जेल में मर्डर : उस कैदी को वियाग्रा खिलाकर निपटा दिया गया था!

Yashwant Singh : चूंकि मैं ‘जानेमन जेल’ नामक किताब का लेखक हूं और 68 दिन जेल का नमक खाने का मौका पा चुका हूं इसलिए जेल में मुन्ना बजरंगी के मर्डर के बारे में एक्सपर्ट कमेंट देना अपना कर्तव्य समझता हूं. Continue reading

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एक बड़े माफिया डॉन ने मुन्ना बजरंगी को जेल में मारने की सुपारी सुनील राठी को दी थी! देखें वीडियो

मुन्ना बजरंगी की जेल में हत्या से योगी सरकार पर भी उठने लगे सवाल….

Girish Malviya : रामराज्य की दूसरी क़िस्त आज रिलीज हो गयी कुख्यात माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी को जेल में 10 गोली मार कर हत्या कर दी गयी है. अपराधी है तो मृतक से किसी को कोई सहानुभूति नहीं है लेकिन फिर भी जेल में इस तरह की हत्या क़ानून व्यवस्था पर गम्भीर प्रश्न खड़े करती है. 10 दिन पहले ही मुन्ना बजरंगी की पत्नी ने प्रेसकांफ्रेन्स कर उसकी हत्या की आशंका जताई थी. Continue reading

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यूपी की एक जेल के भीतर की रीयल जिंदगी देखें… क्या कुछ नहीं होता यहां… देखें वीडियो

झांसी जेल में सजा काट चुके कुछ कैदियों ने अंदर बनाए गए वीडियो को रिपोर्टर मधुर यादव को सौंपा…..  झांसी के पत्रकार मधुर यादव  ने जोरदार खुलासा किया है. उन्होंने झांसी की जेल के भीतर के रीयल फुटेज पब्लिक डोमन में लेकर आए हैं. इन फुटेज को देखने से पता चलता है कि जेल के भीतर नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं. वीडियो से साफ जाहिर है कि जेल के अंदर दुकानें सजती हैं जहां कैदियों को जिला कारगार प्रशासन की मदद से ऊंचे दामों में सामान बेचा जाता है.

इन दुकानों पर बीड़ी सिगरेट, गुटखा, मिठाईयां और कच्ची शराब मिलती है. जेल के अंदर कैदियों को मोबाइल फोन ले जाने की छूट दी जाती है. झांसी जेल में सजा काट चुके कई कैदियों ने सजा के दौरान जेल के अंदर की हालत का मोबाइल पर वीडियो बनाते हुए स्टिंग कर लिया. झांसी जेल से सजा काट चुके कैदियों ने बाहर आकर स्टिंग का वीडियो रिपोर्टर मधुर यादव को सौंप दिया. इन भूतपूर्व कैदियों का कहना है कि जेल में ऐसा कोई अवैध काम नहीं है जिसे न किया जाता हो.

कैदियों द्वारा दिये गये वीडियो को देखने से पता चलता है कि जेल के अंदर जलेबी, शराब, गुटखा, बीड़ी, सिगरेट,  सब्जी आदि धड़ल्ले से बिकती है और इनकी कीमत पहले से ही तय रहती है. हर रोज जेल प्रशासन को इस व्यापार से 1 लाख रुपए से ऊपर की कमाई होती है. जेलर कैदियों को उनकी काबिलियत के हिसाब से काम देता है. पूरी जेल को पुलिस नहीं बल्कि फिल्मों की तरह राइटर और लंबरदार चलाते हैं. इनकी संख्या करीब 40 के आस-पास है. हर बैरिक में 2 राइटर और लंबरदार को रखा जाता है. 

राइटर एक प्रकार से आला अधिकारी के पीए का काम करते हैं और लंबरदार के पास एक डंडा होता है जो पूरी जेल में घूम-घूम कर कमजोर कैदियों पर अत्याचार करता है. झांसी जेल में लगभग 1500 कैदी हैं जबकि यहां 470 कैदी रखने की ही व्यवस्था है. जेल के अंदर हाई क्वालिटी मोबाइल से लेकर कैदियों के पास सारे ऐश और आराम के समान होते हैं.

कैदी पसंद का खुद खाना खुद बनाते हैं

जो ज्यादा पैसे वाले होते हैं उनके लिए तो अंदर ही खाने की व्यवस्था हो जाती है। लेकिन मीडियम क्लास के कैदी जेल से मिलने वाले खाने में रोटियां ज्यादा लेते हैं। फिर उन्हें सुखाकर ईंधन के काम में लाते हैं। पूरी जेल में अलग-अलग जगह कैदी अपनी पसंद का खाना बनाते हुए दिख जाएंगे। जेल के अंदर 150 रुपए किलो के हिसाब से जलेबी मिल जाती है और बालूशाही का एक पीस 10 रुपए का मिलता है। इसकी कीमत जेलर तय करता है।

जन्म दिन पर बाहर से आता है केक

कैदी पैसे देने में सक्षम है तो उसके जन्मदिन पर बाकायदा बाहर से केक और दूसरे सामान मंगाए जाते हैं। इसकी उन्हें मुंह मांगी कीमत देनी पड़ती है। पूरी जेल में एक बिजनेस की तरह नेटवर्क चलता है। यदि कोई नया कैदी आता है तो उससे मशक्कत न कराने के नाम पर 300 रुपए वसूले जाते हैं। यदि कैदी पैसे वाला है तो 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक मशक्कत न कराने के नाम पर ले लिए जाते हैं। कैदी जब जेल के अंदर पैसे लेकर जाते हैं तो उनसे 10 पर्सेंट कमीशन वसूला जाता है। आरोप है कि ये सब सुपरिटेंडेंट राजीव शुक्ला, जेलर कैलाश चंद्र और डिप्टी जेलर संदीप भास्कर के इशारे पर होता है।

जेल के अंदर इन कैदियों का है वर्चस्व

माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी का झांसी जेल में जलवा है. जेल प्रशासन के संरक्षण में मुन्ना बजरंगी के गुर्गे आनंद लेते हैं.  जेल के अंदर एक सत्येंद्र है। यह गरौठा थानाक्षेत्र का रहने वाला है। मर्डर केस में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। यह सुपरिंटेंडेंट का राइटर है। इसकी बैरक में 56 इंच की एलसीडी टीवी लगी हुई है। अपने पास गलैक्सी ए5 मोबाइल रखता है। यह जेल के अंदर कैंटीन चलवाता है। इसका मंथली इनकम 50-60 हजार रुपए महीने है। कैंटीन में एक लाख रुपए की रोज की बिक्री है।

गोलू नाम का युवक भी जेल में बंद है। ये मऊरानीपुर थानाक्षेत्र का रहने वाला है। मर्डर केस में आजीवन सजा काट रहा है। इसका काम है कैदियों को उनके रिश्तेदारों से मिलाई कराना और पर हेड 20 रुपए उनसे लेना। इसमें से वो खुद 5 रुपए रखता है, बाकी 15 रुपए जेलर के पास जाते हैं। जेल में बंद जितेंद्र मर्डर केस में आजीवन कारावास काट रहा है। इसके पास खाद्य सामग्री का चार्ज रहता है। यह अपने नेटवर्क द्वारा कैदियों के लिए आई सरकारी सामग्री को बाहर मार्केट में बिकवा देता है। इसका कमीशन इससे लेकर जेल प्रशासन तक पहुंचता है। जेल में बंद छोटे श्रीवास मर्डर केस में आजीवन सजा काट रहा है। इसका काम है जेल के अंदर जुआ खिलवाना और ब्याज पर कैदियों को पैसा बांटना। जेल में बंद कौशल रावत जेलर का राइटर है। यह सिर्फ जेलर का आदेश मानता है। जेलर के इशारे पर कैदियों को पीटता है।

इन वीडियोज और आरोपों के बारे में झांसी जिला कारागार के सुपरिटेंडेंट राजीव शुक्ल का कहना है कि उनके संज्ञान में वीडियो आया है. इसकी जांच कराई जा रही है. पता किया जा रहा है कि यह वीडियो कब का है और किन परिस्थितियों में बनाया गया है. यह पुष्टि हो जायेगी, तभी आगे कुछ कह पाना ठीक होगा.

देखें झांसी जेल के भीतर का हाल….

झांसी से मधुर यादव की रिपोर्ट. संपर्क : 8853719246 या madhuryadav376@gmail.com

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आइसा छात्र नेता नितिन राज ने जेल से भेजा पत्र- ‘रिश्वत देकर रिहाई कतई कुबूल नहीं’

सरकारों का कोई भी दमन और उनके भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती……

साथियों,

आज शायद भारतीय छात्र आन्दोलन अपने इतिहास के सबसे दमनात्मक दौर से गुजर रहा है, जहाँ छात्रों को अपनी लोकतान्त्रिक माँगो को लेकर की गई छात्र आन्दोलन की सामान्य कार्यवाही के लिए भी राजसत्ता के इशारे पर महीनों के लिए जेल में डाल दिया जा रहा है. छात्र आन्दोलन से घबराई योगी सरकार, जो कि इसे किसी भी शर्त पर कुचल देना चाहती है, हमें इतने दिनों तक जेल में रख कर हमारे मनोबल को तोड़ने की कोशिश कर रही है. लेकिन हम क्रान्तिकारी परम्परा के वाहक हैं हमारे आदर्श भगतसिंह और चंदू हैं, सावरकर नहीं, जो जेल के भय से माफ़ीनामा लिखकर छूटे और अंग्रेजों की दलाली में लग गए. हमें अगर और दिनों तक जेल में रहना पड़ा तब भी हम कमजोर पड़ने वाले नहीं हैं.

कल जब हमारे साथ के सभी आन्दोलनकारी साथियों की रिहाई हो गई और मेरी नही हुई तो पहले कुछ कष्ट हुआ लेकिन जब से पता चला कि मेरी रिहाई BKT थाने में हमारे साथियों द्वारा रिश्वत देने से इंकार करने के चलते रुकी है तब मुझे जानकर ख़ुशी हुई. यदि रिश्वत देकर मेरी रिहाई कल हो गई होती तो मैं छूट तो जाता परन्तु वो भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन, जिसके चलते मैं जेल में आया, शायद हार जाता. जो कि इस आन्दोलन की मुख्य अंतरवस्तु को ही भटका देता. मुझे गर्व है कि मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ सही मायने में लड़ रहा हूँ और अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ भले ही मुझे इसके लिए अधिक दिनों तक जेल में क्यों न रहना पड रहा हो. जेल में मैं बस हमारे प्रिय छात्रनेता चंद्रशेखर प्रसाद (चंदू) के शब्दों “ यह मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है कि मैं चे ग्वेरा की तरह जियूँ और भगतसिंह की तरह मरुँ”, को याद करके खुद को राजसत्ता के दमन से ज्यादा मजबूत पाता हूँ और लड़ने की एक नई उर्जा प्राप्त करता हूँ. 

आज पूरे देश में जिस तरीके से कार्पोरेट फासीवादी ताकतों की सत्ता स्थापित है उसमें लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं व अन्य वंचित तबकों पर हमले बढ़ रहे हैं. पूरे देश में एक ऐसी भीड़ पैदा की जा रही है जो सिर्फ अफवाह के चलते किसी की भी हत्या कर दे रही है. हमारे किसान जब अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो उन्हें गोली से उड़ा दिया जा रहा है. अगर छात्र नौजवान शिक्षा और रोजगार की बात करता है तो उसे जेल में ठूंस दिया जा रहा है, जो भी सरकार पर सवाल उठाता है उसे देशद्रोही करार दिया जाता है. इस भयानक दौर में मैं देश के सभी छात्र नौजवानों से अपील करता हूँ कि भगत सिंह के क्रांतिकारी विचारों से प्रेरणा लेते हुए समाज के सभी उत्पीडित तबकों को गोलबंद कर इन जनविरोधी, लोकतंत्र विरोधी सरकारों को उखाड़ फेकने की जिम्मेदारी लें. ये काम सिर्फ छात्र नौजवान ही कर सकते हैं.

अंत में मैं फिर इन सरकारों से कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा कोई भी दमन और तुम्हारे भ्रष्टतंत्र की कोई भी बेशर्मी और बेहयाई क्रांतिकारी नौजवानों के मंसूबों को तोड़ नहीं सकती. 

इंकलाब जिंदाबाद!!

द्वारा-

नितिन राज
छात्र नेता
आइसा
लखनऊ

उपरोक्त पत्र की ओरीजनल प्रति यूं है…

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ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर!

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।

चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।

हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।

दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर – नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर – नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर – उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।

उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।

इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर  बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए।

लेखक Hari Govind Vishwakarma से संपर्क 09920589624 के जरिए किया जा सकता है.

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किशोरों की नशाखोरी का स्टिंग करने के कारण एक पत्रकार जेल काट रहा है, पढ़िए उसका भेजा गया पत्र

Sir,  Main Manish dubay s/o Shree Laxmishankar kanpur uttar-pardesh ka niwasi hu. ve pesey se press-repotar hu.! Par aaj shayad mera profetion hi mere liye jaan ki afaat ban chuka hai.! Main apne ghaar, pariwaar, patni ve ek chhoti si bachhi se dur police ve kanun ke hatho ki katputli ban nirapradh jail kat raha hu.! Sir, maine 2011 mai dilli ke kuch kam umar ladko ko nasha-khori karte hue ek video banaya tha. tatha apne samajik sarkaro ke chalte usse youtube par upload kar diya tha.!

Sir mujhe nhi pta ki anjane me maine unn juwenail magar kam umar ke shatiro ka koi raaj ujagar kiya tha.! Jiske bad you-tube par pade mere naam ve mobile no. se mujhe 3jan 2012 me 20-25 logo tuglakabad metro station se gun point par utha liya.! ye log mujhe lekar rohini se sec-7 thana North Rohini pohche tab mujhe pata chala ki ye apharan karta nhi police wale hai.!

Uss samaye maine dilli stith ek rashtriya chennal me bator sampadak(U.P) join kiya tha. jisse do hi mahine hue the. thana north me le jakar police ne mujhe waha pehle se bethe ek ladke ko pehchanne ko bola, par usse maine tab se pehle dekha hi nhi tha. Police ne ussey mujhe pehchanne ko kaha bola toh usne, haan me saar hilaya.!

Maine apne sath hui iss aasamajik ghatna, tatha ukkat ladke ke vehawar se puri traha chakkar me tha ki tabhi delhi-police ke supar caop inspactor Amit kumar mere se bola ”isse pehchano ye navin gulab hai,apne aera ka B.C. isse dosti kar lo tumhe crime beat ka bhadiya repotar bana denge.! is doran in logo ne mujhe kisi bhi mere jankar se phone par bat tak karwana munasib nhi samjha.! In logo ne rato-rat mera medical karakar meri kai photo ve video banaye, tatha mujhe rohini jail me bhej diya gaya.! jaha bad me mujhe pata chala ki navin s/o gulab naam ka ye apradhi un ladko ka sathi tha. Jo unhe drag vagera splie kar choti-moti vardate karta tha. (jis par kai mukadme bhi hai)

Jiska video bana kar maine virul kiya tha. Navin/gulab naam ke iss ladke ne hi kai apradh kar mera naam ve mobile no. police ko batya tha. you-tube ke madhyam se.! Dilli police ne mujhpar do lut ka ceas banaya tha. 4 jan 2012 ko rohini jail me avrudh me 6 dec 2012 ko chhuta tha.! 2013 me mera ek case bari ho chuka tha. kanun par behad bharosa or jhuth se ek na ek din parda uthne ke chalte main apne dusre case se puri traha aasvast tha. Iss doraan feb-2014 me meri shadi tatha 8 mahine ki ek beti thi jab dec-2015 ki 16 tarikh ko ek bar fir kanun tatha uske namaindo ke dokhe ka shikar bana.! Mere vakil ‘Goyal vinkal’ ne I.O Amit kumar se kuch sathh  gath kar jila evem sub nayale rohini(206) ke bhagwan vidhya prakash se mujhe 7 varsh ki ke kara di.!

16/12/2015 se 23/12/2016 tak main tihar 8/9 no. me tatha 23/12/2016 se abh tak nayi bani mandoli jail nirapadh-ghratrashtra ho chuke kanun ke dwara di gyi saja ko bhugatne ko vivash hu. super caop-top delhi police ke maharathiyo ne mere sath ye ghinona khel- khelkar mera bhavishya ve ghar-parivar ko tahas-nahas kar ke rakh diya hai, kanpur se delhi pervi me aa rhe mere papa kanun tatha ghart vakil ki luot khasoth se behad pareshan ho chuke hai Riyaz ahmad, Arun kumar, siddhart yadav kukur mutto ki traha ugey ye vakil jo tamam sabaj baag dikhakar sirf paise eyth kar palla jhad lete hai. or apne kukarmo se puri biradri(vakalat) ke muh par kalikh pot dete hai.!

Main ek medium femily se talluk rakhta hu. mere papa rajya karamchari the jo abh ritayar ho chuke hai. meri bachhi badi ho rahi hai na jane kitna paisa is court kachehri PP perokar vakil munshi peshakaro ko me khud de chuka hu. satyamev-jayte aaj ki date me puri traha majak ban chuka hai. yaha undar ke halat toh bahar se bhi battar hai. ye kanun kapil sibbal v.ram jethmalani jese ke liye hi sirf positive jaan padta hai. jo humari hesiyat se bahar hai. salman khan se madat mil nhi sakti hai. toh sirf or sirf aap ka hi bharosa hai mamla sagyan me lete hue uchit nayaye kare, jisse kanun ka uchh staar sthayi reh sake, tatha prathi ke man me nayaye ka bharosa kayam reh sake….!!!!

Manish Dubay
kanpur
uttar-pardesh
mkkumar893@gmail.com
(mandoli jail no.14 new-delhi)

Pidit pattrakar ke parijano se sampark 09793318739 par kar sakte hai…!!

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अखबार के प्रबंध संपादक को हथकड़ी लगाना पुलिस वालों को पड़ा महंगा

मुंबई उच्च न्यायालय ने नुकसान भरपाई के लिए चार लाख रुपये मुआवजा देने और पुलिस वालों पर कारवाई का आदेश दिया : मुंबई उच्च न्यायायल ने गुरुवार को एक कड़ा कदम उठाते हुये एक अखबार के प्रबंध संपादक को हथकड़ी लगाने पर ना सिर्फ पुलिस वालों को जमकर फटकार लगायी बल्की चार लाख रुपये का नुकसान भरपाई और २५ हजार रुपये याचिका खर्च के रुप में याचिकाकर्ता को देने और पुलिस वालों पर कार्रवाई का आदेश दिया है।

हफ्ता के लिये धमकाने के इस मामले में समाचार पत्र के प्रबंध संपादक को गिरफ्तार कर उसको हथकड़ी पहनाकर सरेराह ले जाना दमन-दीव पुलिस को महंगा पड़ गया है। पुलिस की इस हरकत पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को संज्ञान में लेते हुये तथा इस कुकृत्य को आरोपी के मूलभूत अधिकारों का हनन मानते हुये मुंबई उच्च न्यायालय ने गुरुवार को प्रबंध संपादक को हुये चार लाख रुपये के नुकसान भरपाई करने तथा पुलिस पर कार्रवाई का आदेश दिया है।

मुंबई उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अभय ओक और न्यायमूर्ति अमजद सय्यद की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता प्रबंध संपादक को हुये नुकसान की भरपाई को बढ़ाने की मांग पर दिवानी न्यायालय में दावा करने का निर्देश दिया। साथ ही याचिका के लिये खर्च स्वरुप अतिरिक्त २५ हजार रुपये देने का आदेश भी दिया। याचिकाकर्ता प्रबंध संपादक ने आरोप लगाया था कि माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अहवेलना करते हुये पुलिस ने ना सिर्फ उसे हथकड़ी लगाया बल्कि सरेराह सड़क पर घुमाया भी। इस प्रबंध संपादक ने आरोप लगाया कि वह जिस समाचार पत्र में काम करता है वह दमन-दीव और गुजरात में सबसे ज्यादा प्रसार वाला अखबार है। वर्ष २००९ में प्रशासन की अवैध कारवाई के बारे में खबर लिखने से नाराज होकर उनके खिलाफ जानबूझ कर ये मामला दर्ज किया गया था। मुंबई उच्च न्यायालय के इस कदम की पत्रकारिता जगत में काफी तारीफ की जा रही है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टीविस्ट
मुंबई
९३२२४११३३५

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एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी

करे कोई, भरे कोई। एक पुरानी कहावत है। एक बात यह भी है कि कई बार आंखों देखा और कानों सुना सच भी , सच नहीं होता। होता तो यह जेल डायरी लिखने की नौबत नहीं आती। लेकिन हमारे जीवन में भी कई बार यह बात और वह कहावत लौट-लौट आती है। एक वाकया याद आता है। एक गांव में एक पंडित जी थे। पूरी तरह विपन्न और दरिद्र। लेकिन नियम क़ानून और शुचिता से कभी डिगते नहीं थे। किसी भी सूरत। लोग बाग़ जब गन्ने के खेत में आग लगा कर कचरा , पत्ता आदि जला देते थे , पंडित जी अपने खेत में ऐसा नहीं करते थे। यह कह कर कि अगर आग लगाएंगे तो जीव हत्या हो जाएगी। पत्तों के साथ बहुत से कीड़े-मकोड़े भी मर जाएंगे। पर्यावरण नष्ट हो जाएगा।

लेकिन पंडित जी के इस सत्य और संवेदना से उन के कुछ पट्टीदार जलते थे। एक बार गांव में एक हत्या हो गई। उस हत्या में पंडित जी को भी साजिशन नामजद कर दिया उन के पट्टीदारों ने। पुलिस आई तफ्तीश में तो पंडित जी बुरी तरह भड़क गए पुलिस वालों पर। जो जो नहीं कहना था , नाराजगी में फुल वॉल्यूम में कहा। पुलिस भी खफा हो गई। उन्हें दबोच ले गई और मुख्य मुल्जिम बना कर जेल भेज दिया। सब जानते थे कि इस हत्या में पंडित जी का एक पैसे का हाथ नहीं। पर उन्हें सज़ा हो गई। जो व्यक्ति गन्ने के खेत में पत्ते भी इस लिए नहीं जलाता था कि जीव हत्या हो जाएगी , कीड़े-मकोड़े जल कर साथ मर जाएंगे। उसी व्यक्ति को हत्या में सज़ा काटनी पड़ी। ऐसा होता है बहुतों के जीवन में। सब जानते हैं कि फला निर्दोष है लेकिन क़ानून तो क़ानून , अंधा सो अंधा। यही उस का धंधा।

तो यहां इस डायरी की नायिका भी निरपराध होते हुए भी एक दुष्चक्र में फंसा दी गई। न सिर्फ़ फंसा दी गई , फंसती ही गई। कोई अपना भरोसे में ले कर जब पीठ में छुरा घोंपता है तो ऐसे ही होता है। इस कदर छुरा घोंपा कि एक निरपराध औरत सी बी आई के फंदे में आ गई।  फ्राड किसी और ने किया , घोटाला किसी और ने किया और मत्थे डाल दिया इस औरत के। इस औरत के पति को भी इस घेरे में ले लिया। शुभ चिंतक बन कर डस लिया।

विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता का शीर्षक है लिफ़ाफ़ा :

पैग़ाम तुम्हारा
और पता उन का
दोनों के बीच
फाड़ा मैं ही जाऊंगा

तो इस डायरी की नायिका लिफ़ाफ़ा बनने को अभिशप्त हो गई। एक निरपराध औरत की जेल डायरी की नायिका का सब से त्रासद पक्ष यही है। मेरी त्रासदी यह है कि इस लिफ़ाफ़ा का डाकिया हूं। डायरी मेरी नहीं है। बस मैं परोस रहा हूं। जैसे कोई डाकिया चिट्ठी बांटता है , ठीक वैसे ही मैं यह डायरी बांट रहा हूं। एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी परोसते हुए उस औरत की यातना , दुःख और संत्रास से गुज़र रहा हूं। उस के छोटे-छोटे सुख भी हैं इस डायरी की सांस में। सांस-सांस में। पति और दो बच्चों की याद में डूबी इस औरत और इस औरत के साथ जेल में सहयात्री स्त्रियों की गाथा को बांचना सिर्फ़ उन के बड़े-बड़े दुःख और छोटे-छोटे सुख को ही बांचना ही नहीं है। एक निर्मम समय को भी बांचना है। सिस्टम की सनक और उस की सांकल को खटखटाते हुए प्रारब्ध को भी बांचना है।

यह दुनिया भी एक जेल है। लेकिन सचमुच की जेल ? और वह भी निरपराध। एक यातना है। यातना शिविर है। मैं ने सब से पहले जेल जीवन से जुड़ी एक किताब पढ़ी थी भारतीय जेलों में पांच साल। जो मेरी टाइलर ने लिखी थी। फाइव इयर्स इन इंडियन जेल। इस का हिंदी अनुवाद आनंद स्वरूप वर्मा ने किया था। मेरी टाइलर अमरीका से भारत घूमने आई थीं। पेशे से पत्रकार थीं। लेकिन अचानक इमरजेंसी लग गई और वह सी आई ए एजेंट होने की शक में गिरफ्तार कर ली गईं। कई सारी जेलों में उन्हें रखा गया। यातना दी गई। इस सब का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दर्ज किया है मेरी टाइलर ने। दूसरी किताब पढ़ी मैं ने जो मोहन लाल भास्कर ने लिखी थी , मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था। पाकिस्तानी जेलों में दी गई यातनाओं को इस निर्ममता से दर्ज किया है मोहनलाल भास्कर ने कि आंखें भर-भर आती हैं। पॉलिन कोलर की ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’  तीसरी किताब है जो मैं ने जेल जीवन पर पढ़ी है। मूल जर्मन में लिखी इस किताब के हिंदी अनुवाद का संपादन भी मैं ने किया है। मैं  हिटलर की दासी थी  नाम से हिंदी में यह प्रकाशित है। हिटलर के समय में जर्मन की जेलों में तरह तरह की यातनाएं और नरक भुगतते हुए  पॉलिन कोलर ने ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ में ऐसे-ऐसे वर्णन दर्ज किए हैं कि कलेजा मुंह को आता है। कई सारे रोमांचक और हैरतंगेज विवरण पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।  पॉलिन कोलर का पति भी जाने किस जेल में है। जाने कितने पुरुषों की बाहों और उन की सेक्स की ज़रूरत पूरी करती , अत्याचार सहती पॉलिन कोलर का जीवन नरक बन जाता है। फिर भी वह हिम्मत नहीं हारती। संघर्ष करते-करते हिटलर की सेवा में रहते हुए भी जेल जीवन से वह न सिर्फ़ भाग लेती है बल्कि अपने पति को भी खोज कर छुड़ा लेती है और देश छोड़ कर भाग लेती है।

कई सारे उपन्यासों में भी मैं ने जेल जीवन पढ़ा है। हार्वर्ड फास्ट की आदि विद्रोही जिस का हिंदी अनुवाद अमृत राय ने किया है उस के विवरण भी पढ़ कर मन हिल जाता है। एलेक्स हेली  की द रूट्स का हिंदी अनुवाद ग़ुलाम नाम से छपा है। इस के भी हिंदी अनुवाद का संपादन एक समय मैं ने किया था। इसे पढ़ कर यहूदियों की गुलामी और उन की कैद  के विवरण जहन्नुम के जीवन से लथपथ हैं। जानवरों की तरह खरीदे और बेचे जाने वाले यहूदी जानवरों की ही तरह गले में पट्टा बांध कर रखे भी जाते हैं। अनगिन अत्याचार जैसे नियमित हैं। लेकिन यह ग़ुलाम अपनी लड़ाई नहीं छोड़ते। निरंतर जारी रखते हैं। मुझे इस उपन्यास का वह एक दृश्य कभी नहीं भूलता। कि  नायक जेल में है। उस की गर्भवती पत्नी उसे जेल में मिलती है और पूछती है कि तुम्हारे होने वाले बच्चे से तुम्हारी ओर से मैं क्या कहूंगी ? वह ख़ुश  हो कर कहता है , सुनो ,  मैं ने अपनी मातृभाषा के बारे में पता किया है। मुझे पता चल गया है कि  मेरी मातृभाषा क्या है ? लो यह सुनो और पैदा होते ही मेरे बेटे के कान में मेरी ओर से मेरी मातृभाषा के यह शब्द कहना। मोहनलाल भास्कर भी विवाह के कुछ महीने बाद ही अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़ कर पाकिस्तान गए हुए हैं। जासूसी के लिए। एक गद्दार की गद्दारी से वह गिरफ़्तार हो जाते हैं। पर पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में रहते हुए उन की चिंता में भी पत्नी और पैदा हो गया बेटा ही समाया रहता है। ‘आई वाज़ हिटलर्स मेड’ की पॉलिन कोलर का भी जेल में रहते हुए पहला और आख़िरी सपना पति और परिवार ही है।

इस डायरी की हमारी नायिका भी जेल में रहते हुए पति और बच्चों की फ़िक्र में ही हैरान और परेशान मिलती है। अपने दुःख और अपनी मुश्किलें भी वह बच्चों और पति की याद में ही जैसे विगलित करती रहती है। सोचिए कि वह जिस डासना जेल में है, उस जेल के पास से ही लखनऊ जाने वाली ट्रेन गुज़रती रहती है। जिस ट्रेन से उस का बेटा गुज़रता है, उस ट्रेन के गुज़रने के शोर में वह अपने बेटे की धड़कन को सहेजती मिलती है। कि बेटा लखनऊ जा रहा है। मेरे बगल से गुज़र रहा है। मां की संवेदना में भीग कर , उस के कलपने में डूब कर उस के मन का यह शोर ट्रेन के शोर से उस की गड़गड़ाहट से अचानक बड़ा हो जाता है, बहुत तेज़ हो जाता है। खो जाती है ट्रेन, उस का शोर, उस की गड़गड़ाहट। 

एक मां की इस आकुलता में डूब जाती हैं डासना जेल की दीवारें। मां-बेटे के इस मिलन को कोई भला किन शब्दों में बांच पाएगा ? बच्चों का कैरियर पति की मुश्किलें उसे मथती रहती हैं। बेटी के कॅरियर और विवाह को ले कर डायरी की इस नायिका की चिंताएं अथाह हैं। वहअपनी चिंताओं को विगलित करने के लिए अपने बच्चों को चिट्ठी लिखती है। चिट्ठी लिखते-लिखते वह जैसे डायरी लिखने लगती है। रोजनामचा लिखने लगती है। अपने आस-पास की दुनिया लिखने लगती है। लिखी थीं कभी पंडित नेहरु ने अपनी बेटी इंदु को जेल से चिट्ठियां। बहुत भावुक चिट्ठियां। महात्मा गांधी भी विभिन्न लोगों को जेल से चिट्ठियां लिखते थे। कमलापति त्रिपाठी की भी जेल से लिखी चिट्ठियां भी मन को बांध-बांध लेती हैं। लेकिन वह बड़े लोग थे। महापुरुष लोग थे। उन की चिंताओं का फलक बड़ा था , उन की लड़ाई बड़ी और व्यापक थी। लेकिन इस डायरी की नायिका एक जन सामान्य स्त्री है। निरपराध है। साजिशन फंसा दी गई है। उस की चिंता में सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने रोजमर्रा के छोटे-छोटे दुःख हैं। पति और बच्चे हैं। उन की चिंता है। दिखने में यह सब बातें बहुत छोटी और सामान्य दिखती हैं , लेकिन जिस पर गुज़रती है , उस के दिल से पूछिए। उस का यह दुःख उसे हिमालय लगता है। हिमालय से भी बड़ा।

और जेल की सहयात्री स्त्रियां? जेल बदल गई है , समय और यातनाएं बदल गई हैं लेकिन स्त्रियों का जीवन नहीं बदला है। जेल से बाहर भी वह कैद ही रहती हैं। कैदी जीवन उन का बाहर भी होता है। पर वह घर परिवार के बीच रह कर इस सच को भूल जाती हैं। तो महिला बैरक की स्त्रियों की कथा , उन की मनोदशा और दुर्दशा भी साझा करती रहती है हमारी डायरी की यह नायिका। जितनी सारी स्त्रियां , उतने सारे दुःख। जैसे दुःख न हो साझा चूल्हा हो। तमाम सारी स्त्रियों का टुकड़ा-टुकड़ा , भारी-भारी दुःख और ज़रा-ज़रा सा सुख , उस का कंट्रास्ट और कोलाज एक डाकिया बन कर , पोस्टमैन बन कर बांट रहा हूं मैं। स्नेहलता स्नेह का एक गीत याद आ रहा है , थोड़ी धूप , तनिक सी छाया , जीवन सारा का सारा। माया गोविंद ने लिखा है , जीना आया जब तलक तो ज़िंदगी फिसल गई। नीरज ने लिखा है , कारवां गुज़र गया , ग़ुबार देखते रहे। हमारी डायरी की यह नायिका भी जेल जीवन में गाती रहती थी और अब बताती रहती है कि यह डायरी लिख कर ही मैं ज़िंदा रह पाई थी जेल में। नहीं ज़िंदा कहां थी , मैं तो मर-मर गई थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की ही एक कविता है झाड़न :

पड़ा रहने दो मुझे
झटको मत
धूल बटोर रखी है
वह भी उड़ जाएगी।

लेकिन इस डायरी ने झाड़न चला दी है। जेल जीवन जी रही औरतों पर पड़ी धूल की मोटी परत उड़ गई है। इस धूल से हो सके तो बचिए। क्यों कि औरतों की दुनिया तो बदल रही है। यह डायरी उसे और बदलेगी। सरला माहेश्वरी की यह कविता ऐसे ही पढ़ी और लिखी जाती रहेंगी :

8150 दिन !

-सरला माहेश्वरी

जेल में
8150 दिन !
23 वर्ष !
प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
बेगुनाह साबित होने की प्रतीक्षा के तेइस वर्ष !
जेल के अंदर
एक बीस वर्ष के छात्र के तैंतालीस वर्ष में बदलने के तेइस वर्ष…!!
एक ज़िंदगी के ज़िंदा लाश में बदलने के तेइस वर्ष…!!!
दो बेगुनाह बेटों की
प्रतीक्षा में रोज़ मरते परिवार के तेइस वर्ष !!!
भाषा, शक्ति, बल, छल के तेइस वर्ष !
बोलने के नहीं
बोलने को थोपने के तेइस वर्ष !
बोलने की ग़ुलामी के तेइस वर्ष !
आज़ादी के पाखंड के तेइस वर्ष !
निर्बल और निर्दोष को
बलि का बकरा बनाये जाने के
सत्ता के सनातन समय के
सनातन सत्य के सनातन तेइस वर्ष !
ओह निसार ! ओह ज़हीर ! ओह सरबजीत !
प्रतीक्षा और प्रतीक्षा !
नहीं छूटती…
ज़िंदगी की प्रतीक्षा !
प्रेम की प्रतीक्षा !!
मुक्ति की प्रतीक्षा !!!
नई सुबह की प्रतीक्षा !!!!
प्रतीक्षा को चाहिये कई ज़िंदगियाँ….!!!!!

– दयानंद पांडेय

[जनवाणी प्रकाशन, दिल्ली से शीघ्र प्रकाश्य ‘एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी’ की भूमिका]

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आज के ही दिन चार साल पहले अपुन हवालात फिर जेल गए थे : यशवंत सिंह

Yashwant Singh : आज ‘जेल दिवस’ है. आज के ही दिन चार साल पहले अपुन हवालात फिर जेल गए थे. मुझे आज इस दिवस पर बधाई दे सकते हैं. इस मौके पर एक संस्मरण अभी लिखा हूं जिसका लिंक दे रहा हूं. जो लोग ‘जानेमन जेल’ पढ चुके हैं, उनसे जरूर चाहूंगा कि वो दो शब्द कहें. जो नहीं पढ़े हैं उन्हें कहूंगा कि एक बार पढ़ो तो, पढ़ कर जेल जाने का मन न करे तो पैसे वापस 🙂

लिंक ये है : यशवंत के लिए आज है ‘जेल दिवस’, जानिए ‘जानेमन जेल’ के आगे पीछे की अनकही कहानी

भड़ास के एडिटर यशवंत के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Sumer Dan सर जी मुझे वो किताब पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ जोधपुर में बुक वल्ड पर भी कई बार गया लेकिन जानेमन जेल ” किताब नहीं मिली

Yashwant Singh इस लिंक पर क्लिक करके मंगाने का तरीका जान सकते हैं… janeman jail book

Shailesh Ji और जो मन कर जाए, तो?

Yashwant Singh तो हो आइए. जेल को पवित्र जगह ही मानिए. कोई दिक्कत हो तो हमें बताइएगा.

Shailesh Ji किसको गरियाने से जल्दी ये मौका मिलेगा? सोचता हूँ, एकबार हो ही आऊँ!

Yashwant Singh जिसके चलते आपकी आत्मा में कोई फांस फंसी नजर आ रही हो और गरियाने से ही निकल जाए तो गरिया दीजिए…

Ravi S Srivastava जानेमन जेल बिल्कुल आपकी तरह है लेखकीय चालाकी उसमे नही है

Yashwant Singh 😀 वाह वाह रवि भाई… दिन बना दिया आपने… बताइए पार्टी कब दूं 🙂

Ravi S Srivastava आप से मुलाकात की इच्छा है, पार्टी उस दिन होगी

Ashok Das बिल्कुल सही कहा रवि जी।

Ankit Sharma शानदार रचना 😉

Harpal Singh Bhatia जानेमन जै जै

Kamal Sharma जेल यात्रा पर बधाई। यह दिन बार बार आए..यह कहें क्‍या भाई। आप भी हर दिन मनाने मैदान में होते हो।

Hero Dubey सर ! क्या बात है ?

Sunil Singh बधाई हो ।

Kamal Kumar Singh न सोना साथ जाएगा न चांदी जायेगी।

Pankaj Kumar “जानेमन जेल” जब नाम ऐसा है सच में जानेमन जेल को पढ़ने में मजा आयेगा।।।

चैतन्य घनश्याम चन्दन जानेमन जेल पढ़कर जेल के अंदर के जीवन को लेकर मन में जो भ्रांतियां थीं, वो सब दूर हो गईं. पहले जेल का नाम सुनते ही डर लगने लगता था, लेकिन किताब पढ़ने के बाद से जेल जाने को हरदम तैयार रहता हूँ. यह बात दीगर है कि इसका मौका अभी तक नहीं मिला. आपने अपने जेल जीवन का इतनी खूबसूरती से बखान किया है, कि किताब एक बार शुरू करने के बाद पूरी खत्म करने के बाद ही रख पाया. ऐसी किताब लिखने के लिए साधुवाद।

अमित कुमार राघव बधाई हो..

Kamlesh Sharma लाल दरवाजा दिवस की शुभकामनाएं..

Shrimant Jainendra जानेमन जेल पढ़ के मुझे भी एक बार जेल जाने का मन करने लगा है |

Amit Singh कट्टन बनाना सिखाने के लिये

Ashutosh Gupta आज ही के दिन मैं पहली बार में जेल में आपसे डा.वीरेश राज शर्मा के कक्ष में मिला था।

Yashwant Singh हां, आप कई पत्रकार साथी आए थे जो डासना कवर करते हैं. आप लोगों की वो मुलाकात मेरे लिए जेल के भीतर टर्निंग प्वाइंट साबित हुई. थैंक्यू भाई.

Harshit Rana Padhi h hmne aapki janeman jail…… Sir… Kese aap waha yoga krte hue …. Is duniya ki buraiyo se door the….

मूल पोस्ट…

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आज है ‘जेल दिवस’, जानिए ‘जानेमन जेल’ के आगे पीछे की अनकही कहानी

आज ‘जेल दिवस’ है. आज के ही दिन वर्ष 2012 में कुछ कारपोरेट और करप्ट संपादकों-मीडिया मालिकों ने मिलकर मुझे पुलिस के जरिए उठवाया, थाने के हवालात में बंद कराया फिर जेल भिजवा दिया. पूरे 68 दिन गाजियाबाद के डासना जेल में रहा. उन दिनों नोएडा यानि गौतमबुद्धनगर का जेल भी डासना ही हुआ करता था. अब नोएडा का अपना खुद का जेल हो गया है जिसके बारे में बताया जा रहा है कि काफी आधुनिक किस्म का है, हालांकि यहां अभी जाना नहीं हो सका है. तो बता रहा था कि आज मेरे लिए जेल दिवस है.

उन दिनों समाचार प्लस चैनल के संचालक उमेश कुमार अपने काफी अच्छे मित्र हुआ करते थे. उमेश जी के बारे में खास बात ये है कि वे जिनके अच्छे मित्र होते हैं, उसे ही मौका मिलने पर नाप देते हैं या उसी के कंधे पर सीढ़ी लगाकर उपर चढ़ने के बाद सीढ़ी समेत उस आदमी को धक्का देकर गिरा कर हाथ धो पोंछ लेते हैं. विनोद कापड़ी तब इंडिया टीवी का संपादक हुआ करता था. इसकी दूसरी पत्नी साक्षी जोशी उर्फ साक्षी कापड़ी भी पत्रकार हुआ करती थी. कापड़ी को भड़ास शुरू होने के कई सालों तक दर्जनों बार रात को फोन कर गरियाया क्योंकि उसके चक्कर में दैनिक जागरण से नौकरी गई थी, और यह मलाल रात में दारू पीने के बाद उभर आया करता था, सो उसे फोन कर गालियां निकलने लगती थीं. ज्यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि भड़ास की शुरुआत के पीछे असल प्रेरणा विनोद कापड़ी जी ही हैं.

तब मैं दैनिक जागरण नोएडा में हुआ करता था और एक रात स्टार न्यूज के तत्कालीन संपादक विनोद कापड़ी से जमकर हुई फोन पर गाली गलौज के बाद जागरण ने कापड़ी के प्रभाव में मुझे पैदल कर दिया. इसी प्रक्रिया में भड़ास की शुरुआत हुई कि पहले जमकर चिरकुट संपादकों हरामी मीडिया मालिकों को गरिया लूं, उसके बाद जाकर गांव पर खेती करूंगा. लेकिन मेरी गाली खत्म हुई तो देखा कि पूरी मीडिया में शोषितों उत्पीड़ितों की गाली भड़ास भरी बसी पड़ी है और इसे निकलने निकालने का कोई मंच नहीं है. सो, भड़ास देखते ही देखते आम मीडियाकर्मियों के दुख सुख का मंच बन गया और मीडिया प्रबंधन के लिए खतरे की भीषण घंटी. इस तरह कापड़ी जी द्वारा मेरे खिलाफ चलाए गए सफल नौकरी छोड़ाऊ अभियान से भड़ास का श्रीगणेश हुआ और गाड़ी चल निकली. यानि नौकरी से आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम बढ़ाने को मजबूर किया माननीय कापड़ी जी ने.

मेरी गालियाों से तंग आकर दूसरी बार वाला सफल जेल भेजाऊ अभियान भी कापड़ी जी के ही नेतृत्व में चलाया गया लेकिन कापड़ी जी के बहाने इसमें भागीदार हो गया ज्यादातर शीर्षस्थ हिंदी मीडिया प्रबंधन. कापड़ी ने रंगदारी मांगने, इनकी पत्नी छेड़ने और कई किस्म के आरोप लगाते हुए एफआईआर क्या दर्ज कराया, मीडिया हाउसों ने निलकर नई नई आई तबकी यूपी की अखिलेश सरकार को मैनेज कर उपर से पुलिस को आदेश दिलवा दिया कि यशवंत नामक खूंखार अपराधी को तुरंत अरेस्ट कर लंबे वक्त के लिए जेल भेजा जाए. सो, पुलिस भी ढूंढ ढूंढ कर धाराएं लगाने लगी और यशवंत एंड भड़ासी गैंग को देश का सबसे खूंखार गैंग टाइप बताते हुए जिंदा या मुर्दा पकड़ने में जुट गई.

उमेश जी की कृपा से इनके आफिस से बाहर निकलते वक्त नोएडा पुलिस की सादी वर्दी में आई टीम ने मुझे अरेस्ट कर लिया. हालांकि उमेश ने दिखावटी एक्शन, भागादौड़ी और मदद आदि के नाटक भरपूर किए लेकिन यह राज बाद में खुल ही गया कि असल मुखबिरी किसी और ने नहीं बल्कि उमेश ने की थी. भड़ास के साथी और तत्कालीन संपादक अनिल सिंह से लेकर ढेर सारे लोगों ने उमेश की कार्यशैली और हरकतों को वॉच करते हुए बाद में इसकी पुष्टि की. जिस दोपहर मुझे उमेश के आफिस से अरेस्ट किया गया तब वहां उमेश और नोएडा पुलिस की फिक्सिंग वाली झड़प दिखी. उसी के बाद उमेश अति सक्रिय हो गया.

उमेश ने पहले तो घर वालों को गफलत में रखा, सच नहीं बताया कि मैं अरेस्ट हो गया. घरवालों को पता ही तब चला जब अखबार में खूंखार टाइप खबर छप गई और उन लोगों ने पढ़ लिया. उमेश आज के ही दिन 2012 में भड़ास के तत्कालीन संपादक अनिल सिंह को डराने भागे रहने वाली बातें कहने लगा. खुद की लोकेशन के बारे में गलत जानकारी दूसरों को देता रहा. फोन करने वालों को इधर-उधर की बातें बताते हुए इस ‘गंभीर’ मामले में चुप रहने या तटस्थ हो जाने की तरफ इशारा करने लगा. कुल मिलाकर उमेश का बेहद संदेहास्पद और मित्र विरोधी रवैया सामने आया. जेल जाने के बाद वह जेल में भी मिलने कुछ दिनों तक आता रहा और उसके बाद फाइनली आना, हाल लेना बंद कर दिया. वह अपने हिसाब से यह स्थापित कर चुका था कि यशवंत के लिए मित्रता में उसने बहुत कुछ कर दिया है. सोचिए, जो दोस्ती को सिर्फ पैसे लेने देने से तौलता हो वह शख्स कैसा होगा? मुझे अंदर बाहर का सारा फीडबैक मिलता रहा लेकिन मैंने छोटी छोटी चीजों बातों पर ध्यान नहीं देने का फैसला किया और उस पर अडिग रहा, बहुत दिनों तक.

बुरा तब लगने लगा, जेल यात्रा के काफी बाद, जब उमेश वैसे तो यात्राएं मीटिंग बैठकें करता रहता दिल्ली मुंबई लखनऊ की ओर लेकिन जब मैं फोन करूं तो अपनी पत्नी से कहलवाता कि ”भइया, वो बहुत बीमार हैं, फोन तक नहीं उठा पा रहे हैं”. बड़े बनने का उसे ऐसा दौरा पड़ा कि हम जैसे सामान्य लोगों का फोन उसके लिए गैर-जरूरी हो गया. आज दर्जनों सिक्योरिटी गार्डों से घिरा भाजपा का दुलारा उमेश कुमार असल में कितना बहादुर और कितना यारबाज है, इसे कोई ठीक से जानता है तो वो मैं हूं. जब निशंक उत्तराखंड के सीएम थे और इस पर दर्जनों मुकदमें लादे थे तो इसके साथ कोई न खड़ा था, सिवाय हम जैसे दो चार मित्रों के.

तब दिन रात उमेश पुलिस से बचता भागता रहता. देश से लेकर विदेश तक भागा दौड़ा. एक बार अपने नोएडा के घर पर घिर गया तो रात दस ग्यारह बजे हम लोगों ने जाकर उसे रेस्क्यू किया और पुलिस से बचा पाए. दर्जनों बार ऐलानियां लिख कर खुल कर उमेश के साथ खड़ा हुआ और पूरी की पूरी उत्तराखंड की स्टेट मशीनरी की निगाहों में मैं भी खटकने लगा. उत्तराखंड सरकार की तरफ से कुछ लोगों ने पैसे विज्ञापन के आफर दिए, उमेश का साथ छोड़ने के लिए लेकिन इसे ऐलानिया मैंने ठुकरा दिया और सब चीजों के उपर दोस्ती को रखे रहा. अगर पैसा प्रमुख होता मेरे लिए तो आज भड़ास न होता, कहीं मैं भी न्यूज एडिटर या एडिटर टाइप की नौकरी कर रहा होता या फिर उत्तराखंड सरकार के कुछ अफसरों का आफर स्वीकार करके उमेश कुमार का साथ उसी दौर में छोड़ गया होता. 

पर उमेश को अब भी अपने पैसे की इतनी गर्मी है कि वह तुरंत हर किसी को पैसे से तौलने लगता है कि उसने इतना दिया, तब दिया, अब दिया, बहुत दिया टाइप बोल के. उसे ये नहीं पता कि जो कंपनी टू कंपनी किसी एग्रीमेंट के तहत पेमेंट होता है, वह एहसान दान या खैरात नहीं होता बल्कि हक होता है. जरूरत पड़ने पर उधार लेना और उसे समय से लौटा देना कोई पाप नहीं. लेकिन धन की आंखों से सब कुछ को देखने वाला उमेश कुमार असल में एक ऐसे असाध्य ‘रोग’ से पीड़ित है जिसका कोई इलाज नहीं. यह है अतिशय महत्वाकांक्षा का रोग और हर किसी को अपना चेला बना लेने बता देने का रोग. जो लोग दोस्ती नहीं करना जानते वो या तो किसी के चेला बन जाते हैं या फिर दूसरों को चेला बनाने की फिराक में रहते हैं. बड़े लोगों के आगे बिछ बिछ जाना और सामान्य लोगों को गालियां देना, पैसे से तौलने की बात करना निकृष्ट मानसिकता का परिचायक होने के साथ साथ एक किस्म का मनोविकार भी है. झूठ बोलना और बड़े बड़े दावे करने का रोग तो जैसे उमेश के लिए पैदाइशी फितरत हो. खैर, मैं इस बात का कतई बुरा नहीं मानता कि आप मेरे साथ क्या सलूक करते हैं, मेरे बारे में क्या सोचते हैं, मेरे लिए कैसी भावनाएं रखते हैं क्योंकि अगर प्रकृति नियति ने मेरा बुरा कतई न होने देने का इरादा कर रखा है तो मनुष्यों के सोचे किए क्या होता है. और, कई बार ऐसा भी हो जाता है कि आप किसी का बुरा करने जाओ, लेकिन बदले में उसका भला हो जाए. 

कापड़ी और उमेश पहले से ही अच्छे मित्र थे. बाद में इनकी यारी की जुगलबंदी में ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ नामक फिल्म बनी जो बुरी तरह फ्लाप हो गई. आज के दिन 2012 में सुबह सुबह कई लोगों के फोन मेरे पास आए जो मेरे घर का पूरा पता मांग रहे थे. इनमें एक महिला पत्रकार भी थीं. इनमें से ज्यादातर को नहीं पता था कि मेरा पता उनसे किस मकसद से मांगा मंगवाया जा रहा है. मेरा शुरू से नियम है कि मैं घर का पता जल्द किसी को नहीं देता क्योंकि मेरा मानना है कि घर में आफिस को और आफिस में घर को नहीं मिक्स करना चाहिए. अभी पिछले दिनों ही आजतक चैनल से किसी का फोन आया था जो मेरे घर का पता मांग रहे थे, ‘गिफ्ट’ भेजने के लिए. मैंने उनसे हंसते हुए कहा कि गुरु, लीगल नोटिस या पुलिस भिजवाना होगा तो जान लो, लीगल नोटिस मेरे मेल आईडी पर भेज दो और पुलिस को कह दो कि मेरे मोबाइल नंबर 9999330099 की लोकेशन ट्रेस कर ले, मैं जहां बैठा हूं इस वक्त वहां अगले 48 घंटे तक बैठा रहूंगा. वो सज्जन लगे हंसने.

बाद में बताया कि लीगल नोटिस भिजवाने के लिए ही आफिस ने मांगा था. हालांकि वो लीगल नोटिस आजतक से आजतक नहीं आई, शायद केवल डराने और डरा कर खबर हटवाने की कवायद रही होगी. लेकिन यह सच है कि महीने में दस पांच लीगल नोटिस देश के किसी न किसी कोने से आ ही जाते हैं. और, यह सब लीगल नोटिस, पुलिस, थाना, कचहरी, जेल आदि के बारे में मैं शुरू से ही सचेत था कि ये सब होगा क्योंकि भड़ास4मीडिया के जरिए जो काम हम लोग कर रहे थे, वह पहले कभी नहीं हुआ था. मीडिया को बीट मानकर उसके खिलाफ लगातार लिखना, एक्सपोज करना मीडिया मठाधीशों को कतई बर्दाश्त नहीं था क्योंकि अब तक वो दुनिया के बारे में लिखते थे और अपने पैरों में सबको झुकाते थे लेकिन एक भड़ास4मीडिया आ गया जो उनके खिलाफ न सिर्फ लगातार लिख रहा है बल्कि किसी किस्म धमकी, नोटिस, पुलिस से डर नहीं रहा है.

हिंदुस्तान टाइम्स द्वारा 20 करोड़ रुपये का मानहानि का मुकदमा भड़ास पर पहला मुकदमा था जो अब भी चल रहा है. यह मुकदमा हिंदुस्तान अखबार से दर्जनों लोगों की छंटनी किए जाने के बाद मृणाल पांडेय एंड प्रमोद जोशी गैंग ने कराया था. हालांकि नियति का खेल देखिए कि जिसने जिसने भड़ास4मीडिया का बुरा चाहा, वह ही एक एक कर निपटते चले गए. इन दोनों की हिंदुस्तान अखबार से शोभना भरतिया ने छुट्टी कर दी. लेकिन मुकदमा एचटी मीडिया लिमिटेड की तरफ से था, इसलिए वो जारी है और हर तारीख पर एचटी मीडिया के बड़े बड़े वकील लंबी चौड़ी फीस कंपनी से वसूल रहे हैं. भड़ास की तरफ से जो वकील साब उमेश शर्मा जी हैं, वो फ्री में एचटी मीडिया से भिड़े हुए हैं और उनका दावा है कि हम लोग इन्हें न सिर्फ हराएंगे बल्कि इनके खिलाफ मानहानि और जुर्माने का दावा करेंगे.

जब डासना जेल गया तो जैसे सारे मीडिया मालिकों और पीड़ित संपादकों को मन मांगी मुराद मिल गई. जागरण वाला संजय गुप्ता अपने तत्कालीन चेले निशिकांत ठाकुर के माध्यम से एक अन्य फर्जी मुकदमा मेरे और मेरे संपादक अनिल पर दर्ज करवा दिया. आलोक मेहता टाइप चिरकुट संपादक अपने नेशनल दुनिया अखबार में पहले पन्ने पर फोटो समेत पांच पांच कालम खबर छापने लगा. दैनिक जागरण ने गिरफ्तारी के बाद की मेरी तस्वीर और मेरी ‘करतूत’ का वर्णन बढ़ा चढ़ा कर आल एडिशन किया जिससे मेरे गांव तक में मेरे बारे में कहानी पहुंच गई कि अब यशवंत को ऐसा वैसा मत समझो, अब ये हो गया है ‘बड़ी’ काम की चीज. शशि शेखर की वर्षों पुरानी दबी कुंठा इच्छा छलछला के बाहर निकल आई और हिंदुस्तान अखबार में दबाकर छापने लगे मेरे और भड़ास के खिलाफ खबर. ऐसे ही दर्जनों मालिकों संपादकों पत्रकारों ने, दिल्ली से लेकर मुंबई तक, उन दिनों बदला लेने, खुन्नस निकालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. तो जो लोग मेरे बारे में नहीं जानते थे, भड़ास के बारे में नहीं जानते थे, उन तक इन मीडिया वालों ने मेरा व भड़ास का परिचय पहुंचा दिया. मैंने मन ही मन कहा- आइ लाइक इट 🙂

खैर, बात कर रहे थे हम लोग आज जेल दिवस की. तो, पुलिस सुबह सुबह मेरे पुराने मयूर विहार फेज थ्री दिल्ली वाले किराए के घर जाकर छापा मार चुकी थी लेकिन मैं काफी समय से वहां से छोड़कर मयूर विहार फेज टू में सपरिवार रहने लगा था. उसी दरम्यान उमेश कुमार से विनोद कापड़ी ने मेरे घर के बारे में पता पूछा होगा और उमेश ने बताया होगा कि यशवंत तो मेरे यहां दिन में बारह बजे मिलने आने वाला है, पहले से ही मीटिंग फिक्स है. बस, फिर क्या था. पुलिस ने पूरी योजना बना ली. यह भी सच है कि अगर मुझे पता होता कि पुलिस मुझे खोज रही है तो मैं तुरंत थाने पहुंच जाता क्योंकि मैं ऐसे क्षणों का इंतजार करता रहता हूं जब कुछ नया थोड़ा अलग-सा हो जीवन में. अफसोस सिर्फ ये हुआ कि मेरे बाद मेरे मित्र और तत्कालीन भड़ास संपादक अनिल सिंह को भी विनोद कापड़ी एंड गैंग ने जेल भिजवा दिया. असल में जेल से बाहर अनिल ही भड़ास संचालित करने से लेकर कोर्ट मुकदमे जमानत आदि की भागादौड़ी कर रहे थे. कापड़ी एंड गैंग को यह बात नागवार गुजरी कि आखिर भड़ास चल कैसे रहा है और ये अनिल सिंह कौन है जो यशवंत की जमानत के लिए इतनी भागादौड़ी कर रहा है. एक रोज नोएडा कोर्ट से बाहर निकलते हुए अनिल को भी पुलिस वाले उठा ले गए और जेल भेज दिया. एक से बढ़कर हुए दो. जेल में अनिल के आने के बाद जेल में रौनक बढ़ गई. हम लोग मिलते तो खूब बतियाते. शुरुआती कुछ दिनों बाद जेल में अनिल को भी मजा आने लगा. अनिल ने में कहा कि भइया बाहर बहुत काम और तनाव था, यहां तो बड़ा सुकून है.

खैर, अपन तो पूरे ताव से हवालात में रहे. पूरी मस्ती से जेल काटी. नतीजा ये हुआ कि एक किताब ‘जानेमन जेल’ नाम की पैदा हुई. जेल जीवन का मेरे सार ये रहा कि अगर बाहर यानि जेल से बाहर आपका बहुत कुछ नष्ट नहीं हो रहा है तो जेल एक अदभुत जगह है. अगर आप अहंकार के रोग से पीड़ित नहीं हैं तो जेल एक सह जीवन का अदभुत संसार है. अक्सर ऐसा वहां लगता रहा कि सबसे मुक्त आदमी तो मैं हूं, असल जेल तो बाहर है. मुझे जेल में न खाने की चिंता करनी थी, न दवा की, न जिम की, न किताब की. सब कुछ मुफ्त में उपलब्ध था. किसिम किसिम के लोग और उनकी जिंदगियां, उनकी कहानियां कभी उबने नहीं दिया करतीं. जेल में मुझे एक से एक मित्र मिले. अभी कुछ रोज पहले ही जेल में मित्र बने एक शख्स ने फोन किया.  राणा नामक इस युवक ने फोन कर भाव विह्वल होकर बताया- ”भइया, आपने जेल से छूटने के बाद पतंजलि वाला जो च्यवनप्राश का डिब्बा और पांच सौ रुपये दिए, वह कभी न भूल पाउंगा. ऐसा भाव और व्यवहार आजतक नहीं देखा.” असल में जेल में बंद ज्यादातर लोगों के जीवन में प्रेम का बड़ा अभाव होता है. उन्हें कोई प्रेम नहीं करता या फिर उन्होंने ऐसी हरकत कर रखी है कि कोई उनसे जेल में मिलने तक नहीं आता या फिर इतनी दूर से दिल्ली नोएडा आए और जेल पहुंच गए कि कोई उनके गरीब घर वाला उनसे मिलने आ पाने की आर्थिक तंगी के कारण हिम्मत नहीं जुटा पाता. ऐसे में अगर कोई कुछ ही दिनों पहले परिचित बना हुआ शख्स जेल में न सिर्फ मिलने आ जाए बल्कि खाने पीने का सामान और रुपया आदि दे जाए तो भाव विह्वल होना लाजमी है. हालांकि मैंने ये सब कई साथियों के साथ इसलिए नहीं किया कि वो मुझे महान मानेंगे. सिर्फ इसलिए किया क्योंकि जेल वाले कहते थे कि जो छूट जाता है, फिर पलट कर मिलने नहीं आता. इसलिए छूटने के बाद कई महीनों तक जेल के साथियों से मिलने जाता रहा और दर्जनों गरीब कैदियों के आर्थिक दंड आदि भर-भरवा कर उन्हें छुड़वाया.

जेल दिवस के मौके पर वे ढेर सारी साथी याद आ रहे हैं जिनने मेरे रंगदारी मांगने, छेड़छाड़ करने आदि के संगीन धाराओं के बावजूद मेरे में भरोसा रखा और मेरा सपोर्ट किया. धरना प्रदर्शन तक जंतर मंतर पर किया. हवालात से लेकर जेल तक में मिलने आए. आप सभी साथियों के संबल और सपोर्ट के कारण ही कठिन से कठिन मुश्किल वक्त भी हंसते खेलते कट जाता है. जेल में जब था तो एक रोज पता चला कि बाहर के सारे बड़े बड़े चोर संपादक जेल के अफसरों को फोन करके सिखा रहे थे कि यशवंत को जेल में इतना टार्चर करो कि यह पत्रकारिता भूल जाए और बाहर निकल कर भड़ास नामक दुकान बंद करके गुमनामी में चला जाए. पर जेल के कुछ सरोकारी अफसरों ने इन संदेशों से यह निहितार्थ निकाला कि यशवंत वाकई कुछ अच्छा काम कर रहा था जेल के बाहर जो इतने महान महान लोगों की फटी पड़ी है और फोन कर रहे हैं, खासकर मीडिया इंडस्ट्री के दिग्गज लोग.

जेल से बाहर इन दिग्गजों के यहां मैसेज यही भिजवाया जाता रहा कि यशवंत जी की जमकर ‘सेवा’ हो रही है, खूब रोटी खाना पकवाया जा रहा है, खूब तलवा सिंकाई हो रही है. लेकिन सच ये है कि जेल के कुछ कर्तव्यनिष्ठ अफसरों ने मुझे जेल में बेहद सामान्य जीवन जीने देने और जेल मैनुअल के हिसाब से सकारात्मक जीवनचर्या रखने की छूट दी जिसके कारण ही ‘जानेमन जेल’ किताब लिखी जा सकी. ये सच है, जेल का जीवन सबके लिए सुखद नहीं होता. कई बार बाहरी दबावों के चलते जेल प्रशासन जेल के किसी कैदी बंदी के साथ काफी गलत व्यवहार भी कर गुजरता है. ऐसे अनेकों उदाहरण दूसरे कई जेलों के पता चले हैं. लेकिन मेरे साथ डासना जेल में जो हुआ वह अविस्मरणीय रहा. इसीलिए वह ‘जानेमन जेल’ के नाम से पूरे मीडिया जगत में स्थापित है. ‘जानेमन जेल’ मेरे जेल जीवन का पहला पार्ट है जिसमें जेल के भीतर के मेरे अनुभवों की दुनिया का चित्रण है. जानेमन जेल का दूसरा पार्ट जल्द ही आएगा जिसमें जेल के बाहर भड़ास के शुरू होने से लेकर थाने जाने तक की यात्रा का वर्णन होगा.

आज 30 जून जेल दिवस की याद यूं आई कि 30 जून 2012 की एक मयंक सक्सेना की पोस्ट मेरे सामने रख दी फेसबुक ने, मेमोरी शीर्षक से. मयंक की यह पोस्ट पहली बार पढ़ा. यह शायद फेसबुक पर मेरे हवालात होने या जेल जाने से संबंधित उस रोज की पहली पोस्ट रही होगी. नीचे आखिर में उस पोस्ट के कंटेंट और उस पर आए कमेंट को छोड़ जा रहा हूं ताकि आप भी पढ़ें. आखिर में, ‘जेल दिवस’ पर डासना जेल, इस जेल के अधिकारियों, जेल के साथियों को याद करने के साथ-साथ आप सबको प्रणाम करता हूं. साथ ही नोएडा जेल, तिहाड़ जेल समेत देश के बाकी जेलों को एडवांस में नमन करता हूं जहां का दाना-पानी लिखा होगा.

आई लाइक इट 🙂

चीयर्स

यशवंत सिंह
भूतपूर्व बंदी
डासना जेल (गाजियाबाद)
संपादक, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम
yashwant@bhadas4media.com


नीचे वो स्टेटस है जिसे मयंक सक्सेना ने 30 June 2012 को एफबी पर पोस्ट किया था….

Mayank Saxena
30 June 2012
मित्र Yashwant Singh के बारे में कुछ चिंताजनक खबर मिल रही है…क्या कोई पुष्टि करेगा…और इस बारे में ज़्यादा जानकारी दे पाएगा?

Pradeep Singh Kaun si khabar?

Harishankar Shahi क्या हुआ भैया कुछ बताइए तो

Mayank Saxena प्रदीप जी रुकिए पहले जो जानता हो वो पुष्टि कर दे…फिर ही लिखूंगा नहीं तो बेवजह अफवाह बन जाएगी…

अमित राजवंत Abhi tak to kuch pta nahi sir .

Mayank Saxena Udit Sharma Vashisatha क्या आप पढ़ नहीं पाए कि क्या लिखा है…चिंताजनक खबर को आप लाइक कर रहे हैं…हद है…शर्मनाक

Mayank Saxena अभी नोएडा सेक्टर 49 थाने में Yashwant Singh से मिलकर आ रहा हूं….लॉकअप में बैठे गाना गा रहे थे…खाकी पहने भाई लोगों ने कहा कि सुबह आएं…बाकी दूर से ही चिल्ला कर बात हुई तो बताया कि एक टीवी चैनल के सम्पादक के इशारे पर उनको थाने में बिठाया गया है…भाई अपना मस्त है…चलिए भाई ने हम सबके लिए बहुत लड़ाई लड़ी…अब भाई यशवंत के लिए लड़ने का वक्त आ गया है…ये लड़ाई पूरी वैकल्पिक मीडिया की है…साथ आएं…डीटेल्स आगे…और कल भारी संख्या में सुबह से ही नोएडा सेक्टर 49 थाने पहुंचना शुरु करें…इनकी ऐसी की तैसी…

Niraj Kumar KIS SAMPADAK KI KARTOOT HAI?

Yashraj Kumar Agar aisa hai to sabhi ko milkar Yashwant bhai kaa saath denaa chahiye! UP Police Criminals per to haath daalti nahi hai kabhi, ab Patrkaaron ko giraftaar kar rahi hai! A BIG SHAME for UP police!

Sharad Yadav it’s shameless !!!!!!!

Er Udit Sharma Vashisatha chamma….. Mayank Saxena

Saroj Arora can you brief about yashwant?

Mayank Saxena यशवंत सिंह पर दायर किये गए मामलों में ज़्यादातर धाराएं बिना वजह लगाई गयी हैं…ये जानते हुए भी एक मुद्दे पर मैं अपना बिलकुल बेबाक स्टैंड आप सब के सामने रखना चाहता हूँ कि अगर यशवंत सिंह ने वाकई किसी महिला को अश्लील एस एम् एस भेजे हैं….और परेशान किया है, जैसा कि तहरीर में कहा गया है, तो निस्संदेह ये निंदनीय है…और उनके ऊपर इस धारा में केस होना चाहिए पर क्या तुक है यशवंत पर ३८६ और ७ सी एल ऐ लगाने का …ऐसा कर के वादी कहीं न कहीं अपनी नीयत और मंशा के ऊपर संदेह की उंगली उठवा रहा …..

Yashwant Singh आज यानि 30 जून 2016 को यह पोस्ट मेरा नाम टैग होने के कारण एफबी मुझे पुरानी मेमोरी में दिखा रहा है. और, इसी बहाने पहली बार देख रहा हूं कि मेरे थाने जेल जाने पर एफबी पर सबसे पहले क्या लिखा गया. 🙂 थैंक्यू मयंक भाई.


यशवंत की जेल यात्रा और जानेमन जेल के बारे में ज्यादा जानने के लिए इन्हें भी पढ़ सकते हैं….

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यशवंत ने 68 दिन में जेल को बना लिया जानेमन

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जेल को भी जानेमन बना लेने का यह हुनर कोई आपसे सीखे

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‘जानेमन जेल’ से मुझे कैदी और बंदी के बीच का फर्क समझ आया

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कॉरपोरेट घराने यशवंत को जेल तो भिजवा सकते हैं लेकिन ‘जानेमन जेल’ लिखने से कैसे रोकेंगे

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‘भड़ासजी’, अच्छा लिखा आपने, किताब का नाम ‘रोमांस विथ जेल’ भी रखा जा सकता था

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‘जानेमन जेल’ : चंदन श्रीवास्तव की टिप्पणी

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‘जानेमन जेल’ : मुकुंद हरि शुक्ला की समीक्षा

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मन में समाई जेलों की खौफनाक तस्वीर ‘जानेमन जेल’ पढ कर कुछ कम हुई

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कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

महिला बंदी ने एटा के जेल अधीक्षक अनूप सिंह पर वसूली और छेड़छाड़ समेत कई गंभीर आरोप लगाए (देखें वीडियो)

यूपी के एटा जिला जेल से जमानत पर बाहर आकर एक महिला ने एटा जेल अधीक्षक अनूप कुमार पर जेल में अवैध वसूली, छेड़छाड करने और शारीरिक सम्बन्ध बनाने का प्रयास करने का सनसनीखेज आरोप लगाया है। उसने अपनी शिकायत मुख्यमंत्री, महिला आयोग, डीजी जेल, मानवाधिकार आयोग, डीएम, एसएसपी से की है। डीआई जी जेल आगरा और महिला आयोग की टीम ने एटा जेल पहुंचकर मामले की जांच शुरू कर दी है। 

एटा जेल में एक मामले में निरुद्ध रही और अब जमानत पर बाहर आयी एक महिला बंदी ने जेल के खेल की जो हैरतअंगेज दास्ता बताई उससे हर कोई हैरान है। इस महिला का आरोप है कि वो १३ अप्रैल २०१६ को एक मामले में न्यायालय में हाजिर होकर एटा जिला कारागार गयीं जहां उससे जेल की महिला बंदी रक्षक पुष्पारानी ने ६०० रुपये की अवैध वसूली की मांग की। उसने कहा कि यह वसूली जेल अधीक्षक अनूप सिंह द्वारा सभी से कराइ जाती है। इस महिला के पास जेल में रुपये न होने के कारण ये ६०० रुपये नहीं दे सकी। इस महिला का आरोप है कि जेल अधीक्षक द्वारा उसे खुद अपने कार्यालय में तलब करके पैसा मंगाने के लिए दबाव दिया गया। हद तो तब हो गयी जब इस महिला बंदी रक्षक द्वारा अवैध वसूली के ६०० रुपये न देने पर जेल की महिला बंदी रक्षक पुष्पा रानी ने इसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शुरू कर दिया और कहा कि आप एक बार जेल अधीक्षक अनूप सिंह से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर लो तो यह रुपया आपको नहीं देना पड़ेगा।

इस महिला बंदी का आरोप है कि इसके बाद जेल अधीक्षक अनूप सिंह ने इसे अपने ऑफिस में बुलाकर अपनी इच्छापूर्ति हेतु दबाव डाला और इच्छापूर्ति की बात न मानने पर प्रार्थिनी की जेल की अन्य बंदियों से पिटाई करवाने की धमकी दी। इस बात की शिकायत जब पीड़िता ने जेलर पीके सिंह से की तो उन्होंने भी जेल अधीक्षक के दबाव में आकर चुप्पी साध ली। इस महिला का आरोप है कि २ मई को जेल अधीक्षक अनूप सिंह ने जेल की महिला बंदी रक्षक पुष्पारानी से जेल कार्यालय में बुलवाकर बदनीयती से दबोच लिया। पीड़िता द्वारा चीखने व विरोध करने पर महिला बंदी रक्षक और जेल अधीक्षक द्वारा पीड़िता की बेरहमी से मारपीट की गयी जिससे पीड़िता के कपडे फट गए और वह अर्धनग्न हो गयी।

पीड़िता ने इस घटना को जेल के अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को बताया परन्तु जेल अधीक्षक के दबाव के कारण पीड़िता की फ़रियाद किसी ने भी नहीं सुनी। पीड़िता का आरोप है कि एटा जेल में प्रत्येक महिला बंदी के साथ इस प्रकार का आर्थिक और शारीरिक शोषण किया जाता है। पीड़िता जब ९ मई को जेल से रिहा होकर बाहर आयी तब उसने महिला आयोग, मुख्यमंत्री, मानवाधिकार आयोग, एटा के जिला अधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, डीजी जेल से शिकायत की जिस पर डीआई जी जेल और महिला आयोग की टीम ने जेल में आकर मामले की जांच शुरू कर दी है। 

पीड़ित महिला ने बताया कि अब जेल अधीक्षक अनूप सिंह के गुंडे उसे अनूप सिंह से समझौता करने का दबाव बन रहे हैं और धमकी दे रहे हैं कि यदि तुमने फैसला नहीं किया तो तुम्हें जान से मरवा देंगे और मुक़दमे लगवा देंगे। पीड़ित महिला को इन गुंडों ने दो दिन पूर्व घेरा भी था परन्तु टॉयलेट के बहाने किसी तरह से वो अपनी जान बचा कर भाग आयी। उसने मुख्य्मंत्री से अपनी सुरक्षा किये जाने और जेल अधीक्षक अनूप सिंह को सस्पेंड कर उसके खिलाफ जांच करवाकर कार्यवाही करने की अपील की है।

इस पीड़ित महिला के अतिरिक्त तीन अन्य महिला बंदी रही महिलाओ प्रेमवती, उषा रानी और शहनाज ने भी जेल में महिला बंदियों से जेल अधीक्षक अनूप सिंह द्वारा जबरन ६०० रुपये अवैध वसूल किए जाने की शिकायत एटा के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, महानिदेशक कारागार उत्तर प्रदेश और महिला आयोग से की है जिसकी जांच की जा रही है। इस पूरे मामले में जब एटा के जिला अधिकारी अजय यादव और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय शंकर राय से बात करने की कोशिश की गयी तो इन लोगों ने मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करते हुए कैमरे पर कुछ भी बोलने से साफ़ इनकार कर दिया। इस मामले में जब एटा जेल के अधीक्षक अनूप सिंह से बात की गयी तो उन्होंने सारे आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। 

इस प्रकरण से संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://www.youtube.com/watch?v=csoYUYTai7Q

एटा से धनंजय की रिपोर्ट.

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जेलों के भीतर किस किस्म का भ्रष्टाचार होता है, जानिए इस पत्र से

Dear Mr. Director general Ajeet Singh ji

Rajasthan prisons

jaipur

Subject : input media reports about various irregularities and corruption at Bikaner central jail

Dear sir

We have strong media inputs and reports with evidences etc concerning with below mentioned points. .. ..

३ मार्च को आप (डीजी जेल) वहां बीकानेर पहुंचे ..जेल देखा भी होगा… वहां की वस्तुस्थिति आप की जानकारी के लिये कुछ इस तरह से है… गौर फरमाया जाये व जांच कराई जावे…

जेल में भ्रष्टाचार :-

लंगर का ठेका किसी बंदी ओम चौटाला को ७००००/- मासिक में अघोषित उगाही. ये चाय सब्जी मसाले इत्यादि अन्य बंदियों को बेचते हैं.

कैंटीन का मासिक उगाही ठेका ७००००/- जहां बाजार मूल्य से ज्यादा दर पर सामान बिकता है. मसलन हर चीज २०-५०% अधिक दर पर जिसे बंदी मजबूरन खरीदता है जैसे दूध ३६/- की जगह ४२/- चीनी ३४/- की जगह ४५/-

हास्पिटल का मासिक उगाही ठेका ५००००/- जहां सरकारी दूध चीनी फल अंडे इत्यादि बंदियों को बेची जाती है, मसलन १००/- में मात्र ३ अंडे. 

इसी तरह एक बंदी अमन जाट को ५००००/- मासिक में एक सेपरेट बैरक दी हुई है, वार्ड नं एक में, जहां कोई जेल अधिकारी नहीं जाता, शायद आज आप भी नहीं गये होंगे.. वीआईपी बैरक है ये.

इसी तरह जेल में चरस गांजा लाने बेचने की भी काफी सुविधा है. कई डीलर हैं जेल में, जिनका माल जेल अफसर लाते हैं व बिकता है. लगभग ५ लाख मासिक का धंधा है.

नशीली दवा.. नींद वाली… इनकी बिक्री का ठेका एक बंदी (कैमिस्ट) का है लगभग ५ लाख मासिक.

बाकी सिपाहियों का २००-५००/- में बंदियों का छुटपुट काम करते रहना.. मदद करना आम बात है.. अमूमन एक सिपाही डेली ५००-१०००/- कमाता ही है.

अब आईये जेल में परची बनवाने के खेल पर…अन्य शहर में चालान पेशी पर जाने का शुल्क..बैरक बदलने का शुल्क इत्यादि भी है.

डीजी महोदय से निवेदन है कि उक्त जांच करें. वर्तमान जेल अफसर कैलाश त्रिवेदी, पूनिया व पारस की जुगलबंदी करीबन ६-७ लाख प्रतिमाह की है.. हमारे विश्ववस्त सूत्र हिसाबनुसार… बिना बंदियों को तंग परेशान किये जांच करें. सत्य सामने आयेगा.

अन्य कई बाते हैं.. क्रिकेट बालीबाल खेलने की परची.. अखबार १२०/- मासिक में खरीदो..

उपरोक्त सभी खबर पुष्टि करने के बाद ही आपको लिखी गई हैं आवश्यक कार्यवाही जांच हेतु.. एक जागरूक पत्रकार मीडियापर्सन होने के नाते जो हम कर सकते हैं खबर लिखना भेजना वो अपना कर्तव्य पूरा किया, बिना किसी राग द्वेष भेदभाव किये.. Now ball is in your court.

Regards
Naveen Kumar
Editor
Indiamirrors news
Delhi

navneetc2010@gmail.com

CC :- home ministry new delhi & central jail Bikaner

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भारत के इतने सारे मीडिया हाउसों के मालिक जेल में! पढ़िए पूरी लिस्ट और इनकी पूरी कहानी

आजादी के बाद यह पहला मौका है, जब इतनी बड़ी संख्या में ‘मीडिया’ के मालिक जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे हैं। सहारा टीवी समूह के मालिक सुब्रत रॉय सहारा जेल में हैं और जमानत की राशि के इंतजाम में लगे है। लगभग दो साल में वे जमानत की राशि इकट्ठा नहीं कर पाए। दो लाख करोड़ के साम्राज्य का मालिक होने का दंभ भरने वाले सुब्रत रॉय दस हजार करोड़ नहीं जुटा पा रहे हैं। इसी तरह पी-7 चैनल और पर्ल ग्रुप के मालिक निर्मल सिंह भंगू भी जेल में हैं। खबर भारती चैनल के मालिक बघेल सांई प्रसाद समूह के शशांक प्रभाकर, महुआ ग्रुप के हिन्दी, भोजपुरी, बांग्ला भाषाओं के कई चैनलों के मालिक पी.के. तिवारी भी जेल में हैं। इसी तरह शारदा ग्रुप के चैनल-10 के मालिक सुदीप्तो सेन भी जेल में हैं। समृद्ध जीवन परिवार नामक चिटफंड कंपनी के मालिक और लाइव इंडिया नाम के चैनल के मालिक महेश किसन मोतेवार जेल में बंद हैं। इनमें से अधिकांश टीवी चैनलों के मालिक धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार हैं।

स्टार के पूर्व सीईओ पीटर मुखर्जी शीना बोहरा हत्याकांड में अपनी पत्नी इंद्राणी के साथ बंद हैं। ओडिशा के कामयाब टीवी चैनल के मालिक मनोज दास और ओडिशा भास्कर न्यूज पेपर के मधुसुदन मोहंती भी सीबीआई के जाल में हैं। इनमें से अधिकतर लोग आर्थिक घोटालों में जेल में बंद हैं। घोटाले भी छोटे-मोटे नहीं, सभी हजारों करोड़ के मामलों में सलाखों के पीछे हैं। इनमें से ज्यादातर चिटफंड घोटाले में फंसे हैं। सुब्रत रॉय सहारा जो कभी अरबों में खेलते थे, तिहाड़ जेल में बंद हैं और अपनी इज्जत बचाने के लिए जेल में किताबें लिख रहे हैं। मानो उन्हें आजादी की लड़ाई के लिए जेल की सजा मिली हो। सुब्रत रॉय सहारा हजारों लोगों के अरबों रुपए खाकर डकार नहीं ले रहे हैं। हजारों लोगों से उन्होंने अरबों रुपए मकान के नाम पर लिए और शायद ही किसी को मकान उपलब्ध कराया। चेन मार्केटिंग के सहारे लोगों को ब्याज का लालच दे देकर उन्होंने अरबों रुपए इकट्ठे किए। सेबी, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया उनके खिलाफ अनेक मामलों की जांच करा चुका है। उनकी कंपनियों के खिलाफ सैकड़ों मामले विचाराधीन है। इसके बावजूद सुब्रत रॉय ऐसे बड़ी-बड़ी बातें करते है, मानो वे कोई देवदूत हो।

पर्ल ग्रुप के निर्मल सिंह भंगू की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। धोखेबाजी में वे सुब्रत रॉय को पीछे छोड़ चुके हैं। पूरे देश में अरबों की संपत्ति बना चुके निर्मल सिंह भंगू ने भी सुब्रत रॉय सहारा की ही तरह सुरक्षा कवच के रूप में मीडिया के धंधे में आगमन किया। उन्हें लगा था कि चैनल के बहाने कोई उन्हें हाथ नहीं लगाएगा, लेकिन कानून के लंबे हाथ और अपनी पापों के कारण निर्मल सिंह भंगू भी जेल की सलाखों के पीछे है। भंगू का पी-7 चैनल बंद हो चुका है। लाखों निवेशक उनके नाम पर खून के आंसू रो रहे है। सैकड़ों पत्रकार रोजी रोटी की तलाश में जुटे हैं। इसके बाद भी भंगू लोगों को कह रहे है कि वे धीरज बनाए रखे, उनका पैसा उन्हें मिल जाएगा।

जिस तरह सुब्रत रॉय सहारा लम्ब्रेटा स्कूटर पर घूम-घूमकर अपनी चिटफंड कंपनी के लिए लोगों से पैसे मांगा करते थे, उसी तरह निर्मल सिंह भंगू ने भी अपना सफर मामूली से काम से शुरू किया था। पंजाब के चमकौर साहब जिले में भंगू साइकिल पर घर-घर जाकर दूध बेचते थे। इस दौरान उनके संपर्क में कई लोग आए और उन्होंने चिटफंड कंपनी के एजेंट का काम भी शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनका धंधा चल निकला और उन्होंने अपना पर्ल ग्रुप शुरू किया। फिर निर्माण के धंधे में आए, जो पैसे इकट्ठे किए थे, उसे जमीन-जायदाद के धंधे में लगा दिया और जमीनों के भाव बढ़ते ही उन्हें बेचकर करोड़ों रुपए कमाए। नियमों के विरुद्ध चिटफंड चलाने के मामले में उनकी जांच हुई और वे करीब 49 हजार करोड़ रुपए के डिफाल्टर पाए गए।

लाइव इंडिया चैनल के मालिक महेश मोतीवार की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। महेश मोतेवार ने अपनी चिटफंड कंपनी खोली, जिसका नाम था समृद्ध जीवन परिवार। सुब्रत रॉय सहारा के सहारा इंडिया परिवार की तरह ही वे भी अपनी कंपनी को समृद्ध जीवन परिवार के नाम पर प्रचारित करते रहे। मोतेवार की कंपनी ने पुणे में गाय और बकरिया पालने का धंधा शुरू किया। पशु-पालन फॉर्म खोले और लोगों से कहा कि इस धंधे में जबरदस्त कमाई है, उनके पास जितने भी पैसे हो वे इस कंपनी में लगा दे। बकरी और गाय पालने से जो भरपूर मुनाफा मिलता है, उसका फायदा गांव वाले भी उठाएं और एक रुपए को तीन रुपए में तब्दील करें। यानि दोगुना शुद्ध मुनाफा। शुुरू में कुछ लोगों को मोतेवार की कंपनी ने पैसे दिए भी। लालच में आकर बड़ी संख्या में लोग समृद्ध जीवन परिवार के सदस्य बने। पैसा आते ही मोतेवार ने हिन्दी और मराठी न्यूज चैनल शुरू किए। अपनी इमेज चमकाने के लिए उनकी कंपनी देशभर में रक्तदान के शिविर लगाती रही और यह माहौल बनाया गया कि सहारा समूह की तरह मोतेवार का समृद्ध जीवन परिवार भी जनकल्याण के काम में लगा है।

पश्चिम बंगाल के रोजवैली और शारदा चिटफंड कंपनी के मालिक भी धोखेबाजी के मामले में कानून की गिरफ्त में हैं। शारदा ग्रुप के मालिक सुदीप्तो सेन पुलिस की गिरफ्त में हैं। रोजवैली चिटफंड कंपनी के मालिक गौतम कुंडू भी जेल जा चुके है। रोजवैली ग्रुप के देशभर में ढाई हजार से ज्यादा बैंक खाते सील किए जा चुके है। शारदा चिटफंड घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता फंसे है। शारदा ग्रुप के मालिक सुदीप्तो सेन एखून समय नामक टीवी चैनल की बिक्री के फर्जीवाड़े में शामिल बताए जा रहे है। सीबीआई और ईडी के जाल में पूर्व केन्द्रीय मंत्री मतंग सिंह भी फंस चुके हैं।

ओडिशा के कामयाब टेलीविजन और ओडिशा भास्कर अखबार के सीएमडी मनोज दास और मधुसूदन मोहंती भी कानून की गिरफ्त में हैं। इन लोगों ने भी लोगों से अवैध तरीके से पैसे जमा किए थे। कुल मिलाकर इनमें से अधिकांश लोगों को काम मीडिया समूह का संचालन करने के बजाय लोगों को लालच देकर फांसने में ज्यादा रहा। इनके अलावा ऐसे मीडिया मालिक भी है, जो हत्या, बलात्कार, गुंडागर्दी और दूसरे गैरकानूनी कामों के कारण जेल की सलाखों के पीछे है। ऐसे मीडिया मालिकों की भी एक लंबी सूची है, जो किसी भी क्षण जेल जा सकते है। अभी ये लोग किसी न किसी बहाने जेल जाने से बच रहे है।

आजादी के पहले जवाहर लाल नेहरू, माखनलाल चतुर्वेदी, लोकमान्य तिलक, बालगंगाधर गोखले आदि अनेक लोग हुए, जो आजादी की लड़ाई लड़ते हुए शान से जेल गए। इन लोगों का जेल जाने का एक मकसद था कि भारत की आजादी की लड़ाई तेज हो, लेकिन अब जो मीडिया मालिक जेल जा रहे है, उनका एक मात्र मकसद बड़े आर्थिक घोटाले करना रहा। आजादी के बाद जो मीडिया मालिक जेल गए वे आर्थिक घोटालों में शामिल थे। इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के एकलौते पुत्र भगवानदास गोयनका को न्यूज प्रिंट की धोखाधड़ी के मामले में जेल जाना पड़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के ही अशोक कुमार जैन विदेशी मुद्रा के मामले में फंसे थे। वे दोषमुक्त हो पाते, इसके पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। महू के अल-हलाल जैसे ग्रुप भी थे, जो छोटे-मोटे अखबार निकालते थे और अब चिटफंड के अरबों रुपए इकट्ठा करके भाग गए। ऐसे लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है कि उनका पता लगाना भी आसान नहीं।

लेखक प्रकाश हिंदुस्तानी वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग प्रकाश हिंदुस्तानी डॉटकॉम से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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भंगू का हाल में ही किडनी बदला गया है, जेल प्रशासन रखेगा ध्यान

देश के सबसे बड़े पौंजी घोटाले में गिरफ्तार पर्ल्स समूह के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू का अभी हाल में ही किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. इस बात का उल्लेख उनके दो वकीलों ने कोर्ट में सुनवाई के दौरान किया. भंगू के अधिवक्ता मनीष जैन और विजय अग्रवाल ने अदालत से कहा कि भंगू का हाल में किडनी प्रत्यारोपण हुआ है इसलिये जेल में उनकी नियमित जांच होनी चाहिये. साथ ही उनकी मेडिकल कंडीशन के मुताबिक इलाज व दवाइयां दिए जाने की मांग की. अदालत ने इस पर कहा कि जेल प्रशासन इसका ध्यान रखेगा. वकीलों की यह मांग भी कोर्ट ने मान ली कि उन्हें रोजाना एक घंटे अपने क्लाइंट यानि भंगू से मुलाकात की अनुमति दी जाए.

पर्ल्स समूह के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक निर्मल सिंह भंगू और तीन अन्य को 45,000 करोड़ रुपए की कथित धोखाधड़ी मामले में एक स्थानीय अदालत ने 14 दिन की न्याययिक हिरासत में भेज दिया. मुख्य महानगर दंडाधिकारी सुगंधा अग्रवाल ने सीबीआई के यह कहने पर कि अब हिरासत में उनसे पूछ-ताछ की जरूरत नहीं है, आरोपियों को छह फरवरी तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया. अदालत ने कहा, ‘आरोपियों को 14 दिन के पुलिस रिमांड के बाद अदालत में पेश किया गया. अब 14 दिन की न्यायिक हिरासत के लिए एक याचिका दायर की गई है. आवेदन में दी गई वजहों के तहत इसकी मंजूरी दी जाती है.’

इस प्रकार ये लोग 6 फरवरी तक के लिए जेल भेज दिए गए. इन पर आपाराधिक साजिश रचने और धोखाधड़ी के आरोप हैं. सीबीआई ने इन आरोपियों को आठ जनवरी को दो साल की लंबी जांच पड़ताल के बाद गिरफ्तार किया था. जांच के आदेश उच्चतम न्यायालय ने दिये थे.

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साईं प्रसाद की मालकिन वंदना भापकर को कोर्ट ने जेल भेजा

चिटफंड कंपनी साईं प्रसाद की मालकिन वंदना भापकर को रायपुर की एक अदालत ने जेल भेज दिया है. उन्हें पहले एक दिन के रिमांड पर पुलिस को सौंपा था. रिमांड अवधि पूरी होने के बाद उन्हें 14 दिनों के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है. लाभ की आकर्षक स्कीमों का झांसा देकर कई सालों से छत्तीसगढ़ और देश के दूसरे शहरों में सक्रिय साईं प्रसाद और उससे सम्बंधित दूसरी कंपनियों पर CBI ने छापा मारी शुरू कर दी है. साथ ही देश के 30 से ज़्यादा शहरों में दस्तावेजी जांच पड़ताल शुरू हो गयी है. सूत्रों के अनुसार CBI की तीन टीमें रायपुर पहुंची जिसमे दिल्ली कोलकता और भिलाई के अधिकारी शामिल थे.

 

CBI अधिकारियों ने रिंग रोड राजेन्द्र नगर के पास मिलेनियम काम्प्लेक्स के फ्यूचर अ डे नामक फर्म पर दबिश दी. यह कंपनी साई प्रसाद की सहयोगी कंपनी बताई जा रही है. मारुती रेसीडेंसी अमलीडीह के एक मकान पर भी छापामार कार्यवाही हुई. दोनों जगहों पर कोई जिम्मेदार नहीं मिला. सूत्रों के अनुसार सीलबंद कार्यवाही की भी तैयारी है. इस तरह की जांच देश के 25 से 30 शहरों में जारी है. साथ ही कंपनी द्वारा 800 करोड़ रुपये का गड़बड़झाला किए जाने के मामले की भी जांच की जा रही है.

एक अधिकारी ने बताया कि अशोक मिलेनियम में भाड़े पर जगह लेकर कम्पनी चला रहे साईं प्रसाद के आफिस पर CBI ताला तोड़कर घुसी और पुलिस बल की मौजूदगी में दस्तावेजी जांच शुरू हुई. मगर कोई भी सामने नहीं आया है. वहीं रायपुर में कंपनी के ऊपर सीधे तौर पर कोई FIR दर्ज नहीं है मगर निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की खबर है. निवेशक इस वक्त एजेंटों को ढूंढ रहे हैं. पश्चिम बंगाल के शारदा चिट फंड घोटाले से भी साईं प्रसाद कंपनी के तार जुड़े होने का सन्देह है. उडीशा और प.बंगाल में साईं प्रसाद के ऊपर 50 से ज़्यादा FIR दर्ज है.

न्यूज़ एक्सप्रेस नेशनल चैनल, रीजनल चैनल MP CG स्वराज एक्सप्रेस और हमवतन अखबार की आड़ में चिटफंड कारोबार करने वाली यह कम्पनी मीडिया के नाम पर सरकार और प्रशासन में अपनी पकड़ बनाने की जुगत के थी. मगर कंपनी के मालिकों की सारी मंशा पर पानी फिर गया. कुछ चैनलों व अखबार की गर्भावस्था में ही मौत हो गयी. पुलिस कंपनी की मालकिन को पुणे के चिंचवड से ले गयी.

जानकारों के अनुसार देश में वर्षों से चिटफंडिया कारोबार करने वाले देश के सभी राज्यों में वसूली करते रहे हैं. SEBI और RBI की कार्यवाही से बचने के लिए नामी कंपनियों ने कोआपरेटिव सोसायटी बना कर कामकाज को नंबर एक में तब्दील करना शुरू कर दिया है. एक तरह से ये कंपनिया नाम बदलकर सहयोगी कम्पनियों के ज़रिये फ़र्ज़ीवाड़ा करती हैं. साईं प्रसाद की मालकिन वंदना भापकर को छत्तीस गढ़ पुलिस ने अरेस्ट किया है. उनसे एक दिन की रिमांड अवधि के दौरान पूछताछ जारी है. पुलिस की कोशिश है कि वंदना भापकर पर दबाव बनाकर बाला साहब भापकर व शशांक भापकर को सामने लाया जाए ताकि चिटफंड फ्राड का पूरा खुलासा हो सके.

पत्रकार दानिश आज़मी की रिपोर्ट.

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टीवी पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी पर ट्विटर से कई सेक्सिस्ट टिप्पणियां करने वाले अंग्रेजी के एक बड़े पत्रकार जाएंगे जेल

(टीवी पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी)


Deepak Sharma : महिलाओं का सम्मान किया जाना चाहिए. चाहे वो कर्मचारी हों या अधिकारी. चाहे वो पत्रकार हों या टीवी पर खबर पढ़ने वाली एंकर. भाषा का संयम और भद्रता अनिवार्य है. वरना वही हाल होगा जो अब दिल्ली के अंग्रेजी अखबार के एक बड़े पत्रकार का होने वाला है. इन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से टीवी पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी पर कई सेक्सिस्ट टिप्पणियां की और आज़िज़ आकर स्वाति ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवा दी.

पुलिस ने मुकदमा दर्ज़ कर लिया है. ये ट्विटर पर अभद्रता का पहला मामला है जिसमे गिरफ्तारी होने जा रही है. नि:संदेह स्वाति सुन्दर हैं, किसी के लिए आकर्षक हो सकती हैं और हो सकता इस पत्रकार से कोई अनबन हुई हो. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि महिला का सम्मान न किया जाए. किसी को देखना या चाहना और किसी पर सार्वजनिक अभद्र टिप्पणियाँ करना दो अलग स्थितियां हैं. पहली स्थिति मित्रता में भी बदल सकती है पर दूसरी स्थिति निश्चित ही जेल भिजवा सकती है.

(वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा के फेसबुक वॉल से.)

इस प्रकरण के बारे में द हिंदू अखबार में Damini Nath और Jatin Anand ने विस्तार से एक खबर में बताया है. यह भी बताया है कि अभी तक ट्विटर वाले दिल्ली पुलिस के उस मेल का जवाब नहीं दे रहे हैं जिसमें आरोपी के आईपी एड्रेस व अन्य डिटेल मांगे गए हैं ताकि उसकी पहचान पुख्ता कर अरेस्ट करने की प्रक्रिया शुरू की जा सके. द हिंदू अखबार में छपी खबर पढ़ने के लिए नीचे लिखा आ रहा 2 या Next पर क्लिक करें>>

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दिल्ली पुलिस के जवानों ने आगरा में कैदी को कराई शापिंग, देखें वीडियो

दिल्ली पुलिस वैसे तो छोटे-मोटे मामलों में किसी को जेल भेजकर अपनी पीठ थपथपा सकती है, लेकिन जब खुद के गुनाहों की बारी आती है तो चुप्पी साध जाती है. इन दिनों भाजपा नेताओं के इशारे पर चलने वाली दिल्ली पुलिस के लिए आम आदमी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता सबसे बड़े दुश्मन हैं. थोड़ा भी आरोप लगा तो जांच शुरू और फौरन गिरफ्तारी. लेकिन यही दिल्ली पुलिस पेशेवर अपराधियों के साथ बेहद दोस्ताना व्यवहार करती है. इन अपराधियों को नियम-कानून तोड़कर शापिंग कराती फिरती है.

 

नीचे दिए गए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके वीडियो देखिए. इस वीडियो में दिल्ली पुलिस के लोग मनोज नामक एक कैदी को आगरा के एक मार्केट में शापिंग करा रहे हैं. जब आगरा के वीडियो जर्नलिस्ट सैय्यद शकील ने सूचना मिलने पर अपना कैमरा आन किया तो दिल्ली पुलिस के पसीने छूट गए. फौरन सारे पुलिस वाले कैदी को लेकर गाड़ी में बैठे और चलते बने. वीडियो में सब कुछ साफ-साफ दिख रहा है. सैय्यद शकील का कहना है कि दिल्ली पुलिस की इस करतूत में आगरा की पुलिस भी शामिल है.

वीडियो लिंक ये है: https://www.youtube.com/watch?v=hSUVcVqxarE

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जालसाजी करने पर जीबी पन्त पॉलिटेक्निक के कर्मशाला अधीक्षक को जेल

लखनऊ की चीफ जुडीशिअल मजिस्ट्रेट ने जालसाजी से प्रमाणपत्र बनाकर नौकरी करने के एक मामले में समाज कल्याण विभाग के लखनऊ स्थित जी. बी. पन्त  पॉलिटेक्निक के कर्मशाला अधीक्षक पवन कुमार मिश्रा की जमानत अर्जी ख़ारिज करते हुए अभियुक्त को जेल भेज दिया।

अदालत ने यह आदेश सामाजिक और आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी शर्मा द्वारा दायर मुकद्दमे में दिया है। उर्वशी ने बताया कि अभियुक्त पवन कुमार मिश्रा ने लखनऊ स्थित अवध इंडस्ट्री के लैटर पैड पर फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र बनाकर इस पॉलिटेक्निक में नौकरी पा ली थी। उर्वशी के अनुसार उन्होंने आरटीआई के प्रयोग से यह अनुभव प्रमाणपत्र हासिल करने के बाद अभियुक्त पवन कुमार मिश्रा के खिलाफ यह मुकद्दमा लखनऊ के थाना काकोरी में कायम कराया था।

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‘जानेमन जेल’ पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे यशवंत जी सामने बैठ कर अपनी कहानी सुना रहे हों…

Prabudha Saurabh : यशवंत जी की किताब ‘जानेमन जेल’ पढ़ना बिलकुल नया अनुभव रहा। ‘जेल’ और ‘जानेमन’ शब्द का एक साथ होना ही इस किताब के प्रति आकर्षण पैदा करने के लिए काफ़ी था, दूसरा आकर्षण यशवंत। यह किताब मोटे तौर पर (हालांकि है बड़ी पतली सी) यशवंत जी की दो-तीन महीने की आपबीती (या यों कहें कि जेलबीती) है। निजी रूप में जितना मैं यशवंत जी को जानता हूँ, यह समझना तो मुश्किल है, कि वो क्रांतिकारी ज़्यादा हैं या पत्रकार लेकिन इतना ज़रूर है कि वो एक अनूठा फॉर्मूला हैं।

जिस मज़ेदार तरीके से वो आमने सामने बात करते हैं, ठीक उसी तरह से इस किताब में भी शब्द रखते चले गए हैं। किताब पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे यशवंत जी ही सामने बैठ कर अपनी कहानी सुना रहे हों। डासना जेल को बधाई, कि उस प्रांगण के ऊपर एक अच्छी किताब लिखी गई। उम्मीद है कि जेल के योगा-कम-लाइब्रेरी रूम में यह किताब भी ‘कुफ्र’ के साथ लगी होगी और क़ैदी-बंदी ‘Bhadas4media जी’ की किताब को उसी चाव से पढ़ते होंगे, जिस चाव से उन दूसरी किताबों को ‘पढ़ते’ थे। बहरहाल, यशवंत जी की सलाह के अनुसार मेरा अगला मिशन होगा ‘कुफ्र’!

प्रबुद्ध सौरभ के फेसबुक वॉल से.

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जब मीडिया मालिकों ने यशवंत को जेल भिजवाया था, तभी मैंने आगाह कर दिया था….

Palash Biswas : शाहजहांपुर में सोशल मीडिया के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों और पुलिसे के द्वारा उसके घर में जिन्दा जला कर मार देने की घटना रौंगटे खड़ा कर देने वाली हैl साथ ही यह उत्तर प्रदेश कि सरकार के साथ साथ प्रदेश के पत्रकारों के चरित्र को भी उजागर करती हैl साथियों, याद करें जब मजीठिया की लड़ाई में पत्रकारों की अगुवाई करने वाले भड़ास के यशवंत को मालिकों की रंजिश की वजह से जेलयात्रा करनी पड़ी, तो हमने सभी साथियों से आग्रह किया था कि हमें एकजुट होकर अपने साथियों पर होने वाले हमले के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। हम शुरू से पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर वैकल्पिक मीडिया के हक में लामबंदी की अपील करते रहे हैं। हम लामबंद होते तो हमारे साथी रोज-रोज मारे नहीं जाते।

एक फीसद से भी प्रभु वर्ग के सारस्वत पत्रकारों के लिए कारपोरेट पत्रकारिता का मायामहल भले ही पांचसितारा मौजमस्ती का मामला है, हकीकत की जमीन पर निनानब्वे फीसद पत्रकारों की हालत कुकुरदुर्गति है, ऐसा हम बार बार लिख कह रहे हैं। जाति व्यवस्था का भयंकर चेहरा मीडिया का सच है तो नस्ली वर्ण वर्चस्व यहां दिनचर्या है। वैसे भी पिछले वेज बोर्ड के बाद तेरह साल के इंतजार के बाद जो मजीठिया आधा अधूरा मिला, उससे पहले तमाम अखबारों में स्थाई कर्मचारी ठिकाने पर लगा दिये गये। बाकी भाड़े पर बंधुआ फौज है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के पांच सितारा लाइव चकाचौंध में परदे पर उजले जगमगाते चेहरों के कार्निवाल के पीछे हमारे भाइयों साथियों का दमन उत्पीड़न शोषण का अटूट सिलिसिला है। सितारा अखबारों और समूहों में तो नस्ली भेदभाव ही पत्रकारिता का जोश है और तमाम मीडिया महाजन मसीहा वृंद आंदोलन के नाम पर चूजे सप्लाई करते रहने वाले या चूजों के शौकीन महामहिम हैं। जिलों और देहात में उमेश डोभाल हत्याकांड का सिलसिला जारी है।

पत्रम् पुष्पम् के बदले दिन रात सिर्फ नाम छपने की लालच में जो पत्रकारिता के शिकंजे में फंसकर मुर्गियों की तरह हलाल कर दिये जाते हैं, भड़ास और मीडिया से जुड़े तमाम सोशल साइटों के कारण उनका किस्सा भी अब सभी जानते हैं। राजनीति के साथ महाजनों, मठाधीशों और आंदोलन चलानेवालों के अविराम हानीमून का नतीजा यह है कि पकत्रकारिता मिशन या जनमत या जन सरोकार से कोसों दूर हैं। हमारी मीडिया बिरादरी आकाओं की अय्याशी का समान जुटाने के लिए ही खून पसीना एक किये जा रहे हैं। महाजनों के सत्ता संबंधों की वजह से ही आम पत्रकारों और कासकर जिलों, गांवों और कस्बों में जनता की आवाज उठाकर सत्ता से टकराने वाले पत्रकारों की हत्या का यह उत्सव है। कानून का राज कैसा है और झूठ के पंख कितने इंद्रधनुषी हैं, मोदियापा समय के जनादेश बनाने वाले केसरिया कारपोरेट प्रभुओं की कृपा से हम सारे लोग इस जन्नत का हकीकत जानते हैं, जो सिरे से हाशिये पर हैं।

हमें अपनी ताकत का अंदेशा नहीं है और गुलामी की जंजीरों को पहनकर हम मटक मटककर सत्ता गलियारे की जूठन की आस में हैं जो थोक भाव से प्रभू वर्ग का वर्चस्व है। निनानब्वे फीसद को तो वेतन, भत्ता, प्रमोशन सब कुछ जाति और पहचान और सत्ता संबंधों के आधार पर मुटियाये चर्बीदार पांच सितारा लुटियन तबके के मुकाबले कुछ भी नहीं मिलता। पत्रकारों के संगठन अब तक मालिकों के साथ ट्रेड यूनियन आचरण के तहत सौदेबाजी करते रहने के लिए मशहूर है और मीडिया में सामंतवादी साम्राज्यवादी तंत्र मंत्र के किलाफ बगावत अभी शुरु ही नहीं हो सकी है। एक मजीठिया मंच से ही मालिकान के खेमे में नानियां खूब याद आ रही है। बहुसंख्य बहुजन उत्पीड़ित पत्रकार अगर एकजुट हो जायें और जंग लगी कलम और उंगलियों को ही हरकत में लाकर महामहिमों के सत्ता संबंधों के खिलाफ उठ खड़े हों तो हत्याओं का यह सिलसिला रुक सकता है, वरना नहीं। समझ लीजिये कि केंद्र और सूबों में जो बाहुबलि धनपशुओं का वर्गीय वर्णीय जाति वर्चस्व लोकतंत्र के नाम पर जनसंहार राजकाज अबाध पूंजी में लोटपोट चला रहे हैं, भ्रष्ट राजनेताओं के साथ साथ भ्रष्ट पत्रकारों की हिस्सेदारी उसमें प्रबल है। अरबपति बन गये भूतपूर्व पत्रकारों की एक अच्छी खासी जमात भी अब तैयार है। मंत्री से संत्री तक की असली ताकत इन्ही विभीषणों की कारगुजारी है।

जिलों, कस्बों और गांवों के पत्रकार साथियों के हक हकूक की लड़ाई में राजधानियों और महानगरों के मीडिया बिरादर जब तक शामिल न होंगे,हत्याकांड होते रहेंगे और निंदा की रस्म अदायगी के साथ हम फिर हत्यारों का साथ देते रहेंगे और याद रखियें रोज रोज मौत की यह जिंदगी हम ही चुन रहे हैं। साथियों, अपनी ख्वाहिशों और ख्वाबों की तमाम तितलियों को पकड़ने के लिए अपने साथियों के साथ खड़े होने के कला कौशल भी तकनीक की तरह सीख लीजिये वरना खामोश मजा लीजिये कार्निवाल का। भाई अरुण खोटे की अपील पर भड़ास जुबान से उंगलियों तक संक्रमित हो गयी है, किन्हीं साथी को चोट पहुंचाना हमारा मकसद नहीं है। क्या करें कि हकीकत बयां करते हुए दागी चेहरे बेनकाब हो ही जाते हैं।


Arun Khote : शाहजहांपुर में सोशल मीडिया के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों और पुलिसे के द्वारा उसके घर में जिन्दा जला कर मार देने की घटना रौंगटे खड़ा कर देने वाली हैl साथ ही यह उत्तर प्रदेश कि सरकार के साथ साथ प्रदेश के पत्रकारों के चरित्र को भी उजागर करती हैl सत्ता के मद में दुबे समाजवादी दल के नेता और मंत्री अपनी गुंडा गर्दी के कारन लगातार चर्चाओं में हैंl इस घटना का हम सब विरोध करते हैंl हम मांग करते हैं कि दोषी मंत्री और पुलिस वालों को तुरंत बर्खास्त करके उनकी गिरफ़्तारी की जायेl घटना कि तय सीमा में सी.बी.आई. जाँच कराई जायेl मृतक पत्रकार के परिवार को एक करोड़ का मुवयाज़ा और उसके परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी तुरंत दी जायेl  दोस्तों! सोशल मीडिया के माध्यम से अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले साथियों के प्रति हम सभी की जिम्मेदारी बनती हैl कोशिश करें कि यह मांग हर हाल में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंचेl

पत्रकार द्वय पलाश विश्वास और अरुण खोटे के फेसबुक वॉल से.

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कलम पर बंदूक का कहर जारी : मौजूदा दौर में पत्रकारिता कर्म दिनों दिन मुश्किल बनता जा रहा है…

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राष्ट्रीय सहारा बनारस यूनिट हेड देवकी का लखनऊ तबादला, सुब्रत राय तिहाड़ में लेंगे मैनेजरों व संपादकों की बैठक

राष्ट्रीय सहारा अखबार से खबर है कि बनारस यूनिट के हेड देवकी नंदन मिश्रा का लखनऊ तबादला कर दिया गया है. उन्हें जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट से संबद्ध किया गया है. इस बीच, एक अन्य सूचना के मुताबिक सहारा के लखनऊ के एचसीबीएल (हिंदुस्तान कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड) बैंक में भगदड़ मचने का बड़ा कारण खुद सहारा के ही कई बड़े पदाधिकारी हैं. जब इन्हें 17 अप्रैल को आरबीआई की टीम के छापे की जानकारी मिली तो सबने फौरन अपना अपना पैसा निकालने के लिए दौड़ लगा दी. साथ ही इन लोगों ने अपने परिचितों को भी पैसे निकाल लेने की सलाह दी. इस तरह देखते ही देखते बात फैल गई और इस बैंक के आफिस के सामने पैसे निकालने वालों की लंबी कतार लग गई. बाद में आरबीआई ने इस बैंक पर रोक लगा दी लेकिन इससे पहले सहारा वाले और इनके परिचितों ने बैंक से अपना पैसा निकाल लेने में सफलता हासिल कर ली थी.

तीसरी खबर ये है कि 22 अप्रैल को सहारा श्री सुब्रत राय तिहाड़ जेल में अपने सहारा मीडिया के मैनेजरों व संपादकों की बैठक लेंगे. सूत्रों के मुताबिक सुब्रत राय को अपनी संपत्ति बेचने के लिए डील की खातिर जो मीटिंग हाल दिया गया है, वहां अब सहारा की आंतरिक मीटिंग होने लगी है. इस तरह सुब्रत राय का जेल में होना या न होना, दोनों स्थिति बराबर हो गई है. भड़ास को सूत्रों ने बताया कि 22 अप्रैल को टीजे (तिहाड जेल) में सुब्रत राय ऑल इंडिया सहारा के स्थानीय संपादकों व मैनेजरों और टीवी चैनलों की मीटिंग लेंगे. इस बैठक को लेकर संपादक व मैनेजर लोग इन दिनों दिन रात होमवर्क करने में लगे हैं.

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सहारनपुर में सहारा का कैमरामैन कई गंभीर आरोपों में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया (देखें वीडियो)

यूपी के सहारनपुर जिले में मिशन कम्पाउंड की घटना है. देर रात सहारा का कैमरामैन जॉन और उसका एक साथी सलीम पानवाला ने तीन बच्चों की प्रेम वाटिका के पास पिटाई कर उनसे 600 रुपये छीन लिए. आरोप है कि जॉन ने बच्चों के मुंह में रिवॉल्वर लगा दिया था. इन तीनों में से एक बेटा देवेश त्यागी का है जो IBN7 के रिपोर्टर हैं और दूसरा बेटा शहर के नामी वक़ील जयकृत सिंह का पोता है.

इन लड़कों की तरफ से थाना सदर बाजार में रिपोर्ट लिखाई गई है. आदित्य राणा जो जयकृत सिंह के बेटे हैं, ने यह रिपोर्ट लिखाई. इस घटना पर सहारनपुर बार संघ एक है. उन्हीं के अथक प्रयासों से जॉन को देर रात पुलिस ने दबाव बनाकर गिरफ्तार किया. जॉन पर 392, 307, 384, 386 आदि संगीन धारायें लगाई गई हैं. 24 मार्च को CJM कोर्ट ज़नाब अब्बासी साहब ने रंगदारी की धारा जुड़वा दी और जॉन को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. सहारा समय के रिपोर्टर ने पूरे ज़िले के नेताओँ और अधिकारियों से जॉन को छुड़वाने की सिफारिश की पर नये कप्तान नितिन तिवारी ने किसी की एक नहीं सुनी और वादी पक्ष का साथ दिया. जॉन को जेल भेज दिया गया.

संबंधित वीडियो देखने के लिए क्लिक करें: https://www.youtube.com/watch?v=KajfqEtp9ks

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देवरिया में तैनात दरोगा शांति भंग के अपराध में भेजा गया मेरठ जेल

मवाना (मेरठ) : जनपद देवरिया में तैनात एस टी एफ के दरोगा को शान्ति भंग की आंशका के चलते उप जिलाधिकारी ने पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया। जनपद मेरठ की मवाना तहसील के ग्राम तिगरी में रास्ते को लेकर सुबह के समय दो पक्षो में विवाद हो गया। सूचना पर उपजिलाधिकारी अरविन्द कुमार सिंह पुलिस क्षेत्राधिकारी डी पी सिंह व तहसीलदार भूपेन्द्र बहादुर पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे।

वहां एक पक्ष से देवरिया में तैनात एसटीएफ के दारोगा शैलेश ने पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों पर पिस्टल तान कर गाली गलौच व अभ्रद व्यवहार किया. इस पर पुलिस दोनों पक्षों से आरोपी दारोगा शैलेश, सतीश, राकेश, लोकेश, अमरीश को थाने ले आयी. इन्हें शांति भंग में निरुद्ध करते हुए उप जिलाधिकारी न्यायालय में पेश किया. इस पर उपजिलाधिकारी अरविन्द कुमार सिंह ने दोनो पक्षों से सभी पांचों आरोपियों को पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया।

मेरठ के मवाना से पत्रकार संदीप नागर की रिपोर्ट.

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आपकी ‘जानेमन जेल’ तो मेरा भी दिल लूटकर ले गई

आदरणीय यशवंत भाई, अमेजोन ब्वॉय ने आज आपकी जानमेन जेल हाथों में रखी तो पता नहीं था दिन इसी के नाम करने वाला हूं। आफिस में पहला पन्ना खोला तो फिर रुका नहीं गया। आपकी जानेमन तो मेरा भी दिल लूटकर ले गई। सबसे पहले तो कुछ बेहतरीन किताबों के नाम सुझाने के लिए धन्यवाद और अफसोस है कि आपको जेल में चीफ साहब अंगुली कर गया। …खैर ये तो मजाक है लेकिन किताब बहुत सीरियस है।

पत्रकारों वाली फितरत आपके रोम-रोम में भरी है। मजा आया पढ़कर। एक नया नजरीया मिला है।

एक पत्रकार के नाते मैं हमेशा सोचता रहा हूं कि जेल के अंदर की दुनिया कैसी होती है? लोग कैसे होते हैं? क्या सोचते हैं? करते क्या हैं? हालांकि एक दो जेल सुपरिटेंडेंट मित्रों से पूछा भी है लेकिन आप तो ये दुनिया जीकर ही आ गए। हां भड़ास आश्रम वाली कल्पना भी कभी साकार कर ही लेना, बड़ी काम आएगी पत्रकारों के लिए।

आपका चट्टान जैसा हौसला काबिलेतारीफ है और आपकी पत्नी को भी दाद देना चाहूंगा जो आप जैसे इंसान को झेल पा रही है। आपकी ही लाइनों से खुद को विराम देना चाहूंगा…यही जीवन है तो यही अपनाना है। भागकर कहां जाना है? स्थितियां बुरी नहीं होती उसे हम अच्छा या बुरा महसूस करते हैं।

…एक बात और… खात्मे की शुरुआत हो चुकी है…

धर्मेंद्र
पत्रकार


अगर आप भी ‘जानेमन जेल’ पढ़ने को इच्छुक हैं तो घर बैठे मंगाने के लिए आप अपना मोबाइल फोन उठाइए और मैसेज टाइप करिए. सबसे पहले book name ‘Jaaneman Jail’ लिखिए. उसके बाद अपना खुद का नाम, पूरा पता पिन कोड सहित और आखिर में अपना मोबाइल नंबर लिखें. इस मैसेज को 09873734046 पर SMS कर दें. किताब कुछ ही दिनों में आपके हाथ में होगी. मूल्य सौ रुपये से कम है और छूट के साथ उपलब्ध है.


इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

यशवंत की ‘जानेमन जेल’ : विपरीत हालात में खुद को सहज, सकारात्मक और धैर्यवान बनाये रखने की प्रेरणा देने वाली किताब

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‘जानेमन जेल’ पढ़ने के बाद कोई भी निरपराध जेल जाने से भय नहीं खायेगा


‘जानेमन जेल’ दूसरे लोगों को कैसी लगी, जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

यशवंत ने 68 दिन में जेल को बना लिया जानेमन

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जेल को भी जानेमन बना लेने का यह हुनर कोई आपसे सीखे

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‘जानेमन जेल’ से मुझे कैदी और बंदी के बीच का फर्क समझ आया

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कॉरपोरेट घराने यशवंत को जेल तो भिजवा सकते हैं लेकिन ‘जानेमन जेल’ लिखने से कैसे रोकेंगे

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‘भड़ासजी’, अच्छा लिखा आपने, किताब का नाम ‘रोमांस विथ जेल’ भी रखा जा सकता था

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‘जानेमन जेल’ : चंदन श्रीवास्तव की टिप्पणी

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‘जानेमन जेल’ : मुकुंद हरि शुक्ला की समीक्षा

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‘जानेमन जेल’ पढ़ने के बाद कोई भी निरपराध जेल जाने से भय नहीं खायेगा

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मन में समाई जेलों की खौफनाक तस्वीर ‘जानेमन जेल’ पढ कर कुछ कम हुई

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यशवंत की जेल कथा ‘जानेमन जेल’ पढ़ने-पाने के लिए कुछ आसान रास्ते

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यशवंत की प्रोफाइल बदल गई लेकिन शराब पीकर बहक जाना नहीं छूटा

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यशवंत की ‘जानेमन जेल’ : विपरीत हालात में खुद को सहज, सकारात्मक और धैर्यवान बनाये रखने की प्रेरणा देने वाली किताब

पूनमपूनम

Poonam Scholar : इस बार विश्व पुस्तक मेला में एक ही बार जाने का मौका मिल सका. हिन्द युग्म प्रकाशन के सामने से गुजरते हुए अचानक याद आया कि इसी प्रकाशन से तो यशवन्त जी की पुस्तक ‘जानेमन जेल’ भी प्रकाशित हुई है. काफी समय से पढ़ने की इच्छा थी सो खरीद ली. कल जाकर समय मिला पढ़ने का. यशवन्त जी ने जेल जीवन के बारे में जो कुछ भी लिखा है उसे पढ़कर जेल के प्रति जो भ्रान्तियाँ हम लोगों के मनों में बनी हुई हैं न केवल वो दूर होती हैं बल्कि विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को सहज, सकारात्मक और धैर्यवान बनाये रखने की प्रेरणा भी मिलती है.

‘जानेमन जेल’ सटीक व कम शब्दों में लिखी गई बेहतरीन पुस्तक है जिसमें आपको कही पर भी जबरदस्ती घुसेड दी गई नाटकीयता नही मिलेगी. यशवन्त जी की लेखन शैली ऐसी है कि पाठक बोर बिल्कुल नही हो सकता. पुस्तक में कई जगह बहुत भावुकता है तो कई जगह कानून के प्रति रोष भी लेकिन सबकुछ बडी सहजता लिए है अपने साथ. यशवन्त जी दूसरे की पीड़ा को भी अपनी पीड़ा मान लेते हैं. उनके इस प्रकार के व्यक्तित्व के दर्शन हमें उनकी पुस्तक में अनेक जगहों पर होते हैं. मेरा अपने युवा मित्रों से अनुरोध है वे एक बार इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें और यशवन्त जी से विनम्र निवेदन भी कि अपनी आत्मकथा के रूप में हम पाठकों से अपने व्यक्तिगत व सार्वजनिक अनुभव आने वाले समय में जरूर साझा करें.

शिक्षिका पूनम के फेसबुक वॉल से.


अगर आप भी ‘जानेमन जेल’ पढ़ने को इच्छुक हैं तो घर बैठे मंगाने के लिए आप अपना मोबाइल फोन उठाइए और मैसेज टाइप करिए. सबसे पहले book name ‘Jaaneman Jail’ लिखिए. उसके बाद अपना खुद का नाम, पूरा पता पिन कोड सहित और आखिर में अपना मोबाइल नंबर लिखें. इस मैसेज को 09873734046 पर SMS कर दें. किताब कुछ ही दिनों में आपके हाथ में होगी. मूल्य सौ रुपये से कम है और छूट के साथ उपलब्ध है.


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यशवंत ने 68 दिन में जेल को बना लिया जानेमन

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यूपी के बरेली में नौनी राम और गोण्डा में अफजल की जेल में कैसे हुई मौत?

लखनऊ । रिहाई मंच ने बरेली जेल में नौनी राम व गोण्डा जेल में अफजल की हिरासत में मौत को मानवाधिकार उत्पीड़न का गंभीर मसला बताते हुए इन दोनों मामलों की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। रिहाई मंच प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अनिल यादव ने कहा कि बरेली जेल में नौनी राम की हिरासत में मौत हुई जो कि 2006 से आजीवन कारावास की सजा काट रहे थे। इस प्रकरण में जिस तरीके से पुलिस ने कहा कि वह मानसिक तौर पर बीमार था और उसने अपने मफलर से फांसी लगाकर जान दी, वह प्रशासन को कई सवालों के घेरे में लाता है।

अगर नौनी राम बीमार था तो क्या उसका इलाज करावाया जा रहा था या फिर ऐसे मानसिक तौर पर विक्षिप्त कैदी को क्यों सामान्य कैदखानें में रखा गया था। ऐसे बहुतेरे सवाल बरेली कारावास प्रशासन की आपराधिक भूमिका को सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि ठीक इसी तरह गोण्डा जेल में सुखवापुरा थाना कर्नलगंज निवासी अफजल की हिरासत में हुई मौत पर पुलिस ने कहा है कि उसने पेड़ पर चढ़कर फांसी लगा ली।

रिहाई मंच नेता राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि जिस तरीके से फरवरी माह में जालौन में दलित समुदाय के अमर सिंह दोहरे की उच्च जाति के लोगों ने नाक काट ली और उनके दोषियों को पुलिस ने बचाने के लिए एफआईआर दर्ज न करने का हर संभव प्रयास किया। ठीक इसी तरह झूंसी इलाहाबाद में हिरासत के दौरान हुई मौत से न सिर्फ पुलिस ने पल्ला झाड़ा बल्कि दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली जनता पर एफआईआर दर्ज किया तो वहीं बरेली और गोण्डा जेल में हुई मौतें साफ कर रही हैं कि पुलिस और अपराधियों की इन घटनाओं में संलिप्तता है। दलित उत्पीड़न की घटनाओं और हिरासत में हो रही मौतों पर यूपी सरकार की चुप्पी से आपराधिक पुलिस व सामंती ताकतों का मनोबल बढ़ा हुआ है। ऐसे में इन घटनाओं प्रदेश सरकार जिम्मेदारी पूर्वक किसी उच्च जांच एजेंसी से जांच करवाए।

द्वारा जारी
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता, रिहाई मंच
09415254919

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संत रामपाल का आरोप- जेल सुपरिंटेंडेंट 50 लाख रुपये मांग रहा है

सतलोक आश्रम के संचालक रामपाल ने मीडिया के सामने सीधे जेल सुपरिंटेंडेंट पर 50 लाख रुपये की फिरौती मांगने का आरोप लगाया है। रामपाल ने कहा कि उसे तकलीफ है कि जिस अधीक्षक ने उससे फिरौती मांगी थी, उसे ही उस जेल का अधीक्षक बना दिया गया है। उसने कहा कि पुलिस ने जो चालान पेश किया है, वह बनावटी और झूठा है। चालान में जो लिखा गया है, सब पुलिस का मनघड़ंत है।

रामपाल को सतलोक आश्रम के प्रवक्ता राजकुमार, पुरुषोत्तम सहित 9 लोगों को चार मुकदमों में मंगलवार को जेएमआईसी की कोर्ट में पेश किया गया। जेएमआईसी प्रतीक जैन ने मुकदमा नंबर 427 में रामपाल को अब 9 मार्च तक पेश होने के निर्देश दिए हैं। मुकदमा नंबर 429, 430 और 443 में रामपाल और उसके अनुयायियों की 10 मार्च को पेशी होगी। 429 नंबर मुकदमे में 9 मार्च को रामपाल को कोर्ट के समक्ष पेश होना पड़ेगा, जबकि अन्य मुकदमों में रामपाल और उसके अनुयायियों की वीसी से पेशी होगी।

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मवाना चीनी मिल में तोड़फोड़ और जानलेवा हमले के मामले में रालोद जिला उपाध्यक्ष रतन सिंह जेल भेजे गए

मेरठ : गन्ना भुगतान की मांग को लेकर मवाना चीनी मिल में हुई तोड़फोड़ व कर्मचारियों पर जानलेवा हमले के मामले में थाना पुलिस ने राष्ट्रीय लोकदल के जिला उपाध्यक्ष रतन सिंह को उसके आवास गांव भैंसा से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। मवाना चीनी मिल पर किसानों का पिछले वर्ष तथा वर्तमान पेराई सत्र का लगभग 300 करोड़ रुपये बकाया है, जिसको लेकर किसान बीते एक माह से गन्ना समिति में धरना दे रहे हैं।

23 जनवरी को जब किसान धरना दे रहे थे तो अचानक उग्र हो गये और सैकड़ों की संख्या में चीनी मिल में पहुंचे तथा चीनी मिल के कर्मचारियों के साथ मारपीट कर कार्यालय के कम्प्यूटर आदि क्षतिग्रस्त कर दिये। मिल प्रबन्ध तंत्र की ओर से चार आरोपियों को नामजद तथा 150 अज्ञात के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करायी गई थी। एक आरोपी बसपा नेता आदेश प्रधान को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है जबकि दूसरे आरोपी राष्ट्रीय लोक दल के जिला उपाध्यक्ष रतन सिंह को थाना पुलिस ने रविवार की सुबह 11 बजे उनके आवास ग्राम भैसा थाना मवाना से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। थाना प्रभारी परशुराम का कहना है कि रतन सिंह पर जानलेवा हमला व चीनी मिल में तोड़फोड़ करने का मामला दर्ज है।

मवाना (मेरठ) से पत्रकार संदीप नागर की रिपोर्ट.

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हमारा लोकतंत्र दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों को सिर्फ जेल दे पाया : शिवमूर्ति

लखनऊ । रिहाई मंच ने ‘अवैध गिरफ्तारी विरोध दिवस’ के तहत यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में ’अवैध गिरफ्तारियां और इंसाफ का संघर्ष’ विषयक सेमिनार का आयोजन किया। आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए खालिद मुजाहिद जिनकी पुलिस व आईबी अधिकारियों द्वारा मई 2013 में हत्या कर दी गई थी, उनकी 2007 में हुई फर्जी गिरफ्तारी की सातवीं बरसी पर यह आयोजन किया गया। सेमिनार को संबोधित करते हुए साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि आज जेलों में तमाम लोग 10-10 सालों से उन मामलों में बंद हैं जिसमें अधिकतम सजा ही दो साल है। इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की है। इससे साबित होता है कि पूरी व्यवस्था ही इन तबकों के खिलाफ है। सबसे शर्मनाक कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता में आई पार्टियों के शासन में भी यह सिर्फ जारी ही नहीं है बल्कि इनमें बढ़ोत्तरी ही हो रही है। खालिद का मामला इसका उदाहरण है। यह सिलसिला तभी रुकेगा जब मुसलमानों को आतंकवाद के नाम पर फंसाने और उन्हें फर्जी एंकाउंटरों में मारने वाले जेल भेजे जाएंगे जैसा कि गुजरात में देखने को मिला।

इस अवसर पर दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा कि अवैध गिरफ्तारियों का सवाल सामान्य नहीं है। यह एक बिजनेस माडल है। इसका एक ग्लोबल स्ट्ररक्चर है और इसे समझने की जरूरत है। यह सवाल दरअसल देश की बहुसंख्यक आवाम से जुड़ा है। देश के 85 प्रतिशत लोगों की सत्ता में कोई भागीदारी नहीं है। वे कोई आवाज न उठाएं इसीलिए यह सब हथकंडे हैं। उन्होंने कहा कि विचार तंत्र को नियंत्रित करने वाले संगठनों में अमीरों का कब्जा है। सारी लड़ाई इस लुटेरे आर्थिक तंत्र को वैधता प्रदान करने की कोशिशों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि आज देश के दलित, आदिवासी और मुस्लिम समाज के लोगों का स्थान अपनी आबादी से अधिक जेलों में है। इसके लिए सिर्फ पुलिस ही नहीं बल्कि देश का राजनीतिक ढांचा भी जिम्मेदार है। पश्चिमी यूपी में जिस तरह दलितों और मुस्लिमों में सापंद्रायिक तनाव भड़काया जा रहा है ऐसे में दलितों को सोचना होगा कि जिस हिन्दुत्वादी अस्मिता के तहत वे कभी बसपा तो कभी भाजपा के साथ जाते हैं उस राजनीति ने उन्हें क्या दिया।

उन्होंने कहा कि गुजरात में पहली बार आईपीएस जेल गए और फर्जी एनकाउंटर बंद हो गए। खालिद के मामले में निमेष कमीशन ने भी दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफरिश की है। अगर इस पर अमल हो गया तो फर्जी गिरफ्तारियों में काफी कमी आ जाएगी। मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि रिहाई मंच की इस लड़ाई ने सरकार पर एक दबाव बनाया और उसके बाद सरकार ने हर जिले में एक शासनादेश भेजा कि सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए बेगुनाह छोड़े जाएं। जबकि होना यह चाहिए था कि सरकार मामलों की पुर्नविवेचना के बाद उनको छोडने की बात करती। इससे सरकार ने न्याय के इस सवाल को साम्प्रदायिक राजनीति के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसलिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा।

इस अवसर पर रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि हम आतंकवादियों को छुड़ाने की बात नहीं करते बल्कि बेगुनाहों को छोड़ने की बात करते हैं। सरकार ने वादा किया था कि वह इन नौजवानों को छोड़ेगी और उनका पुर्नवास करेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अभी भी कई बरी लोग पुर्नवास की बाट जोह रहे हैं। रामपुर के जावेद उर्फ गुड्डू, ताज मोहम्मद, मकसूद बिजनौर के नासिर हुसैन और लखनऊ के मोहम्मद कलीम जैसे बेगुनाह बरी होने के बावजूद किसी भी तरह के पुर्नवास से वंचित है। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों बाराबंकी पुलिस द्वारा खालिद मुजहिद की हत्या पर की गई झूठी विवेचना को खारिज करते हुए न्यायालय ने इस मामले की जांच बाराबंकी एसपी को पुनः कराने का निर्देश दिया था। आज खालिद के चचा जहीर आलम फलाही ने उन्हें बताया कि आज वही दरोगा उन्हें फोन किया था कि वे आकर अपनी गवाही दें। दोषपूर्ण विवेचक द्वारा पुनः विवेचना कराना न सिर्फ न्यायालय की अवमानना है, इससे यह भी साबित होता है कि यूपी की सपा सरकार किसी भी हाल में खालिद के हत्यारोपी पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा व अन्य आईबी व पुलिस अधिकारियों को हर कीमत पर बचाना चाहती है। जिससे कि आतंकवाद के मामलों में पुलिस व आईबी के गठजोड़ से पर्दा न उठ सके।

मौलाना खालिद मुजाहिद के चचेरे भाई शाहिद ने कहा कि पूरी दुनिया जानती है कि मेरे भाई को गलत तरीके से उठाया गया। निमेष रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है। लेकिन बावजूद इसके उन्हें पांच साल तक जेल में रखा गया और आखिर में मार डाला गया। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि इंसाफ के इस संघर्ष के कारण उनके हत्यारे जरूर जेल जाएंगे। सपा सरकार उनको बहुत दिनों तक बचा नहीं पाएगी। सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सवाल केवल खालिद की अवैध गिरफ्तारी का नहीं है, अवैध गिरफ्तारियां आज भी लगातार जारी हैं और व्यवस्था के लिए उनके अपने निहितार्थ हैं। ऐसी अवैध गिरफ्तारियां सत्ता को अपनी हुकूमत बचाए रखने के लिए जरूरी हैं ताकि आम जनता डरकर उनके खिलाफ आवाजें उठाना बंद कर दे। उन्होंने कहा कि पश्चिमी यूपी के मुसलमानों को आधार कार्ड, राशन कार्ड के नाम पर धर्मान्तरण करवाया जा रहा है। संघ की साम्प्रदयिक साजिशों में अखिलेश यादव सरकार परदे के पीछे से खेल रही है।

सेमिनार को संबोधित करते हुए ट्रेड यूनियन नेता शिवाजी राय ने कहा कि पूंजीवाद के चरित्र में इस किस्म के अपराध होते हैं। यह सब इस व्यवस्था का अंग है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दस लाख हेक्टेयर जमीन किसानों से छीनी हैं और विरोध करने पर फर्जी मुकदमे लादे जाते हैं। वास्तव में पुलिस का चरित्र ही उत्पीड़क है। एपवा की नेता ताहिरा हसन ने कहा कि खालिद मुजाहिद की सातवीं बरसी पर हम उन्हें याद कर रहे हैं और देश में अवैध गिरफ्तारियों के खिलाफ मजबूत विरोध के लिए इकट्ठा हुए है। खालिद की गिरफ्तारी देश के संविधान पर हमला था जिसे देश की खाकी द्वारा अंजाम दिया गया था। अगर निमेष आयोग कहता है कि खालिद बेगुनाह है तो फिर उस प्रताड़ना का जवाब कौन देगा जो उसे और उसके परिवार को मिली हैं।

सेमिनार में आदियोग, रामकृष्ण, धमेंद्र कुमार, अजीजुल हसन, राजीव प्रकाश साहिर, डा. अनवारुल हक लारी, वर्तिका शिवहरे, ज्योत्सना, रिफत फातिमा, नेहा वर्मा, प्रदीप शर्मा, सीमा राणा, एहसानुल हक मलिक, शिवनरायण कुशवाहा, जैद अहमद फारूकी, सैयद मोईद अहमद, डाॅ अली अहमद, कमर सीतापुरी, जुबैर जौनपुरी, गुफरान खान, खालिद कुरैशी, आफाक, दीपिका पुष्कर, बिलाल हाश्मी, होमेंद्र मिश्र, जाहिद अख्तर, फैजान मुसन्ना, मुजफ्फर लारी, मोहम्मद समी, अख्तर परवेज, महेश चंद्र देवा, शरद जायसवाल,, तारिक शफीक, हरेराम मिश्र, विनोद यादव, लक्ष्मण प्रसाद, शाहनवाज आलम आदि मौजूद थे।

कार्यक्रम में 6 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया –

1- मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की विवेचना को प्रभावित करने वाले हत्यारोपी पुलिस अधिकारियों विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीव नाथ सिन्हा आदि को तत्काल गिरफ्तार किया जाए।

2- अपने चुनावी वादे के मुताबिक सपा सरकार आतंकवाद के आरोपों से अदालतों से दोष मुक्त हुए मुस्लिम युवकों का पुर्नवास सुनिश्चित करे।

3- आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को तत्काल रिहा किया जाए।

4- सपा सरकार अपने वादे के मुताबिक आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करे।

5- ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने वाले हिन्दुत्वादी संगठनों आरएसएस, बजरंगदल, विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उनके दोषी नेताओं को गिरफ्तार किया जाए।

6- आतंकवाद के नाम पर हुई घटनाओं की न्यायिक जांच कराई जाए, जिसके दायरे में खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का लाया जाए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता, रिहाई मंच
09415254919

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अपराधी मीडिया मालिक छुट्टा घूम रहे, विज्ञापन एजेंट को तीन साल की जेल हो गई

किसी अखबार या चैनल मालिक को आपने पेड न्यूज या छंटनी या शोषण या चोरी के मामले में जेल जाते आपने नहीं सुना होगा लेकिन एक विज्ञापन एजेंट को तीन साल की जेल की सजा इसलिए हो गई क्योंकि उसने अखबार में विज्ञापन छपवाकर उसका पेमेंट जमा नहीं कराया. विज्ञापन छपवा कर पैसे न जमा कराना अपराध है. उचित ही सजा मिली. लेकिन ऐसी सजाएं बड़े लोगों को अपराध में क्यों नहीं होती.

सारे के सारे चोर ब्लैकमेलर मीडिया मालिक धड़ल्ले से पेड न्यूज और छंटनी जैसे कुकर्म करते हैं लेकिन इनके खिलाफ कहीं कोई सुनवाई नहीं होती. लेकिन ये अखबार मालिक जब चाहें तब किसी भी विज्ञापन एजेंट या पत्रकार को जेल भिजवा दें, कोई भी आरोप लगाकर. इन ताकतवर मीडिया मालिकों से पुलिस वालों की सेटिंग किसी से छुपी नहीं है. लीजिए पढ़िए विज्ञापन एजेंट के तीन साल जेल वाली खबर….

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