अमर उजाला के संपादक के खिलाफ बुलंदशहर में एफआईआर दर्ज

बुलंदशहर नगर कोतवाली में अमर उजाला के संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। सिंचाई विभाग के अवर अभियंता की तहरीर पर जिला प्रशासन की तरफ से यह एफआईआर दर्ज कराई गई। संपादक के खिलाफ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर यह एफआईआर दर्ज कराई गई है।

संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज होते ही बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ आशीष कुमार के पसीने छूट गए है। ब्यूरो चीफ ने डीएम और एसएसपी से काफी अनुरोध किया कि संपादक के खिलाफ एफआईआर दर्ज न हो, लेकिन ब्यूरो चीफ की एक नहीं चली। बताया जा रहा है कि एफआईआर दर्ज होने से अमर उजाला के संपादक डॉ इंदु शेखर पंचोली बुलंदशहर के ब्यूरो चीफ से काफी नाराज हैं। देखें एफआईआर की कापी…

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मजीठिया वेज बोर्ड से डरे अमर उजाला प्रबंधन ने भी डंडा चलाना शुरू किया

मजीठिया वेज बोर्ड का खौफ अखबार मालिकों पर इस कदर है कि वह सारे नियम कानून इमान धर्म भूल चुके हैं और पैसा बचाने की खातिर अपने ही कर्मचारियों को खून के आंसू रुलाने के लिए तत्पर हो चुके हैं. इस काम में भरपूर मदद कर रहे हैं इनके चमचे मैनेजर और संपादक लोग. खबर है कि अमर उजाला प्रबंधन ने मजीठिया वेज बोर्ड से बचने की खातिर कर्मचारियों का तबादला करना शुरू कर दिया है. साथ ही इंप्लाइज की पोस्ट खत्म की जा रही है.

सूत्रों के मुताबिक अमर उजाला प्रबंधन अपना रजिस्टर्ड आफिस का एड्रेस नोएडा से हटाकर दिल्ली कनाट प्लेस दिखा रहा है. कर्मचारियों की सेलरी स्लिप भी चेंज कर दी गई है. वैसे तो अमर उजाला वाले खुद को भारत का तीसरे नंबर का अखबार बताते फिरते हैं लेकिन जब मजीठिया वेज बोर्ड देने की बारी आती है तो वो अपने को पांचवें ग्रेड का अखबार दिखाने लगते हैं. कहा जा रहा है कि आगे आने वाले दिनों में कई लोगों को नौकरी से निकाला भी जा सकता है.

अमर उजाला के एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अमर उजाला में हो रहा शोषण, 5 दिन की सेलरी देकर 6 दिन काम ले रहे नए संपादक

प्रिय भड़ास,

यह सिर्फ शिकायती पत्र नहीं है। न ही किसी एक व्यक्ति की ओर से है। यह अमर उजाला के पीड़ित और शोषित कर्मचारियों की ओर से है। इस पत्र के जरिए नव नियुक्त संपादक महोदय की तानाशाही को उजागर किया जा रहा है। AUW यानि अमर उजाला वेबसाइट में इन दिनों कर्मचारियों का जमकर शोषण हो रहा है। इस पत्र के जरिए श्रम विभाग से गुहार है कि वह कर्मचारियों के साथ हो रहे अन्याय की पड़ताल करे।

आने वाले दिनों अमर उजाला की वेबसाइट नई ‘ऊंचाइयों’ को छूने वाली है, ठीक वैसे ही जैसे की हिंदुस्तान की छू रही है। इसका कारण भी वही होंगे जो हिंदुस्तान से अब अमर उजाला पहुंच गए हैं। यूं तो जनाब खुद को बड़ा लो प्रोफाइल एडिटर बताते हैं, पर अब पता लग रहा है कि वाकई कितनी ‘निम्न श्रेणी और निम्न सोच’ के आदमी हैं। हालांकि उम्मीद करते हैं कि वे अमर उजाला की रोशनी बनाए रखेंगे,  हालांकि ये मुश्किल नजर आ रहा है। जिस तरह का माहौल वे बना रहे हैं और जिस तरह से कंटेंट टीम का शोषण कर रहे हैं,  निश्चित ही अमर उजाला को भविष्य में इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। शोषण और निकृष्टता का वातावरण तैयार करने की कुछ बानगी देखिए…

– सबसे पहले 5 दिन से 6 दिन का काम कर दिया गया वो भी सिर्फ कंटेंट टीम के लिए। हैरानी तब होती है जब HR और मैनेजमेंट इस बारे में सूचित नहीं करते, महाशय करते हैं तो इसे किसका निर्णय समझा जाए। जबकि महाशय जी ठीकरा फोड़ते हैं मैनेजमेंट के सिर पर।

– एक और बात समझ नहीं आई, अगर एचआर पॉलिसी में ही बदलाव किया है तो फिर ये कैसी पॉलिसी है जो कंटेंट के लिए 6 दिन औऱ बाकी सबके (प्रोडक्ट, मैनेजमेंट, मार्केटिंग, आईटी) के लिए 5 दिन की है।

– एचआर पोलिसी में साफ-साफ 5 दिन काम करवाने का प्रावधान है, उसी हिसाब से सबकी सैलरी और छुट्टियां तय हुई हैं। पर अब 6 दिन के हिसाब से न तो किसी की सैलरी बढ़ाई गई जा रही है और ना ही सालभर में मिलने वाले छुट्टियों जैसे अन्य लाभ।  सबूत के तौर पर HR Policy का ये स्नैपशॉट देखिए….

– 6 दिन काम का फरमान सुनाते वक्त कहा गया कि ‘उत्पादकता’ घटी है, ‘बुद्ध पुरुष’ ने यह नहीं पूछा कि किस सेक्शन में कितने काम कर रहे हैं। फीचर में तो एक-एक आदमी के हवाले पूरा का पूरा सेक्शन है। तो छुट्टी वाले दिन भी लोग घर से जुटे रहते, कर्मठता का सिला ये मिला कि अब न घर से काम कर सकते हैं और ज्यादा दिन ऑफिस भी आना है। जबकि तनख्वाह तो बढ़ेगी ही नहीं। न्यूज टीम का हाल तो उससे भी बुरा है। यहां अब चमचों की भर्ती के लिए पुराने कर्मठ लोगों को ‘चाटुकार’ के जरिए परेशान किया जाने लगा है।

– चाटुकारों की मौज… जब से नए महाशय ने कार्यभार संभाला है ऑफिस वालों को एक नया चाटुकार देखने को मिला है… चाटुकार आजकल जी-हुजूरी में ही लगे रहते हैं। सब कंटेंट वाले जब एक स्वर में 6 दिन के लिए बात करने वाले थे तो इन्हीं चाटुकार महोदय ने आकर सबको मीठी गोली दी और अपनी चाल चल कर दोनों ओर से भले बने रहे।

– एचआर में AUW को नया आदमी दिया गया है, पर ये HR का कम और महाशय का ‘झंडू’ ज्यादा नजर आता है।

– वर्क फ्रॉम होम खत्म…. डिजिटल में काम करने वाले इस बात से वाकिफ हैं कि वर्क फ्रॉम होम की अहमियत और जरूरत क्या है… पर लगता है जनाब अभी तक प्रिंट की आदतें ही नहीं छोड़ पा रहे। तभी तो जरुरतमंदों के लिए भी इसे खत्म कर दिया गया।

– छुट्टियां अधिकार है पर ले के तो दिखाओ…. एक बैठक में कहा गया छुट्टियां कर्मचारी का अधिकार है जरुर लें, पर कोई दे तो।

– एक साथी कर्मचारी पिछले दिनों दुर्घटना का शिकार हुए उन्हें छुट्टियां मिलने में जो मुश्किल आ रही है सो तो अलग है उन्हें घर से भी काम नहीं करने का विकल्प नहीं दिया जा रहा। इससे ज्यादा शोषण और अमानवीय व्यवहार और क्या होगा।

–  चाय तक पर रोक लगी है… एक वक्त था जब चार लोग साथ चाय पी सकते थे पर अब तो अकेले चाय पीने के लिए भी सोचना पड़ता है। जबकि चाटुकार खुद पर 5 मिनट में ऑफिस के बार दिखते है। तर्क है कि इससे समय बर्बाद होता है, पर हम पूछते हैं कि हे बुद्ध पुरुष जरा बताओ चार लोग जाएं या एक 10-15 मिनट में लौट आएंगे। जबकि एक-एक जाएगा तो 6 आदमी औसत में 60 मिनट बिता आए। पता नहीं किस बुद्धिमान ने महाशय को यह सलाह दी या उनकी खुद की बुद्धिमानी है। 

– कर्मचारियों पर बेवजह की तांकाझांकी…. अधिकारियों का काम मैनेज करना होता है न कि जासूसी करना, पर जनाब को काम तो करना नहीं जासूसी जरूर करनी है। ऑफिस के कोनों से यूं झांकते रहते हैं मानो सारे कामचोर बैठे हों। इससे आप की ही इज्जत कम होती है महाशय जी।

– इसी माहौल को देखते हुए इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है और नहीं मैनेजमेंट को चेतावनी है कि अगर माहौल नहीं बदला तो जल्द ही हड़ताल भी हो सकती है।

नए महाशय का कहना है कि यहां बडे़ नाम वाले संपादक आए और गए पर ‘कुछ नहीं’ कर गए। शायद उनका इशारा कर्मचारियों के शोषण की ओर था जिसकी कलई अब धीरे-धीरे खुल रही है। इस पत्र के जरिए हम सब मैनेजमेंट और मालिकों से कहना चाहते हैं कि इस महाशय के निर्णयों से अमर उजाला की साफ सुथरी और कर्मचारी हितैषी छवि को निश्चित ही अपूरणीय नुकसान हो रहा है और आगे भी होगा।

मैनेजमेंट और मालिकों को चाहिए कि वे पुनर्विचार करें कि कही ‘बंदर के हाथ में बंदूक’ तो नहीं दे दी गई है। अभी तो हिटलरशाही का वातावरण तैयार हो रहा है, धीरे-धीरे वो वक्त आएगा जब कर्मचारी के गुस्से का फल गिरती विजिटर संख्या के रूप में दिखेगा। महाशय से भी यही प्रार्थना है कि ‘जड़ता’ को छोड़ दें औऱ डिजिटल बनें। हो सकता है आप अनुशासन के नाम पर डर पैदा कर रहे हों और संभवतः यही आपके लिए आत्मघाती साबित हो। रही बात नजरों की तो वो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गिरे हैं कि नहीं।

सादर

अमर उजाला कंटेंट के सभी डिजिटल मजदूरों की ओर से

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हरियाणा में अमर उजाला ने मारा सर्वेयरों का वेतन!

नमस्कार सर

मैं अपना नाम पहचान छिपा कर यह पत्र लिख रहा हूं. मैं रोहतक हरियाणा का रहने वाला हूं. मैंने कई महीनों से अमर उजाला रोहतक का सर्वे ज्वाइन कर रखा था लेकिन पिछले तीन महीनों से सर्वे बंद है. वजह है कि अमर उजाला ने आखिरी दो महीनों का हमारा आधा आधा वेतन नहीं दिया. दरअसल अमर उजाला में सर्वेयर की सैलरी 7500 है, बिना किसी छुट्टी के. लेकिन अचानक से सितंबर महीने में हमारी सैलरी ये कहकर पूरी नहीं दी गई कि बाद में देंगे.

जब हमें बाद में भी वेतन नहीं मिला तो आखिर हमने 22 अक्टूबर को सर्वे का काम छोड़ दिया. उस समय सर्वे में लगभग सात लड़के थे. सबके छोड़ने के कारण ही अमर उजाला का सर्वे भी बंद हो गया. अब हमारी पूरी सर्वे की टीम जब भी अमर उजाला में सैलरी के लिए जाती है तो कभी कह दिया जाता है आज सर नहीं है. कभी कोई दूसरे किस्म का बहाना / आश्वासन मिलता है.

जब हमने पता लगाने की कोशिश की तो पता चल रहा है कि हमारी सैलरी आगे से आ चुकी है, कुछ छोटे पद के लोगों ने जानबूझ कर रोक रखी है. इस समय दूसरे अखबारों की वजह से अमर उजाला की कापियां लगातार कम होती जा रही हैं. ऐसे में अब अमर उजाला को अखबार में विज्ञापन निकालने के बाद भी सर्वेयर नहीं मिल रहे तो हमसे कहा जा रहा है कि तुम फिर से सर्वे चालू करो, पिछला हिसाब भी कर देंगे. लेकिन हम पहले हिसाब मांगते हैं तो उनका गोलमोल जवाब शुरू हो जाता है. फिलहाल एक बार फिर सर्वेयरों ने जीएम से मिलने की तैयारी की है. अगर बात नहीं बनी तो तो सभी सर्वेयर लेबर कोर्ट जाने की योजना बनाए हैं. यदि इसमें आप हमारी कुछ मदद कर सकें तो हम सभी आपके आभारी रहेंगे.

एक सर्वेयर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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अमर उजाला मुरादाबाद में भारी चूक, एक खबर को दो बार अलग-अलग हेडिंग से लगाया गया

ऐसा लग रहा है कि अमर उजाला मुरादाबाद संस्करण को खबर की कमी हो रही है. तभी तो एक ही खबर को अलग अलग हेडिंग से और अलग फोटो के साथ प्रकशित किया गया है. 15 दिसम्बर के पेज नंबर दो पर अमर उजाला ने एक ही खबर को कॉपी कर के अलग अलग हेडिंग “पुलिस ने पकडे जुआरी, 3 को छुड़ा ले गए नेता जी” और “30-50 रूपये में आपका कूड़ा कूड़ा उठायगी हरी भरी” से लगा दिया है.

इस चूक की चर्चा पूरे शहर में हो रही है. लोगों का कहना है कि क्या अमर उजाला के पास खबरों का अकाल पड़ गया है या अमर उजाला की छवि धूमिल करने की कोई सोची समझी साजिश रची गई है. देखें अख़बार की कटिंग….

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अमर उजाला कानपुर में श्रम विभाग का छापा

मजीठिया वेज बोर्ड मामले को लेकर माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश का असर उत्तर प्रदेश में दिखने लगा है। कानपुर में अमर उजाला के कार्यालय पर श्रम अधिकारियों की टीम ने औचक छापा मारा और जरूरी दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिया। बताया तो यहाँ तक जारहा है कि श्रम अधिकारियों ने अमर उजाला के कार्मिक विभाग का हार्डडिस्क भी अपने कब्जे में ले लिया। हालांकि हार्ड डिस्क वाली बात की पुष्टि नहीं हो पाई है।

बताते हैं कि जिस समय यह छापा पड़ा, सभी कंप्यूटर और यहाँ बने छोटे छोटे केबिन बंद कर दिए गए। मार्केटिंग और कांट्रेक्ट पर काम करने वाले कई साथियों को बाहर से ही प्रबंधन ने वापस भेजने का प्रयास किया मगर वे सफल नहीं हो पाए। इस कार्रवाई से अमर उजाला प्रबंधन के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही हैं, वहीँ अमर उजाला के कर्मचारी बहुत खुश हैं। आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के लेबर कमिश्नर को लापरवाही बरतने पर काफी लताड़ लगाते हुए जेल भेजने की धमकी दी थी और 6 सप्ताह में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कराकर पूरी रिपोर्ट मंगाई है।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता
9322411335

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अमर उजाला में कई बड़ी यूनिटों के संपादक इधर-उधर, राजेश श्रीनेत की फिर हुई इंट्री

खबर है कि राजेश श्रीनेत फिर से अमर उजाला के हिस्से बन गए हैं और उन्हें अच्छी खासी जिम्मेदारी देते हुए गोरखपुर यूनिट का स्थानीय संपादक बना दिया गया है. राजेश श्रीनेत अमर उजाला के मालिक राजुल माहेश्वरी के करीबी माने जाते हैं. अभी तक राजेश श्रीनेत्र सतना से प्रकाशित मध्य प्रदेश जनसंदेश नामक अखबार के संपादक हुआ करते थे. राजेश श्रीनेत की अमर उजाला में वापसी को आश्चर्य की नजर से देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि राजुल माहेश्वरी अपने पुराने भरोसेमंद लोगों पर दांव लगाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं.

अभी तक अमर उजाला गोरखपुर के स्थानीय संपादक के रूप में काम कर रहे प्रभात सिंह का तबादला कम महत्वपूर्ण यूनिट मुरादाबाद कर दिया गया है. सूत्रों के मुताबिक बरेली में प्रभात का घर और परिवार है, इसलिए वह मुरादाबाद आने चाहते थे. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि प्रबंधन ने रणनीतिक तौर पर उन्हें कम महत्वपूर्ण यूनिट का जिम्मा दिया है. मुरादाबाद के स्थानीय संपादक नीरजकांत राही को आगरा का संपादक बना दिया गया है. यह राही के लिए एक बड़ी छलांग है. आगरा के संपादक राजेंद्र त्रिपाठी को बनारस का संपादक बनाया गया है. बनारस के संपादक अजित वडरनेकर का तबादला झांसी यूनिट के संपादक पद के लिए कर दिया गया है. झांसी के संपादक हेमंत लवानिया रिटायर हो चुके है और एक्सटेंशन पर चल रहे थे, जिसकी अवधि पूरी हो गई.

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अमर उजाला वाले पत्रकार को न्यूज एजेंसी बना खूब कर रहे शोषण, सुनिए एक पीड़ित कर्मी की दास्तान

मीडिया संस्थान अमर उजाला में फुल टाइम कर्मचारियों को जबरन न्यूज़ एजेंसी का कर्मी बना कर उन्हें न्यूनतम वेतन लेने के दबाव बनाया जाता है. इसके लिए एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत समय-सीमा निर्धारित करके दबावपूर्वक लिखवाया जाता है कि वे (कर्मचारी) संस्थान के स्थाई कर्मचारी न होकर एक न्यूज़ एजेंसी कर्मी के तौर पर कार्य करेंगे. लेकिन असलियत ये है कि न्यूज़ एजेंसी संचालक से एक स्थाई कर्मचारी वाला काम लिया जा रहा है. उसे न्यूनतम वेतन पर सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक यानि 12 घंटे संस्थान के लिए कार्य करने को बाध्य किया जाता है.

अमर उजाला में जो फुल टाइम वर्कर हैं यानि पक्के कर्मचारी हैं, वे भी केवल 8 घंटे ही सेवाएं देते हैं. न्यूज़ एजेंसी संचालकों के लिए गाइडलाइन है कि वह किसी संस्थान के लिए बाध्य न होकर स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगे. आज कई न्यूज एजेंसियों को अमर उजाला ब्यूरो ऑफिस में गुलामी की नौकरी करने को मजबूर किया जा रहा है. न तो उन्हें आईकार्ड दिया जाता है, न पूरी सैलरी दी जाती और न ही उनको समय पर अवकाश दिया जाता है. उन्हें एक बंधुआ मजदूर बना दिया गया है. यदि कोई कर्मचारी इसका विरोध करता है तो उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. मीडिया संस्थान अमर उजाला के अधिकारियों और ब्यूरो प्रमुख द्वारा धमकी दी जाती है कि यदि किसी कर्मचारी ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई तो उसे नौकरी से हटा दिया जाएगा. रोज़गार छिनने का भय दिखाकर अमर उजाला संस्थान लगातार कर्मचारियों का शोषण कर रहा है. इस कुव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाने पर मुझे (अमर उजाला के कुरुक्षेत्र कार्यालय में सेवारत दीपक शर्मा) तानाशाहीपूर्ण रवैया दिखाते हुए ज़बरदस्ती नौकरी से हटाया जा रहा है.

मेरा अपराध ये रहा कि कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन द्वारा कही गई मौखिक बात को लिखित में मांग लिया था. टंडन ने कहा था कि हेमंत राणा ज्योतिसर, विशेष नाथ गौड़, राकेश रोहिल्ला और दीपक शर्मा को न्यूज एजेंसी संचालक होने के बावजूद सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक काम करना होगा. इसी बात को मैंने लिखित में हेड आफिस से मांग लिया. इसके बाद ब्यूरो प्रमुख ने हेड ऑफिस रोहतक में किसी संपादक से बात करके मुझे सर्विस से हटाने की रणनीति बना ली. न्यूज एजेंसी के कॉन्ट्रैक्ट में साफ़-साफ़ लिखा है कि अमर उजाला ने दीपक शर्मा न्यूज एजेंसी से तीन वर्षों के लिए अनुबंध किया है, जबकि अमर उजाला के जिला कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारियों ने तानाशाही दिखाते हुए लगभग आठ माह के अंतराल में ही मेरी सेवाओं को समाप्त कर दिया.

ब्यूरो चीफ ने दूसरों की खबरें की अपने नाम से प्रकाशित

अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन ने ऐसा भी किया कि न्यूज के लिए भागदौड़ तो की मैंने या किसी अन्य ने और न्यूज प्रकाशित कराई मुकेश टंडन ने अपने नाम से। उदाहरण के तौर पर…. ‘कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में बिना चेकिंग के एंट्री कर रहे वाहन’ शीर्षक के तहत खबर छपी थी जो कि मैंने बायलाइन भेजी थी, लेकिन ब्यूरो प्रमुख ने डेस्क पर बात करके इस पर से मेरा नाम हटवा दिया. दो दिन बाद जब इस खबर का इम्पेक्ट आया तो कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने यह इम्पेक्ट अपने नाम से प्रकाशित करा दिया, जिसका शीर्षक कुछ ऐसा था कि… ‘अब स्टिकर लगे वाहनों की होगी यूनिवर्सिटी में एंट्री’. जब इस न्यूज को लेकर मैंने मुकेश टंडन से बात की तो वे ताव में आ गए और बोले कि टंडन ब्यूरो चीफ है कुरुक्षेत्र का, जो मर्जी आए करूंगा, जो मेरे अंडर काम करता है वो मुझसे कुछ पूछ नहीं सकता.

ब्यूरो चीफ ने कई बड़े मामले दबा दिए गए

मैंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में नियमों को ताक पर रख आनन-फानन में एक असिस्टेंट प्रोफेसर को प्रोफेसर के पद पर प्रमोट करने का मामला कवर किया था. इस खबर को खंगालते वक़्त सामने आया था कि ये प्रमोशन की फ़ाइल कई बार रिजेक्ट हो चुकी थी. लेकिन अमर उजाला संस्थान के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने इस खबर को दबा दिया. इसके पीछे मुकेश टंडन की क्या मंशा थी या हेड ऑफिस रोहतक से किसी प्रकार के निर्देश आए थे, ये तो मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक वाले ही बेहतर जानते होंगे. लेकिन, कुछ भी बात रही हो, मेहनत करने के बावजूद इतनी बड़ी खबर न छापना कुछ और ही इशारा कर रहा था.

मैंने जब खबर न छपने बारे कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन से बात की तो वे बोले कि हेड ऑफिस वाले नहीं छाप रहे, उनकी मर्जी. इसके दो दिन बाद जब दोबारा यह न्यूज भेजने की रिक्वेस्ट की तो मुकेश टंडन बोले कि ऑनलाइन सॉफ्टवेयर पर खबर नहीं है. फिर जब कंप्यूटर के फोल्डर में सेव की गई यही न्यूज भेजनी चाही तो वहां से भी गायब थी. ये क्या ड्रामा चल रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा. मीडिया संस्थान अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारी क्यों संस्थान को बट्टा लगवाने पर तुले हुए हैं? पर कभी तो आवाज उठेगी और मीडिया संस्थान अमर उजाला की असलियत सबके सामने आएगी.

सवाल उठने लगे हैं-

-क्या तानाशाही का विरोध करने की ये सजा हो सकती है कि एक कर्मचारी को नौकरी से हटा दिया जाए?
-क्या सुबह 10 से रात 10 बजे तक काम करवाकर बंधुआ मजदूर बनाना ही अमर उजाला संस्थान का उद्देश्य है?
-क्या एजेंसी संचालक द्वारा कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख से 10 am to 10 pm कुरुक्षेत्र ब्यूरो में काम करने को लेकर हेड ऑफिस से लिखित में आदेश  मंगवाने की गुज़ारिश करना भी किसी अपराध की श्रेणी में आता है?
-क्या मीडियापर्सन या एक कर्मचारी का शोषण करने के लिए ही अमर उजाला संस्थान ने न्यूज एजेंसी की पॉलिसी अपनाई हुई है?
-एक कर्मचारी को जबरन एजेंसी बनाकर उसे बेहद कम वेतन पर मजबूर करना, क्या यही नियम, कायदा और न्याय है अमर उजाला का?

कीजिए सच का सामना, दीजिए जवाब.

कहते हैं जब किसी जानवर को खून मुंह लग जाता है तो उसकी मजबूरी हो जाती है बार-बार खून पीना. ऐसी ही स्थिति यहां भी दिखाई दे रही है. न जाने कितने ही कर्मचारियों को इस कुव्यवस्था का शिकार बनाया होगा आपने अभी तक और न जाने कितनों को बनाओगे. कुछ भी हो, एक दिन पोल खुलती ज़रूर है. अब वक़्त आ गया है अमर उजाला संस्थान की पोल खोलने का. आखिर में दो लाइनें कहना चाहूंगा…

आपकी भी कुछ मजबूरी रही, अब मेरी भी कुछ मजबूरी है,
जल्दी अब तैयारी करो, कोर्ट की कितनी दूरी है।
अच्छा किया या बुरा किया, तुम खूब जानो अमर उजाला के नुमाइंदों,
न्याय नहीं है तुम्हारी शरण में, अब कोर्ट की शरण जरूरी है।।

जय हिन्द…. जय भारत….

एक पीड़ित प्रताड़ित कर्मचारी

दीपक शर्मा

रिपोर्टर

कुरुक्षेत्र, हरियाणा

संपर्क: फोन 098132 88085 मोबाइल sdeepaknews@gmail.com

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मजीठिया वेज बोर्ड : अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़े (आखिरी पार्ट)

गतांक से आगे…

इससे पहले हम एक्‍स और वाई श्रेणी के शहरों में कार्यरत अमर उजाला के साथियों को अपने वेतन के तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए जानकारी दे चुके हैं। अब हम उमर उजाला के जेड सिटी यानि धर्मशाला, जम्‍मू आदि में कार्यरत सभी साथियों को तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए वेतनमान उपलब्‍ध करवा रहे हैं। यह वेतनमान (ग्रेड बी का) जुलाई 2015 से दिसंबर 2015 तक के बीच भर्ती नए साथियों पर लागू होते हैं। जिससे आसानी से जाना जा सकता है आप को बी ग्रेड के अनुसार वेतनमान मिल रहा हैं या नहीं है। (अपना शहर देखने के लिए देखें मजीठिया वेजबोर्ड की रिपोर्ट में पेज नंबर 37-38 या 55-56)

अनुसूची- I. क- बी ग्रेड समाचार पञ  (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(समाचार-पञ प्रतिष्‍ठानों में श्रमजीवी पञकारों का समूहन)

समूह-1: कार्यकारी संपादक, स्‍थानीय संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 22,000

Gross Salary: 58,748

समूह-2: सहायक संपादक, समाचार संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 20,000

Gross Salary: 53,744

समूह-3: मुख्‍य संवाददाता, मुख्‍य उप-संपादक,  सहायक समाचार संपादक, कार्टूनिस्‍ट, पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 18,000

Gross Salary: 48,739

समूह-4: वरिष्‍ठ उप-संपादक, डिप्‍युटी पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 43,735

समूह-5: उप-संपादक, रिपोर्टर, कलाकार, मुख्‍य प्रूफशोधक एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 38,731

समूह-6: प्रूफशोधक एवं अन्‍य… समस्‍त श्रमजीवी पञकार…

Basic: 13,000

Gross Salary:  36,228

अनुसूची- II.  बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारी-प्रशासनिक स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ सहायक महाप्रबंधक, वेब प्रशासक, इलैक्‍ट्रोनिक अथवा सॉफ्टवेयर अभियंता, मुख्‍य लेखाकार एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 43,735

समूह-2: अपर प्रबंधक, लेखा अधिकारी, कल्‍याण अधिकारी एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 38,731

समूह-3: अधिकारी अथवा विभागीय मुखिया, हेड क्‍लर्क, डीटीपी इंचार्ज, प्रोग्रामर एवं अन्‍य…

Basic: 12,000

Gross Salary: 33,726

समूह-4: वरिष्‍ठ स्‍टेनो सचिव, सुरक्षा पर्यवेक्षक एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 31,224

समूह-5: कनिष्‍ठ क्‍लर्क, टेलीफोन/फैक्‍स मशीन ऑपरेटर, ड्राइवर, कारपेंटर, प्‍लम्‍बर, राजमिस्‍ञी एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 26,220

समूह-6: बिल कलैक्‍टर्स, पिओन (चपरासी) एवं अन्‍य…

Basic: 8,500

Gross Salary: 24,969

अनुसूची- III. बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘जेड’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारियों-फैक्‍ट्री स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ अभियंता, सहायक अभियंता एवं अन्‍य…

Basic: 12,500

Gross Salary: 34,877

समूह-2: वरिष्‍ठ पर्यवेक्षक, फोरमैन एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 31,124

समूह-3: वरिष्‍ठ उत्‍पादन सहायक, कनिष्‍ठ वीडीटी संचालक, ऑफसेट मशीनमैन एवं अन्‍य…

Basic: 10,000

Gross Salary: 28,622

समूह-4: कन्‍वेयर स्‍ट्रीकेट मशीन-मैन, आर्ट विभाग में पेस्‍ट-अप मैन, प्‍लम्‍बर एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 26,120

समूह-5: सहायक इलैक्‍ट्रीशियन, ट्रीडलमैन तथा डीएफ प्रेसमैन एवं अन्‍य…

Basic: 8,000

Gross Salary: 23,618

समूह-6: बालर मुकदम, रील लोडर तथा अनलोडर, ट्रोली मैन एवं अन्‍य…

Basic: 7,500

Gross Salary: 22,366

नोट- 1. उपरोक्‍त वेतन में पीएफ में 12 फीसदी कंपनी का योगदान भी जोड़ा गया है। इसके अलावा दिसंबर 2015 में रविवार को साप्‍ताहिक अवकाश का आधार मान कर 27 दिन का यानि 2700 रुपये रात्रि भत्‍ता भी जोड़ा गया है।
2. यदि आपको संस्‍थान ने नई कंपनी बनाकर उसमें स्‍थानांतरित कर दिया है तो भी आपको मजीठिया वेजबोर्ड के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
3. ईएसई के अंतर्गत आने वाले साथियों को चिकित्‍सीय भत्‍ता नहीं मिलेगा।
4. मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें ठेका आधार पर कार्यरत सभी साथियों और अंशकालिक संवाददाता व छायाकार पर भी लागू होंगी।

मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार यह वेतनमान उन सहयोगियों का है जिन्‍होंने जुलाई 2015 से दिसंबर 2015 के बीच उमर उजाला में या बी ग्रेड के किसी भी अन्‍य समाचार पञ  (शहरी वर्गीकरण ‘जेड’) को ज्‍वाइन किया होगा। आप जो वर्तमान वेतन प्राप्‍त कर हैं उससे आपका वेतन कहीं ज्‍यादा होगा यदि आपके संस्‍थान में मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें सही ढंग से लागू हो जाती हैं तो। इसको देखकर आप समझ सकते हैं कि केवल सामूहिक प्रयास ही हमें अपना हक दिलवा सकता है। इसलिए साथियों एकजुट हो जाइए, ताकि आप अपना और अपने परिवार का भविष्‍य सुरक्षित कर सकें।

इसके पहले वाले हिस्से पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

मजीठिया वेज बोर्ड : अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़ें (पार्ट वन)

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अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़े (पार्ट दो)

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मजीठिया वेज बोर्ड : अमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़े (पार्ट दो)

गतांक से आगे…

इससे पहले हम एक्‍स श्रेणी के शहरों में कार्यरत अमर उजाला के साथियों को अपने वेतन के तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए जानकारी दे चुके हैं। अब हम उमर उजाला के वाई सिटी यानि मेरठ, चंडीगढ़, कानपुर आदि में यूनिटों में कार्यरत सभी साथियों को तुलनात्‍मक अध्‍ययन के लिए वेतनमान उपलब्‍ध करवा रहे हैं। यह वेतनमान (ग्रेड बी का) जुलाई 2015 से दिसंबर 2015 तक के बीच भर्ती नए साथियों पर लागू होते हैं। इससे आसानी से जाना जा सकता है कि आप को बी ग्रेड के अनुसार वेतनमान मिल रहा हैं या नहीं है। (देखें मजीठिया वेजबोर्ड की रिपोर्ट में पेज नंबर 37-38 या 55-56)

अनुसूची- I. क- बी ग्रेड समाचार पञ  (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘एक्‍स’)

(समाचार-पञ प्रतिष्‍ठानों में श्रमजीवी पञकारों का समूहन)

समूह-1: कार्यकारी संपादक, स्‍थानीय संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 22,000

Gross Salary: 63,203

समूह-2: सहायक संपादक, समाचार संपादक एवं अन्‍य…

Basic: 20,000

Gross Salary: 57,794

समूह-3: मुख्‍य संवाददाता, मुख्‍य उप-संपादक,  सहायक समाचार संपादक, कार्टूनिस्‍ट, पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 18,000

Gross Salary: 52,384

समूह-4: वरिष्‍ठ उप-संपादक, डिप्‍युटी पेज डिजाईनर एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 46,975

समूह-5: उप-संपादक, रिपोर्टर, कलाकार, मुख्‍य प्रूफशोधक एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 41,566

समूह-6: प्रूफशोधक एवं अन्‍य… समस्‍त श्रमजीवी पञकार…

Basic: 13,000

Gross Salary:  38,861

अपने पद की श्रेणी देखने के लिए हिंदी मजीठिया रिपोर्ट का पेज नंबर 2 या 18 देखें

अनुसूची- II.  बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘एक्‍स’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारी-प्रशासनिक स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ सहायक महाप्रबंधक, वेब प्रशासक, इलैक्‍ट्रोनिक अथवा सॉफ्टवेयर अभियंता, मुख्‍य लेखाकार एवं अन्‍य…

Basic: 16,000

Gross Salary: 46,975

समूह-2: अपर प्रबंधक, लेखा अधिकारी, कल्‍याण अधिकारी एवं अन्‍य…

Basic: 14,000

Gross Salary: 41,566

समूह-3: अधिकारी अथवा विभागीय मुखिया, हेड क्‍लर्क, डीटीपी इंचार्ज, प्रोग्रामर एवं अन्‍य…

Basic: 12,000

Gross Salary: 36,156

समूह-4: वरिष्‍ठ स्‍टेनो सचिव, सुरक्षा पर्यवेक्षक एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 33,452

समूह-5: कनिष्‍ठ क्‍लर्क, टेलीफोन/फैक्‍स मशीन ऑपरेटर, ड्राइवर, कारपेंटर, प्‍लम्‍बर, राजमिस्‍ञी एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 28,042

समूह-6: बिल कलैक्‍टर्स, पिओन (चपरासी) एवं अन्‍य…

Basic: 8,500

Gross Salary: 26,690

अपने पद की श्रेणी देखने के लिए हिंदी मजीठिया रिपोर्ट का पेज नंबर 26 देखें

अनुसूची- III. बी ग्रेड समाचार पञ (शहरों का वर्गीकरण- क्षेञ ‘एक्‍स’)

(गैर पञकार समाचार-पञ कर्मचारियों-फैक्‍ट्री स्‍टाफ का वर्गीकरण)

समूह-1: वरिष्‍ठ अभियंता, सहायक अभियंता एवं अन्‍य…

Basic: 12,500

Gross Salary: 37,509

समूह-2: वरिष्‍ठ पर्यवेक्षक, फोरमैन एवं अन्‍य…

Basic: 11,000

Gross Salary: 33,452

समूह-3: वरिष्‍ठ उत्‍पादन सहायक, कनिष्‍ठ वीडीटी संचालक, ऑफसेट मशीनमैन एवं अन्‍य…

Basic: 10,000

Gross Salary: 30,747

समूह-4: कन्‍वेयर स्‍ट्रीकेट मशीन-मैन, आर्ट विभाग में पेस्‍ट-अप मैन, प्‍लम्‍बर एवं अन्‍य…

Basic: 9,000

Gross Salary: 28,042

समूह-5: सहायक इलैक्‍ट्रीशियन, ट्रीडलमैन तथा डीएफ प्रेसमैन एवं अन्‍य…

Basic: 8,000

Gross Salary: 25,338

समूह-6: बालर मुकदम, रील लोडर तथा अनलोडर, ट्रोली मैन एवं अन्‍य…

Basic: 7,500

Gross Salary: 23,985

अपने पद की श्रेणी देखने के लिए हिंदी मजीठिया रिपोर्ट का पेज नंबर 28 देखें

नोट- 1. उपरोक्‍त वेतन में पीएफ में 12 फीसदी कंपनी का योगदान भी जोड़ा गया है। इसके अलावा दिसंबर 2015 में रविवार को साप्‍ताहिक अवकाश का आधार मान कर 27 दिन का यानि 2700 रुपये रात्रि भत्‍ता भी जोड़ा गया है।
2. यदि आपको संस्‍थान ने नई कंपनी बनाकर उसमें स्‍थानांतरित कर दिया है तो भी आपको मजीठिया वेजबोर्ड के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
3. ईएसई के अंतर्गत आने वाले साथियों को चिकित्‍सीय भत्‍ता नहीं मिलेगा।

अगले व अंतिम भाग में हम जेड श्रेणी के शहरों में कार्यरत अमर उजाला के साथियों के वेतनमान के बारे में।

इसके पहले वाला पार्ट वन पढ़ने के लिए नीचे दिए गए शीर्षक पर क्लिक करें>

मजीठिया वेज बोर्ड : उमर उजाला के साथी इसे जरूर पढ़ें (पार्ट एक)

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अमर उजाला पर विज्ञापन न मिलने से डीजीपी के खिलाफ खबर छापने का आरोप

अमर उजाला को विज्ञापन न देने पर डीजीपी के खिलाफ 31 जनवरी और 1 फरवरी को प्रकाशित खबरों के मामले ने तूल पकड लिया है। पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला न पढ़ने की चेतावनी जारी कर दी है। साथ ही अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ नगर कोतवाली देहरादून में मुकदमा दर्ज कर लिया है। सूत्रों की मानें तो अब अमर उजाला के पदाधिकारी मुख्यमंत्री हरीश रावत से मिलकर मामले में समझौता कराने के प्रयास में लगे हैं।

पुलिस विभाग की तरफ से जारी यह पत्र चर्चा में है…

महिला दरोगा भर्ती से सम्बंधित विज्ञापन न मिलने से बौखलाए अमर उजाला अखबार ने डीजीपी उत्तराखंड महोदय के सम्बन्ध में पहले 31.1.16 को देहरादून में तथा 1.2.16 को हरिद्वार में, फिर उसका फॉलोअप छापा जो काफी भद्दा गैरजिम्मेदाराना तरीके से छापा है. इतने बड़े अखबार को ऐसी ओछी हरकत शोभा नहीं देती. एक ही खबर को ज्यों का त्यों दो दिन प्रदेश में अलग स्थानों में छापा गया। प्रदेश पुलिस के मुखिया के बारे में इस प्रकार की टिप्पणी करना पूरे पुलिस विभाग के लिए गंभीर चिंता और मनन का विषय है जो कि सीधे तौर पर उत्तराखण्ड पुलिस के मान सम्मान को ललकारते हुऐ पीत पत्रकारिता का जीता-जागता उदाहरण है।

पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर द्वारा किये गए विभागीय अच्छे कार्यों को तो कभी भी अमर उजाला ने तार्किक जगह नहीं दी। यदि कभी-कभार ऐसी ख़बरें छापी भी हैं, तो बाद के पन्नों में वो भी बेमन से, और बहुत कम शब्दों में। परंतु विज्ञापन न मिलने की खबर को अमर उजाला ने फ्रंट पेज की खबर बनाया है। सही में देखा जाये तो अमर उजाला का कुछ सालों में पैटर्न पूरी तरह से पुलिस विभाग के एंटी अखबार का है, और मात्र एक ही बदनाम पुलिस अधिकारी का व्यक्तिगत अखबार तक सीमित होकर रह गया है।

पुलिस विरोधी नकारात्मक खबरें इसमें बड़ी बड़ी और पुलिस विभाग के गुड वर्क की ख़बरें बहुत छोटी छोटी छापी जाती हैं। वर्तमान खबर तो मात्र सिर्फ और सिर्फ विज्ञापन न मिलने के कारण छापी गयी है जबकि खबर में जमीन से जुड़े जिस केस को उछालकर जिक्र किया गया है, उस केस के करंट अपडेट को तो जानने की कोशिश तक नहीं की गयी और केस से जुड़े अधिकारीयों को सजा दिए जाने के बारे में लिखा है।

हकीकत में इस केस में धोखाधड़ी तो हमारे डीजीपी सर के साथ हुई है। अपने हक़ के लिये जमकर लड़ना कोई गलत बात नहीं। लेकिन अमर उजाला डीजीपी सर के विरोध में ख़बरें छाप कर उनकी छवि ख़राब कर पूरे पुलिस विभाग को छोटा करने की कोशिश कर रहा है। पिछले 2 वर्षों में डीजीपी सर ने पुलिस परिवार का मुखिया होने की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाई और अपने अधीनस्थों के भलाई के लिए स्वयं व्यक्तिगत रुचि लेते हुए शासन में लंबे समय से लटकी पड़ी तमाम फाइलों की पैरवी की गयी तथा सिपाहियों की वेतन विसंगति, प्रमोशन, स्थायीकरण, नये पदों और पुलिस विभाग के आधुनिकीकरण आदि मामलों का बहुत तेजी से निस्तारण करवाया।

वर्ष 2015 में वेतन विसंगति एवं एरियर को लेकर काली पट्टी बांधने एवं सोशल मीडिया पर मेसेज फॉरवर्ड करने के मामले में जब सिपाहियों पर कार्यवाही की बात कई पुलिस अधिकारी कर रहे थे, अकेले डीजीपी सर ही थे, जिन्होंने किसी भी निर्दोष सिपाही पर कार्यवाही नहीं होने दी। उन्होंने किसी निर्दोष के साथ नाइंसाफी नहीं होने दी, जबकि उस मामले में सैकड़ों सिपाहियों पर कार्यवाही की तलवार लटकी हुई थी। यहाँ तक कि डीजीपी सर ने सिपाहियों के हक़ के लिए वेतन विसंगति समय से ठीक न होने की स्थिति में अपना इस्तीफा तक देने की बात कही थी। यह डीजीपी सर के व्यक्तिगत प्रयासों का ही नतीजा है कि माननीय मुख्यमंत्री जी ने एरियर के भुगतान के लिए अलग से बजट स्वीकृत किये जाने की बात कही है और जल्द ही सभी सिपाहियों को एरियर मिल भी जायेगा।  

साथियों, हम अपने पैसों के लिए तो एकजुट होकर लड़ते हैं, तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं परंतु हमारी हक़ और इज़्ज़त की लड़ाई में हमारे साथ खड़े होने वाले डीजीपी सर जब दो महीने में रिटायर होने वाले हैं, तो ऐसे समय में एक अखबार की मनमानी के कारण क्या हम उनकी, अपने विभाग और वर्दी की छवि को धूमिल होते हुए हाथ पर हाथ रखकर यूँ ही देखते रहें? क्या हमें उनके साथ, उनके समर्थन में एकजुट होकर खड़े नहीं होना चाहिए?

यह समय एकजुट होकर पुलिस विभाग को चुनौती देने वालों को मुंहतोड़ जवाब देने का है। यह समय डीजीपी सर के साथ उनके समर्थन में खड़े होने का समय है। ऐसा लगता है कि अमर उजाला के पत्रकार अपनी मर्जी के मालिक हैं, जो मन में आया छाप दिया। जब प्रदेश पुलिस के मुखिया को ही यह अखबार कुछ नहीं समझ रहा है, तो आने वाले दिनों में छोटे अधिकारियों और सिपाहियों का क्या हाल होगा, जरा सोचो। विचार करो। एकजुट होकर इस अखबार के विरोध में खड़े हो जाओ। दिखा दो इन्हें उत्तराखंड पुलिस की एकता और हमारी ताकत। इसलिए इस अखबार को सबक सिखाने के लिए यह जरूरी है कि इस अखबार का विरोध हर स्तर पर किया जाये।  

साथियों, आज से इस अखबार का विरोध शुरू कर दो और यह विरोध तब तक करते रहो, जब तक यह अखबार हमारे डीजीपी सर से इस खबर के बारे में माफ़ी न मांग ले। जिसके भी घर में, परिवार में, रिश्तेदारी में अमर उजाला अख़बार आता है, आज ही उसे बदलवाकर दूसरा अखबार लगवाओ और अपने हॉकर को तथा पत्रकारिता से जुड़े जिस भी शख्स को जानते हो, उसे भी बताओ कि तुमने यह अखबार क्यों बंद किया है? 

साथियों, यह पुलिस की एकजुटता दिखाने का समय है। मीडिया की दलाली को जवाब देने का समय है। हमारे सम्मान की लड़ाई लड़ने वाले डीजीपी के स्वाभिमान की लड़ाई में साथ खड़े होने का समय है। ये दिखाने का समय है कि हम एक हैं और कोई भी हमें हल्के में नहीं ले सकता। देखना है, कौन जीतता है। हमारी एकता या बिकाऊ मीडिया।

जय हिन्द
जय उत्तराखंड पुलिस।

———————–

पुलिस ने निकालनी शुरू की खुन्नस

अब पुलिस ने खुन्नस में अमर उजाला के विज्ञापन कर्मी के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। आरोप है कि विज्ञापन वाला पीएचक्यू में घुसा। विज्ञानकर्मी पर 384, 385, 120 बी, 185, 186 की धारा लगायी गई है। देहरादून यूनिट में कार्यरत विज्ञापन के अभिषेक शर्मा के खिलाफ दर्ज हुआ मुकदमा।

देहरादून से एक मीडियकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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स्व. अतुल जी के साथ चले गए अमर उजाला के सिद्धांत

पिछले दिनों अमर उजाला के नवोन्मेषक स्व. अतुल माहेश्वरी जी की पुण्यतिथि थी। अमर उजाला ने उनको याद करने की औपचारिकता भी निभाई, मगर सवाल यह है कि क्या अमर उजाला की नई मैनेजमेंट के दिमाग में उनकी नीतियां व दूरगामी सोच अभी अमर उजाला में जिंदा या है या फिर उनके साथ ही उनके मूल्यों का भी देहावसान हो चुका है। वैसे मौजूदा परिस्थितियों का आकलन करें, तो ऐसा लग नहीं रहा कि उनके जाने के बाद उनके द्वारा स्थापित सिद्धांतों तथा मूल्यों को पोषित किया जा रहा है। अब हालात बदल चुके हैं। शायद ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति एक जैसा नहीं होता, मगर एक पद की परंपरा व मूल्य एक जैसे हो सकते हैं। ऐसा होने से ही तो आदर्श स्थापित होते हैं। अब असल बात यह है कि स्व. अतुल जी के निधन के बाद अमर उजाला में स्थापित मूल्यों का पतन होता जा रहा है या यह कहें कि उनकी हत्या कर दी गई है या नहीं।

अमर उजाला के मूल्यों व स्थापित परंपरा की चरचा से पहले मैं एक ऐसा वाक्या बताना चाहता हूं, जो स्व. अतुल जी द्वारा स्थापित मूल्यों व पत्रकारिता के सिद्धांतों से जुड़ी उनकी दूरदर्शी सोच के साथ-साथ अपने साथ जुड़े हर छोटे-बड़े कर्मी के प्रति उनके व्यवहार से जुड़े अनगिनत किस्सों में से एक है। बात हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला ब्यूरो की है। उस सयम अमर उजाला को हिमाचल में आए कुछ अर्सा ही हुआ था। उस दौरान कारपोरेट परंपरा के तहत सब कुछ संपादकों व मैनेजरों पर नहीं छोड़ा गया था। एक मालिक व समूह का प्रबंध निदेशक होने के नाते स्व. अतुल जी का ध्यान केवल बैलेंस शीट पर नहीं होता था, वे संपादकीय विभाग पर खास पकड़ रखते थे। यहां तक कि फुर्सत मिलने पर हर एडिशन पर नजर मारते थे और कमियों को पकड़ कर दूर करने का प्रयास करते थे। इसी कड़ी में एक बार किसी कस्बे में रखे गए एक अवैतनिक रिपोर्टर ने अपनी खबर न छपने को लेकर स्व. अतुल जी को पत्र लिख दिया और शिकायत की कि उनकी खबरों को प्रकाशित नहीं किया जा रहा है, जबकि वह रोज फैक्स का खर्च भी कर रहा है और उसे वेतन भी नहीं दिया जाता। ऐसे में क्या कारण है कि उसकी खबरों को जगह नहीं दी जा रही।

यह पत्र पहुंचते ही अतुल जी ने तुरंत इस पर एक्शन लेते हुए सीधे धर्मशाला ब्यूरो को पत्र लिख कर इस अवैतनिक संवाददाता की खबरों को प्रकाशित न करने की वजह पूछी और यह तक कहा कि अगर कोई देहात का रिपोर्टर मेहनत करके हमें अपने खर्च पर खबर भेज रहा है, तो उसे प्रकाशित क्यों नहीं किया जाता। उनके पत्र लिखने मात्र से यह संदेश चला गया कि ब्यूरो चीफ या संपादक अपनी मनमानी करके किसी व्यक्ति का इस तरह इस्तेमाल नहीं कर सकते। अगर उसे रखा गया है और वह अपने जेब खर्च से खबरें भेज रहा है, तो उसे प्रकाशित भी किया जाए। अगर कमी है तो उसे ब्यूरो स्तर पर दुरुस्त किया जाए। इतना ही नहीं अतुल जी के कहने पर ऐसे संवाददाताओं को खबरें भेजने का खर्च तक लगाया गया। हालांकि यह खर्च महज तीन सौ से पांच सौ रुपये तक था, मगर हैरानी की बात है कि आज भी इन रिपोर्टरों को इतनी ही राशि दी जा रही है। बड़ी बात तो यह है कि इन्हें अमर उजाला आज तक आईकार्ड तक नहीं दे पाया है, जबकि बाकी अखबारों में हर स्टींगर को अवैतनिक कर्मी का ही सही एक आईकार्ड तो दिया जाता है। ऊपर से विज्ञापन की शर्त के साथ-साथ एक ब्लैंक चैक, एक पांच हजार रुपये का चैक और शपथपत्र भी मांगा जा रहा है, जैसे ये अमर उजाला के स्टींगर न होकर कोई ब्लैकमेलिंग एजेंट हों। 

अब बात करें अमर उजाला के गिरते स्तर की, तो संपादकीय विभाग को विज्ञापन एकत्रित करने के काम से दूर रखने वाला यह अखबार अब अपने अवैतनिक संवाददाताओं को विज्ञापन के टारगेट देने की होड़ में कूद पड़ा है। जिन मूल्यों को स्व. अतुल जी ने संजो कर रखा था और जिनके दम पर अमर उजाला को एक शालिन व निष्पक्ष समाचार पत्र कहा जाता था वे मूल्य आज गटर में चले गए हैं। अब अमर उजाला के विज्ञापन प्रबंधक हर दूसरे-तीसरे माह ब्यूरो कार्यालय में पहुंच कर रिपोर्टरों के टारगेट फिक्स कर रहे हैं और टारगेट पूरा न करने पर खबरें रोकने की धमकियां दी जा रही हैं। ऐसा हिमाचल में तो हो ही रहा है, बाकी जगह की जानकरी नहीं है।

शर्मनाक बात यह है कि जो स्टींगर या अवैतनिक संवाददाता बिना पगार के महज तीन सौ से पांच सौ रुपये के मानदेय पर जेबखर्चें से इस अखबार में पिछले 16 वर्षों से काम कर रहे थे। जिन्होंने अमर उजाला को हिमाचल में नंबर एक की दौड़ में शामिल किया, आज उनका मानदेय तो बढ़ाया नहीं जा रहा, उल्टे उन्हें विज्ञापन एकत्रित करने का टारगेट देकर खबरें रोकने की धमकियां मिल रही हैं। कुछ रिपोर्टरों ने तो साफ कह दिया है कि निकालना है तो निकाल दो। वैसे भी वो अमर उजाला के मानदेय पर तो जी नहीं रहे, अपना बिजनेस करके परिवार पाल रहे हैं। ब्लैकमेलिंग न करने की आदत उन्हें परंपरा से मिली थी, जिसे अब छिनने की कोशिश चल रही है। उन्हें भी अब खबरें लिखने के बजाय बाकी समाचारपत्रों की तरह ब्लैकमेलिंग या फिर गिड़गिड़ाकर विज्ञापन एकत्रित करने को कहा जा रहा है। हालांकि दूसरे समाचारपत्र ऐसे रिपोर्टरों को कमीशन के अलावा अमर उजाला से कहीं ज्यादा मानदेय देते हैं, मगर यहां तो मानदेय इतना है कि मोबाइल का खर्च भी पूरा न हो।

चलो अब बात करें अमर उजाला के मूल्यों की, तो ये मूल्य अब खत्म हो गए हैं। शायद मालिक लोग बैलेंसशीट चैक करने में मस्त हैं और संपादकों को मैनेजरों के हवाले कर दिया गया है। एक मैनेजर जो कोकाकोला कंपनी या फिर किसी साबून बेचने वाली कंपनी से उठाया गया है, वह अखबार भी कोकाकोला व साबून की तरह ही बेचने की कोशिश करेगा ही। इसमें उसका दोष नहीं, उसे अखबार के संपादकीस पक्ष की समझ नहीं है और उस पर टारगेट का दबाव भी है। ऐसे में अखबार के संपादकीय की संवेदना समझने का काम तो मालिक ही कर सकता है। ऐसे में मालिक को ही इसकी समझ न हो या इसे समझना न चाहे तो क्या कर सकते हैं। ऐसे में मूल्यों की बात करने वाले लोगों को नमस्कार कर दिया जाता है।

लाला जी मैनेजरों के आंकड़ों की चकाचौंध में उलझे रहेंगे और अपने निचले स्तर के कर्मियों से संवाद तोड़ देंगे तो स्व. अतुल जी जैसे संस्कार व मूल्य तो खुद ही दम तोड़ देंगे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अब मूल्यवान अखबार अपनी छवि बदलकर अपने प्रतिद्विद्वियों की राह पर है, जो मूल्यों को पहले ही तिलांजली देकर मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में बदल चुके हैं। वे शेयर मार्किटों से पैसा बटोर कर पूरे विश्व में नंबर वन बनने की होड़ में है, मगर अपनी श्रम शक्ति को कुचलकर व बौद्धिक संपदा को खोने वाली कंपनियां ज्यादा देर तक टिक नहीं पातीं। वैसे भी अखबरों का रॉ मेटिरियल खबरें ही हैं। भले ही विज्ञापनों के बाद इन्हें जगह मिलती है, मगर पाठक विज्ञापन के लिए अखबार नहीं नेता, बल्कि खबर के लिए अखबार खरीदकर विज्ञापन तक पहुंचता है।  अमर उजाला के मामले में अभी तक कोई ज्यादा देर नहीं हुई है, मगर देर हुई तो घातक होगी। अमर उजाला को चाहने वाले इस स्थिति को देखना पसंद नहीं कर सकते।

रविंद्र अग्रवाल
वरिष्ठ पत्रकार
हिमाचल प्रदेश
संपर्क: 9816103265


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उफ्फ… अमर उजाला के अधिकारी ने अपने ग्रामीण पत्रकारों के साथ किया कितना घटिया आचरण, पढ़ें शिकायती पत्र

ये शिकायती पत्र कई ग्रामीण पत्रकारों ने अपने नाम पहचान और मोबाइल नंबर के साथ संपादक और मालिक को भेजा है. अमर उजाला लखनऊ संस्करण के अधीन आता है फैजाबाद ब्यूरो. यहां ग्रामीण पत्रकारों के साथ बैठक में अमर उजाला के एक अधिकारी ने ग्रामीण पत्रकारों को विज्ञापन लाने के लिए किस तरह दबाव में लिया और कैसे कैसे अपशब्दों का प्रयोग किया गया, यह सब कुछ इस शिकायती पत्र में है.

अमर उजाला को हिंदी मीडिया में सबसे गंभीर, सरोकारी और कंटेंट फ्रेंडली अखबार माना जाता है. लेकिन यह प्रकरण जिस तरह घटित हुआ, वह यह बताने के लिए काफी है कि इस अखबार का प्रबंधन अब पैसे के लालच में अपने अखबार की वर्षों पुरानी स्वस्थ परंपरा को नष्ट करने पर तुल गया है. उम्मीद करते हैं कि इस मामले में अखबार के मालिक राजुल माहेश्वरी कोई कड़ा फैसला लेंगे और अखबार की रीढ़ ग्रामीण पत्रकारों के सम्मान को बहाल करेंगे. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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अमर उजाला की डिजिटल टीम के पास मुद्दों का टोटा, देखिए क्या क्या छाप रहे हैं

Ayush Shukla : लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ. धन्य हो तुम्हारा हिंदी अखबार. धन्य हो इस अखबार की डिजिटल टीम के रिपोर्टर. धन्य हो डिजिटल के संपादक जी और धन्य हो इस ग्रुप के ओवरआल मालिक जी. आप लोग भी इसे देखिए और सोचिए कि अमर उजाला की टीम के पास क्या मुद्दों का टोटा पड़ गया है जो पैंट में पेशाब कर देने जैसी चीजों को खबर बनाने पर तुले हुए हैं.

 न्यू मीडिया के युवा पत्रकार आयुष शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार… पढ़िए एक युवा ने क्यों कर लिया सुसाइड

Vinod Sirohi : जरूर शेयर करें —मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार — आप पर कोई बंदिश नहीं है आप इस मैसेज को बिना पढ़े डिलीट कर सकते हैं। अगर आप पढ़ना चाहें तो पूरा पढ़ें और पढ़ने के बाद 5 लोगों को जरूर भेजें।

मेरा नाम राहुल है। मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के गोहाना का रहने वाला हूँ। आप भी मेरी तरह इंसान हैं लेकिन आप में और मुझमें फर्क ये है कि आप जिन्दा हैं और मैंने 19 अगस्त, 2015 को रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

चौकिये मत, नीचे पढ़िये।

मेरा परिवार गरीबी से जूझ रहा था। एक दिन मैंने एक हिन्दी के अख़बार में (अपने आप को हिन्दी जगत का प्रमुख अखबार बताने वाला ) मोबाईल टावर लगाने सम्बन्धी विज्ञापन पढ़ा। इसमें 45 लाख एडवांस, 50 हजार रूपये महीना किराया तथा 20 हजार रूपये प्रतिमाह की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने की बात कही थी। मैनें दिये गये नम्बर पर फोन किया तो उन्होंने हमारे प्लाट का पता ले लिया जहाँ मैं टावर लगवाना चाहता था। अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके मुबारकबाद दी और कहा कि मेरा प्लाट टावर लगने के लिए पास हो गया है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ीस के तौर पर 1550 रूपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाता 20266209852 ब्रांच लाजपत नगर नई दिल्ली में डालने के लिए कहा। मैंने 1550 रूपये डाल दिये तो उन्होंने मुझे रिलायंस कम्पनी का ऑफर लेटर तथा एक लेटर सूचना और प्रोद्द्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार का मेरी ईमेल पर भेजा जिसमें 27510 रूपये सरकारी टैक्स जमा करवाने की बात कही गई थी।

मैंने 27510 रूपये भी जमा करवा दिये तो उन्होंने मुझसे 13500 रूपये डिमांड ड्राफ्ट चार्जेज के तौर पर जमा करवाने के लिए कहा। मैंने ये रूपये भी जमा करवा दिए तो उन्होंने मेरे फोन उठाने बंद कर दिये। जो पैसे मैंने इस खाते में जमा करवाये वह पैसे मेरी बहन की शादी के लिए रखे थे। मैं अपने परिवार को 45 लाख रूपये का सरप्राइज देना चाहता था, लेकिन जब मुझे ठगी का एहसास हुआ तो मैं अपने परिवार को मुहँ दिखाने के लायक नहीं बचा और मैंने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

मेरी असमय मौत के बाद मेरी रूह धरती पर ही भटक रही है और लोगों को ठगी के इस जंजाल के प्रति जागरूक कर रही है। मेरे दावे की सत्यता के लिये आप ऊपर दिये गये बैंक खाते की 11 अगस्त से 18 अगस्त की स्टेटमेंट देख सकते हैं। ऐसे लगभग 300 फ्रॉड ग्रुप अख़बारों में फर्जी विज्ञापन देकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनके झांसे में ना आयें। आप 5 लोगों को 2 मिनट में ये सन्देश जरूर भेजें और पार्क, बैठक, घर और दफ्तर के लोगों को मौखिक तौर पर इस ठगी के खेल के बारे में जरूर बतायें। मेरी रूह को शान्ति मिलेगी और आपको आत्मसंतुष्टि।

यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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अमर उजाला के आगरा आफिस पर नारायण साईं समर्थकों का हमला, पत्रकार का गला दबाया

आगरा। दुष्कर्म मामले में जेल में बंद आसाराम के बेटे नारायण साईं के करीब दो दर्जन समर्थकों ने मंगलवार शाम अमर उजाला कार्यालय पर हमला किया। तोड़फोड़ और मारपीट कर रहे इन लोगों के खिलाफ जब कर्मचारी एकजुट हुए तो अन्य भाग निकले लेकिन दो पकड़े गए। इन्हें सिकंदरा थाने की पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। नारायण साईं समर्थक अमर उजाला में गत 20 सितंबर को छपी खबर पर प्रतिक्रिया जताने आए थे। बड़ी संख्या में लोगों को देख जब गार्ड ने रोका तो उनसे हाथापाई करते हुए सभी स्वागत कक्ष तक आ गए। मुख्य उप संपादक चंद्र मोहन शर्मा ने फिर भी पूरे संयम से उनकी बात सुनी।

जब उन्होंने समझाने की कोशिश की कि इस खबर में आपत्तिजनक कोई तथ्य नहीं है। यह नारायण साईं के खिलाफ उनकी पत्नी जानकी हरपलानी द्वारा इंदौर के खजराना थाने में दी गई शिकायत पर आधारित है। इसमें वही लिखा गया गया है जो जानकी ने पुलिस से कहा। इतना सुनते ही उन्होंने गाली-गलौज करते हुए उनकेसाथ हाथापाई शुरू कर दी। ये हमारे बापू के खिलाफ बहुत लिखते हैं आज इन्हें सबक सिखा देना है, कहते हुए कई ने छुपाकर लाए लाठी-डंडे निकाल लिए। उन्हें घिरा देख टेलीफोन आपरेटर राजेंद्र बीचबचाव को पहुंचे। बीचबचाव को आए पत्रकारों आशीष शर्मा, धर्मेंद्र यादव और राजीव शर्मा को भी हमले में चोटें आईं। इसी बीच एक समर्थक ने चंद्रमोहन शर्मा का गला दबाने की कोशिश की। शोर सुनकर अन्य कर्मचारियों को आता देख हमलावर धमकियां देते हुए भाग निकले पर दो पकड़ लिए गए। हमले की सूचना पाकर सिकंदरा थाने के इंस्पेक्टर हरीमोहन सिंह फोर्स के साथ आए। पकड़े गए युवकों डिफेंस स्टेट, सदर निवासी देवेश पुत्र विशंभरदयाल और नेहरू एन्क्लेव सदर निवासी हरिओम पुत्र कुंवरसेन को उन्होंने हिरासत में ले लिया और थाने ले गए। एडमिन हेड हिमांशु बघेल ने थाना पुलिस को हमलावरों के खिलाफ बलवा, तोड़फोड़, मारपीट, जानलेवा हमले की तहरीर दी है।

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अमर उजाला नोएडा से एक साल में एक दर्जन विकेट गिर चुके हैं

अमर उजाला नोएडा हेड ऑफिस के एक साल में एक दर्जन विकेट गिर चुके हैं। अपने मोहरे फिट करने के जुगाड़ में लगे संपादक अभी भी कई पर टेढी़ नजर रखे हैं। सबसे लेटेस्ट गिरने वाले दो विकेट सब एडिटर मनीष सिंह और सीनियर सब एडिटर अमित कुमार बाजपेयी हैं। अमर उजाला से जुड़े अधिकारियों की मानें तो ग्रेटर नोएडा के स्टार रिपोर्टर और बीते दो साल से नोएडा हेड ऑफिस में सबसे तेज एडिटिंग-पेजीनेशन करने वाले अमित कुमार ने संस्थान को गुडबाय बोल दिया है।

2006 में जागरण आई नेक्स्ट की लांचिंग टीम में फोटो जनलिस्ट पोजीशन छोड़कर वो अमर उजाला ग्रेटर नोएडा में रिपोर्टर बने। सात साल तक रिपोर्टिंग के बाद बीते दो साल से वो डेस्क पर थे। उन्होंने अपनी नई पारी राजस्थान पत्रिका के पोर्टल कैच न्यूज हिंदी के साथ की है. वहीं, मनीष सिंह भी पिछले करीब चार साल से दिल्ली डेस्क पर डिजाइनर पन्ना बनाने के उस्ताद मानें जाते हैं। मध्य प्रदेश के  सतना निवासी मनीष ने भी अगस्त में इस्तीफा दे दिया है और अब वह सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैंl

इससे पहले अगस्त में ही नोएडा ब्यूरो के रिपोर्टर सोमदत्त शर्मा ने हिंदुस्तान गुड़गांव का दामन थाम लिया था। राष्ट्रीय सहारा के बाद वो करीब तीन साल पहले अमर उजाला से जुड़े थे। अमर उजाला में जूनियर सब एडिटर सोमदत्त हिंदुस्तान में रिपोर्टर के रूप में जुड़े हैं। वहीं, इससे पहले इस साल नोएडा के सीनियर सब एडिटर-  रिपोर्टर अनुराग त्रिपाठी और क्राइम बीट प्रभारी दिनेश शर्मा भी संस्थान को गुडबाय बोल चुके हैं। दिनेश ने नवोदय टाइम्स दिल्ली में ज्वाइन किया है।

इसके अलावा दिल्ली के बाद ग्रेटर नोएडा में रिपोर्टर और डेस्क पर भेजे गए भरत पांडेय भी अब यहां नहीं हैं। जबकि दिल्ली डेस्क पर काम करने वाले रोहिताश्व, फरीदाबाद ब्यूरो के कुंदन तिवारी यहां से जा चुके हैं। इससे पहले देहरादून स्टेट ब्यूरो प्रमुख शेषमणि शुक्ला और बरेली ब्यूरो चीफ रह चुके मुकेश उपाध्याय भी डेस्क पर भेजे जाने के बाद कुछ समय काम करके अमर उजाला से इस्तीफा दे चुके हैं। गुड़गांव ब्यूरो चीफ मलिक असगर हाशमी भी गुड़गांव से जा चुके हैं। जबकि पलवल प्रभारी भगत सिंह डागर भी संस्थान छोड़ कर जा चुके हैं। जहां तक जानकारी है इस साल एनसीआर से एक दर्जन से ज्यादा स्टाफ अमर उजाला को छोड़ देगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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शिमला में तैनात धर्मशाला के कर्मी सात साल बाद पंचकूला स्थानांतरित, वेतन में इजाफा

: रविंद्र अग्रवाल की मुहिम का असर, साथियों को मिला न्याय : अमर उजाला प्रबंधन की मनमानियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र अग्रवाल की एक और मुहिम रंग लाई है। रविंद्र अग्रवाल ने अमर उजाला प्रबंधन की धर्मशाला व पंचकूला यूनिटों में पीस रह कर्मचारियों को उनका हक दिलवाया है। मामला यह था कि अमर उजाला ने अपनी धर्मशाला यूनिट से एडिटोरियल व अन्य प्रमुख विभागों को पैकअप करके शिमला पहुंचा दिया था। जबकि कुछ पद पंचकूला के अधिन कर दिए थे।

इसके चलते करीब सात साल पहले अमर उजाला के एडिटोरियल स्टाफ को धर्मशाला से शिमला स्थित कार्यालय में शिफ्ट करके संपादक सहित डैस्क का सारा काम यहां बदल दिया था। इसके चलते धर्मशालार यूनिट के तहत आने वाले साथियों को भी शिमला भेज दिया गया था। जबकि इनका तबादला नहीं किया गया। इन्हें धर्मशाला यूनिट का इंप्लाई ही दर्शाया जाता रहा। इसके चलते उन्हें पंचकूला यूनिट के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभ नहीं मिल पाते थे।

असल खेल की बात करें, तो यहां अमर उजाला ने धर्मशाला यूनिट को घाटे में दर्शाने के लिए बड़ी चालाकी कर रखी है। हिमाचल के ऊपरी जिलों शिमला, सोलन, सिरमौर व किन्नौर को पंचकूला यूनिट के प्रकाशन के तहत रखा है। इसके चलते हिमाचल सरकार सहित बड़े-बड़े संस्थानों व औद्योगिक क्षेत्रों का विज्ञापन पंचकूला यूनिट के खाते में चला जाता है। ऐसे में हिमाचल के खाते में सिर्फ बाकी के आठ जिलों की प्रिंटिंग व यहां के स्टाफ का भारी भरकम खर्च आता है। इस कारण यह यूनिट अखबार की सत्तर फीसदी सर्कूलेशन संभालने के बावजूद विज्ञापन की कमाई पंचकूला में चले जाने के चलते घाटे में रहती है।

हालांकि शुरू में इसका कोई प्रभाव कर्मियों पर नहीं दिखता था, असल खेल तब पता चला जब मजीठिया वेज बोर्ड सामने आया। अमर उजाला ने वेज बोर्ड के नियमों कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए जब कमाई के मामले में सभी यूनिटों को अलग दर्शाकर वेतन तय किया तो धर्मशाला के कर्मी पंचकूला से पिछड़ गए। जबकि उनके बाकी साथ हर रोज उनके साथ वाली कुर्सी में उनके जितना ही काम करके ज्यादा वेतन पा रहे थे। पर कर भी क्या सकते थे, दब्बूपन व नौकरी जाने का खतरा जो सामने था। ऐसा बदस्तूर चलता रहा।

उनकी किस्मत तब खुली, जब अमर उजाला प्रबंधन से अकेले अपने दम पर लड़ाई लड़ रहे रविंद्र अग्रवाल ने अमर उजाला प्रबंधन की पब्लिकेशन के नियमों को तोडऩे व कर्मियों के इस उत्पीडऩ की शिकायत जून माह में उपायुक्त कांगड़ा से लिखित तौर पर की। इसमें अमर उजाला पर श्रम कानूनों के साथ-साथ समाचार पत्र के प्रकाशन के नियमों की भी धज्जियां उड़ाने की बात शामिल थी। लिखा  गया था कि अमर उजाला धर्मशाला से अपना प्रकाशन बंद कर चुका है, अब केवल नगरोटा बगवां से अखबार ही प्रिंट होती है। इसके बावजूद अखबार में प्रकाशन केंद्र का पता धर्मशाला के जिला आफिस का दिया जा रहा है। जहां केवल जिला प्रभारी ही बैठता है। वहीं शिमला के प्रकाश केंद्र के बारे में न तो आरएनआई और न ही उपायुक्त के समक्ष घोषणा दाखिल की गई है।

फिलहाल इस मामले में जांच कहां तक पहुंची है, यह तो उपायुक्त व विभाग ही जाने, मगर इस मुहिम का असर यह हुआ है कि शिमला में बंधुआ मजदूरों की तरह सात सालों से काम कर रहे धर्मशाला यूनिट के साथियों को अमर उजाला प्रबंधन ने आनन-फानन में पंचकूला यूनिट में स्थानांतरित कर दिया है। इसके साथ ही उनकी तनख्वाह में करीब दो हजार रुपये प्रतिमाह का इजाफा भी हो गया है। यानि चौबिस हजार रुपये सालाना।

मुहिम जारी रहेगी : रविंद्र अग्रवाल

इस संबंध में रविंद्र अग्रवाल से बात की गई तो उन्होंने बताया कि उनकी अब तक की लड़ाई से संस्थान में मानमानी पर लगाम लगी है। उन्होंने बताया कि उन्होंने जून माह में उपायुक्त को एक शिकायत पत्र सौंपा था। इस पर उन्होंने श्रम विभाग को भी मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। इसकी लिखित जानकारी कुछ दिन पूर्व ही उन्हें मिली है। उन्होंने कहा कि अमर उजाला प्रबंधन द्वारा जबरन शिमला बिठाए गए धर्मशाला यूनिट के कर्मियों को पंचकूला भेजे जाने की खबर भी कुछ दिन पहले ही उन्हें मिली है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि उनकी मुहिम के चलते सात सालों से अन्याय सह रहे बाकी साथियों को हर माह करीब दो हजार रुपये का लाभ मिला है। उन्होंने कहा कि उनकी जांच तब तक जारी रहेगी, जब तक अमर उजाला प्रबंधन मजीठिया वेज बोर्ड को अक्षरश: लागू नहीं करता।

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धन्य है अमर उजाला का ज्ञान : हाथापाई का अंग्रेजी अनुवाद ‘ब्लो जॉब’!

अमर उजाला ने इंग्लिश में लिखा- हिमाचल विधानसभा में ‘मुख मैथुन’. सोशल मीडिया पर उस वक्त हिंदी अखबार ‘अमर उजाला’ की जमकर फजीहत हुई, जब उसकी एक रिपोर्ट का इंग्लिश टाइटल अनर्थ करता दिखा। अंग्रेजी में टाइटल था- ‘Blow job in Himachal Vidhansabha’. लोग इस बात को लेकर मजे लेते नजर आए। गौरतलब है कि blow job का अर्थ ‘मुख मैथुन’ होता है। तो इस हिसाब से इस टाइटल का मतलब बना- हिमाचल विधानसभा में मुख मैथुन. shabdkosh.com पर blow job का अर्थ कोई भी देख सकता है।

जाहिर है, यह ऐसी गलती है, जो इंग्लिश के कम ज्ञान की वजह से हुई है। शायद अमर उजाला में काम करने वाले किसी सब एडिटर ने ”हिमाचल विधानसभा में हाथापाई’ का इंग्लिश टाइटल देना चाहा होगा। ऐसे में उसने गूगल ट्रांसलेट की मदद ली, जिसने हाथापाई की इंग्लिश blow job कर दी। गूगल ट्रांसलेट से आप इसका अर्थ देख सकते हैं।

गौरतलब है कि अभी गूगल का हिंदी ट्रांसलेट विकास के चरण में है और इस पर भरोसा नहीं किया जाता। पहले भी कई बार अजीब और आपत्तिजनक अनुवाद के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में यह मानवीय भूल की वजह से अमर उजाला को थोड़ी असहज स्थिति का सामना जरूर करना पड़ा है। ऐसी गलती किसी से भी हो सकती है; हमसे भी। मगर उम्मीद है कि इस घटना से सबक लेते हुए आगे ऑनलाइन मीडिया पोर्टल ही नहीं, अन्य लोग भी गूगल ट्रांसलेट इस्तेमाल करते वक्त सावधानी बरतेंगे।

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राष्ट्रव्यापी शोक के वक्त निर्लज्ज दैनिक जागरण और अमर उजाला ने डॉ.कलाम को बेच खाया

पैसे की भूख से तड़प रहे देश के नामी मीडिया घराने बेखौफ, कैसी-कैसी शर्मनाक हरकतें करने पर आमादा हैं। इन बेशर्मों ने तो पूर्व राष्ट्रपति डॉ.एपीजे अब्दुल कलाम की लोकप्रिय निष्ठा को भी ऐसे मौके पर बेच दिया, जिस वक्त उनके निधन पर पूरा राष्ट्र गहरे शोक में डूबा हुआ था। ऐसी अक्षम्य निर्लज्जता का प्रदर्शन किया कानपुर में दैनिक जागरण और अमर उजाला ने। 

 

दोनो अखबारों ने ऐसे दुखद मौके पर विज्ञापनों की लूट के लिए किस तरह उस अविस्मरणीय हस्ती की छवि को सरेबाजार नीलाम कर दिया, जिसके जाने से पूरा देश आज भी विचलित है। दोनो अखबारों ने डॉ. कलाम के निधन को अपनी बाजारवादी गंदी मनोवृत्ति से जोड़ कर “कलाम को सलाम” नाम से एक-एक पेज विज्ञापन परिशिष्टांक छापकर लाखों की धन उगाही कर ली।

 पहले दिन ये बेहयायी कानपुर दैनिक जागरण ने की। उसके अगले दिन अमर उजाला ने “कमाल के कलाम” नाम से एक पेज का विज्ञापन छापकर अपने नंगेपन का सुबूत दे दिया। दोनों ने डा. कलाम के नाम पर एक-एक पेज का विज्ञापन छापकर धन उगाही तो की पर श्रद्धांजलि के नाम पर उन्हें एक सेंटीमीटर जगह देना भी मुनासिब नहीं समझा। 

कानपुर के पत्रकार महबूब अली से संपर्क : k.mehboob@rediffmail.com

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दुबई की यात्रा पर गए हुए हैं अमर उजाला के 10 संपादक

अमर उजाला ने अपने दस संपादकों को दुबई की यात्रा पर भेजा है. ये संपादक हैं- इंदु शेखर पंचोली (लखनऊ), प्रभात सिंह (गोरखपुर), अजित वडरनेकर (वाराणसी), विजय त्रिपाठी (कानपुर), राजीव सिंह (मेरठ), भूपेंद्र (दिल्ली), संजय अभिज्ञान (चंडीगढ़), वीरेंद्र आर्य (रोहतक) और नीरजकांत राही (मुरादाबाद). अमर उजाला ने संपादकों को विदेश टूर पर भेजने का काम पहली बार किया है.

बताया जा रहा है कि इन संपादकों ने कंटेंट और सरकुलेशन के मोर्चे पर अच्छा काम किया है. इन्हें जो टारगेट दिया गया था, उसे पूरा किया. एबीसी के ताजे आंकड़े लक्ष्य के अनुकूल रहे. इस कारण प्रबंधन ने पुरस्कार के बतौर इन्हें भ्रमण पर भेजा है. वहीं, विघ्नसंतोषियों ने खबर उड़ाई है कि उन लोगों को विदेश टूर पर भेजा गया है जिन्होंने पुराने लोगों को निकालने और मजीठिया वेज बोर्ड के आग को ठंढा करने का काम भरपूर मात्रा में किया है.

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जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान ने महेंद्र मोहन और संजय गुप्ता के खिलाफ समन नहीं छापा

मुरादाबाद  : दूसरों के बारे में बड़ी बड़ी हांकने वाले प्रमुख मीडिया घराने अपनी करतूतें छापने से कैसे कतराने लगते हैं, इसकी ताजा मिसाल है मुरादाबाद के इंस्पेक्टर विजेंद्र सिंह राना का मामला। कोर्ट में दैनिक जागरण के मालिक महेंद्र मोहन गुप्ता और प्रधान संपादक संजय गुप्ता के खिलाफ एक गलत खबर प्रकाशित करने का मामला चल रहा है। गत दिनो जब राना के वकील उस केस का समन प्रकाशित कराने जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान और आज अखबारों के दफ्तर पहुंचे तो चारो ने उसे प्रकाशित करने से साफ मना कर दिया। अंत में सिर्फ दैनिक केसरी ने समन को प्रकाशित किया।   

दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता और एमडी महेंद्र मोहन गुप्ता के खिलाफ दायर ये मामला तीन साल पुराना है। तीन साल पहले बिलारी क्षेत्र में एक युवक की लाश लटकी मिली थी। इस मामले में दायर कोर्ट केस में संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता को पार्टी बनाया गया है। कोर्ट सम्मन छपवाने के लिए अखबार का नाम अदालत से ही तय होता है। समन प्रकाशन के लिए अदालत से जागरण का नाम तय हुआ। 

सब इंस्पेक्टर राना के वकील संजीव चौधरी और नीतेश कुमार सबसे पहले दैनिक जागरण के मुरादाबाद में कांठ रोड स्थित कार्यालय पहुंचे। सम्मन में संजय गुप्ता और महेंद्र मोहन गुप्ता का नाम और पद लिखा था, इसलिए जागरण आफिस में हड़कंप मच गया। संपादक ने ये कह कर समन प्रकाशित करने से मना कर दिया कि हम अपने ही खिलाफ इसे कैसे छाप सकते हैं। वहां से तुरंत नोएडा और कानपुर जागरण कार्यालयों को बताया गया। उधर से मामला कोर्ट के बाहर निपटाने को कहा गया तो संपादक ने जमकर जोर लगाया और जब सफलता हाथ नहीं लगी तो नोएडा कह दिया कि मामला उनसे पुराना है। इसलिए वो इसमें कुछ नहीं कर सकते। उन्होंने बता दिया कि खबर ज्ञानेंद्र सिंह ने प्रदीप शुक्ला के कार्यकाल में लिखी थी। ज्ञानेंद्र अब जागरण इलाहाबाद में और प्रदीप शुक्ला बरेली जागरण में तैनात हैं।

इसके बाद संजीव चौधरी और नीतेश कुमार समन लेकर हिंदुस्तान कार्यालय पहुंचे। हिंदुस्तान ने भी छापने से मना कर दिया। वहां से दोनो वकील अमर उजाला कार्यालय गए। रिसेप्शनिस्ट ने पहले तो छापने के लिए स्वीकारते हुए समन ले लिया। फिर बिलबुक लेने के बहाने आफिस के अंदर गया। लौट कर उसने भी समन लौटाते हुए छापने से मना कर दिया। दोनो वकीलों ने किसी के माध्यम से समन आज अखबार में छपवाना चाहा तो वहां से भी इनकार कर दिया गया। आखिर स्थानीय दैनिक केसरी ने समन को छापा।

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अमर उजाला फाउंडेशन ने एक-एक लाख रुपये की दो फेलोशिप के लिए मांगा आवेदन, करें अप्लाई

नई दिल्ली। अमर उजाला ने अमर उजाला फाउंडेशन राष्ट्रीय पत्रकारिता फैलोशिप-2015 की घोषणा कर दी है। इस बार फाउंडेशन ने दो पत्रकारों को एक-एक लाख रुपये की फैलोशिप देने का निर्णय लिया है। यह फैलोशिप छह माह की होगी। विषय चयन: इच्छुक अभ्यर्थी देश के किसी खास क्षेत्र या समूचे देश को अपना कार्य क्षेत्र बना सकते हैं। कोई भी ऐसा मुद्दा ले सकते हैं, जिस पर शोध से सामाजिक पत्रकारिता में योगदान के अवसर खुल सकें। आयु सीमा: अभ्यर्थी की उम्र 35 साल और पत्रकारिता में पांच साल का अनुभव अनिवार्य है। आवेदन के समय संस्थान का अनापत्ति पत्र देना जरूरी होगा।

 

कैसे करें आवेदन: स्व चयनित विषय पर 1,000 शब्दों में प्रस्ताव (सिनॉप्सिस) फाउंडेशन को भेजें। प्रस्ताव के साथ संक्षिप्त बायोडाटा (शैक्षणिक योग्यता, कार्य अनुभव) और यदि पहले कोई पत्रकारिता-फैलोशिप मिली है, तो उसका भी उल्लेख करें। अपने बाइलाइन की तीन श्रेष्ठ रिपोर्ट/आलेखों की फोटो कॉपी और दो ऐसे व्यक्तियों के नाम, पता, ईमेल, फोन नंबर लिखें, जो आपको और आपके पत्रकारीय काम के बारे में जानते हों।

चयन प्रक्रिया: निर्णायक समिति आये प्रस्तावों पर विचार करेगी और इसके बाद साक्षात्कार के माध्यम से अंतिम फैसला किया जाएगा। चयनित अभ्यर्थियों के काम की प्रतिमाह अनिवार्य समीक्षा होगी। फाउंडेशन का मकसद : फाउंडेशन का मानना है कि पत्रकारिता से जुडे़ संवेदनशील, प्रतिभाशाली युवाओं को करिअर के शुरुआती दौर में लीक से हटकर काम करने का मौका मिलना चाहिए, ताकि उनमें देश और समाज को गहराई से प्रभावित वाले मुद्दों पर सुलझे नजरिए से काम करने का निरंतर उत्साह बना रहे। 10 जुलाई तक आवेदक कर सकेंगे आवेदन। आवेदन प्राप्ति की अंतिम तिथि : 10 जुलाई। लिफाफे पर स्पष्ट रूप से अंकित हो- अमर उजाला फाउंडेशन राष्ट्रीय पत्रकारिता फैलोशिप के लिए। इस पते पर भेजेंः प्रोजेक्ट निदेशक, अमर उजाला फाउंडेशन, सी-21,22, सेक्टर-59, नोएडा-201301

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अमर उजाला के पचास करोड़ रुपये के आईपीओ को सेबी ने दी मंजूरी

पूंजी बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड (सेबी) ने पिछले हफ्ते तीन कंपनियों के प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) को अपनी मंजूरी दे दी है। यह तीनों कंपनियां अपने कारोबार विस्‍तार और कार्यशील पूंजी की जरूरतों के लिए संयुक्‍त रूप से 1,000 करोड़ रुपए की राशि बाजार से जुटाएंगी। इसके साथ ही इस साल सेबी द्वारा आईपीओ की मंजूरी हासिल करने वाली कंपनियों की संख्‍या बढ़कर 17 हो गई है।

सेबी ने पिछले हफ्ते हिन्‍दी दैनिक अखबार अमर उजाला की प्रकाशक कंपनी अमर उजाला पब्लिकेशन, इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर कंपनी दिलीप बिल्‍डकॉन और कल्‍पतरू पावर ट्रांसमिशन की सब्सिडियरी श्री शुभम लॉजिस्टिक के आईपीओ को मंजूरी दी है। इन सभी ने फरवरी और मार्च में सेबी के समक्ष ड्राफ्ट पेपर दाखिल किए थे। पिछले महीने सेबी ने चार कंपनियों को आईपीओ लाने की मंजूरी दी थी। हालांकि, इन कंपनियों ने अभी तक अपना आईपीओ लांच नहीं किया है।

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि 2015 में आईपीओ बाजार में कुछ गतिविधी देखने को मिल सकती है, क्‍योंकि एक दर्जन से अधिक कंपनियों को इसके लिए मंजूरी हासिल हो चुकी है। सेबी ने दिलीप बिल्‍डकॉन को एक जून, श्री शुभम लॉजिस्टिक को 2 जून और अमर उजाला को 3 जून को मंजूदी दी थी। सेबी को दिए गए ड्राफ्ट पेपर्स के मुताबिक दिलीप बिल्‍डकॉन के आईपीओ का साइज 650 करोड़ रुपए है। श्री शुभम लॉजिस्टिक के प्रस्‍तावित आईपीओ का आकार 210 करोड़ रुपए है। अमर उजाला के आईपीओ का आकार 50 करोड़ रुपए है।

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अमर उजाला के पत्रकार को छह लाख रुपये के विवाद में मारी गई गोली

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कांधला में पत्रकार विनय बालियान पर जानलेवा हमला छह लाख रुपये के लेनदेन को लेकर किया गया था। पुलिस ने एक हमलावर को पकड़ कर यह खुलासा किया है। इस प्रकरण में अभी दो हमलावरों सहित शातिर पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। एसपी शामली विजय भूषण ने अपने कार्यालय में पत्रकारों से वार्ता कर घटना का खुलासा किया। एसपी के अनुसार, 25 मई की रात दुकान से घर जाते समय पत्रकार विनय बालियान को बाइक सवार तीन शातिरों ने गोली मारकर घायल कर दिया था।

अज्ञात हमलावरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया। पुलिस ने जांच पड़ताल की। सर्विलांस का सहारा लिया और शातिरों का पता लगाकर एक हमलावर को पकड़ लिया। एसपी का कहना है कि विनय बालियान ब्याज पर रुपये देने का काम करता है। कांधला निवासी इकराम से छह लाख के लेनदेन को लेकर दोनों में मनमुटाव था। इकराम का चचेरा भाई नौशाद अपराधिक छवि का है। पूर्व में उससे भी विनय की कहासुनी हुई थी। सर्विलांस के जरिए नौशाद, राजेश सैनी व अरशद निवासी कांधला की भूमिका संदिग्ध पाई गई। जांच पड़ताल में सामने आया कि घटना वाली रात दिल्ली अड्डे पर पहले तीनों ने शराब का सेवन किया। अरशद ने एक बाइक का इंतजाम किया। इसी बाइक पर सवार होकर तीनों ने विनय बालियान को गोली मारी। नौशाद को पकड़ा गया तो उसने घटना का खुलासा किया।

एसपी ने जानकारी दी कि नौशाद का कहना है कि घटना के बाद बाइक को सुनसान क्षेत्र में डाल दिया था। इस मामले में नौशाद, अरशद व राजेश सैनी को मुख्य आरोपी बनाया गया है। इकराम के खिलाफ साजिश रचने की धारा में कार्रवाई होगी। उधर, घटना में किसी सफेदपोश के शामिल होने के सवाल पर एसपी का कहना था कि अभी तक जांच पड़ताल में ऐसा नहीं आया है। यदि ऐसा आया तो कार्रवाई होगी।

एसपी का कहना है कि इकराम व विनय बालियान के बीच चेयरमैन ने समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन समझौता कुछ दिन बाद ही टूट गया। तब चेयरमैन समझौते से बाहर आ गए थे। विनय ने इकराम पर पैसे के दबाव बनाया तो इकराम की साजिश पर इस घटना को अंजाम दिया गया। इस प्रकरण में दो हमलावरों सहित तीन आरोपी फरार हैं। इसके अलावा भी जो तथ्य प्रकाश में आएंगे, उन्हें भी कार्रवाई में सम्मिलित किया जाएगा। पुलिस ने नौशाद की निशानदेही पर तमंचा बरामद किया है। विनय बालियान पर हमला प्रकरण में गिरफ्तार नौशाद ने स्वयं को निर्दोष बताया। उसका कहना था कि उसका इस मामले से कोई लेनादेना नहीं है। उसके चचेरे भाई इकराम का विनय के साथ लेनदेन का विवाद है।

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नहीं सम्‍पादक जी, नहीं, ऐसा मत कीजिए

वैसे भी आपकी विश्‍वसनीयता पिछले कई बरसों से बुरी तरह खतरे में हैं, इसके बावजूद अगर आपने अपना रवैया नहीं सुधारा तो अनर्थ ही हो जाएगा। अब देख लीजिए ना, कि आपके संस्‍थान में क्‍या-क्‍या चल रहा है। राजधानी से प्रकाशित अखबारों पर एक नजर डालते ही हर पाठक को साफ पता चल जाता है कि मामला क्‍या है और खेल किस पायदान पर है। 

हिन्‍दुस्‍तान और अमर उजाला ने बिजली कम्‍पनियों द्वारा की गयी कई-कई सौ रूपयों की धोखाधड़ी की खबर को लीड छापी है। नभाटा ने कुमार विश्‍वास को लीड बनाया है। लेकिन दैनिक जागरण ने मोदी की जान पर खतरे को लीड बना दिया है। 

क्‍या वाकई नरेंद्र मोदी की जान को खतरा है ? अगर हां, तो इस खबर की अनदेखी करके बाकी अखबारों ने वाकई गम्‍भीर चूक की है। शर्मनाक चूक।

लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो आपको यह स्‍पष्‍ट करना होगा कि इस खबर की विश्‍वसनीयता क्‍या है।

कुमार सौवीर के एफबी वॉल से

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Newspapers readership IRS 2014 Download

Download Topline Newspapers Readership numbers… देश के बड़े अखबारों, मैग्जीनों आदि की लैटेस्ट या बीते वर्षों की प्रसार संख्या जानने के लिए नीचे दिए गए शीर्षकों या लिंक्स पर क्लिक करें…

IRS 2014 Topline Findings
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IRS 2013 Topline Findings
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IRS 2012 Q4 Topline Findings
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कई दिन चुप्पी साधे रहे जागरण और अमर उजाला का आज एक साथ आईआरएस रिपोर्ट पर अटैक, निशाने पर ‘हिंदुस्तान’

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रीडर सर्वे : जागरण, हिंदुस्तान, भास्कर की शीर्ष अग्रता बरकरार, पत्रिका चौथे, अमर उजाला पांचवें पायदान पर

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अमर उजाला ने लखनऊ में दैनिक जागरण को पटका, बना नंबर वन

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हिंदुस्‍तान ने लिखा – बड़े अखबारों का विरोध बेकार, इंडियन रीडरशिप सर्वे की रिपोर्ट सही

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई, भविष्य की रणनीति और लड़ने का आखिरी मौका… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : सुप्रीम कोर्ट से अभी लौटा हूं. जीवन में पहली दफे सुप्रीम कोर्ट के अंदर जाने का मौका मिला. गेट पर वकील के मुहर लगा फार्म भरना पड़ा जिसमें अपना परिचय, केस नंबर आदि लिखने के बाद अपने फोटो आईडी की फोटोकापी को नत्थीकर रिसेप्शन पर दिया. वहां रिसेप्शन वाली लड़की ने मेरा फोटो खींचकर व कुछ बातें पूछ कर एक फोटो इंट्री पास बनाया. पास पर एक होलोग्राम चिपकाने के बाद मुझे दिया. जब तक कोर्ट नंबर आठ पहुंचता, केस की सुनवाई समाप्त होने को थी.

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में भड़ास यानि Bhadas4Media.com की पहल पर दायर सैकड़ों याचिकाओं की सुनवाई आज थी. जो साथी छुपकर लड़ रहे हैं, उनको मैं रिप्रजेंट कर रहा हूं. कोर्ट नंबर आठ में आइटम नंबर तीन था. दूसरे कई पत्रकार साथी और उनके वकील भी आए हुए थे. मामले की सुनवाई शुरू होते ही टाइम्स आफ इंडिया की तरफ से आए एक वकील ने कहा कि उनके खिलाफ जिस कर्मचारी ने याचिका दायर की थी, उसने वापस लेने के लिए सहमति दे दी है. इस पर कर्मचारी के वकील ने विरोध किया और कहा कि ये झूठ है. इसको लेकर न्यायाधीश ने लड़-भिड़ रहे दोनों वकीलों को फटकार लगाई और इस प्रकरण को अपने पास रोक लिया. इसी तरह वकील परमानंद पांडेय के एक मामले में जब दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि मजीठिया मांगने वाला कर्मी इसके दायरे में आता ही नहीं तो न्यायाधीश ने परमानंद पांडेय से पूछ लिया कि क्या ये सही है. पांडेय जी फाइल देखने लगे. तुरंत जवाब न मिलने पर न्यायाधीश ने इस मामले को भी होल्ड करा लिया. बाकी सभी मामलों में  कोर्ट ने सभी मालिकों को नोटिस भेजने का आदेश दिया है. इस नोटिस में कहा गया है कि क्यों न अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा शुरू किया जाए. मामले की सुनवाई की अगली तारीख 28 अप्रैल है.

दोस्तों, एक मदद चाहिए. सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े चाहिए. जो साथी इसे मुहैया करा सकता है वह मुझे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करे. अखबार मालिक अपने बचाव के लिए जो नई चाल चल रहे हैं, उसका काउंटर करने के लिए ये आंकड़े मिलने बहुत जरूरी हैं ताकि आम पत्रकारों को उनका हक दिलाया जा सके. मालिकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत तल्ख है. आज की सुनवाई से यह लग रहा है कि 28 अप्रैल की डेट पर सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कड़ा आदेश जारी कर सकता है. अगली डेट पर मालिकों की तरफ से क्या क्या नई चाल चली जाने वाली है, इसके कुछ डिटेल हाथ लगे हैं. उसी के तहत आप से सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े मांगे जा रहे हैं. आप लोग जिन-जिन अखबारों में हो, उन उन अखबारों के उपरोक्त डिटेल पता लगाएं. मैं भी अपने स्तर पर इस काम में लगता हूं.

दोस्तों बस कुछ ही दिनों का खेल है. जी-जान से सबको लग जुट जाना है. ये नहीं देखना है कि उसका वकील कौन है मेरा वकील कौन है. जो भी हैं, सब अच्छे हैं और सब अपने हैं. जो साथी अब तक इस लड़ाई में छुपकर या खुलकर शरीक नहीं हो पाए हैं, उनके लिए अब कुछ दिन ही शेष हैं. आप सिर्फ सात हजार रुपये में सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बनने वाली अपनी सेलरी व अपना एरियर का हक पाने के लिए एडवोकेट Umesh Sharma​ के मार्फत केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

आज यानि 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा ने जो कुछ मुझे बताया, उसे मैंने अपने मोबाइल से रिकार्ड कर लिया ताकि आप लोग भी सुनें जानें और बूझें. क्लिक करें इस लिंक पर: https://www.youtube.com/watch?v=KTTDbkReQ1k

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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अमर उजाला के पीटीएस विभाग पर वज्रपात, दूर तबादला करके मशीन विभाग में काम करने को मजबूर किया

अमर उजाला के पीटीएस विभाग के कर्मचारियों की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं लेती। अगर एक खत्म हो तो दूसरी मुश्किल सामने ही खड़ी होती है। कुछ महीने पहले ही अमर उजाला में पीटीएस विभाग खत्म करने का निर्देश जारी किया गया था। उसके बाद से ही अमर उजाला के हर यूनिट से पीटीएस में कांट्रैक्ट पर रखे सभी कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। कुछ पीटीएस कर्मचारियों को बिना कारण नोएडा ऑफिस बुलाकर इस्तीफा मांग लिया गया। जब किसी कर्मी ने इस्तीफा नहीं दिया तो उन सभी कर्मचारियों का ट्रांसफर कर दिया गया। बात यहीं खत्म नहीं होती। कुछ पीटीएस कर्मचारियों का ट्रांसफर बरेली से रोहतक यूनिट के मशीन में कर दिया गया।

अब सोचने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने साक्षात्कार (इंटरव्यू) पेज व ऐड बनाने का दिया था वो मशीन में कैसे काम कर सकते हैं। पर इससे मालिक लोगों का कोई लेना-देना नहीं। उन्हें तो सिर्फ पीटीएस विभाग के कर्मियों को परेशान कर संस्‍थान से बाहर निकालना है। मजीठिया वेतनमान लागू करने का दिखावा करने वाले अमर उजाला ने मजीठिया वेतनमान से पीटीएस विभाग के कर्मियों को कोसों दूर रखा। मजीठिया वेतनमान देने के नाम पर संस्‍थान ने पीटीएस के किसी भी कर्मी को 250 रुपये से लेकर 1200 रुपये से ज्यादा का लाभ नहीं दिया।

इस विभाग में कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्होंने अमर उजाला के एमडी रहे स्व. श्री अतुल महेश्‍वरी जी के सा‌थ काम किया है। पीटीएस विभाग में वो लोग भी शामिल हैं जिन्होंने संस्‍थान में अपने जीवन का मूल्यवान समय झोंक दिया और आज उन्हें ही ओछी नजरों से देखा जा रहा है। आज उनका ही स्‍थानांतरण कर मशीन में काम करने को कहा जा रहा है। 10 मार्च को चंडीगढ़ यूनिट से पीटीएस विभाग के इंचार्ज प्रेम प्रकाश शर्मा का स्‍थानतरण यूपी के गोरखपुर अमर उजाला के मशीन में कर दिया गया। संस्‍थान पीटीएस विभाग समाप्त करने के मकसद से अब सभी पीटीएस कर्मचारियों को यूनिट के संपादकों के अधीन कर दिया है। पहले यह प्रोडेक्शन मैनेज़र के अधीन काम करते थे। पीटीएस विभाग का शोषण अमर उजाला में हमेशा होता रहता है। कभी मालिक के लोगों द्वारा तो कभी उच्च पद पर बैठे अधिकारियों द्वारा। यहां तक कि संपादकीय विभाग में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो पीटीएस विभाग के कर्मचारियों को नीचा दिखाने और उनकी शिकायत अधिकारियों से करने से परहेज नहीं करते।

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अमर उजाला को चाहिए ब्राह्मण पत्रकार

उत्तर प्रदेश : सुलतानपुर में अमर उजाला लांच होने पर रमाकांत तिवारी को ब्यूरो चीफ बनाया गया था। इनके कार्यकाल के दौरान से रिपोर्टर व कैमरामैन पदों पर ब्राह्मण बिरादरी के लोग तलाशे जा रहे हैं। इधर बीच कानाफूसी कर ब्यूरो चीफ ने होनहार कैमरामैन पंकज गुप्ता की छुट्टी करवा दी। इसके बाद चर्चाओं का बाजार गर्म है। अमर उजाला लांच के समय यानि सात साल पहले पंकज गुप्ता को सुलतानपुर में कैमरामैन पद पर नियुक्त किया गया था। अपने अच्छे काम के चलते पंकज ने चंद दिनों में ही अमर उजाला को एक नया मुकाम दिला दिया, लेकिन यहां के ब्यूरो चीफ शायद ब्राह्मण को ही ज्यादा पसंद करते हैं।

अमर उजाला आफिस में 11 लोगों की नियुक्ति है, जिसमें सभी रिपोर्टर ब्राह्मण हैं। शेष दो विनय सिंह और अमर बहादुर हैं जिनमें एक प्रसार देखते हैं और दूसरे विज्ञापन। एक हफ्ता पहले जब ब्यूरो चीफ को ब्राह्मण कैमरामैन मिल गया तो पंकज गुप्ता के खिलाफ झूठी शिकायत कर उन्हें हटवा दिया गया। सूत्रों का कहना है कि ब्यूरो चीफ अपने बिरादरी के हर रिपोर्टर का गलत सही कामों में सहयोग करते हैं। लोेकसभा चुनाव के दौरान तो इन पर कई आरोप लगे थे। ऐसे ही एक मामले में पूर्व मंत्री अमिता सिंह ने दफ्तर पहुंचकर इन्हें खरी-खोटी सुनाई थी। पंकज गुप्ता को हटाए जाने के बाद अब रमाकांत तिवारी ने विजय तिवारी को अपना कैमरामैन नियुक्त करवा लिया है।

 

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