विकास के मनमोहन-मोदी मॉडल से तौबा !

साल भर पहले मनमोहन सिंह अछूत अर्थशास्त्री थे । साल भर पहले पहले जातीय राजनीति करने वाले बीजेपी के लिये अछूत थे । साल भर पहले कश्मीरी पंडितों की घरवापसी बीजेपी के लिये सबसे अहम थी । साल भर पहले किसानों के दर्द पर बीजेपी जान छिड़कने को तैयार थी । साल भर पहले सत्ता के दलालों के लिये बीजेपी में गुस्सा था । साल भर पहले बीजेपी को विश्व बैंक की नीतियों पर गुलाम बनाने वाली प्रतित होती थी।  साल भर पहले बीजेपी अपनी जीत पर इतराती हुई एकला चलो के नारे को लगा रही थी । और साल भर में सबकुछ बदल गया ।

मनमोहन सिंह के लिये 7 आरसीआर के दरवाजे खुल गये । जातीय राजनीति की जमीन से उपजे जीतनराम मांझी से गलबहियां डालने के रास्ते निकाले जाने लगे। कश्मीरी पंडितों की उम्मीद मुफ्ती के साथ सत्ता प्रेम तले दफ्न होने लगी। किसानों को विकास के जाल में फंसाने के उपाय खोजे जाने लगे । राडिया टेपकांड की फाइल बंद कर दी गई। बिहार में चुनावी जीत के लिये जिस पप्पू यादव की दबंगई के कसीदे पढे गये वह दबंगई छूमंतर होने लगी । तो सरकार चलाने के लिये भी कही ममता तो कही जयललिता से हाथ मिलाना शुरु हो गया। विश्व बैंक की नीतियां विकास के लिये शानदार लगने लगीं और विश्व बैंक के हिमायती योजना आयोग के जिस मोंटेक सिह अहलूवालिया की अर्थशास्त्रीय सोच की टोपी संसद के भीतर उछाली गई उसी सोच के पनगढिया को नीति आयोग सौप दिया गया। तो क्या साल भर पहले जनता ने बदलाव के जो सपने नरेन्द्र मोदी के जरीये संजोये वह सिवाय सपने के और कुछ नहीं था ।

और क्या संसदीय राजनीति करते हुये सत्ता चलाने का कोई दूसरा रास्ता देश में है ही नहीं । यानी जातीय राजनीति , दागी राजनीति और कारपोरेट राजनीति ही जीत का आखिरी चुनावी मंत्र है। और सत्ता मिलने के बाद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हो या हिन्दू राष्ट्रवाद या फिर राष्ट्रीय स्वाभिमान का सवाल सब कुछ ठंडे बस्ते में डाल कर ही सत्ता चलायी जा सकती है । क्योंकि सत्ता को उसी संसद के जरीये चलना है जहां भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलो में लपेटे दौ सौ से ज्यादा सांसद है। इनमें 185 सांसदों को तो जनता ने ही अपनो वोट से चुना है। और बाकि राज्यसभा के सदस्यों में दागियों से ज्यादा तो उस सिस्टम की पहचान है जहां प्राइवेट बिजनेस निजी मुनाफे पर टिके होते हैं ।यानी राज्यसभा के चालिस फीसद सदस्यों के अपने घंघे है । कोई कारपोरेट से जुडा है तो कोई उघोगपति है । किसी के की फार्म है तो किसी के उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकते है । 

अब यह सवाल हर जहन में उठ सकता है कि जिन सवालों को साल भर पहले नरेन्द्र मोदी ठसक के साथ उठा रहे थे वही सवाल अब सरकार चलाने में भारी पड़ रहे है । क्योंकि जिस यूपी में 15 लाख बेरोजगारों के नाम रोजगार दफ्तरों में दर्ज है उसी यूपी में पुलिस भर्ती में सत्ता के अनुकूल जाति देखी जाती है और जिस यूपी में आठ करोड लोग गरीबी की रेखा से नीचे हो वहा सत्ता शाहीअंदाज में विवाह समारोह करती हो और प्रधानमंत्री मोदी भी इसमें शरीक होने से नहीं हिचकते । दागदार लालू यादव की सत्ता को जंगल राज कहने में साल भर पहले भी नहीं हिचके और आज भी जो बीजेपी नहीं हिचकती है उनके साथ विवाह समारोह में गलबहियां डालकर फोटो खिंचवाने के लिये प्रधानमंत्री मोदी भी सैफई क्यों पहुंच जाते है ।

मुश्किल यह नहीं है कि जयललिता का आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में बरी होते ही देश के पीएम बधाई देते है या फिर चिट पंड में फंसी ममता को राजनीतिक तौर पर एक वक्त लताड़ते है और दूसरे पल समझौते की दिशा में कदम बढ जाते है । टूटती तृणमूल को राहत मिलती है तो जो ममता मनमोहन के साथ बांग्लादेश नहीं गई वह मोदी के साथ खड़ी होती दिखायी देती है । मुश्किल यह है कि हाशिये पर पडे देश के करोड़ों करोड़ लोग जो सत्ता के बदलाव से अपनी जिन्दगी में बदलाव के सपने संजोते हैं उनके सामने वही हालात नये चेहरे के साथ  खड़े होते हैं । तो क्या हर पांच बरस बाद अब देश चुनाव के लिये जनता की भावनाओं के साथ खेलने का नायाब अवसर दे रहा है और यही राजनीतिक बिसात है । या फिर राजनीतिक सत्ता ही ऐसे मुहाने पर आ खडी हुई है जहा संसदीय ढांचा ही लोकतंत्र का आखिरी गीत है जिसे संसद के भीतर सुनने से लोकतंत्र का मर्सिया लगता है और जनता के बीच खड़े होकर सुनने से दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक देश होने का गुरुर पैदा होता है। और सच है क्या यह हर चुनाव के वक्त नेताओं के भाषण या राजनेता के खिलाफ आक्रोश में सड़क पर जमा होते लोगों से खड़ा होते आंदोलन के बीच पता चल नहीं पाता है। क्योंकि राज्य चलाने का कोई आर्थिक-सामाजिक मॉडल कहीं से निकलता नहीं है ।

साल भर पहले पीएम बनने के लिये सैकड़ों मिल की यात्रा करते हुये नरेन्द्र मोदी जो कह रहे थे, वह सिवाय नेहरु से लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सत्ता से बने सामाजिक मवाद के दिखाने-बताने के अलावे और कुछ था भी नहीं। और तीन बरस पहले दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर जंतरमंतर तक भी अन्ना के संघर्ष में जो कहा जा रहा था, वह भी सिवाय संसदीय राजनीतिक सत्ता के भीतर के मवाद को दिखाने-बताने के अलावे और कुछ था भी नहीं। यानी देश चले कैसे और चल रहे देश को कौन रोककर खड़े हैं और उसे दरकिनार किया कैसे जाये यह सवाल हर दौर में अनसुलझे रहे है या फिर संसदीय ढांचा जिन आधारों पर आ खड़ा हुआ है उन आधारों को ही देश मान लिया गया है। अगर कोई नेता,राजनेता,नौकरशाह,पार्टी कार्यकर्ता, व्यापारी, उघोगपति नहीं है तो वह देश का नागरिक है कहां और देश के संविधान के तहते उसे जो हक मिले है उसकी सुनेगा कौन इसकी कोई व्यवस्था किसी रुप में मौजूद है नहीं। यह सवाल इसलिये बड़ा है क्योंकि देश में आर्थिक सुधार 1991 में शुरु हुये। और उसके बाद से देश के हालात में विकास का नाम लेकर कमोवेश हर पीएम ने अपने अपने तरीके से रास्ते निकालने का जिक्र किया । विकास को चकाचौंध से जोड़ा। और मौजूदा वक्त में भी प्रधानमंत्री मोदी जिस तरह लगातार विदेशी निवेश के जरीये विकास का जिक्र कर रहे है और उसी से हाशिये पर पडे भारत की तस्वीर बदलने का सपना दिखा रहे है, उसके उलट स्थिति यह है कि 1991 में भी भारत दुनिया के मानचित्र पर भूखमरी में पहले नंबर पर था और 2014-15 में भी भुखमरी में भारत पहले नंबर पर है। 

तो फिर विकास के नाम पर किसका विकास होता है या आम जनता क्यों बदहाली में ही रह जाती है, यह सवाल बहुत जटिल नहीं है । पन्नों को पलटें तो 1991 में 1 अरब 30 करोड़ का विदेशी निवेश भारत में हुआ । और 2014-15 में 35 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ । लेकिन इसी विदेशी निवेश के आसरे देश को विकास की राह पर लाने का दावा करने वाले अब इस आंकड़े से परेशान होंगे कि 1990-92 के वक्त भी 21 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार थे और 2014-15 में भी करीब 19 करोड 60 लाख लोग भुखमरी के शिकार है । वैसे यह सवाल उठ सकता है कि तब आबादी कम थी और अब आबादी ज्यादा है । लेकिन समझना यह भी होगा कि आखिर विकास का कौन सा मॉडल हम अपना रहे है । क्योंकि दुनिया के मानचित्र पर पच्चीस बरस पहले भी इसी दौर में भारत के तमाम पड़ोसियों के भुखमरी के हालात में खासा सुधार हुआ है। नेपाल में भुखमरी की स्थिति में 65.6 फीसदी और भूटान में 49.9 फीसदी की कमी हुई। चीन में भी भारत से कम भुखमरी है । और यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के स्टेट ऑफ फूड इनसिक्योरिटी इन द वर्ल्ड की है। जिसके मुताबिक दुनियाभर में 79 करोड़ चालिस लाख लोग भुखमरी के शिकार है, इनमें से भारत में 19 करोड़ चालिस लाख लोग शामिल है ।

और मनमोहन सिंह विकास के नाम पर जिस आर्थिक सुधार को लेकर आये और चीन उस वक्त भी जिस कृषि विकास को लेकर काम कर रहा था असर उसी का है कि 1991 में चीन में 29 करोड़ भुखमरी के शिकार थे जो 2015 में घट कर 13 करोड़ पर आ गया और भारत इस दौर में 21 करोड़ से घटकर 19.4 करोड तक पहुंचा । यानी दुनिया में भुखमरी में नंबर एक । तो अब सवाल यह भी है ककि क्या विकास को लेकर देश में जो रास्ता 1991 के बाद से अपनाया गया वह गलत है क्योंकि विकास से गरीबों को तो अभी भी जोड़ा जा रहा है। जानकारों का कहना है कि बच्चों को पोषण और मिड डे मिल स्कीमों में बजट की कमी से भारत में भुखमरी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तो सवाल सीधा है कि जब विकास के लिए उठाए गए कदमों का फायदा गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों तक पहुंच ही नहीं रहा तो क्या विकास की बातें बेमानी हैं या सरकार की तमाम योजनाएं उस हाशिए पर पड़े इंसान के लिए हैं ही नहीं, जिन्हें केंद्र में रखकर योजनाएं बनाने का दावा किया जाता है। और ऐसे में अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह बतौर कमजोर पीएम रहे हो हो या ताकतवर पीएम के तौर पर नरेन्द्र मोदी। और दोनों ही कुछ भी कहे लेकिन देश के विकास का कोई ब्लू प्रिट वाकई है तो किसी के पास भी नहीं। 

पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लॉग से

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मनमोहन के आवास तक सोनिया का समर्थन मार्च

दिल्ली : गुरुवार की सुबह, सोनिया गांधी के साथ पार्टी के शीर्ष नेताओं ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रति एकजुटता व्यक्त करने के लिए उनके आवास तक मार्च किया। पूर्व प्रधानमंत्री के आवास तक मार्च का नेतृत्व करने के बाद सोनिया गांधी ने कहा कि हम यहां मनमोहन सिंह के प्रति पूर्ण समर्थन और एकजुटता व्यक्त करने आए हैं। सोनिया ने कहा कि हम अपने पास मौजूद सभी कानूनी संसाधनों के साथ लड़ाई लड़ेंगे, मुझे यकीन है कि हम सही साबित होंगे।

कुछ दिनों से वायरल फीवर से पीड़ित सोनिया संसद की कार्यवाही में भी भाग नहीं ले रही थीं। आज मार्च के बाद वह मनमोहन सिंह से मिली भीं। राहुल गांधी भी इस सप्ताह के अंत तक छुट्टी से लौटने वाले हैं। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री का हर हाल में बचाव करने का फैसला लिया है। कांग्रेस का मानना है कि मनमोहन सिंह ने कोयला ब्लॉक आवंटन में जो कुछ भी किया वह सही था और उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता पर शक नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है कि सीबीआई की विशेष अदालत ने बुधवार को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े एक मामले में बतौर आरोपी पेश होने के लिए समन जारी किया। वे दूसरे पूर्व पीएम होंगे, जिन्हे पेशी का सामना करना पड़ेगा।

स्पेशल जज भारत पाराशर ने यह कहते हुए 83 साल के पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख और चार अन्य लोगों को समन जारी किया है कि उनके कुछ कार्य मामले में उनकी संलिप्तता प्रदर्शित करते हैं। जज पाराशर ने मनमोहन समेत छह लोगों को 8 अप्रैल को अदालत में पेश होने को कहा है।

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मनमोहन सिंह हाजिर हों ! कोयला घोटाले में पूर्व पीएम को कोर्ट का समन

नई दिल्‍ली : कोल ब्‍लॉक आबंटन केस में नया मोड़ आ गया है। पटियाला हाऊस कोर्ट ने बुधवार को कोयला घोटाले में एक बड़ा फैसला दिया है। विशेष अदालत ने आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आरोपी के तौर पर समन जारी किया है।

बताया गया है कि विशेष अदालत ने आज हिंडाल्‍को केस में मनमोहन सिंह को आरोपी बनाने का आदेश दिया। साथ ही सिंह को बतौर आरोपी 8 अप्रैल 2015 कोर्ट में हाजिर होने के लिए समन भेजा है। वहीं, अदालत ने सभी छह आरोपियों को आठ अप्रैल को पेश होने का निर्देश दिया।

इसके अलावा, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारख और तीन अन्य को भी आरोपी के तौर पर समन किया गया। अदालत ने आपराधिक साजिश, विश्वासघात और भ्रष्टाचार रोकथाम कानून के प्रावधानों के तहत उन सबों को समन किया है। वहीं, अदालत ने मामले में आरोपियों के तौर पर मेसर्स हिंडाल्को, इसके अधिकारियों शुभेंदु अमिताभ और डी भट्टाचार्य को तलब किया।

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न्यूज एक्स से जुड़ गए पंकज पचौरी

पंकज पचौरी एनडीटीवी में हुआ करते थे. उसके बाद वह मनमोहन सिंह की सरकार में पीएम के मीडिया सलाहकार बन गए. सलाह देने के बाद जब मनमोहन सरकार विदा हो गई तो कुछ महीनों के खालीपन के बाद अब फिर से पत्रकार रूप में सक्रिय होने को तैयार हो गए हैं. अबकी वह न्यूज एक्स के साथ जुड़े हैं.

पंकज पचौरी इस चैनल पर बतौर गेस्ट बहसियाते दिखने लगे हैं. पंकज बीबीसी और इंडिया टुडे में भी कम कर चुके हैं. मथुरा निवासी पंकज पचौरी के भाई सुधीश पचौरी हैं जो व्यंग्य लेखक हैं. पंकज ने ट्वीट करके टीवी में फिर से सक्रियता की घोषणा की है. न्यूज ए्क्स पर पंकज आने वाले दिनों में किसी प्रोग्राम को होस्ट करते भी देखे जा सकते हैं.

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