गोपाल सुब्रमण्यम ने मजीठिया लागू करवाने का आश्वासन दिया

देश भर से इस बात को लेकर पूछताछ की जा रही है कि 16 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले में हुई सुनवाई के दौरान क्या हुआ। हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में कई अखबार कर्मी मौजूद थे। उन्होंने बाकी साथियों को इस संबंध में सूचनाओं का आदान-प्रदान भी किया है, फिर भी जिज्ञासा बनी हुई है। हालांकि इस दिन अखबार कर्मियों के पक्ष में कोई भी सुनवाई नहीं हुई। इस दौरान विशेषतौर पर इनाडू अखबार के प्रकाशक उषोदया पब्लिकेशन्स की ओर से उस समय आशा की किरण दिखाई दी, जब सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रामण्यम ने यह कहते हुए कोर्ट से समय की मांग की कि वह मजीठिया वेजबोर्ड कार्यान्वयन से जुड़े विवरण पर अपने मुवक्किल एवं अखबार के मालिक रामोजी राव से चर्चा करना चाहते हैं।

अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड लागू करें अन्यथा जेल जाएंगे : एडवोकेट परमानन्द पांडे

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में मीडिया कर्मियों की तरफ अखबार मालिकों के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट परमानंद पांडे को मीडिया का भी काफी तजुर्बा है। वे इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट के सेक्रेटरी जनरल भी हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके परमानंद पांडे पर मीडियाकर्मियों को पूरा भरोसा है। वजह भी साफ़ है। परमानंद पांडे मीडियाकर्मियों का दर्द जानते हैं। यही वजह है कि वे माननीय सुप्रीमकोर्ट में सटीक मुद्दा रखते हैं। जो बात कहना रहता है पूरे दम से कहते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड मामले पर एडवोकेट परमानंद पांडे से बात किया मुम्बई के निर्भीक पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकान्त सिंह ने। पेश है बातचीत के मुख्य अंश…

Action Taken Report of Rajasthan speaks more about its inaction

Govt. of Rajasthan has yesterday filed ‘Action Taken Report’ on the implementation of the Majithia Wage Board Award in the Supreme Court. The State Government had earlier filed a status report, which contained the appointment of the Labour Inspectors and the submissions of employers and employees. In this report the State Government has informed that notices were issued to 893 newspaper establishments out of it 298 were daily newspapers, 220 weekly newspapers, 358 fortnightly newspapers and 17 monthly newspapers. As a matter of fact, this humongous exercise of the Public Relations Department has created more confusion than clarity with regard to the implementation by the newspaper owners and steps taken by the State Government to accelerate the implementation process.