यशवंत जी, आपका ब्लाग कुछ समय से अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है!

प्रिय यशवंत जी।

मैं लंबे समय से आपका भड़ास4मीडिया ब्लॉग पढ़ रहा हूँ। पहले मुझे ये अच्छा लगता था क्यों की आप मीडिया में फैली बुराइयों को सामने लाते थे। लेकिन कुछ समय से देख रहा हूँ की आपका ये ब्लॉग अरविन्द केजरीवाल, ABP न्यूज़ और ND टीवी का मुखपत्र बन गया है।

सिवाए सरकार की आलोचना, RSS का विरोध, सरकारी चैंनल की आलोचना, अरविन्द केजरीवाल के समर्थन की न्यूज़ और ND टीवी व् ABP न्यूज़ की बढ़ाई के और कुछ पढ़ने को नहीं मिलता।

जो बाते सोशल साईट पर शर्मीला, शोभा डे, कविता कृष्णन के बारे में बताई गई क्या वो गलत है।

क्या आपने अरविन्द के उस जोक पर कोई कटाक्ष किया? जो उन्होंने एक रिक्शे वाले के सन्दर्भ में कहा। केजरीवाल भी तो मीडिया के दम से ही फेमस हुआ है।

अच्छा लगेगा अगर आप जवाब देंगे।

प्रार्थी

आदित्य गुप्ता

aditya0786@gmail.com

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फिर सक्रिय होगा भड़ास Blog, पुराने निष्क्रिय हटेंगे, नयों को मिलेगा स्थान

Yashwant Singh : जागरण ग्रुप के बच्चा अखबार आई-नेक्स्ट के कानपुर संस्करण की लांचिंग कराने के बाद इसके संपादक पद से इस्तीफा देकर कई महीने तक अपने गांव में रहा. जी भर खुली हवा में सांस लेकर छाती मजबूत बनाने और घूम घूमकर ताड़ी पीकर गला तर करने के बाद नई नोकरी खोजने नोएडा पहुंचा. शराब न पीने और झगड़ा न करने टाइप कई किस्म की शर्तों को मुझसे मनवाए जाने के बाद अंतत: कामकाज के मेरे पुराने अच्छे रिकार्ड को देखते हुए दैनिक जागरण नोएडा में नौकरी दे दी गई. इसी दौरान सुना कि हिंदी में ब्लागिंग का दौर शुरू हुआ है और किसिम किसिम के हिंदी ब्लाग बन चल लिखे जा रहे हैं. अपन लोगों ने भी मिलकर एक ब्लाग बनाया. भड़ास नाम से. इसका आनलाइन पता WWW.Bhadas.Blogspot.COM रखा गया.

इस ब्लाग में करीब एक हजार संपादक बनाए गए. यानि जो भी इसका मेंबर बना उसको डायरेक्ट पोस्टिंग का राइट दे दिया गया. इस कारण कभी कभार ये भी होता कि मैं सो कर उठता तो देखता कि भाई लोग मुझे ही गालिया लिख लिखकर भड़ास पर छापे हुए हैं. खैर. कई किस्म की लंबी उठा पटक बहस झगड़ा होड़ कंपटीशन कंप्लेन मुंहफुलव्वल आदि के बाद ब्लागिंग की आग धीरे धीरे शांत होने लगी. शौकिया ब्लागर निष्क्रिय होने लगे. कुछ ही प्रतिबद्ध ब्लागर फील्ड में जमे रहे. कई लोग ब्लागिंग के आगे की राह देखने समझने लगे. कुछ लोग इधर उधर हुए तो कुछ ने फेसबुक ट्विटर आदि की राह पकड़ी. कइयों ने डाट काम को अपनाया. समय हर चमकीली चीज पर धूल की परत चढ़ाकर उसे पुराना कर देता है और कुछ नया चमकता पेश कर देता है.

अब जबकि ब्लागिंग लगभग न के बराबर है और हर कोई अपनी बात टेक्स्ट आडियो वीडियो के रूप में फेसबुक व ट्विटर जैसे मंचों पर पोस्ट पब्लिश करता है तो हम लोग एक बार फिर भड़ास ब्लाग को सक्रिय करने की तैयारी कर रहे हैं. पुराने निष्क्रिय (ज्यादातर निष्क्रिय ही हैं) को हटाकर नयों को शामिल करने की तैयारी चल रही है. मुझे यह स्वीकारने में गर्व है कि भड़ास ब्लाग के संचालन के दिनों में मिले ज्ञान समझ रगड़े झगड़े आदि के कारण विकसित हुई परिपक्वता से भड़ास4मीडिया का कांसेप्ट दिमाग में आया जो शुरुआती कठिन संघर्षों के बाद चल निकला. अन्यथा हम जैसे हिंदी पट्टी के देहातियों अराजकतावादियों मुंहफटों के लिए उन दिनों दिल्ली नोएडा में नौकरियों के सारे दरवाजे बंद किए जा चुके थे और सरवाइवल मुश्किल था. पर नौकरी के परे खुद के पैशन को प्रोफेशन बनाने की जो धुन सवार हुई तो भड़ास4मीडिया के जरिए परवान चढ़ता चला गया. लेकिन इस भड़ास4मीडिया को पैदा किया असल में भड़ास ब्लाग ने ही. एक बार आप भी भड़ास के सबसे शुरुआती, अनगढ़, ओरीजनल और देसज मंच को देखें. लिंक ये है: Bhadas.BlogSpot.com

भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

फेसबुक पर उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Journalist Atul Tiwari Ab ye btao ki apni bhdas hum kha nikale

गुप्ता सेल्स राहुल गुप्ता सर कुछ लिखने के मौका दे Bhadas.Blogpost.com पर सबूत और पक्के साक्ष्य के साथ, पहले आप उनको जस्टिफाई और वेरिफाई कर ले उसके बाद उसको आगे प्रकाशित करे। उम्मीद है आप मौका देंगे।
राहुल गुप्ता
बदायूं।

Vishesh Shukla mai bhi gawah hu sir un dino ka

Harshvardhan Tripathi अब जबकि ब्लागिंग लगभग न के बराबर है Yashwant Singh आपकी इस बात से पूर्ण रूप से असहमत। नए बच्चे दे दनादन ब्लॉग ठेल रहे हैं। गोता लगाइए। अजब-गजब मोती मिल जाएंगे। हां, ये जरूर है कि उस समय के हमारे आपके जैसे लोग कुछ ठंडा गए हैं। और आपने तो उसे आगे ही बढ़ाया है। बाकी सुखद समाचार।

Shailesh Bharatwasi आप चंद टिके रहनेवाले लोगों मे रहे, ये बड़ी और प्रेरणास्पद बात है।

Riyaz Hashmi वह गालियों का मंच था और संभवतः इसीलिए उसका नाम भड़ास रखा गया था, जिसका मैं भी शुरूआती हिस्सा था। खूब बहस होती थी उस मंच पर।

Roy Tapan Bharati आपका ब्लाॅग पहले से और ज्यादा लोकप्रिय होगा

Yashwant Singh हर्षवर्द्धन सर, संभव है नए लोग जो ब्लाग चला रहे हों, उसके बारे में मुझे पता न हो. या डाट काम में अति व्यस्तता के कारण मैंने खुद ही ब्लाग की दुनिया के बारे में ज्यादा खैर खबर नहीं ली, न रखी. आपसे संपर्क कर नए सक्रिय ब्लागरों को जोड़ता हूं. ये एक अच्छा संकेत है. आपने ठीक जानकारी दी. शुक्रिया.

Anil Sakargaye प्रेम है रे,,,,तुमसे,,
बोले तो,,,,लाड,,,,
कईयो को पढा,,,कईयो को ललकारा
पर तुम्से न जाने क्यों,,,प्यार हो गया,,,
तुम्हारी,,,आग को सलाम,,,
उस आग को,,,उस ज्वाला को,,जो
तुम्हने,,,,जलायी/ लगाई तो,,,??
पर वो,,,रौशनी बिखेर रही है,,
सलाम प्रणाम,,,सब कुछ,,

Neelabh Ashk यशवन्त, न बिकना कोई बड़ी बात नहीं, न बिकते रहना बड़ी बात है. क्योंकि जो कहता है कि मैं पैसे पर नहीं बिकता, वो साला पद पर बिक जाता है, प्रतिष्ठा पर बिक जाता है, प्यार पर बिक जाता है, मजबूरियों के नाम पर बिक जाता है, नेता की लटकन बनने पर बिक जाता है. सम्मान पर बिक जाता है. हमारे यहां गृहस्थ जीवन को क्षुरस्य धार यानी छुरे की धार पर चलने की मानिन्द ठहराया गया है, पत्रकार बड़ा गृहस्थ होता है, उसका परिवार सारा समाज होता है, उसका जोखिम खांडे की धार पर चलने के बराबर है. जो इसे पूरा कर सके वो असली वरना गां–ऊ तो बहुत-से हैं.

Mayank Saxena सब याद है…. 🙂

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का एक पुराना इंटरव्यू

मीडियासाथी डॉट कॉम नामक एक पोर्टल के कर्ताधर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 मार्च 2011 को भड़ास के संपादक यशवंत सिंह का एक इंटरव्यू अपने पोर्टल पर प्रकाशित किया था. अब यह पोर्टल पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक किया जा चुका है. पोर्टल पर प्रकाशित इंटरव्यू को हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और यशवंत के भले-बुरे विचारों से सभी अवगत-परिचित हो सकें.

यशवंत सिंह

 

कठघरे में ‘भड़ास4मीडिया’ के एडिटर यशवंत सिंह

साक्षात्कारकर्ता : महेन्द्र प्रताप सिंह

10.03.2011 11.30pm


(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और ‘मीडिया साथी डॉट कॉम’ के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। ‘भड़ास4मीडिया’ पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम ‘भड़ास4मीडिया’ से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है – महेन्द्र प्रताप सिंह)

-यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। ‘भड़ास’ एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

–समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, जो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

-लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

–बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

-जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि ‘भड़ास’ लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

–आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि ‘भड़ास’ क्या है जो कभी ‘भड़ास’ के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि ‘भड़ास’ चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

-लोगों का मानना है कि ‘भड़ास’ पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

–इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर ‘भड़ास’ को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि ‘भड़ास’ को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

-‘भड़ास’ पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता ‘भड़ास’ पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

–पाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और ‘भड़ास’ गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

-‘भड़ास’ पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

–मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

-कंटेंट को लेकर भी ‘भड़ास’ तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

–पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

-आरोप यह भी है कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

–कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

-‘भड़ास’ पर एक कॉलम है ‘कानाफूसी’। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को ‘हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला’ और ‘राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े’ आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

–हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को सत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

-‘भड़ास’ वैसे तो ‘भड़ास4मीडिया’ है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, ‘मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो’ या ‘इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस’ या ‘सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों?’ इत्यादि।

–‘भड़ास4मीडिया’ के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

-आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे ‘पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?’  

–ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

-‘भड़ास4मीडिया’ के विचार सेक्शन में एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

–आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

-क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम ‘भड़ास’ पर आप ख़ुद भी करते हैं?

–जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि ‘भड़ास’ का सर्वाइवल रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

-तथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

–बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

-आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

–परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

-यशवंत जी, आइए अब आपकी निजी ज़िंदगी की ओर रुख़ करते हुए चलते हैं… अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।

–मेरा गाँव अलीपुर बनगाँवा है। ग़ाज़ीपुर ज़िले से 22 किलोमीटर दूर। शहर में भी एक मकान है, जिसे बाबा ने बनवाया था, जहाँ रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई की। उसके पहले कक्षा आठ तक गाँव में रहकर पढ़ाई की। पिता का नाम लालजी सिंह है और माँ यमुना सिंह। पिता रिटायर्ड फ़ौजी हैं, माँ हाउस वाइफ। हम लोग तीन भाई हैं। बहन नहीं है। बहन न होने की कमी रक्षाबंधन के दिन ख़लती है।

-अपने बचपन के विषय में कुछ बताएँ।

–बचपन में हाईग्रेड की शरारतें करता था। पैसा चोरी से लेकर भुट्टा व गन्ना चोरी तक। इन्नोवेशन हर फ़ील्ड में करता था, बचपन में ही। सेक्स से लेकर समाधि तक में बचपन में प्रयोग किया। कभी परम पुजारी बन जाता था, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड याद करके, तो कभी गाँव से बाहर किसी खेत में हम कुछ मित्र अपने गुप्तांगों का सामूहिक प्रदर्शन कर इस छुपी दुनिया के रहस्य जानने की कोशिश करते।

-अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।

–गाँव में ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। बाद में ग़ाज़ीपुर ज़िले के इंटर कॉलेज से इंटर किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए किया और उसके बाद बीएचयू से बीजेएमसी की डिग्री ली।

-दिल्ली कब और कैसे आना हुआ और गाँव और शहरी जीवन तथा ग़ाज़ीपुर और दिल्ली में आपने कितना अंतर पाया और इसने आपको कैसे प्रभावित किया?

–दिल्ली चार साल पहले आया। पहले दिल्ली से डर लगता था, लेकिन दिल्ली आने की ठान भी चुका था, क्योंकि प्रतिभाओं को सही मुक़ाम दिल्ली-मुंबई में ही मिल पाता है। दिल्ली में सारी टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ लोग हैं। इससे अगर आप प्रयोगधर्मी हैं तो काफ़ी कुछ सीखने-करने की ग़ुंजाइश होती है। बाक़ी गाँव के लोगों को शहरी जीवन में जो मुश्किलें होती हैं, वो मेरे साथ भी होती रही हैं। भीड़ में अकेले होने का भाव, सामूहिकता का अभाव। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में भावनाओं को न समझा जाना आदि-आदि।

-अध्ययन के दौरान आपने आजीविका के लिए कौन-सा क्षेत्र चुना था? और बाद में क्या परिस्थितियाँ बनीं? क्या मनचाही फ़ील्ड में कार्य किया या समझौता करना पड़ा?

–अध्ययन करने इलाहाबाद पहुँचा तो मक़सद था, आईएएस बनना, पर बीच पढ़ाई में भगत सिंह को आदर्श मानते हुए ग़रीबों के लिए लड़ने और सिस्टम से लोहा लेने को एक नक्सलवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और पूरी तरह, होलटाइमर के रूप में काम करने लगा। बाद में लगा कि इतना मुश्किल काम मैं नहीं कर सकता।

-पत्रकारिता में आपकी रुचि कब पैदा हुई? और किस-किस मीडिया संस्थान में कार्य किया? और वहाँ आपके अनुभव कैसे रहे?

–पत्रकारिता में रुचि पॉलिटिकल एक्टीविज़्म के दौर में पैदा हुई। अमर उजाला और जागरण में काम किया। दोनों जगहों के अच्छे व बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे।

-साथी कर्मचारियों में आपकी छवि कैसी थी और उनका आपके प्रति कैसा व्यवहार था?

–चूँकि मैं ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा इन्नोवेशन के साथ काम करता हूँ, और ऐसे ही लोगों को पसंद करता हूँ तो कई बार जो लोग मेरी सोच के अनुसार नहीं चल पाते, उनसे मतभेद-मनभेद आदि होते रहते हैं।

-बॉस और कर्मचारियों के रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं। बॉसों की क्रूरता के बहुत से क़िस्से प्रचलित हैं। आपके और आपके बॉसों के रिश्ते कैसे थे?

–आम तौर पर मेरे बॉस ही मुझसे डरा करते थे, क्योंकि मैंने कभी किसी बॉस की चेलहाई नहीं की। वीरेन डंगवाल जैसे संपादकों के साथ काम किया, जो चेला नहीं, अच्छे दोस्त की तरह अपने अधीनस्थों से काम करते-कराते हैं।

-मीडिया छोड़कर कुछ दिनों आपने एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर भी काम किया। ये फ़ील्ड में परिवर्तन कैसे हो गया?

–एक टीवी संपादक से रात में फ़ोन पर गाली-गलौज हो गई और उन्होंने मेरी गालियों को रिकॉर्ड कर दैनिक जागरण के मालिक के पास भेज दिया तो इस स्टिंग में मैं नप गया। पत्रकार की नौकरी हर जगह तलाश की। नौकरी न मिली तो जो मिला उसको ग्रहण कर लिया। मार्केटिंग फ़ील्ड में जाने से बहुत कुछ नई चीज़ें समझ में आईं और उसी समझ के कारण मुझे लगा कि ख़ुद का काम करना चाहिए, किसी की नौकरी करने की जगह।

-नौकरी के वक़्त का कोई रोचक प्रसंग बताइए।

–अमर उजाला कानपुर की बात है. एक बार मेरे संपादक वीरेन डंगवाल ने मुझे डाँटा, तो मैंने उन्हें चुपके से इस्तीफ़ा थमा दिया और कमरे पर जाकर दारू पीने लगा। उन्होंने कुछ वरिष्ठों को मुझे मनाने के लिए भेजा, पर मैं नहीं माना। सुबह संदेशा भिजवाकर अपने कमरे पर बुलवाया। उन्होंने कहा कि तुम पहले तय कर लो कि जीवन में करना क्या है। तुम आईएएस बनने इलाहाबाद गए थे, वह न बन सके। लगे क्रांति करने। क्रांति करने के लिए निकले तो वो न कर सके। चल पड़े पत्रकार बनने। अब पत्रकारिता की राह छोड़ने की बात कर रहे हो। जीवन में इतनी अस्थिरता ठीक नहीं। अपनी प्रियारटीज़ तय कर लेनी चाहिए। उनकी इस बात ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया और तय किया पत्रकारिता के क्षेत्र में लगकर काम करना है, सो उनकी प्रेरणा से आज तक इस पेशे में बना हुआ हूँ।

-ब्लॉगिंग में रुचि कैसे हुई?

–वो हिन्दी ब्लॉगों के शुरू होने का दौर था। कई ब्लॉग खुल रहे थे, सो मैंने भी एक ब्लॉग बनाने का निश्चय किया और कुछ अलग-सा, कुछ हटके ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया में ‘भड़ास’ ब्लॉग बनाया।

-ब्लॉग तो ठीक है, पर उसका नाम ‘भड़ास’ कैसे सूझा?

–यूँ ही। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगों के जितने नाम थे, सबको देखने के बाद लगा कि अलग व विचित्र-सा नाम ‘भड़ास’ ही है, जो हिन्दी की देसज आत्मा को प्रतिध्वनित करता है और यह भी बताता है कि हम हिन्दीवालों में शहरों और अंग्रेज़ियत के ख़िलाफ़ काफ़ी भड़ास है, जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है।

-और उसके बाद ‘भड़ास4मीडिया’ वेबसाइट शुरू करने का ख़याल कैसे आया?

–‘भड़ास’ ब्लॉग पर मीडिया से संबंधित पोस्टों को काफ़ी लोकप्रियता मिलने लगी। कम्युनिटी ब्लॉग होने के कारण ढेरों लोग डायरेक्ट अपनी जानकारियाँ पोस्ट करने लगे कि फलाँ पत्रकार ने फलाँ जगह ज्वॉइन कर लिया, उनको बधाई। इस तरह से करते-करते मुझे लगा कि मीडिया पर सेंट्रिक हिन्दी में एक अलग पोर्टल होना चाहिए।

-पाठकों का तो ‘भड़ास’ को खूब प्रतिसाद मिला, लेकिन आपके मित्रों और नज़दीकी लोगों ने इसे कैसे लिए और कितना सहयोग किया?

–मिला-जुला रहा। ‘भड़ास’ ब्लॉग के कारण जागरण में एक बार नौकरी जाते-जाते बची थी। तब ‘भड़ास’ को डिलीट करना पड़ा था। वहाँ से मुक्त होने के बाद फिर ‘भड़ास’ बनाया। कई दोस्त बने ‘भड़ास’ के कारण और कई दुश्मन भी पैदा किए ‘भड़ास’ ने।

-‘भड़ास’ के शुरुआती दौर में जब मैं आपसे मिला था, आपने बताया था कि उस वक़्त आपके किसी परिचित ने ‘भड़ास’ के नाम का ग़लत इस्तेमाल किया था। क्या इस तरह के वाक़ये भी हुए और आप उनसे कैसे निपटे?

–पहले मुझे लगता था कि ‘भड़ास’ का मतलब यशवंत सिंह होना चाहिए। अब मुझे लगता है कि भड़ास या कोई और शब्द किसी एक का नहीं है, सबका होना चाहिए। इसी कारण ‘भड़ास’ नाम से ढेरों ब्लॉग और पोर्टल बन रहे हैं और यह सब देखकर मुधे ख़ुद पर गर्व होता है कि मैंने एक शब्द को इतनी ताक़त दे दी।

-‘भड़ास’ के पहले और बाद में मीडिया को लेकर आपके नजरिए में कितना और क्या बदलाव आया?

–पहले मीडिया रूपी समुद्र में मैं एक तैराक भर था। अब मीडिया रूपी समुद्र का सर्वेयर हूँ जो तैराकों पर नज़र रखता है और उनके भले-बुरे को समझता-महसूसता है और दुनिया को बताता है। बहुत बदला हूँ अंदर से, यह काम करते हुए। कई बार मैं कन्फ़्यूज़्ड हो जाता हूँ कि सही क्या है और ग़लत क्या है। कई बार मुझे सही कहे जाने वाला व्यक्ति ज़्यादा ख़राब दिखता है, बजाय बुहरा कहे जाने वाले से।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या था और क्या ‘भड़ास4मीडिया’ ने इसे पूरा किया?

–लक्ष्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं पर मेरा एक मक़सद शुरू से रहा है मनुष्यता के लिए किसी बड़े स्तर पर काम आना और काम करना। मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, भगत सिंह जैसे लोग मेरे आदर्श रहे हैं और इसमें दर्शन सिर्फ़ एक है कि मनुष्य को कैसे उसके दुःखों से मुक्ति दिलाई जाए। मुझे लगता है कि अंततः मैं कोई आध्यात्मिक टाइप का जीव हो जाऊँगा जो अपने में मगन रहेगा, गाते-माँगते।

-‘भड़ास’ ने वेब-पत्रकारिता में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। कैसा अनुभव है इतने लोकप्रिय पोर्टल का मॉडरेटर और मालिक होने का, जिससे इतने सारे लोग जुड़े हैं और रोज़ देखते-पढ़ते हैं?

–मालिक होने का भाव रोज़ सुख नहीं देता। इस सुख का अहसास तब होता है, जब कराया जाता है। जैसे आपने अभी अहसास कराया है, तो मुझे महसूस हो रहा है कि हाँ, मैं मालिक हूँ। लेकिन सही बात तो यह है कि मैं क्लर्क हूँ जो पूरे दिन लोगों के मेलों का निस्तारण करता रहता है, उनकी सूचनाओं पर काम करता है। इसी ऊर्जा ने ‘भड़ास’ को खड़ा किया और कोशिश करता हूँ कि यही ऊर्जा क़ायम रहे।

-‘भड़ास’ ने अनेक मामले ऐसे उठाए हैं, जो मीडिया हाउसों के मालिकों और प्रबंधकों को पसंद नहीं आए। इन लोगों ने आप पर अनेक मुक़दमे दायर किए हैं। हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इस वक़्त आप पर कितने मुक़दमे चल रहे हैं; उनकी क्या स्थिति है और ‘भड़ास’ उनसे कैसे निपट रहा है?

–क़रीब एक दर्जन मुकदमे हैं। कई नोटिस हैं। हम लोगों ने भी एक लीगल सेल बना दिया है। जब तक आप ज़िंदा हैं, यह मानकर चलिए कि केस, मुक़दमे, थाना, पुलिस ये सब आपके जीवन के हिस्से हैं। इनसे अगर आप बचे हुए हैं, तो आप बहुत सीमित दुनिया में जी रहे हैं। जो लड़ते हैं, उन्हें हराने के लिए चौतरफ़ा घेराबंदी होती है और सिस्टम का हर अंग-प्रत्यंग उसे भाँति-भाँति से क़ाबू में करने की कोशिश करता है। पर अच्छी बात है कि अगर आप सही हैं तो बहुत देर तक कोई आपको परेशान नहीं कर सकता।

-इतना बड़ा और जटिल पोर्टल चलाना बहुत तनाव भरा काम है। कभी-कभी ये आपके लेखों में भी झलकता है। इतनी मुश्किलें, उलाहने, आलोचना और मुक़दमेबाज़ी से कभी निराशा भी होती होगी। ऐसे हालात में स्वयं को कैसे संभालते हैं और फिर से ऊर्जा और आशा कहाँ से जुटाते हैं?

–दारू पीकर, भजन गाकर। सच बता रहा हूँ। दारू मेरे लिए मुक्ति का माध्यम है। कुछ लोगों के लिए सेक्स होता है, कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ संगीत होता है। पर मेरे लिए दारू और संगीत, दोनों मिक्स होकर परम मुक्ति के मार्ग बन जाते हैं और मैं अपने सारे अवसाद, दुःखों, तनावों को इसमें होम कर देता हूँ। किसी के प्रति कोई पाप जो होता है मन में, वो भी इसी अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

-यदि ‘भड़ास’ न होता तो आज आप क्या कर रहे होते?

–किसी कंपनी में पत्रकार या मार्केटियर बनकर नौकरी कर रहा होता। बच्चों, पत्नी को जिलाने में अपनी ज़िंदगी होम कर रहा होता।

-अपनी रुचियों (हॉबीज़) के विषय में कुछ बताइए। फ़ुरसत का वक़्त कैसे बिताते हैं?

–इधर तो मेरी एक ही हॉबी है, भड़ास और सिर्फ़ भड़ास। इस कारण ज़्यादातर वक़्त भड़ास के लिए देना पड़ता है। बचे हुए वक़्त में दारू और म्यूज़िक।

-हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि ‘भड़ास’ का कामकाज कैसे चलता है? कितने लोग इस काम में आपका हाथ बँटाते हैं और ख़बरें कैसे जुटाते हैं और कैसे प्रकाशित की जाती हैं?

–ख़बरें जनता भेजती है। मीडिया के लोग भेजते हैं। छह लोगों की टीम है, जिनमें कुछ अंशकालिक और कुछ पूर्णकालिक हैं। अनिल सिंह कंटेंट एडिटर हैं, जो अमूमन ख़बरों के संपादन व प्रकाशन का काम करते हैं। पोर्टल के लिए पैसे वग़ैरह के जुगाड़ में मैं लगा रहता हूँ ताकि सर्वर का खर्चा और हम लोगों रहने-खाने का खर्चा निकलता रहे।

-‘माँ को न्याय’ ‘भड़ास4मीडिया’ का बहुत ही मार्मिक प्रसंग था। आपको क्या लगता है कि हम पत्रकार इतने कमज़ोर क्यों हैं कि अपनी माँ को छोड़िए, ख़ुद तक को इंसाफ़ नहीं दिला पाते?

–जैसा सिस्टम होता है, वैसा ही असर उस समय की जनता पर पड़ता है। मैं तो भाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी माँ के लिए अभियान चलाया। तमाम लोग तो पुलिस के चंगुल में फँसकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम लगातार असंवेदनशील, क्रूर, भ्रष्ट और आपराधिक होता जा रहा है। जनविरोधी सिस्टम में आम जनता को न्याय नहीं मिल पाता। सिर्फ़ ताक़तवर और पैसे वाले लोग ही न्याय ख़रीद कर अपने को सुरक्षित रख पाते हैं। ऐसे माहौल में लगता है कि अब बिना किसी क्रांति से कम पर काम चलने वाला नहीं है। पत्रकार भी तो किसी मीडिया कंपनी में नौकरी करते हैं। अगर मीडिया कंपनी न चाहे, तो भला कौन पत्रकार अपने लिए लड़ पाएगा।

-वर्तमान मीडिया पर कुछ सवाल। मीडिया की वर्तमान स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

–परंपरागत मीडिया जनता के सुखों-दुःखों से तेज़ी से कट गया है तथा विज्ञापन के लिए सिर्फ़ मेट्रो केंद्रित, शहर केंद्रित है जो बहुत दुःखद है। वर्तमान मीडिया में पेड न्यूज़ का चलन भयंकर रूप से बढ़ा है और इस पर नियंत्रण के लिए चारों ओर से आवाज़ उठने का क्रम शुरू हुआ है।

-आपके विचार मीडिया के क्या दायित्व है और क्या वर्तमान मीडिया अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन कर पा रहा है?

–मीडिया का उद्देश्य समाज को जाग्रत करना है, सही दिशा दिखाना है, वैज्ञानिक सोच पैदा करना है। पर दुःखद है कि कई चैनल व अख़बार समाज को मध्ययुगीन दौर में ले जाने का काम कर रहे हैं।

-हाल ही में राडिया टेप प्रकरण ने मीडिया की छवि को बहुत नुक़्सान पहुँचाया है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

–अब लोग पत्रकारों से पूछने लगे हैं कि आप मीडिया से हैं या राडिया से। यानी मीडिया में ऊपर के स्तर पर दलालों की जो बड़ी फ़ौज तैयार कर दी गई थी, उसके चेहरे का पहली बार ऐसा ख़ुलासा हुआ है। मुनाफ़ा कमाने के लिए मीडिया कंपनियाँ संपादक की नियुक्ति करती हैं और इसी वजह से राडियाएँ उन्हें जूती के नीचे रखने की कोशिश कर रही हैं।

-भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

–बहुत जल्दी मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ। वैसे मन से तो मैं संन्यासी बन चुका हूँ, अब तन से भी बनना है। संन्यासी का यहाँ आशय भगवा पहनने और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाकर राम-राम करने से नहीं बल्कि लोगों को ख़ुश रखने, लोगों को जागरूक करने, लोगों से इंटरेक्ट करने जैसे स्वांतः सुखाय काम में लगना है। आजकल मैं गाता भी रहता हूँ, कबीर को…”नइहरवा हमका न भावे..” और “मन लागा यार फ़क़ीरी में..”

-“मीडिया साथी डॉट कॉम” की ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ और अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

–आपका भी बहुत धन्यवाद।

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