6 महीने बाद देशभर के 90% अखबार होंगे बंद, लाखों अखबार कर्मी होंगे बेरोजगार

डीएवीपी के खिलाफ कोर्ट जायेगा ‘अखबार बचाओ मंच’, पहले राजनीतिक दलों से मांगों फिर अखबारों से मांगना हिसाब! अस्तित्व बचाने की आखिरी कोशिश में ‘अखबार बचाओ मंच’ न्यायालय की शरण में जायेगा। मंच ये तर्क रखेगा कि जब राजनीतिक दल अपने चंदे का हिसाब और टैक्स नहीं देते तो फिर अखबारों पर एक-एक पैसे का हिसाब और नये-नये टैक्स क्यों थोपे जा रहे हैं। Continue reading

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सरकारी विज्ञापन वितरण प्रणाली पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई नाराजी, 17 विभागों को नोटिस जारी

उन्मेष गुजराथी, दबंग दुनिया

मुंबई: अभिव्यक्ति के साधनों में से एक विज्ञापन को आधार बनाकर विभिन्न संस्थाएं, व्यक्ति अपने कार्यो को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं। समाचार पत्रों, चैनलों, सोशल मिडिया, रेडियो, मोबाइल के संदेशों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति दी जा सकती है। विज्ञापन देने वाली कंपनियां किसे विज्ञापन दें, यह तो विज्ञापन देने वाली कंपनी के अधिकार क्षेत्र में रहता है, लेकिन कई बार यह देखने को मिलना है कि अच्छा सर्कुलेशन होने के बवाजूद विज्ञापन देने में दोहरी नीति अपनायी जाती है, जो लोग ऊंची पहुंच वाले हैं, वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कोई गुरेज नहीं करते।

दरअसल समाचार पत्रों में विज्ञापन देने वाले विभाग भी अपनी जेब भरने की फिराक में रहते हैं। दरअसल, इसके पीछे भी दबाव तंत्र काम करता है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में ख्यात समाचार पत्रों में विज्ञापन को लेकर जिस तरह की कमीशनखोरी जारी है, उससे यह सिद्ध होता है कि मिडिया क्षेत्र में भी दबावतंत्र हावी है और कुछ बड़े समाचार पत्रों को सभी नियमों को तोड़ते हुए भरपूर विज्ञापन दिए जाते हैं और कुछ समाचार पत्र ऐसे हैं, जिन्हें जानबूझ कर विज्ञापन से वंचित रखा जाता है।

राज्य सरकार के सूचना व जनसंपर्क महानिदेशालय तथा अन्य विभागों की ओर से वितरित किए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों में बड़ी मात्रा पर स्वेच्छाधिकार के बूते पर सरकारी नियमों को ताक पर रखते हुए कुछ चुने हुए समाचार पत्रों को ही विज्ञापन दिया जाता है। इस संबध में एडिटर्स फोरम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई  मा. न्यायमूर्ति शंतनु केमकर और न्यायमूर्ति एम.एस. कर्णिक की खंडपीठ के सामने हुई। इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजी जताई हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महानिदेशक (सूचना और जनसंपर्क), आयुक्त मुंबई महानगर पालिका, प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष सिडको, मुख्याधिकारी एमआईडीसी समेत कुल 17 विभागों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।

छोटे अखबारों के साथ पक्षपात : मध्यम और छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन वितरित करते समय काफी पक्षपात किया जाता है। इस संदर्भ में एडिटर्स फोरम ने समय-समय पर सरकार और प्रशासन को इस सबंध में अवगत भी कराया गया था। लेकिन इस पर अभी तक किसी प्रकार को दखल सरकार ने नहीं ली, इस कारण  एडिटर्स फोरम ने इस के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कुछ समाचार पत्र तो अपने समाचार पत्र के प्रकाशन की संख्या बहुत ज्यादा बताकर बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित करके का षडयंत्र रचते हैं। छोड़े बड़े समाचार पत्रों का भेद बताकर लाखों रूपए कमाने का धंधा भी इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहा है। विज्ञापन के रूप में चल रहे काले कारनामों पर अंकुश लगाना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि उनके साथ बड़े समाचार पत्र का सहयोग प्राप्त है। जब पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है तो फिर छोटे, मध्यम तथा बड़े का भेद क्यों किया जाता है।

सूची में नाम नहीं होने पर भी मिलता विज्ञापन : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर ने बताया कि जब यह याचिका कोर्ट में प्रलंबित होने पर भी 18 फरवरी को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों नई मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे का भूमि पूजन और मैग्नेटिक महाराष्ट्र  यानि बदलते  महाराष्ट्र और समृद्धि परिवर्तन की कहानियों पर राज्य सरकार की ओर से करोड़ रुपए के विज्ञापन विशेष समाचार पत्रों में दिया गया था। विशेष रूप से जिस समाचार पत्र का नाम सरकार के विज्ञापन सूची में नहीं हैं, उन्हें भी फुल पेज विज्ञापन सरकार की ओर से दिया गया है। यह जानकारी एडिटर्स फोरम ने शॉर्ट एफेडेवीट सी.एच.एस.डब्ल्यू.एस.टी.122/2018 दाखिल करते हुए, इस मामले को बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने रखी गई है।

करोड़ों रुपए का विज्ञापन कैसे? : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर के अनुसार विज्ञापन देने के दौरान मध्यम और छोटे अखबारों पर अन्याय हो रहा है। नियमों को ताक पर रखते हुए जिन विशेष अखबारों और जिनका नाम सरकारी विज्ञापन सूची में नहीं हैं, ऐसे समाचार पत्रों को करोडों रुपए के विज्ञापन कैसे दिया जाता है? साथ ही कहा है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की फुल पेज फोटो की जरूरत न होने के बावजूद  विज्ञापनों में फोटो लगाकर करोड़ों रुपए सरकार क्यों खर्च कर रही है? राजनीतिक पार्टियां सरकारी विज्ञापन के जरिए आगामी चुनाव प्रचार कर रही है, ऐसा सवाल भी बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने उपस्थित किया है। जिस पर न्यायाधीश केमकर और न्या.कर्णिक इस मामले को गंभीर बताते हुए। 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

सरकार विभागों के अधिकारी और नेताओं के मिली भगत के चलते अपने हित में समाचार प्रकाशित करवाने के लिए अखबारों को करोडों रुपए का विज्ञापन दिया जाता है। बहुत से समाचार पत्रों का सरकारी विज्ञापन सूची में नाम भी नहीं हैं, बावजूद इसके  मिली भगत के कारण लाखों रुपए के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। इसके चलते छोटे समाचार पत्रों से साथ अन्याय हो रहा हैं। सरकार के इस रवैए से ऐसा लग रहा है कि सरकार लोकतंत्र का गला घोट रही है।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

नोटिस पाने वाले 17 विभागों के नाम : 1) मुख्य सचिव 2) सचिव सामान्य प्रशासन (मावज) 3) सचिव राजस्व व वन 4) सचिव ग्रामीण विकास 5) सचिव समाज कल्याण 6) बस्ट प्रशासन 7) सचिव शहरी विकास 8) महानिदेशक सूचना और जनसंपर्क 9) आयुक्त समाज कल्याण 10) सभी निदेशक, उप निदेशक, जिला सूचना अधिकारी, (सूचना और जनसंपर्क) 11) आयुक्त ( राजस्व ) 12) आयुक्त मुंबई मनपा 13) आयुक्त नागपुर मनपा 14) आयुक्त बिक्री कर विभाग 15) जिला सूचना अधिकारी वर्धा 16) प्रबंध निदेशक तथा उपाध्यक्ष सिडको 17) मुख्य कार्यकारी अधिकारी एमआईडीसी इन विभागों को नोटिस जारी करने के आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी है।

सरकार और राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप की वजह से विशेष समाचार पत्रों को विज्ञापन देने का काम किया जा रहा है। साथ ही नियमों का भी उल्लंघन करके लाखों रुपए के विज्ञापन अपने हितचिंतक समाचार पत्रों के दिए जा रहा हैं, जिससे लोकतंत्र खतरे में आ गया है। एडिटर्स फोरम ने कई बार राज्य सरकार और संबंधित विभागों को इस बारे में अवगत भी किया था, लेकिन सरकार ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, इसके चलते बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

लेखक Unmesh Gujarathi दबंग दुनिया, मुंबई संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनसे संपर्क 9322755098 के जरिए किया जा सकता है.

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2019 के अंत तक बंद होंगे 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे!

आज़ादी के 70 साल बाद अभी वर्तमान का यह समय छोटे और मध्यम अखबारो के लिए सबसे कठिन है। यदि सरकार के DAVP पॉलिसी को देखा जाय तो लघु समचार पत्रों को न्यूनतम १५ प्रतिशत रुपये के रूप में तथा मध्यम समाचार पत्रों को न्यूनतम ३५ प्रतिशत रुपये के रूप में विज्ञापन देने का निर्देश है। गौरतलब है कि भारत विविधताओं का देश है यहां विभिन्न भाषाएं हैं। ग्रामीण तथा कस्बाई इलाकों में भिन्न-भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। बड़े अखबार समूह की पहुंच वहां तक नहीं है। यदि विज्ञापन के आवंटन में भाषा और मूल्य वर्ग का ध्यान नहीं रखा गया तो निश्चित ही उस विज्ञापन की पहुंच विस्तृत तथा व्यापक नहीं होगी और विज्ञापन में वर्णित संदेश का प्रसार पूरे देश के समस्त क्षेत्रों तक नहीं हो पायेगा। पूर्व मंत्री द्वारा राज्यसभा में एक प्रश्र के उत्तर में नीति के पालन की बात कही गयी थी। परन्तु आज वह बयान झूठ साबित हो रहा है।

गांव का सरपंच यदि मजदूरी का भुगतान नहीं करता। पटवारी खसरे की नकल देने में रिश्वत मांगता है। दफ्तर का बाबू हर काम के लिए गरीब को दौड़ाता है। शुद्ध पानी नहीं मिल रहा। बिजली नहीं है। ठेकेदार ने मजदूरी हड़प ली। सड़के टूटी हैं। गन्दगी है। तो ऐसे सवालों के लिए आम जनता बड़े अखबारों के दफ्तर में नहीं पहुंचती है। वह जिंदगी की जद्दोजहद से परेशान अपने गांवों तथा कस्बों से छपने वाले अखबारों के दफ्तरों में पहुंचता है। लेकिन मोदी सरकार तो पूंजीपतियों के इशारे पर चल रही है। उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक बार फिर इमरजेन्सी की तलवार लटक रही है। कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को अंग्रेजों के जमाने की याद ताजा हो रही है। आज़ादी के बाद नेहरू जी ने अखबारों को जगह जगह जमीनें दिया था। अखबारी कागज पर सब्सिडी मिलती थी ताकि चौथा खम्भा जीवित रहे। परन्तु वर्तमान सरकार को ना जाने कौन सलाह दे रहा है कि सिर्फ बड़े मीडिया हाउस पर मेहरबान है यह।

सरकार की डीएवीपी पालिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने के कगार पर हैं, या फिर बंद हो रहे हैं। इसका दूसरा बड़ा कारण कारण है बड़े अखबारों का लागत से 90% कम पर अखबार बेचना या कहें कि एक तरह से फ्री में देना। आज अखबार के सिर्फ एक पेज के कागज का दाम 30 पैसे पड़ता है। इस तरह 12 पेज के अखबार के कागज की कीमत 3.60 रुपये होती है। इसके बाद प्रिंटिंग, सैलरी तथा अन्य खर्च कम से कम प्रति अखबार रु 2.40 आता है। कुल मिलाकर 6 रुपये होता है। इसके बाद हॉकर तथा एजेंट कमीशन, टांसपोर्टशन 50%, यानी 3 रुपये। टोटल 9 रुपये खर्च पर एक पेज की लागत 75 पैसे आती है। इस प्रकार 20 पेज का अखबार का 15 रुपये होता है। जितना ज्यादा पेज उतना ज्यादा दाम होने चाहिए। तब छोटे औऱ मध्यम अखबार बिक सकते हैं और तभी प्रसार बढ़ेगा, नहीं तो असम्भव है।

जैसे छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की पॉलिसी है, एन्टी डंपिंग डयूटी, विदेशी कंपनियों से यहां के उद्योग धंधों को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी लगाया जाता है, उसी तरह लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, मोनोपोली कमीशन भी इसमें सहयोग नहीं कर रहा है। जबतक ये नहीं होता है, तबतक कभी भी छोटे और मध्यम अखबार नहीं बिक सकेंगे, क्योंकि इन्हें प्राइवेट विज्ञापन नहीं मिलता है। इसलिए लागत से कम बेचना सम्भव नहीं है। बड़े अखबारों का फर्जी प्रसार सबसे ज्यादा है। अखबार फ्री देकर प्रसार बढ़ाते हैं। सिर्फ इतना ही दाम रखते हैं कि हॉकर रद्दी में बेचे तो उसे नुकसान हो। बड़े अखबारों का ज्यादातर प्रसार बुकिंग के द्वारा होता है। घर की महिलाएं बुकिंग से मिलने वाले गिफ्ट के लिए स्कीम वाले अखबार खरीदती हैं। बुकिंग के बाद हर महीने हॉकर को जो कुछ राशि देनी पड़ती है वो भी अखबार का रद्दी बेचकर निकल जाता है। इस तरह अखबार फ्री में मिलता है। सभी बड़े अखबारों के मालिक बड़े उद्योगपति हैं या बड़े उद्योगपतियों ने इनके शेयर खरीद रखे हैं। उनके प्राइवेट विज्ञापन एक तरह से उनके ही अखबारो में आते हैं। एक तरह से एक जेब से अपना पैसा दूसरे जेब में डालते हैं।

सभी बड़े अखबार एक होकर छोटे और मध्यम अखबार को सरकार की नीतियों में बदलाव करवा कर निबटाने में लगे हैं। इसी का नतीजा है नई डीएवीपी पालिसी और जीएसटी। जो हालात दिख रहा है, उसके मुताबिक 2019 तक 90% छोटे और मध्यम अखबार बंद हो जाएंगे। उसके बाद सिर्फ बड़े अखबार रहेंगे और सरकार के गुणगान में लगे रहेंगे। सभी सरकारी विज्ञापन भी उनकी झोली में जायेंगे और उसके मालिक लोग अपने उद्योगों की दलाली करते रहेंगे।

अखबार को विज्ञापन लेने का हक है क्योंकि सिर्फ अखबार ही ऐसा माध्यम है जिससे रोजाना 2 से 4 पेज सिर्फ सरकार और उसके सभी अंगों की खबरें, चाहे प्यून से PM या चपरासी से CM, मुखिया से लेकर सभी नेताओं तक, की छपती है। यह किसी अन्य माध्यम में नहीं होता है। फिर भी आज इस चौथे खंभा की आज़ादी पर चारों तरफ़ से हमले हो रहे हैं। अखबार को विज्ञापन लेने का हक है। कम से कम दो पेज रोजाना। जितना एरिया न्यूज का, उतना कम से कम विज्ञापन का होना चाहिए। पहले सरकार अखबार को प्राइम जगहों पर जमीन देती थी, सब्सिडी पर कागज, अब GST लगाकर वसूली के साथ-साथ इंस्पेक्टर राज। कोई भी आकर लेखा जोखा चेक करने लगेगा।

सरकारें कहती हैं कि सरकार के फेवर में लिखो, विरोध में लिखोगे तो विज्ञापन बंद। जज का वेतन सरकार देती है लेकिन क्या सरकार कहती है कि सरकार के विरोध में जजमेंट दोगे तो वेतन और सुविधा बंद कर दिया जाएगा? यही नहीं, समय समय पर इनके वेतन इत्यादि में वृद्धि होती है। परन्तु आज अखबार के विज्ञापन में कमी की गई और अब इसे खत्म करने की साजिश हो रही है। आज देश में एक दूसरे तरह का संकटकाल है।  बड़े बड़े उद्योगों के मालिक मीडिया के शेयर खरीद रहे हैं और मीडिया उनका गुलाम बनता जा रहा है। अमेरिका की तरह भारत में भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति एक व्यापारी बन सकता है या फिर पाकिस्तान की तरह सेना का कठपुतली प्रधानमंत्री बन सकता है। पाकिस्तान में पहले सेना तख्ता पलट कर देती थी। अब कठपुतली प्रधानमंत्री और सरकार के सभी बड़े पदों के लोग सेना के कठपुतली हैं।

छोटे और मध्यम अखबार से जुड़े लोग सड़क पर आ जायेंगे और बड़े मीडिया हाउस के जुड़े पत्रकार भी परेशान होंगे क्योंकि जब प्रिंट मीडिया के पत्रकार बेरोजगार होंगे तो वो TV ईत्यादि हर जगह नौकरी की लाइन में लगेगा। ऊपर से सरकार पेनाल्टी का केस डाल कर वसूली करने की तैयारी में है। हमें मिलकर सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर लागत से कम पर अखबार नहीं बिके, इसके लिए दबाव बनाना होगा। अमेरिका में 1 डॉलर (70रु) ब्रिटेन में 1 पौंड (80रु) और पड़ोसी पाकिस्तान में 20 रुपये में अखबार बिक सकता है तो भारत में क्यों नहीं? पाकिस्तान के लोग ज्यादा अमीर हैं? ज्यादा पढ़े लिखे हैं? करांची की आबादी 2 करोड़ है पर उस शहर में सबसे ज्यादा प्रसार वाले अखबार की प्रसार संख्या कितनी है? पाकिस्तान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार ‘जंग’ है जिसका पूरे पाकिस्तान में प्रसार 8.5 लाख है। हमारे यहां तो Metro Cities के कुछ अखबार 10 लाख से ज्यादा ABC सर्कुलेशन दिखाते हैं। जब 15-20 या ज्यादा पेज के कारण ज्यादा दाम होगा तब दस लाख सर्कुलेशन दिखाने वाला अखबार एक लाख भी नहीं बिक पायेगा।

दूसरी बात अगर सरकार सचमुच में छोटे और मध्यम अखबार को बचाना चाहती है तो 5000 कॉपी सर्कुलेशन तक के लिए कम से कम 25 रुपये डीएवीपी दर दे और इससे ज्यादा सर्कुलेशन के लिए आरएनआई चेकिंग का नियम बना दे। हर 5000 सर्कुलेशन बढ़ने पर 10% दर बढ़े। साथ ही बिग कैटेगरी के स्लैब की दर में कोई बदलाव नहीं हो, क्योंकि बड़े अखबारो को प्राइवेट विज्ञापन बहुत मिलते हैं।

सरकार ये नियम भी बनाये कि जो भी व्यक्ति अखबार या कोई मीडिया हाऊस चलाता हो, वो कोई धंधा नहीं करे या दूसरा बड़ा काम नहीं करे या छोटे-छोटे धंधे जो पूर्व से संचालित है, उसे 75 लाख टर्नओवर की लिमिट कर दे क्योंकि इससे कोई अखबार किसी का सपोर्ट या विरोध नहीं करेगा, उसका हित प्रभावित नहीं होगा। जज जिस कोर्ट से रिटायर होता है उसे उस कोर्ट में वकील के रुप मे प्रैक्टिस करने की मनाही होती है। समाचार पत्र अब जीएसटी के चलते बन्द हो जायेंगे। पं. दीन दयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के कथनी करनी में अन्तर स्पष्ट दिख रहा है।

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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DAVP ने फोड़ा प्रकाशकों के ऊपर एक और बम, रिकवरी नोटिस जारी

इस मोदी सरकार ने बड़े अखबारो से मिलकर छोटे और मध्यम अखबारों को खत्म करने का कुचक्र चला दिया है. इससे एक तीर से दो शिकार होंगे. बड़े अखबार को विज्ञापन बढ़ेगा जिससे वो मोदी सरकार के प्रति ज्याद निष्ठावान होंगे और छोटे व मध्यम अखबार बंद होंगे जिसके कारण भाजपा को लेकर होने वाले खुलासे देखने पढ़ने को नहीं मिलेंगे. वर्तमान सरकार ने न्यूजप्रिंट पर GST लगा दिया है जिसके कारण अखबारों पर भारी बोझ पड़ा है. जिन प्रकाशकों ने अपना प्रसार कम किया है, उनसे वसूली क्यों नहीं किया जाय, इसका नोटिस DAVP ने जारी कर दिया है. DAVP के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.

इस सम्बंध में DAVP क्या स्प्ष्ट करेगा कि:-

1. DAVP पॉलिसी के किस नियम के तहत यह वसूली का नोटिस दिया गया है। इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि प्रसार कम करने पर पिछले साल की वसूली की जाय। DAVP Policy Clause- 25 देखा जा सकता है।

2. भविष्य में अगर कोई अखबार का प्रसार बढ़ता है तो  क्या DAVP की तरफ से पिछले साल से बढ़े हुए दर का डिफरेंस दिया जाएगा क्योंकि प्रसार पिछले साल के रिटर्न दाखिल करने के साथ उनके आधार पर रेट बढ़ता है, सर्कुलेशन चेकिंग होता है।

3. DAVP POLICY clause-22 के अनुसार 30 दिनों के अंदर भुगतान करना होता है, 30 दिन के अंदर कोई भी भुगतान नहीं किया गया है अतः जितने भी दिन की देरी हुई है उस पर18% ब्याज दिया जाय।

4. 1 जून से वैसे अखबार जिनका रेट दिया जाना था, उसमें बहुतों को आजतक दर नहीं मिला है या मिलने के बाद ब्लॉक किया हुआ है. क्या उनको DAVP छतिपूर्ति देगा क्योंकि वैसे अखबारों का विज्ञापन DAVP के कारण हर जगह से बंद पड़ा है।

5. प्रकाशक को वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी प्रसार कम करने पर DAVP तुरंत दर कम करने का नियम बना दे क्योंकि एक साल के बाद कोई रिटर्न फाइल करने में दर कम करने पर हमेशा रिकवरी करने की जरूरत पड़ेगी।

6. DAVP policy Clause- 3 के अनुसार भारत सरकार के सभी विज्ञापन DAVP के द्वारा जारी किया जा सकता है.. सिर्फ कुछ टेंडर अन्य विभाग स्वयं जारी कर सकते हैं, वो भी DAVP दर पर,  जिसका पालन नहीं हो रहा है.. साथ ही विज्ञापन छोटे को 15%, मध्यम को 35% और बड़े अखबार को 50% अधिकतम रुपये की टर्म्स पर देना है परन्तु इसका पालन नहीं हो रहा है.. 50% की जगह 60%- 80% बड़े अखबारो को जा रहा है.. साथ ही DAVP Policy Clause- 19 के अनुसार अंग्रेजी 30%, हिंदी 35% स्थानीय और अन्य भाषा के अखबार के बीच 35% विज्ञापन का बंटवारा होना चाहिए, जिसका पालन नहीं हो रहा है।

7. DAVP Policy Clause- 16 के अनुसार RNI / ABC अखबारों को पहले से पांचवे पन्ने या अंतिम पन्ने पर विज्ञापन छापने पर 10% से 50% प्रीमियम देना है परन्तु आजतक किसी को भी नहीं मिला है।

8. DAVP Policy Clause- 18 (ll) जो बड़े अखबार शैक्षणिक विज्ञापन DAVP दर पर छापने की सहमति देते हैं उन पर उसे 50% अधिक विज्ञापन दिया जाएगा, जिसने सहमति नहीं दिया है उसके अनुपात से मिलेगा, लगभग सभी बड़े अखबार ने सहमति नहीं दी है, जिसका पालन नहीं हो रहा है।

9. 2016 से बहुत से बड़े अखबारो लगभग सभी का ABC कम हुआ है परन्तु उनसे कोई वसूली नहीं की जा रही है जबकि नियम सबके लिए एक समान लागू होता है।

DAVP के नोटिस के जवाब का ड्राफ्ट नीचे दिया जा रहा है… इससे प्रकाशकों को जवाब बनाने में सुविधा होगी :-

The Director General,
Directorate of Advertising and Visual Publicity,
Soochna Bhawan, Lodhi Road.
New Delhi – 110003

Subject : Reply to Show Cause Notice of Recovery dated 20/10/2017

REF : DAVP CODE – – PUBLICATION :

Dear Sir,

We are surprised to this see this Advisory as per DAVP POLICY 2016 Suspension and Recovery clause no. 25 (a)(b)(c)&(f) no provision for Recovery due if Publisher reduces their circulation. All 6 points wherein the Recovery can be generated but our edition doesn’t fall in any of them and hence recovery should not be initiated against our paper.

We wish to state that we had earlier stated the reasons for decrease in our circulation for the year 2016-17 vide our letter dated ——-. Those reasons had been accepted by you and subsequently Revised Rate was issued and the Blockage was removed only recently after 4 months period. Now, due to this blockage there was a huge revenue loss of government advertisements as no ads was being issued either by you or by various government departments, Board, Nigam & state govts.

We understand that both the parties, DAVP and Us are under Contractual Obligation as per the Rate Contract issued from 1st Jan. 2016 for 3 Years and the Advertising Policy Guidelines are binding on both of us. Any deviation from the guidelines has serious implications for both of us and therefore should be adhered to by both of us in a cordial manner.

Before recovery please look some serious facts/ points who effected print media in these days : –

1.    Demonitisation – Demonitisatation of November and December

2.    Rise in Overheads – Overheads such as Salaries, Transportation, Printing and Other Expenses increased. DAVP Revised rates in 2012 after that approximately 50% costs enhanced of Material ( Newsprint and others materials) and wages ( due to Majitia and other)

3.    Rise of Electronic / Digital Media – TV / Radio / Outdoor Events specially IPL forced the Commercial Advertisers to shift from Print Media.

4. Now, we feel strongly that under the Recovery Notice has been served to a select few publications, whose names have appeared in Recent Advisories is totally unjustified as all Big ( ABC / RNI ), Medium or Small Category Newspapers whose circulation has fallen since the Rate Contract became applicable on 1st Jan. 2016 have been left untouched. All such newspapers should be made accountable for Recovery in case there is a fall in their circulation also from 2007. We fail to understand as to why this biasness towards such papers. Any decisions should be for all newspapers in a uniform manner.

5. We wish to bring to your kind notice that Clause No. 22 of the Advertising Policy of 2016, dealing with Bill Submission and Payment mentions that DAVP would make every effort for payment within 30 Days but such thing has never happened. In fact, the Outstanding was at record level only recently up to August 2017. We are already paying Bank Interest on Credit Facilities and Recovery of any amount whatsoever will seriously effect our financial stability. DAVP should pay interest on delay every delayed payments @ 16%. Also DAVP Should compensate losses of every publisher’s also against loss of Advertisements from DAVP or by various government departments, Board, Nigam & state govts their rates still blocked or delayed uploaded because, previously every 1st January DAVP updated New rates who files change in circulation in September.

6. Regarding distribution of advertisement by the DAVP in financial year 2017-18 Big catogary newspapers getting ads upto 65% – 90% in place of maximum 50%, it’s directly loss of small and medium newspapers. We feel DAVP taking every efforts to kill medium & small newspapers.

7. we feel that the Recovery Notice has been served to a select few publications we feel that a Uniform Policy on Recovery should be Notified and No Exception should be given to any newspaper, be it in Big ( ABC / RNI ), Medium or Small Category in case of fall in circulation and since the Rate Contract became applicable on 01st Jan. 2016, all newspapers should be made accountable for Recovery in case there is a fall in circulation for the said period.

8. Payment of GST is due in every month, but payment of Advertisement is very delay by the DAVP, others government and Agencies 3 min 3 months to one year. Previously government was given various types of relaxation to promote Print Media and save Fourth Piller, Land on prime Location, subsidy on newsprint etc. But these days imposing taxes etc.

Under above circumstances, we wish to state that we are already facing lo of financial difficulties in running a genuine medium newspaper and request you to kindly reconsider the recovery notice.

Hence, we request you to kindly reconsider above facts before any recovery.

However, decisions of DAVP

acceptable to us regarding recovery.

Thanking You

……………

Your truly,

PRINTER & PUBLISHER

एक छोटे अखबार के प्रकाशक द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दैनिक जागरण और टाइम्स आफ इंडिया सहित 51 अखबारों को डीएवीपी ने किया सस्पेंड

पेड न्यूज़ समेत कई शिकायतों को लेकर की बड़ी कार्रवाई…  पेड न्यूज और अन्य कई शिकायतों के मामले में प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के आदेश पर डीएवीपी ने देशभर के 51 समाचार पत्रों को दो महीने के लिए सस्पेंड करते हुए विज्ञापन पैनल से बाहर कर दिया है।

इन समाचार पत्रों में टाइम्स ऑफ इंडिया का भुवनेश्वर संस्करण, दैनिक जागरण दिल्ली संस्करण, आज समाज दिल्ली संस्करण और राज एक्सप्रेस समेत कई अखबार शामिल हैं। जो अखबार पहले से ही पैनल में नहीं हैं वे इन दो महीने की अवधि में पैनल में शामिल नहीं किए जाएंगे. देखें 51 अखबारों की पूरी लिस्ट….

 

 

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डीएवीपी ने कम प्रसार संख्या के आधार पर 187 अखबारों को नया विज्ञापन रेट जारी किया! (देखें लिस्ट)

नई विज्ञापन नीति के तहत डीएवीपी की तरफ से कहा गया था कि अखबार स्वेच्छा से अपनी असली प्रसार संख्या की घोषणा कर दें अन्यथा मौके पर चेकिंग के दौरान गड़बड़ी पाई गई तो अखबार के टाइटिल निरस्त कर दिए जाएंगे. इसके बाद सैकड़ों अखबारों ने अपनी झूठी प्रसार संख्या को खारिज करते हुए कम प्रसार संख्या के आंकड़े डीएवीपी को सौंप दिए.

डीएवीपी ने इनमें से 187 अखबारों के कागजातों आदि की जांच कर इनकी कम प्रसार संख्या को स्वीकार करते हुए नया विज्ञापन रेट जारी किया है. इन 187 समाचार पत्रों के रेट रिवाइज करने की एडवाइजरी डीएवीपी की वेबसाइट पर आ गई है, जो इस प्रकार है…

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डीएवीपी की नीतियों के कारण ‘तरुणमित्र’ अखबार में छंटनी, 20 से ज्यादा हुए बेरोजगार

लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक तरुणमित्र ने आर्थिक दबाव के कारण 20 से अधिक मीडिया कर्मियों को नमस्ते कह दिया है. डीएवीपी ने फाइलों में छपने वाले समाचार पत्रों को हटाने के चक्कर में उन अखबारों को भी पैनल से हटा​ दिया है, जहां सैकड़ों मीडियाकर्मियों की रोजी रोटी जुड़ी हुई थी.

मजेदार बात तो यह है कि फाइल में छपने वाले अखबार आज भी पैनल में बने हुए हैं. लखनऊ से प्रकाशित लगभग ऐसे 25 अखबार होंगे जहां सैकड़ों की संख्या में कर्मचारी कार्यरत हैं, लेकिन केन्द्र सरकार ने उन्हें भी फाइल का अखबार मानते हुए विज्ञापन पैनल से हटा दिया. इससे ये अखबार आर्थिक दिक्कतों में आ गए जिसके कारण इन्हें अपने यहां छंटनी करनी पड़ रही है.

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मोदी की नई विज्ञापन नीति : छोटे अखबार वाले अगर चोर हैं तो बड़े वाले पूरे डकैत हैं!

Sanjay Sharma : केंद्र सरकार की प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 को लेकर लघु और मध्यम अखबारों के प्रकाशक लगातार लड़ाई लड़ रहे है। इस लड़ाई के तहत हम लोगों के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई याचिका दायर की जा चुकी है। मध्य प्रदेश में बीते वर्ष योजित एक याचिका के बाद DAVP के कुछ अधिकारी लघु और मध्यम अखबारों को फर्जी साबित करने और नीति को सही ठहराने के प्रयास में जुटे है।

अगर कुछ देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि लघु और मध्यम अखबारों में खामियां है तो क्या बड़े अखबारों में नहीं है? बिना इम्पेनलमेन्ट के बड़े अखबारों को विज्ञापन देना, दैनिक अखबार के लिए जारी विज्ञापन साप्ताहिक अखबार में प्रकाशित करना… इसके अलावा अभी 4 दिन पहले प्रधानमंत्री जी के फोटो वाले विज्ञापन सरकार के तीन साल पूरे होने के अवसर पर देश के सभी अखबारों में छापे गए… यह विज्ञापन जैकिट पर प्रकाशित क्यों हुए… क्या कोई बतायेगा कि इन विज्ञापनों का पेज नंबर क्या है… क्या यह डकैती और सरकारी धन का दुरुपयोग नहीं है… 

विज्ञापन कई दिन से लगातार जारी किए जा रहे हैं। मीडिया लिस्ट रिपीट हो रही है। सारे विज्ञापन एक ही लिस्ट के आधार पर जारी किए गए। क्या इसमें रोटेशन नहीं होना चाहिए। इस सब के बावजूद सरकार की नीति बहुत बढ़िया है। मैं ऐसे कई बड़े अखबारों को जानता हूं जिनकी आन रिकार्ड प्रसार संख्या लाख में है पर असलियत में वह 10 हजार भी नहीं छपते। इस सब के बावजूद DAVP के अधिकारी बहुत ईमानदार हैं।

DAVP के हर अधिकारी की एक अपनी लिस्ट होती है। आखिर क्यों? जो हुआ उसमें अधिकारियों की लिप्तता से इनकार सरकार को नहीं करना चाहिए। पर नजर केवल एक तरफ है… यह तो ठीक नहीं है। छोटे अखबार वालों को चोर और बड़े वालों को डकैत कहा जाना चाहिए। सरकार को भेदभाव नहीं करना चाहिए। कानून सबके लिए बराबर है। पर यहाँ तो एक साल से भेदभाव ही देखने को मिला रहा है। लड़ाई जारी है…

नोएडा से छपने वाले अखबार एनसीआर टुडे के एडिटर संजय शर्मा की एफबी वॉल से.

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मोदी सरकार ने गिराई गाज : 269556 पत्र-पत्रिकाओं के टाइटिल निरस्त, 804 अखबार डीएवीपी विज्ञापन सूची से बाहर

नरेंद्र मोदी सरकार की सख्ती की गाज छोटे अखबारों और पत्रिकाओं पर पड़ी है. इससे दूर दराज की आवाज उठाने वाली पत्र-पत्रिकाओं का संचालन ठप पड़ गया है, साथ ही इससे जुड़े लाखों लोग बेरोजगार भी हो गए हैं. ऐसे दौर में जब बड़े मीडिया घराने पूरी तरह कारपोरेट के चंगुल में आ चुके हैं और असल मुद्दों को दरकिनार कर नकली खबरों को हाईलाइट करने में लगे हैं, मोदी सरकार उन छोटे अखबारों और पत्रिकाओं की गर्दन दबोचने में लगी है जो अपने साहस के बल पर असली खबरों को प्रकाशित कर भंडाफोड़ किया करते थे. हालांकि दूसरा पक्ष यह है कि उन हजारों लोगों की अकल ठिकाने आ गई है जो अखबारों पत्रिकाओं की आड़ में सिर्फ और सिर्फ सरकारी विज्ञापन हासिल करने की जुगत में लगे रहते थे और उनका पत्रकारिता से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं हुआ करता था. वो अखबार पत्रिका के जरिए ब्लैकमेलिंग और उगाही के धंधे में लिप्त थे.

मोदी सरकार द्वारा सख्ती के इशारे के बाद आरएनआई यानि समाचार पत्रों के पंजीयक का कार्यालय और डीएवीपी यानि विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय काफी सख्त हो चुके हैं. समाचार पत्र के संचालन में जरा भी नियमों को नजरअंदाज किया गया तो आरएनआई समाचार पत्र के टाईटल पर रोक लगाने को तत्पर हो जा रहा है. उधर, डीएवीपी विज्ञापन देने पर प्रतिबंध लगा दे रहा है. देश के इतिहास में पहली बार हुआ है जब लगभग 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए गए और 804 अखबारों को डीएवीपी ने अपनी विज्ञापन सूची से बाहर निकाल दिया है. इस कदम से लघु और माध्यम समाचार पत्रों के संचालकों में हड़कम्प मच गया है.

पिछले काफी समय से मोदी सरकार ने समाचार पत्रों की धांधलियों को रोकने के लिए सख्ती की है. आरएनआई ने समाचार पत्रों के टाइटल की समीक्षा शुरू कर दिया है. समीक्षा में समाचार पत्रों की विसंगतियां सामने आने पर प्रथम चरण में आरएनआई ने प्रिवेंशन ऑफ प्रापर यूज एक्ट 1950 के तहत देश के 269,556 समाचार पत्रों के टाइटल निरस्त कर दिए. इसमें सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के अखबार-मैग्जीन (संख्या 59703) और फिर उत्तर प्रदेश के अखबार-मैग्जीन (संख्या 36822) हैं. इन दो के अलावा बाकी कहां कितने टाइटिल निरस्त हुए हैं, देखें लिस्ट…. बिहार 4796, उत्तराखंड 1860, गुजरात 11970, हरियाणा 5613, हिमाचल प्रदेश 1055, छत्तीसगढ़ 2249, झारखंड 478, कर्नाटक 23931, केरल 15754, गोआ 655, मध्य प्रदेश 21371, मणिपुर 790, मेघालय 173, मिजोरम 872, नागालैंड 49, उड़ीसा 7649, पंजाब 7457, चंडीगढ़ 1560, राजस्थान 12591, सिक्किम 108, तमिलनाडु 16001, त्रिपुरा 230, पश्चिम बंगाल 16579, अरुणाचल प्रदेश 52, असम 1854, लक्षद्वीप 6, दिल्ली 3170 और पुडुचेरी 523.

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उर्दू अख़बारों का फर्ज़ीवाड़ा

डीएवीपी में अपने अख़बार को इम्पैनल कराने के लिए उर्दू अख़बार वाले तबियत से झूठ का सहारा लेते हैं

डीएवीपी में फर्ज़ीवाड़ा करने वालों पर शिकंजा कैसे जाने की ख़बर से बहुत खलबली है. काग़ज़ों पर चलने वाले अख़बारों और अपने समाचारपत्र का सर्कुलेशन दसों हज़ार में बताने वालों में बैचेनी है. अगर ईमानदारी से कार्रवाई हुई तो दर्जनों अख़बारी घपलेबाज़ों को रिकवरी के नाम पर अपने मकान बेचने पड़ जायेंगे. वेसे तो फर्ज़ीवाड़ा करके सरकारी विज्ञापन का पैसा हड़पने में सभी भाषाओँ के अख़बारों का हिस्सा है लेकिन इसमें उर्दू अख़बार किसी से काम नहीं हैं.

डीएवीपी में अपने अख़बार को इम्पैनल कराने के लिए उर्दू अख़बार वाले तबियत से झूठ का सहारा लेते हैं, आपको जान कर हैरत होगी कि अकेले दिल्ली में डीएवीपी करा चुके उर्दू अख़बारों की संख्या 129 है. इनमे से हर एक अख़बार ने अपना सर्कुलेशन 50 से 70 हज़ार तक लिखवाया हुआ है. अगर इनको जोड़ दिया जाये तो दिल्ली में उर्दू अख़बारों की रोज़ाना 65 लाख प्रतियां छप रही हैं. अब अगर हक़ीक़त देखें तो दिल्ली में किसी भी अख़बार वाले की दूकान पर वही गिनती के 5-6 अख़बार होते हैं.

इन पांच छह में से भी किसी भी अख़बार का सर्कुलेशन पांच हज़ार से ज़्यादा नहीं है. ये पांच हज़ार भी सिर्फ दो ही अख़बारों का सर्कुलेशन है वरना बाकी का तो सर्कुलेशन पांच सौ से एक हज़ार के बीच है. यानी 129 में से 120 अख़बार ऐसे हैं जो सिर्फ काग़ज़ों पर छप रहे हैं. इनके मालिक कुछ ले दे कर डीएवीपी करा लेते हैं और सिर्फ जमा करने करने के लिए फाइल कॉपी छपवाते हैं. जो काग़ज़ों पर नहीं हैं और छप रहे हैं वो अपना सर्कुलेशन कई सौ गुना बता कर माल कूट रहे हैं.

ये सारा मामला भ्रष्ट अफसरों की मिली भगत के बिना संभव नहीं है. अगर सिर्फ दिल्ली में इतना बड़ा घपला है तो देश भर में क्या हो रहा होगा समझा जा सकता है. मज़े की बात ये है कि अगर इन अख़बारों के खिलाफ कार्रवाई हुई तो ये सब चीख चीख कर कहेंगे कि उर्दू पर हमला हो रहा है.

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