थू थू कर उठे थे. इसलिए देवेगौड़ा को लेकर भी एक शंका सबके मन में थी. लेकिन नरसिम्हाराव अव्वल दर्जे के घाघ और घुन्ना आदमी थे. उन्होंने टिहरी बाँध आंदोलन के दौरान हमें सर्वाधिक सताया. पिटवाया, अपहरण करवाया और मुकद्दमे लदवाये. इसके विपरीत देवेगौड़ा टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन को लेकर भारी दबाव में थे. उन्हें पद भार ग्रहण करते ही सर्वप्रथम इस अज़ाब से दो चार होना पड़ा था.

मेरे पिता अनशन पर थे और उस समय मीडिया इतना बाजारू नहीं हुआ था कि ऐसे मामलों की पूरी तरह अनदेखी कर राखी सावंत के ठुमके दिखाता रहे. सो मीडिया ने भी इस मामले में खूब हाईप बना रखी थी. जनता दल के वरिष्ठ नेता और समाजवादी चिन्तक-लेखक सुरेन्द्र मोहन टिहरी बाँध विरोधी आंदोलन के समर्थक और मेरे पिता के मित्र थे. उन्होंने देवेगौड़ा को डराया कि सुंदरलाल बहुगुणा इस क्षेत्र की सर्वमान्य सामजिक हस्ती हैं. अनशन के फलस्वरूप उन्हें कुछ हो गया, तो भारी मुसीबत में फंसोगे. प्रधानमंत्री का पद तो जाएगा ही, उत्तर भारत की ओर आना-जाना भी दूभर हो जायेगा. जबकि हालत इसके ठीक विपरीत थे. उत्तर भारत के तमाम बड़े राज नेता बाँध समर्थक थे. पिछले कुछ वर्षों से हर प्रधानमंत्री के घर बाँध के ठेकेदार का आना जाना था. खुद टिहरी में ही जितने लोग बाँध के विरोध में थे, उससे कहीं गुना अधिक बाँध के समर्थन में एकजुट थे, क्योकि बाँध का पैसा किसी न किसी चैनल से उन तक भी पंहुच रहा था.

सब कुछ बाँध के पक्ष में था. हमारे पक्ष में यदि कुछ था, तो वह था विज्ञान और मानवीय मूल्यों का सत्य. लेकिन विज्ञान और मानवीय मूल्यों को तो राजनेता ठेंगे पर रखते हैं. सुरेन्द्र मोहन चतुराई से काम लेकर देवेगौड़ा को दबाव में ला चुके थे. लेकिन अनर्थ होता देख बाँध समर्थक लाबी ने देवेगौड़ा को आश्वस्त किया कि सुंदर लाल बहुगुणा के साथ कोई नहीं है.तु म्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ेगा. तुम्हारे पास इस बाँध को रुकवा कर खोने और पाने को हर तरह से करोड़ों के हरे-गुलाबी, कड़क और सुंदर नोट के बोरे हैं.

…जारी…

इस संस्मरण के लेखक राजीव नयन बहुगुणा हैं. राजीव उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.


इसके पहले का पार्ट पढ़ें-

मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी और मैंने उन्हें दो-तीन बार फिर ठगा

अभय कुमार दुबे जैसे वरिष्ठ पत्रकार द्वारा बसपा पर हमला और सपा का बचाव शोभा नहीं देता

Shambhunath Shukla : लाजवाब है रवीश कुमार की एंकरिंग। रवीश ने उघाड़ दिया सांसदों और पत्रकार को। कल के प्राइम टाइम में संजय निरूपम जैसे बड़बोले सांसद को तो उन्होंने डिफेंसिव बना ही दिया। उग्र पत्रकार अभय कुमार दुबे को भी बैकफुट पर डाल दिया। राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने के बाबत संजय सिर्फ अपनी पोच दलीलें देते रहे और उतने ही अधिक दर्शकों के समक्ष वे एक्सपोज होते रहे। जबकि बीजद के सांसद केएन सिंह देव आगे बढ़कर राजनीतिक दलों को इस दायरे में लाने को राजी दिखे।

पत्रकार अभय कुमार दुबे ने बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा अकूत संपत्ति जोडऩे का बार-बार जिक्र किया लेकिन एक बार भी मुलायम सिंह द्वारा संपत्ति जोड़ने की बात नहीं कही। पर रवीश कुमार कहां मानने वाले थे। उन्होंने अभय कुमार दुबे को टोकते हुए कहा भी कि मुलायम सिंह ने भी यही किया है पर अभय जी एकदम से इस बात को पी गए और बोले कि हां अन्य पार्टियों द्वारा भी ऐसा किया गया है। अभय कुमार दुबे जैसे वरिष्ठ पत्रकार द्वारा बसपा पर हमला और सपा का बचाव शोभा नहीं देता।

यही हाल भाजपा के मुख्तार अब्बास नकवी का हुआ। वे भाजपाई नैतिकता का हवाला देते हुए राजनीतिक दलों के चंदे की बारे में लल्लो चप्पो करते रहे कि एक राजनीतिक दल के लिए यह कैसे संभव है कि वह अपनी पाई-पाई का हिसाब रखने के लिए लोगों को नौकरी पर रखे। कुल मिलाकर ऐसा लगा कि जैसे इस मामले में सारे राष्ट्रीय राजनीतिक दल एक हैं। संजय और नकवी दोनों मीडिया पर रवीश को दबाने के लिए यह कहते दिखे कि फिर मीडिया को इस दायरे में लाना चाहिए। पर रवीश जैसे चतुर सुजान एंकर उनकी हनक में नहीं आए और इन सारे सांसदों का असली चेहरा दर्शकों के समक्ष उघाड़ दिया। इसके लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

Make Bhaskar.com an 18+ site and let them publish as much porn as they want to

Samar Anarya : There seems to be some confusion over my stand against Web Media masquerading porn as news. Let me affirm that despite my problem with pornography, I am opposed to its censorship until and unless it is misogynist and spreads violence against women, transgenders or even men. After all people can enter porn industry out of their free will, hypothetically, at least as is claimed by porn 'industry' in the western world. Though how free this free will is debatable, yet one cannot really take a moral position on that.

My problem is with newspaper's websites distributing porn as news without the necessary safeguards (like Enter if you are more than 18 yrs) that porn websites adhere to. There should be such legitimate restrictions on porn sites like bhaskar.com as are on Adult Certification given to movies with violence and/or obscenities. Make Bhaskar.com an 18+ site and let them publish as much porn as they want to.

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Samar Anarya : तमाम अखबारों से जुड़े दोस्त अपनी वेबसाइट्स से जुड़े लोगों की कुंडली भेज रहे हैं. यौन कुंठा के अलावा जो दूसरी साझा बात दिख रही है वह यह कि सब के सब 'मर्द' हैं. बाकी पत्रकारिता में ठीकठाक संख्या में दिखने वाली महिलायें वेबमीडिया से लगभग गायब हैं क्या यही वजह है वेबमीडिया के लगभग पोर्नसाइट्स में बदल जाने के पीछे?

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Samar Anarya : दैनिक पोर्न भास्कर के प्रमुख पोर्नकार हैं विजय कुमार झा. बोले तो मैथिल ब्राह्मण. उनके ऊपर हमले होते देख सबसे पहले उनके बचाव में कूदे संघी दलाल श्री रजनीश के झा. मेरी फ्रेंडलिस्ट तक में न होने के बावजूद मुझे मित्र तक घोषित कर गए. वह भी मैथिल ब्राह्मण. अंत में आये ब्लॉग चोरी कर अपने नाम से जनसत्ता में छपवा लेने के कारनामे के लिए जाने जाने वाले मंजीत ठाकुर. मेरी जाति खोजने वाले कोलम्बसों में से एक और नाम जोड़ने वाले यह महानुभाव भी मैथिल ब्राह्मण. कुछ और कहूँ?

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Samar Anarya : दैनिक पोर्न भास्कर अश्लीलता के खिलाफ उतर आया है और आप कहते हैं कि फर्क नहीं पड़ता! बाकी आज पहली बार अश्लीलता के खिलाफ़ अपलोड की गयी फोटो स्टोरी में भी न केवल चुन चुन के अश्लील तस्वीरें लगाई गयीं हैं बल्कि बेहद आपत्तिजनक जातिवादी भाषा का प्रयोग भी किया है. पढ़िए आप भी.. "सबसे अधिक अफसोस की बात यह है कि यह सब राजपूतों की धरती पर हो रहा है। जहां की औरतों के शौर्य की गाथा पूरा देश गाता है, उस प्रदेश की औरतों को जिस तरीके से बाजार के सामने परोसा जा रहा है, वह काफी निराशाजनक है"..  अब सोचिये कि जिस बाबूसाहब या बाबाजी ने यह महान बात लिखी है उसने राजस्थान के शौर्य की भंवरी देवी जैसी तमाम साथियों के बदन पर लिखी इबारत पढ़ी है या नहीं.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

यशवंत के नाम भी किसी ने किया किताब का समर्पण!

Yashwant Singh : कुछ रोज पहले ''जानेमन जेल'' किताब को जब कापड़ी-साक्षी के नाम समर्पित कर रहा था तो मुझे तनिक अंदाजा न था कि इसके प्रतिदान स्वरूप मेरे नाम भी कोई अपनी किताब समर्पित कर रहा होगा.. मेरे नाम भी किसी ने एक किताब समर्पित कर दिया है भाइयों… और इस समर्पण के बारे में मुझे तब पता चला, जब वो किताब मेरे पास कूरियर से चलकर आई… एक दो पन्ने पलटते ही लिखा दिखा- ''यशवंत सिंह के लिए''…

मुझे भरोसा नहीं हुआ कि यह मेरे नाम है… तुरंत फोन लगाया और उन्होंने बताया- ''तेरे ही नाम है जानेमन जेल''. मैं जोर से हंसा.. उस तरफ फोन पर थे Dayanand Pandey जी. अब उनके इस समर्पण, इस प्यार को क्या नाम दूं! लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और गजब के लिक्खाड़ दयानंद पांडेय उर्फ दनपा ने जिस नई किताब को मुझे समर्पित किया है, उसका नाम है- ''एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी''. यह किताब दनपा के पोलिटिकल आर्टकिल्स का कलेक्शन है. शुक्रिया पंडीजी. लव यू. आवारा, लफंगा, लफंटूस द ग्रेट एंड लंपट श्रेणी के जानवर में आपने कुछ नया तलाश लिया, यह आपकी बलिहारी… जय हो.. — feeling blessed.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


यशवंत ने विनोद कापड़ी – साक्षी जोशी को समर्पित की अपनी पहली किताब 'जानेमन जेल'

संपादक मतलब कुतुबमीनार

बहुत पहले संपादक की परिभाषा के परिप्रेक्ष्य में मास काम के कोर्स में एक जगह लिखा हुआ पढ़ा था कि ''हर सम्पादक अपने को कुतुब मीनार से कम नहीं समझता।'' अपने पुर्ववर्ती अनुभवों में मैंने इसे बहुधा सही भी पाया। एक जगह उप सम्पादक की परिभाषा लिखी थी कि '''उपसम्पादक युद्ध का बेनाम योद्धा होता है।''

और यह एक हद तक सही भी है। उपसम्पादक सब कुछ तो करते है लेकिन उनका नाम कही शायद ही छपता हो। वर्तमान सम्पादकों के मीडिया हाउसों के बाजारवाद के भेंट चढ़ते-चढ़ाते देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि अब कुतुब मीनार का कुनबा गिर सा गया हो। ठीक ऐसे जैसे कुतुब मीनार आसमान की ओर न जाकर पाताल की ओर गया हो। जी न्यूज से लेकर प्रेस कौन्सिल में व्याप्त पेड न्यूज से लेकर बिहार में विज्ञापन घोटालों को लेकर अनेकों मामले इसके डिफेन्स में आ खड़े होंगे।

आजादी पश्चात मीडियाईयों और खासकर के सम्पादकों के रुतबे हुआ करते थे। उस समय पत्रकारिता कमीशन नही वरन मिशन हुआ करती थी। और चार लाइन की खबर पर शासन से लेकर प्रशासन तक में हलचल मच जाती थी। और खबरों के असर से सब वाकिफ भी थे। कहते हैं न कि ज्यादा जोगी मठ उजार। वैसे ही आजकल कुछ हो रहा है।

मीडिया के जोगियों की मात्रा में उछाल सा आ गया है। और मीडियाई मठ बेचारे चीख रहे है कि मुझे बचाओं। आजकल हर रोड हर गली में जो प्रेस का लेबल दिख रहा है वैसा आजादी के पश्चात् तो कतई नहीं था। लेकिन आज का माहौल ऐसा हो गया है कि पत्रकारों के भीड़ में मिशन और कमीशन वाले पत्रकारों की पहचान पुलिस की पहचान से बाहर सा हो गया है। रंगा सियार मानिंद।

कुकुरमुत्तों की भाषा अगर पत्रकारों को आती और अगर कोई पत्रकार उनसे उनकी जमात और अखबारों के जमात के बारे तुलना करता तो निश्चय ही वे अखबार और पत्रिका के आगे शर्म से गड़ जाते। विषय से भटकने का इरादा त्यागते हुए पुनः अपने विषय पर पधारने की कोशिश करते है। हां तो सम्पादक की चर्चा हो रही थी। ब्रिटिश इंडिया में सम्पादकों की भूमिका को समझने के लिए एक विज्ञापन ही काफी है जो मीडिया सेवकों के रोंगते खड़े कर देने वाला विज्ञापन है।

फरवरी 1907 में स्वराज्य इलाहाबाद के लिये विज्ञापन जोकि ‘जू उन करनीन’ में छपा था ”एक जौ की रोटी और एक प्याला पानी, यह शहरे-तनख्वाह है, जिस पर ”स्वराज्य“ इलहाबाद के वास्ते एक एडीटर मतलूब है (आवश्यकता) है। यह वह अखबार है जिसके दो एडीटर बगावट आमेज्ञ (विद्रोहात्मक लेखों) की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुके है। अब तीसरा एडीटर मुहैया करने के लिए इस्तहार दिया जाता है, उसमें जो शरदे तलख्वाह जाहिर की गयी है, वास्ते ऐसा एडीटर दरकार है, जो अपने ऐशो आराम पर जेलखाने मे रहकर जौ की रोटी एक प्याला पानी तरजीह दे“।

लेखक विकास कुमार गुप्ता पीन्यूजडाटइन के सम्पादक है.

वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला को ब्रेन स्ट्रोक, चंडीगढ़ में अस्पताल में भर्ती

चंडीगढ़ से बुरी खबर है. वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार जगमोहन फुटेला को ब्रेन स्ट्रोक हुआ है. घटना छह अगस्त की है. उन्हें चंडीगढ़ में अस्पताल में भर्ती कराया गया है. उनके नजदीकी लोगों का कहना है कि कई दिनों के इलाज के बाद फिलहाल वे खतरे से बाहर हैं लेकिन ब्रेन स्ट्रोक के साइड इफेक्ट बरकरार हैं.

जगमोहन फुटेला ने अभी हाल में ही हरियाणा से शुरू होने वाले एक चैनल के संपादक पद से इस्तीफा दिया था और चैनल के अंदर की गड़बड़ियों को उजागर करते हुए बेबाक लेख लिखे थे. जगमोहन फुटेला लंबे समय तक दैनिक जागरण में रहे. जागरण प्रबंधन द्वारा किए गए अन्याय के खिलाफ उन्होंने कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की. उन्होंने जर्नलिस्टकम्युनिटी डाट काम की स्थापना कर मीडिया और राजनीति के कई स्याह पक्षों के बारे में विश्लेषणात्मक लेख लिखा करते हैं और अन्य लोगों की अभिव्यक्ति को भी मंच प्रदान करते हैं.

जगमोहन फुटेला के ब्रेन स्ट्रोक की खबर मिलते ही उनके जानने वाले लोग अस्पताल पहुंचने लगे और उनके शीघ्र स्वस्थ होने की दुवाएं की. जगमोहन फुटेला के पुत्र अभिषेक उनकी देखरेख में लगे हुए हैं. परिवार के अन्य सदस्य भी मुकम्मल इलाज के लिए सक्रिय हैं. बताया जाता है कि पहले वे मैक्स अस्पताल में एडमिट कराए गए थे. बाद में उन्हें पीजीआई ले जाया गया. भड़ास4मीडिया जगमोहन फुटेला के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता है और चंडीगढ़ के पत्रकारों से अपील करता है कि फुटेला जी के बेहतर इलाज के लिए हर संभव सक्रियता दिखाएं.

एबीपी न्यूज के पत्रकार मनु पंवार का पहला व्यंग्य संग्रह आया, आलोक पुराणिक ने किया विमोचन

एबीपी न्यूज से जुड़े पत्रकार मनु पंवार का पहला व्यंग्य संग्रह ‘खबरदार, राजा दु:खी है' आ गया है। दिल्ली में एक सादे समारोह में जाने-माने व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने इसका विमोचन किया। युवा व्यंग्यकार मनु पंवार का यह व्यंग्य संग्रह हिन्दी अकादमी दिल्ली के सहयोग से अनुज्ञा बुक्स दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस संग्रह मे कुल 56 व्यंग्य है जिनमें विषयों का वैविध्य है।

इस व्यंग्य संग्रह के मुखपृष्ठ के लिए रेखांकन मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान ने तैयार किया है। मनु पंवार की यह दूसरी क़िताब है। इससे पहले 2007 में उनकी 'समय से संवाद' नाम की किताब प्रकाशित हो चुकी है जिसमें विभिन्न क्षेत्रों की चर्चित शख्सियतों के साक्षात्कार हैं।

मनु पंवार का यह पहला व्यंग्य संग्रह जरूर है लेकिन विभिन्न समाचार समाचार पत्रों में नियमित रूप से इनके व्यंग्य प्रकाशित होते रहते हैं। इस विधा में वो तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। इस संग्रह में शामिल कई व्यंग्य लघु कथाओं के अंदाज में हैं। अपने व्यंग्य में मनु पंवार ने पौराणिक किरदारों, घटनाओं का भी सहारा लिया है लेकिन उनका संदर्भ समकालीन है। उनके सामाजिक, राजनीतिक निहितार्थ हैं।
 

‘सीनियर इंडिया’ के मालिक विजय दीक्षित ने मारा कार्टूनिस्ट चंदर का मेहनताना

कुछ दिन पहले अखबार में खबर छपी कि ’सीनियर बिल्डर’ गिरफ़्तार। पढ़कर आश्चर्य नहीं हुआ। ऐसा होना ही था। सीनियर बिल्डर लिमिटेड यानी एसबीएल कम्पनी मालिक विजय दीक्षित सीनियर मीडिया के भी मालिक हैं। सीनियर मीडिया की पाक्षिक हिन्दी पत्रिका 'सीनियर इंडिया‍' के लिए मैंने तत्कालीन सम्पादक और पुराने पत्रकार (दैनिक लोकमत समाचार, नागपुर के पूर्व सम्पादक और मेरे कुछ परिचित) एस.एस विनोद के कहने पर बन्द पड़ी पत्रिका को फ़िर शुरू करने में सहयोग की खातिर 3 दिन लगातार रात-दिन काम किया।

इस दौरान मैं अपने एक डिज़ाइनर मित्र और अन्य लोगों के साथ डिफ़ेंस कॉलोनी स्थित पत्रिका कार्यालय में ही रहा। यह पत्रिका मेरे दैनिक जनसत्ता के साथी पत्रकार और सीनियर इंडिया के सम्पादक आलोक तोमर द्वारा एक कार्टून छापने के विवाद या अन्य कारण से उनकी विदाई के बाद बन्द पड़ी थी। दिल्ली के एक बड़े होटल में कम्पनी द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पत्रिका बंटनी थी सो किसी भी तरह पत्रिका छापनी ही थी। इस अंक के लिए आवरण डिज़ाइन, आन्तरिक सज्जा और अनेक चित्र-कार्टून बनाने बाद भी कई अंकों के लिए मैंने पूरी लगन से काम किया।

पारिश्रमिक के लिए भी कहता रहा, याद दिलाता रहा। भुगतान के लिए अनेक बार अश्वासन मिले। यहां तक कहा गया कि चैक तैयार है, ले जाएं। इसके लिए सीलिंग के दौरान नोएडा स्थान्तरित हुए दफ़्तर में भी मुझे 3 बार बुलाया गया। लेकिन उस चैक पर मालिक साब यानी विजय दीक्षित के हस्ताक्षर कभी नहीं हुए सो मुझे कभी वह चैक मिला भी नहीं। किन्हीं कारणों से एस.एन. विनोद की विदाई हो गयी। अब नये सम्पादक आये मेरे एक अन्य मित्र विनोद श्रीवास्तव जो काफ़ी पहले दिल्ली प्रेस में काम करते थे और बाद में मासिक पत्रिका 'मेरी संगिनी' के सम्पादक रहे।

पहले इन्होंने कहा कि पिछला भुगतान हो जाएगा, काम शुरू करो। बाद में कहा कि मालिक से बात हो गयी है, फ़िर कहा कोशिश करूंगा। खैर, सामग्री छपने के ३ महीने बाद भुगतान करने के अपने नियम के तहत वे काम कराते रहे। बाद में कई बार मेरा चैक ’तैयार’ हुआ पर मालिक के दस्तखत न होने से मिला नहीं, हालांकि मुझे चैक लेने के लिए 2-3 बार बुलाया भी गया। यों दिल्ली जैसे शहर में डाक, कूरियर या सन्देशवाहक के द्वारा बड़ी आसानी से कोई कागज-दस्तावेज भेजा जा सकता है। पर भेजने की नीयत भी तो होनी चाहिए।

अपने मेहनताने को लेकर मैं काफ़ी सक्रिय रहा। विजय दीक्षित से मिलने की हर कोशिश बेकार रही। अनेकों बार डिफ़ेंस कॉलोनी स्थित दफ़्तर में मैंने सम्बन्धित बिल दिये, मालिक को अनेक बार ई-मेल किए पर कोई नतीजा नहीं निकला। मेरा कुल पारिश्रमिक 34450.00 (चौंतीस हजार चार सौ पचास रुपये) है जो अनेक प्रयासों के बाद भी आज तक नहीं मिला। यह मेहनताना सन 2006, 2007 और 2009 का है।

कुछ लोगों को अखबार-पत्रिका निकालने की बीमारी चार पैसे जेब में आते ही लग जाती है। जल्दी ही वे अपना मीडिया हाउस बना लेना चाहते हैं ताकि अपने अनेक उल्टे-सीधे काम कराने या धोंस जमाने के लिए उसका इस्तेमाल कर सकें।  मैं यही चाहता हूं कि मेरे जैसे फ़्रीलांस काम करने वाले मित्र ऐसे लोगों से जरूरत से ज्यादा सावधान रहें और ऐसे लोगों को बेनकाब भी करें ताकि अन्य मेहनती लोग इनके शोषण के शिकार न हों। इसी तरह और भी अनुभव हुए हैं- नौकरी और फ़्रीलांस काम करने के दौरान, फ़िर बताऊंगा।

लेखक टी.सी. चन्दर मशहूर कार्टूनिस्ट हैं जिन्हें 'कार्टूनिस्ट चन्दर' नाम से जाना जाता है.


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राजीव शर्मा का लाखों रुपये मेहनताना दबाए बैठा है एस1 चैनल का मालिक विजय दीक्षित

यह मत कहना कि ये प्रदेश के ईमानदार अफसरों में से एक हैं (देखें कार्टून)

जाने-माने और चर्चित कार्टूनिस्ट इरफान की पेशकश. यूपी के हालात पर उन्होंने क्या खूब एक कार्टून बनाया है. हजार-लाख शब्दों पर भारी एक कार्टून. सूबे में ईमानदारी और ईमानदारों की स्थिति क्या है, यह इस कार्टून से खुद ब खुद जाहिर है.


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अपने एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई के पक्ष में उतरे आशुतोष लिखते हैं…

: हे ईश्वर इन्हें ज्ञान दीजिये : हमारे एडिटर इन चीफ राजदीप सरदेसाई ने ट्विटर पर ईद मुबारक कहा और उनको गालियां पड़नी शुरू हो गईं। फ्रस्टेट होकर उन्हें ट्विटर पर लिखा, 'मेरे ईद मुबारक लिखने से कुछ बेवकूफ और कट्टरपंथी लोगों को तकलीफ होती है। इन लोगों को अक्ल आनी चाहिये या फिर ये किसी और देश में जा कर रहें।' उनका ये ट्वीट पढ़कर तकलीफ हुई। हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ उनके साथ ही होता है। हिंदू-मुस्लिम मसले पर या फिर सेकुलरिज्म के मुद्दे पर आप कुछ भी लिखो आप को फौरन गाली पड़ने लगती है।

सिरफिरों की एक जमात मां, बहन की गालियां देने से भी नहीं चूकती और इस्लामपरस्त बताकर खारिज करने का धंधा शुरू हो जाता है। गालियां देने वाले ये लोग अनपढ़ गंवार जाहिल नहीं हैं। सोशल मीडिया पर पढ़े लिखे लोग ही आते हैं। ऐसे लोग जो टेक्नॉलाजी जानते हैं। जिनके पास कंप्यूटर या फिर स्मार्ट मोबाइल रखने लायक पैसे हैं। इनमें से कई की प्रोफाइल मैंने खुद देखी है। कुछ अच्छी कंपनियों में काम करते हैं। अच्छी तनख्वाह पाते होंगे। एक ने जब मुझे गालियां बकीं तो मैंने उनका प्रोफाइल खोला। देखकर दंग रह गया। किसी मल्टी नेशनल कंपनी में काम करते थे।

तब मुझे अपना गांव याद आया। उत्तर प्रदेश का गोंडा जिला। अयोध्या से चालीस किमी दूर। बचपन की यादें तरोताजा हो गईं। हम छोटे-छोटे बच्चे तपती दोपहरी में गांव की धूल में सने, नंगे पांव पूरे गांव का चक्कर काटा करते थे। इनमें से कई मुस्लिम परिवारों के बच्चे भी थे। मेरे गांव की आबादी में हिंदू और मुस्लिम लगभग बराबर हैं। बहुत गरीब गांव था। अब थोड़ा बेहतर हुआ है लेकिन ईद में हम उनके घर जाते और सिवइयां खाते। होली, दीवाली को वो हमारे घर आते और गुझिया-खुर्मे-खाजा खाते। मुहर्रम में ताजिया निकलता और सारे बच्चे गैस की रोशनी में पीछे-पीछे दौड़ते। किसी के घर शादी होती तो हिंदू हो या मुसलमान सबके घर से सामान जाता और हम ऐसे खुशियां मनाते जैसे कि अपने घर में शादी हो रही है। अम्मा तो कई दिन के लिये उस घर की हो जाती।

कभी खयाल ही नहीं आया कि फलां मुसलमान है या हिंदू। थोड़ी झिकझिक भी होती थी। कभी प्रधानी के चुनाव के लेकर या फिर किसी आपसी झगड़े को लेकर लेकिन कभी भी सांप्रदायिक तनाव पैदा नहीं हुआ। गांवों की मिट्टी की दीवारों पर कभी कुछ ऐसा लिखा नहीं मिला जैसा ट्विटर पर देखने को मिलता है। यहां तक बाबरी मस्जिद के जमाने में भी मारपीट या तनाव की नौबत नहीं आई। मेरे घर के ठीक सामने ही एक निहायत गरीब जुलाहे का घर था। तन पर कपड़े ना के बराबर लेकिन मेरे घर से उसके रिश्ते में कभी कोई ऊँच नीच नहीं देखने को मिलती। हम कभी शरारत करते तो लोकल जुबान में जुलाहन प्यार से हमें गालियां देती और हम हंस के टाल देते। अम्मा, बाबू, चाचा या दादा ने भी कभी बुरा नहीं माना।

पिता जी शहर में नौकरी करते थे तो हम भी शहर के हो गये। स्कूल जाने लगे। वहां मुहम्मद रजी मिला और क्रिकेट खेलते शाह साजिद से दोस्ती हो गई। इनका घर आना शुरू हुआ। अम्मा कभी-कभी उनके रसोई में जाने पर एतराज करती लेकिन घर आने पर कभी पाबंदी नहीं लगी। आज पचीस साल बाद भी दोस्ती है। साजिद नोयडा में ही है। ईद के दिन घर न जाओ तो नाराज होता है।

जेएनयू गये अनवर मिल गया। पढ़ाकू बिहारी। क्रांतिकारी। बहुत कोशिश की मुझे मार्क्सवादी बनाने की लेकिन कामयाब नहीं हुआ। आगे चलकर प्रोफेसर हो गया। चर्चा चलती रहती है। वो मेरे हिंदू होने पर ताना देता है तो मैं उसके मुसलमान होने पर और फिर हम हंसकर दूसरे मसलों पर घंटों गप्प मारते हैं। मेरे घर और उसके घर में कोई फर्क नहीं है। सब साझा है। गुजरात दंगे हों या फिर बाबरी मस्जिद का ढहना या बटला हाउस कांड तीखी बहस होती है। दोनों के अपने अपने विचार हैं। पर दोस्ती आज भी कामयाब है। दोनों के परिवारों ने इसे और मजबूत कर दिया है। अब हमसे ज्यादा पक्के वो दोस्त हैं। ईद के एक रोज पहले उसकी बीवी मेरी बीवी को आधी रात जबरन मेहंदी लगाने के लिए पकड़ कर ले जाती है।

यूनिवर्सिटी में सोचा करता था कि सुकरात सही थे। सुकरात कहते थे कि 'ज्ञान ही गुण है और बुराई अज्ञानता'। लगता था कि देश में सांप्रदायिकता इसलिए है क्योंकि देश में गरीबी है, पिछड़ापन है। लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं। जैसे जैसे साक्षरता बढ़ेगी, समृद्धि आएगी, लोग सांप्रदायिकता के चंगुल से दूर होते जाएंगे। मैं शायद गलत था। मेरे गांव में गरीबी थी। लोग अनपढ़ थे। स्कूल और कॉलेज के जमाने में हिंदुस्तान भी गरीब था, साक्षरता काफी कम थी।

आज हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे तेज रफ्तार अर्थव्यवस्था है। साक्षरता बढ़ी है। गरीबी कम हुई है। लेकिन ट्विटर को देखकर लगता है कि मेरे घर के सामने की वो जुलाहन बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वालों से कहीं ज्यादा पढ़ी-लिखी और समझदार है। पड़ोस का केवट भी अमीर नहीं है और न ही पढ़ा-लिखा पर कभी उसने हिंदू मुसलमान के नाम पर किसी को गाली नहीं दी, किसी धर्म को बुरा भला नहीं कहा।

मुझे लगता है मेरे गांववाले ट्विटरबाजों से ज्यादा अच्छी तरह से स्वामी विवेकानंद को समझते हैं। विवेकानंद कहा करते थे-'मैं पूरी तरह से इस बात का कायल हूं कि बिना व्यावहारिक इस्लाम के वेदांत के संप्रत्य, जो चाहें जितने ही बेहतरीन क्यो न हो, का संपूर्ण मानवजाति के लिये कोई मूल्य नहीं है।

हम मानवजाति को वहां ले जाना चाहते हैं जहां न वेद है, न बाइबिल और न कुरान और ऐसा वेद, बाइबिल, कुरान में सौहार्द पैदा करने से ही होगा। मानव जाति को ये सीखाना पड़ेगा कि सभी धर्म 'एक-धर्म' यानी 'एकत्व' की अलग अलग अभिव्यक्तियां हैं। और हर शख्स अपनी अपनी सुविधा से अपना-अपना रास्ता चुन सकता है।' हिंदु मुस्लिम एकता के संदर्भ में विवेकानंद कहते हैं- 'हमारी मातृभूमि के लिए दोनों ही सभ्यताओं- हिंदूवाद और इस्लाम का जंक्शन- वेदांती मस्तिष्क और इस्लामिक शरीर- ही एकमात्र उम्मीद है।' आज भी हमें उम्मीद अपने उसी गांव से है।

आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष के ब्लाग से साभार.

दुर्गा शक्ति के बहाने ताकतवर होती आईएएस लॉबी

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा युवा आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित कर दिये जाने के मुद्दे को कॉर्पोरेट तथा धनाढ्य वर्ग के चंगुल में कैद मीडिया द्वारा जमकर उछाला गया है। इस मुद्दे के बहाने मीडिया व हितबद्ध लोगों द्वारा तरह-तरह की चर्चाएँ और परिचर्चाएँ आयोजित और सम्पन्न करवायी गयी। प्रिंट और सोसल मीडिया पर कई सौ आलेख इस विषय पर लिखे जा चुके हैं।

इस मुद्दे को प्रचारित करने का आधार ये बताया जा रहा है कि दुर्गा शक्ति नागपाल नाम की ये निलम्बित आईएएस ईमानदार बतायी जाती हैं और इन्होंने कथित रूप से माफिया से टक्कर लेने की कौशिश की। जबकि उत्तर प्रदेश की सरकार का पक्ष है कि रमजान के पवित्र महिने में इस्लाम के अनुयाईयों की ओर से किये जा रहे मस्जिद की निर्माण में व्यवधान डालने का प्रयास करके दुर्गा शक्ति नागपाल ने कथित रूप से सामाजिक सौहार्द और शान्ति को भंग करने का प्रयास किया।

इस मुद्दे को जहॉं एक ओर तो देश की आईएएस लॉबी ने अपनी आन-बान और शान से जोड़ दिया है, वहीं दूसरी और इस देश की संस्कृति, ईमानदारी, चाल, चरित्र और सभी सामाजिक मूल्यों की ठेकेदारी करने वाली सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक ताकतों ने इसे इस प्रकार से उछालने का प्रयास किया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के निलम्बन से आसमान टूट पड़ा हो और मानो इससे देश का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ईमानदारी का ढांचा ही बिखर जायेगा। इन ताकतों का मानना है कि इस देश के प्रबुद्ध वर्ग का नेतृत्व आईएएस करता है और वही देश को सही दिशा दे सकता है। इसलिये हर हाल में आईएएस का सम्मान होना चाहिये और आईएएस चाहे कुछ भी करे, उसे स्थानान्तरित किये जाने से बड़ी कोई सजा दी ही नहीं जानी चाहिये।

अन्यथा क्या कारण है कि गुजरात के आईपीएस संजीव भट्ट के साथ कोई क्यों खड़ा नहीं हुआ और प्रतिदिन कई सौ छोटे कर्मचारी कठोर श्रम करने के बाद भी अपनी ईमानदारी और संविधान के प्रति निष्ठा के चलते हुए भी आईएएस और पीएसएसी अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित किये जा रहे हैं, लेकिन उनके साथ कोई खड़ा नहीं होता है। उनके साथ होने वाला अन्याय कोई अन्याय नहीं और दुर्गा शक्ति नागपाल को निलम्बित किया जाना देशभर में इस प्रकार से चर्चा का विषय बना दिया गया है, मानो दुर्गा शक्ति नागपाल के साथ कोई भयंकर अमानवीय दुर्व्यवहार या दुर्घटना हो गयी है।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट अनेक बार कहा चुका है कि "निलम्बन कोई सजा नहीं है। अत: निलम्बन को चुनौती नहीं दी जा सकती।" हॉं ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय उन छोटे कर्मचारियों को राहत नहीं देते हुए सुनाये जाते रहे हैं, जिनमें राज्य लोक सेवा आयोग और संघ लोक सेवा आयोग के उत्पाद महामानव, महान विभूतियों द्वारा मनमाने तरीके से छोटे कर्मचारियों का निलम्बन किया जाता रहा है, ऐसे में दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले में आने वाले समय में स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी मीडिया की भॉंति अपना नया "विपरीत रुख" अपना ले तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट हड़ताल करने को असंवैधानिक घोषित करने के बाद भी ओबीसी वर्ग को संविधान में वर्णित सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुसार उच्च शिक्षण संस्थानों में, ओबीसी की जनसंख्या से बहुत कम फीसदी आरक्षण दिये जाने के सरकारी आदेश के विरुद्ध, उच्च वर्ग के डॉक्टरों द्वारा विरोध स्वरूप, गैर कानूनी तरीके से की गयी हड़ताल को, सुप्रीम कोर्ट अपने पिछले आदेश की अनदेखी करते हुए न मात्र संवैधानिक ठहरा चुका है, बल्कि केन्द्र सरकार को निर्देश भी दे चुका है कि हड़ताली डॉक्टरों को हड़ताल की अवधि का वेतन दिया जावे।

ऐसे में "आईएएस अधिकारी का निलम्बन भी सुप्रीम कोर्ट को सजा नजर आ जाये तो कोई आश्‍चर्य नहीं होना चाहिये!" जिसका सबसे बड़ा कारण यही है कि "हमें हजारों सालों से एक ही बात सिखायी गयी है कि उच्च वर्ग और शासक वर्ग कभी गलत नहीं होता, उसे कभी बड़ी सजा नहीं दी जा सकती और छोटे लोग या निम्न वर्ग सेवा करने, सजा पाने और देश के कानून को तथा सत्ताधारियों व सत्ता के दलालों के हर आदेश को मानने के लिये पैदा हुए हैं।" "ये मनोभाव आज भी इस देश के लोगों के अवचेतन में विद्यमान है और यही रुग्ण मानसिकता, अनेक प्रकार के शोषण एवं विभेद के लिये जिम्मेदार है। जब तक इस मानसिकता को पैदा करने वाले कारकों को शक्ति से नहीं बदला जायेगा दुर्गा शक्ति नागपाल जैसियों के बहाने आईएएस अधिक ताकतवर होते रहेंगे और कमजोर वर्ग शोषण का शिकार होता रहेगा।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' का विश्लेषण.

गलत सर्कुलेशन दिखाकर महंगे रेट पर विज्ञापन वसूलने के खिलाफ हाई कोर्ट में पीआईएल

गलत सर्कुलेशन दिखाकर महंगे रेट पर विज्ञापन वसूलने वाले अखबारों की मुश्किल बढ़ सकती है. इस मामले समेत कई मुद्दों को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में पीआईएल दाखिल की गई है. इसमें ऐसे पत्रकारों को भी निशाने पर लिया गया है, जो सस्‍ते दर पर सरकारी प्‍लाट लेने के बावजूद सरकारी आवासों का आनंद उठा रहे हैं. पीआईएल दृष्‍टांत पत्रिका के संपादक अनूप गुप्‍ता ने दाखिल की है. इस मामले पर सुनवाई मंगलवार को होगी. 

अनूप गुप्‍ता लंबे समय से लखनऊ में भ्रष्‍ट पत्रकारों के खिलाफ अभियान चलाते आ रहे हैं. इस बार पीआईएल के माध्‍यम से उन्‍होंने लखनऊ के तमाम अखबारों को निशाना बनाया है, जो गलत सर्कुलेशन का आंकड़ा दिखाकर महंगे दर पर सरकारी विज्ञापन वसूलकर अपनी झोली भर रहे हैं.

इसके अलावा सरकार से सस्‍ते दर पर प्‍लाट लेने के वावजूद सरकारी आवासों में रहने वाले पत्रकारों को भी निशाना बनाया गया है. लखनऊ में कई दर्जन ऐसे पत्रकार हैं, जो प्‍लाट पर अपना मकान बनवाने के बावजूद सरकारी आवास में नाम मात्र के किराए पर रह रहे हैं, जबकि अपने अवासों का कामर्शियल उपयोग कर रहे हैं. ऐसे ही पत्रकारों को निशाने पर लेकर अनूप गुप्‍ता ने पीआईएल दाखिल किया है. अनूप का कहना है कि ऐसे पत्रकार सरकार की दलाली में लिप्‍त हैं और पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं. अपनी सुविधाओं के लिए सरकार की चमचागिरी कर रहे हैं. 

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‘कर्मभूमि संवाद’ में वेतन के लाले, चारू तिवारी का इस्तीफा, दिलीप सिकरवार बने प्रदेश टुडे बैतूल के ब्यूरोचीफ

पहाड़ के सवालों पर आधारित नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका 'कर्मभूमि संवाद' के कार्यकारी संपादक व एक प्रकार से पत्रिका चलाने वाले चारू तिवारी ने कर्मभूमि को बॉय-बॉय कह दिया है. कर्मभूमि के संपादक मालिक राजेंद्र रौतेला हैं जो मैग्जीन के पांच अंक प्रकाशित कर सके हैं.

बड़े जोरशोर से उत्तराखंड में पत्रकारों की टीम खड़ी की गई, और वेतन देने के लिए नियुक्ति पत्र तक भेजे गये. उत्तराखंड में आयी आपदा से लगता है कि पत्रिका पर भी आपदा आ गई और उद्योगपति महोदय पांच माह में एक माह की तनख्वाह भी पत्रकारों को दे पाये या नहीं, यह भी पुख्ता नहीं हुआ है.

पत्रकार दिलीप सिकरवार को प्रदेश टुडे अखबार का बैतूल ब्यूरो चीफ नियुक्त किया गया है. उनकी नियुक्ति अखबार के प्रसीडेंट/ डायरेक्टर सतीश पिम्पले ने की है. पिंपले ने आशा जताई कि सिकरवार की सीनियारटी व अनुभवों का लाभ अखबार को मिलेगा. सिकरवार का न्यूज़ पेपरों में काम करने का 17 वर्षों का लम्बा अनुभव है. पिछले कुछ सालों से वे आल इंडिया रेडियो से जुड़े हुए है. साथ ही स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे थे.

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अमर उजाला में फरमान, पत्रकार बेचें ‘युवान’!

अमर उजाला मुरादाबाद संस्करण से खबर है कि यहां के संपादकीय कप्तान नीरज कांत राही ने एक फरमान जारी किया है जिसमें कहा गया है कि सभी पत्रकारों को युवान बेचने की जिम्मेदारी उठानी है. यही नहीं, इस काम को वे कितनी ईमानदारी से कर रहे हैं, उन्हें इसका सुबूत भी देना होगा. इसके लिए उन्हें उन सभी स्कूलों व कॉलेजों का फोटो करने को कहा गया है, जहां वे युवान बेचने गए थे और कितनी प्रतियां बेची.

इस आदेश पर पत्रकारों में रोष है और कहा जा रहा है कि ऐसे तो सभी पत्रकारों को हॉकर बना दिया गया. इस नए फरमान से मुरादाबाद संस्करण के बुजुर्ग पत्रकारों की नींद उड़ गई है. बुजुर्ग पत्रकार अपनी नौकरी बचाने के लिए अपने रिश्तेदारों से 'युवान' खरीदने की मिन्नत कर रहे हैं तो कुछ ने बेटे-बेटियां को ही अपना सेल्स प्रतिनिधि बनाकर मार्केट में उतारने का मन बना लिया है. आखिर पापी पेट का सवाल जो है.

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जागरण वालों की गुंडई! बीच शहर में डायनामाइट से धमाका, मालिक पर मुकदमा दर्ज

दैनिक जागरण वाले जो कर करा दें, वही कम है. पेड न्यूज, उगाही, शोषण, फर्जीवाड़ा आदि के बाद अब ताजा काम शुरू किया है डायनामाइट से धमाका करने का. जैसे भारत ने हो कोई अफगानिस्तान हो जहां कोई नियम-कानून न हो. पर जागरण वाले नियम-कानून मानते कब हैं, क्योंकि ये नियम-कानून बनाने वालों को साधने में माहिर जो ठहरे. मसला झांसी का है. यहां दैनिक जागरण वाले डायनामाइट लगाकर विस्फोट कर रहे थे. धमाकों से लोग दहल गए. होटल समेत कई मकानों को नुकसान पहुंचा है.

जब अखबार चलाने वाले ही ऐसी हरकत करें तो भला इनकी खबर कौन छापेगा. लेकिन धरती वीरों से खाली नहीं है. झांसी में एक अखबार है जनसेवा मेल. इसने अपने पेज नंबर तीन पर विस्तार से पूरी खबर छापी है. साथ में यह भी कि दैनिक जागरण के मालिक समेत कइयों पर दो मुकदमें दर्ज किए गए हैं. यह तो हमको आपको सबको पता है कि इन जागरण वालों के खिलाफ कोई एक्शन होना हवाना तो है नहीं क्योंकि सत्ता इनकी मुट्ठी में, अफसर इनकी मुट्ठी में, पुलिस इनकी मुट्ठी में, नेता इनकी मुट्ठी में. इसलिए ये मुकदमें और कानूनी कार्रवाई आगे चलकर दम तोड़ दे तो किसी का आश्चर्य नहीं होगा.

सोचिए, अगर यही हरकत किसी आम आदमी ने किया होता तो ये दैनिक जागरण वाले ही कितनी बड़ी बड़ी खबर छापते और उस आम आदमी का क्या हश्र होता जो डायनामाइट लगाकर धमाके कर रहा होता. सोचिए सोचिए भाई.. सोचिए, क्योंकि यह यूपी है और यहां सपा का राज चलता है, जहां प्रभावशाली आदमी कुछ भी कर सकता है और आम आदमी बिना अपराध के थाने-जेल जा सकता है. नीचे जनसेवा मेल की कटिंग है. इस कटिंग पर क्लिक कर देंगे तो आपको विस्तार से पूरी कहानी पढ़ने को मिल जाएगी.  -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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अगर आपके पास भी मीडिया वालों की गुंडई, उगाही, अत्याचार की कोई खबर सूचना हो तो भड़ास तक जरूर पहुंचाएं. याद रखिए, आज अगर आप चुप रहे तो आपके साथ कभी अत्याचार हुआ तो दूसरा कोई बोलने वाला नहीं होगा.

वेज बोर्ड से बचने के लिए हिंदुस्तान मैनेजमेंट परमानेंट इंप्लाई को परेशान कर रहा!

हिंदुस्तान, पटना से खबर है कि यहां जो परमानेंट इंप्लाई है, उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड की सुविधा न देने के लिए उन्हें इस्तीफा देने को मजबूर किया जा रहा है. जो लोग इस्तीफा नहीं दे रहे, उनका तबादला दूसरे प्रदेशों में किया जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक हिंदुस्तान, पटना के परमानेंट स्टाफ की लिस्ट बनाकर इन लोगों को तरह-तरह से परेशान किया जा रहा है.

इन्हें रिजाइन करके कांट्रैक्ट पर काम करने को कहा जा रहा है और जो ऐसा नहीं कर रहा है उसका ट्रांसफर कर दिया जा रहा है. बताया जाता है कि यह कवायद हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड के कई एडिशनों में चल रही है.

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मजीठिया वेज बोर्ड न देने के लिए 'लोकमत' वाले अपने परमानेंट इंप्लाइज से जबरन इस्तीफा ले रहे (देखें पत्र)

सुभाष सिंह ने जागरण छोड़ा, विवेक वाजपेयी जी न्यूज से जुड़े, दीपिका का इस्तीफा

दैनिक जागरण, लखनऊ से लोगों का जाना थम नहीं रहा है. क्रांति ने इस्तीफा देकर नभाटा, लखनऊ ज्वाइन किया तो अब सुभाष सिंह ने इस्तीफा देकर नेशनल दुनिया, जयपुर के साथ नई पारी शुरू की है. सुभाष जागरण में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत थे. बताया जाता है कि नेशनल दुनिया, जयपुर में वे सेकेंड मैने के रूप में काम देखेंगे.

विवेक वाजपेयी ने जी न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की है. वे अभी तक दिशा चैनल में प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत थे.

दीपिका शर्मा ने धार्मिक चैनल मंगल कलश के एचआर हेड पद से इस्तीफा दे दिया है. बताया जाता है कि चैनल में खराब माहौल के कारण उन्होंने यहां गुडबॉय बोल दिया.

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सीमा पर जारी है उपद्रव, पाक को करारा सबक सिखाने का बढ़ गया है दबाव!

भारत सरकार के कड़े रुख के बावजूद पाकिस्तान की सेना अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रही है। जबकि, रक्षामंत्री ए के एंटनी ने दो दिन पहले ही इस्लामाबाद को कड़ा संदेश भेजा था। सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने भी कह दिया है कि यदि पाकिस्तान ने अपना रवैया नहीं बदला, तो फिर मुंह तोड़ जवाबी कार्रवाई के लिए भारत को भी मजबूर होना पड़ेगा। ऐसी स्थिति आई, तो पाक की दिक्कतें बढ़ जाएंगी।

इस तरह की चेतावनियों के बाद भी सीमा पार से लगातार शरारतें की जा रही हैं। सोमवार की रात में जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में पाकिस्तानी सीमा से आए फौजियों ने खूनी उपद्रव किया था। इन लोगों ने भारतीय चौकी में तैनात पांच जवानों को मार दिया था। इससे दोनों देशों के बीच नए सिरे से तनाव बढ़ गया है। भारत में सड़क से संसद तक पाक के इस कारनामे पर लोगों में भारी गुस्सा है। इस संवेदनशील स्थिति में भी पाक का रवैया नहीं बदला है। शुक्रवार को आधी रात के बाद मेंढर सेक्टर में पाकिस्तान की सीमा से भारतीय चौकियों को निशाना बनाकर अधाधुंध गोलीबारी की गई।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, पाक के फौजियों ने करीब साढ़े सात घंटे तक फायरिंग जारी रखी। अनुमान है कि लगभग सात हजार राउंड गोलियां चलाई गईं। माना जा रहा है कि ‘सीज फायर’ लागू होने के बाद पहली बार इतनी देर तक फायरिंग की घटना हुई। इसे काफी गंभीर मामला माना जा रहा है। उल्लेखनीय है कि कारगिल युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 2003 में ‘सीज फायर’ का समझौता हुआ था। शुरुआती दौर में तो पाकिस्तान ने काफी संयम दिखाया था। लेकिन, पिछले दो सालों से पाक की सेना जम्मू-कश्मीर से जुड़ी सीमा रेखा में लगातार शरारतें कर रही है। सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह ने पिछले दिनों दावा किया था कि पाकिस्तान की तरफ से 60 बार ‘सीज फायर’ का उल्लंघन किया गया है। पाक की तरफ से लगातार उकसावे वाली हरकतें की जा रही हैं। उन्होंने इस्लामाबाद को चेतावनी देते हुए कह दिया था कि भारत की सेना का धैर्य टूटा, तो यह स्थिति पाकिस्तान के लिए बहुत महंगी पड़ने वाली है। सेना प्रमुख की इस टिप्पणी को अल्टीमेटम के रूप में देखा गया।

रक्षा विशेषज्ञों को भी हैरानी हो रही है कि भारत के इन कड़े तेवरों की भी पाकिस्तान के हुक्मरान पता नहीं क्यों परवाह नहीं कर रहे हैं? रक्षा विशेषज्ञ डॉ. भरत वर्मा का मानना है कि अब वह समय आ गया है कि सिर्फ जुबानी चेतावनियों से काम नहीं चलने वाला। ऐसे मेंं, जरूरी हो गया है कि जल्द से जल्द सीमा पर पलटवार की रणनीति अपना ली जाए। यदि इस मौके पर भी नरमी की रणनीति रही, तो इससे सेना का मनोबल भी गिरने का खतरा है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों पुंछ सेक्टर में भारतीय सीमा में आधा किमी अंदर आकर पाक के फौजियों ने पांच जवानों को मार दिया था। रक्षामंत्री ए के एंटनी ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि हमलावर आतंकवादी नहीं, बल्कि पाक के ही फौजी थे। सेना प्रमुख जनरल बिक्रम सिंह इस हादसे के बाद घटनास्थल का जायजा लेने के लिए पुंछ सेक्टर में पहुंचे थे। उन्होंने सेना के अधिकारियों से कह दिया है कि सीमा पार से जरा भी शरारत हो, तो उसका मुंह तोड़ जवाब देना बहुत जरूरी है। उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि भारतीय सीमा में आधा किमी अंदर आकर पाक के फौजियों ने हमला किया और सुरक्षित अपनी सीमा में कैसे लौट गए? सेना प्रमुख के कड़े तेवरों से फौजियों में यह संदेश दे दिया गया है कि अब मुंह तोड़ जवाब देना जरूरी हो गया है।
पुंछ चौकी में हुए हमले को लेकर विपक्ष ने यूपीए सरकार पर काफी दबाव बढ़ा दिया है। पिछले सप्ताह इस मामले को लेकर विपक्ष ने संसद में सरकार की जमकर खिंचाई की थी। विपक्ष के दबाव के चलते ही रक्षामंत्री एंटनी को अपना बयान बदलना पड़ा। दरअसल, पुंछ में हुए हमले को लेकर पहले दिन संसद में रक्षा मंत्री ने यही कह दिया था कि सीमा पार से 20   आतंकवादियों के दल ने भारतीय चौकी में हमला किया था। इसी से हमारे पांच जवान शहीद हो गए। रक्षामंत्री ने यह बताया था कि हमलावरों में कुछ लोग पाक सेना की वर्दी में थे। एंटनी के इस बयान से संसद में खासा हंगामा हुआ। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज तो सरकार पर बिफर ही गई थीं। उन्होंने रक्षामंत्री से माफी मांगने के लिए कहा था। एंटनी के बयान पर कांग्रेस के नेता भी खुश नहीं थे। क्योंकि, इस बयान से यही संदेश गया कि सरकार पाकिस्तान के प्रति नरम नीति अपना रही है।

पाक की हरकत के खिलाफ जब देशभर में गुस्से की लहर बढ़ी, तो सरकार को भी अपने तेवर कड़े करने पड़े। इसके बाद रक्षामंत्री ने अगले दिन अपना नया बयान दिया। इसमें उन्होंने यह स्वीकार किया कि पुंछ चौकी में हमला पाक सेना की ही एक स्पेशल यूनिट ने किया था। उल्लेखनीय है कि इसी साल जनवरी में जम्मू के पास मेंढर सेक्टर में पाक के सैनिकों ने दो भारतीय जवानों का सिर काट लिया था। इस बर्बर घटनाक्रम के दौरान एक जवान का कटा हुआ सिर तो पाक के सैनिक अपने साथ ही ले गए थे। इस हादसे को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा था। यह अलग बात है कि पाक सेना के अधिकारियों ने यही सफाई दी थी कि सिर काटने का कारनामा उन लोगों ने नहीं किया था। पाक के हुक्मरानों ने इसे आतंकवादी घटना के रूप में प्रचारित किया था।

पाकिस्तान में सत्ता परिवर्तन हो चुका है। नवाज शरीफ, प्रधानमंत्री बने हैं। शरीफ की छवि एक मृदुभाषी नेता की रही है। वे लगातार भारत से अच्छे रिश्ते रखने की दुहाई भी देते रहे हैं। यह भी कह चुके हैं कि फिर दोबारा कारगिल जैसी स्थितियां दोनों देशों के बीच हरगिज नहीं आने दी जाएंगी। शरीफ के इन संकल्पों के बाद भी वहां की सेना की कार्यशैली में बदलाव नहीं देखा जा रहा। रक्षा विशेषज्ञ भरत वर्मा सवाल करते हैं कि शरीफ साहब की तमाम ‘शराफत’ किस काम की? जब वे अपनी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना पर कुछ भी नियंत्रण नही रख पा रहे हैं। कारगिल युद्ध के समय भी सत्ता में नवाज शरीफ ही थे। उस समय तो यही कहा गया था कि तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने ही साजिश रची थी। शरीफ को कोई जानकारी नहीं दी गई थी।

इस बीच खुफिया एजेंसी आईबी ने दिल्ली पुलिस को एक अलर्ट भेजा है। इसमें कहा गया है कि आतंकी संगठन जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद लगातार भारत के खिलाफ जहरीला भाषण दे रहा है। कराची की एक सभा में इस आतंकी आका ने यहां तक कहा है कि भारत को सबक सिखाने के लिए दिल्ली में बड़ा निशाना साधने की जरूरत है। आईबी ने खबरदार किया है कि हाफिज के गुर्गे दिल्ली को आतंकी निशाना बना सकते हैं। इस अलर्ट के बाद राष्ट्रीय राजधानी में सुरक्षा निगरानी बढ़ा दी गई है। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर बीएस बस्सी ने कहा है कि वैसे भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी जाती है। लेकिन, हाफिज की धमकी के बाद सुरक्षा निगरानी और दुरुस्त कर दी गई है। उल्लेखनीय है कि नवंबर 2008 में हुए मुंबई के आतंकी हमले का मास्टर माइंड यही हाफिज सईद था। भारत के लिए यह आतंकी आका मोस्ट वांटेड है। लेकिन, पाक सरकार इसे खुला संरक्षण देने में लगी है।

ईद के मौके पर शुक्रवार को हाफिज सईद ने लाहौर के प्रसिद्ध गद्दाफी स्टेडियम में नमाज के दौरान जहरीली तकरीर की। इस मौके पर भी हाफिज ने कई आपत्तिजनक टिप्पणियां कर दीं। यहां तक कह दिया कि कश्मीरियों को आजादी दिलाने के लिए जो भी करना पड़े, इसके लिए तैयार रहना होगा। ताकि, उन्हें अगली ईद तक आजादी की सांस मिल सके। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हाफिज ने अपनी तकरीर से साफ कर दिया है कि उसके इरादे कश्मीर में उपद्रव बढ़वाने के हैं। उल्लेखनीय है कि सीमा पार के उकसावे के चलते कश्मीर में एक दशक तक हालात काफी खराब रहे हैं। 89 से अब तक जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों के चलते करीब 70 हजार लोग मारे गए हैं। काफी मुश्किल से इस राज्य के हालात काबू में आए हैं। लेकिन, सीमा पार के आतंकी संगठन फिर से घाटी में ‘आजादी’ के नाम पर साजिश करने में लगे हैं। ईद के मौके पर जम्मू के किश्तवाड़ में छोटी सी बात पर सांप्रदायिक दंगा हो गया। इसमें दो लोगों की जान चली गई। सरकार के सामने चुनौती है कि किश्तवाड़ की सांप्रदायिक आग और न बढ़े। लेकिन, सीमा पार के हाफिज सईद जैसे आतंकी आका, इस्लाम के नाम पर तमाम भड़काऊ संदेश घाटी में भिजवा रहे हैं। इससे जम्मू-कश्मीर की सरकार भी चिंतित हो गई है।

इस बीच पाकिस्तान की तरफ से पहली बार यह खुलासा किया गया है कि भारत का मोस्ट वांटेड दाऊद इब्राहिम लंबे समय तक पाकिस्तान में रहा है। पूर्व राजनयिक एवं प्रधानमंत्री के नवाज शरीफ के सलाहकार शहरयार खान ने दाऊद के संदर्भ में यह खुलासा शुक्रवार को किया था। लेकिन, शनिवार को उन्होंने ‘यू-टर्न’ लेने की कोशिश की। यही कह दिया कि उन्हें नहीं पता कि दाऊद अब कहां है? यदि वह पाकिस्तान में होता, तो उसे हम गिरफ्तार कर लेते। दो दशकों में पहली बार पाक के किसी हुक्मरान ने दाऊद के बारे में मुंह खोला है। लेकिन, भारत सरकार पाक के ‘सच’ को विश्वसनीय नहीं मान रही है। इस मामले में सभी राजनीतिक दलों ने एक स्वर में पाकिस्तान की खबर ले ली है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कह दिया है   कि पाकिस्तान महा झूठा देश है। इसकी बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता। विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कह दिया है कि दाऊद इब्राहिम की तलाश जारी रहेगी। सरकार तब तक चैन नहीं लेगी, तब तक दाऊद उसकी पकड़ में नहीं आ जाता है। पाक के रवैए के खिलाफ सभी दलों की आम सहमति बन गई है कि इस्लामाबाद को कड़े से कड़ा संदेश दिया जाए। जरूरत पड़ने पर सीमा पर करारा जवाब देने से भी नहीं चूकना चाहिए।

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

एनडीटीवी, मेरठ से जुड़े युवा कैमरामैन अविनाश कमांडो का निधन

मेरठ से एनडीटीवी के कैमरामैन अविनाश कमांडो के निधन की दुखद सूचना है. मेरठ के चर्चित कैमरामैन अविनाश जानसन उर्फ कमांडो को ब्रेन अटैक आठ जुलाई की सुबह घर पर हुआ. शनिवार को इनका निधन हो गया. ब्रेन अटैक से अविनाश का शरीर पैरालिसिस का असर हो गया.

शनिवार शाम लगभग आठ बजे इलाज के दौरान मेरठ में शास्त्रीनगर स्थित डा. अशोक गर्ग नर्सिंग होम में अविनाश ने अंतिम सांस ली. 35 वर्षीय अविनाश अपने पीछे पत्नी रीतू, 12 साल की बेटी तमन्ना और 2 साल का बेटा आशीष को छोड़ गए हैं. रविवार की शाम अविनाश का अंतिम संस्कार साकेत स्थित कब्रिस्तान में किया गया.

अविनाश को अंतिम विदाई देने के लिए उनके परिजनों, रिश्तेदारों के अलावा बड़ी संख्या में मीडिया, राजनीति, सामाजिक संगठनों के लोग उपस्थित हुए. अविनाश मेरठ में इलेक्ट्रानिक मीडिया में करीब 18 साल से सक्रिय थे. उन्हें कमांडो के नाम से जाना जाता था. मेरठ दर्शन, सिटी हलचल, जी न्यूज, स्टार न्यूज और एनडीटीवी सहित कई टीवी चैनलों को अपनी सेवाएं दी. इलेक्ट्रानिक मीडिया जगत में अविनाश ने कुशल कैमरामैन के रूप में अपनी पहचान बनाई थी. व्यवहार में भी अविनाश बहुत सौम्य और सभी को सम्मान देने वाले थे.

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जयपुर के बाद लखनऊ पहुंचेगा नेशनल दुनिया, महुआ के पांच साल पूरे, आउटलुक प्रबंधन ने संकट निपटाया

दिल्ली, मेरठ के बाद अब जयपुर से छपने लगा हिंदी दैनिक नेशनल दुनिया. अगली तैयारी लखनऊ की है. नेशनल दुनिया अब लखनऊ में मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है. इसके बाबत तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. एसबी मीडिया प्रकाशन ग्रुप का यह अखबार अब दिल्ली-एनसीआर के बाहर यूपी व राजस्थान में अपनी पहुंच बना चुका है. माना जा रहा है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव को देखते हुए राजस्थान से यह अखबार शुरू किया गया है. जयपुर एडिशन की लांचिंग 9 अगस्त को की गई. यहां पर संपादक पद की जिम्मेदारी वरिष्ठ पत्रकार मनोज माथुर को दी गई है.

भोजपुरी एंटरटेनमेंट चैनल महुआ ने पांच वर्ष पूरे कर लिए हैं. कई तरह के विवादों और दबावों से जूझ रहे महुआ ग्रुप का यह चैनल महुआ पांच साल पहले 11 अगस्त 2008 को लांच हुआ था. पांच सालों में महुआ ने कई सफलताएं हासिल की. इस चैनल ने भोजपुरिया सभ्यता, संस्कृति और मिट्टी को नई उंचाई बख्शी. इस चैनल के कई भोजपुरी सीरियल व शो सुपरहिट रहे. बाहुबली, बड़की मलकाईन, खानदान, कजरी, इम्तहान आदि सीरियल पापुलर रहे तो ‘भौजी नं.-वन’, 'सुर-संग्राम', 'डांस-संग्राम' और ‘नाच-नचईया धूम मचईया’ जैसे शो ने भोजपुरी इलाके के लोगों को बड़ा प्लेटफार्म दिया. महुआ ने अपने दर्शकों को ढेर सारी सुपरहिट और क्लासिक फिल्में दिखाईं.

उधर,  आउटलुक ग्रुप से खबर है कि तीन अंतरराष्ट्रीय मैग्जीन्स पीपल, मैरी क्लेयर और जियो के बंद होने से मीडिया इंडस्ट्री में ग्रुप की हो रही थूथू से निपटने के लिए प्रबंधन ने कई तरह की कवायद शुरू की है. तीन मैग्जीनों के बंद होने से सैकड़ों मीडियाकर्मी बेरोजगार हो गए. बाद में कोर्ट ने आउटलुक ग्रुप को यथास्थिति कायम रखने के निर्देश दिए. ताजी सूचना के मुताबिक आउटलुक मैनेजमेंट और बेरोजगार कर्मियों के बीच सहमति हो गई है. आउटलुक ग्रुप के प्रेसीडेंट इंद्रनील रॉय का कहना है कि कर्मियों और प्रबंधन के बीच विवाद सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझा लिया गया है. इन्होंने माना कि पत्रिकाओं को बंद करने का निर्णय प्रोफिट से जुड़ा हुआ है. आउटलुक ग्रुप के बिकने की खबर पर राय का कहना है कि ये सब अफवाह है जो कई वर्षों से गाहे बगाहे उड़ती रहती है.

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हिन्दुस्तान गोरखपुर से डिप्टी मैनेजर अजय त्रिवेदी ने दिया इस्तीफा, जनसंदेश टाइम्स संतकबीरनगर से अजीत जुड़े

एक मेल के जरिए सूचित किया गया है कि हिंदुस्तान गोरखपुर से यूनिट हेड दीपक माहेश्वरी के कारण पिछले कुछ समय से लगातार लोग इस्तीफा दे रहे हैं. शनिवार को अख़बार के डिप्टी मैनेजर अजय त्रिवेदी ने भी इस्तीफा दे दिया. हालाँकि प्रबंधन अभी उन्हें रोकने में लगा हुआ है. इसके पहले मार्केटिंग के ही दाउद अहमद और सोनू कुमार ने भी दीपक माहेश्वरी पर व्यक्तिगत आरोप लगा कर इस्तीफा दे दिया था. आरोप है कि मीटिंग में गाली-गलौज और अपशब्दों के कारण स्वाभिमानी लोग इस्तीफा देने को मजबूर हो रहे हैं.

जनसंदेश टाइम्स संतकबीरनगर में तीन माह में चार ब्यूरो प्रभारी बदले जा चुके हैं। जुलाई माह में राजकुमार तिवारी के दैनिक जागरण में चले जाने के बाद से कार्यालय में ताला बंद हो गया था। तब यहां सेकेण्डमैन रहे कौशलेन्द्र राय वेतन भुगतान की मांग को लेकर अड़ गए थे, जिससे कार्यालय नहीं खुल रहा था। अब जनसंदेश टाइम्स ने डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के संतकबीरनगर जिले के ब्यूरो प्रभारी अजीत नाथ मिश्र को जनसंदेश का प्रभार दे दिया है।

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नक्षत्र न्यूज से परिवेश का इस्तीफा

खबर है कि झारखंड बिहार के रीजनल न्यूज चैनल नक्षत्र न्यूज के चैनल हेड परिवेश वात्सायायन अब कार्यमुक्त हो चुके हैं. सूत्रों का कहना है कि इनपुट हेड दीपक ओझा के साथ हुए विवाद के बाद परिवेश को जाना पड़ा. बताया जाता है कि किसी मुद्दे को लेकर दीपक और परिवेश में काफी बहस हुई थी. इसके बाद दीपक ने कंपनी के डायरेक्टर कन्हैया तनेजा को अपना इस्तीफा सौंप दिया. प्रबंधन ने दीपक के इस्तीफे को नकार दिया और चैनल हेड परिवेश को एक सप्ताह के लिए बैठा दिया. खबर है कि प्रबंधन के इस फैसले से नाराज परिवेश ने नक्षत्र छोड़ दिया.

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आरपी सिंह सुदर्शन टीवी पहुंचे, नीरज शर्मा के हवाले सुभारती, कई लोगों का इस्तीफा

सुभारती टीवी से इस्तीफा देने के बाद आरपी सिंह ने सुदर्शन टीवी ज्वाइन कर लिया है. आरपी सिंह के नेतृत्व में ही सुभारती टीवी लांच हुआ था और वे कई वर्षों से सुभारती ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे. आरपी के सुदर्शन टीवी ज्वाइन करने के बाद सुभारती टीवी का जिम्मा नीरज शर्मा को दे दिया गया है.

नीरज के काम संभालने के बाद दो असिस्टेंट प्रोड्यूसर हर्ष और जितेंद्र, सीनियर कैमरामैन कैलाश, कैमरामैन अमित, मृत्युंजय, कासिफ ने इस्तीफा दे दिया है. बताया जाता है कि चैनल का माहौल ठीक नहीं है. सेलरी इनक्रीमेंट की बात बार बार की जाती है पर किसी की सेलरी बढ़ाई नहीं गई. बेहद कम दाम पर यहां लोग काम कर रहे हैं.

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रवीन्द्र पंचौली बने आईएफडब्ल्यूजे के प्रांतीय महासचिव

भोपाल। कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार रवीन्द्र पंचौली को पत्रकार संगठन इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के प्रांतीय महासचिव पद पर राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रय राव ने नियुक्त किया है। इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट यूनियन के सचिव सेंट्रल इंडिया प्रभारी कृष्णमोहन झा की अनुशंसा पर आई.एफ.डब्ल्यू. जे. के राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पांडे ने रवीन्द्र पंचौली को संगठन के मध्यप्रदेश इकाई का प्रदेश महासचिव नियुक्त किया है।

श्री पंचौली को आई.एफ.डब्ल्यू.जे. के प्रांताध्यक्ष बनने पर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रामगोपाल शर्मा,सतीश सक्सैना,दिनेश चंद वर्मा जयंत वर्मा, उकीर्ति राणा, राजेन्द्र कश्यप,विश्वेश्वर शर्मा, योगेश तिवारी, उज्जैन प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष रमेश दास, रतलाम प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष रमेश टाक, चंद्रभूषण शंकरकाय, रमाशंकर तिवारी, राजेन्द्र अहवर्यू, सुधीर उपाध्याय, ज्ञानेन्द्र त्रिपाठी, सैयद जावेद अली, विलोक पाठक परवेज खान, सीताराम शर्मा, प्रमोद मिश्रा सहित प्रदेश के सभी पत्रकारों ने बधाई दी है। साथ ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव एवं राष्ट्रीय महासचिव परमानंद पांडे के प्रति आभार ज्ञापित किया है।

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रायपुर से ‘जस्ट इन टाइम’ नामक नया रीजनल न्यूज चैनल, पंकज चोपड़ा, जरीन सिद्दीकी और गौतम कुमार जुड़े

भड़ास4मीडिया को एक मेल के जरिए सूचित किया गया है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से छत्तीसगढ की खबरों पर आधारित एक नया न्यूज चैनल शुरू हो रहा है. चैनल का नाम रखा गया है- ''जस्ट इन टाईम न्यूज चैनल''. इसका प्रसारण 15 अगस्त से किया जाएगा.

अबीर वर्टज एंड इंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के बैनर तले शुरू हो रहे इस चैनल का हेड पकंज चोपड़ा को बनाया गया है. ब्यूरो प्रमुख के पद पर जरीन सिददीकी को नियुक्त क्यिा गया है. सम्पादक गौतम कुमार बनाए गए हैं. इस चैनल का प्रसारण सिर्फ केबल के माध्यम से छत्तीसगढ के सभी जिलों में किए जाने का दावा किया गया है. चैनल का उदघाटन 15 अगस्त को मुख्यमंत्री रमन सिंह के हाथों कराए जाने की तैयारी है.

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‘आज’ अखबार अपने ही शहर काशी में अपनी अंतिम सांसें ले रहा

न केवल यूपी बल्कि बिहार- झारखंड के बाजारों से ‘आज‘ गायब होता जा रहा है। लगता है बस विज्ञापन की खानापूर्ति के लिए इसकी प्रतियां छप रही हैं। एक रुपया दाम रहने के कारण चाय-पान की दुकानों और सैलूनों में ही इसकी प्रतियां दिख जाती है। प्रतियोगिता की इस दौड़ में ‘आज‘ बुरी तरह मात ही खा गया समझिये। वह भी क्या समय था जब हिन्दी भाषा को समृद्ध करने के लिए देशवासी ‘आज‘ ही पढ़ते थे।

घरों में बच्चों को ‘आज‘ पढ़ने की नसीहत दी जाती थी। लेकिन बड़े घराने के अखबारों के बाजारों में छा जाने और आज प्रबंधन द्वारा खर्च से हाथ खीच लेने से ‘आज‘ की हालत बिलकुल खस्ता हो गयी है। ऐसी बात नहीं कि सरकारी विज्ञापनों से कमाई कम हो रही है। यूपी में भले ही कम हो लेकिन बिहार और झारखंड में जम कर सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं। इसके बावजूद मालिकों का ध्यान भी अखबार से हट कर दूसरे कारोबार में लग गया है।

इतिहास गवाह है कि राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त द्वारा स्थापित ‘आज‘ बाबूराव विष्णु राव पराड़कर के लीडरशिप में इतना चमका कि दक्षिण भारतीय का भी यह लोकप्रिय पत्र बना। पंडित कमलापति त्रिपाठी,पंडित लक्ष्मी शंकर व्यास, विद्याभास्कर, चन्द्रकुमार, अटलजी, मनोरंजन कांजिलाल बाबू दूधनाथ सिंह, बाबू पारसनाथ सिंह, विश्वनाथ सिंह,राजनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, दीनानाथ गुप्त, राममोहन पाठक, धीरेन्द्रनाथ सिंह, लक्ष्मीनाथ संड, पदमपति शर्मा, जगत शर्मा, के अलावा कई ऐसे पत्रकार दधीचियों ने अपने खून-पसीना से आज को सींचा, इसे एक मुकाम तक पहुंचाया। आज इन दधीचियों को खुद अब ‘आज‘ प्रबंधन भी याद नहीं करता।  इनमें कई दिवंगत हो गये तो कई अब भी अपनी कलम-कूची की बदौलत सुर्खियों में हैं।

बाद की पीढ़ियों में दिलीप शुक्ल, शशिशेखर, अमर सिंह, दिनेशचन्द्र श्रीवास्तव, अशोक चक्रवर्ती गणपति नावड़, गोपोश पांडेय, ज्ञानवर्द्धन मिश्र, सुरेन्द्र किशोर, सत्यप्रकाश असीम, विद्यार्थीजी, अविनाशचन्द्र मिश्र, दिलीप श्रीवास्तव नीलू के अलावा एक दर्जन से अधिक पत्रकारों ने अपने-अपने क्षेत्रों में अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए किसी अखबार को आगे नहीं बढ़ने दिया। आज क्या स्थिति है किसी से छिपी नहीं। वषों से कर्मियों को न तो कोई प्रोन्नति दी गयी है और न सालाना इन्क्रीमेंट ही। प्राविडेड फंड का पैसा भी सरकार के खाते में न जमा कर कंपनी अपने निजी ट्रस्ट में ही जमा करती है। मासिक पगार भी एक महीना के अंतराल पर दिया जाता है, वह भी कर्मियों के मांगने पर। कर्मचारियों के समक्ष मजबूरी है कि वे कहीं जा नहीं सकते और ‘आज‘ में रह कर जी भी नहीं सकते। जीवन यापन लायक भी वेतन नहीं मिलता।

यूपी की प्रायः सभी यूनिटों की हालत खस्ता है। खुद काशी का पयार्य माना जाने वाला ‘आज‘ अपने ही शहर में अपनी अंतिम सांसे ले रहा है। बिहार में इसकी एक ही यूनिट पटना में हैं। यही हाल झारखंड का है। श्री सत्येन्द्र कुमार गुप्त के संपादक रहने पर सबकुछ ठीकठाक रहौ  उनके पुत्र शार्दूल बिक्रम गुप्त के हाथों में बागडोर आने पर इसमें लेटेस्ट तकनीकी का उपयोग हुआ और यूपी में एक के बाद एक यूनिटों का विस्तार हुआ। उसी दौर में बिहार और झारखं डमें इसका पदार्पण भी हुआ। समय बदला और बदली परिस्थितियां भी। कर्मियों को अब महसूस होने लगा है कि शार्दूलजी भी बस नाम मात्र के संचालक या संपादक रह गये हैं, बागडोर परिवार के ही किसी और के हाथ में है और अप्रत्यक्ष रूप से संचालन का काम वहीं से हो रहा है।

आज की तारीख में दो से पांच हजार रुपये वाले स्ट्रींगरों के बल पर ही अखबार चल रहा है। रेगुलर श्रमजीवी पत्रकारों की संख्या तो नहीं के बराबर रह गयी है। किसी वेतनबोर्ड की सिफारिशों को नहीं मानना प्रबंधन अपना धर्म मानता है। ऐसी बात नहीं कि संचालकों के पास धन की कमी है। आधी काशी के मालिक ये लोग है। बस कमी है तो इच्छाशक्ति की। अब भी वक्त है। आने वाले वषों में अपने प्रकाशन का एक सौ वर्ष पूरा करने वाला है। प्रबंधन नये सिरे से धमाकेदार रिलांच करे और वह देखे कि उनका ‘आज‘ देखते-देखते कैसे बाजार में छा जाता है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

स्टिंग कर अफसरों से वसूली करने वाले चार कथित पत्रकारों की शिकायत पुलिस कमिश्नर के यहां पहुंची

एक महिला ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को मेल कर दिल्ली के चार कथित पत्रकारों के बारे में शिकायत भेजी है. इस शिकायत में महिला ने काफी कुछ बातें बताई हैं. इस महिला के पत्र के कुछ हिस्से इस प्रकार है-  ''सर शहर में कुछ असामाजिक लोगों के विषय में आपको गुप्त सूचना देना चाहती हूँ, दिल्ली में रहने वाले चार शातिर जालसाजों के बारे में मैं आपको कुछ जानकारी दे रही हूँ, महोदय से अनुरोध है की आप इनकी सही जाँच कर समाज के इन भ्रष्ट गुनाहगारों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाही करेंगे, महोदय उपरोक्त आरोपियों के बारे में नीचे कुछ जानकारी दी हुई है.''

महिला ने पत्र में चारों कथित पत्रकारों के नाम और उनके मोबाइल नंबर दिए हैं. फिर आगे लिखा है- ''महानुभाव ये चारों अपने आपको पत्रकार बताते हैं, और लोगों व सरकारी दफ्तरों के अधिकारियों का फर्जी स्टिंग कर उन्हें धमकाते हैं, उनसे लाखों रुपयों की उगाही करते हैं, अगर कोई इसका विरोध करता है तो उसे इंडियन मुजाहिद्दीन के आतंकियों से मरवाने की धमकी भी दी जाती है। जनाब ये महीने में लाखों के वारे-न्यारे कर रहे हैं अपनी आरामदायक गाड़ियों में घूम रहे हैं, और अपने काले कारनामों को लगातार अंजाम दे रहे हैं..। इनमें से दो पर पहले से ही बैंक लूटने और ब्लैक मेलिंग के कई मामले लंबित हैं, जिनमे अब तक इन्हें कोई सजा नहीं मिली है, महोदय इनके कई आपराधिक संगठनों और आतंकियों से भी सम्बन्ध होने का शक है, ये चारों आजकल m.c.d के दर्जनों अधिकारियों से महीने की रंगदारी वसूल रहे हैं, कुछ नामों का ज़िक्र कर रही हूँ…''

महिला ने अपने पत्र में उन पांच अधिकारियों के नाम व मोबाइल नंबर दिए हैं जिनको ये चारों कथित पत्रकार धमकाते और वसूलते हैं. इनमें से ज्यादातर इंजीनियर हैं. महिला ने मेल दिल्ली पुलिस कमिश्नर की आफिसियल मेल आईडी पर भेजी है. देखना है दिल्ली पुलिस इस मामले में क्या एक्शन लेती है.

आम्रपाली ग्रुप पर इनकम टैक्स का छापा

एनसीआर में रियल एस्टेट में अरबों का कारोबार करने वाली आम्रपाली ग्रुप के दिल्ली-नोएडा एवं गाजियाबाद के ठिकानों पर इनकम टैक्स विभाग के अफसरों ने एक साथ छापेमारी की। आयकर अधिकारियों को शक है कि इस ग्रुप ने काली कमाई के साथ बोगस निवेश कर रखा है।

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के सौ से ज्यादा ऑफिसर इस कार्रवाई में शामिल थे। छापेमारी से आम्रपाली ग्रुप में हड़कंप का माहौल दिखा। आम्रपाली ग्रुप का लखनऊ में भी रियल स्टेट से जुड़ा कारोबार है। सूचना के अनुसार दिल्ली-नोएडा एवं गाजियाबाद में पड़े छापे में आयकर टीम ने कंपनी के तमाम कागजातों को अपने कब्जे में ले लिया है।

उधर, ऐसा ही छापा रांची और कोलकाता में प्रणामी बिल्डर्स के यहां पड़ा। इसके मालिक विजय अग्रवाल और एक प्रोजेक्ट में पार्टनर समीर लोहिया के ठिकानों पर इनकम टैक्स की कई टीमों ने छापेमारी की। सूत्रों का कहना है कि ये सारी छापेमारी एक बड़े कनेक्शन के भंडाफोड़ के लिए की गई है। बिहार, यूपी और झारखंड में बिल्डरों, मीडिया, नेताओं, अफसरों का एक पूरा गठजोड़ बन चुका है जो पैसे बनाने उगाहने के लिए नियम कानूनों की धज्जियां उड़ा रहा है।

‘प्रभात खबर’ की मातृ कंपनी उषा मार्टिन के मालिक समीर लोहिया के ठिकानों पर छापेमारी

रांची : कर चोरी की जांच के सिलसिले में आयकर विभाग की अलग-अलग टीम द्वारा प्रणामी बिल्डर्स के विजय अग्रवाल और उनकी कई कंपनियों में बतौर निदेशक शामिल समीर लोहिया के विभिन्न ठिकानों पर छापामारी के दौरान अधिकारियों को जहां एक सौ करोड़ रुपये से अधिक निवेश का पता चला है, वहीं अधिकारियों की टीम ने 60 लाख रुपये नकद, छह लॉकर व भारी मात्रा में जेवरात बरामद किये है।

इसके पूर्व आयकर विभाग ने कर चोरी की जांच के सिलसिले में राजधानी रांची में 19 और और कोलकाता के 8 ठिकानों पर एक साथ छापामारी की। इस छापामारी में आयकर अधिकारियों को बड़ी सफलता मिली है। आयकर की अलग-अलग टीम ने प्रणामी बिल्डर्स के विजय अग्रवाल और दैनिक प्रभात खबर की मातृ कंपनी उषा मार्टिन के निदेशक समीर लोहिया के विभिन्न ठिकानों पर छापामारी कर करीब 50 करोड़ रुपये के निवेश का पता लगाया है।

आयकर अधिकारियों की टीम ने कई अन्य छोटी-छोटी कंपनियों के ठिकानों में भी छापामरी की। इस छापामारी के क्रम में करीब आयकर अधिकारियों को 60लाख नकद, छह लॉकर, भारी मात्रा में जेवरात और जमीन तथा अन्य तरह के निवेश के कई तरह के दस्तावेज भी मिले है। आयकर विभाग बिहार-झारखंड के निदेशक कुमार संजय ने इन ठिकानों पर आयकर छापामारी की पुष्टि की है। आयकर विभाग के आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्य रुप से व्यवसायी व बिल्डर विजय अग्रवाल के विभिन्न ठिकानों पर छापामारी की गयी। विजय अग्रवाल के रांची स्थित ठिकानों पर की गयी छापामारी में कई अलग-अलग कंपनियों में निवेश का भी पता चला है। बताया गया है कि प्रमाणी समूह के प्रणामी बिल्डर, प्रणामी स्टेट, प्रनिधि कंस्ट्रक्शन, ग्रीन ब्यू हाईट्स, ग्रीन रेसिडेंसी समेत अन्य कंपनियां शामिल है।

प्रणाली समूह के मालिक विजय अग्रवाल की कुछ कंपनियों में समीर लोहिया भी बिजनेस पार्टनर है। आयकर विभाग की टीम ने आज रांची के जिन 19 ठिकानों पर छापामारी की, उनमें एमआर टॉवर, ग्रीन ब्यू हाईट्स, ग्रीन रेसिडेंसी, मंगलदीप अपार्टमेंट, मंगल टावर, ग्रीन पार्क, परम शुभ अपार्टमेंट, एचबी चेंबर, मंगल कुंज, फॉरच्यून हाईटस, बंसल प्लाजा शामिल है। सूत्रों के मुताबिक प्रणामी और लोहिया समूह की ओर से हाल के कुछ महीनों में ग्रीन ब्यू हाईट्स और ग्रीन रेसिटेंसी की बड़ी परियोजना शुरू की गयी थी। इस परियोजना में 100 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश की खबर है। इन दोनों परियोजनाओं में काम प्रगति पर है।

बताया गया है कि आयकर अधिकारियों को यह निरंतर सूचना मिल रही थी कि इन समूहकों की ओर से कुछ नयी कंपनियां बनायी गयी है और इन कंपनियों के दो रुपये का शेयर 100 गुणा अधिक में बिक रहा है, इसका सीधा से मतलब था कि इन कंपनियों में निवेश भी इन्हीं कंपनियों की ओर से किया जा रहा है। इसी सूचना के आधार पर कार्रवाई की गयी। प्राप्त जानकारी के अनुसार आयकर अधिकारियों की टीम ने विजय अग्रवाल से जुड़ी विभिन्न विभिन्न कंपनियों में करीब 35 करोड़ रुपये शेयर प्रिमियम का पता लगाया है, वहीं लोहिया समूह से जुड़ी कंपनियों में 15 करोड़ रुपये की शेयर प्रिमियम का पता चला है। छापामारी के क्रम में आयकर अधिकारियों को निवेश से संबंधित कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी मिले है। बताया गया है कि छापामारी के क्रम में आयकर विभाग की ओर से नई दिल्ली स्थित केंद्र को सूचना दी गयी, जहां से विभाग को यह जानकारी मिली कि इन कंपनियों से जुड़े आठ अन्य बैंक खाते भी है। आयकर अधिकारियों द्वारा यह छापामारी काफी दिनों से मिल रही सूचना के आधार पर की गयी है।

इस छापेमारी को लेकर टाइम्स आफ इंडिया में प्रकाशित खबर इस प्रकार है..

I-T raids on 27 locations in Jharkhand & Kolkata

RANCHI: After chief minister Hemant Soren hinted at the existence of a builder-contractor-police nexus in the state and threatened to take stringent action against them, the income tax sleuths on Wednesday conducted simultaneous raids on 27 locations in Jharkhand and Kolkata. The raids that began in the morning continued till late in the night.

Of the 27 locations, raids were conducted in as many as 19 locations in Ranchi, which included the premises of Pramani builders at Hariom tower in Lalpu, MR Tower at Main road and the office and residences of one Samir Lohia of the Usha Martin group of industries.
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Sources said during the raids cash worth Rs 22.4 lakh were confiscated from the office of Pramani builders whereas documents related to investment and shares were also recovered from different locations where raids were being conducted. Though an official figure about the cash recovered or investment through papers could not be ascertained, rough estimates put the cash figures to the tune of Rs 65 lakh whereas the investments are estimated to be around Rs 30 crore.

Separate IT raids were conducted in Noida, greater Noida and Delhi on the premises of Amrapali builders but a connection between the two raids was not established. Sources in the IT department, however, agreed that the Amrapali builders have some links with officials in Bihar and UP and their tentacles spreading to Jharkhand could not be ruled out.

पत्रकार रोहिताश सैन श्रीलंका जायेंगे

जयपुर। प्रदेश के युवा पत्रकार रोहिताश सैन 12 अगस्त को श्रीलंका जायेंगे। सैन ने बताया कि श्रीलंका सरकार के वित्त मंत्रालय एवं श्रीलंका पर्यटन मंत्रालय के सयुंक्त बुलावे पर देश भर से 30 पत्रकारों का प्रतिनिधि मण्डल एक सप्ताह के लिए श्रीलंका जायेगा। जहाँ उन्हें राजकीय अथिति का दर्जा दिया जायेगा।

अपने 7 दिवसीय कार्यक्रम इस प्रतिनिधि मण्डल को वहाँ की सरकार के मंत्रियों ब्यूरोक्रेटस उद्योगपतियों एवं वहाँ के नामचीन पत्रकारों से मुलाकात करवायी जायेगी तथा पूरे देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर घुमाया जायेगा। 20 अगस्त को यह दल कोलम्बो हवाई अड्डे से स्वदेश के लिए रवानगी लेगा। उल्लेखनीय है कि इस 30 सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल में सैन राजस्थान से एकमात्र प्रतिनिधि है।

के न्यूज, सीके मिश्रा, विनीत, क्रांति, राजीव, अंबुज, सचिन के बारे में सूचनाएं

कानपुर से चल रहे 'के न्यूज' चैनल ने अब यूपी के बाद उत्तराखंड में अपना प्रसार शुरू कर दिया है. अभी तक उत्तराखंड में ब्यूरोचीफ के रूप में विजय कुमार तिवारी को रखा था. अब राज्य में काम कर रहे संवाददाताओं को नियुक्ति पत्र और जून माह का मानदेय देकर अपने इरादे जता दिए हैं. 15 अगस्त से उत्तराखंड का एक बुलेटिन भी शुरू होने जा रहा है.. इस चैनल के एडिटर हनुमंत राव और एसाईनमेंट हेड दुर्गेंन्द्र चौहान हैं.

सीके मिश्रा ने नई पारी की शुरुआत द सी एक्सप्रेस, आगरा के साथ की है. वहीं, आगरा में दैनिक जागरण में कार्यरत विनीत ने नई पारी की शुरुआत अमर उजाला, मेरठ के साथ की है.

दैनिक जागरण, लखनऊ में डेस्क पर कार्यरत क्रांति ने इस्तीफा दे दिया है. वे नवभारत टाइम्स, लखनऊ से जुड़ गए हैं. उधर, दैनिक जागरण, लखनऊ के स्पोर्ट्स डेस्क पर कार्यरत राजीव वाजपेयी को अब लोकल रिपोर्टिंग में भेज दिया गया है.  हिंदस्तान, लखनऊ से अंबुज और सचिन ने इस्तीफा देकर अमर उजाला ज्वाइन किया है.

अखिलेश सरकार में किन-किन दागी-आरोपी अफसरों की है मौज, देखें लिस्ट

लखनऊ। खनन माफियाओं के लिए सिरदर्द बनीं आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को यूपी की अखिलेश सरकार ने भले ही निलंबन जैसी बड़ी सजा सुना दी हो, पर इसी सरकार ने तमाम ऐसे अफसरों को अहम पदों पर बैठा रखा है जिनके खिलाफ कई संगीन आरोप हैं। इनमें से कुछ के खिलाफ तो सीबीआई जांच तक हुई है।

खास बात ये है कि जिस प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार के दस्तखत से दुर्गा जैसी ईमानदार अफसर को निलंबित किया गया, वो खुद भी भ्रष्टाचार के मामले में निचली अदालत से सजायाफ्ता हैं और फिलहाल हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा कर रखी है।

यूपी के प्रमुख सचिव नियुक्ति और सीनियर आईएएस अफसर राजीव कुमार के पास सारे आईएएस अधिकारियों की तैनाती का जिम्मा है। इन्हीं के दस्तखत से आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को भी निलंबित किया गया। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि राजीव कुमार खुद संगीन आरोपों के घेरे में हैं। उन्हें हटाए जाने को लेकर अदालत में याचिका तक दायर है। दरअसल राजीव कुमार को नोएडा के प्लॉट आवंटन में भ्रष्ट्राचार के आरोप में सजा सुनाई जा चुकी है और फिलहाल हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगी हुई है।

प्लॉट आवंटन वही मामला है जिसमें यूपी की पूर्व प्रमुख सचिव नीरा यादव को भी जेल जाना पड़ा था। निचली अदालत से सजा पाने वाले इस अफसर को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपनी कोर टीम में रखा है। भ्रष्ट्राचार के आरोपों से घिरे इस अफसर पर सरकार की मेहरबानी सवालों के घेरे में है।

हैरानी की बात ये है कि जब सीबीआई ने राजीव कुमार को दंडित कर दिया तो उनको हटा देना चाहिए था, लेकिन वो दुलारे अफसरों में शामिल होते हैं। सरकार का मनचाहा काम करते हैं इसलिए उनको प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर तैनात कर दिया गया।

मसला अकेले राजीव कुमार का ही नहीं है। दुर्गा शक्ति नागपाल के निलंबन को लेकर पूरी तरह अड़ी अखिलेश सरकार में नौकरशाहों के कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जिन पर दाग है। मसलन आईएएस के धनलक्ष्मी। यूपी में हुए हजारों करोड़ के यूपीएसआईडीसी घोटाले में धनलक्ष्मी सीबीआई और ईडी के जांच के दायरे में है।

अखिलेश सरकार ने उन्हें भी अहम जिले अमेठी में जिलाधिकारी तैनात कर रखा है। वाराणसी में कमिश्नर के तौर पर तैनात आईएएस चंचल तिवारी के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है।

तो वहीं लखनऊ में कमिश्नर बना कर रखे गए संजीव शरण भी सीबीआई जांच के दायरे में है। शरण के पास पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव और डीजी का भी कार्यभार है। तो वहीं नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे अथॉरिटी के चेयरमैन के अहम पद पर तैनात रमारमण लोकायुक्त जांच में घिरे हुए हैं।

रमारमण पर मायावती सरकार के दौरान हुए फॉर्महाउस घोटाले में संगीन आरोप हैं। मुख्यमंत्री के सचिव आईएएस आलोक कुमार पर सिडकुल घोटाले में गंभीर आरोप लगे थे और उनकी जांच भी हुई। फिलहाल अवैध खनन के मामले में उन पर एक बार फिर आरोप लगे हैं और अदालत ने इस मामले में नोटिस भी जारी किया है।

सिर्फ आईएएस ही नहीं, आईपीएस अधिकारियों में भी यूपी सरकार ने तमाम ऐसे अफसरों को महत्वपूर्ण तैनातियां दे रखी हैं जो आरोपों के घेरे में हैं। मसलन लखनऊ के एसएसपी जे रवींद्रगौड़ एक बेगुनाह को फर्जी एनकाउंटर में मारने के आरोपों से घिरे हैं और सीबीआई ने उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की इजाजत मांगी है। इसी तरह मायावती में पुलिस भर्ती घोटाले में गिरफ्तार किए गए आईपीएस अधिकारियों को भी सरकार ने अहम पदों पर बैठा रखा है। (साभार- आईबीएन7)

जिस भगोड़े आईएएस सूर्य प्रताप सिंह को बर्खास्त करना चाहिए था, उसे अखिलेश ने प्रमुख सचिव बना दिया!

Sanjay Sharma : कोई साधारण कर्मचारी अगर एक साल से ज्यादा समय तक बिना बताये नौकरी से गायब होता है तो उसे तत्काल सेवा से बर्खास्त कर दिया जाता है.. उत्तर प्रदेश के एक आईएएस अफसर है नाम है सूर्य प्रताप सिंह. वर्ष 2004 में स्टडी लीव के लिए गए थे और गायब हो गए. बताया जाता रहा कि अमेरिका में हैं और अपना धंधा कर रहे हैं. अचानक पिछले महीने प्रकट हुए और सरकार ने बिना कुछ पूछे उन्हें ''प्रमुख सचिव अवस्थापना एवं ओद्योगिक विकास'' बना कर तीन और विभाग की जिम्मेदारी दे दी.

यह वो विभाग है जहाँ हजारों करोड़ की आमदनी की चर्चा हर कोई करता रहता है. होना तो यह चहिये था कि खुद को मेनस्ट्रीम मीडिया का पत्रकार कहने वाले सभी लोगों को यह खबर छापनी चहिये थी. पत्रकारों ने लिखी भी होगी मगर मालिकों ने मना कर दिया होगा क्योंकि नोएडा और ग्रेटर नोएडा से विज्ञापन के अलावा और भी बहुत धंधा मिलता है. वीकएंड टाइम्स की खबर पढिये और सोचिये जब हम छाप सकते हैं तो बाकी क्यों नहीं?

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा के फेसबुक वॉल से.


तो फिर नियम तोड़ने वाले सूर्य प्रताप सिंह जैसे अफसरों की ताजपोशी क्यों करते हैं सीएम?

-संजय शर्मा-

एक आईएएस अफसर उत्तर प्रदेश में नौकरी करते-करते अचानक गायब हो जाता है। नौ साल बाद वह लौटता है। लौटते 5478ही उसे प्रदेश की सबसे क्रीम माने जाने वाली पोस्ट पर तैनाती दे दी जाती है। आपको लगता होगा कि ऐसा संभव नहीं है। मगर यूपी में ऐसा ही हो रहा है। और ऐसा वह सीएम कर रहे हैं जो कह रहे हैं कि आईएएस अफसर गरीबों की नहीं सुनते और कभी-कभी उनकी भी नहीं सुनते। अब आप सिर्फ उस डील का अंदाजा लगाइये जिस डील के चलते सभी नियम और कायदे ताक पर रखकर 1980 बैच के आईएएस सूर्य प्रताप सिंह को उत्तर प्रदेश का प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास बना दिया गया।

प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास प्रदेश की सबसे कमाऊ मानी जाने वाली तैनाती होती है। नोएड, ग्रेटर नोएडा से लेकर तमाम औद्योगिक विकास वाली चीजों को तय करने का अधिकार इसी अफसर को होता है। आम तौर पर आईडीसी और प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास एक ही अफसर के पास रहते हैं। मगर सूर्य प्रताप सिंह के लिए सारे नियम कायदे ताक पर रख दिये गये। सूर्य प्रताप सिंह 2004 में स्टडी लीव के लिए गये थे और तभी से गायब हो गए।

आईएएस अफसरों का सभी लेखाजोखा रखने वाली डीओपीटी ने अफसरों की लीव के संबंध में जो निर्देश जारी किए हैं उसके मुताबिक नौ साल बाद लौटने पर पहले सूर्य प्रताप सिंह को निलंबित किया जाता फिर उनसे इतने सालों का स्पष्टीकरण मांगा जाता। कुछ जानकारों का कहना है कि निर्धारित समय पूरा होने के बाद सूर्य प्रताप सिह के न लौटने पर सरकार को एक पक्षीय कार्रवाई करके उन्हें नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए ऐसा स्पष्ट नियम हैं। मगर जब सरकार खुद किसी अफसर को बुलाने को और उसकी ताजपोशी करने को बेताब हो तो सारे नियम और कायदे ताक पर रख दिये जाते हैं। सूर्य प्रताप सिंह के मामले में भी यही हुआ। उन्हें विदेश से निमंत्रण पर बुलाया गया और शर्तों के मुताबिक उनकी ताजपोशी की गई।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक सूर्य प्रताप सिंह ने स्टडी लीव के दौरान ही अमेरिका में अपना नेटवर्क बढ़ा लिया था। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सूर्य प्रताप सिंह श्रीश्री रविशंकर के सानिध्य में आ गए और उसके बाद ही दुनिया भर के बड़े पूंजीपतियों के बीच सूर्य प्रताप सिंह ने अपना नाटक करना शुरू कर दिया। बड़े अफसरों के बीच यह चर्चा भी आम है कि सूर्य प्रताप सिंह की सबसे बड़ी खासियत में से एक यह है कि उन्हें राजनेताओं से संबंध बनाना बखूबी आता है। वह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के बेहद करीबी बताये जाते हैं। बदायूं में जिलाधिकारी के रूप में अपनी तैनाती के दौरान इन्होंने अपने सजातीय भाजपा के एक नेता के लिए दिन रात एक कर दिया। इससे क्षुब्ध होकर वहां के काबीना मंत्री ने इनकी तमाम शिकायतें सरकार में की। हालांकि वह भी भाजपा के ही मंत्री थे। यही हाल इनका बरेली में भी रहा।

सूत्रों का कहना है कि उनकी प्रदेश में लौटने से पहले यही शर्त थी कि उन्हें राकेश गर्ग की जगह मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव बनाया जाये। मगर यह बात प्रमुख सचिव नियुक्ति राजीव कुमार के स्तर पर लीक हो गई और ईटीवी ने इसको प्रमुखता से दिखाना शुरू कर दिया जिसके बाद यह योजना फेल हो गयी। मगर इसके बावजूद उन्हें प्रमुख सचिव औद्योगिक विकास जैसे महत्वपूर्ण पद पर यह कहकर तैनात कर दिया गया कि कुछ दिनों में ही उनकी ताजपोशी राकेश गर्ग की जगह मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के रूप में कर दी जायेगी। बताया जाता है कि इसके लिए सूर्य प्रताप सिंह ने अमेरिका के कुछ उन लोगों को पकड़ा जो मुख्यमंत्री के भी करीबी थे। और तभी यह डील तय हुई।

सूर्य प्रताप सिंह के अलावा शिशिर प्रियदर्शी, संजय भाटिया, अतुल बगाई जैसे कई अफसर हैं जो अपनी लीव खत्म होने पर भी सालों से विदेशों में तैनात हैं। गंभीर बात यह है कि सरकार को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि नौ साल तक आखिर सूर्य प्रताप सिंह ने विदेश में क्या किया। कहीं किसी विदेशी नेटवर्क से तो उनका संबंध नहीं है। नौ वर्षों तक उन्होंने अपना और अपने परिवार का खर्चा कैसे चलाया। यह पूछने की हिम्मत तभी आ सकती थी जब सूर्य प्रताप सिंह यह न कहते कि उनके मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत संबंध है।

अब देखना यह है कि दुर्गा नागपाल को मामूली बात पर निलंबित कर देने वाले मुख्यमंत्री सूर्य प्रताप सिंह को भी नियमानुसार निलंबित करते हैं या फिर उनका मामला ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। जिस तरह उन्हें प्रमुख सचिव अवस्थापना एवं औद्योगिक विकास के पद पर तैनात करके प्रबन्ध निदेशक पिकप, मुख्य कार्यपालक अधिकारी लीडा एवं अधिशाषी निदेशक उद्योग बंधु का चार्ज दिया गया वह तो यही सिद्ध करता है कि फिलहाल इस प्रदेश में सूर्य प्रताप सिंह उसी तरह अपना जलवा बिखेरने को तैयार हैं जिस तरह वह राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री रहते किया करते थे।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और वीकएंड टाइम्स हिंदी वीकली के संपादक हैं.

मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी और मैंने उन्हें दो-तीन बार फिर ठगा

: (संस्मरण – पार्ट 4) : दिल्ली में राधा कृष्ण बजाज उर्फ "भाया जी" दिल्ली गेट के पास अंसारी रोड के पास एक कोठी से अपना सत्याग्रह चलाते थे. यह कोठी किसी सेठ ने खरीदी थी और इसको लेकर लफडा था, सो उसने भाया जी को अपना आंदोलन यहीं से संचालित करने के लिए प्रेरित किया, ताकि वहां भजन-कीर्तन होता रहे, और भीड़-भाड़ बनी रहे. दो-चार साल बाद झगडा सुलट जाने के बाद उसने अपनी कोठी खाली करवा ली, और भाया जी कुछ दिन एक गेराज में रहने के बाद अंततः वापस वर्धा चले गए. यह ऐतिहासिक हवेली थी, जो कभी महात्मा गांधी और स्वामी श्रद्धानन्द के निकट सहयोगी रहे डॉ. अंसारी की संपत्ति थी.

यहाँ मेरा काम भाया जी के पत्र और लेख टाइप करने का था. लेकिन ड्यूटी चूंकि स्वेच्छिक थी, इसलिए जब मुझे फुर्सत मिलती तब करता, वरना नहीं भी करता. उन्हें पत्र लिखने का बड़ा चाव था. रोज गांधी जी की तर्ज़ पर गो रक्षा को लेकर दर्ज़नों पत्र लिखते, यद्यपि जवाब शायद ही किसी का आता हो. गाय के दूध, गोबर, मूत्र आदि के फायदे को लेकर लंबे लंबे लेख और प्रेस नोट बना कर मुझे सौंपते, जिन्हें अखबार वाले रद्दी की टोकरी के हवाले कर देते थे, लेकिन वह हार नहीं मानते, और सतत लिखते रहते.

अपने साथ रहने वाले हम पांच-छह स्थायी अन्तःवासियों को वह रोज प्रार्थना के बाद गाय के दूध पर प्रवचन देते. एक दिन हममें से सबसे वरिष्ठ महावीर त्यागी ने उलाहना दिया- आप हमेशा कहते रहते हो कि गाय का दूध हर भारत वासी को रोज कम से कम आधा सेर मुहैय्या होना चाहिए, जबकि यह हमें कभी नहीं मिलता तो औरों की बात क्या करें? भाया जी किकंर्तवयविमूढ हो गए, और नतीजतन हमें रोज रात को दो सौ ग्राम दूध मिलने लगा. गाय का दूध लेने प्रायः मैं ही जाता. एक दिन गाय का दूध उपलब्ध न होने पर सप्लायर ने भैंस का दूध दे दिया. भाया जी बहुत नाराज़ हुए और वह दूध वापस फेरना पड़ा. यह नौबत एकाधिक बार फिर आई, लेकिन अब प्रदाता ने मुझे साध लिया था. वह भैंस के दूध में चुटकी भर हल्दी पावडर मिलाता, और भाया जी देख कर खुश होते- देखो यह हुआ न असली गाय का दूध, रंग और स्वाद में कितना खरा है. मैं हामी भरता.

यहाँ मुझे रहने-खाने की कोई दिक्कत न थी, फिर भी मैं माथुर साहब से बार-बार कहता कि खाना कभी मिलता है कभी नहीं, जल्दी मेरा उद्धार कीजिए. लेकिन वह अडिग होकर कहते कि कम खाने से आज तक कोई नहीं मरा, दुनिया के तमाम लोग ज्यादा खाने से मर रहे हैं. प्रतीक्षा करो. मैं प्रतीक्षा न करता तो क्या करता? नवभारत टाइम्स में भी मैं स्वयंसेवा ही कर रहा था. असल में माथुर साहब का उद्देश्य यह था कि मैं कुछ काम सीख लूं, ताकि उन पर कोई आंच न आये. एक सतूना उन्होंने मेरा यह बिठा दिया था कि अखबार के उत्तर प्रदेश संस्करण में मेरे लेख या रपटें छप जातीं, जिनका मुझे भुगतान होता था. मैं हर माह एकाउंट में जाकर पूछता- मेरा चेक बना क्या? और जब पता चलता कि बन गया तो सौ या दो सौ रूपये का चेक लेने अपने गाँव टिहरी चला जाता, तीन सौ रूपये खर्च करके. चेक गाँव के पते पर ही जाता था, क्योंकि दिल्ली में मेरा कोई स्थायी ठिकाना तो था नहीं. गाँव आने-जाने का किराया भाया जी सहर्ष दे देते, लेकिन उन्हें वापसी में बस के टिकट सौंपने पड़ते. दो रुपये की चाय भी रस्ते में पी तो उसका भी अलग से पर्चा बना के देना होता.

जैसे-जैसे दिन-महीने गुजरने लगे, मुझे माथुर साहब पर संदेह होने लगा कि वह मुझे टरका रहे हैं. राजेन्द्र माथुर कम बोलने वाले व्यक्ति थे, जिससे मुझ समेत कईयों को लगता था कि वह उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन ऐसा था नहीं. अब मैंने इधर-उधर हाथ-पैर मारने शुरू किये. राधा कृष्ण बजाज से मिलने टाइम्स ऑफ इंडिया वालों के कुल गुरु सदृश गांधी वादी बुज़ुर्ग साहित्य कार जैनेन्द्र कुमार (जैन) भी यदा-कदा आते थे. सुना था कि उनकी कोई बात टाइम्स वाले नहीं टालते. लेकिन भाया जी ने उनसे मेरा परिचय तो कराया, पर मेरा दिल्ली में होने का मकसद नहीं बताया. मुझे विश्वनाथ प्रताप सिंह का ध्यान आया, जो उन दिनों राजीव गांधी की सरकार में एक प्रभावशाली मिनिस्टर थे.
विश्वनाथ जी से मेरा परिचय पुराना था. वह मेरे पिता के प्रति स्नेह और आदर का भाव रखते थे. एक बार जब वह करीब पांच साल पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो उत्तराखंड के कुछ छुटभैया फरियादियों के साथ मैं भी लखनऊ स्थित उनकी कोठी पर पहुंच गया. करीब दो सौ फरियादियों को आनन-फानन निबटा कर मुख्यमंत्री कार में बैठ कर जाने लगे. हमारा नम्बर नहीं आया था. हमारे दल में से किसी ने ऊंचे स्वर में गुहार लगाई- सर ! सुंदर लाल बहुगुणा जी के सुपुत्र भी आपसे मिलने को खड़े हैं. कहाँ हैं, कहाँ हैं? यह कहते हुए मुख्यमंत्री स्टार्ट हो चुकी कार से उतर गए, और मुझे अपने साथ बिठा ले गए.

उन्होंने मुझसे पूछा- पढाई का खर्चा पर्चा आराम से चल जाता है? मैंने संकोच सहित नकारात्मक उत्तर दिया तो उन्होंने उत्तरकाशी के डीएम की मार्फ़त मुझे साढ़े तीन हज़ार रुपये भिजवा दिए. इस घटना से मेरा रूतबा बढ़ गया और मुझे धन दोहन की नयी राह मिल गयी. इसके बाद मैंने उन्हें दो-तीन बार और ठगा. उत्तरकाशी का डीएम मेरे कब्ज़े में आ गया, और जब भी मैं मांगू मुझे सरकारी गाड़ी मिलने लगी. खैर ……विश्वनाथ जी ने कहा कि उद्योगपतियों पर छापे के कारण टाइम्स वाले मुझसे नाराज़ हैं, लेकिन आपके लिए कोई और राह देखते हैं. लेकिन मुझे तो पत्रकार बनने की और वह भी राजेन्द्र माथुर के साथ काम करने की लगन लगी थी. अब मैंने हेमवती नंदन बहुगुणा का दर खटखटाया, जिनका मैं पुराना स्नेह पात्र था, और राजनीति का रास्ता छोड़ उन्ही के कहने पर पत्रकार बनने की ठानी थी.

उत्तराखंड मूल के, लेकिन इलाहाबाद से राजनीति के घाघ बने राज पुरुष हेमवती नंदन बहुगुणा उन दिनों दिल्ली में अपने दुर्दिन गुज़ार रहे थे. वह इलाहबाद से लोक दल के टिकट पर फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन से लोकसभा चुनाव हार कर फिर से स्थापित होने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे. वह मेरी तो क्या खुद की ही कोई मदद करने की स्थिति में नहीं थे. राजीव गांधी अपनी माँ की हत्या से उपजी सहानुभूति के कारण भारी बहुमत से सत्ता में आये थे, और उनके हाली-मवाली दून स्कूल के गिटपिट अंग्रेज़ी बोलने वाले चाकलेटी भद्रलोक के साथी और हवाई जहाजों के ड्राईवर से नेता बने नौसिखुए दोस्त पुराने राज नेताओं को चुन चुन कर अपमानित कर रहे थे.

हेमवती नंदन बहुगुणा उनके निशाने पर सबसे पहले आये. उनसे सरकारी मकान छीन लिया गया, यद्यपि वह चुनाव हार जाने के बाद सरकारी मकान के हक़दार नहीं रह गए थे, लेकिन अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष, स्वाधीनता सेनानी, सुदीर्घ राजनैतिक सेवा तथा दिल का मरीज़ होने की बिना पर उन्होंने सरकारी बंगले पर बने रहने देने की गुहार लगाई. लेकिन सरकार का रुख सख्त था. बंगले से सामान बाहर फिंकवाए जाने की नौबत आते देख वह चुपचाप कांस्टीट्यूशन क्लब के दो कमरों में शिफ्ट हो गए, यह व्यवस्था भी एक माह के लिए थी. इस दौरान मैंने उन्हें रोज मकान एलाटमेंट की अपनी फ़ाइल को फालो करने के लिए गृह मंत्रालय के बाबुओं के पास आते-जाते देखा.

आखिर स्वाधीनता सेनानी के नाते उन्हें डिफेन्स कालोनी में एक छोटा सा फ्लैट एलाट हो गया. यहाँ वह कुंठा, निराशा, क्रोध, ग्लानि और प्रतिशोध की भावना से ओतप्रोत लेकिन पुनर्स्थापन के लिए छटपटा रहे थे. उन पर सत्ता लोलुप तथा दल बदलू होने का ठप्पा लग चुका था, यद्यपि वह एक होशियार, वाकपटु, मिलनसार, मेधावी, महत्वाकांक्षी और अनुभवी लेकिन अधीर राज नेता थे. वह जिसे एक बार देखते, उसे कभी भूलते नहीं थे थे, और सालों बाद मिलने पर भी उसे नाम लेकर पुकारते थे. उनको ठीक ठीक समझना हो तो उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री उनके पुत्र विजय बहुगुणा के व्यक्तित्व का ठीक विलोम कर लीजिए, तो हेमवती बाबू का व्यक्तित्व सामने आ जायेगा. लगातार पांच साल तक सत्ता से बाहर रहने, और कोढ़ पर खाज यह कि एमपी तक न बन पाने की विडंबना के कारण उनके फायनेंसरों ने उन्हें पैसा देने से लगभग हाथ खींच लिया था. एक बार मैं उनके साथ उन्हीं की कार से राजघाट की ओर गया तो, रास्ते में उन्होंने गाडी रोक कर खुद घर के नौकर चाकरों के लिए साबुन-तेल की खरीदारी की. यह देखना मेरे लिए त्रासद था, क्योंकि मै उनका चरम वैभव काल भी देख चुका था. उनकी फजीहत देख मैं कुछ देर के लिए अपना संकट भूल जाता.

हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुझे और मैंने उन्हें पहली बार 1975 में नवंबर महीने की चौदह तारीख को देखा. तब तक वह उत्तर प्रदेश के लोकप्रिय, लेकिन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की आँख की किरकिरी वाले नेता बन चुके थे. टिहरी में एक नहर परियोजना का शिलान्यास करने के बहाने आये थे. सदियों से दमित, दलित, कुंठित और तिरस्कृत पूर्व टिहरी रियासत की प्रजा ने उनमें अपना अभिनव स्वाभिमान देखा था. मैं स्कूल में पढता था, लेकिन कुछ माह पहले ही चर्चित अस्कोट – आराकोट पदयात्र पूरी कर आया था. मेरे पिता और हेमवती नंदन बहुगुणा, दोनों तब तक एक दूसरे से लंबा और घातक वैचारिक युद्ध करने के बाद आत्म समर्पण कर चुके थे. दोनों पर एक दूसरे के प्रति सोफ्ट कोर्नर अपनाने का आरोप लगना शुरू हो गया था. इन्हीं सारे आरोपों के कारण, शायद मेरे पिता उनके टिहरी दौरे की खबर आते ही एक गुफा में ध्यानस्थ हो गए, अनिश्चित काल के लिए. ऐसा वह गाहे-ब-गाहे करते रहते थे, जब-जब उनके पुराने राजनैतिक दोस्त व दुश्मन कांग्रेसी उन्हें घेरने का प्रयास करते. आखिर मेरे पिता भी पुराने कांग्रेसी रह चुके थे, और अपने दोस्तों की रग-रग से वाकिफ़ थे. मंच पर लगभग दौड़ कर चढ़ कर उर्दू, हिंदी और गढवाली में सम्मोहक व्याख्यान देकर उन्होंने मुझे मोह लिया. यही जादू उन पर शायद मैंने भी किया, जब मैं थोड़ी देर बाद उनसे मिला. इसके बाद हम दोनों उनकी मृत्यु तक एक दुसरे के प्रति निष्ठावान रहे.

जन सभा में भाषण देने के बाद हेमवती नंदन बहुगुणा खुली जीप में खड़े होकर नेहरु स्टाईल में हाथ हिलाते शहर से होते हुए डाक बंगले पंहुचे. यह डाक बंगला पुराने टिहरी शहर की कचहरी के पास था. नीम अँधेरे में करीब दो सौ फरियादियों से मिलते हुए सभी की अर्जियां लेने लगे. मैं सबसे अंत में खड़ा था, और मैंने उनके हाथ में पहले से लिखित एक पन्ना थमा दिया, जिस्मे मेरा सम्पूर्ण परिचय तथा उनसे दो मिनट अलग से मिलने की गुहार थी. करीब दस मिनट बाद हड़बड़ाता हुआ एक एसडीएम मेरा नाम पुकारता आया. मुझे "सरकार" ने भीतर बुलाया था. इसका अर्थ यह हुआ कि बहुगुणा ने जनता से मिलने के बाद सारी अर्जियां पढ़ीं, उन्हें न तो रद्दी की टोकरी में फेंका और न किसी अधीनस्थ के हवाले किया. दिन भर की भाग दौड, धूल और भाषणबाज़ी से श्लथ होकर वह बिस्तर पर अकेले बैठे थे. यद्यपि उनका यह दौरा हेलीकोप्टर से हो रहा था, लेकिन बड़े लोग तो हवाई जहाज़ में भी थक जाते हैं. सामने मेज़ पर एक चम्मच में तीन-चार रंग बिरंगी गोलियाँ रखी थी. यह संभवतः उनकी ह्रदय रोग की दवा थी. ह्रदय रोग से उनका रिश्ता युवावस्था में ही जुड गया था. बहुत साल बाद उन्होंने एक बार प्रसंग वश मुझे बताया- मेरी माँ भी इसी बीमारी से मरी थीं.

वह मेरी – अस्कोट – आराकोट पद यात्रा की डायरी पलटने, बल्कि पढ़ने लगे. अचानक पढते-पढते उन्होंने हांक लगाई — शुक्ला!. दरवाज़े पर चपरासी की जगह खड़ा कलेक्टर, जी सरकार, कहता हुआ दोनों हाथ जोड़ कर अर्ध धनुषाकार में अवनत खड़ा हो गया. यह नौकरशाहों पर उस ज़माने के शासकों का रूतबा था, क्योंकि वह कलेक्टर की पोस्टिंग पैसे खा कर नहीं करते थे. अभी कुछ ही माह पहले उन्हीं के मुख्यमंत्री पुत्र ने कलेक्टर की शिकायत करने पर अपनी ही पार्टी के एक विधायक को शट अप कह कर हड़का दिया. खैर…… बहुगुणा ने कलेक्टर से गुस्से में पूछा- यह नैट्वाड कहाँ है? कैसे हो गया वह क़त्ल? वह मेरे जिले में नहीं, उत्तरकाशी में है सरकार, कह कर कलेक्टर ने राहत की सांस ली. उससे (उत्तरकाशी के डीएम से) कहो कि मुझसे बात करे, कह कर बहुगुणा फिर मेरी ओर मुखातिब हुए, और डीएम को बाहर जाने का इंगित किया. दरअसल मेरी यात्रा डायरी में एक जगह नैट्वाड में हुए एक ब्लाइंड मर्डर केस का ज़िक्र था, जिसे पढ़ कर बहुगुणा तुरंत हरकत में आये थे.

हेमवती नंदन बहुगुणा कार और ब्यूरोक्रेसी दोनों को तेज गति से हांकने के माहिर थे. उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक नकचढे नौकरशाह को कुछ मौखिक आदेश दिया. टालने के अंदाज़ में अफसर बोला- कल तक देखूंगा सर. ''कल तक तो तुम जेल चले जाओगे'', बहुगुणा ने उसे वार्निंग दी. वह कहा करते थे- नौकरशाही एक ऐसा घोड़ा है जो अपने सवार को पहचानता है. सवार अनाड़ी हुआ तो उसे पीठ से गिरा देता है. जब उन्होंने यह बात कही, संयोगवश उन्हीं दिनों उनको अपदस्थ कर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने नारायण दत्त तिवारी उत्तरकाशी जिले में हरसिल नामक जगह पर घोड़े से गिर पड़े थे.

नौकरशाह सचमुच बड़े ज़ालिम लोशन होते हैं. मैं एक गोपनीय प्रसंग आज आपसे शेयर कर रहा हूँ. 1996 में मेरे पिता टिहरी बाँध विरोधी अनशन कर रहे थे. केन्द्र सरकार की गहन चिंता के फलस्वरूप मुझे वार्ता के सारे अधिकार देकर दिल्ली भेजा गया. प्रधान मंत्री एच.डी. देवेगौड़ा से मिलने को मैं भी उत्सुक था कि दो टांग वाला तथा हवाई जहाज़ में उड़ने वाला गौड़ा कैसा होता होगा. (गढवाली में गौड़ा गाय को कहते हैं). देवे गौड़ा सचमुच हम्बल फार्मर थे. वह मुझे रिसीव करने अपने घर के पोर्च में खड़े थे. उन्होंने मिलते ही मुझे गले लगा कर कहा- ''आई कान्ट स्लीप नाव ए डेज़. ही इज आल्सो लाइक माय फादर.'' मैंने वहीं से अपने पिता को फोन किया कि यह तो लाल बहादुर शास्त्री से भी ज्यादा विनम्र प्रधान मंत्री है. इनकी लाज रखी जानी चाहिए.

तय हुआ कि कल दोपहर ग्यारह बजे प्रधानमंत्री के दफ्तर में हमारी फाइनल वार्ता होगी. अंग्रेज़ी में बात-चीत में मदद के लिए मैंने अपने मित्र शिमला विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर आरएस पिर्ता को बुलावा भेजा और अपने भाई प्रदीप को कहा कि वह भी कल सुबह तक गंगा जल की एक शीशी लेकर दिल्ली पहुंचे, ताकि प्रधान मंत्री की सदाशयता का उचित सम्मान दिया जा सके. देवेगौड़ा ने कहा कि वह मेरे पिता को अपने हाथ से चिट्ठी लिखेंगे, और उनका हर आदेश मानेंगे. अपने परिवार तथा साथियों के लंबे संघर्ष को फलीभूत होता देख मै भाव विह्वल हो गया. आप कहाँ रुके हैं? प्रधानमंत्री ने मुझसे पूछा. मैं जेएनयू के हास्टल में सो जाऊँगा सर. मैंने जवाब दिया. मेरी ही अंग्रेज़ी जैसी विकलांग हिन्दी में उन्होंने आह्वान किया- ''ये देबेगौडा गरीब का ब्यटा, किसान का ब्यटा. मास मच्छी को ये काता नी, मुर्गी, अंडा, सराब को ये पीता नी. तुम हॉस्टल में क्यों सोती, मेरे ही घर क्यों नी सोती.''

''थैंक्यू सर, थैंक्यू सर. सो कैन्ड आफ यू सर. आई विल कम्फेरतेबल दियर सर.'' मैंने प्रकटतः तो धन्यवाद देते हुए यह कहा, पर मन ही मन बोला- ''अरे चाचा तू मांस माछी, अंडा, सराब नी खाती-पीती, पर मैं तो खाती-पीती. मुझे प्रधान मंत्री निवास में क्या आलू का झोल खिला कर मेरा नास मारोगे.''

आप चाय में चीनी कितनी लेंगे सर? विनम्र प्रधान मंत्री ने चीनी की टिकिया मेरे कप में डालते हुए पूछा. अतिशय सौहार्दपूर्ण वातावरण में कल मिलने का निश्चय कर मैं वहां से विदा हुआ, ताकि जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के भद्र ढलानों पर नीम अँधेरे में बैठ कर प्रणयबद्ध जोड़ों को देख कर हलके सुरूर में अपनी थकान उतार सकूं.

जेएनयू के उन्मुक्त लेकिन शिष्ट वातावरण में गंगा ढाबे के पीछे कल रात झुरमुटों और चट्टानों की ओट से आने वाली प्रणय कलह की उन्मादक ध्वनियाँ फंतासी बन कर अभी भी मेरे मस्तिष्क में कौंध रही थीं. मैं उन्हीं के सहारे बोरियत से बच रहा था. क्योंकि प्रधान मंत्री ग्यारह बजे का समय देकर एक बजे तक भी नहीं मिले थे, जबकि उन्होंने कल कहा था कि- मैं ठीक ग्यारह बजे अपने ऑफिस में आपका स्वागत करूँगा. बताया गया कि वह ज़रूरी मीटिंग में व्यस्त हैं.

राजनेताओं से मेरा साबका बचपन से ही खूब पड़ा है, और बाद में अखबार का रिपोर्टर रहते हुए तो उनसे चोली-दामन का जैसा साथ रहा, इसलिए मैं सब समझता था कि राजनेता मीटिंग के बहाने ईटिंग और चीटिंग खूब करते हैं. यह ईटिंग मुर्गे की भी हो सकती है और नोटों के बोरे की भी. उकता कर मैं प्रो. पिर्ता के मना करने के बाद भी, गलियारे में चहलकदमी करने लगा. मुझे प्रधान मंत्री के गवाक्ष से ऊर्जा मंत्रालय का एक अफसर बाहर निकलते दिखा, जो कुछ दिन पहले ही ऊर्जा मंत्री के साथ टिहरी में हमारी कुटिया पर आया था. अब मुझे आभास होने लगा कि मीटिंग क्या चल रही है, और देरी का कारण क्या है. मैं प्रधान मंत्री के विश्वस्त अफसर जैन के कमरे में घुसा, तो वहां मुझे टिहरी के पूर्व सांसद परिपूर्ण नन्द पैन्यूली बैठे मिले.

आखिर हमारे तीन सदस्यीय दल को बुलावा आया. कल अतिशय अपनत्व के साथ पेश आ रहे प्रधानमंत्री का व्यवहार आज औपचारिक था. मुझे लगा कि कल घर की बात थी आज ऑफिस में हैं, इसलिए प्रोटोकाल की मर्यादावश ऐसा होगा, लेकिन उन्होंने मेरे पिता के नाम टाइप किया हुआ जो पत्र मुझे थमाया, उससे मैं सब कुछ समझ गया. कल उन्होंने अपने हाथ से पत्र लिखने की बात कही थी, लेकिन आज यह सधा हुआ कुटिल सरकारी भाषा विन्यास वाला पत्र. ब्यूरोक्रेसी उन्हें यथार्थ के मस्लेहत आमेज़ धरातल पर ला चुकी थी. घोड़ा अपने सवार को गिरा चुका था. पत्र में कहा गया था कि वह टिहरी बाँध बनने दें और राष्ट्र हित में अपना अनशन समाप्त करें. वचन और स्वप्न भंग के फलस्वरूप मैं सन्नाटे में आकर रुआंसा हो गया. बस इतना ही किया जा सकता है, प्रधान मंत्री ने कहा.

मुझे फिर इंदिरा गांधी, हेमवती नंदन बहुगुणा और मोरारजी देसाई जैसे राजनेता याद आये, जिनसे ऐसे ही मसलों पर हमारा पहले साबका पड़ चुका था, और जिनका कहा पत्थर की लकीर होता था

इस संस्मरण के लेखक राजीव नयन बहुगुणा हैं. राजीव उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट हैं.


इसके पहले का पार्ट पढ़ें…

नौकरशाही बनाम जन-प्रतिनिधि : तुलनात्मक अध्ययन

IAS:- एक परीक्षा जिसका कोई खास योग्यता या बौद्धिक जांच का आधार नहीं होता है को कुछ किताबें रटकर फिर रटे हुये को उत्तर पुस्तिका में लिखने की दौड़ में जो अच्छा धावक हुआ वह IAS बन जाता है। समाज की समझ, दूरदर्शिता, सामाजिक अकाउंटिबिलिटी आदि बातों का कोई मायने नहीं होता इस रट्टा लेखन की परीक्षा दौड़ में।

इस रट्टा दौड़ को जीतने वाले के लिये जो कारक सबसे बड़ा कारक होता है वह यह कि एक बार किसी तरह परीक्षा पास कर ली जाये फिर ताउम्र बिना कुछ किये खूब अधिकारों वाला सामंत बन कर रहा जा सकता है। कोई कुछ खास बिगाड़ नहीं सकता है। जो बिलकुल ही इमानदार बनकर रहना चाहे उसको भी इतनी राजसी सुविधायें और कार्यकारी अधिकार होते हैं कि महाराजा की तरह जीवन तो गुजरता ही है वह भी जनता के संसाधनों से और कोई धेला भर की भी अकाउंटिबिलिटी नहीं।

यदि कोई IAS जनमानस के लिये कुछ कर देता है तो उसको भगवान का दर्जा मिल जाता है। यह वैसा ही कुछ है जैसे कि कोई महाराजा अपनी प्रजा के लिये यदि कुछ कर दे तो वह देवतुल्य हो जाता है। यदि कोई IAS आम आदमी से बिना दुत्कारे बात कर लेता है तो उसको महाविनम्र मान लिया जाता है। यह घोर अलोकतांत्रिक है और सामंतवादी गुलामी को स्वीकारना ही है।

जन-प्रतिनिधि:- जन-प्रतिनिधि को हर पांच साल बाद जनता के पास जाना पड़ता है एक बार फिर से प्रतिनिधि बनने के लिये आम आदमी से अनुमति प्राप्त करने के लिये। हर पांच साल बाद फिर से और अधिक मेहनत करनी पडती है विरोधियों को हराने के लिये। जन-प्रतिनिधित्व के पांच साल भी लगातार जीवन के खतरे, विरोधियो का पूरा जी जान से विरोध, मीडिया का विरोध, लोगों की अपेक्षाएं पता नहीं क्या क्या झेलना पड़ता है। इतना सब कुछ झेलने की बावजूद जन-प्रतिनिधि के पास कोई कार्यकारी अधिकार नहीं होता है।

सबसे भयावह तथ्य तो यह है कि यदि कोई MLA या MP है किंतु रूलिंग पार्टी का नहीं है तो सिवाय संसद या विधानसभा में हंगामों के बीच सवाल पूंछने के कोई कार्यकारी अधिकार ही नहीं है जबकि उसको क्षेत्र विशेष के लोगों नें अपना प्रतिनिधि चुना होता है। एक जन-प्रतिनिधि जिसको खुद लोगों नें चुना होता है उसको खुद अपने ही क्षेत्र में कोई कार्यकारी अधिकार नहीं होता है और उस क्षेत्र की नौकरशाही उसके अधीन नहीं होती है। तो यदि कोई MLA या MP यदि रूलिंग पार्टी का नहीं है तो उसके जन-प्रतिनिधि होनें या न होनें का कोई मतलब ही नहीं रहा जाता है।

अधिकारी लोग जो महज कोई परीक्षा पास कर लेते हैं को उस जन-प्रतिनिधि के क्षेत्रे के लोगों के बारे में निर्णय लेने के सारे कार्यकारी अधिकार होते हैं। जन-प्रतिनिधि के पास अपने क्षेत्र के लोगों के लिये कुछ कर पाने के कार्यकारी अधिकार न होते हुये भी क्षेत्र के लोग विकास न हो पाने पर, या कोई समस्या होनें पर अपने जन-प्रतिनिधि को ही दोषी मानते हैं। और अधिकारियों को जो कि पूर्ण रूपेण दोषी होते हैं को महान, देवतुल्य और इमानदार होने के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। इसे मैं लोगों की अजागरूकता और मानसिक गुलामी का बेजोड़ और जीवंत उदाहरण मानता हूं।

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जन-प्रतिनिधि आज MP/MLA है। हारने के बाद कुछ भी नहीं रहता है। यदि किसी नें MP/MLA रहते हुए किसी IAS के खिलाफ कुछ किया तो पांच साल बाद जब वह MP/MLA नहीं रहेगा, जबकि वह IAS तब भी IAS रूपी सामंत ही रहेगा। सोचिये तो IAS बदला लेने के लिए कितने अधिक कार्यकारी अधिकारों से युक्त है क्या हश्र करेगा उस MP/MLA का। और एक बहुत जुझारू व इमानदार MP/MLA भी बहुत ही भ्रष्ट IAS का क्या उखाड़ लेगा। बहुत से बहुत यदि रूलिंग पार्टी का हुआ तो स्थानांतरण करवा लेगा किंतु स्थानांतरण तो कोई दंड तो हुआ नहीं। वह भ्रष्ट IAS जहां जायेगा वहीं गंदगी करेगा और समय के साथ साथ बिना किसी कसौटी के या पुनर्मूल्यांकन के प्रमोशन भी पाता रहेगा।

भारत में IAS/ICS नाम का नौकरशाह आजादी के बहुत पहले से ही बहुत ही अधिक हिंसक, सामंतवादी और बेहद करप्ट है और लगातार इसी चरित्र का ही है। जन-प्रतिनिधि को तो मजबूरी में आजादी के कुछ काल के बाद करप्ट होना ही पड़ा और यही IAS चाहता था। फिर दोनों ने मिलकर नेक्सस बना लिया।

यदि IAS और नौकरशाही को सामंतवादी स्तर के कार्यकारी अधिकार और आम जनता के संसाधनों को निरंकुश तरीके से भोगने के अधिकार नहीं मिले होते। यदि IAS और नौकरशाही को स्थानीय जन-प्रतिनिधि और स्थानीय लोगों के प्रति अकाउंटेबल बनाया गया होता तो कभी भी नौकरशाही और जन-प्रतिनिधियों का नेक्सेस नहीं बनता और देश की और देश के आम आदमी की इतनी बुरी दुर्दशा नहीं होती।

यह सामन्तवादी गुलाम मानसिकता की ही देंन है कि भारत में निरंकुश और स्थायी अधिकारों से लैस अन-अकाउंटेबल नौकरशाही को अधिकार विहीन जन-प्रतिनिधियों से बेहतर माना जाता है। यह गुलामी है जिसके दम पर नौकरशाही आजादी के बाद से इस देश को जैसे मन करे चलाता आ रहा है।

आप किसी जिलाधिकारी और MP की या जिला पंचायत अध्यक्ष के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी उप जिलाधिकारी और MLA के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी ब्लाक विकास अधिकारी और ब्लाक पंचायत प्रमुख के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये। आप किसी ग्राम विकास अधिकारी और ग्राम प्रधान के अधिकारों और सुविधाओं की तुलना कर लीजिये।

नौकरशाही को नियंत्रित कर लीजिये, नौकरशाही को सुधार लीजिये। ऐसा होते ही जन-प्रतिनिधि तो चुपचाप बिना बहुत हील-हुज्जत के खुद ही सुधर जायेगा क्योंकि आखिर उसको पांच साल में ही सही किंतु आम आदमी के पास सलाम बजानें आना पड़ता ही है, उसके पास भागने का कोई रास्ता नहीं है।

भारत में नौकरशाही और जन-प्रतिनिधि का तंत्र पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और उल्टा खड़ा है। जब तक यह ठीक नहीं होगा तब तक चाहे जिस पार्टी की सरकार आ जाये और चाहे जो प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन जाये देश की जो भी हालात हैं कमोवेश वैसी ही रहेगी।

IAS नें जीवन में एक दो साल कुछ किताबे रटकर एक परीक्षा पास कर ली वह भी ऐसी परीक्षा जो पूरे जीवन भर के लिए एक तरह से निरंकुश सामंत बनने की गारंटी देती है। ऐसा सामंत कभी आम आदमी के लिये अकाउंटेबल हो सकता है इस प्रश्न का ही कोई वजूद नहीं हो सकता है। जो कुछ चंद IAS लोग अपवाद स्वरूप अपनी कुल नौकरी के चंद साल पब्लिक हित के लिये कुछ काम भी यदि कर देते हैं तो यह उनका अपना खुद का शौक या अपने जीवन में झेली गयी परेशानियों से जन्मी संवेदनशीलता ही अधिक होती है।

चारों शंकराचार्य मुझसे संवाद में जीत कर दिखाएं : उदित राज

रायपुर : अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय अध्यक्ष सह इंडियन जस्टिस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. उदित राज ने देश के चारों शंकराचार्यों को उनसे संवाद में जीतने की चुनौती दी है. रायपुर में उन्होंने कहा कि, “जाति प्रथा आज भी समाज में जीवित है. देश में चारों शंकराचार्य ब्राह्मण ही हैं, भले उनसे ज्यादा ज्ञानी लोग अन्य जातियों में भी क्यों न हो लेकिन वे शंकराचार्य की उपाधि नहीं ग्रहण कर सकते. मैं चारों शंकराचार्यों को चुनौती देते हुए कहता हूं कि मुझसे संवाद कर जीत जाएं तो मैं राजनीति एवं दलित आंदोलन छोड़ दूंगा”.

डॉ. राज ने कहा कि देश में केवल 15 प्रतिशत सवर्ण हैं किन्तु उनको 50 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है जबकि दलित एवं आदिवासी आज भी देश में पिछड़े हुए हैं. उन्होंने कहा कि वर्तमान में देश की तरक्की तभी संभव है जब यहां निजी क्षेत्रों के रोजगार में भी आरक्षण लागू हो, क्योंकि ऐसा करने से देश में लगातार सरकारी नौकरी की घटती संख्या के बीच उफनी बेरोजगारी की समस्या से निजात मिल पाएगा. उनके अनुसार देश के विकास के लिए आरक्षण एक बेहतर विकल्प रहा है.

डॉ राज ने राजधानी में अनुसूचित जाति-जनजाति संगठन, छत्तीसगढ़ राज्य इकाई द्वारा आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के पूर्व पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहा, “समूचे देश में शासकीय नौकरियां कम होती जा रही हैं. साथ ही जो बची भी हैं तो उनमें ठेकेदारी प्रथा का बोलबाला है. इस तरह पहले से ही दमित एससी, एसटी एवं अन्य आदिवासी युवकों के सामने रोजगार का संकट गहरा होता जा रहा है. निजी क्षेत्रों में आरक्षण लागू हो जाने से कुछ हद तक समस्या से छूटकारा मिल जाएगा”.

उन्होंने बताया कि पदोन्नती में भी आरक्षण लागू करने का विधेयक राज्यसभा में पारित पिछले वर्ष हो चुका लेकिन लोकसभा में होना बाकि है, यह ११७ वां संविधान संशोधन इसी सत्र में हो जाना चाहिए था. देश की आंतरीक सुरक्षा को खतरा मानने वाले नक्सलवाद पर डॉ राज ने कहा कि वे लोग ही नक्सली बने जिनको जनतंत्र का कोई लाभ नहीं मिला, इसका समाधान भी आदिवासियों के विकास से ही संभव हो पाएगा. उन्होंने बताया, “जहां तक मेरी जानकारी जाती है माओवादियों में भी दलित एवं आदिवासी ही नीचे कैडर बेस है एवं उनका नेतृत्वकर्ता वर्ग सवर्ण है. वहां भी दलित एवं आदिवासी शोषित ही हैं.”
 

आईएएस अशोक खेमका ने सौंप दी अपनी रिपोर्ट, रॉबर्ट वाड्रा की डील को फर्जी बताया

नई दिल्ली। हरियाणा के चर्चित आईएएस अशोक खेमका ने रॉबर्ट वाड्रा की जमीन के सौदे के मामले में अपनी रिपोर्ट हरियाणा सरकार को सौंप दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा ने गुड़गांव में गलत दस्तावेजों के जरिए जमीन का सौदा किया। मामला गुड़गांव के शिकोहपुर में साढ़े तीन एकड़ जमीन का है। ये वही जमीन है जिसके सौदे की जांच करने के बाद आईएएस खेमका ने जमीन की रजिस्ट्री को ही रद्द कर दिया था।

इस मामले में खेमका ने 21 मई को ही 100 पन्नों की रिपोर्ट हरियाणा सरकार की बनाई 3 सदस्यीय जांच कमेटी को सौंपी है। आपको बता दें कि वाड्रा और डीएलएफ के बीच डील में हुई कथित धांधली के आरोप लगने के बाद हरियाणा सरकार ने अक्टूबर 2012 में जांच कमेटी गठित की थी। यूं तो रॉबर्ट वाड्रा उस समय से ही चर्चा में आ गए थे जब उन्होंने सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गाँधी से शादी की थी। रॉबर्ट वाड्रा का दरअसल हैंडीक्राफ्ट आइटम्स और कस्टम आभूषणों का कारोबार है और उनकी कंपनी का नाम है आर्टेक्स एक्सपोर्ट्स. इसके अलावा भी रॉबर्ट वाड्रा की कई कंपनियों में भागीदारी है। रॉबर्ट वाड्रा उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में पैदा हुए। उनके पिता राजेंद्र वाड्रा पीतल व्यवसायी थे और माँ स्कॉटलैंड की रहने वाली है। रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी की मुलाकात 1991 में दिल्ली में एक कॉमन फ्रेंड के घर पर हुई थी।

बाद में दोनों की नज़दीकियां बढ़ीं और दोनों ने 18 फरवरी, 1997 को शादी कर ली। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे अरविंद केजरीवाल ने रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप लगाया कि एक बड़े रियल एस्टेट डेवलपर डीएलएफ़ समूह ने गलत तरीकों से रॉबर्ट वाड्रा को 300 करोड़ रुपयों की संपत्तियां कौड़ियों के दामों में दे दीं। इसके अलावा इस बात का भी खुलासा हुआ की वाड्रा ने हरियाणा में कई संपत्तियां खरीदीं जिसमें नियमों की अनदेखी की गई। रॉबर्ट वाड्रा मोटर साइकिलों और कारों के भी शौकीन हैं। कहा जाता है कि वाड्रा के पास कई शानदार विदेशी कारों के अलावा मोटर साइकिलें भी हैं।

 

मैंने आर्यन टीवी इसलिए छोड़ा क्योंकि यहां और काम कर पाना संभव नहीं था

Abhiranjan Kumar : मित्रों, मैं आप लोगों की बेचैनी समझ सकता हूँ, लेकिन मैं उन अवसरवादियों में नहीं कि कहीं ज्वाइन करने के लिए आर्यन टीवी को छोड़ दिया, मैंने आर्यन टीवी इसलिए छोड़ा है, क्योंकि मेरे लिए यहाँ और काम करना संभव नहीं रह गया था। आप लोगों के स्नेह और समर्थन से मैं समूचे बिहार-झारखण्ड के लिए लड़ा, लेकिन अपने साथियों की निराशा दूर नहीं कर पा रहा था।

साथी पत्रकारों के दिल के लहू को अपने कलम की स्याही बनाकर मुझे महान संपादक नहीं बनना। मैंने अपने दूसरे कविता-संग्रह "उखड़े हुए पौधे का बयान" (2006) की भूमिका में लिखा था- "मैं सपनों के साथ जीता, अपनों के साथ मरता हूँ। मैं साहित्य, समाज और मीडिया का एक अदना-सा कार्यकर्ता हूँ।" मैं अपना लिखा अभी नहीं भूला हूँ।

मैं आदमी छोटा ज़रूर हूँ, लेकिन ज़िन्दगी का मकसद बड़ा है। पवित्र साध्य के लिए सोच और साधन की पवित्रता भी ज़रूरी है। कवि हूं, गणितज्ञ नहीं, इसलिए ज़िन्दगी में कभी नफ़े और नुकसान का हिसाब नहीं लगाया। बिहार मेरी अपनी मिट्टी है और यह मिट्टी मेरी मां है।

बिहार के लोग मेरे अपने सगे भाई-बहन हैं। मेरे ऊपर उनका बहुत क़र्ज़ है। अपने शरीर में लहू की आखिरी बूँद रहने तक भी यह क़र्ज़ अगर उतार पाया, तो जीवन धन्य समझूंगा। इसलिए बिहार से नाता नहीं टूटेगा, इसके लिए निश्चिन्त रहें। बस मुझे थोड़ा वक़्त दें अपने को रिचार्ज करने के लिए।

पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से.

पंद्रह अगस्त आते ही नींद से जाग उठे फर्जी पत्रकार

15 अगस्त और 26 जनवरी आते ही जिले-जिले में पत्रकारों की बाढ़ सी आ जाती है। यह पत्रकार खरपतवार की तरह अपने पैर पसारने लगे हैं। कोई अपने आपको साप्ताहिक अखबार का प्रधान संपादक बताता है तो कोई मैगजीन का ब्यूरो। इन छुटभैय्या पत्रकारों की भीड़ ने जिले के मुख्य पत्रकारों को भी पीछे छोड़ दिया है और मानों 15 अगस्त या 26 जनवरी इनके लिए कोई त्यौहार की होता है, जो साल में एक बार आता है।

इन्हीं तिथियों में इनका अखबार बाकायदा मार्केट में उतरता है और फिर ईद के चांद की तरह गायब भी हो जाता है। मुहुर्त और तिथि देखकर अखबार निकालने वाले ये पत्रकार पत्रकारिता को बदनाम कर रहे हैं। अपनी गाड़ियों में बड़े-बड़े अक्षरों से प्रेस लिखाकर वसूली के बहाने लोगों को चमकाते नजर आते हैं। इसके साथ-साथ अपने वाहन में सवारी बैठाकर छेड़खानी से भी बाज नहीं आते।

आज पत्रकारिता में ज्यादातर गुण्डा प्रवृत्ति के लोगों का समावेश हो गया है। कई बार वास्तविक पत्रकारों ने इन सभी बिंदुओं अपनी आवाज उठाई लेकिन आज तक इस पर कोई कार्यवाही सामने नहीं आई। मजे की बात तो यह है डी लिस्ट में जाने वाले अखबार भी प्रकाशित हो रहे हैं, किंतु इस ओर जनसंपर्क अधिकारी गंभीर नहीं है। वास्तविक पत्रकारों द्वारा इन फर्जी पत्रकारों के विरूद्ध कई बार आवाज उठाई गई, किंतु विभाग द्वारा कोई नकेल इन पर नहीं कसी गई।

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

इंदौर प्रेस क्लब परिसर में स्थापित होगी हिन्दी पत्रकारिता त्रिवेणी बारपुते, माथुर व जोशी की प्रतिमा

इंदौर। इंदौर प्रेस क्लब परिसर में मूर्धन्य संपादक राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर एवं प्रभाष जोशी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। यह निर्णय इंदौर प्रेस क्लब की वार्षिक साधारण सभा में लिया गया। बैठक की अध्यक्षता इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने की।

इंदौर प्रेस क्लब महासचिव अरविंद तिवारी ने बताया कि साधारण सभा में प्रेस क्लब सदस्यों के दो-दो लाख रुपए राशि की दुर्घटना बीमा योजना, ६० वर्ष से अधिक उम्र के सदस्यों का सदस्यता शुल्क माफ करने, सदस्यों के आठवीं तथा दसवीं कक्षा के मेघावी बच्चों को प्रतिमाह एक हजार रुपए की स्कालरशिप, प्रकाशित छायाचित्रों पर प्रतिमाह पांच हजार रुपए के पुरस्कार दिए जाने, वार्षिक सदस्यता शुल्क बढ़ाकर पांच सौ रुपए प्रतिवर्ष तथा पांच हजार आजीवन शुल्क करने का निर्णय हुआ।

प्रारंभ में अध्यक्ष श्री खारीवाल ने इंदौर प्रेस क्लब में स्थापित होने जा रहे राष्ट्रीय शोध केंद्र के विषय में विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर कोषाध्यक्ष कमल कस्तूरी ने वर्ष २०१२-१३ की ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की। अंत में सचिव संजय लाहोटी ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में पूर्व अध्यक्ष शशीन्द्र जलधारी, ओमी खंडेलवाल, जीवन साहू सहित बड़ी संख्या में सदस्यगण मौजूद थे। सदस्यों ने प्रेस क्लब की बेहतरी के लिए अनेक सुझाव दिए।

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग यूपी में प्रमोशन में पक्षपात

सेवा में, श्री यशवन्त सिंह जी, सम्पादक, भड़ास4मीडिया डॉट काम, महोदय, आजादी के इतने सालों बाद भी जाति-बिरादरी को समाप्त करने के दावे किये जाते हैं, लेकिन इन तमाम दावों के बावजूद सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग, उत्तर प्रदेश में स्टेनो संत प्रसाद तिवारी को तरह-तरह से दंद-फंद करके सहायक निदेशक के पद पर पदोन्नति प्रदान कर दी गई जबकि लोक सेवा आयोग, उत्तर प्रदेश से चयनित चार अफसर इस स्टेनो/चीफ रिपोर्टर से उच्च वेतनमान के हैं। लेकिन सूचना निदेशालय के एक अपर निदेशक अनिल पाठक के रिश्तेदार होने के चलते इस चीफ रिपोर्टर को पुरस्कृत किया गया है।

सहायक निदेशक के पद पर पदोन्नति पाने के लिए वर्ष 2002 में उत्तर प्रदेश सूचना राजपत्रित सेवा नियमावली बनाई गयी थी। लेकिन इस रिपोर्टर ने कभी भी 2002 से नवम्बर, 2012 तक अपनी वरिष्ठता के सम्बन्ध में सवाल नहीं उठाया लेकिन इस चीफ रिपोर्टर का एक रिश्तेदार जैसे ही सूचना निदेशालय में अपर निदेशक बन कर आया तो इसने अपनी वरिष्ठता का दावा ठोक दिया और नियम विरूद्ध शासन को गुमराह करके सहायक निदेशक के पद पर पदोन्नति भी प्रदान कर दी।

जिन चार अधिकारियों का हक मारा गया है वो 1996 से 1997 बैच के अधिकारी है और चीफ रिपोर्टर के पद से उच्च वेतनमान में कार्यरत है। लेकिन विभाग के अपर निदेशक के आगे निदेशक सूचना कुछ भी नहीं कर पाते क्योंकि वो प्रदेश में लैपटाप बांटने में व्यस्त हैं। अपर निदेशक अनिल पाठक का कमाल देखिये, विभागीय पदोन्नति समिति की आनन-फानन में शुक्रवार को बैठक कराकर शनिवार को अवकाश के दिन आदेश जारी कराकर कार्यभार भी ग्रहण करा दिया। प्रभावित अफसरों को रोज धमकाया जा रहा है कि अगर कुछ बोले तो दूर के जिलों में तबादला कर दिया जायेगा। कौन देगा ऐसे अफसरों को न्याय? कृपया इसे भडास पर प्रचारित करने की कृपा करें।

सादर
एस.वी. प्रसाद
पत्रकार
सचिव, बहुजन पत्रकार संघ
कानपुर नगर
दिनांक 10 अगस्त, 2013

स्ट्रिंगरों का खून पीने वाला चैनल है ”ज़ी न्यूज प्लस राजस्थान मरुधरा”

किसी भी न्यूज चैनल में सबसे अंतिम और छोटी कड़ी होता है स्ट्रिंगर। सबसे महत्वपूर्ण भी। यही वो बंदा होता जिसके लिए असाइनमेंट डेस्क पर बैठा हर व्यक्ति विद्वान, काम का जानकार होता है। उनके निर्देशों का पालन माता-पिता के निर्देशों से अधिक करता है। उनकी डांट सुनता है। व्यक्तिगत टिप्पणी भी खून के घूंट पीकर रह जाता है। यही स्ट्रिंगर जब महीने बाद पेमेंट मांगता है तो यही असाइनमेंट वाले कहते हैं कि चैनल टेस्ट सिग्नल पर था। पेमेंट का पक्का नहीं है मिलेगी या नहीं। मिलेगी तो आपको बता देंगे। 

यही हुआ ज़ी न्यूज प्लस राजस्थान “मरुधरा” में। दो माह तक स्ट्रिंगर्स से काम करवाया। पेमेंट मांगी तो पता लगा कि चैनल टेस्ट पर था इसलिए संभव है मेहनताना ना मिले। ये कहानी नहीं सच्चाई है। जी मीडिया के जी राजस्थान प्लस मरुधरा की। इस रिजनल चैनल के लिए जून में  ही काम शुरू हो गया था। स्ट्रिंगर्स ने खूब काम किया। अपने क्षेत्र के सभी सीन। कोई आधे घंटे की स्टोरी, कोई पैकेज। वह सब भेजा जो चैनल के लिए जरूरी होता है। लेकिन अब दो माह पता लगा कि चैनल का 31 जुलाई तक टेस्ट सिग्नल था। इसलिए जरूरी नहीं कि इस अवधि की पेमेंट मिले।

अचरज की बात है कि किसी भी चैनल की सबसे अधिक महत्वपूर्ण कड़ी को मालूम ही नहीं कि उसे उसके काम का फल मिलेगा या नहीं। चलो ना मिले। इसके साथ साथ ये भी हो कि असाइनमेंट डेस्क से लेकर दूसरे सभी विभागों के अधिकारियों को भी टेस्ट सिग्नल की अवधि का वेतन नहीं मिलना चाहिए। स्ट्रिंगर्स ने तो पल्ले से फोन करके। जेब से खर्चा कर स्टोरी कवर की। ताकि उसके पास दो पैसे आएंगे। किन्तु ये तो उलटा हो गया। जो मिलना चाहिए वो तो मिलेगा नहीं। जेब से और गया।

यह स्ट्रिंगर्स के साथ अन्याय है। बोलेगा कोई नहीं। कोई इस बारे में आवाज नहीं उठाएगा कि काम किया है तो पेमेंट मिलनी चाहिए।  क्योंकि सबको बड़े चैनल का नाम चाहिए। वह है ही। ये कैसा अन्याय है कि अधिकारी तो सेलरी लेंगे,बस स्ट्रिंगर्स को कुछ नहीं मिलेगा। बेबसी देखो कि अपने हक के लिए किसी को कुछ कह भी नहीं सकते। एक छोड़ेगा दस तैयार हैं फ्री में काम करने के लिए। कहते हैं कि मीडिया दूसरों के शोषण को तो आवाज देता है। लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं कर सकता। लाचार है स्ट्रिंगर्स।

नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक स्ट्रिंगर द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित.

बेइमान साधना प्रबंधन के हाथों जमकर इस्तेमाल होने के बाद नैय्यर आजाद अब हो गए आजाद

मीडिया की दुनिया में तेज़ी से डूबता जहाज़ बन गया है साधना न्यूज़। वर्ष 2012 में सहारा चैनल में अच्छी पोजीशन छोड़ साधना न्यूज़ आए नैय्यर आजाद ने साधना न्यूज़ को बाय-बाय कह दिया है। साधना प्रबंधन ने नय्यर के लगभग एक लाख रुपये के बिलों का भुगतान नहीं किया था जिसके चलते नय्यर ने इस्तीफ़ा दे दिया। ये बिल उस समय के है जब वो बिहार में बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत थे और उसी दौरान एक बाबूजी नाम के शख्स के कहने पर प्रभातम ग्रुप के लिए इलाहाबाद में होने वाले कुम्भ के मीडिया सेंटर के लिए लखनऊ की यात्रा किया करते थे। अब इस्तीफे के बाद नय्यर ने साधना न्यूज़ पर मुकदमा करने का निर्णय लिया है।

कहा ये भी जा रहा है कि साधना न्यूज़ के सीनियर और जूनियर मालिक "गुप्ता" के दबाव में आकर उन्हें बिहार में काम करते हुए भी उत्तर प्रदेश में कुम्भ मेले का भी काम देखने का हुक्म दिया गया, उन्हें कई बार सूचना विभाग के अधिकारियों के साथ सेटिंग करने के लिए लखनऊ की यात्रा भी करनी पड़ती थी। उन्होंने अपने बिलों के भुगतान की बात की तो उन्हें ये कहकर चुप करा दिया गया कि प्रबन्धन उनके बिल को जल्द ही पास कर देगा। आश्वासन बार बार उन्हे बाबू जी के खेमे से मिल रहे थे मगर आजतक वो रुपये नहीं मिले। उन्होंने कुम्भ मेले के दौरान तीन महीने इलाहाबाद में भी बिताए।  

उनके पटना पहुंचते ही प्रबन्धन नें उन्हे नोएडा ऑफिस प्रमोट करके बतौर न्यूज़ एडिटर भेज दिया। साधना प्रबन्धन ने ट्रांसफर की चिट्ठी में ये लिखा था कि कुम्भ में उनके काम से खुश होकर प्रबन्धन ने उन्हे बतौर एसोसिएट एडिटर नोएडा ऑफिस में शिफ्ट करने का निर्णय लिया है, मगर उन्हें ना तो ट्रान्सफर के पैसे ही दिए गए और ना तो उनको सैलेरी दी गयी।  बीच बीच में उन्हें प्रबन्धन बार बार उत्तर प्रदेश सरकार और बिहार सरकार से सिर्फ एड का काम करने का दबाव देती रहा लेकिन विजिबिलिटी न होने के चलते ऐसा हो न सका, मगर साधना प्रबन्धन नैय्यर आजाद को लागातार ये कहता रहा कि सरकारों से अपनी जान पहचान का फाएदा उठाएं। अब हालात ये है कि नैय्यर आजाद ने भी साधना न्यूज़ को बाय बाय कह दिया है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘दंबग दुनिया’ में वो कौन है जो बातें लीक कर रहा है?

इंदौर के गुटखा उस्ताद किशोर वाधवानी के खास माने जाने वाले विनोद शर्मा ओर वैभव शर्मा दंबग दुनिया अखबार को लेकर हो रही कानाफूसी से काफी परेशान हैं दोनों ने खुफिया तरीके से अपने गुप्तचर अखबार में बैठा रखे हैं जो सभी रिपोर्टर ओर डेस्क के लोगों पर नजर जमाए हुए हैं कि अगर कोई भी संस्था को लेकर बातें किसी दूसरे अखबार के लोगों से शेयर करता है तो उसे तुरंत किशोर वाधवानी के सामने ले जाया जाएगा. पिछले कई दिनों से अखबार के अंदरखाने की बातें बाहर चली जा रही हैं और खासकर भड़ास पर छप जा रही हैं. इस सबसे वाधवानी का ब्लड प्रेशर काफी बढ़ चला है.

भड़ास की अपील : आप सभी मीडियाकर्मियों से अपील है कि आप लोग अपने अपने मालिकों के काले कारनामों और मीडिया के अंदर के हलचलों को भड़ास तक जरूर पहुंचाया करें ताकि इससे पारदर्शिता बढ़े और मालिक लोग किसी का शोषण-उत्पीड़न करने से डरें. याद रखिए, आपकी चुप्पी या आपकी कथित नमक के प्रति वफादारी न सिर्फ भ्रष्टाचार और शोषण बढ़ाता है बल्कि आपके खुद के वाजिह हक, हिस्से पर डाका डालता है. इसलिए आप मीडियाकर्मियों का फर्ज है कि आप देश-दुनिया के स्याह सफेद के बारे में अपने मीडिया में लिखें और खुद के मीडिया के स्याह सफेद के बारे में भड़ास को बताएं, bhadas4media@gmail.com पर मेल करके.

भ्रष्ट आईएएस राजीव कुमार के खिलाफ चैनलों ने दिखाई स्टोरी

वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा की भ्रष्ट आईएएस अफसर राजीव कुमार के खिलाफ चलाई गई मुहिम रंग लाने लगी है। हेड लाइन्स टुडे, आजतक, आईबीएन7 ने अपनी जबरदस्त रिपोर्ट में दिखाया कि जिस ईमानदार आईएएस अफसर दुर्गा नागपाल के समर्थन में पूरा देश खड़ा हो रहा है, उस अफसर की निलंबन की फाइल उस भ्रष्ट अफसर ने तैयार की जिसको खुद भ्रष्टाचार के आरोप में तीन साल की सजा हो चुकी है।

इन चैनलों पर जबरदस्त रिपोर्टिंग के बाद अब इस बात की बहस तेज हो गयी है कि क्या अखिलेश यादव अपने इस भ्रष्ट प्रमुख सचिव को हटायेंगे या फिर बेईमान और सजायाफ्ता अफसर को प्रदेश के सभी पीसीएस और आईएएस अफसरों को चुनने का अधिकार दिया जाता रहेगा।

प्रदेश में सभी पीसीएस और आईएएस अफसरों की तैनाती का जिम्मा प्रदेश के प्रमुख सचिव नियुक्ति के हवाले होता है वही इन अफसरों की तैनाती की फाइल बनवाता है और मुख्यमंत्री से हस्ताक्षर के लिए भेजता है। जब अखिलेश यादव ने सत्ता संभाली थी तो यह माना जा रहा था कि वह ईमानदार अफसरों की तैनाती करेंगे मगर अप्रत्याशित रूप से उन्होंने प्रमुख सचिव नियुक्ति के रूप में राजीव कुमार को तैनात कर दिया। उस समय सीबीआई राजीव कुमार और नीरा यादव के नोएडा जमीन घोटाले की जांच कर रही थी। तब वीकएंड टाइम्स में रिपोर्ट प्रकाशित हुई कि ऐसे व्यक्ति को प्रमुख सचिव नियुक्ति नहीं बनाना चाहिए जिसके खिलाफ खुद जांच चल रही हो।

अंततः वही हुआ जिसकी आशंका जतायी जा रही थी और कुछ समय बाद ही राजीव कुमार को जमीन घोटाले के आरोप में नीरा यादव के साथ तीन साल की सजा हो गयी। सजा होते ही सरकार ने मजबूरीवश उनको हटाया और जब वह हाईकोर्ट से गिरफ्तारी से बचने का स्टे ले आए तो फिर सरकार ने उनको उसी पद पर फिर तैनात कर दिया। वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने इसके विरूद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर करते हुए कहा कि जब दो साल की सजा के बाद किसी भी व्यक्ति को सांसद या विधायक का चुनाव लडऩे से रोक दिया जाता है तो फिर किसी तीन साल की सजा पाए अफसर को नौकरी कैसे करने दी जा सकती है। इस याचिका को वापस लेने के लिए संजय शर्मा पर लगातार दबाव पड़े मगर उन्होंने ये याचिका वापस नहीं ली। इसके बाद न्यायालय ने संजय शर्मा की याचिका पर राज्य और केन्द्र सरकार दोनों को नोटिस जारी कर दिए।

इस बीच दुर्गा नागपाल के मामले से पूरे देश में हड़कंप मच गया। दुर्गा नागपाल के निलंबन की फाइल राजीव कुमार ने ही तैयार की थी क्योंकि वही प्रमुख सचिव नियुक्ति थे। यह बात पता चलते ही लोगों में एक बार फिर नाराजगी बढ़ी। इसके बाद हेडलाइन्स टुडे और आजतक ने राजीव कुमार का एक स्टिंग आपरेशन तक कर डाला। इस रिपोर्ट में संजय शर्मा का इंटरव्यू करते हुए बताया गया कि किस तरह से यह भ्रष्ट अफसर सरकार को बदनाम कर रहा है।

कल दोपहर से आईबीएन 7 ने भी संजय शर्मा के इंटरव्यू के साथ राजीव कुमार और बाकी भ्रष्ट अफसरों की धमाकेदार खबर चलानी शुरू की जो अभी भी चल रही है। इस खबर के बाद यूपी की नौकरशाही और सरकार में हड़कंप मच गया है। अब सभी लोग यह मान रहे कि दुर्गा नागपाल को गलत तरीके से निलंबित करने वाली सरकार अगर इन भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करेगी तो यह मामला और ज्यादा तूल पकड़ेगा।

‘आज’ अखबार के पत्रकार सोमेंद्र ने हरदोई के बसपा प्रत्याशी शिवप्रसाद पासी पर धमकाने का आरोप लगाया

सेवा में, श्रीमान संपादक जी, भड़ास मीडिया पोर्टल, महोदय, निवेदन के साथ कहना है कि बघौली बाजार निवासी प्रार्थी सोमेन्द्र गुप्ता पुत्र श्री रतनलाल गुप्ता सम्मानित समाचार पत्र हिन्दी दैनिक ‘आज‘ लखनऊ संस्करण में उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले में बघौली क्षेत्र का पत्रकार है जिसे स्थानीय कस्बा से जुड़े छोट्टनपुरवा निवासी भूतपूर्व विधायक व मौजूदा बसपा प्रत्याशी लोकसभा हरदोई क्षेत्र शिवप्रसाद पासी द्वारा काफी दिनों से जानमाल की धमकी दी जा रही है। झूठे मुकदमे में फंसाने के लिए भी तमाम तरीके से प्रयास जारी है।

बघौली पुलिस थाने में शिवप्रसाद पासी व उसका बेटा हिस्ट्रीशीटर नम्बर आठ रजिस्टर में दर्ज हैं। वह तमाम तरीके से सार्वजनिक रूप से गाली गलौज कर सामाजिक छवि को प्रभावित कर लगातार मानसिक उत्पीड़न कर रहा है। जिसके बारे में स्थानीय पुलिस को भी सूचना दी गई। फिर भी पुलिस ने कोई ऐसी कार्यवाही नहीं की जो इस समस्या से निजात दिला सके।

श्रीमान जी इस दबंग पूर्व विधायक की खिलाफत की मुख्य वजह यह है कि तमाम तरीके से अवैध कारोबार करने वाले इसके बारे में पत्रकार सोमेन्द्र गुप्ता ने मामला उजागर किया था। हालांकि अन्य अखबारों ने भी इससे जुडे़ समाचार प्रकाशित किए फिर भी इस पत्रकार पर काफी रंजिश जताकर पूरे पत्रकार समाज की बेइज्जती करता घूम रहा है। पुलिस विभाग को महीना देकर अवैध दारू शराब का कारोबार करने वाले इस दबंग का पुलिस विभाग में अच्छा नेटवर्क है।

ग्रामसभा गोंड़ाधार की सरकारी राशन की दुकान इसी के नाम थी। बीते दिनों इसने दबंगई दिखाते हुए एक राजेश सिंह नाम के युवक को बहुत मारा उसका कसूर इतना था कि उसने सड़ा अनाज लेने से इन्कार कर दिया था। उसके समर्थन में गांव वालों ने भी विरोध जताया। जिसमें प्रार्थी ने पत्रकार साथियों को सूचना दी जिसकी भनक लगने से भी नाराजगी बढ़ गई। प्रार्थी की समस्या को पोर्टल पर प्रकाशित करने का कष्ट करें। महान कृपा होगी।

निवेदनकर्ता

सोमेन्द्र गुप्ता

हिन्दी दैनिक ‘आज‘ लखनऊ संस्करण

संवाददाता (बघौली), हरदोई

09450856210, 9005133200

बना दो एक्सट्रा खाना, क्योंकि आईआईएमसी की नई खेप आ चुकी है

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हम सभी कैंटीन संचालक अनधिकृत रूप से भोजन करने आए भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के छात्रों का इस बार भी भारी मन से स्वागत कर रहे हैं. हमारे देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान के छात्र हैं आप लोग. आप नवांकुर पत्रकारों के लिए हम लोग जेएनयू में अगस्त से अप्रैल तक एक्सट्रा खाना बनाते हैं. आप आते हैं चोरी-छुपे 8-10 लड़कों के गुट में. आपलोगों को देखकर हम समझ जाते हैं कि आप महान आईआईएमसी के छात्र हैं, जहां शौचालय की खूबसूरती और बनावट भी मुनिरका-कटवारिया सराय के उन कमरों से बेहतर है, जहां आप 3-4 लड़के एक साथ रहते हैं.

सुना है अब तो आपके आईआईएमसी में हाकिमों ने लिफ्ट भी लगा दी है. वातानुकूलित कक्षाएं, पुस्तकालय, लैब और 10 करोड़ी मंच सभागार तो पहले से ही था. आप लोग तो 20 रुपया का कूपन कटाते हैं और बदले में 40 रूपये का भोजन कर लते हैं और इक्वागार्ड वाला शुद्ध पानी भी पीते हैं. हम जेएनयू में छात्रावास कैंटीन चलाते हैं और हम जानते हैं कि आप इतना भोजन क्यों करते हैं, क्योंकि आपको सुबह में जल्दी भूख न लगे. कभी-कभी कुछ मजबूरियां होती हैं, जिस वजह से हमलोग आईआईएमसी वालों को कूपन देने से मना कर देते हैं, लेकिन आप ठहरे जीवट छात्र. हों भी क्यों नहीं, क्योंकि आप भविष्य में बड़े पत्रकार बनेंगे. हम जेएनयू में कैंटीन चलाने वाले पिछले 25 वर्षों से आप जैसे हज़ारों आईआईएमसी के छात्रों को जेएनयू के छात्रों के साथ भोजन करते देखा है.

हम लोगों ने आपस में आप लोगों की बातें भी सुनी हैं- कभी क्रांति की, कभी ग़ैर-बराबरी की, तो कभी जनसरोकारी पत्रकारिता करने की. वैसे हम लोग तो ठहरे खाना बनाने वाले साधारण पढ़े लिखे आदमी. हमें आप लोगों की बड़ी बातें समझ में नहीं आती, लेकिन एक दिन हमारे सहयोगी धनपत ने कहा कि ताऊ एक बात बताओ ये आईआईएमसी के छात्र बातचीत से तो बड़े क्रांतिकारी और सुधारक लगते हैं और पत्रकार भी हैं, लेकिन पिछले 25 वर्षों से इनके यहां छात्रावास नहीं है और ये लोग अपनी शर्म-हया को हथेली पर रखकर हर साल जेएनयू में अवांछित तत्व की तरह भोजन करते हैं, पेट में अन्न जाते ही ये लोग रूस की क्रांति से बात शुरू करते हैं और उदारीकरण होते हुए एफडीआई और मोदी, आडवाणी पर बात ख़त्म करते हैं, लेकिन ये वीर पत्रकार छात्रावास के लिए अपने संस्थान के अधिकारियों से बात क्यों नहीं करते, कोई प्रदर्शन क्यों नहीं करते.

जब ये बैठे-बैठे रूसी क्रांति की पटकथा लिख सकते हैं, तो अपने यहां छात्रावास के लिए कम से कम 5 लाइनें भी क्यों नहीं लिखते. जबकि उनके आईआईएमसी में विदेशी छात्रों और छात्राओं के लिए छात्रावास है. इतना ही नहीं, आईआईएमसी के ढेंकनाल, अमरावती, कोट्टयम, आइजॉल और जम्मू कैंपस में भी छात्रावास है, लेकिन दिल्ली में नहीं है. इन्हीं वजहों से आईआईएमसी के वीर पत्रकार जेएनयू में खाना खाने चले आते हैं. खैर चलो बाद में बात करते हैं. धनपत देखो 8-10 लड़के आ रहे हैं, जेएनयू के छात्र तो लग नहीं रहे हैं, लगता है आईआईएमसी का नया खेप आ गया है, अरे बना दो 100 रोटी एक्सट्रा और 5 किलो चावल अलग से.

लेखक अभिषेक रंजन सिंह आईआईएमसी के पासआउट हैं और पत्रकार हैं.

‘प्रेस’ लिखे बाइक पर सवार और खुद को बताने वाला पत्रकार करता था हेरोइन की तस्करी

अमृतसर : पुलिस ने प्रेस की आड़ में हेरोइन की तस्करी करने वाले एक नकली पत्रकार को गिरफ्तार किया है। आरोपी प्रेस लिखे मोटर साइकिल पर सवार होकर गांवों में हेरोइन सप्लाई करता है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार करके उसके खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। डीआईजी बार्डर रेंज परमराज सिंह उमरानंगल के नेतृत्व में चल रही एंटी नारकोटिक्स सेल की टीम को सूचना मिली थी कि सुल्तानविंड गेट के निकट स्थित माहना सिंह रोड ढोली मोहल्ला निवासी सूरज कुमार सभ्रवाल हेरोइन बेचने का धंधा करता है।

पुलिस ने जब उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाया तो देखा कि उसने अपने मोटर साइकिल नंबर पीबी02वाई 2318 पर प्रेस लिखा हुआ था। आरोपी शुक्रवार रात को अमृतसर से हेरोइन लेकर तरनतारन रोड पर पहुंचा। नारकोटिक्स सेल की टीम ने उसका पीछा किया। गांव चब्बा के निकट आरोपी ड्रेन के किनारे से होते हुए गांव चब्बा की तरफ चला गया। वही पर पुलिस ने उसे काबू कर लिया। तलाशी के दौरान आरोपी से तीस ग्राम हेरोइन बरामद की है। नारकोटिक्स सेल की टीम में शामिल सब इंस्पेक्टर बलदेव सिंह और एएसआई अश्विनी कुमार ने बताया कि पूछताछ करने पर आरोपी ने पुलिस पर रौब जमाया और कहा कि वह एक दैनिक समाचार पत्र का पत्रकार है।

तलाशी लेने पर उससे एक ड्राइविंग लाइसेंस व मोटर साइकिल की आरसी के सिवाय कोई और पहचान पत्र नहीं मिला। पुलिस ने शहर के पत्रकारों से भी आरोपी सूरज सभ्रवाल के बारे में पूछताछ की। मगर वह किसी भी समाचार पत्र से संबंधित नहीं निकला। आरोपी के खिलाफ थाना चाटीविंड में एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज कर लिया है। शनिवार को आरोपी को अदालत में पेश किया गया। अदालत ने आरोपी को दो दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया है। (साभार- दैनिक जागरण)

टीवी पत्रकार शिवेंद्र कुमार सिंह की किताब ‘विजय चौक लाइव’ का विमोचन हुआ

नई दिल्ली : खबर की दुनिया से जुड़ने वालों को देश और दुनिया की बुनियादी समझ होनी जरूरी है। उन्हें पता होना होना चाहिए कि उनकी रिपोर्ट का सकारात्मक असर पड़ेगा या नकारात्मक। ये बातें वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीन नकवी ने टीवी पत्रकार शिवेंद्र कुमार सिंह की किताब ‘विजय चौक लाइव’ के विमोचन के दौरान कहीं।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में एबीपी चैनक के पत्रकार विजय विद्रोही ने पत्रकारिता के स्वरूप और चुनौतियों पर परिचर्चा करते हुए मीडिया की ताकत पर अपनी बात रखी। वहीं वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने सामयिक परकाशन द्वारा प्रकाशित इस किताब पर कहा कि पत्रकारिता पहले से बेहतर और निडर हुई है। उसमें नवीनता भी आई है। इस मौके पर पत्रकार आशुतोष ने कहा कि उस उपन्यास की खूबसूरती भी है।

उपन्यास के लेखक शिवेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि इसका मकसद टीवी जगत की पोल खोलना कतई नहीं बल्कि उन बातों और उद्देश्यों को सामने लाना है जिसके लिए मीडिया बना है। कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने हिन्दी और अंग्रेजी पत्रकारिता के फर्क पर अपनी बात रखी। इस दौरान मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रियदर्शन, वर्तिका नंदा समेत तमाम पत्रकार और साहित्यकार मौजूद थे। (साभार- हिंदुस्तान)

‘पत्रिका’ में जो माहौल बना है वह किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए घुटन देने वाला है

राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार पत्रिका के रायपुर एडिशन में कार्यरत सुरेंद्र शुक्ला ने इस्तीफा देने के लिए जो पत्र लिखा है छत्तीसगढ़ के स्टेट एडिटर को, वह भड़ास के पास भी है. इस पत्र से जाहिर होता है कि पत्रिका वाले रायपुर पहुंचे तो पहले अच्छे लोगों के जरिए अच्छी व बड़ी खबरें ब्रेक कराकर अखबार को प्रतिष्ठा दिलाई और अब जब अखबार का नाम हो गया तो दलालों को आगे करने लगे और धंधा-पानी बढ़ाने लगे. सुरेंद्र के पत्र से ऐसा ही कुछ जाहिर होता है. नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप सुरेंद्र के पत्र को पढ़ सकते हैं…

अगर आपके पास भी मीडिया से जुड़ी कोई सूचना जानकारी आवाजाही इनाम पुरस्कार घपला घोटाला हेरफेर हो तो भड़ास तक इसे पहुंचाएं ताकि दुनिया भर की खबर देने वालों की खबर हम आप मिलकर ले सकें. ध्यान रखिए, आप अगर आज चुप रहे तो कल फिर कोई आपके लिए बोलने वाला नहीं रहेगा. भड़ास तक अपनी बात कहने के लिए आप bhadas4media@gmail.com मेल आईडी का सहारा ले सकते हैं.

भास्कर ने हिंदी फिल्म हिरोईन्स के ब्रेस्ट साइज भी पता कर लिए हैं

Samar Anarya : Dainik Porn Bhaskar knows Bollywood Actresses' breast size. Not merely that, it has the cheeks to scream that out in the URL of that story it published as NEWS. Want to know the Breast Size of other women. Contact Bhaskar.

http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-bollywood-actresses-breast-sizes-list-4342975-PHO.html?seq=3

Samar Anarya : लीजिये… भास्कर की एक और खबर शहीद. लिंक लगाने के घंटे भर में ही उनके खोजी पोर्नकारों ने बॉलीवुड अभिनेत्रियों के स्तन साइज़ हटा लिए हैं, बाकी लिंक और तस्वीरें रहने दी हैं. डरते बहुत है ये दैनिक भास्कर वाले.. नहीं? बाकी फिर से यूआरएल ध्यान से पढ़िए और यह मानसिकता देखिये. जिसमे bollywood-actresses-breast-sizes-list चमक रहा है… खैर… अब कौन बतायेगा कुंठितों को महिलाओं का साइज़…

Anant Paliwal :  अब तो भास्कर ने हिंदी फिल्म हिरोईन्स के ब्रेस्ट साइज भी पता कर लिए हैं। केवल बिकनी पहने हिरोईन्स की फोटो डाल दी हैं। कई फोटो में उभार भी साफ – साफ दिख रहे हैं। मैं दैनिक पोर्न भास्कर के खिलाफ जारी मुहिम का समर्थन करता हुं, चूंकि मैं खुद भी भी वेब पत्रकार हुं तो चाहता हुं कि यह गंदगी समाप्त हो।
http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-bollywood-actresses-breast-sizes-list-4342975-PHO.html?seq=3

Anant Paliwal : So as of now Bhaskar has deleted the size description but has kept the name of actresses. It has backtracked on the showing of content and edited the details too but till now has not removed the link from its website…..what the bull shit is going on!!!! Dainik Bhaskar

समर अनार्या और अनंत पालीवाल के फेसबुक वॉल से.

दैनिक पोर्न भास्कर के किसी कारिंदे ने फोन कर समर को धमकाया

Samar Anarya : अभी दैनिक पोर्न भास्कर के किसी कारिंदे ने फोन किया. अफ़सोस की प्राइवेट नंबर से सो शेयर नहीं कर सकता. धमकी दी कि औकात में रहूँ वरना आईडी हैक कर लेंगे तेरी. फिर वो सबक सिखायेंगे कि… मैंने उसकी बात यहीं काट दी. उसे बोला कि दल्ले… सुन. तेरे बापों ने मुकदमे की धमकी दी थी. पहले वो करवा ले. बाकी बाद में भौंकना. अब बोल.. उसने फोन काट दिया.

सो साहिबान.. तैयार रहिये मेरी प्रोफाइल से पोर्न कंटेट दिखने को. पासवर्ड बदल लेने और लॉग इन नोटिफिकेशन इनेबल कर देने के बाद भी भास्कर जैसे पोर्न विशेषज्ञ समूह से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है. हाँ.. जैसे ही हुआ वैसे ही मैं यहाँ विजय कुमार झा से लेकर बरास्ते अनुज खरे और ज्ञान गुप्ता राजेश उपाध्यायों से लेकर कल्पेश याग्निकों तक को यहाँ की अदालत में बुलाऊंगा. मुहब्बत भरी बातें करने के लिए. और मेरी बातें इनकी धमकियों की तरह खोखली हैं या नहीं यह भी देख ही लेंगे.

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Samar Anarya : भास्कर से आई उस प्राइवेट नंबर वाली कॉल के बाद मैं बहुत डर गया हूँ साहिबान… थर थर काँप रहा हूँ. सो आप से गुजारिश है कि नीचे दिए सारे नंबरों पर फोन करें और कहें की मुझ गरीब समरवा को माफ़ कर दें. मैं अपना अभियान बंद कर दूंगा. आप निश्चिन्त होकर खबर के नाम पर पोर्न छापें.

बाकी इन सबको फोन किया मैंने अभी.. किसी ने नहीं उठाया नहीं तो मैं खुद ही विनयावनत हो जाता. शायद मेरे नंबर के आगे आने वाले स्थाई +852 ने आगाह कर दिया इन्हें. प्लीज़ मुझे माफी दिला दें इन पोर्नकारों से…..

09811850284- ज्ञान गुप्ता
कल्पेश याग्निक (फोन नंबर- 08989299000)
राजेश उपाध्याय (फोन नंबर 095 60 866006)
अनुज खरे (8860427755)
विजय क झा (9953884656)

इन सबको फिर से फोन करें.

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Samar Anarya  : दिल खुश है कि दैनिक पोर्न भास्कर के खिलाफ छेड़ी इस जंग में लोग कहाँ कहाँ से साथ रहे हैं.. अभी एक साथी ने खबर दी कि जिम्मेदार सिर्फ दिल्ली वाले नहीं हैं. भोपाल में बैठे कुछ पोर्नकार भी इस पोर्न यज्ञ में अपने ढूंढें लिंक्स की आहुति देते रहते हैं. इनके नाम और नंबर भी लें.. पत्रकारिता में इ अभूतपूर्व योगदान के लिए इन्हें भी मुबारकबाद दें…

सुशील तिवारी (टीमलीडर)- 09713261234
संजीव श्रीवास्तव (नाइट शिफ्ट इंचार्ज) 09424618622
 

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी समर अनार्या उर्फ अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

आम आदमी और रॉबर्ट वाड्रा में कितना बड़ा फर्क है, ये देश देख रहा है…

Amaresh Jha : लोकतंत्र कहां है? आम आदमी और रॉबर्ट वाड्रा में कितना बड़ा फर्क है ये देश देख रहा है…इतना बड़ा गड़बड़झाला कि हजारों करोड़ की हेराफेरी हो गई…लेकिन रॉबर्ट वाड्रा साहब पर आंच तक नहीं आई…रुपए का लेन देन हुआ नहीं और हजारों करोड़ की प्रोपर्टी अपने नाम कर ली…एक आईएएस अधिकारी ने सवाल उठाए…तो उसका तबादला हो गया…सरकार ने आईएएस अधिकारी के खिलाफ ही जांच बिठा दी…

यही हेराफेरी एक आम आदमी ने की होती…तो वो चौर सौ बीसी के मामले में जेल में होता…सरकारी कमेटी से जांच तो छोड़ दीजिए…एसएचओ तक नहीं सुनता…आजादी के 66 साल बाद भी हमारा सिस्टम आजाद नहीं है…शर्म की बात है कि ये हाल उन लोगों की वजह से है…जिन्हें देश ने हुकूमत चलाने का सबसे ज्यादा मौका दिया है…

अमरेश झा के फेसबुक वॉल से.

इन सौ से अधिक लड़के-लड़कियों के होटल में मिलने पर पाबंदी क्यों?

Jitendra Dixit : कल गाजियाबाद में सौ से अधिक लड़के-लड़कियां एक होटल में अलग-अलग कमरों में निजी पल बिताते पकड़े गए। पुलिस उन्हें उनके अभिभावकों को सौंपेगी। संभव यह है भी है कि लड़कियां अभिभावकों को सौंप दी जाए और लड़कों को जेल भेजा जाए। अक्सर इस तरह के मामलों में ऐसा होता है। विवाह से पूर्व इस तरह युवक-युवतियों का निजी पल एकांत में बिताना हमारे समाज में सही नहीं माना जाता जबकि कानूनी दृष्टि से वयस्क युवक-युवती सहमति से शारीरिक संबंध बना सकते हैं।

जाहिर है कि होटल में इनका मिलन सहमति से ही होगा। मुझे बड़ा अजीब लगता है कि जब इस तरह के मामलों में दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं। एक तरफ लड़कियों के देर रात तक घूमने-फिरने और दोस्तों से मिलने-जुलने की वकालत की जाती है। लिव इन का चलन शुरू हो चुका है। शरीर पर सिकुड़ते जा रहे उनके कपड़ों को सही ठकराया जाता है, तो फिर होटल में उनके मिलने पर पाबंदी क्यों?

मेरठ में कुछ वर्ष पूर्व गांधी बाग में पुलिस ने इस तरह के जोड़ों की धरपकड़ की थी, तब पुलिस को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी। बात मानवाधिकार तक की हुई थी। खबरिया चैनलों ने कई दिनों तक पुलिस कार्रवाई के विरोध में चटपटी खबरें परोसी थीं। मेरा आशय यह है कि दोहरे मापदंड न अपनाए जाएं। या तो उन्हें मिलने पर पाबंदी न हो या फिर पहनावा, देर रात तक बाहर रहने, ब्वाय फ्रेंड-गर्ल फ्रेंड बनाने आदि के चलन के विरोध को सही ठहराया जाए।

यदि पुलिस की कार्रवाई सही है तो फिर बेलेंटाइन-डे का विरोध भी सही है और उस दिन भी पुलिस की कड़ी चौकसी रहनी चाहिए। युवक-युवतियों के होटल में मिलने की शुरूआत तो वेलेंटाइनी दोस्ती जैसे फंडो से ही होती है। इस पूरे मामले में समाज, कानून और पुलिस को अपनी दृष्टि बदलने की जरूरत है।

मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र दीक्षित के फेसबुक वॉल से.

इस पंजाबी मुंडे कपिल शर्मा ने कामेडी शो में आकर यूपी वाले गजोधर भैया यानी राजू श्रीवास्तव को ठिकाने लगा दिया है

Shambhunath Shukla : कामेडी विद कपिल मेरा पसंदीदा शो है। वीकेंड में देर रात तक मैं इसे देखता हूं वर्ना कोशिश रहती है कि रात ११ बजे तक बिस्तर पकड़ लिया जाए। अब अपन ठहरे सीधे सादे आदमी किसी क्लब के मेंबर तो हैं नहीं जो देर रात तक का बख्त जाया करें। पर शनिवार देर रात तक कलर्स में आने वाले कपिल के शो को देखते रहने के कारण सुबह की वाक कैंसिल करनी पड़ी।

मुझे लगता है कि इस पंजाबी मुंडे कपिल शर्मा ने कामेडी शो में आकर अपने यूपी वाले गजोधर भैया यानी राजू श्रीवास्तव को ठिकाने लगा दिया है। यूं कपिल यूपी वाले भैया से ज्यादा प्रतिभाशाली और काबिल भी है। बेचारे राजू अब वाकई राजू बन गए हैं और मुलायम शरणं गच्छामि हो गए हैं।

कानपुर से चुनाव लडऩे की योजना बनाई है लेकिन श्रीप्रकाश जायसवाल के आगे वे जमानत ही जब्त कराएंगे। अब उन्हें सपा का परंपरागत वोट तो मिलेगा नहीं क्योंकि शहरी यादव का रुझान मोदी के कारण भाजपा की तरफ और कुछ बहुत कांग्रेस की तरफ है। मुसलमान भी राजू की छवि के कारण उनकी उम्मीदवारी पर गंभीर नहीं है। अलबत्ता भाजपा के कायस्थ वोट बैंक में वे जरूर सेंध लगा देंगे। जो एक लाख के आसपास तो है ही।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

कंवल भारती मुद्दे पर प्रलेस, जलेस और जसम एक मंच पर इकट्ठा हो रहे

Om Thanvi : प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच आज कँवल भारती के हक में प्रेस क्लब में एक मंच पर इकठ्ठा हो रहे हैं। आशा करनी चाहिए कि कँवल भारती को न्याय मिल पाएगा, उनके साथ और अन्याय नहीं होगा। लेखक संगठनों के इस इस मिलाप पर मैं निजी तौर पर भी थोड़ा खुश हो सकता हूँ। क्योंकि कई बार लिख चुका कि तीनों संगठन मार्क्स में आस्था रखते हैं, पर किसी मार्क्सवादी लेखक की मृत्यु पर शोकसभा तक मिलकर नहीं कर पाते।

कँवल भारती की गिरफ्तारी पर भी सिर्फ जसम की ओर से तुरंत बयान जारी हुआ था। आज का सम्मिलन भी, बताते हैं, जसम की पहल पर मुमकिन हुआ है। उम्मीद करनी चाहिए कि यह मिलाप आगे भी तीनों सगठनों को, कम से कम जीने-मरने के मामलों में, एक छत एक मंच देता रहेगा।

हालाँकि मैं अब भी समझ नहीं पाता हूँ कि एक मार्क्स के नाम पर इतने राजनीतिक दल आखिर बने क्यों? और विभिन्न मार्क्सवादी दलों की पटरी पर लेखक संघ (सीपीआइ=प्रलेस; सीपीएम=जलेस; सीपीआइ-एमएल=जसम) चल क्यों पड़े? जैसा कि Khurshid Anwar पूछते हैं: क्या एक प्रगतिशील लेखक के भीतर जनवाद नहीं होता? क्या कोई जनवादी लेखक प्रगतिशील विचार का नहीं होता? क्या ये दोनों जन संस्कृति के पक्षधर नहीं होते? अगर होते हैं तो उसी एक मार्क्स देव के नाम पर लेखकों के बीच अलग-अलग ठिकानेदारी पनपाई ही क्यों गई है?

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.