HT Media concludes stake sale in HT Burda Media Ltd

New Delhi : HT Media Ltd (HTML) today said it has concluded the transaction of selling its entire 51 per cent stake in joint venture HT Burda Media Ltd to its partner Burda Druck Gmbh, Germany, for Rs 60 crore.

"On September 30, HT Media and Burda Druck GmbH have executed share purchase agreement and other transaction document to conclude the transaction sale of 51 per cent stake of HTML to Burda for an aggregate consideration of Rs 60 crore," the company said in a BSE filing.

In February this year, HT Media had informed that its board has given in-principle approval to sell its entire 51 per cent equity shareholding in HT Burda Media Ltd to Burda Druck GmbH or its nominee.

"The decision follows the strategic review of HT Media''s long term plans. The sale will be value accretive to HT Media as the gross margins in the printing business were much lower than the margins in the print media business," it said in a statement.

Burda Druck Gmbh is a part of the Hubert Burda Media Group. Hubert Burda Media has its presence in various segments such as print, publishing, TV channels, radio, mobile, online, e-commerce, events, direct marketing, promotions, and research etc.

Shares of HT Media closed today at Rs 84.65 apiece, down 3.20 per cent from its previous close on the BSE. (PTI)

एमपी-सीजी के लिए एक और न्यूज चैनल की चर्चा, अनिल सौमित्र जुड़ेंगे

: मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ५ अक्टूबर से शुरू होगा स्टेट न्यूज चैनल : मीडिया एक्टिविस्ट अनिल सौमित्र के जुडऩे की खबर : मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 24  घंटे का सैटेलाइट चैनल 'स्टेट न्यूज' के 5  अक्टूबर से लॉन्च होने की खबर है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इसका हेडऑफिस रहेगा। बीते छह माह से इसकी तैयारी चल रही है। विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि मीडिया एक्टिविस्ट और चरैवेति के पूर्व सम्पादक अनिल सौमित्र बतौर सलाहकार संपादक स्टेट न्यूज से जुड़ सकते हैं।

स्टेट न्यूज चैनल की लॉन्चिंग के लिए दिल्ली से आए अमरदीप कुमार और उनकी टीम ने तैयारियों को लगभग अंतिम रूप दे दिया है। अमरदीप कुमार बताते हैं कि 5  अक्टूबर से स्टेट न्यूज मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में घर-घर तक पहुंचेगा। स्टेट न्यूज चैनल पर समाचार के साथ-साथ मनोरंजन और एजुकेशन बेस्ड प्रोग्राम भी प्रसारित किए जाएंगे। बता दें कि मध्यप्रदेश में यह बंसल न्यूज के बाद दूसरा सैटेलाइट चैनल है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई प्रमुख जिलों में नियुक्ति प्रक्रिया हो चुकी है तो कई जिलों के लिए अभी भी इंटरव्यू का दौर जारी है।

मध्यप्रदेश विधानसभा और लोकसभा चुनाव को देखते हुए मध्य प्रदेश से जल्द ही कई न्यूज चैनल शुरू होने की खबर है। जानकार बताते हैं कि न्यूज चैनलों की भीड़ में स्टेट न्यूज कछुआ साबित हो सकता है। स्टेट न्यूज चैनल के सेटअप को देखते हुए कहा जा रहा है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा साबित होगा। लोगों के बीच अपनी जगह बनाने के लिए स्टेट न्यूज चैनल अपने प्रोग्राम पर भी खासा फोकस कर रहा है। चैनल से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि चैनल काफी तैयारी करने के बाद लोगों के बीच आ रहा है।

रायसेन जिले के वरिष्ठ पत्रकार कल्याण सिंह भद्रेटिया पंचतत्व में विलीन

रायसेन : रायसेन जिले के वरिष्ठ पत्रकार कल्याण सिंह भद्रेटिया का कल उनके गृह नगर देवनगर में अंतिम संस्कार कर दिया गया। उनके अंतिम संस्कार में जिला पंचायत अध्यक्ष भंबर लाल पटेल बीर सिंह पटेल छतर सिंह पटेल प्रमोद कांकर इकबाल अहमद सिद्दीकी प्रशांत साहू राजेश व्यास  रायसेन से पत्रकार गण दीपक कांकर राजकिशोर सोनी प्रवीण श्रीवास्तव बारेलाल सूर्यवंशी मौजूद समेत देवनगर के गणमानय नागरिक मौजूद थे।

उनके निधन से देवनगर के सभी प्रतिष्ठान शौक स्वरूप उनके अंतिम संस्कार तक बंद रहे तथा एक शोक सभा का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजली अर्पित की गई।

 

पत्रकार लिंगाराम और शिक्षिका सोनी सोरी की जमानत याचिका पर छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार लिंगाराम कोडोपी और आदिवासी शिक्षिका सोनी सोरी की जमानत याचिका पर छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी किये. ये दोनों माओवादियों से कथित संपर्क के आरोप में जेल में हैं. न्यायमूर्ति सुरिन्दर सिंह निज्जर और न्यायमूर्ति एफ एम इब्राहिम कलीफुल्ला ने सोरी और कोडोपी की जमानत याचिका पर छत्तीसगढ सरकार से जवाब तलब किये हैं. राज्य सरकार को 28 अक्तूबर तक अपना जवाब दाखिल करना है.

सोरी और कोडोपी की जमानत अर्जी छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आठ जुलाई को खारिज कर दी थी. इन दोनों को छत्तीसगढ़ में माओवादियों की ओर से इस्सार समूह से धन स्वीकार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. सोरी और उनके 25 वर्षीय भतीजे कोडोपी को इस समूह द्वारा माओवादियों को संरक्षण के लिये कथित रूप से दिये जाने वाली रकम के संपर्क सूत्र के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. पुलिस के अनुसार कोपोडी और इस्सर स्टील लिमिटेड से संबंधित भवन निर्माता बी के लाला को 15 लाख रूपए की नकदी के साथ गिरफ्तार किया गया था. आरोप है कि ये रकम नौ सितंबर, 2011 को दंतेवाड़ा में माओवादियों को सौंपी जानी थी. पुलिस का यह भी दावा है कि सोरी भी कोडोपी की साथी लेकिन वह मौके से बच निकलने में सफल हो गयी थी. इसके बाद सोरी को नयी दिल्ली से चार अक्तूबर, 2011 को गिरफ्तार किया गया था. इस सिलसिले में इस्सर स्टील लिमिटेड के महाप्रबंधक डीवीसीएस वर्मा को भी गिरफ्तार किया गया था. वर्मा और लाला को दंतेवाड़ा की जिला अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया था.
 

पत्रकार उत्पीड़न पर यूपी सरकार से जवाब तलब

संत रविदास नगर भदोही के पत्रकार सुरेश गांधी को उच्चाधिकारियों के इशारे पर पुलिस द्वारा उत्पीड़न किए जाने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाब-तलब किया है। हाईकोर्ट के जस्टिस वीके शुक्ला व राकेश श्रीवास्तव की बेंच ने प्रमुख सचिव गृह, जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक भदोही को एक माह के अंदर जवाब देने को कहा है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े सुरेश गांधी को पत्रकारिता के कार्यों में बाधा डालने के लिए जिलाधिकारी ने नौ अप्रैल 2013 को गुंडा ऐक्ट लगाते हुए जिला बदर कर दिया था। हाईकोर्ट ने गुंडा ऐक्ट के आदेश को 20 मई 2013 को ही स्थगित कर दिया था, इससे क्षुब्ध होकर पुलिस के इशारे पर दो मुकदमें दर्ज करा दिए गए थे। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हुई इस कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट में पत्रकार ने अपील दायर की है। ह्यूमन राइर्ट्स लॉ नेटवर्क की ओर से अधिवक्ता केके राय ने इस मामले की पैरवी की।
 

मरजलिस-ए-आमला की बैठक में पत्रकारों से अभद्रता

देवबंद (सहारनपुर) : दारुल उलूम के अतिथि गृह में आयोजित एक दिवसीय मजलिस- ए- आमला (वर्किंग कमेटी) की बैठक में पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया। सोमवार को मेहमानखाने में आयोजित बैठक में संस्था की शैक्षिक रिपोर्ट पेश करने के साथ ही तीन नए शिक्षकों की नियुक्ति पर फैसला लिया जाना था। दोपहर तक चली बैठक के बाद पत्रकार कवरेज करने जब मेहमानखाने में पहुंचे तो वहां के इंचार्ज ने मीडिया पर पाबंदी लगाए जाने की बात कहते हुए पत्रकारों से अभद्रता करते हुए बाहर निकाल दिया। इससे पत्रकारों में रोष है।

उधर, मजलिस-ए-शूरा व मजलिस- ए- आमला के सदस्य तथा पूर्व मोहतमिम मौलाना गुलाम मोहम्मद वस्तानवी ने पत्रकारों से अभद्रता पर अफसोस का इजहार किया है। वस्तानवी ने कहा कि दारुल उलूम प्रबंध तंत्र द्वारा मीडिया पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई गई है। इस संबंध में संस्था के मोहतमिम से वार्ता का प्रयास किया गया लेकिन संपर्क नहीं हो सका। प्रेस एसोसिएशन देवबंद की बैठक में संरक्षक अथर उस्मानी ने अभद्रता करने वाले कर्मचारी को बर्खास्त करने की मांग की है।
 

और जब पत्रकारों पर तमतमा उठे बाराबंकी के सपा जिलाध्यक्ष मौलाना मेराज

: कार्यक्रम में मिला मनी, माफिया, मीडिया से दूर रहने का ज्ञान : बाराबंकी। जिले में लैपटॉप वितरण का अभियान जोरों पर है। लेकिन सपा के कुछ नेताओं के दिलों में पत्रकारों के बारे में भी वैचारिक अभियान उससे जोरों पर है। ऐसे में जब सपा जिलाध्यक्ष तमतमाकर सच्चाई जानो व सच्चाई लिखो का उपदेश दे और सदर विधायक मनी, माफिया, मीडिया से दूर रहने का ज्ञान दे तो यह स्थिति चौकाती तो जरूर है। लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ आज पटेल महाविद्यालय के लैपटॉप वितरण कार्यक्रम में।

मौका था लैपटॉप वितरण का और जब बोलने खड़े हुए सपा जिलाध्यक्ष मौलाना मेराज तो एकाएक मौके पर उपस्थित चौकन्ने हो गये। मौलाना ने कहा पत्रकारों को सच्चाई जाननी चाहिए फिर सच्चाई लिखनी चाहिए। आज सरकार मुसीबत में है तो हमें सबकी मदद चाहिए। इसके बाद विधायक सुरेश यादव ने अपने सम्बोधन में मौलाना मेराज का समर्थन करते हुए कहा कि मनी, माफिया और मीडिया से दूर रहना चाहिए। बाद में पत्रकारों से मौलाना मेराज ने खेद जरूर व्यक्त किया। खैर अध्यक्षता कर रहे कोआपरेटिव बैंक के अध्यक्ष धीरेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा हमारे जिले की मीडिया हमारे साथी थी और है। इस पर मंत्री अरविन्द सिंह गोप ने कहा यहां के पत्रकारों से नहीं बल्कि मुख्यालय के पत्रकारों से नाराज हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि जिसके अंदर संस्कार होते हैं जनता उनका सम्मान करती है और जो तुर्रम खां होता है जनता उसे नकार देती है। उधर पूर्व विधायक सरवर अली खां ने आज लैपटॉप वितरण समारोह में उस वक्त सन्नाटा पैदा कर दिया जब उन्होंने ग्राम्य विकास मंत्री अरविन्द सिंह गोप और उनके बगल में बैठे विधायक सुरेश यादव को देखकर कहा कि मैं मंत्री अरविन्द सिंह गोप के धैर्य का सम्मान करता हूं। समुद्र की गहराई का पैमाना है लेकिन भाई गोप के धैर्य का कोई पैमाना नहीं है। जड़ में मट्ठा डालने वालों को भी गोप देते है सम्मान है। यह जानते है कौन उनकी बुराई करता है, कौन उनके लिए चाले चलता है लेकिन उसके बाद भी इनके सम्मान में कोई कमी नहीं रहती। सरवर अली खां की तकरीर पर सन्नाटा छा गया लोग एक दूसरे का मुंह देख खूसुर-फूसुर करने लगे।

बाराबंकी से पत्रकार रिजवान मुस्तफा की रिपोर्ट.

उस दिन पुण्य प्रसून और आजतक को भला-बुरा कहते हुए लालू बाहर निकल गए

Vineet Kumar : रेल बजट का दिन था और रेल म्यूजियम में सभी चैनलों के सेट लगे थे. तब आजतक पर पुण्य प्रसून वाजपेयी की सांसें अटक गयी थी. लालू हेडलाइंस टुडे पर जुझार सिंह को बुरी तरह लताड़कर, ''लंदन से पढ़के आए हो, अंगरेजी से पुटपुटियाने से काबिल हो जाओगे'' जैसी बातें करने और लगभग एक मिनट में ही सेट से उठकर चले जाने के बाद आजतक पहुंचे थे. आते ही उन्होंने जोर से झल्लाते हुए कहा था- आपलोग हम पर चुटकुला चला रहे हो.. प्रसूनजी लगातार कह रहे थे- ''नहीं लालूजी, ऐसा नहीं है''.

लालू बोले- ''भक्क, हमको बुडबक समझते हैं, हम देख नहीं रहे थे कि क्या कर रहा था आपका चैनल घंटों से.'' खैर.. पुण्य प्रसून वाजपेयी ने सवाल-जवाब का दौर शुरू ही किया कि अभी ढाई मिनट भी नहीं हुए होंगे कि लालू प्रसाद कान से इपी आदि निकालकर उठ खड़े हुए और शाल को झाड़ते हुए कहा- ''चलो रे, यहां से..इ लोग नाकाबिल समझता है हमलोगों को'' और आजतक को भला-बुरा कहते हुए निकल लिए. हम इन्टर्न दोपहर से ही रेलभवन में मौजूद थे. भारी थकान के बीच थोड़ा उत्साहित भी कि तीन फीट दूरी से एक ही साथ लालू प्रसाद और सबसे पसंदीदा प्यारे एंकर पुण्य प्रसून को बातचीत करते देख सकेंगे..

लेकिन इस घटना के बाद हम सबके चेहरे मुरझा गए. मेरे साथ गेस्ट कार्डिनेशन में इन्टर्नशिप कर रहे आशीष ( Ashish Singh ) पूछने लगे- अब क्या होगा मैम? इन्चार्ज ने कहा- कुछ नहीं और तुम लोग इस तरह उदास क्यों हो, तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम जिस चैनल में काम कर रहे हो वहां ऐसे धारदार लोग हैं जिनके सवाल से रेलमंत्री इस तरह तिलमिला जाते हैं. बाकी देखा ऐसा किसी चैनल पर.. हमारे भीतर थोड़े देर के लिए सच में सबसे तेज चैनल से जुड़ने का गर्व हुआ और हम अकेले दिन के जनपथ कार्यक्रम के लिए वापस लौट आए.. लालू प्रसाद का वो तेवर मेरी आंखों के सामने अब भी नाच रहा है.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण, मेरठ फिर दंगाछाप पत्रकारिता पर उतर आया है

Wasim Akram Tyagi : दैनिक जागरण, मेरठ फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आया है… लगभग आधे सप्ताह तक इसकी दंगाछाप पत्रकारिता पर विराम लग गया था। लेकिन पिछले दो तीन दिन से फिर उसी तर्ज पर पत्रकारिता हो रही है जैसी पत्रकारिता मुजफ्फरनगर दंगे से पहले करके वहां के लोगों के दिलों में नफरत भरी थी। धीरे धीरे अप्रत्यक्ष रूप से बहुसंख्यक समुदाय को एक विशेष समुदाय के खिलाफ भड़काया था। वही काम जागरण ने फिर से शुरू कर दिया है। जिन पर दंगों के आरोप हैं, और जिन को गिरफ्तारी के लिये पुलिस दबिश देना चाहती है, मगर उनका विरोध महिलाएं कर रही हैं जिनका आरोप है कि पुलिस फर्जी गिरफ्तारी करना चाहती है। उनका कहना है कि जिन लोगों पर आरोप हैं, वे निर्दोष हैं।

ये वैसी ही दलील है जैसी गुजरात के मुखिया देते हैं कि अगर वे दोषी हैं तो उन्हें फांसी पर चढ़ा देना। उनके इस कहने से उन पर मुकदमा तक भी दर्ज नही हो पाया। कुछ ऐसा ही उन महिलाओं के द्वारा किया जा रहा है जिनकी तस्वीरें जागरण जैसा सांप्रदायिकता की स्याही से लिखा जाने वाला और संघ छाप प्रेस में छपने वाला अखबार प्रकाशित कर रहा है। जिस गांव कुटबा की विरोध करती हो मुख्यमंत्री और आम खां का पुतला फूंकती महिलाओं की तस्वीर इसने आज प्रकाशित की हैं, उस गांव कत्ल नहीं बल्कि कत्ल ए आम हुआ था। अगर उस गांव के लोग सभी निर्दोष हैं तो फिर कत्ल ऐ आम करने वाले कौन लोग कहां के थे ? वहां से एक विशेष समुदाय का नामो निशां मिटा देने वाले लोग कहां के थे? अगर वे इस गांव के नहीं थे तो फिर किस गांव के थे? और अगर वे बाहर से आये थे तो उन्हें गांव में आने किसने दिया? ये जरूरी नहीं है कि सभी लोग दोषी हों मगर ये भी जरूरी नही है कि सबके सब निर्दोष ही हों।

जागरण जिस तरीके से खबरों को तोड़ मरोड़कर बड़ी बड़ी तस्वीरों के साथ प्रकाशित कर रहा है उसे देख कर लोगों के जहन में सिर्फ यही छवी उभरती है कि प्रशासन बहुसंख्यक समुदाय को प्रताड़ित कर रहा है। जबकि सच्चाई इसके बरअक्स है, ऐसे सैकड़ों लोग हैं जिनकी प्राथमिकी तक भी दर्ज नहीं की गई है, ऐसे लोगों में बीएसएफ के जवान साजिद भी शामिल हैं जिनका कहना है कि "न हमारी एफआईआर दर्ज हो रही है और न ही प्रशासन कोई मदद कर रहा है. मैंने एफआईआर दर्ज करवाने के लिए शिकायत दी है लेकिन अभी तक मुझे रिसीविंग नहीं दी गई है. जिन लड़कों ने मेरा घर जलाया है वे गाँव में फुटबाल खेल रहे हैं." लेकिन जागरण को ये लोग नजर नहीं आये उसकी नजर में कातिल तो निर्दोष हैं, जागरण फिर से वही जमीन तैयार कर रहा है जिस जमीन पर मुजफ्फरनगर, शामली, मेरठ के गांवों में खून की होली खेली गई थी।

विरोध करने वाली महिलाओं को वीरांगना जैसे शब्दों से संबोधित किया जा रहा है। अगर यही महिलाएं आदिवासी होती तो इन्हें सबसे पहले नक्सली यही अखबार बताता। अगर ये कश्मीरी होती तो इनके साथ बलात्कार किया जाता, तब इनके साथ इसे कोई हमदर्दी नहीं होती। जिन मासूमों का इस दंगे मे बलात्कार हुआ है उनकी खबर जागरण आज मिली है जबकि यह खबर विभिन्न वेबपोर्टल पर सप्ताह भर से चल रही है उर्दू अखबार अजीजुलहिंद इस खबर को चार दिन पहले प्रकाशित कर चुका है, लेकिन उनके साथ जागरण ग्रुप को कोई हमदर्दी नहीं है, इसे तो सिर्फ उन महिलाओं के साथ हमदर्दी है जो हाथों में तबल, लाठी, डंडे, बर्छी, भाले लेकर खुले आम कह रही हैं कि अगर पुलिस गांव में घुसी तो वे उसका बुरा हस्त्र कर देंगी। शायद दुष्यंत ने ये शेर इस संघछाप अखबार के लिये ही लिखा था।

अब तो दरवाजे से अपने नाम की तख्ती उतार,
शब्द नंगे हो गये शोहरत भी गाली हो गई।

लेखक वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार हैं.

लालू यादव की गिरफ्तारी व उनका राजनीतिक अवसान लोकतंत्र के लिए कोई सुखद खबर नहीं है

Ambarish Rai : लालू यादव का भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना… लालू प्रसाद जेल गए. जेपी आन्दोलन से उभरे तथा सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाने वाले नेता का इस तरह भ्रष्टाचार के आरोप के साथ पटाक्षेप होना, कल्पना से परे और दुखद है. सत्तर व अस्सी के दशक में देश ने प्रभावशाली आन्दोलनों व कद्दावर नेतृत्व को उभरते हुए देखा है. ऐसे नेता पिछड़ों और दलित समुदाय से उभरे और उन्होंने सदियों से विषमता झेल रहे करोड़ों लोगों को न केवल जगाया, बल्कि उन्हें आंदोलित किया और अधिकारों को हासिल करने के लिए संगठित किया.

मंडल कमीशन ने भी इन आंदोलनों को उचाईयों पर पंहुचा दिया. सामाजिक न्याय के लिए उठे इन आन्दोलनों ने लोकतंत्र को न केवल मजबूत किया बल्कि उसका विस्तार भी किया. सत्ता और लोकतंत्र में पिछड़ों और दलितों की बराबर से भागीदारी सुनिश्चित की. जनता की इस ऐतिहासिक गोलबंदी ने साम्प्रदायिकता के रथ पर लगाम लगाने का काम भी किया. लालू यादव इन्ही आन्दोलनों से उपजे एक प्रमुख स्तम्भ रहे हैं. दशकों से गरीब जनता इन्हें अपने सर आँखों पर बिठा कर रखे हुए है. मगर वे भूल गए कि गरीबों ने उन्हें एक वैकल्पिक राजनीति एवं वैकल्पिक संस्कृति की जरूरत को पूरा करने के लिए समर्थन दिया था.

जनादेश बदलाव के लिए मिला था मगर लालू प्रसाद जी शासक वर्गों की परंपरागत राजनीति की न केवल नक़ल में उतर आये बल्कि उनके ही पिछलग्गू बन गए. सामाजिक न्याय इनके एजेंडे से गायब हो गया. हालाँकि तमाम कमजोरियों के बावजूद भी पिछड़ों और दलितों से आये यह सभी नेता अब भी पिछड़ों की ताकत बने हुए है. लालू यादव की गिरफ्तारी व उनका राजनीतिक अवसान लोकतंत्र के लिए कोई सुखद खबर नहीं है. अभी भ्रष्टाचार के दलदल में और भी बड़े मगरमच्छ है. जो कानून की मदद लेकर ही फल फूल रहे हैं. और उनका अंजाम अभी देखना बाकि है. यह एक जमीन से उभरे नेता के गलत कामों का दुखद परिणाम है.

जनांदोलनों से जुड़े रहे और सोशल एक्टिविस्ट अंबरीश राय के फेसबुक वॉल से.

इंडिया टुडे ने कांग्रेस रैली की फोटो को मोदी रैली का बता दिया, बाद में माफीनामा छापा

Abhishek Srivastava : नीचे दी गई तस्‍वीर ''इंडिया टुडे'' की नरेंद्र मोदी की दिल्‍ली रैली की है (लिंक: http://indiatoday.intoday.in/story/narendra-modi-delhi-rally-bjp-pm-candidate-gujarat-cm-japanese-park/1/312260.html) जिसका कैप्‍शन हिंदी में है: ''जापानी पार्क, रोहिणी का विहंगम दृश्‍य, जहां नरेंद्र मोदी की विकास रैली का स्‍थल था''।

रैली स्‍थल जापानी पार्क के सिर पर सफेद रंग का पंडाल था। आखिर यह तस्‍वीर पंडाल को चीर कर कैसे निकल आई? मैं सवा ग्‍यारह बजे तक वहां था, तो क्‍या उसके बाद पंडाल को फाड़ दिया गया यह तस्‍वीर उतारने के लिए? क्‍या कोई मुझे बताएगा कि सिर पर तने तम्‍बू के बावजूद विहंगम तस्‍वीर कैसे उतारी जाती है? या फिर कोई यही दावा कर सके कि वहां पंडाल नहीं था। मीडिया ऐसे झूठ रोज़ छापता-दिखाता है। यह तस्‍वीर पुरानी है रामलीला मैदान की। यह इंडिया टुडे का अपने पाठकों से सरासर धोखा है। हमें इस पत्रिका नाम बदल कर ''इंडिया येस्‍टरडे'' कर देना चाहिए।

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Abhishek Srivastava : ''इंडिया टुडे'' ने मोदी की रैली वाली खबर में 4 नवंबर 2012 की कांग्रेस रैली की फोटो लगाने पर अपनी वेबसाइट पर माफी मांग ली है।

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Avinash Das : ''इंडिया टुडे ने अच्‍छा काम किया। वरना पत्रिकाएं चुप्‍पी साधे रह जाती हैं। इस माफीनामे का तहेदिल से स्‍वागत किया जाना चाहिए और इसको अपनी हार-जीत से परे होकर देखना चाहिए''

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Abhishek Srivastava : मैं भी इंडिया टुडे के इस माफीनामे का स्‍वागत करता हूं। पाठकों के फीडबैक पर खुद को दुरुस्‍त करने की परंपरा जो लगभग खत्‍म हो चली थी, उसे इंडिया टुडे ने बहाल किया है।

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इंडिया टुडे का माफीनामा…

Crowdsourcing has pitfalls and we fell for a wrong one.

An earlier version of the report carried photos from the rally posted by Twitter users. One of the photos turned out to be not that of Narendra Modi's rally in Japanese Park, Rohini, but that of a Congress-supported rally in Ramlila Maidan. This and other crowdsourced photos have since been removed. We have also built better filters to ensure authenticity of crowdsourced information/visuals on our site and to avoid repeating such mistakes. And if we make new ones, we would own up, always. Thank you.

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव और अविनाश दास के फेसबुक वॉल से.

होटल पर बवाल करने वाला एक पत्रकार अरेस्‍ट, दो फरार

अमृतसर : जंडियाला बाईपास स्थित होटल में तीन पत्रकारों ने शुक्रवार की रात मैनेजर को धमकाया. खाने में छूट देने को लेकर तीनों जमकर हुड़दंग मचाया. मैनेजर ने पुलिस को सूचना देकर मौके पर बुलाया. पुलिस ने लोकल केबल में काम करने वाले एक पत्रकार को अरेस्‍ट कर लिया है, जबकि दो अन्‍य निजी चैनल के पत्रकार भागने में सफल रहे. पुलिस दोनों की तलाश कर रही है.

जंडियाला के निवासी तथा तेज फूड प्वाइंट के मैनेजर रविंदर पाल सिंह ने पुलिस बताया कि वह शुक्रवार शाम अपनी ड्यूटी पर थे. इसी दौरान तीन लोग खाना खाने के लिए आए. खाना खाने के बाद उनसे डिस्काउंट की मांग की. उन्‍होंने अपना परिचय पत्रकार के रूप में दी. जिस पर उन्होंने दस प्रतिशत डिस्काउंट किया, मगर तीनों पत्रकार उन्‍हें धमकाना शुरू कर दिया. वे तीस प्रतिशत डिस्काउंट की मांग करने लगे. रविंदन ने कहा कि मैनेजर होने के नाते उनके पास केवल इतनी ही पावर है.

इस बात से नाराज तीनों पत्रकार होटल के कमरे चेक करने लगे. साथ ही फोटो खींचने लगे. रोकने पर उनके साथ हाथापाई की और उनकी पगड़ी उतार दी और गाली गलौज किया. स्थिति को बिगड़ते देख मैनेजर ने होटल के मालिक व पुलिस को सूचना दी. थाना जंडियाला के एसएचओ पुलिस पार्टी के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस ने मौके पर एक पत्रकार सुखविंदर सिंह कोहली निवासी न्यू राजेश नगर तुंग बाला मजीठा रोड को गिरफ्तार कर लिया. मौके से कथित पत्रकार हरपाल सिंह व उसका एक अन्य व्यक्ति फरार हो गए. फरार हुए दोनों व्यक्ति निजी टीवी चैनल के पत्रकार बताए ला रहे हैं. पुलिस ने हुड़दंग मचाने व धमकाने के आरोप में तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.

भारतीय पत्रकार रविशंकर चीन में सम्‍मानित

बीजिंग : एक प्रमुख सरकारी अंग्रेजी दैनिक के साथ काम करने वाले एक भारतीय पत्रकार रवि शंकर को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान के लिए विदेशी विशेषज्ञ के नाते चीन के सर्वोच्च सम्मान ‘फ्रैंडशिप अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। चाइना डेली के अंतरराष्ट्रीय संस्करण के कार्यकारी संपादक शंकर 20 देशों के उन 50 विदेशी मामलों के विशेषज्ञ पत्रकारों में शामिल हैं जिन्हें कल यह सम्मान प्रदान किया गया।

पुरस्कार प्रदान करते हुए चीन के उप प्रधानमंत्री मा काई ने कहा, विदेशी विशेषज्ञ चीनी जनता के घनिष्ठ मित्र हैं , ये चीनी अंतरराष्ट्रीय संवाद के दूत हैं और चीन के विकास की महत्वपूर्ण ताकत हैं। चीनी जनता चीन के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखेगी। आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले शंकर पिछले 11 साल से अधिक समय से चाइना डेली के साथ जुड़े हुए हैं। (एजेंसी)

नलिन मेहता बने हेडलाइंस टुडे के मैनेजिंग एडिटर, राहुल कंवल एडिटर एट लार्ज बनाए गए

टीवी टुडे समूह ने नलिन मेहता को अपने अंग्रेजी चैनल हेडलाइंस टुडे का मैनेजिंग एडिटर नियुक्‍त किया है. उन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारी संभाल ली है. वे दिल्‍ली में बैठेंगे. उन्‍हें राहुल कंवल की जगह लाया गया है. राहुल को प्रमोट करके एडिटर एट लार्ज बना दिया गया है. वे हेडलाइंस टुडे के साथ हिंदी चैनल आजतक की जिम्‍मेदारी भी एडिटर एट लार्ज के रूप में देखेंगे.

नलिन मेहता ने अपने करियर की शुरुआत जी न्‍यूज से की थी. इसके बाद ये एनडीटीवी में पॉलिटिकल करेस्‍पांडेंट और एंकर बन गए. पढ़ाई के लिए बीच में इन्‍होंने पत्रकारिता छोड़ दी थी. अपनी पीएचडी करने के बाद वे पत्रकारिता में दुबारा लौटे और टाइम्‍स नाऊ के साथ एंकर कम डिप्‍टी न्‍यूज एडिटर के रूप में अपनी दूसरी पारी शुरू की.

2008 में टाइम्‍स नाऊ से इस्‍तीफा देने के बाद वे हेडलाइंस टुडे के कंसलटेंट बन गए. इसके अलावा वे इंडियन एक्‍सप्रेस, टाइम्‍स ऑफ इंडिया समेत कई अखबारों में कॉलम भी लिखा करते थे. 2008-12 के बीच वे युनाइटेड नेशन के साथ जुड़े रहे. इस दौरान इन्‍होंने कई फेलोशिप प्रोग्राम भी पूरे किए. उन्‍होंने टेलीविजन पर एक किताब भी लिखी, जिसे एशियन पब्लिशिंग अवार्ड से सम्‍मानित किया गया. इसके अलावा भी उन्‍होंने कई किताबों की एडिटिंग की है.

हमारी कोआर्डिनेटर महोदया मुझसे अंग्रेजी में सवाल पूछकर मेरी योग्यता पर सवालिया निशान लगाती रहती हैं

: नस्लभेद जैसा भाषायी भेदभाव : पराई भाषा की कठिनाई को समझिए। अभी हाल में ही मैंने एनसीआर की टॉप वन यूनिवर्सिटी होने का दावा करने वाले एक विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी हेतु एडमिशन लिया है, हमने सोचा था कि अच्छे विश्वविद्यालय में उच्च स्तरीय ज्ञान मिलेगा, कुछ नया शोध करेंगे। ज्ञान का तो अभी पता नहीं क्योंकि अभी तक केवल एक-दो कक्षा ही अटैंड की है। लेकिन, अंग्रेजी भाषा ने सिर में दर्द कर रखा है। मेरी कोर्स वर्क की क्लास में करीब दर्जन भर से अधिक छात्र हैं। अधिकांश नौकरी पेशा वाले है। कुछेक भारत सरकार के महकमों में उच्च पदस्थ अधिकारी हैं। मुझे छोड़कर सभी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते है।

बात यहीं तक सीमित होती तो कोई बात नहीं थी। असलियत में मामला इससे बडा है। महिला-पुरूष छात्रों के अलावा हमारी कोआर्डिनेटर महोदया बीच-बीच मुझसे अंग्रेजी में सवाल पूछकर मेरी योग्यता पर सवालिया निशान लगाती रहती हैं। यह अलग बात है कि अंग्रेजी में पूछे गए उऩ प्रश्नों के जवाब में जानता हूं। जब मैं सही जवाब हिंदी में देता हूं तो  जवाब सही होने के बावजूद अंग्रेजी में न होने के कारण उसका वजन कम हो जाता है, ऐसा उनके चेहरों के बदलते भावों को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है। साथ ही सहपाठियों की नजरों में भी प्रश्नवाचक चिह्न दिखाई देता है। उनके चेहरे के भाव ऐसे लगते है जैसे नस्लीय पूर्वाग्रहों से ग्रसित किसी गोरे के बीच में कोई काला बैठा गया हो।

भाषायी भेदभाव को जीवन में पहली बार महसूस किया है। शायद देश में योग्यता और व्यक्तित्व ही काफी नहीं है, अंग्रेजीदां होना भी जरूरी है। क्या किया जाए जब देश ही पराई भाषा में चल रहा है। लुटियन जोन पूरी तरह अंग्रेजी से ग्रसित है। यदि मंत्रालयों के गलियारों में पहुंच बनाना चाहते हैं तो इसके लिए कुछ जरूरी हथकंडे आपके पास होने चाहिए जैसे जुबां पर अंग्रेजी, गले में टाई, बदन पर कोट और भारतीय परंपराओं ओर संस्कृति को तिरस्कारित करने का अनुभव साथ ही विनम्र जुगाड़ु।

दोस्तों, यह अलग बात है कि हिंदी के एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के प्रकाशन ने पत्रकारिता एवं जनसंचार  विषय पर लिखी गई मेरी एक पुस्तक को प्रकाशित करने व करीब साढे तीन लाख रूपये पारिश्रमिक देने का आश्वासन दिया है। पुस्तक जल्दी ही बाजार में उपलब्ध होगी। मैने अपने कैरियर की शुरुआत सन 2010 पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में मास्टर डिग्री करने के बाद हिंदी के एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में बतौर क्राइम रिपोर्टर की थी। स्वास्थ्य बेहद खराब होने के कारण पत्रकारिता छोडकर उत्तराखंड के एक विश्वविद्यालय में  करीब छह महीने अध्यापन किया। अभी सितंबर 2013 में उपरोक्त अंग्रेजीदां विश्वविद्यालय में बतौर पीएचडी छात्र प्रवेश लिया है।

आशीष कुमार

शोध छात्र
पत्रकारिता एवं जनसंचार
09411400108

जदयू, मधुबनी के जिलाध्यक्ष का अहंकार बिलकुल नितीश कुमार जैसा

बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की तरह ही अब उनके सहयोगियों, पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को भी अहंकार हो गया है। आज मधुबनी में जदयू का कार्यकर्ता सम्मलेन था। पर पार्टी के द्वारा इसकी जानकारी किसी भी इलेक्ट्रोनिक मीडिया को नहीं दिया गया।

आज सुबह जब एक इलेक्ट्रोनिक मीडिया के पत्रकार ने जदयू के जिलाध्यक्ष उदयकांत चौधरी को कॉल किया तो उन्होंने अहंकार भरे लब्जों में कहा कि "हम किसी को बुलाते नही हैं, लोग खुद ही आ जाते हैं, आप भी आ जाइये"। मैं नितीश कुमार और उनके पार्टी के लोगों को आगाह करता हूं कि हम पत्रकार कोई नरेन्द्र मोदी या लालू प्रसाद यादव नहीं हैं जो आप हमें कुछ भी बोल दें। आप मर्यादा में रहेंगे तो हम सम्मान करेंगे वरना हमें भी शौक नहीं है ऐसे लोगों के मुँह लगने की।

अभिजीत कुमार
मधुबनी
बिहार
 

हेमलता अग्रवाल ला रही हैं ‘भास्कर न्यूज’ नाम से चैनल और समाचार एजेंसी!

चर्चा है कि भास्कर समाचार समूह के संस्थापक स्वर्गीय श्री डी.पी. अग्रवाल की पुत्री श्रीमती हेमलता अग्रवाल अब 'भास्कर न्यूज़' के नाम से समाचार एजेन्सी की शुरुआत करने जा रही हैं। ये एजेन्सी प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया क्षेत्र में काम शुरू कर रही है। कहा जा रहा है कि एजेन्सी शुरू होने के कुछ माह बाद 'भास्कर न्यूज़ चैनल' भी लांच किए जाने की तैयारी है।

चैनल का निदेशक और सीईओ राहुल मित्तल को बनाया गया है। ये राहुल मित्तल पहले मेरठ में पत्रकार हुआ करते थे। अब दिल्ली आ गए हैं। इस समाचार एजेंसी और चैनल का आफिस ए-147, सेक्टर-63, नोएडा में बनाया गया है। यह आफिस 7 अक्टूबर से काम शुरू कर देगा। उधर, कुछ लोगों का कहना है कि यह सारा उपक्रम लोकसभा चुनाव को ध्यान में रख कर किया जा रहा है।

यह भी कहा जा रहा है कि 'भास्कर' नाम से समाचार एजेंसी और चैनल शुरू करने पर कानूनी विवाद भी होने की आशंका है क्योंकि भास्कर को लेकर इसके मालिकों के बीच लंबे समय से अदालती लड़ाई चल रही है।  फिलहाल लगातार छंटनी, बंदी के दौर में एक और समाचार एजेंसी व चैनल खुलने से आम मीडियाकर्मियों को लाभ मिल सकता है, यह उम्मीद की जा सकती है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पत्रकार रवि शंकर को चीन ने ‘भारतीय फ्रेंडशिप अवार्ड’ से सम्मानित किया

बीजिंग : एक प्रमुख सरकारी अंग्रेजी दैनिक के साथ काम करने वाले एक भारतीय पत्रकार रवि शंकर को देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में योगदान के लिए विदेशी विशेषज्ञ के नाते चीन के सर्वोच्च सम्मान ‘फ्रैंडशिप अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। चाइना डेली के अंतरराष्ट्रीय संस्करण के कार्यकारी संपादक शंकर 20 देशों के उन 50 विदेशी मामलों के विशेषज्ञ पत्रकारों में शामिल हैं जिन्हें कल यह सम्मान प्रदान किया गया।

पुरस्कार प्रदान करते हुए चीन के उप प्रधानमंत्री मा काई ने कहा, विदेशी विशेषज्ञ चीनी जनता के घनिष्ठ मित्र हैं , ये चीनी अंतरराष्ट्रीय संवाद के दूत हैं और चीन के विकास की महत्वपूर्ण ताकत हैं। चीनी जनता चीन के विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखेगी। आंध्र प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले शंकर पिछले 11 साल से अधिक समय से चाइना डेली के साथ जुड़े हुए हैं। (एजेंसी)

मैंने मनमोहन सिंह के बारे में कुछ ‘अपमानजनक’ नहीं सुना : बरखा दत्त

नई दिल्ली: एनडीटीवी की पत्रकार बरखा दत्त ने साफ कहा है कि जिस बात का जिक्र यहां (नरेंद्र मोदी के भाषण में) हुआ, मैं इसके बारे में नहीं जानती। दत्त ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से इंटरव्यू के सिलसिले में मिलने गई थी, वह इंटरव्यू जो उन्होंने एनडीटीवी को दिया। इस इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शरीफ ने 'एक अच्छा आदमी' करार दिया और कहा कि वह मनमोहन सिंह का पाकिस्तान में स्वागत करना चाहते हैं। बरखा ने बताया कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने इंटरव्यू से पहले चाय नाश्ते पर कुछ लोगों से मुलाकात की जिनमें, कुछ अधिकारी और पाकिस्तानी पत्रकार शामिल थे। शरीफ ने मुझे भी चाय के लिए बुलाया, क्योंकि मैं वहां पर इंटरव्यू के लिए इंतजार कर रही थी।

अनौपचारिक बातचीत में पीएम नवाज शरीफ ने नाराजगी जाहिर कर कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच मुलाकात में पाकिस्तान ही केंद्र में रहा। शरीफ ने कहा कि भारत को इस मुद्दे पर सीधे पाकिस्तान से बात करनी चाहिए। इसके आगे शरीफ ने गांव के दो लोगों के बीच की कहानी का जिक्र किया, जिसमें एक महिला होती है। उस कहानी का सार यह था कि दो लोगों के बीच का विवाद उन्हीं में सुलझाया जाना चाहिए और इसमें तीसरे को नहीं लाया जाना चाहिए।

बरखा ने कहा कि मेरी मौजूदगी में पीएम मनमोहन सिंह के खिलाफ एक भी अपमानजनक शब्द का प्रयोग नहीं हुआ। उनकी कहानी में विवाद को सुलझाने के लिए भारत, पाकिस्तान और अमेरिका को संदर्भित किया गया। दत्त ने कहा कि मुझे काफी झटका लगा जब मुझे बताया गया कि हामिद मीर ने जियो टेलीविजन को दिए फोनो रिपोर्ट में कुछ और कहा। आमतौर पर, अनौपचारिक और ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत को रिपोर्ट में नहीं कहा जाता। बरखा का कहना है कि जब उन्हें पता चला कि ऐसी रिपोर्टिंग हुई है, जिसकी वह स्वयं गवाह रही हैं, तब उन्होंने फैसला किया कि वह सारी बातें साफ करेगी। हामिद मीर, जिन्होंने इस पूरी विवादास्पद खबर को दिया था, ने अब ट्वीट कर कहा है कि शरीफ ने मनमोहन सिंह के खिलाफ कुछ भी अपमानजनक नहीं कहा था। बरखा का मानना है कि इस पूरी घटना पर विवाद अब थम जाना चाहिए। (एनडीटीवी)

Naresh Mohan, Satish Mishra cease to be Jagran Prakashan directors

Jagran Prakashan said that Naresh Mohan, an independent director of the company since Nov. 18, 2005 has retired by rotation at the 37th annual general meeting of the company held on Sept. 25, 2013 and hence, he cease to be director.

Further the company said Satish Mishra, an additional director, ceased to be director of the company since, his tenure has expired in this annual general meeting. Shares of the company gained Rs 0.75, or 0.91%, to settle at Rs 83.30. The total volume of shares traded was 209 at the BSE (Wednesday).
 

सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ आईपीएस नजरुल पहुंचे कोर्ट, खुद करेंगे अपने मुकदमे की पैरवी

आईपीएस अधिकारी नजरुल इसलाम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य सरकार के सीनियर अफसरों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अपने मुकदमे की पैरवी भी वे खुद करेंगे। आईपीएस अधिकारी नजरुल इसलाम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य सरकार के सीनियर अफसरों के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। अपनी याचिका में उन्होंने दावा किया कि सरकार ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के इशारे पर उनकी वरिष्ठता के अनुरुप प्रमोशन देने से इनकार कर दिया। नजरुल इसलाम के वकील गुलाम मुस्तफा ने बताया कि इस सिलसिले में एक याचिका बंकशाल कोर्ट के मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर की गयी है।

अतिरिक्त महानिदेशक (एडीजी) पद पर कार्यरत अधिकारी नजरुल इसलाम ने 17 अगस्त को पुलिस से ममता बनर्जी, मुख्य सचिव संजय मित्रा, गृह सचिव वासुदेव बनर्जी और पुलिस महानिदेशक नपराजित मुखर्जी के खिलाफ धमकी देने, मानसिक परेशानी देने, प्रमोशन देने से इनकार करने, छुट्टी देने से मना करने, फोन लाइनों को टैप करने आदि की शिकायत की थी। इसलाम के वकील गुलाम मुस्तफा ने बताया कि हेयर स्ट्रीट पुलिस थाने ने, जहां इसलाम ने शिकायत दर्ज करायी थी, मामले की जांच से इनकार कर दिया। यहां तक कि कोलकाता पुलिस के आयुक्त ने भी, जिन्हें उन्होंने चिट्ठी लिखी थी, कोई कार्रवाई नहीं की। इसलिए इस याचिका को दायर किया गया है। अधिवक्ता मुस्तफा ने बताया कि अदालत ने उनकी याचिका को स्वीकार कर लिया है और मामले की सुनवाई शुरू हो गयी है।

आईपीएस नजरुल इसलाम विवादों में रहे हैं। कभी मुख्यमंत्री के अति घनिष्ठ अफसर नजरुल ने मुसलिमदेर कि करणीय नामक पुस्तक लिखकर राज्य के अल्पसंख्यकों के साथ धोखाधड़ी का खुलासा किया है। इसके बाद उन्होंने मूलनिवासीदेर की करणीय नामक पुस्तक भी लिख दी और बंगाल में दलितों, शूद्रों, पिछड़ों और अल्पसंकख्यकों को मूल निवासी बताते हुए उनके खिलाफ जारी एकाधिकारवादी जाति वर्चस्व के खिलाफ जिहाद भी छेड़ दिया है। वाम शासन के दौरान सरकार की आलोचना के लिए हाशिये पर थे साहित्यकार नजरुल इस्लाम और परिवर्तन जमाने में भी लंबे समय से पुलिस महकमे में उन्हें दरकिनार कर रखा गया है।

प्रतिष्ठित साहित्यकार आईपीएस नजरुल इसलाम  का कहना है कि उनकी वरिष्ठता के आधार पर उन्हें उचित पद नहीं दिया गया है। गौरतलब है कि वाम मोरचा के शासन में पुलिस उपायुक्त (खुफिया विभाग) रहते उन्होंने कई पेजीदे मामलों का खुलासा किया था। सट्टे के खिलाफ अभियान चलाया। यह अजीब संयोग है कि वाम मोरचा शासन के दौरान ही विवादास्पद पुस्तक को लेकर भी वह चरचा में रहे हैं। खास बात यह है कि दूसरे पढ़े लिखे लोगों की तरह अपनी खाल बचाने के लिए नजरुल कभी खामोश नहीं रहे। वे सामाजिक यथार्थ से समर्थ कथाकार है और जनसरोकार के मुद्दों को सीधे तौर पर संबोधित करके सत्ता से पंगा भी ले लेते हैं। किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ पद पर रहते हुए उन्होंने बाकायदा थाने में रपट दर्ज करायी। फिर भी कार्रवाई नहीं हुई तो सीधे अदालत पहुंच गये। यही नहीं वे अपने मुकदमे की पैरवी करेंगे। वे साहित्य के अलावा समाज सेवा से भी जुड़े रहे हैं। खास कर शिक्षा के क्षेत्र में काम किया है।

कोलकाता से एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​ की रिपोर्ट.

‘नेशनल दुनिया’ अखबार के कई लोग पहुंचे ‘लाइव इंडिया’ अखबार में

दिल्ली-एनसीआर में 'नेशनल दुनिया' अखबार का बाजा बज चुका है. अखबार का न सर्कुलेशन है और न ही कंटेंट लेवल पर कुछ खास कर पा रहा है. छंटनी और कटौती के कारण बची-खुची साख भी जा चुकी है. यहां कार्यरत लोग बहुत तेजी से नौकरियां खोज रहे हैं. सूचना है कि नेशनल दुनिया के दुष्यंत ने लाइव इंडिया न्यूजपेपर में बतौर डिप्टी फीचर एडिटर ज्वाइन किया है.

अनूप झा नेशनल दुनिया में डिप्टी न्यूज एडिटर हुआ करते थे. उन्होंने भी लाइव इंडिया अखबार में डीएनई के रूप में ज्वाइन किया है. विवेकानंद झा भी लाइव इंडिया अखबार से जुड़ गए हैं. विवेकानंद आलोक मेहता के समय में नेशनल दुनिया के संडे परिशिष्ट में कार्य करते थे. डिजायनर मनोज राजपूत ने भी नेशनल दुनिया से विदा लेकर लाइव इंडिया अखबार के साथ नई पारी की शुरुआत की है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.
 

राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है : काशीनाथ सिंह

: उदयपुर के साहित्यकार पल्लव को डॉ घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार, प्रयास संस्थान की ओर से सूचना केंद्र में हुआ समारोह, दिग्गज कथाकार काशीनाथ सिंह, डॉ आशुतोष मोहन, पुखराज जांगिड़, डॉ घासीराम वर्मा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार व साहित्यप्रेमी रहे मौजूद : चूरू : हिंदी के बहुचर्चित वरिष्ठ साहित्यकार काशीनाथ सिंह ने कहा है कि राजनीति में जो हो रहा है, दुर्भाग्य से वैसा ही कुछ साहित्य में भी हो रहा है और आज आलोचना में रचना की बजाय रचनाकार को ध्यान में रखा जाता है, पल्लव इस मायने में सबसे भिन्न हैं कि उनकी नजर हमेशा रचना पर ही रहती है।

काशीनाथ सिंह रविवार को प्रयास संस्थान की ओर से शहर के सूचना केंद्र में आयोजित डॉ घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार समारोह में पल्लव को सम्मानित करने के बाद बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पल्लव आलोचना के लिए अधिकांशतः अच्छी लेकिन उपेक्षित रचना को चुनते हैं और व्यक्तिगत संबंध के निर्वाह के नाम पर किसी को भी अनावश्यक रियायत नहीं देते हुए पक्षपातरहित दृष्टि से रचनाओं को देखते हैं, वास्तव में आलोचना यही है। उन्होंने कहा कि वह जमाना गया, जब किसी एक दिग्गज आलोचक के कहने मात्रा से साहित्य की प्रमाणिकता तय हो जाती थी, आज प्रत्येक व्यक्ति व आलोचक अपने नजरिए से सोचना है और चीजों का मूल्य तय करता है, पल्लव उसी लोकतांत्रिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रयास संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि इस पुरस्कार के कारण देशभर के लोग चूरू को जानने लगे हैं लेकिन पुरस्कार देते समय यह प्रयास रहना चाहिए कि इसमें युवाओं को तरजीह दी जाए क्योंकि साहित्य का भविष्य युवाओं के हाथ में है। उन्होंने डॉ घासीराम वर्मा की सराहना करते हुए कहा कि मूलतः गणित के व्यक्ति हैं लेकिन हर तरह के गणित से दूर रहकर अपने समाज और जनता को प्रेम करते हैं।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता नई दिल्ली के प्रख्यात साहित्यकार डॉ आशुतोष मोहन ने कहा कि साहित्य जगत् में आज आलोचना की त्रासदी यह है कि पाठक आलोचना से कृति की ओर से बढना चाहता है जबकि उसे कृति से आलोचना की ओर जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि आलोचना रचनाओं की कमी बताए तो लेखक को अखरता है और आलोचक के साथ बड़ी मुश्किलें पेश आती है। इसके बावजूद पल्लव ने अपनी आलोचना में सैद्धांतिक साहस को बनाए रखा है और इसी में उनकी आलोचना की प्रासंगिकता है। उन्होेंने पल्लव में निहित संभावनाओं को जाहिर करते हुए कहा कि वे सटीक आलोचना की कोशिश करते रहें और महान आलोचक बनने की बजाय अच्छा आलोचक बनने की दिशा में काम करें।

विशिष्ट अतिथि युवा साहित्यकार पुखराज जांगिड़ ने कहा कि साहित्य में आलोचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे रचनाओं को देखने की एक दृष्टि मिलती है। एक आलोचक के रूप में पल्लव हमें बताते हैं कि कहानी एक रचना के रूप में किस प्रकार चीजों को देख रही है और पहचान भी रही है। उन्होंने कहा कि आज चीजों को देखने का नजरिया बदल रहा है और पल्लव इस बदलाव की मुखर अभिव्यक्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि शरतचंद्र के देवदास में अब देवदास की बजाय पारो को कथा का नायक समझा जाने लगा है और स्त्राी को बर्बाद करके उससे प्रेम का दंभ भरने वाले पुरूष को चुनौती दी जाने लगी है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीकरण में गुम होते जीवन की कथाओं को पल्लव ने अपनी आलोचना का विषय बनाया है, यह उनकी आलोचना का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है।

सम्मानित साहित्यकार पल्लव ने विनम्रता से पुरस्कार को स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें सुखद आश्चर्य हो रहा है है कि रचनाकारों के इस संसार में आलोचना पुरस्कृत हो रही है। उन्होंने कहा कि देश में सहिष्णुता के लिए खतरा बनने वाले तत्वों के खिलाफ हमें एकजुट होकर लोकतंत्रा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का निर्वाह करना चाहिए। उन्होंने कहा कि युवा लेखन और आलोचना की परम्परा को अधिक सशक्त किए जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अपनी जड़ों के लिए चिंतित शिक्षक डॉ घासीराम वर्मा और अपने प्रिय साहित्यकार काशीनाथ सिंह के हाथों सम्मानित होकर उन्हें बेहद प्रसन्नता हो रही है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए ख्यातनाम गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा ने कहा कि समाज में सदियों से स्त्राी को उपेक्षित रखा गया है, अब वह आगे आ रही है तो पुरूष को यह बात अखर रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य में भी स्त्राी के बारे में गलत बातें लिखी गई हैं, जिससे समाज में गलत संदेश गया है लेकिन आज स्थितियों में बदलाव आने लगा है।

कार्यक्रम के आरंभ में चित्तौड़गढ के युवा आलोचक पल्लव को उनकी पुस्तक कहानी का लोकतंत्रा के लिए छठे डॉ घासीराम वर्मा पुरस्कार के रूप में पांच हजार रुपए, शॉल, श्रीफल व प्रशस्ति पत्रा देकर सम्मानित किया गया। प्रयास के संरक्षक भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। युवा साहित्यकार कुमार अजय ने सम्मानित साहित्यकार का परिचय प्रस्तुत किया। वयोवृद्ध साहित्यकार बैजनाथ पंवार ने आभार जताया। प्रयास के अध्यक्ष दुलाराम सहारण व  उम्मेद गोठवाल अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। संचालन कमल शर्मा ने किया।

पूर्व सभापति रामगोपाल बहड़, जयसिंह पूनिया, हनुमान कोठारी, रियाजत अली खान, माधव शर्मा, महावीर सिंह नेहरा, खेमाराम सुंडा, सोहन सिंह दुलार, वासुदेव महर्षि, शोभाराम बणीरोत, श्यामसुंदर शर्मा, शंकर झकनाड़िया, अर्चना शर्मा, नीति शर्मा, इंदिरा सिंह, मोहन सोनी चक्र, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर, कमल सिंह कोठारी, भवानी शंकर शर्मा, ओमप्रकाश तंवर, हरिसिंह सहारण, रामगोपाल ईसराण, सुधींद्र शर्मा सुधी, विकास मील, जमील चौहान, देवेंद्र जोशी, राधेश्याम कटारिया, राजेंद्र कसवा, राजीव स्वामी, जलालुद्दीन खुश्तर, मुंगल व्यास भारती, अरविंद चूरूवी, अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार देवेंद्र जोशी, संजय कुमार ने अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया। समारोह में बड़ी संख्या में अंचल के साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

कोलकाता में काशीनाथ सिंह ने अपने अप्रकाशित उपन्यास ‘उपसंहार’ के अंतिम अंश का पाठ किया

अपनी हर रचना में अपने ही रूप का खंडन करने के लिए मशहूर हिंदी के प्रसिद्ध कथाकार काशीनाथ सिंह ने महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्विद्यालय के कोलकाता केंद्र में 23 सितम्बर, 2013 को अपने अप्रकाशित उपन्यास 'उपसंहार' के अंतिम अंश का पाठ किया | इस उपन्यास में काशीनाथ जी ने अपने उस हर अंदाज और शिल्प को तोडा है, जिसके लिए उन्हें जाना जाता है | पहली बात तो यह कि यह पहला मौका था जब काशीनाथ जी ने प्रकाशन से पूर्व अपनी किसी रचना का सार्वजनिक रूप से पाठ किया |

दूसरी बात उपन्यास के विषय-वस्तु और कहन शैली में भी काशीनाथ जी ने इसमे आमूल-चुल परिवर्तन किया है | इस आधार पर यदि कहें तो कहा जा सकता है कि कृष्ण के पुनर्जन्म के साथ-साथ एक तरह से एक नए काशीनाथ का जन्म भी इस रचना के माध्यम से हुआ है | कृष्णचरित पर आधारित यह उपन्यास न केवल हिंदी साहित्य के लिए, अपितु संपूर्ण भारतीय साहित्य के लिए ‘मील का पत्थर’ साबित होगा, ऐसी कामना है | मैं जब ऐसा कह रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए कि संभवतः कृष्ण के वृद्धावस्था के जीवन पर, महाभारत के युद्ध के बाद द्वारिका लौट गए कृष्ण के जीवन पर आधारित यह संभवतः संपूर्ण भारतीय साहित्य का पहला उपन्यास है | कृष्ण के चरित पर अनेकों रचनाएँ साहित्य में मिलती हैं, किन्तु सभी रचनाओं में हमें लीलाधारी कृष्ण, नटखट कृष्ण, कंस के संहारक कृष्ण, महाभारत के कृष्ण आदि रूपों का वर्णन मिलता है | महाभारत के बाद द्वारिका लौट गए कृष्ण के जीवन को किसी रचनाकार ने अपनी रचना का आधार नहीं बनाया है |

यह महती कार्य काशीनाथ जी ने इस उपन्यास के माध्यम से किया है | स्वयं काशीनाथ जी कहते हैं “इसमें महाभारत के युद्ध के उपरांत द्वारिका लौटे उस कृष्ण के जीवन को मैंने आधार बनाया है, जो अब द्वारिकाधीश नहीं रह गए हैं | एक सामान्य मनुष्य का जीवन व्यतीत कर रहे हैं | और तो और स्वयं यदुवंश के कुल का अंत भी करते हैं |” जाहिर सी बात है कि कृष्ण का यह जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा होगा | सत्ता के आदी हो गए व्यक्ति से यदि सत्ता छीन ली जाती है या किसी कारणवश उसकी सत्ता और शक्ति नहीं रहती है तो उसका जीवन अत्यंत पीड़ादायी होता है | कुछ ऐसा ही कृष्ण के उत्तरकालीन जीवन में रहा है, जिसे अपनी रचना का आधार बनाया है काशीनाथ जी ने | काशीनाथ जी मानते हैं “कृष्ण संभवतः पहले राजा हैं जो उस युग में राजतंत्र के खिलाफ और जननायक थे |

वे एक कुशल रणनीतिज्ञ या रणनीतिकार थे | अपने उत्तरकालीन जीवन में उनके साथ सबसे बड़ा दुःख यह रहा है कि उन्हें स्वयं के खिलाफ अर्थात अपनी सेना के खिलाफ ही युद्ध लड़ना पड़ा है, जिसमे एक तरफ वे स्वयं हैं और एक तरफ उनकी सेना | संभवतः यह हमारे इतिहास की पहली घटना रही होगी जिसमे सेनापति एक तरफ हो और सेना दूसरी तरफ | सेनापति के विपक्ष में उसकी ही सेना खड़ी हो | कृष्ण के इसी ऐतिहासिक भूल के चलते कृष्ण द्वारा पालित और विकसित द्वारका का विनाश तो हुआ ही इसके साथ-साथ कृष्ण के हाथों ही यादव कुल का नाश हुआ | बालक कृष्ण से लेकर महाभारत के कृष्ण तक वे ईश्वर के रूप में रहे हैं | अपने उत्तरकालीन जीवन में वे ईश्वर नहीं रह जाते, एक सामान्य मनुष्य के रूप में अपना जीवन व्यतीत करते है, जिसके अपने दुःख हैं, अपनी खुशियाँ हैं, अपने लोगों से शिकायत है |” निश्चय ही यह उपन्यास पौराणिक होते हुए भी अपौराणिक है | कृष्ण पौराणिक नायक रहे हैं, किन्तु इस उपन्यास के कृष्ण पौराणिक होते हुए भी प्रतीक हैं एक समृद्धशाली राजा के, एक ऐसे राजा का जिसका साम्राज्य समाप्त हो गया है और वह एक सामान्य मनुष्य की तरह अपना गुजर-वसर कर रहा है | 

अस्तु, भारतीय कथा साहित्य में एक नयी शुरुआत करने के लिए आदरणीय गुरुवर और कथाकार काशीनाथ जी को हार्दिक बधाई और शुभ्मानाएं | रचना अभी प्रकाशित नहीं हुई है, शीघ्र ही प्रकाशित हो जाएगी ऐसी कामना है | मेरी यह धारणा सिर्फ काशीनाथ जी द्वारा पाठ किये गए उपन्यास के अंतिम अंश को सुनने के बाद बनी है | इसमें बात करने के लिए ढेरों मुद्दे होंगे, लेकिन इसके लिए हमें अभी उपन्यास के प्रकाशित होने का इंतज़ार करना होगा | तब तक के लिए काशीनाथ जी को हार्दिक बधाई !

डॉ. महेंद्र प्रसाद कुशवाहा की रिपोर्ट. संपर्क: 09333844917

हाई कोर्ट ने ‘राम लीला’ फिल्म के लिए वर्तमान में कोई निर्देश देने से मना किया

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर द्वारा 'राम लीला' फिल्म के विरुद्ध दायर पीआईएल में इलाहाबाद हार्इ कोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा कि वर्तमान में सेंसर बोर्ड को कोई निर्देश दिया जाना उचित नहीं है क्योंकि बोर्ड ने अभी इस मामले में कोई भी निर्णय नहीं लिया है. जस्टिस इम्तियाज़ मुर्तजा और जस्टिस देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की बेंच ने कहा कि इस फिल्म को अभी सिनेमेटोग्राफर एक्ट 1952 की धारा 4 के अधीन प्रदर्शित किये जाने हेतु अनुमति नहीं मिली है और सर्टिफिकेट जारी किये जाने की प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हुई है.

हाई कोर्ट ने कहा कि जब सेंसर बोर्ड इस फिल्म को प्रदर्शन हेतु सर्टिफिकेट देने के लिए देखेगा तो यह अपेक्षा की जाती है कि वह सिनेमेटोग्राफर एक्ट और अन्य कानूनों का पूर्ण अनुपालन करेगा. याचिका के अनुसार संजय लीला भंसाली की फिल्म का नाम राम लीला है जबकि इसका उस पवित्र धार्मिक कार्यक्रम से कोई भी वास्ता नहीं है. यह फिल्म अपने आप को गोलियों की रामलीला कहती है. इसके आधिकारिक ट्रेलर में कई गंदे डायलॉग और अन्तरंग दृश्य हैं जिनका इस शब्द से कोई संबंध नहीं है और जो हिन्दुओं की भावनाओं को आहत करता है. अतः नूतन ने तत्काल इस फिल्म का नाम बदले जाने या ऐसा नहीं करने पर इसके प्रोमो को रोकने और फिल्म को अनुमति देने से मना करने की प्रार्थना की थी.

संलग्न- हाई कोर्ट ऑर्डर की प्रति

HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD, LUCKNOW BENCH

Court No. – 2

Case :- MISC. BENCH No. – 8872 of 2013

Petitioner :- Dr. Nutan Thakur [P.I.L.]
Respondent :- Sri Sanjay Leela Bhansali, Producer & Director Hindi Feature
Counsel for Petitioner :- Asok Pande,Tripuresh Tripathi
Counsel for Respondent :- A.S.G.

Hon'ble Imtiyaz Murtaza,J.
Hon'ble Devendra Kumar Upadhyaya,J.
Heard Sri Asok Pande, learned counsel for petitioner and Sri Raj Kumar Singh, Advocate, who has put in appearance on behalf of Union of India.
Through the instant public interest litigation petition, a prayer has been made that respondent no.3-Central Board of Film Certification and respondent no.4- Ministry of Information and Broadcasting, Union of India be directed to intervene in the matter relating to public exhibition of a film directed and produced respectively by respondent nos. 1 and 2 titled 'Ram Lila' and direct them to change the title of the film.  Further prayer has been made that Central Board of Film Certification be directed not to grant the certificate for public exhibition of the aforesaid film under Sections 4, 5 and 5-A of Cinematograph Act, 1952, if the title of the film is not changed.
Petitioner has also prayed that Central Board of Film Certification and Union of India be directed to impose complete ban on all promotional advertisements of the film, in case Producer and Director of the film do not change title of the film.
It has been alleged by the learned counsel for petitioner that film was watched by the petitioner at her residence on a website as mentioned in para 12 of the writ petition and while watching the movie certain objectionable dialogues and scenes were noticed by her which, according to her, are not only vulgar, rude, offensive and crude but the same degrades the religious feeling of the petitioner. It has further been stated that on account of these objectionable dialogues and scenes in the film, there is a possibility of people misunderstanding the title.
It has also been submitted by the petitioner that the film in question is affecting the sentiments of the public on account of its wrongful title for the reason that title of the film has been derived from dramatic enactment of the life of Lord Rama which cannot be used by the kind of film produced by its Producer.  It has been further argued that use of title 'Ram Lila'  for the film is clearly against decency and morality, which are the grounds envisaged under Section 5-B of the Cinematograph Act, 1952 as principles for guidance in certifying the films for public exhibition.  It has further been argued that if the film is certified for public exhibition with the title 'Ram Lila', the same would offend the principles of decency and morality.
Having heard the learned counsel for the petitioner, we have noticed that the film has not yet been certified for public exhibition as required under Section 4 of the Cinematograph Act, 1952. As per prayer made in the writ petition, petitioner seeks a direction to the Central Board of Film Certification not to grant certificate.  In other words, it appears that process of consideration for grant of certificate for public exhibition of the film has not yet concluded.  Thus, merely on the ground of apprehension, the Court cannot issue direction to the Central Board of Certification, which is a statutory body created under the Cinematograph Act, 1952, to exercise its discretion and statutory authority in a particular manner.
As regards the prayer made by the petitioner for issuing directions to the Ministry of Information and Broadcasting and Central Board of Film Certification to direct the Producer and Director of the film to change its title, the Court is of the considered opinion that at the time when the Central Board of Film Certification will examine the film for issuing certificate for public exhibition, it is expected that the Board will act in accordance with the provision of Cinematograph Act, 1952 and other related laws.
The proceedings before the Central Board of Film Certification as regards the grant of certificate for public exhibition have not yet been concluded, as such, at this juncture issuing any direction to a statutory body to exercise its statutory discretion and power in a particular manner is not called for.
Yet, another submission made by learned counsel for the petitioner is that Producer and Director have announced 15.11.2013 as the date for releasing the film for exhibition and as such it can be presumed that Central Board of Film Certification will grant certificate without examining the film in the light of principles for guidance enumerated under Section 5-B of the Cinematograph Act, 1952. The said presumption is unfounded.
As stated above, Central Board of Certification is a statutory body and unless and until process for consideration of certifying film by the Board is completed, no such apprehension regarding the aforesaid presumption on the part of petitioner can be given any weightage.
It has further been pointed out that this Court in the case of Vinod Shanker Misra vs Salman Khan, Writ Petition No. 5483 (M/B) of 2011 by means of interim order dated 08.06.2011 directed the Central Board of Film Certification to reconsider grant of certificate to Hindi feature film 'Ready' and as such taking into account the sentiments of the petitioner, similar directions be issued in respect of film in question in the instant writ petition.  The order dated 08.06.2011 by this Court in Writ Petition No. 5483 (M/B) of 2011 was passed at the stage when certificate for public exhibition of the film 'Ready' was already granted. However, in the instant case, process of consideration for grant of certificate for public exhibition of the film in question has not yet been completed, as such we do not find it appropriate to issue any such direction to the Central Board of Film Certification.
In view of discussions made above, the writ petition is hereby dismissed.

Order Date :- 26.9.2013

Renu/-

सुभाष चंद्रा ने जी न्यूज के क्राइम शो एडिटर नवीन कुमार की हवा निकाल दी, पढ़ें पत्र

नवीन कुमार जी न्यूज के क्राइम शो के एडिटर व एंकर हैं और कहा जा रहा है कि वो जी ग्रुप के आने वाले क्राइम चैनल के हेड हैं. उनको लेकर एक मेल जी के मालिक सुभाष चंद्रा ने जारी किया है. सुभाष चंद्रा के बिहाफ पर यह मेल जी के एचआर ने सभी लोगों के मेल पर फारवर्ड किया है. इस मेल में नवीन कुमार को अपने काम पर ध्यान देने, अपने क्राइम शो की गुणवत्ता को बढ़ाने और रिजल्ट देने की बात कही गई है. माना जा रहा है कि यह मेल बड़बोले नवीन कुमार की हवा निकालने के लिए कुछ दिन के लिए पर्याप्त है. पढ़ें सुभाष चंद्रा का पूरा पत्र…

Dear Colleagues,

This message is being circulated on behalf of the Chairman to all employees in ZMCL with the Chairman's express instruction for circulation.  

Thank you

Human Resources

—–Original Message—–
From: Subhash Chandra
Sent: Thursday, September 26, 2013 10:09 PM
To: Naveen Kumar
Cc: Bhaskar Das;  Alok Agarwal; sudhir chaudhary
Subject: Circulate all at Zee Media

Dear Navin,

I have been noticing your shows and they are not at all fit for a national brand like Zee. The stories are fit for a cable channel in a part of Delhi.

I believe every one at Zee Media believes that I do not want you to be accountable to anyone other than me. This is every one's conclusion based on your behavior in the past.

I am putting you on notice that to me only one thing matters and that is one and only one SUCCESS. You giving an impression that you are very close to me. I want to say in this open communication that not only you but all esselites working for Essel Group are close to me.

I will expect results, and if you want to be directly responsible to me that is not right in a corporate's life but I am still willing to make an exception but, I WARN you that you are exposing yourself to a boss who becomes unreasonable when it comes to delivery. Decide and let me know, but your reply should also be copied to all, I have marked.

Very Best

SC

पहली बार किसी दोस्त ने मेरे जन्मदिन को यूं यादगार बनाया : राणा यशवंत

Rana Yashwant : अर्से बाद फुर्सत और तसल्ली का ऐसा दिन गुजरा । और पहली बार किसी दोस्त ने मेरे जन्मदिन को यूं यादगार बनाया कि उम्र भर पीछे मुड़ मुड़कर याद करना अच्छा लगेगा। दीपक औऱ उनकी पत्नी अनूसुईया ने मेरे जन्मदिन की दावत रखी और दोस्ती की ऐसी तस्वीर रखी जिसको जब भी याद करो नाज सा होगा। मेरे और दीपक के बीच एक अजीब सी डोर है जो ना कभी ज्यादा तनती है और ना कभी ढीली पड़ती है । गहरी दोस्ती के बावजूद हम दोनों जरुरत भर की बात ही कर पाते हैं लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी मसले पर दोनों की राय अलग रही हो। अनूसुईया का जुड़ाव यूं भी दिखता है। कुछ ऐसा अधिकार उनके पास जो शायद उनके पास होना भी चाहिए।

मेरे जन्मदिन के केक के साथ इंडिया न्यूज की शानदार कामयाबी का केक भी कटा। बहुत कम अर्से में इस बुलंदी पर आने का सारा श्रेय उस टीम को है जिसने जंगजू की तरह खुद को साबित करने और किसी भी चुनौती को मात देने के लिये दिन रात एक कर दिया । मैं औऱ दीपक जब इंडिया न्यूज आए तो 80 फीसदी वैसे साथी जुड़े जो हमारे लिये बिल्कुल नए थे । बीते सात महीनों में तीन दिन ऐसे रहे कि मैं दफ्तर नहीं गया और अपनी टीम के साथ मोर्चे पर खड़ा नहीं रहा। जैसे ढाला ,जैसे तराशा वैसे निकले-वैसे निखरे हमारे ये दोस्त । दफ्तर में कई बार उनकी ये जिद भी अच्छी लगी कि अब आप घर जाइए- आपका ठीक रहना हमारे लिये जरुरी है। हमारी इस टीम के कई साथी बीती रात की पार्टी में थे लेकिन जो नहीं थे उनका रोल भी उतना ही बड़ा रहा है।

जब मैं और दीपक इंडिया न्यूज आए तो हम दोनों को एक बात का यकीन था औऱ वो ये कि बहुत जल्द हम न्यूज इंडस्ट्री की तस्वीर बदल देंगे। आज हम उस मकाम पर आ गये हैं- सिर्फ सात महीनों में । आनेवाला वक्त हमेशा खाली और खुला होता है – चुनौती की तरह । वो है। खैर, बात अमूमन कम करता हूं – आज शायद ज्यादा हो गई। दिन में मुद्दतों बाद बारिश ठीक से देखी। तेज हवा पर बूंदों की लहरों का दूर तक दौड़ना देखना अच्छा लगा। पेड़ों के पत्तों से गर्द का गिरना और उनके बदन का चमकना अच्छा लगा। अच्छा लगा घर के सामने के पार्क के ऊपर से भींगते भागते परिंदों को देर तक देखना । अच्छा लगा आज घर पर तसल्ली से रहना। अच्छा लगा तमाम दोस्तों का शुभकामना संदेश । आप सबों का दिल से शुक्रिया। आज सबकुछ अच्छा लगा।

'इंडिया न्यूज' चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत के फेसबुक वॉल से.

कल्पतरु एक्सप्रेस अखबार से स्थानीय संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी की विदाई की चर्चाएं

कई अखबारों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके और इन दिनों आगरा से प्रकाशित हिंदी दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस के स्थानीय संपादक अरुण कुमार त्रिपाठी के बारे में चर्चा है कि उनकी कल्पतरु ग्रुप से विदाई हो गई है. हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हो पा रही है. अरुण त्रिपाठी पर कई तरह के आरोप हैं. उनकी कार्यशैली को लेकर काम करने वाले पत्रकारों में खासा रोष है. उन पर आरोप है कि उन्होंने एक पत्रकार को अपने घर पर कामकाज करने में लगा रखा था. साथ ही उन्होंने कल्पतरु ग्रुप की लाइब्रेरी के लिए आई दर्जनों महंगी किताबें हड़प कर अपने घर ले गए.

चर्चा है कि अरुण कुमार त्रिपाठी की किसी दूसरे मीडिया ग्रुप के साथ बातचीत तय हो गई है, इस कारण वो कल्पतरु एक्सप्रेस को विदा कह गए हैं. बताया जाता है कि उन्होंने अपनी तरफ से एक पत्र प्रबंधन को भेज दिया है और वो आगरा से दिल्ली की तरफ कूच कर गए हैं. कल्पतरु मीडिया के ग्रुप एडिटर पंकज सिंह के बारे में सूचना है कि वे अरुण कुमार त्रिपाठी के अलविदा कह देने के बाद की स्थिति को संभालने में लगे हुए हैं.

यह भी बताया जा रहा है कि अरुण कुमार त्रिपाठी ने जाते-जाते अपने खास पत्रकारों को इस्तीफे के लिए प्रोत्साहित किया. अरुण के करीबी उन कुछ पत्रकारों ने इस्तीफा दे भी दिया है जो मध्य प्रदेश के किसी एक अखबार में नई ज्वायनिंग के लिए बातचीत तय कर चुके हैं. कल्पतरु एक्सप्रेस, आगरा का पूरा संचालन अरुण कुमार त्रिपाठी ही किया करते थे. ग्रुप एडिटर पंकज सिंह केवल मीडिया विमर्श के वक्त संडे के दिन आगरा जाते. बताया जा रहा है कि जाते-जाते अरुण कुमार त्रिपाठी ने उसी पंकज सिंह के खिलाफ एक अघोषित मोर्चा खोल दिया और आरोप लगाने की कोशिश की जिन पंकज सिंह ने अरुण कुमार त्रिपाठी को बेहद मुश्किल वक्त में नौकरी दिलाई. (कानाफूसी)

आगरा से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

सुपरवाइजर ने पत्रकार को पीटा, एफआईआर दर्ज

पश्चिम बंगाल में मनरेगा योजना की रिपोर्टिग करने पहुंचे एक पत्रकार की जॉब सुपरवाइजर ने पिटाई कर दी। घायल पत्रकार ने नारायणपुर इंवेस्टीगेशन सेंटर में सुपरवाइजर के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी है। आसनसोल जिले के आछड़ा ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना के तहत काम चल रहा था। स्थानीय पत्रकार काजल मित्र ने जब कार्य की प्रगति के बारे में सुपरवाइजर बाबी मजि से पूछताछ शुरू की तो उसने पत्रकार को उसे पीट दिया। उसका कैमरा भी तोड़ दिया।

पत्रकार ने इसकी इसकी सूचना अपने साथियों को दी। सूचना के बाद कई पत्रकार वहां पहुंचे और रूपनारायणपुर पुलिस इंवेस्टीगेशन सेंटर में बाबी माजि पर प्राथमिकी दर्ज करायी। इस संबंध में आसनसोल दुर्गापुर पुलिस के एडीसीपी वेस्‍ट सुब्रत गांगुली ने बताया कि आरोपी के खिलाफ कार्य में बाधा डालने, मारपीट और कैमरा क्षतिग्रस्त करने का मामला दर्ज किया है। मामले की जांच की जा रही है। जल्‍द ही आरोपी को अरेस्‍ट किया जाएगा।

Hindustan Advertisement Scandal : Sharma files his counter-affidavit in Supreme Court

New Delhi : Mr.Mantoo Sharma, Respondent No.-02 in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013, filed by the Shobhana Bhartia, the chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi), has filed his counter-affidavit in 315 pages in the Supreme Court on Sept, 16 recently. Mr.Mantoo Sharma is the informant in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 in Bihar.

Before filing his counter-affidavit, Mr.Sharma sent one set of the counter-affidavit to M/S Karanjawala & Co., Advocates for the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, The Hindustan Times House, 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi -110001 by the registered parcel and two sets of his counter – affidavit to the government lawyer of the Bihar government in the Supreme Court by hand.Four sets of the counter- affidavit were filed in the court of the Reistrar -II, Mr.Sunil Thomas.

The petitioner, Shobhana Bhartia has filed the Special Leave Petition( Criminal) No. -1603 of 2013 in the Supreme Court and prayed for an interim ex-party stay of investigation in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011, dated Nov.,18,2011 under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with Sections 420/471/476 of the Indian Penal Code

In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi), the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar. The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations "prima-facie true" against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code.

The historical order of the Patna High Court : The Hon'ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order. (EOM)

Report by ShriKrishna Prasad, advocate.  Mobile No.-09470400813

फगवाड़ा में पत्रकार से लूट, होशियारपुर के पत्रकार को मातृ शोक

फगवाड़ा : शुक्रवार रात करीब साढ़े दस बजे आधा दर्जन लुटेरों ने पत्रकार छवि भास्कर को लूट लिया। पुलिस को दी शिकायत में छवि ने बताया कि वह सैर करते जा रहे थे कि मॉडल टाउन रोड पर स्थित चावला वाच कंपनी से कुछ कदम आगे दो मोटरसाइकिलों पर सवार ६ लुटेरों ने घेर लिया। विरोध करने पर उन्होंने हाथापाई की तथा दातर के बल पर एप्पल आईफोन ४एस तथा नोकिया ई५१ तथा एक हजार रुपए तथा आईकार्ड निकाल लिए। इसके अलावा दो हीरे तथा एक पन्ने की अंगूठी भी छीन ली।

होशियारपुर : पत्रकार वरिंदर प्रताप सिंह राणा की माता तारा देवी का लंबी बीमारी के पश्चात शुक्रवार रात निधन हो गया। वे 70 वर्ष की थीं। गांव नैनवां में स्वर्गीय तारा देवी का अंतिम संस्कार किया गया। उन्हें राजनीतिक, समाजसेवी, धार्मिक व स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों ने अंतिम विदाई दी।

भड़ास को जिंदा रखने में आपका सक्रिय योगदान चाहिए

भड़ास यानि भड़ास4मीडिया.

भड़ास यानि भारत में वेब मीडिया का प्रचंड नाम.

भड़ास यानि भारत में न्यू मीडिया का अग्रदूत.

भड़ास यानि भारतीय मीडिया के करप्शन और शोषण के खिलाफ संघर्ष का सबसे बड़ा नाम.

भड़ास यानि संगठति भ्रष्टाचार और लूट के खिलाफ बेबाकी और बेखौफ का दूसरा नाम…

उपरोक्त बातें हम नहीं कह रहे… लोग कहते हैं… भड़ास ने कभी अपनी तारीफ में, अपनी ब्रांडिंग में कुछ नहीं कहा.. इसके पाठकों के शब्द और बयान ही इसकी ब्रांडिंग के लिए काफी है…

भड़ास के बारे में कुछ और बातें…

  • भड़ास पिछले छह साल से सत्ता, सिस्टम, लुटेरों, दलालों, भ्रष्टाचारियों के विरोध, प्रताड़ना, उत्पीड़न को झेलने के बावजूद न सिर्फ जिंदा है बल्कि पूरे तेवर के साथ आगे बढ़ रहा है..
  • भड़ास को रोकने के लिए इससे जुड़े लोगों को समय-समय पर तरह-तरह से परेशान-प्रताड़ित किया जाता है…
  • भड़ास को परेशान करने के लिए अब तक कई दर्जन मुकदमें देश भर में लिखाए जा चुके हैं…
  • भड़ास को बंद कराने के लिए इससे जुड़े लोगों को थाना, पुलिस, जेल जैसी जगहों पर सफेदपोशों के इशारे पर भिजवाया जा चुका है…
  • भड़ास का तेवर खत्म करने और मनोबल गिराने के लिए समय-समय पर भ्रष्टाचारियों और दलालों की तरफ से धमकियां दी जाती रही हैं..

पर भड़ास आश्चर्यजनक रूप से न बंद हो रहा और न खत्म हो रहा और न इससे जुड़े लोगों का मनोबल टूट रहा…

पर इस भड़ास के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह है इसका आर्थिक रूप से कमजोर होना…

  1. इस भड़ास का संचालन कारपोरेट के पैसे से नहीं, आप सभी के छोटे-छोटे योगदान से किया जाता है.
  2. अगर आप भड़ास पढ़ते हैं, भड़ास पसंद करते हैं, भड़ास से उम्मीदें पालते हैं, भड़ास के योगदान को सराहते हैं, भड़ास के तेवर के प्रशंसक हैं तो आपको जरूर सोचना चाहिए कि इस भड़ास को बचाए रखने, चलाते रहने में आपका क्या योगदान हो सकता है.
  3. आपने अगर भड़ास को एक भी रुपया आज तक चंदे के रूप में नहीं दिया, आपने अगर आज तक एक भी रुपया भड़ास के संचालन में नहीं लगाया, आपने अगर आज तक एक भी रुपया भड़ास को बचाने के लिए खर्च नहीं किया, अगर आपने भड़ास का कंटेंट पढ़ने-जानने के एवज में आज तक एक भी रुपया फीस के बतौर नहीं दिया…  तो फिर आप दिल पर हाथ रख कर कहिए कि क्या सिर्फ सदिच्छा से भड़ास चलेगा?

भड़ास आपका मंच है.

भड़ास आपकी आवाज है.

भड़ास एक ऐसा प्रयोग है जो पत्रकारिता की मूल आत्मा को जिंदा रखकर बड़े-बड़ों की बखिया उधेड़ने और उनका काला सच सामने लाने के लिए तत्पर है.

इस भड़ास को बचाने-बढ़ाने में हमें आपके सहयोग की सख्त जरूरत है, और लगातार जरूरत है.

आप जब भी भड़ास पढ़ें तो जरूर सोचें कि आपने भड़ास के लिए अब तक क्या किया?

आप जब कई गैर-जरूरी मद में हजारों रुपये खर्च कर सकते हैं तो भड़ास जैसे मंच को बचाए रखने के लिए कुछ योगदान क्यों नहीं कर सकते?

आप संकोच न करें.

आप शर्म न करें.

आप इसे कल पर न टालें.

जब आप किसी अच्छे ब्रांड, अच्छे मकसद, अच्छे अभियान, अच्छे काम, अच्छे आदमी की मदद करते हैं तो आप खुद के लिए कई मददगार अनजाने में खड़ा कर लेते हैं.

भड़ास के सहज संचालन और जनपक्षधर तेवर को बचाए रखने के लिए आप छोटे से छोटा योगदान भी कर सकते हैं… 

शुरुआत सौ रुपये, पांच सौ रुपये, हजार रुपये जैसी रकम भड़ास के खाते में जमा करने से कर सकते हैं..

जो मीडियाकर्मी और गैर-मीडियाकर्मी शुभचिंतक साथी अच्छी जगहों पर कार्यरत हैं उनसे भड़ास को उम्मीद है कि वो सालाना पांच हजार रुपये से दस हजार रुपये आर्थिक मदद के रूप में दें.

आप अगर खुद आर्थिक मदद करने के अलावा भड़ास को विज्ञापन दिलाने में समक्ष हैं, तो ऐसा कर सकते हैं. इस बारे में बात की जा सकती है.

अपने ब्लाग, वेब, अखबार, मैग्जीन, चैनल का लोगो, विज्ञापन भड़ास पर लगाकर और बदले में आर्थिक मदद करके भड़ास की मदद कर सकते हैं.

बाकी, अगर आप कोई सुझाव, कोई राय, कोई सवाल देना-करना चाहते हैं तो अपनी बात yashwant@bhadas4media.com पर मेल कर सकते हैं.

भड़ास को योगदान के लिए नीचे दो एकाउंट नंबर दिए जा रहे हैं..

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आप जो भी रकम जमा करें, उसके बारे में मुझे yashwant@bhadas4media@gmail.com पर मेल करके या 09999330099 पर एसएमएस करके सूचित कर दें ताकि सनद रहे.

आप अपने योगदान के बारे में भड़ास पर प्रकाशित कराना चाहते हों तो इसका मेल में जिक्र करें और अगर आर्थिक मदद को गोपनीय रखना चाहते हों तो इसका भी जिक्र करें.

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ईरान में पुरुष अपनी गोद ली हुई तेरह साल की बेटी से शादी कर सकेगा!

Balendu Swami : 'द गार्जियन' अखबार ने खबर दी है कि पिछले रविवार को ईरान की संसद ने एक बिल पास किया है जिससे की पुरुष अपनी गोद ली हुई 13 साल की बेटी से शादी कर सकेगा! लन्दन की मानवाधिकार वकील शादी सदर ने कहा है कि इसके फलस्वरूप बच्चों से शादी करने के लिए उनके गोद लेने की संख्या में बढ़ोत्तरी हो जायेगी! बोलो क्या कहोगे अब? क्या कोई शब्द हैं आपके पास?

Balendu Swami : इस्लामिक चिकित्सा विज्ञान के शोध के अनुसार, सऊदी अरब में महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगी रोक को जायज़ ठहराने के लिए शेख सालेह लुहायदान ने कहा है कि ड्राइविंग करने से महिलाओं का गर्भाशय सिकुड़ जाता है, जिसकी वजह से उनके बच्चे बीमारियों से ग्रस्त पैदा होते हैं! (स्रोत: हिन्दुस्तान) इन मुल्लाओं से पूछो कि आदमी का भी कुछ सिकुड़ता है क्या?

प्रगतिशील सोच वाले नए जमाने के स्वामी बालेंदु के फेसबुक वॉल से.

गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली में 10 दिनी पत्रकारिता एवं लेखन कार्यशाला 19 अक्टूबर से

गांधी शांति प्रतिष्ठान (नई दिल्ली) की ओर से एक दस दिवसीय पत्रकारिता एवं लेखन कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है. कार्यशाला प्रतिदिन दो घंटे (संध्या 5:30 से 7:30 तक) चलेगी. 19 अक्तूबर से 28 अक्तूबर 2013 तक चलने वाली यह कार्यशाला उन नवजवानों के लिए है जो पत्रकारिता या लेखन की दुनिया में कदम रखने वाले हैं या कदम रखने की सोच रहे हैं. यह उन नवजवानों के लिए भी है जो पत्रकारिता या लेखन को अपना कैरियर तो नहीं बनाना चाहते लेकिन किसी न किसी रूप में इस क्षेत्र से जुड़े रहना चाहते हैं.

पूरी तरह से हिंदी पत्रकारिता एवं लेखन पर केंद्रित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है- इस क्षेत्र में आने वाली नई पीढ़ी के दिल-दिमाग में पत्रकारिता व लेखन की सार्थक दृष्टि पैदा करना तथा मूल्यों-आदर्शों एवं सरोकारों की भूमिका पर बहस को नई उर्जा प्रदान करना. इसमें देश के अनेक वरिष्ठतम पत्रकारों का वक्ता के रूप में भाग लेना अवश्यंभावी है.

कार्यशाला में प्रवेश हेतु प्रवेश फॉर्म वितरित होने लगा है तथा यह किसी भी दिन कार्यालय अवधि (सुबह 10 बजे से संध्या 5 बजे तक) में कार्यालय अधीक्षिका से प्राप्त किया जा सकता है. प्रवेश की अंतिम तिथि 10 अक्तूबर निर्धारित  है लेकिन प्रवेश 'पहले आओ पहले पाओ' के आधार पर हो रहा है और सीटें सीमित हैं. कार्यशाला में प्रवेश हेतु प्रवेश शुल्क के आलावा फॉर्म के साथ (या 10 अक्तूबर तक कभी भी) प्रत्येक प्रतिभागी को कम से कम दो सौ शब्दों में यह लिख कर जमा करना जरूरी है कि 'वह पत्रकारिता एवं लेखन की दुनिया से क्यों जुड़ना चाहता है'. विशेष जानकारी कार्यालय अधीक्षिका से अथवा फ़ोन नम्बर – (०११) २३२३७४९१ एवं २३२३७४९३ तथा मोबाइल – ९७१७०५२८६५ पर प्राप्त की जा सकती है.

अभय प्रताप

कार्यशाला संयोजक

प्रेस रिलीज

गाजीपुर के गजानन्द की याद और रायफल क्लब का निर्माण

उन्नीसवी सदी में प्रकाशित कोई भी पुस्तक, जिसमें गाजीपुर जिले की चर्चा हो, और उसमें गजानन्द मारवाडी या गजानन्द सेठ की चर्चा न हो, खोज पाना र्दुलभ होगा। विभिन्न पुस्तकों, लेखों और जनश्रुति के आधार पर यह स्पष्ट है कि इस निराले व्यक्तित्व की सोच भी निराली थी। इनका मानना था कि सोचो वही जो लोकहित में हो। समझो वही जो लोकहित में हो और करो भी वही जो लोक हित में हो। निश्चित रूप से यह सर्वोत्तम सोच ही वह कारण था कि तत्समय में कोई भी कार्यक्रम चाहे वह सामाजिक हो धार्मिक हो या राजनैतिक, उसमें इनकी सक्रिय सहभागिता आवश्यक होती थी।

लोक हितार्थ तमाम कार्यक्रमों के साथ साथ जिले के नौजवानों के उज्जवल भविष्य के इस स्वप्न द्रष्टा द्वारा अपने आत्मीयजन कृष्ण देव नारायण सिंह एडवोकेटए उपेन्द्र नाथ सिंह वकील राम कृष्ण व्यवसायी वशीर हसन आव्दी एडवोकेट इन्द्रबहादुर सिंह वकील, जीडी अग्रवाल एडवोकेट, राजनारायण सिंह कृषक,  चिरंजी लाल व्यवसायी, गुप्तेश्वर नाथ वकील और महिलाओं में श्रीमती एचके सेठ श्रीमती के वर्मा के साथ मिलकर जिले के किशोरों युवाओं को आग्नेयास्त्र का उचित प्रशिक्षण देने, अनुशासित एवं आत्मविश्वासी बनाकर नागरिक दायित्व की भावना जागृत करने के उद्देश्य से गाजीपुर रायफल क्लब का गठन किया। उस समय भारतीय लोक प्रशासन सर्वोत्तम प्रबन्धकीय/प्रशासनिक सेवाओं के लिए विख्यात था। अतः सर्वसम्मति से पदेन जिलाधिकारी अध्यक्ष बनाए गये। इसी क्रम मे कृष्ण देव नारायन सिंह उपाध्यक्ष, मेजर मनोहर लाल सचिव, उपेन्द्र नाथ सिंह वकील सयुक्त सचिव, श्रीमती एचके सेठ संयुक्त सचिव, गजानन्द मारवाड़ी कोषाध्यक्ष और रामकृष्ण एडीटर तथा अन्य 12 सदस्य चुने गये।

लोक हितार्थ निरन्तर चिन्तन करने वाले कर्मयोगी गजानन्द जी द्वारा जिले के नौजवानों का भविष्य सवाँरने के लिए क्लब का गठन किया गया किन्तु दुर्भाग्य वश क्लब गठन के चन्द महीनों बाद ही गजानन्द जी गोलोक वासी हो गये। क्लब के जनक के मरणोपरान्त क्लब के रुप मे मिली विरासत को हम सजों नहीं पाए, जिस हेतु हम जनपदवासी अपनी नई पीढी़ के अपराधी हैं। यदि ऐसी लापरवाही हम नहीं करते तो कोई कारण नहीं है इतने वर्षों में जिले के उत्साही युवक अपनी निशानेबाजी के माध्यम देश विदेश में कीर्ति मान स्थापित न किए होते।

आज हमारे युवा वर्ग में जो दिशाहीनता, विद्रोह, अपराधी मनोवृत्ति और प्रलोभनों के प्रति सहज समर्पण दिखाई दे रहा है, वह आने वाले भीषण संकट का संकेत है। अनुशासित, शिक्षित, स्वाभिमानी, जागरूक और निष्पक्ष चिन्तन करने वाले युवा ही आने वाले इस संकट से उबार सकते हैं। उनको तुच्छ तात्कालिक लाभों में उलझाने वाले कुटिल लोगों को समझना होगा और अपने भविष्य निर्माण के लिए यथार्थवादी तरीको से डट कर संघर्ष करना होगा। दरअसल भ्रष्ट सिस्टम और निरंकुश प्रशासन से टकरा पाना दमदार नौजवानो के ही बस की बात है।

गाजीपुर रायफल क्लब के नीति नियन्ता क्लब के मूल उद्देश्यों से भटक कर नौजवानों के भविष्य निर्माण की जगह क्लब हेतु जनता से प्राप्त चन्दे की धनराशी से भले ही क्लब के लिए भवन निर्माण और उसके साज सज्जा में व्यस्त रह कर जिले के नौजवानों की अनदेखी करें पर कचहरी स्थित रायफल क्लब नामक यह भवन सदा नौजवानों के हितों के रक्षक गजानन्द की तो दिलाता ही रहेगा।

शिवेन्द्र पाठक

गाजीपुर

सम्पर्क- 09415290771

रही-सही कसर टैम के टीआरपी पैमाने ने पूरी कर दी जिसके आगे दूरदर्शन निस्तेज दिखने लगा

: सार्वजनिक प्रसारक की चुनौती और दायित्व : देश में जितनी तेजी से टेलीविजन चैनलों और एफएम रेडियो का विस्तार हुआ है, उतनी ही तेजी से इन पर प्रसारित हो रहे कंटेंट को लेकर सवाल भी उठ खड़े हुए हैं। बेशक बाजार में चमक-दमक भरी दुनिया वाले निजी चैनलों का दबदबा कायम है। क्षेत्रीय भाषाओं के साथ मिलकर कुल मिलाकर पांच सौ से ज्यादा टेलीविजन चैनलों की भारतीय दुनिया से सकारात्कम कंटेंट की विदाई या तो हो चुकी है या फिर प्रक्रिया में है।

हालांकि एक धारा ऐसी भी है जो एक फिल्म की तर्ज पर अंग्रेजी में कंटेंट इज किंग यानी कंटेंट ही असल ताकत है का नारा बुलंद कर रही है। लेकिन जब बेतुके कंटेंट, बेतुकी समाचार कथाएं और बेतुके सोप ऑपेरा की दुनिया से खासतौर पर बौद्धिक वर्ग का पाला पड़ता है तो एक बार फिर सवाल उठने लगता है कि क्या भारत जैसे बहुवर्णी और संस्कृतिबहुल देश में ऐसे प्रसारक नहीं होने चाहिए, जो देसी संस्कृति का खयाल तो रखे ही, संपूर्ण भारतीयता की अवधारणा के साथ फिक्शन और समाचार दोनों तरह के कंटेंट पेश करें।

ऐसे में एक बार फिर सार्वजनिक प्रसारण पर ही जाकर हमारी निगाह टिकती है। सार्वजनिक प्रसारण यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी। चूंकि यही वह दौर है, जिसमें जिंदगी की सारी इकाइयां उदारीकरण और पश्चिमी मानकों वाली आधुनिकता में रंगने के लिए सौंपी जा रही है। लिहाजा एक बहस यह भी है कि आखिर सरकार या सार्वजनिक पैसे का दुरूपयोग(?)  किया ही क्यों जाए। ये कुछ संदर्भ हैं, जिनकी वजह से यह सवाल उठ खड़ा होता है कि भारत में सार्वजनिक प्रसारण संगठनों की क्या भूमिका होनी चाहिए। क्या उसे भी बाजारी ताकतों की तरह अपने कंटेंट का स्तर गिराकर चटपटा बना लेना चाहिए या फिर उसे अपनी खासियत बनाए रखनी चाहिए। इन संदर्भों में हमें प्रसिद्ध समाजशास्त्री पूरन चंद्र जोशी की अध्यक्षता में 1982 में गठित समिति की रिपोर्ट पर गौर करना चाहिए।  पीसी जोशी कमेटी ने कहा था- टेलीविजन किसी भी देश का चेहरा होता है। अगर किसी देश का परिचय पाना है तो उसका टेलीविजन देखना चाहिए। वह राष्ट्र का व्यक्तित्व होता है। स्पष्ट है कि दूरदर्शन पर भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कार्यक्रम ही प्रसारित होना चाहिए, इस आशय की रिपोर्ट पीसी जोशी के नेतृत्व वाली कमेटी ने सरकार को सौंपी थी।

पीसी जोशी कमेटी की रिपोर्ट ही थी कि दूरदर्शन पर बुनियाद, हमलोग जैसे सोप ऑपेरा की बुनियाद रखी गई और यह सिलसिला गणदेवता, मैला आंचल होते हुए रामायण, महाभारत, कृष्णा और चाणक्य तक पहुंचा। भारतीयता का चेहरा दिखाने वाला दूरदर्शन तब तक आगे रहा। लेकिन जैसे ही नरसिंह राव की सरकार के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उदारीकरण के दरवाजे खोले, दूरदर्शन पिछड़ने लगा। आर्थिक उदारवाद और सॉफ्टवेयर क्रांति के दौर में दूरदर्शन के पिछड़ने की प्रक्रिया सतत प्रवाहशील बनी रही। इसके बाद एक दौर ऐसा भी आया कि सेटेलाइट चैनलों के दौर में दूरदर्शन का नाम उपहास का पात्र भी बन गया। इस दौर में दूरदर्शन को उबारने की कोशिश हुई। जनता पार्टी की सरकार के दौरान बने बीजी बर्गीज कमिटी ने सार्वजनिक प्रसारण ट्रस्ट बनाने की सिफारिश की थी। जो न्यायपालिका जैसी स्वायत्त हो। लेकिन तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इसे नकार दिया था। उन्होंने कहा था – “ कमेटी ने न्यायपालिका की तरह एक समानांतर स्वायत्त संस्था बनाने की सिफारिश की है, जिस पर विधायिका का भी कोई नियंत्रण ना हो। लेकिन हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। ” बेशक बाद में संयुक्त मोर्चा की सरकार ने 1996 में प्रसार भारती का गठन तो कर दिया। लेकिन उसके बाद आई एनडीए की सरकार ने प्रसार भारती के बावजूद अपना सीमित नियंत्रण जारी रखा। इसे लेकर हो हल्ला भी मचा था। तब तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन ने कहा था कि सार्वजनिक पैसे से चलने वाले सार्वजनिक प्रसारण माध्यमों पर अगर सरकारी पक्ष नहीं रखे जाएंगे तो क्या रखे जाएंगे। 1978 में लालकृष्ण आडवाणी सार्वजनिक प्रसारण ट्रस्ट की अवधारणा को जिस अंदाज में खारिज कर रहे थे, वह शालीन था। लेकिन उसके अंदर भी निहित वही था, जिसे करीब बीस-इक्कीस साल बाद प्रमोद महाजन ने कहा।

सार्वजनिक प्रसारण तंत्र को लेकर हमारे सामने ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन का मॉडल रखा जाता है। जिस पर सरकार का सीधा नियंत्रण नहीं है। उसे ब्रिटिश संसद नियंत्रित करती है। लेकिन यह नियंत्रण सिर्फ प्रशासनिक और आर्थिक ही होता है। कंटेंट के स्तर पर उस पर किसी का सिद्धांतत: किसी संस्था या सरकार का नियंत्रण नहीं है। 1989 में जब राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी थी, तब के सूचना और प्रसारण मंत्री पी उपेंद्र के सामने बीबीसी की तर्ज पर ही भारतीय दूरदर्शन और आकाशवाणी को पेश करने और संगठित करने का सुझाव दिया गया था। राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार इसके लिए तैयार भी थी। लेकिन जब तक वह इसे लागू कर पाती, सरकार गिर गई और उसके बाद आई नरसिंह राव सरकार ने उदारीकरण की तरफ कदम बढ़ा दिए। बदले माहौल में सार्वजनिक प्रसारण की भूमिका क्या होनी चाहिए, इस पर बहस की गुंजाइश ही नहीं रही। तर्क तो यहां तक दिए जाने लगे कि जब राज्य अपने उद्योगों और फैक्ट्रियों का विनिवेशीकरण करके बाजार के हवाले कर रहा है तो निजी चैनलों के दौर में दूरदर्शन ही क्यों सरकारी नियंत्रण में रहे। लेकिन विरोधाभास देखिए कि जिस एनडीए सरकार ने विनिवेशीकरण की प्रक्रिया को तेज किया, उसी एनडीए सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रमोद महाजन सार्वजनिक प्रसारण संस्थान को सरकारी कब्जे में ही बनाए रखने के हिमायती रहे। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रसारण और खासतौर पर सार्वजनिक प्रसारण की ताकत और बदलते दौर में क्या भूमिका हो सकती है।

निश्चित तौर पर जब उदारीकरण की बयार तेज हुई तो उस वक्त दूरदर्शन ने खुद को बाजार से मुकाबले के लिए तैयार नहीं किया। रही-सही कसर टैम के टीआरपी पैमाने ने पूरी कर दी। जिसके आगे दूरदर्शन निस्तेज दिखने लगा। हालांकि अपनी पहुंच और प्रसार की वजह से वह देश के करीब 96 फीसदी हिस्से तक अपनी पहुंच रखता है। गांवों के खेतों-खलिहानों से लेकर सुदूर उत्तरपूर्व की पहाडियों तक अपनी पहुंच और अपना नेटवर्क होने की वजह से वह निजी चैनलों की बाढ़ के बीच अनचीन्हा और अनजाना ही नहीं, निस्तेज दिखता रहा। निश्चित तौर पर इसके लिए बाजार की शक्तियां जिम्मेदार थीं। जिन्हें अपने सपनीले प्रोडक्ट बेचने में दूरदर्शन के जरिए मदद नहीं मिलनी थी। सार्वजनिक प्रसारण होने के नाते उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा बनती है। वह मिथ्या प्रचार और मिथ्या तथ्य पेश नहीं कर सकता। लेकिन इस पूरी कवायद में निजी चैनलों से भारत लगातार पिछड़ता चला गया और नव इंडिया अपने नए तेवर के साथ सपनीली दुनिया के साथ आगे बढ़ता रहा। निजी चैनलों को देखकर कोई कह सकता है कि भारत की आज भी करीब सत्रह करोड़ आबादी सत्रह रूपए से कम पर जीने के मजबूर है। निश्चित तौर पर कुल आबादी के हिसाब से देखें तो यह छोटा प्रतिशत है। लेकिन संख्या के लिहाज से देखें तो यह भयावह संख्या है। योजना आयोग के ही एक अर्थशास्त्री अर्जुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता वाली समिति ने 2005 में एक रिपोर्ट दी थी। जिसके मुताबिक देश में 83 करोड़ 70 लाख लोग रोजाना बीस रूपए या उससे भी कम में जीने के लिए मजबूर थे। लेकिन निजी चैनलों की चमकीली दुनिया से भारत का यह स्याह पक्ष गायब था।

निजी खबरिया चैनलों का नेटवर्क और प्रसार के साथ ही उदारीकरण की दुनिया की बादशाह उपभोक्ता कंपनियों को अपना बाजार सिर्फ उच्च मध्यवर्ग, दिल्ली, मुंबई और राज्यों की राजधानी तक के शहरों में ही दिखता है। लिहाजा निजी चैनलों और एफएम स्टेशनों के कार्यक्रम भी इसी वर्ग के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाए और पेश किए जा रहे हैं। खबरिया चैनलों की हालत भी इसी तरह की है। बाजार पर कब्जे की ही दौड़ है कि कुएं में गिरा प्रिंस देश के निजी खबरिया चैनलों की बड़ी खबर बनता है। सांड गाजियाबाद के किसी घर की छत पर चढ़ जाता है तो वह राष्ट्रीय खबर बन जाता है। बिना ड्राइवर की कार, एलियन का गाय उठा ले जाना, राखी सावंत का चुंबन के साथ ही फिल्मों की रिलीज राष्ट्रीय खबरों में प्रमुख स्थान बनाती हैं। लेकिन चेरापूंजी में बारिश लगातार घट रही है, मानसून के बेहतर अनुमान के दौर में भी बिहार का एक हिस्सा, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सूखे का अंदेशा राष्ट्रीय कौन कहे, कोने की खबर भी नहीं बन पाती। सुदूर केरल में क्या घटित हो रहा है या फिर उड़ीसा में लोग कैसे जी रहे हैं, जैसे तथ्यों पर राष्ट्रीय मीडिया होने का दावा करने वाले निजी चैनलों तक से ऐसी खबरें गायब हैं। ऐसे माहौल में सार्वजनिक प्रसारण संगठन से ही उम्मीदें बंधती हैं। बेशक उसे भी चलाने में भारी रकम लगती है। उसे संचालित करने के लिए बेहतर राजस्व चाहिए। लेकिन सार्वजनिक प्रसारण होने के चलते उसकी सीमाएं भी हैं। चूंकि बाजार के दबाव में दूरदर्शन इतना नहीं झुका कि उसकी राष्ट्रीयता की अवधारणा पर सवाल उठाया जा सके, लिहाजा उससे उम्मीदें बरकरार हैं और पीसी जोशी के शब्दों में कहें तो देश को समझने और देखने के लिए एक बार फिर दूरदर्शन पर निर्भरता बढ़ी है।

दूरदर्शन जैसे सार्वजनिक प्रसारण इसके बावजूद इन दिनों दुविधा में दिखता है। उस पर भी प्रोफेशनल और कमर्शियल होने का दबाव है तो वह अपनी सार्वजनिक प्रसारक की भूमिका को बचाए और बनाए भी रखना चाहता है। वह तय करता नहीं दिख रहा है कि उसकी कमर्शियल भूमिका किस सीमा तक होनी चाहिए कि उसकी सार्वजनिक प्रसारक की छवि पर सवाल ना उठे। इसलिए वह कई बार एक कदम आगे तो दो कदम पीछे चलता दिखता है। उसे इस दुविधा से निकलना होगा।

जिस सार्वजनिक प्रसारण माध्यम को हम मॉडल के तौर पर मानते-देखते आए हैं, उस बीबीसी पर बेशक सरकार और उसके किसी संस्थान या अंग का नियंत्रण नहीं है। लेकिन राष्ट्रीय हितों पर उठने वाली खबरों को लेकर उसे भी दबाव झेलना पड़ता है। याद कीजिए इराक हमले को लेकर हुए खुलासे का। इराक पर हमले का आधार तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने व्यापक जनसंहार वाले रासायनिक हथियारों को बनाया था। बाद में पता चला कि इराक के पास ऐसे कोई हथियार थे ही नहीं। इसका खुलासा का आरोप ब्रिटेन के एक वैज्ञानिक विलियम केली पर लगा। जिसे बीबीसी ने प्रसारित किया। बीबीसी पर इतना दबाव बढ़ा कि ये खबर प्रसारित करने वाले संवाददाता समेत बीबीसी के महानिदेशक तक को इस्तीफा देना पड़ा। इन अर्थों में देखें तो कोई सार्वजनिक प्रसारण पूरी तरह से स्वायत्त या पूरी तरह से नियंत्रण मुक्त नहीं हो सकता। दूरदर्शन शायद यह तथ्य समझता है। लेकिन राष्ट्रीय संपत्ति से संचालित होने के चलते राष्ट्रीय प्रतिबिंब बनना उसका पहला दायित्व होना चाहिए। राष्ट्र के स्पंदन पर भी उसकी नजर होनी चाहिए और राष्ट्र क्या बोल रहा है, उसके जरिए पता लगना चाहिए। पीसी जोशी कमेटी ने भी स्वायत्तता को बरकरार रखने की वकालत इन्हीं संदर्भों में की थी। क्योंकि अक्सर सत्ताधारी दल सार्वजनिक प्रसारण माध्यमों को अपना भोंपू बना लेते हैं। सार्वजनिक प्रसारक के संचालक अफसर भी चूंकि उसी नौकरशाही व्यवस्था से आए हुए होते हैं, लिहाजा वे सत्ताधारी दलों के सामने सरेंडर करने से नहीं हिचकते। निश्चित तौर पर तब राष्ट्र का प्रतिबिंब नहीं झलकता, तब राष्ट्र की बजाय एक अंग और एक छोटा सा हिस्सा ही बोलता नजर आता है। सूचना क्रांति के दौर में जब सूचनाएं कई स्रोतों से आ रही हैं, आम जनता के लिए यह पता लगाना आसान है कि क्या सच है और कितना एकांगी या सर्वांगी है। सार्वजनिक प्रसारक को यह चुनौती समझनी होगी। तभी जाकर वह सही मायने में राष्ट्र का प्रतिबिंब बन पाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी का यह लिखा दूरदर्शन की पत्रिका 'दृश्यांतर' में प्रकाशित हो चुका है.

मेरठी महापंचायत में महाभारत के दौरान मीडिया भी निशाने पर, काफी नुकसान

मेरठ : सरधना के भाजपा विधायक संगीत सोम की गिरफ्तारी और उन पर रासुका लगाए जाने के विरोध में आज रविवार को खेड़ा गांव में ठाकुर चौबीसी व हिंदू संगठनों द्वारा बुलाई गई महापंचायत में पुलिस-प्रशासन की मनमानी के चलते एक बार फिर हालात बिगड़ गए. पुलिस और महापंचायत में शामिल लोगों के बीच जमकर पथराव हुआ. पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े. इस दौरान उग्र लोगों ने मीडिया को भी निशाना बनाया और एनडीटीवी की ओबी वैन पर पथराव किया. एक महिला पत्रकार की स्कूटी को भी फूंक दिया. अन्य कई नुकसान भी होने की सूचना है.

चर्चा है कि पुलिस की गोली से मोहित नाम के युवक की मौत हो गई है और कई अन्य घायल हैं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है. सेना बुलाने की भी चर्चा है. लेकिन मेरठ के जिलाधिकारी नवदीप रिनवा का कहना है किसी की भी मौत नहीं हुई है और न ही सेना बुलाई जा रही है. डीएम के मुताबिक मेरठ के सरधना क्षेत्र के खेड़ा गांव में प्रतिबंधित पंचायत के दौरान पुलिस कार्यवाही में किसी भी व्यक्ति की मौत नहीं हुई है. उन्होंने कहा कि कतिपय न्यूज चैनल्स पर सेना बुलाये जाने की बात बेबुनियाद है. सेना को केवल सतर्क रहने के निर्देश दिये गये हैं.

श्री रिनवा घटना को नियंत्रण करने के लिए खेड़ा गांव में ही पुलिस व प्रशासन के आला अफसरों के साथ कैम्प किये हुए हैं. उन्होंने कहा कि पुलिस कार्यवाही के दौरान एक व्यक्ति मामूली रूप में घायल हुआ है, जिसे सुभारती मेडिकल कालेज में भर्ती करा दिया गया है, जहां उसकी स्थिति सामान्य है. उन्होंने ग्रामीणों से अपील की है कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और शांति व सदभाव बनाये रखें. उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित महापंचायत को न होने देने के प्रशासन के दावों की हवा निकल चुकी है, क्योंकि आज सुबह ही मौके पर बीस हजार से अधिक लोग आ गए, जिनमें आधी से अधिक महिलायें थीं, जिससे सवाल उठता है कि पुलिस-प्रशासन जमीन पर फेल क्यूं हुआ?

मोदी और मीडिया का मैजिक

Brahmaveer Singh : मीडिया को खुराक चाहिए। हर वक्त नए जायके के साथ। उसकी खुराक कम नहीं होती। सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जाती है। खुराक के लिए वह हर वक्त, बदल-बदलकर वह प्रतीक गढ़ती है। हर तरफ से लुटी-पिटी मायूस आवाम को उज्जवल भविष्य के प्रतिमान दिखाकर अपने लिए दर्शक बटोरती है। उनके प्रतिमानों को पनीर की तरह निचोड़ती है फिर बचे पानी की तरह उन्हें दरवाजे के बाहर नाली में फेंक देती है। और फिर नया प्रतिमान तलाशती है, निचोड़कर फेंक देने के लिए।

यह सिलसिला उतना ही पुराना है जितना बिहार में पदस्थ उस कलेक्टर की कहानी जिसने एक समय राजनीति के आकाश के सबसे तेज चमकते सितारे लालकृष्ण आडवानी को मंच से उतारकर टाइम मैगजीन में जगह हासिल कर ली थी। मीडिया ने उन्हें रातोंरात कर्तव्य परायण अफसर के इतने कसीदे गढ़े की बेईमानों के राज से तंग हर युवा ईमानदार गौतम ही बनना चाहता था। मगर जब वही अफसर बाढ़ राहत का पैसा खाकर असमय अपनी नौकरी गंवा बैठा तो मीडिया के पास दूसरा प्रतिमान तलाशने के दूसरा रास्ता ही नहीं बचा।

या फिर दुर्गा नागपाल। शुद्ध आईएएस अफसर, जिसने कठिन परीक्षा की बैतरणी पार की और सरकार के प्रति वफादारी की सौगंध लेकर नौकरी शुरू की। उसे नायिका बनाकर जिस तरह पेश किया गया वह शायद खुद दुर्गा के लिए हैरत का सबब रहा होगा। रातोंरात बिना कुछ कहे, दुर्गा की कहानी को मीडिया दर्शकों के सामने तब तक परोसता रहा जब तक दर्शक बोर न हो गए या फिर मीडिया को ट्विस्ट के लिए कुछ नहीं मिला। आखिर में हश्र वही हुआ जो अकसर होता रहा है। दुर्गा रूपी शक्ति ने उस शख्स से माफी मांगी जो आज यूपी के इतिहास में सबसे कन्फ्यूज्ड युवा मुख्यमंत्री है। आला दर्जे का निकम्मा भी।

और अन्ना हजारे…एक सज्जन किस्म के व्यक्ति को दिल्ली में गांधी का अवतार बताकर शुरू हुआ खेल आज कहां जाकर खत्म हुआ है? एक वक्त अन्ना के सांस के उतार-चढ़ाव का हिसाब रखने वाले हमारे हम पेशेवर लोग आज उनके दिनों, हफ्तों या महीनों की भी खबर नहीं रखते। अन्ना में जब तक टीआरपी की गुंजाइश थी, निचोड़ी गई। दिल्ली में मीडिया का भविष्य तय करने वाले आला दर्जे के होनहार संपादक अन्ना के गांव में पीपली लाइव की तर्ज पर जिंदगी जी रहे थे। एक बाइट के लिए धक्का खाने से लेकर गाली खाने तक की घटनाएं उस वक्त हुर्इं। जब टीआरपी का रस खत्म हो गया तो अन्ना आज मीडिया के अनिवार्य नहीं गैर जरूरी हो चुके हैं।

अब उनकी खबरें आती हैं तो इस बात कि एयर कंडीशन नहीं होने की वजह से वे सभा छोड़कर भाग गए। आज शायद अन्ना भी यह समझ पाने में नाकाम हो चुके होंगे कि आखिर अचानक क्या हो गया है। अब वे मायूस होकर यही आरोप लगा सकते हैं कि सरकार उनकी बातों को सेंसर करा रही है। पैसे देकर उनकी खबरें रुकवाई जा रही हैं। अन्ना जी, दोष आपका नहीं है। यह खेल ही निराला है। जब अन्ना का मैजिक खत्म हो गया तो जरूरी हो गया कि नया प्रतिमान गढ़ा जाए।

बाबा रामदेव की कहानी कौन नहीं जानता। सौ प्रतिशत मतदान, कालाधन और स्वदेशी जैसे नारों के साथ मीडिया उनके पीछे तब तक दिनरात भागता रहा जब तक पुलिस ने बाबा रामदेव को गैर कानूनी तरीके से ही सही, मैदान से खदेड़ नहीं दिया। क्या अब मोदी की बारी है? भारत का भविष्य बताकर मीडिया ने नरेंद्र मोदी की खबरों को ओवर डोज देश को दे रखा है उससे यही आशंका जन्म ले रही है। एक अच्छे-खासे प्रशासक को अति प्रचार का हिस्सा बना दिया गया है। अति हर चीज की बुरी होती है। मीडिया की अति तो अति की खराब होती है।

‘खुदा न खास्ता’ अगर चुनावों के नतीजे वैसे न रहे, तो सिर पर उठाकर घूमने वाला मीडिया उनके साथ क्या हश्र करेगा यह ऊपर लिखे किस्सों से जाहिर है। मीडिया उन्हें तब लोकतंत्र का सितारा नहीं कहेगा। दंगों के दाग से हारा हुआ नेता बताएगा। उसके चंद दिनों बाद नए प्रतिमान की तलाश होगी। दर्शकों को एक बार फिर उम्मीद बंधाने के लिए।

हरिभूमि अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार ब्रह्मवीर सिंह के फेसबुक वॉल से.

‘तहलका’ के पत्रकार शिरीष खरे की किताब ‘तहकीकात’ का इंदौर में हुआ विमोचन

इंदौर. युवा पत्रकार और मध्य प्रदेश में तहलका के वरिष्ठ संवाददाता शिरीष खरे की खोजी पत्रकारिता पर आधारित पहली पुस्तक ‘तहकीकात’ का विमोचन किया गया. इस दौरान देश के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई, दूरदर्शन के महाप्रबंधक त्रिपुरारी शरण, जाने-माने न्यूज एंकर आषुतोष, एक्सचेंज फॉर मीडिया के संपादक अनुराग बत्रा, सकाल (मराठी) के सलाहकार संपादक विजय नायक, नई दुनिया के समूह संपादक श्रवण गर्ग, अजय उपाध्याय, सुरेश बाफना और सीमा मुस्तफा जैसी हस्तियां मौजूद थीं.

‘तहकीकात’ पुस्तक में मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई बड़े घोटालों के खुलासों से जुड़ी बातों पर प्रकाश डाला गया है. यह पुस्तक युवा पत्रकार की उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित हैं जो उन्होंने बीते दो सालों के दौरान इन राज्यों में पत्रकारिता का काम करते हुए तैयार की हैं. इसमें खास तौर से इन राज्यों के राजनीतिक मूल्यों में आई गिरावट को प्रक्रियाओं के साथ समझने की कोशिश की गई है और उन्हें संदर्भों सहित रखा गया है.

गौरतलब है कि मीडिया के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी यह सभी हस्तियां  इंदौर के होटल फॉरच्यून लेंड मार्क में इंदौर प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के संयुक्त तत्वाधान में द्वारा आयोजित ‘पत्रकारिता की नई चुनौतियां’ में शामिल हुई थीं. इस दौरान उन्होंने खास तौर से युवा पत्रकारों के सामने आ रही चुनौतियों को लेकर अपने अनुभव और विचारों को भी लोगों के साथ साझा किया.

पुस्तक के बारे में : 'तहकीकात' यह पुस्तक मुखौटों के पीछे का ऐसा सच है जिसमें रिपोर्ट दर रिपोर्ट कई बड़े घोटालों का खुलासा हुआ है. साथ ही भ्रष्ट व्यवस्था के ऊंचे सोपानों पर बैठे व्यक्तियों के दोहरे चरित्र की पड़ताल भी की गई है. यह पुस्तक मुख्यतः उन विशेष रिपोर्टों पर आधारित है जो लेखक ने बीते दो सालों में मध्य प्रदेश और राजस्थान रहते हुए लिखी थीं. अपने समय की तस्वीरें बताती हैं कि देश के विकसित होते इन राज्यों में आर्थिक घटनाक्रम किस तेजी से बदल रहा है. इसकी वजह से खास तौर पर राजनीतिक मूल्यों में किस हद तक गिरावट आई है. रिपोर्टिंग के पीछे मकसद था कि ऐसी स्थितियों की प्रक्रियाओं को जाना जाए और उन्हें संदर्भ के रुप में रखा जाए. दूसरे शब्दों में यह अपने समय का लघु दस्तावेज है. एक युवा पत्रकार के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारिता के पहले ही दौर में मैंने जो लिखा उसकी गूंज सियासी गलियारों से लेकर सदन तक हुई. इस मामले में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान के उन संस्कारों का धन्यवाद जहां असली शक्ल दिखाने के बावजूद आईना तोड़ने का चलन अभी पनपा नहीं है. उम्मीद है कि यह प्रयास अपने समय के मुद्दों को संदर्भ और विश्लेषण के साथ समझने में मदद करेगा.

लेखक के बारे में : शिरीष खरे जनपक्षीय पत्रकारिता में बीते बारह सालों से सक्रिय. इस दौरान दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेष के गांवों को देखा-समझा. गरीबी, समाज के उत्पीडि़त वर्ग पर होने वाले अत्याचारों और सत्ता के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की अराजकता की वजह से आम आदमी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को पत्रकारिता का विषय बनाया. 2002 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विष्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त की. प्रतिष्ठित लाडली मीडिया पुरस्कार और सेंट्रल स्टडी आफ डवल्पमेंट सोसाइटी, नई दिल्ली द्वारा मीडिया फेलोषिप सम्मान. जन्मः  24 अक्टूबर, 1980. संप्रतिः  वरिष्ठ संवाददाता, तहलका. स्थान:  भोपाल, मध्य प्रदेश. मोबाईल: 08827190959. ईमेल:  shirish2410@gmail.com

मोदी की दिल्‍ली रैली की असल हकीकत बयान कर रहे हैं पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव

हाल ही में एक बुजुर्ग पत्रकार मित्र ने मशहूर शायर मीर की लखनऊ यात्रा पर एक किस्‍सा सुनाया था। हुआ यों कि मीर चारबाग स्‍टेशन पर उतरे, तो उन्‍हें पान की तलब  लगी हुई थी। वे एक ठीहे पर गए और बोले, ''ज़रा एक पान  लगाइएगा।'' पनवाड़ी ने उन्‍हें  ऊपर से नीचे तक ग़ौर से देखा, फिर बोला, ''हमारे यहां तो जूते लगाए जाते हैं हुज़ूर।'' दरअसल, यह बोलचाल की भाषा  का फ़र्क था। लखनऊ में  पान बनाया जाता है।

तस्वीर: अभिषेक श्रीवास्तव

लगाने और बनाने के इस फ़र्क को समझे बगैर दिल्‍ली से आया  मीर जैसा अदीब भी गच्‍चा खा जाता है। ग़ालिब, जो इस फ़र्क को बखूबी समझते थे, बावजूद खुद दिल्‍ली में ही अपनी आबरू का सबब पूछते रहे। दिल्‍ली और दिल्‍ली के बाहर के पानी का यही फ़र्क है, जिसे समझे बग़ैर ग़यासुद्दीन तुग़लक से दिल्‍ली हमेशा के लिए दूर हो गई। गर्ज़ ये, कि इतिहास के चलन को जाने-समझे बग़ैर दिल्‍ली में कदम रखना या दिल्‍ली से बाहर जाना, दोनों ही ख़तरनाक हो सकता है। क्‍या नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात कोई जाकर समझा सकता है? चौंकिए मत, समझाता हूं…।

अगर आपने राजनीतिक जनसभाएं देखी हैं, तो ज़रा आज की संज्ञाओं का भारीपन तौलिए और मीडिया के जिमि जि़प कैमरों के दिखाए  टीवी दृश्‍यों से मुक्‍त  होकर ज़रा ठहर कर सोचिए: जगह  दिल्‍ली, मौका राजधानी में  विपक्षी पार्टी भाजपा की पहली चुनावी जनसभा और वक्‍ता इस देश के अगले प्रधानमंत्री का इकलौता घोषित प्रत्‍याशी नरेंद्र मोदी। सब कुछ बड़ा-बड़ा। कटआउट तक सौ फुट ऊंचा। दावा भी पांच लाख लोगों के आने का था। छोटे-छोटे शहरों में रैली होती है तो रात से ही कार्यकर्ता जमे रहते हैं और घोषित समय पर तो पहुंचने की सोचना ही मूर्खता होती है। मुख्‍य सड़कें जाम हो जाती हैं, प्रवेश द्वार पर धक्‍का-मुक्‍की तो आम बात होती है। दिल्‍ली में आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। न कोई सड़क जाम, न ही कोई झड़प, न अव्‍यवस्‍था। क्‍या इसका श्रेय जापानी पार्क में मौजूद करीब तीन हज़ार दिल्‍ली पुलिसबल, हज़ार एसआइएस निजी सिक्‍योरिटी और हज़ार के आसपास आरएएफ के बलों को दिया जाय, जिन्‍होंने कथित तौर पर पांच लाख सुनने आने वालों को अनुशासित रखा? दो शून्‍य का फ़र्क बहुत होता है। अगर हम भाजपा कार्यकर्ताओं, स्‍वयंसेवकों, मीडिया को अलग रख दें तो भी सौ श्रोताओं पर एक सुरक्षाबल का हिसाब पड़ता है। ज़ाहिर है, पांच लाख की दाल में कुछ काला ज़रूर है।    

आयोजन स्‍थल पर जो कोई भी सवेरे से मौजूद रहा होगा, वह इस काले को नंगी आंखों  से देख सकता था। मोदी की जनसभा का घोषित समय 10 बजे  सवेरे था, जबकि वक्‍ता की लोकप्रियता और रैली में अपेक्षित भीड़ को देखते हुए मैं सवेरे सवा सात बजे जापानी पार्क पहुंच चुका था। उस वक्‍त ईएसआई अस्‍पताल के बगल वाले रोहिणी थाने के बाहर पुलिसवालों की हाजि़री लग रही थी। सभी प्रवेश द्वार बंद थे। न नेता थे, न कार्यकर्ता और न ही कोई जनता। रोहिणी पश्चिम मेट्रो स्‍टेशन वाली सड़क से पहले तक अंदाज़ा ही नहीं लगता था कि कुछ होने वाला है। अचानक मेट्रो स्‍टेशन वाली सड़क पर बैनर-पोस्‍टर एक लाइन से लगे दिखे, जिससे रात भर की तैयारी का अंदाज़ा हुआ। बहरहाल, आठ बजे के आसपास निजी सुरक्षा एजेंसी एसआइएस के करीब हज़ार जवान पहुंचे और उनकी हाजि़री हुई। नौ बजे तक ट्रैक सूट पहने कुछ कार्यकर्ता आने शुरू हुए। गेट नंबर 11, जहां से मीडिया को प्रवेश करना था, वहां नौ बजे तक काफी पत्रकार पहुंच चुके थे। गेट नंबर 1 से 4 तक अभी बंद ही थे। सबसे ज्‍यादा चहल-पहल मीडिया वाले प्रवेश द्वार पर ही थी। दिलचस्‍प यह था कि तीन स्‍तरों के सुरक्षा घेरे का प्रत्‍यक्ष दायित्‍व तो दिल्‍ली पुलिस के पास था, लेकिन कोई मामला फंसने पर उसे भाजपा के कार्यकर्ता को भेज दिया जा रहा था। तीसरे स्‍तर के सुरक्षा द्वार पर भी भाजपा की कार्यकर्त्री और एक स्‍थानीय नेतानुमा शख्‍स दिल्‍ली पुलिस को निर्देशित कर रहे थे।

यह अजीब था, लेकिन दिलचस्‍प। साढ़े नौ बजे पंडाल में  बज रहे फिल्‍मी गीत ''आरंभ है प्रचंड'' (गुलाल) और ''अब तो हमरी बारी रे'' (चक्रव्‍यूह) अनुराग कश्‍यप व प्रकाश झा ब्रांड बॉलीवुड को उसका अक्‍स दिखा रहे थे। इसके बाद ''महंगाई डायन'' (पीपली लाइव) की बारी आई और भाजपा के सांस्‍कृतिक पिंजड़े में आमिर खान की आत्‍मा तड़पने लगी। जनता हालांकि यह सब सुनने के लिए नदारद थी। सिर्फ मीडिया के जिमी जि़प कैमरे हवा में टंगे घूम रहे थे। अचानक मिठाई और नाश्‍ते के डिब्‍बे बंटने शुरू हुए। कुछ कार्यकर्ता मीडिया वालों का नाम-पता जाने किस काम से नोट कर रहे थे। फिर पौने दस बजे के करीब अचानक एक परिचित चेहरा दर्शक दीर्घा में दिखाई दिया। यह अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण को चैंबर में घुसकर पीटने वाली भगत सिंह क्रांति सेना का सरदार नेता था। उसकी पूरी टीम ने कुछ ही देर में अपना प्रचार कार्य शुरू कर दिया। ''नमो नम:'' लिखी हुई लाल रंग की टोपियां और टीशर्ट बांटे जाने लगे। कुछ ताऊनुमा बूढ़े लोगों को केसरिया पगड़ी बांधी जा रही थी। कुछ लड़के भाजपा का मफलर बांट रहे थे। जनसभा के घोषित समय दस बजे के आसपास पंडाल में भाजपा कार्यकर्ताओं, स्‍वयंसेवकों और मीडिया की चहल-प‍हल बढ़ गई। सारी कुर्सियां और दरी अब भी जनता की बाट जोह रही थीं और टीवी वाले जाने कौन सी जानकारी देने के लिए पीटीसी मारे जा रहे थे।

सवा दस बजे एक पत्रकार  मित्र के माध्‍यम से सूचना आई कि नरेंद्र मोदी 15 मिनट पहले फ्लाइट से दिल्‍ली के लिए चले हैं। यह पारंपरिक आईएसटी (इंडियन स्‍ट्रेचेबल टाइम) के अनुकूल था, लेकिन आम लोगों का अब तक रैली में नहीं पहुंचना कुछ सवाल खड़े कर रहा था। साढ़े दस बजे के आसपास माइक से एक महिला की आवाज़़ निकली। उसने सबका स्‍वागत किया और एक कवि को मंच पर बुलाया। ''भारत माता की जय'' के साथ कवि की बेढंगी कविता शुरू हुई। फिर एक और कवि आया जिसने छंदबद्ध गाना शुरू किया। कराची और लाहौर को भारत में मिला लेने के आह्वान वाली पंक्तियों पर अपने पीछे लाइनें दुहराने की उसकी अपील नाकाम रही क्‍योंकि कार्यकर्ता अपने प्रचार कार्य में लगे थे और दुहराने वाली जनता अब भी नदारद थी।

तस्वीर: अभिषेक श्रीवास्तव

पौने ग्‍यारह बजे की स्थिति यह थी कि आयोजन स्‍थल पर बमुश्किल दस से बारह हज़ार लोग मौजूद  रहे होंगे। एक पुलिस सब-इंस्‍पेक्‍टर ने (नाम लेने की ज़रूरत नहीं) बताया कि कुल सात हज़ार  के आसपास सुरक्षाबल (सरकारी और निजी), 500 के आसपास मीडिया, तीन हज़ार के आसपास कार्यकर्ता और स्‍वयंसेवक व छिटपुट और लोग होंगे। ''लोग नहीं आए अब तक?'', मैंने पूछा। वो मुस्‍कराकर बोला, ''सरजी संडे है। हफ्ते भर नौकरी करने के बाद किसे पड़ी है। टीवी में देख रहे होंगे।'' फिर उसने अपने दो सिपाहियों को चिल्‍लाकर कहा, ''खा ले बिजेंदर, मैं तुम दोनों को भूखे नहीं मरने दूंगा।'' ग्‍यारह बज चुके थे और पंडाल के भीतर तकरीबन सारे मीडिया वाले और पुलिसकर्मी भाजपा के दिए नाश्‍ते के डिब्‍बों को साफ करने में जुटे थे। मंच से कवि की आवाज़ आ रही थी, ''मोदी मोदी मोदी मोदी''। उसने 14 बार मोदी कहा। मंच के नीचे पेडेस्‍टल पंखों और विशाल साउंड सिस्‍टम के दिल दहलाने वाले मिश्रित शोर का शर्मनाक सन्‍नाटा पसरा था और हरी दरी के नीचे की दलदली ज़मीन कुछ और धसक चुकी थी।  

कुछ देर बाद हम निराश होकर निकल लिए। मोदी सवा बारह के आसपास आए और दिल्‍ली में हो रही जोरदार बारिश के बीच एक बजे की लाइव घोषणा यह थी कि रैली में पांच लाख लोग जुट चुके हैं। मोदी ने कहा कि ऐसी रिकॉर्ड रैली आज तक दिल्‍ली में नहीं हुई। इस वक्‍त मोबाइल पर उनका लाइव भाषण देखते हुए हम बिना फंसे रिंग रोड पार कर चुके थे। पंजाबी बाग से रोहिणी के बीच रास्‍ते में गाजि़याबाद से रैली में आती बैनर, पोस्‍टर और झंडा बांधे कुल 13 बसें दिखीं। अधिकतर एक ही टूर और ट्रैवल्‍स की सफेद बसें थीं। निजी वाहनों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। हरेक बस में औसतन 20-25 लोग थे। लाल बत्तियों पर लगी कतार को छोड़ दें तो पूरी रिंग रोड (जो हरियाणा को दिल्‍ली से जोड़ती है), रोहिणी से धौला कुआं वाली रोड (गुड़गांव वाली), कुतुब से बदरपुर की ओर जाती सड़क (जो फरीदाबाद को दिल्‍ली से जोड़ती है) और बाद में उत्‍तर प्रदेश से दिल्‍ली को जोड़ने वाली आउटर रिंग रोड खाली पड़ी हुई थी। और यह दिल्‍ली की बारिश में था जबकि जाम एक सामान्‍य दृश्‍य होता है।

रैली में आखिर लाखों लोग आए कहां से? क्‍या सिर्फ 26 मेट्रो से? बसों और निजी वाहनों से तो जाम लग जाता, जबकि ग़ाजि़याबाद से रोहिणी और वहां से वापस रिंग रोड, आउटर रिंग रोड व भीतर की पंजाबी बाग वाली रोड को कुल 125 किलोमीटर हमने पूरा नापा। ग़ाजि़याबाद का जि़क्र इसलिए विशेष तौर पर किया जाना चाहिए क्‍योंकि राजनाथ सिंह यहां से सांसद हैं और पिछले दो दिनों से बड़े पैमाने पर यहां रैली की तैयारियां चल रही थीं। इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मोदी की जनसभा में जितने भी नेताओं के कटआउट आए थे, सब ग़ाजि़याबाद से आए थे जिन्‍हें एक ही कंपनी ''आज़ाद ऐड'' ने बनाया था। सवेरे साढ़े आठ बजे तक ये कटआउट यहां ट्रकों में भरकर पहुंच चुके थे, हालांकि ग़ाजि़याबाद से श्रोता नहीं आए थे। वापस पहुंचने पर इंदिरापुरम, ग़ाजि़याबाद के स्‍थानीय भाजपा कार्यकर्ता टीवी पर मोदी का रिपीट भाषण सुनते मिले।

तस्वीर: अभिषेक श्रीवास्तव

बहरहाल, मोदी जब बोल चुके थे तो भाजपा कार्यालय के एक प्रतिनिधि ने फोन पर बताया  कि रैली में आने वालों  की कुल संख्‍या 50,000 के आसपास  थी। अगर हम इसे भी एकबारगी  सही मान लें, तो याद होगा कि इतने ही लोगों की रैली पिछले साल फरवरी में  दिल्‍ली में कुछ मजदूर  संगठनों ने की थी और समूचा  मीडिया यातायात व्‍यवस्‍था और जनजीवन अस्‍तव्‍यस्‍त  हो जाने की त्राहि-त्राहि मचाए हुए था। अजीब बात है कि बिना हेलमेट पहने और लाइसेंस के बतौर भारत का झंडा उठाए दर्जनों बाइकधारी नौजवानों के आज सड़क पर होने के बावजूद कुछ भी अस्‍तव्‍यस्‍त नहीं हुआ, लाखों लोग रोहिणी जैसी सुदूर जगह पर आ भी गए और चुपचाप चले भी गए। यह नरेंद्रभाई मोदी की रैली में ही हो सकता है। उत्‍तराखंड की बाढ़ में फंसे गुजरातियों को जिस तरह उन्‍होंने एक झटके में वहां से निकाल लिया था, हो सकता है कि ऐसा ही कोई जादू चलाकर उन्‍होंने दिल्‍ली की विकास रैली में लाखों लोगों को पैदा कर दिया हो। ऐसे चमत्‍कार आंखों से दिखते कहां हैं, बस हो जाते हैं।

ऐसे चमत्‍कारों का हालांकि खतरा बहुत होता है। उत्‍तराखंड वाले चमत्‍कार में ऐपको नाम की जनसंपर्क एजेंसी का भंडाफोड़ हो चुका है। दिल्‍ली में किस एजेंसी को भाजपा  ने यह रैली आयोजित करने के लिए  नियुक्‍त किया, यह नहीं पता। देर-सवेर पता चल ही जाएगा। मेरी चिंता हालांकि यह बिल्‍कुल नहीं है। मैं इस बात से चिंतित हूं कि मोदी जैसा कद्दावर शख्‍स दिल्‍ली में बोल गया और दिल्‍लीवाले नहीं आए। वजह क्‍या है? कहीं तुग़लक जैसी कोई समस्‍या तो इसके पीछे नहीं छुपी है? मोदी दिल्‍लीवालों को न समझें न सही, क्‍या विजय गोयल आदि आयोजकों से भी कोई चूक हो गई? ठीक है, कि टीवी चैनलों के हवा में लटकते पचास फुटा कैमरों ने टीवी देख रहे लोगों को काम भर का भरमाया होगा, जैसा कि उसने अन्‍ना हज़ारे की गिरफ्तारी के समय किया था। अन्‍ना से याद आया- वह भी तो रोहिणी जेल का ही मामला था जहां दो-चार हज़ार लोगों को कैमरों ने एकाध लाख में बदल दिया था। इत्‍तेफाक कहें या बदकिस्‍मती, कि रोहिणी में ही इतिहास ने खुद को दुहराया है। मोदी चाहें तो किसी ज्‍योतिषी से रोहिणी पर शौक़ से शोध करवा सकते हैं। वैसे रोहिणी तो एक बहाना है, असल मामला दिल्‍ली के मिजाज़ का है जिसे भाजपा (प्रवृत्ति और विचार के स्‍तर पर इसे अन्‍ना आंदोलन भी पढ़ सकते हैं) समझ नहीं सकी है।

भाजपा और संघ के पैरोकार वरिष्‍ठ पत्रकार वेदप्रताप  वैदिक ने आज तक एक ही बात ऐसी लिखी है जो याद रखने योग्‍य है। उन्‍होंने कभी लिखा था कि इस देश का दक्षिणपंथ जनता की चेतना से बहुत पीछे की भाषा बोलता है और इस देश का वामपंथ जनता की चेतना से बहुत आगे की भाषा बोलता है। इसीलिए इस देश में दोनों नाकाम हैं। कहीं मोदी समेत भाजपा की दिक्‍कत यही तो नहीं? कहीं वे भी तो शायर मीर की तरह ''लगाने'' और ''बनाने'' का फर्क नहीं समझते? मुझे वास्‍तव में लगने लगा है कि किसी को जाकर नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को यह बात गंभीरता से समझानी चाहिए कि 29 सितंबर, 2013 को दिल्‍ली के जापानी पार्क में उनकी ''बनी'' नहीं, ''लग'' गई है। ग़ालिब तो शेर कह के निकल लिए, इस ''भारत मां के

अभिषेक श्रीवास्तव
अभिषेक श्रीवास्तव
शेर'' का संकट उनसे कहीं बड़ा है। दिल्‍लीवालों ने आज संडे को टीवी देखकर मोदी और भाजपा की आबरू का सरे दिल्‍ली में जनाज़ा ही निकाल दिया है।

लेखक अभिषेक श्रीवास्तव प्रतिभाशाली और तेजतर्रार पत्रकार हैं. वे वैकल्पिक पत्रकारिता और सरोकारी पत्रकारिता को लेकर हमेशा सजग और सक्रिय रहते हैं. उनसे संपर्क 08800114126 या guru.abhishek@gmail.com के जरिए कर सकते हैं.


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एनडीटीवी की आलोचना करने वाली इस पोस्ट को द हूट चलाने वाली सैवंती नैनन ने छापने से मना कर दिया

Modi’s statement against Indian media objectionable : BEA

New Delhi, 29.09.2013 : The Broadcast Editors' Association finds Gujarat Chief Minister Mr. Narendra Modi's statement against Indian media at a public rally in New Delhi today as objectionable. The BEA believes that such statement aims at demeaning Indian media, which is a key institution of democracy.

The Broadcast Editors' Association is disturbed at the attempt to project Indian media team visiting the UN in a poor light. Mr. Narendra Modi's statement has been made without knowing the full facts of the matter and without realizing the dignified role media is expected to play at international fora. The BEA would like to assure all that Indian media understands its responsibility and also it's code of conduct.

NK Singh
General Secretary

Shazi Zaman
President

Press Note


मूल खबर:

देखो पत्रकारों, ये नमो तुम्हें गद्दार बताकर चला गया!

जी टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम ‘फियर फाइल्स’ को बंद कराने के लिए पत्र

सेवा में, श्रीमान अध्यक्ष महोदय जी, I.B.F. Delhi, विषय:- जी टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम 'फियर फाईल्स' (डर की सच्ची तस्वीरें) के प्रसारण पर रोक हेतु प्राथना पत्र… श्री मान जी, निवेदन यह है कि जी टीवी पर शनिवार व रविवार को समय 22:30 – 23:30 बजे एक कार्यक्रम प्रसारित होता है जिसका नाम फियर फाईल्स (डर की सच्ची तस्वीरें) है. इसमें झूठी डरावनी कहानियां दिखाई जाती हैं जिसके कारण दर्शकों में अंधविश्वास बढ़ता है और आज के विज्ञान युग में ऐसे कार्यक्रमों को देखकर पढ़े-लिखे नौजवानों, बच्चों व बूढों में अंधविश्वास बढ़ता है और ढोंगी बाबा, तांत्रिकों को बढ़ावा मिलता है और वो दर्शकों को भूत, प्रेत, जिन, डायन, चुड़ैल आदि का डर दिखा कर आम जनता से मन चाहे रुपये वसूलते हैं.

ऐसी घटनाये रोज समाचार पत्रों में पढने को मिलती है कि किसी तांत्रिक ने किसी महिला की इज्जत लूट ली, गहने ठग लिए, रुपये ऐंठ लिए या किसी तांत्रिक के कहने पर किसी महिला ने बच्चे की चाहत में किसी बच्चे का कत्ल कर दिया. आज के वैज्ञानिक युग में यह कार्यक्रम दर्शकों के आगे डर फैलाता है जिससे आम जनता ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों के चक्कर में फंसकर अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई इन ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों पे लुटा देती है. पढ़े-लिखे दर्शक अपना प्रेम पाने के लिए प्रेम विवाह करने के लिए वकीलों के बजाये तांत्रिकों के चक्कर काटते हैं.

इस कार्यक्रम के कारण दर्शकों का ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों पर विश्वास बढ़ता जा रहा है. ये ढोंगी बाबा और तांत्रिक लोगों को नौकरी पाने, विदेश जाने, सौतन से छुटकारा, पढाई में कमजोर, बाँझपन, पति-पत्नी में अनबन आदि कारण से लूटते हैं. इसी कारण से हर शहर में ऐसे ढोंगी बाबाओं, तांत्रिकों का ताँता लगा हुआ है और ऐसे ढोंगी बाबा और तांत्रिको को जी टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम फियर फाईल्स (डर की सच्ची तस्वीरें) के प्रसारण के कारण बढ़ावा मिलता है. इस कारण से इस कार्यक्रम का प्रसारण दर्शकों के हित को देखते हुए तुरंत बंद किया जाये. आप की अति कृपा  होगी. मैं आपका जीवन भर आभारी रहूँगा.

प्रार्थी

मयंक जोगी

192/7 दया नगर कलोनी तरावडी
जिला करनाल (हरियाणा )
संपर्क सूत्र :-+91-829-555-666-0
EMAIL:-myankjogi@gmail.com

From: Myank Jogi (myankjogi@gmail.com)

To: ibf@ibfindia.com

Date: Sun, 29 Sep 2013 00:39:44 +0530

नईदुनिया बनाम नईदुनिया

एक संस्थान था जिसका ​नाम नईदुनिया था। वहां काम करने वाले उसे जन्नत मानते थे और उसके बाहर तो मानो उनके लिए कुछ था ही नहीं। हालांकि दूसरे संस्थानों की तरह वहां भी सेटिंग, अपनों को उपकृत करना और कामचोरों का अस्तित्व था। रोमांटिक किस्म के किस्से कहानियां भी थीं वहां। काम चलाउ अफेयर से परा-वैवाहिक संबंध तक यहां पाए जाते थे। वक्त ने करवट बदली और नईदुनिया में सबकुछ बदल गया। कई लोगों ने आनन फानन में अपनी निष्ठाएं बदल डालीं। कई मक्कारों ने किसी न किसी ऐसी गाय की पूछ पकड ली जो श्रवण रूपी वैतरणी पार करा दे। किसी ने व्यास को सांटा तो किसी ने मिश्र को मक्कखन लगाया। कुछ तो सीधे श्रवण तक पहुंच गए।

आज भी यहां के संपादकीय विभाग में कई ऐसे लोग हैं जो आफिस आते हैं, चाय नाश्ता करते हैं गपशप करते हैं। कानाफूसी करते हैं और घर चले जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपनी सीट पर बैठे हुए काम दिखाने के लिए घर से किताबें ले आते हैं और आठ घंटे का समय काट कर चले जाते हैं। किसी के पास काम नहीं है तो किसी को काम की वजह से सांस लेने की फुरसत नहीं है। अधिकांश पुराने लोग यही कहते हुए पाए जाते हैं कि पहले तो ऐसा नहीं होता था वैसा नहीं होता था। तो कुछ ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों के काम में पैर फंसाकर यह दिखाते हैं कि वो बहुत ज्यादा काम करते है।

कई मामलों में यह कहा जा सकता है कि नईदुनिया बिकने के पहले के चार पांच सालों में काफी इतना कचरा भर लिया था। उसकी छंटनी अब मुश्किल पड़ रही है। यही हालात अब भी हैं। नए लोगों को लाने के नाम पर श्रवण ने चावल और कंकर दोनों ही भर लिए हैं। जो कहीं नहीं चले उनको नईदुनिया ले आया गया। खासकर भास्कर और पत्रिका से लाए गए लोग। माहौल ऐसा हो चुका है कि गधे और घोड़े साथ में दौड़ रहे हैं। यही वजह है कि पुराने लोग तो अब भी अपनी रोटियां सेक रहे हैं लेकिन कई नए लोग वापस जा चुके हें और कई और जाने की तैयारी में बैठे हैं। (कानाफूसी)

भदोही के पत्रकार सुरेश के उत्पीड़न मामले में डीएम-एसपी और कोतवाल को कोर्ट ने कि‍या तलब

भदोही । पुलि‍सि‍या उत्‍पीड़न से त्रस्‍त जनसंदेश टाइम्‍स के पत्रकार अपने हक की लडायी लडने में लगे हुए हैं। इ‍समें उनको सफलता भी मि‍ल रही है। कुछ माह पहले ही पत्रकार सुरेश गांधी के उपर गुण्‍डा एक्‍ट के तहत कर्रवाई कर जि‍ला बदर घोषि‍त कर दि‍या गया था। इ‍सके बाद कोर्ट ने सुरेश गांधी के जि‍ला बदर पर रोक लगा दी।

रोक लगने पर जब सुरेश गांधी भदोही पहुंचे तो पुलि‍स ने उन्‍हें हि‍रासत में ले लि‍या और सरेराह बेइज्‍जत करते हुए थाने ले गयी, वहां उनके साथ बुरा बर्ताव भी कि‍ए जाने की बात सामने आयी और फि‍र आपराधि‍क धाराएं लगा दी गयी। इ‍से लेकर सुरेश जायसवाल उर्फ सुरेश गांधी द्वारा न्‍यायालय में मानवाधि‍कार के हनन व उत्पीड़न को लेकर याचि‍का दायर की गई। याचि‍का पर सुनवायी करते हुए हाईकोर्ट ने डीएम-एसपी और कोतवाल को तलब कि‍या है।

पत्रकार सुरेश गांधी की याचिका पर उच्च न्यायालय इलाहाबाद की डबल बेंच के न्यायमूर्ति वी0के0 शुक्ला एवं राकेश श्रीवास्तव ने प्रमुख गृह सचिव सहित जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक एवं थाना प्रभारी भदोही संत रविदास नगर भदोही को तलब किया है। इसके अलावा पत्रकार पर हो रही सभी उत्पीड़नात्मक कार्यवाही पर रोक, उच्च स्तरीय जांच एवं उनके कमरे का ताला तोड़कर लाखों की लूट आदि मामले में मुआवजे की मांग की गयी थी। इसमें माननीय उच्च न्यायालय ने याचिका को संज्ञान में लेकर एक माह के भीतर प्रशासनिक अफसरों से रिपोर्ट देने को कहा है।

अभियोजन पक्ष के सीनियर अधिवक्ता के0के0 राय व शम्स विकास ने बताया कि पत्रकार सुरेश गांधी की ओर से याचिका दायर की गई थी, जिसमें जिला प्रशासन एवं पुलिस प्रशासन की उत्पीड़नात्मक कार्यवाईयों की बात कही गयी थी। याचिका में कहा गया है कि पुलिस एवं जिला प्रशासन  ने फर्जी तरीके से उन तीन मामलो को आधार बनाकर गुण्डा एक्ट एवं जिला बदर की कार्यवाही की, जो न्यायालय से दोषमुक्त है या पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगायी है। कार्यवाही के दौरान ही जब गांधी जिले से बाहर थे उसी समय पुलिस ने मकान मालिक की फर्जी रिपोर्ट दर्ज की बल्कि उनके कमरे का ताला तुड़वाकर 25 लाख से भी अधिक का घरेलू सामान लुटवा दिया। इसके अलावा मकान मालिक द्वारा दर्ज करायी गयी फर्जी रिपोर्ट व जिला बदर की कार्यवाही का माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश दिये जाने के बावजूद भी गांधी को पकड़कर पुलिस ने न सिर्फ मारापीट बल्कि एक और फर्जी मुकदमा दर्ज कर दी। पुलिस एवं प्रशासन की उत्पीडनात्मक कार्यवाही से न सिर्फ वे बेघर हो चुके है बल्कि बच्चों की पढ़ाई लिखाई बांधित होने के साथ ही वह अपनी पत्रकारिता भी सूचारू रूप से नहीं कर पा रहे है।
 

जागरण का ‘गुरुकुल’ के साथ वफादारी निभाना जारी

बिहार के समस्तीपुर जिले में तीसरे पायदान पर जा पहुंचे ‘दैनिक जागरण’ एवं शैक्षिक संस्थान ‘गुरुकुल’ के रहस्यमय संबंध की विस्तृत जानकारी भड़ास के माध्यम से जागरण प्रबंधन सहित देश एवं दुनिया को दी गई. भड़ास पर ‘दैनिक जागरण विज्ञापन और पैसे के लिए ऐसे करता है किसी संस्थान को ब्लैकमेल’ शीर्षक से खबर प्रसारित होने के बाद से जागरण का मुजफ्फरपुर यूनिट एवं समस्तीपुर कार्यालय हतप्रभ रह गया. उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि आम पाठक इतनी बारीकी से उनकी हरकतों को वाच करते होंगे. उस रिपोर्ट में प्रकाशित सभी बातें जागरण के लिए ‘कड़वा सच’ के समान था.

भड़ास पर खबर आने के दो-तीन दिनों तक जागरण ने खुद को संयमित रखा लेकिन बिहार में एक देहाती कहावत है ‘मुंह खाता है तो आंख लजाता है’। इसी फर्मूले पर चलते हुए जागरण ग्रुप ने शर्म-हया को ताक पर रखकर फिर से जिले के पूर्णतः वातानुकुलित शिक्षण संस्थान ‘गुरूकुल’ की गतिविधियों को समाचार के रूप में प्रकाशन कर ‘गुरूकुल’ के साथ वफादारी निभाना प्रारंभ कर दिया है। गुरूकुल अपने संस्थान के पूर्णतः वातानूकुलित होने का प्रचार-प्रसार इस तरह करता है जैसे वह विद्या का मंदिर न होकर रेस्ट हाउस या आवासीय होटल हो। यहां जागरण ग्रुप को बता देना चाहूंगा कि वे समस्तीपुर के पाठकों को मूर्ख नहीं समझें। इस जिले के पाठक काफी जागरूक एवं सजग हैं। उन्हें अब पेड न्यूज का मतलब खूब समझ में आता है। ऐसी क्या मजबूरी है कि एक धनबली के शिक्षण संस्थान की गतिविधियों को समाचार के रूप में प्रकाशित करके पाठकों को गुमराह किया जा रहा है। अखबार तो और भी हैं लेकिन वे जागरण की तरह अपने मान-मर्यादा को नहीं बेच रहे हैं।

दैनिक जागरण ने गुरूकुल के सहयोगी संस्थान की तस्वीर के साथ प्रकाशित समाचार में पर्यावरण जागरूकता के बहाने गुरूकुल को सुर्खियों में लाया है। यहां जागरण ग्रुप के दिमाग की दाद भी देना चाहूंगा कि अपने बचाव में उन्होंने आज गुरूकुल के समाचार के उपर में जिला मुख्यालय के एक अन्य शिक्षण संस्थान की शैक्षणिक गतिविधि को भी समाचार के रूप में प्रकाशित कर यह दिखाने की कोशिश की है कि वे सिर्फ गुरूकुल के प्रचारक नहीं हैं। लेकिन उनकी यह चालाकी प्रबुद्ध पाठकों से छुप नहीं सकी और लोग दोनों शिक्षण संस्थानों से संबंधित समाचार को बेहिचक ‘पेड न्यूज’ करार दे रहे हैं।

समस्तीपुर से विकास कुमार की रिपोर्ट.

पाकिस्तान में खुलेगा दाउद का न्यूज चैनल

पाकिस्तान में दहशत की जड़ें अब मीडिया को भी निगलने पर आमादा हैं। खबर है कि डी-कंपनी और आईएसआई अब मिलकर वहां न्यूज़ चैनल खोलने की तैयारी कर रहे हैं। दाऊद ने अपने खज़ाने इस चैनल के लिए खोल दिए हैं। इसमें काम करने वाले पाकिस्तानी पत्रकारों को महंगी गाड़ियां और सैलेरी ऑफर की जा रही है।

सूत्रों की मानें तो दाऊद का गुर्गा छोटा शकील खुद कुछ आला पत्रकारों से इस सिलसिले में मिला है। चैनल का इरादा पाकिस्तान के पॉपुलर चैनल जिओ टीवी की जगह लेने का है। यहां तक कि जिओ टीवी के हेड को करीब एक करोड़ की सैलेरी पर रखा गया है। चैनल का नाम बोल टीवी होगा और इसके दिसंबर तक लॉन्च होने की उम्मीद है। कहा जा रहा है कि आईएसआई पाकिस्तानी मीडिया में मुखर हो रहे उदारवादी सुरों से परेशान है और मीडिया में अपने एजेंडे को फैलाना चाहती है।

‘हिन्दुस्तान’ अखबार ने पप्पू की चमचागिरी में पत्रकारिता की अर्थी निकाल दी है

आपने 'हिन्दुस्तान' अखबार पढ़ा कि नहीं? हिन्दुस्तान अखबार ने पप्पू की चमचागिरी में पत्रकारिता की अर्थी निकाल दी है। राहुल गांधी द्वारा सांसदों-विधायकों को संरक्षण देने वाले अध्यादेश के खिलाफ व्यक्त किये गये बयानों पर हिन्दुस्तान अखबार ने कल एक पेज विशेष तौर पर दिया है और संपादकीय भी लिखा है जिसमें राहुल गांधी की चमचागिरी की हद हुई है। इसके पूर्व कई विपक्षी नेता अध्यादेश के खिलाफ बोले पर हिन्दुस्तान ने न तो विशेष संपादकीय लिखा और न ही कोई विशेष पेज निकाला।

हिन्दुस्तान अखबार की मालकिन शोभना भरतिया कांग्रेस से सांसद हैं। उसके वैध-अवैध कारोबार का सोशल आडिट होना चाहिए। शोभना भरतिया बिड़ला परिवार की सदस्य हैं। बिड़ला परिवार की कई औद्योगिक इंकाइयां हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं जहां पर कई प्रकार के शोषण होते हैं। सरकारी टैक्स की चोरी होती है। कांग्रेस बिड़ला परिवार पर हमेशा मेहरबान होती है।

मेरा मानना है कि राहुल गांधी के चमचागिरी के खिलाफ विपक्षी नेताओं को हिन्दुस्तान अखबार और हिन्दुस्तान अखबार की मालिक शोभना भरतिया और संपादक शशि शेखर चतुर्वेंदी के खिलाफ नोटिस लेना चाहिए और बिड़ला परिवार की औद्योगिक ईकाइयों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाने और सरकारी राजस्व के नुकसान पहुंचाने, पर्यावरण के विध्वंस के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। तभी हिन्दुस्तान अखबार का राहुल गांधी की चमचागिरी बंद होगी, पत्रकारिता की मूल्यों की रक्षा हो सकती है। आप भी हिन्दुस्तान की मालकिन शोभना भरतीया और संपादक शशि शेखर चतुर्वेदी को फोन कर पत्रकारिता और निष्पक्षता का पाठ पढा सकते हैं।

लेखक विष्णु गुप्त दक्षिणपंथी विचारधारा के स्तंभकार और टिप्पणीकार हैं.

दीपक चौरसिया ने एक बड़ा काम कर दिया है…. क्या और कैसे? इसे पढ़ें

Yashwant Singh : दीपक चौरसिया ने एक बड़ा काम कर दिया है. शायद इस काम का अंदाजा उन्हें भी न होगा. कितना बड़ा काम किया है, यह बताने से पहले एक कहानी बताना चाहूंगा. एक बार इंडिया टीवी में कार्यरत एक बंदे ने जी न्यूज में तत्कालीन संपादक रहे सतीश के. सिंह को एसएमएस किया. यह एसएमएस नौकरी मांगने के लिए एक मुलाकात करने के लिए था, मुलाकात के लिए टाइम मांगने के लिए था. कहा जाता है कि सतीश के. सिंह ने उस एसएमएस को विनोद कापड़ी को फारवर्ड कर दिया, उस विनोद कापड़ी को जो तब और अब भी इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर हुआ करते हैं. कापड़ी ने उस बंदे का अपने यहां क्या हश्र किया होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है.

अजीत अंजुम जो न्यूज24 में लंबे समय से मैनेजिंग एडिटर हैं, एक जमाने में कहा करते थे कि उनकी मर्जी के बिना हिंदी न्यूज चैनल इंडस्ट्री में पत्ता भी नहीं खड़क सकता. उनका सारा जोर अपने अधीनस्थों को यह बताने डराने में होता रहा है कि अगर तुम यहां से लड़ भिड़ छोड़ छाड़ के कहीं गए तो वहां भी नौकरी नहीं मिलेगी जहां तुम जाने के इरादे कर रहे हो क्योंकि वहां जो हैं, वो सब उनके अपने हैं.

मतलब ये कि हिंदी न्यूज चैनल इंडस्ट्री में एक बड़ा काकस काम करता रहा है और कर रहा है. इसमें गाहे बगाहे आशुतोष वगैरह भी शामिल होते हैं या शामिल हैं, क्योंकि कोई दूसरे तगड़े चैनल का मैनेजिंग एडिटर अगर आशुतोष से कहेगा कि इस बंदे को अपने यहां नहीं रखना है तो वो नहीं रखेंगे, क्योंकि एक तो उनको मैनेजिंग एडिटर का मान रखना है और दूसरे उन्हें यह पता है कि इस इंडस्ट्री में एक बेरोजगार को भगाओ तो तीस नए मिलेंगे, रिरियाते हुए नौकरी मांगने के लिए.

एक तरह से सोच के स्तर पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व रहा है हिंदी न्यूज चैनल इंडस्ट्री में कुछ लोगों का. और, इस काकस, एका के कारण ढेर सारे होनहार पत्रकार जो रीढ़ सीधी रखते हैं और इस काकस की चेलहाई स्वीकारने से इनकार करते हैं, अपना काम अदभुत तरीके से करते हुए किसी की भी राजनीति का हिस्सा नहीं बनते हैं, उन्हें असमय हिंदी टीवी की पत्रकारिता के परिदृश्य से नेपथ्य में जाना पड़ा और पड़ता है.

मुझे खुद भी याद है जब मेरा शुरुआती विवाद हुआ नौकरी मांगने के निमित्त एक फोन कर देने भर से, विनोद कापड़ी से, भड़ास ब्लाग के दौरान और भड़ास4मीडिया के बनने से पहले, तब जब मैं जागरण में था, और इस विवाद के बाद दैनिक जागरण से बाहर पटक दिया गया, तो अजीत अंजुम ने कहा था अपने आफिस के लोगों से कि इस यशवंत को जिस किसी ने भी, खासकर मेरे आफिस के किसी बंदे ने, इंटरटेन किया तो उसका हाल बहुत बुरा होगा, देखता हूं ये यशवंत नामक प्राणी विनोद कापड़ी से पंगा लेकर कैसे टिक पाता है इस इंडस्ट्री में, कैसे टिक पाता है इस दिल्ली में. मुझे ये बात कई लोगों ने बताई और ये अनुरोध भी किया कि कृपया उनका नाम भड़ास ब्लाग पर न दें.

तब से लेकर आजतक मैं इंतजार करता रहा उस शख्स का जो आए और इस काकस, इस नेक्सस, इस गठजोड़ को आइना दिखा दे, तोड़ डाले… और वो काम किया है दीपक चौरसिया ने. अब बताना चाहूंगा कि दीपक ने कितना बड़ा काम किया है. दीपक ने ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाले हिंदी टीवी इंडस्ट्री में टीआरपी का परचम फहराकर यह साबित किया है कि टीआरपी की बुद्धि और काबिलियत किन्हीं उन ब्राह्मणवादी मानसिकता और घटिया सोच वाले पत्रकारों में ही नहीं होती, उनमें भी होती है, जो उनके बगैर जीते और आगे बढ़ते हैं.

हो सकता है दीपक चौरसिया को लेकर कुछ एक के मन में कोई आग्रह या पूर्वाग्रह हो और मेरे मन में भी कुछ सवाल हों, पर फौरी, तात्कालिक तौर पर यह कह सकता हूं कि हिंदी टीवी न्यूज इंडस्ट्री अब एक नए दौर में जाने को तत्पर है जहां उन लोगों को भी काम मिलेगा और काम छोड़ कर नया काम खोजने की आजादी मिलेगी, जो किसी की चेलहाई नहीं करते और अपने काम से काम रखते हैं, साथ ही अपना काम ब्रिलियेंट तरीके से करते हैं.

फिलहाल आज की शाम दीपक चौरसिया के नाम…

मेरी निजी आकांक्षा है कि दीपक चौरसिया के नेतृत्व में इंडिया न्यूज चैनल न सिर्फ इंडिया टीवी को खा जाए बल्कि एबीपी न्यूज को भी खा जाए जहां से दीपक खुद निकले हैं और जिनको ये बताना है, साबित करना है कि उनका जाना, उनका इस्तीफा देना बिलकुल सही था और दुनिया में वही जीतता, राज करता है जो बड़ा रिस्क लेता है.

जय हो.

Aamir Kirmani मेरी शुभकामनाये और आपके संघर्ष को भी सलाम Yashwant Singh भाई
 
शशांक शेखर ये मस्त बात हुई..
 
Deepak Awasthi बिल्कुल सच कहा आपने
 
Vijay Yadav भाई , वाकई आपकी इसी बेवाकी के लोग कायल है. ग्रुपिंग का शिकार मै भी हु। फ़िलहाल आपके इस लेख को मेरा लाख-लाख सलाम ………..
 
Vikash Upreti Great…
 
Jai Prakash Mahish Deepak chaurashiya namhi kafi hai…
 
Shailendra Kumar Nimbalkar 100% true my blessings
 
पंकज कुमार हो सकता है आपकी सभी बातें सच हों, भगवान करे दीपक जी के नेतृत्व में इंडिया न्यूज को बहुत आगे जाये, लेकिन इस चैनल को खा जाये उस चैनल को खा जाये …. ये तो गलत बात है।
 
Ashish Mishra Yaa khuda bade pench hai is field me bhi
 
Yashwant Singh पंकज कुमार जी. बात खाने की टीआरपी में है, न कि भकोसने में, जैसे हनुमान सूर्य को भकोस गए थे.. ऐसा कहा जाता है… पर मैं वैसा नहीं चाहता… यहां डेमोक्रेसी है, सबका सम्मान और मान रहना चाहिए, सभी सरवाइव करें, ये मेरा निजी मत और दुआ है सबके लिए.
 
Adarsh Tripathi sahi h
 
Manish Mansi कम से कम लोग Deepak chaurasia से कुछ तो सीखेंगे .वरना पत्ते चाटी से कुछ नहीं मिलने वाला
 
महेश जायसवाल 'जोगी' Yashwant Singhआप चाहे जि‍तना लम्‍बा चौडा लेख लि‍ख दें पर मै तो आपको ही मीडि‍या का महारथी मानता हूं…आपसे हमेशा कुछ न कुछ सीखने को मि‍लता है ।
 
Jitendra Kishore bilkul theek kaha yashwant ji aapne.
 
Syed Mohammad Altamash Jalal aaj ki debate mein ghazab dhya hai deepak ji ne
 
पंकज कुमार आपकी बात से पूर्ण सहमत हूं, स्वच्छ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।
 
Arvind Srivastava bilkul sahi bhai unique personality to hai deepak chaurasiya ji
 
Kunaal Jaiszwal Bhaiya aapki baat se sahmat hoon aur aapki tarif bhi karta hoon lekin aise logo ki kahani unki facebook wall se aap apne sansthan me kyu likhte hai jo is layak nahi hain
 
Manish Sharma दीपक जी ज्यादा योगदाण राणा यशवंत जी का है…!!
 
Devanand Yadav जी यशबन्त जी आपका मत बिल्कुल सही है जो जितना बड़ा रिस्क लेगा , वो उतना ही आगे बढ़ता है .. यही दिपक चौरसिया जी ने सिद्ध करके दिखा दिया है .. आज इंडिया न्यूज परचम लहरा रहा है किसकी बदौलत .. सिर्फ और सिर्फ दीपक और उसकी कड़ी मेहनत के कारण ही …आज की शाम दीपक चौरसियां और यशवन्त जी के नाम …
 
Raju Das Manikpuri Aap is baat se sahamat hu aakhir hunar bhi koi chig hai hum bhi sataye hua hai kya nahi kiya hamne trp ke chakar me mila kya anda/prata.
 
Prem Chand Gandhi दीपक चौरसिया भी अंतत: ब्राह्मणवादी ही है यशवंत जी… इस व्‍यवस्‍था में ये सब यही बने रहने की प्रक्रिया में संलग्‍न हैं…
 
Shyamji Mishra बड़े भाई लोग ब्राह्मणवादी की बात कुछ हद तक सही हो सकती है .पर ज्यादा तर सीनियर पञकारों और संपादकों को अपनी पञकारिता पर ज्यादा घमंड रहता है .और जूनियर पञकारों को ज्यादा अहमियत नहीं देते है .क्यों कि जूनियर पञकार मेहनती और कर्तब्यनिषठ होता है .इस लिए संपादकों को ये डर बना रहता है कि कहीं मेरी कुर्सी ना चली जाय.और रही ब्राह्मणवादी वाली बात तो जैसे एक कुत्ता दूसरे कुत्ते को देखकर गुर्राता है वैसे ही एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण का भला नही चाहता !
 
Sanjaya Kumar Singh शुरुआत और उदाहरण से लगा कि दीपक ने चौकड़ी (कॉकस कहना सही रहेगा, चौकड़ी में तो चार ही होंगे) के किसी तोप सदस्य के घनघोर विरोधी को नौकरी दे दी है। पहली नजर में तो मुझे लगा आपको सलाहकार तो नहीं बना लिया। पर बाद में ऐसा कुछ नहीं मिला। चैनल की सफलता टीम वर्क है। टीम अच्छी होगी तो चैनल कामयाब रहेगा। टीम में पहले ही छांटकर बिना रीढ़ वालों को (कई बार रीढ़ सीधी रखने वाले की भी गुंजाइश नहीं होती) रखा जाएगा तो ऐसे ही चलता रहेगा। दीपक का चैनल अच्छा चल रहा है तो दीपक को बधाइयां, उनकी टीम को भी। लाला को भी जो उनको काम करने दे रहा है। हालांकि चुनाव का समय है लाला को भी साख बनानी है। फिर भी देखते रहिए। फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त।
 
Yashwant Singh प्रेमचंद भाई… एक बात आपसे कहना चाहूंगा. दीपक चौरसिया की तारीफ तबके सभी संपादक मुंह पर करते रहे हैं, पर पीठ पीछे किसी ने नहीं चाहा कि ये आदमी बड़ा बने.. इसका एहसास दीपक को भी होगा.. हालांकि दीपक के पास वक्त नहीं इन चीजों पर लिखने बोलने कहने के लिए… लेकिन मैं मीडिया के गहरे से जुड़ा हुआ हूं, सो, जानता हूं कि दीपक चौरसिया के प्रति संपादकों का वही रवैया रहा है जो एक जमाने में यादवों के लिए होता था, कि अहीर हो तो गाना बिरहा गाओ.. कहां चले आए इस पेशे में…. ये बड़ा कटु सत्य है … दीपक ने अपने दम पर, भले वह बुरा या सही हो, खुद की सीढ़ी बनाई है.. बाकी, बाजार व टीआरपी का पूरा सिस्टम जनता से दूर का है, ये आप भी जानते हैं और मैं भी. लेकिन कई बार कुछ लोगों को प्रमोट करना, सपोर्ट करना पड़ता है ताकि ज्यादा जटिल, दुष्कर, तानाशाह, घमंडी टाइप लोगों का साम्राज्य चूर किया जा सके…
 
Pratik Sharma I liked…main bhi ye batana chaunga verma ji ki main bhi dipak ki ka bahut bada fan ..hu..bahut hi achhe vyaktitv k …insan hai dipak…chaurasiya ji..
 
Yashwant Singh श्यामजी मिश्रा, मैं ब्राह्मणवादी विचारधारा की बात कर रहा हूं, बाभनों की नहीं…
 
Atul Katyayan Misra sir ek saal se iis industry me job talaash rha hu par ab dil aur dimag kahne laga hai koi dusri line pakad le beta
 
Pratik Sharma Sorry dipak ji ka…
 
Atul Katyayan Misra kya karu apki rai chahuga
 
Yashwant Singh अतुल मिश्रा जी, जल्द से जल्द दूसरी फील्ड में जाब तलाशिए… वहां आर्थिक रूप से खड़े होइए और शौकिया पत्रकारिता करिए…. बाकी, अगर आपमें कई किस्म की काबिलियत है यानि आपकी कापी शुद्ध होती है, ग्रामर सही है, सहजता और तेजी है तो आपको मौका मिल सकता है..
 
Sanjaya Kumar Singh लेकिन नौकरी की पूरी उम्र पत्रकारिता में काटना मुश्किल है। कमाने की कोई व्यवस्था हो तो पेशा मजेदार है।
 
Yashwant Singh संजय भइया, दो बातें. एक तो दीपक इस चैनल में मालिक बनकर आए हैं, यानि उनका शेयर भी है. ये भी एक बड़ा प्रयोग और बड़ा माद्दा है, जो बाकी चिरकुट संपादकों से उन्हें अलग करता है. बाकी संपादक मालिक को तेल लगाकर नौकरी बचाने के लिए अभिशप्त रहते हैं.. दूसरे, दीपक ने मुझे सलाहकार तो नहीं बनाया है, और, वो मेरा भी फोन नहीं उठाता, लेकिन, मुझे लगता है कि पिछले छह सालों से जो मैं इंडस्ट्री को वाच कर रहा हूं, भड़ास चला रहा हूं… तो इस एक बंदे ने सच में धमाल मचा रखा है टीआरपी को लेकर. बाकी ढेर सारे बड़े नाम वाले चैनल लेकर आए, संपादक बनकर आए और शहीद हो गए, सिर्फ अपनी जेब भर पाए और ढेर सारों की नैया डुबोकर चलते बने.. शैलेष टाइप अब भी कई हैं जो जाने किस गहन अंधेरे में चैनल चला रहे हैं.. न कोई पूछने वाला है, न कोई जिक्र करने वाला….
 
Sanjaya Kumar Singh सही कह रह हैं आप। सहमत हूं।
 
Atul Katyayan Misra thank you sir
 
Pankaj Sharma बाकी ढेर सारे बड़े नाम वाले चैनल लेकर आए, संपादक बनकर आए और शहीद हो गए, सिर्फ अपनी जेब भर पाए और ढेर सारों की नैया डुबोकर चलते बने……मीडिया के उत्थान और पतन की पूरी कहानी छुपी है….इन दो लाइनों में
 
Krishna Mohan Aapki bat sahi hai kintu ajit brahman nahi hai, wo bhumihar hai aur uske father ka name Ram Sagar Singh hai. Voh dhurt aur chalbaj hai,yeh bat channel head anuradha prasad ko samajhani chahiye.
 
Yashwant Singh कृष्ण मोहन जी, ये सबको पता है कि अजीत अंजुम, सतीश के सिंह, एनके सिंह, शैलेश.. ये सभी भूमिहार हैं… इसमें मीडिया वालों को बताने जैसी कोई जरूरत नहीं है…
 
Ajay Katare · Friends with Pankaj Sharma and 9 others
प्रिय यशवंत जी ऑफीस पॉलिटिक्स हर जगह रहती है इसमे ब्राह्मण और ब्राह्माणवाद को जोड़ना ठीक नही है और रही बात चेनल की तो ये सिर्फ़ पैसे वालो का ही काम बचा है होनहार के पास सिर्फ़ नौकरी है कही भी करो सिस्टम यही मिलेगा…..
 
Niket Bhargava Rashtra ब्राह्मणवादी वर्चस्व रहा है???? kab raha hai… paisa lagaa hai Church aur Saudee ka
 
Niket Bhargava Rashtra bhoomihhaaro ne hi bhoomi daan ki hai tabhi bhalaa huaa sabka bihaar mein…
 
Niket Bhargava Rashtra R U a NAXALITE ????
 
Niket Bhargava Rashtra Karan Thapar, N Ram, Sagrika Ghosh… ye sab brahminwaadi hain ha ha ha ha ha…
 
Niket Bhargava Rashtra ha ha ha ha… Good Joke…
 
Niket Bhargava Rashtra U R really…
 
Yashwant Singh हे निकेत भार्गव राष्ट्रा.. तुम्हें न तो हिंदी लिखनी आती है और न ही हिंदी में लिखे गए को समझ पा रहे हो… दुबारा पढ़ो.. सारी बात हिंदी न्यूज चैनलों को लेकर हो रही है…
 
Niket Bhargava Rashtra Arre kisi bhi channel ki ho rahi ho… bakwaas patak rahe ho… Deepak Chaurasiya great man… LOL… Ye hindi bhaashi jyaada ho to NEWS CHANNEL ko bhi hindi me likho srimaan… sahbdo ko dhang se prayog karo… chalaataau vaktvya mat do…
 
Pradeep Sharma दादा एक बात तो आपको माननी पड़ेगी की जुगाड़ नामक जो शव्द है वो तो चिपका है न मीडिया की नोकरी में। और दादा यहाँ दम नहीं दरख्वास्त देखी जाती है कि कितनी बड़ी है ।
 
Rajesh Ranjan Puri baazi dipak chaurasiya ne palat ke rakh diya hai, Hindi channel ki .
 
Krishna Mohan Yashwant jee. Ajit jab is peshe mein nahi aaya tha,tab se use mai jan raha hoon, voh mere mitra Ramesh Poddar ka chela hai. Uske pita muzaffarpur court mein JM the,tab voh P.N.Mishra namak patrakar ke pichhe-pichhe ghooma karta tha.bad poddar ka chela bana
 
Tara Chandra Gupta Bilkul sahi
 
Mohammad Anas बाबा लाजवाब लिखे हो ..कसम से . पूरा नेक्सस ही उखाड़ फेंका न सिर्फ भड़ास ने बल्कि इण्डिया न्यूज़ ने भी . और यह काम यशवंत एवं दीपक द्वारा होता है ,जय हो ..जिंदाबाद
 
Care Naman Tabhi to ye vyakti sabse pahle wanaha panuchta hai janha per hawa bhi nahi panuchpati …?
 
Narendra Mishra Aise Jo bhi ho , Lekin Apne Aap me Glaani Mahsus ho rha h.. Vajah Aap B samajh gye honge .. Sthiti Sochneeya h.. Aapka Vichaar b saraahneeya h.
 
Aasmohammad Kaif shera.
 
Sudhir Sharma इस बारे में दीपक चौरसिया की राय भी प्रकाशित करे यशवंत जी.. keep it on please
 
Krishna Rao यशवंत जी आपकी बात बहुत कुछ सही है और दीपक जी नई प्रतिभाओ को प्रोत्साहित करने के लिए भी जाने जाते है । मुझे एक बात समझ नहीं आ रही है कि इण्डिया न्यूज मेरे वीडियोकान डीटीएच पर उपलब्ध क्यों नहीं है ?
 
Vijay Kumar Mishra आसान से चारे आसा राम को दे दिया पूरा प्राइम टाइम / आतंक वादियों / मन मोहन / अचानक हीरो बनना छह रहे पप्पू ( अध्यादेश फाड़ दो ) तमाम मुद्दे हैं / अरे आसा राम तो निपट गए / जरूरी मुद्दों को देखो?
 
Imran Idris sahmat Yashwant Singh ji …..
 
Acharya Sushil Gangwar yahwant bhai .. ye to lafda hai jab kowi journalist badi post par aa jata hai to esa karta hai magar ab adne patrakar kuch thoda bahut kar lete hai to unka dimag kharab ho jata hai .. Fir Deepak bhai , Ajeet Bhai to , Vinod to badi position par baithe hai .. Es liye ensaan ko apna ahkaar dava ke yaa gath me badh kar rakh dena chahiye or kaam karte rahna chahiye ..
 
David Vinay दीपक जी को बताना चाहता हूँ आप को मध्यप्रदेश सहित देश के पत्रकारो की स्थिति ओर जीवका पर धयान देना चाहिए आपने जिस हाला तों का सामना किया वो हर पत्रकार नही कर सकता आपने हर वकत को मज़े मे लिया ओर जीत हासिल की …. पर पत्रकार समाज के लिए ग्राम से जिले तक के पत्रकारों के लिए भी कुछ करे…….
 
Vikas Kumar India Ki Best Team Hai ,, Rana Yeswant Aur Dipak Ji Ki
 
Devanand Yadav प्रेम चन्द जी , दीपक चौरसिया भी फारवर्ड लॉबी को तोड़ने के लिए… उन्ही के शस्त्रों का प्रयोग कर रहे है …तो जाहिर है दोनों में समानता तो होगी ही…
 
Rk Gandhi दीपक चौरसिया ने जो काम किया है..वो तो मील का पत्थर तो है ही…लेकिन यशवंत जी आपने जिस शैली में इलेट्रानिक मीडिया की वस्तुस्थिति को सामने रखा है..काबिलेतारीफ है..
 
Rabindra Kumar Madhesia Lagata hai deepak chaurasiya aaplogo ko gutaka khila jar aapni TRP badha rahe hai…
 
Chandralok Singh Patel bataur darshak hum aap ke sath hai.
 
अन्वेषण सिंह बागी "वीर भोगे वसुन्धरा" और आज का वीर दीपक चौरसिया को कहने में किसी को भी हिचक महसूस नहीं करना चाहिए |
 
Somesh Shukla Sahmat
 
Akshat Saxena jai ho………..yashwant bhai………khoob kahi…….sahi samay par sahi war…..
 
Ravindra Ranjan sahi likha hai
 
Sushil Sharma यशवंत जी ,,, सभी काम करने के स्थानों पर प्रतीस्पर्धा होती है ,,,अपनी नाकामियों को किसी धर्म-समाज से जोड़ना सही नहीं है ,,,मेहनत करे ;आगे बड़े।

Sandeep Jain यशवंत जी रिस्‍क लेने वालों के कदम ही दुनिया चूमती है
 
Sabir Khan mehnat karne walo ki kabhi haar nahi hot.. himmet karne walo ki kabhi haar nahi hoti…
 
Dev Nath bahut khub
 
Rajesh Rai Supriya prasad and Dilip Mandal bhi apne dam par hi Media Industry me chhaye huye hai. News 24 se Supriya Prasad bhi bahar aye aur Aj tak ke head hai. Deepak Ji pahle unka nam lijiye shabashi ke liye

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

दैनिक जागरण के स्टेट एडिटर्स का नाम प्रिंट लाइन में जाएगा

दैनिक जागरण प्रबंधन ने लंबे समय बाद मालिकों के अलावा किसी अन्य पत्रकार का नाम प्रिंट लाइन में डालना स्वीकार कर लिया है. स्टेट एडिटर्स का नाम प्रत्येक प्रदेश में दैनिक जागरण प्रिंट लाइन में प्रकाशित करने का फैसला प्रबंधन ने लिया है. मीनाक्षी शर्मा को हरियाणा और पंजाब का स्टेट एडिटर बनाया गया है. इन प्रदेशों में मीनाक्षी का नाम स्टेट एडिटर के रूप में प्रिंट लाइन में जाएगा.

बिहार में शैलेंद्र दीक्षित स्टेट एडिटर के रूप में प्रिंट लाइन के हिस्से होंगे. झारखंड में कमलेश रघुवंशी का नाम स्टेट एडिटर के बतौर जागरण अखबार की प्रिंटलाइन में प्रकाशित होगा. हिमाचल प्रदेश में रचना और उत्तराखंड में कुसुम कौटियाल का नाम स्टेट एडिटर के रूप में देने का फैसला लिया गया है. इस पूरे मामले में एक बात काफी दिलचस्प है कि दैनिक जागरण में अब करीब तीन महिला पत्रकारों का नाम स्टेट एडिटर के रूप में जाएगा. यह महिलाओं के लिए सम्मान की बात है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

सड़क हादसे में हिंदुस्तान, मुजफ्फरपुर के पत्रकार राकेश मिश्रा घायल

बिहार के मुजफ्फरपुर से खबर है कि हिंदुस्तान अखबार के पत्रकार राकेश मिश्रा सड़क हादसे में घायल हो गए हैं. उनका पैर टूट गया है. राकेश हिंदुस्तान में जनरल डेस्क इंचार्ज हैं. शुक्रवार को आफिस आते वक्त उनकी बाइक एक ट्रक से टकरा गई. आगे चल रहे ट्रक के ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगा दिया जिससे उनकी बाइक जा भिड़ी. उनका इलाज मुजफ्फरपुर के मां जानकी हास्पिटल में चल रहा है. उनका दाया पैर टूटा है. उनकी स्थिति खतरे से बाहर है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

 

अमिताभ अग्निहोत्री के दिवंगत पिता को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रार्थना सभा तीस को

समाचार प्लस न्यूज चैनल में मैनेजिंग एडिटर के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री के पिता डा. जेपी अग्निहोत्री का 18 सितंबर को निधन हो गया. उनकी स्मृति में और श्रद्धांजलि देने के लिए एक प्रार्थना सभा का आयोजन तीस सितंबर को किया जा रहा है. आयोजन स्थल है गाजियाबाद में वसुंधरा के सेक्टर 5 में उत्सव पार्टी लान (बुद्धा चौक के नजदीक). समय दिन में बारह बजे.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

देखो पत्रकारों, ये नमो तुम्हें गद्दार बताकर चला गया!

Vineet Kumar : देखो पत्रकार, तुम तो दिन-रात घुसकर मारो पाकिस्तान को, पाकिस्तान पर हल्ला बोल टाइप के पैकेज और स्टोरी चलाते हो लेकिन ये नमो तुम्हें गद्दार बताकर चला गया. कहा- इस देश के पत्रकार नवाज शरीफ की बैठकर मिठाइयां खा रहे थे, मनमोहन सिंह को देहाती औरत कहा और तुमने कुछ नहीं कहा..तुम एक बार भी नरेन्द्र मोदी से असहमत होकर स्टोरी करोगे कि पत्रकार अगर नवाज शरीफ या किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री या लोगों से बात करता है तो वो गद्दार नही हो जाता. तुम्हें शर्म नहीं आती, लगातार उनके चारण में पैकेज दर पैकेज ठेले जा रहे हो.

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Vineet Kumar : आज अगर मीडिया में रत्तीभर भी अपने पेशे के प्रति सम्मान बचा है तो नरेन्द्र मोदी की इस बात का जमकर विरोध किया जाना चाहिए कि अगर हमारे जमात के कुछ लोगों ने नवाज शरीफ से बात की, पाकिस्तान की मिठाई खा ली तो गद्दार कैसे हो गया ? क्या हमें इतने संकीर्ण और तंग दिमाग से काम करने चाहिए ?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

ये चुनाव पेड न्यूज से आगे बढ़कर पेड विजुअल की तरफ शिफ्ट हो गया

Vineet Kumar :  2013-14 का चुनावी कवरेज पेड न्यूज से आगे बढ़कर पेड विजुअल की तरफ शिफ्ट हो गया है. दिल्ली में मोदी और बीजेपी की चल रही रैली में ये बहुत साफ दिखाई दे रहा है..आखिर ये कैसे संभव है कि लगभग सारे चैनलों की फुटेज के कैमरा एंगिल एक तरह से हैं.

साफ लग रहा है कि ये चैनलों के कैमरे की फुटेज न होकर भाजपा के कैमरे से ली गई फीड है और ट्रांसफर करके सब चला रहे हैं. बाकी स्लग और वीओ में जो आप देख-सुन रहे हैं, वो सब साफ समझ आ ही रहा है.

ये चुनाव राजनीतिक पार्टियों के बीच का चुनाव नहीं, पीआर एजेंसियों के बीच की प्रतिस्पर्धा है. जिस राजनीतिक पार्टी की जीत होती है, वो पीआर एजेंसी की स्ट्रैटजी की जीत होगी लेकिन इसमे हर हाल में मीडिया बिका हुआ, मैनेज हुआ माध्यम बनकर हमारे सामने होंगे.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

मेरी एक छोटी सी चुहल से वीरेंद्र यादव प्रश्नाहत हो गए

Dayanand Pandey : मेरी एक छोटी सी चुहुल से वीरेंद्र यादव आप इस तरह प्रश्नाहत हो गए और ऐसा लगा जैसे आप यादवों के प्रवक्ता हो गए हों। और किसी ने आप की दुखती रग को बेदर्दी से दबा दिया हो। जब हिंदी संस्थान के पुरस्कारों की घोषणा हुई तब मैं ने आप को व्यक्तिगत रुप से फ़ोन कर के बधाई दी थी, समारोह में भी। यह भी आप भूल गए? हां, मैं ने इस टिप्पणी में चौथीराम यादव को ज़रुर याद करने की कोशिश की। रचनाकार को याद उस की शक्लोसूरत से नहीं किया जाता, उस की रचनाएं उस की याद दिलाती हैं।

मुंशी प्रेमचंद का नाम आते ही गबन, गोदान, रंगभूमि और उन की कहानियां सामने आ कर खड़ी हो जाती हैं। गुलेरी जी का नाम याद आते ही उस ने कहा था ही नहीं, लहना सिंह भी सामने आ खड़ा होता है। मुझ मतिमंद ने बहुत याद करने की कोशिश की कि चौथी राम यादव को याद करुं तो उन की कोई रचना या आलोचना मेरी स्मृति-पटल पर अंकित हो जाए पर नहीं हुई। आप चूंकि लखनऊ में बरास्ता नामवर मौखिक ही मौलिक है के नाते छोटे नामवर माने जाते हैं इस लिए आप के बारे में मुतमइन था कि आप को यह मरतबा कोई यूं ही सेंत-मेंत में तो मिल नहीं गया होगा। ज़रुर आप की बड़ी स्पृहणीय और उल्लेखनीय साहित्यिक उपलब्धियां भी होंगी। तो जब चौथीराम यादव की किसी रचना को याद नहीं कर सका तो खामोश हो कर बैठ गया यह मान कर कि मेरी अज्ञानता का अर्थ यह कैसे लगा लिया जाए मैं नहीं जानता हूं तो इस लिए यह चीज़ है ही नहीं। पर उस दिन पुरस्कार वितरण समारोह में वितरित हुई विवरणिका देख कर फिर जिज्ञासा जगी कि चौथीराम यादव के बारे में कुछ जान ही लूं।

विवरणिका देख कर मुझे गहरा सदमा सा लगा कि हिंदी संस्थान महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए कुंजियां लिखने वालों को कब से सम्मानित करने लगा, वह भी लोहिया सम्मान जैसे सम्मान से। जिसे निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, शिव प्रसाद सिंह, कुंवर नारायन, कन्हैयालाल नंदन, शैलेष मटियानी, रवींद्र कालिया जैसे लोग पा चुके हैं। ऐसे में यादव होना योग्यता के तौर पर मेरे या और भी लोगों के मन में बात आ ही गई तो कुछ अस्वाभाविक नहीं माना जाना चाहिए। खैर अब फ़ेसबुक पर आई आप की अब इस अयाचित टिप्पणी के क्रम में आप का भी पन्ना खुला परिचय का तो पाया कि आप के खाते में भी ऐसा तो कुछ रचनात्मक और स्मरणीय नहीं दर्ज है । और एक बड़ी दिक्कत यह भी है सामने है कि यह किन के हाथों सम्मानित हो कर आप फूले नहीं समा रहे हैं। आप तो हमेशा सत्ता विरोध में मुट्ठियां कसे की मुद्रा अख्तियार किए रहते हैं। कंवल भारती की गिरफ़्तारी और मुज़फ़्फ़र नगर के दंगे पर्याप्त कारण थे आप के सामने अभी भी मुट्ठियां कसे की मुद्रा अख्तियार करने के लिए। खैर यह आप की अपनी सुविधा का चयन था और है। इस पर मुझे कुछ बहुत नहीं कहना।

इसलिए भी कि अभी कुछ दिन पहले फ़ेसबुक पर ही आप को जनसत्ता संपादक ओम थानवी से कुतर्क करते देख चुका था। इसी फ़ेसबुक पर कमलेश जी को सी.आई.ए. का आप का फ़तवा भी देख चुका था। प्रेमचंद को ले कर भी आप के एकाधिकारवादी रवैए को देख चुका था। और अब आप के यदुवंशी होने की हुंकार को दर्ज कर रहा हूं। आप के द्विज विरोध और आप की द्विज-नफ़रत को देख कर हैरत में हूं। पहले भी कई बार यह देखा है। एक बार चंचल जी की वाल पर भी एक प्रतिक्रिया पढ़ी थी कि मोची को चाय की दुकान पर बिठा दीजिए और पंडित जी को मोची की दुकान पर। तब मैं भी आऊंगा चाय पीने आप के गांव। गोया चंचल न हों औरंगज़ेब हों कि जिस को अपने गांव में जब जहां चाहें, जिस काम पर लगा दें। अजब सनक है द्विज दंश और नफ़रत की। खैर बात बीत गई। पर अब फिर यह टिप्पणी सामने आ गई। तो सोचा कि जिस व्यक्ति को मैं पढ़ा लिखा मान कर चल रहा था वह तो साक्षरों की तरह व्यवहार करने पर आमादा हो गया। एक मामूली सी चुहुल पर इतना आहत और इस कदर आक्रामक हो गया? कि द्विज दंश में इतना आकुल हो गया। भूल गया अपनी आलोचना का सारा लोचन। एक शेर याद आ गया :

कितने कमज़र्फ़ हैं ये गुब्बारे
चंद सांसों में फूल जाते हैं।

द्विज विरोध की सनक में आप यह भी भू्ल गए कि एक द्विज श्रीलाल शुक्ल के चलते ही आप आलोचक होने की भंगिमा पा सके । कि उसी द्विज के आशीर्वाद से आप की किताब छपी और देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार भी मिला। लेकिन इस द्विज दंश की आग में जल कर आप इतने कुपित हो गए कि यादव से शूद्र तक बन गए। मायावती की ज़ुबान बोलने लगे ! द्विजों ने आप का, आप की जाति का और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का इतना नुकसान कर दिया कि कोई हिसाब नहीं है। यह सब यह कहते हुए आप यह भी भूल गए कि बीते ढाई दशक से भी ज़्यादा समय से मुलायम और उन का कुनबा तथा मायावती या कल्याण सिंह ही राज कर रहे हैं। यह लोग भी तो आप की परिभाषा में दबे-कुचले शूद्र लोग ही हैं। बीच में राजनाथ सिंह और रामप्रकाश गुप्त भी ज़रा-ज़रा समय के लिए आए। लेकिन सामाजिक न्याय की शब्दावली में ही जो कहें तो दबे-कुचले, निचले तबकों का ही राज चल रहा है उत्तर प्रदेश में। केंद्र में भी देवगौड़ा से लगायत मनमोहन सिंह तक दबे-कुचले लोग ही हैं। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इस बीच कार्यकारी अध्यक्ष भी यही दबे-कुचले लोग रहे। सोम ठाकुर, शंभु नाथ, प्रेमशंकर और अब उदय प्रताप सिंह जैसे लोग इसी दबे कुचले तबके से आते हैं जिन पर वीरेंद्र यादव के शब्दों में द्विजों ने अत्याचार किए हैं और कि करते जा रहे हैं। तो क्यों नहीं इन दबे कुचले लोगों ने जो कि राज भी कर रहे थे, वीरेंद्र यादव जैसे शूद्रों को भारत भारती या और ऐसे पुरस्कारों से लाद दिया? कम से २५ भारत भारती या इस के समकक्ष बाकी दर्जनों पुरस्कार तो द्विजों के दांत से खींच कर निकाल ही सकते थे। मैं तो कहता हूं वीरेंद्र यादव जी अब इस मुद्दे पर एक बार हो ही जाए लाल सलाम ! एक श्वेत पत्र तो कम से कम जारी हो ही जाए।

यह भी अजब है कि जो अगर आप को किसी की बात नहीं पसंद आए तो उसे भाजपाई करार दे दीजिए, इस से भी काम नहीं चल पाए तो आप सी.आई.ए. एजेंट बता दीजिए। यह तो अजब फ़ासिज़्म है भाई ! आप फ़ासिस्टों से लड़ने की दुहाई देते-देते खुद फ़ासिस्ट बन बैठे ! यह तो गुड बात नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.


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वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना!

‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के बहाने संगठित होते युवा : झीलों की नगरी उदयपुर में दो दिवसीय फ़िल्मोत्सव संपन्न

उदयपुर। द ग्रुप, जन संस्कृति मंच और उदयपुर फ़िल्म सोसायटी के सयुंक्त तत्वावधान में आज आरएनटी मेडिकल कॉलेज के सभागार में प्रतिरोध का सिनेमा के पहले उदयपुर फ़िल्म उत्सव का आगाज हुआ। फिल्मोत्सव का आगाज ‘उदयपुर फ़िल्म सोसायटी’ की प्रग्न्या, संगम और पंखुड़ी के गाये ‘तू ज़िंदा है, तू ज़िंदगी की जीत पे यकीन कर’ गाने के साथ हुआ।

उद्घाटन सत्र में उदयपुर फ़िल्म उत्सव के संयोजक शैलेंद्र प्रताप सिंह ने सभी मेहमानों का स्वागत करते हुए प्रतिरोध के सिनेमा और उदयपुर फ़िल्म उत्सव के बारे में अपनी बात रखी और सभागार में मौजूद दर्शकों को बताया कि प्रतिरोध की ये फिल्में बड़े गहरे सवाल की माफिक है जिन्हें देखने और उन पर चर्चा करने की जरूरत है। इन्होने आगे बताया कि उदयपुर के लोगों के सहयोग की बदोलत ही आज इस फिल्मोत्सव का आयोजन संभव हो सका है। साथ ही इन्होने यह भी कहा कि हमें सवाल पैदा करने वाले सिनेमा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।

इस सत्र में ‘दाएँ या बाएँ’ की निर्देशक बेला नेगी ने प्रतिरोध का सिनेमा के साथ अपने जुड़ाव और अनुभव पर बात करते हुए बताया कि प्रतिरोध के सिनेमा में उनकी फ़िल्म के प्रदर्शन के दौरान पाँच सौ से सात सौ दर्शकों की उपस्थिति रही है, जबकि मुंबई और दिल्ली जगहों पर उनकी फ़िल्म वितरकों के षडयंत्रों के कारण महज एक शो में चली है, इसके कारण उन्हें अपेक्षानुरूप दर्शक भी नहीं मिले। इस मायने से प्रतिरोध का सिनेमा मुख्य धारा के सिनेमा से बहुत आगे है और यह अपनी सार्थकता भी रखता है। इनके अनुसार व्यावसायिक सफलता को ही असली सफलता का पर्याय मानना एक बड़ी गलतफहमी है।

इसी सत्र में आगे द ग्रुप, जसम के राष्ट्रीय संजय जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा को परिभाषित करते हुए कहा कि यह जनता का सिनेमा है, यह जनता द्वारा चलाया जाता है और इसमें जनता के संघर्ष की कहानी है। इन्होने अपनी बात को आगे बढ़ाते कहा कि हमें इस सिनेमा के विकास के लिए निरंतर सहयोग करने की जरूरत है ताकि अगली बार इसके फिल्मोत्सव के आयोजन और बेहतर ढंग से किए जा सके और सिनेमा के जरिये तमाम काला माध्यमों को समेटकर कुछ सार्थक किया जा सकता है। उद्घाटन सत्र में उदयपुर फ़िल्म सोसायटी की चंद्रा भण्डारी ने सुप्रसिद्ध चित्रकार चित्तप्रसाद द्वारा बिमल राय की विख्यात फ़िल्म ‘दो बीघा जमीन’ के कथानक से प्रेरित यादगार चित्र पर आधारित चित्रकार अशोक भौमिक द्वारा बनाए गए दो पोस्टरों का लोकार्पण किया और इसके बाद फ़िल्मकार सूर्य शंकर दाश और बेला नेगी द्वारा इस दो दिवसीय फ़िल्मोत्सव की स्मारिका का विमोचन किया गया।

उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता प्रख्यात दस्तावेजी फ़िल्मकार सूर्य शंकर दाश ने सरकार, न्यायपालिका, कॉर्पोरेट और मुख्यधारा मीडिया की मिलीभगत को उदाहरण सहित प्रस्तुत करते हुए उड़ीसा में जल, जंगल, जमीन की लूट में शामिल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के काले कारनामों के बारे में दर्शकों को बताया। सूर्य शंकर दाश ने कहा कि ये कंपनियाँ दोहरा चरित्र धारण किए हुए हैं, एक तरफ अपनी अच्छी छवि बनाने के लिए यह फ़िल्म मेकिंग प्रशिक्षण और विभिन्न फ़िल्म उत्सवों को प्रायोजित करती हैं तो दूसरी ओर आदिवासी लोगों के संसाधनों को अपने कब्जे में करने के कुचक्र रचती हैं। उन्होने कॉर्पोरेट मीडिया द्वारा सूचनाओं को अपने कब्जे में करने तथा उन्हें जनता के सामने अनुकूलित बनाकर पेश करने की रणनीति को उजागर किया। उन्होने एक फ़िल्मकार की असल भूमिका को रेखांकित किया जो अपने केमरे द्वारा इस कॉर्पोरेट मीडिया के कुचक्र को ध्वस्त करता हैं।

इस सत्र के आखिर में वरिष्ठ आलोचक और उदयपुर फ़िल्म  सोसायटी के नवल किशोर  ने सभी का शुक्रिया अदा  करते हुए कहा कि अन्याय के प्रति विरोध में आवाज उठाना भी एक वैचारिक आंदोलन की शुरुआत है।

‘जय भीम कॉमरेड’ से हुआ नई बहस का जन्म

आज उदयपुर फ़िल्म उत्सव की पहली शाम भारत के शीर्ष दस्तावेजी फ़िल्मकार आनंद पटवर्धन की बहुचर्चित फ़िल्म ‘जय भीम कॉमरेड’ को दर्शकों ने बड़ी संख्या में देखा और पसंद किया। फ़िल्म के पश्चात निर्देशक आनंद पटवर्धन के दर्शकों के साथ संवाद का सत्र भी लंबा, विचारोत्तेजक और ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर नई बहस को जन्म देने वाला रहा ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ थीम पर केन्द्रित इस फ़िल्मोत्सव में मुख्य रूप से देश – विदेश की ऐसी बहुचर्चित नई-पुरानी फ़िल्मों को दिखाया जा रहा है जो जन सिनेमा के आदर्श को लेकर प्रतिबद्ध फ़िल्मकारों द्वारा बनाई गईं और जिन्हें दुनिया भर में दर्शकों ने देखा और सराहा है।

फ़िल्म ‘जय भीम कॉमरेड’ जो आनंद पटवर्धन के 14 वर्ष के अथक प्रयासों के बाद प्रदर्शित हुई, इस फ़िल्म में जातिवाद में जकड़े भारतीय समाज, धार्मिक अंधविश्वास, धर्म पर आधारित राजनीति, कार्यपालिका व न्यायपालिका का दलितों के प्रति दोहरा व्यवहार, अपने निजी स्वार्थों के कारण दिन-ब-दिन रंग बदलते राजनेता और दलित अत्याचार व उनके आंदोलन को बड़े ही गंभीरता से दिखाया गया है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती पटवर्धन की यह फ़िल्म कई चौंकाने वाले आंकड़े हमारे सामने लाती है। जैसा फ़िल्म में बताया गया है कि देश में प्रतिदिन 2 दलितों की हत्या होती है और इनके ऊपर होने वाले अत्याचारों के मामलों में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में नजर आती है। फ़िल्म के पहले भाग में जहां दलित आंदोलन के मजबूत पक्ष को दिखाया गया है तो दूसरे भाग में दलित नेताओं के उनके बुनियादी राजनैतिक मूल्यों में हो रहे पतन और बाबासाहब डॉ. अंबेडकर को अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपयोग करने वाले राजनैतिक दलों को प्रमुखता से दिखाया गया है।

फ़िल्म में दलित युवाओं के सांस्कृतिक दल ‘कबीर कला मंच’ का अचानक दलित आंदोलन में प्रमुखता से उभर कर आना और उनकी दलित आंदोलन में बढ़ती भूमिका के कारण पुलिस द्वारा उनको नक्सलवादी घोषित कर उनको झूठे मुकदमों में फंसाना और आखिर में इस दल का मजबूरन भूमिगत होना साफ जाहीर करता है कि किस तरह सत्ता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अतिक्रमण कर रही है, यह लोकतंत्र की सार्थकता पर बहुत बड़ा सवाल हैं।

इससे पूर्व फ़िल्मोत्सव में मालेगांव के लोगों  द्वारा फ़िल्म बनाने की उनकी कोशिशों और उनके सिनेमा प्रेम पर आधारित फैज़ा अहमद खान की फ़िल्म ‘मालेगांव का सुपरमैन’दिखाई गई। इस फ़िल्म के प्रदर्शन के दौरान उदयपुर के सिने-प्रेमियों ने बहुत ही हल्के-फुल्के माहौल में फ़िल्म बनाने की प्रक्रिया को जाना और इसके बाद हुई चर्चा में कुछ लोगों ने खुद की फ़िल्म बनाने की मंशा जताई। ‘मालेगांव का सुपरमैन’ मालेगांव के ऐसे युवाओं का दस्तावेज़ है जो फ़िल्मों के प्रति दीवानगी रखने के साथ-साथ अपनी खुद की फिल्में भी बनाते है। फैज़ा अहमद खान की यह फ़िल्म हमें यह बताती है कि वर्तमान समय में फ़िल्म बनाना आसान काम हो गया है। सीमित संसाधनों के बावजूद लोग कैसे सुपरमैन की कहानी को अपने अंदाज में दिखाते हैं, यही मुख्य बात ‘मालेगांव के सुपरमैन’ से दर्शक जानते है।

‘मालेगांव का सुपरमैन’ के बाद लघु फ़िल्मों के जरिये उदयपुर के लोगों ने विश्व सिनेमा को देखा। इसमें बर्ट हांस्त्रा की फ़िल्म ग्लास, गीतांजलि राव की प्रिंटेड रेनबो, आशीष पाण्डेय की केबिन मैन, रॉबर्ट जॉर्जियो एनरिको की द अकरैंस एट द ऑउल क्रीक ब्रिज, क्लौड जतरा और नॉर्मन मैक्लेरेन की चेरी टेल, नॉर्मन मैक्लेरेन की नेबर्स, ऋत्विक घटक की उस्ताद अल्लाउद्दीन खान और बीजू टोप्पो और मेघनाथ की गाड़ी लोहारदगा मेल जैसी फ़िल्में दिखाई गईं। फ़िल्मों के प्रदर्शन के बाद फीडबेक के दौरान उदयपुर के लोगों ने उदयपुर फ़िल्म सोसायटी की इस पहल की सराहना की और भविष्य में इस तरह के आयोजनों में सहयोग का वायदा भी किया।

प्रतिरोध  का सिनेमा हर उम्र वर्ग के लिए

15 सितंबर, उदयपुर फ़िल्मोत्सव  के दूसरे दिन का पहला  सत्र नन्हें दोस्तों  के नाम रहा। इसमें उदयपुर  शहर के विभिन्न स्कूलों  के बच्चों ने जन्नत  के बच्चे, रेड बेलून  और सामान की कहानी जैसी  फिल्में देखी। इस तरह  के फ़िल्मोत्सवों में  बच्चों की उपस्थिति जाहीर  करती हैं कि यह सिनेमा  सबकी बात करता है। इसके  बाद ‘नया भारतीय दस्तावेजी  सिनेमा’ के अंतर्गत रीना  मोहन की पहली भारतीय  फ़िल्म अभिनेत्री कमला  बाई के जीवन पर बनी  दस्तावेजी फ़िल्म ‘कमला बाई’ दिखाई  गई। यह फ़िल्म पुरुष प्रधान समाज की वर्जनाओं को तोड़कर अभिनय की दुनियाँ में कदम रखने वाली कमला बाई के साहस और जज़्बे को दिखाती हैं। दोपहर में ‘नया सिनेमा’ सत्र के अंतर्गत बेला नेगी द्वारा निर्देशित ‘दाएँ या बाएँ’ का प्रदर्शन हुआ। उत्तराखंड की पहाड़ी संस्कृति को दिखाती यह फ़िल्म वैश्वीकरण पर गहरा व्यंग्य करती है, साथ ही विकास और आधुनिकीकरण के नाम पर बढ़ रही बाजारवादी संस्कृति को हमारे सामने नग्न करती हैं। इस फ़िल्म के बाद बेला नेगी दर्शकों के साथ हुई बातचीत में बताया कि वर्तमान दौर में विकास प्रक्रिया ने हमारे सामने कोई विकल्प नहीं छोड़ा हैं। हमें ऐसा विकास भ्रमित करता हैं। बेला नेगी की इस फ़िल्म को उदयपुर के दर्शकों से भरपूर सराहना मिली।

इसके बाद उड़ीसा से आए फ़िल्मकार और एक्टिविस्ट सूर्य  शंकर दाश ने अपनी लघु दस्तावेजी  फ़िल्मों के माध्यम से उड़ीसा  में वेदांता कंपनी के विरुद्ध चल रही आदिवासियों की लड़ाई और संघर्ष को दिखाया और बताया कि किस तरह आदिवासियों के संसाधनों को विकास के बहाने सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले कर रही हैं। पूँजीपतियों द्वारा संचालित दमनचक्र में उनका सहयोग कर रही पुलिस कितने बर्बर तरीके से जन-संघर्ष को दबाने की कोशिश करती है और मीडिया जो जनता के मुद्दों के प्रति सजग होने का दिखावा करता है कैसे अपने निजी हितों को आमजन की ज़िंदगी की कीमत पर पूरा करता हैं। सूर्य शंकर दाश की दस्तावेजी फ़िल्मों के बाद उन पर चर्चा भी हुई जिसमें यह बात निकल कर आई कि कॉर्पोरेट जगत, मीडिया और सरकार का गठजोड़ सूचनाओं को अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए उपयोग कर जनता को भ्रमित रखते हैं।

फ़िल्मोत्सव का समापन बलराज  साहनी अभिनीत एम.एस. सथ्यु की फ़िल्म ‘गर्म हवा’ दिखाने के साथ हुआ। विभाजन के बाद अल्पसंख्यक वर्ग के साथ हो रहे दोहरे व्यवहार को उजागर करती यह फ़िल्म बलराज साहनी की सर्वश्रैष्ठ फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। अपने ही मुल्क में पराये घोषित हो चुके अल्पसंख्यक वर्ग की पीड़ा को इस फ़िल्म में महसूस किया जा सकता हैं और इसी परिपेक्ष्य में ‘गर्म हवा’ आज भी अपनी प्रासंगिकता रखती हैं। इस फ़िल्म के बाद पहले उदयपुर फ़िल्मोत्सव का इस उम्मीद के साथ समापन हुआ कि अब प्रतिमाह एक फ़िल्म का प्रदर्शन किया जायेगा और उस पर चर्चा की जाएगी।

लेखक सुधीन्द्र कुमार कॉमिक्स एक्टिविस्ट हैं जसम, उदयपुर फ़िल्म सोसायटी के सदस्य हैं. उनसे संपर्क +91-9782366557 के जरिए किया जा सकता है.

मुजफ्फरनगर के फसादियों को मुस्लिम छात्राओं का करारा जवाब

बाराबंकी। मुजफ्फरनगर में फिरकेवाराना फसाद कराने वालों के मुंह पर आज करारा तमाचा मारकर यह पैगाम दिया असन्द्रा के मलका तालीम गाह डिग्री कालेज की मुस्लिम छात्राओं ने। लैपटॉप वितरण समारोह में ईरान में तालीम हासिल कर रहे अल्लामा रजा हैदर और ग्राम्य विकास मंत्री अरविन्द सिंह गोप की मौजूदगी में मां की वन्दना कर सब को आश्चर्यचकित कर दिलों को एकता का बंधन बांधने का पैगाम दे डाला।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का वादा इण्टर पास छात्राओं को लैपटॉप देने की कड़ी में जैदपुर हैदरगढ़ विधानसभा की सरहद पर स्थित थाना असन्द्रा के मलका तालीम गाह डिग्री कालेज में आयोजित लैपटॉप वितरण कार्यक्रम में सरस्वती के चित्र पर दीप जलाकर ग्राम विकास मंत्री अरविन्द सिंह गोप ने शुभारम्भ किया। इस मौके पर इस्मत फात्मा और फूल बानो ने मां की वन्दना इस अन्दाज में की। मां से मोहब्बत करने वालो की आंखे छलक पड़ी।  ईरान से आये अल्लामा रजा हैदर की मौजूदगी में। इन छात्राओं ने पढ़ा-दुखि तेरे दर पर खड़ी कब से पुकारती है। पूजा की थाली लिए आरती उतारती है। ऐ वीणा वाली मां, ऐ वीणा वाली मां मुस्लिम छात्राओं का वन्दना करना आम लोगों के दिलों में एक नया पैगाम दे गया।

वहीं मौलाना रजा हैदर ने अपने सम्बोधन में कहा सियासत से वाकिफ नहीं हूं। 18 मार्च 1987 को मैं वतन से बाहर गया तब मुझे वतन की मोहब्बत का अंदाजा लगा। यह हाल वही जिस तरह मछली पानी हटकर बेचैन होती है। वही बेचैनी अपने वतन के छुटने से होती है। आज मेहमानों के गले में फूल की माला डाली गई यह फूल जिसमें काटे नहीं थे। यह प्यार और मोहब्बत का वातावरण मेरे हिन्दुस्तान में आज भी कायम है। सारी जिन्दगी सभी मजहब का अध्ययन करता रहा कई मुल्कों मंे गया लेकिन मुझे अच्छा सिर्फ हिन्दुस्तान लगा।

उन्होंने कहा कि सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तानता हमारा-जिस धरती पर मेरा जन्म हुआ है वहीं दफन हो जाये यही मेरे लिए काफी है। डा. इकबाल का शेर हम लोगों के लिए एक मिसाल था है और रहेगा ‘‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना-हिन्दी हैं हमवतन हैं हिन्दोस्ता हमारा। मौलाना रजा ने आगे कहा कि मौलाना कल्बे जवाद साहब हमारे अजीज दोस्त हैं उनका फिरकेवाराना फसाद के बारे में एक तकरीर में कहा कुछ लोगों के मकान जलते हैं और कुछ लोगों की दुकाने चलती हैं।

उन्होंने कहा कि मुल्क की तीन चीजे भ्रष्टाचार, आतंकवाद, फिरकेवाराना फसाद अगर खत्म हो जाये तो हमारा मुल्क एक मिसाली मुल्क होगा। लेकिन उम्मीद की किरन अभी बाकी है लैपटॉप वितरण योजना में मुझे पता चला इसमें कोई भ्रष्टाचार नहीं है तो हुकूमत की और योजनाओं में भी अगर इसी तरह भ्रष्टाचार खत्म हो जाये तो हिन्दुस्तान एक अजीम मुल्क बन जाये।

उन्होंने छात्राओं से कहा कि गिलास में पानी की तरह मत रहो नहीं तो सिर्फ एक महदूद जगह ही सिमट कर रह जाओगे। उसके लिए दरिया बन जाओ जहां हर प्यासा अपनी प्यास बुझाये। यानी एक अजीम इन्सान बन जाओ जिसकी अजमतों को लोग सलाम करे और लोगों की मदद करो। मौलाना रजा ने बच्चों को हिदायत भी दिया लैपटॉप का गलत इस्तेमाल न करें सिर्फ शिक्षा में ही इस्तेमाल करें, ड्रामा पिक्चर देखने के लिए नहीं दिया गया है बल्कि आप इससे सॉफ्टवेयर खुद तैयार कर हिन्दुस्तान का नाम दुनिया में रोशन करें। जय हिन्द जय भारत के साथ मौलाना की तकरीर की समाप्ति पर लोगों ने जमकर तालियां बजायी।

बाराबंकी से रिज़वान मुस्तफा की रिपोर्ट.

भास्कर ने इंदौर में बर्बाद कर दिया पच्चीस लाख रुपये का स्कूली ग्राउंड

इंदौर : स्कीम-54 स्थित गुजराती स्कूल का जो मैदान समाज के खैरख्वाहों ने निजी राजनीतिक स्वार्थ के कारण गरबे के लिए दैनिक भास्कर समूह को नि:शुल्क दिया है उसे 25 लाख रुपए से ज्यादा खर्च करके समाज ने सालभर पहले ही स्टेडियम की तरह संवारा था। इसमें 150 से ज्यादा पौधे और लाखों की विलायती घास लगाई गई थी जिसे रविवार को साधारण सभा में मिली मंजूरी से पांच दिन पहले ही भास्कर समूह ने उखाड़कर फेंकना शुरू कर दिया। हालात यह है कि पांच दिन पहले तक जहां बच्चे चौके-छक्के लगा रहे थे उसी मैदान की छाती पर आज घास-पेव्हर उखाड़कर तंबू के लिए कीलें ठोके जा रहे हैं।

गुजराती समाज के अध्यक्ष विनोद भाई पंड्या और मानद मंत्री पंकज संघवी के संचालक मंडल ने तकरीबन सालभर पहले तीन एकड़ जमीन में फैले बेजार मैदान को संवारा था। विधिवत विलायती घास लगाई गई। 150 से ज्यादा पेड़-पौधे लगाए गए। आसपास पेव्हर लगाई गई। मैदान का विकास समंदर सिंह ‘जो कि नेहरू स्टेडियम, होलकर स्टेडियम और ग्वालियर के क्रिकेट स्टेडियम की पीच को आकार दे चुके हैं’, के मार्गदर्शन में हुआ। समाज के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मानें तो मैदान के सौंदर्यीकरण पर 25 लाख रुपए खर्च हुए थे। यह जानकारी मौजूदा संचालक ही अलग-अलग बैठक में कई बार दे चुके हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि गुजराती समाज को अब तक नजरअंदाज करते आए भास्कर समूह को अभिव्यक्ति के लिए मंजूरी देकर मैदान का कबाड़ा क्यों कराया जा रहा है। संचालक अब तक इस बात का जवाब भी नहीं दे पाए हैं कि अभिव्यक्ति के बाद भास्कर समूह क्या उसी स्वरूप में मैदान लौटाएगा जिस स्वरूप में उसने इस्तेमाल के लिए लिया था। यदि नहीं तो मैदान को नए सिरे संवारने की रकम समाज क्यों दे। क्यों न इसका खर्च उन संचालकों से वसूला जाए जिनकी मनमानी मैदान की जान लेने पर आमादा है।

तकरीबन आधे मैदान में अभिव्यक्ति के दो सर्कल बनेंगे। जनरल और रिजर्व। इसके अलावा फूड जोन व अन्य व्यवस्था। इनके सबके बीच यदि भास्कर समूह घास नहीं भी उखाड़ेगा तो वह पैरों तले दब ही जाएगी। इसके अलावा पेड़-पौधों को भी नुकसान होना है। रविवार की एजीएम में मैदान इस्तेमाल की मंजूरी हुई जबकि मौके पर भास्कर समूह पांच दिन पहले ही गेट और चौतरफा पतरे ठोककर उजाड़ अभियान शुरू कर चुका है। गरबे 6 अक्टूबर से होना है। खुदाई शुरू हुई 17 सितंबर से। 10 अक्टूबर तक गरबे होंगे। तंबे उखाड़ने में लगेंगे 15 दिन। यानी करीब एक महीने तक बच्चे बिना मैदान खेलेंगे। इतना ही नहीं ठोका पीटी से उनकी पढ़ाई प्रभावित होगी सो अलग।

ख्यात क्यूरेटर समंदर सिंह के मार्गदर्शन में 25 लाख से ज्यादा खर्च हुआ। पंकज संघवी ने अपने निजी स्वार्थ के कारण इस हरेभरे मैदान को नेस्तनाबूद करने की अनुमति दी। इन 25 लाख रुपए की भरपाई उनसे व उनके समर्थक संचालकों से होना चाहिए। -सर्जिवभाई पटेल

पंकज संघवी और उनके समर्थकों ने समाज में अपनी मोनोपॉली के चलते समाज की जमीन और शैक्षणिक संस्थानों का दुरुपयोग अपने निजी व राजनीति हित के लिए हमेशा किया है। विरोध करने वालों को दबाते हैं इसीलिए लोग विरोध करने से डरते भी हैं। वे स्वयं को समाज से इतना ऊपर मानते हैं कि उन्हें समाज की चिंता रही, न ही समाजजनों की। -दिलीप चुलगर, सदस्य एमपीसीए

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200 से ज्यादा दृष्टिबाधित बच्चे…। दो दर्जन मुक-बधिर…। दर्जनभर से ज्यादा मेंटल रिटायर्ड…। 650 बेड का बॉम्बे हॉस्पिटल, जहां 70 फीसदी क्रिटिकल मरीज भर्ती हैं। गुजराती, सत्यसार्इं, मारथोमा और प्रेस्टीज जैसे एज्यूकेशनल इंस्टिट्यूट…। पार्किंग और यातायात फजीहत के साथ इन तमाम मुद्दों को सिरे से नजरअंदाज करते हुए जिला प्रशासन ने गुजराती स्कूल के मैदान पर दैनिक भास्कर समूह को गरबे की अनुमति दे दी…। न दृष्टिबाधित बच्चों के लिए साउंड की सेंसेटिविटी को तवज्जो दी…। न शोर-शराबे से मरीजों की सेहत न बिगड़े इसकी चिंता की…। वह भी उस स्थिति में जब सेंसेटिव जोन करार देकर हाईकोर्ट और जिला कोर्ट के आसपास 100 वर्गमीटर क्षेत्र में वाहनों का हॉर्न बजाना तक प्रतिबंधित है।

दैनिक भास्कर समूह स्कीम-54 स्थित गुजराती स्कूल के जिस मैदान पर ‘अभिव्यक्ति’ होना है उसके 250 वर्गमीटर के क्षेत्र में महेश दृष्टिहीन कल्याण केंद्र, नवदीप शिशु कल्याण बोर्ड, राधादेवी बृजरतन मोहता दृष्टिहीन बालिका छात्रावास, द नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लार्इंड, रॉटरी पॉल हैरिस स्कूल आॅफ मेंटल रिटायर्ड जैसे सामाजिक संस्थान हैं जहां परिवार से दूर बच्चों को स्पेशल अटेंशन देकर रखा जाता है। बॉम्बे  और टोटल जैसे हॉस्पिटल है। प्रेस्टीज, आईआईपीएम, इंदिरा स्कूल आॅफ करियर डेवलपमेंट, सत्यसार्इं, मारथोमा और गुजराती जैसे एज्यूकेशनल इंस्टिट्यूट हैं। सामने बीसीएम हाइट्स, शेखर प्लेनेट, प्रिंसेस रेसीडेंसी, रॉयल प्लेटिनम जैसी आवासीय-वाणिज्यिक इमारतों के साथ प्रेमशांति, मंगल रिजेंसी और इन्फिनिटी जैसी होटलें भी हैं।

यानी एक तरफ सामाजिक और स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस सेंसेटिव जोन है जहां भारीभरकम साउंड की अनुमति नहीं दी जी जा सकती। दूसरी तरफ है वाणिज्यिक और आवासीय क्षेत्र जहां किसी भी सूरत में रात के वक्त प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 60 डेसीबल से ज्यादा साउंड के इस्तेमाल की अनुमति चाहकर भी नहीं दे सकता। बावजूद इसके यहां दैनिक भास्कर समूह ने अभिव्यक्ति तकरीबन एक लाख वॉट से ज्यादा का साउंड सिस्टम लगाएगा जो स्वीकृति से 20 डेसीबल ज्यादा होगा।

अभिव्यक्ति के गरबे में एक से डेढ़ लाख वॉट के बीच साउंड सिस्टम लगता आया है। इससे कम में बात ही नहीं बनती। इस बार भी एक लाख से अधिक वॉट का सिस्टम लगेगा। डेसीबल-वेसीबल से हमारा कोई लेना-देना नहीं।
(भास्कर के लिए काम करने वाली साउंड कंपनी के प्रतिनिधि)

शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थानों को सेंसेटिव जोन मानते हुए उनके आसपास साउंड की अनुमति नहीं दी जाती है। वैसे भी बॉम्बे हॉस्पिटल वाली रोड एक तरफ सेंसेटिव है तो दूसरी तरफ कमर्शियल जहां किसी भी सूरत में 60 डेसीबल से ज्यादा साउंड की अनुमति नहीं दे सकते। -बापट, साइंटिस्ट, एमपीपीसीबी

आयोजन स्थल से महज 90 मीटर दूर स्थित महेश दृष्टिहीन कल्याण केंद्र के छात्रावास में 152 लड़कियां रहती हैं। सभी साउंड सेंसेटिव हैं। आंख न होने की स्थिति में कान ही बच्चियों की ताकत है। यदि कल को कानफाड़ू सिस्टम से कान खराब हो गए तो हमारा जीवन ही बिगड़ जाएगा। इसकी जिम्मेदारी न आयोजक लेंगे। न आयोजन की अनुमति देने वाले। -दीपिका प्रजापति, दृष्टिबाधित बच्ची

अभी थोड़ा-बहुत शोर होता है तो बच्चियां सो नहीं पाती हैं। रात-रात भर जगती है सुबह कॉलेज-स्कूल नहीं जा पाती। परीक्षाएं चल रही है। आयोजन सामने है और ईको के कारण यहां कुछ सुनाई देता। यह अनुभव हम बीते कुछ महीने पहले शंकर महादेवन के आयोजन के दौरान ही कर चुके हैं। -परणा दत्ता, वार्डन

बात करने से दिक्कत दूर होती है तो करें। अन्यथा कोई मतलब नहीं है। न आयोजकों को कोई फर्क पड़ता है। न ही आयोजन की मंजूरी दिए बैठे अफसरों को। अनुमति देने से पहले अफसरों ने यहां आकर यह तक नहीं देखा कि पार्किंग है या नहीं। क्षेत्र सेंसेटिव है। या नहीं। -संजय लोखंडे, डेवलपमेंट आफिसर, द नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंट

भास्कर जैसा बड़ा समाचार समूह जो कि यह जानता है कि यहां बच्चों को स्पेशल अटेंशन देकर संभाला जाता है बावजूद इसके मदद करना तो दूर बच्चों की मुश्किलें बढ़ाई जा रही है। आसपास सभी एनजीओ हैं। किसी के पास मुकबधिर बच्चे हैं तो किसी के पास मेंटली रिटायर्ड। -डॉली जोशी, आफिसर, राधादेवी बृजरतन मोहता दृष्टिहीन बालिका छात्रावास

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सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य जैसी सेंसेटिव सेवाओं को नजरअंदाज करते हुए जहां दैनिक भास्कर समूह गुजराती स्कूल के मैदान में गरबे की तैयारियां कर रहा है वहीं उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मेंदोला की संस्था कनकेश्वरी ने अपना गरबा स्थल बदल दिया है। इस बार मां कनकेश्वरी देवी का गरबा सत्यसार्इं के सामने नहीं, बल्कि प्राइम सिटी और श्यामनगर के बीच स्थित मैदान पर होगा। इसका कारण आयोजक सत्यसार्इं के पास स्थानाभाव, सेंसेटिव सेवाओं और लोगों को होने वाली परेशानियों को बताते हैं।

गुजराती स्कूल में जब से दैनिक भास्कर ने अभिव्यक्ति की तैयारियां शुरू की है तभी से चर्चा तेज है कि मां कनकेश्वरी के गरबे कहां होंगे? यदि दोनों गरबे आमने-सामने हो गए तो क्या होगा? जैसे सवालों से परेशान हो रहे क्षेत्रवासियों को विजयवर्गीय और मेंदोला की संस्था ने आयोजन स्थल बदलकर बड़ी राहत दी है। एमआर-9 पर श्यामनगर और प्राइम सिटी के बीच गौरीनगर निवासी घनश्याम चौधरी की 13 एकड़ जमीन पर संस्था ने आयोजन की तैयारियां शुरू कर दी। मैदान पर लाइटिंग लग चुकी है। मैदान को बराबर करने का काम जारी है।

संस्था के कर्ताधर्ताओं का कहना है कि 2012 में सत्यसार्इं विद्या विहार के सामने स्थित मैदान पर गरबा आयोजित किया था। अनुभव यह रहा कि आयोजन के लिए पर्याप्त जमीन नहीं है। क्षेत्र में पार्किंग बड़ा संकट है। सत्यसार्इं से बॉम्बे हॉस्पिटल के बीच की रोड की आवाजाही प्रभावित होती है। जाम लगता है। लोग परेशान होते हैं। सामने सत्यसार्इं और गुजराती जैसे स्कूल हैं। सामाजिक संस्थाओं के शैक्षणिक संस्थान और हॉस्टल है। पिछली बार शोर के कारण बॉम्बे हॉस्पिटल के मरीजों को भी दिक्कत आई थी। इसीलिए मैदान बदलना पड़ा।

वहां फायदे..

प्राइम सिटी के पास 13 एकड़ पर्याप्त जमीन है। आसपास खाली जमीन है। एमआर-9 जैसी रोड है जहां ज्यादा वाहनों का दबाव नहीं है। आसपास न कोई शैक्षणिक परिसर। न ही अस्पताल।

यह है दिक्कतें..

शैक्षणिक : तकरीबन 4.62 लाख वर्गफीट में फैले गुजराती समाज के परिसर में एसकेआरपी गुजराती हॉम्योपैथिक कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर, आरजीपी गुजराती प्रोफेशनल इंस्टिट्यूट, एसजेएचएस गुजराती इनोवेटिव कॉलेज आॅफ कॉमर्स एंड सांइस, एनएमटी गुजराती कॉलेज आॅफ फॉर्मेसी और एएमएन गुजराती इंग्लीश मिडियम स्कूल जैसी शैक्षणिक संस्थाएं हैं जहां तीन हजार से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं। इनके बीच 1.70 लाख वर्गफीट (4 एकड़) का मैदान देने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होगी।

खेलकूद : तकरीबन चार एकड़ जमीन पर किके्रट, फुटबॉल, टेनिस ग्राउंड हैं। जहां मध्यावकाश के दौरान बच्चे खेलते है। आयोजन पांच दिन का है लेकिन शामियाना तानने और निकालने के नाम पर भास्कर समूह 25 दिन मैदान में ही डटा रहेगा। इन 25 दिनों में चौतरफा सुरक्षित परिसर छोड़कर बच्चे कहां और कैसे खेलेंगे।

पार्किंग : तकरीबन चार एकड़ जमीन पर फैले इस मैदान में 100 से ज्यादा बसें, शिक्षकों के वाहन और बच्चो के दोपहिया वाहन पार्क होते हैं। 25 दिनों में यह वाहन कहां जाएंगे? इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

यातायात : बेतरतीब पार्किंग से बीआरटीएस और रिंग रोड के बीच की लिंक रोड प्रभावित होगी। यह रोड विजयनगर, स्कीम-54, 74 और 78 को महालक्ष्मीनगर, चिकित्सकनगर, स्कीम-94, सार्इंविहार कॉलोनी, क्लासिक पुर्णिमा जैसी 20 से ज्यादा वैध-अवैध कॉलोनियों को जोड़ता है। यातायात विभाग भास्कर को अनुमति देने से पहले यदि सड़क पर वाहनों का दबाव जांच ले तो पता चल जाएगा कि यहां कितना लोड है।

स्वास्थ्य : गुजराती समाज और बॉम्बे हॉस्पिटल ‘जहां ज्यादातर क्रिटिकल केस आते हैं’, के बीच डॉ. सुनील जैन का टोटल हॉस्पिटल, गोल्ड जिम, महेश दृष्टिहीन कल्याण केंद्र व अपाहिजों से जुड़ी अन्य संस्थाएं और उनके परिसर हैं। इनमें से कुछ में हॉस्टल व्यवस्था भी है। एक लाख वॉट के साउंड इनकी सेहत भी बिगाड़ेगा। सामने बीसीएम हाईट्स और शेखर प्लेनेट जैसी मल्टियां हैं जहां कई आईएएस, आईपीएस और आईआरएस रहते हैं। वे भी प्रभावित होंगे।

दबंग दुनिया अखबार, इंदौर में विनोद शर्मा की प्रकाशित रिपोर्ट का संपादित अंश.

इंदौर में राजदीप सरदेसाई ने भारतीय समाज को मुफ्तखोर कहा

इंदौर। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंदौर प्रेस क्लब के संयुक्त तत्वावधान में ‘पत्रकारिता का नया दौर और चुनौतियां’ विषय पर होटल फार्च्यून लैंडमार्क में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में वक्ताओं ने कहा कि वक्त के साथ पत्रकारिता का दौर भी बदल रहा है। इस नए दौर में साथ चलने के लिए पत्रकार और पाठक दोनों को बदलना होगा। श्री त्रिपुरारि शरण, महानिदेशक, दूरदर्शन ने कहा कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में फर्क है। प्रिंट वाले जो लिखते हैं वे बहुत सोच-समझकर अपनी बात कहते हैं, लेकिन जो बोलते हैं जरूरी नहीं कि वह पहले उस पर सोचते हैं। आज पत्रकारिता में विश्लेषण करने की क्षमता कम होती जा रही है। दूरदर्शन पर आज चाणक्य, बुनियाद, हम लोग और व्योमकेश बक्क्षी जैसे ऐतिहासिक सीरियल इसलिए दोबारा दिखाए जा रहे हैं ताकि नई पीढ़ी के लोग हमारी संस्कृति को करीब से जान सके।

राजदीप सरदेसाई, एडिटर इन चीफ, आईबीएन-सीएनएन, नेटवर्क18 ने कहा कि आम जनता का स्वभाव बन गया कि व टीवी चैनल को देखती है और साथ में उसे कोसती भी है क्या इसे हम टीवी चैनलों की विश्वसनीयता पर संकट कहे। टीवी चैनलों के आने के बाद जो कुछ गलत हो रहा था उसे लोगों के बीच में लाने का काम शुरु हुआ। चैनलों के सामने दो तरह की चुनौतियां है, जिससे हमें मुकाबला करना है। यह सही है कि जिनके पास कालाधन है, बिल्डर है, रीयल एस्टेट से जुड़े हैं और राजनीति में रसूखदार है उन लोगों ने टीवी चैनल शुरू किए, लेकिन अधिकांश आज घाटे में हैं। भारतीय समाज को मुफ्त में खाने की आदत सी पड़ गई है इसलिए वह ३०० रुपए में २५० चैनल देखना चाहता हैं। इस फील्ड में यदि किसी ने पैसा बनाया तो वो केबल ऑपरेटरों ने। टीवी चैनलों को एक बड़ी राशि इन ऑपरेटरों को देना पड़ती है। यदि नासिक शहर में छगन भुजबल के खिलाफ कोई स्टोरी दिखाई जाती है तो केबल वाले उसे काट देते हैं। यही स्थिति चेन्नई में जयललिता के खिलाफ दिखाओ तो होती है। टीवी चैनल के आने के बाद हर आधे घंटे पहले जो दिखाया गया वह इतिहास बन जाता है। दरअसल टीवी पत्रकारिता में टीआरपी का जोर है और वहां भी रैंकिंग हो रही है। जिस चैनल की रैंकिंग ज्यादा वह सबसे बड़ा चैनल। जब एक टीवी पत्रकार ने बिहार के प्रोफेसर की प्रेम कहानी पर स्टोरी बनाई तो उसे टॉप टेन में रैंकिंग मिल गई। कहने का मकसद यह है कि कई मर्तबा टीआरपी की दौड़ में टीवी पत्रकार ऐसी स्टोरी बनाते हैं,  जिसका जनता से कोई सरोकार नहीं या जिसमें राष्ट्रीय हित की कोई बात नहीं। यह कहना गलत है कि पत्रकार बिके हुए हैं। अगर कोई पत्रकार मोदी के साथ है और राहुल के साथ नहीं तो उसे राहुल के समर्थक गलत मानते हैं, जबकि पत्रकार को पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए तभी वह अपनी खबर के साथ और आम जनता के साथ न्याय कर सकेगा। टीवी चैनल को २४ घंटे कार्यक्रम दिखाना होते हैं, इसलिए वे अपनी न्यूजरूम में हर खबर के साथ ड्रामा का तड़का लगा देते हैं ताकि लोगों का आकर्षक चैनल के प्रति बना रहे। वर्ना लोग रिमोट का बटन दबाकर चैनल बदल देंगे। जैसे किसी एंकर को क्राइम पर स्टोरी करना है तो कई बार उसे अपराधी जैसा भी बनना पड़ता है। आज की टीवी पत्रकारिता भी बॉक्स ऑफिस जैसी हो गई है। पहले फिल्में ही बॉक्स ऑफिस में कलेक्शन करती थी अब टीवी चैनल भी ऐसा करने लगे हैं।
वायु की गति से हम आगे बढ़ रहे हैं

आशुतोष, एडिटर, आईबीएन7 ने कहा कि आज नया भारत बन रहा है या गढ़ा जा रहा है, पर हम उसे समझ नहीं रहे हैं। हम नए बिन्दुओं की तलाश नहीं करना चाहते। नई पीढ़ी किस्मत वाली है, जिसने बहुत बड़े बदलाव देखे हैं। आज हम वायु की गति से आगे बढ़ रहे हैं। देश और काल दोनों ही बदल गए हैं। टीवी पत्रकारिता ने बहुत बड़ी क्रांति ला दी है। इसने अभिजात्य संस्कृति को ध्वस्त किया है। सामंतवादी सोच को बदला है और जमीन तक लोकतंत्र को फैलाया है। जो २५ साल पहले नहीं था वह आज हम अपने सामने देख रहे हैं। इतनी बड़ी क्रांति पहले कभी नहीं हुई। टीवी पत्रकारिता ने जनता को एक आवाज दी है और वे किसी भी समय एक जगह पर एक साथ इकट्ठे हो जाते हैं यह बड़ी बात है। टीवी पत्रकारिता के साथ चुनौतियां भी आई है, जिसका मुकाबला हमें ही करना होगा।

सीमा मुस्तफा, वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभ लेखक ने कहा कि एक दौर था जब पत्रकारों को रिपोर्टिंग करने के बाद अपनी खबरों को दफ्तर में भेजने के लिए पोस्ट ऑफिस या अन्य सेंटरों पर घंटों इंतजार करना पड़ता था। यदि कोई पत्रकार बाहर जाकर रिपोर्टिंग करता था तो उसके बारे में जानकारी दूसरे-तीसरे दिन मिलती थी। आज स्थिति बदल गई है। आज मोबाइल, इंटरनेट का जमाना है। इनफार्मेंशन के सबसे हथियार आज हमारे पास है। दुनिया के किसी भी हिस्से में बैठकर आप खबरें पलभर में एक जगह से दूसरी जगह भेज सकते हैं, लेकिन जर्नलिज्म में कमिटमेंट समाप्त होता जा रहा है। अखबारों में संपादकों की पोस्ट खत्म हो गई है, अब मैनेजर और प्रोपाराइटर का जमाना है। टीवी चैनल राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी को दिखाता है, लेकिन मुजफ्फर नगर के दंगे नहीं दिखाता। छोटी-छोटी जगह पर जो हादसे हो रहे, उन पर किसी की नजर नहीं है। टीवी पत्रकारिता में एक बहुत बड़ा काम किया है, उसने भ्रष्टाचार को उजागर किया है। यूं कहे कि सबसे अधिक आर्थिक घोटाले टीवी चैनलों ने ही उजागर किए। मीडिया को अपनी आचार संहिता खुद बनाना होगी।

श्रवण गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार एवं सदस्य भारतीय प्रेस परिषद् ने कहा कि पत्रकारिता में विश्वसनीयता आज सबसे बड़ी चुनौती है। खबरों में वास्तविकता का होना जरूरी है, लेकिन आज नकलीपन का जमाना है। सही चीजें खत्म हो रही है और गलत चीजें सामने आ रही है। अगर अखबार की कीमत उसकी रद्दी की कीमत से कुछ अधिक होगी तो उसमें छपने वाली खबरें भी रद्दी की शक्ल में होगी। उन खबरों का न कोई मूल्य होगा न क्रेडिबिलिटी। कारपोरेट घरानों का प्रवेश मीडिया में बढ़ता जा रहा है। उत्तर भारत में औद्योगिक घराने, राजनीतिक दल अपने हितों के इस्तेमाल के लिए टीवी चैनल और अखबारों का उपयोग कर रहे हैं। ये एक चुनौती है जिसे हमें समझना होगा। लोग अखबार खरीदकर कम मांगकर अधिक पड़ते हैं। हिन्दी भाषी राज्यों में अखबार के पाठक अधिक है ग्राहक कम। अब मोबाइल का जमाना है। ऐसे में हमें स्वयं अपने हथियार गढ़ने होंगे। खासकर हिन्दी भाषी राज्यों को अधिक मेहनत करने की जरूरत है।

अजय उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि लोकतंत्र में प्रेस एक मजबूत स्तंभ है। पत्रकारिता टीवी की हो या प्रिंट की, दोनों ही ताकतवर है, लेकिन लिखे शब्दों में अधिक ताकत होती है। पत्रकारिता में वेरिफिकेशन का होना जरूरी है। वर्तमान दौर में पत्रकारिता को पुनर्भाषित करना होगा। सोशल मीडिया, पत्रकारिता और मीडिया कम्युनिकेशन तीनों अलग-अलग चीजे हैं। वर्तमान में विज्ञापन और संपादकीय के बीच एक नया विभाग शुरू हो रहा है जो विज्ञापन भी और संपादकीय भी। हमें इस चीज को समझना होगा।

अनुराग बत्रा, एडिटर, मीडियाएक्सचेंज डॉट कॉम ने कहा कि आज की पत्रकारिता में बहुत सारे बदलाव आ चुके हैं। आज डिजीटल का जोर है। आने वाले दिनों में हम ई-पत्रकारिता को अपनाएंगे।  लोग अखबार इंटरनेट और मोबाइल पर पढ़ेंगे। सोशल साइट का प्रयोग अधिक बढ़ेगा। वर्तमान में २.७ बिलियन वेबपेज रोजाना सर्च हो रहे हैं।  ३२ हजार करोड़ विज्ञापन पर खर्च हो रहे हैं। जिसका एक बड़ा भाग डिजीटल पर खर्च हो रहा है। वर्तमान में सच बोलने वाले लोग कम है, लेकिन उनकी वेल्यु और क्रेडिबिलिटी अधिक है।

विनय छजलानी, सीईओ, वेबदुनिया ने कहा कि पत्रकारिता में ई-कम्यूनिकेशन का दौर शुरू हो चुका है। अब वेबसाइट, ई-मेल, यूट्यूब, सोशल साइट, ट्यूटर, ब्लॉग जैसे ई-कम्यूनिकेशन पर चर्चा अधिक होती है। नई पीढ़ी इन चीजों को तेजी से अपना रही है। ई-जर्नलिज्म को अब हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। समय के साथ इसका महत्व बढ़ता जा रहा है।

प्रवीण कुमार खारीवाल, अध्यक्ष, इंदौर प्रेस क्लब ने कहा कि भूमंडलीकरण और उदारवादी अर्थव्यवस्था का मौजूदा दौर जबसे आरंभ हुआ है तब से हमारी पत्रकारिता के चाल, चरित्र और चेहरे में भी काफी बदलाव आया है, उसके सरोकार भी बदले हैं और उसके समक्ष कई तरह की चुनौतियां भी आ खड़ी हुई है। यह बदलाव और चुनौतियां किस तरह की है, मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊगा, क्योंकि इसके लिए हमारे बीच विशेषज्ञ वक्ता मौजूद हैं जो इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

प्रारंभ में अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर परिसंवाद का शुभारंभ किया। विषय प्रवर्तन वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग ने किया। अतिथियों का परिचय एडिटर्स गिल्ड के सचिव विजय नाईक ने दिया। स्वागत उदबोधन इंदौर प्रेस क्लब अध्यक्ष प्रवीण कुमार खारीवाल ने दिया। कार्यक्रम का संचालन महासचिव अरविंद तिवारी ने किया, जबकि एडिटर्स गिल्ड के कोषाध्यक्ष सुरेश बाफना ने आभार व्यक्त किया। अतिथि स्वागत प्रवीण कुमार खारीवाल, अमित सोनी, सुनील जोशी, मोहित भार्गव, अनिल कुमार, संजय लाहोटी, गंगेश मिश्र, नितिन माहेश्वरी, पंकज मित्तल, कमल कस्तुरी,  हेमंत शर्मा, विजय गुंजाल, रचना जौहरी। आदि ने किया। अतिथियों को प्रतीक चिन्ह राजा शर्मा, डॉ. प्रशांत तिवारी, सुनील अग्रवाल, शशीन्द्र जलधारी, रुमनी घोष, आलोक ठक्कर, डॉ. हनीष अजमेरा, संजीव सिंह ने भेंट किए। कार्यक्रम में कुलपति डॉ. डीपी सिंह, संभागायुक्त संजय दुबे, कलेक्टर आकाश त्रिपाठी, डीआईजी राकेश गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार अभय छजलानी, पूर्व कुलपति डॉ. भरत छापरवाल, उद्योगपति रमेश बाहेती,  सुरेंद्र संघवी, विनय छजलानी, विधायक अश्विन जोशी, खनिज विकास निगम के उपाध्यक्ष गोविंद मालू सहित अनेक गणमान्य व प्रबुद्धजन उपस्थित थे। इस अवसर पर युवा पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक तहकीकात का विमोचन भी हुआ। अतिथि वक्ताओं ने श्रोताओं के प्रश्नों का विस्तार से जवाब भी दिए।

प्रेस रिलीज

राहुल गांधी ने सिर्फ अपनी मां सोनिया और अपने पीएम मनमोहन का नाम बदनाम किया

Kanwal Bharti : अगर राहुल गाँधी जनता को यह दिखाना चाहते हैं कि वह राजनैतिक क्रान्ति लाना चाहते हैं, तो वह गलतफहमी में हैं. अध्यादेश बकवास है, उसे फाड़ कर रद्दी की टोकरी में डाल दो, यह कहने से क्रान्ति नहीं होती है. यह ड्रामा है, और जनता इसे अच्छी तरह जानती है. क्या यह संभव है कि सरकार कोई अध्यादेश लाये और सोनिया-राहुल को उसकी खबर तक न हो? पूरा देश जान रहा था कि सरकार दाग़ी नेताओं को बचाने के लिए बिल ला रही है, उसे राहुल न जानते हों, कौन यकीन करेगा?

अगर राहुल उसके पक्ष में नहीं थे, तो उस बिल को उन्होंने बनने ही क्यों दिया? अब बिल का विरोध करके प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह को अपमानित करने के पीछे की सियासत क्रांतिकारी नहीं कही जा सकती. असल में यह बिल पास ही नहीं होना चाहिए था. क्यों पास हुआ? वहां तो राहुल चुप रहे, अब भाजपा का विरोध देख कर क्रांतिकारी भूमिका में आ गये. सवाल यह है कि कांग्रेस ने दागी मंत्रियों के हक में यह बिल बनाया ही क्यों?

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Atul Agrawaal : बकवास अध्यादेश को फाड़ कर फेंक देने वाले राहुल गांधी के बयान ने सिर्फ प्रधानमंत्री की ही फजीहत नहीं कराई, बल्कि 21 सितंबर को इस ऑर्डिनेंस को पास करने वाली कोर ग्रुप की मीटिंग की अध्यक्षता करने वाली अपनी मां सोनिया गांधी को भी मूर्ख साबित कर दिया है…

जाने-माने दलित चिंतक कंवल भारती और पत्रकार / एंकर अतुल अग्रवाल के फेसबुक वॉल से.

जिसके साथ सात लोगों ने गैंग रेप किया, उसे दो सौ कोड़े मारे जाने की सजा मिली

Balendu Swami : सउदी अरब में एक 19 साल की लड़की के साथ 7 लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया, और उसे इस्लामिक कानून के अनुसार 200 कोड़े मारने तथा 6 महीने जेल की सज़ा मिली. उसका जुर्म ये था कि वो कार में जिनके साथ बैठी थी वो उसके रिश्तेदार नहीं थे. पहले उसे 90 कोड़े मारने की सज़ा मिली थी परन्तु उसके वकील ने सज़ा पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करी और इस सम्बन्ध में मीडिया से बात करी इसलिए उसकी सज़ा 90 की जगह बढाकर 200 कोड़े कर दी गई और उसके वकील का वकालत करने का लाइसेंस भी छीन लिया गया.

ये केस अब अन्तर्राष्ट्रीय सुर्खियाँ पा चुका है. इसलिए मैं कहता हूँ कि ये धर्म नीचता की हद तक गन्दा और घिनौना है, और इसके कानून की वाहियात किताब के ऊपर तो उलटी दस्त करने का मन होता है मेरा. और सुन लो घोषित अघोषित मुल्लों, अगर मेरी बात सुनकर मिर्ची लगे तुम्हें तो तुरंत हट जाओ मेरी लिस्ट से, तुम्हारे इस खून और क्रूरता से भरे शान्ति के मज़हब, उसकी किताब और इसे बनाने वाले के लिए मैं और भी कठोर बोलूंगा.

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Balendu Swami : सभी आदरणीय और प्रिय कामरेडों से क्षमापूर्वक! बहुत सारे लाल सलाम वाले मेरे फेसबुक मित्र हैं, वो मुझे पसंद करते हैं और मैं भी उन्हें पसंद करता हूँ. निश्चित ही धर्म अफीम है और स्वाभाविक तौर पर उन्हें मेरा धर्म विरोधी रुख सुहाता है. परन्तु जहाँ मैंने इस्लाम की बुराइयों पर बोलना शुरू किया तभी इनको सांप सूंघ जाता है! क्यों जी, क्या ये नकली धर्म निरपेक्षता नहीं है हमारे देश में? मुझे पूरा विश्वास है कि इसीलिये इन लोगों का यहाँ पर विकास नहीं हो पाया!

स्वामी बालेंदु के फेसबुक वॉल से.

लड़कों की बजाय, लड़कियों का आना अच्छा लगता है

Manisha Pandey : बहुत सारे लड़के मेरे दोस्‍त हैं और बहुत प्‍यारे दोस्‍त हैं। एकदम यारबाश। लेकिन फिर भी घर आकर पार्टीबाजी करें तो मजे के साथ-साथ बहुत गुस्‍सा आता है। जबकि लड़कियों का आना, रहना, पार्टी करना, दारू पीकर लोटना सब अच्‍छा लगता है।

कारण?

लड़के आते हैं तो लगता है जैसे घर में कोई तूफान आकर गुजरा है। किचन से लेकर रूम तक पूरा घर कबाड़खाना बन जाता है। प्‍लेट कहीं पड़ी है, बीयर की बोतल कहीं पड़ी है। जगह-जगह एश्‍ट्रे बिखरा पड़ा है। जो किताब बुक शेल्‍फ से निकाली, वहीं छोड़ दी। सब्‍जी के छिल्‍के, आटा, चावल पूरे प्‍लेटफॉर्म पर लोट रहा है। कहीं चिप्‍स का पैकेट उड़ रहा है, कहीं मूंगफली, नमकीन चादर पर विराजमान हैं। और तो और, कुशन और चादर पर दाग भी लग जाते हैं। पूरे घर में उथल-पुथल। सब ओर तबाही। पानी की बोतलें पी-पीकर खाली कर दीं और भरने का होश किसी नहीं।

और लड़कियां?

कितनी प्‍यारी होती हैं। कितनी अच्‍छी, सलीकेदार, सफाईदार, समझदार। सब्‍जी काटेंगी तो सारे छिल्‍के डस्‍टबिन में। पानी की बोतल खाली होने से पहले ही भरकर रख दी। कभी हम लोग बाहर से शॉपिंग करके आए तो एक स्‍कर्ट के साथ दस टॉप निकालकर पहन-पहनकर आईने के सामने मटक रहे हैं। पूरे बेड पर कपड़ों का ढेर लग गया। लेकिन फैशन परेड पूरी होते ही दस मिनट के अंदर बिना कहे मेरी दोस्‍त सारे कपड़े तह करके जगह पर पहुंचा देती है। ये पूछने की भी जरूरत नहीं कि इसे रखना कहां है। और लड़के चायपत्‍ती का डिब्‍बा आलमारी से उठाने के बाद आवाज लगाकर पूछते हैं कि अब इसे रखूं कहां?

अरे अपनी खोपड़ी पर रख लो। चरस।

लड़कों को ये सीखने की जरूरत है। उन्‍हें अपनी लापरवाहियां और नाकारापन ही अपना एसेट लगता है। ये कोई महान गुण नहीं है। तुम्‍हारी इंडियन, नॉर्थ इंडियन परवरिश का नतीजा है। क्‍या समझे बेटा?

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Manisha Pandey : लड़कियां काम करती हुई कितनी अच्‍छी लगती हैं। उस दिन पासपोर्ट ऑफिस में काम करने वाली सारी लड़कियां कितनी कमाल की लग रही थीं। कितनी स्‍मार्ट, खूबसूरत, एफिशिएंट। जिस लड़की ने मेरे डॉक्‍यूमेंट चेक किए, कितनी फटाफट सब काम कर रही थी और बिलकुल फोकस्‍ड। कभी किसी रिपोर्टिंग एसाइनमेंट में जींस और जूता पहले, 15 किलो का कैमरा अपने कंधे पर लादकर दौड़ती और शूट करती हुई लड़की को देखा है। अद्भुत। कितनी कमाल की लगती है, कॉन्फिडेंट और जिंदगी से भरी हुई।

साइकिल और बाइक चलाती, दौड़ती-भागती, काम पर जाती, बोलती, चीखती, लड़ती, जीती और अपने फैसले लेती हुई लड़कियां कमाल लगती हैं।

और पता है सबसे ज्‍यादा गुस्‍सा किन पर आता है।

फेसबुक पर मोहब्‍बती शायरी पोस्‍ट करने वाली लड़कियों पर।

वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टुडे हिंदी मैग्जीन की फीचर एडिटर मनीषा पांडेय के फेसबुक वॉल से.

जब जेब काटने के बाद जेबकतरा भाई ने मेरी मां को पैसा भेजा!

Nitin Sharma : बस से उतरकर.. जेब में हाथ डाला, मैं चौंक पड़ा.., जेब कट चुकी थी..। जेब में था भी क्या..? कुल 150 रुपए और एक खत..!! जो मैंने अपनी माँ को लिखा था कि – ''मेरी नौकरी छूट गई है; अभी पैसे नहीं भेज पाऊँगा…।'' तीन दिनों से वह पोस्टकार्ड मेरी जेब में पड़ा था। पोस्ट करने को मन ही नहीं कर रहा था। 150 रुपए जा चुके थे..। यूँ 150 रुपए ..कोई बड़ी रकम नहीं थी., लेकिन जिसकी नौकरी छूट चुकी हो, उसके लिए 150 रुपए 1500 सौ से कम नहीं होते..!!

कुछ दिन गुजरे…। माँ का खत मिला..। पढ़ने से पूर्व.. मैं सहम गया..। जरूर.. पैसे भेजने.. को लिखा होगा..। …लेकिन, खत पढ़कर.. मैं हैरान.. रह गया। माँ ने लिखा था — “बेटा, तेरा 500 रुपए का.. भेजा हुआ मनीआर्डर.. मिल गया है। तू कितना अच्छा है रे ! …पैसे भेजने में.. कभी लापरवाही.. नहीं बरतता..।” मैं इसी.. उधेड़- बुन में लग गया.. कि आखिर.. माँ को मनीआर्डर.. किसने भेजा होगा..? कुछ दिन बाद., एक और पत्र मिला..। चंद लाइनें.. लिखी थीं—आड़ी- तिरछी..। बड़ी मुश्किल से खत पढ़ पाया..।

लिखा था… “भाई, 150 रुपए तुम्हारे और 350 रुपए अपनी ओर से मिलाकर मैंने तुम्हारी माँ को मनीआर्डर भेज दिया है। फिकर न करना। माँ तो सबकी एक जैसी ही होती है न..!! वह क्यों भूखी रहे? तुम्हारा- जेबकतरा भाई..!!!
दुनिया में आज भी माँ को प्यार करने वाले ऐसे इन्सान हैं..!

नितिन शर्मा के फेसबुक वॉल से.

भगत सिंह के जन्मदिन पर भारत सरकार ‘युवा दिवस’ क्यों नहीं मनाती?

Manish Sisodia : शहीदे आज़म भगत सिंह की एक और जयंती पर एक सवाल – पूरा देश भगत सिंह का अगाध सम्मान करता है, फिर भी उनके जन्मदिन पर भारत सरकार 'युवा दिवस' क्यों नहीं मनाती. सरकारी युवा दिवस स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि पर मनाया जाता है. इसका कारण क्या हो सकता है? अपूर्वानंद ने एक शानदार लेख जनसत्ता में लिखा है. जो लोग भगत सिंह में थोडी भी आस्था रखते हैं उन्हें यह लेख ज़रूर पढ़ना चाहिए. तमाम तरह के विवाद का खतरा उठाते हुए अपूर्वानंद का कहना है कि 'डिफाल्ट सेटिंग' में हिन्दू मानसिकता का नुकसान भगत सिंह को पहुंचा है. इसीलिए छदम राष्ट्रवादियों की सरकारों के दौर में भी भगत सिंह को वह सम्मान नहीं मिल सका.

मेरा मानना है कि भगत सिंह का 'शहादत पक्ष' राजनीति के लिए सबसे सुविधाजनक पक्ष रहा है. उनके व्यक्तित्व और उनकी सोच से कांग्रेस को तो कभी सरोकार हो ही नहीं सकता था, छदम राष्ट्रवादियों के लिए भी वह परेशानी बन सकता था क्योंकि मात्र 24 साल के जीवन में अपनी सोच को भगत सिंह ने कार्ल मार्क्स, टैगोर से लेकर टालस्टाय और गोर्की तक को पढकर तपाया था. देश और समाज को लेकर उनके सपने पढ़कर लगा ही नहीं कि यह शख्स मात्र 24 साल जिया था. और उनकी एक बात जो कांग्रेस या इन छदम राष्ट्रवादियों को कभी नहीं सहन हो सकती, वह है उनका नारा. उनका नारा सिर्फ 'इंकलाब-जिंदाबाद' नहीं था, इसकी अगली हुंकार थी – 'साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद'…. अब भला लोकतंत्र के नाम पर देश को पुन: देशी-विदेशी कंपनियों की दुकान बना देने वाले दलों को भगत सिंह का यह पक्ष कैसे सहन हो सकता है. इसीलिए भगत सिंह का व्यक्तित्व आज तक जनता के दिल में बसा है और हुक्मरानों के गले में अटका रहता है.

लेखक मनीष सिसोदिया पत्रकार रहे हैं और इन दिनों आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में सक्रिय हैं. मनीष दिल्ली के पटपड़गंज विधानसभा चुनाव क्षेत्र से 'आप' के उम्मीदवार हैं.

शहीद भगत सिंह के मायने

Ambarish Rai :  आज शहीदे आज़म भगत सिंह का जन्म दिन है.वे आज भी देश के नौजवानों के लिए बदलाव के संघर्ष में प्रेरणास्रोत एवं नायक बने हुए हैं. उपभोक्तावादी संस्कृति एवं बाज़ार की ताकतें तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें इस मुकाम से बेदखल नहीं कर सकीं हैं. इसलिए वे अब भगत सिंह के मायने ही बदल देना चाहती हैं.

यथास्थितवादी एवं सांप्रदायिक ताकतें, जिनका भगत सिंह ने आजीवन बिरोध किया, अब उनके नाम पर समारोह आयिजित करने में लग गयी हैं. और उनके विचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही हैं. जबकि यह बात किसी से छुपी नहीं है की शहीद भगत सिंह और उनके साथी अंग्रेजों को बेदखल कर हिंदुस्तान में समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे. एक न्याय पूर्ण समाज, जो गैरबराबरी पर न खड़ा हो, की स्थापना के प्रयास में जुटे थे. और इसके लिए उन्होंने नौजवानों से गावों में जाने का आवाहन भी किया था.

साथ ही देश को संप्रभुता संपन्न रास्ट्र के रूप में मजबूत करना चाहते थे. भगत सिंह छुवाछूत की जिम्मेदार जातिप्रथा के धुर विरोधी थे. साम्राज्यवाद,सामन्ती व्यवस्था तथा साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाली शक्तियां हमेशा उनके हमलें के निशाने पर

अंबरीश राय
अंबरीश राय
रहीं. आज की परिस्थितियों को देखते हुए वे बेतहाशा यद् आ रहे हैं….काश भगत सिंह यदि आज जिन्दा होते……!!! शहीद भगत सिंह अमर रहें.

लेखक अंबरीश राय सीपीआई और सीपीआई (एमएल) के सीनियर लीडर रहे हैं. इन दिनों प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में कई किस्म के प्रयोगों में खुद को व्यस्त किए हुए हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से साभार लेकर भड़ास प्रकाशित किया गया है.

मुंबई इमारत दुर्घटना में पत्रकार योगेश पवार का निधन

मुंबई। यहाँ के डाकयार्ड में शुक्रवार को हुई एक इमारत दुर्घटना में मराठी दैनिक सकाळ के संवाददाता योगेश पवार का निधन हो गया. योगेश के पिता मुंबई मनपा विभाग में कार्यरत हैं. दुर्घटना में उनके पिता के घायल होने की खबर है. खबर लिखे जाने तक इस दुर्घटना में 50 से अधिक लोगों के मारे जाने की जानकारी मिली है.

सरकारी महकमों से खबरें निकालने और उनकी खामियों पर गहरा प्रहार करने वाले योगेश खुद सरकारी खामियों के शिकार हो गये. दुर्घटनाग्रस्त ईमारत मनपा की थी, जिसमे मनपा कर्मचारी रहते थे. ३० वर्षीय योगेश अविवाहित थे. उक्त ईमारत में वे अपने पिता के साथ रहते थे. घर के अन्य सदस्य दूसरी जगह रहते थे. उनके निधन पर भारतीय पत्रकार विकास परिषद सहित तमाम पत्रकार संगठनों, पत्रकार साथियों व समाजसेवियों ने गहरा दुःख व्यक्त किया है.

प्रिंट मीडिया ने सरकार से कहा, एफडीआई की सीमा बढ़ाकर 49 प्रतिशत की जाये

बेंगलूर : इंडिया न्यूजपेपर सोसायटी (आईएनएस) ने प्रिंट मीडिया क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी करने पर जोर दिया है. आईएनएस ने कहा कि मीडिया कंपनियों को विस्तार के लिए धन के प्रवाह की जरूरत है, क्योंकि और वृद्धि की संभावनाएं व्यापक हैं.

आईएनएस की 74वीं सालाना आम बैठक में अपने अध्यक्षीय संबोधन में के एन तिलक कुमार ने कहा कि ऐसे समय पर, जबकि पश्चिमी दुनिया में पिछले कुछ साल में  प्रिंट मीडिया क्षेत्र में गिरावट आयी है, भारत में पिछले कुछ दशकों में यह काफी तेजी से बढ़ा है.

उनके अनुसार आगामी सालों में इसमें वृद्धि की संभावनाएं व्यापक हैं. कुमार ने कहा, इस वृद्धि को बनाये रखने के लिए मीडिया कंपनियों को धन अंतर्प्रवाह की जरूरत है ताकि वे अपने परिचालन का विस्तार कर सकें. इस संदर्भ में प्रिंट मीडिया में एफडीआई सीमा को मौजूदा 26 प्रतिशत से बढाकर 49 प्रतिशत किये जाने की जरूरत  है.
 

आईआईएमसी फर्स्ट बैच के दो छात्रों की पच्चीस साल बाद हुई यशवंत के घर पर मुलाकात

Yashwant Singh : आईआईएमसी के पहले बैच के दो विद्यार्थी करीब पच्चीस साल बाद आज मिले.. वो भी मेरे घर पर… मुंबई से सीनियर बिजनेस जर्नलिस्ट कमल शर्मा दिल्ली आए हुए हैं. उनसे परिचय, जान-पहचान हिंदी ब्लागिंग के शुरुआती दौर से है. तब उनका एक ब्लाग 'वाह मनी' हुआ करता था. अपन लोग 'भड़ास' ब्लाग चलाते थे. हम सारे हिंदी ब्लागरों की फीड 'ब्लागवाणी' डाट काम पर आया करती और वहां हम सब अपने अपने ब्लाग की रेटिंग, हिट्स आदि देख-देख कर खुश हुआ करते.

हिंदी ब्लागिंग के शुरुआती काल के घोर लड़ाकू, असभ्य और अराजक लोगों में मैं शुमार रहा तो शरीफ, सरल और सुसंस्कृत लोगों में कमल शर्मा, बालेंदु दधीच आदि ब्लागरों का नाम लिया जा सकता है. उन्हीं कमल शर्मा जी ने दिल्ली आने पर फोन किया तो उनको मैंने घर बुला लिया. तब तक अनामी शरण बबल जी का फोन आया तो उनको भी घर बुला लिया. और, पता चला कि ये दोनों तो इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मास कम्युनिकेशन के पहले बैच के स्टूडेंट हैं और आज पच्चीस साल बाद मिल रहे हैं.. दोनों देर तक गले मिले और मिलन का साक्षी मुझे बनाने के लिए बीच में बिठाकर फोटो खिंचाये.. अपनी स्थिति बीच वाली कुछ वैसी नहीं लग रही कि .. दाल भात में मूसलचंद…

तस्वीर में दाएं कमल शर्मा जी हैं और बाएं अनामी शरण बबल.

और हां, एक बात तो बताना भूल ही गया.. वो ये कि कमल शर्मा जी प्याज लहसुन तक नहीं खाते. और, अपन का दिल होता है कि कोई मेहमान आ जाए तो उसे मुर्गा पकाकर खिलाऊं. सो सोच में पड़ गया कि बिना लहसुन प्याज का भला क्या पक सकता है? ऐसे में अपने साथी राजीव शर्मा जी लंबे दाढ़ी बाल वाले को याद किया. वो भी प्याज लहसुन नहीं खाते और बाबा नीम करोली जी के अनन्य भक्त हैं. फेसबुक पर वो जितने देर बैठे रहेंगे, सिर्फ नीम करोली बाबा की फोटो शेयर करते रहेंगे, राम राम लिखते हुए..

एक बार तो राजीव की इस अंधभक्ति से उबकर उन्हें अनफ्रेंड कर दिया फेसबुक पर. जब उन्हें कई दिनों बाद पता चला कि वे हम अब एफबी पर फ्रेंड नहीं रहे तो उनका फोन आया.. तब मैंने बहाना मारा कि यार नशे कि अवस्था में कर्सर जाने कैसे कहां कहां हिल उड़ चल जाता है और उसी प्रक्रिया में डिलीट, अनफ्रेंड, ब्लाक टाइप के कुकृत्य हो जाया करते हैं.. खैर, उन्हें दोबारा फ्रेंड बनाया और जब जब वे बाबा नीम करोली महाराज के फोटो शेयर करते हैं, तब तब मजबूरी में मैं भी जय हो जय हो टाइप करता रहता हूं…

तो, बात कर रहा था कि बिना प्याज लहसुन के खाना कैसे बने, इस समस्या के हल के लिए राजीव शर्मा जी को बुलाया. उनके नेतृत्व में जो पंचमेल दाल बनी और खड़े मसालों को पीस कर फ्राई की गई, वह लाजवाब रहा… मैंने आलू मिर्च की सूखी सब्जी बना दी. फटाफट चावल पकाया. पत्नी ने मदद करते हुए रोटी बना दिया. खाना रेडी. सारे भाइयों ने जी भर खाया, देर तक गपियाये और सब अपने अपने राह चलते बने… तो, इस तरह एक अदभुत दिन बीता आज.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

कौटिल्य ने अब दीपक चौरसिया के स्टूडियो में बैठे-बैठे छींकना शुरू कर दिया है

Vineet Kumar : कौटिल्य ने अब स्टूडियो में बैठे-बैठे छींकना शुरु कर दिया है, दीपक चौरसिया ने कहा- आपको कोल्ड हो रहा है. कौटिल्य का जवाब है- नहीं, दरअसल मेरे घर में एसी नहीं है न और यहां है इसलिए.मैंने तो कभी एसी भी नहीं देखा. दीपक चौरसिया का जवाब होता है- लेकिन ये स्टूडियो तो बिना एसी के चलेंगे नहीं. मैं आपको एसी दिखाउंगा.

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चैनलों ने पौने छह साल के कौटिल्य को मदारी का बंदर बना दिया है. हरियाणा( झझर) के इस बच्चे की खास बात है कि इसे महज तीन महीने में पूरी एटलस याद हो गई है और बाकी विषय के सवालों के जवाब याद हैं. पहले तो चैनलों ने इसे खबर की शक्ल में दिखाया, तब तक तो ठीक था लेकिन देख रहा हूं कि एक-एक करके चैनल उनके साथ कौन बनेगा करोड़पति टाइप के गेम शो खेलने लगे हैं. कल जब इंडिया न्यूज पर दीपक चौरसिया के साथ इसी तरह के गेम शो "जीनियस का टेस्ट लाइव" देख रहा था जिसमे दीपक चौरसिया पूरी तरह बोलने से लेकर चेक देने के अंदाज में अमिताभ बच्चन बनने की कोशिश कर रहे थे तो लगा कि चलो ये दीपक चौरसिया है. इस तरह की चिरकुटई वो पहले भी कई बार कर चुके हैं, बाइक पर जॉन इब्राहिम के साथ बिना हेलमेट पहले नोएडा गौतमबुद्ध नगर से गुजर चुके हैं औऱ हिस्स फिल्म के दौरान भी जंगल-झाड़ियों के बीच मल्लिका शहरावत का इंटरव्यू कर चुके हैं. बीच-बीच में अच्छा भी लगा कि कुछ नहीं तो उन्हें बच्चों से बात करने की बेहद संजीदा तरीके मालूम हैं और हो न हों अपने निजी जीवन में बहुत ही अच्छे बाप हों. वो ये खेल आज भी जारी है. उसे आज बाकायदा कुर्ते पायजामे और लाल तिलक में चैनल पर उतारा गया है. उसे सरस्वती पुत्र करार दिया. लेकिन

यही तमाशा जब इंडिया टीवी पर एंकर और साथ ही गायिका शिवानी कश्यप के साथ देखा तो लगा कि अब इसका दोहन हो रहा है. आप सोचिए कि हम कैसे समाज में जीते हैं जहां किसी का चीजों को ठीक-ठीक याद रखना एक तमाशा बन जाता है और ऐसा तमाशा कि चैनल के एंकर जमूरे बनकर उन्हें मदारी के बंदर बनाकर छोड़ते हैं. चैनलों के लिए बच्चे कितने बड़े तमाशे हैं कि जब वो गड्ढे में गिरकर जान के लिए लड़े तब भी मदारी का हिस्सा होता है और एटलस याद कर एक मिसाल कायम करे तो भी..ये किसी भी तरह से प्रतिभा का सम्मान नहीं उसके साथ भद्दा मजाक और भौंड़ापन है.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

राहुल गांधी आज भसड़ मीडिया के एंटीवायरस साबित हुए

Vineet Kumar : हम राहुल का शुक्रिया अदा करते हैं. ये आज कांग्रेस के लल्ला नहीं बल्कि भसड़ मीडिया के एंटीवायरस साबित हुए हैं. आज अगर उन्होंने ये बयान नहीं दिया होता तो जापानी पार्क में तो भाजपा का शेर कल गरजता लेकिन चैनल में ये काम आज शाम से ही प्राइम टाइम में शुरु हो जाता. क्रॉस कटिंग की तर्ज पर इसे क्रॉसटाइमिंग कह सकते हैं. आपको राहुल की स्मार्टनेस का कायल होना चाहिए कि उन्होंने वीकएंड को शेर के खाते में जाने के बजाय आज से ही झाम कर दिया.

अगर चुनाव मीडिया वार का हिस्सा है तो राहुल ने बहुत ही कायदे की पारी शुरु की है. समझदार कांग्रेसियों को कांग्रेस कुंवर की स्ट्रैटजी की तारीफ की जानी चाहिए.बाकी शेर मार्का रैली की पीआऱ एजेंसी ने जिन मीडिया से डील किया होगा, आज तो उनमे मठ्ठा( छाछ) पड़ गया जी.

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मुझे एक बात जानने की बड़ी दिलचस्पी है कि आखिर नरेन्द्र मोदी में ऐसी कौन सी कमी रह गई जिसके कारण उनकी पार्टी ने उन्हें आदमी के बजाय शेर के रुप में दिखाने में लग गए. भारत मां के सपूत से आपको ज्यादा शेर सुनना अच्छा लगता है क्या और वैसे भी प्राणी विज्ञान के हिसाब से देखेंगे तो अगर अभी गरजेंगे तो बाद में सीधै ही निगल जाएंगे. न बाबा न, शेर की जगह चिड़ियाघर या जंगल में ही ठीक है, लोकतंत्र में आते ही वो तो खेत-खलिहान से लेकर मॉल-मस्जिद सब रौंद डालेगा.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Print media to govt: raise FDI ceiling to 49 pc

Bangalore  : The Indian Newspaper Society today made a pitch for enhancing the FDI ceiling in print media to 49 per cent, saying media companies need inflow of funds to expand as there are significant prospects for more growth. In his Presidential address at the 74th Annual General Meeting of the INS here, K N Tilak Kumar said that at a time when the print media in the western world was on a path of rapid decline in the last few years, in India it had grown exponentially in the last few decades and there are significant prospects for more growth in the coming years.

"To sustain this growth, media companies need inflow of funds to expand and reach every corner of the country. In this context, there is indeed a need for enhancing the FDI ceiling in the print media to 49 per cent from 26 per cent at present", Kumar said.

Raising some issues which he said are important for the health of the industry and involve government policies, Kumar said that in a free economic environment it is not only undesirable to have Wage Board mechanism for determination of wages but with the unsustainable levels of wage hikes proposed by Majithia Wage Boards for newspaper employees, it is also turning out to be detrimental to the very survival of the newspaper industry.

"As virtually no other industry has Wage Boards, there is no rationale for persisting with such boards for the print media", Kumar argued.

"We are confronted with the most unjustifiable and unsustainable levels of wage hikes recommended by Justice G R Majithia Wage Boards which the government has notified subsequently without taking a realistic view on the concerns articulated in our various representations to the government".

INS also said it viewed with serious concern the government's proposal, as reported in the press, to bring in regulation with stringent punishment leading to stoppage of DAVP advertisements and cancellation of registration of newspapers to rein in instances of the so-called "paid news".

Feeling strongly that such regulation would have far-reaching consequences for the smooth functioning of the Fourth Estate of democracy, Kumar said "these isolated instances which happened in the past are aberrations and the entire media must not be tarred with the same brush".

Maintaining that cross-media operations can reduce the cost of news gathering and news dissemination while also providing affordable access to international news, Kumar said any attempt to restrict such synergy and sharing of content among the various horizontal media platforms would throttle the well-meaning objective of large-scale penetration embarked upon by newspaper establishments.

Press Trust of India

लखीमपुर में पत्रकार से अभद्रता मामले में चौकी इंचार्ज हटे

लखीमपुर : लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक समाचार पत्र के स्थानीय फोटो पत्रकार से महिला थाने में अभद्रता करने वाले चौकी इंचार्ज को पुलिस अधीक्षक ने हटा दिया है। एसपी ने सीओ सिटी की जांच के बाद यह कार्रवाई की है। इस मामले में संलिप्त एएसपी के गनर पर अभी तक कार्रवाई तय नहीं हुई है। महिला थाने में महिला पुलिस से एक सपा नेता द्वारा कथित अभद्रता की सूचना पाकर कवरेज करने गए पत्रकार मोहम्मद साजिद से अभद्रता करने वाले जेल गेट चौकी इंचार्ज शिव चरन लाल को वहां से हटा दिया गया है।

उपनिरीक्षक शिव चरन को मोहम्मदी कोतवाली की रेहरिया चौकी भेजा गया है। पुलिस अधीक्षक ने यह कार्रवाई सीओ सिटी दिनेश कुमार पुरी की रिपोर्ट पर की है। वहीं दूसरी तरफ अभी तक मामले में दोषी सिपाही पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। दोषी सिपाही अपर पुलिस अधीक्षक का गनर है। ज्ञातव्य हो कि 20 अगस्त को महिला थाने में सपा छात्र सभा अध्यक्ष व एक महिला आरक्षी के बीच विवाद हो गया था। इस मामले की सूचना मिलने के बाद फोटो पत्रकार मोहम्मद साजिद कवरेज के लिए पहुंचे थे, लेकिन वहां मौजूद जेल गेट प्रभारी की मौजूदगी में एक सिपाही ने अभद्रता की थी। मामले ने तूल पकड़ लिया था। इसके बाद पुलिस अधीक्षक ने बुधवार को कार्रवाई करते हुए जेल गेट चौकी इंचार्ज को वहां से हटा दिया।

 

पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु ने दी पीएम को त्यागपत्र देने की सलाह

नयी दिल्ली: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु ने आज उन्हें सलाह दी है कि अध्यादेश के मुद्दे पर राहुल गांधी ने उनपर हमला कर उनके ‘अधिकारों की जो अवज्ञा ’ की है उसे देखते हुए उन्हें त्याग पत्र दे देना चाहिए.

अध्यादेश पर राहुल के हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए बारु ने कहा, ‘‘बस बहुत हो गया. प्रधानमंत्री को पद त्याग देना चाहिए. यह (राहुल का बयान) अधिकारों की अवज्ञा है, क्योंकि जिस प्रकार से मंत्रिमंडल के निर्णय को बकवास बताया गया है और उसे फाड़कर फेंकने को कहा गया है.’’  वरिष्ठ संपादक ने कहा, ‘‘सरकार के निर्णय पर इस प्रकार के आरोप, जिसे स्पष्ट रुप से पार्टी की सलाह से लिया गया है अधिकारों की अवज्ञा के समान है.’’

चोरी करते क्राईम रिपोर्टर ही कैद हो गया सीसीटीवी कैमरे में!

मुंबई। अब तक दूसरे लोगों के सीसीटीवी कैमरे में कैद होने की खबर प्रसारित करने वाला एक रिपोर्टर ही कलयुगी सीसीटीवी की नजरों कैद हो गया. इस सीसीटीवी कैमरे ने बॉस यानि न्यूज़ चैनल के एचआर हेड को सारी घटना का उल्लेख भी कर दिया. मामला मुंबई स्थित एक नेशनल चैनल के कार्यालय का है, जहाँ नाईट ड्यूटी के दौरान सीसीटीवी कैमरे ने अपने क्राईम रिपोर्टर को कंप्यूटर का माउस व अन्य सामान चुराते कैमरे में कैद कर लिया.

घटना करीब १० दिन पहले की है. कार्यालय से लगातार नाईट में सामानों के गायब होने की खबर प्रबंधन को मिल रही थी. प्रबंधन ने जब सीसीटीवी फुटेज को खंगाला, तो पता चला कि सामानों की चोरी और कोई नहीं, बल्कि नाईट रिपोर्टर ही कर रहा है और इसे उठाकर अपने घर ले जा रहा है. आनन-फानन में चैनल ने रिपोर्टर को बाहर का रास्ता दिखा दिया. मामला दोनों के सम्मान से जुड़ा था, इस नाते कोई क़ानूनी कारवाई नहीं की गयी. जब से यह न्यूज छनकर बाहर आई है, शहर का हर मीडिया कर्मी चासनी से निकली ताज़ी जलेबी की तरह मजे ले रहा है.

हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि यह खबर सच नहीं है क्योंकि अव्वल तो जब किसी रिपोर्टर को पता है कि वह सीसीटीवी के दायरे में है तो वह चोरी क्यों करेगा? दूसरे, क्राइम रिपोर्टर को कमाने-खाने के लिए फील्ड में बहुत कुछ पड़ा रहता है तो वह आफिस से माउस टाइप की चीजें क्यों चुराएगा? लोगों का कहना है कि रिपोर्टर की छवि खराब करने के लिए उससे खुन्नस रखने वाले दूसरे लोगों ने उसके बारे में चोरी वाली फर्जी खबर उड़ा दी है. (कानाफूसी)

मीडिया घरानों को धमकी देने के आरोप में इंजीनियर गिरफ्तार

इंफाल : मणिपुर में पत्रकारों, मीडिया घरानों और अखबार वितरकों को कथित तौर पर धमकी देने के आरोप में एक निजी कंपनी के 30 वर्षीय इंजीनियर को गिरफ्तार किया गया है। गृह विभाग का जिम्मा संभाल रहे, उपमुख्यमंत्री गैखानगम ने बताया कि इंफ्राटेल कंपनी में काम करने वाले थोकचोम प्रियोकुमार को कल थोबल जिले के काकचिंग इलाके से गिरफ्तार किया गया। (भाषा)

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

अवधेश बच्चन प्रमोट, प्रदीप श्रीवास्तव कार्यमुक्त

खबर है कि दैनिक जागरण, पानीपत के सीनियर न्यूज एडिटर अवधेश कुमार बच्चन को प्रमोट करके एसोसिएट एडिटर बनाया गया है. उनके काम से खुश होकर संजय गुप्ता ने तीन साल में तीन प्रमोशन दिए हैं. डीएनई से एनई, फिर सीनियर एनई और अब एसोसिएट एडिटर.

अमर उजाला, मुरादाबाद से खबर है कि यहां चीफ सब एडिटर के रूप में कार्यरत प्रदीप श्रीवास्तव संस्थान से कार्यमुक्त हो गए हैं. उनकी विदाई को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं हैं. प्रदीप गोरखपुर से ट्रांसफर होकर मुरादाबाद आए थे.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

नवीन जोशी ने इस सूरमा पत्रकार को उल्‍टे पांव लौटा दिया था

लखनऊ। राजधानी में खुद को सूरमा पत्रकार समझने वालों की कोई कमी नहीं हैं। गलत सही सारे धंधे करते हैं, लेकिन दिखावा ऐसा करते हैं कि इनसे ईमानदार कोई नहीं है। यहां से प्रकाशित एक अंग्रेजी के हिंदी दैनिक संस्करण के एक ऐसे ही तथाकथित ईमानदार और डेस्क पर काम करने वाले एक अखबार कर्मी अपनी इसी स्‍वनिर्मित छवि की बदौलत नई पारी शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि जब तक वो स्वतंत्र भारत और वायस आफ लखनऊ में रहे तब अपने काम की कोई छाप नहीं छोड़ नहीं पाए। लेकिन उन्हें लगता है कि वे ईमानदारी की बात लिखकर टॉप के तीन में से किसी अखबार में जाकर अपने फन का लोहा मनवा लेंगे।

लखनऊ वाले इनके बारे में बताते हैं कि जब भी उन्हें कुछ करने-दिखाने का मौका मिला वे बुरी तरह फ्लाप रहे। जिस अखबार में इस समय कार्यरत हैं उस अखबार को मीडिया की दुनिया में बुलंदियों पर ले जाने का सपना दिखा रहे थे। जब खुद कुछ नहीं कर पाए तो अब अपनी असफलता का ठीकरा अपने सहयोगियों पर फोड़ दिया। जो लोग उन्हें जानते हैं वो यह भी जानते हैं कि अगर उन्हें अमर उजाला क्या हिन्दुस्तान में भी ले मौका मिल गया तो वे उसे भी वही बना देंगे जो अब तक अन्‍य अखबारों को बनाते आए हैं। हालांकि नवीन जोशी के दर पर एक बार गए थे लेकिन उन्‍होंने इन्‍हें डेस्‍क पर रखना तो दूर संवाद सूत्र बनने लायक नहीं पाया और उल्‍टे पांव लौटा दिया था।

ये महाशय अपने आप भले कुछ न कर पाए लेकिन आइडिया देने के मामलें में बड़े-बड़े दार्शनिकों को पीछे छोड़ देते हैं। अब अमर उजाला या किसी दूसरे अखबार में अगर जाएं और कुछ ढंग का लिख पढ़ लें तो यह बड़ा करिश्मा ही होगा। जब तक स्वतंत्र भारत और बाकी अखबारों में रहे तो तब लोकल हेल्थ ही देखते रहे। आगे बढऩा का मौका भी मिला लेकिन खुद को महान मानने की सनक में आगे बढ़ नहीं पाए। किसी ने ठीक ही कहा है कि गधे को ठोंकपीट कर खच्चर तो बनाया जा सकता है, लेकिन उसे घोड़ा कभी नहीं बनाया जा सकता। (कानाफूसी)

एसओ को ओबलाइज करने के लिए दैनिक जागरण ने दो बार छाप दी खबर

दैनिक जागरण में अधिकारियों को ओबलाइज करने का धंधा पुराना है. मैनेजमेंट और पत्रकार अपने उल्‍टे सीधे काम करवाने के लिए अधिकारियों की छोटी-छोटी उपलब्धियों को तो तानकर छापते हैं, लेकिन कोई पीडि़त ऐसे लोगों के खिलाफ खबरें देता है तो उस खबरों को कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है. जागरण में सबसे ज्‍यादा पुलिसवालों को ओबलाइज किया जाता है ताकि समय आने पर उनका गलत इस्‍तेमाल किया जा सके. ऐसा ही मामला शाहजहांपुर में सामने आया है.

दैनिक जागरण ने शाहजहांपुर के रामचंद्र मिशन थाने के एसओ को पुरस्‍कार मिलने की खबर दो दिन प्रकाशित किया है. पहले दिन एसओ साहब का फोटो नहीं छप पाया तो ब्‍यूरोचीफ और रिपोर्टर ने दूसरे दिन वही खबर फोटो के साथ प्रकाशित की. पहले 26 सितम्‍बर को एसओ के पुरस्‍कृत होने की खबर प्रकाशित की गई, जब‍ एसओ इतने से ही संतुष्‍ट नहीं हुए तो दूसरे दिन यानी 27 सितम्‍बर को उसी खबर को एसओ का फोटो लगाकर प्रकाशित किया गया. आप भी देखिए दैनिक जागरण की पत्रकारिता की मिसाल.

26 सितम्‍बर को प्रकाशित खबर
27 सितम्‍बर को प्रकाशित खबर

भगत सिंह जन्म दिवस पर : हम कहेंगे इन्कलाब जिन्दाबाद

: 28 सितंबर पर विशेष : भगत सिंह को जानने का सबसे बेहतर तरीका होगा कि भगत सिंह के विचारों की उर्जा की कड़ी से हम जुड़ें जिससे जुड़ कर खुद भगत सिंह ने एक नए हिन्दुस्तान का सपना देखा था। 28 सितंबर लायलपुर बंगा में जन्म लेने वाले भगत सिंह ने शोषण विहीन समाज का सपना देख इंकलाब-जिन्दाबाद का नारा बुलंद करते हुए कहा कि हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक कि हमें लूटने वाले रहेंगे, फिर वो गोरे अंग्रेज हो या फिर विशुद्ध भारतीय। मानवीय संवेदना, मानवीय गरिमा और बराबरी का सपना लिए इन्कलाब-जिन्दाबाद का नारा बुलंद करने वाले मात्र 23 वर्षीय भगत सिंह और उनके साथियों ने आजादी की लड़ाई को एक नया रास्ता दिखाया और कहा कि इस क्रांति का इस शताब्दी में सिर्फ एक मतलब हो सकता है, वो है जनता के लिए जनता की राजनीतिक शक्ति हासिल करना!

इसमें कोई शक नहीं कि मेहनत करने वाले मेहनत करने के बावजूद आज भी बुनियादी सुविधाओं से दूर है। रोजी-रोटी, शिक्षा, चिकित्सा के बिना करोड़ो जनता नारकीय जीवन जी रहे है। समाज में चौरतफा अराजकता है। दूसरी तरफ पूंजीपति, शोषक और समाज में घुन की तरह जीने वाले लोग अपनी सनक पूरी करने के लिए करोड़ो रूपये पानी की तरह बहा रहे हैं। आम आदमी का हक मारकर अपने ऐशो-आराम को पूरा करने वाले ये लोग किसी गोरे अंग्रेजो से कम नहीं हैं। इस तरह की भयानक विषमताएं समाज को अराजक स्थिति की ओर ले जा रहा है। आज नए समाज और नव मानव की गठन की जरूरत हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

मुकदमें के दौरान कोर्ट में भगत सिंह ने बेहद साफ तौर पर कहा था कि हम मानवता को प्यार करने में किसी से पीछे नहीं है। … हम प्राणीमात्र को हमेशा आदर की निगाह से देखते आए हैं… क्रान्ति के लिए खूनी लड़ाईया अनिवार्य नहीं हैं। न ही उसमें व्यक्तिगत हिंसा के लिए कोई स्थान, वह बम-पिस्तौल का जन सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है अन्याय पर आधारित समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। देश को एक आमूल परिवर्तन की जरूरत है। जब तक मनुष्य द्वारा मनुष्य, एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते है, समाप्त नहीं होता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा नहीं मिलेगा। क्रान्ति की इस पूजावेदी पर हमने अपने यौवन के दीप जलाए हैं, क्योंकि ऐसे आदर्श के लिए बड़े से बड़ा त्याग भी कम है।

भगत सिंह को तब के हालात और परिस्थतियों ने गढ़ा था। उन्होंने अपना रास्ता चुना था। तात्कालिक समाज के हालातों का अध्ययन कर उन्होंने अपने सार्थक विचारों को गढ़ा, कहा- आंखे बंद कर नहीं, समझ-बूझ कर, किसी विचार को अपनाएं।  आईए भगतसिंह के जन्म दिवस के मौके पर उनसे दोस्ती कर लें, इस वादे और इरादे के साथ कि शोषण के खिलाफ हम अपना संघर्ष तब तक जारी रखेंगे जब तक कि बराबरी पर आधारित समाज न रच लें…

तुम्हारी चांदनी में चलना है हमें

तुम्हारे चिंतन को जीना है

रहना है तुमसे मुखातिब सदा

और कहना है

इंकलाब जिदांबाद!

वाराणसी से भास्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट. संपर्क: 09415354828
 

मोदी के पीएम बनने संबंधी सवाल पर अमिताभ ने पत्रकारों से कहा- आप बेहतर जानते होंगे

मुंबई: अमिताभ बच्चन गुजरात राज्य के ब्रांड एंबेसडर हैं। टीवी पर उन्हें गुजरात में पर्यटन को बढ़ावा देने संबंधी विज्ञापनों में देखा जाता है। लेकिन जब भी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में उनसे प्रश्न पूछा जाता है तो वे जवाब दने में कतराते दिखते हैं। हाल ही में मुंबई में हुए एक समारोह में जब उनसे पूछा गया कि क्या वह नरेंद्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त मानते हैं, तो वह बड़ी सफाई से इसका जवाब टाल गए।

बिग बी ने कहा, “मेरा अब राजनीति से कोई लेना देना नहीं है। मैं राजनीति छोड़ चुका हूं। इसलिए मैं इस पर क्या बोलूं। आप पत्रकार लोग देश भर में घूमते रहते हैं, ये आप बेहतर जानते होंगे कि कौन प्रधानमंत्री बन सकता है।”

मीडिया ने उन्हें और कुरेदने की कोशिश की लेकिन अमिताभ बच्चन ने कुछ भी नहीं कहा। इससे पहले भी देश के युवा वोटरों को पंजीकृत करवाने के लिए नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए आनलाइन अभियान को अमितभ बच्चन ने नजरअंदाज कर दिया था। मोदी की तारीफ करते यूट्यूब पर डाले गए एक फर्जी वीडियो से भी अमिताभ बच्चन खासे नाराज हुए थे। वीडियो देखने पर प्रतीत होता था कि बच्चन मोदी की तारीफ कर रहे हैं और बतौर पीएम उनका समर्थन कर रहे हैं। इस पर अमिताभ ने कहा था, ‘मैं यह देखकर निराश हूं और इसमें मेरी कोई सहमति नहीं है।’
 

मनजीत सिंह आईबीएफ के अध्यक्ष पुनर्निर्वाचित, पुनीत गोयनका और रजत शर्मा उपाध्यक्ष बने रहेंगे

मुंबई : इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) में मल्टी स्क्रीन मीडिया के मनजीत सिंह 2013-14 के लिए अध्यक्ष पुनर्निर्वाचित हुए हैं। मल्टी स्क्रीन मीडिया सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन एवं सेट मैक्स जैसे चैनल चलाता हैं।  आईबीएफ बोर्ड की कल मुंबई में हुई बैठक में राहुल जौहरी (डिस्कवरी) को उपाध्यक्ष चुना गया।

इसके अलावा पुनीत गोयनका (जी एंटरटेनमेंट) एवं रजत शर्मा (इंडिपेंडेंट मीडिया) उपाध्यक्ष बने रहेंगे। टाइम्स टेलीविजन नेटवर्क के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी सुनील लुल्ला को आईबीएफ कोषाध्यक्ष निर्वाचित किया गया है। (भाषा)

भास्कर डाट काम वाले शांत हो चुके मुजफ्फरनगर दंगे से हिट्स बटोरने में जुटे!

मीडिया का धंधा कितना गंदा है, इसे जब गहराई से समझेंगे तो उबकाई आने लगेगी. मुजफ्फरनगर में दंगा शांत हो चुका है. लोग अपने सामान्य जीवन की तरफ लौट चुके हैं. पर मीडिया का एक हिस्सा इसे जिलाए हुए है. कई वजहों से बदनाम भास्कर डाट काम वालों ने मुजफ्फरनगर के स्थानीय अखबारों की रिपोर्टिंग की कतरनों को इकट्ठा कर उसे पिक्चर स्लाइड बना चुके हैं और भड़कीले शीर्षकों से पाठकों के सामने परोस चुके हैं. इन शीर्षकों और स्थानीय अखबारों में छपी खबरों को पढ़कर मन अशांत हो जाता है.

जिन कई अखबारों पर दंगा भड़काने वाली रिपोर्टिंग और खबरें छापने का आरोप है, उन्हीं अखबारों की खबरों को भास्कर डाट काम परोस रहा है. इस घटिया और हिट्स बटोरने के लिए पत्रकारीय नैतिकता को तार-तार करने वाली मानसिकता की जितनी निंदा की जाए उतनी कम है.

भास्कर वालों ने दंगे से संबंधित स्थानीय अखबारों की रिपोर्टिंग के कुल 42 फोटो स्लाइड बनाए हैं. हर स्लाइड में दो तीन खबरों की कतरन जोड़ी गई हैं. आखिर इन कतरनों को दिखाकर भास्कर क्या बताना चाहता है, और किस तरह की पत्रकारिता को बढ़ावा देना चाहता है? यह तो सरासर टीआरपीबाजी का प्रयोग है, जिसका आम पाठक के दिल-ओ-दिमाग पर बुरा असर पड़ता है और सूख रहे घावों को हरा करने की साजिश नजर आती है. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

पंडित आयुष की नई पारी, चंद्रमोहन ठाकुर जागरण से हटाए गए, कुछ अन्य इधर-उधर

न्यूज एक्सप्रेस चैनल में क्राइम और स्पेशल इनवेस्टीगेशन बीट देख रहे पंडित आयुष के बारे में सूचना है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने नई पारी की शुरुआत लाइव इंडिया न्यूज चैनल के साथ एसआईटी (स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम) हेड के रूप में की है. पंडित आयुष कई चैनलों में क्राइम बीट देख चुके हैं.

उधर, दैनिक जागरण, नोएडा से सूचना है कि निशिकांत ठाकुर के करीबियों को हटाए जाने का सिलसिला जारी है. चंद्रमोहन ठाकुर को कार्यमुक्त कर दिया गया है. वे लंबे समय से दैनिक जागरण में थे और निशिकांत ठाकुर के करीबी माने जाते थे.

हिन्दुस्तान बदायूं के रिपोर्टर मनोज वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है. यहीं कार्यरत रिपोर्टर योगेन्द्र सागर ने दैनिक भास्कर, रोहतक ज्वाइन किया है. हिन्दुस्तान, देहरादून से संबद्ध रुड़की ब्यूरो से अंकुर त्यागी ने इस्तीफा देकर दैनिक जागरण, देहरादून ज्वाइन किया है.

भड़ास तक सूचनाएं bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

मजीठिया वेजबोर्ड पर आखिरी सुनवाई इसी एक अक्टूबर से

पत्रकारों और गैर-पत्रकारों के वेतन रिवीजन के लिए गठित मजीठिया वेज बोर्ड मामले की आखिरी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में इसी एक अक्टूबर से की जाएगी. इस मसले पर सुनवाई काफी समय से लटकी है और टल रही है. अब सुप्रीम कोर्ट ने फाइनल हियरिंग के लिए एक अक्टूबर 2013 की तारीख तय कर दी है.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में तब गया जब मीडिया मालिकों ने आपत्ति करते हुए अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखा. मीडियाकर्मियों का आरोप है कि मीडिया मालिक इस वेज बोर्ड को लटकाने और रिवाइज्ड सेलरी देने में देरी करने की खातिर मामले को कोर्ट लेकर गए.

मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम और न्यायाधीश रंजना देसाई व राजन गोगोई ने अब इस मामले पर अंतिम सुनवाई के लिए कहा है. मीडिया मालिकों के संगठन इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (आईएनएस) की ओर से वरिष्ठ वकील वेणुगोपाल ने कहा कि इस सुनवाई को पूरा होने में करीब चार हफ्तों का समय लग सकता है. मीडियाकर्मियों के संगठन के वकील बीके पाल और परमानंद पाडेण्य ने कहा कि पत्रकार पिछले एक साल से मजीठिया वेज बोर्ड के फैसले का इंतजार कर रहे हैं और इसलिए सुनवाई में तेजी लाई जाए.

यौन उत्पीड़न के आरोपी राजशेखर व्यास दूरदर्शन से हटाकर एआईआर में भेजे गए

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव पद पर कार्यरत आभा शुक्ला ने प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सरकार को लिए एक पत्र लिखकर कहा है कि यौन उत्पीड़न के आरोपी प्रसार भारती के तहत संचालित दूरदर्शन के अतिरिक्त डायरेक्टर जनरल राज शेखर व्यास के खिलाफ लिए गए एक्शन के संबंध में मंत्रालय को जानकारी दी जाए. छेड़छाड़ और उत्पीड़न के आरोपी व्यास अब ऑल इंडिया रेडियो में शिफ्ट किए जा चुके हैं. प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जवाहर सरकार का कहना है कि वे इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के हिसाब से कदम उठा रहे हैं.

ज्ञात हो कि यौन उत्पीड़न का आरोप प्रथम दृष्टया साबित होने के बाद किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ पुलिस में शिकायत तुरंत दर्ज करवानी होती है. आंतरिक जांच में व्यास दोषी पाए गए हैं. केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रलय ने लिखकर कार्रवाई करने को कहा है. फिर भी व्यास के खिलाफ अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है. पिछले 12 अगस्त को एक महिला कर्मचारी ने दूरदर्शन वूमेन सेल में व्यास के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई. कर्मचारी ने राज शेखर व्यास पर छेड़छाड़ और उत्पीड़न का आरोप लगाया. प्रसार भारती की आंतरिक जांच में आरोप सही पाया गया. इस बारे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की मंशा है कि इस केस को पुलिस को दे दिया जाए जो कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत देखे.
 

Prasar Bharati chief denies taking ‘lenient’ view of DD sexual harassment case

Prasar Bharati CEO Jawhar Sircar has maintained that "appropriate action" under the Central Civil Services (Conduct) Rules and relevant legal guidelines was taken against a top Doordarshan official in a sexual harassment case, saying suggestions that he had parried on the issue were "mischievous".

In a letter to Bimal Julka, secretary in the Ministry of Information and Broadcasting, Sircar said in the case of additional director general of Doordarshan Raj Shekhar Vyas: "You can rest assured that appropriate action in terms of the Central Civil Services (Conduct) Rules of 1964 as also under the Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013 and the Vishaka Guidelines of the Supreme Court are being adhered to with as much sensitivity and promptness as you would expect of a senior colleague."

Vyas has been transferred to All India Radio. Sircar explained that an FIR had not been filed against Vyas – it had been alleged that he had used "abusive words and unparliamentary language" against a woman employee – because "we would require a solid complaint against the officer in terms of Indian Penal Code, that has to be presented by the complainant, either to us: or even direct to the police. We can take appropriate action if this is available: isn't it?"

The Prasar Bharati CEO pointed to Vyas's lengthy reply to the charge-sheet against him and noted: "It may not be legally correct/appropriate at this level/stage to make any premature interventions in the due process of law, as this itself could become a cause for legally challenging the fairness of the entire proceedings."

He blamed "mischievous element( s)" for trying to create the impression that he had taken a lenient view on Vyas even though the joint secretary in the Information and Broadcasting Ministry had informed him in a letter that there was a prima facie case of sexual harassment against Vyas.

The ministry official had referred to a report by a Women's Cell that Prasar Bharati was empowered to take disciplinary action against Vyas and this may be initiated "at the earliest".

साभार: dailymail.co.uk

मजदूर नेता पर सेवक ने लगाया दुराचार का आरोप, सीडी पुलिस को दी (देखें वीडियो)

सोनभद्र : रेणुकूट नगर में एक कामगार यूनियन के महामंत्री द्वारा अपने ही सेवक के साथ अप्राकृतिक दुराचार का मामला सामने आया है. भुक्तभोगी ने अपने मोबाइल से वीडियो बनाने के बाद उसकी सीडी तैयार करवाया और पुलिस के हवाले कर दिया। इसके खुलासे के बाद सभी हैरत में पड़ गए। निजी कंपनी में काम करने वाले एक यूनियन के महामंत्री का सेवक शुक्रवार को पिपरी थाने पहुंचा। उसने थानाध्यक्ष को एक सीडी दी और आपबीती बताई। उसका कहना था कि उसके साथ 72 वर्षीय कामगार नेता पिछले पांच वर्षों से अप्राकृतिक दुराचार कर रहा है।

उसने यह भी बताया कि नौकरी दिलाने का झांसा देकर उसका ही नहीं, अन्य कई युवकों के साथ कामगार नेता दुराचार कर चुका है। सबूत के तौर पर थानाध्यक्ष को दी गई सीडी की वीडियो को पुलिस ने देखा तो हैरत में पड़ गई। कामगार नेता की पोल खुलने के बाद लोगों में आक्रोश फैल गया है और उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है।

इधर थानाध्यक्ष सुनील सिंह का कहना है कि भुक्तभोगी युवक से पूछताछ की गई है। उसके पिता को भी बुलाया गया है। वह चंदौली जिले का मूल निवासी है और कामगार नेता की कई वर्षों से सेवा करता आ रहा है। उसके साथ स्थाई नौकरी दिलाने के नाम पर दुराचार किया गया है। थानाध्यक्ष ने यह भी बताया कि सीडी को पुलिस महकमे के उच्चाधिकारियों को भेज दिया गया है। उनके द्वारा निर्देश मिलते ही कामगार नेता के खिलाफ एफआइआर दर्ज कर गिरफ्तारी की जाएगी।

संबंधित वीडियो: (चेतावनी: यह अश्लील कंटेंट / वीडियो है, इसलिए कृपया इस लिंक पर 21 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोग ही क्लिक करें) : CD

रेणुकोट से विवेक की रिपोर्ट.

‘राइट टू रिजेक्ट’ का हाल दरअसल दूर के ढोल सुहावने जैसा है.

: 'राइट टू रिजेक्ट' कानून 1857 का गदर है जो 1947 में जाकर असर दिखा पाया था : सुप्रीम कोर्ट ने राइट टू रिजेक्ट को कानून सम्मत मानते हुए अगले चुनावों में इसे अमली जामा पहनाने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश 'पीपल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज' (PUCL) नामक संगठन की याचिका पर दिया है. इसे आने वाले विधानसभा चुनावों में प्रभावी रूप से लागू करने का आदेश भी दिया गया है. इस आदेश के ऐसे समय में आने पर कुछ सवाल मन में जरूर उठते हैं.

पहला यह कि ऐसे समय में जब दागी नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ समूचा सदन एकत्रित होकर उस आदेश को पलटने के लिये अपनी सहमति को कानूनी रूप देने ही वाला है तब सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह का आदेश देकर जनता के गुस्से को डाइवर्जन देकर सरकार के साथ साथ विपक्ष को भी राहत दे ही दी है. और जो लोग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं वो दरअसल प्रणाली को ना समझ पाने कारण ऐसा कह रहे हैं. कोई इसे लोकतंत्र का प्रहरी और ना जाने क्या – क्या कह रहे हैं. दरअसल हमें यह समझना होगा कि कानून का रखवाला ईमानदार हो यह उतना जरूरी नही जितना कि कानून का ईमानदार होना और उससे ज्यादा कानून के बनाने वाले का होना जरूरी है.

दूसरा यह कि अदालतों को ऐसे फैसले देते वक्त या फिर अदालतों को छोड़ दें क्यूंकि अदालतें तो अपील पर सुनवाई के लिए बाध्य ही होती हैं, वे संगठन जो इस प्रकार की याचिका दायर करते हैं जरा भी देश के जन को समझते हैं या बस याचिका कर के वाह वाही बटारते हैं. जरा अब आप गाँवों में जाकर राइट टू रिजेक्ट को समझाने का कष्ट करेंगे. अभी भी देश में डाक या मेल द्वारा वोट डालने की सुविधा नहीं है ऐसे में बहुत से लोग अपना प्रत्याशी नहीं चुन पाते और ऐसे में आपकी राइट टू रिजेक्ट की माँग कहाँ तक उचित है?

ऐसे समय में जब लोग प्रत्याशी नहीं ग्लैमर का चुनाव करते हैं, साम्प्रदायिक उन्माद, हत्या और बलात्कार के अपराधी लाख – 2 वोटों के अन्तर से चुनाव जीत रहे हैं आप राइट टू रिजेक्ट की बात कर रहे हैं. मैं जानता हूँ कि आप मानते हैं कि 'एक पत्थर तो तबीयत से उछालों यारों' पर जब आसमान फट पड़ा हो तो छेद करने की बात ही करना बेकार हैं. आखिर क्या वजह है कि दागियों को सदन में रोकने वाला हर कानून संसद के द्वारा ही बार बार बदल दिया जाता है, क्यू एक बार भी नही झिझकते हमारे महानुभाव, कभी सोचते हैं हम इस बारे में. ऐसा इसलिए है क्यूंकि हमारी चेतना सो गयी है और ये बात वो अच्छा तरह से जानते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत हो ऐसा नही है लेकिन अभी उपयोगी नही है इसके पहले कुछ दूसरे जरूरी काम किये जाने चाहिए. इसलिये अभी हमें कानून की नही बल्कि लोगों को बनाने की जरूरत है. कोई भी तंत्र तब अच्छा नही हो जाता जब उसमें विशिष्ट काम करें बल्कि तब होता है जब सब काम करें. नये कानूनों के बनने से ज्यादा जरूरी उनका बने रहना है. फिर भी हमें इसका स्वागत करना चाहिए क्यू्ंकि अच्छाई अपना असर दिखाती है. दरअसल 'राइट टू रिजेक्ट' कानून 1857 का गदर है जो 1947 में जाकर असर दिखा पाया था, लेकिन इसके लिए अभी जमीन बनाने की आवश्यकता है.

युवा पत्रकार विवेक सिंह का विश्लेषण.

टाइम्स आफ इंडिया पर अपनी किताब 13 वर्षों में पूरी कर पाईं संगीता, पढ़िए कुछ अंश

संगीता पी. मेनन मल्हान ने 'टीओआई' पर एक किताब लिखा है. यह प्रोजेक्ट 13 वर्षों बाद पूरा हुआ. किताब को हार्पर कालिंस ने प्रकाशित किया है. किताब के कुछ अंश यहां प्रकाशित किए जा रहे हैं, साथ ही लेखिका के बारे में भी कुछ जानकारी दी जा रही है…

Book Description

‘Commercially, Samir Jain was the best thing that could have happened to The Times of India. But he destroyed an institution and made it a great big factory’  — PRITISH NANDY

The newspaper industry in India was once organized around unstated but  fairly rigid regulations. Until the 1980s, when Bennett, Coleman and  Company Limited, owners of The Times of India, The Economic Times and other publications, rewrote the rules – whether they were about pricing, advertorials or editorial freedom. Over the next two decades, the Indian newspaper industry found itself utterly transformed. In 1985, The Times of India had three editions with a circulation of a little over 5.6 lakh. By March 2012, it had become the largest selling English daily in the country, with fourteen editions and a circulation of over 45 lakh. As it grew, the newspaper ended up reinventing the rules of reportage, editorial policies  and marketing initiatives for the entire industry. Yet, very little is known  about how the Times Group changed the dynamics of the Indian media business. Sangita Malhan, a former journalist with The Times of India, set
out to remedy this. She began by interviewing the journalists and  corporate honchos who had played crucial roles in the transformation of  the paper. What she has unearthed is a fascinating story of clashing egos,  changing visions and corporate makeovers. A must-read for industry  insiders as well as all those who are interested in the way news is produced and consumed in India.

 
THE TOI STORY

How a Newspaper Changed the  Rules of the Game

SANGITA P. MENON MALHAN

HarperCollins Publishers India

For my parents and siblings  And for Teji, Avii and Kanwaldeep, who walked with me on this journey

CONTENTS

PROLOGUE

THINK OF NEWS MEDIA in India and the image that comes to mind is of aggressive, racy, out-of-breath, near-paroxysmal anchors sharing screen space with scrolls, images, graphics and ads, coaxing news angles out of diligent correspondents – all this, done slickly, tirelessly, in real time, through all our waking hours. The media1 scene appears as a grand frenzy; almost shambolic. A flurry of images, ideas, updates – and the familiar in-studio panellists – mingle in a relentless churn, in the battle for the TRP. At the last count, more than 800 private satellite television channels2 including 300 news channels3 across several languages were vying for viewer attention.

The consumer is spoilt for choice when we also consider the print media that is on offer. While newspapers and magazines in the print form are in rapid decline in the West, they are more than holding their own in India. They may be less obstreperous than their television counterparts, but are not any less competitive. As of 31 March 2012, the total number of registered publications in India was 86,754, with the combined circulation of newspapers standing at 373,839,764.4 Their numbers, as well as circulation, have been growing handsomely over the years. The rate of growth of the combined publications over the previous year (2010-11) has been 5.51 per cent. And 4,545 new publications were registered in 2011-12.5

This media phenomenon in India is only a little over a decade old. Prior to that, the media was much smaller, more confined and far less competitive. Media players now are always at pains to make themselves distinct from their competitors (though to a lay viewer, they often end up looking alike). In contrast, newspapers in the 1980s and earlier, while having their individual and distinct personalities, had a lot in common in the way they looked at their business and the unstated rules around which they organized themselves.

It may be said that Bennett, Coleman and Company Limited (BCCL), which owns The Times of India and The Economic Times, among others, was the first to break the rules. That set the stage for a seminal change in the Indian newspaper industry in the 1980s and ’90s. To be sure, several protagonists played a part in that transformation. But this one media group remained at the centre of it all.

The BCCL story is probably one of the biggest corporate growth stories of that decade. Strangely, it has never received the attention it deserved. All the interconnections of that change have never been brought out. It is ironic that a newspaper group that regularly chronicles the rise and fall of business empires – and all that happens in between – should remain relatively obscure from public attention.

Some of this has to do with the philosophy of the group as also the obsessively low profile of its vice chairman, Samir Jain. He is rarely, if ever, featured in his own publications. The photographers of the group are under instructions not to click his pictures for use in the papers. As for other publications and channels, his interactions are so few, with so many years between them, that opportunities to know his story through the popular media are practically non-existent.

The group’s growth has not just been about its own numbers. It has profoundly impacted the media industry in India. If the media today is market-driven and profit-obsessed, the media before the 1980s was resolutely profit-averse. The market was rarely the media’s priority and it almost seemed to draw satisfaction from the fact that commerce did not govern its decisions.

The transformation from an inward-looking and market-agnostic media, to the media as we consume it today, was led by BCCL. The media began breaking away from a sequacious past sometime in the mid-1980s. Until then, for decades, it saw itself in the role of a ‘watchdog of democracy’ contributing to ‘building the nation’. It had been at the forefront of India’s freedom movement. Although more than three decades had elapsed since then, and much had changed even within the media, its self-image was still tethered to its days of glory.

The break that BCCL triggered was built around the idea that the media was also a business like any other. Like any business, it had to identify who its customers were, how its products and services would bring value to them and how much the business would make in return. As in any other business, it would have to compete with other companies, create its own value proposition and safeguard its bottom line.

In many ways, this set the stage for what came thereafter in the media industry. With the advent of satellite television in the early 1990s and then the proliferation of news channels, the media has effectively gone to the other end of the spectrum in terms of following the dictates of the market. The BCCL’s transformation, though resented and controversial at that time, now seems far more measured in comparison.

The BCCL story is also largely hidden from public view because one part of it had to do with the ‘truculent’  treatment of journalists in the group’s publications. The company chose to get rid of those who did not understand, or agree with, its new line; they were unceremoniously removed. The controversies surrounding the exit of journalists from The Times Group were analysed at some length in the past. They hit the headlines because fellow media persons took up the issue with great vigour, even as they, more or less, ignored the other aspects of the transformation of the group.

The media in the 1980s was, of course, much smaller, far less competitive and a lot less to play for. Yet the moves were audacious for that time. Take, for example, changing the look, feel and content of The Economic Times, pricing it at a premium and then abruptly bringing down the price one-day-a-week to rake in the volumes – all this made for scintillating stuff.

The group’s diligent but clever move to create a web of advertising rates for editions across the country also created new rules for the industry. Its move to cut the price of The Times of India and expand reach had a cascading effect on the industry. After some initial hesitation, many formerly sententious rivals followed suit. This meant that households in Delhi, for instance, could buy two newspapers for the same monthly bill. This, combined with certain other factors, led to an explosive growth in readership.

To carry all this through, it was important that the organization worked as one integrated whole, focused on the overall objectives. That was not easy. Newspapers consciously separate the news side of the organization from the advertising and marketing functions. This is to maintain objectivity and ensure that news is not influenced by those advertising in it.

While the same applied to BCCL, the separation had been taken too far. Each function operated as an island. The predominant position was with the lead writers. Many of its editors were erudite, well known among the intellectual middle class and respected in the corridors of power. Over time, however, this perhaps made them averse to change. They had strong, sometimes limiting, views on what was appropriate for a newspaper.

There was resistance, though less publicized, on the marketing and advertising side as well. People had to shed years of inertia and wake up to the new experiments being undertaken. There was upheaval there as well, with some in the old guard yielding to a new crop of professional marketing and brand managers recruited from other sectors.

All this action unfolded in the context of major changes in the media landscape, as also in the Indian economy. The latter half of the 1980s was an interesting time for the print media in India, which witnesed a magazine boom. There was also growth and expansion of newspapers, as some of the now prominent names entered the fray during that time.

The electronic media was essentially Doordarshan. Although government-controlled, it had opened itself up to commerce. It was smartening up, having gone colour in 1982. More importantly, it was steadily expanding its reach across the country and owing to its captive position, governments saw it as a potent weapon to shape and strengthen perceptions.

The Indian economy was taking its first wobbly steps towards liberalization. The new paradigm of openness and less government control had started to become visible. It would acquire momentum and clarity post-1991. But even in the mid-1980s, a new middle class was emerging in the metropolitan cities and large towns.

In hindsight, it appears that the transformation in the BCCL was timed to coincide with these mega developments. Some insiders claim these were a conscious response to the context as it unfolded. Others argue that they were foreseen. Yet others claim that to a large extent these changes were defined and shaped by the experts at BCCL.

What cannot be refuted is that the group experienced scorching growth in turnover, profits, reach and mindshare during the decade starting the mid-1980s. In 1985, it had a turnover of Rs 73.5 crore and a net profit of Rs 1.2 crore. The Times of India had three editions with a circulation of a little over 5.6 lakhs. By 2001, turnover had grown to Rs 1,214 crore. Net profit was at Rs 205.9 crore.

On 5 June 2005, The Sunday Times carried an advertisement which declared, ‘Shakespeare sulks. Byron blinks. And Wordsworth wails…as The Times of India becomes the largest selling English newspaper in the world’ with 2,438,115 copies. There was further growth.

As of March 2012, The Times of India is the largest circulated multi-edition daily in English in the country, with fourteen editions and a circulation of 4,575,895.6 The Economic Times is the second largest-selling business daily in the world, after the Wall Street Journal. The group publishes thirteen editions of newspapers and several magazines from eleven publishing and twenty-six printing centres and dominates the country’s English-language newspaper arena, which has more than 11,000 newspapers. All in all, the group has fifty editions across forty cities.

The group’s financials too have come a long way. In the financial year that ended on 31 March 2011, the company earned profit before tax of Rs 1,489.2 crore on a total income of Rs 4,749.3 crore.

Along with its newspapers, the group forges ahead with its two news channels, Times Now and ET Now, an entertainment, film and lifestyle channel (Zoom), a movies channel (Movies Now) and a radio network (Radio Mirchi). It also has OOH (out of home) advertising and event management ventures; and its investments span various other sectors such as music, films and real estate, among others.

Much has happened in terms of the group entering new areas of business, catching up on the news television business, buying and selling new brands and putting a lot of focus on the web and Internet media.

But it is reasonable to argue that the seeds for this prolific growth were sown in the early 1980s.

ABOUT THE AUTHOR

Sangita P Menon Malhan is an Indian writer born in 1967, who began her journey by training to be a pilot but shifted careers in her mid-twenties and became a journalist in New Delhi. She has worked with The Statesman, Delhi Mid-Day and  The Times of India. In 2008, she veered towards writing fiction. Her first book, a collection of short stories for children, Rastapherain’s Tales, was published in 2010. “The Time Has Come,’’ one of her short stories, was selected for 2011 New Asian Writing Short Story Anthology. She also has to her credit a collection of poems in Urdu, Nusrat-e-Gham. The TOI story has been in the works for 13 years, in fact as she told us, she almost gave up writing the book and then picked up the threads again to finally see it happen. She is fond of languages and teaches French. She lives in New Delhi.

भाजपा को सत्ता मिली तो दशकों तक कीमत चुकानी होगी!

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता और राजनेता बार-बार इस बात को नकारता आया है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भाजपा के राजनैतिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप रहता है। लेकिन पहले नितिन गडकरी की और अब नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी को लेकर जिस प्रकार संघ ने खुलकर भाजपा को निर्देश दिये हैं, उससे ये बात निर्विवाद रूप से साफ हो गयी है कि संघ एक ऐसा संगठन है, जिसके पास किसी भी प्रकार की लोकतान्त्रिक ताकत नहीं है, फिर भी वह भाजपा को संचालित करता रहा है।

यह प्रत्येक तटस्थ बुद्धिजीवी जानता है कि संघ राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के नाम पर इस देश में साम्प्रदायिक जहर फैलाने वाला फासीवादी संगठन है। जिसका काम इस देश में मनुवादी व्यवस्था को राजनैतिक रूप से फिर से पूरी तरह स्थापित करना है और मनुवादी व्यवस्था का अर्थ है-इस देश की स्त्रियों सहित 90 फीसदी आबादी को हमेशा गुलाम बनाये रखने वाली व्यवस्था को समाज में मान्यता प्रदान करना।

मनुवाद फिर से आर्यों के अधिपत्य को स्थापित करना चाहता है, जबकि आज बहुत सारे तटस्थ बुद्धिजीवी ब्राह्मण तक जहरीले मनुवादी नाग की खुलकर खिलाफत कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का अहसास हो गया है कि इतिहास में मनुवाद ने इस देश का भला करने के बजाय नुकसान अधिक किया है। मनुवाद के कारण देश पर विदेशी ताकतों का कब्जा हुआ, मनुवाद के ही कारण भारत जातियों में विभाजित है, जो इस देश की एकता को सबसे बड़ा खतरा है। इसके उपरान्त भी आज संघ ने हिन्दुत्व और कथित राष्ट्रवाद के नाम पर इतनी सारी दुकाने इस देश में खोल रखी हैं, जो इस देश के भोले-भाले और अशिक्षित या कम शिक्षित या परम्परावादी लोगों को बेवकूफ बनाकर, आकर्षक कलेवरों में मुनवाद का जहर बेच रही हैं। जिसके चलते गाँवों में भी मनुवादी जहर तेजी से फैल रहा है, जो इस देश के सुनहरे भविष्य के लिये सर्वाधिक घातक है। इस जहर के चलते यह देश कभी भी अपनी रीढ की हड्डी सीधी करके खड़ा नहीं हो सकेगा।

एक दूसरी बात और आज संघ यदि इस स्थिति में पहुँचा गया है और वह गुजरात के कत्लेआम के जरिये भाजपा के मार्फत नयी दिल्ली को कब्जाने के सपने देख रहा है तो इसके लिये उसने बहुत सारे ऐसे प्रयास किये हैं या कहो राजनैतिक षड़यन्त्र किये हैं, जो और किसी के लिये सम्भव नहीं है। इनमें सबसे बड़ा कार्य या कहो षड़यन्त्र ये रहा कि संघ ने अपने स्वयं सेवकों को सभी राजनैतिक दलों में प्रवेश करा रखा है और उन्हें उन दलों को धराशाही करने का जिम्मा सुपुर्द किया हुआ है। जिससे कि भाजपा का रास्ता साफ हो सके।

विशेष रूप से संघ के कई सौ कार्यकर्ता आज कांग्रेस में शीर्ष पदों पर विराजमान हैं, जो कांग्रेस का भट्टा बिठाने में लगे हुए हैं। इसे संघ की राजनैतिक षड़यन्त्रों को अंजाम देने की महारत कहा जा सकता है। जिसमें फिलहाल संघ सफल होता दिख रहा है, लेकिन इस षड़यन्त्रकारी राजनीति के जरिये संघ और अन्ततः भारतीय जनता पार्टी को कितना राजनैतिक लाभ होने वाला है, ये बात अभी भी संदिग्ध है, क्योंकि लोगों को डर है कि संघ नरेन्द्र मोदी के मार्फत कहीं इस देश को गुजरात की तरह कत्लगाह नहीं बनवा दे। इसलिये आज के माहौल को देखकर तो नहीं लगता कि संघ अपनी कुटिल कूटनीति में सफल होगा।

फिर भी इस देश की सभी स्त्रियों, देश के सभी अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों तथा ईसाइयों के साथ-साथ आरक्षित वर्गों-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति एवं ओबीसी के लोगों को सतर्क होने की जरूरत है, क्योंकि संघ की तलवार का पहला आघात इन्हीं सब की गर्दन काटने में होने वाला है। संघ कतई भी नहीं चाहता कि इस देश की स्त्री मुनवादी धार्मिक कायदों को नकारते हुए पुरुषवादी एकछत्र अहंकारी व्यवस्था को चुनौती देकर, पुरुष सत्ता में हिस्सेदारी करे। यही कारण है कि लोकसभा में प्रतिपक्ष की दबंग नेत्री होते हुए भी और हर प्रकार से योग्य एवं राजनैतिक रूप से कुशल और सक्षम होते हुए भी सुषमा स्वराज को किनारे करके कट्टर मुनवादी नरेन्द्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमन्त्री पद का दावेदार घोषित किया गया है।

नरेन्द्र मोदी गुजरात में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं, लेकिन गुजरात विधान सभा में एक भी अल्पसंख्यक को भारतीय जनता पार्टी का टिकिट नहीं दिया गया। केन्द्रीय स्तर पर भी शाहनवाज और नकवी के दो मुखौटों के अलावा भारतीय जनता पार्टी के पास कोई अल्पसंख्यक राजनेता नहीं है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति के राजनेताओं को भाजपा में किनारे लगाने के लिये संघ के इशारे पर लगातार षड़यन्त्र चलते रहते हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है-बंगारू लक्ष्मण।

यही नहीं संघ सभी पार्टियों में प्रविष्ट अपने स्वयं सेवकों के जरिये और संघ समर्थित कारपोरेट घरानो द्वारा संचालित मीडिया के मार्फत अजा, अजजा एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को समाप्त करने और स्त्रियों को आरक्षण नहीं दिये जाने के लिये लगातार काम करता रहता है। जिसमें उसे आश्चर्यजनक रूप से न्यायपालिका का भी सहयोग मिलता रहा है!  इस सबके बाद भी यदि भारत की हजारों वर्षों से शोषित स्त्रियाँ, अल्पसंख्यक और आरक्षित वर्ग के लोग संघ के इशारों पर नाचने वाली भारतीय जनता पार्टी के मोहपाश में फंसकर उसका राजनैतिक समर्थन करने की भूल करते हैं तो उन्हें आने वाली सदियों तक इसका मूल्य चुकाना होगा।

लेखक डा. पी. मीणा 'निरंकुश' से संपर्क 09828502666 के जरिए किया जा सकता है.

आसाराम के आदमी बचाव में बंटवा रहे पर्चे, पढ़िए क्या लिखा है

आसाराम मामले को लेकर मीडिया ट्रायल के बाद अब आसाराम के आदमी खुद आसाराम के बचाव में निकल पड़े हैं और इसके लिए बाकायदा पर्चे छपवा कर आसाराम समर्थकों के बीच बंटवाया जा रहा है. आसाराम खेमे की कोशिश है कि यौन शोषण प्रकरण के बाद आसाराम के भक्तों की संख्या में कमी न आए और आसाराम का बचाव समुचित तरीके से किया जाए. इसके लिए पर्चे पर पूरी बात आसाराम के फेवर में लिखकर बंटवाने की रणनीति अपनाई गई है. नीचे वो पर्चे हैं जो आसाराम समर्थक आसाराम के भक्तों के बीच वितरित करा रहे… पढ़ने के लिए नीचे दिए गए पर्चों के ठीक उपर क्लिक कर दें…


भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

चिटफंड कंपनी से पैसे लेकर चुप रहे पर 1500 करोड़ लेकर संचालक भाग गए तो अखबार वाले भी छापने लगे

प्रिय यशवंत जी, बहुत दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला के मुसाबनी प्रखंड के जादूगोड़ा (जहां यूसिल का माइंस है) इलाके में अवैध चिट-फंड संचालक कमल सिंह एवं दीपक सिंह द्वारा राज-कॉम कंपनी खोलकर निवेशकों का लगभग पन्द्रह सो करोड़ रुपये हड़प लिया गया. अब दोनों भाई फरार हो गए हैं. यह सब कुछ गोरखधंधा जादूगोड़ा थाना से मात्र कुछ गज की दूरी पर हो रहा था.

इन अवैध चिटफंड संचालकों द्वारा कई वर्षों से यहाँ यह धंधा किया जा रहा था जिसमें निश्चित रूप से पुलिस प्रशासन की मिलीभगत रही है. अखबार वाले भी इस रैकेट में शामिल रहे हैं और पैसे मिलने के कारण पहले कुछ नहीं लिखते थे. जबसे कंपनी के संचालक फरार हुए हैं और अखबार वालों को पैसा मिलना बंद हुआ है, तबसे अखबार वालों ने भी कंपनी के खिलाफ छापना शुरू कर दिया है. यानि पैसा मिलना बंद और छपाई शुरू.

ऐसा भी नहीं कि आला अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं थी. पर निजी स्वार्थ की खातिर इन अवैध संचालकों पर कोई कार्रवाई नहीं किया गया. इसका नतीजा यह है कि ये आराम से लोगों की गाढ़ी कमाई लेकर फरार हो गए. कुछ पत्रकारों को थाना प्रभारी द्वारा पहले कहा जाता था कि कोई लिखित शिकायत ही नहीं कर रहा इसलिए कार्रवाई नहीं कर पा रहा हूं जबकि सच्चाई यह है कि यह सब पैसों का खेल था और संचालकों से मोटा पैसा संरक्षण के नाम पर वसूला जा रहा था. जो कोई शिकायतकर्ता थाने आता, उसे थाना परिसर से डांट कर भगा दिया जाता. इस खेल में स्थानीय नेताओं की भी बड़ी भूमिका रही है जो संचालकों से मासिक पैसा वसूलते थे. प्रशासन, प्रेस और नेताओं की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा रैकेट चलाना नामुमकिन है.

यशवंत जी, आपको यह सूचना देने का कारण है कि जनता जागे और इन नान-बैंकिंग, चिटफंड कंपनियों से दूर रहे क्योंकि यहाँ सिर्फ धोखा ही मिलेगा.  दूसरा कारण है कि यह पढकर देश की बड़ी जांच एजेंसियों की आंखें खुले और जांच कर पूरे मामले का खुलासा करें. संचालको के साथ उनके सभी एजेंटों को पकड़ा जाए. स्थानीय प्रशासन के इस रैकेट में शामिल होने के कारण स्थानीय स्तर पर धोखेबाजों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई होना असंभव है. आपको बताता हूं कि यह कंपनी क्या करती थी. जादूगोड़ा के रहने वाले कमल सिंह यूसिल कंपनी में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था. इसने करीब सात साल पहले एक धंधा शुरू किया. वह यह कि मुझे एक लाख दो, बदले में पांच हज़ार मासिक दूंगा. साथ ही जो मुझे पैसा दिलाएगा उसे एक प्रतिशत अलग से दूंगा.

इसी तरह से इसका यह धंधा चल निकला और इसने इसी तरह से अपने सैकड़ों एजेंटों के माध्यम से करीब पन्द्रह सौ करोड़ रुपये मार्केट से उठा लिए. इसने मोबाईल कंपनी और कई अन्य कंपनियां खोल दी जिससे निवेशकों का विश्वास इन पर बढता चला गया. इतने दिनों से सब कुछ ठीक चल रहा था कि जून २०१३ से इसने पैसा वापस करना बंद कर दिया. पैसा वापस मांगने पर अलग-अलग बहाने बनाने लगा और लोगों से कहा कि आपका पैसा 25 सितम्बर तक वापस कर दूंगा. परन्तु ये 24 सितम्बर को ही अपने भाई और परिवार के साथ यहाँ से फरार हो गया जिसके बाद जादूगोड़ा में हंगामा मच गया. निवेशकों ने तोड़फोड़ एवं हंगामा शुरू कर दिया. इसकी खबर पाकर बड़े अधिकारी जादूगोड़ा पहुंचे एवं 50 की संख्या में निवेशकों ने कमल और उसके भाई पर मामला दर्ज करवाया जिसके बाद जादूगोड़ा थाना में धारा ४१९ /४२० /४०६ /४६७ /४६८ /४७१ /१२० के तहत २५ /०९ /२०१३ को मामला दर्ज किया गया है.

यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि सब कुछ जानते हुए भी इतने वर्षों से अखबार केवल निजी स्वार्थ एवं विज्ञापन के लोभ में कुछ भी नहीं छाप रहे थे. लेकिन कंपनी के भाग जाने के बाद जिस तरह से अखबारवालों ने छापना शुरू किया है, यह जादूगोड़ा क्षेत्र में बहुत बड़ा चर्चा का विषय बन गया है. लोग कह रहे हैं कि कि जबतक पैसे मिलते थे, कुछ भी नहीं छापा और पैसा मिलना बंद होते ही विरोध में छापना शुरू कर दिया. 

जादूगोड़ा से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

‘के न्यूज’ चैनल के दुर्दिन

कानपुर से चलने वाले 'के न्यूज' में मालिकों की खींचातानी और आपसी तालमेल में कमी के चलते जोशोखरोश से शुरू हुआ चैनल दम तोड़ता नजर आ रहा है.. लगातार पुराने लोगों के छोड़ने और नए व कम पैसे में काम करने वाले लोगों के जुड़ने से चैनल में तालमेल गड़बड़ होने लगा है.. एमडी के रूप में काम संभाल रहे यश अग्रवाल सब कुछ देखने का दावा करते हैं.. पर उनके पास निर्णय का कोई अधिकार नहीं है.. छोटी से छोटी बात के लिए वे धर्मेश चतुर्वेदी और अंशुल गुप्ता से बात करते हैं.. फिर भी फैसला होने में कई दिन लग जाते हैं..

पता ही नहीं चल रहा है कि चैनल को चलाने की जिम्मेदारी किसकी है, चैनल की कमियां ठीक कौन करेगा, और कौन है जो अभी सारे घालमेल का जिम्मेदार है.. फिलहाल यूपी उत्तराखंड के साथ साथ बुंदेलखंड के कई इलाकों से खबरों का आना लगभग बंद सा है.. फिर भी खींचतान कर एएनआई की खबरों और अखबारों की खबरों के सहारे चैनल चलाने की मुहिम जारी है.. अगर जल्द मालिकों ने प्रोफेशनल रवैया नहीं अपनाया तो चैनल की ऐसी की तैसी होना तय है..

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

क्या खुद को टीवी न्यूज़ का अमिताभ समझने लगे हैं दीपक चौरसिया?

इंडिया न्यूज़ पर 'जीनियस का टेस्ट लाइव' नाम से शो लेकर आए हैं देश के 'नं.4' न्यूज़ चैनल के एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया। मौका खुशी का था तो कौटिल्य पंडित (इंडिया का गूगल ब्वाय) और उसके दादा से केक कटाया। साथ ही ऐलान किया, न्यूज़ टीवी के अनोखे शो 'जीनियस का टेस्ट लाइव' का। इस शो के दौरान दीपक ने कौटिल्य से सवाल पूछे। एक सवाल की कीमत होगी दो हज़ार रुपये रखी गई।

शो मे दीपक बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन और उनके शो 'कौन बनेगा करोड़पति' की नकल करने मे लगे हैं. बोलने का अंदाज़, उन्हीं की तरह कुछ सवालों के जवाब के बाद चेक काटना. जिस सीट पर कौटिल्य बैठे, उसको रेड सीट (लाल सवाल वाली सीट दीपक ने शो के दौरान बोला) पुकारना. सब केबीसी और अमिताभ की तरह दिखने-दिखाने की कोशिश.  न जाने क्यों कर रहे हैं दीपक?  सवाल बस यही है कि क्या चौथे नंबर पर आने की खुशी मे खुद को टीवी न्यूज़ का अमिताभ समझने लगे हैं दीपक चौरसिया?

निखिल कुमार

times.newsnikhil@gmail.com

मुजफ्फरनगर के हत्यारों की तरफ से मुंह मोड़े बैठी है यूपी सरकार

लखनऊ : उत्तर प्रदेश शांत हो गया है। दंगों के दर्द को पीछे छोड़कर जनता अपने काम धंधे में लग गई है। वह लोग भी अपने गमों को भुलाने की कोशिश में हैं जिनके परिवार को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा था। उन्हें इस बात की चिंता जरूर सता रही है कि दंगों का राजनीतिकरण होने के कारण कहीं असली गुनाहगार जिन्होंने खुल कर हत्याओं, हिंसक वारदातों और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया था, बच न जायें। क्योंकि अभी तक कथित रूप से दंगा भड़काने वाले कुछ नेताओं और छुटपुट लोगों के अलावा दंगे में शामिल रहने वालों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। कई बेगुनाह और तमाशबीन ही नहीं रिक्शा चलाने और मजदूरी करने वालों को भी गुड वर्क दिखाने के चक्कर में पुलिस ने सलाखों के पीछे डाल दिया गया है। वहीं असली गुनाहगार खुलेआम अपने आकाओं के संरक्षण में घूम रहे हैं।

मुजफ्फरनगर पुलिस को 64 लोगों को मौत की नींद सुलाने वाले तमाम हत्यारों में से करीब 70-80 आरोपियों के बारे में सब पता है, लेकिन वह इस ओर से आंखें मूंदे बैठी है। स्थानीय पुलिस ने शासन को भेजी रिपोर्ट में भी जिक्र किया था कि उसने कुछ हत्यारों की शिनाख्त कर ली है। यह भी चौंकाने वाला तत्व है कि हत्या के अरोप में करीब 101 मुकदमे दर्ज हुए और तफ्तीश में 100 लोगों के नाम सामने आये, लेकिन गिरफ्तारी 213 लोगों की दिखा दी गई। इसी तरह से हत्या में 78 अपराधियों का नाम सामने आया और सिर्फ 40 को पकड़ा गया।

खैर, इन सब किन्तु-परंतुओं के बीच अच्छी खबर यह भी आ रही है कि दहशत कम होते ही शरणार्थी शिवरों में जीवनयापन करने वाले परिवार वापस अपने गांव-देहात की तरफ कूच करने लगे हैं। शिविरों में ही सही लड़कियों के हाथ पीले किये जा रहे हैं।  भाजपा का पश्चिमी उत्तर प्रदेश बंद भी शांतिपूर्वक निपट गया। अगर कुछ शांत नहीं हुआ है तो राजनीतिक नेताओं की धमा-चौकड़ी। दंगों को लेकर नेताओं के बीच आरोपों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सभी अपने-अपने हिसाब से दंगा भुनाना चाहते हैं।

दंगों के बाद की राजनीति पर नजर डाली जाये तो समाजवादी नेता भाजपा और कांग्रेस पर दंगा भड़काने का आरोप लगा रहे हैं तो भाजपा का आरोप है कि दंगा समाजवादी सरकार की साजिश का परिणाम था। कांग्रेस ने भी इसमें अखिलेश सरकार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करके राजनैतिक रोटियां सेंकने की कोशिश की। भाजपाई अपने नेताओं को बेदाग बताते हुए आरोप लगाते हैं कि उनके नेताओं और जनप्रतिनिधियों को साजिशन पकड़ा जा रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता और मंत्री तो हिंसा ग्रस्त इलाके का दौरा कर रहे हैं लेकिन भाजपा नेताओं को दंगा प्रभावित इलाकों में जाने से रोका जा रहा है ताकि समाजवादियों और कांग्रेसियों का खेल उजागर न हो जाये। भाजपा,  सपा के कद्दावर नेता और मंत्री आजम खॉ पर कई गंभीर आरोप लगा रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर हैं। पूरी पठकथा 2014 को ध्यान में रखकर लिखी जा रही है।

भाजपा को इस बात का बेहद मलाल है कि कांग्रेस और उसकी केन्द्रीय सरकार और समाजवादी पार्टी और उसकी राज्य सरकार दंगों के नाम पर एक वर्ग विशेष को खुश करने में लगी है, जबकि दंगों से कोई भी अछूता नहीं रहा था। बसपा सुप्रीमों मायावती अपना अलग राग अलाप रही हैं। वह भाजपा और समाजवादी दोनों को निशाने पर लिये है। दंगों ने बसपा में प्राण वायु फूंक दी हैं, बसपाइयों के जबर्दस्त विरोध के चलते अखिलेश सरकार सदन से लेकर सड़क तक पर बैकफुट पर आ गई, लेकिन बसपा को उस समय करारा झटका लगा जब यह खबर सार्वजनिक हुई की उसकी (बसपा)पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक मुस्लिम महिला सांसद समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव से करीबी बना कर बसपा के मंसूबों पर पानी फेरने में लगी है। खबर लीक होते ही बसपा आलाकमान का पारा चढ़ गया। चर्चा तो यहां तक है कि इसी महिला सांसद की बातों पर विश्वास करके ही समाजवादी सरकार ने भाजपा ही नहीं बसपा विधायक को भी दबोचा था।

सबके अपने-अपने तर्क हैं। राजनैतिक पंडित कहते हैं कि सपा नहीं चाहती है कि दंगाग्रस्त इलाके में उनके अलावा किसी और जाति का नेता मुसलमानों का मसीहा बनने की कोशिश करे। इसी लिये बसपा के कुछ मुस्लिम जनप्रतिनिधियों पर भी लगाम लगाई जा रही है। वैसे भी जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी कैबिनेट मंत्री आजम खॉ के बहाने समाजवादी सरकार को कटघरे में खड़ा करने की पूरी कोशिश कर रहे है। कभी मुलायम के काफी करीब रहे जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी द्वारा आजम को यूपी का मोदी तक बताया जा रहा है। रही सही कसर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने मुजफ्फरनगर दंगों की तुलना गुजरात दंगों से करके पूरी कर रखी है। जमीयत के महासचिव मौलाना महमूद मदनी शायद ही कोई दिन गुजरता होगा जब यूपी सरकार पर हमला नहीं बोलते हों, वह सीमए अखिलेश को विफल सीएम की उपमा दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी मुजफ्फनगर दंगों और उसके बाद जांच के नाम पर भेदभाव पूर्ण व्यवहार का आरोप झेल रही समाजवादी सरकार के खिलाफ दायर तमाम आईपीएल पर गौर कर रही है।

हालात की गंभीरता को इस अहसास से समझा जा सकता है कि राजनीति के सबसे चतुर खिलाड़ियों मंे गिने जाने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव तक चारो खाने चित दिखाई दे रहें हैं, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने के दौरान कुछ मुस्लिमों संगठनों और मुसलमानों की नाराजगी और सीएम को काला झंडा दिखाये जाने की घटना ने सपा को सकते में डाल दिया है। मुलायम की लाचारी का आलम यह है कि वह दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने तक का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं, एक बार प्रोग्राम बना भी था तो विरोध की आशंका के चलते अंतिम समय मंे रद्द कर दिया गया। शिवपाल यादव के दौरे का भी वैसा ही हश्र हुआ जैसा सीएम के दौरे का हुआ था। शिवपाल ने यह कोशिश जरूर की कि सभी वर्ग के लोगों से मुलाकात करके उनके जख्मों पर मरहम लगाया जाये, उनके साथ विभिन्न वर्गो के नेताओं का जमावड़ा भी साथ-साथ चल रहा था, लेकिन सारी कवायत बेकार गई।  हालत यह है कि सपा का कोई बड़ा नेता दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा करने का साहस नहीं जुटा पा रहा है। मुलायम के साथ परेशानी यह है कि आजम खॉ को लेकर दौरा करंेगे तो गैर मुस्लिम नाराज हो जायेगें और उनके बिना दौरा करंेगे तो मुसलमानों के बीच यह मैसेेज जायेगा कि आजम साहब दंगों से नाराज चल रहे हैं। इन सब बातों के बीच बताते चलें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक गुरू पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह का राजनैतिक क्षेत्र रहा है।

हालांकि चौधरी चरण सिंह ने कभी ऐसा कोई बयान नहीं दिया था जिससे लगे कि मुलायम को वह अपना चेला नही मानते थे। अनेक मौंको पर दोनों अलग-अलग खड़े दिखाई पड़ जाते थे। चरण सिंह ने जाटों और मुसलमानों को एक ही घाट पर रहना सिखाया था और इसी के बल पर वर्षो तक यहां एक छत्र राज किया था। चरण सिंह की विरासत संभालने वाले उनके पुत्र अजित सिंह भी इसी फार्मूले के बल पर  रोटिंया सेंकते रहें हैं। मुलायम अपनी पार्टी के जाट नेताओं की नाराजगी से भी परिचित हैं। कई ने पाला बदल दिया है तो कुछ और के बदलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बैंक मुसलमानों से भी बढ़ा है, इसी लिये मुलायम दोनों(जाट और मुसलमानों) को नाराज नहीं करना चाहते हैं। मामला थोड़ा ठंडा होने की बाद ही मुलायम का वेस्ट यूपी दौरा संभव लग रहा है। तब तक उनकी सरकार दोनों की कौमों को मरहम लगाने का काम करती रहेगी।

बहरहाल, बात बसपा की कैराना की महिला सांसद तबस्सुम हसन की कि जाये जो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के लिये दंगों के बाद रहनुमाई कर रही हैं, वह एक तीर से दो निशाने लगा रही हैं। अपने संसदीय क्षेत्र में भाजपा की कमर तोड़ना और मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बनाना उनका परम धर्म बन गया है। यहीं से भाजपा के बड़े जाट नेता हुकुम सिंह आते हैं। हाल फिलहाल तक हुकुम सिंह और तबस्सुम के बीच अच्छी बनती थी, विधायक का चुनाव हुकुम सिंह लड़ते तो तबस्सुम उनकी मदद करती और सांसदी में हुकुम सिंह की मदद उन्हें मिलती, लेकिन बदले हालात ने रिश्तों पर ग्रहण लगा दिया। तबस्सुम की मुलाकात विधान सभा सत्र के दौरान मुख्यमंत्री से हुई थी। सीएम जब दंगा प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने गये थे तब भी तबस्सुम ने उन पर काफी मेहरबानी की थी। दौरे के दौरान भी उन्होंने बसपा सांसद से मुलाकात की थी।  तबस्सुम कहती भी हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री का सच्चाई बतायी थी। सांसद तबस्सुम का सारा ध्यान 2014 पर लगा है, वह यहां अपना वोट बैंक किसी भी तरह से बढ़ाना चाहती हैं, इसी लिये सभी तरह के हथकंडे अपना रही हैं। बसपा सुप्रीमों नाराज भी हो जायेंगी तो उनकी सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। एक रास्ता बंद होगा तो दूसरा खुल जायेगा। बसपा आलाकमान को इस बात का पता चलते ही महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने सफाई देते हुए कहा कि उनके पास सांसद तबस्सुम के मुख्यमंत्री से मिलने के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पार्टी के अन्य नेताओं को भी कुछ नहीं पता है। मीडिया से इस बात का पता चला है, पूरे मामले की जांच की जायेगी।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

कोई कार्यक्रम-सेमीनार टाइप होता तो राहुल जी सबको डांट ही देते…

Abhishek Srivastava : खालीपन से ऊब कर अभी टीवी चैनल बदल रहा था। अचानक ज़ी बिज़नेस पर राहुल देव जी नरेंद्र मोदी पर बोलते दिखे। दो सेकंड ठिठका और सुनने की कोशिश करने लगा कि वे क्‍या कह रहे हैं। जितने में संदर्भ आदि समझ में आता, एक हिलते-डुलते पगलाए एंकर ने उनका मुंह ही नोंच लिया। राहुल जी बोलते रहे और उनकी आवाज़ को म्‍यूट कर के एंकर उनका एक वाक्‍य लेकर ऐसे उछलने लगा जैसे किसी ने पीछे से पेट्रोल डाल दिया हो।

अजीब पागल सब आने लगे हैं भाई… सब एक-दूसरे की नकल करते हैं चिम्‍पान्‍जी की तरह। सोच रहा हूं कि कोई कार्यक्रम-सेमीनार टाइप होता तो राहुल जी सबको डांट ही देते… टीवी पर तो जाने कैसा न कैसा लगता होगा ऐसी स्थिति में..

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

लोकतंत्र का असली मंदिर संसद भवन नहीं बल्कि हमारा सुप्रीम कोर्ट है : असीम त्रिवेदी

Aseem Trivedi : दागी नेताओं के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय और फिर राईट टू रिजेक्ट के बाद तो लगने लगा है की लोकतंत्र का असली मंदिर संसद भवन नहीं बल्कि हमारा सुप्रीम कोर्ट है. सुप्रीम कोर्ट ने वो सभी काम सम्हाल लिए हैं जिसकी जिम्मेदारी सही अर्थों मे हमारी संसद की थी. देखकर आश्चर्य होता है की सुप्रीम कोर्ट जनता की लड़ाई लड़ रहा है और जनता घर मे बैठकर टी वी पर खबरें देख रही है. दागियों के पक्ष मे सरकार के अध्यादेश के बाद कहीं भी कोई प्रोटेस्ट देखने मे नहीं आया. क्या प्रतिरोध की सारी धाराएं थम चुकी हैं.

क्या पिछले कुछ सालों मे जागी जनचेतना फिर से सुषुप्त हो चुकी है. मेरा मन ये जानने के लिए बेचैन है की क्या एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा जाएगा और लोकतंत्र का बलात्कार किया जाएगा या फिर हम वाकई मे एक नयी सुबह देखेंगे. एक ऐसी संसद देखेंगे जहां ईमानदार लोग बैठे दिखाई पड़ेंगे, जिनका मकसद अपनी तरक्की नहीं अपने देश की तरक्की होगा. जो हमें हमारे सपनों के भारत को हकीकत मे देखने का मौक़ा देने के लिए सच्ची कोशिशें करेंगे. लेकिन इतना तो स्पष्ट है की अगर सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का ये ऐतिहासिक फैसला नहीं पलटा तो आश्चर्यजनक परिणाम होंगे.

आने वाले चुनाव एक आंदोलन की शक्ल ले सकते हैं. जब लोग वोट सिर्फ इसलिए न दें कि ये महज़ एक जिम्मेदारी है बल्कि इस लिए दें कि वो ये महसूस करें कि देश को बचाने का, उम्मीदों को बचाने का सिर्फ एक ही तरीका बचा है और वो है मतदान. हर पार्टी पर दबाव होगा कि अगर वो दागियों को उम्मीदवार बनाकर सामने लाये तो जनता उन्हें रिजेक्ट कर सकती है. ये दबाव टिकट वितरण के ढंग मे आमूल चूल परिवर्तन कर सकता है. और अगर ऐसा न भी हो और देश के बस कुछ हिस्सों मे भी लोग अपने उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने मे सफल हो जाएँ, तो ये भ्रस्टाचार और अपराध मे घुटने तक धंसे राजनीतिक दलों और उनके भ्रष्ट नेताओं को जनता का करारा जवाब होगा.

जाने-माने कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी के फेसबुक वॉल से.

हिंदी में अमर उजाला के उदय कुमार ह्वाइट हाउस जाने के लिए चुने गए

Udai Kumar Sinha : मैं उन 5 खुशकिस्मत पत्रकारों में हूं जिनका चयन कल व्हाइट हाउस जाने के लिए हुआ है। हिंदी अखबार से एकमात्र मुझे लिया गया है। 2 अंग्रेजी, एक क्षेत्रीय भाषा और एक न्यूज चैनल के पत्रकार हैं।

पाबंदियों के कारण व्हाइट हाउस में सीमित लोगों को ही जाने की इजाजत मिली है। कल सुबह ओबामा- मनमोहन मुलाकात का गवाह बनने का मौका मिलेगा।

अमर उजाला में संपादक के रूप में कार्यरत उदय कुमार सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

दैनिक ट्रिब्यून के संपादक संतोष तिवारी को मातृ शोक

दैनिक ट्रिब्यून के संपादक श्री संतोष तिवारी की माता जी श्रीमती विमला देवी का कानपुर में निधन हो गया है। वे अंत तक स्वस्थ और सक्रिय थीं। उनकी उम्र 75 वर्ष के आसपास थी. वे अपने पीछे दो पुत्र और चार पुत्रियां छोड़कर गई हैं। उनकी एक पौत्री, साक्षी,  जो श्री संतोष तिवारी की पुत्री हैं, 92.7 बिग एफएम रेडियो में लोकप्रिय आरजे हैं। आप संतोष तिवारी से 08283844664 पर संपर्क कर सकते हैं।

भड़ास तक अपनी बात पहुंचाने के लिए bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

बिनोद सिन्हा पांकी विधानसभा क्षेत्र में अभी से बहा रहा पैसा!

उसके पास रातों रात कमाया हुआ अपार सफेद-काला पैसा है। वह हाल ही में करीब 44 माह बाद जमानत पर जेल से छूटा है। उस पर अरबों-खरबों के घपले-घोटालों के कई मामले चल रहे हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री एवं चाईबासा के वर्तमान सांसद मधु कोड़ा का लंगोटिया यार रहा है। उसे अरबों रुपये के घोटाले के आरोपी कोड़ा एंड कंपनी का मुख्य सूत्रधार भी माना जाता है।  आज कल दवा घोटाले के मुख्य आरोपी मधु कोड़ा मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे भानु प्रताप शाही की गलबहियां डाल रखा है। वह किसी किमत पर कहीं से विधान सभा चुनाव जीतना चाहता है।

इसीलिये वह इन दिनों झारखंड के उग्रवाद प्रभावित पलामु जिले के पांकी क्षेत्र में पानी की तरह पैसा बहा रहा है। वह जिधर चलता है, उधर सौ से उपर महंगी गाड़ियों का काफिला साथ चलता है। यहां से स्थानीय राजनीति के मंझे खिलाड़ी विदेश सिंह बतौर निर्दलीय विधायक हैं। फिलहाल विदेश सिंह अचरज में हैं कि उनके मांद में अचानक यह सब क्या हो कहा है।  

जी हां, मैं बात कर रहा हूं झारखंड में कथित मधु कोड़ा लूट राज का सूत्रधार बन कर उभरे एक प्रमुख आरोपी बिनोद सिन्हा की। इस शक्स का हर तरफ पैसा बोलता है। उसे यकीन है कि वह पैसा से कुछ भी कर सकता है। किसी को भी चुनाव जीता है और खुद जीत भी सकता है। जब वह मधु कोड़ा को सांसद-मुख्यमंत्री तथा उनकी पत्नी को विधायक बना दिया तो  उसके लिये खुद का रास्ता तो काफी आसान है।  इधर पिछले एक पखबारे से बिनोद सिन्हा अपने नीजि लाव-लश्कर के आलावे कथित दवा घोटालेबाज भानूप्रताप शाही के संग पांकी में खूब हवा बांध रहा है।  वहां के पत्रकारों भी बहती गंगा में हाथ धोने में पीछे नहीं है। विनोद सिन्हा को मीडिया में मोटी-मोटी सुर्खियां मिल रही है।

राजनीतिक सूत्र  बताते हैं कि विनोद सिन्हा अपने शागिर्द मधु कोड़ा की जय भारत समानता पार्टी की बनैर तले चुनाव लड़ने का मन बना लिया है। हालांकि फिलहाल भानुप्रताप शाही के क्षेत्रीय युवा मोर्चा के झंडे-बैनर के साथ सारा दौड़-धूप हो रहा है। इससे पहले विनोद सिन्हा ने झाविमों, कांग्रेस, झामुमो, आजसू,राजद जैसे दलों में शामिल होने के खूब जुगत भिड़ाये लेकिन, कहीं दाल नहीं गली।  राजनीतिक विश्लेष्कों का मानना है कि विनोद सिन्हा के पांकी विधानसभा क्षेत्र  से चुनाव लड़ने की स्थिति में खास कर कांग्रेस-झामुमों-राजद की अंदरुनी मदद मिल सकती है।

रांची से राजनामा डाट काम के संचालक-संपादक मुकेश भारतीय की रिपोर्ट.

देह-मुक्ति का सवाल दलित स्त्रीवाद का सवाल नहीं है : अनिता भारती

‘दलित स्त्रीवाद का सभी मुक्तिकामी आन्दोलनों की उपलब्धियों पर दावा है, सबके साथ अलायंस है, सबकी सीमाओं को अहसास कराते हुए..’ …यह निष्कर्ष पिछले २४ सितम्बर को 'दलित स्त्रीवाद : चुनौतियां और लक्ष्य' विषय पर हुए परिचर्चा का था, जिसे 'स्त्रीकाल' (स्त्री का समय और सच) पत्रिका के 'दलित स्त्रीवाद अंक' के प्रकाशन के अवसर पर 'स्त्रीकाल' और 'आल इण्डिया बैकवर्ड स्टूडेंट्स फोरम' के द्वारा आयोजित किया गया था.

'स्त्रीकाल' की ओर से बोलते हुए संपादक मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने कहा कि 'स्त्रीकाल' अपने प्रकाशन के साथ ही विशेष अंकों का प्रकाशन करता रहा है और सम्बंधित थीम पर परिचर्चा आयोजित करता रहा है. इस बार का अंक चूंकि ‘दलित स्त्रीवाद अंक है,’ इसलिए यह परिचर्चा आयोजित हुई है.

विषय प्रवेश करते हुए पत्रिका की अतिथि संपादक अनिता भारती ने कहा कि दलित स्त्रीवाद को सवर्ण वर्चस्व के स्त्रीवाद से अलग ढंग से समझने की जरूरत है. यदि दलित स्त्री की मुक्ति की बात करनी है, तो उसे सबसे पहले जाति से मुक्ति की बात करनी होगी, देह-मुक्ति का सवाल दलित स्त्रीवाद का सवाल नहीं है. दलित स्त्री के श्रम भी गैर दलित स्त्री की तुलना में अलग है, जहां उत्पीडन की संभावनाएं अधिक है.’

टाटा इंस्टीट्यूट फॉर सोशल सायंस के एडवांस सेंटर फॉर वीमेनस स्टडीज की चेयर पर्सन मीना गोपाल  ने कहा कि ‘जब श्रम और यौनिकता के सवाल को जाति के सवाल के साथ जोड़ कर देखते हैं, तो स्त्रीवादी राजनीति का एक अलग परिप्रेक्ष्य सामने आता है . इसलिए स्त्री आन्दोलन पर बात करते हुए दलित स्त्री आन्दोलन की स्वायतता को अलग से समझा जाना जरूरी है .’

सी डव्ल्यू डी एस की सीनियर फेलो मेरी इ जॉन ने कहा कि पिछले चार-पांच दशकों में स्त्रियों ने अपनी पहचान बनानी शुरू की है , उसी अनुपात में उनके ऊपर पुरुष हिंसा की घटनाएं बढती भी गई हैं. चाहे वह हिंसा हरियाणा के खाप पंचायतों के द्वारा हो या दिल्ली आदि जगहों में बलात्कार  के रूप में हो.’

नाट्यकर्मी तथा सामजिक कार्यकर्ता सुजाता पारमिता ने इस विषय पर आपनी बातचीत में कहा कि दलित स्त्री साहित्य दलित स्त्री के जमीन पर किये गए संघर्ष से पैदा हुआ साहित्य है, इसलिए उसको देखने और समझने के लिए अलग ढंग के नजरिये की जरूरत है. उन्होंने लोककलाओं और साहित्य में दलित स्त्री के दखल पर विस्तृत प्रकाश डाला . वही जे एन यू के भारतीय भाषा केंद्र के प्राध्यापक देवेन्द्र चौबे ने कहा कि दलित स्त्रीवाद के प्रसंग में सबसे बड़ा सवाल है कि हमारे सामजिक –सांस्कृतिक संरचना में दलित स्त्री को कहाँ जगह दी गई है .’

मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय  की प्राध्यापिका रजनी दिसोदिया ने विषय पर बहस के बाद अपनी टिपण्णी में विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में दलित स्त्री और दलित प्रश्नों के साथ भेद –भाव को स्पष्ट किया , वहीँ उन्होंने समाज में गहरे पैठ चुके जातिवादी मानस के कारण दलित स्त्री के प्रति समाज के हिंसक रवैये पर भी अपनी बात कही. अपनी टिपण्णी में दलित प्रश्नों पर आधिकारिक हस्तक्षेप रखने वाले डा बजरंग बिहारी तिवारी ने कहा कि ‘दलित स्त्रीवाद डा आम्बेडकर की पुनर्प्राप्ति का आन्दोलन है. उन्होंने कहा कि दलित स्त्रीवादी लेखन आन्दोलन धर्मी लेखन  है , इसकी लेखिकाएं आन्दोलनों से जुड़कर लिखती हैं न कि खाली समयों में अभिव्यक्त होती हैं .’

स्त्रीवादी चिन्तक और कार्यकर्ता रमणिका गुप्ता ने कार्यक्रम  की अध्यक्षता करते हुए  कहा कि ‘दलित स्त्रीवादी आन्दोलन से स्त्रीवादी आन्दोलन और मजबूत होगा . उन्होंने दलित स्त्री के तिहरे शोषण की बात करते हुए कहा कि उनका संघर्ष जाति और पितृसत्ता दोनो से है.’ रमणिका गुप्ता ने कहा कि ‘आदिवासी तथाकथित सभ्य समाज से ज्यादा प्रगतिमूलक समाज है. उनकी भाषा और भाषिक मिथक की प्रकृति स्त्रीवादी है . उनकी कई जनजातियों में स्त्री की संतान के लिए उसकी माता की पहचान ही काफी है , इस लिहाज से स्त्रियाँ वहां ज्यादा स्वतंत्र हैं. दिक्कत तब होती है , जब उनके बीच से ही कोई कालेज –विश्वविद्यालयों में पढ़कर सीता –सावित्री के मिथकों से परिचित हो जाता  है .’ उन्होंने इस सदी को प्रतिरोध की सदी कहा और हर स्तर पर चल रहे स्त्रियों के संघर्ष के आपसी साहचर्य को आवश्यक बताया .’

कार्यक्रम का संचालन स्त्रीकाल के संपादन मंडल के सदस्य धर्मवीर सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन एआईबीएसऍफ़ के जितेन्द्र यादव ने किया .

संजीव चन्दन की रिपोर्ट.

वीके सिंह को फंसाने के लिए जो रपट उछाली गई, वह केंद्र के गले की फांस बनी

जनरल वी.के. सिंह को बदनाम करने के लिए सरकार ने जब एक गोपनीय रपट को अखबारों में उछलवाया था तो पिछले हफ्ते मैंने लिखा था कि यह सरकार का देशद्रोहपूर्ण कार्य है। उस समय सरकार के बारे में मेरी यह राय कुछ लोगों को काफी कठोर मालूम पड़ रही थी लेकिन अब जबकि सरकार की पोल अपने आप खुलती जा रही है तो वह और उसके नेता हाय-तौबा मचाने लगे हैं। वी.के. सिंह को फंसाने के लिए जो रपट उछाली गई थी, वही अब केंद्र सरकार के गले का हार बन गई है। सरकार को अब पता चल रहा है कि इस रपट को सार्वजनिक करने के दुष्परिणाम क्या होंगे।

इस रपट में सरकार ने यह कहलवाया कि जनरल सिंह ने अपने कार्यकाल में फौज की करोड़ों की गुप्त-राशि जम्मू-कश्मीर के मंत्रियों को चटा दी ताकि वे उमर अब्दुल्ला की सरकार को गिरवा सकें। अखबारों में कुछ मंत्रियों के नाम और उन्हें दी गई राशियां भी छपीं। यह स्वभाविक था कि जनरल सिंह इस आरोप का खंडन करते या सफाई देते। उन्हें सरकार ने सफाई देने के लिए मजबूर किया। उन्होंने मजबूरी में उस राशि के वितरण का सैद्धांतिक ब्यौरा भी प्रगट कर दिया। अगर वे चुप रहते तो उनकी बदनामी तो होती ही, सरकार की बदनामी ज्यादा होती। पाकिस्तान में कहा जाता कि भारत सरकार कश्मीर पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए स्थानीय नेताओं को करोड़ों की रिश्वत भी देती है। इसीलिए जनरल सिंह ने बताया कि वह राशि रिश्वत की नहीं, सदभाव की राशि होती है, जो मंत्रियों को दी जाती है। जनरल सिंह के इस बयान से सरकार की छवि थोड़ी सुधरती है, लेकिन आश्चर्य है कि कांग्रेस के नेता अपने हाथों ही अपने पांव पर कुलहाड़ी मार रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जनरल सिंह नाम उजागर करें।

अब इन नेताओं से पूछा जाए कि नाम उजागर होंगे तो किनके होंगे? उन्हीं के होंगे, जिनकी सरकारें श्रीनगर में आज तक बनती रही हैं। जनरल सिंह का कहना है कि ये राशियां शुरू से दी जा रही हैं, यदि यह सच है तो क्या इस जाल में कांग्रेसी नहीं फंसेंगे? फारुख अब्दुल्ला और कांग्रेसी नेता अपने आपको बड़ा दूध का धुला दिखा रहे हैं और उन्होंने ऐसा तेवर धारण कर लिया है, जैसे कि उन्हें आज तक इस तरह की हेराफेरी की भनक भी नहीं थी।

अच्छा होता कि जनरल सिंह चुप रह जाते लेकिन अब हमारी गुप्तचर एजंसियों के रहस्य खुलने शुरू हो जांएगे। सरकार में बैठे कुछ मुर्ख नेता अपने विरोधियों का मुंह काला करने के चक्कर में अपनी नाक कटवाने का आयोजन कर रहे हैं। उनकी कटे तो कट जाए लेकिन यह भारत की बदनामी भी है। सीमांत क्षेत्रों में सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ फौज की ही नहीं होती, गुप्तचर संस्थाओं की भी होती है। इस रपट का दुरुपयोग करके सरकार ने हमारी गुप्तचर एजेंसियों को भी खतरे में डाल दिया है। उन कश्मीरी नेताओं की स्थिति भी विषम कर दी है जिन्होंने भारत के साथ सहयोग किया है। इस दृष्टि से भारत सरकार के जिन नेताओं ने यह नादानी की है, उनका यह कार्य देशद्रोह से कम नहीं है। जनरल सिंह या बाबा रामदेव या अन्ना हजारे से लड़ने के लिए अपने देश की सुरक्षा को खतरे में डालना कहां तक उचित है?

लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं.


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समझदारों का पागलखाना

कभी-कभी ऐसा होता है जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें और उन्हें कभी भूल न पाएं। यह जरूरी नहीं कि हम उनका नाम जानें और वे बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति हों। उनका इनसान होना भी जरूरी नहीं है। जैसा कि वे चार उल्लू, जो रात को घर आते वक्त मुझे रास्ते में मिलते थे। वे किसी सैनिक की तरह लाइन बनाकर एक दीवार पर बैठते थे। उनमें से जो सबसे मोटा था, शायद वह उनका कमांडर था। एक दिन मैंने उनकी गिनती की तो उनमें से एक उल्लू गायब मिला। मुझे बहुत फिक्र हुई। बाद में मैंने अनुमान लगाया कि शायद उल्लुओं के बीच साप्ताहिक अवकाश का कोई समझौता हो गया है। उल्लू मुझे बहुत पसंद हैं। खासतौर से उनका चेहरा। वे स्वभाव से ही मुझे जिज्ञासु लगते हैं। उनके काम का तरीका पूरी दुनिया से अलग है।

नेचुरोपैथी की पढ़ाई के दौरान मिले एक अंकल का चेहरा आज तक मेरी यादों में ताजा है। मैं उनका नाम नहीं जानता, फिर भी हजारों की भीड़ में उन्हें पहचान सकता हूं। वे एक रिटायर्ड फौजी हैं। उन्हें राजनेता पसंद नहीं थे। इसके बजाय वे राजाओं के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने मुझे एक ऐसे राजा की कहानी सुनाई जिसने चोरी हुआ पांच किलो घी सिर्फ आधा घंटे में ढूंढ़ लिया। उनका मानना था कि दुनिया को अब भी राजा के शासन की ही जरूरत है। वे महाराजा अशोक, विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य को बेहद पसंद करते थे। उनका एक सपना पहले महायुद्ध में शामिल होने का था, जो कभी पूरा नहीं हो सका।

इसी तरह स्कूली दिनों के एक अध्यापक मुझे अच्छी तरह याद हैं। उनका नाम मामचंद जी था। हम बातचीत में उन्हें मामा जी कहते थे। शुरुआत में वे विज्ञान पढ़ाते थे। बाद में उन्होंने हिंदी पढ़ाने का अभ्यास किया। हिंदी में जब बात नहीं बनी तो गणित में हाथ आजमाया। एक दिन वे नहीं आए। हम उनका इंतजार करते रहे। उसके बाद वे कभी नहीं आए। कुछ दिनों पहले मैंने उन्हें गूगल और फेसबुक पर तलाशने की कोशिश की। वे वहां भी नहीं मिले। अगर वे कभी मुझे रास्ते में मिले तो उनसे शिकायत करूंगा कि उन्होंने गणित की जो प्रश्नावली अधूरी छोड़ी थी, उसकी वजह से कई बच्चे परीक्षा में उसका सवाल छोड़कर आ गए। मैं उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद कहना चाहूंगा कि बच्चों की पिटाई में उनकी कोई रुचि नहीं थी।

यहां मैं एक दिलचस्प बात और बताना चाहता हूं। यह मुझे मेरे एक दोस्त ने बताई थी। तब वह एक सरकारी स्कूल का छात्र था। उनके विज्ञान के टीचर बहुत क्रोधी थे। जब उन्हें गुस्सा आता तो बच्चों की बेरहमी से पिटाई करते। एक बार स्कूल के बच्चे और सभी टीचर शिमला घूमने गए। शाम होने के बाद मौसम खराब होने लगा तो उन्हें स्थानीय प्रशासन ने अपनी होटल में लौट जाने का निर्देश दिया। थोड़ी देर बाद दो पुलिसकर्मी आए और उन्होंने सभी बच्चों को जाने के लिए कहा। तभी विज्ञान के टीचर आ गए और पुलिस से बहस करने लगे। बात बढ़ती देख एक पुलिसकर्मी ने उन्हें डंडा जमा दिया। टीचर बोले- ‘मैं सरकारी कर्मचारी हूं।’

इस पर पुलिसकर्मी बोला – ‘मैं भी सरकारी कर्मचारी हूं।’ और उसने टीचर को एक डंडा और लगा दिया। इस घटना के चश्मदीद गवाह वे बच्चे थे जो अब तक टीचर के हाथों स्कूल में असंख्य बार बुरी तरह पिट चुके थे। यह बात तत्काल जंगल की आग की तरह फैल गई। कुछ बच्चों ने इसे तिल का ताड़ बनाकर अपने दोस्तों को बताया। मालूम हुआ कि शिमला से लौट आने के बाद टीचर का स्वभाव बदल गया और उन्होंने बच्चों को पीटना हमेशा के लिए बंद कर दिया। अब वे एक अच्छे और दयालु अध्यापक बन चुके थे।

चलते-चलते

दुनिया को समझ पाना असंभव नहीं तो भी बहुत-बहुत मुश्किल है। इतना मुश्किल कि मैं इसे अब तक असंभव ही मानता आया हूं। मेरा मानना है कि दुनिया एक बहुत बड़ा स्कूल है, जिसमें हम सभी छात्र हैं। यहां हमें कितनी क्लास पास करने का मौका मिलता है, यह कोई नहीं जानता। लेकिन इस स्कूल की एक खासियत इसे अलग बनाती है। यहां और स्कूलों की तरह परीक्षा का कोई तय टाइम टेबल नहीं होता। किसी भी वक्त परीक्षा की घोषणा हो सकती है। यह पूरी तरह विद्यार्थी पर निर्भर करता है कि वह कितने सवाल कैसे हल करता है। असल में दुनिया समझदारों का पागलखाना है। इनसान की एक आदत और होती है। वह जैसा नहीं होता है, वैसा दिखने की कोशिश करता है। जबकि हकीकत इससे ठीक अलग होती है। यहां सब पागल हैं। कोई कम, तो कोई ज्यादा। अगर आपको यकीन न हो तो मेरे साथ एक कप कॉफी की शर्त लगा सकते हैं।

राजीव शर्मा

संचालक

गांव का गुरुकुल

ganvkagurukul.blogspot.com

दागी ‘माननीयों’ के लिए कवच

विवादित हो चले नए अध्यादेश से मनमोहन सरकार एक बार फिर अपने हाथ जला बैठी है। लेकिन, किसी ‘पवित्र हवन’ के चक्कर में सरकार के हाथ नहीं झुलसे हैं। यदि दो टूक अंदाज में कहा जाए, तो सरकार को अपनी राजनीतिक गोटें बैठाने की कुछ कीमत देनी पड़ रही है। पिछले तीन-चार सालों से सरकार हर छोटे बड़े फैसले पर आलोचनाओं के ऐसे तीर झेलती आ रही है।

ऐसे में लगता यही है कि उसकी राजनीतिक संवेदना का स्तर भी कुछ भोथरा होने लगा है। यदि ऐसा नहीं होता, तो वह विवादित ताजा अध्यादेश को लेकर इतनी हठधर्मिता का रवैया शायद न अपनाती। लेकिन, सरकार अपने फैसले को लेकर डटी है। कांग्रेस नेतृत्व ने जोरशोर से कहना शुरू कर दिया है कि उसने व्यापक जनहित में ही अध्यादेश लाने का फैसला लिया है। जबकि, सरकार के इस फैसले से उच्चतम न्यायालय का वह ऐतिहासिक निर्णय नाकाम हो रहा है, जिसकी जमकर सराहना हुई थी। सरकार का नया अध्यादेश हमारे दागी ‘माननीयों’ के लिए कवच की भूमिका निभाने जा रहा है। निचली अदालत से इन्हें सजा मिलने के बाद भी उनकी कुर्सी अब बची रहेगी।

लेकिन, मनमोहन सरकार ने अध्यादेश के जरिए इसे पलट दिया है। मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में इस पर मुहर लगा दी गई। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह अध्यादेश कानूनी हैसियत पा लेगा। इसके चलते ऐसे तमाम दागी सांसदों और विधायकों को बड़ी राहत मिल जाएगी, जिन्हें उच्चतम न्यायालय के फैसले के चलते अपनी कुर्सी जाने का खतरा पैदा हो गया था। दरअसल, 10 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला किया था कि जनप्रतिनिधियों को आपराधिक मामलों में दो साल या उससे ज्यादा की सजा किसी अदालत से मिलेगी, तो उनकी सदस्यता उसी दिन से स्वत: ही रद्द हो जाएगी। अदालत की पीठ ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-8 की उप धारा-4 को असंवैधानिक करार किया था, जिसके चलते ‘माननीयों’ को अपनी सदस्यता बचाने का कवच मिल जाता था। लेकिन, अदालत ने इस उप धारा को रद्द करते हुए कहा कि महज अपील के आधार पर सजा पाने वालों को राहत देने का कानून सही नहीं है।

अदालत के इस फैसले को राजनीतिक शुचिता के लिहाज से ऐतिहासिक करार किया गया था। पूरे देश में यह चर्चा शुरू हुई थी कि इस पहल से राजनीति में अपराधियों की बढ़ती आमद कम हो जाएगी। लेकिन, मुख्य धारा के राजनीतिक दलों को अदालत का यह फरमान एक तरह से ‘गैर-लोकतांत्रिक’ लगा। इसीलिए, 4 अगस्त को ही सर्वदलीय बैठक में सभी ने इस फैसले को कई लिहाज से गैर-जरूरी बताया। यह कहकर आलोचना की गई कि इस फैसले से तमाम नेताओं के साथ घोर नाइंसाफी हो जाएगी। क्योंकि, कई बार राजनीतिक कारणों से नेताओं के खिलाफ झूठे मुकदमे लिखा दिए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि जुलाई में हुए अदालती आदेश में यह भी प्रावधान किया गया था कि जेलों में रहकर ‘माननीय’ चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। इस फैसले को पलटने के लिए सभी दलों ने पार्टी लाइन से हटकर एकजुटता दिखाई थी।

विपक्षी दलों का रुख देखकर सरकार ने मानसून सत्र में ही सर्वोच्च अदालत के फैसले को पलटने की तैयारी कर ली थी। कानून में संशोधन करने के लिए एक विधेयक भी तैयार किया गया था। इसे राज्यसभा में रख भी दिया गया था। लेकिन, कुछ प्रावधानों को लेकर वामदलों और मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने विरोध कर दिया था। इसी के चलते सरकार यह विधेयक मानसून सत्र में पास नहीं करा पाई। भाजपा के नेता यही मांग करते नजर आ रहे थे कि विधेयक की खामियों को दुरस्त करने के लिए इसे संसद की स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया जाए। ताकि, सभी दलों के सांसद इसमें अपनी राय दे सकें। वामदलों ने भी यही नजरिया रखा था कि जल्दबाजी में यदि अदालत के फैसले को पलटने की कोशिश की गई, तो राजनेताओं के प्रति लोगों में अविश्वास और बढ़ेगा।  

यह जरूर है कि मानसून सत्र समाप्त होने के पहले सरकार ने संसद से उस नए कानून पर मुहर लगवा ली, जिसके तहत जेलों में बंद नेताओं को चुनाव लड़ने का अधिकार बहाल कर दिया गया है। जबकि, अदालत के फैसले के चलते यह कानूनी प्रावधान हो गया था कि जो जनप्रतिनिधि जेल में बंद होगा, वह संसद या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता। इस पर सभी दलों ने आम तौर पर यही कहा था कि राजनीतिक कारणों से नेताओं के खिलाफ झूठे मकदमे लिखवा कर जेल भिजवा दिया जाता है। महज, इसी आधार पर उन्हें चुनाव के अयोग्य घोषित करने का फैसला सही नहीं कहा जा सकता। सरकार की इस पहल की भी काफी आलोचना हुई थी।

अब सरकार ने अध्यादेश के जरिए दागी नेताओं के लिए भी बड़ी राहत का इंतजाम कर दिया है। लेकिन, इस बार मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने जोरदार विरोध दर्ज कराना शुरू किया है। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से अनुरोध किया है कि वे इस ‘अनैतिक’ अध्यादेश पर अपनी मुहर न लगाएं। वाम दलों ने भी इसी तरह की गुहार लगाई है। सुषमा ने सवाल किया है कि आखिर सरकार जल्दबाजी में यह अध्यादेश क्यों लाई है? आरोप लगाया जा रहा है कि राज्यसभा के कांग्रेसी सांसद रसीद मसूद और सहयोगी दल राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को खासतौर पर राहत देने के लिए यह अध्यादेश लाया गया है। उल्लेखनीय है   कि बहुचर्चित चारा घोटाला कांड में रांची की एक विशेष अदालत ने लालू को दोषी करार किया है। उन्हें 30 सितंबर को सजा सुनाई जानी है। जबकि, कांग्रेसी सांसद रसीद मसूद भी 22 साल पुराने एक फर्जीवाड़े के मामले में दोषी करार किए गए हैं। उन्हें 1 अक्टूबर को अदालत सजा सुनाने वाली है। ये दोनों महाशय ऐसे मामलों में दोषी करार किए गए हैं, जिसकी सजा दो साल से ज्यादा होनी ही है।

ऐसे में, यदि सरकार अध्यादेश लाकर नया कानूनी प्रावधान नहीं करती, तो सांसद के रूप में दोनों की सदस्यता तत्काल चली जाती। कानून मंत्री कपिल सिब्बल के पास भी इस बात का तार्किक जवाब नहीं है कि आखिर सरकार को अदालती आदेश पलटने के लिए अध्यादेश लाने की हड़बड़ी क्या थी? कानून मंत्री यही दलील दे रहे हैं कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला उन लोगों को संरक्षण नहीं देता, जो अपील करने के बाद बरी हो जाते हैं। ऐेसे में, उनके पास फिर से चुनकर आने का ही विकल्प बचता है। क्या, यह बात न्यायोचित है?  

अहम सवाल यह है कि आम आदमी बढ़ती महंगाई से लेकर तमाम तरह की दुश्वारियों से जूझ रहा है। लेकिन, सरकार ने कभी इस मोर्चे पर कोई कारगर कदम उठाने के लिए इतनी तत्परता नहीं दिखाई। जबकि, दागी माननीयों को कवच देना, उसकी प्राथमिकता कैसे बन गई? मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इस मामले में नैतिकता का झंडा जरूर उठा लिया है। लेकिन, भूलना नहीं चाहिए कि एनडीए की सरकार ने भी 2002 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को पलटने का पूरा जोर लगा दिया था, जिसके तहत अदालत ने यह अनिवार्य कर दिया था कि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी नामांकन के दौरान अपना आपराधिक रिकॉर्ड का ब्यौरा दें। साथ ही, अपनी वित्तीय स्थिति और शैक्षणिक योग्यता का भी ब्यौरा भी अनिवार्य रूप से देंगे। इसको पलटने के लिए वाजपेयी सरकार ने अध्यादेश का सहारा लिया था। इस अध्यादेश पर संसद की मुहर भी लगवा ली गई थी। लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय ने 2003 में इस कानूनी संशोधन को गैर-कानूनी करार किया था। ऐसे में, यह कहना मुश्किल है कि राजनीति के इस हमाम में कौन राजनीतिक दल नंगा नहीं है?

लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

श्रेष्ठता का संघर्ष है ब्राह्मणवाद

अपने पैतृक गांव डिहरा (औरंगाबाद, बिहार) से बाहर निकलने के बाद ‘ब्राह्मणवाद’ शब्द से लगातार पाला पड़ता रहा। भाषणों से लेकर सामाजिक चर्चाओं में हावी रहा यह शब्द। एक बार मैंने एक गोष्ठी में कहा कि हम ब्राह्मणवाद के समर्थक  हैं। हम चाहते इतना हैं कि इस व्यवस्था में जो श्रेष्ठता ब्राह्मणों की है, वह यादवों को प्राप्त हो। इसके बाद हमारे दूसरे साथियों ने इसका विरोध भी किया। लेकिन आखिर ब्राह्मणवाद है क्या श्रेष्ठता के संघर्ष के अलावा।

पिछड़ों व दलितों के हित की लड़ाई लड़ने वाले लोग, संगठन और पार्टियां चाहे या अनचाहे ब्राह्मणवाद को सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ मानते हैं। इसके लिए सैकड़ों कहानियां गढ़ी गयी हैं। लेकिन पूरे ब्राह्मणवाद के विरोध के नाम पर क्या हुआ? पोथी फाड़ो, पोथी जलाओ, जनेऊ तोड़ो। यही न। इससे आगे बढ़ें तो ब्राह्मण पूजारी के साथ चमार, अहीर, कोइरी पूजारी मंदिरों में बैठा दिए गए। कुछ नये पुरोहित पैदा हो गए, जो वैदिक पद्धति के शादी-विवाह से लेकर श्राद्धकर्म तक कराने लगे। लेकिन समग्र रूप से यह सब उन्हीं कामों के विकल्प तलाशे गए, जो ब्राह्मण कर रहे थे। क्योंकि इन्हीं कर्मों व कार्यों के कारण ब्राह्मण श्रेष्ठ थे।

यानी हम वर्ण व्यवस्था में व्याप्त श्रेष्ठता का विरोध नहीं कर रहे थे। हम श्रेष्ठ बनने के प्रयास कर रहे थे। जिस श्रेष्ठता के हित में ब्राह्मणों के लिए ‘ब्राह्मणवाद’ ढाल बना रहा, उसी श्रेष्ठता के लिए हम बेचैन हैं। हम ‘नया ब्राह्मण’ बनाना चाहते हैं, जो पूजा कराए, शादी कराए, श्राद्ध कराए। लेकिन किसी ब्राह्मणवाद के विरोधी ने डोम के कामों को करने की पहल नहीं की, किसी ने चमार के कामों को करने की पहल नहीं की, किसी ने धोबी के कामों को करने की पहल नहीं की। आखिर यह कर्म व काम भी वर्ण व्यवस्था के हिस्से थे। लेकिन वर्ण व्यवस्था के विरोधियों ने कभी ब्राह्मणों के कार्यों को अपनाने के समान डोम, चमार या धोबी के कार्यों को नहीं अपनाया। इसके लिए कोई आंदोलन नहीं चलाया। क्योंकि ये काम श्रेष्ठता के पर्याय नहीं थे। यह काम समाज के निम्न कामों की नजर से देखा जाता है। इसलिए इसे कोई नहीं करना चाहता है। ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले डोमवाद, चमारवाद या धोबीवाद का विरोध क्यों नहीं करते हैं? क्योंकि वह समाज में श्रेष्ठ कहलाना चाहते हैं। इसलिए ब्राह्मणों के कार्यों के लिए आंदोलन करते हैं। लेकिन चमार, डोम या धोबी के कार्यों के लिए सोचते भी नहीं है।
दरअसल ब्राह्मणवाद का विरोध सबसे बड़ा आडंबर है। ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले लोग समाज में, व्यवस्था में श्रेष्ठता के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। लेकिन वह इसे खुले शब्दों में स्वीकारने के बजाय ‘वाद’ की चासनी में लपेट पर लोगों के समक्ष रखते हैं। ताकि उनका झूठ छुपा रहे।

यदि हम यह कहते हैं कि हम ब्राह्मणवादी व्यवस्था के समर्थक हैं और उस व्यवस्था में यादवों की श्रेष्ठता चाहते हैं। तो इसकी अपनी चुनौतियां भी हैं और उन्हें स्वीकार करने के लिए हम तैयार भी हैं। यदि आप समाज में श्रेष्ठता चाहते हैं तो उसके लिए अपने आपको तैयार भी करना होगा। शिक्षा, समाज, संस्कृति, आर्थिक हर रूप से अपने को सक्षम बनाना होगा। सामाजिक आंदोलन का एक व्यापक असर दिखा था। त्रिवेणी संघ जैसे संगठनों ने सामाजिक सम्मान व सत्ता के संघर्ष को मुकाम दिया था। शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र के नए आयाम सामने आए थे। लेकिन हम ‘ब्राह्मणवाद’ के दायरे से बाहर नहीं निकल पाए या कहें कि ‘ब्राह्मण’ बनने की चुनौतियों से मुंह मोड़ लिया। परिणाम सामने है कि हम ‘दुर्गा’ की जगह ‘महिषासुर’ की पूजा का आडंबर कर रहे हैं। हम पूजा का विरोध नहीं कर रहे हैं। जब तक महिषासुर रहेगा, तब तक दुर्गा भी रहेगी। और दुर्गा रहेगी तो दुर्गा का आडंबर भी रहेगा। इसलिए जरूरी है कि ब्राह्मणवाद की ‘श्रेष्ठता के संघर्ष’ को हम स्वीकार करें और श्रेष्ठता की लड़ाई में अपने को श्रेष्ठ साबित करें। श्रेष्ठता विरोधी अभियान चलाने के बजाय श्रेष्ठ बनने का अभियान चलाएं।

लेखक बीरेंद्र कुमार यादव बिहार के पत्रकार हैं.

फोटो जर्नलिस्‍ट गैंगरेप के एक आरोपी को लेकर खोया-पाया का खेल

मुंबई : मुंबई में एक महिला फोटो पत्रकार के साथ गैंगरेप के पांच आरोपियों में से एक के बारे में बताया गया कि वह 'लापता' है, लेकिन बाद में ठाणे के अतिरिक्त महानिदेशक (कारागार) ने बताया कि वह जेल में है। सिराज रहमान खान नामक इस आरोपी को आज कोर्ट में पेश किया जाना था, लेकिन उसे पेश नहीं किया जा सका और मामला शुक्रवार तक के लिए टल गया।

क्राइम ब्रांच ने कहा कि उसे ठाणे जेल ले जाया गया था, लेकिन जेल प्रशासन ने कहा कि वह क्राइम ब्रांच की कस्टडी में ही है। खबरों के मुताबिक ऐसा संभव है कि यह किसी कागजी कार्रवाई में गड़बड़ी के चलते हुआ हो। उल्लेखनीय है कि पिछले हफ्ते ही मुंबई पुलिस ने गैंगरेप के पांच आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी।

सलीम अंसारी, विजय जाधव, सिराज रहमान खान, कासिम बंगाली और एक नाबालिग आरोपी ने 22 अगस्त को शक्ति मिल्स परिसर में महिला फोटो पत्रकार के साथ उस वक्त गैंगरेप किया था, जब वह अपने ऑफिस द्वारा सौंपे गए काम के सिलसिले में अपने एक मित्र के साथ वहां गई थी। (खबर)

खबर छपने से नाराज विधायक समर्थकों ने राष्‍ट्रीय सहारा, पटना के संपादक को पीटा

पटना से खबर है कि राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक दयाशंकर राय के साथ जदयू विधायक सतीश कुमार यादव के समर्थकों ने मारपीट की है. समर्थक एक अखबार में विधायक को अपराधियों का संरक्षक बताए जाने से नाराज थे. संपादक की परेशानी यह थी कि वे अपना बचाव भी नहीं कर सकते थे, क्‍योंकि वे उसी विधायक के आवास में रहते थे, जिसके खिलाफ उनके अखबार में खबर प्रकाशित हुई थी. इस मामले की जांच करने नोएडा से एडमिनिस्‍ट्रेशन हेड सीबी सिंह जाने वाले हैं. 2 अक्‍टूबर को समूह संपादक रणविजय सिंह के भी जाने की योजना है.

जानकारी के अनुसार राष्‍ट्रीय सहारा के संपादक दयाशंकर राय का जब से तबादला हुआ है, वे खानाबदोश तरीके से रह रहे थे. पहले एक-दो महीने गेस्‍ट हाउस में रहे. जब वहां से जवाब मिल गया तो वे राष्‍ट्रीय सहारा में कार्यरत संतोष कुमार यादव के विधायक भाई के सरकारी आवास पर रहने लगे. संतोष के भाई सतीश कुमार यादव जदयू के टिकट पर राघवपुर विधानसभा सीट से राबड़ी देवी को पराजित करके विधायक बने हैं. इनको पटना के कबूतरखाना स्थित विधायक निवास में 1989 तथा 1990 नम्‍बर फ्लैट आव‍ंटित हुआ है.

संपादक डीएस राय पिछले साल यानी 2012 के सितम्‍बर महीने से ही विधायक के आवास में रह रहे हैं. शुरुआत में किसी ने ऐतराज नहीं किया. पर यह महीनों तक वहीं जमे रहे. जब काफी कहने के बावजूद इन्‍होंने अपने लिए मकान या कमरा नहीं खोजा तो विधायक निवास पर रहने वाले लोग इनको तरह-तरह से परेशान करने लगे. कभी इनकी अटैची इस कमरे में तो कभी उस कमरे में की जाने लगी. इसके बाद भी संपादक जी टस से मस नहीं हुए. इसके बाद संपादक जी सुबह नहाने धोने के बाद अटैची लेकर ऑफिस जाने लगे.

पर विधायक निवास से रुखसत होना इन्‍हें गंवारा नहीं हुआ. विधायक और उनके समर्थक परेशान हो गए तो उन्‍होंने दूसरे तरीकों से परेशान करना शुरू किया. जब संपादक देर रात लौटते तो विधायक समर्थक दरवाजा ही नहीं खोलते. घंटों दरवाजा पीटने, घंटी बजाने के बाद किसी तरह दरवाजा खुलता तो इनको सोने की जगह नहीं दी जाती. तमाम तरीके से इन्‍हें परेशान किया गया, लेकिन इसके बावजूद संपादक जी ने किराए का कमरा लेने की नहीं सोची. इस बीच इन्‍होंने पटना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी से भी फ्री में मकान देने की गुजारिश की, पर उन्‍होंने इनके ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए बहाना बना दिया.

बीते सोमवार को ही संपादक लखनऊ से पटना पहुंचे थे, त‍ब विधायक समर्थकों ने उनको निवास में रहने को लेकर परेशान‍ किया. बताया जा रहा है कि इसी बीच हाजीपुर जिले के राघवपुर विधानसभा के गिदूपुर थाना क्षेत्र में दो युवतियों से बलात्‍कार हुआ था. इसको लेकर ग्रामीण थाने पर हंगामा कर रहे थे. सभी अखबारों ने इस खबर को प्रकाशित किया, लेकिन राष्‍ट्रीय सहारा ने खबर को प्रकाशित करने के साथ यह भी लिख दिया कि राघवपुर के विधायक सतीश कुमार यादव अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं. इसके अलावा भी विधायक के खिलाफ कई बातें लिखी गईं.

प्रत्‍यक्षदर्शियों का कहना है कि सुबह जब विधायक और उनके समर्थकों ने अखबार देखा तो संपादक को उठाकर उनकी ऐसी तैसी करनी शुरू की. पहले गाली-ग्‍लौज हुई. बात बढ़ी तो विधायक समर्थकों ने संपादक की धुनाई कर दी. कुछ अन्‍य लोगों ने बीच बचाव कर संपादक को गंभीर रूप से घायल होने से बचाया. इसके बाद संपादक ऑफिस पहुंचे तथा साथी पत्रकारों से पांच सौ रुपए किराए का कमरा ढूंढने का निर्देश दिया. हालांकि इस बीच यह खबर नोएडा तक भी पहुंच गई. प्रबंधन ने प्राथमिक स्‍तर पर घटना की सत्‍यता को देखते हुए जांच की जिम्‍मेदारी एडमिनिस्‍ट्रेशन हेड सीबी सिंह को सौंपी है.

सूत्रों का कहना है कि मामले की जांच के लिए दो अक्‍टूबर को समूह संपादक रणविजय सिंह भी पहुंचने वाले हैं. दयाशंकर राय पिछले साल जून में पटना भेजे गए थे, तब से ही वे अटैची संपादक के रूप में रह रहे थे. किराए का कमरा लेने की बजाय यहां वहां रहकर दिन काट रहे थे. इसके पहले भी पटना यूनिट विवादों में रह चुका है. कुछ साल पहले एक सर्कुलेशन मैनेजर को हॉकरों ने पीट दिया था, तब भी सीबी सिंह और रणविजय सिंह इनके मामले की जांच करके तत्‍कालीन संपादक ओंकारेश्‍वर पांडेय को हटा दिया था. बाद में सर्कुलेशन मैनजर को भी हटा दिया गया था. अब देखना है कि इन लोगों की टीम इस मामले में क्‍या निर्णय लेती है. इस संबंध में संपादक दयाशंकर राय को फोन किया गया लेकिन उनका फोन नहीं लगा, जिससे उनका पक्ष नहीं जाना जा सका. अगर इस संबंध में उनका पक्ष आता है तो उसे भी ससम्‍मान प्रकाशित किया जाएगा.

आईपीएस प्रवीण कुमार एम्स में भर्ती, आंख में दिक्कत

पहले नोएडा के एसएसपी रहे और इन दिनों मुजफ्फरनगर के एसएसपी के रूप में कार्यरत प्रवीन कुमार के बारे में सूचना मिली है कि आंख में दिक्कत के कारण उन्हें दिल्ली स्थित एम्स में भर्ती होना पड़ा है. बताया जा रहा है कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी पद पर तैनाती के ठीक पहले उनका आंख का कोई आपरेशन हुआ था, जिसमें अब कोई दिक्कत आ गई है. इसी कारण से उन्हें एडमिट होना पड़ा है.

हालांकि प्रवीण कुमार को लेकर कई तरह की चर्चाएं भड़ास तक पहुंची. एक सज्जन ने मेल कर बताया कि मुजफ्फरनगर के एसएसपी प्रवीण कुमार को हार्ट अटैक हो गया है जिसके कारण उन्हें दिल्ली भर्ती कराया गया है. वहीं कुछ का कहना था कि उन्हें हाई बीपी की दिक्कत की वजह से भर्ती कराना पड़ा. बाद में प्रवीण कुमार के कुछ करीबियों ने बताया कि उन्हें आंख में प्राब्लम बढ़ जाने के कारण एम्स में एडमिट कराया गया है.

भड़ास तक अपनी बात आप bhadas4media@gmail.com पर मेल करके पहुंचा सकते हैं.

‘जी न्यूज’ से काफी आगे निकल गए, अब अगले की बारी है : रवि शर्मा

'इंडिया न्यूज' चैनल के एडिटर क्राइम रवि शर्मा ने अपने फेसबुक वॉल पर इंडिया न्यूज में जश्न के माहौल की एक तस्वीर शेयर की है. एडिटर इन चीफ दीपक चौरसिया और मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत बुके पकड़े हुए. दोनों के चेहरे खिले हुए. रवि शर्मा ने स्टेटस में लिखा है कि जी न्यूज से हम लोग काफी आगे निकल गए हैं और अब नेक्स्ट की बारी है… यानि उनका इशारा साफ है कि अब इंडिया टीवी को निगलने की तैयारी है.. रवि शर्मा के वॉल से तस्वीर व स्टेटस का प्रकाशन किया जा रहा है..

Ravi Sharma  :  Two great leaders of the industry, Mr Rana yashwant managing editor india news, n Mr deepak chaurasia the editor in chief of india news, sharing a memorable moment of great success, as channel has the unbelievable viewer ship. Three cheers for india news. I memorable moment. Zee news se kaafi aage Nikal gaye.. ab next ki baari hai.

Vimal Kant Pandey Nice to see u after long gap, Looking dashing
 
Dharmender Chaudhary Sir ab ABP ki bari hai.. Congrats
 
Manu Bhatt sir bahut bahut badhai..hum sabki taraf se poori team ko mubarak…
 
Navjyot Randhawa congrats……………
 
Chitra Tripathi Cheeeeeeeeeeers n congrts u too for ur prog jisaki 30 trp hai aur 10:30 ka 5 prog 1 week me top par hai.
 
Viju Shakya kiya baat hai.. sharma ji…
 
Om Om Prakash Yh….Time to celebrate…
 
Anand Anand Amrit Raj Ye to hona hi tha
 
Akash Kumar Badhai ho bhaiya,
 
हरिचरण सिंह यादव Congratulation!!!!!!!!
 
Munish Bangia Congrats
 
Vaibhav Chaudhary congrats sir
 
Deepak Sharma bahut bahut badhai
 
Rakesh Rawat congrats ravi….ye to ek padaw hai, abhi to manzilo a jahaan abhi baaki hai…..

रवि शर्मा के फेसबुक वॉल से.

क्या सेक्सुअली कुंठित हैं आजतक की वेबसाइट चलाने वाले!

Kamal K. Jain : अपने आप को पिछले बारह साल से सर्वश्रेष्ठ बताने वाले इस न्यूज चैनल की वेबसाइट पर पिछले पांच छ: दिन से इस एक खबर का लिंक बार-बार दिया जा रहा है, इस लिंक में जो स्टोरी खुल रही है उसमें किसी कपल के हाईवे पर चलती गाड़ी में सेक्स करने का ब्यौरा दिया गया है. कुछ अस्पष्ट सी तस्वीरे भी है… मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि चैनल वालों को इसमें क्या महत्वपूर्ण नज़र आ रहा है जो लगातार इसी खबर का लिंक शेयर किये जा रहे हैं… ये जो गाड़ी में सवार थे, उनमें कोई इनका रिश्तेदार सवार था क्या…

Dilnawaz Pasha : Aaj Tak के फ़ेसबुक पेज पर चलती कार में सेक्स की एक ही ख़बर को पिछले 24 घंटे में कम से कम तीन बार और अब तक कम से कम दस बार शेयर किया जा चुका है. आजिज आकर मैं ये पेज डिसलाइक कर रहा हूँ… पहली बार फ़ेसबुक पर मुझे खीज आ रही है…

कमल के. जैन और दिलनवाज पाशा के फेसबुक वॉल से.


संबंधित खबर और तस्वीर यूं है, जिसे आजतक वाले बार-बार शेयर कर रहे…

एक्‍सप्रेस वे पर चलती गाड़ी में सेक्‍स करने लगा प्रेमी जोड़ा

तस्‍वीर में दिख रहा यह कामोत्तेजक कपल घर पहुंचने का इंतजार नहीं करना चाहता था, तभी तो इन्‍होंने चलती गाड़ी में हाईवे पर ही सेक्‍स करने का फैसला कर लिया. वैसे, गाड़ी चलाते वक्‍त एक सतर्क ड्राइवर स्‍टीयरिंग कभी नहीं छोड़ता और ना ही उसकी नजरें सड़क पर से हटती हैं, लेकिन अपनी महिला साथी के साथ अंतरंग पल बिताते वक्‍त भी इस शख्‍स ने किसी तरह गाड़ी पर नियंत्रण बनाए रखा. इस जोड़े की हरकत को इनके बगल में चल रही गाड़ी में बैठे कपल ने अपने कैमरे में कैद कर लिया. मामला अमेरिका के शिकागो के इसनहोवर एक्‍सप्रेसवे का है.

उन्‍होंने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि उन्‍हें कैमरे में शूट किया जा रहा है और वे दुनिया से बेपरवाह एक-दूसरे में खोए रहे. दूसरी कार में बैठी महिला चालक अपने साथ बैठे शख्‍स से वीडियो में यह कहते हुए सुनाई दे रही थी कि वो सेक्‍स कर रहे कपल का ठीक से शॉट ले. वीडियो के सामने के आने बाद अब इस कपल को हाईवे पर सेक्‍स करने से पहले दो बार जरूर सोचना होगा. इससे पहले मई में न्‍यू मेक्सिको के एक शख्‍स पर गाड़ी चलाते वक्‍त महिला के साथ सेक्‍स करने का आरोप लगा था. आपको बता दें कि उस शख्‍स की गाड़ी की टक्‍कर हो गई थी और उसकी नग्‍न गर्लफ्रेंड सामने के शीशे को चीरती हुई बाहर जा गिरी.

सेना कश्मीर के मंत्रियों को फंड उपलब्ध कराने में लगेगी तो ऐसे हमले कैसे रुकेंगे!

Manish Sisodia : जम्मू कश्मीर में फिर आतंकी हमला…. ये महज आतंकी हमला है या अमेरिका यात्रा पर गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओबामा से मुलाकात से पहले एक कूटनीतिक संदेश? क्या किसी के पास सूचना है कि हमारे देश के किन किन नेताओं या उनके दामाद, मामा-भांजे आदि, पाकिस्तान के किस नेता या उसके रिश्तेदार के साथ व्यापारिक रिश्ते रखते हैं और उनकी कमाई कितनी तेजी से बढी है?

अगर पुलिस नेताओं की सुरक्षा में लगी रहेगी और सेना को जम्मू कश्मीर के मंत्रियों को फंड उपलब्ध कराने में लगाया जायेगा तब तक क्या ऐसे हमले रुक सकते हैं…?

पूर्व पत्रकार और आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया के फेसबुक वॉल से.

‘लव जेहाद’ की हकीकत

संघ परिवार का 'थिंक टैंक' नए-नए मिथक गढ़ता में बहुत माहिर है। मुसलमानों के बारे में संघ परिवार ऐसे-ऐसे मिथक गढ़ता है कि कभी हंसी आती तो कभी उस पर तरस आता है। बहुत पहले से संघ परिवार ने 'लव जेहाद' का मिथक गढ़ रखा है। शुरू में तो यही पता नहीं चल पाया कि यह 'लव जेहाद' बला क्या है। धीरे-धीरे पता चला कि संघ परिवार ने एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत यह अफवाह फैलाई कि मुस्लिम लड़के अपनी पहचान छिपाकर भोली और मासूम हिंदू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनसे शादी करते हैं और बाद में उनका धर्म-परिवर्तन कराते हैं।

यहां तक झूठ बोला गया कि हिंदू लड़कियों को आतंकवादी कार्यवाई में हिस्सा लेने के लिए तैयार किया जाता है। ऐसा लगता है कि संघ परिवार को यही नहीं पता कि यह इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ हो रहा है, जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती थी। आज की तारीख में भारत में मल्टीनेशनल कम्पनियों की बाढ़ आई हुई है। इन कंपनियों में हिंदु और मुस्लिम लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। सहशिक्षा ले रहे हैं। साथ-साथ कोचिंग कर रहे हैं। इस बीच अन्तरधार्मिक, अन्तरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना अस्वाभाविक नहीं है। प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से बगावत करके भी होंगी।

अब कोई हिंदु लड़की किसी मुस्लिम लड़के से प्रेम और शादी कर लेती हैं तो संघ परिवार 'लव जेहाद' का राग अलापना शुरू कर देता है। जबकि सच यह है कि मुस्लिम लड़कियां भी हिंदु लड़कों से अच्छी खासी तादाद में शादियां कर रही हैं। इसे संघ परिवार क्या नाम देना चाहेगा? शायद इसमें भी संघ परिवार यह कहना चाहेगा कि मुस्लिम लड़कियां हिंदू लड़के का भी धर्म-परिवर्तन कराकर 'लव जेहाद' को अंजाम दे रही हैं। मेरठ के एक गैर सरकारी संगठन ने उन हिंदू और मुस्लिम लड़कियों से बातचीत की थी, जो विपरीत धर्म के लड़कों से प्रेम करती थीं। उस बातचीत में यह निकलकर आया था कि वे लड़के का धर्म पहले से जानती थीं, लेकिन दिल के हाथों मजबूर थीं।

लड़के और लड़की की जिद के चलते अब तो परिवार की रजामंदी से भी अन्तरधार्मिक शादियां हो रही हैं। कुछ साल पहले जब मैं अपने छोटे भाई की शादी के लिए शादी कार्ड लेने बाजार गया तो सेम्पल के तौर पर जो कार्ड दुकानदार ने मुझे दिखाए थे, उनमें एक कार्ड अन्तरधार्मिक शादी का कार्ड भी था। उस दिन मेरा यह मिथक टूटा था कि अन्तरधार्मिक शादियां केवल समाज और परिवार से बगावत करके की संभव हो सकती हैं। मेरे एक रिश्तेदार के लड़के का स्कूल के जमाने में ही एक हिंदू लड़की से अफेयर हो गया था। मेरे रिश्तेदार बहुत परेशान हो गए थे। लेकिन वह इस बात से आश्वस्त थे कि किशोर उम्र की प्यार की खुमारी वक्त के साथ खुद ही दूर हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। लड़के ने दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी ज्वायन कर ली। लड़की अपनी एजुकेशन पूरी करके घर में रही। लेकिन दोनों का प्यार कम नहीं हुआ। दोनों ही ने कहीं और शादी करने से साफ इनकार कर दिया। दोनों परिवारों ने आपसी रजामंदी से दोनों के कोई गलत कदम उठाने से पहले दोनों को शादी की रजामंदी दे दी। अब इसे 'लविंग जेहाद' कहें या यह कहें कि 'जोड़ियां स्वर्ग में तय होती हैं।'

अन्तरधार्मिक प्रेम और शादियों की वजह क्या है। ऐसा भी नहीं है कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं। यह अलग बात है कि मीडिया के फैलाव और संघ परिवार की हायतौबा के चलते यह ज्यादा लगने लगा है। मुगल बादशाह अकबर ने जोधाबाई से शादी की थी। फिल्मों मे अन्तरधार्मिक शादियों को सिलसिला भी पुराना है। नर्गिस ने सुनील दत्त से शादी की। किशोर कुमार ने मधुबाला से शादी की, जो मुस्लिम थीं। सुनील शेट्टी की पत्नी मुस्लिम हैं। इसी तरह शाहरुख और आमिर खान ने हिन्दु लड़कियों से शादी की। मशहूर फिल्म निर्देशक फरहा खान और तब्बू की बहन ने हिन्दू से शादी की है। बॉलीवुड की यह कुछ मिसालें हैं। यदि बात की जाए राजनीति की तो इंदिरा गांधी ने एक पारसी फिरोज से शादी की थी। राजीव गांधी ने ईसाई से शादी की। उमर अब्दुल्ला ने एक हिन्दू परिवार में शादी की तो सचिन पायलट की पत्नि उमर अब्दुल्ला की बहन हैं। लविंग जेहाद का मिथक गढ़ने वाले संघ परिवार के सदस्य लालकृष्ण आडवाणी की भतीजी और बाल ठाकरे की पोती ने मुसलिम से शादी की। भाजपा के मुसलिम चेहरे कहने जाने वाले मुख्तार अब्बास नकवी और शाहनवाज हुसैन की पत्नियां भी हिंदू हैं अब पता नहीं, वह लविंद जेहाद था या नहीं?  अफसानों पर यकीन मत किजिए हकीकत का सामना करें।

लेखक सलीम अख्तर सिद्दीकी मेरठ से प्रकाशित हिंदी दैनिक जनवाणी में सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. उनसे संपर्क saleem_iect@yahoo.co.in या 09045582472 के जरिए किया जा सकता है.

शेखर गुप्ता यूपीए सरकार की कठपुतली : जनरल वीके सिंह

इन दिनों इन्डियन एक्सप्रेस और जनरल वीके सिंह दोनों सुर्खियों में हैं. पिछले 18 महीने में इन्डियन एक्सप्रेस में दूसरी बार अपने खिलाफ खबर छपने से वीके सिंह बहुत गुस्से मे हैं. रिटायर्ड जनरल ने खुद के बारे में नकारात्मक रिपोर्ट को दुर्भावना से प्रेरित बताया है. उन्होंने अपने ट्विटर एकाउन्ट पर इन्डियन एक्सप्रेस के सम्पादक के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली है.

इस कड़ी में वीके सिंह ने शेखर गुप्ता की पत्नी पर भी आरोप लगा दिये हैं. 23 सितम्बर को किये ट्वीट में सिंह ने कहा है कि जिनके पास 55 करोड़ का घर हो उन पर विश्वास किया जा सकता है कि वो यूपीए की कठपुतली हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि वे इन्डियन एक्सप्रेस का उपयोग लोगों को बदनाम करने के लिए कर रहे हैं.

एक दूसरे ट्वीट मे उन्होंने कहा है कि गुप्ता और उनकी पत्नी नीलम जाली ने 2002 मे ग्रीनपाइन एग्रो शुरू की थी. कई सालों तक कोई एकाउन्ट फाइल नहीं किया गया. उन्होंने गुप्ता के इनकम टैक्स रिटर्न पर भी सवाल उठाये हैं.
टाइम्स नाऊ चैनल के सम्पादक अर्नब गोस्वामी को दिये इन्टरव्यू में सिंह ने कहा है कि इस अखबार ने पहले मुझे दिल्ली की सरकार गिराने का प्रयास करने का दोषी बताया और अब यह मुझे जम्मू कश्मीर की सरकार गिराने की कोशिश करने वाला कह रहा है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि ये एक ऐसा न्यूजपेपर है जिस पर विश्वास नहीं किया जा सकता. एक अखबार जो दो सैन्य टुकड़ियों की सामान्य गतिविधियों को तख्तापलट की कोशिश कहता हो, मैं समझता हूँ कि ऐसे अखबार को रद्दी की टोकरी मे फेंक देना चाहिए.

सोशल मीडिया पर इन खबरों की वजह से अखबार की प्रतिष्ठा पर खतरे को भापते हुये इंडियन एक्सप्रेस के आनन्द गोयनका भी बहस में उतर गये हैं. उन्होंने जनरल के खिलाफ लिखा है कि आप निहित स्वार्थों के तहत आरोप लगा सकते हैं लेकिन हमारा इतिहास दिखाता है कि हम वो इश्यू उठाते हैं जिन्हें उठाने का कोई साहस नहीं करता. जहाँ मेनस्ट्रीम मीडिया इस ट्विटर वार पर चुप्पी साधे हुए है और इस पर कोई खबर नहीं दे रहे हैं वहीं सोशल मीडिया पर इस लड़ाई की चर्चा जोर शोर से चल रही है. सिंह के समर्थक औऱ विरोधी, दोनों खबर और ट्वीट को आधार बनाकर इसे फैला रहे हैं.

विवेक सिंह की रिपोर्ट.

समृद्ध जीवन परिवार के दैनिक अखबार ‘लाइव इंडिया’ का प्रकाशन शुरू

समृद्ध जीवन समूह ने मीडिया क्षेत्र में एक कदम और आगे बढ़ाया है। कंपनी ने अब दैनिक अखबार प्रकाशित करना शुरू किया है। 'लाइव इंडिया' नाम से ये अखबार फिलहाल दिल्ली से प्रकाशित किया जा रहा है। बारह पेज के इस अखबार में सप्ताहांत के दौरान दो विशेष परिशिष्ट भी प्रकाशित किए जाएंगे। इस अखबार के प्रमुख संपादक एनके सिंह हैं। वहीं संपादकीय दायित्व डॉ. प्रवीण तिवारी को दिया गया है।

गौरतलब है कि डॉ. प्रवीण तिवारी कंपनी के चैनल 'लाइव इंडिया' के साथ पिछले आठ सालों से जुड़े हुए हैं। समृद्ध जीवन समूह इसके पहले 'लाइव इंडिया' के नाम से एक हिंदी पत्रिका भी प्रकाशित कर रहा है। इस अखबार को शुरू करते हुए समृद्ध जीवन परिवार के मुखिया महेश मोतेवार ने कहा कि वो जनता के मुद्दों और खबरों के लिहाज से इस अखबार को देश का सबसे भरोसेमंद अखबार बनाना चाहते हैं।

कंपनी की सीईओ सुप्रिया कणसे ने अखबार में बड़ी खबरों को व्यापक आयामों के साथ आम भाषा में परोसने की कोशिश पर बल दिया है। सुप्रिया मानती हैं कि आज की पत्रकारिता जनसरोकारों से दूर हटती जा रही हैं। प्रिंट मीडिया खासतौर पर अखबारों की पत्रकारिता में जोरदार बदलावों की वकालत करते हुए सुप्रिया कणसे ने कहा कि उनकी कोशिश होगी कि वो अपने पाठकों को सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरें ज्यादा से ज्यादा मात्रा में दे सकें।

एडीजी लॉ एंड आर्डर अरुण कुमार का तबादला, मुकुल गोयल को जिम्‍मेदारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के एडीजी लॉ एंड ऑर्डर अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया है। उन्हें पुलिस हेडक्वार्टर से अटैच कर दिया गया है। अरुण कुमार की जगह मुकुल गोयल को नया एडीजी लॉ एंड आर्डर बनाया गया है। इससे पहले मुकुल जीआरपी में तैनात थे।

अरुण कुमार का तबादला इस मायने में अहम माना जा रहा है कि उन्होंने कुछ दिन पहले ही यूपी सरकार को पत्र लिखकर प्रतिनियुक्ति का आदेश मांगा था। अरुण कुमार ने मुजफ्फरनगर दंगों के बाद दो दिन के अवकाश पर भी चले गए थे। इसे उनका विरोध और नाराजगी बताया जा रहा था। इसके बाद से अरुण कुमार के इस पद से हटने के कयास लग रहे थे। चर्चा थी कि वो खुद ही हट जाएंगे या प्रदेश सरकार उन्हें हटा देगी। आखिरकार प्रदेश सरकार ने उनकी बलि ले ली है।

एडीजी के करीबियों कहना था कि अब वो यूपी में काम नहीं करना चाहते हैं। अरुण कुमार ने लिखा था कि राज्य में काम करने की जो मियाद होती है वो पूरी हो चुकी है। अब वो प्रतिनियुक्ति पर जाने का अधिकार रखते हैं, लिहाजा उन्‍हें अनुमति दी जाए। सूत्रों की मानें तो अरुण कुमार उत्तर प्रदेश के हालात से परेशान हैं। उन्हें खुलकर काम करने की आजादी नहीं मिल पा रही है इसलिए वो यहां से जाना चाहते हैं। खासतौर पर मुजफ्फरनगर दंगों में जिस तरह से सरकार ने पुलिस के मामलों में हस्तक्षेप किया, उससे अरुण कुमार बेहद दुखी थे।

जम्‍मू में पुलिस और सेना कैंप पर आतंकी हमला, लेफ्टिनेंट कर्नल समेत 12 की मौत

श्रीनगर : जम्मू के कठुआ और सांबा में आतंकियों ने दोहरा हमला कर पुलिसकर्मियों और सैनिकों समेत 12 लोगों की हत्या कर दी है। सूत्रों के मुताबिक मारे गए लोगों में सेना का एक लेफ्टिनेंट कर्नल भी शामिल है। इन हमलों में कई लोग घायल भी हुए हैं, जिनमें सेना के कमांडिंग ऑफिसर भी शामिल हैं। सेना ने जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। सेना की वर्दी पहनकर आए चार में से दो आतंकी भी मारे गए हैं।

एक अनजान-से आतंकवादी संगठन 'शुहादा ब्रिगेड' के प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी पीटीआई को फोन कर दावा किया कि इन दोनों हमलों के पीछे उन्हीं का हाथ है। हालांकि माना जा रहा है कि ऐसा दावा असली आतंकी संगठन की करतूत से ध्यान हटाने की चाल भी हो सकती है। पहला हमला कठुआ के हीरा नगर पुलिस स्टेशन पर हुआ, जहां आतंकियों का मुकाबला करते हुए कम  से कम छह पुलिसवाले शहीद हो गए। आतंकी सेना की वर्दी में ऑटो से आए थे। आतंकियों ने पहले पुलिस स्टेशन के बाहर एसटीडी बूथ पर हमला किया, फिर आतंकी पुलिस स्टेशन में दाखिल में हुए। हमले को अंजाम देने के बाद आतंकी एक ट्रक पर कब्जा कर सांबा की ओर भागे, जहां आतंकियों ने सेना के कैंप पर हमला किया। वहां एक लेफ्टिनेंट कर्नल और एक जवान के मारे जाने की खबर है।

इन आतंकियों ने सीमापार से घुसपैठ की थी और इसके बाद इन्होंने पूरी तैयारी के साथ हमले को अंजाम दिया। गौरतलब है कि कठुआ और सांबा एलओसी से सटा इलाका है, जिसकी वजह से सीमा पार से आतंकी यहां घुस आते हैं। इससे पहले भी कई बार कठुआ में आतंकी हमले हुए हैं, वहीं सांबा में सेना का बड़ा कैंप है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मुस्तफा कमाल का कहना है कि यह हमला भारत और पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया को झटका देने के इरादे से किया गया है।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन आंतकवादी हमलों की निंदा करते हुए इसे शांति वार्ता पर हमला करार दिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह शांति के दुश्मनों द्वारा एक और हमला एवं बर्बर कार्रवाई है। पीएम ने कहा कि आतंकियों को हराने का हमारा इरादा पक्का है।

भाजपा के इस प्रवक्‍ता का जवाब नहीं, पत्रकार मित्रों से कराते हैं विरोधियों की हजामत

लखनऊ : कहते हैं कि कोई मरे, कोई मौजै गावें। अखबारों में छपने की भूख और टीवी चैनलों पर दिखने की अतृप्त लालसा ने उत्तर प्रदेश भाजपा के एक प्रदेश प्रवक्ता को इस कदर दीवाना बना दिया है कि उनके अपने गाडफादर तो मेडिकल कालेज में डेंगू से जूझ रहे हैं, लेकिन यह प्रवक्ता महोदय कलफ लगा कुर्ता और पायजामा पहनकर भाजपा मुख्‍यालय में आकर डंट जाते हैं। जबकि गॉडफादर की बदौलत ही उन्‍होंने नाम और दाम दोनों बनाया।

पर यह प्रवक्ता महोदय इस बात के कायल हैं कि राजनीति में चलती का नाम गाड़ी है। नेता जी डेंगू के मारे अस्‍पताल में पड़े हैं तो पड़े रहें। अगर वे (प्रवक्ता महोदय) चार दिन नहीं छपेंगे तो उनकी टीआरपी जरूर कम हो जाएगी। हालांकि उनकी टीआरपी बाकी प्रवक्ताओं की अपेक्षा बनी रहे इसकी चिंता प्रवक्ता महोदय से ज्यादा उनके स्वाजातीय मीडिया के मित्रों का भी है। हो भी क्यों न, भाजपा सरकार में मकान दुकान से लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग तक में वरीयता स्वाजातीय मीडिया कर्मियों को ही दी गई है। इनमें कुछ बाहर चले गए और कुछ अभी भी नमक का हक अदा कर रहे हैं। हालांकि इस बीच इन प्रवक्ता महोदय के कई और स्‍वजातीय साधक तैयार हो गए हैं। जिनकी सलाह और मशविरे पर न सिर्फ प्रेस नोट तैयार होते हैं बल्कि उनके नेता का किस इश्‍यू पर कांफ्रेस करना सही रहेगा, इसका सजेशन भी यही लोग देते हैं।

जब इन प्रवक्ता महोदय को प्रेस नोट और चैनलों पर बोलने के लिए कोई मुद्दा नहीं मिलता है तो अखबारों वाले से ही पूछा करते हैं कि क्या बोला जाए? उधर इनके राजनीतिक गाडफादर को संभालने के लिए तिवारी जी अकेले लगे हैं। यह दोनों ही कल (आज) राज की दांए बाएं माने जाते हैं। प्रतिस्पर्धा यह रहती है कौन बड़ा तराजू है। हालांकि इस समय तो नंबर अपने तिवारी जी के ज्‍यादा बन रहे हैं, क्यों कि अस्पताल में सेवा सुश्रुषा में वे पूरे मनोयोग से लगे हैं। इधर प्रवक्ता महोदय सोम मंगल और बुधवार की ड्यूटी मुस्तैदी से बजा रहे हैं। बाकी दो प्रवक्ता कहीं उनसे अच्छा और ज्यादा न बोल जाएं, इस चिंता से यह प्रवक्ता महोदय हमेशा ग्रसित रहते हैं। यह प्रवक्ता महोदय भले कोई चुनाव न जीत पाए हों, लेकिन कम से कम एक नेता के चिंटू होने के नाते अपने समकक्ष वाले प्रवक्ताओं से तो जीतते ही रहते हैं।

चुनाव कोई हो, पूर्वांचल में कौन दल और नेता प्रभावी रहेगा प्रवक्ता यह भाजपा मुख्‍यालय के कक्ष में बैठकर ही बताते हैं। बाकी काम उनकी हां में हां मिलाकर उनके कुछ स्वाजातीय पत्रकार मित्र कर देते हैं, जिनकी इन प्रवक्ता महोदय के गाडफादर में अटूट और अबाध श्रद्धा है। इतना ही नहीं पार्टी के भीतर की अपने विरोधियों की काम लगाऊ खबरें भी अपने कुछ खास पत्रकार मित्रों को गाफिल करते रहते हैं। अगर लालजी टंडन की प्रेस कांफ्रेंस है तो अपने पत्रकार मित्रों से लखनऊ सीट पर नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह की दावेदारी का सवाल जरूर पूछवाते हैं। हालांकि मासूम इतने हैं कि जिसकी बजाते हैं उसके बगल में बैठने से भी परहेज नहीं करते हैं। शेष बातें अगली कड़ी में। (कानाफूसी)

वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना!

: लाभ (सम्मान) जब थूकता है तो उसे हथेली पर लेना पड़ता है -परसाई : बहुत पहले यह पढ़ा था, अब साक्षात देख रहा हूं। आप भी ज़रा इस का ज़ायका और ज़ायज़ा दोनों लेना चाहें तो गौर फ़रमाइए। और आनंद लीजिए परसाई के इस कथन के आलोक में।

अब की बार उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा दिए गए पुरस्कारों के लिए एक योग्यता यादव होना भी निर्धारित की गई थी। रचना नहीं तो क्या यादव तो हैं, ऐसा अब भी कहा जा रहा है।

यह एक टिप्पणी मैं ने फ़ेसबुक पर चुहुल में लगाई थी। किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन ध्यान में चौथी राम यादव का नाम ज़रुर था। वीरेंद्र यादव के बाबत तो मैं इस तरह सोच भी नहीं रहा था। क्यों कि अभी तक मैं मानता रहा था कि वीरेंद्र यादव जाति-पाति से ऊपर उठ चुके लोगों में से हैं। और कि सिर्फ़ यादव होने के बूते ही उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने साहित्य भू्षण से नहीं नवाज़ा होगा। आखिर वह पढ़े-लिखे लोगों में अपने को शुमार करते रहे हैं। पर इस पोस्ट के थोड़ी देर बाद ही उन का यह संदेश मेरे इनबाक्स में आया।

Virendra Yadav : दयानंद जी, निंदा चाहे जितनी कीजिए, लेकिन तथ्यों से आँखें मत मूंदिये. वह कौन सा पुरस्कृत यादव है जिसके पास रचना नहीं है सिर्फ यादव होने की योग्यता है. चाहें तो अपनी टिप्पणी पर पुनर्विचार करें.

मैं तो हतप्रभ रह गया। यह पढ़ कर। सोचा कि अग्रज हैं, उतावलेपन में जवाब देने के बजाय आराम से कल जवाब दे दूंगा। फ़ेसबुक पर ही या फ़ोन कर के। पर दूसरे दिन जब नेट खोला और फ़ेसबुक पर भी आया तो उस पोस्ट पर आई तमाम लाइक और टिप्पणियों में यह एक टिप्पणी वीरेंद्र यादव की यह भी थी : अब आप इसे भी पढ़िए :

Virendra Yadav अनिल जी, दयानंद जी खोजी पत्रकार हैं. दरअसल हिन्दी संस्थान के इतिहास में अब तक द्विज लेखक ही पुरस्कृत होते रहे हैं शूद्र और दलित लेखक उस सूची से हमेशा नदारद रहे हैं. यह अकारण नही है कि राजेंद्र यादव तक इसमें शामिल नहीं किये गए हैं. यह मुद्दा विचारणीय है कि आखिर क्यों पिछले वर्षों में किसी शूद्र, दलित या मुस्लिम को हिन्दी संस्थान के उच्च पुरस्कारों से नहीं सम्मानित किया गया. क्या राही मासूम रजा, शानी, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिलाह इसके योग्य नहीं थे/हैं. ओम प्रकाश बाल्मीकि एकमात्र अपवाद हैं वह भी मायावती शासन काल में. जिस संस्थान में पुरस्कारों के लिए एकमात्र अर्हता द्विज होना हो वहां यदि 112 लेखकों में दो शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को सम्मानित किया जाता है तो जरूर उसके इतर कारण होंगे और दयानंद पांडे अनुसार वह यादव होने की शर्त है. वैसे दयानंद पांडे स्वयं इस बार पुरस्कृत हुए हैं इसके पूर्व भी दो बार हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत हो चुके हैं. और इस बार भी अन्य खोजी पत्रकारों की सूचना के अनुसार उनके लिए उस 'साहित्य भूषण' संस्थान के लिए एक दर्जन से अधिक संस्तुतियां थी जिसकी उम्र की अर्हता साठ वर्ष है जो उनकी नहीं है. जाहिर है सुयोग्य लेखक हैं अर्हता न होने पर भी संस्तुतियां हो ही सकती हैं. संजीव, शिवमूर्ति जैसे शूद्र पृष्ठभूमि के लेखक अयोग्य न होते तो उनकी संस्तुतियां क्यों न होती? जिन शूद्र पृष्ठभूमि के लेखकों को मिल गया उनकी रचना भी कैसे हो सकती है. क्योंकि इसका अधिकार तो द्विज को ही है. यह सब लिखना मेरे लिए अशोभन है लेकिन दुष्प्रचार की भी हद होती है! …

अब मेरा माथा ठनका। और सोचा कि वीरेंद्र यादव को यह क्या हो गया है? सोचा कई बार कि कमलेश ने जो कथादेश के सितंबर, २०१३ के अंक में एक फ़तवा जारी किया है कि, 'वीरेंद्र यादव प्रतिवाद झूठ और अज्ञान से उत्तपन्न दुस्साहस का नमूना है।' को मान ही लूं क्या? फिर यह शेर याद आ गया।

ज़फ़ा के नाम पे तुम क्यों संभल के बैठ गए
बात कुछ तुम्हारी नहीं बात है ज़माने की।

लेकिन फिर मैं यह सब सोच कर रह गया। प्रति-उत्तर नहीं दे पाया। एक पत्रकार मित्र को देखने दिल्ली जाना पड़ गया। उन्हें लकवा मार गया है। तो उन्हें देख कर अब दिल्ली से वापस लौटा हूं तो सोचा कि अपने अग्रज वीरेंद्र यादव जी से अपने मन की बात तो कह ही दूं। नहीं वह जाने क्या-क्या सोच रहे होंगे। सो इस बहाने कुछ ज़रुरी सवाल भी उन से कर ही लूं।

मेरी एक छोटी सी चुहुल से वीरेंद्र यादव आप इस तरह प्रश्नाहत हो गए और ऐसा लगा जैसे आप यादवों के प्रवक्ता हो गए हों। और किसी ने आप की दुखती रग को बेदर्दी से दबा दिया हो। जब हिंदी संस्थान के पुरस्कारों की घोषणा हुई तब मैं ने आप को व्यक्तिगत रुप से फ़ोन कर के बधाई दी थी, समारोह में भी। यह भी आप भूल गए? हां, मैं ने इस टिप्पणी में चौथीराम यादव को ज़रुर याद करने की कोशिश की। रचनाकार को याद उस की शक्लोसूरत से नहीं किया जाता, उस की रचनाएं उस की याद दिलाती हैं। मुंशी प्रेमचंद का नाम आते ही गबन, गोदान, रंगभूमि और उन की कहानियां सामने आ कर खड़ी हो जाती हैं। गुलेरी जी का नाम याद आते ही उस ने कहा था ही नहीं, लहना सिंह भी सामने आ खड़ा होता है। मुझ मतिमंद ने बहुत याद करने की कोशिश की कि चौथी राम यादव को याद करुं तो उन की कोई रचना या आलोचना मेरी स्मृति-पटल पर अंकित हो जाए पर नहीं हुई। आप चूंकि लखनऊ में बरास्ता नामवर मौखिक ही मौलिक है के नाते छोटे नामवर माने जाते हैं इस लिए आप के बारे में मुतमइन था कि आप को यह मरतबा कोई यूं ही सेंत-मेंत में तो मिल नहीं गया होगा। ज़रुर आप की बड़ी स्पृहणीय और उल्लेखनीय साहित्यिक उपलब्धियां भी होंगी। तो जब चौथीराम यादव की किसी रचना को याद नहीं कर सका तो खामोश हो कर बैठ गया यह मान कर कि मेरी अज्ञानता का अर्थ यह कैसे लगा लिया जाए मैं नहीं जानता हूं तो इस लिए यह चीज़ है ही नहीं। पर उस दिन पुरस्कार वितरण समारोह में वितरित हुई विवरणिका देख कर फिर जिज्ञासा जगी कि चौथीराम यादव के बारे में कुछ जान ही लूं। विवरणिका देख कर मुझे गहरा सदमा सा लगा कि हिंदी संस्थान महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए कुंजियां लिखने वालों को कब से सम्मानित करने लगा, वह भी लोहिया सम्मान जैसे सम्मान से। जिसे निर्मल वर्मा, श्रीलाल शुक्ल, शिव प्रसाद सिंह, कुंवर नारायन, कन्हैयालाल नंदन, शैलेष मटियानी, रवींद्र कालिया जैसे लोग पा चुके हैं। ऐसे में यादव होना योग्यता के तौर पर मेरे या और भी लोगों के मन में बात आ ही गई तो कुछ अस्वाभाविक नहीं माना जाना चाहिए।

खैर अब फ़ेसबुक पर आई आप की अब इस अयाचित टिप्पणी के क्रम में आप का भी पन्ना खुला परिचय का तो पाया कि आप के खाते में भी ऐसा तो कुछ रचनात्मक और स्मरणीय नहीं दर्ज है । और एक बड़ी दिक्कत यह भी है सामने है कि यह किन के हाथों सम्मानित हो कर आप फूले नहीं समा रहे हैं। आप तो हमेशा सत्ता विरोध में मुट्ठियां कसे की मुद्रा अख्तियार किए रहते हैं। कंवल भारती की गिरफ़्तारी और मुज़फ़्फ़र नगर के दंगे पर्याप्त कारण थे आप के सामने अभी भी मुट्ठियां कसे की मुद्रा अख्तियार करने के लिए। खैर यह आप की अपनी सुविधा का चयन था और है। इस पर मुझे कुछ बहुत नहीं कहना।

इस लिए भी कि अभी कुछ दिन पहले फ़ेसबुक पर ही आप को जनसत्ता संपादक ओम थानवी से कुतर्क करते देख चुका था। इसी फ़ेसबुक पर कमलेश जी को सी.आई.ए. का आप का फ़तवा भी देख चुका था। प्रेमचंद को ले कर भी आप के एकाधिकारवादी रवैए को देख चुका था। और अब आप के यदुवंशी होने की हुंकार को दर्ज कर रहा हूं। आप के द्विज विरोध और आप की द्विज-नफ़रत को देख कर हैरत में हूं। पहले भी कई बार यह देखा है। एक बार चंचल जी की वाल पर भी एक प्रतिक्रिया पढ़ी थी कि मोची को चाय की दुकान पर बिठा दीजिए और पंडित जी को मोची की दुकान पर। तब मैं भी आऊंगा चाय पीने आप के गांव। गोया चंचल न हों औरंगज़ेब हों कि जिस को अपने गांव में जब जहां चाहें, जिस काम पर लगा दें। अजब सनक है द्विज दंश और नफ़रत की। खैर बात बीत गई। पर अब फिर यह टिप्पणी सामने आ गई। तो सोचा कि जिस व्यक्ति को मैं पढ़ा लिखा मान कर चल रहा था वह तो साक्षरों की तरह व्यवहार करने पर आमादा हो गया। एक मामूली सी चुहुल पर इतना आहत और इस कदर आक्रामक हो गया? कि द्विज दंश में इतना आकुल हो गया। भूल गया अपनी आलोचना का सारा लोचन। एक शेर याद आ गया :

कितने कमज़र्फ़ हैं ये गुब्बारे
चंद सांसों में फूल जाते हैं।

द्विज विरोध की सनक में आप यह भी भू्ल गए कि एक द्विज श्रीलाल शुक्ल के चलते ही आप आलोचक होने की भंगिमा पा सके । कि उसी द्विज के आशीर्वाद से आप की किताब छपी और देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार भी मिला। लेकिन इस द्विज दंश की आग में जल कर आप इतने कुपित हो गए कि यादव से शूद्र तक बन गए। मायावती की ज़ुबान बोलने लगे ! द्विजों ने आप का, आप की जाति का और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का इतना नुकसान कर दिया कि कोई हिसाब नहीं है। यह सब यह कहते हुए आप यह भी भूल गए कि बीते ढाई दशक से भी ज़्यादा समय से मुलायम और उन का कुनबा तथा मायावती या कल्याण सिंह ही राज कर रहे हैं। यह लोग भी तो आप की परिभाषा में दबे-कुचले शूद्र लोग ही हैं। बीच में राजनाथ सिंह और रामप्रकाश गुप्त भी ज़रा-ज़रा समय के लिए आए। लेकिन सामाजिक न्याय की शब्दावली में ही जो कहें तो दबे-कुचले, निचले तबकों का ही राज चल रहा है उत्तर प्रदेश में। केंद्र में भी देवगौड़ा से लगायत मनमोहन सिंह तक दबे-कुचले लोग ही हैं। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में इस बीच कार्यकारी अध्यक्ष भी यही दबे-कुचले लोग रहे। सोम ठाकुर, शंभु नाथ, प्रेमशंकर और अब उदय प्रताप सिंह जैसे लोग इसी दबे कुचले तबके से आते हैं जिन पर वीरेंद्र यादव के शब्दों में द्विजों ने अत्याचार किए हैं और कि करते जा रहे हैं। तो क्यों नहीं इन दबे कुचले लोगों ने जो कि राज भी कर रहे थे, वीरेंद्र यादव जैसे शूद्रों को भारत भारती या और ऐसे पुरस्कारों से लाद दिया? कम से २५ भारत भारती या इस के समकक्ष बाकी दर्जनों पुरस्कार तो द्विजों के दांत से खींच कर निकाल ही सकते थे। मैं तो कहता हूं वीरेंद्र यादव जी अब इस मुद्दे पर एक बार हो ही जाए लाल सलाम ! एक श्वेत पत्र तो कम से कम जारी हो ही जाए।

यह भी अजब है कि जो अगर आप को किसी की बात नहीं पसंद आए तो उसे भाजपाई करार दे दीजिए, इस से भी काम नहीं चल पाए तो आप सी.आई.ए. एजेंट बता दीजिए। यह तो अजब फ़ासिज़्म है भाई ! आप फ़ासिस्टों से लड़ने की दुहाई देते-देते खुद फ़ासिस्ट बन बैठे ! यह तो गुड बात नहीं है।
वीरेंद्र यादव इसी टिप्पणी में लिखते हैं:

वैसे दयानंद पांडे स्वयं इस बार पुरस्कृत हुए हैं इसके पूर्व भी दो बार हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत हो चुके हैं. और इस बार भी अन्य खोजी पत्रकारों की सूचना के अनुसार उनके लिए उस 'साहित्य भूषण' संस्थान के लिए एक दर्जन से अधिक संस्त