क्रिएटिव हेडिंग के मामले में टेलीग्राफ अव्वल, देखें सुप्रीम कोर्ट के टाइपिंग एरर वाले मुद्दे पर मुख्य शीर्षक

Ravish Kumar : मैं टाइप करता गया, एरर होता गया… CAG GAC ACG AGC CGA PAC CAP PCA APC ACP…. IS, WILL, HAS BEEN…. BEEN WILL, IS, HAS, मैं क्या जानूँ रे, जानू तो बस मैं इतना जानू, मैं कुछ ना जानू रे। हुज़ूर की शान में अंग्रेज़ी जो हो ग़लत… ये कौन सी बात …

टेलीग्राफ ने तो कमाल कर दिया, लीड हेडिंग में केवल क्वेश्चन मार्क! देखें

Ravish Kumar एक अख़बार यह भी है। कोर्ट इतनी बड़ी ग़लती कैसे कर सकता है? या सरकार से ये ग़लती हुई? कौन सी CAG की रिपोर्ट की बात लिखी है जो पब्लिक अकाउंट कमेटी में जमा हुई? पब्लिक अकाउंट कमेटी को तो क़ीमतों पर सीएजी की किसी रिपोर्ट की जानकारी ही नहीं। कृपया हमें अनुसरण …

टेलीग्राफ ने ‘गोदी’ हो चुके फेसबुक की हरकतों को लीड खबर बनाकर छापा, पढें

बड़े फौन्ट के शीर्षक और दो-चार बॉक्स वाली ‘बड़ी खबरें’! आज के सभी अखबारों में कोई एक सी बड़ी खबर नहीं है। लिहाजा सभी अखबारों ने अपनी खबरों में से किसी एक को प्रमुखता से बड़े फौन्ट के शीर्षक लगाकर बड़ी खबर बना दिया है। किस अखबार ने किस खबर को प्रमुखता दी है यह …

द टेलीग्राफ में छपी ये खबर- ‘जेटली चुप, टीवी चैनल बचाव में’

Sanjaya Kumar Singh गोदी मीडिया जेटली के बचाव में कूदा… अरुण जेटली-विजय माल्या विवाद में टीवी चैनलों (और अखबारों और सोशल मीडिया पर भक्त पत्रकारों) ने जेटली का बचाव शुरू कर दिया है। माल्या के आरोपों के बाद एक तरफ जेटली ने उनसे मिलना स्वीकार कर लिया दूसरी तरफ कांग्रेस सांसद पीएल पूनिया ने कहा …

स्मृति ईरानी के बारे में अंग्रेज़ी अखबार The Telegraph में प्रकाशित संपादकीय का हिंदी अनुवाद पढ़िए

Vishwa Deepak : मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के बारे में अंग्रेज़ी अखबार The Telegraph में प्रकाशित संपादकीय का हिंदी अनुवाद –

(आपको) लंबी कहानियों से क्या शिक्षा मिलती है?

(मशहूर अंग्रेजी नाटककार) ऑस्कर वाइल्ड को परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है. घटने के बजाय झूठ बोलने की कला आज अपने चरम पर है. कम से कम भारतीय संसद में तो है ही. यहां नेता सचाई के लिए नहीं जाने जाते लेकिन केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने जब सांसदों को ‘राष्ट्रवाद’ का पाठ पढ़ाया तो खुल्मखुल्ला झूठ का ऐसा मानक तैयार कर दिया जिससे आपको ईर्ष्या हो सकती है.

टेलीग्राफ ने पिछले एक महीने में जो हेडिंग दी, वह बहुत आसान काम नहीं है

Ambrish Kumar : सिर्फ दो अखबार… अपनी जो पोस्ट पब्लिक में थी उसमें बहुत से अंजान लोग भी आए. कई आहत थे तो कई आहत करने का प्रयास कर गए. उनकी एक नाराजगी अपन के पत्रकार होने के साथ पूर्व में इंडियन एक्सप्रेस समूह का पत्रकार होने से ज्यादा थी. वे मीडिया की भूमिका से नाराज थे. पर यह नाराजगी दो अखबारों से ज्यादा थी. अपनी प्रोफाइल में इंडियन एक्सप्रेस है ही जो एक अख़बार था तो दूसरा टेलीग्राफ. दोनों की दिल्ली में सांकेतिक मौजूदगी है, बड़े प्रसार वाले अखबारों के मुकाबले. एक्सप्रेस से अपना लंबा संबंध रहा है और उसका इतिहास भूगोल सब जानते भी हैं. चेन्नई अब कहा जाता है पर आजादी से पहले के मद्रास में किस तरह अंग्रेजों से यह अख़बार नुकसान सहकर लड़ा, यह कम लोग जानते है.

सेल्फीमार पत्रकारों को आज के टेलीग्राफ अखबार का पहला पन्ना जरूर पढ़ना चाहिए

Sanjaya Kumar Singh : मेरा पसंदीदा अखबार। इसी को पढ़कर पत्रकारिता का चस्का लगा था और जब इसमें अपनी रिपोर्ट छप गई तो लगा अंग्रेजी में भी छप गया। उस समय सभी पत्रिकाओं में कम से कम एक रिपोर्ट छपवा लेने का रिकार्ड बना रहा था। बाद में प्रभाष जी को बताया कि टेलीग्राफ में भी छप चुका हूं तो उन्होंने कहा कि उसकी अंग्रेजी तो हिन्दी जैसी ही (आसान) है। तब समझ में आया था कि घर में स्टेट्समैन आने के बावजूद मुझे टेलीग्राफ क्यों अच्छा लगता था। पर अब भी अच्छा लग रहा है तो उसका कारण कुछ और है। इसके संस्थापक संपादक कांग्रेस से होते हुए भाजपा में पहुंच गए हैं पर अखबार के तेवर लगभग वैसे ही है। सेल्फी पत्रकारों के इस दौर में भी।