इंडिया टुडे का सेक्स सर्वे और रवीश कुमार का ब्लॉग

सेक्स सर्वे आए दिन होने लगा है। तमाम पत्रिकाएं सर्वे कर रही हैं। सेक्स सर्वेयर न जाने किस घर में जाकर किससे ऐसी गहरी बातचीत कर आता है। कब जाता है यह भी एक सवाल है। क्या तब जाता है जब घर में सिर्फ पत्नी हो या तब जाता है जब मियां बीबी दोनों हों। क्या आप ऐसे किसी को घर में आने देंगे जो कहे कि हम फलां पत्रिका की तरफ से सेक्स सर्वे करने आए हैं या फिर वो यह कह कर ड्राइंग रूम में आ जाता होगा कि हम हेल्थ सर्वे करने आए हैं।

एक ग्लास पानी पीने के बाद मिसेज शर्मा को सेक्स सर्वे वाला सवाल दे देता होगा। मिसेज शर्मा भी चुपचाप बिना खी खी किए सवालों के खांचे में टिक कर देती होंगी। और सर्वेयर यह कह कर उठ जाता होगा कि जी हम आपका नाम गुप्त रखेंगे। सिर्फ आपकी बातें सार्वजनिक होंगी। मिसेज शर्मा कहती होंगी कोई नहीं जी। नाम न दीजिए। पड़ोसी क्या कहेंगे। सर्वेयर कहता होगा डोंट वरी…पड़ोसी ने भी सर्वे में जवाब दिए हैं। मिसेज शर्मा कहती होंगी…हां….आप तो…चलिए जाइये।

ज़रूरी नहीं कि ऐसा ही होता हो। मैं तो बस कल्पना कर रहा हूं। सर्वे में शामिल समाज को समझने की कोशिश कर रहा हूं। क्या हमारा समाज हर दिन सेक्स पर किसी अजनबी से बात करने के लिए तैयार हो गया है। हर तीन महीने में सेक्स का सर्वे आता है। औरत क्या चाहती है? मर्द क्या चाहता है? क्या औरत पराई मर्द भी चाहती है? क्या मर्द हरजाई हो गया है? क्या शादी एक समझौता है जिसमें एक से अधिक मर्दो या औरतों के साथ सेक्स की अनुमति है? क्या सेक्स को लेकर संबंधों में इतनी तेजी से बदलाव आ रहे हैं कि हर दिन किसी न किसी पत्रिका में सर्वे आता है?

हो सकता है कि ऐसा होने लगा हो। लोग नाम न छापने की शर्त पर अपनी सेक्स ज़रूरतों पर खुल कर बात करते हों। समाज खुल रहा है। सेक्स संबंधों को लेकर लोग लोकतांत्रिक हो रहे हैं। क्या सेक्स संबंधों में लोकतांत्रिक होने से औरत मर्द के संबंध लोकतांत्रिक हो जाते हैं? या फिर यह संबंध वैसा ही है जैसा सौ साल पहले था। सिर्फ सर्वे वाला नया आ गया है। सर्वे वाला टीन सेक्स सर्वे भी कर रहा है। लड़के लड़कियों से पूछ आता है कि वो अब कौमार्य को नहीं मानते। शादी से पहले सेक्स से गुरेज़ नहीं। शादी के बाद भी नहीं। सेक्स सर्वे संडे को ही छपते हैं। सोमवार को नहीं। क्या इस दिन सेक्स सर्वे को ज़्यादा पढ़ा जाता है।

आज के टाइम्स आफ इंडिया में भी एक कहानी आई है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ लड़के लड़कियों ने बताया है कि वो शादी संबंध के बाहर सिर्फ सेक्स के लिए कुछ मित्र बनाते हैं। फन के बाद मन का रिश्ता नहीं रखते। सीधे घर आ जाते हैं। इस कहानी में यही नहीं लिखा है। जब पति पत्नी को पता ही होता है कि उनके बीच दो और लोग हैं। तो सेक्स कहां होता होगा। घर में? इसकी जानकारी नहीं है। सिर्फ कहानी है। ऐसी कि आप नंदीग्राम छोड़ सेक्सग्राम की खबरें पढ़ ही लेंगे। सेक्स संबंधों में बदलाव तो आता है। आ रहा है। हमारा समाज बहुत बदल गया है। लेकिन वो सर्वे में आकर सार्वजनिक घोषणा करने की भी हिम्मत रखता है तो सवाल यही उठता है कि वो अपना नाम क्यों छुपाता है। क्या सिर्फ 2007 के साल में ही लोग शादी से बाहर सेक्स संबंध बना रहे हैं? उससे पहले कभी नहीं हुआ? इतिहास में कभी नहीं? अगली बार कुछ सवालों का सैंपल बनाकर मित्रों के बीच ही सर्वे करने की कोशिश कीजिएगा। पता चलेगा कि कितने लोग जवाब देते हैं। या नहीं तो किसी बरिस्ता में बैठे जोड़ों से पूछ आइयेगा। जवाब मिल गया तो मैं गलत। अगर मार पड़ी तो अस्पताल का बिल खुद दीजिएगा।

(रवीश कुमार एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये आलेख उनके ब्लॉग पर छपा है। वहीं से साभार) 

सहारा ने सैट के आदेश को दी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, सोमवार को सुनवाई

सहारा समूह ने प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट) के आदेश को आज उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। सैट ने करीब तीन करोड़ निवेशकों के ब्याज सहित करीब 24,000 करोड़ रुपये लौटाने के मामले में सहारा समूह की दो कंपनियों द्वारा बाजार नियामक संस्था भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के खिलाफ दायर अपील कल खारिज कर दी थी। मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसकी सुनवाई सोमवार के लिए तय कर दी। सहारा के वकील ने पीठ से कहा कि कंपनी शीर्ष न्यायालय की रजिस्ट्री में 5,100 करोड़ रुपये का ड्राफ्ट जमा करने को पहले ही से तैयार है।

इससे पहले सहारा समूह ने अपनी अपील में निवेशकों का धन लौटाने के मामले में न्यायाधिकरण से हस्तक्षेप का आग्रह किया था। समूह ने आरोप लगाया था कि सेबी इस मामले में उसके खिलाफ गलत तरीके से उच्चतम न्यायालय के आदेश का अनुपालन न करने का आरोप लगा रहा है। न्यायाधिकरण ने हालांकि कहा था कि इस मामले में किसी तरह का और निर्देश उच्चतम न्यायालय की ओर से ही दिया जा सकता है। ऐसे में इस अपील को खारिज किया जाता है।

उच्चतम न्यायालय ने सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लि. और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लि. को तीन करोड़ निवेशकों का 24,000 करोड़ रुपया 15 फीसदी के सालाना ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने सेबी को निर्देश दिया था कि वह तीन करोड़ बॉन्डधारकों के धन की वापसी को इन कंपनियों से सुनिश्चित करवाएं। न्यायालय ने कंपनियों को इन निवेशकों से जुड़े दस्तावेज दस दिन के भीतर सेबी के पास जमा करने के साथ कहा कि उनकी राशि तीन महीने के भीतर वापस की जाए। (एजेंसी)

sebi sahara

फेसबुक पर बाल ठाकरे के खिलाफ एक और आपत्तिजनक टिप्‍पणी

मुंबई : पालघर से फेसबुक पर कमेंट करने का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। ठाणे के पालघर शहर से फेसबुक से जुड़ा एक और मामला प्रकाश में आया है। शुक्रवार को इस सिलसिले में चौथी आपत्तिजनक टिप्पणी सामने आई। पुलिस को एक स्थानीय अखबार के ‘फर्जी’ फेसबुक एकाउंट पर दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से जुड़े ‘आपत्तिजनक’ कमेंट को लेकर शिकायत मिली है। 'पालघर मिरर' नामक पाक्षिक अखबार के नाम पर फर्जी अकाउंट बना कर किसी ने बाल ठाकरे के खिलाफ फिर से आपत्तिजनक फोटो और टिप्पणी पोस्ट की है।

एक एजेंसी के मुताबिक अखबार के संपादक मोहम्मद हुसैन नादी सरवर खान (30 वर्ष) ने इस बारे में पुलिस को सूचित किया है। पालघर से मराठी और हिंदी भाषाओं में छपने वाले इस समाचार पत्र के संपादक हुसैन ने पुलिस को शिकायत में बताया है कि उनके अखबार का किसी ने फर्जी अकाउंट बनाया और उससे बाल ठाकरे के खिलाफ आपत्तिजनक फोटो और टिप्पणी पोस्ट कर दी। लेकिन बाद में इस अकाउंट को बंद कर दिया गया। गौरतलब है कि बाल ठाकरे के निधन के बाद फेसबुक पर कमेंट करने वाली पालघर की दो युवतियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया गया था। राज्य सरकार ने तीखी आलोचनाओं के बाद पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया था।

न्‍यायिक हिरासत में जेल भेजे गए सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया

: शनिवार को होगी जमानत पर सुनवाई : जी और जिंदल ग्रुप स्टिंग ऑपरेशन विवाद में गिरफ्तार किए गए जी समूह के दोनों संपादकों सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को कोर्ट ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। दोनों संपादकों को दिल्ली के साकेत कोर्ट में पेश किया गया जहां अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। दोनों संपादकों को कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल की कंपनी की ओर से जबरन वसूली की शिकायत का मामला दर्ज कराने के बाद गिरफ्तार किया गया था।

पुलिस ने दोनों संपादकों को बुधवार को दो दिन की रिमांड पर लिया था। शुक्रवार को दोनों संपादकों की पेशी साकेत कोर्ट में की गई, जहां सुनवाई के बाद जज ने दोनों को चौदह दिन की न्‍यायिक हिरासत में जेल भेज दिया। 14 दिसम्‍बर को फिर से दोनों संपादकों की कोर्ट में पेशी होगी। पुलिस के अनुसार जी के सेल्स हेड अमित त्रिपाठी, कानून सलाहकार ए मोहन और सुभाष चंद्रा के भाई जवाहर गोयल का बयान रिकॉर्ड कर लिया गया है। आरोपियों के वकील ने कोर्ट में दोनों की जमानत अर्जी भी दाखिल की है जिस पर 1 दिसंबर को सुनवाई होगी।


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”वर्तमान में घनश्‍याम सुयाल का नहीं है चैनल वन से कोई नाता”

चैनल वन ने भड़ास4मीडिया को पत्र भेजकर स्‍पष्‍ट किया है कि देहरादून में गिरफ्तार हुए घनश्‍याम सुयाल उनके ब्‍यूरोचीफ नहीं हैं. अपने पत्र में चैनल वन का कहना है कि घनश्‍याम चैनल वन के साथ दिसम्‍बर 2010 से लेकर सन 2011 के मध्‍य तक जुड़े हुए थे. इसके बाद इनका चैनल से कोई संबंध नहीं था. वर्तमान में चैनल वन के ब्‍यूरोचीफ अनुज अग्रवाल हैं. गौरतलब है कि घनश्‍याम को पुलिस ने एक व्‍यक्ति की हत्‍या कराने की कोशिश के आरोप में पकड़ा है. नीचे चैनल वन द्वारा भेजा गया पत्र एवं इस संदर्भ में प्रकाशित खबर.

 

सुपारी किलर निकला चैनल वन का उत्तराखण्ड ब्यूरो चीफ

दैनिक भास्‍कर से अमल एवं तरुण का इस्‍तीफा

दैनिक भास्‍कर, भोपाल से खबर है कि दो लोगों ने इस्‍तीफा देकर दूसरे संस्‍थानों से अपनी नई पारी शुरू की है. भास्‍कर के नेशनल न्‍यूज रूम में कार्यरत सीनियर सब एडिटर अमल चौधरी यहां से इस्‍तीफा देकर दिल्‍ली में हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन कर लिया है. वे काफी समय से भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे रहे थे. अमल इसके अलावा भी कई संस्‍थानों को अपनी सेवा दे चुके हैं. उनकी गिनती अच्‍छे पत्रकारों में की जाती है.

दूसरी तरफ नेशनल न्‍यूज रूम में ही कार्यरत कम्‍प्‍यूटर डिजाइनर तरुण यादव ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी नईदुनिया से शुरू कर दी है. तरुण भी लम्‍बे समय से भास्‍कर को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि दोनों लोग वरिष्‍ठों के व्‍यवहार से तंग आकर संस्‍थान छोड़ने का निर्णय लिया है.

क्‍या कोई टीवी रिपोर्टर फेसबुक पर लिखने वालों का औकात तय करेगा?

पंकज झा तेजतर्रार पत्रकार हैं. छत्‍तीसगढ़ में दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं. पंकज फेसबुक पर भी काफी सक्रिय रहते हैं. समसामयिक तथा राजनीतिक मुद्दों पर भी खुलकर लिखते-बोलते हैं. फेसबुक पर ही एक कमेंट पर ए‍नडीटीवी के किसी कर्मचारी ने उन्‍हें औकात में रहने की हिदायत दी है. इस मामले पर पंकज लिखते हैं कि एनडीटीवी के कर्मचारी अखिलेश शर्मा को हम सभी जानते हैं. अगर आप मेरे नीचे के पोस्ट पर आयी उनकी टिप्पणी पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि अकड़ केवल सुधीर चौधरी में ही नहीं थी. कैमरा हाथ में आ जाने के बाद किस तरह लोग खुद को खुदा समझने लग जाते हैं उसका उदहारण आपको नीचे के पोस्ट में मिलेगा. ''तुमसे पहले जो शख्स यहां गद्दीनशी था, उसे भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था.''  पंकज झा का कहना है कि अब पाठक ही यह तय करें कि क्या कोई टीवी रिपोर्टर भी अब फेसबुक पर लिखने वालों का औकात तय करेगा?

Pankaj Jha : दो घोटाला आपस में गड्ड-मड्ड हो गए हैं. दोनों के सरगनाओं की गिरफ्तारी होनी चाहिए. कोलगेट के लिए मनमोहन सिंह की और न्युजगेट के लिए सुभाष चन्द्रा की.

विकास भारतीय : यह कारपोरेट, सरकार और मीडिया का कॉकटेल है, जिसमें जनता का भरपूर खून मिला है और जिसे पीने पर खूब नशा भी आता है। यह इस नशे का ही असर है कि ये तीनों मिलकर लोकतंत्र को बेसुध किए हैं। जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया जैसे लोगों का नशा जेल से निकलने के बाद भी हिरण नहीं होगा…और क्‍यों हो बर्खा दत्‍त, वीर सांघवी, प्रभू चावला, प्रणव राय, राजदीप सरदेसाई…का भरापूरा उदाहरण इनके सामने है। ये तो केवल 100 करोड की दलाली कर रहे थे, वो भी शायद मालिक या प्रबंधन के कहने पर..यहां उपरोक्‍त महानुभावों ने तो सरकार को बचाने और मंत्री बनवाने जैसी दलाली की, एनडीटीवी और हिंदुस्‍तान टाइम्‍स ने कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में अपना वारा-न्‍यारा किया, भास्‍कर जैसे संस्‍थान ने खुद कोयला ब्‍लॉक हासिल किया… ये खेल तो और चलेगा और तब तक चलेगा जब तक इस देश के 'आम आदमी' के रगों में खून का आखिरी कतरा बचा है…आखिर 'लाल रंग' का नशा ऐसे ही तो नहीं उतरता है न!

Akhilesh Sharma : और उस बीजेपी से सवाल पूछो जिसने पिछला सत्र नहीं चलने दिया मनमोहन सिंह के इस्तीफ़े की मांग पर। अब क्या साँप सूंघ गया? कहाँ गई वो मांग? अब तो मुद्दा बदल गया क्योंकि गडकरी का सवाल आएगा तो कहाँ जाएँगे?

Akhilesh Sharma : पीएम की गिरफ़्तारी की मांग करते हो। तुम्हारी हैसियत है ये सवाल करने की। वो भारत के प्रधानमंत्री हैं कम से कम उस पद की गरिमा का ख्याल रखो।

Pankaj Jha : ये लोकतंत्र है अखिलेश. आपका पहला कमेन्ट ज़रूर गौर करने लायक था लेकिन दूसरी टिप्पणी कहीं से यह नहीं लग रहा है कि आप की हो. यहां हैसियत देख कर सच और झूठ का फैसला नहीं किया जाता. हम सब जानते हैं कि कोयला आवंटन में 1 लाख 86 हज़ार करोड़ के नुकसान का आकलन है और उस समय कोयला विभाग मनमोहन सिंह के अधीन था. सो उस अपराध में हम भारत के लोग अपने सेवक मनोमहन सिंह को बर्खास्त करने का प्रस्ताव करते हैं. यह मेरी हैसियत के अंदर की बात है. आश्चर्य लग रहा है आप के जैसा प्रबुद्ध पत्रकार इसमें हैसियत का सवाल कहां देखने लगा. भारत के नागरिक होने के नाते हम हज़ार बार यह कहना चाहेंगे कि पीएम इस्तीफा दें और उन्हें गिरफ्तार किया जाय.

Akhilesh Sharma : चमड़े की ज़बान है। हिलाओ क्या फ़र्क पड़ता है। लोक तंत्र को नाम पर ये बकवास भी सुनी। प्रधानमंत्री को गिरफ़्तार करने की मांग? कौन सी दुनिया में रहते हो?

Akhilesh Sharma : और मैं कोई प्रबुद्ध पत्रकार नहीं हूँ।

डॉ.सौरभ मालवीय : अखिलेश जी आज कल सिटीजन जनरलिस्ट का भी समय है, आप की नाराजगी आश्चर्य? लोकतन्त्र है

Pankaj Jha : आप दुबारा पोस्ट पढ़िए. मनमोहन सिंह के गिरफ्तारी की मांग है, प्रधानमंत्री की नहीं. ज़ाहिर है पद की गरिमा का ख़याल कर के ही नाम से लिखा है.

Pankaj Jha : यानी इस्तीफा होगा उनका या वे हारेंगे और फिर गिरफ्तार होंगे हम उस दिन की बाट जोह रहे हैं अखिलेश..

Pankaj Jha : प्रबुद्ध तो हम लोग चैनल का नाम देख कर समझ लेते हैं. हालांकि यह पैमाना सच में गलत है. अखिलेश.  आपके डिस्क्लेमर (कि आप प्रबुद्ध नहीं हैं) के बाद यह साबित हो गया.

डॉ.सौरभ मालवीय : पंकज जी, मनमोहन सिंह जी कहां से चुनाव जीत कर आए है? फिर हारने की चर्चा होगी कृपया बताए?

Akhilesh Sharma : तो ख़ुश रहो। चैनल का नाम देखो और पत्रकार की औक़ात तय करो। मेरी फ़्रेंड लिस्ट में ग़लती से शामिल हो गए। अब पीएम को गिरफ़्तार कर वापस आना। टाटा

Pankaj Jha : पी एम को नहीं मनमोहन सिंह को. हालांकि ऐसी असहिष्णुता वास्तव में यही साबित करता है कि आज का इलेक्ट्रोनिक मीडिया उसी काबिल है जिसकी चर्चा (सुधीर चौधरी के सन्दर्भ में) आज दिन भर हो रही है. उफ्फ्फ..कौन से देवताई का घमंड है भाई. समझ नहीं आ रहा है अखिलेश.

डा. अनिल पांडेय : बरखा वाला चैनल  NDTV नारायण दत्त तिवारी वीडियोज

डा. अनिल पांडेय : ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी और बिज़नेस हेड समीर आहुलवालिया की आज हुई गिरफ़्तारी का स्वागत किया जाना चाहिए। मीडिया के लिए यह बहुत अच्छा सबक है। यह और ऐसा कुछ बहुत पहले होना चाहिए था। आगे यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। भस्मासुर में तब्दील होती जा रही मीडिया और उस के सरोकार जिस तरह हमारे सामने है, यह झटका बहुत पहले मिलना चाहिए था। जिस तरह मीडिया पर प्रबंधन और उस का व्यवसाय हावी होता जा रहा है, संपादक नाम की संस्था अब दलाल, लायजनर, मैनेजर और मालिकों का पिट्ठू बन कर जन-सरोकारों से मुंह मोड़ कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय देखने में लग गई है, वह हैरतंगेज़ है। सिर्फ़ और सिर्फ़ मीडिया मालिकों के हित साधने में लगे संपादकों को उन की इस कुत्तागिरी के लिए जितनी सज़ा दी जाए कम है। मीडिया को बचाने के लिए यह बहुत ज़रुरी हो गया है। ऐसे तमाम मालिकों और संपादकों को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए जो समाचार और व्यवसाय का फ़र्क भूल कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय जानते हैं। मालिकों की तिजोरी भरना जानते हैं। और सांसद और उद्योगपति नवीन ज़िंदल तो कोयला स्कैम में गले तक धंसे पड़े हैं, उन की भी जगह जेल ही है। कानून अगर ठीक से काम करेगा तो ज़िंदल भी एक-न-एक दिन जेल में ज़रुर होंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि कानून बड़े अपराधियों के खिलाफ़ काम करते समय सो जाता है और यह बड़े अपराधी बेल ले कर मज़े लेते हैं। अब देखिए न कि फ़ेसबुक पर कमेंट करने वाली लड़कियां कितनी जल्दी गिरफ़्तार हो जाती हैं, पुलिस और जज सभी एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। पर बाल ठाकरे जीवन भर कानून हाथ में लिए रहे पर उन का क्या हुआ? उन्हें तिरंगे में लपेट कर विदा किया गया। यह देश और देश के स्वाभिमान पर एक गंभीर तमाचा है। जूता है देश-प्रेमियों के मुंह पर। पर मीडिया इस पर खामोश है।!!!!!!..

(हर बार की तरह ही विचार पूरी तरह से निजी नही चोरी की है…!!)

Gopal Samanta : Media -medium of entertainment through dramatic and idiotic acts….

Vinay Pandey : Ye Akhilesh ji garam kahe ho gaye ? Bhai democracy men to sabase bada haisiyatdaar janta hai. PM to hamara naukar hai ji. sewak. usaki kya haisiyat hai. agar aap loktantr ki baat karate hain to. par ek aadami ka naam aapane kyun chhod diya NAVIN JINADAL ka naam ?

Thakur Gautam Katyayn : अखिलेश जी आप तो उम्र में मुझसे बड़े हैं, फिर भी आपको मुफ्त में सलाह देना चाहूँगा, "आप दांत के बदले जीभ बनना सीखिए अन्यथा सामाजिक जीवन से संन्यास ले लीजिए, अन्यथा बहुत बड़ा दुर्घटना होने वाला है आपके जीवन में और फिर पछताने से कुछ नहीं होगा और आप भी नीरा राडिया और बरखा दत्त की श्रेणी में आकर धन से तो मजबूत होंगे लेकिन जन से नहीं, आप जैसे 'महात्मा पत्रकार' की क्या औकात होती है यह सबों को पता है…

Ashish Kumar 'Anshu' : Akhilesh Sharma: lagta hai aaPka gussa kaheen aur hai, nikal kaheen aur raha hai? kyonki aaPaki bhasha natural naheen lag rahee hai…

Manish Chandra Mishra : मेरे पास पक्की जानकारी है। अखिलेश जी एनडीटीवी के लिए विजज्ञापन नहीं ला पाये और अब उनके नौकरी पे बन आई है। बोले तो पूरे के पूरे फ्रस्ट्रेसन में चल रहा है उनका मामला। ;);)

Sushil Shukla : भटगांव एक्स्टेंशन 1,2, के लिए किसकी? पूर्ति के लिए किसकी? मदनपुर नार्थ के लिए किसकी? गिरफ्तारी होनी चाहिए ….

Pankaj Jha : सबकी गिरफ्तारी होनी चाहिए  Sushil Shukla जी. सहमत हूं आपसे. लेकिन शुरुआत सरगना से होना चाहिए. अन्याय यहीं पे हो जाता है कि सरगना तो बच जाता है और छोटे-छोटे चोरों के चक्कर में हम पड़े रहते हैं. बिना लाग-लपेट के दो टुक बात यह बार-बार कहना है कि कोल आवंटन के समय यह विभाग मनमोहन सिंह के पास था, पहले उनका इस्तीफा हो. वे गिरफ्तार हों. फिर चाहे जितने को और जिसको सूली पे चढाना ज़रूरी हो चढ़ाते रहिये.

Shravan Kumar Shukla : NDTV Congres ke mukhpatra ki tarah hai.. jo sari dunia janti hai.. SARKARI chamchai karke Seat Hathiyane me inka koi jod nahi

Ravindra Nath : कैसे कैसे बदतमीज लोग भरे पड़े हैं, सच में आश्चर्य होता है. अभी कुछ दिन पहले ही, एक सज्जन मेरे तर्कों को काट नहीं पाए तो उसे कुतर्क करार दे दिया, और मैंने ज़रा उनके प्राण प्रिय देवता परम आदरणीय (उनके लिए) के लिए खुजलीवाला लिख दिया तो ऐसे बिदक गए जैसे किसी ने काट खाया हो, ऐसे लोग किसी काम के नहीं होते सिवाय चमचागिरी के.

Sushil Jhunjhunwala : जिंदल ने मुफ्त कोल ब्लाक लिये लेकिन बिजली खुले बाजार में बेची। पी एम ओ के कितने लोग देशको चूना लगाने के इल्जाम का शिकार हुए। केजड़ी आया तो क्यू लग जायेगी तिहाड़ जाने की।

पंकज झा के फेसबुक वॉल से साभार.   

सरकार की भी नहीं सुन रही यूपी की नौकरशाही

: खामियों का पुतला बने अधिकारी : उत्तर प्रदेश की नौकरशाही निरंकुश और स्वेच्छाचारी है। यह आरोप समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने विधान परिषद में लगा कर कोई नई बात नहीं कही है। ब्यूरोक्रेसी निरंकुश और स्वेच्छाचारी ही नहीं भ्रष्ट और मौकापरस्त भी हो गई है। बेलगाम नौकरशाही की हालत यह है कि उसका अधिकांश समय अब अब शासन-प्रशासन चलाने से अधिक ‘राजनीति’ करने और और राजनैतिज्ञों के इर्दगिर्द मंडरा कर अपना मकसद पूरा करने में जाता है। बसपा सरकार के समय में भी नौकरशाहों ने अपनी बेढंगी चाल के लिए खूब नाम कमाया था, लेकिन तब उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मायावती के आदेश की वह अवहेलना कर पाते, वह सहमें हुए रहते थे, लेकिन बसपा सरकार की अन्य कई मंत्रियों की स्थिति ऐसी नहीं थी, उन्हें अपना काम कराने के लिए नौकरशाहों के कमरों तक में जाना पड़ जाता था। समाजवादी सरकार के सत्ता में आते ही नौकरशाहों के ऊपर से सत्ता का डर बिल्कुल ही जाता रहा।

अब तो वह मंत्रियों की बात तो दूर है मुख्यमंत्री तक की नहीं सुनते हैं। यह वो ही नौकरशाही है जिसे कभी मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपने हिसाब से हॉकते थे। 24 जून 1991 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तत्काल बाद उन्होंने पत्रकार वार्ता में नौकरशाही की तुलना घोड़े से करते हुए कहा था ‘नौकरशाही एक बेलगाम घोड़े की तरह है। यदि घुड़सवार (मुख्यमंत्री) की रानों (जाघों) में ‘घोड़े‘ को काबू में रखने की कूबत (ताकत) नहीं है तो वह (नौकरशाही) और भी बेलगाम होती जायेगी।‘ कल्याण ने यह बात सिर्फ कही नहीं थी, बल्कि इसे कर के  भी दिखाया था। आज की तारीख में अपवाद को छोड़कर करीब-करीब सभी नौकरशाह खामियों का पुतला बन गये हैं।

नौकरशाहों की नकेल अगर इस समय थोड़ी बहुत कस पा रहा है तो वह है हमारी न्यायपालिका, जिसके आगे ब्यूरोक्रेट्स की एक नहीं चलती है। वह डरती है तो अदालत से ही। 1971 बैच की आईएएस और यूपी की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव (अब सेवानिवृत) और 1983 बैच के आईएएस तथा मौजूदा प्रमुख सचिव (नियुक्ति) राजीव कुमार को सीबीआई अदालत ने नोयडा आवंटन घोटाले में तीन-तीन वर्ष की कठोर सजा सुनाकर नौकरशाहों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह भले ही राजनैतिज्ञों को अपने हिसाब से समझाते रहें, लेकिन अदालत की पैनी नजर के चलते उनकी मनमानी करने के दिन लद गए हैं, सब जानते हैं कि अगर नीरा यादव और राजीव जैसे दर्जनों नौकरशाहों के घोटालों की जांचे बरसों से दबाई नहीं जा रही होती तो कई और नौकरशाह भी जेल की सलाखों के पीछे होते। नौकरशाह ही इन जांचों पर कुंडली मारे बैठे हैं। इसमें से कई भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों को तो महत्वपूर्ण और मलाईदार पदों पर तैनाती तक मिली हुई है। अपने समय की चर्चित आईएएस अधिकारी और कई ‘सरकारों’ की विश्वासपात्र रहीं नीरा यादव को सजा सुनाएं जाने से ब्यूरोक्रेसी में हड़कम्प मचा है। वैसे तो नीरा यादव से पूर्व उत्तर प्रदेश के एक और नौकरशाह अखंड प्रताप सिंह को भी मुख्य सचिव के पद पर रहते जेल जाना पड़ा था, लेकिन उन्हें अभी सजा नहीं सुनाई गई है।

यहां यह बताना भी जरूरी होगा की यूपी आईएएस एसोसियेशन भी इन नौकरशाहों के भ्रष्टाचार से तंग थी और 1997 में एक नई परम्परा डालते हुए एसोसियेशन ने जिन तीन महाभ्रष्ट नौकरशाहों का चुनाव मतदान से किया था उसके भी अखंड प्रताप सिंह पहले, नीरा यादव दूसरे और बृजेन्द्र यादव तीसरे स्थान पर रहे थे। नीरा यादव को पहली बार सजा नहीं सुनाई गई है, इससे पूर्व भी उन्हें 2010 में नोयडा भूखंड आवंटन के एक अन्य मामले फ्लैक्स जमीन घोटाले में चार साल की सजा हुई थी और जेल भी जाना पड़ा था। करीब 15 वर्ष पूर्व नोयडा घोटाले का जब खुलासा हुआ तो इस पर सीबीआई के तत्कालीन निदेशक विजय रामाराव ने कैबिनेट सचिव तथा यूपी के राज्यपाल को लिखित तौर पर बताया था कि आईएएस नीरा यादव ने नोयडा के सीईओ तथा अध्यक्ष पद पर रहते हुए अपने पद का दुरुपयोग किया और करोड़ों की जमीन रिश्तेदारों को आवंटित कर दी। इस पर तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने मामले की जांच के लिए 1997 में जस्टिस मुर्तजा हुसैन की अध्यक्षता में कमेटी बना दी, जिसने भी उन्हें दोषी करार दिया गया, लेकिन तत्कालीन कल्याण सरकार ने इस मामले में कुछ नहीं किया। सीबीआई ने जांच की अनुमति मांगी तो सरकार ने इसे गैर जरूरी बता कर पल्ला मामला रफा-दफा करने की कोशिश की, लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के चलते मामला दब नहीं पाया।

सीबीआई की गाजियाबाद अदालत में यह मामला चल रहा था, जिस पर 20 नवंबर 2012 को विशेष न्यायाधीश एस लाल ने तीन-तीन वर्ष की कैद और एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगया। नीरा यादव जब तक सेवा में रहीं उनकी तूती बोलती थी, वह यूपी आईएएस एसोसियेशन की अध्यक्ष भी रह चुकी थीं। 1997 में मुर्तजा हसन आयोग ने भी उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी करार दिया था, इतना ही नहीं वह देश की पहली आईएएस अधिकारी भी थीं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते यूपी के मुख्य सचिव पद से हटाया था। इसी तरह से 1981 जिस प्रदीप शुक्ला ने आईएएस सेवा में टॉप किया था, वह 2012 आते-आते भ्रष्टाचार के चलते (एनआरएचएम घोटाला) जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गये थे। नीरा यादव जब भ्रष्टाचार के दलदल में फंस गई तो अपना दामन बचाने के लिए उन्होंने राजनीति का सहारा लिया और भारतीय जनता पार्टी में शामिल भी हो गईं, लेकिन सजा मिलने के बाद यहां भी उनकी महत्वाकांक्षा को विराम लग गया।

उक्त के अलावा भी उत्तर प्रदेश के करीब दर्जन भर नौकरशाह ऐसे हैं जिनके दामन दागदार है। इसमें से कुछ मामले अदालत में साबित हो चुके हैं तो कुछ को फैसले का इंतजार है। आईएएस नीरा यादव, अखंड प्रताप सिंह, प्रदीप शुक्ला और राजीव कुमार की तरह ही 1980 बैच के भ्रष्टाचार के अरोपों से घिरे आईएएस तुलसी गौड़ पर भी निर्यात निगम के एमडी के पद पर रहते, पद के दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगा था। इस कारण उनकी प्रोन्नति भी प्रभावित हुई थी। वह सचिव पद पर रहते ही रिटायर्ड हो गए थे। आईएएस बीएस लाल, सिद्धार्थ बेहुरा, के धनलक्ष्मी, विजय शंकर पांडेय, शशि भूषण, महेश गुप्ता भी विवादों में फंसते रहे हैं।

बहरहाल, नौकरशाहों की छवि आम जनता के बीच ही नहीं समाजवादी सरकार की नजरों में भी अच्छी नहीं है। इस बात का खुलासा सपा सरकार के मुखिया अखिलेश यादव और उनके मंत्रियों द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों से साफ हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि ब्यूरोक्रेट्स अपनी छवि सुधारने के लिए स्वयं पहल करें। समाजवादी पार्टी के विधान परिषद सदस्य देवेन्द्र प्रताप ने विधान परिषद में नौकरशाही की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करके उन तमाज जनप्रतिनिधियों की भी वाहवाही लूट ली जो ब्यूरोक्रेसी से त्रस्त चल रही है। सरकार ने अपने विधायक के इस आरोप पर कोई प्रश्न चिन्‍ह लगाने के बजाये यह कहकर बेचैनी और भी बढ़ा दी कि यह कार्यसंस्कृति लंबे समय से बिगड़ी है। कई मंत्रियों को भी यह कहते सुना गया कि नौकरशाही के समय उनकी भी नहीं चलती। उम्मीद करना चाहिए सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव अपने मुख्यमंत्रित्व काल के अनुभव का फायदा मुख्यमंत्री अखिलेश को भी देंगे ताकि वह नौकरशाही पर नियंत्रण करके प्रदेश को तरक्की के मार्ग पर ले जा सकें।

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं. वे यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं.

सेलरी कटने से इंडिया न्यूज कर्मी भड़के, एचआर हेड को घेरा

इंडिया न्यूज चैनल के कर्मी भयंकर गुस्से में हैं. इन लोगों की सेलरी अनाप शनाप तरीके से काट ली गई है. आरोप लगाया गया है आफिस लेट आने का. पर जिन लोगों ने ओवर टाइम किया, उन्हें ओवरटाइम नहीं दिया गया. लेकिन लेट आने के नाम पर कई कई हजार रुपये सेलरी काट ली गई. यह कटौती सैकड़ों कर्मियो की सेलरी से की गई है.

इससे नाराज कर्मचारियों ने आज एचआर हेड सुषमा को घेर लिया. उन्हें नाइंसाफी के बारे में बताया गया पर वह कटौती खत्म करने को राजी नहीं हुईं. कम सेलरी में काम करने वाले और काम के बोझ से दबे इंडिया न्यूज कर्मी बेहद परेशान और गुस्से में हैं. वे इन हालात में प्रबंधन को बददुआ दे रहे हैं. ताजी खबर के मुताबिक इंडिया न्यूज कर्मी टाप मैनेजमेंट को पत्र लिखकर अपनी पीड़ा जताने की योजना बना रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इंडिया न्यूज प्रबंधन ने अपने कर्मियों को दीवाली पर भी बोनस नहीं दिया. अब सेलरी काट कर जले पर नमक छिड़कने का काम किया है.

अमर उजाला, बरेली के एनई लक्ष्‍मण सिंह भंडारी का तबादला हल्‍द्वानी

अमर उजाला, बरेली से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार एवं समाचार संपादक लक्ष्‍मण सिंह भंडारी का तबादला हल्‍द्वानी यूनिट के लिए कर दिया गया है. वे पिछले 27 सालों से बरेली में अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहे थे. बताया जा रहा है कि श्री भंडारी के आग्रह पर प्रबंधन ने उनका तबादला हल्‍द्वानी के लिए किया है. मूल रूप से उत्‍तराखंड के रहने वाले लक्ष्‍मण सिंह ने अपने करियर की शुरुआत जबलपुर में जागरुक प्रभात से की थी. इसके बाद वे नईदुनिया एवं नवभारत में भी अपनी सेवाएं दीं. लगभग पांच साल जबलपुर रहने के बाद वे अमर उजाला से जुड़ गए थे. 32 साल के अपने करियर में लक्ष्‍मण सिंह ने कई खबरें भी ब्रेक कीं।

पंजाब की शक्ति की हालत खराब, कर्मचारियों को नहीं मिला वेतन

: कानाफूसी : पंजाब से खबर है कि बडे जोर-शोर से बाजार में उतरे पंजाब की शक्ति की टांय टांय फिस्‍स हो गई है। नवंबर में लांचिंग के एक माह बाद ही शक्ति का दम फूल गया है। जालंधर व अमृतसर के बाद अखबार का बठिंडा कार्यालय भी बंद हो गया है। जालंधर से राजेश कपिल और अमतसर से गुरमीत लूथरा के बाद बठिंडा में भी मनीष शर्मा के इस्‍तीफा देने के बाद दफ्तर खाली हो गया है। पंजाब की शक्ति सिर्फ 10 दिन बाजार में आया और अब बंद हो गया।

बताया जा रहा है कि अखबार के एमडी राजेश शर्मा पर नकली सीमेंट का पर्चा होने के बाद से ही बुरे दिन शुरु हो गए थे। किसी भी कर्मचारी को तनख्‍वाह नहीं मिली। फील्‍ड वालों ने खुद सप्‍लीमेंट निकालकर इसका जुगाड़ किया। अब कभी 10 दिसंबर तो कभी 20 दिसंबर को अखबार आने का कहा जा रहा है। बताया जा रहा है कि अब अखबार जनवरी में आएगा पर वह भी पक्‍का नहीं। एमडी राजेश शर्मा और भास्‍कर छोड अखबार लांच करने वाले संपादक नवीन गुप्‍ता के चक्‍कर में आकर कई पत्रकारों ने अपना करियर बरबाद कर लिया है। हालत इतनी बुरी है कि किसी भी कर्मचारी को पिछले तीन महीने से वेतन नहीं मिला। बताया जा रहा है कि एमडी राजेश शर्मा व संपादक नवीन गुप्‍ता ने वीरवार को लुधियाना दफ्‍तर में बैठक कर क्‍लीयर कर दिया है कि जिसको जाना है जाए और जो रहेगा उसे सेलरी नहीं मिलेगी।

वाह रे समाजवाद : दो पत्रकारों पर दर्ज हुआ 150 रुपये लूट का मामला

यूपी में समाजवादी पार्टी का राज आने के बाद से पत्रकारों पर प्रशा‍सनिक हमले बढ़े हैं. फर्जी मामलों में फंसाएं जाने की संख्‍या भी बढ़ी है. ताजा मामला है बाराबंकी जिले के सफदरगंज थाना का. खुद को एक मंत्री का रिश्‍तेदार बताने वाले थानाध्‍यक्ष ने दो पत्रकारों नीरज त्रिवेदी तथा अवधेश वर्मा के खिलाफ 150 रुपये लूट का मामला दर्ज किया है. इस खबर के बाद से ही पत्रकारों में नाराजगी है, वहीं पुलिस के खिलाफ भी उनमें गुस्‍सा है.

पत्रकारों का आरोप है कि थानाध्‍यक्ष खबरों से नाराज होकर पत्रकारों के ऊपर फर्जी तरीके से दोनों पत्रकारों को फंसाने की साजिश रची है. नीचे पढि़ए अखबार में प्रकाशित खबर. खबर को ठीक से पढ़ने के लिए अखबार के कटिंग पर क्लिक करिए.  
 

‘हिमाचल आजकल’ बंद, ‘हिमाचल लाइव न्‍यूज’ शुरू

हिमाचल प्रदेश का बहुचर्चित न्यूज बुलेटिन ’हिमाचल आजकल’ करीब 6 महीने के अल्प समय में ही बन्द हो गया। यह बुलेटिन मोहाली (पंजाब) के न्यूज चैनल 7SEA पर राजेश्वर सब्रवाल ने स्लॉट लेकर इस साल अप्रैल में शुरू किया था। ’हिमाचल आजकल’ के प्रधान संपादक वरिष्ठ पन्नकार कृष्ण भानु बने, जिन्होंने विवाद के चलते दो महीने पहले ’हिमाचल आजकल’ छोड़ दिया। तभी से इस बुलेटिन के भविष्य पर सवालिया निशान लग गये थे।

’हिमाचल आजकल’ के बन्द होने के बाद पन्नकार कृष्ण भानु ने 7SEA पर ’हिमाचल लाइव न्यूज’ नाम से न्यूज बुलेटिन शुरू कर दिया है। आधा-आधा घण्टा के 3 बुलेटिन में हिमाचल प्रदेश से सम्बन्धित खबरों का प्रसारण किया जा रहा है। इस न्यूज बुलेटिन के साथ प्रदेश के नामी गिरामी पन्नकार जुड़े हैं। 7SEA चैनल मुख्यतः पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली के केबल नेटवर्क के अलावा बिग टीवी डीटीएच पर भी उपलब्ध है। इस चैनल पर ’हिमाचल लाइव न्यूज’ प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे, दोपहर 3:30 बजे और रात 8:30 बजे देखा जा सकता है।

सोते रहे नईदुनिया के संपादक और छूट गई खबर

'पहले लिखा था इतिहास अब लिखेंगे भविष्य' की पंच लाइन के साथ ग्वालियर में रीलांच हुए नईदुनिया अखबार के संपादक की नींद अखबार को भारी पड़ गई। रिपोर्टर से लेकर फोटोग्राफर तक उन्हें एक अहम खबर की सूचना देने और यह तय करने के लिए मोबाइल लगाते रहे कि यह खबर कहां लगेगी पर संपादक नींद में ऐसे डूबे रहे कि उन्होंने किसी का टेलीफोन ही नहीं अटेंड किया। कुछ अखबार अपने सिटी एडिशन के कुछ अखबारों में खबर ब्रेक कर चुके थे और नईदुनिया खबर होते हुए भी खबर से चूक गया।

असल में गुरुवार-शुक्रवार की रात लगभग दो बजे भोपाल की ओर से आकर दिल्ली जाने वाली जीटी एक्सप्रेस की दो बोगियों में आग लग गई। आग एयरकंडीशन बोगियों में लगी और आनन-फानन में जंजीर खींचकर रेल को सिथौली के पास रोका गया। मुसाफिरों ने किसी तरह रेल से कूदकर जान बचा ली पर उनका सामान खाक हो गया। खबर बड़ी थी। घटनास्थल ग्वालियर से सिर्फ 14 किलोमीटर था। खबर के शहर में पहुंचते ही अखबार वाले सक्रिय हो गए और मौके पर जा पहुंचे। जैसी व्यवस्था बनी, वैसी खबर छापने का इंतजाम किया गया।

नईदुनिया के रिपोर्टर अमरनाथ गोस्वामी, अरविंद पांडे भी फोटोग्राफर रवि उपाध्याय के साथ मौके पर पहुंच गए। खबर नईदुनिया के पास भी थी लेकिन छापने के लिए संपादक अनूप शाह की इजाजत की जरूरत थी। संपादक को जब मौके पर मौजूद फोटोग्राफर से लेकर रिपोर्टर तक ने फोन लगाया तो घंटी बजती रही पर संपादक जी की नींद नहीं खुली, जिसके चलते यह खबर नहीं लग पाई। संपादक की गहरी नींद की यह खबर जैसे ही इंदौर पहुंची, श्रवण गर्ग ने संपादक की क्लास लेने में देरी नहीं की।

फेसबुक पर कमेंट मामला : गिरफ्तारियों पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि किन परिस्थितियों में ठाणे की उन दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया जिन्होंने शिवसेना नेता बाल ठाकरे की मौत के बाद मुंबई बंद की फेसबुक पर आलोचना की थी. दिल्ली की एक छात्रा श्रेया सिंघल की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर और और जस्टिस जे चेलामेश्वर की खंडपीठ ने ये नोटिस दिया है.

इस जनहित याचिका में आईटी कानून की धारा 66 ए को खत्म करने की मांग की गई है. इसी धारा के तहत पुलिस ने महाराष्ट्र के ठाणे जिले में पालघर की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया था. मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की खंडपीठ ने कहा, “महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया गया है कि वो बताएँ कि किन परिस्थतियों में इन लड़कियों को फेसबुक पर टिप्पणी करने के लिए गिरफ्तार किया गया.”

बेंच ने राज्य सरकार से चार हफ्तों के भीतर नोटिस का जवाब देने को कहा है. अदालत ने पश्चिम बंगाल और पॉन्डिचेरी की सरकारों को भी इस मामले में पक्ष बनाया है क्योंकि वहां भी हाल में ऐसे मामले देखने को मिले हैं. दिल्ली सरकार को भी नोटिस जारी किया गया है और जवाब देने के लिए चार हफ्तों का समय दिया गया है. मामले की अगली सुनवाई छह हफ्तों बाद होगी. अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती ने कहा, “कृपया सूचना प्रोद्यौगिकी अधिनियम 2000 की धारा 66 ए की समीक्षा की जाए.” अदालत ने इस मामले में अटॉर्नी जनरल की मदद भी मांगी है.

वाहनवती ने इन दिशानिर्देशों की तरफ ध्यान दिलाया कि आईटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने का फैसला ग्रामीण इलाकों में डीजीपी और शहरों में आईजीपी रैंक का अधिकारी ही करेगा. अटॉर्नी जनरल ने कहा, “पुलिस थाने का प्रमुख ऐसा नहीं कर सकता है.” इस बीच श्रेया की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने इस बारे में अदालत के निर्देश मांगे हैं कि देश भर में इस सिलसिले में कोई भी मामला तब तक दर्ज नहीं होना चाहिए जब तक ऐसी शिकायतों को राज्य के डीजीपी देख न लें और अपनी मंजूरी न दें. (बीबीसी)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन कर रहा सहारा समूह!

: निवेशकों का पैसा कंपनी की दूसरी योजनाओं में लगवाया जा रहा : सहारा इण्डिया उच्चतम न्यायालय द्वारा सहारा समूह की दो योजनाओं के मार्फत निवेशकों से 17400 करोड़ रुपये वसूली गई राशि को लौटाने के आदेश का पालन किए जाने के बजाय कंपनी द्वारा निवेश राशि को दूसरे योजनाओं में गुप्त तरीके से बदला जा रहा है। जानकारी के अनुसार, सहारा ग्रुप द्वारा सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन के जरिये 17400 करोड़ जुटायी गई थी। 2 करोड़ 30 लाख छोटे निवेशकों से परिवर्तनीय डिबेंचर के जरिये वसूली गई उक्त राशि को पूंजी बाजार की नियामक संस्था ‘‘भारतीय प्रतिभूति एंव विनिमय बोर्ड (सेबी) ने वापस करने का आदेश पिछले साल जून माह में दिया था। उक्त आदेश के खिलाफ सहारा ग्रुप सर्वोच्च न्यायालय गया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी सेबी द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखते हुए सहारा समूह को निवेशकों से जुटाये गए 17400 करोड़ रुपये की राशि 15 प्रतिशत सूद के साथ लौटाने का आदेश गत माह दिया था। शीर्ष कोर्ट ने पैसा लौटाने के लिए कंपनी को 3 माह का समय दिया था। शीर्ष कोर्ट ने अपने आदेश में यह कहा था कि सेबी निवेशकों के बारे में पता लगायेगा और यदि निवेशकों के जानकारी नहीं मिलती है तो यह पैसा सरकार के खाते में जमा कराना होगा। बताया जाता है कि सहारा ग्रुप द्वारा शीर्ष कोर्ट के फैसले को पूर्णरुपेण पालन करने की बजाय सहारा ग्रुप दूसरे योजनाओं में गुप्‍त रूप से बदलने में लगी हुई है। उक्त कार्य को अंजाम दे रहे हैं सहारा ग्रुप के फील्ड वर्कर। वे निवेशकों से कह रहे है कि अगर आप अपना निवेश कनवर्जन (ट्रांसफर) नहीं करवायेंगे तो उक्त राशि पर आयकर कटेगा।

यह सब कार्य हो रहा है बहुत ही गुप्‍त तरीके से, ना ही किसी तरह का लिखित आदेश कंपनी द्वारा हुआ है और ना ही कोई पर्चा छपावाया गया है। शहर से लेकर सुदुरवर्ती कस्बों तक फैले सहारा ग्रुप के कार्यकर्ता दिन-रात एक करके निवेशकों को इसके लिए समझा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सहारा ग्रुप अपने अन्य प्लान ‘‘क्यू-शाप प्लान-एच‘‘ में ट्रांसफर किया जा रहा है। निवेशकों को यह भी कहा जा रहा है कि ‘‘क्यू-शाप प्‍लान‘‘ में निवेश की गई राशि 6 वर्षों में सवा 2 गुना हो जायेगी। निवेशकों को फील्ड कार्यकर्ताओं द्वारा यह भी भय दिया जा रहा है कि पुराने किये गये निवेश सेबी के मार्फत भुगतान किया जायेगा, जिसमें लम्‍बी प्रकिया लगेगी।

भोले-भाले निवेशक फील्ड कार्यकर्ताओं के बहलावे में आकर पुनः अपना निवेश सहारा की अन्य योजनाओं में ट्रांसफर करवा रहे हैं। कार्यकर्ताओं द्वारा जी–तोड़ मेहनत करने का राज यह भी छिपा है कि उक्त राशि अन्य योजनाओं में पुनः निवेश करने पर कमीशन मिलेगा। अपने कमीशन के चक्कर में कार्यकर्ता, निवेशकों को समझाने में गलत–सलत बातों का भी सहारा ले रहे हैं। बताया जाता हैं कि सहारा ग्रुप की मंशा शीर्ष आदालत के फैसलों को पूरी तरह पालन नहीं करने की है। सहारा ग्रुप 17400 करोड़ रुपये निवेशकों को 15 प्रतिशत ब्याज सहित लौटाने की बजाय जनता से निवेश के जरिये उगाही की गई राशि को अधिकतम रकम पुनः अपने पास ही रखने की है।

सहारा यह भी दिखाना चाहती है कि निवेशकों ने अपने स्वेच्छा से धन पुनः दूसरे योजनाओं में ट्रांसफर करवा लिया हैं। परन्तु हकीकत कुछ और ही है। निवेशकों को राशि वापस किए जाने की प्रक्रिया पर शीर्ष अदालत ने सेवानिवृत न्यायाधीश वीएन अग्रवाल को निगरानी की जिम्मेवारी सौंपी गई है। न्यायालय ने आदेश में यह भी कहा है कि कोर्ट के आदेश को सहारा पालन नहीं करती है तो ‘‘सेबी‘‘ सहारा समूह की संपति को अटैच कर उसकी बिक्री कर सकेगी।

संजय कुमार की रिपोर्ट.

sebi sahara

ज़ी बनाम ज़िंदल : पत्रकारिता एवं पुण्‍य प्रसून दोनों की साख पर सवाल

ज़ी न्यूज बनाम जिंदल मामले में स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार किसी बड़े चैनल के संपादकों को गिरफ्तार किया गया…दिल्ली पुलिस बिना किसी ठोस सबूत के ऐसी कार्रवाई मीडिया के किसी बड़े ग्रुप पर नहीं करेगी… जी ग्रुप ने इसे कांग्रेस सरकार द्वारा मीडिया को बंधक बनाने जैसा कहा है…. तो सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने कहा है कि ये सरकारी नहीं, कानूनी मामला है… यानि सरकार पुलिस की कार्रवाई को सही बता रही है…. विद्वान पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने इसे आपातकाल से जोड़ा है जिसकी कड़ी आलोचना हो रही है…क्योंकि आपातकाल के समय मीडिया पर सेंसरसिप लगाने के अलग कारण और तत्कालीन परिस्थितियां थीं…उस समय 100 करोड़ के घूस लेने के आरोप में किसी को जेल नहीं भेजा गया था…जबकि सुधीर और समीर पर 100 करोड़ की उगाही के आरोप है.

कौन सच्चा है कौन झूठा…ये कहना मुश्किल है…बेशक इसकी निष्‍पक्ष जांच होनी चाहिए… लेकिन जिस तरह की तेजी इस मामले में पुलिस ने दिखाई है… उसी तरह की तेजी कोयला घोटाले और अन्य घोटाले से जुड़े नेताओं पर जांच एजेसिंया क्यों नहीं दिखाती …..ये अपने आप में बड़ा सवाल है… संपादक को बिजनेस हेड बनाने की जिस परंपरा की शुरुआत ज़ी न्यूज ने की… वह उसे भारी पड़ी… अब वो ज़माना नहीं रहा जब संपादक पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए मालिक के आदेश को मानने से इनकार कर देते थे… अब पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसे पत्रकार के लिए भी ज़ी न्यूज के मालिक और उनका आदेश सर्वोपरि है… आखिर सवाल लाखों की सैलरी का जो है… शायद इसलिए मीडिया के सरोकार पर सैलरी भारी पड़ी.

ज़ी न्यूज ने वर्षों से जो प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता हासिल की थी… वो इस घटना से बर्बाद हो गई…. सुधीर चौधरी की बतौर संपादक या पत्रकार कोई खास प्रतिष्ठा नहीं है… वो पहले भी विवादों में रह चुके हैं लेकिन यहां सवाल रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त उस वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का है जिसकी छवि पत्रकारिता के छात्रों के लिए आदर्श रही है… लेकिन जिस तरह से उन्होंने ज़ी बनाम ज़िंदल मामले में शुरुआत से ही अपने संपादक के लिए बचाव की मुद्रा में रहे और कमर वहीद नकवी के बयान को तोड़ मरोड़कर अपने बुलेटिन में पढ़ा उससे उन पर सवाल उठने लाज़िमी हैं… अपुष्ट खबरों की माने तो अब उन्होंने ज़ी न्यूज से इस्तीफा दे दिया है… अगर ये खबर सही है तो फिर उन्हें ये इस्तीफा पहले ही दे देना चाहिए ताकि उनकी प्रतिष्ठा बची रहती.

कुछ लोगों का मानना  है कि सुधीर और समीर जैसे ब्लैकमेलर संपादक लगभग हर मीडिया हाउस में है… पकड़ गए तो चोर बच गए तो साहूकार… ये कहावत ऐसे संपादकों पर लागू होती है… कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला के चैनल न्यूज 24 के एडिटर अजीत अंजुम की नज़र में किसी एक चैनल या एक संपादक अगर गलत करता है तो इसका मतलब ये नहीं कि सभी संपादक या चैनल ऐसे हैं….हो सकता है ये सच हो लेकिन जिस तरह से टीवी चैनलों की कारगुजारियों पर सवाल उठ रहे हैं… दर्शकों का टीवी न्यूज चैनल से विश्वास कम हो रहा है उसे दूर करने के लिए तथाकिथत बड़े संपादक क्या कर रहे हैं… सेल्फ रिगुलेशन की बात कहने मात्र से ही क्या वास्तव में कोई सुधार हो रहा है?

यहां सवाल केवल ज़ी न्यूज का नहीं है… आज के दौर  की पत्रकारिता पर उठे सवाल हैं… हलांकि अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि इस मामले में ज़ी न्यूज दोषी है या नहीं क्योंकि कोयला घोटाले में ज़िंदल ग्रुप भी कोई पाक साफ नहीं है… पेड न्यूज के मामले में पहले से ही बदनाम टीवी न्यूज चैनल बाजार या मालिक के दबाव में आकर अगर पत्रकारिता की पवित्रता को ताक में रख देंगे तो फिर आम जनता के मन से मीडिया के प्रति मोहभंग होना स्वाभाविक है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि बाकी चैनल्स भी ज़ी न्यूज बनाम ज़िंदल प्रकरण से सीख लें कि वे इस तरह का कुकृत्य किसी कीमत पर नहीं करेंगे ताकि पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को अक्षुण्य रखा जा सके.

लेखक अरुणेश कुमार द्विवेदी मंगलायतन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्‍म में लेक्‍चरर हैं.

पुलिस ने जी न्‍यूज के मालिक सुभाष चंद्रा को भी पूछताछ के लिए बुलाया

जी न्यूज के दो वरिष्ठ पत्रकारों के कथित तौर पर धन उगाही की कोशिश के मामले में ऐसा माना जा रहा है कि जी समूह के अध्यक्ष सुभाष चंद्रा ने पुलिस को सूचित किया है कि वह पांच दिसंबर तक जांच में शामिल नहीं हो सकते हैं। पुलिस सूत्रों ने बताया कि जांचकर्ताओं ने उन्हें जांच में शरीक होने के लिए नोटिस भेजा था जिसके जवाब में चंद्रा ने और समय की मांग की है क्योंकि वह विदेश में हैं। पुलिस ने चंद्रा को कल अदालत में दो बार जांच में शामिल होने को कहा था। यह पूछे जाने पर कि क्या जांचकर्ता अब अदालत का रूख कर वारंट जारी करने की मांग करेंगे, पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जब जरूरत होगी, तब इस पर फैसला किया जाएगा।

दिल्ली पुलिस के दोबारा नोटिस के बाद जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने दिल्ली पुलिस के सामने पेश होने के लिए कुछ समय मांगा है, माना जा रहा है कि ये समय इसलिए मांगा गया है, ताकि वो कानूनी माहिरों से 100 करोड़ उगाही मामले में कानूनी मदद ले सकें। फिलहाल जी ग्रुप के मालिकों ने जी बिजऩैस और जी न्यूज़ में खाली हुए संपादकों के पदों को भर दिया है, ये पद समीर और सुधीर के जेल में जाने के बाद खाली हुए हैं, खबर है कि मैनेजमेंट ने राकेश कार को जी न्यूज़ का और और मिहिर भट्ट को जी बिजऩैस का संपादक नियुक्त कर दिया है।

पुलिस सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की रिमांड को बढाने की मांग करने की उम्मीद है। दोनों को कल अदालत में पेश किया जाएगा। उन्हें दो दिनों के लिए पुलिस हिरासत में भेजा गया था। सूत्रों ने कहा कि चंद्रा के जांच में शामिल नहीं होने की स्थिति में पुलिस दोनों संपादकों की हिरासत अवधि बढ़ाने की मांग कर सकती है और कह सकती है कि साजिश पर से पर्दा उठाने के लिए हिरासत में उनसे पूछताछ जरूरी है। कुल मिलाकर जी न्‍यूज और इसके कर्ताधर्ताओं की मुश्किलें आगे और बढ़ सकती हैं।  

दिल्ली पुलिस अपनी जांच में जुटी है मगर जी ग्रुप के मालिकों ने पहले ही खुद को और अपने संपादकों को क्लीन चिट देकर अपने तरफ से मामले को खत्म कर दिया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जी न्यूज के लिए नवीन जिंदल जंजाल बन गए हैं। मंगलवार देर शाम हुई गिरफ्तारी के बाद समीर चौधरी और समीर अहलूवालिया पर नवीन जिंदल ने आरोप लगाया था कि कोयला घोटाले पर कवरेज रोकने के बदले जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने 100 करोड़ रुपए मांगे थे। 


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हिंदुस्‍तान प्‍लस से जुड़े अश्‍वनी एवं अनुज, धर्मेंद्र द सी एक्‍सप्रेस पहुंचे

हाल ही में आगरा से प्रकाशित हुए हिंदुस्‍तान प्‍लस से खबर है कि दो पत्रकारों ने इसके साथ अपनी नई पारी शुरू की है. डीएलए से इस्‍तीफा देकर अश्‍वनी भदौरिया तथा कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस से इस्‍तीफा देकर अनुज शर्मा हिंदुस्‍तान प्‍लस से जुड़े हैं. अश्‍वनी पिछले पांच सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं. वे पिछले तीन सालों से डीएलए को अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इसके पहले भी वे कई संस्‍थानों को अपनी सेवाएं दे चुके हैं.

दूसरी तरफ अनुज भी लम्‍बे समय से पत्रकारिता में हैं. इसके पहले वे आगरा से प्रकाशित मून न्‍यूज, द पायनियर को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वहीं आगरा से प्रकाशित हो रहे नवलोक टाइम्‍स से खबर है कि धर्मेंद्र पराशन ने इस्‍तीफा दे दिया है. उन्‍होंने अपनी नई पारी द सी एक्‍सप्रेस के साथ शुरू की है. इसके पहले वे एनडीटीवी इमैजिन को अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

दैनिक जागरण में प्रकाशित किस आंकड़े को सही मानें पाठक?

पटना से एक जागरूक पाठक ने पत्र भेजा है कि दैनिक जागरण ने 29 नवम्‍बर के एडिशन में प्रकाशित अपने दो खबरों में राजधानी पटना की जनसंख्‍या अलग-अलग लिखी है. पाठक का कहना है कि अपने को नम्‍बर एक अखबार बताने वाले जागरण में क्‍या अंदाजे से या फिर मनमानी तरीके से आंकड़ों को प्रकाशित किया जाता है? उसका कहना है कि आखिर अखबार पढ़ने वाला किस आंकड़े को सही माने? उन्‍होंने दोनों खबरों को भी भेजा है, जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है.

छुट्टी के दिन भी सड़कों पर रफ्तार नहीं पकड़ सके वाहन

कार्यालय प्रतिनिधि, पटना : 19.6 लाख से अधिक की जनसंख्या, साढ़े पांच लाख से अधिक वाहन वाली राजधानी पटना में गाड़ी चलाना सिरदर्द बन चुका है। अब जाम के लिए पीक आवर या अन्य किसी कारण की जरूरत नहीं है। हालात, ऐसे हैं कि अवकाश के दिन भी बुधवार को जगह-जगह जाम लगा रहा। और इसका कारण था यातायात प्रबंधन को सुगम बनाने को जिम्मेदार ट्रैफिक पुलिस। उनकी निष्क्रियता और वाहनों चालकों में जल्दी पहुंचने की होड़ हालात को और विकराल बना देती है।

अपराह्न 1 बजे : आयकर गोलंबर से डाकबंगला चौराहा को जाने वाली सड़क पर वाहनों की लंबी कतार लगी है। कोतवाली से बुद्धमार्ग की ओर मुड़ने पर भी कमोवेश वही हाल थे। मीठापुर ओवरब्रिज में टैंकर तथा बड़ी बसों के कारण वाहनों की कतार रेंगने को विवश हैं। करबिगहिया की ओर स्टेशन से आगे तक वाहन रेंगने को विवश थे। दूसरी ओर भी जाम था, उसमें पीली बत्ती वाली कई गाडि़यां फंसी थी। एक्जीबिशन रोड से लेकर डाकबंगला चौराहा और वहां से पटना जंक्शन तक धीमे चलना वाहनों की मजबूरी थी। जंक्शन पर बड़ी बसों व आटो के कारण भयंकर जाम था। शाम को पांच बजे : इन रास्तों पर शाम पांच बजे तक इसके सिवाय कोई परिवर्तन नहीं था कि वाहनों की संख्या कुछ और बढ़ गई थी। वाहनों को रेंगने के लिए भी काफी इंतजार करना पड़ रहा था।


सिलेंडर की सियासत में पिसता उपभोक्ता

हमारे कार्यालय संवाददाता, पटना : 14.2 किलोग्राम के एक सिलेंडर ने आम लोगों के जीवन में भूचाल पैदा कर दिया है। एक तरफ महंगाई की मार दूसरी तरफ सब्सिडी वाले सिलेंडरों में कटौती के कारण सिलेंडरों का इस्तेमाल करने वाली शहरी क्षेत्र की बढ़ी आबादी इस आस में थी कि शायद कटौती के जख्म पर राज्य सरकार कुछ मरहम रखेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 13 सितंबर को आया हिलाने वाला फैसला : इसी साल केन्द्र सरकार ने देश की आबादी को झटका दिया और सब्सिडाइज्ड सिलेंडरों में कटौती कर दी। निर्देश हुआ कि एक साल में किसी भी उपभोक्ता को छह से अधिक सब्सिडाइज्ड सिलेंडर नहीं मिल सकेंगे। केन्द्र के इस फैसले का सीधा असर शहरों में रहने वाली आबादी पर पड़ा। बिहार के लगभग दस करोड़ लोगों में से 35 लाख लोगों के सामने समस्या थी कि अब कैसे घर का बजट बनाया जाएगा। शहरी लोग हुए सबसे ज्यादा हलकान परेशान : केन्द्र सरकार के इस फैसले की चपेट में शहर में रहने वाली ज्यादा आबादी आई। पटना की आबादी साढ़े 18 लाख है। जिनमें से 72.7 फीसदी घरों में जलावन में एलपीजी छोड़ दूसरा कोई साधन नहीं है। उम्मीद में उठी राज्य सरकार की ओर आंखें : लोगों को उम्मीद थी राज्य सरकार उसके दुखों पर मरहम रखेगी और कम से कम तीन सिलेंडरों पर अपने कोष से सब्सिडी देगी। जैसा किसानों की डीजल योजना में होता है। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बिहार शरीफ में चल रहे हैं कई अवैध न्यूज चैनल!

अगर कोई कार्य प्रशासन के मेल बिना किया जाए तो वह अवैध कहलाता है। परन्तु वही कार्य प्रशासन के मेल से किया जाए तो वह वैध हो जाता है। ऊपर कही गई बातें सौ फीसदी सही है। वह कार्य हो रहा हैं, सुशासन बाबू के अपने गृह जिले मुख्यालय बिहार शरीफ में। बिहार शरीफ शहर में केबुल के माध्यम से करीव आधे दर्जन लोकल समाचार चैनल चल रहे है, जिनका कोई रजिस्ट्रेशन नहीं हैं और ना ही चलाने के लिए किसी ने आदेश दिया है। परन्तु प्रशासन द्वारा इन्हें सरकारी कार्यक्रमों तथा चुनाव के दौरान आयोग द्वारा समाचार संकलन हेतु पास तक उपलब्ध करवाया जाता हैं।

करीब एक दशक पूर्व जिला जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में केबल के माध्यम से एक लोकल चैनल का प्रशारण शुरू किया गया था। जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए आधे दर्जन से अधिक हो गई। मीडिया का लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहा गया है तथा वह निष्पक्ष होकर कार्य करता है। परन्तु, अवैध रुप से चल रहे लोकल चैनलों की निष्पक्षता पर सवालियाँ निशान लगा हुआ है। ये चैनल वाले आम जनता के विरुद्ध गलत-सलत खबरें दिखा दें, कोई कुछ नहीं बिगाड़ेगा, परन्तु सरकार व प्रशासन के विरुद्ध अगर कोई सही खबरें दिख दे तो इन चैनलों के प्रसारण पर ही सवालियाँ निशान लग जाता है तथा बंद करने की नौबत आ जाती है।

अवैध कार्य में ही ज्यादा आमदनी होती है, जिसके कारण लोग गलत धंधे करने लगते हैं। करीब एक लाख की पूंजी लगाकर केबल के माध्यम से लोकल समाचार चैनल शुरू कर दिया जाता है। लागत पूंजी से आधी आमदनी हर माह होने लगती है। ऐसे चैनल संचालकों को पत्रकारिता के मापदंड से कोई वास्ता नहीं है, उन्हें तो सिर्फ पैसे कमाने से मतलब है। चाहे कोई स्तर तक जाना क्यों ना पड़े। चैनल संचालको द्वारा रिर्पोटर के नाम पर 2-3 लोगों को बहाल कर लिया जाता है। कथित रिर्पोटरों द्वारा डरा-धमकाकर विभिन्न संस्थानों से विज्ञापन लिया जाता है। अगर, कोई संस्थान विज्ञापन देने में आनाकानी करता है तो उसके खिलाफ मनगढ़त समाचार चैनल पर दिखा दिया जाता है। प्रत्येक लोकल चैनलों को विज्ञापन से ही करीब शुद्ध आमदानी 50000/- हैं। विज्ञापन कितना मिलता है, इनके चैनल देखने वाले ही खुद क्या करते है। दो समाचार के बाद 3-4 विज्ञापन दिखाया जात है। अखबारों तथा चैनलों पर विज्ञापन हेतु सरकार द्वारा मापदंड बनाया गया है कि कितना समाचार रहेगा तथा विज्ञापन, लेकिन अवैध रुप से चल रहे चैनलों पर कोई शिकंजा नहीं है। समाचार से ज्यादा विज्ञापन का ही अनुपात है।

इन चैनलों का एक ही सिद्धांत है, आम जनता के बारे में चाहे कितना भी गलत समाचार दिखा दो, परन्तु प्रशासन के बारे में कितना भी सही क्यों ना हो उसे मत दिखाओं। उदाहरण स्वरुप, एक प्रिटिंग प्रेस के संचालक को नकली लेबल छापने के आरोप में गिरफ्तार किया, चैनल वाले ने दो लोगों को गिरफ्तारी की खबरे अपने चैनल पर तीन दिनों तक चलाते रहे, वह भी वीडियो के साथ। परन्तु, सच्चाई यह थी कि एक ही व्यक्ति पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी। किस आधार पर एक अन्य व्यक्ति को 3 दिनों तक वीडियों दिखाया गया, क्या उसकी छवि को धूमिल करने हेतु, मुक्तभोगी व्यक्ति जाय तो कहाँ, ना रजिस्ट्रेशन नंबर है और ना ही किसी पदाधिकारी के आदेश। पीड़ित व्यक्ति मन मारकर रह जाता है।

भारतीय प्रेस परिषद् के अध्यक्ष की यह टिप्पणी कि ‘‘ नीतीश राज में बिहार की मीडिया आजाद नहीं है,‘‘ उक्त अवैध लोकल चैनलों पर पूरी तरह फिट बैठती है। प्रशासन द्वारा कोई भी कार्यक्रम हो, उसे प्रमुखता के साथ 3-4 दिनों तक दिखाया जाता है। वही प्रशासन की विफलता की खबरें खोजने पर भी नहीं मिलेगी इन चैनलों पर। बताया जाता है कि स्थानीय चैनल के संवाददाताओं के द्वारा प्राइवेट कार्यक्रम कवरेज के नाम पर आयोजकों से 500 से हजार रुपये तक वसूला जाता है। राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर चल रहे सेटेलाइट चैनल अपने जरुरत के अनुसार समाचारों का चयन करते हैं, कि कौन समाचार दिखाना है या नही, इनके नाम पर पैसा नहीं वसूला जा सकता है। परन्तु लोकल चैनल स्वंय समाचारों का चयन करते हैं तथा वसूली गई राशि के अनुसार उक्त समाचार का कवरेज दिखाते हैं।

लोकतंत्र में पक्ष-विपक्ष दोनों की अहम भूमिका रहती है। सरकारी पक्ष गलत कार्य करने पर विपक्ष उसका विरोध करता है, ताकि सुधार हो, परन्तु विपक्ष मौन रहे तो लोकतंत्र की दुर्दशा होना निश्चित ही है। उसी प्रकार स्वच्छ व निष्पक्ष मीडिया का होना भी जरुरी है। परन्तु, राज्य व जिला प्रशासन के गुण–अवगुण को नजर अंदाज करते हुए स्थानीय लोकल चैनल के संवाददाता सिर्फ प्रशासन पक्षीय समाचार दिखाकर लोकतंत्र का चैथा स्तंभ कहे जाने वाले स्तंभ की मर्यादा को कुछ रुपये के चक्कर में गला-घोटने पर तुले हुए हैं। बताया जाता है कि इन चैनल कर्मियों द्वारा प्रशासन के निकट होने का रौब आम जनता तथा विभिन्न संस्थानों के संचालकों पर दिखाकर विज्ञापन वसूला जाता है। इन चैनल संचालकों द्वारा ना तो बिक्रीकर और ना ही आयकर सरकार को दिया जाता है। आय-व्यय का ब्‍योरा भी नहीं दिया जाता है। सरकार को भी राजस्व का चूना लगाया जा रहा है।

बताया जाता है कि एक आरटीआई कार्यकता ने सूचना के अधिकार के तहत जिला जनसम्पर्क पदाधिकारी से जानकारी चाही कि बिहार शरीफ शहर से जानकारी चाही कि बिहार शरीफ शहर में केबल के माध्यम से कितने चैनलों का प्रसारण हो रहा है, इनका निबंधन संख्या, विज्ञापन से आय तथा 2005 के विधानसभा चुनाव में कितने मीडियाकर्मी को चुनाव आयोग द्वारा पास दी गई। पास के संबंधित नामों की सूची मांगी गई परन्तु जबाब देना तो दूर पदाधिकारी ने कथित रुप से यह कहा कि जवाब मांगने वाले को औकात बता देंगे। संचालकों ने भी उक्त आवेदन कर्ता को धमकी दिया गया कि आप अपना आवेदन वापस ले-लें, वरना पुलिस व प्रशासन से कहकर अंदर करवा देंगे।

जनसम्पर्क पदाधिकारी ने अपीलीय सीमा एक माह की अविध समाप्त हो जाने के ठीक एक माह यानी दो माह के बाद जवाब भेजा, वो भी आधा–अधूरा। जवाब में दो ही चैनल का जिक किया गया है तथा जबकि 6 से अधिक चैनल हैं। 2005 के विधानसभा चुनाव में निर्गत पास के बारे में उक्त पदाधिकारी ने लिखा है कि अभी सूची उपलब्ध नहीं है, उपलब्ध होते ही करवा दी जाएगी। परन्तु 4 माह से अधिक बीत गया है परन्तु आज तक जवाब नहीं मिला है। पदाधिकारी द्वारा जानबूझकर आधा-अधूरा जवाब देना यह दर्शाता है कि प्रशासन की मिली भगत से ही अवैध चैनल चल रहे हैं। सुशासन बाबू के द्वारा कानून का राज चलाने का किया जा रहा दावा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है।

नालंदा से संजय कुमार की रिपोर्ट.

तो क्‍या खुद अजीत अंजुम इन संपादकों की लिस्‍ट में नहीं हैं?

Ajit Anjum : जो लोग कह रहे हैं कि जिंदल मामले में फलां- फलां भले ही खबर दिखाने के बाद 100 करोड़ की डील करते पकड़े गए हैं, हर संपादक ऐसा ही है, जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सिपाही …जो लोग कह रहे हैं कि मालिकों के कहने पर कौन ऐसा संपादक है जो डील करने नहीं चला जाएगा ….उनके लिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि आशुतोष (आईबीएन -7) शाजी जमां और मिलिंद खांडेकर (एबीपी न्यूज) सतीश के सिंह (लाइव इंडिया), विनोद कापड़ी (इंडिया टीवी), कमर वहीद नकवी (आजतक के पूर्व संपादक) और सुप्रिय प्रसाद (आजतक के मौजूदा संपादक) जैसे संपादक हैं, जिनकी कीमत कोई जिंदल नहीं लगा सकता….जिन्हें कोई जिंदल सौदेबाजी के लिए तैयार नहीं कर सकता …चैनल मालिक भी इन्हें किसी ऐसी डील के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

इनमें से कोई ऐसा नहीं है जो नेताओं के आता-जाता (रिश्ते तराशने के लिए) हो …इनमें से कोई ऐसा नहीं है जिनकी नेताओं और मंत्रियों से नेटवर्किंग में दिलचस्पी हो ….इनमें से कोई ऐसा नहीं है, जो नेताओं-मंत्रियों के गुड बुक में बने रहने के लिए खबरों की सौदेबाजी करता हो …दुर्भाग्य से इनमें से कोई ऐसा भी नहीं है, जिन्हें दो-चार मंत्री अपना दोस्त भी मानते हों ….ये न्यूज रूम के लोग हैं, जो सत्ताधीशों के ड्राइंग रुम और अंत:पुर में कभी नहीं देखे जाते …..फिर आप फलां-फलां से सबकी तुलना कैसे कर सकते हैं ….आशुतोष जैसे लोगों को तो कोई हजार करोड़ देकर भी Oblige नहीं कर सकता ….दो पकड़े गए तो ये कहकर छाती मत पीटिए कि सभी संपादक डीलर हैं ….इस लिस्ट में बहुत से नाम छूट भी गए हैं ….मैंने सिर्फ हिन्दी चैनलों के संपादकों की बात की है …

वरिष्‍ठ पत्रकार अजीत अंजुम के फेसबुक वॉल से साभार.

पत्राकारों को भी कर देनी चाहिए अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा?

 

ज़ी न्यूज के गिरफ्तार संपादक सुधीर चौधरी कई लिहाज़ से नंबर वन रहे हैं। वे पहले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने महज़ 35 साल की उम्र में बीएमडब्ल्यू कार (तत्कालीन कीमत लगभग 40-45 लाख) खरीद ली। वे पहले ऐसे चैनल हेड रहे जिन्होंने इस पद की नौकरी पाने से पहले चैनल की डील करवा दी। 
 
वे पहले ऐसे चैनल हेड रहे जिन पर दूसरे चैनल की फूटेज़ चुरा कर प्रसारित करने और एक नारी की इज्जत उछालने का मुकदमा चला। वे पहले ऐसे चैनल हेड रहे जो एक बार जिस चैनल से निकले उसी चैनल में तीन गुना सैलरी पर सबसे ऊंचे पद पर वापस लौटे। 
 
कुछ खट्टे, कुछ मीठे अनुभवों के साथ सुधीर चौधरी जहां कइयों के लिए निंदा का विषय हैं वहीं कइयों के लिए आदर्श भी हैं। पत्रकारों में चर्चा आम है कि जो शख्स 40 लाख की कार पर बैठता है उसके पास कितने करोड़ की जमापूंजी होगी इसका अंदाजा कैसे लगाया जाए?
 
उधर समीर अहलूवालिया को बैठे-बिठाए शोहरत मिल गयी वर्ना वो तो दूसरे बिजनेस पत्रकारों की तरह कंबल ओढ़ कर घी पी रहे थे। एक शख्स ने बाकायदा फोन करके बताया कि समीर साहब दिल्ली और कई शहरों में कई फ्लैटों के अलावा एक आलीशान फॉर्म हाउस के भी मालिक हैं। उनकी संपत्ति करोड़ों से भी ज्यादा की गिनती में है।
 
दूसरे कई पत्रकारों के भी करोड़ों बटोरने की खबरें यदा-कदा आती रहती हैं। दिलचस्प बात ये है कि वे पत्रकार ही एक-दूसरे पर कीचड़ भी उछालते या उछलवाते रहते हैं जिन्होंने खुद भारी दौलत जमा कर रखी है। अगर कोई उनसे उनकी संपत्ति के बारे में पूछ दे तो वे बौखला जाते हैं। हालांकि सारे ऐसे नहीं हैं। ज्यादातर पत्रकार आज भी फक्कड़ ही हैं लेकिन बदनाम हो रहे हैं। 
 
सवाल ये उठता है कि क्या जैसे मीडिया के दबाव में राजनेताओं और अधिकारियों ने सार्वजनिक मंचों पर अपनी संपत्ति की घोषणा शुरु कर दी है, वैसे ही पत्रकारों को भी अपनी संपत्ति घोषित नहीं कर देनी चाहिए। दुनिया से भ्रष्टाचार मुक्त और बेदाग होने की अपेक्षा करने वाले पत्रकार अपना चेहरा दिखाने में क्यों झिझक रहे हैं?

एनडीटीवी का कैमरामैन एन रवि धौलाधार में लापता

धर्मशाला : एनडीटीवी चैनल का कैमरामैन धौलाधार में कहीं लापता हो गया है। वह त्रियूंड व इंद्रहार पास के लिए ट्रैकिंग पर गया था, लेकिन लौटा नहीं। चैनल ने इस संबंध में पुलिस को सूचित कर दिया है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जी शिवा कुमार ने बताया कि एनडीटीवी चैनल का नई दिल्ली का कैमरामैन एन रवि शुक्रवार को आया था। यहां पर चैनल का कोई कार्यक्रम था। वह आंध्र प्रदेश का रहने वाला है और दिल्ली में रह रहा है।

रवि ने ट्रैकिंग पर जाने से पहले फोन पर अपनी मां से बात की थी। उसने यह भी बताया था कि मंगलवार को वह अपने दिल्ली पहुंचेगा। बुधवार को भी वह ऑफिस नहीं पहुंचा तो उसकी तलाश शुरू हुई। चैनल के एक कर्मचारी बीआर कृष्णा ने पुलिस को बताया कि रवि अभी तक वापस नहीं पहुंचा है। कृष्णा की शिकायत पर पुलिस ने रवि की तलाश शुरू कर दी है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक जी शिवा कुमार ने लोगों से अपील की है कि जिस व्यक्ति ने रवि को देखा है, वह पुलिस को सूचना दें। उन्होंने आशंका जताई कि हो सकता है कि कहीं पैर फिसलने से रवि गिर न गया हो। उसका मोबाइल फोन भी स्वीच ऑफ आ रहा है। बताया जा रहा है कि रवि इससे पहले भी कई क्षेत्रों में ट्रैकिंग पर जा चुका है। उसने कई बार सात-आठ दिन की अकेले ट्रैकिंग की है। फिलहाल पुलिस ने उसकी तलाश शुरू कर दी है। (जागरण)

झटका : सैट ने सेबी के खिलाफ सहारा समूह की अपील खारिज की

मुंबई : प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (सैट)ने तीन करोड़ निवेशकों के 24,000 करोड़ रुपये लौटाने के मामले में सहारा समूह की दो कंपनियों द्वारा सेबी के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी है। सहारा समूह ने अपनी अपील में निवेशकों का धन लौटाने के मामले में न्यायाधिकरण से हस्तक्षेप का आग्रह किया था। समूह ने आरोप लगाया था कि सेबी इस मामले में उसके खिलाफ गलत तरीके से उच्चतम न्यायालय के आदेश का अनुपालन न करने का आरोप लगा रहा है।

न्यायाधिकरण ने अपने निर्णय में कहा कि इस मामले में किसी तरह का और निर्देश उच्चतम न्यायालय द्वारा ही दिया जा सकता है। ऐसे में इस अपील को खारिज किया जाता है। सैट ने कहा कि यह अपील समय से पहले दायर की गई है इसलिए इसे खारिज किया जाता है। सैट ने सहारा समूह की कंपनियों की 27 नवंबर की अपील पर कहा कि सेबी द्वारा दायरा अवमानना याचिका और सहारा समूह की कंपनियों द्वारा 31 अगस्त, 2012 के आदेश के खिलाफ दायर पुनर्रीक्षा याचिका पहले से उच्चतम न्यायालय में लंबित हैं। (एजेंसी)

sebi sahara

एमपी सरकार वरिष्‍ठ पत्रकारों को हर महीने देगी पांच हजार रुपये

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकारों के लिए श्रद्धा-निधि योजना को स्वीकृति दी है। शासन ने श्रद्धा-निधि के लिए नियम, शर्तें व योजना भी जारी की है। श्रद्धा-निधि ऐसे पूर्णकालिक अधिमान्य पत्रकार को दी जाएगी, जो किसी दैनिक, साप्ताहिक समाचार-पत्र में कम से कम बीस साल तक सवैतनिक कार्य करते रहे हों और उनकी आयु एक जुलाई, 2012 की स्थिति में 62 साल हो। उन्हें हर महीने पांच हजार रुपए श्रद्धा-निधि के रूप में देने का फैसला लिया गया है। श्रद्धा-निधि शुरुआत में पांच साल के लिए दी जाएगी।

योजना के अनुसार श्रद्धा-निधि केवल उन पत्रकारों को दी जाएगी, जिन्हें राज्य शासन से कोई अन्य नियमित सहायता प्राप्त नहीं हो रही हो। अधिमान्य पत्रकार को यह शपथ-पत्र देना होगा कि वह आयकरदाता की श्रेणी में नहीं आता। यह पात्रता उन अधिमान्य पत्रकारों को होगी जो जनसंपर्क संचालनालय मध्य प्रदेश से कम से कम 10 वर्ष अधिमान्य रहे हों। एक पत्रकार को हर महीने पांच हजार रुपए तक श्रद्धा-निधि की पात्रता होगी।

इसी प्रकार अधिमान्य पत्रकार को बैंक में बचत-खाता खुलवाना होगा, जिससे उनके बैंक खाते में राशि जमा की जा सके। इसके लिए पत्रकार को आवश्यक प्रमाण-पत्र साल में एक बार प्रस्तुत करना होगा, जिससे उनके बैंक खातों में हर महीने श्रद्धा-निधि जमा की जा सके। अधिमान्य पत्रकार पर किसी प्रकार का कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज नहीं होना चाहिए। श्रद्धा-निधि स्वीकृति के संबंध में एक उच्च-स्तरीय पांच सदस्यीय निर्णायक मंडल का गठन होगा, जो प्राप्त आवेदनों का परीक्षण कर अपनी अनुशंसाएं देगा। निर्णायक मंडल की अनुशंसा शासन के लिए मान्य करना बंधनकारी नहीं होगा।

श्रद्धा-निधि की पात्रता स्वीकृति के बाद किसी भी समय खत्म की जा सकती है। यदि लाभार्थी का आचरण पत्रकारिता के मान्य सिद्धांतों, मानदंडों के विपरीत पाया जाता है या उनके विरुद्ध कोई आपराधिक मामला दर्ज होता है, तो पात्रता समाप्त की जा सकेगी। श्रद्धा-निधि स्वीकृति के पांच साल के बाद प्रकरणवार समीक्षा भी की जाएगी। (एजेंसी)

पत्रकार धीरेंद्र की हत्‍या में राजा कोलंदर दोषी

इलाहाबाद: पत्रकार धीरेन्द्र सिंह समेत चौदह लोगों की हत्या करके शव के टुकड़े- टुकड़े करने और शवों को खाने के आरोपी राजा कोलंदर को इलाहाबाद की ट्रायल कोर्ट ने दोषी माना है. सजा का ऐलान शुक्रवार को होगा. दिसंबर 2000 में पत्रकार धीरेन्द्र सिंह की हत्या हुई थी. राजा कोलंदर तब से ही जेल में बंद है. साल 2000 के दिसंबर महीने में पत्रकार धीरेन्द्र सिंह की हत्या के बाद से ही राजा कोलंदर अपने साले बछराज के साथ जेल में बंद है.

धीरेन्द्र सिंह का कत्ल सामने आने के बाद जांच के दौरान पुलिस ने राजा कोलंदर के फार्महाउस से चौदह नर कंकाल व खोपड़ियां बरामद की थीं. इस सनसनीखेज और नृशंस हत्या के केस की सुनवाई पिछले 12 साल से चल रही थी और इसी महीने अदालत ने अपनी सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था. (एबीपी)

सुपारी किलर निकला चैनल वन का उत्तराखण्ड ब्यूरो चीफ

 

देहरादून। उत्तराखण्ड में न्यूज चैनलों की आड़ के साथ-साथ मीडिया में आपराधिक लोगों की गतिविधियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। न्यूज चैनल के संचालक उत्तराखण्ड में ऐसे लोगो को मीडिया की कमान सौंप रहे हैं जिनका चरित्र आपराधिक रहा है। बीते दिवस उत्तराखण्ड तिवारी सरकार में स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान के उपाध्यक्ष खजान गुडडू की हत्या की सुपारी देने वाले चैनल वन के उत्तराखण्ड व्यूरो चीफ धनश्याम सुयाल को उसके साथियों सहित एसटीएफ व देहरादून पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है।

पुलिस ने खुलासा किया है कि पकड़ा गया गिरोह रामनगर, देहरादून, हरिद्वार व कई अन्य जगहों पर आपराधिक वारदातों को अंजाम देने की फिराक में था। पूर्व राज्य मंत्री खजान को जेल से हत्या की सुपारी ली गयी थी। पुलिस इनके अन्य सम्पर्क करने वाले लोगों की भी तलाश कर रही है।

 

उत्तराखण्ड में मीडिया के नाम पर पत्रकारिता करने वाले चैनल वन के ब्यूरों चीफ को पुलिस ने जिस तरह गिरफ्तार किया है उससे साबित हो रहा है कि ऐसे चैनल पत्रकारिता की आड़ में अपराधियों को संरक्षण दे रहे है और पत्रकारिता को भी दूषित किया जा रहा है जबकि मीडिया के अन्दर आपराधिक लोगों की धुसपैठ नही होनी चाहिए। लेकिन 24 धण्टे का न्यूज चैनल वर्ष 2010 से किस तरह एक अपराधी को उत्तराखण्ड का ब्यूरो चीफ बना कर काम करता रहा इससे चैनल की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं।

 
लगातार मीडिया के गिरते जा रह स्तर को ऐसे न्यूज चैनलों ने अपराधी मीडिया का दर्जा दे दिया है पुलिस इस मामले में अन्य लोगो की भी तलाश कर रही है और पुलिस को इनके पास से हथियार भी बरामद हुए हैं। इस घटना के बाद उत्तराखण्ड में मीडिया के अन्दर काम करने वाले ईमानदार पत्रकारों में ऐसे लोगो के खिलाफ रोष व्याप्त है।
 
(उत्तराखंड से नारायण परगाई की रिपोर्ट)
 

ऐक्ट्रेस मनीषा कोइराला को कैंसर है, अस्पताल में भर्ती हुईं

 

मुंबई से खबर है कि बॉलिवुड ऐक्ट्रेस मनीषा कोईराला को कैंसर है। मनीषा को तीन दिन पहले वहां के जसलोक हॉस्पिटल में ऐडमिट कराया गया है। सूत्रों के अनुसार यहां उनका कैंसर का इलाज किया जाएगा।
 
गौरतलब है कि मनीषा नवंबर के शुरुआत से ही काठमांडू में थीं। नेपाल में वह अपना नया घर बना रही हैं। कुछ दिन पहले खबर आई कि वह बीमार हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर बताया गया उन्हें फूड पॉइजिंग हुआ था। इसके बाद मनीषा एक दिन बेहोश भी हो गईं। कई दिनों से बीमारी के चलते मनीषा तुरंत मुंबई आ गईं और यहां उनके कई टेस्ट किए गए।
 
फिलहाल उनकी मां सुषमा उनके साथ हैं। उनके पिता प्रकाश कोईराला और भाई सिद्धार्थ कोईराला के भी आज रात मुंबई पहुंचने की उम्मीद है।
 
करीबी दोस्त ने बताया कि कैंसर की खबर को मनीषा ने बड़ी बहादुरी के साथ लिया और बिल्कुल हिम्मत नहीं हारी। सूत्र ने बताया कि वह इस बीमारी को लेकर काफी पॉजिटिव हैं और उन्हें पूरी उम्मीद है कि वह कैंसर के खिलाफ जंग जीतेंगी।
 
गौरतलब है कि सुभाष घई की फिल्म 'सौदागर' से बॉलीवुड में एंट्री करने वाली मनीषा कोईराला काफी समय से फिल्मों से दूर थीं और हाल ही में उन्होंने राम गोपाल वर्मा की भूत-रिटर्न्स से वापसी की है।(एनबीटी)

जी ग्रुप ने भरी संपादकों की कुर्सियां, क्या सुधीर समीर को होगा नमस्ते जी?

जी नेटवर्क ने अपने दोनों चैनलों जी न्यूज और जी बिजनेस के लिए नये संपादकों की घोषणा कर दी है। खबर है कि मैनेजमेंट ने राकेश कार को जी न्यूज़ का संपादक नियुक्त किया गया है। ये जगह सुधीर चौधरी के जेल जाने से खाली हुई है।

उधर जी बिजनेस की कमान मिहिर भट्ट को सौंपे जाने की खबर है। जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया के जेल चले जाने के बाद ये कुर्सी भी खाली पड़ी है। गौरतलब है कि दोनो संपादकों को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने स्टिंग ऑपरेशन में चैनल के लिये ब्लैकमेलिंग करने के आरोप में गिरफ्तार करवा दिया था।

हालांकि अभी ये स्पष्ट नहीं हो पाया है कि दोनों पदों पर नियुक्त किये गये नये संपादक कब तक इस कुर्सी पर रहेंगे। जी नेटवर्क में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या सुधीर और समीर वापस आएंगे तो उन्हें कोई नयी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी या उन्हें 'नमस्ते जी' कह दिया जाएगा?


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पुण्य प्रसून बाजपेयी ने जी न्यूज़ से इस्तीफा दिया..?

 

खबर है कि पुण्य प्रसून बाजपेयी ने जी नेटवर्क से इस्तीफा दे दिया है। बताया जाता है कि 27 नवंबर के उनके विवादास्पद बुलेटिन के बाद जब उनकी चारों तरफ आलोचना होने लगी तो उन्होंने मैनेजमेंट से अगले दिन के बुलेटिन मे अपना स्टैंड इस पचड़े से अलग रखने की कही, लेकिन सीईओ आलोक अग्रवाल और मालिकान इस बात पर अड़े रहे कि उऩ्हें अपने 'आपातकाल' वाले कदम पर ही कायम रहना होगा। 

 
बताया जाता है कि मालिकों ने पुण्य प्रसून को साफ संकेत दे दिया था कि अगर  वृंदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना होगा, यानी जी न्यूज पर मंगलवार को उन्होंने हाथ मलते हुए जिस आपातकाल की घोषणा की थी उसपर न सिर्फ कायम रहना होगा, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाना होगा। सूत्रों का कहना है कि पुण्य प्रसून इसके लिए तैयार नहीं हुए।
 
उधर सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों फेसबुक और ट्वीटर पर उनकी जमकर आलोचना हुई ही, वरिष्ठ पत्रकारों ने भी उन्हें झिड़क दिया। फेसबुक पर तो उनकी इतनी निंदा हुई कि उन्हें वहां से गायब होना पड़ गया। अब फेसबुक पर पुण्य प्रसून का प्रोफाइल ढूंढे नहीं मिल रहा। संभवतः उन्होंने अपना प्रोफाइल अस्थाई तौर पर डिएक्टिवेट कर दिया है। 27 नवंबर के बाद 28 नवंबर के बुलेटिन ‘बड़ी खबर से भी वे गायब रहे।
 
भड़ास4मीडिया ने उनका पक्ष जानने के लिए कई बार उनसे फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उनका फोन लगातार बजता रहा और किसी ने रिसीव नहीं किया।
 

पत्रकारों को अंदर नहीं घुसने दिया लालबत्ती धारी शिव प्रकाश राठौर ने

सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव कल आगरा आये.  उनके साथ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव व उनकी धर्मपत्नी डिंपल यादव भी थीं. वे यहाँ लघु उद्योग निगम के चेयरमैन शिव प्रकाश राठौर की लड़की की शादी में शरीक होने आये. इस दौरान शिव प्रकाश राठौर ने किसी भी पत्रकार को भीतर प्रवेश नहीं करने दिया और दो टूक कह दिया कि जो करना चाहे वह कर लो.

बताते हैं कि शिव प्रकाश राठौर तेल कारोबारी हैं जो कि सलोनी ब्रांड नाम का तेल का कारोबार करते हैं. अभी हाल ही में उन्होंने अपनी यूनिट का उदघाटन किया था जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री को बुलाया गया था. शिव प्रकाश राठोर को लाल बत्ती से नवाजा गया है और लघु उद्योग निगम का चेयरमैन बनाकर राज्य मंत्री बनाया गया. अभी तक तो सही चल रहा था लेकिन कल जैसे ही सपा सुप्रीमो वहां आये तो उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया व मीडिया को भीतर प्रवेश नहीं करने दिया. इसके चलते वहां पर मौजूद मीडिया कर्मी बेचारे बने रह गए.

‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ को क्यों नहीं होस्ट कर रहे हैं दीपक चौरसिया?

दीपक चौरसिया को लेकर तरह तरह की चर्चाएं फैली हुई हैं. कोई कह रहा है कि वो इंडिया न्यूज ज्वाइन कर चुके हैं. कोई कह रहा है कि एबीपी न्यूज में इंटरनल पालिटिक्स के कारण उन्होंने गुस्से में छुट्टी ले ली है. जितने मुंह उतनी बातें. जब भड़ास ने इस बारे में दीपक से जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि उनकी सेहत ठीक नहीं है. वे घर पर आराम कर रहे हैं. उधर, उनके करीबियों का कहना है कि लगातार फील्ड में काम करने से दीपक का स्वास्थ्य काफी बिगड़ गया. वे कौन बनेगा मुख्यमंत्री होस्ट करने गुजरात गए थे लेकिन बुखार बढ़ जाने के कारण उन्हें लौट कर दिल्ली आना पड़ा और कंप्लीट बेड रेस्ट लेना पड़ रहा है.

उधर, अंदरखाने चर्चा है कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री का शो सिद्धार्थ शर्मा को होस्ट करने को दिए जाने के पीछे अंदरूनी राजनीति है. यह राजनीति क्या है, इसको लेकर तरह तरह की चर्चाएं हैं. दीपक चौरसिया की बहन इंडिया न्यूज के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ चैनल को हेड करती हैं. उन्होंने इसकी फ्रेंचाइजी ली है. इसी को लोग दीपक से जोड़कर बताते फिर रहे हैं कि दीपक भी इंडिया न्यूज अच्छे खासे पैकेज पर जाने वाले हैं. पर दीपक के करीबियों का कहना है कि जो शख्स एबीपी न्यूज में इतने अच्छे पद पर है, वह भला इंडिया न्यूज जैसे चैनल में क्यों जाएगा. यह सारी अफवाहें मनगढ़ंत और दीपक के विरोधियों की साजिश है. (कानाफूसी)

बीएजी को बॉय बोल बजरंग झा आईबीएन7 में एईपी बनकर पहुंचे

बीएजी के साथ पिछले 8 साल से जुड़े बजरंग झा ने आखिरकार संस्थान को बाय-बाय कर दिया है। बजरंग झा बीएजी के साथ प्रोडक्शन हाउस के दौर से ही जुड़े थे। इस दौरान उन्होंने 'पोल-खोल' जैसे कार्यक्रम बनाए। बीएजी का चैनल- न्यूज 24 आया तो यहां भी उन्होंने कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। वो न्यूज के साथ ही प्रोग्रामिंग में सिद्धहस्त हैं। न्यूज 24 में चुनाव से जुड़े कई कार्यक्रम प्रोड्यूस किए। फास्ट ट्रैक जैसा रिपोर्टर बेस्ड प्रोग्राम लांच किया।

बजरंग झा रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों के ही मास्टर माने जाते हैं। जनसत्ता और अमर उजाला जैसे अखबारों में काम करने के बाद उन्होंने बीएजी ज्वाइन किया था। न्यूज इंडस्ट्री में 16 साल का अनुभव रखने वाले बजरंग झा ने IBN-7 बतौर AEP ज्वाइन किया है। माना जा रहा है कि उन्होंने राजनीतिक विषयों से जुड़े कार्यक्रमों की जिम्मेदारी दी जा सकती है।

वरिष्‍ठ पत्रकार रमेंद्र सिन्‍हा बने पीपुल्‍स समाचार के ग्रुप एडिटर

 

मध्‍य प्रदेश से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार रामेंद्र सिन्‍हा पीपुल्‍स समाचार के ग्रुप एडिटर बन गए हैं. भोपाल, इंदौर, जबलपुर, ग्‍वालियर, रायपुर और दिल्‍ली से प्रसारित पीपुल्‍स समाचार को नई दिशा देने के लिए रामेंद्र सिन्‍हा को यह जिम्‍मेदारी सौंपी गई है. पीपुल्‍स समूह मासिक पत्रिका एवं न्‍यूज वेबसाइट का संचालन भी करता है. 
 

मूल रूप से देवरिया के रहने वाले रामेंद्र सिन्‍हा राष्‍ट्रीय सहारा, गोरखपुर के लांचिंग टीम के प्रमुख सदस्‍यों में एक रहे हैं. वे हिंदुस्‍तान और दैनिक भास्‍कर को भी वरिष्‍ठ पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं. रमेंद्र सिन्‍हा ने अपने करियर की शुरुआत मित्र प्रकाशन की माया और मनोहर कहानियां तथा दिनमान जैसे नामी पत्रिका में स्‍वतंत्र लेखन से की थी. रामेंद्र की गिनती तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है. माना जा रहा है कि रामेंद्र के नेतृत्‍व में पीपुल्‍स समाचार नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगा. 

संपादकों के घूसकांड पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

 

: देर सवेर सुभाष चंद्रा को भी होना है गिरफ्तार : अब वह समय गया जब पत्रकारिता को खबर छापने और दिखाने का पेशा माना जाता था। अब यह खबर न दिखाने ओर न छापने का पेशा है। यही पत्रकारिता का मुख्य धंधा है। इसी प्रचलित रास्ते पर चलते हुए जी न्यूज ने खबर न दिखाने के लिए सौ करोड़ की घूस मांगी। यदि सौ करोड़ रुपये की घूस का यह स्टिंग आपरेशन किसी नेता या अफसर का होता तो तय मानिये ये सारे न्यूज चैनलों की मेन हेड लाइन होती और सारे अखबारों की पहली हैंडिंग होती। न्यूज चैनल वाले इस पर प्राइम टाइम डिबेट कर रहे होते और देश के बड़े-बड़े नामी गिरामी पत्रकार राजनीति में आई गिरावट पर इतना विलाप कर रहे होते कि टीवी स्टूडियोज के कालीन उनके आंसुओं से तरबतर हो गए होते। लेकिन ऐसा लगता है कि भले ही राजनीति में भ्रष्टाचार पर यह बंधुत्व और भातृभाव गायब हो लेकिन कारपोरेट मीडिया में भ्रष्टाचार पर अद्भुत एकता है।
 
नायाब बंधुत्व है। इसीलिए पत्रकारिता के इस ऐतिहासिक घूस प्रकरण पर बीते दिन एक भी प्राइम टाइम डिबेट नहीं हुई। न्यूज चैनलों के दुलारे और नामी गिरामी पत्रकारों की बिरादरी में से एक भी इस घटना पर नहीं रोया। जी न्यूज से अपने विवाद के चलते केवल अमर उजाला ने ही इसे पहली हैंडिंग बनाया लेकिन बाकी अखबारों ने इस खबर को अनजान कोने में पटक दिया ताकि पाठक की नजर में भी न आ सके। मीडिया के भ्रष्टाचार को कालीन के नीचे सरका कर दबाने की यह बेशर्मी क्या बताती है? धूमिल के शब्दों में कहें तो कारपोरेट मीडिया अपराधियों का संयुक्त परिवार बन गया है।
 
सवाल यह है कि क्या मीडिया को यह अबाध और निर्बाध अधिकार होना चाहिए कि वह किसी खबर को कालीन के नीचे सरका दे और किसी खबर को अपने बैनर पर टांग दे। यदि कारपोरेट मीडिया ने अपनी पेशागत ईमानदारी छोड़ दी है तो उसे पाठकों और दर्शकों के सामने स्वीकार करना चाहिए कि वह भी उतना ही घटिया हो चुका है जितना कि सरकारी तंत्र। मीडिया का यह रवैया राजनेताओं के आचरण से भी ज्यादा बुरा है। क्योंकि कम से कम राजनीति में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा और भाजपा के भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस तो दिखाई देती है। 
 
मीडिया के योद्धा जी न्यूज का पक्ष तो खूब दिखा रहे हैं लेकिन उनमें से एक भी न्यूज चैनल आम लोगों के बीच में जाकर इस घूसकांड के बारे में आम आदमी की राय लेने नहीं पहुंचा। क्योंकि सारे न्यूज चैनल जानते हैं कि यदि उन्होंने इस बारे में आम लोगों की राय जानने की जहमत उठाई तो लोग उनकी कलई उतार देंगे। सच छापने और सच दिखाने का दावा करने वाला मीडिया अपने भीतर के भ्रष्टाचार पर चर्चा भी नहीं करना चाहता और उसमें जनता के बीच जाने का साहस भी नहीं है। यह कैसी ईमानदारी है। एक करोड़ रुपये के घपले पर जिस कारपोरेट मीडिया की छाती फट जाती है वह सौ करोड़ की घूस पर क्यों चुप हो गया? 
 
पत्रकारिता को खबर न दिखाने और न छापने का धंधा बनाए जाने पर क्यों नहीं प्राइम टाइम डिबेट के पत्रकार योद्धा हाथ में तलवार लेकर मीडिया के भ्रष्टाचार के खिलाफ मैदान कूदे। उनकी जुबानों पर क्यों जंग लग गया? क्यों नहीं वे न्यूज चैनलों से कहते कि जब तक आप लोग पत्रकारिता में व्याप्त इस नए तरह के भ्रष्टाचार पर चर्चा नहीं कराते तब तक वे किसी डिबेट में भाग नहीं लेंगे। कारपोरेट मीडिया के इस भ्रष्टाचार पर चर्चा कराए बगैर इन प्राइम टाइम डिबेटियों को राजनीतिक या सरकारी भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करने का क्या नैतिक अधिकार है? अपने भीतर के भ्रष्टाचार को कालीन के नीचे सरकाने वाले न्यूज चैनलों और अखबारों को नेताओं के भ्रष्टाचार पर बोलने का क्या अधिकार है?
 
हर दिन किसी न किसी नेता के भ्रष्टाचार की जन्मपत्री बांचने वाले ईमानदारी की प्रतिमूर्ति अन्ना हजारे, वीरांगना किरण बेदी, भ्रष्टाचार विरोधी पंथ के मठाधीश अरविंद केजरीवाल, ईमानदारी के ध्वजवाहक शांतिभूषण और उनके परम ईमानदार पुत्र प्रशांत भूषण की बोलती कारपोरेट मीडिया के भ्रष्टाचार पर क्यों बंद है। बात-बात में पत्रकार सम्मेलन बुलाने वाले अरविंद केजरीवाल ने बीते दिन नही क्यों नहीं पत्रकार सम्मेलन बुलाकर इस घूसकांड का विरोध किया? क्या मीडिया का भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार नहीं है? क्या वही भ्रष्टाचार विरोध के योग्य है जिससे आपको राजनीतिक लाभ हो? मीडिया के भ्रष्टाचार पर पूरे देश में राजनीतिक मौन है। इस सन्नाटे पर ‘‘शोले’’ में एके हंगल का वह अमर संवाद याद आता है,‘‘ इतना सन्नाटा क्यूं है भाई?’’ 
 
कोई बताएगा कि 100 करोड़ रुपये के घूस कांड पर इतना सन्नाटा क्यों है। क्यों सबको सांप सूंघ गया है? इस कांड पर क्यों नहीं अरविंद केजरीवाल, अन्ना हजारे, किरण बेदी समेत लोकपाल आंदोलन के पराक्रमी वीर सामने आकर मांग करते कि मीडिया को भी लोकपाल के तहत लाया जाना चाहिए? क्यों ये लोग मांग करते कि सीबीआई की तरह भारतीय प्रेस परिषद को भी मीडिया के भ्रष्टाचार की स्वतंत्र जांच करने और मुकदमा दर्ज करने का अधिकार मिलना चाहिए। क्यों नहीं देश के नेता और राजनीतिक दल मांग करते कि जब देश की हर संस्था के नियमन के लिए कानून और एजेंसियां हैं तो फिर मीडिया के लिए ही क्यों आत्म नियमन की व्यवस्था होनी चाहिए। 
 
सच तो यह है कि जी न्यूज के खिलाफ मामला दर्ज होने से सभी नेताओं के मन में लड्डू फूट रहे हैं। क्योंकि लगभग हर नेता और दल को पेड न्यूज का कोबरा डंस चुका है। लेकिन इनके पास इस नागराज के काटे का कोई मंत्र नहीं हैं। इसलिए इसी कोबरे के विष से इसका इलाज हो रहा है तो नेता लोग भी प्रसन्न हैं। उन्हें पता चल गया है कि स्टिंग का इलाज भी स्टिंग में ही छुपा है। विदेश की बात होती तो अब तक जी न्यूज के मालिक भी पूरे कांड की जिम्मेदारी लेकर जी न्यूज के प्रबंधन से त्यागपत्र दे चुके होते। कॉल डिटेल से यह बात आईने की तरह साफ हो चुकी है कि इस बारे में जी न्यूज के दोनों संपादकों की जी न्यूज के मालिक सुभाष चंद्रा से बात हुई थी। यानी कि सुभाष चंद्रा द्वारा हरी झंडी दिए जाने के बाद ही ये दोनों संपादक सौ करोड़ रुपये की इस डील को फाइनल कराने के लिए जिंदल ग्रुप के अफसरों से मिले। वैसे भी यह नहीं हो सकता कि सौ करोड़ रुपये की डील हो और मालिक को खबर तक न हो। सुभाष चंद्रा इतने मासूम मालिक तो हो नहीं सकते। देर सवेर उन्हे भी गिरफ्तार होना ही है। यदि नहीं होंगे तो माना जाएगा कि कानून ने मीडिया के आगे घुटने टेक दिए। लेकिन भारत में भ्रष्टाचार पर शर्मिंदा होने की परंपरा नहीं है। इसलिए यहां का कारपोरेट मीडिया भी उतना ही बेशर्म है जितना कि यहां का राजनेता।
 
लेकिन इस सन्नाटे को टूटना चाहिए। बेहतर है कि देश में जो भी लोग लोकतंत्र के लिए चिंतित हैं वे इस सन्नाटे को तोड़ें। हमें यह मानना होगा कि राजनीतिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा खतरा नहीं है। बल्कि भ्रष्ट कारपोरेट मीडिया लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। नेताओं और सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर ईमानदार मीडिया अंकुश रख सकता है लेकिन भ्रष्ट मीडिया पर हजार ईमानदार नेता भी अंकुश नहीं लगा सकते। इस घूसकांड पर जो चुप्पी है वह साफ-साफ बता रही है कि मीडिया के डर से कोई नेता, सामाजिक कार्यकर्ता मीडिया के भ्रष्टाचार पर बोलने को तैयार नहीं है। यहां तक कि देश के सूचना और प्रसारण मंत्री भी इतने बड़े 

उगाही कांड पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। जबकि सबसे पहले उन्हे ही कहना चाहिए था कि मीडिया की गंदगी को दूर करने के लिए सरकार क्या मैकनेनिज्म तैयार करने जा रही है। यदि मीडिया अपनी साख बचाने के लिए चिंतित नहीं है तो केंद्र सरकार को मीडिया की साख बचाने के लिए जरुरी उपाय करने के प्रस्तावों के साथ आगे आना चाहिए। आखिर यह कांड मीडिया का व्यक्तिगत मसला नहीं है बल्कि यह इस देश की जनता की अभिव्यक्ति की आजादी का मसला है। सबको डर है कि यदि उन्होंने इस पर मुंह खोला तो पूरा कारपोरेट मीडिया उनके पीछे हाथ धोकर पड़ जाएगा। यह मीडिया का ही आतंक है जिसके नीचे ऐसा जनविरोधी सन्नाटा फैला हुआ है। उत्तराखंड आंदोलन के कवि अतुल शर्मा के शब्दों में कहें,‘‘ ये सन्नाटा तोड़ के आ! सारे बंधन छोड़ के आ!!’’
 
 लेखक एस राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर हिमाचल के पूर्व स्थानीय संपादक और ‘‘ जनपक्ष टुडे’’ के मुख्य संपादक हैं।

दो दिन के पुलिसिया रिमांड पर गये सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया

नयी दिल्ली : दिल्ली की एक अदालत ने कथित तौर पर धन की उगाही से संबधित जिंदल समूह द्वारा दायर किये गये मुकदमें में ‘जी समूह’ के गिरफ्तार वरिष्ठ संपादकों को दो दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया है. अब उनकी अगली पेशी 30 नवंबर को होगी.

नवीन जिंदल से सौ करोड़ रुपये जबरन वसूली की कोशिश के आरोप में गिरफ्तार किए गए जी न्‍यूज के संपादक सुधीर चौधरी एवं जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को बुधवार की दोपहर को कोर्ट में पेश किया गया. अपराध शाखा की टीम ने दोनों संपादकों को कड़ी गहमागहमी के बीच कोर्ट में पेश किया. आज अवकाश होने के बावजूद कोर्ट में काफी भीड़ रही.

मामले पर सुनवाई करते हुए जज ने दोनों संपादकों की जमानत याचिका खारिज कर दी तथा उन्‍हें दो दिन के पुलिस रिमांड पर भेजे जाने का आदेश दिया. पुलिस ने कोर्ट के सामने निवेदन किया था कि दोनों संपादकों से पूछताछ के लिए कस्‍टडी दी जाए. जिस पर कोर्ट ने दो दिन का रिमांड दे दिया. दो दिन बाद फिर पुलिस दोनों संपादकों को कोर्ट में पेश करेगी.

उधर जी न्यूज ने मांग की है कि कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल द्वारा दाखिल जबरन वसूली के मामले में गिरफ्तार किये गये उसके दो संपादकों को तत्काल रिहा किया जाए. संस्थान ने आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई ‘गैरकानूनी’ तथा ‘किसी और मकसद’ से की गयी है. कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में जिंदल पावर एंड स्टील लिमिटेड पर आरोप लगाने वाली खबरों को प्रसारित नहीं करने के लिए कंपनी से 100 करोड रुपये मांगने की कोशिश करने के आरोपों का खंडन करते हुए जी न्यूज के सीईओ आलोक अग्रवाल ने आरोप लगाया कि संप्रग.2 सरकार अपनी ‘गलतियों’ के चलते मीडिया को ‘डरा धमका रही’ है.

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को जिंदल की कंपनी की ओर से अक्तूबर में दाखिल शिकायत के आधार पर कल रात गिरफ्तार कर लिया गया. अग्रवाल और जी समूह के वकील आर के हांडू ने गिरफ्तारी और इसके समय पर सवाल खडा करते हुए कहा कि जानबूझकर छुट्टी वाले दिन से पहले गिरफ्तारियां की गयीं ताकि नियमित जमानत नहीं मिल सके.

हांडू ने कहा कि गिरफ्तारी उस धारा के तहत की गयी है जो गैर जमानती अपराध पर लागू होती है ना कि जमानती के लिए. हांडू ने कहा, ‘‘गिरफ्तारी की क्या जरुरत थी. यह किसी और मकसद से किया गया है.’’   अग्रवाल ने दावा किया कि कांग्रेस सांसद ने पहले जी के संपादकों को रिश्वत के तौर पर पैसा देने की और बाद में यह पैसा कंपनी को देने की पेशकश की थी. उन्होंने आरोप लगाया कि जिंदल ने जी के कई वरिष्ठ अधिकारियों को न केवल सीधे बल्कि कई अन्य लोगों के जरिये प्रभावित करने का भी प्रयास किया जिनमें उनके भाई पृथ्वी जिंदल, रिश्तेदार सीताराम जिंदल और दिग्विजय सिंह, रमन सिंह तथा अजरुन मुंडा जैसे नेता भी हैं.

अग्रवाल का यह भी दावा है कि इन लोगों ने जिंदल के खिलाफ खबरों को प्रसारित नहीं करने का अनुरोध भी किया था. उन्होंने कहा कि जिंदल और जी के अधिकारियों की छह मुलाकातों में कुल छह घंटे की बातचीत हुई और यदि कोई इस बातचीत का केवल पांच प्रतिशत निकालता है तो इसे किसी भी तरह से तोडा मरोडा जा सकता है.

जिंदल ने आज इस घटनाक्रम पर अपनी ओर से कोई भी टिप्पणी करने से मना करते हुए कहा, ‘‘मामला अदालत में विचाराधीन है. दिल्ली पुलिस मामले की जांच कर रही है. मैं इस पर टिप्पणी नहीं करुंगा.’’ हालांकि जब जिंदल से उनके, उनकी कंपनी के अधिकारियों और जी के अधिकारियों के बीच हुई बातचीत का केवल 14 मिनट का अंश जारी करने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला ने इसकी पडताल की है और सबकुछ सार्वजनिक किया जाएगा.

क्या जिंदल की कंपनी की तरफ से स्टिंग आपरेशन का मकसद कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में जिंदल पावर की कथित संलिप्तता से ध्यान हटाना था, इस पर जिंदल ने तल्ख लहजे में कहा, ‘‘ठीक है, आप अपना ध्यान नहीं भटकाएं.’’ गिरफ्तारी के समय के सवाल पर हांडू ने कहा कि प्राथमिकी जहां दो अक्तूबर को दर्ज की गयी थी वहीं गिरफ्तारी कल ऐसे वक्त की गयी जब दोनों संपादक जांच में सहयोग दे रहे हैं.

उन्होंने दावा किया, ‘‘पुलिस का कहना है कि उनके पास फोरेंसिक रिपोर्ट है. तो वे सीधे आरोपपत्र क्यों नहीं दाखिल करते. गिरफ्तारी की क्या जरुरत है? सामान्य मामले में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता.’’ अग्रवाल ने कहा, ‘‘हमने बातचीत से कभी इनकार नहीं किया.’’ उन्होंने कहा कि जब दोनों पुलिस की जांच में शुरु से सहयोग दे रहे हैं तो गिरफ्तारी क्यों की गयी.


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उत्‍तराखंड सरकार ने बेच दिया पद्मविभूषण! सीबीआई जांच की मांग

 

उत्तराखंड में राज्य सरकार द्वारा पद्मश्री ओर पद्मविभूषण के लिए उत्तर प्रदेश में रह रहे व्यक्तियों के नामों की संस्तुति किए जाने से बबाल हो गया है। राज्य के कई संगठनों और गणमान्य व्यक्तियों ने राज्य सरकार और मुख्यमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए आरोप लगाया है कि यूपी के एक शिक्षा माफिया को पद्मविभूषण देने की सिफारिश में करोड़ों का लेनदेन हुआ है। आक्रामक क्षेत्रीय संगठन उत्तराखंड जनमंच ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड को यूपी का उपनिवेश बना दिया गया है। 
 
मुख्यमंत्री पर हमला करते हुए जनमंच ने कहा है कि राज्य के मुख्यमंत्री यूपी के रेजिडेंट कमिश्नर की तरह व्यवहार कर रहे हैं। उत्तराखंड सांस्कृतिक पुनर्जागरण मंच, राज्य आंदोलनकारी मंच, आल उत्तराखंड स्टूडेंट यूनियन, हिमालयन जर्नलिस्टस ऐशोशियेशन समेत कई जन संगठनों ने राज्य सरकार के निर्णय को उत्तराखंड का अपमान बताते हुए कहा है कि कानपुर के निवासी की सिफारिश कर राज्य सरकार ने साबित कर दिया है कि उसे उत्तराखंड के निवासियों से कोई लेना देना नहीं है।
 
उत्तराखंड सरकार के फैसलों से राज्य में बुद्धिजीवियों और क्षेत्रीय संगठनों का गुस्सा आसमान पर है। हाल ही में राज्य सरकार ने प्रदेश के तीन विश्वविद्यालयों के लिए जो कुलपति नियुक्त किए उनमें से एक भी राज्य का निवासी नहीं है। जबकि राज्य इन पदों के लिए आवेदन करने वालों में जाने-माने शिक्षाविद शामिल थे। ये सभी राज्य के निवासी थे। लेकिन राज्य सरकार और राजभवन की मिलीभगत से एक भी स्थानीय शिक्षाविद को कुलपति के लिए नहीं चयनित किया गया। जबकि कांग्रेस के बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ ने खुलकर इन तीन पदों पर राज्य के निवासी शिक्षाविदों की नियुक्ति की मांग की थी। बाहरी राज्यों के लोगों को कुलपति नियुक्त किए जाने की खबर ज्यों ही सार्वजनिक हुई तो राज्य के बुद्धिजीवियों में गुस्से की लहर दौड़ गई। कई पत्रकार, कवि, लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने राज्य सरकार के इस निर्णय की भर्त्सना की। 
 
गौरतलब है कि राज्य के नौ विश्वविद्यालयों में एक भी राज्य का निवासी नहीं है। यह ऐसा तथ्य है जिससे राज्य के बौद्धिक समाज में गहरा असंतोष है। लेकिन राज्य सरकार ने पद्मविभूषण के लिए यूपी के कानपुर निवासी एक व्यक्ति के नाम की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजे जाने की खबर जैसे ही सार्वजनिक हुई, राज्य में बयानों का तूफान आ गया। हालांकि सरकार के मीडिया प्रबंधन करने वाले तंत्र ने इन खबरों के अखबारों और न्यूज चैनलों में न आने देने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। फिर भी कुछ अखबारों ने इन खबरों को छापने की हिम्मत जुटाई और अब पूरा प्रकरण जनता के सामने आ गया है।
 
आक्रामक क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाले उत्तराखंड जनमंच ने इसे लेकर कांग्रेस, भाजपा और क्षेत्रीय राजनीतिक दल यूकेडी पर जोरदार हमला बोलते हुए इन तीनों दलों पर आरोप लगाया है कि कुलपतियों की नियुक्त्यिों और पद्मविभूषण के लिए हुई डील में इन तीनों दलों के नेता शामिल हैं। जनमंच ने सवाल उठाया है कि यूपी सरकार ने कभी भी कानपुर निवासी उक्त व्यक्ति का नाम पद्मविभूषण के लिए नहीं भेजा। जनमंच ने सवाल उठाया है कि दूसरे राज्य के निवासी का नाम कैसे राष्ट्रीय सम्मान के लिए भेजा जा सकता है। 
 
जनमंच के कार्यकारी अध्यक्ष शशिभूषण भट्ट ने कहा कि प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले एक दर्जन जाने-माने ऐसे शिक्षाविद हैं जिनके काम की तारीफ राष्ट्रीय स्तर पर की गई है। भट्ट ने कहा कि यूपी के इस करोड़पति व्यक्ति के नाम की सिफारिश के पीछे सरकार चलाने वाली एक भ्रष्ट लाबी का हाथ है। उन्होंने कहा कि इसी लाबी ने लेनदेन कर पद्मविभूषण का सौदा किया है। जनमंच के नेता ने कहा कि राज्य में भ्रष्टाचार यहां तक बढ़ गया है कि अब सरकार में बैठे लोग पद्म विभूषण और पद्मश्री भी बेचने लगे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सम्मानों के लिए की जा रही इस सौदेबाजी की जांच सीबीआई द्वारा की जाने चाहिए। 
 
जनमंच के कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा है कि राज्य के बुद्धिजीवी और महत्वपूर्ण हस्तियां प्रधानमंत्री, यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी 

और राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर मांग करेंगे कि राज्य सरकार द्वारा पद्मश्री और पद्म विभूषण के लिए जिन लोगों की सिफारिश की गई है उनकी संपत्ति, चाल चलन और धंधों की खुफिया जांच कराई जाय। जनमंच ने ऐलान किया है कि वह जल्द ही राज्य की हस्तियों को एक मंच पर लाकर राज्यसरकार के निर्णयों के खिलाफ पत्रकार सम्मेलन आयोजित करेगा। उत्तराखंड सांस्कृतिक  पुनर्जागरण मंच के प्रमुख एसएन पांडे ने कहा है कि राज्य सरकार के इस निर्णय के खिलाफ राज्य के सभी संस्कृति कर्मियों, लेखकों, कवियों और लोकगायकों का एक सम्मेलन बुलाया जाएगा। जिसमें इस निर्णय के खिलाफ राजधानी में एक सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाएगा।
 
लेखक एस राजेन टोडरिया वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. 

आपको लोगों ने ईमानदार समझा लेकिन आप तो बड़े वो निकले : अजीत अंजुम

 

Ajit Anjum: हमने कब कहा कि हम ईमानदार हैं …आपको लोगों ने ईमानदार समझा लेकिन आप तो बड़े वो निकले ……हमने कब कहा कि हम सरोकारी हैं लेकिन आप तो सरोकारों के खजांची बनते थे …फिर एक ही घंटे में जिंदगी भर की जमा पूंजी क्यों लुटा बैठे ……….
 
Purushottam Singh: jaane dijiye sar bhram tuta….subh se pata nahi kanha much chhipaye baithe hai……..hahahahhahaha
 
Manoj Shrivastav: Sir….chhor dijie!
 
Abhishek Tiwari: Wo Isliye Ki Wo Jamaa Kiye Hi The Lutaane Ke Liye . . . . . . Khud To Dube Pure Kaaynat Par Chhite Laga Baithe . . . . . .
 
Rahul Chauhan: Kuch jyada hi naraz lag rahe hain apne dost se..
 
Ravish Kumar: ये लाइन थोड़ी गड़बड़ है सर आपकी । पर्सनल बना रहे हैं क़्या । थोड़ा इंतज़ार करना चाहिए । मतलब कहीं आप खुद को जस्टिफाई तो नहीं कर रहे हैं । आपका इरादा भले न ऐसा हो लेकिन मुझे ऐसा ही लगा । क्या इस नतीजे पर पहुँचा जाए कि हम सब ढोंगी हैं , जो कि हैं भी , ये साबित होना भी चाहिए लेकिन इससे सवाल हल्के हो जाते हैं । मुझे ऐसा लगा ।
 
Ajit Anjum: रवीश , बात यहां मुद्दे की है , अगर आप जमाने भर को कठघरे में खड़ा करके सवाल पूछते हैं …अगर दूसरों को रीढ़ विहीन घोषित करते हुए खुद को सीधे खड़े रखने और दिखने की कोशिश करते हैं और अगर आप वही करते हैं, जो बाकी कर रहे हैं तो जवाब तो आपको भी देना चाहिए…. ( जब मैं आप कह रहा हूं तो जाहिर है आपको नहीं कह रहा हूं….)
 
Ajit Anjum: सवाल हल्के क्यों हो जाते हैं रवीश ……ये तो ज्यादा बड़े सवाल हैं….जो पूछे जाने चाहिए ….जो सबसे सवाल पूछते हैं , जो सबको सवालों के घेरे में रखते हैं , जो नैतिकता और सरोकार की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठकर परोपदेशे पाण्डित्यं की मुद्रा में होते हैं , उनसे क्यों नहीं सवाल पूछे जाने चाहिए ….आपने क्यों नहीं तय की थी अपनी लक्ष्मण रेखा ……और अगर आप भी इतनी ही मजबूर हैं तो कहिए कि जब तक मजबूरियों के इम्तेहान से आप गुजरे नहीं थे , तभी तक सरोकारी थे……..
 
Ajit Anjum: और हां …ये मैं किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं कह रहा हूं . अगर आप किसी व्यक्ति से जोड़कर मेरे कमेंट को देख रहे हैं , उसके लिए आप खुद जिम्मेदार हैं …………मैंने किसी का नाम नहीं लिया ….मेरी भावनाओं को कोई चेहरा मत दीजिए …..निराकार में कोई आकार मत खोजिए ……..
 
सिंह उमेश: SIR EK KADAM AAGE BHI HAI DEKHIYE AUR VICHAR KARIYE……HUM WAHIN DOSHI HAIN JAHAN GUNJAISH HAI YAHAN TO HUM MAANNE KO HI NAHI TAIYAR HAIN AUR NA MANNE KI KOI DAWA NAHI SIVAY NEECHE LIKHI BATON KI YAHI EK DAWA HAI JO KARGUJAR HAI SIR 
उम्मीद की सहर होते ही शाम होती है, खुदा ये सल्तनत तेरी है
हर दफ़े उम्मीद करता हूँ तेरे सहर का, क्या हर दफ़े गलती मेरी है
सजाया मुझे जख्मों में अब नासूर करते हो, क्या यही रज़ा तेरी है
गुनाहे अजीम भी पसंद है ग़र तुझे ,गुनाहगार तुम हो, तो क्या तोहमतें ही मेरी है__
उमेश सिंह
 
Dhiraj Bhardwaj: जगजीत सिंह की एक गज़ल है…
देखा जो आइना तो मुझे सोचना पड़ा,
खुद से न मिल सका तो मुझे सोचना पड़ा..
 
Praveen Dube: media guide lines…need of the hour….lakshman rekha must be defined…for all sides….
 
 
Umashankar Singh: ख़बर के रूप आने वाले भ्रष्टाचार से जुड़े हर मामले में मीडिया ने अगर 'थोड़ा ठहर कर', 'कानून-सम्मत फैसले का इंतज़ार कर', या 'किसी भी आरोपित की व्यक्तिगत मान-मर्यादा' का ख़्याल करने का सऊर और संयम दिखाया होता तो इसके नवीनतम लाभार्थियों में नितिन गडकरी भी होते। इस ख़ास गिरफ्तारी के मौक़े पर यही लाभ 'मीडियाकर्मियों' को भी मिलता। लेकिन 'दूसरों' से जुड़ी ख़बर बांचने के टाईम में हम 'मीडिया के अरविंद केजरीवाल' बन जाते हैं और 'ख़ुद' से जुड़ी ऐसी सच्चाई आने पर कानून मंत्री की तरह बात करने की कोशिश करते हैं। वैसे तथ्यपरक रिपोर्टिंग और भावनाप्रधान फेसबुक पोस्टिंग में कुछ तो अंतर होता है। 🙂
 
(वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज़-24 के संपादक अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से साभार)

अमर उजाला और आज समाज ने फर्स्‍ट पेज पर छापी सुधीर-समीर की गिरफ्तारी

जी न्‍यूज के दो संपादकों सुधीर चौधरी और समीर आहलुवालिया की गिरफ्तारी की खबर को तमाम अखबारों ने सिर्फ एक हल्‍की खबर की तरह प्रकाशित किया वहीं अमर उजाला तथा आज समाज ने इस खबर को अपने फर्स्‍ट पेज पर प्रकाशित किया. अमर उजाला ने तो सेकेंड लीड के रूप में प्रमुखता से प्रकाशित किया. आज समाज ने भी मेन पेज पर छापा. अमर उजाला शायद बीते दिनों जी समूह से हुए खटपट के चलते खबर को पूरा तानकर छापा है. वहीं आज समाज पर कांग्रेसी मालिक का ठप्‍पा लगा हुआ है.

हालांकि इसके बावजूद इन अखबारों ने खबर को प्रमुखता दी वो सराहनीय है, अन्‍यथा अन्‍य अखबार तो किसी तरह मजबूरी में इन खबरों को निपटा दिया है. आप भी देखें अमर उजाला और आज समाज की खबर. 
 
 


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जी ने कहा – उनके संपादकों की गिरफ्तारी गैरकानूनी तथा किसी और मकसद से की गई है

 

जी न्यूज ने बुधवार को मांग की है कि कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल द्वारा दाखिल जबरन वसूली के मामले में गिरफ्तार किये गये उसके दो संपादकों को तत्काल रिहा किया जाए. संस्थान ने आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई ‘गैरकानूनी’ तथा ‘किसी और मकसद’ से की गयी है. कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में जिंदल पावर एंड स्टील लिमिटेड पर आरोप लगाने वाली खबरों को प्रसारित नहीं करने के लिए कंपनी से 100 करोड़ रुपये मांगने की कोशिश करने के आरोपों का खंडन करते हुए जी न्यूज के सीईओ आलोक अग्रवाल ने आरोप लगाया कि संप्रग-2 सरकार अपनी ‘गलतियों’ के चलते मीडिया को ‘डरा धमका रही’ है.
 
जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को जिंदल की कंपनी की ओर से अक्तूबर में दाखिल शिकायत के आधार पर मंगलवार की रात गिरफ्तार कर लिया गया था. अग्रवाल और जी समूह के वकील आर के हांडू ने गिरफ्तारी और इसके समय पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि जानबूझकर छुट्टी वाले दिन से पहले गिरफ्तारियां की गयीं ताकि नियमित जमानत नहीं मिल सके. हांडू ने कहा कि गिरफ्तारी उस धारा के तहत की गयी है जो गैर जमानती अपराध पर लागू होती है ना कि जमानती के लिए. हांडू ने कहा, ‘‘गिरफ्तारी की क्या जरूरत थी. यह किसी और मकसद से किया गया है.’’
 
अग्रवाल ने दावा किया कि कांग्रेस सांसद ने पहले जी के संपादकों को रित के तौर पर पैसा देने की और बाद में यह पैसा कंपनी को देने की पेशकश की थी.
उन्होंने आरोप लगाया कि जिंदल ने जी के कई वरिष्ठ अधिकारियों को न केवल सीधे बल्कि कई अन्य लोगों के जरिये प्रभावित करने का भी प्रयास किया जिनमें उनके भाई पृथ्वी जिंदल, रिश्तेदार सीताराम जिंदल और दिग्विजय सिंह, रमन सिंह तथा अजरुन मुंडा जैसे नेता भी हैं. अग्रवाल का यह भी दावा है कि इन लोगों ने जिंदल के खिलाफ खबरों को प्रसारित नहीं करने का अनुरोध भी किया था.
 
उन्होंने कहा कि जिंदल और जी के अधिकारियों की छह मुलाकातों में कुल छह घंटे की बातचीत हुई और यदि कोई इस बातचीत का केवल पांच प्रतिशत निकालता है तो इसे किसी भी तरह से तोड़ा मरोड़ा जा सकता है. जिंदल ने बुधवार को इस घटनाक्रम पर अपनी ओर से कोई भी टिप्पणी करने से मना करते हुए कहा, ‘‘मामला अदालत में विचाराधीन है. दिल्ली पुलिस मामले की जांच कर रही है. मैं इस पर टिप्पणी नहीं करुंगा.’’
 
हालांकि जब जिंदल से उनके, उनकी कंपनी के अधिकारियों और जी के अधिकारियों के बीच हुई बातचीत का केवल 14 मिनट का अंश जारी करने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला ने इसकी पड़ताल की है और सबकुछ सार्वजनिक किया जाएगा. क्या जिंदल की कंपनी की तरफ से स्टिंग आपरेशन का मकसद कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले में जिंदल पावर की कथित संलिप्तता से ध्यान हटाना था, इस पर जिंदल ने तल्ख लहजे में कहा, ‘‘ठीक है, आप अपना ध्यान नहीं भटकाएं.’’
 
गिरफ्तारी के समय के सवाल पर हांडू ने कहा कि प्राथमिकी जहां दो अक्तूबर को दर्ज की गयी थी वहीं गिरफ्तारी कल ऐसे वक्त की गयी जब दोनों संपादक जांच में सहयोग दे रहे हैं. उन्होंने दावा किया, ‘‘पुलिस का कहना है कि उनके पास फोरेंसिक रिपोर्ट है. तो वे सीधे आरोपपत्र क्यों नहीं दाखिल करते. गिरफ्तारी की क्या जरूरत है? सामान्य मामले में उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता.’’ अग्रवाल ने कहा, ‘‘हमने बातचीत से कभी इनकार नहीं किया.’’ उन्होंने कहा कि जब दोनों पुलिस की जांच में शुरू से सहयोग दे रहे हैं तो गिरफ्तारी क्यों की गयी. (सहारा)

दोनों संपादक छह घंटे वहां बैठकर सौदेबाजी नहीं कर रहे थे तो क्‍या कर रहे थे?

 

इतने दिनों की तफ्तीश के बाद यदि जी न्यूज के दो पत्रकार हिरासत में लिए गए हैं तो जरूर पुलिस के पास पुख्ता सबूत जुट गए होंगे. इन गिरफ्तारियों का राजनीतिक अपयश चाहे जिसे मिले लेकिन निरंतर बे लगाम होते जा रहे इलेक्ट्रानिक मीडिया को सही सबक जरूर मिलेगा. इंदिरा जी ने प्रेस पर प्रतिबन्ध जल्दबाजी में लगा दिया था लेकिन इन ब्लैकमेलर पत्रकारों के खिलाफ न केवल वीडियो सबूत है बल्कि अन्य प्रमाण भी जुटाने में पुलिस को खास मेहनत नहीं करना पड़ी होगी. 
 
इलेक्ट्रानिक मीडिया के जितने न्यूज चैनल आज हैं उनमें से अधिकतर न्यस्त स्वार्थी लोगों, बिल्डरों के द्वारा चलाये जा रहे हैं. सारे के सारे घाटे में चल रहे हैं. अपने पत्रकारों से जबरन वसूली करवाकर ये तत्व कुछ अपना खर्च और कुछ कर्मचारियों का वेतन निकालते हैं. पिछले एक साल में कितने ही चैनल अपने कर्मचारियों को वेतन न दे पाने के कारण बंद हो चुके हैं, लेकिन उतने ही नए चैनल आ भी रहे हैं, आम चुनाव जो नजदीक हैं. जी न्यूज को ब्लैकमेलिंग की जरूरत भले न हो पर जब अन्य सारे लूट खसोट में व्यस्त हों तो ये क्यों न बहती गंगा में हाथ न धोयें. सरकार को इन चैनलों के लिए सख्त गाइड लाइन बनानी चाहिए और उसका पालन करवाना चाहिए. दर्शकों को गफलत और भयाक्रांत रखने का इन चैनलों ने शगल पाल रखा है. उधार के मनोरंजक कार्यक्रमों के बल पर चल रहे इन कथित समाचार चैनलों पर नकेल कसी जाना चाहिए. परिणाम अच्छे ही निकलेंगे जब अच्छे चैनल ही अपना अस्तित्व बचा पायेंगे.
 
बहरहाल, संदर्भित चर्चा को आगे बढ़ाएँ. जिसमें जी न्यूज के दो वरिष्ठ पत्रकारों को ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. कोल ब्लाक आवंटन में जांच पहले से चल रही है. जिंदल के खिलाफ भी वही आरोप होना चाहिए जो बाकी आवंटियों पर आरोपित किये गए हैं. लगभग ६० आवंटन जांच के घेरे में हैं और अटल सरकार के समय हुए आवंटनों को जोड़ लें तो शायद १२२ कोल ब्लाक. जी न्यूज इन परिस्थितियों में जिंदल से १०० या २०० करोड लेकर भी क्या मदद जिंदल की कर पाता, यह मेरी समझ से बाहर है. जो हश्र दर्डा के जेडी पावर, भास्कर के डीबी पावर या अजय संचेती और नागपुर के जायसवाल को आवंटित ब्लाकों के तारतम्य में होगा उसी अनुसार जिंदल का भी होता या होगा. 
 
जी न्यूज किस लिए ख़बरें दबाना चाहता था और क्यों उसके लिए जिंदल से कीमत वसूलना चाहता था, यह जानने और विचारने की जरूरत है. नवीन जिंदल ने ब्लैकमेलिंग की जिस तरह ६ घंटे की गोपनीय फिल्म रिकार्डिंग की वह जी न्यूज की परतें खोलने के लिए काफी है. रिकार्डिंग की फोरेंसिक जांच हो चुकी है और उनमें कोई छेड़छाड़ नहीं पाई गई है. अब यह जी न्यूज पर है कि किस तरह वह अपना बचाव पेश करता है. क्या यह बात अस्वाभाविक नहीं लगती कि जी न्यूज के ये दो कथित पत्रकार लगातार ६ घंटे तक जिंदल के दफ्तर में बैठे क्या कर रहे थे — अगर सौदेबाजी नहीं कर रहे थे तो क्या कर रहे थे. क्या इतना समय कोई प्रतिष्ठित पत्रकार या उद्योगपति कभी किसी को देते हैं. 
 
इस इकलौते मामले को सेंसरशिप कहना अथवा आपातकाल को इस बहाने याद करना उतनी ही जल्दीबाजी का संकेत करता है जितनी जल्दी मीडियाधर्मी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि सेंसरशिप की शुरुआत हो रही है. इलेक्ट्रानिक मीडिया का स्वछन्द आचरण गैर जिम्मेदारी की पत्रकारिता की ओर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है. इसके कारण सदन की कार्यवाही तक अब बेमानी हो चली है और राजनीतिक दलों को अपनी अगडम-बगडम फैलाने मुफ्त का माध्यम मिल गया है. ये अपनी कोई जिम्मेदारी कभी नहीं लेते और सारी निराधार या दुष्प्रचार को साबित करने का भर संबंधित नेता या पार्टी पर डाल देते हैं. यह चिंतन का विषय है कि क्यों प्रिंट मीडिया पर दफा ५०० लग जाती है और क्यों इलेक्ट्रानिक मीडिया किसी भी ऐसी धारा या प्रमाण प्रस्तुत करने की बाध्यता से मुक्त हैं. न ये जवाबदार और न कथित नेता. अराजकता फैलने का जितना खतरा अफवाहों से होता है उतना ही खतरा इन इलेक्ट्रानिक चेनलों से भी संभव है, यह धारणा अब पुष्ट होती जा रही है.
 
लेखक देवेंद्र सुरजन पत्रकार हैं.

सरकार को जी न्‍यूज का लाइसेंस निलंबित कर देना चाहिए : काटजू

 

मंगलवार को ज़ी टीवी के दो वरिष्ठ पत्रकारों की उगाही के इलज़ाम में गिरफ़्तारी से भारतीय पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल उठ खड़ा हुआ है. ज़ी न्यूज़ के प्रमुख सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के प्रमुख समीर अहलूवालिया पर आरोप है कि उन्होंने कांग्रेस सांसद और उद्योगपति नवीन जिंदल के ग्रुप से इस आधार पर 100 करोड़ रुपए मांगे थे कि वो ज़िंदल और कोयला घोटाले को जोड़ कर कोई रिपोर्ट नहीं करेंगे.
 
ज़ी न्यूज़ प्रबंधन के अनुसार ये गिरफ्तारियां ग़ैर कानूनी हैं और कोयला घोटाले से ध्यान हटाने के लिए ये गिरफ्तारियां की गई हैं इन आरोपों का फैसला तो अब अदालत क़रेगी, लेकिन सवाल ये है कि क्या इन गिरफ्तारियों से भारतीय पत्रकारिता की छवि ख़राब होती है?
 
'असामान्य मामला' : राष्ट्रीय प्रसासरक संघ के महासचिव एनके सिंह कहते हैं ये एक असामान्य मामला है. "ये एक एक अकेला ममला है. भारतीय पत्रकारिता में ऐसा नहीं होता है." एनके सिंह के अनुसार उनके संगठन ने इस इलज़ाम के तुरंत बाद कदम उठाया और एक समिति का गठन किया. उन्होंने कहा, ''समिति की रिपोर्ट के बाद सुधीर चौधरी को संगठन के खजांची पद से ही नहीं बल्कि इसकी सदस्यता से भी हटा दिया गया.''
 
उन्होंने यह स्वीकार किया कि इन गिरफ्तारियों से टीवी पत्रकारों पर प्रश्‍न चिन्ह ज़रूर लगेंगे लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि वो ऐसे कई क़दम उठा रहे हैं जिससे इस तरह के मामले दोबारा न हों सकें. "हम अपने ऊपर खुद निगरानी रखने के लिए ऐसे क़दम उठा रहे हैं जो यूरोपी देशों में भी नहीं हैं. हम चाहते हैं कि हमारे मामलों में सरकार का हस्तक्षेप कम हो."
 
लाइसेंस निलंबित करें : काटजू
 
इस मामले पर बीबीसी ने प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू से उनकी राय पूछी तो उन्होंने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, ''नेशनल ब्राडकांस्टिंग एसोसिएशन और पुलिस दोनों ने अपनी प्रारंभिक जांच में यह पाया है कि यह दोनों पत्रकार दोषी हैं. मेरी राय में सरकार को ज़ी न्यूज़ का लाइसेंस तब तक निलंबित कर देना चाहिए जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती.''
 
गिरफ्तार होने वाले पत्रकारों को उनके चैनल का पूरा समर्थन है. ज़ी न्यूज़ लिमिटेड के प्रमुख अलोक अग्रवाल ने बुधवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि जिंदल ग्रुप द्वारा सीडी के कुछ अंश ही जारी किए गए हैं. वह इस बात से इनकार नहीं करते कि उनके पत्रकार जिंदल से मिले थे लेकिन पांच से छह घंटे चलने वाली इस मुलाक़ात के दौरान दोनों ने रिश्वत की मांग बिलकुल नहीं की बल्कि जिंदल ने इन पत्रकारों को रिश्वत देनी चाही. उल्लेखनीय है कि जब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया इस बारे में जिंदल ग्रुप के साथ बात कर रहे थे तब ज़िंदल ग्रुप ने उनकी एक सीडी बना ली थी.
 
क्या है सीडी में : इस सीडी में कथित तौर पर दिखाया गया था कि ये पत्रकार पैसों की मांग कर रहे थे और कह रहे थे कि अगर उन्हें ये पैसा मिला तो वो जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक खबरें नहीं करेंगे. दोनों पत्रकारों ने भी अपने खिलाफ इलज़ाम को ग़लत बताया है. लेकिन क्या जांच जारी रहने तक इन्हें अपने पद से अलग हो जाना चाहिए. एनके सिंह कहते हैं उनकी इस पर राय ये है कि ये फैसला व्यक्तिगत होगा और उनका संगठन उसके लिए उन पर दबाव नहीं डाल सकता.
 
हकीकत कुछ भी हो विशेषज्ञ कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से आम धारणा बनती जा रही है कि कई पत्रकार बिकाऊ होते जा रहे हैं, ख़ास तौर से छोटे शहरों में. इन गिरफ्तारियों से इस धारणा को और बल मिल सकता है.
 
बीबीसी के लिए जुबैर अहमद की रिपोर्ट. 

फेसबुक और ब्लॉग कितनी सफाई कर पाएंगे.. साफ-साफ क्यों नहीं गरियाया..?

सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की गिरफ्तारी को ज़ी न्यूज़ ने मीडिया का गला घोंटने वाला बताया और रात दस बजे पुण्य प्रसून बाजपेयी हाथ मलते हुए गला फाड़ चिल्लाते हुए हाय-तौबा मचाने लगे.. 

आज की तुलना एमरजेंसी के दिनों से करने लगे.. कई दिग्गजों के फोनो भी लिए गये। क़मर वहीद नक़वी, राहुल देव, एनके सिंह.. आदि-आदि.. ज्यादातर लोगों ने इन गिरफ्तारियों को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया।
 
बस, मानो यहीं से पुण्य प्रसून को आत्मबल मिल गया। कहने लगे सब इसे दुर्भाग्यपूर्ण ठहरा रहे हैं.. नैतिक समर्थन दे रहे हैं… पत्रकारों पर हमला मान रहे हैं.. और भी न जाने क्या-क्या.. 
 
जब नक़वी जी और राहुल देव से पूछा गया कि वो कुछ ही दिनों पहले इसी मसले पर हुए एक सेमिनार में दिए अपने उस बयान से कैसे पलट गये जिसमें ज़ी न्यूज़ के संपादकों को गलत ठहराया था.. तो उन्होंने फौरन अपना फेसबुक पर सफाई दी… स्टेटस अपडेट डाला.. "हमने कभी सुधीर-समीर की तरफ़दारी नहीं की… वो हमारे बयान तोड़े-मरोड़े गये थे.."
 
अब सवाल ये उठता है कि इन दिग्गजों ने ऐसे राजनेताओं की तरह के बयान दिये ही क्यों थे जिन्हें तोड़ा-मरोड़ा जा सके..? सीधा-साफ कहते, "भइया, तुम्हारे संपादकों ने जो ब्लैकमेलिंग की कोशिश की थी, हम उसकी निंदा करते हैं.." या फिर अपनी स्थिति फोनो पर पैच किये जाने से पहले ही स्पष्ट कर देते तो शायद उनका फोनो शामिल ही नहीं किया जाता। 
 
आम आदमी तो चोर को मुंह पर चोर नहीं कह पाता, लेकिन पत्रकार, खासकर वरिष्ठ पत्रकारों से साफगोई की उम्मीद की जाती है। ऐसे में सामने वाले से अपने संबंधों के नाते चुप रह जाना न सिर्फ समाज को गलत संदेश देता है, बल्कि अपनी उस छवि के लिए भी नुक़सानदेह होता है जो उन्होंने बरसों मेहनत करके बनायी है।
 
वैसे ये दिग्गज तो बड़े हैं.. नामचीन हैं.. और अनुभवी भी.. हम उन्हें भला क्या सीख देंगे..? लेकिन बात सोच-समझ कर बोलने की है.. अगर उसी में चूकेंगे तो फेसबुक और ब्लॉग कितनी सफाई कर पाएंगे..?
 
Comments:
 
Qamar Waheed Naqvi: धीरज जी, बेहतर होता कि आप मेरा फ़ोनो सुनने के बाद कुछ कहते.
 
Yogesh Garg: जी न्यूज के सम्पादक दोषी भले ही हो लेकिन कोल स्केम में नवीन जीन्दल का बच निकलना अधिक दुर्भाग्य पूर्ण है।
 
Dhiraj Bhardwaj: सर क्षमा करें अगर मैंने कुछ गलत कह दिया हो तो.. पुष्कर जी की वेबसाइट मीडियाखबर.कॉम पर और आपकी वॉल पर देखने से ऐसा महसूस हुआ कि पुण्य प्रसून को आपके बयान को तोड़ने-मरोड़ने का मौका मिल गया..
 
Deepak Singh: agree with Yogesh Garg.
 
Yogesh Garg: कोल स्केम पर अब चैनल मीडिया की खामोशी ये स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि जी न्यूज मैनेज नही हो पाया या उसने ज्यादा रकम मांग ली थी । इस हमाम में सब नंगे है ।
 
Qamar Waheed Naqvi: कल रात में ही मैंने न्यूज़ 24 को भी फ़ोनो दिया था और आज दिन में लाइव इंडिया को. उनसे तो मुझे कोई शिकायत नहीं हुई. वे फ़ोनो भी सुने जा सकते हैं. मैं ख़ुद तो देख नहीं पाया, लेकिन कल रात ही किसी ने बताया था कि ज़ी सम्पादकों के इस कृत्य की राहुल जी ने काफ़ी कड़े शब्दों में भर्त्सना की थी.
 
Dhiraj Bhardwaj: हक़ीकत यही है योगेश जी.. लेकिन जमाने का दस्तूर है.. जो पकड़ा गया वही चोर है.. अगर छोटी-मोटी रकम पर मान जाते तो वहां भी कुछ नहीं दिखता..
 
Yogesh Garg: भ्रष्टाचार को बढावा देने के लिये वो नपुसंक मीडिया चैनल सबसे ज्यादा दोषी है जो कोल स्केम की खबरे दिखाने के बजाय जी न्यूज के सम्पादको की गिरफ्तारी पर ताली पीट पीट कर हंस रहे है।
 
Pushkar Pushp: धीरज जी , नकवी जी ने ज़ी न्यूज़ की तरफदारी कभी नहीं की. मैंने उनका फोनो सुना था. पुण्य प्रसून जी ने उनसे बात की थी. नकवी जी ने साफ़ शब्दों में इसे मीडिया और पत्रकारिता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था. लेकिन ज़ी न्यूज़ ने शातिराना तरीके से एकाध शब्दों को इधर – उधर करके लिख दिया कि संपादकों की गिरफ्तारी दुर्भाग्यपूर्ण . वैसे नकवी जी स्टेटमेंट यहाँ चस्पा कर दे रहा हूँ ताकि किसी तरह का शक – सुबहा खतम हो जाए. दरअसल गलती आपकी नही , ज़ी न्यूज़ की है. ज़ी न्यूज़ अपनी साख बचाने के लिए नकवी जी की साख के साथ खिलवाड कर रहा है. “My phono on arrest of Zee News Editor Sudhir Chaudhaary and Zee Buisness Editor Sameer Ahulwalia is being misreported by Zee Channels. I strongly condemned the conduct of two editors in this case and said that it is an unfortunate event for all us journalists. I also said that in my view police decided to arrest them after it has fully satisfied that a prima facie case of extortion and criminal conspiracy exists against these two journalsits. I also said since police acted after forensic investigation of the CD, there is now no doubt on the authenticity of the CD on the basisi of whichthis case stands . I was asked that police didn’t take any action against those journalists whose conversations were there in Radia tapes, I said that case was related with ethical misconduct of the journalists and I condemned the conduct of those journalists but Sudhir and Sameer’s case is of criminal misconduct. Therefore police action doesn’t seem wrong to seem wrong to me. – Q.W.Naqvi.”
 
Gh Qadir: giraftari jis vajah se huyee hai voh media k liye durbhagypoorn hai..
 
Dhiraj Bhardwaj: मैंने भी ज़ी न्यूज़ की शरारत पर ही उंगली उठाने की कोशिश की है नक़वी सर.. लेकिन आप भी ये मानेंगे कि उन्हें ये स्पेस मिल पाया इसके लिए बयानों की साफगोई में कमी ही जिम्मेदार है.. आपने फेसबुक जैसे खुले मंच पर इतना कुछ कहा, इसके लिए भी साधुवाद के हक़दार हैं.. महाभारत की लड़ाई में अश्वत्थामा के वध की घोषणा की तरह ही ये मामला पेचीदा है.. हमने कहीं आपकी नीयत पर सवाल नहीं उठाया है..
 
Satish Pancham: "दुर्भाग्यपूर्ण" शब्द कोई कायमचूर्ण तो नहीं है कि हर उम्र, वर्ग, पेशे के लिये बिंदास इस्तेमाल किया जा सके ….. अब पत्रकार धरे गये तो धरे गये….जी न्यूज वाले उसे अपने हिसाब से कायमचूर्ण की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं….हद है। रही बात मीडिया के लिये दुर्भाग्य होने की तो किस किस के दुर्भाग्यता कहा जाय……छोड़िये……की फर्क पैंदा ऐ 🙁
 
Satish Pancham : लोग यदि भूल गये हों तो याद दिला दूं कि निर्मल बाबा को बड़ा करने में न्यूज चैनल ही थे, सुबह से वह News channels पर किसी को लड्डू बांटता, किसी को समोसे खिलाता…किसी को कचौड़ी खिलाकर ठीक करता लेकिन तब यही सौभाग्यपूर्ण मीडिया मुंह बंद कर बैठा रहा….वो तो जब फेसबुक, इंटरनेट पर मोर्चा खुलना शुरू हुआ उस शख्स के खिलाफ तब जाकर मीडिया की मजबूरन आंख खुली और ऐसे बोला जैसे उसे सोते से जगाया गया हो. तब मीडिया का दुर्भाग्य नहीं था शायद….संभवत: तब सौभाग्यकाल चल रहा था।
 
Qamar Waheed Naqvi: धीरज जी, ये कुछ एसएमएस हैं, जो कल रात मुझे मिले. आप उसे नहीं सुन पाये, यह मेरा दुर्भाग्य है:
Great Phono Dada! Intni bebaki se shayd aur koi yeh batein nahi kah pata. It was real pleasure to hear you on Zee News. Rakesh
Ur statement is being run by zee news in wrong contest. It looks that ur against Sudhir and Sameer's arrest. Rakesh
Sir, aapka phono kuchh aur kah raha hai aur Zee me flash chala raha hai- sampaadko ki giraftari durbhaagyapoorn- Qamar Wahi Naqvi (Naval, Lucknow)
Dada amazing comment on Zee awesome . Regards Manish
 
Vipin Rathore: कुछ लोग इंटरनेट पर जी न्यूज़ के संपादकों की गिरफ्तारी की चर्चा करते समय यह भूल जाते हैं कि नवीन जिंदल कितने दूध के धूले हैं और देशहित में कितना काम कर रहे हैं। हिम्मत है तो जिंदल के भी राजनीति और व्यवसाय की जांच करा लो…शर्म आती है देश की मीडिया जगत की दोगलई पर..
 
Ramakant Roy: मैं कहूँगा कि जिंदल पर भी उसी तत्परता से कार्यवाई होनी चाहिए.
 
Dhiraj Bhardwaj: नक़वी सर, आपकी साफगोई का मैं भी कायल हूं, लेकिन अगर ऐसा ही था तो आपको ज़ी न्यूज़ से शिकायत क्यों है..? आपका फोनो तो रात को चला था.. आज सुबह का किस्सा सुनिये.. ज़ी न्यूज़ वालों ने भाजपा के मीडिया सैवी नेता मुख्तार अब्बास नकवी से अपने पक्ष में बयान दिलवा लिया, फिर फुल प्लेट में खबर चला दी कि "नक़वी ने कहा: एमरजेंसी जैसे हालात.." मेरे पास भी कई मित्रों के फोन आए जिन्होंने आपका फोनो पूरा सुना है.. सबने आपकी तारीफ की, लेकिन उनकी भी ये शिक़ायत रही कि अगर आप उन्हें दो टूक सुना देते तो ज़ी वालों को मनमानी व्याख्या करने का मौका नहीं मिलता.. अगर अब भी आपको इस आलेख से शिक़ायत हो तो कहें, मैं इसे वापस ले लेता हूं क्योंकि मैंने इसे आपके खिलाफ नही लिखा था..
 
Qamar Waheed Naqvi: मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं.

 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये आलेख और प्रतिक्रियाएं उनकी फेसबुक वॉल पर हैं। उनसे dheeraj@journalist.com पर संपर्क किया जा सकता है)

बेहद तकलीफदेह, दूर्भाग्यपूर्ण और शर्मसार करने वाला क्षण है : राहुल देव

 

Rahul Dev : शायद मुझे भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि सुधीर-समीर गिरफ्तारी पर मैंने भी न्यूज 24 पर कल रात फोनो दिया था। यह कहा कि सारे तथ्यों को तो हम अभी नहीं जानते लेकिन सीएसएफएल की जांच रिपोर्ट आने के बाद गिरफ्तारी हुई है तो कम से कम यह मान सकते हैं कि सीडी की सत्यता असंदिग्ध मानकर, पुख्ता आधार के बाद ही पुलिस ने इतने बड़े मीडिया समूह के संपादकों की गिरफ्तारी का कदम उठाया होगा। यह भी कहा कि यह हम सबके लिए बेहद तकलीफदेह, दूर्भाग्यपूर्ण और शर्मसार करने वाला क्षण है। समकालीन भारतीय मीडिया के इतिहास में इससे ज्यादा गंभीर आरोप शायद कम ही लगे हैं।
 
Rahul Dev : लेकिन नवीन जिंदल और कोलगेट में नामित सभी कंपनियों पर लगे आरोपों की जांच, मुकदमों आदि जरूरी कानूनी कारर्वाई में भी सरकार और उसकी एजेंसियां इतनी ही मुस्तैदी और पारदर्शिता दिखाएंगे यह उम्मीद भी करनी चाहिए। यह भी मांग करता हूं कि प्रेस परिषद, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी, इंडियन ब्राडकास्टिंग फेडरेशन, न्यूज ब्राडकास्टिंग एसोसिएशन, एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया को एक उच्चस्तरीय संयुक्त समिति बना कर इस पूरे मामले की जांच करके तथ्य देश के सामने रखने चाहिए। भारतीय मीडिया की साख और भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए यह भी जरूरी है कि इस मामले में मुंबई हाईकोर्ट और दिल्ली की स्थानीय अदालत में चल रहे मुकदमों की सुनवाई विशेष और दैनिक तौर पर की जाए।
 
वरिष्‍ठ पत्रकार राहुल देव के फेसबुक वॉल से साभार. 

”जिस तरह छीछालेदर लाइव हो रही है उससे लगता है बाकी चैनल दूध के धुले हैं”

 

कल रात जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और सीनियर समीर आहलूवालिया को गिरफ्तार किया गया.. आज जी न्यूज़ सफाई दे रहा है … और जिस तरीके से छीछालेदर लाइव हो रही है उससे लगता है बाकी सभी चैनल दूध के धुले हैं.. आजतक, एनडीटीवी, एबीपी न्यूज़ २४, आईबीएऩ ७. …और न जाने कौन कौन .. जैसे इस खबर को दिखा रहे हैं लगता है सबने जो इतने पैसे कमाए हैं .. साफ-सुथरे तरीके से ही कमाए हैं। 
 
सुना है- प्रणव रॉय पर दूरदर्शन को चूना लगाने का आरोप है, अरुण पुरी ने पैसे के हेरफेर में अपनी बहन को कंपनी से बाहर किया… आईबीएऩ ने वोट के बदले पैसे वाला स्टिंग करने के बाद भी प्रसारित क्यों नहीं किया था … न्यूज़ २४ का तो पूछना ही नहीं … देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों के नेता मिलकर इसे चलाते हैं इसका चरित्र क्या हो सकता है … सब मिलकर जी न्यूज़ को कोस रहे हैं … अरे ठीक है भाई चावल के व्यापार से इतना बड़ा कारोबार इन्होंने भी खड़ा किया है … सब एक जैसे हैं । सच दिखाने की सच बोलने की किसी में ताकत नहीं है .. नीरा राडिया मामला में सब साफ हो चुका है। और हां जो लोग भी चाहे वो मीडिया के किसी धड़े के हैं उन्हें आरोप लगाने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए।
 
Ashish Maharishi : सर आप किस साइड हैं। क्‍या आप जी न्‍यूज को सपोर्ट कर रहे हैं
 
Prashant Pathak : मर्द मूंछों से नहीं अपने काम से कहलाता है बिना मूंछ के बहुत ऊंची पूंछ के जिंदल की कारोबारी उपलब्धि …….बेहद सस्ती दरों पर कोयला ब्लॉक लेकर करीब 55 हजार करोड़ रुपए कमाए और सौ करोड़ मांगने वाले संपादको को बिना लेनदेन के ही जेल पहुंचाया …….ऐसे नाजायज़ सम्पादक देश को नहीं चाहिए लेकिन ऐसे राजनीतिक धनपशु देश की जायज़ माँग है
 
Deepak Singh : I asked Rajdeep Sardesai, when is his turn to see the world from behind the bars.
 
Alok Kumar : लेकिन शुरुआत हुई है ये तो अच्छी बात है न..कल किसी और का कारनामा कोई और दिखाएगा..पहले ऐसा बिरले होता था..ये पत्रकारिता के लिहाज से अच्छी चीज है..अगर सब नंगे हैं तो ऐसा दिख जाए…ये अच्छा है
 
Prakash K Ray : Anuranjan sir, really nice comment….. kudos
 
Hasan Jawed : Bawal..himmat dikhaye h aap n
 
Anuranjan Jha : आलोक सब नंगे है और यह कहने की जरुरत नहीं है … तकलीफ उनसे है जो शराफत का चोला पहने हुए हैं और नंगई कर रहे हैं
 
Sunil Kumar : Sir, it like wo kahte hain na ki jinke ghar shishe ke hote hain wo dusaron ke ghar me pathar nahi feka karte. ZEE ne feka, ab bhog raha hai. The day journalism become business, the fate of media houses were slipped into wrong hands. No surprise at the recent case.
 
Kumar Prakash : Sir,kanun ne himat ka kam kiya…patrakaro ka jo charitra ban gaya tha logo ke bichh "dalal" ka oh badlega..or wayese patrakar v sambhal jaye jo sirf dalali karte hay..
 
Prakash K Ray : I still remember how a channel totally blacked out the Vadra expose by the Kejriwal Team. Ironically someone related to the channel has updated dozens of status on facebook since the last night expressing his joy in utterly bad taste.
 
Minnat Rahmani : kuch jyada hi pareshan horahe he ZEE group wale. are bhai 24 ghante ki custody to facebook pe comment keliye bhi ki jati he, saikro log bewajah arrest hote he, five star hotel me meeting karne k kya jarurat thi editor sb ko, media pe lagam jaruri he, warna wo out of control hojaega, hamne dekha arop lagne pe media wale neta se fauran istifa mangte he lekin barkha dutta ko to aur increment dedi gayi, Anuranjan Jha ji sahi kaha ke sab nange he……
 
Kamalendra Jha : बिल्कुल सही कहा सर आपने ………..
 
Vijay Kumar Jha : नंगई करना ही है तो खुल कर हो तो ज्‍यादा अच्‍छा है। आवरण के साथ नंगई करेंगे तो कत्‍ल-ए-आम भी हो सकता है। यह भारत महान है।
 
Krishna Kumar Kanhaiya : मीडिया की परिभाषा, काम करने का तरीका और संचालन के लिए रकम… इसपर भारत के मंजे हुए और जनहितैषी पत्रकार राय दें…
 
Rakesh Narayan Dwivedi : inki giraftari to huyee par jindalon ka kya…
 
Raju Yadav : very good sir
 
SK Chaudhary Sonu : सर ये आपकी हिम्मत हैं, जो खुलकर इन सब लोगों के बारे मे बोला हैं,,, लेकिन चौधरी साहब के बचाव में कुछ लोग अपनी साख भी गिरा रहे हैं… वैसे अच्छा हैं शुरुआत तो हुई कम से कम।
 
Mahesh Jaiswal : सम्पादक की गिरफ्तारी के बाद एक ओर चैनल सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा था और दूसरी ओर हर ब्रेक में कांग्रेस के विज्ञापन चल रहे थे!  ये शहर है ……. यहाँ पर सब ………….
 
Pankaj Jha : अभी जो गिरफ्त में आया है उसकी बात की जा रही है. जब दूसरा मामला सामने था तब उसकी बात हुई ही थी. हां ये ज़रूर है कि नीरा राडिया के टेपों के बाद भी किसी पत्रकार का न नपना दुखद था.
 
Alok Vani : सर बात तो सही है कि हमाम में सारे नंगे हैं लेकिन ये एक अच्छी शुरुआत है, कल जब कोई दूसरा संपादक/मालिक फंसेगा तो जी भी उन्हें नहीं छोड़ेगा और सब नंगो की असलियत सामने आ जायेगी
 
Manmohan Kiran Gupta : sahi hai HAMAM mein sabhi Nangey hai aur Nanga Nangey ko kya Nanga karega 🙂
 
क्षत्रिय आयुष आवारा : ab tathakathit "news" to dikhani h…aur fir apne pratispardhi ke khilaf kuch chal rha ho to us mauke ko y kaise chhod sakte h….
 
Vijay Raaj Singh : Agree 100 %
 
Vinay Dipu Dwivedi : bahut khub sir…sir aapne ek jhatke me hi wab saaf kar diya …
 
बी.पी. गौतम : इंडिया टीवी रह गया सर
 
वरिष्‍ठ पत्रकार अनुरंजन झा के फेसबुक वॉल से साभार. 

दिग्विजय सिंह, रमण सिंह एवं अर्जुन मुंडा ने भी खबर रोकने का दबाव डाला : जी न्‍यूज

 

जी न्यूज के सीईओ आलोक अग्रवाल ने जी न्यूज को दोनों संपादकों की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए जल्द ही उनकी रिहाई की मांग की। उन्होंने कहा कि पहले संपादकों को पैसा देने की पेशकश की गई। उन्होंने पैसा नहीं लिया तो ग्रुप को पैसा देने की कोशिश की गई। दिग्विजयसिंह, रमन सिंह, अर्जुन मुंडा जैसे दिग्गज नेताओं के जरिए चैनल पर दबाव डाला गया। 
 
अग्रवाल ने कहा कि कोयला ब्लॉक आवंटन जरिए जिंदल ग्रुप को 45 हजार करोड़ का फायदा पहुंचाया गया। 155 ब्लॉक में से 22 ब्लॉक इस ग्रुप को दिए गए। जिंदल ग्रुप पर जी ने 238 स्टोरियां कर दिखाई है। कैग रिपोर्ट में भी जिंदल ग्रुप पर सवाल उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि जब हाईकोर्ट में इस मामले पर सुनवाई चल रही है, पुलिस पर राजनीतिक दबाव डालकर संपादकों को गिरफ्तार कराया गया है। जिंदल कंपनी के खिलाफ जांच अभी जारी है और इस मामले में संपादकों की गिरफ्तारी गैर कानूनी है। 
 
जी के वकील ने गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि 2 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज की गई और 27 नवंबर को गिरफ्तारी की गई। संपादक जब पूछताछ में सहयोग कर रहे थे तो उन्हें क्यों गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कहा कि एक सीडी को आधार बनाकर संपादकों की गिरफ्तारी की गई। सीडी में पांच छह घंटों की बातों को 15 मिनट में कैसे रिकॉर्ड किया गया है। गौरतलब है कि दोनों पत्रकारों को पुलिस ने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल से कोयला घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट प्रकाशित न करने के एवज में 100 करोड़ रुपए मांगने के आरोप में बुधवार को गिरफ्तार किया। (एजेंसी)

दोनों संपादकों की गिरफ्तारी अनुचित नहीं लगती : कमर वहीद नकवी

 

: तथ्‍यों को तोड़- मरोड़कर कर जी न्‍यूज ने मुझे पीड़ा पहुंचाई है : ज़ी न्यूज़ ने अपने सम्पादक व बिज़नेस हेड सुधीर चौधरी व ज़ी बिज़नेस चैनल के सम्पादक समीर अहलूवालिया की कल हुई गिरफ़्तारी पर मेरा फ़ोनो कल रात किया था. इसके बाद मेरे पास कई लोगों के फ़ोन और एसएमएस आये कि क्या आपने ज़ी को दिये फ़ोनो में पुलिस कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है क्योंकि ज़ी न्यूज़ अपने यहाँ ब्रेकिंग न्यूज़ की पट्टी पर आपका ऐसा बयान चला रहा है. मुझे इससे बड़ी पीड़ा पहुँची है. यह तथ्यों को अपने पक्ष में तोड़ कर पेश करने की निन्दनीय हरकत है.
 
इस मामले में मेरा स्पष्ट मानना है कि दो राष्ट्रीय न्यूज़ चैनलों के सम्पादकों पर अवैध उगाही और आपराधिक साज़िश जैसे आरोपों का लगना पत्रकारिता जगत के लिए बड़ी शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण बात है. चूँकि इस मामले में साक्ष्य के तौर पर वीडियो सीडी उपलब्ध है और उसकी फ़ॉरेन्सिक रिपोर्ट आ चुकी है कि उसके वीडियो-आडियो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गयी है, इसलिए प्रथम दृष्ट्या इन दोनों सम्पादकों के विरुद्ध गम्भीर आपराधिक मामला बनता है और पुलिस ने इनके ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की है, वह किसी भी दृष्टि से अनुचित नहीं लगती.
 
वरिष्‍ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के फेसबुक वॉल से साभार. 
 
“My phono on arrest of Zee News Editor Sudhir Chaudhaary and Zee Buisness Editor Sameer Ahulwalia is being misreported by Zee Channels. I strongly condemned the conduct of two editors in this case and said that it is an unfortunate event for all us journalists. I also said that in my view police decided to arrest them after it has fully satisfied that a prima facie case of extortion and criminal conspiracy exists against these two journalsits. I also said since police acted after forensic investigation of the CD, there is now no doubt on the authenticity of the CD on the basisi of whichthis case stands . I was asked that police didn’t take any action against those journalists whose conversations were there in Radia tapes, I said that case was related with ethical misconduct of the journalists and I condemned the conduct of those journalists but Sudhir and Sameer’s case is of criminal misconduct. Therefore police action doesn’t seem wrong to seem wrong to me. – Q.W.Naqvi.”

सुधीर-समीर की गिरफ्तारी का मामला संसद में उठाएंगे शरद यादव

New Delhi : JD(U) leader and NDA convenor Sharad Yadav on Wednesday described the arrests of Zee News Editors Samir Ahluwalia and Sudhir Chowdhary as an attempt by the government to gag the media.  Speaking to Zee News, Yadav said they would raise the issue in Parliament. 

 
Yadav wanted to know why those behind the loot in the Coalgate (Naveen Jindal) have not been arrested. “Why only one-sided action? Why hasn’t action been taken against those guilty of corruption?” he asked.  The JD(U) leader said since the case is already in court, first extortion should have been proved before arresting the editors. 
 
BJP leader Mukhtar Abbas Naqvi too described the arrests as illegitimate.  Saying that the Zee Group has been raising its voice against corruption, Naqvi warned that the government will suffer because of this action. (Zee)


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दिल्‍ली के साकेत कोर्ट में होगी सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की पेशी

: जी न्‍यूज ने कहा उनके स्‍टाफ ने कोई अपराध नहीं किया : नई दिल्ली : ज़ी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी औऱ ज़ी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को आज दिल्ली के साकेत कोर्ट में पेश किया जाएगा. कल दोनों को गिरफ्तार किया गया था. जिंदल स्टील एंड पावर कंपनी के चेयरमैन नवीन जिंदल ने आरोप लगाया था कि कोयला घोटाले पर कवरेज रोकने के बदले दोनों ने सौ करोड़ मांगे थे. जी न्यूज ने संपादकों की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए हैं. सुबह 11 बजे जी ग्रुप ने इसी मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की है. 

 
जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया है. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कल शाम सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को पूछताछ के लिए बुलाया था जिसके बाद उन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. जिंदल स्टील एंड पावर कंपनी के चेयरमैन नवीन जिंदल की शिकायत पर सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को गिरफ्तार किया गया है. 
 
नवीन ने इन लोगों का स्टिंग सीडी जारी करने के बाद आरोप लगाया था कि कोयला घोटाले पर कवरेज रोकने के बदले जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने 100 करोड़ रुपये मांगे थे. नवीन जिंदल ने अपने स्टिंग ऑपरेशन की सीडी दिल्ली पुलिस को भी सौंपी थी. हालांकि सुधीर और समीर के अलावा जी समूह भी इन आरोपों को सिरे से नकार चुका है. 
 
जी न्‍यूज की तरफ से एक बयान भी जारी किया गया है, जिसमें कहा गया है, "कांग्रेस सरकार मीडिया को सच बताने से रोक रही है. आज फिर से इमरजेंसी के हालात बने हैं. आज इतिहास का काला दिन है. जब केस कोर्ट में है तो दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के इशारे पर सुधीर चौधरी, समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी की है. सनसनी मचाने, कोलगेट घोटाले को छुपाने और नवीन जिंदल को बचाने के लिए गिरफ्तारी की गई है. ये गिरफ्तारी प्रेस की आजादी पर क्रूर हमला है. चैनल तमाम आरोपों को खारिज करता है. हमारे स्टाफ ने कोई अपराध नहीं किया है."


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सेबी से परेशान सहारा ग्रुप ने खरीदे न्यूयॉर्क में दो होटल

सुब्रत रॉय सहारा प्रोमोटेड सहारा ग्रुप ने न्यूयार्क में 2 आइकॉनिक होटल खरीदें हैं। ये दोनों ही होटल न्यूयार्क प्लाजा और ड्रीम न्यूयार्क मैनहटन के सेंट्रल पार्क जैसे अहम लोकेशन के पास हैं। ये सौदा करीब 4400 करोड़ रुपये में हुआ है। 2010 में जब सहारा ग्रुप ने लंदन में ग्रॉसवेनर हाउस को खरीदा था, तभी लक्जरी होटल में क्षेत्र में अपनी पोर्टफोलिया बनाने का संकेत दिया था।

इजरायल की अचल संपत्ति क्षेत्र की कंपनी एलाद प्रापर्टीज के मुताबिक प्लाजा होटल 105 साल पुराना लक्जरी होटल है और यह न्यूयार्क के सेन्ट्रल पार्क के पास है। होटल का मालिकाना हक फिलहाल एलाद प्रापर्टीज और सउदी कंपनी किंगड़ा होल्डिंग्स कंपनी के पास संयुक्त रुप से है। एलाद पर इजरायल के कारोबार यितझाक शुवा का नियंत्रण है। कंपनी को इस सौदे में उसकी 60 प्रतिशत हिस्सेदारी के लिए 1.6 अरब सिकेल्स प्राप्त होंगे जबकि शेष राशि सउदी कंपनी किंगड़ा को मिलेगी। सउदी कंपनी किंगड़ा सउदी अरबपति राजकुमार अलवालीद बिन तलाल की निवेश इकाई है। यह सौदा पूरा हो जाने पर उसके पास होटल में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी रहेगी। 

 

जी न्‍यूज ने कहा – मीडिया का गला घोंटना चाहती है कांग्रेस सरकार

 

जी समूह के संपादक सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया को नवीन जिंदल की कंपनी से सौ करोड़ रुपये मांगने के आरोप में दिल्‍ली पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया है. पुलिस ने एफआईआर दर्ज होने के 45 दिनों तक इस मामले की बाकायदा जांच की. नवीन जिंदल ने बाकायदा इन आरोपों के पक्ष में सीडी जारी किया. इसके बाद भी जी समूह का कहना है कि नवीन जिंदल की पार्टी मीडिया का गला घोंटना चाहती है. नीचे पढ़े एनडीटीवी में प्रकाशित खबर. 
 
Journalists' arrests: Zee News says Congress govt trying to gag media
 
New Delhi: Zee News has called the arrest of its senior journalists Sudhir Chaudhary and Samir Ahluwalia for alleged extortion of steel tycoon and Congress MP Naveen Jindal as an attempt by the party-led government to gag the media and cover up the coal scam.
 
"After 65 years of independence, the present Congress-led government is pushing the media to not speak the truth and gag it. It is practically the Emergency revisited in India on November 27, 2012, a day that will also be known as a black day in Indian history," the company said in a statement. (Read statement)
 
"The arrests have been made to sensationalise the issue and lend a cover to the coal scam and in particular favour Naveen Jindal, Congress MP, and his company Jindal Steel and Power Limited (JSPL)," the statement said.
 
Mr Chaudhary, who heads Zee News, and Mr Ahluwalia, head of Zee Business, were arrested on Tuesday evening by the Delhi police's crime branch in an extortion case registered about 45 days ago on a complaint by JSPL. They will be produced in a city court today.
 
Mr Jindal has alleged that Zee News tried to extort Rs. 100 crore in exchange for not airing unfavourable stories linking him and his group to the coal blocks allocation scam, which rocked the UPA government earlier this year. 
 
"JSPL is using the state machinery, controlled by the Congress both at the Centre and in Delhi, to muzzle voices of dissent and to interfere with the legitimate rights of the media in an attempt to divert attention from its illegalities and misdeeds, which the Zee News editors had sought to highlight in public interest," the Zee statement said.
 
On October 25, Mr Jindal had released a video-recording of meetings with executives of Zee TV and claimed this to be proof that they were trying to extort money from him. He said the news channel told his company's executives that if they did not spend Rs. 100 crore on advertising, the channel would run negative stories on allocation of coal fields to his firm.
 
Mr Jindal said the "extortion attempt" was caught on a hidden camera; he released CDs of this footage to reporters. The 'reverse sting' was carried out between September 13 and 19 over four meetings in different locations in Delhi. (एनडीटीवी)

भारत में फेल हो रहा है प्रजातंत्र का यूरोपीय मॉडल!

 

सत्ता के प्रतीक लालबत्ती को चमकाते हुए कोई सुखदेव नामधारी गोली चलाता है और उसकी रक्षा के लिए उत्तराखंड शासन की ओर से रखा गया पीएसओ भी साथ मिलकर वही अपराध करता करता है. उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मायावती सरकार का मंत्री राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य योजना के हजारों करोड़ डकारने में जेल में बंद होता है. ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार “सुशासित बिहार” में भ्रष्ट राज्य सरकार के अधिकारी फर्जी काम दिखाकर केंद्र सरकार की मनरेगा (रोजगार योजना) के आठ हजार करोड़ में से ६००० करोड़ मार जाते है. 
 
केन्द्रीय सरकार का तत्कालीन मंत्री राजा महीनों जेल में रहता है लेकिन सत्ता पक्ष दहाड़ते हुए सीएजी को चुनौती देता है. लोकसभा इस बात पर नहीं चलती कि जनता के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे “विदेशी पूंजी का खुदरा व्यापार में निवेश” पर चर्चा वोट कराने के प्रावधान वाले रूल १८४ में हो या बिना वोट वाले १९३ में. बिहार में हर दूसरे  सप्ताह एक मनोविकार से ग्रस्त महिला को इंटों-पत्थरों से गाँव के लोग मार देते है यह सोच कर कि “डायन है पूरे गाँव को खाने आई है”. इस समझ वाला वर्ग चुनाव में अपना सांसद भी चुनता है. और इसी के मत से प्रजातंत्र की भव्य इमारत दिल्ली में संसद के रूप में खड़ी कर दी जाती है यह कह कर कि सब कुछ संविधान के अनुरूप चल रहा है.
 
ऐसा नहीं है कि देश में प्रजातंत्र आयातित है यह तब से है जब यूरोप के लोग जंगल में रहते थे और हम वैशाली में जनमत के आधार पर शासन चलाते थे. लेकिन शायद संविधान निर्माता यह भूल गए कि छोटी ग्रामीण स्तर की संस्थाएं पहले बनायी जाये फिर प्रजातंत्र का भव्य मंदिर –संसद. जो डायन कह कर विक्षिप्त महिला को पत्थरों से मार देते हों उनकी समझ को बेहतर किये बिना प्रजातंत्र की इमारत तामीर करने का नतीजा है कि लालबत्ती लगाने वाला हत्या करता है, मंत्री जेल में रहता है और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले सीएजी को कटघरे में खडा करने को कोशिश की जाती है.        
 
कांग्रेस की स्थापना अधिवेशन में बोलते हुए दादाभाई नौरोजी ने कहा, “ भारत में अंग्रेजी हुकूमत का क्या फ़ायदा अगर इस देश को भी बेहतरीन ब्रितानी संस्थाओं के समान संस्थाएं नहीं दी गयी. हमें उम्मीद है कि भारत को भी ऐसी संस्थाओं का तोहफा ब्रिटेन की सरकार देगी. ठीक एक साल बाद १८८६ में पार्टी के अधिवेशन में बोलते हुए महामना मदनमोहन मालवीय ने कहा था, “ ब्रिटेन की प्रतिनिधि संस्थाएं वहां की जनता के लिए उतनी हीं अहम् है जितनी उनकी भाषा और उनका साहित्य. क्या ब्रितानी हुकूमत हमें जो हम जो ब्रिटेन की पहली प्रजा हैं और जिनमें वहां की हुकूमत ने ऐसी समझ और सोच विकसित की है  कि हम ऐसी आकांक्षा रखें, क्या ऐसी प्रतिनिधि संस्थाओं से वंचित रखेगी?”
 
दूसरी ओर अँगरेज़ लगातार कहते रहे कि भारत में इस तरह की प्रतिनिधि संस्थाएं बुरी तरह असफल रहेंगी. उनका तर्क था कि ब्रिटेन में भी इस तरह की संस्थाएं विकसित करने के पीछे मैग्ना कार्टा से तब तक का ७०० साल का इतिहास रहा है. सामाजिक चेतना का स्तर अलग रहा है, प्रजातांत्रिक भावनाओं को आत्मसात करने का अनुभव रहा है. उनका मानना था कि किसी ऐसे समाज में जिसमे समझ का स्तर बेहद नीचे हो, जिसमें समाज तमाम अतार्किक और शोषणवादी पहचान समूह में बंटा हो और जो पश्चिमी प्रजातंत्र के औपचारिक भाव को न समझ सकता हो, यूरोपीय प्रतिनिधि संस्थाएं थोपना भारत के लोगों के साथ अन्याय होगा.
 
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की भारत में भी संसदीय प्रणाली स्थापित करने की इस मांग पर अपनी प्रतिक्रया में तत्कालीन वाइसरॉय लार्ड डफरिन ने कहा, “ यह अज्ञात की खोह में कूदने से अलावा कुछ भी नहीं होगा. ये संस्थाएं बेहद धीमी गति से कई सदियों की तैयारी का नतीज़ा हैं“. ब्रिटिश संसद में भारत में लागू किये जाने वाले चुनावी प्रस्ताव पर एक बहस के दौरान १८९० में वाइसकाउंट क्रॉस जो भारतीय मामलों के मंत्री थे कहा, “ अपने होशो- हवास में रहने वाला कोई भी व्यक्ति यह सोच भी नहीं सकता कि ऐसी संसदीय व्यवस्था जैसी इंग्लैंड में है भारत में भी होनी चाहिए. भारत तो छोडिये, किसी भी पूर्वी देश में जिनकी आदतें व सोच सर्वथा अलग किस्म की हैं संसदीय प्रणाली निरर्थक साबित होगी.”
 
उनके उत्तराधिकारी “अर्ल ऑफ़ किम्बरले” उनसे भी आगे बढ़ते हुए बोले, “एक ऐसे देश में जो समूचे यूरोप से बड़ा हो और जिसकी विविधताएं अनगिनत हों संसदीय व्यवस्था देने की सोच मानव मष्तिष्क का अजूबा विचार ही कहा जा सकता है”. ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री ए जे बेल्फौर ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में बोलते हुआ आगाह किया, “हम सब यह मानते हैं कि पश्चिमी प्रतिनिधि सरकार –एक ऐसी सरकार जो पारस्परिक विचार-विमर्श (डिबेट) के आधार पर चलती हो, सर्वश्रेष्ट है लेकिन यह तब (संभव है) जब आप एक ऐसे समाज में हैं जो एकल (होमोजेनियस) हो, जो हर तथ्यात्मक व भावनात्मक रूप से समान हो, जिसमे बहुसंख्यक अपने अल्पसंख्यको की भावनाओं का स्वतः और आदतन अंगीकार करे और जिसमें एक –दूसरे की परम्पराओं को समभाव से देखने की पध्यती हो और जहाँ विश्व के प्रति तथा राष्ट्रीयता को लेकर सदृश्यता हो”. प्रधानमंत्री भारत में बदती हिन्दू-मुसलमान वैमनस्यता तथा पूरी तरह एक-दूसरे से अलग रहने वाली जाति संस्था के सन्दर्भ में बोल रहे थे.
 
भारत के १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट की पृष्ठभूमि तैयार करने वाली संयुक्त समिति ने १९३४ में लार्ड ब्राईस को उधृत करते हुआ कहा, “ब्रितानी संविधान जटिलताओं को समर्पित भाव से संश्लेषित करने का अद्भुत उपक्रम है लेकिन ब्रिटेन के अलावा किसी अन्य देश में इसकी सफलत संदिग्ध है क्योंकि यह एक समझदार लोगों के बॉडी द्वारा चलायी जाती है –एक ऐसी समझ जो सदियों के अनुभव के बाद आती है”.
 
इन सभी चेतावनियों को दरकिनार कर यहाँ तक कि गाँधी के तमाम विरोध के बावजूद अंग्रेजी शिक्षा से ओतप्रोत कुछ संभ्रांत नेताओं ने भारतीय संविधान को बीएन राव सरीखे एक अफसर (जिन्होंने १९३५ के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट बनाने में भी अपनी जबरदस्त भूमिका निभायी थी) की देख रेख में ब्रितानी, अमरीकी और अन्य यूरोपीय संस्थाओं की नक़ल करते हुए भारत का संविधान तैयार करवाया. आज एक बार फिर सोचने की ज़रुरत है कि प्रजातंत्र की वर्तमान टेढ़ी इमारत जो ऊपर से नीचे लायी गयी है, लेकिन जिसमें नीचे केवल खम्भा है, बनाई रखी जाये या फिर जनता की सोच बेहतर करते हुए ग्राम सभा की नींव पर 

संसद का मंदिर गढ़ा जाये.   
 
लेखक एनके सिंह जाने-माने पत्रकार हैं. ईटीवी, साधना समेत कई संस्‍थानों में वरिष्‍ठ पद पर रहे हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के जनरल सेक्रेट्री भी हैं. उनसे संपर्क singh.nk1994@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है. उनका यह लिखा दैनिक भास्कर अखबार में प्रकाशित हो चुका है.

मजबूरी में दैनिक जागरण को बदलनी पड़ी समीर-सुधीर वाली खबर!

अपनी सुविधानुसार पत्रकारिता करने के लिए कुख्‍यात दैनिक जागरण ने सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की गिरफ्तारी की खबर में भी अपनी तरफ से पूरा खेल करने की कोशिश की. खबर को खबर के तरीके से नहीं बल्कि इस तरीके से लगाया गया कि यह खबर छूटे भी नहीं और आरोपियों के नामों तथा उनके चैनल के नाम का खुलासा भी ना हो, पर जागरण की कुटिल चाल अन्‍य वेबसाइटों और दूसरे माध्‍यमों के चलते सफल नहीं हो सकी. मजबूरन उसे भी फिर अपने खबर में बदलाव करना पड़ा. 

 
शायद इस खबर को लिखने में जागरण को डर हो कि पेड न्‍यूज और ब्‍लैकमेलिंग की पत्रकारिता उनके लोग भी करते हैं कभी इस तरह की स्थिति आई तो ये लोग भी अखबार तथा पत्रकारों का नाम लिखने से परहेज करेंगे. पर बुरा हो न्‍यू मीडिया का जिसने बड़ी तेजी से इस सूचना को हर जगह प्रसारित कर दिया. अन्‍य मामलों में तानकर खबर लिखने वाला जागरण पहले वाले खबर को मात्र कुछ लाइनों में ही निपटा दिया. हेडि़ग में भी नवीन की जगह नीवन लिखा गया. अब यह गलती थी या जानबूझ कर लिखा गया था, ये तो यही लोग बता पाएंगे, पर बाद में अन्‍य जगहों पर खबर आने के बाद मजबूरन में जो बड़ी खबर लिखी गई, उसमें भी आरोपियों का पक्ष लेना अखबार नहीं भूला.
 
हालांकि आरोपी पत्रकार का पक्ष लेना पत्रकारिता के लिहाज से सही भी है, पर इस अखबार का दोहरा चरित्र भी दिखाती है यह खबर. इस तरह की अन्‍य खबरों में यह अखबार आरोपियों का पक्ष न लेता है और ना ही लिखता है, बस पुलिस ने जो कहानी बता दी अखबार उसे छाप देता है पर इस मामले में पत्रकारिता का पूरा ख्‍याल रखा गया. यानी दैनिक जागरण ऐसा अखबार है जो अखबार को पत्रकारिता के हिसाब से नहीं बल्कि अपनी सुविधा और सहूलियत, लाभ और हानि, दोस्‍ती और दुश्‍मनी के आधार पर प्रकाशित करता है. आप भी नीचे देखिए पहली खबर उसके बाद दूसरी खबर.  


 

नीवन जिंदल मामले में दो पत्रकार गिरफ्तार 
 
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता और उद्योगपति नवीन जिंदल को ब्लैकमेल करने के आरोप में दिल्ली पुलिस ने मंगलवार को एक समाचार चेनल के दो पत्रकारों को पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया है। दोनों को बुधवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा। नवीन जिंदल ने दोनों पर आरोप लगाया था कि ये एक खबर को रोकने के लिए 100 करोड़ रुपये की मांग कर रहे थे। हालांकि समाचर चैनल का कहना था कि उन्होंने खुद संपर्क किया था तथा रुपये की पेशकश की थी। (जागरण)




 

 

वसूली के आरोप में जी न्यूज के दो वरिष्ठ पत्रकार गिरफ्तार, पेशी आज

 
नई दिल्ली। कोयला घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट नहीं प्रसारित करने के लिए कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपये मांगने के आरोप में पुलिस ने मंगलवार को जी न्यूज चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकारों को गिरफ्तार किया है। नवीन जिंदल की कंपनी ने पत्रकारों के खिलाफ जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच में मुकदमा दर्ज कराया था, जिसके 45 दिनों बाद यह कार्रवाई हुई है। बुधवार को इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों की पेशी होगी।
 
पुलिस अधिकारियों ने बताया कि जी न्यूज के प्रमुख सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के प्रमुख समीर अहलूवालिया को गिरफ्तार किया गया है। नवीन जिंदल ने पिछले महीने एक सीडी जारी की थी, जिसमें कथित तौर पर जी न्यूज के पत्रकार जिंदल ग्रुप के अधिकारियों से यह सौदा करने की कोशिश कर रहे थे कि रुपये देने पर उनका चैनल जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक स्टोरी प्रसारित नहीं करेगा।
 
सुधीर चौधरी ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा है कि यह आरोप साजिशन लगाया जा रहा है। यह दबाव बनाने की रणनीति है ताकि चैनल को इस तरह की रिपोर्ट प्रसारित करने से रोका जा सके। चौधरी का कहना है कि सरकारी दस्तावेजों केआधार पर कोयला घोटाले से संबंधित हमने ऐसी रिपोर्ट की सीरीज चलाई थी। यह हमारे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान पर प्रतिक्रिया है।
 
जिंदल ने दावा किया था कि जी न्यूज के अधिकारियों ने पहले चार साल तक रिपोर्ट न दिखाने के लिए 20 करोड़ रुपये मांगे थे, बाद में उन्होंने इसे बढ़ाकर 100 करोड़ कर दिया। गौरतलब है कि कोयला घोटाले से संबंधित कैग की रिपोर्ट लाभ लेने वाली कंपनियों में जिंदल ग्रुप का भी नाम है। (जागरण)


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सुधीर चौधरी और समीर आहलूवालिया की गिरफ्तारी पर इन्‍होंने क्‍या लिखा?

जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर आहलूवालिया को दिल्‍ली पुलिस ने ब्‍लैकमेलिंग में गिरफ्तार किया है. सोशल मीडिया पर तो इन दोनों संपादकों की गिरफ्तारी का ज्‍यादातर लोगों ने स्‍वागत किया है. कारण कि इन जैसे लोगों के चलते ही मीडिया बदनाम हो रही है. इन्‍हीं दलालियों और ब्‍लैकमेलिंग के जरिए ऐसे लोग शीर्ष पर पहुंच रहे हैं और पूरे माहौल को गंदा कर रहे हैं. सभी बड़े अखबार तथा चैनलों की वेबसाइटों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है. आप भी पढ़े किसने क्‍या लिखा?

 
ज़ी न्यूज़ और जी बिजनेस के संपादक हुए गिरफ्तार
 
नई दिल्ली: ज़ी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. जिंदल स्टील और पावर ग्रुप के मालिक नवीन जिंदल की शिकायत पर यह गिरफ्तारियां हुई हैं. नवीन जिंदल कांग्रेस के सांसद भी हैं. नवीन जिंदल ने आरोप लगाया था कि कोयला घोटाले पर कवरेज रोकने के बदले जी न्यूज़ की ओर से 100 करोड़ मांगे गए थे.
 
जिंदल के आरोपों को सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने नकारा था. गिरफ्तारी पर ज़ी न्यूज और ज़ी बिजनेस का पक्ष अभी नहीं आया है. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सोमवार को दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया था जिसके बाद दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. इन्हें बुधवार को कोर्ट में पेश किया जाएगा. ग़ौरतलब है कि जिंदल ने मीडिया के सामने अपनी कंपनी के ओर से लगाए गए आरोपों के समर्थन में एक वीडियो दिखाया था जिसमें कथित रुप से कोयला घोटाले पर कवरेज रोकने के बदले जी न्यूज़ की ओर से 100 करोड़ मांगे गए थे. (एबीपी)


 
जी समूह के दो सम्पादक गिरफ्तार, कल किया जाएगा अदालत में पेश
 
दिल्ली। दिल्ली पुलिस ने आज देर शाम जी न्यूज़ के दो संपादकों को गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी नवीन जिंदल के उस वीडियो टेप के आधार पर की गई है जिसमें कथित तौर जी चैनल के अधिकारियों को धन उगाही करते हुए दिखाया गया था। गिरफ्तार किये गए ज़ी के समूह संपादक सुधीर चौधरी और बिजनेस हेड समीर अहलूवालिया को कल अदालत में पेश किया जाएगा.
 
गौरतलब है कि 25 अक्तूबर को जिंदल ने ज़ी टीवी के अधिकारियों के साथ बैठक की एक वीडियो रिकॉर्डिंग जारी की थी जिसमें कथित तौर पर जी चैनल के अधिकारियों को धन उगाही की कोशिश करते हुए दिखाया गया था। श्री जिंदल ने कहा कि टीवी चैनल ने उनकी कंपनी के अधिकारियों से कहा कि यदि वे 100 करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च नहीं करते हैं तो, चैनल उनकी फर्म को कोयला क्षेत्र आवंटन मामले में नकारात्मक खबरें चलाएगा। (भास्‍कर)


 
जी न्यूज के एडिटर सुधीर चौधरी को पुलिस ने किया गिरफ्तार
 
नई दिल्ली। जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। कुछ समय पहले उद्योगपति और कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने एक स्टिंग ऑपरेशन की सीडी जारी कर आरोप लगाया था कि उनकी कंपनी के खिलाफ खबर रुकवाने के लिए सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया ने उनसे सौ करोड़ रुपए मांगे थे।
 
उन्होंने इसकी शिकायत दिल्ली पुलिस में की थी। खबर के मुताबिक सीएफएल जांच में स्टिंग ऑपरेशन की सीडी सही पाई गई है। अब पुलिस ने कार्रवाई करते हुए सुधीर चौधरी और समीर अहलुवालिया को गिरफ्तार कर लिया है। जिंदल ने स्टिंग ऑपरेशन की खबर की सीडी जारी करते हुए कहा था कि जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने हमारी टीम से कहा कि वे तब तक हमारे खिलाफ नकारात्मक खबरें दिखाते रहेंगे, जब तक कि हम उन्हें 100 रुपए का विज्ञापन देने पर सहमति नहीं जताते। कांग्रेस सांसद ने एक सीडी भी जारी की थी, जिसमें चौधरी को रुपये मांगते हुए दिखाया गया है।
 
वहीं जी न्यूज ने उलटा आरोप लगाया है कि जिंदल रिश्वत देकर कोयला घोटाले में अपनी भूमिका से जुड़ी खबरों का प्रसारण रुकवाना चाहते थे। जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलूवालिया ने एक बयान जारी करके कहा है कि ये उन्हें बदनाम करने की साजिश है। जिंदल ने जो सीडी दिखाई है, वो मूल बातचीत की रिकार्डिंग में छेड़छाड़ करके तैयार की गई है। बयान में कहा गया कि जी न्यूज ने आगे बढ़कर कोयला घोटाले में नवीन जिंदल की कंपनी जेएसपीएल की भूमिका का खुलासा किया था। (आईबीएन7)


 
जबरन वसूली के आरोप में ज़ी ग्रुप के दो सीनियर पत्रकार गिरफ्तार
 
भाषा| नई दिल्ली।। कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के व्यापारिक समूह से 100 करोड़ रुपए की जबरन वसली की कोशिश के आरोप में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने 'जी न्यूज' के संपादक सुधीर चौधरी और 'जी बिजनेस' के संपादक समीर आहलूवालिया को गिरफ्तार किया। दोनों पत्रकारों पर आरोप है कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन से जुड़े घोटाले में जिंदल की कंपनियों से जुड़ी नकारात्मक खबरें न चलाने की एवज में उन्होंने 100 करोड़ रुपए की मांग की। 
 
करीब 45 दिन पहले जिंदल की कंपनी ने अपराध शाखा में जबरन वसूली का मामला दर्ज कराया था। मामला दर्ज कराने के 45 दिन बाद दोनों पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया कि 'जी न्यूज' के प्रमुख सुधीर चौधरी और 'जी बिजनेस' के प्रमुख समीर आहलूवालिया को गिरफ्तार किया है। (एनबीटी)


 
उगाही में दो वरिष्ठ पत्रकार गिरफ्तार
 
जी न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी एवं जी बिजनेस प्रमुख समीर अहलूवालिया को क्राइम ब्रांच ने उगाही की कोशिश करने और आपराधिक षड्य़ंत्र रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उन पर एक उद्योगपति व सांसद से पैसा मांगने का आरोप है। जिसके सबूत सांसद ने एक सीडी के जरिये पुलिस को पहले ही सौंप दिये थे। क्राइम ब्रांच ने आरोपों की सत्यता परखने के बाद उनकी गिरफ्तारी की।
 
पुलिस के अनुसार मंगलवार को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बताया जाता है कि सांसद को ब्लैकमेल कर उससे करोड़ों रुपये ऐंठने की कोशिश की। इस दौरान दोनों आरोपियों की बातचीत की सांसद ने वीडियो सीडी बना ली थी। जिसे सांसद ने पुलिस को सौंप दिया था। सीडी की फोरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद दिल्ली पुलिस ने दोनों आरोपियों को नोटिस भेजकर क्राइम ब्रांच के चाणक्यपुरी स्थित कार्यालय में हाजिर होने के लिए कहा। 
 
बताया जाता है कि दोनों आरोपियों से हुई पूछताछ और सबूतों के आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया है। इससे पूर्व सांसद से करोड़ों रुपये मांगने की बात सामने आने पर सुधीर चौधरी को ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन-संपादकों की संस्था-बीईए के कोषाध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था। मामला गर्माने पर जहां सांसद ने प्रेसवार्ता कर अपनी सफाई दी थी तो वहीं वरिष्ठ पत्रकारों ने इस बात को सिरे से नकार दिया था। इसके बाद कथित सीडी को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था। (हिंदुस्‍तान)


 
जिंदल मामले में जी ग्रुप के दो वरिष्ठ पत्रकार गिरफ्तार
 
कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के व्यापारिक समूह से 100 करोड़ रुपये की जबरन वसली की कोशिश के आरोप में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने ‘जी न्यूज’ के संपादक सुधीर चौधरी और ‘जी बिजनेस’ के संपादक समीर आहलूवालिया को गिरफ्तार किया. दोनों पत्रकारों पर आरोप है कि कोयला ब्लॉकों के आवंटन से जुड़े घोटाले में जिंदल की कंपनियों से जुड़ी नकारात्मक खबरें न चलाने की एवज में उन्होंने 100 करोड़ रुपये की मांग की.
 
करीब 45 दिन पहले जिंदल की कंपनी ने अपराध शाखा में जबरन वसूली का मामला दर्ज कराया था. मामला दर्ज कराने के 45 दिन बाद दोनों पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया है. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि ‘जी न्यूज’ के प्रमुख सुधीर चौधरी और ‘जी बिजनेस’ के प्रमुख समीर आहलूवालिया को गिरफ्तार किया है. (आजतक)


 
जी न्यूज के दो संपादक गिरफ्तार
 
नई दिल्ली: कोयला घोटाले से जुड़ी रिपोर्ट नहीं प्रसारित करने के लिए कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपए मांगने के आरोप में पुलिस ने मंगलवार को जी न्यूज चैनल के दो वरिष्ठ पत्रकारों सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के प्रमुख समीर अहलूवालिया को गिरफ्तार किया है। उल्लेखनीय है कि कोयला घोटाले से संबंधित कैग की रिपोर्ट लाभ लेने वाली कंपनियों में जिंदल ग्रुप का भी नाम है।
 
नवीन जिंदल की कंपनी ने पत्रकारों के खिलाफ जबरन वसूली के आरोप में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच में मुकदमा दर्ज कराया था, जिसके 45 दिनों बाद यह कार्रवाई हुई। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि नवीन जिंदल ने पिछले महीने एक सीडी जारी की थी, जिसमें कथित तौर पर जी न्यूज के पत्रकार जिंदल ग्रुप के अधिकारियों से यह सौदा करने की कोशिश कर रहे थे कि रुपए देने पर उनका चैनल जिंदल ग्रुप के बारे में नकारात्मक स्टोरी प्रसारित नहीं करेगा।
 
इस बीच सुधीर चौधरी ने आरोप को खारिज करते कहा है कि ये आरोप साजिशन लगाए जा रहे हैं। यह मीडिया पर दबाव बनाने की कोशिश है ताकि चैनल इस रिपोर्ट को प्रसारित न कर सके। चौधरी ने कहा कि सरकारी दस्तावेजों के आधार पर कोयला घोटाले से संबंधित हमने एक अभियान चलाया था, यह उसी की महज प्रतिक्रिया है।
 
उधर जी न्यूज ने इस गिरफ्तारी को सरकारी बर्बरता बताते हुए कहा है कि देश में इमरजेंसी जैसे हालात बन रहे हैं। इस गिरफ्तारी के साथ साबित हो गया है कि आज इतिहास का काला दिन है। लेकिन उद्योगपति व सांसद नवीन जिंदल ने दावा किया था कि जी न्यूज के अधिकारियों ने पहले चार साल तक रिपोर्ट न दिखाने के लिए 20 करोड़ रुपए मांगे थे, बाद में उन्होंने इसे बढ़ाकर 100 करोड़ कर दिया। (पंजाब केसरी)


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एक चैनल को बैन करवाने वाले सुधीर के खिलाफ यह फैसला देर से हुआ

कभी सहारा समय के ब्यूरो चीफ, कभी इंडिया टीवी में रजत शर्मा के ख़ासम ख़ास रहे, और लाइव इंडिया में एक टीचर का फर्ज़ी स्टिंग चलाकर और अपने एक बेहद जूनियर के सिर सारा इल्ज़ाम जड़ कर, उसको जेल भिजवा कर सरकार के हाथों पहली बार एक चैनल को बैन कराने का रिकार्ड बना चुके सुधीर चौधरी अपने पुराने संस्थान ज़ी न्यूज़ दोबारा क्या गये कि उनके जेल जाने का परवाना ही तैयार हो गया.

 
अभी ख़बर सुनी कि ख़बर दिखाने और रोकने के नाम पर 100 करोड़ की ब्लैकमेलिंग के आरोप में दिल्ली पुलिस ने उनको धर दबोचा. भारतीय मीडिया के लिए इससे बुरी कोई ख़बर नहीं हो सकती, इसको अगर भारतीय पत्रकार जगत के लिए काला दिन कहा जाए तो ग़लत ना होगा. लेकिन अगर तस्वीर के दूसरे पहलू पर नज़र डालें तो जो कुछ हुआ…..देर से और अधूरा हुआ. कई लोगों का मानना है कि सुधीर चौधरी और आहलूवालिया ने जो किया वो उनके लिए कोई नया नहीं था. साथ ही क्या इस पूरी ब्लैकमेंलिग में सिर्फ ये दो ही नाम शामिल थे..? 
 
सुधीर चौधरी की गिरफ्तारी की ख़बर के बाद अचानक कई बातें याद आ गई… कि लगने लगा इनको भी कह डाला जाए. सुधीर चौधरी को उसी दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है जिसको ये बहुत ही मामूली मानते थे. 2005 की घटना है धौला कुंआ रेप केस जैसे बहुचर्चित मामले में भी रिपोर्टर्स मीटिंग के दौरान रिपोर्टरों पर दबाव बनाने की कोशिश होती थी, कि या तो ये बताओ रेपिस्ट कौन है या विक्टिम का वन टू वन लाओ. भले ही सुधीर चौधरी ने फील्ड से कभी कोई स्टोरी या रिपोर्टिंग ना की हो मगर अपने गुरु घंटाल की तरह अदालत सजा कर जब ये स्टूडियो में बैठते तो दुनिया का सबसे बड़ा पत्रकार समझने से इनको कोई रोक ही नहीं सकता था. 
 
इतना ही नहीं अगर दिल्ली पुलिस से मिली कोई जानकारी रिपोर्टर देना चाहता था तो इनका कहना होता था कि पुलिस का समोसा खाते हो ना? चूंकि अब लगने लगा है कि ख़ुद इनको नेताओं की दलाली और मोटा माल खाने का शौक़ था… इसीलिए इन्होंने टीम भी ऐसी ही बनाई. जिसने कभी रिपोर्टिगं के नाम पर आर भी ना सीखा हो मगर सुधीर जी को ख़ुश रखना उसने सीख लिया, किस नेता से क्या बाइट लानी है, और क्या चलानी है, तो भला उसकी तरक़्क़ी और मौज को कौन रोक सकता था. लेकिन अफसोस आज बेचारे अकेले जेल चले गये, जिनको आउट ऑफ वे प्रमोट किया, वो बचाने के लिए कहीं नज़र नहीं आ रहे, जिनको डुबोया उन्होंने ही इनकी सोने की लंका में हनुमान जी वाला काम कर दिया.
 
जी न्यूज से मामूली पत्रकार की हैसियत करियर शुरु करने के बाद आज करोड़ों का मालिक होना भी कोई इन्ही से सीखे. हां, एक बात और अभी अभी फेसबुक एक और संपादक जी ने सुधीर चौधरी की गिरफ्तारी पर ख़ुशी ज़ाहिर की है और कहा है कि अगर ये गिरफ्तारी ना होती तो उनको अफसोस होता, लेकिन जनाब संपादक महोदय… ये तो भला हो भड़ास जैसी कई सोशल मीडिया साइटों का जिन्होंने सुधीर चौधरी और जी न्यूज की ब्लैकमेल की दबी हुई कहानी को उजागर किया और मीडिया की मजबूरी बनी कि इसको दिखाया भी जाए और इसकी जांच भी की जाए. लेकिन एक नेशनल न्यूज चैनल के ये बेचारे संपादक महोदय अपनी और अपनी टीम की करततू को फिलहाल शायद भूले बैठे हैं. जब मेरठ में होने वाले एक बड़े और हाइप्रोफाइल हत्या कांड में इनकी टीम पर करोड़ों की उगाही करके आरोपियों को मदद पहुंचाने के आरोप लगे थे. मगर इन्हीं साहब ने सुधीर चौधरी की तरह ख़ुद को बचाने के लिए एक छोटे प्यादे की बलि चढा़ दी थी और आज नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते.  
 
इसके अलावा सुधीर चौधरी के खिलाफ शिकायत करने वाली पार्टी भी इतनी भारी थी कि इसमें कार्रवाई होना तय था ही. नहीं तो कई मामलों पर कुछ चैनलों की ख़ामोशी सबके सामने ही है…..बहरहाल सुधीर चौधरी से हमें पूरी हमदर्दी है. हो सकता है कि जेल से आने के बाद फिर से कोई चैनल उनको अपने यहां सेवा का मौका दे दे. या वो अपना ही चैनल ले आएं और फिर इतने होनहार और कमाऊ पत्रकार को कौन नहीं चाहेगा. ये भी सच है कि एक पत्रकार होने के नाते उन्होंने जो कुछ योगदान दिया, वो भारतीय मीडिया के लिए एक मील का पत्थर होगा. उनकी मिसाल सुनकर करप्ट और दलाल टाइप के बचे कई लोग ज़रूर सबक़ लेंगे. हां ये अलग बात है कि हो सकता है कि अब और सतर्क होकर मामले तय किये जाने लगें. इतना ज़रूर है कि कभी कॉफी हाउस में कॉफी तक के पैसे ना दे पाने की हैसियत रखने वाले कई पत्रकारों के मौजूदा एंम्पायर को देखकर लगता है कि सब जगह के करप्शन खुल चुके हैं…बस अब तो मीडिया के करप्ट लोग भी बेनक़ाब हो तो देश और समाज का भला हो सकता है. 
 
लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं. सुधीर चौधरी के कार्यकाल में सहारा और इंडिया टीवी  में काम कर चुके हैं. 


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ब्लैकमेलर सुधीर चौधरी, बेजमीर पुण्य प्रसून बाजपेयी

ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी और बिज़नेस हेड समीर आहलूवालिया की आज हुई गिरफ़्तारी का स्वागत किया जाना चाहिए। मीडिया के लिए यह बहुत अच्छा सबक है। यह और ऐसा कुछ बहुत पहले होना चाहिए था। आगे यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। भस्मासुर में तब्दील होती जा रही मीडिया और उस के सरोकार जिस तरह हमारे सामने है, यह झटका बहुत पहले मिलना चाहिए था। जिस तरह मीडिया पर प्रबंधन और उस का व्यवसाय हावी होता जा रहा है, संपादक नाम की संस्था अब दलाल, लायजनर, मैनेजर और मालिकों का पिट्ठू बन कर जन-सरोकारों से मुह मोड़ कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय देखने में लग गई है, वह हैरतंगेज़ है। सिर्फ़ और सिर्फ़ मीडिया मालिकों के हित साधने में लगे संपादकों को उन की इस कुत्तागिरी के लिए जितनी सज़ा दी जाए कम है। 

 
मीडिया को बचाने के लिए यह बहुत ज़रुरी हो गया है। गिरफ़्तार तो ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष गोयल को भी किया जाना चाहिए। और ऐसे तमाम मालिकों और संपादकों को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए जो समाचार और व्यवसाय का फ़र्क भूल कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय जानते हैं। मालिकों की तिजोरी भरना जानते हैं। और फिर सुधीर चौधरी तो पेशेवर ब्लैकमेलर हैं। सांसद और उद्योगपति नवीन ज़िंदल तो कोयला स्कैम में गले तक धंसे पड़े हैं, उन की भी जगह जेल ही है। कानून अगर ठीक से काम करेगा तो ज़िंदल भी एक-न-एक दिन जेल में ज़रुर होंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि कानून बड़े अपराधियों के खिलाफ़ काम करते समय सो जाता है और यह बड़े अपराधी बेल ले कर मज़े लेते हैं। अब देखिए न कि फ़ेसबुक पर कमेंट करने वाली लड़कियां कितनी जल्दी गिरफ़्तार हो जाती हैं, पुलिस और जज सभी एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। पर बाल ठाकरे जीवन भर कानून हाथ में लिए रहे पर उन का क्या हुआ? उन्हें तिरंगे में लपेट कर विदा किया गया। यह देश और देश के स्वाभिमान पर एक गंभीर तमाचा है। जूता है देश-प्रेमियों के मुह पर। पर मीडिया इस पर खामोश है।
 
खैर, सुधीर चौधरी और समीर की तो गिरफ़्तारी हुई है और समूची ज़ी टीम इसे गलत ठहराने में पिल पड़ी है। और तो और पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे लोगों की आत्मा इतनी मर गई है कि इस घटना को इमरजेंसी से जोड़ने में अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल कर रख दी है, अपनी सारी साख मिट्टी में मिला दी है। सफलता की चांदनी रात के इन उल्लुओं को बाज़ार और अपनी नौकरी के सिवाय कुछ दिखता ही नहीं, यह तो हद है। समूची पत्रकारिता को मालिकों की पिछाड़ी धोने में खर्च करने वाले यह बेजमीर लोग पत्रकारिता की मा-बहन करते हुए देश की सेलीब्रेटी बनने की मुग्धता में सारे सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे कर उसे राजनीति, कारपोरेट, क्रिकेट और सिनेमा में ध्वस्त करने में जी-जान से लगे पड़े हैं। यहीं उन की दुनिया शुरु होती है, और यहीं खत्म होती है। इन्हीं के आंगन में उन का सूरज उगता है, और इन्हीं के नाबदान में इन का सूरज डूबता है। इस और ऐसी कृतघ्न मीडिया की क्या इस भारतीय समाज को ज़रुरत है? 
 
वह मीडिया जो बीस रुपए कमाने वाले लोगों की ज़रुरत को नहीं जानती। वह जानती है ठाकरे जैसे गुंडों और देश-द्रोहियों को महिमामंडित करना। अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर जैसे पैसे के पीछे भागने वाले लोगों की खांसी-जुकाम की खबर रखना। अंबानी, ज़िंदल जैसे लुटेरों, देशद्रोहियों के हित की रक्षा करने वाली यह मीडिया, ब्लैकमेलर मीडिया जो अपने ही यहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा नहीं जानती, जिस मीडिया में काम करने वाले तमाम लोग मनरेगा से भी कम मज़दूरी में काम करते हैं, उस मीडिया में जहां सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया जैसे ब्लैकमेलर ऐश करते हैं, वह मीडिया जो नीरा राडिया जैसी दलालों के इशारे पर नाचती है, वह मीडिया जो अमर सिंह जैसे खोखले और दलाल लोगों के आगे गिड़गिड़ाती है, मौका पड़ने पर रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे देती है, वह मीडिया अगर सचमुच इमरजेंसी के टाइम में रही होती तो सोचिए कि भला क्या हुआ होता? और यह बेशर्म और ब्लैकमेलर मीडिया आज अपनी ब्लैकमेलिंग को इमरजेंसी की तराजू पर तौलने में जिस बेशर्मी से लगी है, यह तो मीडिया को मार डालने की कोशिश है।
 
जिस तरह मीडिया मालिकों ने सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय को ही अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है वह किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज और देश के लिए शुभ नहीं है। ज़िंदल चाहे जितने बड़े बेइमान हों पर अभी पहले दौर में तो उन्हों ने सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया का स्टिंग कर उन की ब्लैकमेलिंग का जो वीडियो जारी किया है वह सुधीर चौधरी और समीर को अपराधी साबित करने के लिए बहुत है। अब कुछ वकीलों और संपादकों के मुंह में अपनी बात डाल कर ज़ी न्यूज़ के एंकर सुधीर-समीर को चाहे जितना जस्टीफ़ाई कर लें, कानून और समाज की नज़र में हाल-फ़िलहाल तो वह अपराधी हैं। जिस भी किसी ने वह वीडियो देखा होगा, सुधीर, समीर का ब्लैकमेलर चेहरा साफ देखा होगा। क्या तो हेकड़ी से सौ करोड़ रुपए सीधे-सीध मांग रहे हैं। और वह लोग रिरिया कर बीस करोड़ दे रहे हैं और कोयला स्कैम न दिखाए जाने का आदेश भी फ़रमा रहे हैं। ऐसे ब्लैकमेलरों को मीडिया-जगत को खुद-ब-खुद शिनाख्त कर उन्हें उन की राह दिखा दी जानी चाहिए। शुचिता, नैतिकता और मीडिया के प्रति निष्ठा का तकाज़ा यही है कि सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया की इस ब्लैकमेलिंग को जितना कोसा जाए कम है, और उन की इस 

गिरफ़्तारी का दिल खोल कर स्वागत किया जाए, न कि इसे कंडम कर घड़ियाली आंसू बहाने में ज़ी घराने को कंधा दिया जाए। दिल्ली पुलिस को बधाई दी जानी चाहिए।
 
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com  के जरिए किया जा सकता है. यह लेख पांडेय जी के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है. दयानंद की बेबाक लेखनी का स्वाद लेने के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं- भड़ास पर दनपा 


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सुनो, हम दोनों अरेस्ट हो गए, ब्रेकिंग चलवाओ…मेन एंकर को लगाकर इसे लोकतंत्र और मीडिया पर हमला बताओ

Mayank Saxena  :  चम्पादक और पुलिस संवाद….

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चम्पादक- जी, आप कैसे गिरफ्तार कर सकते हैं एक चम्पादक को…वो भी दफ्तर से…

पुलिस अधिकारी- आपके खिलाफ़ वारंट है…

चम्पादक- वारंट से क्या होता है…हम चम्पादक हैं…कानून वानून नहीं मानते…

पुलिस अधिकारी- डंडा तो मानते हो कि नहीं…

 

चम्पादक- देखिए ये महंगा पड़ सकता है…

पुलिस अधिकारी-100 करोड़ हैं ही नहीं हमारे पास…2-3 लाख में आपका पेट नहीं भरेगा…क्या करोगे…चलो अब…

 

चम्पादक- मेरी पहुंच बेहद ऊपर तक है…

पुलिस अधिकारी- मेरे भी बॉस वही हैं…

 

चम्पादक- सस्पैंड करवा दूंगा…

पुलिस अधिकारी- बहुत करवा लिया…आज तो बदले का दिन है…

 

चम्पादक- थाने चलो, वहीं देखते हैं…वर्दी का घमंड है…

पुलिस अधिकारी- चलो…वर्दी उतार कर ही बात करेंगे आज रात…

 

चम्पादक- अच्छा..अरे…ओह..बुरा मान गए क्या…देखो अपन तो भाई भाई हैं…

पुलिस अधिकारी- मैं तो कभी गिरफ्तार नहीं हुआ…कैसे भाई…

 

चम्पादक मालिक को फोन लगाते हैं….

फोन पर- डायल किया गया नम्बर फिलहाल स्विच ऑफ़ है…

 

चम्पादक- मरवा दिया @#$%^& ने…बोले धंधा लाओ…वाट ही लगवा दी…कहा था टिंगल टेढ़ा आदमी है…पावरप्राश के दो स्लॉट और ले आते…बाकी पांटी से बात करवा देते…कुछ ज़मीनें दिलवा देते…

पुलिस अधिकारी- बेटा, तुमको भी तो बड़ी पड़ी थी, जल्दी चैनल हेड बनने की…जब रिपोर्टर थे…थाने आते थे…तभी से लक्षण दिखते थे…लेकिन 10-20 हज़ार की दलाली से इतनी जल्दी उड़ने की इच्छा से ये ही होना था…खिचड़ी गर्म हो तो किनारे से खाना शुरु करो…बीच से खाओगे तो मुंह जलाओगे…

 

चम्पादक- अब ज्ञान न दो…मालिकवा भी फोन नहीं उठा रहा…

पुलिस अधिकारी- चलो…क्या करना है…

 

चम्पादक- रुको एक फोन और कर लें…

(चम्पादक न्यूज़रूम में फ़ोन लगाता है…)

 

चम्पादक- सुनो…हम दोनों को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है…ब्रेकिंग चलवाओ…और अगला बुलेटिन चलाओ…फोनो लो…लाइव लो…मेन एंकर को लगा दो…लोकतंत्र पर हमला…सम्पादकों की गिरफ्तारी…सरकार का मीडिया पर हमला…आज़ादी छीनने की कोशिश…मीडिया पर दबाव बनाने की कोशिश…लोकतंत्र के चौथे खंभे की नींव में पानी भरने की सरकारी साज़िश…जो जो याद आए, सारे जुमले ठेल दो…और हां एंकर लिंक लिख कर पढ़वाना…नहीं बहुत अक्खड़ एंकर है…मन से बोला तो ऐसी तैसी करवा देगा…सम्पादक की गिरफ्तारी कैसे कर सकते हैं…भले ही राष्ट्रपति की कर लें…हां याद रखना…लोगों को इमरजेंसी की याद भी दिला देना…समझे…

पुलिस अधिकारी- बहुत हो गया…चलो रास्ते से बीयर भी लेनी है, दिल्ली में दुकान दस बजे बंद हो जाती है…बाकी बात वकील से करना…

चम्पादक- अच्छा…वो बीयर लेना तो एक ओल्ड मॉंक का अद्धा भी ले लेना…बाकी तो लोकतंत्र की हत्या हो ही गई…ग़म ही ग़लत कर लें…
पुलिस वाला मुस्कुराता है…

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(इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है…हो तो वो खुद ज़िम्मेदार है…)

    Jamshed Qamar Siddiqui * Custom .. हम्म्म्
 
    Sarika Thakur hahaha bahut khoob …
 
    Sanjay Sharma Jabardast..
   
    Tanu Sharma i luuuuved it 🙂
    
    Tanu Sharma bure kaam ka bura natija 🙂
     
    Vishal Dudeja kal jab aam aadmi ki baat thi tab kha ye media
     
    Mohak Sharma too gud..sharing ..proud of u ..!!
     
    Arpit Bhatia are Arrest hua kyn ?
     
    Nitin Thakur वो मेन एंकर कभी देवता बनकर पुजा करता था..अब कसम से जूतों से पिटना भी चाहिए..आए बड़े मीडिया के देवदूत!!
    
    Ila Joshi Bahut khoob likha hai Mayank….Nitin…Bhasha ka sanyam rakho baalak, tark jitne sanyamit tarike se ho behtar hain


युवा पत्रकार मयंक सक्सेना रचित इस सीरिज की अन्य कथाओं के लिए यहां क्लिकियाएं- चम्पादक कथा


युवा और तेजतर्रार पत्रकार मयंक सक्सेना के फेसबुक वॉल से साभार.


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संपादकों की गिरफ्तारी को जो मीडिया की आज़ादी पर हमला कहेगा वो पत्रकार नहीं दलाल है

Akhilesh Sharma : मुझे अपने पत्रकार होने पर फ़ख़्र है। मैं ऐसा नहीं हूँ। सारे पत्रकारों को ये बिल्ला टाँग कर घूमना पड़ेगा। नाक कट गई यार। मीडिया की साख के ताबूत पर ये आख़िरी कील है। जो इसे मीडिया की आज़ादी पर हमला कहेगा वो पत्रकार नहीं दलाल है।

Naveen Kumar मैं सहमत हूं…
 
Tri Bhuvan Great…..i am proud of you and myself, akhilesh…..from doha qatar……Cop18
 
Shobha Ram नकवी साहब तो कह रहे हैं ये गिरफ्तारी मीडिया के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है..
   
Vibhakar Rajan Hey Akhilesh- be proud of what u r – u can talk abt yrself cant ensure others follow yr path- so chill and keep follwing yr honest path.
    
Akhilesh Sharma No I am very upset tonight Vibhakarji. We pay our emi. Pay our taxes. May be seeking small favours like getting our railway tickets confirmed. Getting school admission in the school for the kids of poor man working in our housing society. But how can somebody call it attack on the freedom of press?
     
Rajeev S Raju Akhiri nahi ye pahli keel hai..jo bahut der baad thoki gayee..iski starting barkha dutt aur veer sanghwi jaise logo se ho sakti thi..lkn nahi huyee..wo isliye keoki uske peeche koi navin jindal nahi tha..
 
Naveen Kumar चार साल में इतने पैसे मिलते है जिससे की केवल नोएडा से दिल्ली आना जाना और अपने खुद के खर्च निकाल सकूं, रोटी, मकान, बिजली पानी सब माता-पिता से मिलता है। खुश हूं…बहुत से चिलांडू है जो मुझ से ज्यादा तनख्वाह पर केवल बीड़ी चाय पी कर घर निकल जाते है और पंडित जी नमस्ते कहलाते है। खुश हूं.
 
Akhilesh Sharma Rajeev Sahu you please shut up.
   
Akhilesh Sharma You don't write on my posts Rajeev Sahu.
    
Akhilesh Sharma Who the hell are you?
     
Akhilesh Sharma How did you join my friends list?
     
Ajit Anjum सहमत…………….
     
Naveen Kumar बुरा जो देखन मैं चला…
     
Amit Gandhi सच कड़वा होता है ..

Akhilesh Sharma होता है तो वही तो झेल रहे हैं।
 
Vibhakar Rajan Akhilesh no right thinking journo can call it attack on the freedom of press – i would rather call it a liberation moment for "Journalists"and time to call a spade a spade
 
Akhilesh Sharma नहीं तो कौन सा चैनल का संपादक एक अजीत जी को छोड़ कर यहाँ सार्वजनिक भर्त्सना कर रहा है। मैं अपना प्रवक्ता हूँ किसी और का नहीं।
 
Akhilesh Sharma सही बात विभाकरजी। टीवी पत्रकारिता का ये संक्रमण काल जो साँप- बिच्छु, नाग-नागिन से शुरू होकर स्वर्ग की सीढ़ी तक स्पीड न्यूज़ से लेकर गया इसका भी एक दिन अंत होना था दिल रोता है इस टीवी पत्रकारिता का ये हाल देख कर। आज संयोग से अपना १५ साल पुराना फ़ुटेज देखा। सोचा ये मैं वही हूँ क्या?
 
Vibhakar Rajan Ajit ji has been critical on air as well so was NK Singh and Naqvi ji and Rahul Dev Ji- they all called it shamefull and a wake up call -at the same time all of them suggested that an act ,which is criminal in nature cant be condoned.However, they also emphasized that one shud not generalize . And Akhilesh u r right we can only talk for ourselves. We all might have errerd in our judgement about a news /about some happening/ about our personal equation but majority of us never got compromised for few bucks.
 
Vibhakar Rajan U r the same old Akhilesh- bas thora motey ho gaye ho – lol
 
Deepak Choubey Akhilesh Sharma सर,आपकी बात से सौ फीसदी सहमत लेकिन बताई वजहों से सौ फीसदी असहमत हूं।बेइमानों की जिम्मेदारी ईमानदार अपने सर क्यों लें। व्यावहारिक तौर पर हम ऐसे प्रोफेशनल हैं जिनसे ईमानदारी की उम्मीद की जाती हैं,आपने पिछले पोस्ट में ईएमआई या एडमिशन वाली बात लिखी थी वो बीच के करीब सत्तर फीसदी पर लागू होती है, लेकिन उपर और नीचे के पंद्रह फीसदी क्या करेंगे ये कौन जानता है। हम जरुरत से ज्यादा लोड ले रहे हैं, सिर्फ इसलिए कि सोशल साइट्स पर हम बहुमत में हैं। यहां को भी कुछ नहीं कर सकता सिवाय इसके कि अपने स्तर पर ईमानदार रहे। अगर कोई पत्रकार बेइमानी में फंसता है तो यही समझिए किसी सेर को सवा सेर मिल गया।
 


पुण्य प्रसून बाजपेयी की हरकत पर कुछ और फेसबुकी टिप्पणियां…

Vishal Tiwari : ‎'कायरों' को 'शहीद' का तमगा देने का राग अलाप रहें हैं पुण्यप्रसून बाबा !!! Zee news के संपादक सुधीर चौधरी की दिल्ली पुलिस द्वरा नवीन जिंदल फिरौती मामले में गिरफ्तारी के बाद सलहकार संपादक पुण्यप्रसून वाजपेयी सारी मर्यदा, नैतिकता और सिद्धांतों को तक पर रखकर ढिठाई पूर्वक इसकी तुलना आपातकाल से कर रहें हैं.

Pushkar Pushp : पुण्य प्रसून की कुटिल मुस्कान आज गायब है. सुधीर चौधरी की गिरफ्तारी को लेकर बेदम तर्क देते हुए बहुत बेदम नज़र आ रहे हैं. ऐसा निरीह पुण्य कभी नहीं देखा. पुण्य प्रसून ने ज़ी न्यूज़ की साख के लिए अपनी साख पूरी तरह से गँवा दिया. अपने ऊपर शर्म आ रही है कि कभी पुण्य प्रसून को मैंने आदर्श माना था.

Pankaj Jha : जी न्यूज़ के लिए अपनी साख बचाने का अंतिम मौका था वो इस खबर को एक आम गिरफ्तारी के खबर की तरह ही ट्रीट करता. वास्तव में यह पुण्य प्रसून जी की साख के लिए भी ज़रूरी था.


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ये क्या किया पुण्य प्रसून बाजपेयी? तुमसे ये उम्मीद न थी, शेम! शेम!!

सरोकार और नैतिकता वाली पत्रकारिता के मसीहा बने फिरने वाले और बेबाक बोल बोलने के लिए चर्चित पुण्य प्रसून बाजपेयी के चेहरे से भी नकाब उठ गया. नौकरी की नैतिकता ने उनकी खुद की वैचारिक तेज को ढंक लिया और उन्हें सुधीर चौधरी व समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी पर जलेबी छानने को मजबूर कर दिया. पुण्य प्रसून जिस जी न्यूज चैनल में एंकरिंग करते हैं, उस चैनल के दो संपादकों को ब्लैकमेलिंग कांड में गिरफ्तार किए जाने के प्रकरण को वो आपातकाल से जोड़ कर देख रहे हैं, मीडिया के पैरों में बेड़ियां डाले जाने के रूप में देख रहे हैं.. क्या वे खुद के चश्मे से यह सब देख रहे हैं या फिर सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका के चश्मे का पावर चढ़ा हुआ है उनकी आंखों पर?

फेसबुक पर लोग पुण्य प्रसून बाजपेयी पर थू थू करना शुरू कर चुके हैं… अच्छा भी है, भ्रम जितनी जल्दी खत्म हो जाए, उतना अच्छा…  लोगों का कहना है कि सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया के बारे में तो लोग जान गए थे, पर इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद लोग पुण्य प्रसून बाजपेयी को भी जान गए कि वो कितने क्रांतिकारी हैं. पापी पेट का सवाल हो या जी के मालिकों के दुख के मौके पर उनका साथ देने की मजबूरी, जो भी हो, लेकिन पुण्य ने ठीक नहीं किया. वे शान से ऐसा प्रोग्राम एंकर करने से मना कर सकते थे और पूरे देश के पत्रकारों को जीवट व बहादुर होने का संदेश दे सकते थे. पर उन्होंने कमजोरी दिखा दी.  सुधीर चौधरी ने मालिक के कहने पर ब्लैकमेलिंग की. और पुण्य प्रसून बाजपेयी ने मालिक के कहने पर ब्लैकमेलर को बचाया. पूरे मुद्दे को मीडिया की आजादी से जोड़कर भ्रष्ट कारपोरेट मीडिया के कुत्सित चेहरे पर डेमोक्रेटिक फ्रीडम का मुलम्मा चढ़ाया..

फेसबुक पर Kumud Singh लिखते हैं- एक डकैत ने चोर को गिरफ्तार करवा दिया। पुण्य प्रसून जैसे पत्रकार यह कैसे कह सकते हैं कि डकैत ने गलत किया। सुधीर चौधरी की तो कोई साख थी ही नहीं। आज पुण्य प्रसून भी हाथ मलते अच्‍छे नहीं लगे।

इसी प्रकरण पर Naveen Kumar का कहना है : ज़ी न्यूज़ के संपादक गिरफ्तार… पुण्य प्रसून जी बता रहे हैं… मीडिया को बेड़ियों में जकड़ा दिखा रहे हैं…

Ankit Muttrija का वक्तव्य पढ़िए- ''क्योंकि एमरजेंसी के बाद से किसी संपादक की गिरफ्तारी नहीं हुई, क्योंकि राडिया टेप प्रकरण में कई बड़े बड़े पत्रकार-संपादक शामिल थे, किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई, क्योंकि आम आदमी सबूतों के साथ किसी संपादक के खिलाफ़ मुआमला दर्ज क्यों ना करवाए, गिरफ्तारी नहीं होती, पर आज हुई, इसलिए यह चिंता का विषय है….

Pushkar Pushp कहिन : पुण्य प्रसून ने आज अपनी पूरी साख खत्म कर ली. सुधीर चौधरी पर जैसे आज उन्होंने दस बजे की बुलेटिन पढ़ी और उनके बुलेटिन में वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी के बयान को तोड़ – मोड कर पेश किया . वह शर्मनाक था. हम सुधीर चौधरी के लिए नहीं पुण्य प्रसून के लिए दुखित हैं.

बी.पी. गौतम : जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया को दिल्ली पुलिस ने साजिश रचने और ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है, पर इससे कुछ नहीं होगा, इन दोनों की मुंह काला कर के और गले में जूतों की माला डाल कर बारात निकाली जानी चाहिए, क्योंकि अब नेता चीख कर बोला करेंगे कि पत्रकार कौन से हरिश्चन्द्र हैं? … पत्रकार की बोलती बंद और चोर नेता जिंदाबाद … इसकी भरपाई नहीं हो सकती

रजनीश के झा : निंदनीय! गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उसके बाद फर्जी पत्रकारों की दी जा रही आपातकाल की दुहाई… अति निंदनीय।

Jamshed Qamar Siddiqui : मुझे ये समझ में नहीं आ रहा, पुण्य प्रसून जी इसे इमरजेंसी से क्यों जोड़ रहे हैं? और आखिर संपादक को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा सकता।


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सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका को क्यों नहीं अरेस्ट किया पुलिस ने?

जिन सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका के कहने पर इनके संपादक द्वय सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया जिंदल समूह के मालिक नवीन जिंदल को ब्लैकमेल कर रहे थे, खबरें रोकने के लिए सौ करोड़ रुपये मांग रहे थे, उन मीडिया मालिकों को पुलिस ने अरेस्ट क्यों नहीं किया? क्या इसलिए कि वे बड़े लोग हैं, मालिक लोग हैं, रसूख वाले हैं, सत्ता केंद्रों तक उनकी सीधी पहुंच है… बस इसलिए? यह तो बड़ा अन्याय है.

आखिर संपादक लोग खबर रोकने के लिए पैसे मांगने का काम तो अपने मालिकों की सहमति से ही तो कर रहे थे. फिर क्यों बख्शा गया मालिकों को. जबकि एफआईआर तक में इन सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका का नाम है. तो फिर यह नाइंसाफी क्यों हुई. क्या यही न्याय और कानून है..

सच तो यही है कि भारत में हर स्तर पर पूर्वाग्रह और जुगाड़ से ही काम होता है. न्याय केवल एक अमूर्त शब्द की तरह होता है. कानून कहने को सबके लिए बराबर होता है पर सच्चाई यही है कि कानून भी छोटा बड़ा देखता है. एक बार फिर न्याय और कानून का पक्षपात साफ साफ दिख रहा है. दो नौकरों को पकड़वा दिया और मालिक लोग बच निकले. इन्हीं दोनों मालिकों ने कभी खुद को और अपने संपादकों को पूरे प्रकरण में पाक-साफ बताया था.

यकीन न हो तो नीचे दिए गए शीर्षकों में से इनसे संबंधित शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ डालिए. बाकायदा पीटीआई ने खबर जारी की थी कि जी ग्रुप के मालिकों ने खुद को और अपने संपादकों को क्लीन चिट दे दिया. जी ग्रुप की तरफ से जीक्यू नामक पहला एजुटेनमेंट (एक से चौदह साल की उम्र के बच्चों के लिए केंद्रित एजुकेशन प्लस इंटरटेनमेंट) चैनल लांच किए जाने के मौके पर जी इंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एक्जीक्यूटिव आफिसर पुनीत गोयनका ने कहा था कि नवीन जिंदल की कंपनी की तरफ से लगाए गए आरोप बकवास हैं. ऐसे आरोप लगते रहते हैं. आगे भी लगेंगे. यह सब दबाव बनाने की रणनीति है.


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जी ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा ने भी तब कहा था कि उनके चैनल का कोई भी पत्रकार गलत काम में लिप्त नहीं है. उन पर लगाए गए आरोप झूठे हैं. इन बयानों की रोशनी में कहा जा सकता है कि एफआईआर में नाम होने के कारण मालिक लोग अपने संपादकों को पाक-साफ बताने के लिए मजबूर थे. पर अब समझ में आ रहा है कि अंदर ही अंदर कोई डील हुई है जिसके तहत संपादक लोगों को पकड़ कर अंदर कर दिया गया और मालिक लोगों को किन्हीं शर्तों पर राजी करके खुला छोड़ दिया गया है. ये शर्तें क्या हो सकती हैं, आप भी अंदाजा लगाइए.

यहां यह बताना चाहूंगा कि भड़ास ने जब ब्लैकमेलिंग कांड का सबसे पहले खुलासा किया तो एक एक करके अंग्रेजी अखबारों ने इसे छापना शुरू किया. फिर कुछ चैनलों पर खबर चली. जी न्यूज आत्मरक्षा में खुद अपनी छीछालेदर कराने वाली बहसें अपने चैनल पर दिखाने लगा. हिंदी अखबारों में भी थोड़ी बहुत खबरें छपी. लेकिन सबसे ज्यादा आक्रामक तेवर न्यू मीडिया और सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने अपनाया. इन न्यू मीडिया माध्यमों ने कारपोरेट मीडिया, भ्रष्ट मीडिया, पतित संपादक, हरामखोर मालिक, नैतिकता, अवमूल्यन.. सब पर बात की, बहस की, विचार रखे. अब जब संपादकों की गिरफ्तारी हुई है तो थोड़ी बहुत खबरें दिखाने के बाद कारपोरेट मीडिया वाले चुप्पी साध लेंगे लेकिन न्यू मीडिया माध्यमों पर बहस जारी रहेगी. खासकर यह बहस जरूर चलेगी कि आखिर मालिक लोगों को क्यों छोड़ दिया गया?

यशवंत सिंह

संपादक

भड़ास4मीडिया

yashwant@bhadas4media.com

09999330099


इस प्रकरण से संबंधित अन्य कई खबरें पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों पर क्लिक कर सकते हैं…

1. Jindal’s Zee TV sting is a great favour to Indian media
 
 
2. ZEE – JINDAL STING CD… watch video
 
 
3. ज़िंदल और ज़ी की जंग में किसकी होगी जीत?
 
 
4. भड़ास पर देखें नवीन जिंदल द्वारा किए गए सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की स्टिंग की सीडी
 
 
5. हमें पैसे दे देंगे तो आपको आगे कोई नुकसान नहीं होगा: सुधीर चौधरी
 
 
 
6. जिंदल ने जारी की स्टिंग ऑपरेशन की सीडी, ज़ी ने कहा: 'डमी' था प्रपोजल
 
 
 
7. जी-जिंदल प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता की टिप्पणी
 
 
 
8. सुधीर चौधरी के मामले में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को सांप क्‍यों सूंघ गया?
 
 
 
9. सुधीर चौधरी की तरह ए. राजा भी यही कह रहा था कि पहले आप जांच करा लो
 
 
 
10. बीईए से निकाले जाने के फैसले पर सुधीर चौधरी ने जताई आपत्ति, शाजी जमां को लिखा पत्र
 
 
 
11. सुधीर चौधरी को ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन ने अपने यहां से भगाया
 
 
 
12. सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका ने खुद को और अपने संपादकों सुधीर चौधरी व समीर अहलूवालिया को क्लीन चिट दे दी
 
 
 
13. जी-जिंदल ब्लैकमेलिंग प्रकरण : ये है एफआईआर, सुभाष चंद्रा और पुनीत गोयनका का भी नाम
 
 
 
14. बीईए को जी-जिंदल ब्लैकमेलिंग प्रकरण की इतनी देर बाद याद क्यों आई?
 
 
 
15. जिंदल-जी ब्लैकमेलिंग प्रकरण की जांच के लिए तीन सदस्यीय बीईए समिति गठित
 
 
 
16. जी न्यूज के संपादकों पर दो धाराएं बढ़ाई गई
 
 
 
17. कोलगेट में फंसी एक और कंपनी से जी न्यूज के संपादकों ने मांगे थे सौ करोड़ रुपये!
 
 
 
18. जी न्यूज और सुधीर चौधरी को लेकर फेसबुक पर छिड़ी बहस
 
 
 
19. The coal scam claims its first journalistic victim
 
 
 
20. खबर रोकने के लिए जी के संपादकों द्वारा पचास करोड़ रुपये मांगने की खबर इंडियन एक्सप्रेस और ईटी की वेबसाइट पर भी
 
 
 
21. क्या सचमुच फंस पाएंगे ज़ी न्यूज़ के ब्लैकमेलर संपादक?
 
 
 
22. सुभाष चंद्रा के लिए नवीन जिंदल से पैसे मांगे थे जी के एडिटरों ने!
 
 
 
23. कई अखबारों में छपे हैं ज़ी न्यूज़ के एडीटरों के 'ब्लैकमेलिंग' के किस्से
 
 
 
24. सही साबित हुई सुधीर चौधरी पर ब्लैकमेलिंग के आरोप वाली खबर
 
 
 
25. जी न्यूज के सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के समीर अहलूवालिया के खिलाफ जिंदल ने दर्ज करा दी रिपोर्ट!


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सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया को पुलिस ने गिरफ्तार किया

अभी अभी सूचना मिली है कि जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी और जी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया को दिल्ली पुलिस ने साजिश रचने और ब्लैकमेलिंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है. सूत्रों के मुताबिक दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने नवीन जिंदल की तरफ से दर्ज कराई गई एफआईआर और मुहैया कराए गए सुबूतों की विवेचना के बाद गिरफ्तार करने का फैसला लिया.

जी ग्रुप की तरफ से सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया ने नवीन जिंदल से कोयला घोटाले की खबरों से जिंदल ग्रुप को बाहर रखने के लिए करीब सौ करोड़ रुपये की मांग की थी. नवीन जिंदल ने इस पूरी बातचीत की सीडी बनवा कर दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दिया. बाद में यह प्रकरण तब चर्चा में आया जब भड़ास4मीडिया ने इससे संबंधित खबर प्रकाशित की.

भड़ास पर खबर छपने के बाद अखबारों व चैनलों ने भी एक एक करके इस खबर को छापना दिखाना शुरू किया. बाद में यह बड़ा मुद्दा बन गया जिस पर पूरे देश में चर्चा और बहस होने लगी. अब सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की गिरफ्तारी के बाद एक बार फिर यह मुद्दा तूल पकड़ेगा. इस मुद्दे के जरिए पूरे देश में मीडिया में फैलते भ्रष्टाचार और संपादकों की भूमिका पर बहस होने लगी है.

बड़ा सवाल यह है कि एफआईआर में जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा व अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है, तो इनकी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई और क्या आगे इनकी गिरफ्तारी होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सुभाष चंद्रा अपने रसूख और हैसियत के कारण बच जाएंगे और उनके दो संपादकों, जो अपने मालिक के इशारे पर काम कर रहे थे, गिरफ्तार किए जाने के बाद मामले को अंजाम तक पहुंचा मान लिया जाएगा.


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5. हमें पैसे दे देंगे तो आपको आगे कोई नुकसान नहीं होगा: सुधीर चौधरी
 
6. जिंदल ने जारी की स्टिंग ऑपरेशन की सीडी, ज़ी ने कहा: 'डमी' था प्रपोजल


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बिहार में पहले पेज पर सबसे उपर प्रकाशित खबर- ‘विश्व के शीर्ष चिंतकों में नीतीशी भी’

Saroj Kumar : बिहार के अखबारों की बड़ी खबर…. 'विश्व के शीर्ष चिंतकों में नीतीशी भी'…पत्रकारों ने जबरदस्त खोजी पत्रकारिता का परिचय देते हुए खोज निकाला है- 'विश्व के शीर्ष चिंतकों में नीतीशी भी'….जी हां आज बिहार में पहले पेज की सबसे उपर छपी खबर है ये…शीर्षक भी यही है…सुशासन बाबू जय हो… 'फॉरेन पॉलिसी' पत्रिका की सूची से निकाल कर अखबार में बिहार की सबसे बड़ी खबर बनाई गई है इसे…

    Sushila Puri इससे अधिक विडंबना पूर्ण पत्रकारिता अब नहीं हो सकती….. ये किस अखबार की खबर है..?
   
    Dilip Khan अमेरिकी पत्रिका 'फॉरेन पॉलिसी' ने ये सूची जारी की है। 😀
    
    Nityanand Gayen 😀
     
    Ravi Kumar Sushashan babu jai ho 😛
     
    Pradeep Singh Saroj Kumar… i wolud like to say.."GHAR KI MURGI DAL BARABAR"…
     
    Ved Prakash ..  जब खुले-आम जूता-चप्पल-कुर्सी फेंका जाय तो कोई भी चिंतक हो जाएगा…
 
    Gourav Kumar to ab sushashan babu 'videshi media' bhi manage karne lage kya?

सरोज कुमार के फेसबुक वॉल से साभार.

“आम आदमी पार्टी का हाथ जिन्दल साहब के साथ”

Thakur Gautam Katyayn : जिन्दल साहब देश में सबसे अमीर उद्योगपतियों में से एक हैं. इनकी सालाना आमदनी देश में सबसे ज्यादा है. इनकी तनख्वाह ही करीब सत्तर करोड़ रुपये सालाना है. इसमें इनकी शेयरों और संपत्ति से आमदनी को नहीं जोड़ा गया है. जिन्दल साहब कांग्रेस पार्टी के हैं लेकिन बंगाल में जिन्दल साहब के लिये ज़मीन छीनने के लिये जंगल महल के आदिवासियों पर मार्क्सवादी पार्टी ने भयंकर ज़ुल्म किये.

जब आदिवासियों ने कहा कि हम पर हुए ज़ुल्मों के लिये सरकार कम से कम हमसे माफी तो मांगे तो सरकार ने आदिवासियों पर ज़ोरदार हमला बोल दिया और नाम दिया गया 'आपरेशन लालगढ़'. आज उस इलाके को अशांति में झोंक दिया गया है और अब तृणमूल कांग्रेस के लोग जिन्दल साहब के लिये ज़मीन छीनने के लिये वहाँ के नौजवानों को सरकारी बंदूकें दे रहे है और इस गैरकानूनी सेना को भैरव वाहिनी नाम दिया गया है.

जिन्दल साहब की अपनी प्राइवेट जेलें भी हैं. जब कोई आदिवासी जिन्दल साहब को ज़मीन देने से मना करता है तो उसे उठवा लिया जाता है और जब तक वह अपनी ज़मीन देने के कागजों पर दस्तखत करने को राजी ना हो जाये, उसे इन जेलों में पीटा जाता है. जिन्दल साहब के कई पावर प्लांट ऐसे भी हैं जो वन भूमि पर बनाए गये हैं और सरकार को सूचना के अधिकार में स्वीकार किया है कि ज़मीन जिन्दल साहब को दी ही नहीं गयी लेकिन जिन्दल साहब वहाँ पावर बना रहे हैं और सरकार को ही बेच रहे हैं.

कुछ मामलों में सामाजिक कार्यकर्ताओं की कोशिशों से जिन्दल साहब को कोर्ट के नोटिस भी जारी हुए हैं पर आज तक सरकार कोर्ट का एक भी नोटिस जिन्दल साहब के किसी नौकर को भी नहीं दे पायी. जिन्दल साहब ने इंडिया अगेंस्ट करप्शन को भी चंदा दिया. भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर बनी नई आम आदमी पार्टी अरविन्द केजरीवाल ने दूसरे उद्योगपतियों के बारे में तो थोड़ा बहुत बोला लेकिन जिन्दल साहब के बारे में आज तक एक शब्द नहीं बोला.

    Sanjay K Chaudhary इस चोंचलेबाजी की भी पोल बहुत जल्द खुलने वाली है…भारतीय राजनीति में ऐसे कितने धूमकेतु आए और समय की गर्त में विलीन हो गए….वैसे मुगालते में अगर कोई जीना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है भला…!
 
    Amit Singh is hamam men sabhi Nange hain koi kam koi jyada …dekhiye kya hota hai inka bhi ase abhi koi bara aarop nahi hai chanda dena na galat hai aur na hi lena kisi se bhi
 
    Niloo Ranjan आप नवीन जिंदल और सीताराम जिंदल को एक ही समझने की गलती कर रहे हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन को चंदा सीताराम जिंदल ने दिया था और आप जिस जिंदल की कारगुजारियां बता रहे है व केजरीवाल के साथ जिसका फोटो लगाया है वो नवीन जिंदल हैं। नवींन जिंदल कांग्रेस पार्टी के सांसद भी हैं।
    
    Thakur Gautam Katyayn अमितजी आप का कहना सही है की लेना-देना गलत नहीं है, किन्तु 'जैसा होगा अन्न वैसा होगा मन' इस बात को तो ध्यान में रखा ही जा सकता है.
     
    Thakur Gautam Katyayn नीलू भाई, फिर सबों के नकारात्मक गुणों को सामने लाने वाले के मुँह से 'नवीन जिंदल' के लिए कुछ क्यों नहीं निकल रहा है, उनके उपलब्धियों को भी 'आम आदमी' तक क्यों नहीं लाया जा रहा. यह तो निश्चय ही आश्चर्य वाली बात हुई ना. 🙂
     
    Amit Singh Bhai sahab jab ham kisi se chanda lete hai to ye nahi dekhte hain ki samne wala kahan se paisa laya hai bas paisa diya aur ham rasid kat diye kam se IAC to apne website par nam sahit dikhaya hai ki hame kisne kahan se chanda diya aur sabhi aandolan chanda se hi chalta hai …ye paisa aandolan ke liye diya gaya tha na ki party ke liye …
     
    Amit Singh aashcharya to hai lekin kejriwal kisi par koi anargal aarop aaj tak nahi lagaya hai agar aapke pas kuchh sabut hai to aap unko likh sakte hain aur uska ek copy mere ko bhi mail kar digiyega mai bhi bhej dunga …jitna ka sabut hota hai utna hi aarop  lagata hai wo kyoki wo janta ki agar kuchh idhar udhar kiya to hamko warwad kar dega ye sab ….Navin Jindal par muh band rakha hai to kuchh karan hoga ….aaj tak BJP kyo nahi uthayee is mudde ko ya phir aur koi party kyo nahi uthata hai ….yah bhi to samjh se pade hai.

ठाकुर गौतम कात्यान के फेसबुक वाल से साभार.

अंजना ओम कश्यप को इतनी बढ़िया रिपोर्ट और कसी हुई स्क्रिप्ट के लिए बधाई

Zafar Irshad : अभी-अभी 'आज तक' पर अंजना ओम कश्यप Anjana Om Kashyap की गोधरा पे रिपोर्ट देखी..गज़ब की रिपोर्ट थी..बखिया उधेड़ दी उन्होने मोदी के गुजरात विकास की..जब से गोधरा ट्रेन काण्ड हुआ है वहा विकास का कोई काम नही हुआ है नाली-सीवर-पानी-सड्के सब उस एक ट्रेन हादसे और मुस्लिम बाहुल्य होने का खामियाज़ा उठा रहे है..अगर कोई एक प्रदेश का राजा मोदी जो पूरे देश का राजा बनने का सपना देख रहा है अगर इस तरह भेदभाव करेगा तो वो कैसे कल को प्रधानमन्त्री बन पायेगा..बधाई अंजना जी इतनी बढिया रिपोर्ट और कसी हुई स्क्रिप्ट के लिये…

Mohd Sabah like it
 
Ziaul Haq Scriber zafar bhai anjana om kashyap ye anchor nhi ye shakshiyat hia inki zabaan pe kya aa jaaye ye khud script soch me padd jaaye, haazir jawaab hain ye,. Dil Se Salaam Anjana Om Kashyap ji
 
Iqbal Ahmad Waqai qabile tareef reporting
 
Subhash Tripathi V V thanks Anjna Inka yehi sach hai.
 
Journalist Afsar Pathan zabradast reporter hain ye…
 
Shant Prakash Jatav Anjna ji 1984 ke peedit sikh pariwaron par bhi bebak report banane ka kasht Karain.
 
Gyanendra Shukla MAINE BHI DEKHI THI I LIKE IT
 
Santosh Srivastava ye report jaroor anjana ji thi… magar is puri report ke pichhe us stringer ki mehanat hogi… jo waha kaam kar raha hoga.. magar us stringer kaa naam kahi sunane ko mila…
 
Zafar Irshad Shant Prakash Jatav ji..Please aap apni BJP ke politics meri wall par na kiya kare…aap Neta hai aapki apni wall hai jo jee chahe likhe..lekin meri Wall par Politics na kare…
 
Shant Prakash Jatav Anjna ji 1969;71;72;73;82;84;85;86 (2);87;90 (4);91 (3);92(3); 93 total 21- time Gujrat main Danga Hua Uska Bhi Jikr kartin To Accha Hota.
 
Zafar Irshad Shant Prakash Jatav…Gujraat me Danga to aapki Party BJP ne hi karaya tha..uska detail bhi de aap anjana ji ko..to behtar hoga…
 
Shant Prakash Jatav Zafar bhai maine sabhi varshon ka hawala diya hai BJP kis daur main thi aap dekh saktey hain.
 
Shant Prakash Jatav Zafar bhai main mafi Chahunga ki maine aapki wall par comment kiya chunki aap mere mitr mandal main hain aisa isliye hua mera apki bhawnaon ko ahat karne ka koi uddeshy nahin tha
 
Santosh Srivastava waise bhi zafar sahab eshke liye aajtk puri team ko bhadhai dena chahiye… sirf ek aadmi ke prayaas kaa ye report nahi hai… waise ye bhi sahi hai jo dikhata hai wahi bikta hai.. parde ke pichhe ke logo ko kaun puchhata hai..

जफर इरशाद के फेसबुक वॉल से साभार. जफर इरशाद कानपुर में समाचार एजेंसी पीटीआई के पत्रकार हैं.

प्रो. विश्वनाथ मिश्र पर ब्राह्मणों ने गांव में घुसने पर पाबंदी लगा दी थी

रुद्रपुर : प्रख्यात लेखक, विचारक, अनुवादक, वामपंथी विचारों के पुरोधा और चर्चित पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के पूर्व संपादक प्रो0 विश्वनाथ मिश्र के निधन पर यहां गांधी पार्क में एक बैठक आयोजित की गई जिसमें प्रो0 मिश्र के समाज हित में किए गये कार्यों का स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी गई. बैठक में कहा गया कि कमाई केन्द्रित होते जा रहे वाम बुद्धिजीवियों के बीच विश्वनाथ मिश्र की आजीवन सामाजिक और बौद्धिक सक्रियता नयी पीढ़ी के लिए आदर्श है. उनके द्वारा लिखा ‘विद्रोही वाल्मीकि’ नाटक काफी चर्चा और विवादों में रहा, तो उनके अनूदित उपन्यास 'आदि विद्रोही' को पढ़कर हजारों हिंदी भाषी युवा सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के वामपंथी विकल्प चुनने को तत्पर हुए. उन्होंने दर्जनों विश्वप्रसिद्ध साहित्य और राजनितिक पुस्तकों का अनुवाद किया, जिसके बदले आजीवन कोई मेहनताना नहीं लिया. उसी लेखकीय सक्रियता का असर था कि इन्टरनेट से दूर रहने वाले विश्वनाथ मिश्र ने गॉड पार्टिकल मुद्दे पर एक बेहद ही सरल भाषा में लोकप्रिय लेख लिखा.

विश्वनाथ मिश्र वामपंथी राजनीति से जुड़ने से पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे. उसी दौरान उन्होंने ‘विद्रोही वाल्मिकी’ जैसा नाटक लिखा और मंचन कराया. इस नाटक के प्रकाशित और मंचित होने के बाद समाज के तथाकथित संस्कारी समाज ने उनका बहिष्कार किया. खासकर उनके गांव और इलाके के ब्राम्हणों ने उनसे पारिवारिक संबंध तोड़ लिये और उन पर कई बरस तक गांव आने पर पाबन्दी लगी रही.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सहजौर गांव (राजिपार) के रहने वाले विश्वनाथ मिश्र को इलाके में विद्रोही विश्वनाथ के नाम से याद किया जाता था. एक समय में वह सामंती और ब्राम्हणवादी सांस्..तिक जकड़नों को तोड़ने के कारण चौक-चौराहों और गांवों की चौपालों पर चर्चा में हुआ करते थे. आज भी उनके क्षेत्र में जब कोई छात्र वामपंथी राजनीति से जुड़ता है तो संस्कारी लोग कहा करते हैं कि, ‘बाबू विश्नाथ मिसिर बनिहें.’

वैचारिक वामपंथी पत्रिका दायित्वबोध के संपादक रहे विश्वनाथ मिश्र ,पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के सह्जौर (रजिपार) चौराहा के रहने वाले थे और गोरखपुर के बड़हलगंज के नेशनल पीजी कॉलेज में ..षि विभाग के प्रमुख पद से कुछ वर्ष पहले सेवानिवृत हुए थे. सेवानिवृत्ति के बाद वह पारिवारिक जरूरतों के लिए होमियोपैथ के डाक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने लगे थे. उनके परिवार में तीन बेटियां और एक बेटा है. उनकी मौत से उनके परिजनों, वामधारा से जुड़े सैकड़ों लोगों और उनके छात्रों में गहरा शोक है.

विश्वनाथ मिश्र के करीबियों में शामिल रहे आदेश सिंह ने बताया कि, ‘वह चाहते थो दर्जनों पुस्तकें साहित्य, दर्शन, विज्ञान, समाज और ..षि पर लिख सकते थे, लेकिन उन्होंने बहुत कम किताबें लिखीं. वह प्रसिद्ध चीनी साहित्यकार लू शून को अपना आदर्श मानते थे और कहते थे कि नये समाज के निर्माण के लिए जो पुस्तकें देश और दुनिया में लिखीं जा चुकी हैं, उसको हिंदी पाठकों तक पहुंचाना मेरी पहली जिम्मेदारी है. इसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए वह आजीवन अनुवाद करते रहे.’ गौरतलब है कि चीनी साहित्यकार लू शून ने भी कम्यूनिष्ट क्रांति के दौर में कई पुस्तकों का अनुवाद किया था.

उनके पारिवारिक मित्र सुनील चौधरी ने कहा कि, विश्नाथ मिश्र का जाना एक शिक्षक, एक साथी और एक दर्शंनशास्त्री का जाना है, जिसने कभी पद और पॉवर के लिए अपनी वैचारिकी से समझौता नहीं किया. वामबुद्धजीवियों के बीच बढ़ते लोभ-लालच के इस दौर में वह एक मात्र उदाहरण हैं, जिन्होंने सैकड़ों युवाओं को वाम राजनीति से जोड़ा. उनके जाने से पूर्वांचल के वाम राजनीति में कमी खलती रहेगी. गौरतलब है कि वामपंथ की जिस राजनीतिक धारा से वे जुड़े थे, उसको लेकर पिछले कुछ वर्षों से वे आलोचनात्मक हो गये थे. खासकर उन संगठनों के प्रयोगात्मक और व्यावहारिक कार्यवाहियों को लेकर. वह बार-बार शिकायत करते थे कि ये विचारधारा के बनिए हो गए हैं. मगर वह जीवनपर्यंत व्यापक वाम विचारधारा के समर्थन में रहे और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को खत्म करने के लिए वामपंथ को ही एकमात्र निर्णायक राजनीति मानते थे.  उन्होंने जिन किताबों का अनुवाद किया था, उनमें तरुणाई का तराना, क्रांति का विज्ञान, शहीदे आजम भगत सिंह की जेल नोटबुक आदि हैं।

बैठक में में अयोध्या प्रसाद ‘भारती’, कस्तूरीलाल तागरा, खेमकरण ‘सोमन’, रूपेश कुमार सिंह, प्रह्लाद सिंह कार्की, प्रकाश भट्ट, नरेश कुमार, दीपिका भारती, स. गुरुचरन सिंह, अन्जार अहमद, कमला बिष्ट, राजेश प्रधान, शिवजी धीर, दिनेश कुमार, मा. प्रताप सिंह, संजय रावत, गिरीश भट्ट, दीप पाठक, अरविंद कुमार सिंह, विमल शर्मा, देवेंद्र दीक्षित आदि शामिल थे.

रुद्रपुर से खेमकरण ‘सोमन’ की रिपोर्ट.

रिटायर्ड आईपीएस अफसर के घरों पर “चोर पहरा”

नेशनल आरटीआई फोरम, लखनऊ की कन्वेनर डॉ नूतन ठाकुर ने आज डीजीपी, यूपी को एक पत्र लिख कर उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग के हेड कॉन्स्टेबल, कॉन्स्टेबल, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों के दुरुपयोग के सम्बन्ध में जानकारी देते हुए उनसे इस सम्बन्ध में अपेक्षित कार्यवाही की मांग की है. आरटीआई द्वारा लखनऊ पुलिस, 32 वीं और 35वीं वाहिनी पीएसी से प्राप्त सूचना के अनुसार लखनऊ पुलिस लाइन से चार अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारियों के साथ कुल छह पुलिस कर्मी (एक हेड कॉन्स्टेबल तथा पांच कॉन्स्टेबल) अभी तक “चोर पहरा” ड्यूटी पर लगे हैं.

ये अधिकारी हैं अरुण कुमार गुप्ता, विक्रम सिंह, के एन डी द्विवेदी तथा स्व० विजय शंकर माथुर. साथ ही एक कर्मी इजहार अहमद सीबीआई में प्रतिनियुक्त आईपीएस जावेद अहमद के साथ कई वर्षों से नियुक्त रहे. चतुर्थ श्रेणी कर्मी में एक विशेष सचिव गृह तथा एक बी के भल्ला, अवकाशप्राप्त डीजी के साथ नियुक्त हैं.

इसी प्रकार 35वीं वाहिनी पीएसी से पांच पीएसी कर्मी अवकाशप्राप्त आईपीएस शैलेन्द्र सागर, आर के तिवारी, के एल गुप्ता, बी नाथ तथा यशपाल सिंह के साथ बिना किसी लिखित आदेश के दूरभाष वार्ता द्वारा लगाए गए हैं. 32वीं वाहिनी पीएसी से एक चतुर्थ श्रेणी कर्मी बाबू लाल यादव, अवकाशप्राप्त डीजीपी तथा एक जावेद अहमद, सीबीआई अधिकारी के साथ संबद्ध हैं.

नूतन ने डीजीपी को इन तैनातियों से अवगत कराते हुए निवेदन किया है कि ऐसे प्रकरण पूरे प्रदेश में दिखवाते हुए नियमविरुद्ध ऐसी तैनातियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित करते हुए पुलिसकर्मियों पर व्यय समस्त धनराशी की कटौती इन्ही अधिकारियों से कराएं.

हरियाणा सरकार की ‘चोरी’ से डा. नंदलाल मेहता वागीश दुखी

हरियाणा सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत कक्षा पाँच के हिंदी के पाठ्यक्रम में 72 वर्षीय डॉ. नंदलाल मेहता वागीश की एक रचना को शामिल किया। पर प्रकाशन से पहले न तो लेखक की स्वीकृति ली गई, न ही उनका नाम ही लेख के साथ प्रकाशित किया गया है। यह भी बताने की शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने जरूरत नहीं समझी कि उन्होंने यह लेख किस पुस्तक से साभार लिया है। डॉ. वागीश अब तक 18 पुस्तक लिख चुके हैं। लेखक, समीक्षक एवं भाषाविद डॉ. वागीश संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के पूर्व सीनियर फैलो भी रह चुके हैं।

उनके वैचारिक निबंध संग्रह 'समय, समाज और परिवेश' में पृष्ठ संख्या 55 पर 'हरियाणा के मेले एवं पर्व त्यौहार' शीर्षक से निबंध है। इस निबंध को ज्यों का त्यों शिक्षा विभाग हरियाणा ने सर्व शिक्षा विभाग द्वारा 2011 के लिए प्रकाशित पांचवीं कक्षा की 'हिंदी-5' में 'हरियाणा के मेले एवं पर्व त्यौहार' शीर्षक से पृष्ठ संख्या 56 पर प्रकाशित किया है। अर्बन एस्टेट गुडग़ांव सेक्टर चार के मकान संख्या 1218 'शब्दलोक' में रहने वाले डॉ. नंदलाल मेहता वागीश ने शिक्षा विभाग के ऊपर रचना के प्रकाशन की अनुमति नहीं लेने का आरोप लगाया है। सरकर द्वारा की गई कथित चोरी का साक्ष्य भी दिखाया। लेखकीय अस्मिता के प्रति बरती गई सरकार के इस उपेक्षा से डॉ वागीश दुखी हैं।

डॉ. वागीश का कहना है कि जब यह मामला उनको ज्ञात हुआ तो उन्होंने मौखिक रूप से इसकी शिकायत कुछ अधिकारियों के समक्ष की, लेकिन इस पूरे मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई। डॉ मेहता ने मौलिक शिक्षा निदेशक डॉ. अभय सिंह यादव को इसी वर्ष 19 मार्च को पत्र लिख और त्रुटि दूर करने की मांग की। कोई कार्रवाई न होने पर 18 अगस्त को पुन: निदेशक एवं मुख्य सचिव हरियाणा को सभी साक्ष्य के साथ पत्र भेजा, लेकिन कारवाई सिफर।

मुकेश समस्तीपुरी की रिपोर्ट.

एएनआई को एक महीने में दूसरा बड़ा झटका, श्रीनारायण झा का इस्तीफा

एएनआई से श्रीनारायण झा ने डायरेक्टर सुरेंद कपूर को इस्तीफा सौप दिया है। एक महीने के अंदर एएनआई से इस्तीफा देने वाले श्रीनारायण दूसरे सीनियर हैं। श्री नारायण तकरीबन 6 सालों से एएनआई में कोआर्डिनेशन में अहम भूमिका अदा कर रहे थे। झा, पंकज चौधरी की टीम के हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन सुरेंद्र कपूर ने अपने बेटे नवीन कपूर को इनपुट हेड बनाने और पंकज चौधरी को अपदस्थ करने के लिए श्रीनारायण को कोआर्डिनेशन से हटाकर प्रोग्रामिंग में शिफ्ट कर दिया।

एक तरफ कोआर्डिनेशन से पंकज चौधरी की टीम को तोड़ा जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ नवीन कपूर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चैनल वन, पी7 और न्यूज 24 से कई लोगों को कोआर्डिनेशन पर ज्वाइन कराते रहे। नतीजा सूरेंद्र कपूर की आंतरिक राजनीति से तंग आकर पंकज चौधरी ने एएनआई से इस्तीफा देने में ही भलाई समझी। बाद में पंकज ने हेडलाइन टुडे चैनल में डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के पद पर ज्वाइन किया। झा को भी पंकज चौधरी की तरह इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया।

प्रोग्रामिंग में शिफ्ट करने के बाद उन्हें ऑफिस की ओर से मिला मोबाइल फोन तक वापस ले लिया गया। आखिरकार 7 नवंबर को झा ने अपना इस्तीफा सुरेंद्र कपूर को सौंप दिया और अपने इस्तीफे का मेल कंपनी के मालिक संजीव प्रकाश को भी फारवर्ड कर दिया। श्रीनारायण झा की तरह एएनआई को कई और लोग बॉय बॉय कर सकते हैं, इसकी संभावना है। एएनआई प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों को दीवाली गिफ्ट तक नहीं दिया। उल्टे इस बार कई लोगों की सेलरी बदले की कार्रवाई के तहत काट दी गई। सेलरी कटने की वजह छुट्टी ज्यादा होने का बहाना किया जा रहा है।

पत्रकार, विचारक प्रो. विश्‍वनाथ मिश्र का लखनऊ में निधन

प्रख्यात लेखक, विचारक, अनुवादक, वामपंथी विचारों के पुरोधा और चर्चित पत्रिका ‘दायित्वबोध’ के पूर्व संपादक प्रो. विश्वनाथ मिश्र के निधन की सूचना मिली है. प्रोफेसर विश्वनाथ मिश्र का आज सुबह करीब दस बजे लखनऊ के विवेकानंद पालिक्लिनिक में निधन हो गया. 9 नवंबर को उनका ब्रेन हैमरेज हुआ था, तबसे वह लखनऊ में भर्ती थे.

 

बीमारी के दौरान अस्पताल में उनके साथ रहे उत्तराखंड के मजदूर नेता और सामाजिक कार्यकर्त्ता मुकुल ने बताया कि विश्वनाथ मिश्र की स्थिति दो दिनों में काफी जटिल हो गयी थी और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था. ट्रेड यूनियन नेता ओपी सिन्हा, भ्रष्टाचार आन्दोलन से जुड़े सत्येन्द्र कुमार समेत कई लोग उनकी बीमारी  के दौरान कुशल-क्षेम के लिए मौजूद रहे.

सहारा निवेशकों के सत्‍यापन के लिए कई एजेंसियां तैयार

नई दिल्ली : सहारा समूह की दो कंपनियों के निवेशकों के सत्यापन में कईं कंपनियों ने अपनी रुचि जाहिर की है। इनमें कार्वी, कैम्स, एनएसडीएल व सीडीएसएल शामिल हैं। पूंजी बाजार नियामक सेबी फिलहाल सहारा की इन कंपनियों के तकरीबन तीन करोड़ निवेशकों के व्यक्तिगत सत्यापन (आईवीपी) के लिए एजेंसी के चयन की प्रक्रिया में है।

इसके लिए एजेंसियों से निविदाएं आमंत्रित करने की तिथि को एक माह आगे बढ़ाकर 21 दिसंबर कर दिया गया है। इस बीच सेबी ने इच्छुक एजेंसियों के साथ निविदा प्रक्रिया से पहले गत 7 नवंबर को एक बैठक आयोजित की है। इस बैठक में उक्त चारों एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया है। इसके साथ ही, सीडीएसएल की पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी सीडीएसएल वैंचर्स लिमिटेड (सीवीएल) के प्रतिनिधि भी इस बैठक में शामिल थे। यह सभी केवाईसी रजिस्ट्रेशन एजेंसियां (केआरए) हैं। केआरए एजेंसियां ही म्यूचुअल फंडों व ब्रोकरेज फर्मों समेत बाजार की सभी तरह की फर्मों के लिए ग्राहकों की पहचान सुनिश्चित करने वाली प्रक्रिया नो-योर-क्लाइंट (केवाईसी) को अंजाम देती हैं।
 
सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह की दो कंपनियों के तकरीबन तीन करोड़ निवेशकों की 24,000 करोड़ रुपये की जमाराशि 15 फीसदी ब्याज समेत वापस लौटाने की प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी सेबी को दी हुई है। इससे पहले, सेबी को इन सभी निवेशकों की पहचान व उनके पते आदि के सत्यापन का काम करना है। सेबी इस काम को किसी आईपीवी एजेंसी के जरिए अंजाम देगा। इसी के लिए सेबी ने केआरए व सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से निविदाएं आमंत्रित कर रखी हैं। हालांकि, 7 नवंबर को हुई बैठक में किसी सार्वजनिक बैंक के प्रतिनिधि ने भाग नहीं लिया। सेबी द्वारा आईवीपी एजेंसी की नियुक्ति के लिए 2 नवंबर को टेंडर जारी किया गया था। (प्रेट्र)

 

राष्‍ट्रीय सहारा के ब्‍यूरो प्रमुख कुणाल को ‘स्‍टार उदय सम्‍मान’

 

उदय सामाजिक सांस्कृतिक मंच द्वारा ‘राष्ट्रीय सहारा’ के ब्यूरो प्रमुख कुणाल को खोजी पत्रकारिता के लिए ‘स्टार उदय सम्मान’ से नवाजा गया. एलटीजी सभागार में सोमवार को उदय सामाजिक सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित समारोह में ‘राष्ट्रीय सहारा’ के ब्यूरो प्रमुख कुणाल को खोजी पत्रकारिता के लिए ‘स्टार उदय सम्मान’ से नवाजा गया.
 
इसके अलावा इस मौके पर ओलंपिक कुश्ती पदक  विजेता सुशील कुमार, दिल्ली सरकार में खेल निदेशक महाबली सतपाल, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त देवेश श्रीवास्तव, सेंट जेवियर्स स्कूल के खेल निदेशक एसके शर्मा, प्राचार्य जोस जैकब, सीआरपीएफ के डीजी प्रणव सहाय, नेशनल दुनिया के मेट्रो संपादक रास विहारी, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त संजय त्यागी, लिम्का बुक ऑफ र्वल्ड रिकार्ड होल्डर मुकुंद प्रसाद सिंह, एडवोकेट विनोद भारद्वाज, अशोक विहार के एसीपी प्रताप सिंह को भी उदय स्टार सम्मान से नवाजा गया. केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल और कांग्रेस महासचिव आस्कर फर्नाडीस ने संयुक्त रूप से सबको सम्मान प्रदान किए.  इस मौके पर स्टार उदय की स्मारिका का भी विमोचन किया गया.
 
इस मौके पर श्रीप्रकाश जायसवाल ने कहा कि इस तरह के समारोहों से पुरस्कार पाने वालों का हौसला बढ़ता है. वह अपने-अपने क्षेत्र में और बेहतर काम करते हैं. आस्कर फर्नाडीस ने पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम करने वालों को सम्मानित करते हुए कहा कि मीडिया के लिए जो लोग सम्मानित हुए हैं, वह अपने क्षेत्र में और वेहतर काम करेंगे और पत्रकारिता के क्षेत्र में नया मुकाम हासिल करेंगे. महाबली सतपाल ने सुशील कुमार का सम्मान ग्रहण करते हुए कहा कि वह (सुशील) नहीं आ पाये, लेकिन उन्होंने इस सम्मान के लिए आयोजकों को धन्यवाद दिया है. समारोह में शहरी विकास मंत्री अरविन्दर सिंह लवली भी मौजूद थे. (समय)

जब डीजीपी ही सांप्रदायिक हो तो दंगे तो होंगे ही : सुभाषिनी अली

 

: बेगुनाहों को छोड़कर सरकार को उन्हें पद्म विभूषण देना चाहिए – संदीप पांडे : जनहित याचिका पर न्यायाधीशों की टिप्पणी अनावश्यक – असद हयात : लखनऊ। रिहाई मंच द्वारा विधान सभा धरना स्थल लखनऊ में आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को छोड़ने और सांप्रदायिक दंगों की जांच की मांग को लेकर हुए धरने में राजनीतिक दलों, उलेमाओं, सामाजिक संगठनों ने सपा सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए कहा 2014 में मुसलमान सपा को सबक सिखाएंगे। पिछले दिनों दस साल जेल में रहने के बाद निर्दोष बरी हुए कानपुर के मुमताज समेत धरने में पूरे सूबे से आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों तथा इस सरकार में हुए दंगों के पीडि़त परिवार भी मौजूद थे।
 
धरने को संबोधित करते हुए पूर्व सांसद व माकपा नेता सुभाषिनी अली ने कहा कि सपा सरकार की सांप्रदायिक मानसिकता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उसने 1992 में कानपुर में हुए दंगे में एसएसपी रहते हुए जिस एसी शर्मा ने खुलेआम दंगाइयों को संरक्षण दिया, जिस पर जांच के लिए आईएस माथुर कमीशन गठित की गई थी, उसे ही डीजीपी बना दिया। पूर्व सांसद ने कहा कि पूरे सूबे में सैकड़ों की तादाद में मुस्लिम युवक सालों जेलों में रहने के बाद आतंकवाद के आरोप से बरी हुए हैं जिनकी पुर्नवास व मुआवजे की जिम्मेवारी सरकार को लेनी होगी। 
 
मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पांडे ने कहा कि मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी नीतिगत स्तर पर सरकारों ने करवाई है, इसलिए इन मसलों पर अदालतों के अंदर और सड़क पर भी लड़ना होगा। जहां तक निर्दोषों की रिहाई की बात है तो उनकी जिंदगी तबाह करने के बाद उन्हें छोड़ने पर सरकार को तो मुआवजे के बतौर बेकसूरों को पद्मविभूषण देना ही चाहिए। इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान ने सवाल उठाया कि विधानसभा चुनाव में मुलायम ने अपने घोषण पत्र में निर्दोषों का वादा किया था लेकिन उसी कुनबे के एक नेता कह रहे है कि अब किसी को नहीं छोड़ा जाएगा, जो सपा द्वारा मुसलमानों को बेवकूफ समझने की उनकी मानसिकता को दर्शाता है। 
 
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मुसलिम मजलिस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खालिद साबिर ने कहा कि आज जरुरत है कि मुसलमान से इस वादा खिलाफी का जवाब तमाम राजनीतिक संगठनों के साथ एक जुट होकर दें, क्यों की यह सिर्फ मुस्लिमों का सवाल नहीं है, बल्कि यह जम्हूरियत का सवाल है। सोसलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री ओमकार सिंह ने कहा कि जिस सरकार के आठ महीने में दस दंगे हो गए हों उसे सरकार में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
 
रिहाई मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब ने कहा कि आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को छोड़ने पर यदि सरकार ईमानदार होती तो वह तारिक-खालिद की फर्जी गिरफ्तारी पर गठित आरडी निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक करती। लेकिन ऐसा करने के बजाय सरकार ने अपने बयानबाजी से ऐसे तत्वों को मौका मुहैया कराया कि वो अदालत में चले जांए और इस मसले पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो जाए। आवामी काउंसिल के राष्ट्रीय महासचिव असद हयात ने कहा कि धारा 321 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत राज्य सरकार की प्रार्थना पत्र पर सेशन कोर्ट विवेकानुसार यह तय करता है कि मुकदमा वापसी की प्रार्थना को स्वीकार किया जाय कि नहीं, यह प्रश्न जनहित याचिका का विषय नहीं है। माननीय न्यायधीशों ने यदि यह कहा है कि आज इन्हें छोड़ते हैं तो कल उन्हें पद्म विभूषण भी देंगे, विषय से हटकर की गई टिप्पणी है, जो निचली अदालत के किसी भी संभावित फैसले को प्रभावित करती है। अलबत्ता यह टिप्पणी रिकार्ड पर नहीं है।
 
 इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता पीयूएचआर नेता सतेन्द्र सिंह ने निर्दोषों के सवाल पर हाईकोर्ट के जजों द्वारा की गई टिप्पणी को साम्प्रदायिक जेहनियत और न्यायालय की गरिमा के विरुद्ध बताते हुए कहा कि सरकार बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को नहीं छोड़ना चाहती अगर चाहती तो वो अपने महाधिवक्ता को इस याचिका में अपना पक्ष रखने के लिए भेजती जो उसने नहीं किया।
 
धरने में रामपुर सीआरपीएफ कांड में आरोपी बनाए गए कुंडा प्रतापगढ़ से कौसर फारुकी के भाई अनवर, मुरादाबाद के जंगबहादुर के बेटे शेर खान, रामपुर के शरीफ के भाई शाहीन ने कहा कि जिस तरह मुस्लिम युवक दस-दस साल तक जेलों में रहने के बाद बेगुनाह साबित होते है वैसे में सरकार को चाहिए कि रामपुर घटना की सत्यता पर सीबीआई जांच कराए। सपा सरकार में मई 2012 में उठाए गए शकील के पिता मोहम्मद यूसुफ अली, भाई इशहाक, जैनब, खदीजा, और आमिना ने शकील की गिरफ्तारी पर जांच आयोग के गठन के मांग के साथ यूपी एटीएस द्वारा उनके परिवार का महीनों तक चले उत्पीड़न पर सवाल उठाया। वहीं संकटमोचन मामले मे उम्र कैद की सजा पाए फरहान के भाई वकार ने पूरे मामले की पुर्नविवेचना की मांग की।
 
धरने में खालिद के भाई शाहिद और तारिक के चचा फैयाज व ससुर असलम ने कहा कि सरकार के पास जब निमेष जांच आयोग की रिपोर्ट है, जिसमें हमारे बच्चों को बेगुनाह बताया गया है तो सरकार उसे क्यों नही जारी कर रही है। धरने को मौलाना जहांगीर आलम कासमी, एडवोकेट रणधीर सिहं सुमन, ताहिरा हसन, जैद अहमद फारुकी, अजय सिंह, मोहम्मद आफताब, मोहम्मद आफाक, कमरुद्दीन कमर, राघवेन्द्र प्रताप सिंह, आरिफ नसीम, मोहम्द शमी, सलीम राईनी, अहमद हुसैन, हारिस सिद्दीकी, अब्दुल जब्बार, जनार्दन गौड़, अहमद अली, सूफी उबैदुर्ररहमान, सादिक, इसरारउल्ला सिद्किी, केके वत्स, विवके सिंह, अरशद
अली, राजीव यादव इत्यादि ने संबोधित किया। धरने का संचालन शहनवाज आलम ने किया। (प्रेस रिलीज)

दैनिक प्रभात, गाजियाबाद ने मनाया वर्षगांठ, एनई दिलीप झा को अवार्ड

 

गाजियाबाद। दैनिक प्रभात के गाजियाबाद संस्करण द्वारा वर्षगांठ -२०१२ के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में ''विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह : मीडिया बना मंडी'' पर अपना विचार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी के मुख्य वक्ता 'द संडे इंडियन' के संपादक ओंकारेश्वर पांडे ने पत्रकारों को समाचार पर अपने विचारों को स्थान देने की बात कही। उन्होंने कहा कि मीडियाकर्मियों को अपने दायित्व का बोध होना चाहिए कि आखिर वह समाचारों को किस रूप में प्रकाशित करना चाहते हैं। 
 
पांडे ने कहा कि आम और खास में अंतर पैदा करने के लिए यह आवश्यक है कि पत्रकार समाचारों के साथ अपना विचार अवश्य लिखे। मुख्य वक्ता ने कहा कि सरकार या अधिकारियों अथवा संस्थाओं द्वारा किए गए अच्‍छे कार्यों की प्रशंसा की जानी चाहिए। केवल आलोचना करना ही पत्रकारों का मुख्य काम नहीं है। देश में करीब ८४६ चैनल तथा ७५००० समाचार पत्र है जो विश्व में सर्वाधिक है। न्यू मीडिया के बारे में बोलते हुए श्री पांडे ने कहा कि इसने लोगों को बोलने की आजादी दी। कोई भी अपना विचार रख सकता है। वर्षगांठ २०१२ के अवसर पर समाचार संपादक दिलीप झा को विशिष्ठ सेवा के लिए पुरस्कृत किया गया।
 
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पूर्व सिंचाई मंत्री नवाब सिंह नागर ने कहा कि आज पत्रकारों के लिए अनेक चुनौतियां हैं। पत्रकारिता पर विश्वसनीयता का संकट गहराता जा रहा है। चौथे स्तंभ के रूप में पत्रकारिता पर ज्यादा जिम्मेवारी बनती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि संविधान के तीनों अन्य स्तंभों पर प्रश्न उठने लगे है। जनता प्रेस से काफी उम्मीद लगाए बैठी है। इन उम्मीदों पर खरा उतरने की बहुत बड़ी चुनौती पत्रकारों पर है।
 
दैनिक प्रभात के मुद्रक एवं प्रकाशक डॉ. जीएस भटनागर ने कहा कि ग्रामीण पत्रकारिता पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने वास्मे के वरिष्ठ सलाहार डॉ. पी.सी सŽबरवाल के सुझाव का समर्थन करते हुए कहा कि पत्रकारों को गांव के ऐसे समाचारों पर ध्यान देना चाहिए जिससे लोगों को अपनी समस्याओं का समाधान करने में सुविधा हो। उन्होंने भरोसा दिलाया कि भविष्य में ग्रामीण पत्रकारिता पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। भटनागर ने गाजियाबाद के संपादक का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए कहा कि ग्रामीण स्तर पर संवाददाता नियुक्त करें। इससे गांव के लोगों को समस्याओं से निजात पाने में मदद मिलेगी।
 
दैनिक प्रभात के संपादक अवनीन्द्र ठाकुर ने कहा कि हमे पत्रकारिता को प्रदूषण-मुक्त करना होगा और पीत पत्रकारिता से परहेज करना होगा। लेकिन पत्रकारों की भी अनेक समस्याएं है जिस पर तत्काल नीति निर्धारित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पहले समाचार पत्र कम पूंजी में निकल जाते थे आज समाचार पत्र निकालना आसान नहीं है। इसलिए अधिकांश अखबार व्यवसायिक हो चुके हैं। इस चुनौती को भी हमें स्वीकार करना होगा तथा सकरात्मक सोच के साथ परिवर्तन के लिए प्रयास जारी रखना होगा। 
 
वरिष्ठ समाजसेवी एवं नोएडा लोकमंच के महासचिव महेश सक्सेना ने कहा कि पत्रकारिता को समाजिक मूल्यों से जोड़ कर देखा जाना चाहिए। वह दिन लोकतंत्र के लिए शुभ दिन होगा जब समाचार पत्रों के माध्यम से थानों में जरूरतमंद एवं अहसहाय लोगों की प्राथमिकी दर्ज की जाएगी। क्योंकि सीधे थानों में जाकर आम आदमी के लिए प्राथमिकी दर्ज कराना काफी मुश्किल है। सक्सेना ने कहा कि समाचार पत्र सामाजिक समस्याओं से मुंह मोड रहे है यहीं कारण है कि चाहे विधवा पेंशन योजना हो या सरकार द्वारा प्रदžत्‍त कोई अन्य सुविधा। जानकारी के अभाव में लोग इधर-उधर भटकते हैं जबकि अगर उन सुविधाओं को मीडिया द्वारा प्रचारित किया जाए तो समाज के कमजोर वर्ग को इसका सीधा लाभ मिलेगा।
 
पीत पत्रकारिता की समस्या पर बोलते हुए सुभारती मीडिया लिमिटेड के सलाहकार विजय भोला ने कहा कि पीत पत्रकारिता इस जगत की सबसे बड़ी समस्या है। इसका हर हाल में हल ढूढ़ऩा होगा। उन्होंने प्रभात के सहयोगियों को पीत पत्रकारिता से दूर रहने की सलाह दी। प्रभात मेरठ संस्करण के संपादक सुनील छइयां ने कहा कि जब तक सरकारी स्तर पर मुद्रक प्रशासक एवं पत्रकारों को सहयोग नहीं मिलता तब-तक इस प्रकार की समस्याओं से निजात पाना मुश्किल है। छइयां ने कुछ बड़े समाचार पत्रों के ब्रांडिग पर चुटकी लेते हुए कहा कि समाचार पत्र बड़े-छोटे नहीं होते बल्कि महत्व होता है उनमें प्रकाशित समाचारों का।
 
संगोष्ठी के प्रारंभ में स्वतंत्र युवा पत्रकार विश्वेद्र नाथ ठाकुर ने समाचार पत्र के प्रकाशन में आने वाली सतही समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महंगाई के युग में चैनल या समाचार पत्र चलाने के लिए एकमुश्त धन की आवश्यकता होती है। ऐसे में अगर मीडिया मंडी में तŽदील हो गया तो यह देखना दिलचस्प होगा कि मंडी में आखिर क्या बिक रहा है। ठाकुर ने न्यू मीडिया के महत्व की चर्चा करते हुए कहा कि एक ओर जहां समाचार पत्र या चैनल के लिए अधिक धन की आवश्कता होती है वहीं न्यू मीडिया कम खर्च में एक सशक्त माध्यम बन गया है।
 
पूर्व प्राध्यापिका एवं समाज सेवी डॉ. शशि राव ने मीडिया में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बोलते हुए दो टूक शŽदों में कहा कि आज हर स्तर पर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। ऐसे में केवल मीडिया से ईमानदारी की अपेक्षा करना बेमानी होगा। लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित मीडिया को अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। कवि एवं समाचोलक डॉ. वाई.एस तोमर 'यशी' ने कहा कि पत्रकारिता ही नहीं समाज के हर भाग में भ्रष्टाचार है। अपने व्यक्तिगत हितों को त्यागना होगा। तभी किसी सुखद परिणाम की आशा कर सकते है।
 
कार्यक्रम के प्रारंभ में  मुख्य अतिथि मदन चौहान सहित विशिष्ठ अतिथि जी एस भटनागर, विजय भोला, पी सी सबरवाल, एवं संपादक अवनीन्द्र ठाकुर ने दीप प्रज्वलित किया। आगतुक अतिथियों का स्वागत सपांदक अवनीद्र ठाकुर ने की जबकि धन्यवाद ज्ञापन सुभारती मीडिया लिमिटेड के सलाहाकार विजय भोला ने की। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व सिंचाई मंत्री नवाब सिंह नागर ने की। वर्षगांठ २०१२ के अवसर पर समाचार संपादक दिलीप झा को विशिष्ठ सेवा के लिए पुरस्कृत किया गया। समारोह का संचालन करते हुए दैनिक प्रभात के संपादक श्री अवनीन्द्र ठाकुर ने इस अवसर पर सभी साथियों को बधाई दी।

पत्रकार शाशिकांत को फर्जी फंसाए जाने के विरोध में पत्रकारों का धरना जारी

 

जालौन में सपा नेता पर हुए हमले के आरोप में एक पत्रकार को फर्जी फंसा कर जेल भेजने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। जिसको लेकर पत्रकार 22 नवम्बर से जिलाधिकारी परिसर में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गये हैं। आपको बता दें कि 6 नवम्बर को देर रात जालौन के एट थाना क्षेत्र में सपा के पूर्व कोषाध्यक्ष राकेश पटेल जब अपने गाँव सोमई से बाइक से एट जा रहे थे तभी कुछ अज्ञात हमलावरों ने उन पर फायरिंग कर दी जिसमें वो घायल हो गये थे। घटना के नौ दिन बाद सपा नेता के भाई ने 16 नवम्बर 2012 को गाँव के ही दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला के पत्रकार शशिकांत तिवारी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया था, जिस पर पुलिस ने करवाई कर पत्रकार को जेल भेज दिया था। 
 
इस मामले में जनपद के पत्रकारों ने जालौन के पुलिस अधीक्षक आरपी चतुर्वेदी से निष्पक्ष जांच कर करवाई करने की बात कही थी लेकिन जांच कराने के बजाय पुलिस ने अपने ऊपर जनपद के सपा के एक जनप्रतिनिधि का दबाब होना बताया था, जिसके चलते पत्रकारों में आक्रोश भड़क गया और पत्रकारों ने 21 नवम्बर को जिलाधिकारी मनीषा त्रिघटिया से मामले की मजिस्ट्रेट जांच कराने की बात कही थी, लेकिन उन्होंने भी मामले को गंभीरता से नहीं लिया और मजिस्ट्रेटी जांच कराने से मना कर दिया। इसके परिणाम स्वरुप जनपद के पत्रकार लामबद्ध हो गये और 22 नवम्बर 2012 से पत्रकारों ने उरई स्थित कलेक्ट्रेट परिसर में अनिश्चितकालीन धरना देना शुरू कर दिया। 
 
धरने के चौथे दिन उरई स्थित गांधी चबूतरा पर सभी दलों के राजनीतिक लोगों ने एकजुट होकर पत्रकार शशिकांत तिवारी के उत्पीड़न के खिलाफ सभा की और धरना दिया। लोगों ने कहा कि सपा सरकार में आम आदमी के साथ-साथ लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ भी सुरक्षित नहीं है। पत्रकार को आवाज उठाने पर दबा दिया जाता है या फिर उसे झूठे मुकदमे में आरोपी बनाकर जेल भेज दिया जाता है, जो कतई बर्दास्त नहीं किया जा सकता है। इस अवसर पर अखिल भारतीय महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र नाथ त्रिपाठी ने कहा कि प्रदेश में जब बसपा की सरकार थी तब ब्राह्मणों का उत्पीड़न हुआ और अब सपा सरकार आने के बाद भी उत्पीड़न जारी है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों के उत्पीड़न के बाद जिस तरह से विधान सभा चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ़ हो गया था उसी तरह अगर प्रदेश में सपा सरकार में भी निर्दोष लोगों को जेल भेजा गया और ब्राह्मणों पर जुल्म हुआ तो आने वाले लोकसभा चुनावों में सपा का भी सूपड़ा साफ़ हो जाएगा। उन्होंने कहा कि वह निर्दोष पत्रकार शशिकांत तिवारी को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश के मुख्यमंत्री और डीज़ीपी से भी मुलाक़ात करेंगे। 
 
वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने बताया कि अगर प्रशासन निष्‍पक्ष और उचित कार्रवाई नहीं करेगा तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। किसी भी पत्रकार का उत्‍पीड़न निंदनीय है। सपा सरकार में सबसे ज्‍यादा उत्‍पीड़न से पत्रकार ही जूझ रहे हैं। कामरेड कैलाश पाठक ने बेबाक बोलते हुए प्रदेश सरकार से मांग की है कि अगर 6 नवम्बर से लेकर 16 नवम्बर तक घायल सपा नेता राकेश पटेल, एट थाने के थानाध्यक्ष और जालौन के सांसद घनश्याम अनुरागी के मोबाइल फोन को सर्विलांस के माध्यम से जानकारी ली जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा और पत्रकार निर्दोष साबित हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन प्रभावशाली जनप्रतिनिधि के इशारे पर काम कर रहा है इसलिए इस घटना की उच्च स्तरीय जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर पत्रकार को दोषमुक्त कर नहीं छोड़ा गया तो सभी दलों के लोग लखनऊ और दिल्ली तक आन्दोलन करेंगे।
 
सर्वदलीय धरने में गौरीशंकर वर्मा, जगदीश तिवारी, हरेन्द्र विक्रम, कल्ला चौधरी, उरविजा दीक्षित, ब्लाक प्रमुख सुदामा दीक्षित, गिरीन्द्र सिंह, रेहान सिद्दीकी, अशोक द्विवेदी, विजय चौधरी, विनोद चतुर्वेदी (पूर्व विधायक), अभय द्विवेदी, किसान नेता राजवीर जादौन, बलराम सिंह लम्बरदार, लालू शेख एवं मीडिया से वरिष्‍ठ पत्रकार केपी सिंह, अरविन्द द्विवेदी, ना‍थूराम निगम, दीपक अग्निहोत्री, संजय श्रीवास्तव, ब्रजेश मिश्रा, अतुल त्रिपाठी, संजीव श्रीवास्‍तव, ओमप्रकाश राठौर, अमित द्विवेदी, मनोज राजा, आबिद नकवी, सुनील शर्मा, संजय मिश्रा, रमाशंकर शर्मा, जमील टाटा, अरमान, विकास जादौन, श्रीकांत शर्मा, अलीम सिद्दीकी, संजय गुप्‍ता, अनुज कौशिक, विनय गुप्ता, अजय श्रीवास्‍तव, प्रदीप त्रिपाठी, शशिकांत शर्मा, जितेंद्र द्विवेदी, राहुल गुप्‍ता, संजय सोनी, इसरार खान, मनोज शर्मा, जीतेन्द्र विक्रम सिंह, सहित तमाम पत्रकार, नेता एवं समाजसेवी मौजूद रहे और एक स्वर में पत्रकार की रिहाई एवं दोषियों को सजा देने की मांग की। सभी ने कहा कि जब तक निर्दोष पत्रकार के साथ न्याय नहीं होता तब तक धरना जारी रहेगा। 

पत्रकार पर हमला करने वालों की गिरफ्तारी की मांग, एसएसपी से मिले मीडियाकर्मी

 

एटा : टीवी चैनल के पत्रकार देवेश पाल सिंह चौहान पर हुये जान लेवा हमले के आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर एटा जनपद के पत्रकार सोमवार को एसएसपी से मिले तथा आरोपियों को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग की। इस दौरान एसएसपी ने उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है। उन्नीस नवंबर को रात नौ बजे पत्रकार देवेश पाल सिंह पर उस वक्त हमला किया गया था जब वे अपनी कार से अवागढ़ से एटा आ रहे थे। 
 
रिपोर्ट दर्ज होने के बावजूद भी आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हो सके हैं। हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर पत्रकारों का प्रतिनिधि मंडल एसएसपी अजय मोहन शर्मा से मिला। पत्रकारों ने एसएसपी को बताया कि घटना को हुये सात दिन बीत चुके हैं और नामजद आरोपियों को शकरौली पुलिस गिरफ्तार नहीं कर रही। पत्रकार को लगातार धमकियां भी दी जा रहीं हैं। यहां बता दें कि हमलावरों ने देवेश पाल को गोली मारी थी जिसमें वे बाल-बाल बच गये थे। हमलावरों की गिरफ्तारी न होने से मीडिया कर्मियों में रोष व्याप्त है। एसएसपी ने कहा है कि मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी। इस अवसर पर इलैक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया से जुड़े तमाम पत्रकार मौजूद थे। (जागरण) 

फेसबुक पर कमेंट का मामला : एसपी सस्‍पेंड, मजिस्‍ट्रेट का तबादला

 

मुंबई। फेसबुक पर ठाकरे विरोधी कमेंट करने पर 2 लड़कियों को अरेस्ट करने के मामले में सरकार ने लापरवाही बरतने पर सीनियर पुलिस ऑफिसर्स के खिलाफ सख्त ऐक्शन लिया है। सरकार ने ठाणे रूरल के एसपी रविन्द्र सेनगांवकर को सस्पेंड करने का फैसला लिया है। उधर बॉम्बे हाई कोर्ट ने इन दोनों लड़कियों को 15-15 हजार रुपये की जमानत पर रिहा करने वाले फर्स्ट क्लास जुडिशल मजिस्ट्रेट रामचंद्र बागडे का ट्रांसफर कर दिया है।
 
21 साल की शाहीन डाढा ने 18 नवंबर को शिवसेना चीफ बाल ठाकरे के अंतिम संस्कार वाले दिन फेसबुक पर एक स्टेटस अपडेट किया था। इस अपडेट को उनकी दोस्त रेणू ने लाइक करके शेयर किया था। हालांकि शाहीन ने अपनी पोस्ट में ठाकरे का जिक्र नहीं किया था, लेकिन स्थानीय शिवसेना चीफ ने उसके खिलाफ लोगों की भावनाएं भड़काने की शिकायत दर्ज करा दी। यही नहीं, शाहीन के चाचा के क्लिनिक में कुछ गुंडों ने तोड़फोड़ भी की। पुलिस ने भी इस मामले में दोनों लड़कियों को अरेस्ट कर लिया था, जिसके बाद देश भर में 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' के मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई थी।
 
चारों तरफ हो रहे विरोध के बाद महाराष्ट्र के सीएम पृथ्वीराज चव्हान और गृह मंत्री आर.आर. पाटिल ने ऐक्शन लेने का वादा किया था। इसके लिए आईजी रैंक के एक ऑफिसर को मामले की जांच सौंपी गई थी। जांच में पाया गया कि सीनियर पुलिस ऑफिसर्स ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया। अगर उन्होंने वक्त पर सही फैसला लिया होता, तो हालात इतने खराब नहीं होते। जांच रिपोर्ट में पाया गया कि दोनों लड़कियों के खिलाफ इतनी गंभीर धाराओं में केस दर्ज करने के पीछे कोई वजह समझ नहीं आती। दोनों पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने और गलत इंटेशन से मैसेज भेजने और गलत ऐक्टिविटीज़ करने का आरोप लगा था। 19 नवंबर को जांच के आदेश देते हुए महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने कहा था कि दोषी पाए जाने पर किसी को बख्शा नहीं जाएगा।
 
जांच रिपोर्ट के आधार पर ठाणे के एसपी (रूरल) रविन्द्र सेनगांवकर और सीनियर इंस्पेक्टर श्रीकांत पिंगले को सस्पेंड किया जाएगा, जबकि ठाणे रूरल के एएसपी संग्राम निशानदार को कड़ी चेतावनी दी जाएगी। हमारे सहयोगी अखबार 'टाइम्स ऑफ इंडिया' की तरफ से शाहीन ढाडा और रीनू श्रीनिवासन को अरेस्ट किए जाने के खिलाफ चलाए गए कैंपेन के बाद ही यह ऐक्शन लिया गया है। महाराष्ट्र में हाल-फिलहाल सीनियर पुलिस ऑफिसर्स के खिलाफ की गई यह बड़ी कार्रवाई है। 
 
इस मामले में मजिस्ट्रेट पर भी सवाल उठे थे। पूर्व चीफ इन्फर्मेशन कमिश्नर शैलेश गांधी ने सवाल उठाया था कि मजिस्ट्रेट ने मामले को ध्यान से देखा ही नहीं। उन्होंने यह नहीं देखा कि लड़कियों के खिलाफ क्या आरोप लगाए गए हैं और क्यों। मैजिस्ट्रेट ने शाहीन और रीनू को 15-15 हजार रुपये जबकि शाहीन के चाचा के क्लिनिक में तोड़फोड़ करने वालों को 7500 रुपये में जमानत दी थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बागडे को तुरंत प्रभाव से जलगांव ट्रांसफर कर दिया गया है। सीनियर वकील अमित देसाई ने कहा, 'सरकार के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। अच्छी बात है कि इस मामले के ठंडा पड़ने से पहले ही ऐक्शन ले लिया गया। इससे अच्छा मैसेज गया है। आइंदा कोई भी इस तरह से परेशान करने के लिए गलत रिपोर्ट नहीं लिखेगा।' (एनबीटी)

 

पत्रकार हामिद की कार में बम रखकर उड़ाने की कोशिश, बाल-बाल बचे

पाकिस्तान के जाने माने पत्रकार हामिद मीर पर कातिलाना हमला हुआ है लेकिन उनकी जान बच गई है. हामिद मीर जियो टेलिविजन में कैपिटल टॉक शो के मेजबान हैं और कुछ दिनों से तालिबान के निशाने पर थे. पुलिस ने सोमवार को इस्लामाबाद में मीर की गाड़ी के नीचे से एक बम को निष्क्रिय किया. पिछले महीने लड़कियों की शिक्षा की पैरवी करने वाली मलाला युसुफजई पर तालिबान के हमले का मुद्दा मीर ने अपने शो पर उठाया था. 

 
पुलिस का कहना है कि बम उनकी गाड़ी की आगे वाली सीट के नीचे लगाया गया था. "एक डिटोनेटर सहित आधा किलो विस्फोटक पदार्थ गाड़ी के नीचे लगाया गया था." मीर अपने दफ्तर जा रहे थे और माना जा रहा है कि बम तब लगाया गया जब वह कुछ देर के लिए बाजार में रुके. मीर ने जियो चैनल से बातचीत में कहा कि यह हमला उनके और पाकिस्तान में पत्रकार समुदाय के लिए एक संदेश है. "वे चाहते हैं कि हम सच बोलने से रुकें लेकिन मैं उनसे कहना चाहता हूं कि हमें कोई रोक नहीं सकता." 
 
पाकिस्तानी गृह मंत्री रहमान मलिक ने बम के बारे में जानकारी देने वाले किसी भी इनसान को पांच लाख डॉलर का इनाम देने का वादा किया है. मीर के मुताबिक पाकिस्तान के आंतरिक मंत्रालय ने पहले ही उन्हें अपनी जिंदगी को खतरे के बारे में जानकारी दी थी लेकिन वह किसी भी गुट को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहते. पिछले महीने पाकिस्तान में खुफिया अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें तालिबान की पत्रकारों पर निशाना साधने की योजना के बारे में पता चला है. कुछ हफ्तों पहले तालिबान ने पाकिस्तान की पश्चिमोत्तर स्वात घाटी में मलाला युसुजई नाम की लड़की पर हमला किया था क्योंकि वह लड़कियों के लिए शिक्षा के अधिकारों पर खुले आम बोल रही थी. 
 
मई 2011 में पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शहजाद भी मारे गए थे. वे अल कायदा और पाकिस्तान सेना के बीच संपर्क पर लिख रहे थे. शहजाद ने अपनी मौत से पहले ह्यूमन राइट्स वॉच से कहा था कि खुफिया अधिकारियों ने उन्हें धमकी दी थी. पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने शहजाद की मौत में हाथ होने से इनकार किया है. विश्व पत्रकार संगठन रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स के मुताबिक जनवरी 2011 से लेकर अब तक पाकिस्तान में आठ पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. 2011-2012 के लिए प्रेस आजादी इंडेक्स के मुताबिक अंदरूनी मुश्किलों की वजह से पाकिस्तान दुनिया में पत्रकारों के लिए सबसे खतरनाक देश है. (डीडब्‍ल्‍यू)

जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ से कई निकाले गए

 

मुश्किल दौर से गुजर रहे जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ से खबर है कि संस्‍थान से 15 रिपोर्टरों को बाहर किए जाने की तैयारी है. प्रबंधन के इस निर्णय से अखबार में हड़कम्‍प मचा हुआ है. जिन लोगों को बाहर किया गया है या किया जाना है उनमें कई वरिष्‍ठ पत्रकार हैं. जिन लोगों के नाम की जानकारी मिली है उनमें शिव शंकर गोस्‍वामी, मुकुल मिश्र, अविनाश कुमार, प्रमोद श्रीवास्‍तव, सुधीर श्रीवास्‍तव के नाम शामिल हैं. इन लोगों को दस दिन का नोटिस दिया गया है. 
 
इनमें से ज्‍यादातर पत्रकार दैनिक जागरण, हिंदुस्‍तान, सहारा जैसे अखबारों में काम कर चुके हैं. प्रबंधन के इस निर्णय से ये पत्रकार खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं. चर्चा है कि प्रबंधन अपने खर्च में कटौती करने के लिए कुछ और लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखा सकता है. कई दूसरे निर्णय भी लिए जा सकते हैं. फिलहाल अखबार के कार्यालय में हड़कम्‍प वाली स्थिति है. 

पोंटी के साथ डूब गयी कई राजनेताओं और अधिकारियों की काली कमाई

 

: छिपाना भी हुआ मुश्किल और बताना भी हुआ मुश्किल : देहरादून : पोंटी चड्ढा की मौत के साथ कई राज भी दफन हो गए। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में शराब और चीनी कारोबार सहित खनन और रियल स्टेट में दोनों राज्य के कई राजनेताओं और ब्यूरोक्रेटस का काला धन लगा था जो पोंटी चड्ढा के मरने के बाद डूब गया है। पोंटी चड्ढा की वेव कम्पनी में मात्र व्यवसायिक घरानों का ही नहीं बल्कि राजनेताओं और अधिकारियों का काला धन भी लगा था। यह बात केवल या तो पोंटी चढ्ढा ही जनता था या फिर काला धन लगाने वाले अधिकारी और राजनेताओं को ही पता था कि उन्होंने कितना पैसा लगाया है। 
 
हालांकि अब इस बात के कोई सबूत नहीं है कि पोंटी की कम्पनियों में किसका कितना धन लगा हुआ है। वहीं दूसरी तरफ पोंटी के मरने के बाद आर्थिक नुकसान उसके परिवार को भी हुआ है। एक जानकारी के अनुसार पोंटी की काली कमाई का करोडों रुपया कई व्यवसाय में लगा हुआ था। पोंटी की हत्या के बाद यह धन भी डूब गया है जानकारों का कहना है कि काली कमाई से अर्जित किया गया धन या तो मरने वाले के साथ डूब जाता है और इस तरह के धन को लगाने वाले भी खुल कर सामने नहीं आ पाते हैं। 
 
कहा जा रहा है कि जिन नेताओं और अधिकारियों ने पोंटी की कम्पनी में काला धन लगाया था उन्होंने अपने कार्यकाल में पोंटी से शराब और चीनी मिल की खरीद में अरबों कमाए। सूत्रों का यहां तक कहना है कि उत्तराखंड की सरकारी क्षेत्र की चार चीनी मिलों को घाटे वाली बताकर पोंटी को पीपीपी मोड़ में देने की तैयारी हो चुकी थी लेकिन मामला खुल जाने के बाद सरकार की यह योजना धरी की धरी रह गई। जानकारों का कहना है कि जिन नेताओं और अधिकारियों का काला धन डूबा है उनके घरों में पोंटी के मरने के बाद से मातम का माहौल है। उनकी बिडम्बना है कि वे अपना दुःख न किसी को बता सकते हैं और न यह कह सकते हैं कि पोंटी के साथ उनका पैसा भी डूब गया।
 
देहरादून से नारायण परगाई की रिपोर्ट. 

आम आदमी का अखबार बने जनवाणी : महामहिम

 

: समाचार पत्र के उत्तराखंड संस्करण के लोकार्पण कार्यक्रम में बोले प्रदेश के राज्यपाल : देहरादून : उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी ने गॉडविन मीडिया ग्रुप के लोकप्रिय समाचार पत्र दैनिक जनवाणी का विधिवत लोकार्पण करते हुए उम्मीद जताई कि जनवाणी समाज के सबसे निचले तबके की आवाज बनेगा। देश में पत्रकारों की दशा पर चिंता जताते हुए उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाने की जोरदार वकालत की। उन्होंने कहा कि वह केंद्र सरकार को इस बाबत पत्र भी लिख चुके हैं।
 
पत्रकारिता के लगभग 400 साल पुराने इतिहास का जिक्र करते हुए राज्यपाल ने कहा कि उस दौर में पत्रकारिता बहुत मुश्किल थी। मजरूह सुल्तानपुरी के शेर जो घर को अपने जलाए/ हमारे साथ चले- सुनाकर उन्होंने कहा कि उस जमाने में पत्रकारों ने अपने खून की शमा जलाकर पत्रकारिता को जिंदा रखा। अकबर इलाहाबादी के शेर -जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो- के जरिये उन्होंने कहा कि आजादी से पहले और बाद में कुछ सालों तक पत्रकारिता मजबूत थी। आज पत्रकारिता के मायने बदल गये हैं। छोटे पत्रकारों की स्थिति बेहद खराब है। पत्रकारों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए जाने की जोरदार वकालत की। इस बारे में उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर केंद्र सरकार को पत्र लिखने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि कलम पर पहरे नहीं लगने चाहिए। उन्होंने उम्मीद जाहिर कि दैनिक जनवाणी इस भीड़ से अलग हटकर बेनाम-बेचेहरा लोगों की आवाज बनेगा। समाज के सबसे निचले तबके के सीने का दर्द अखबार में दिखाई देगा।

जनवाणी का अगला पड़ाव हिमाचल प्रदेश : जितेंद्र बाजवा

 

गॉडविन मीडिया समूह के निदेशक जितेन्द्र बाजवा ने जनवाणी के लोकार्पण समारोह के अवसर पर ऐलान किया कि यूपी और अब उत्तराखंड के बाद जनवाणी का अगला पड़ाव हिमाचल प्रदेश होगा। जल्द ही जनवाणी का हिमाचल संस्करण आरंभ किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारी किसी अखबार से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। हमारा लक्ष्य अखबारों की भीड़ में अलग जगह बनाना है। दो साल की छोटी सी यात्रा में हम यह जगह बनाने में सफल रहे हैं। 
 
उन्होंने कहा कि जनवाणी का सूत्र वाक्य एक सकारात्मक सोच है। प्रबंधन का मानना है कि अखबार पर किसी पार्टी का रंग नहीं होना चाहिए। निष्पक्ष और सकारात्मक पत्रकारिता हमारा ध्येय होना चाहिए। उन्होंने जनवाणी के लोकार्पण समारोह में राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी, केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत, देहरादून के मेयर विनोद चमोली समेत उपस्थित अतिथिगणों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने जनवाणी टीम को लांचिंग की बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि वे पूरी मेहनत के साथ अखबार के उत्थान के लिए काम करेंगे ताकि अखबार के विस्तारीकरण का सिलसिला आगे बढ़ता रहे। उन्होंने घोषणा की कि आने वाले समय में हिमाचल से जनवाणी का शुभारंभ होगा।

देहरादून से जनवाणी की दमदार लांचिंग, राज्‍यपाल कुरैशी एवं हरीश रावत ने किया लोकार्पण

: जनसरोकारों की पत्रकारिता जीवित रखने की जरूरत – महामहिम : देहरादून : उत्तर प्रदेश में दमदार उपस्थिति दर्ज कराने के बाद रविवार को दैनिक जनवाणी ने उत्तराखंड में शानदार तरीके से दस्तक दी। राज्यपाल डा. अज़ीज़ कुरैशी, केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत, देहरादून के मेयर विनोद चमोली, गॉडविन मीडिया समूह के निदेशक भूपेंद्र सिंह बाजवा व जितेंद्र सिंह बाजवा, दैनिक जनवाणी के समूह संपादक यशपाल सिंह और उत्तराखंड स्टेट हेड योगेश भट्ट समेत सैकड़ों लोग उत्तराखंड में दैनिक जनवाणी के लोकार्पण के गवाह बने।

 
रविवार अपराह्न हाथीबड़कला स्थित सर्वे आफ इंडिया आडिटोरियम में दैनिक जनवाणी के उत्तराखंड संस्करण का लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया गया। अपने संबोधन में प्रदेश के राज्यपाल डा. अजीज़ कुरैशी ने आशा जताई कि दैनिक जनवाणी अपने नाम के अनुरूप ही समाज के उपेक्षित और कमजोर वर्ग की वाणी बनेगा। उन्होंने कहा कि प्रतिस्पर्द्धा के इस दौर में भी बिना समझौता किए जनसरोकारों की पत्रकारिता को जीवित रखने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि एक सकारात्मक सोच दैनिक जनवाणी का विचार इसको विशिष्ट बनाता है। केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पिछले कुछ समय में पत्रकारिता के स्तर में गिरावट आई है। उन्होंने उम्मीद व्यक्त करते हुए कहा कि दैनिक जनवाणी पत्रकारिता के उच्च मानदंडों को पुन: स्थापित करेगी।
 
 
देहरादून के मेयर विनोद चमोली ने कहा कि दैनिक जनवाणी के उत्तराखंड संस्करण को लेकर लोगों में भी खासा उत्साह और उत्सुकता है। एक प्रदेश, एक संस्करण की सोच जनवाणी को अन्य सभी समाचार पत्रों से अलग करती है। गॉडविन समूह के निदेशक जितेंद्र सिंह बाजवा ने कहा कि उत्तर प्रदेश में दैनिक जनवाणी पिछले दो वर्षों में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहा है। उत्तराखंड संस्करण के स्थापित होने के बाद उन्होंने हिमाचल प्रदेश संस्करण शुरू करने की भी घोषणा की। 
 
 
कार्यक्रम में दैनिक जनवाणी के समूह संपादक यशपाल सिंह, उत्तराखंड स्टेट हेड योगेश भट्ट, राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुशीला बलूनी, नगर पालिकाध्यक्ष मसूरी ओपी उनियाल, आरएसएस के प्रांत प्रचारक डा. हरीश, विधायक राजकुमार, नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष अशोक वर्मा, प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना, पूर्व दायित्वधारी रविंद्र जुगराण, उमेश अग्रवाल, प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ के महामंत्री डा. डीपी जोशी, राज्य मौसम विभाग के निदेशक आनंद कुमार शर्मा, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के प्रदेश अध्यक्ष प्रहलाद सिंह, गढ़वाल केंद्रीय विवि शिक्षक संघ अध्यक्ष डा. प्रदीप मोहन सकलानी, सचिव डा. महावीर नेगी, डा. एसपी सती, पीएचएमएस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डा. एसडी जोशी, जनकवि डा. अतुल शर्मा, पद्मश्री अवधेश कौशल, वीरेंद्र पैन्यूली, राजकुमार वालिया, जयसिंह रावत, प्रदीप कुकरेती, अल्पाईन ग्रुप आफ इंस्टीट्यूट के निदेशक अनिल सैनी, लालचंद शर्मा, सुभाष गुप्ता, राजेन टोडरिया, प्रवीन पुरोहित, प्रकाश पुरोहित समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

अमर उजाला में शाहजहांपुर से बदायूं भेजे गए सिद्दीक, जागरण में भी हलचल

 

बदायूं के अमर उजाला कार्यालय में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत शाहजहांपुर से मो. सिद्दीक को भेजा गया है. सिद्दीक इससे पहले यहीं अमर उजाला में रह चुके हैं. शिकायतों के चलते इनका तबादला शाहजहांपुर किया गया था. उससे पहले हिन्दुस्तान के बदायूं कार्यालय में ही क्राइम रिपोर्टर थे, लेकिन तमाम तरह के आरोपों के चलते इन्हें हिन्दुस्तान ने बर्खास्त कर दिया था. मूल रूप से पीलीभीत के निवासी सिद्दीक बदायूं रहने के इच्छुक नहीं हैं, पर अधिकारियों के आदेश पर वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कुछ दिन काम देखने आ गए हैं. 
 
उधर दैनिक जागरण प्रबन्धन में हलचल देखी जा रही है, क्योंकि अव्यव्यस्थाओं से तंग होने के कारण एक-दो रिपोर्टर अमर उजाला जा सकते हैं. दैनिक जागरण बदायूं के नए ब्यूरो चीफ ने सभी रिपोर्टरों को बेकार कर दिया है. फोटोग्राफर गिरीश को क्राइम रिपोर्टर बना दिया है, वहीं अन्य सभी विभागों की खुद निगेटिव रिपोर्टिंग कर रहे हैं, जो अधिकारी ब्यूरोचीफ से सीधे बात करता है, उसी के पक्ष में लिखा जा रहा है. पूरे जिले के रिपोर्टरों की बायलाइन बंद कर दी हैं, जबकि खुद की बायलाइन स्टोरी प्रति दिन छपती है. जिससे सभी रिपोर्टर परेशान हैं.

जी छत्‍तीसगढ़ से मनहर और प्रीतम का इस्‍तीफा

 

जी24घंटे, रायपुर से लोगों के जाने का सिलसिला लगातार जारी है. खबर है कि असाइंनमेट डेस्क पर कार्यरत मनहर चौधरी ने इस्तीफा दे दिया है. मनहर अपनी उपेक्षा से परेशान थे. बताया जा रहा है कि पुराने कर्मचारियों की लगातार उपेक्षा की जा रही है. मनहर के अलावा डेस्‍क पर तैनात प्रीतम पांडेय ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. दोनों लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. 
 
बताया जा रहा है कि मनहर को इनपुट एडिटर का नजदीकी माना जाता था, इसलिए संपादक से उनकी नहीं पट रही थी. बताया जा रहा है कि मनहर के साथ चैनल के कुछ स्ट्रिंगर भी चैनल को बाय कर दिया है. समझा जा रहा है कि ये लोग जल्‍द ही किसी चैनल से जुड़ सकते हैं. 

कांग्रेस विरोधियों पर क्‍यों उबल पड़ते हैं जस्टिस काटजू?

 

कोलकाता : भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बारे में कहा कि उन्हें अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं होती। प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम में काटजू ने कहा, लोगों को आलोचना करने का अधिकार है और अगर कोई इसे सहन नहीं कर पाता है तो उसे राजनीति में रहने का कोई अधिकार नहीं। 
 
उन्होंने कहा, ममता सिर्फ जी हुजूरी करने वालों से ही घिरा रहना पसंद करती हैं पर आपके आस पास ऐसे लोग भी होने चाहिये जो ‘न’ बोल सकें। आप सरकार नहीं चला सकते अगर आप दूसरों की बात नहीं सुन सकते। आपको लोकतांत्रिक ढंग से सरकार चलानी होती है। आप अंतिम निर्णय ले सकते हैं पर आपको दूसरों की बात भी सुननी होगी। (एजेंसी)

हिमाचल के वयोवृद्ध पत्रकार केके रैणा का निधन

 

चंबा : हिमाचल प्रदेश के वयोवृद्ध पत्रकार केके रैणा का निधन हो गया. वे लम्‍बे समय से बीमार चल रहे थे. केके रैणा 90 वर्ष के थे व काफी समय तक पत्रकारिता करने के बाद वे जनसंघ से जुड़ गए थे. उनके निधन पर पत्रकार महासंघ व प्रेस क्लब के सदस्यों ने शोक व्यक्त किया है. पत्रकार महासंघ के अध्यक्ष शिव शर्मा, महासचिव दीपक शर्मा, प्रेस क्लब के अध्यक्ष राकेश शर्मा, राकेश ठाकुर, अशोक टंडन, विनोद कुमार, सोमी प्रकाश भुवेटा, अजय शर्मा, हमीद खान, ब्राह्मण प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष विनय व मंगलेश शर्मा आदि ने रैणा के निधन पर दुख व्यक्त करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की.

अमर उजाला में निवेश करने वाले डीई शॉ का भारत में कारोबार घटा

 

छह साल पहले भारत में अपना निजी इक्विटी कारोबार शुरू करने के बाद डीई शॉ समूह देश में अपना कारोबार समेट रहा है। डीई शॉ समूह दुनिया के सबसे बड़े हेज फंडों में शुमार है। प्रमुख सूत्रों के मुताबिक पीई के भारत प्रमुख और प्रबंध निदेशक अनिल चावला ने डीई शॉ से इस्तीफा दे दिया है और अब वह हॉन्ग कॉन्ग में कंपनी के सलाहकार के तौर पर काम करेंगे। भारत में कंपनी का मुख्यालय गुडग़ांव में है और ऐसा माना जा रहा है कि उसने निवेश पेशेवरों की संख्या 15 से घटाकर 2 कर दी है। ये पेशेवर अब एक बिजनेस केंद्र से काम करेंगे बचे हुए पोर्टफोलियो से बाहर निकलने का काम देखेंगे। 
 
सूत्रों के मुताबिक कंपनी ने देश में कोई नया पीई निवेश नहीं करने का फैसला भी लिया है। संपर्क करने पर अमेरिका में डी ई शॉ के एक प्रवक्ता ने बताया, 'भारत में अब भी हमारा निवेश है। कुछ साल पहले हमारा कारोबार जितना बड़ा था, आज उतना बड़ा नहीं है और हमारे पास कर्मचारी भी कम हैं। यह बदले हुए निवेश हालात की वजह से है, लंबी अवधि के लिए भारत में निवेश के प्रति हमारी दिलचस्पी की वजह से नहीं।' वहीं इस मसले पर टिप्पणी के लिए अनिल चावला उपलब्ध नहीं थे।
 
डीई शॉ ने अपने वैश्विक पूल से भारत में निवेश किया है। बेहतर दौर में कंपनी ने देश में 200 करोड़ डॉलर का निवेश कर रखा था। हालांकि पिछले कुछ सालों में वह अपने कई प्रमुख निवेशों से बाहर निकल चुकी है और फिलहाल उसका पोर्टफोलियो केवल 40 से 50 करोड़ डॉलर का ही है जिससे वह बाहर निकलने की कोशिश करेगी। डीई शॉ ने 2006 में क्रेस्ट ऐनिमेशन स्टूडियोज में 15 फीसदी हिस्सेदारी खरीदकर देश में कदम रखा था। कंपनी ने यह हिस्सेदारी 40 करोड़ रुपये में खरीदी थी। कंपनी ने सबसे बड़ा सौदा तब किया था जब उसने 2009 में 50 करोड़ डॉलर में डीएलएफ ऐसेट्स लिमिटेड (डीएएल) की 36 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी। 
 
रियल एस्टेट क्षेत्र में अब तक के सबसे मुनाफे वाले सौदों में से एक के तहत डीई शॉ ने केपी सिंह के परिवार के मालिकाना हक वाली कंपनी में अपना निवेश 40 फीसदी मुनाफे पर बेचा था। डीई शॉ ने अमर उजाला पब्लिकेशंस लिमिटेड में भी निवेश किया था मगर बाद में वह प्रवर्तकों के साथ एक कानूनी लड़ाई में फंस गई। कंपनी एफकॉन्स इन्फ्रास्ट्रक्चर और जेमिनी इंडस्ट्रीज से भी बाहर निकल गई। इस हेज फंड ने शिक्षा, अक्षय ऊर्जा, रियल एस्टेट, प्रकाशन, ऐनिमेशन, प्रसारण, आउटसोर्सिंग और सुरक्षा सेवाओं समेत कुछ और प्रमुख क्षेत्रों में निवेश किया है। हालांकि चावला ने पिछले साल एक साक्षात्कार में उन नए क्षेत्रों के बारे में बात की थी जिनमें कंपनी ध्यान देना चाहेगी। इन क्षेत्रों में अस्पताल, अक्षय ऊर्जा, कृषि प्रसंस्करण उद्योग और शिक्षा शामिल हैं। डीई शॉ का रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के साथ भी 50:50 का संयुक्त उपक्रम है जिसकी घोषणा मार्च 2011 में की गई थी। (बीएस) 

पत्रकार रवि पारीख के खिलाफ एफआईआर, न्यूज एक्सप्रेस से हटाए गए

नासिक से खबर है कि रवि पारीख नामक न्यूज एक्सप्रेस के पत्रकार के खिलाफ सरकारवाडी पुलिस स्टेशन में चारसौबीसी का मुकदमा दर्ज किया गया है. रवि पर आरोप है कि उन्होंने किसी दूसरे की कार को कब्जा कर अपना बताना शुरू कर दिया था. पुलिस तक जब बात पहुंची तो पुलिस ने जांच शुरू की. रवि ने कार को अपना बताने के लिए समर्थन में फर्जी दस्तावेज भी तैया करा लिया था. इन दस्तावेजों को उन्होंने पुलिस के सामने पेश कर दिया.

पुलिस ने जब दस्तावेजों की गहनता से छानबीन की तो दस्तावेज फर्जी पाए गए और कार भी किसी दूसरे की निकली. इसके बाद थाने में पुलिस वालों ने रवि पारीख के खिलाफ धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. अपने पत्रकार को कार चोरी के मामले में फंसता देख न्यूज एक्सप्रेस प्रबंधन ने आनन-फानन में रवि पारीख को चैनल से निकाल बाहर किया. रवि की नियुक्ति मुकेश कुमार के कार्यकाल के दौरान की गई थी. न्यूज एक्सप्रेस के महाराष्ट्र स्टेट हेड विवेक अग्रवाल ने रवि पारीख को चैनल के साथ रखे जाने की अनुशंसा की थी. पत्रकार द्वारा दूसरे की कार कब्जा कर चलाने और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के इस मामले की महाराष्ट्र में चर्चा जोरों पर है.

”वेबसाइटों पर निगरानी के लिए नियामक इकाई बने”

 

हैदराबाद : साइबर सुरक्षा से जुड़े एक विशेषज्ञ ने कहा है कि आपत्तिजनक सामग्री के चलते वेबसाइटों पर पूरी तरह रोक लगाने की बजाय ऐसा नियामक तंत्र और कानून बनाना बेहतर रहेगा जिससे कि वेबसाइट तेजी से सरकार को जवाब दे सकें. जाने माने कंप्यूटर सुरक्षा विशेषज्ञ और ऐथकल हैकर अंकित फ़ादिया ने कहा, ‘‘मैं लोकप्रिय सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों को पूरी तरह रोके जाने का समर्थन नहीं करता. अवैध सामग्री के संबंध में सरकार को नियामक प्राधिकरण की स्थापना करनी चाहिए जो इन सभी विभिन्न वेबसाइटों के साथ घनिष्ठता से काम करेगा. जब भी कुछ अनुचित सामग्री पोस्ट की जाएगी, उसे हटा दिया जाएगा.’’
 
उन्होंने कहा कि नियामक तंत्र व्यापक होना चाहिए जिसमें केवल सरकारी प्रतिनिधियों का एकाधिकार नहीं हो. फ़ादिया ने कहा, ‘‘यदि सरकार ऐसा नियामक प्राधिकरण बनाती है जिसमें केवल सरकारी सदस्य शामिल हों तो जनता इसे पसंद नहीं करेगी. इसमें विभिन्न तबकों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. इसमें एक कानूनी विशेषज्ञ, एक तकनीकी विशेषज्ञ होना चाहिए. युवा, पुलिस तथा सरकार का प्रतिनिधित्व होना चाहिए. यह एक मनोनीत समिति हो सकती है और यह प्रत्येक दो या चार साल में बदल सकती है.’’ उन्होंने कहा कि यदि वर्तमान में नहीं है तो एक ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जिससे कि वेबसाइट सरकार को तेजी से जवाब देने के लिए बाध्य हो सकें. (प्रभात खबर)

जी ग्रुप भ्रम फैला रहा है : अमर उजाला

नई दिल्ली : समाचार पत्र प्रकाशित करने वाली कंपनी अमर उजाला समूह विदेशी निजी इक्विटी कंपनी डीई शा की हिस्सेदारी खरीदने की प्रक्रिया में है और बाद में इसे नये निवेशक को बेचने पर विचार करेगी. डीई शा ने 2007 में अमर उजाला पब्लिकेशंस में 18 प्रतिशत हिस्सेदारी 117 करोड़ रुपये में खरीदी थी. बाद में दोनो पक्षों में मतभेद हो गया. मीडिया कंपनी ने आरोप लगाया था कि संबंधित विदेशी निवेशक विदेशी निवेश संबंधी कुछ नियमों का उल्लंघन कर रहा है.

 
हालांकि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया जिसके तहत अमर उजाला डीई शा की हिस्सेदारी खरीदने पर सहमत हुई और विदेशी निजी इक्विटी कंपनी को इससे बाहर निकलने का मौका दिया. इस बारे में संपर्क किये जाने पर समूह के प्रवक्ता ने प्रेट्र से कहा, ‘‘हम डी ई शा की हिस्सेदारी खरीदने की प्रक्रिया में हैं. बाद में हम इसे नये निवेशक को बेचने पर विचार करेंगे.’’ हाल की रिपोर्ट के अनुसार जी समूह अमर उजाला को खरीदने के लिये बातचीत कर रहा है.
 
नीचे अमर उजाला समूह के प्रवक्ता का कहना है कि कंपनी ने डीई शॉ से अपने शेयर खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. प्रक्रिया पूरी होने के बाद इस हिस्सेदारी को किसी नए निवेशक को बेचने के मौके तलाशे जाएंगे. इस संबंध में 4 नवंबर 2012 को एक अन्य कंपनी से हुए कथित एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) के संबंध में प्रवक्ता ने साफ तौर पर कहा कि उस दस्तावेज की कोई कानूनी वैधता नहीं है और न ही उसमें कंपनी के सभी संबंधित पक्षों के हस्ताक्षर हैं. लिहाजा इस संबंध में कंपनी की कोई वैधानिक जिम्मेदारी भी नहीं है. कथित एमओयू सिर्फ एक कागज का टुकड़ा है इसलिए उसमें लिखी बातों का कोई औचित्य नहीं है. कथित एमओयू में प्राथमिक तौर पर एक करार की बात की गई है जिस पर उन सभी संबंधित पक्षों की सहमति और उसके साथ हस्ताक्षर की भी जरूरत होती है जिनके नाम इसमें आए हैं.
 
कथित एमओयू के कानूनी तौर पर गैर बाध्यकारी होने के चलते दिल्ली हाईकोर्ट ने किसी तरह का स्थगन आदेश नहीं दिया बल्कि 31 दिसंबर तक लागू होने वाली कुछ शर्तों के उल्लंघन से बचने को कहा है. हाईकोर्ट के आदेश के बाद ये स्पष्ट है कि अमर उजाला के शेयरों की खरीद और शेयरों की किसी दूसरी कंपनी को बिक्री पर कोई रोक नहीं लगाई गई है. जी समूह द्वारा ये सारी कवायद भ्रम फैलाने के लिए की गई और इसका कोई कानूनी आधार नहीं है.
 
अमर उजाला में प्रकाशित खबर. 
 

पत्रकार रवि पारीख के खिलाफ चार सौ बीसी का मामला दर्ज

 

नाशिक से खबर है कि पत्रकार रवि पारीख के खिलाफ सरकारवाड़ी थाने में आईपीसी की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है. रवि पर आरोप है कि वे किसी दूसरे व्‍यक्ति की कार को अपनी कार बता रहे थे. पुलिस को इस पर शक हुआ तो उसने मामले की जांच की जांच में यह कार किसी और की निकली. बताया जा रहा है कि इस दौरान रवि ने कार के फर्जी एवं जाली दस्‍तावेज भी पुलिस के सामने पेश करने की कोशिश की. 
 
इसके बाद ही पुलिस ने उनके खिलाफ चार सौ बीसी का मामला दर्ज कर लिया. बताया जा रहा है कि रवि पंकज शुक्‍ला के इनपुट हेड रहने के दौरान न्‍यूज एक्‍सप्रेस को स्‍टोरी भेजते थे, इसलिए न्‍यूज एक्‍सप्रेस ने इस घटना के बाद कार्रवाई करते हुए रवि का न्‍यूज एक्‍सप्रेस से किसी भी प्रकार का संबंध समाप्‍त कर दिया है. महाराष्‍ट्र के स्‍टेट हेड विवेक अग्रवाल ने रवि को न्‍यूज एक्‍सप्रेस को सेवा देने की अनुमति दी थी. रवि इसके पहले लेमन टीवी को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 

निखिल एवं रश्मि ने शुरू की नई पारी

 

लोकमत समाचार, औरंगाबाद से इस्तीफा देकर भोपाल पत्रिका ज्वाइन करने वाले निखिल सूर्यवंशी ने एक महीने में ही वहां से भी इस्तीफा दे दिया है और भोपाल में नईदुनिया समूह का अखबार नवदुनिया ज्वाइन कर लिया है। नईदुनिया, इंदौर में अंदरखाने ऐसी खबरें हैं कि सिटी लाइव के वर्तमान प्रभारी को बदला जा सकता है।
 
हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम, दिल्ली से सीनियर कॉपी एडिटर रश्मि शर्मा ने रिजाइन कर दिया है। उन्होंने भारत सरकार के आनलाइन पोर्टल को ज्वाइन कर लिया है।

भोपाल एवं इंदौर में कई लोगों अपने संस्‍थान बदले

 

हिंदुस्तान टाइम्स डॉट कॉम के संपादक विजय थापा ने इस्तीफा दे दिया है। ऐसी खबरें हैं कि वो एबीपी न्यूज ज्वॉइन कर रहे हैं। विजय एचटी के पहले स्टार न्यूज, इंडिया टुडे इं​गलिश और टाइम्स आफ इंडिया में भी अच्छे पदों पर रह चुके हैं।
 
उधर, भास्कर और पत्रिका से संपादकीय विकेट गिरने का सिलसिला जारी है। दैनिक भास्कर, भोपाल के नेशनल न्यूज रूम से निहार रंजन सक्सेना ने रिजाइन कर दिया है। उन्होंने नईदुनिया ज्वाइन कर लिया है। पत्रिका, भोपाल से वागीश मिश्रा ने इस्तीफा देकर नईदुनिया, इंदौर ज्वाइन कर लिया है। उन्हें सेंट्रल डेस्क पर तैनात किया गया है।
 
हिंदुस्तान, दिल्ली के दिल्ली डेस्क से सीनियर सब सागर पाटील ने इस्तीफा देकर नईदुनिया, इंदौर ज्वाइन कर लिया है। डीबी स्टार, इंदौर से रिपोर्टर उदय प्रताप सिंह ने रिजाइन कर दिया है। उन्होंने आईनेक्स्ट में बतौर रिपोर्टर ज्वाइन किया है। ऐसी खबरें हैं कि भारत के मालवांचल और दूसरे संस्करणों से और भी विकेट गिर सकते हैं। 
 
पत्रिका भोपाल और इंदौर संस्करण भी अलर्ट पर हैं और वो अपने लोगों को खुश करने में जुटे हैं। उधर नईदुनिया के लोगों को अपनी खींचने का प्रयास भी जारी रखे हुए हैं। इंदौर सिटी भास्कर के कार्य से डीबीस्टार के स्थानीय संपादक मनोज बिनवाल को रिलीव कर दिया गया है। अब वो केवल डीबीस्टार ही देखेंगे। इंदौर भास्कर में पिछले लगभग एक साल से उथल पुथल का महौल बना हुआ है।

सेबी ने शुरू की सुब्रत राय तथा सहारा पर अभियोजन की प्रक्रिया

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सहारा समूह की दो कंपनियों के खिलाफ अभियोजन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। बाजार नियामक ने आरोप लगाया है कि उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार सहारा समूह तीन करोड़ निवेशकों से संबंधित दस्तावेज मुहैया कराने में असफल रहा है। सेबी ने कहा, 'सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन (एसएचसीआईएल) और उनके प्रवर्तकों-निदेशकों अशोक राय चौधरी, रवि शंकर दुबे, वंदना भार्गव और सुब्रत राय सहारा के खिलाफ अभियोजन की प्रक्रिया शुरू की गई है। 

बाजार नियामक ने कहा कि सहारा ने उच्चतम न्यायालय के 31 अगस्त, 2012 के आदेश के तहत दस्तावेज नहीं दिए हैं। हालांकि सहारा समूह के प्रवक्ता ने सेबी के कदम पर कोई टिप्पणी नहीं की। उधर, सेबी ने निवेशकों की निजी रूप से पहचान के लिए एजेंसियों की नियुक्ति सबंधी निविदा की समयसीमा एक माह के लिए बढ़ा दी है। (एजेंसी)

 

कोर्ट का आदेश- फर्जी इंटरव्यू छापने वाले रिपोर्टर रमन, संपादक भट्टाचार्या, मुद्रक-प्रकाशक दीपक और संजीव को जेल भेजो

: अनन्त कुमार सिंह के झूठे साक्षात्कार के मामले में दोषी पत्रकारों की अपील खारिज : आईएएस अनन्त कुमार सिंह का मनगढ़न्त साक्षात्कार लिखने वाले पत्रकार की सजा बरकरार : श्री पी0एन0 श्रीवास्तव, अपर सत्र न्यायाधीश लखनऊ ने अनन्त कुमार सिंह, तत्कालीन जिलाधिकारी, मुजफ्फरनगर का मनगढ़न्त साक्षात्कार छापने वाले रिपोर्टर रमन किरपाल, सम्पादक ए0के0 भट्टाचार्या, मुद्रक एवं प्रकाशक दीपक मुखर्जी एवं संजीव कंवर के द्वारा अधीनस्थ न्यायालय के कारावास एवं जुर्माने की सजा के विरुद्ध दाखिल अपील अपने निर्णय दिनांक 22.11.2012 के द्वारा निरस्त कर दी है। 

श्री श्रीवास्तव ने अपने निर्णय में कहा है कि अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष मानहानि का मुकदमा दाखिल करने वाले अनन्त कुमार सिंह किसी भी संदेह के परे इस तथ्य को साबित करने में सफल रहे हैं कि अभियुक्त रमन किरपाल ने जो मनगढ़न्त साक्षात्कार लिखा, ए0के0 भट्टाचार्या ने जिसे सम्पादित किया तथा दीपक मुखर्जी एवं संजीव कंवर ने जिसे मुद्रित एवं प्रकाशित किया, वह मानहानिकारक था।  इसे पढ़ने से आमलोगों की नजर में अनन्त कुमार सिंह की ख्याति की अपहानि हुई। यह साक्षात्कार दिल्ली एवं लखनऊ से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘दि पॉयनीयर’ एवं हिन्दी दैनिक ‘स्वतंत्र भारत’ समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था।  न्यायालय ने यह भी पाया है कि अभियुक्तगण यह प्रमाणित करने में पूर्णतया विफल रहे हैं कि उन्होंने अनन्त कुमार सिंह का कोई साक्षात्कार लिया था। अपीलार्थी अभियुक्तों ने पहला अपराध होने के आधार पर प्रोबेशन का लाभ देने का अनुरोध अपीली न्यायालय से किया था, जिसे न्यायालय ने आरोप की गम्भीरता को देखते हुए अस्वीकार कर दिया।

याद दिला दें कि वर्ष 1994 में श्री अनन्त कुमार सिंह का एक साक्षात्कार अंगेजी दैनिक ‘दि पॉयनीयर’ के दिल्ली एवं लखनऊ तथा हिन्दी दैनिक ‘स्वतंत्र भारत’ के लखनऊ संस्करणों में फोटो के साथ ‘‘निर्जन स्थान में कोई भी महिला के साथ बलात्कार करेगा-डी0मए0 मुजफ्फरनगर’’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।  उसी दिन अनन्त कुमार सिंह ने इस साक्षात्कार को झूठा एवं मनगढ़न्त बताते हुए अपना खण्डन इन समाचारपत्रों के सम्पादकों को भेज दिया था।  लेकिन इन लोगों ने यह खण्डन एक सप्ताह तक प्रकाशित नहीं किया और जब किया भी तो काट-छांटकर ‘चिट्ठी-पत्री’ कॉलम में रिपोर्टर के झूठे दावे के साथ जिससे लोगों को यह लगे कि वास्तव में साक्षात्कार हुआ है। इस मनगढ़न्त साक्षात्कार को पढ़कर प्रमुख राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्त्ताओं बुद्धिजीवियों एवं अन्य प्रबुद्धजनों के द्वारा अखबारों, पत्रिकाओं एवं खुले मंचों से श्री ंिसंह की निन्दा की गई।  अपीलार्थियों के इस आपराधिक कृत्य से क्षुब्ध अनन्त कुमार सिंह ने इनके विरुद्ध मुख्य न्यायिक मजिस्ट््रेट लखनऊ के न्यायालय में मुकदमा दाखिल किया।  दोनों पक्षों को सुनने के बाद वर्ष 2007 में श्री सतीश चन्द्रा, विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट््रेट (कस्टम्स) ने रिपोर्टर रमन किरपाल को एक वर्ष की सजा एवं 5 हजार रुपए जुर्माना किया, जबकि सम्पादक घनश्याम पंकज एवं ए0के0 भट्टाचार्या तथा मुद्रक एवं प्रकाशक दीपक मुखर्जी एवं संजीव कंवर को 6-6 माह की कारावास तथा 2-2 हजार रुपए का जुर्माना किया।

मैजिस्ट्रेट के उक्त आदेश के विरुद्ध सभी 5 अभियुक्तों ने अपर जिला जज के न्यायालय में अपील की।  अपील की सुनवाई के दौरान अभियुक्त घनश्याम पंकज की मृत्यु हो चुकी है।  श्री पी0एन0 श्रीवास्तव, अपर जिला जज ने सुनवाई के उपरान्त शेष चार  अपीलार्थियों की अपील खारिज कर जमानत निरस्त करते हुए उन्हें निर्देश दिया है कि वे तत्काल दण्डादेश भुगतने के लिए मजिस्ट्रेट न्यायालय में आत्मसमर्पण करें।  उन्होंने मजिस्ट्रेट को भी यह निर्देश दिया कि यदि अपीलार्थीगण तत्काल आत्मसमर्पण न करें तो वारण्ट द्वारा उपस्थिति सुनिश्चित कराकर उन्हें दण्ड भुगतने के लिए कारागार भेजें। ध्यान रहे कि अनन्त कुमार सिंह की शिकायत पर प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया वर्ष 1996 में इस मनगढ़न्त एवं मानहानिकारक साक्षात्कार को प्रकाशित करने के लिए तीनों समाचारपत्रों की निन्दा कर चुका है।

आईएएस अनंत कुमार सिंह का फर्जी इंटरव्यू छापने में कई पत्रकार जेल जाने से नहीं बच पाएंगे

: Court dismisses appeals of journalists for publishing concocted interview of Anant Kumar Singh : Conviction for publishing concoted interview of Anant Kumar Singh upheld : Journalists to serve jail term for publishing concoted interview of Anant Kumar Singh : Shri P.N. Srivastav, Additional District Judge, TECP-V, Lucknow has dismissed on 22.11.2012 the appeal of Raman Kirpal (reporter), A.K. Bhattacharya (editor), Deepak Mukherjee and Sanjiv Kanwar (printers and publishers) against the conviction order passed by the Court of Chief Judicial Magistrate (Customs) in the year 2007 for publishing a concocted interview of the then District Magistrate Anant Kumar Singh by the sensational title “Any man will rape a woman in a lonely spot: DM, Muzaffarnagar” along with his photographs.

Cancelling the bail of the convicts, the Court has also asked them to surrender before the Magistrate for serving the jail term awarded by the trial court. The appellate Court has also directed the trial court that in case the appellants do not surrender immediately then warrant may be issued to secure their presence for executing the order of the court.

It may be recalled that Raman Kirpal, then a reporter of the Pioneer, New Delhi had written an interview titling “Any man will rape a woman in a lonely spot: DM, Muzaffarnagar” which was published in the New Delhi and Lucknow editions of the English daily newspaper ‘The Pioneer’ and Lucknow edition of Hindi daily  ‘Swatantra Bharat’ in October, 1994 in which the District Magistrate was shown to have said that it is human tendency that when a woman is seen at a lonely place in the jungle, any man will be inclined to rape her. Immediately after the publication, the same day Shri Anant Kumar Singh sent his denial about giving any such interview to Raman Kirpal to the editor of Pioneer A.K. Bhattacharya and chief editor of Swatantra Bharat Ghanshyam Pankaj. Being dissatisfied with the continued criminal act due to non-disclosure of corrects facts by the newspaper, Shri Singh filed 3 defamation cases in the Court of Chief Judicial Magistrate Lucknow.

After 13 years of long drawn criminal trial, in the year 2007, the Magistrate  held Raman Kirpal, A.K. Bhattacharya, Ghanshyam Pankaj, Deepak Mukherjee and Sanjiv Kanwar guilty of defaming Anant Kumar Singh, the then District Magistrate Muzaffarnagar by publishing a false and fabricated interview.   The court awarded the reporter Raman Kirpal one year imprisonment with Rs. 5000 fine and 6 months imprisonment with fine of Rs. 2000 each to other 4 convicts. All the 5 convicts filed separate appeals against the order of the Magistrate. During the pendency of the appeal, one of the appellant Ghanshyam Pankaj died.

After hearing both the parties of the appeal, Judge Shri P.N. Srivastav held that Shri Anant Kumar Singh has proved beyond reasonable doubt that the interview written and published by the appellants have lowered his reputation in the eyes of common man while the appellants have failed to produce any evidence which may even suggest that the reporter has taken the interview of Shri Singh. Taking into account the gravity of the offence, the appellate court refused to give the appellants the benefit of probation under the Probation of First Offenders Act.

It may be further recalled that on a separate complaint filed before the Press Council of India in this case by Shri Singh, the Press Council had, in February, 1996, also censured these 3 newspapers for their misconduct.

क्या वाकई राज एक्सप्रेस में ऐसी स्थिति है?

भड़ास को एक पत्र मिला है. इस पत्र में राज एक्सप्रेस अखबार में कार्यरत कर्मियों की खराब हालत के बारे में जानकारी दी गई है. मध्यम और छोटे दर्जे के अखबारों में काम के हालात कैसे हैं और शोषण किस तरह होता है, यह कोई नई बात नहीं है. पर दुर्भाग्य यह कि इसमें काम करने वाले लोग भी खुलकर विरोध नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें भी येनकेन प्रकारेण पैसे चाहिए और परिवार चलाना है. इसी पापी पेट के कारण लोग अपनी नैतिकता, सरोकार, विचार सब भूल जाते हैं और अंततः जो नतीजा सामने आता है वो ये कि हम सब लूट तंत्र के खामोश या सक्रिय हिस्से बन जाते हैं. पत्र यहां इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि राज प्रबंधन संज्ञान ले और चीजों को दुरुस्त करे. एडिटर, भड़ास4मीडिया

संपादक, भड़ास4मीडिया, विषय : मध्यप्रदेश में संचालित समाचार पत्र राज एक्सप्रेस के समस्त ब्यूरो कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारियों एवं रिपोटर्स की बदहाल स्थिति की जानकारी देने हेतु। श्रीमान्, वर्तमान समय में राज एक्सप्रेस समाचार पत्र प्रबंधन द्वारा प्रदेश भर के ब्यूरो कार्यालयों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। कार्यालयों में काम करने वालों को किसी भी प्रकार का वेतन नहीं दिया जा रहा है। राज प्रबंधन द्वारा सभी ब्यूरो ठेके पर संचालित किये गये हैं। इसके चलते इसमें काम करने वाले रिपोर्टरों की आर्थिक स्थिति खराब हो चली है। इसके अलावा राज एक्सप्रेस के मालिक के सनकीपन के चलते आये दिन तरह तरह के निर्णय लेकर कर्मचारियों को परेशान किया जा रहा है। हालत यह है कि राज एक्सप्रेस की इन्हीं नीतियों के चलते अब ज्यादातर ब्यूरो कार्यालय से कर्मचारी काम छोड़ रहे हैं। आगामी 30 नवम्बर को राज प्रबंधन द्वारा नये ब्यूरोचीफ की तलाश के लिए मीटिंग भी बुलाई जा रही है। आप से अनुरोध है कि उक्त समस्या को लेकर भडास4मीडिया पर समाचार प्रकाशित करें।

धन्यवाद।

भवदीय

राज प्रबंधन में कार्यरत एक कर्मचारी

बाल ठाकरे की सुरक्षा में भारी खामियां खोजी थी हेडली ने

 

मुंबई पर आतंकी हमलों की साजिश रचने वाले डेविड हेडली ने आतंकवादियों से कहा था कि बाल ठाकरे बहुत आसान निशाना हैं। हेडली ने 2008 में बांद्रा स्थित मातोश्री के आसपास भी छानबीन की थी। यह राजफ़ाश पत्रकार हुसैन जैदी ने अपनी जल्द प्रकाशित होने वाली किताब 'हेडली ऐंड आई' में किया है।
 
जैदी की किताब महेश भट्टे के बेटे राहुल भट्ट और लश्कर के आतंकवादी डेविड हेडली की दोस्ती पर आधारित है। मुंबई में आतंकी हमलों के लिए निशानदेही करने आए हेडली के मित्र रहे हैं। अपनी किताब में जैदी ने विस्तार से बताया है कि हेडली ने शिव सैनिक और जिम इंस्ट्रक्टर विलास की मदद से बाल ठाकरे के घर मातोश्री की पूरी छानबीन की थी।
 
पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी हेडली दक्षिण मुंबई के एक जिम में अक्सर आता-जाता था। यहीं उसकी मुलाकात राहुल भट्ट और विलास से हुई थी। जैदी ने लिखा है कि हेडली ने मातोश्री की भारी सुरक्षा में कई खामियां खोज ली थीं।
 
जैदी की यह किताब हफ्ते भर में बाजार में आ जाएगी। इसके बारे में पीटीआई से बात करते हुए जैदी ने बताया कि किताब में हेडली के वे बयान भी हैं जो उसने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को शिकागो में दिए थे। जैदी बताते हैं कि हेडली ने ठाकरे का फैन होने के बहाने 15 मिनट तक मातोश्री में तस्वीरें खींची थीं।
 
मातोश्री घूमने के बाद हेडली ने राहुल भट्ट से कहा था कि बाल ठाकरे बहुत आसान निशाना है। हेडली ने कहा, "थोड़े से जुनूनी लोग आराम से सुरक्षा भेद कर ठाकरे तक पहुंच सकते हैं। मुझे समझ नहीं आया कि पुलिस उस सुरक्षा व्यवस्था पर इतना गर्व क्यों करती है।" 
 
2008 में पाकिस्तान के इस्लामाबाद में होटल मेरियट पर हमले की खबर को देखते हुए उसने राहुल से कहा था कि तुम देखना एक दिन मुंबई पर भी ऐसा ही हमला होगा।
 
सुरक्षा से संबंधित मुद्दों में इतनी रुचि दिखाने वाले हेडली के इरादों से राहुल आखिर वक्त तक अंजान थे। 10 नवंबर, 2008 यानी मुंबई हमले से 16 दिन पहले उसने सेटेलाइट फोन की मार्फत राहुल से संपर्क किया। फोन पर उसने राहुल को हिदायत दी थी कि वह कुछ दिनों तक दक्षिण मुंबई की तरफ न जाए।
 
26/11 के बाद दिसंबर महीने में उसने राहुल को फिर से फोन कर उसके व उसके परिवार के सुरक्षित होने की जानकारी ली और यह भी बताया कि उसे हमले के बारे में पहले से जानकारी थी।
 
हेडली ने लाहौर में गोल्फ खेलने का प्रशिक्षण लिया था। इस बहाने उसने महालक्ष्मी स्थित विलिंगटन गोल्फ क्लब के कई चक्कर लगाए। हमले की जांच शुरू होने के बाद फोन काल्स की जानकारी मिलते ही राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनआईए) ने राहुल को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था। 
 
मातोश्री के बाद हेडली दादर स्थित शिवसेना मुख्यालय शिवसेना भवन भी गया। उसने वहां मौजूद जनसंपर्क अधिकारी राजाराम रेगे से मुलाकात की थी। रेगे ने हेडली के साथ मिलकर कारोबार करने की योजना भी बनाई थी। इसे लेकर दोनों ने एक-दूसरे को कई ई-मेल भेजे थे।
 
दहशतवाद फैलाने के अपने मिशन को कामयाब बनाने के लिए हेडली महानगर के  सिद्धिविनायक मंदिर भी गया था। तब राहुल और विलास भी उसके साथ मौजूद थे।  उसने मंदिर से कुछ धागे भी खरीदे। उसमें से एक धागा मुंबई हमले के समय पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब की कलाई पर भी बंधा हुआ देखा गया था। इस दौरान राहुल और हेडली के बीच अच्छे संबंध बन गए थे। (एजेंसियां)
 

 

मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता पुरस्‍कार के लिए प्रविष्ठियां आमंत्रित

 

मेवाड़ संस्थान, सैक्टर 4सी, वसुन्धरा, गाजियाबाद में प्रत्येक वर्ष की भांति सोमवार, 24 दिसम्बर, 2012 को दोपहर 2:30 बजे महामना मदन मोहन मालवीय जयंती के उपलक्ष में आठवां पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह का आयोजन किया जा रहा है। पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार में हिन्दी व अंग्रेजी (प्रिन्ट/टी.वी./इन्टरनेट) संवाददाता के अतिरिक्त फीचर राइटर, कार्टूनिस्ट, फोटोग्राफर/कैमरामैन आदि जो गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, एनसीआर आदि क्षेत्रों में कार्यरत है उन्हें प्रोत्साहन पुरस्कार द्वारा सम्मानित एवं पुरस्कृत करने के लिए नांमाकित किया जायेगा।
 
पत्रकार अपने लेख, कृतियों के साथ 16 दिसम्‍बर तक संपर्क कर सकते हैं। आवेदक का एनसीआर (गाजियाबाद, वैशाली, वसुंधरा, कौशाम्‍बी एवं इंद्रापुरम, नोएडा, फरीदाबाद, गुडगांव) से जुड़ा होना चाहिए। फ्रीलांसर भी आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के साथ जीवन वृत्‍त, फोटो, आईडी तथा अपने लेख भेजें। पत्रकार अपना आवेदन निम्‍न पते पर भेज सकते हैं या ई मेल कर सकते हैं। 
 
डॉ. मारिया हसीन, असिस्टेंट डायरेक्टर, प्लेसमेन्टस एण्ड पी.आर.
 
सैक्टर-4सी, वसुन्धरा, गाजियाबाद-201012
 
दूरभाष: 95120-2698218, 19, 20,  
 
ई-मेल: mim@mimcs.com

48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला (भाग चार)

संसद का मानसून सत्र समाप्त हो चुका है. कोयले घोटाले की आंच ने सरकार को संसद में बैठने नहीं दिया. 1.86 लाख करोड़ के घोटाले ने हर भारतीय के दिमाग की नसें हिला दी है. पहली बार किसी ने इतने बड़े घोटाले के बारे में पढ़ा है. इस बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और जनमानस भी इससे काफी वाकिफ हो चुका है. लेकिन इन सबके बीच एक और घोटाला ऐसा हुआ है जिसके बारे में व्यापक जनमानस अब तक अनजान ही है. ये एक ऐसा घोटाला है जिसमें हुई क्षति वैसे तो लगभग अमूल्य ही है लेकिन कहने के लिए द्रव्यात्मक तरीके से ये करीबन 48 लाख करोड़ का पड़ेगा. प्रो कल्याण जैसे सचेत और सचेष्ट नागरिकों के प्रयास से ये एकाधिक बार ट्विट्टर पर तो चर्चा में आया लेकिन व्यापक जनमानस अभी भी इससे अनजान ही है. 

 
ये घोटाला है थोरियम का-परमाणु संख्या 90 और परमाणु द्रव्यमान 232.0381.इस तत्व की अहमियत सबसे पहले समझी थी प्रो भाभा ने. महान वैज्ञानिक होमी जहागीर भाभा ने 1950 के दशक में ही अपनी दूर-दृष्टि के सहारे अपने प्रसिद्ध-“Three stages of Indian Nuclear Power Programme” में थोरियम के सहारे भारत को न्यूक्लियर महा-शक्ति बनाने का एक विस्तृत रोड-मेप तैयार किया था. उन दिनों भारत का थोरियम फ्रांस को निर्यात किया जाता था और भाभा के कठोर आपत्तियों के कारण नेहरु जी ने उस निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया. भारत का परमाणु विभाग आज भी उसी त्रि-स्तरीय योजना द्वारा संचालित और निर्धारित है. एक महाशक्ति होने के स्वप्न के निमित्त भारत के लिए इस तत्व (थोरियम) की महत्ता और प्रासंगिकता को दर्शाते हुए प्रमाणिक लिंक निचे है-
 
 
 
अब बात करते है थोरियम घोटाले की. वस्तुतः बहु-चर्चित भारत-अमेरिकी डील भारत की और से भविष्य में थोरियम आधारित पूर्णतः आत्म-निर्भर न्यूक्लियर शक्ति बनने के परिपेक्ष्य में ही की गयी थी. भारत थोरियम से युरेनियम बनाने की तकनीक पर काम कर रहा है लेकिन इसके लिए ३० वर्षों का साइकिल चाहिए. इन तीस वर्षो तक हमें यूरेनियम की निर्बाध आपूर्ति चाहिए थी. उसके बाद स्वयं हमारे पास थोरियम से बने यूरेनियम इतनी प्रचुर मात्र में होते की हम आणविक क्षेत्र में आत्म-निर्भरता प्राप्त कर लेते. रोचक ये भी था की थोरियम से यूरेनियम बनने की इस प्रक्रिया में विद्युत का भी उत्पादन एक सह-उत्पाद के रूप में हो जाता (http://www.world-nuclear.org/info/inf62.html). एक उद्देश्य यह भी था कि भारत के सीमित यूरेनियम भण्डारों को राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आणविक-शश्त्रों के लिए आरक्षित रखा जाये जबकि शांति-पूर्ण उद्देश्यों यथा बिजली-उत्पादन के लिए थोरियम-यूरेनियम मिश्रित तकनीक का उपयोग हो जिसमें यूरेनियम की खपत नाम मात्र की होती है. शेष विश्व भी भारत के इस गुप्त योजना से परिचित था और कई मायनों में आशंकित ही नहीं आतंकित भी था. उस दौरान विश्व के कई चोटी के आणविक वेबसाइटों पर विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों के बीच की मंत्रणा इस बात को प्रमाणित करती है. सुविधा के लिए उन मंत्रनाओ में से कुछ के लिंक नीचे दे रहा हूँ-   
 
 
 
 
किन्तु देश का दुर्भाग्य की महान एवं प्रतिभा-शाली वैज्ञानिकों की इतनी सटीक और राष्ट्र-कल्याणी योजना को भारत के भ्रष्ट-राजनीति के जरिये लगभग-लगभग काल-कलवित कर दिया गया. आशंकित और आतंकित विदेशी शक्तियों ने भारत की इस बहु-उद्देशीय योजना को विफल करने के प्रयास शुरू कर दिए और इसका जरिया हमारे भ्रष्ट और मूर्ख राजनितिक व्‍यवस्‍था को बनाया. वैसे तो १९६२ को लागू किया गया पंडित नेहरु का थोरियम-निर्यात प्रतिबन्ध कहने को आज भी जारी है. किन्तु कैसे शातिराना तरीके से भारत के विशाल थोरियम भंडारों को षड़यंत्र-पूर्वक भारत से निकाल ले जाया गया!! दरअसल थोरियम स्वतंत्र रूप में रेत के एक सम्मिश्रक रूप में पाया जाता है, जिसका अयस्क-निष्कर्षण अत्यंत आसानी से हो सकता है. थोरियम की यूरेनियम पर प्राथमिकता का एक और कारण ये भी था की क्यूंकि खतरनाक रेडियो-एक्टिव विकिरण की दृष्टि से थोरियम यूरेनियम की तुलना में कही कम (एक लाखवां भाग) खतरनाक होता है, इसलिए थोरियम-विद्युत-संयंत्रों में दुर्घटना की स्थिति में तबाही का स्तर कम करना सुनिश्चित हो पाता. विश्व भर के आतंकी-संगठनों के निशाने पर भारत के शीर्ष स्थान पर होने की पृष्ठ-भूमि में थोरियम का यह पक्ष अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक था. साथ ही भारत के विशाल तट-वर्ती भागों के रेत में स्वतंत्र रूप से इसकी उपलब्धता यूरेनियम के भू-गर्भीय खनन से होने वाली पर्यावरणीय एवं मानवीय क्षति की रोकथाम भी सुनिश्चित करती थी. 
 
कुछ २००८ के लगभग का समय था. दुबई स्थित कई बड़ी रियल-स्टेट कम्पनियां भारत के तटवर्ती इलाको के रेत में अस्वाभाविक रूप से रूचि दिखाने लगी. तर्क दिया गया कि अरब के बहुमंजिली गगन-चुम्बी इमारतों के निर्माण में बजरी मिले रेत की जरुरत है. असाधारण रूप से महज एक महीने में आणविक-उर्जा-आयोग की तमाम आपत्तियों को नजरअंदाज करके कंपनियों को लाइसेंस भी जारी हो गए. थोरियम के निर्यात पर प्रतिबन्ध था किन्तु रेत के निर्यात पर नहीं. कानून के इसी तकनीकी कमजोरी का फायदा उठाया गया. इसी बहाने थोरियम मिश्रित रेत को भारत से निकाल निकाल कर ले जाया जाने लगा. या यूँ कहें रेत की आड़ में थोरियम के विशाल भण्डार देश के बाहर जाने लगे. हद तो ये हो गयी कि जितने कंपनियों को लाइसेंस दिए गए उससे कई गुना ज्यादा बेनामी कम्पनियाँ गैर-क़ानूनी तरीके से बिना भारत सरकार के अनुमति और आधिकारिक जानकारी के रेत का खनन करने लगी. इस काम में स्थानीय तंत्र को अपना गुलाम बना लिया गया. भारतीय आणविक विभाग के कई पत्रों के बावजूद सरकार आँख बंद कर सोती रही. विशेषज्ञों के मुताबिक इन कुछ सालों में ही ४८ लाख करोड़ का थोरियम निकाल लिया गया. भारत के बहु-नियोजित न्यूक्लियर योजना को गहरा झटका लगा लेकिन सरकार अब भी सोयी है.
 
अब आते है इसी थोरियम से सम्बंधित एक और मसले पर- राम-सेतु से जुड़ा हुआ. दरअसल अमेरिका शुरू से ही जानता था कि भारत के उसके साथ परमाणु करार की असल मंशा इसी थोरियम आधारित तीसरे अवस्था के आणविक-आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना है. पूरे विश्व को पता था कि थोरियम का एक बहुत बड़ा हिस्सा भारत के पास है. लेकिन फिर थोरियम पर नासा के साथ यूएस भूगर्भ संस्‍थान के नए सर्वे आये. पता चला कि जितना थोरियम भारत के पास अब तक ज्ञात है उससे कही ज्यादा थोरियम भंडार उसके पास है. इन नवीन भंडारों का एक बहुत बड़ा हिस्सा राम-सेतु के नीचे होने का पता चला. इस सर्वे को शुरुआत से ही गुप्त रखा गया और किसी अंतर-राष्ट्रीय मंच पर इसका आधिकारिक उल्लेख नहीं होने दिया गया. किन्तु गाहे-बगाहे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों में आणविक-विशेषज्ञ, परमाणु वैज्ञानिक "ऑफ दी रिकॉर्ड" इन सर्वे की चर्चा करने लगे. अभी हाल में थोरियम-सम्बन्धी मामलों में सबसे चर्चित और प्रामाणिक माने जाने वाली और थोरियम-विशेषज्ञों द्वारा ही बनायीं गयी साईट- http://thoriumforum.com/reserve-estimates-thorium-around-world  में पहली बार लिखित और प्रामाणिक तौर इस अमेरिकी सर्वे के नतीजे पर रखे गए. इस रिपोर्ट में साफ़ बताया गया है कि अमेरिकी भूगर्भीय सर्वे संस्थान ने शुरुआत में भारत में थोरियम की उपलब्धता लगभग 290000 मीट्रिक टन अनुमानित की थी. किन्तु बाद में इसने इसकी उपलब्धता दुगुनी से भी ज्यादा लगभग 650000 नापी जो कुल थोरियम भंडार 1650000 मीट्रिक टन का लगभग40% है. इस तरह अमेरिका मानता है कि भारत के पास थोरियम के 290000 से 650000 मीट्रिक टन के भंडार है. रिपोर्ट के मुताबिक अतिरिक्त 360000 मीट्रिक थोरियम में से ज्यादातर राम सेतु के नीचे है. लेकिन इस रिपोर्ट को कभी आधिकारिक रूप से जारी नहीं किया गया है.  
 
दरअसल भारत के पास इतने बड़े थोरियम भंडार को देख कर अमेरिकी प्रशासन के होश उड़ गए थे. भारत के पास पहले से ही थोरियम के दोहन और उपयोग की एक सुनिश्चित योजना और तकनीक के होने और ऐसे हालात में भारत के पास प्रचुर मात्र में नए थोरियम भण्डारों के मिलने ने उसकी चिंता को और बढ़ा दिया. इसलिए इसी सर्वे के आधार पर भारत के साथ एक मास्टर-स्ट्रोक खेला गया और इस काम के लिए भारत के उस भ्रष्ट तंत्र का सहारा लिया गया जो भ्रष्टता के उस सीमा तक चला गया था जहाँ निजी स्वार्थ के लिए देश के भविष्य को बहुत सस्ते में बेचना रोज-मर्रा का काम हो गया था. इसी तंत्र के जरिये भारत में ऐसा माहौल बनाने की कोशिश हुई की राम-सेतु को तोड़ कर यदि एक छोटा समुंद्री मार्ग निकला जाये तो भारत को व्यापक व्यापारिक लाभ होंगे, सागरीय-परिवहन के खर्चे कम हो जायेंगे. इस तरह के मजबूत दलीलें दी गयी और हमारी सरकार ने राम-सेतु तोड़ने का बाकायदा एक एक्शन प्लान बना लिया. अप्रत्याशित रूप से अमेरिका ने इस सेतु को तोड़ने से निकले मलबे को अपने यहाँ लेना स्वीकार कर लिया, जिसे भारत सरकार ने बड़े आभार के साथ मंजूरी दे दी. योजना मलबे के रूप में थोरियम के उन विशाल भण्डारो को भारत से निकाल ले जाने की थी. अगर मलबा अमेरिका नहीं भी आ पता तो समुंद्री लहरें राम-सेतु टूट जाने की स्थिति में थोरियम को अपने साथ बहा ले जाती और इस तरह भारत अपने इस अमूल्य प्राकृतिक संसाधन का उपयोग नहीं कर पाता.
 
लेकिन भारत के प्रबुद्ध लोगों तक ये बातें पहुंच गयी. गंभीर मंत्रनाओं के बाद इसका विरोध करने का निश्चय किया गया और भारत सरकार के इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर हुई. किन्तु एक अप्रकाशित और इसलिए अप्रमाणिक, उस पर भी विदेशी संस्था के रिपोर्ट के आधार पर जीतना मुश्किल लग रहा था. और विडंबना यह थी कि जिस भारत सरकार को ऐसी किसी षड़यंत्र के भनक मात्र पे समुचित और विस्तृत जाँच करवानी चाहिए थी, वो अच्छा लगा कि DAE ने मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेने और खंडन करने का कष्ट तो उठाया। हालांकि उस जैसी प्रतिष्ठित संस्था का गलत और भ्रामक तथ्यों के साथ आना कचोट भी गया. हालांकि दोषी का अपने बचाव में झूठ कहना जग की रीत है- इस आधार पर DAE को माफ़ी दी जा सकती है. अपने तमाम झूठ और गलत बयानी के बावजूद मेरी बधाई DAE को इसलिए भी है की उसने संवेदनशीलता का परिचय तो दिया ही है. वरना इन दिनों सरकारी संस्थाएं तो इतनी दुस्साहसी और ढीठ हो चुकी है कि अदालतों के आदेश बे-असर साबित हो रहे हैं, मीडिया रिपोर्ट की तो बात ही क्या!!! 
 
तो अणु शक्ति भवन, सी एस एम् मार्ग (DAE का आधिकारिक पता) से 19 अक्टूबर,2012 को जारी अपने दो पन्नो के प्रेस रिलीज़ (http://www.dae.nic.in/writereaddata/pr070512.pdf) में DAE एक तरह से देश को आश्वस्त करता है की थोरियम लूट पर आ रही मीडिया रिपोर्ट गलत है, अफवाह-जनक है- ऐसी कोई लूट इस देश में नहीं हुई। और देश के विशाल थोरियम भण्डार बेहद सुरक्षित और भरोसेमंद निगरानी में है।
 
यहाँ ये बेहद रोचक है की किस तरह DAE ने अपने इस प्रेस रिलीज़ में बड़ी चालाकी और सफाई से उन बिन्दुओं से बचने का प्रयास किया है जो उसके लिए जरा भी परेशानी का सबब बन सकती है और आधे-सच के जरिये देश के सामने एक ऐसी तस्वीर रखने की कोशिश की है जहां सब कुछ ठीक है -जबकि हकीकत में ऐसा है नहीं. इसलिए ठीक 30 दिनों बाद इस प्रेस रिलीज़ के जवाब में DAE को मेरा ये पत्र उसे को "सफाई" के बदले "सच्चाई" के साथ आने के आग्रह के साथ है- 


 

सेवा में,

 
जन-जागरूकता विभाग
 
आणविक- उर्जा विभाग
 
अणु-शक्ति भवन
 
सी एस एम् मार्ग,
 
मुंबई-  400 001 
 
विषय: विभाग से 19 अक्टूबर,2012 को जारी (पत्रांक- 13(1)/2012-13/PAD-PR ) प्रेस रिलीज़ के सम्बन्ध में।
 
महाशय,
 
अच्छा लगा की DAE ने मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेने और खंडन करने का कष्ट उठाया। हालांकि उस जैसी प्रतिष्ठित संस्था का गलत और भ्रामक तथ्यों के साथ आना कचोट भी गया।
 
उम्मीद करता हूँ मेरे इस पत्र में नीचे उठाये गए सिलसिलेवार  प्रेक्षणों/ जिज्ञासाओं और आपत्तियों का स्पष्ट,तथ्यात्मक और  संतुष्टिजनक उत्तर देकर देकर DAE को लेकर मेरी अब तक की कायम हुई राय को गलत साबित करेंगे।
 
1. इस प्रेस रिलीज़ के पहले पैराग्राफ में DAE कहता है-
 
"Recently, some sections of the media have alleged that private companies have been allowed to export millions of tons of monazite, and that India has lost large quantities of thorium, worth several lakhs of crores of rupees, through such export. This information is not true "
 
ऐसा लगता है यहाँ DAE. मीडिया को पूरी तरह से गैरजिम्मेदार बताने के शायद कुछ ज्यादा ही जल्दी में है। मीडिया रिपोर्ट्स में ऐसा कहीं नहीं कहा गया है की थोरियम या मोनाजयीट के निर्यात की अनुमति दी गयी है। लगभग सारे मीडिया रिपोर्ट्स इसी बात की ताकीद करते रहे हैं की बहुमूल्य थोरियम को दुर्लभ-मृदा-तत्वों जिन्हें रेत-खनिज भी कहा जाता है- उनके खनन के लिए मिले लाइसेंस के आड़ में अवैध रूप से निकला जा रहा है और उन्ही  दुर्लभ-मृदा-तत्वों के नाम पर देश से निकाल बाहर भी ले जाया जा रहा है। 
 
2. उसी तरह दुसरे पैराग्राफ का एक अंश है:
 
"“Of these, monazite is defined as a ‘prescribed substance’ under the Atomic Energy Act, 1962 (AE Act) as amended in 2006 (Notified in the Gazette of India (57), dated January 20, 2006)”                    
 
DAE यहाँ ये छुपाने की कोशिश करता नज़र आता है की जिस संशोधन का जिक्र वो यहाँ कर रहा है,पुरे थोरियम लूट के मामले में यही संशोधन सबसे ज्यादा सवालों के दायरे में है (ज्यादा जानने के लिए पिछले लेख पढ़े)। DAE को यहाँ ये बताना चाहिए की अपने 40 सालों  के इतिहास में पहली बार भारतीय आणविक अधिनियम,1962 के "अधिसूचित-तत्वों" की सूचि में ये बदलाव किन कारणों और प्रयोजन से किये गए। थोरियम हमारे यहाँ तटवर्ती-रेत में  बहुलता से प्राप्य है . हमारी त्रि-स्तरीय आणविक योजना में थोरियम की महत्ता का बोध होते ही थोरियम-निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। लेकिन थोरियम के हमारे विशाल तटवर्ती क्षेत्र-जो पूर्वी तटों से लेकर केरल के पश्चिमी तटों तक फैले हैं; के रेत में प्रचुर बहुलता और नैसर्गिक उपलब्धता को देखते हुए ये संभावना बनी हुई थी की थोरियम का रेत के आड़ में दोहन और निर्यात हो। इसी संभावना को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमन्त्री और हमारे परमाणु कार्यक्रमों के जनक एवं रचियता डॉ भाभा ने पुरे तटवर्ती-रेत (beach-sand) को ही अधिसूचित-सूचि (prescribed substance list) में डालने का निश्चय किया था।इसलिए DAE को यह स्पष्ट करना चाहिए की अब परिस्थितियों में वें कौन से परिवर्तन आ गएँ हैं जिन्होंने … को ये सोचने को बाध्य किया की ऐसी संभावना (रेत के नाम पर थोरियम का दोहन) अब समाप्त हो गयी है और इस तरह उसने ऐसे संसोधन को मान्यता दे दी जिसमे तटवर्ती-रेत को इस सूचि से बाहर कर दिया गया !!!
 
3. उसी तरह पैराग्राफ 3 और 4 कहते हैं –
 
 ““DAE has not issued any licence to any private entity either for production of monazite, or for its downstream processing for extracting thorium, or the export of either monazite or thorium. Export of the beach sand minerals (not monazite), falls under Open General Licence and does not require any authorisation from DAE.
 
Since the other beach sand minerals and monazite (which contains thorium) occur together, companies   handling beach sand minerals have to get a licence under the Atomic Energy (Radiation Protection) Rules 2004 from the Atomic Energy Regulatory Board (AERB). As per the licensing conditions, the licencee, after separating the beach sand minerals has to dispose of the tailings, which contain monazite, within its company premises or as backfill, depending on the monazite content. These
 
institutions are under strict regulatory control. They send quarterly reports to AERB stating the amount of tailings disposed of safely either in the premises or as backfill. Inspectors from AERB survey these areas to ensure that the licensing conditions are met. Export of monazite without a licence from AERB is a violation of the Atomic Energy (Radiation Protection) Rules 2004.”
 
ये बेहद अफसोसजनक है की DAE के इन दावों के बावजूद की जनरल लाइसेंस धारक कंपनियों द्वारा निष्कर्षित सारा थोरियम IREL को वापस जमा कराया गया है, जमीनी हकीकत इस दावे की ताकीद नहीं करती है। कई IREL अधिकारियों का ने ये स्वीकारा है की इन कंपनियों के विशाल लाइसेंस क्षेत्र और अत्यधिक खनन ने थोरियम निष्कर्षण के निगरानी को इतना दुसाध्य कर दिया है की व्यावहारिकता में उन्हें पूरी तरह इन कंपनियों द्वारा उपलब्ध करवायी गयी जानकारी पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
 
आगे कहा जाये तो इन कंपनियों ने अब तक दसियों लाखो टन रेत के निर्यात के आकडे आधिकारिक रूप से जारी किये है। इसलिए 9-10 % की थोरियम उपलब्धता के आधार पर कम से कम 1,90,000 टन के थोरियम उपरोक्त दावे के अनुसार IREL के पास जमा किये गए होंगे। क्या DAE राष्ट्र को आश्वस्त कर सकता है की IREL में इतना थोरियम पिछले सालों में इन कंपनियों से लेकर  IREL के पास वापस जमा करवाए गए ????
 
4. उसी तरह अंतिम पैराग्राफ कहता है :
 
“The information available in IAEA documents, about the national nuclear programmes of different countries, does not give any indication that any country, other than India, is planning significant use of thorium either in the reactors currently under operation or in those being considered for deployment in the near future. Hence, it is unlikely that there is a demand overseas for large amounts of thorium.”
 
ऐसा प्रतीत होता है की या तो DAE के सुचना के स्रोत अधूरे हैं या अयोग्य। पिछले सालों में थोरियम को लेकर अंतर-राष्ट्रिय परिदृश्य में बेहद गतिशीलता दर्ज की गयी है। इस सम्बन्ध में एक गूगल सर्च भी आँखें खोलने वाला सिद्ध हो सकता हैं। सुविधा के लिए कुछ लिंक निचे भी दिए गए हैं-
 
 
 
 
 
इन्टरनेट तक पर आसानी से दिखने वाली इन गतिविधियों के आलोक में, DAE क्या अज्ञानता और असजगता के इस अवस्था से बाहर आएगा और उपयुक्त और सक्षम अधिकरण के सम्मक्ष इन चिंताओं को रखने का साहस और कष्ट रख पायेगा?? साथ ही क्या DAE विश्व-परिदृश्य पर चल रही इन सारी संदिग्ध गतिविधियों के संभावित "भारतीय- सम्बन्ध" को समग्र और समुचित रूप से जांच को भी सुनिश्चित करेगा??
 
उपरलिखित  बिन्दुओं पर DAE की तरफ से जल्द ही जवाब आने के आशाओं के साथ
 
आपका विश्वासी
 
अभिनव शंकर


जारी…. 

 
अन्‍य भागों को पढ़ने के लिए पर क्लिक करें –  48 लाख करोड़ का थोरियम घोटाला (भाग तीन)
 
लेखक अभिनव शंकर प्रोद्योगिकी में स्नातक हैं और फिलहाल एक स्विस बहु-राष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं.

आज के फिल्मवाले ‘सूफी’ का मतलब भी समझते हैं क्या..? (इंटरव्‍यू)

: जाने-माने कव्वाल वारसी भाइयों से खास मुलाकात : कव्वाली की 850 साल की विरासत को सहेजने वाले हैदराबाद के वारसी घराने के प्रतिनिधि नजीर अहमद खान वारसी और नसीर अहमद खान वारसी को हिंदी फिल्मों में कव्वाली पेश करने के अंदाज पर एतराज है। 2010 में उपराष्ट्रपति मुहम्मद हामिद अंसारी के हाथों संगीत नाटक अकादमी अवार्ड पा चुके और देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों पर अपनी कव्वाली पेश करने वाले दोनो भाई फिल्मों में सिर्फ वहीं कलाम गाना चाहते हैं जहां पेश करने का अंदाज भी सलीके का हो। स्पिक मैके के कार्यक्रम में 5 नवंबर 2012 को भिलाई आए वारसी भाइयों ने स्टील क्लब में अपने प्रोग्राम से ठीक पहले मोहम्‍मद जाकिर हुसैन से की दिल की बातें।  

 
– आपके खानदान में कव्वाली का साथ कब से है? 
 
हमारे खानदान में कव्वाली का चलन ख्वाजा गरीब नवाज अजमेरी के दौर यानि करीब 850 साल से चल रहा है। हजरत अमीर खुसरो ने जो अपने शागिर्दों को सिखाया, हमारा घराना उन्हीं शागिर्दों की पीढ़ी से ताल्लुक रखता है। उन्ही के शिष्यों की औलादों में हम लोग हैं। हमारे बड़े बुजुर्ग दरगाहों-खानकाहों में भी गाते थे और बादशाहों के पास भी रूहानियत की महफिल सजाते थे। हमारे पूर्वजों मे बड़े दादा मियां एतमाद-उल-मुल्क तानरस खां साहब हुए हैं। उन्हें तानरस का खिताब मुगल बादशाह बहादुर शाह जफ़ऱ ने दिया था। वो हजरत निजामुद्दीन औलिया में गाते भी थे। हमारे ही खानदान के अल्लामा-ए-मौसिक़ी मुहम्मद सिद्दीक खान साहब हैदराबाद के निजाम के शाही गायक थे। हमारे खानदान में सूफी और क्लासिकल दोनों की रिवायत है। हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी अपने दौर के बड़े सूफी कव्वाल हुए हैं। वहीं हमारे वालिद उस्ताद जहीर अहमद खां वारसी ने भी कव्वाली को नई ऊंचाइयां बख्शी। आज हम दोनों भाई इस दौर की नुमाइंदगी कर रहे हैं। हम अपने तौर पर और स्पिक मैके की ओर से नई जनरेशन को पूरे हिंदुस्तान में घूम-घूम कर अपनी मिट्टी की तहजीब से रूबरू करा रहे हैं। 
 
– आप कव्वाली की जिस 850 साल की रिवायत की बात कर रहे हैं, उसमें आज कितना बदलाव देखते हैं? 
 
देखिए आज जिसे हम कव्वाली कहते हैं, वो हिंदुस्तान में ही जन्मी है। इसकी शुरूआत 850 साल पहले ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेरी रहमतुल्लाह अलैहि ने की थी। कव्वाली शब्द बना है कौल से, जिसके मायने है दोहराना। जो अल्लाह ने और सरकारे दो आलम मोहम्मद मुस्तफा ने कहा उसको दोहराने का नाम ही है कव्वाली। लेकिन शुरूआती दौर में कव्वाली को महफिले समा और गाने वाले को मुतरिब कहते थे। तब यह खानकाहों  (आश्रम) और दरगाहों तक ही महदूद (सीमित) थी।  बाद में हजरत निजामुद्दीन औलिया ने इसे कव्वाली का नाम दिया। उन्होंने और उनके शागिर्द हजरत अमीर खुसरो ने कव्वाली को खानकाहों-दरगाहों से निकाल कर इसे आम लोगों तक पहुंचाया। उस जमाने के सूफी शायरों ने अपने कलाम फारसी में लिखे थे। तब और आज में बदलाव बहुत सा आया है। तब ताली, ढोलक,तबला और नौबत(डफ) का इस्तेमाल होता था। आज हमनें इसमें सिर्फ हारमोनियम को जोड़ा है। जहां तक फारसी के कलाम की बात है तो आज के दौर के शायरों ने उसे आसान करते हुए उर्दू में लिखा है। वैसे जो बुजुर्गों सूफियों के कलाम है, उनका अपना एक अलग इफेक्ट तो रहता ही है। इस दौर में लोगों ने कुछ और बदलाव भी किए हैं। इसका नाम कव्वाली  ही रखा है लेकिन हम्द (अल्लाह की शान में), नात (नबी की शान में), मनकबत (वलियों की शान में) और  गजल भी इसमें अलग-अलग ढंग से पेश की जाती है। 
 
 
– कव्वाली पेश करने और सुनने का जो लुत्फ है, उसे आप कैसे बयां करेंगे? 
 
देखिए, कव्वाली तो सीधे रूहानियत से जुड़ी हुई है। सही जो कव्वाली होती है वो सीधे अल्लाह से मिलाती है। इसलिए हमें हुक्म दिया जाता है कि जब तुम समा (कव्वाली) गाने बैठो तो वजू करके  पाक साफ होकर बैठो। यह सच है कि जब सही कव्वाली गाई जाती है और किसी को वज्द (हाल) आ जाता है तो उसकी रूह सीधे आलमे बरज$ख (ईह लोक) में चली जाती है। अक्सर ऐसा होता है  जब हम देखते हैं कि अल्लाह का कलाम सुन कर किसी को हाल आ रहा है, तो इस हालत में बेखुदी में वो नहीं झूमता बल्कि उसकी रूह झूमती है। हमनें भी बुजुर्गों से सुना है कि अल्लाह ने मिट्टी का पुतला (इंसान) बनाया और रूह को हुक्म दिया कि जा अंदर दाखिल हो जा, तो रूह अंदर जा रही थी और परेशान हो कर बार-बार बाहर आ रही थी। रूह का कहना था कि मेरे मालिक मैं अंदर जा रही हूं तो सब अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा है और मेरा दम घुट रहा है। मैं क्या करूं,समझ में नहीं आ रहा है। अंदर समाया नहीं जा रहा है। ऐसे में फिर अल्लाह पाक ने अपने फरिश्तों को हुक्म दिया कि एक लहन (सुर) छेड़ो। जब फरिश्तों ने लहन छेड़ा तो रूह एक दम से मस्ती में आ गई और इंसान के जिस्म में चली गई। तो आज जब अच्छा संगीत या सुर सुनकर जब हममें से किसी को भी एक नशा सा तारी होता है तो वो हममें नहीं बल्कि हमारी रूह में होता है। लोग सुन कर वाह-वाह कहते हैं तो ये हम नहीं करते हमारी रूह करती है। हमारा चाहे सूफी संगीत हो या हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत, इसमें दिल और दिमाग दोनों झूमता है। यही हमारी संगीत की परंपरा है। 
 
– आपका ऐसा अपना कोई रूहानी तजुर्बा? 
 
ये तो उस मालिक का करम है। हम तो यही मानते हैं कि हम कलाम पेश कर रहे हैं तो इबादत कर रहे हैं। ऐसा कई बार होता है कि जब हम ख्वाजा गरीब नवाज अजमेरी के दरबार में कव्वाली पेश कर रहे होते हैं तो ज़ार-ज़ार आंसू बहते रहते हैं। वहां कव्वाली पेश करने के दौरान फिर हमको अपनी भी सुध नहीं रहती। एक अलग किस्म का नशा हम पर तारी हो जाता है। चूंकि ख्वाजा साहब ने ही कव्वाली की शुरूआत की थी, इसलिए उनके दरबार में कव्वाली पेश करना हमेशा एक अलग तरह का रूहानी तजुर्बा रहता है।
 
– ..तो क्या ये रूहानी जज्बा आपको सिर्फ कव्वाली से ही हासिल होता है? 
 
देखिए उसको पुकारना है तो कोई भी जबान में पुकार सकते हैं। हमनें श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मंडी’ में कबीर दास जी का भजन ‘हर में हर को देखा’ गाया था। इसमें देखिए कितनी गहराई है। ‘हर में हर को देखा’ देखा यानि हम सब में वही मौजूद है। अल्लाह ने भी फरमाया है कि ‘मैं तेरी शहरग़ (गले के पास की एक खास नस) के करीब हूं तू मुझे पहचान’। इसलिए अल्लाह-परमेश्वर तो हम सबके बेहद करीब है। हम सब में वही है और उसने किसी में भेदभाव नहीं किया। इसलिए उसे चाहे कव्वाली से पुकारो या भजन से। पुकार सच्ची होनी चाहिए तो रूहानियत का जज्बा अपने आप उभर आता है।  
 
– हिंदुस्तानी फिल्मों की वजह से कव्वाली की भी दो धाराएं हो गईं हैं…क्या आप ऐसा मानते हैं? 
 
जी, हां बिल्कुल। एक तो मंच की कव्वाली है और दूसरी फिल्मों की। फिल्म इंडस्ट्री तो कव्वाली से हमेशा मुतअस्सिर (प्रभावित) रही है। कई बड़े नाम है जिन्होंने फिल्मों के लिए कव्वाली गाई है। ज्यादातर मामले में तो हम मानते हैं कि फिल्मों ने कव्वाली का बेड़ा गर्क ही किया है। जहां तक दूसरी धारा की बात है तो कव्वाली आज भी मकबूल है। इसका क्रेडिट उन कव्वालों को जाता है, जिन्होंने इसकी पाकीजगी को कायम रखा। जैसे कि हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी , हाजी गुलाम फरीद साबरी और उस्ताद नुसरत फतेह अली खान सहित और भी दूसरे नाम। जिन्होंने दुबारा से इसे उपर लाया और इसे मकबूलियत दी। आज कव्वाली हिंदुस्तान-पाकिस्तान में तो है ही यूरोप और दुनिया के दूसरे हिस्सों में कव्वाली खूब सुनी जाती है।  
 
– आप को ऐसा क्यों लगता है कि फिल्मों ने कव्वाली का बेड़ा गर्क किया है? 
 
देखिए ‘परदा है परदा’ को आप क्या कव्वाली कहेंगे..? हमारी नजर में वो सिर्फ एक एंटरटेनमेंट या आज की जबान में आइटम सांग है। हजरत अमीर खुसरो अपने पीर हजरत निजामुद्दीन औलिया के दीदार के बाद कहते हैं कि छाप तिलक सब छीन ली। ये रुहानियत में डूबा हुआ कलाम है। वो कहते हैं कि आपने मुझे देखा तो मेरी जितनी भी पहचान और जो छाप थी वो सब छीन ली। वो ‘अपनी सी रंग दीनी’ कहते हैं यानि दुनिया से बेनियाज कर मुझे अल्लाह से मिलवा दिया। लेकिन फिल्म वालों ने क्या किया? ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ फिल्म मे लडक़ी भांग के नशे में झूम रही है और खेत में गा रही है ‘छाप तिलक सब छीन ली’। 
 
– ये बीते दौर की बात हो गई लेकिन आज तो फिल्मों में सूफी खूब चल रहा है..? 
 
हम पूछना चाहते हैं, आज के ये फिल्म वाले सूफी का मतलब, उसकी अहमियत भी समझते हैं..? सूफी यानि हर चीज से पाक साफ। अब आज की फिल्मों को देखिए सूफी के नाम पर गीत रचा गया ‘इश्क सूफियाना’। ये फिल्म वाले जानते हैं इन पाक लफ्जों की अहमियत..? अभी शाहरूख खान की एक फिल्म में सूफी के नाम पर गीत रचा गया ‘तेरा सजदा’। इसमें वो औरत को सजदा करवा रहे हैं। ये क्या हो रहा है..? 
 
– लेकिन आप (कव्वाल) लोगों की तरफ से कभी कोई एतराज भी तो सामने नहीं आता है? 
 
आपका ऐसा कहना गलत है। हमारे हैदराबाद के नागेश कुकनूर ने 2-3 साल पहले ‘इकबाल’ फिल्म बनाई थी। जिसमें सीन रखा कि लोग शराब पी कर बोतल के साथ नाचते हुए ‘आज रंग है हे मां रंग है री’गा रहे हैं। हमने नागेश को बुला कर तुरंत एतराज जताया और उनसे पूछा कि क्या आपको ‘रंग’ का मरतबा या उसके मायने मालूम है..? ये बुजुर्ग सूफी शायर हजरत अमीर खुसरो ने किसलिए लिखा है और इसे क्यों गाया जाता है..? हमनें उनसे कहा कि आइंदा से किसी अच्छे जानकार से मश्विरा लेना फिर कोई सूफी कलाम को रखना। वरना तुम पर ऐसी फिटकार पड़ेगी कि कहीं के भी नहीं रहोगे और ये जितना सब नाम-वाम है,ये सब चले जाएगा। नागेश हमारी बात समझ गए और तुरंत माफी मांगने लगे कि नहीं वारसी साहब हमसे गलती हो गई। 
 
– लेकिन ऐसे माहौल में आपको फिल्मों के ऑफर तो आते होंगे? 
 
बिल्कुल आते हैं। लेकिन, हम अपना और अपने घराने का नाम खराब नहीं करना चाहते हैं। हमारा साफ कहना है कि जिसमें सूफियाना होगा वहीं गाएंगे। जिसमें अल्लाह का नाम होगा,मौला का नाम होगा हमारे ख्वाजा का नाम होगा वो गाएंगे। अब जैसे हमारे दादा पद्मश्री अजीज अहमद खां वारसी ने ‘मौला सलीम चिश्ती’ गाया था। आज भी आप  देखिए और सुनिए कि कैसा पिक्चराइजेशन है और कैसे अल्फाज हैं ‘घूंघट की लाज रखना इस सर पे ताज रखना’।  अब आज तो फिल्मवाले जो दिल मे आए ठोक देते हैं। इसलिए तब तक हम फिल्मों से दूर ही ठीक हैं। 

पत्रकार को फर्जी फंसाए जाने के विरोध में उरई में सर्वदलीय सभा

 

जालौन में सपा नेता पर हुए जानलेवा हमले के मामले में अमर उजाला के पत्रकार को फर्जी फंसाए जाने का विरोध तेज हो गया है. पिछले कई दिनों से उरई में जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष क्रमिक धरना कर रहे पत्रकार अब भी जमे हुए हैं. रविवार को सर्वदलीय सभा आयोजित की गई है, जिसमें सभी दलों के लोग भाग ले रहे हैं. सत्‍ताधारी पार्टी सपा के लोग भी इस सभा में सम्मिलित हैं. प्रशासन के रवैये से पत्रकारों में खासा रोष है. 
 
पत्रकार लगातार मांग कर रहे हैं कि मामले की निष्‍पक्ष जाचं कराई जाए पर प्रशासन सत्‍ता पक्ष के दबाव में कोई सही कार्रवाई नहीं कर रहा है. गौरतलब है कि 6 नवम्बर को देर रात जालौन के एट थाना क्षेत्र में सपा के पूर्व कोषाध्‍यक्ष राकेश पटेल जब अपने गाँव सोमई से बाइक से एटा जा रहे थे तभी कुछ अज्ञात हमलावरों ने उन पर फायरिंग कर दी जिसमें वो घायल हो गये थे. घटना के नौ दिन बाद सपा नेता के भाई ने 16 नवम्बर 2012 को गाँव के ही दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला के पत्रकार शशिकांत तिवारी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज कराया था, जिस पर पुलिस ने करवाई कर पत्रकार को जेल भेज दिया. 
 
इस मामले में पत्रकार एसपी आरपी चतुर्वेदी और जिलाधिकारी मनीषा त्रिघटिया से भी जांच कराने की बात की थी, परन्‍तु उन लोगों ने ध्‍यान नहीं दिया. इसके बाद पत्रकार अमर उजाला के ब्‍यूरोचीफ अनिल शर्मा के नेतृत्‍व में 22 नवम्‍बर से उरई में क्रमिक धरने पर बैठ गए हैं. इसी क्रम में आज सर्वदलीय सभा हो रही है, जिसमें सभी दलों के लोग शामिल हो रहे हैं. अनिल शर्मा ने बताया कि अगर प्रशासन निष्‍पक्ष और उचित कार्रवाई नहीं करेगा तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा. किसी भी पत्रकार का उत्‍पीड़न निंदनीय है. सपा सरकार में सबसे ज्‍यादा उत्‍पीड़न से पत्रकार ही जूझ रहे हैं. 
 
धरने के दौरान प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार केपी सिंह, ना‍थूराम निगम, ब्रजेश मिश्रा, संजीव श्रीवास्‍तव, ओमप्रकाश राठौर, मनोज राजा, आबिद नकवी, सुनील शर्मा, संजय मिश्रा, रमाशंकर शर्मा, जमील टाटा, अरमान, विकास जादौन, श्रीकांत शर्मा, अलीम सिद्दीकी, संजय गुप्‍ता, मनीष राज, अजय श्रीवास्‍तव, प्रदीप त्रिपाठी, शशिकांत शर्मा, जितेंद्र द्विवेदी, राहुल गुप्‍ता, संजय सोनी सहित तमाम पत्रकार, नेता एवं समाजसेवी मौजूद रहे. 

नागपुर से जल्‍द लांच होगा कैरियर एवेन्यू

 

नागपुर की मीडिया मंडी की मजबूती में भूमिका निभाने जल्द ही एक और पाक्षिक पत्र शुमार होने वाला है। नागपुर से प्रकाशित होकर देश भर में वितरण की योजना के साथ कैरियर एवेन्यू धमक के साथ प्रकाशित होने की पूरी तैयारी में है। पत्रिका के प्रबंधन से जुड़े डा. सुरजीत कु सिंह ने संभावना जताई कि इसे जनवरी, 2013 में लांच कर दिया जाएगा। करीब 24 से 32 पेज के इस पाक्षिक में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए महत्वपूर्ण सामयिक सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा स्कूल-कॉलेज स्तर के विद्यार्थियों के कैरियर की सही राह दिखाने वाली जानकारी दी जाएगी।
 
डा. सुरजीत ने बताया कि आजकल बाजार में कैरियर बेस्ड ढेरो पत्रिकाओं की भरमार हैं। इनमें से कई पत्रिकाएं अच्छी सामग्री दे रही है। लेकिन ऐसी पत्रिकाओं के मूल्य इन दिनों आसमान पर हैं। कई बार आम युवा महंगी पत्रिकाओं को खरीदने से वंचित रह जाता है। बेरोजगार युवाओं की जरूरत और उसकी जेब को ध्यान में रखते हुए कैरियर एवेन्यू काफी सस्ता होगा तथा यह बाजार में उपलब्ध होने वाले अन्य सभी कैरियर बेस्ड पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में सस्ता होगा। (प्रेस रिलीज)

राष्‍ट्रीय सहारा में रिटायरमेंट की उम्र 65 साल की गई

 

सहारा मीडिया में प्रिंट वाले आज काल काफी खुश हैं. खासकर वे कर्मचारी जो जल्‍द ही रिटायर होने वाले थे. वे अगले पांच साल तक बिना रोक टोक ऑफिस आ सकते हैं. जी हां, प्रबंधन ने प्रिंट मीडिया के कर्मचारियों के रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा दिया है. सहारा के प्रिंट सेक्‍शन में रिटायर होने की उम्र अब साठ साल से बढ़ाकर 65 साल कर दिया गया है. यानी जो कर्मचारी कुछ महीनों या दिनों में रिटायर होने वाले थे, उनको इस निर्णय के बाद से पांच साल का एक्‍सटेंशन मिल गया है.
 
 प्रबंधन के इस निर्णय से राष्‍ट्रीय सहारा के कर्मचारी काफी खुश हैं. रिटायरमेंट की उम्र पांच साल बढ़ा दिए जाने से हजारों कर्मचारियों को इसका फायदा मिलेगा. हालांकि मीडिया के अनिश्चित नौकरी के दौर में सहारा प्रबंधन का यह निर्णय कर्मचारियों के लिहाज से बहुत राहत देने वाला है. वैसे भी सहारा की नौकरी को सरकारी नौकरी माना जाता रहा है, जहां एक बार आए तो आपको जल्‍दी निकाला नहीं जाता है. हालांकि पिछले कुछ समय से अंदरूनी राजनीति ने जरूर इस तथ्‍य को प्रभावित किया है. फिर भी यहां नौकरी करना अन्‍य मीडिया संस्‍थानों से ज्‍यादा सुरक्ष्रित है.

बीटीवी, भोपाल से कमाल, राजेश और आदित्‍य का इस्‍तीफा

 

खबर बीटीवी भोपाल से है। तीन कर्मचारियों ने इस्तीफा दे दिया है। यहां मार्केटिंग डिपार्टमेंट से कमाल पाशा और राजेश मल्लाह ने इस्तीफा दे दिया है। कमाल पाशा बीटीवी की शुरुआत से ही जुड़े थे। जबकी राजेश ने भी लंबे समय तक बीटीवी में अपनी सेवाएं दी हैं। दोनों सिटी न्यूज से अपनी नई पारी की शुरुआत कर रहे हैं। कमाल जहां बतौर मार्केटिंग हेड ज्वाइन कर रहे हैं तो राजेश भी सीनियर पोजिशन पर पहुंचे हैं। दोनों के जाने से बीटीवी की मार्केटिंग पर अच्छा खासा असर पड़ेगा। बीटीवी में काफी समय बाद ऐसा हुआ है जब मार्केटिंग डिपार्टमेंट से किसी ने इस्तीफा दिया है।
 
वहीं दूसरी ओर एडिटोरियल से आदित्य श्रीवास्तव ने भी इस्तीफा दे दिया है। आदित्य यहां एंकर और बीपी के पद पर कार्यरत थे। आदित्य अपनी नई पारी की शुरुआत जी छत्तीसगढ़ में किसी संस्‍थान से कर रहे हैं। आदित्य के छोड़ने से न्यूज डेस्क का काम प्रभावित हुआ है। खबर तो ये भी है कि आदित्य के छोड़ने से डेस्क इंचार्ज के वीक ऑफ के लाले पड़ गए हैं।

पोंटी और हरदीप को नामधारी ने मारी थीं गोलियां?

 

नई दिल्ली : तो क्या छतरपुर में फार्म हाउस संख्या 42 पर हुई फायरिंग में पोंटी चड्ढा और उनके छोटे भाई हरदीप को सुखदेव सिंह नामधारी ने गोलियां मारी थी! जांच में नामधारी द्वारा प्वाइंट 30 बोर की पिस्टल से फायरिंग करने की बात सामने आने के बाद पुलिस की जांच इस दिशा में घूमती नजर आ रही है। अधिकारियों के अनुसार नामधारी के पास मौजूद पिस्टल का लाइसेंस नहीं था। बावजूद अपने गुडों के साथ फार्म हाउस पर कब्जा करने नामधारी पिस्टल को साथ लेकर आया था। घटना के समय फायरिंग करने तथा पिस्टल की बात उसने पुलिस से छिपाई थी। इससे साबित हो रहा है कि उसके इरादे नेक नहीं थे।
 
पुलिस अधिकारियों के अनुसार इस पूरे मामले में कई चीजें अभी स्पष्ट होना बाकी हैं। लेकिन जिस प्रकार पोस्टमार्टम के दौरान पोंटी चड्ढा के शरीर से प्वाइंट 30 बोर की गोलियां मिली और अब नामधारी द्वारा प्वाइंट 30 बोर की पिस्टल के प्रयोग करने की बात सामने आई है। उसके बाद यह जांचना बेहद जरूरी हो गया है कि कहीं नामधारी की गोली भी तो पोंटी को नहीं लगी। हालांकि हरदीप के पास भी प्वाइंट 30 बोर की पिस्टल थी। किस पिस्टल से निकली गोली से पोंटी की मौत हुई इसका पता बैलेस्टिक एक्सपर्ट लगाएंगे। हरदीप की पिस्टल तथा गोली के खाली खोखे जांच के लिए भेजे जा चुके हैं। वहीं नामधारी से पिस्टल बरामदगी का प्रयास हो रहा है।
 
दूसरी तरफ घटना के प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है कि सचिन त्यागी और नामधारी दोनों ने हरदीप पर फायरिंग की। फार्म हाउस के गेट पर हुई गोलीबारी में शरीर में दो गोलियां (छाती और फेफड़े) लगने के बाद भी वह पैदल चलकर गेट के समीप बने गार्ड रूम तक पहुंच गया था। सचिन त्यागी कारबाइन से गोली चला रहा था जबकि नामधारी के हाथ में पिस्टल थी। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या कारबाइन की गोली लगने के बाद कोई जमीन पर गिरे बिना गार्ड रूम तक जा सकता है?
 
सूत्रों की मानें तो पुलिस को इस बात का पूरा अंदेशा है कि हरदीप को नामधारी की गोली लगी है। लेकिन बैलेस्टिक एक्सपर्ट की रिपोर्ट आने तक फिलहाल कोई अधिकारी खुलकर बोलने से बच रहा है। अधिकारियों का कहना है कि अभी तक जितने साक्ष्य सामने आए हैं उनसे नामधारी का इस केस से बच निकलना कठिन है। जांच से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार नामधारी के पास उत्तराखण्ड का लाइसेंस है। लेकिन वह अवैध रूप से अपनी पिस्टल दिल्ली लेकर आया। कब्जा करने वाले उसके गुंडे भी घटनास्थल के तत्काल बाद वारदात स्थल से गायब हो गए। पुलिस पूछताछ में नामधारी ने आत्मरक्षा में तीन गोलियां चलाने की बात कही है। लेकिन वारदात के बाद 17 नवंबर को ही महरौली थाने में दर्ज कराई एफआईआर में उसने ऐसी किसी भी बात का जिक्र नहीं किया। (जागरण)

दैनिक भास्‍कर समूह के डीबी पावर पर मेहबानी क्यों?

 

नई दिल्ली। डीबी पावर लिमिटेड व जिंदल स्टील एंड पॉवर लिमिटेड समेत कई निजी कंपनियो का आवंटन रद्द न करने को लेकर अंतर मंत्रालीय समूह (आईएमजी) पर निजी कंपनियों के हित में काम करने का आरोप लगाते हुए भाजपा सांसद हंसराज अहीर ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हस्तक्षेप करने व संबंघित अघिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
 
 अहिर ने पीएम को लिखे पत्र में शिकायत की कि आईएमजी दबाव में काम कर रहा है। तय समय-पर काम पूरा न करने वाली सभी कंपनियों के आवंटन रद्द किए जाने चाहिए थे, लेकिन निजी कंपनियों पर मेहरबानी की गई और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए अपने काम की दिशा ही बदल डाली। अहिर ने 'पत्रिका' से कहा, कमजोर कंपनी को निपटा दिया जबकि असरदार को बचा लिया गया। जिन्होंने समय पर काम पूरा नहीं किया, उन्हें पैनल्टी लगाकर छोड़ना नियम विरूद्ध है। इसके पीछे खेल चल रहा है। घोटाले में लिप्त  कंपनियों का आवंटन रद्द कर बैंक गारंटी जब्त की जाए तो 100 फीसदी नुकसान की पूर्ति की जा सकती है। (राजस्‍थान पत्रिका)

केट की टॉपलेस फोटो छापने वाले संपादक ने दिया इस्‍तीफा

 

ब्रिटेन की डचेज़ ऑफ़ कैम्ब्रिज केट की 'टॉपलेस' यानी अर्धनग्न तस्वीरें आयरलैंड के अखबार 'आयरिश डेली स्टार' में 15 सितंबर को छापे जाने के मुद्दे पर अखबार के संपादक को इस्तीफा देना पड़ा है. सितंबर में प्रिंस विलियम और डचेज़ ऑफ़ कैम्ब्रिज केट की फ्रांस में छुट्टी मनाते समय छिपकर खींची गई तस्वीरों के छपने से हंगामा मच गया था.
 
समाचार पत्र के संपादक माइक ओ-केन को इसके बाद अंदरूनी जाँच पूरी हो जाने तक निलंबित कर दिया गया था. उस समय मीडिया मुगल रिचर्ड डेस्मंड ने अखबार को बंद कर देने की धमकी दी थी. डेस्मंड का नॉर्दन एंड शेल ग्रुप, आयरलैंड के इंडिपेंडेंट न्यूज एंड मीडिया के साथ अखबार का संयुक्त मालिक है. डब्लिन स्थित आयरिश डेली स्टार ने एक बयान में कहा, "अखबार के 15 सितंबर 2012 को छापे गए अंक के बाद इंडिपेंडेंट स्टार लिमिटेड के शेयरधारकों के साथ कुछ मुद्दे उठे हैं. इन मुद्दों को माइक ओ-केन के साथ भी उठाया गया है और उन्होंने तत्काल संपादक के पद से इस्तीफा देने का फैसला किया है."
 
अखबार का कहना है कि ओ-केन ने सदा बहुत ही पेशेवर और उचित तरीके से अपना कामकाज किया और अखबार का हित अपने जहन में रखा. ये भी कहा गया है कि उन्होंने सदा संपादकीय नीतियों और दिशानिर्देशों का पालन किया. इससे पहले फ्रांसीसी पत्रिका में केट की टॉपलेस तस्वीरें छपी थीं और ड्यूक-डचेज़ ऑफ़ कैम्ब्रिज ने उस पत्रिका के खिलाफ़ कानूनी करने का फैसला करते हुए कानूनी दावा ठोक दिया था.
 
ब्रिटेन में शाही परिवार के प्रवक्ता ने कहा था कि ये शाही जोड़े की निजता का उल्लंघन था जिसके लिए पत्रिका को जवाब देना होगा. इन तस्वीरों को फ्रांस, इटली, आयरलैंड, स्वीडन और डेनमार्क के अखबारों ने छापा था जबकि किसी भी ब्रितानी अखबार ने ये तस्वीरें नहीं छापी थीं. (बीबीसी)

साधना टीवी में स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट बने भूपेंद्र

 

फोकस टीवी से खबर है कि भूपेंद्र कुमार सिंह ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे इस चैनल के साथ लांचिंग के समय से जुड़े हुए थे. भूपेंद्र ने अपनी नई पारी नोएडा में साधना न्‍यूज के साथ शुरू की है. उन्‍हें रिसर्च विंग का हेड बनाया गया है, साथ ही स्‍पेशल करेस्‍पांडेंट की जिम्‍मेदारी भी सौंपी गई है. भूपेंद्र इसके पहले लोकसभा टीवी और दैनिक जागरण को भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. वे पिछले पांच साल से ज्‍यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं.  

उच्च न्यायालय की टिप्पणी न्यायिक गरिमा के खिलाफ

लखनऊ : रिहाई मंच के अध्यक्ष एडवोकेट मोहम्मद शुऐब और इलाहाबाद हाई कोर्ट के अधिवक्ता और मानवाधिकार संगठन पीयूएचआर के प्रवक्ता सतेन्द्र सिंह ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आतंकवाद से संबंधित कुछ मामलों में सम्बन्धित जिले के प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों से अभियुक्तों को रिहा किए जाने के सम्बन्ध में मांगी गई आख्या के विरुद्ध किसी गैर जिम्मेदार व्यक्ति द्वारा माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद को भेजे गए पत्र के आधार पर संज्ञान लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से उत्तर मांगने तथा नियत तिथि पर उत्तर न देने तथा अवसर प्राप्त करने की याचना पर संबंधित शासकीय अधिवक्ता पर डांट लगाते हुए माननीय न्यायाधीश श्री आरके अग्रवाल तथा श्री आरएस आर मौर्या द्वारा की गई टिप्पणी को अवांछनीय बताया। उन्होंने आगे कहा कि यह टिप्पणी कि ''आज आप इन्हें छोड़ रहे हैं और कल उन्हें पद्म भूषण की उपाधि दे सकते हैं'' न्यायालय की गरिमा के विरुद्ध है तथा माननीय न्यायालय की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है। माननीय न्यायाधीश द्वय की टिप्पणी कि ''कोई व्यक्ति अभियुक्त है,  यह निर्णय करना न्यायालय का कार्य है, राजनीतिज्ञों का नहीं'', माननीय उच्च न्यायालय की अवमानना है।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम धारा 321 दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधान के अन्तर्गत आता है जिसमें कहा गया है कि किसी मामले का भार साधक राज्य सरकार की इस प्रभाव की लिखित अनुमति पर (जो न्यायालय में दाखिल की जाएगी) निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी समय किसी व्यक्ति के अभियोजन को या तो साधारणतः या उन अपराधों में से किसी एक या अधिक के बारे में, जिनके लिए उस व्यक्ति का विचारण किया जा रहा है, न्यायालय की सम्मति से वापस ले सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार सम्बन्धित मुकदमों को वापस लेने से पहले सम्बन्धित प्रशासनिक तथा पुलिस अधिकारियों से यदि रिपोर्ट तलब कर रही है तो इसमें विधि विरुद्ध कुछ भी नहीं दिखता। यदि सरकार उक्त मुकदमों को वापस लेना चाहती है तो वापस लेने की लिखित अनुमति देने से पूर्व की जाने वाली जांच को अवैधानिक कैसे माना जाएगा।

कई मुस्लिम युवा जो आतंकवाद से सम्बन्धित आरोपों में बंद थे, अनेक न्यायालयों द्वारा साक्ष्य के आभाव में पांच से लेकर पन्द्रह साल तक ट्रायल फेस करने के बाद छोड़े गए हैं। इनकी इस लंबी अवधि तक जेल में रहने को अवैध करार देने के बाद उनके ये दिन उन्हें वापस कैसे दिए जा सकते हैं, इस पर भी विचार करना आवश्यक है। भारतीय दंड संहिता में निर्दोषों को फंसाने वालों के विरुद्ध भी दंड का प्रावधान है, लेकिन गुजरात के कुछ मामलों को छोड़कर अब तक किसी भी अधिकारी या पुलिस कर्मचारी के विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाई नहीं की गई है। इन परिस्तियों पर विचार करने के उपरान्त ही माननीय सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा कि पुलिस ऐसा कुछ न करे कि किसी निर्दोष मुसलमान को यह कहना पड़े कि माई नेम इज खान, बट आईएम नाट टेररिस्ट।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम, राजीव यादव
प्रवक्ता रिहाई मंच
मोबाइल- 09415254919, 09452800752
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रिहाई मंच
116/60 हरिनाथ बनर्जी स्ट्रीट, नया गांव पूर्व लाटूश रोड, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
सम्पर्क- 09415012666, 09415254919, 09452800752, 09415164845

प्रेस विज्ञप्ति.

पायनियर के पत्रकार की मोटरसाइकिल का सुराग नहीं, एक और बाइक हो गई चोरी

 

लखनऊ : राजधानी पुलिस एक तरफ जहां कानून व्यवस्था बनाये रखने का दम्भ भरती घूम रहीं है, वहीं लखनऊ शहर में वाहन चोरों का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते सात नवम्बर को लेखराज स्थित सहारा शॉपिंग सेंन्टर के सामने से पायनियर के पत्रकार हरीराम मिश्र की चोरी हुई मोटर साइकिल अब तक बरामद नहीं हो पाई है कि पिछली रात ठीक उसी स्थान से एक ट्रैवल एजेंसी संचालक की मोटर साइकिल फिर चोरी हो गई है। सूत्रों की माने तो पिछले दो माह के भीतर ही उक्त स्थान से कई मोटर साइकिलें गायब हो चुकी है। और हर बार पुलिस खानापूर्ति करके बरामदगी का आश्वासन देती रहती है। 
 
चोरों के हौसले के बुलंदी का आलम यह है कि उन्होंने पत्रकार की प्रेस लिखी बाइक हीरो होण्डा पैशन प्रो को मेंन लॉक के अलावा अलग से पहिये में जंजीर का लॉक लगा होने बावजूद उठा लिया। श्री मिश्र ने चोरी की घटना के सम्बंध में मुकदमा न केवल गाजीपुर थानें में दर्ज कराया, बल्कि क्षेत्राधिकारी, एसपी ट्रान्स गोमती, एसएसपी /एडीजी कानून व्यवस्था से भी गाड़ी बरामदगी की गुहार लगाई। इतना ही नहीं पिछले दिनों प्रेस क्लब में आयोजित समारोह में पहुंचें सरकार के कबीना मंत्री शिवपाल सिंह यादव से भी पत्रकार की मोटर साइकिल चोरी होने की शिकायत की जिस पर उन्होंने वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक से बात भी की। 
 
हैरत की बात ये है कि पत्रकार की मोटर साइकिल को चोरी हुये अब तक अठारह दिन बीत चुके हैं और इस सम्बंध में राजधानी के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में भी खबर पकाशित हो चुकी है, फिर भी अभी तक गाड़ी बरामदगी तो दूर किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को उठाकर पूछताछ भी नहीं की जा सकी। पुलिस की इसी लापरवाही से निश्चिंत वाहन चोर ने बीते 22 नवम्बर की रात को ठीक उसी स्थान से एक और गाड़ी पर भी हाथ साफ कर दिया। श्री मिश्र कहते हैं कि व्यवसायी व धनाड्य लोगों के लिए मोटर साइकिल भले ही कोई खास अहमियत न रखती हो पर एक ईमानदार पत्रकार के लिए मोटरसाइकिल चोरी हो जाना बड़ी घटना है। और उनका काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
 
लखनऊ से विवेक त्रिपाठी की रिपोर्ट. 

चैनल का कैमरामैन शादी का झांसा देकर करता रहा युवती का यौन शोषण, मामला दर्ज

 

देहरादून। शादी का झांसा देकर अस्मत लूटे जाने की बातें तो लगातार सुनी जाती हैं लेकिन दूसरो की खबरों को छापने वाले यदि खुद ही ऐसा करें तो यह बेहद शर्मनाक होगा। देहरादून में दूसरों को नसीहत का पाठ पढ़ाकर आइ्रना दिखाने वाले मीडिया की बिरादरी के कुछ लोगों के कारण समाज में पत्रकारिता की छवि धूमिल होती जा रही हे। पिछले 3 सालों से उत्तराखण्ड की मीडिया में कैमरामैन के रूप में काम करने वाले दीपक शर्मा ने सेल्सगर्ल के रूप में काम करने वाली सीमा शर्मा (नाम काल्पिनक) को शादी करने के झांसे में लेकर उसका यौन शोषण करता रहा। 
 
दीपक आज तक एवं महुआ न्यूज चैनल के लिए भी कैमरामैन का काम कर चुका है। पिछले काफी समय से वह उत्तराखण्ड से भूमिगत है। ताजा मामला देहरादून में बीते दिवस उस समय सामने आया जब पूर्व में सेल्स का काम करने वाली सीमा ने देहरादून के कैन्ट थाने में दीपक के खिलाफ बलात्कार किए जाने एवं शादी का झांसा देकर उसे 3 साल तक गुमराह किए जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई। कैन्ट थाने के बाद इस मामले की जांच बिन्दाल चौकी में तैनात एसआई हरीश कुमार को सौपी गई हैं। प्रारमभिक छानबीन में पता चला है कि दीपक शर्मा मुजफ्फरनगर का निवासी है, लेकिन उसके दिल्ली के बताए गए पते पर पुलिस को कोई सफलता हाथ नहीं लगी है।  
 
आरोप लगाने वाली लड़की का दावा है कि दीपक शर्मा ने पिछले 3 सालों तक उसके साथ कई बार शारीरिक सम्बन्ध बनाए और हर बार शादी की बात करने पर वह मुकरता चला गया। उत्तराखण्ड में पिछले कई सालों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ साथ अन्य राज्यों से आने वाले मीडियाकर्मियों की भूमिका संदिग्ध रही है और लगातार उन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। उत्तराखण्ड के स्थानीय मीडियाकर्मियों को शासन व प्रशासन के बीच बेहद ईमानदार छवि के रूप मे जाना जाता है, लेकिन पिछल कुछ सालों से जिस तरह मीडिया का चरित्र बाहर से आए मीडियाकर्मियो द्वारा दागदार कर दिया गया है, उससे यहां पर पत्रकारिता की छवि को धक्‍का लगा है।  
 
सूत्र बताते हैं कि दीपक शर्मा का मामला तो पुलिस में जाने के बाद खुल गया लेकिन अभी भी देहरादून के अंदर कई मीडियाकर्मी गुपचुप तरीके से कई अन्य लड़कियो का शारीरिक शोषण करने में लगे हैं। चूकि मामला लोकलाज के कारण पुलिस के पास नहीं पहुंच सका है और रोजाना कार्यक्रमों की कवरेज के नाम पर भोलीभाली लड़कियों को छला जा रहा हे। सवाल यह उठ रहा है कि यदि दूसरों को आईना दिखाने वाली मीडिया खुद ही कुछ लोगों के कर्मों के कारण शर्मसार होती रही तो यह बेहद चिन्तनीय विशय बन जाएगा। उत्तराखण्ड के कई वरिष्‍ठ पत्रकार भी मीडिया में फैलती जा रही इस तरह की गंदगी से बेहद खफा हैं। उनका साफ कहना है कि मीडिया को कुछ लोगो द्वारा दूषित कर दिया गया है, जिसके छींटें पूरी मीडिया पर पड़ रहे हैं। पुलिस मामले की जांच कर रही है तथा मीडियाकर्मियों से अपील की है कि दीपक शर्मा के बारे में कोई जानकारी होने पर पुलिस को बताएं। 
 
देहरादून से नारायण परगांई की रिपोर्ट. 

संजीव को बदायूं में सौंपी गई अमर उजाला की तात्‍कालिक जिम्‍मेदारी

 

: इसके पहले पीलीभीत का पूरा स्‍टाफ भी हो चुका है निलंबित : अमर उजाला बदायूं कार्यालय के पूरे स्टाफ को निलंबित करने की कार्रवाई के बाद संजीव पाठक को यहाँ तैनात कर दिया गया है. यह अब तक बरेली में ग्रामीण क्षेत्र के प्रभारी थे. इससे पहले संजीव बदायूं के ही ब्यूरो चीफ थे. बदायूं में तैनाती के दौरान रोडवेज बस अड्डे के पास शराब की दूकान पर एक रात शराब माफिया के गुर्गे से हुई मारपीट की घटना के बाद इनका भी फील्ड में निकलना लगभग बंद हो गया था. हालांकि बाद में शराब माफिया के प्रबंधक ने कार्यालय में आकर संजीव से माफी मांगी थी, पर वह खोया हुआ सम्मान पुनः हासिल नहीं कर पाए. तभी लोकसभा चुनाव के पहले इन्हें यहाँ से हटा कर बरेली तैनात किया गया.
 
बदायूं जिले के ही क़स्बा उघैती के निवासी होने के कारण प्रबंधन ने तात्कालिक व्यवस्था की दृष्टि से संजीव को यहाँ तैनात किया गया है. अभी यह निश्चित नहीं है कि संजीव पाठक यहाँ रहेंगे अथवा नहीं. ख़बरों की संख्या बढ़ाने के लिए अमर उजाला के तहसील रिपोर्ट्स को और अधिक सक्रिय कर दिया गया है. उधर इसी तरह की कार्रवाई अमर उजाला प्रबंधन पीलीभीत में भी कर चूका है. 11 मई 2011 को पीलीभीत पुलिस ने दो स्‍थानों पर छापा मारकर आठ लड़कियों सहित पन्‍द्रह लोगों को गिरफ्तार किया था, जिसमें अमर उजाला का क्राइम रिपोर्टर राजेश शर्मा भी शामिल था. राजेश की गिरफ्तारी के बाद अमर उजाला प्रबंधन ने पूरे स्टाफ को हटा दिया था. ऐसे में लोग यह भी चर्चा करने लगे हैं कि बरेली में तैनात एक बड़ा अधिकारी नोयडा