‘रोहिंग्या शरणार्थी करेंगे हमला’ जैसी फर्जी खबर लिखने वाले पत्रकार की नौकरी गई

सनसनी फैलाने के लिए गलत खबर लिखने वाले कापी एडिटर की नौकरी गई. मामला समाचार एजेंसी एएनआई का है. ANI ने 12 अक्‍टूबर को खबर दी कि नागालैंड पुलिस की खुफिया शाखा ने रोहिंग्‍या शरणार्थियों की तरफ से हमला किए जाने की आशंका जाहिर की है और इसे लेकर सबको चेतावनी दी. इस खबर का सोर्स खुफिया सूत्रों को बताया गया.

खबर में आगे कहा गया कि दीमापुर के इमाम ने नागालैंड के लोगों पर हमला करने के लिए बांग्लादेश से हथियारों और गोला-बारूद लाने के लिए रोहिंग्‍या विद्रोहियों से संपर्क किया है. नागालैंड के अखबार ‘द मोरंग एक्‍सप्रेस’ ने इस खबर का खंडन किया और इसे पूरी तरह गलत बताया. इसके बाद एएनआई ने खबर लिखने वाले कापी एडिटर को नौकरी से हटा दिया. एएनआई की एडिटर स्‍मिता प्रकाश ने गलत खबर के लिए खेद जताया है.

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टाइम्स आफ इंडिया वालों ने चित्रा सिंह को लेकर इतना बड़ा झूठ क्यों छाप दिया!

खबर पढ़ाने के चक्कर में खबरों के साथ जो बलात्कार आजकल अखबार वाले कर रहे हैं, वह हृदय विदारक है. टाइम्स आफ इंडिया वालों ने छाप दिया कि सिंगर चित्रा सिंह ने 26 साल बाद का मौन तोड़ा और गाना गाया. टीओआई में सचित्र छपी इस खबर का असलियत ये है कि चित्रा सिंह ने कोई ग़ज़ल / भजन नहीं गया. उन्हें मंच पर बुलाकर सिर्फ सम्मानित किया गया था. लेकिन खबर चटखारेदार बनाने के लिए छाप दिया कि चित्रा ने गाना गाया.

पढ़िए आप भी टीओआई में छपी झूठी खबर….

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अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल ने हमले में मुसलमानों के शामिल होने की फर्जी ख़बर बनाई!

Mohammad Anas : स्क्रॉल ने की शर्मनाक हरकत। अंग्रेजी वेबसाइट स्क्रॉल ने इस्लामोफोबिक होते हुए बालेंदु स्वामी के नास्तिक मिलन प्रोग्राम पर हुए हमले में मुसलमानों के शामिल होने की फर्जी ख़बर बनाई। कार्यक्रम में शामिल होने आए नास्तिक मित्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तथा दो प्रमुख एवं प्रतिष्ठित समाचारपत्रों के संवाददाता मित्रों के अनुसार वहां सिर्फ बजरंग दल/ विश्व हिंदू परिषद तथा लोकल हिंदू धार्मिक संत एवं जनता ने विरोध प्रदर्शन तथा मारपीट की।

यह है ऑनलाइन बैलेंसवाद। बदनामी हमारी हो रही है तो हम तुम्हें भी बदनाम करेंगे। इस तरह की हेडलाइन देखते ही शेयर होती है। यह एक वर्ग विशेष जो कि अपने ऊपर हो रहे गौ आतंक तथा सरकार प्रायोजित भेदभाव का दंश झेल रहा है उसे ताकतवर बना कर पेश करने की शर्मनाक हरकत है। मुसलमान इस देश में अपनी पहचान बचाने की लड़ाई लड़ रहा है, उसे किसी नास्तिक की पहचान मिटाने की क्या पड़ी है। वह खुद डरा सहमा सा रहता है, भला उसे ‘ऐंवई ही मस्ती विद नास्तिक फ्रेंड’ के मिलाप से क्या मतलब। स्क्रॉल, आपने बहुत गलत किया। शर्म आनी चाहिए आपको।

युवा पत्रकार और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस की एफबी वॉल से.

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भारत को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा क्यों बन जाता है भारतीय मीडिया!

 

(देर आए, दुरुस्त आए… गलत प्रचारित खबर की सच्चाई अब सामने ला रहा भारतीय मीडिया.. एक अखबार के मेरठ-बागपत संस्करण में प्रकाशित खबर…)


भारतीय मीडिया किस तरह अपने ही देश को बदनाम करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा जाने-अनजाने बन जा रहा है, इसे जानना-समझना हो तो आपको बागपत के साकरोद गांव का मामला समझ लेना चाहिए. इस गांव के बारे में इंग्लैंड समेत कई देशों में खबर प्रचारित प्रसारित कर दी गई कि यहां की खाप पंचायत ने दो बहनों के साथ रेप कर उन्हें नंगा घुमाए जाने का आदेश दिया है. इसका कारण यह बताया गया कि लड़कियों का भाई ऊंची जाति की शादीशुदा औरत के साथ भाग गया था, इसलिए बदले में लड़कियों को दंडित करने हेतु दोनों बहनों से रेप करने का फरमान सुनाया गया.

यह मसला देखते ही देखते इंग्लैंड की पार्लियामेंट में भी गूंज गया. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए आनलाइन पीटिशन दायर कर सिग्नेचर कैंपेन शुरू कर दिया जिस पर करीब बीसियों हजार लोगों ने दस्तखत कर भी दिए. ब्रिटिश संसद ने तो बाकायदा प्रस्ताव पारित कर खाप पंचाय के आदेश की निंदा की और बहनों को उचित सुरक्षा देने की भारत सरकार से मांग की. इतने बड़े लेवल पर हो हल्ला होने के कारण दबाव में आई भारतीय मीडिया ने भी जोर शोर से इस मसले को छापना उठाना शुरू कर दिया. दिल्ली से बस सौ किमी दूर स्थित बागपत के साकरोद गांव में मीडिया वालों ने जाना उचित नहीं समझा. पर विदेशी ताकतों के हल्ला करने से उनके प्रभाव में आते हुए दो बहनों के साथ अन्याय की खबर बढ़ाचढ़ा कर प्रकाशित करना दिखाना शुरू कर दिया. विवेकहीन भारतीय मीडिया की इस हरकत को लेकर बागपत से लेकर मेरठ तक के लोगों में भारी गु्स्सा है. कुछ ने तो इसी गुस्से में साकरोद की सच्चाई और मीडिया की भूमिका को लेकर फेसबुक पेज तक शुरू कर दिया है. लिंक ये https://www.facebook.com/SankrodBaghpatTruth है.

टाइम्स आफ इंडिया ने पहल करते हुए अपने रिपोर्टरों इशिता भाटिया और मदन राणा को मौके पर भेजा. इन पत्रकारों ने ग्राउंड रिपोर्टिंग की. इनने जांच पड़ताल के बाद अपनी बाइलाइन रिपोर्ट में बताया कि ऐसी कोई खाप पंचायत यहां हुई ही नहीं. गांव का कोई भी आदमी खाप पंचायत होने की बात नहीं स्वीकार कर रहा और रेप जैसे फरमान के बारे में इनकार कर रहा है. सबका कहना है कि यह सब मनगढ़ंत बातें हैं. इस घटना को स्थानीय लोगों ने पूरी तरह नकार दिया है. टीओआई में छपी खबर को पढ़ने के लिए इस लिंक http://goo.gl/WJYSGB पर क्लिक करें.

इस बारे में बागपत के पत्रकार सचिन त्यागी बताते हैं: ”बागपत के साकरोद गांव का जो मामला आ रहा है उसने यहाँ के सभी बुद्धिजीवियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. दो बच्चों की नादानी ने आज इस गांव की मर्यादा को खतरे में डाल दिया है. मामले की हकीकत चाहे कुछ भी रही हो लेकिन एक बात जरूर सामने आई है. गांव में न तो पंचायत की गयी ओर न कोई फरमान जारी किया गया. मीडिया भी सारी हकीकत जानने के बाद सच्चाई का साथ नहीं दे रहा. गांव में जाकर जिसने भी सच्चई देखी, सब मामला समझ जाते हैं. मैं अकेला इस मामले पर अपनी राय दूँ तो कहा जायेगा कि किसी एक परिवार का साथ दे रहा हूं. लेकिन आप ही फैसला लें. एक परिवार लड़के वाले का है जो हर प्रकार से सम्पन्न है. घर में दो लोग सरकारी नौकरी कर रहे हैं और एक की तैयारी चल रही है. दूसरी ओर लड़की का परिवार है जिसके पास न तो कोई जमीन का टुकड़ा है और न ही कोई अपना रोजगार. दूसरों के यहां मजदूरी कर परिवार चलता है. अब आप ही बतायें कौन किस पर भारी है. लड़की की शादी हो चुकी है. वह अपनी ससुराल में है. गरीब परिवार की लड़की को अगर इस तरह बदनाम किया जाएगा तो क्या होता है, यह आप सब जानते हैं. मैं आज ये सब इसलिए आप से साझा कर रहा हूं कि आप भी इस मामले को लेकर किसी प्रकार के भरम में ना रहें. साकरौद गांव में शांति है और लड़की का परिवार हर सुबह आज भी मजदूरी पर निकल जाता है.”

मेरठ से जुड़े उद्यमी जे. विशाल कहते हैं: ”It’s a laudable attempt by TOI to have sent a female journalist to Sakrond to get the first person account from the villagers. Its shameful on the part of Amnesty International to launch an slanderous anti-India false Campaign when no such incident took place. We should condemn Amnesty International and the western approach to interfere in our sovereignty. Hats off to TOI and the reporter. Kudos.”

ऐसा यह पहली बार नहीं है जब दुष्प्रचार के लपेटे में आकर मीडिया वाले दुष्प्रचार को और ज्यादा प्रचारित प्रसारित कर देते हैं. कम से कम पत्रकारीय तकाजा यह कहता है कि ऐसे मामलों में फौरन जमीनी तथ्य पता लगाना चाहिए और ग्राउंड रियल्टी को रिपोर्ट करना चाहिए. हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भी इसी तरह का एक घटनाक्रम हुआ. प्रचारित कर दिया गया कि 16 अप्रैल को धर्मशाला में कॉलेज की एक छात्रा के साथ दुष्कर्म हुआ है. इसके बाद पुलिस ने पांच दिन बिना एफआईआर मामले की जांच की, क्योंकि मामले के संबंध में न तो कोई शिकायतकर्ता था और न ही दुष्कर्म की बात फैलाने वाला कोई था. लेकिन सोशल मीडिया में यह मामला इतना फैल गया कि पुलिस को 20 अप्रैल को इस संबंध में मामला दर्ज करना पड़ा. मामला दर्ज होने के साथ ही 21 अप्रैल को पुलिस के हाथ दुष्कर्म की अफवाह फैलाने वाली महिला लगी. साथ ही 21 अप्रैल शाम तक यह बात साफ हो गई कि धर्मशाला में कोई भी दुष्कर्म नहीं हुआ है, बल्कि यह मात्र एक अफवाह थी. अब जाकर पता चला है कि धर्मशाला कॉलेज में हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म मामले का संदेश कानपुर से निकला था. पुलिस अधिकारियों की जांच में यह खुलासा हुआ है. सोशल मीडिया में देश-विदेश में हड़कंप मचाने वाले कथित दुष्कर्म मामले का पहला संदेश कानपुर के एक युवक ने सोशल मीडिया में फैलाया था. इसके बाद इस संदेश ने सबको हिलाकर रख दिया था. हैरत की बात तो यह है कि मामले को शांत हुए महीनों का समय बीत चुका है, उच्च न्यायालय ने भी इसकी एफआइआर निरस्त कर दी है. फिर भी हाल ही में मामले के संदेश में सोशल मीडिया नया मैसेज फैला है. सहायक पुलिस अधीक्षक शालिनी अग्निहोत्री ने बताया कि उनकी निजी जांच में पता चला है कि मामले के संबंध में सोशल मीडिया पर फैला मेसेज कानपुर से निकला था. इस संदेश को फैलाने वाले का कहना है कि उसे भी किसी से यह संदेश प्राप्त हुआ है. सोशल मीडिया में धर्मशाला दुष्कर्म का मामला इतना अधिक सक्रिय हो चुका था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों को मामले को जानकारी हो चुकी थी. इसके साथ ही इंटरनेट के गूगल में भी जब भी धर्मशाला नाम डाला जाता था तो सबसे पहले कथित दुष्कर्म की कहानी व उसके विरोध में हुए आंदोलन की फोटो आती थी.

तो सबक ये है कि अगर कोई भी सूचना आप तक या हम तक किसी माध्यम से पहुंचती है तो उस पर तुरंत विश्वास कर आवेशित हो जाने की बजाय उस सूचना के तथ्यों की पड़ताल में जुटना चाहिए. आज के दौर में जब मोबाइल के जरिए हर शख्स तक सूचनाओं, संदेशों, खबरों, जानकारियों, अफवाहों की सीधी और तुरंत पहुंच है, हम सभी को बेहद जिम्मेदार व धैर्यवान बनकर सूचनाओं के जंजाल की पड़ताल कर लेनी चाहिए. विशेषकर मीडिया हाउसेज से तो यह अपेक्षा की ही जाती है कि कौवा कान ले गया कहावत की तर्ज पर विदेश से आई देश के किसी हिस्से की खबर पर आंख मूंदकर भरोसा करने की जगह खुद उस जगह जाकर पड़ताल करा लेना चाहिए नहीं तो दुनिया में भारत की पहले से ही बिगड़ी सामाजिक छवि को और ज्यादा धक्का लगेगा. साकरोद मामले में अब जाकर भारतीय मीडिया ने अपनी गलती को ठीक करना शुरू किया है और विदेशी दुष्प्रचार के सुर में सुर न मिलाते हुए मौके से जानकारी लेकर खाप पंचायत न होने की खबरों का प्रकाशन शुरू किया है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क: yashwant@bhadas4media.com

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इंडिया न्यूज के बस्ती जिले के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज

बस्ती। नगर थाना क्षेत्र के पोखरनी गांव में धर्मांतरण के नाम पर चैनल की टीआरपी बढ़ाने को लेकर दिखाई गई खबर को जिला प्रशासन ने संज्ञान लिया. जांच कराने पर खबर और प्रकरण फर्जी पाया गया. इसको लेकर जिला प्रशासन ने कड़ा कदम उठाते हुए आपसी सौहार्द बिगाड़ने के मामले में इंडिया न्यूज के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करा दिया.

मामला 19 दिसंबर 2014 का है जब बस्ती जिले में तैनात इंडिया न्यूज के रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव अपने चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए नगर थाना क्षेत्र के पोखरनी गांव के निवासी संतोष कुमार पुत्र राम लखन चमार और गांव के ही विश्वनाथ पुत्र रामचेत के घर पहुंचे और वहां पर मौजूद घर की महिलाओं से पूछा कि तुम लोगों ने मुस्लिम धर्म क्यों अपना लिया है। इस पर महिलाओं ने बताया कि नहीं, हम हिन्दू ही हैं लेकिन हम मजार पर जाकर अपनी आस्था प्रकट करते हैं. इन सभी बात को इंडिया न्यूज के पत्रकार सतीश श्रीवास्तव ने रिकार्ड कर लिया. फिर इसे तोड़मरोड़ कर मजहबी रंग देकर अपने चैनल पर प्रसारित करा दिया.

धर्मांतरण की खबर फ्लैश होते ही जिला प्रशासन के हाथपांव फूल गए और आनन फानन में पोखरनी गांव में जिले के आलाधिकारी पंहुचे. पूरे मामले की जानकारी ली. उन्हें पता चला कि चैनल की टीआरपी बढ़ाने के लिए फर्जी तरीके से खबर को तोड़मरोड़ कर चलाया गया इससे समाज का सौहार्द बिगड़ सकता था. दो समुदायों के बीच कोई भी बड़ी घटना घट सकती थी. वहीं इस झूठी खबर का असर ये हुआ कि हिंदू युवा संगठन ने बाजार बंद कराया. बाद में महिला के पति संतोष की तहरीर पर पुलिस ने इंडिया न्यूज के बस्ती रिपोर्टर सतीश श्रीवास्तव सहित पांच लोगों पर मु0अ0सं0 1436/14 धारा 147, 295ए, 506, व अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का मुकदमा दर्ज करके पूरे मामले की जांच सीओ कलवारी को सौंप दी है. इस संबध में विवेचक सीओ कलवारी प्रभंस राम ने बताया कि प्रथम दृष्टया आरोप सही है. विवेचना की जा रही है. सारे तथ्यों को इक्ठ्ठा कर कार्यवाही की जाएगी.

बस्ती से राजकुमार की रिपोर्ट. 

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‘ज़ी संगम’ की फर्जी खबर का असर, फर्रुखबाद के रिपोर्टर दौड़े पूरी रात

फर्रुखाबाद जनपद में 29-011-2014 को फर्रुखाबाद कोतवाली के कोतवाल राजकुमार की हत्या कर दी गयी. हत्या के बाद फर्रुखाबाद मीडिया जगत में खलबली मच गयी और सभी न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर जानकारी लगते ही मौके पर पहुंच गए. सबने अपनी कवरेज शुरू कर दी. फर्रुखाबाद के कोतवाल के अलावा किसी भी सिपाही को खरोच तक न होने की बात सामने आई. सभी रिपोर्टर एक ही बिंदु पर अपनी खबर करते गए.

देर रात पुलिस के बड़े अफसर आईजी आशुतोष पाण्डेय व डीआईजी नीलाब्जा चौधरी भी मौके पर आ गए. लेकिन अभी तक किसी पुलिस कर्मी के घायल होने की कोई भी सूचना नहीं मिली. लेकिन इसी बीच कुछ रिपोर्टरों के मोबाइल फोन बजने लगे. डेस्क से पूछा गया कि कोतवाल के साथ घायल सिपाही कहां है, आप लोगों ने बाइट क्यों नहीं भेजी? सभी रिपोर्टरों के पास कोई जवाब नहीं था. फिर शुरू हो गया एक दूसरे को फोन करना. लेकिन उस गंभीर घायल सिपाही का कोई पता नहीं चल सका. जब कुछ रिपोर्टर थक हार कर अपने आफिस में फोन लगा कर पूछने लगे कि सर सिपाही के घायल होने की खबर किस चैनल पर चल रही है तो उधर से जवाव मिला ‘ज़ी संगम’ पर.

फिर क्या था. कुछ रिपोर्टर ज़ी संगम खोल कर बैठ गए और खबर देखने लगे. पता चला कि जिस घायल सिपाही की बाइट ज़ी संगम चला रहा था, बह फर्जी बाइट थी. दरसल जो बाइट चल रही थी वो कोतवाल की हत्या के 2 दिन पहले झगड़े में घायल हुए मल्लू यादव की थी जो फतेहगढ़ के बरगदियाघाट निवासी हैं. इससे साफ़ है कि ज़ी संगम के रिपोर्टर जिले में किस तरह की रिपोर्टिंग करते हैं. लेकिन क्या किया जाए. सब कुछ चलता है.

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भारत के न्यूज चैनल पैसा कमाने और दलगत निष्ठा दिखाने के चक्कर में सही-गलत का पैमाना भूल चुके हैं : अजय कुमार

: इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनलों का ‘शोर’ : टेलीविजन रेटिंग प्वांइट(टीआरपी) बढ़ाने की चाहत में निजी इलेक्ट्रानिक न्यूज चैनल अपनी साख खोते जा रहे हैं। समाचार सुनने के लिये जब आम आदमी इन चैंनलों का बटन दबा है तो उसे यह अहसास होने में देरी नहीं लगती कि यह चैनल समाचार प्रेषण की बजाये ध्वनि प्रदूषण यंत्र और विज्ञापन बटोरने का माध्यम बन कर रह गये हैं। इन चैनलों पर समाचार या फिर बहस के नाम पर जो कुछ दिखाया सुनाया जाता है, उससे तो यही लगता है कि यह चैनल न्यूज से अधिक  सनसनी फैलाने में विश्वास रखते हैं।

अक्सर यह देखने को मिल जाता है कि जिस समाचार और विषय को लेकर यह चैनल दिनभर गलाकाट प्रतियोगिता करते रहते हैं, उसे प्रिंट मीडिया में अंदर के पन्नों पर एक-दो कॉलम में समेट दिया जाता है।कभी-कभी तो यह भी नहीं होता है। न्यूज चैनलों का उबाऊ प्रसारण देखकर दर्शक तो रिमोट का बटन दबा कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है, परंतु कभी-कभी स्थिति हास्यास्पद और शर्मनाक भी हो जाती है।मीडिया के इसी आचरण के कारण सरकार से लेकर नौकरशाह तक और नेताओं से लेकर जनता तक में इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। दुखद बात यह भी है कि जिन संस्थाओं के कंधों पर मीडिया की मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदार है, उसके कर्णधार इन न्यूज चैनलों के कार्यक्रम का हिस्सा बनकर अपना चेहरा चमकाने में लगे रहते हैं।

आज की तारीख में इलेक्ट्रानिक समाचार चैनल विवाद का केन्द्र बन गये हैं।अगर ऐसा न होता तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय(एएमयू) के अंदर बड़े पैमाने पर मीडिया का विरोध नहीं होता। एएमयू से जुड़े छात्र-छात्राएं और कालेज स्टाफ गत दिनों यहां के वीसी के बयान को तोड़मरोड़ कर इलेक्ट्रानिक मीडिया में पेश किये जाने से नाराज था, जिसमें कहा गया था कि वीसी ने लाइब्रेरी में छात्राओं की इंट्री पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि इससे लाइब्रेरी में चार गुना छात्र ज्यादा आने लगेंगे। एएमयू छात्रसंघ और विमेंस कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन ने मीडिया में इस खबर को शरारतपूर्ण तरीके से दिखाये जाने से नाराज होकर विरोध मार्च निकाला और धरना दिया।

एक अंग्रेजी समाचार पत्र की प्रतियां भी जलाई गईं। विरोध की खबर किसी चैनल पर नहीं दिखाई गई, जबकि पत्रकारिता के कायदे तो यही कहते हैं कि इसे भी चैनल या समाचार पत्रों में उतना ही स्थान मिलना चाहिए जितना वीसी के बयान को पेश करने के लिये दिया गया था। वीसी का साफ कहना था कि किसी छात्रा पर रोक नहीं लगाई गई है। शोध और मेडिकल से जुड़ी छात्राएं लाइब्रेरी आती भी हैं। 1960 से जो व्यवस्था चल रही है उस पर ही आज भी एएमयू आगे बढ़ रहा है, अगर कुछ गलत हो रहा था तो यह आज की बात नहीं थी, जिसका विरोध वीसी की आड़ लेकर किया जा रहा है। यह घटना अपवाद मात्र है जबकि इस तरह के समाचारों से इलेक्ट्रानिक न्यूज बाजार पटा पड़ा है।

ऐसा लगता है कि निजी न्यूज चैनल के कर्ताधर्ता समाचार पत्र के स्रोत का गंभीरता से पता नहीं लगाते हैं, जिसकी चूक का खामियाजा उन्हें समय-समय पर भुगतना पड़ता है। आज स्थिति यह है कि करीब-करीब सभी न्यूज चैनल किसी न किसी दल या नेता के प्रति निष्ठावान बने हुए हैं और उन्हीं को चमकाने में लगे रहते हैं। पैसा कमाने के चक्कर में इनके लिये सही-गलत का कोई पैमाना नहीं रह गया है। अंधविश्वास फैलाना, बेतुके बयानों को तवज्जों देना, अलगावादी और विवादित नेताओं को हाईलाइट करना,बड़ी हस्तियों के निजी जीवन में तांकझाक करना इनकी फितरत बन गई है। यही वजह है कि कई नेता, नौकरशाह, उद्योगति, फिल्मी हस्तियां, समाजवसेवी मीडिया से बात करना पसंद नहीं करते हैं। उन्हें डर रहता है कि न जाने कब उन्हें विवादों में घसीट लिया जाये। न्यूज चैनलों का शोर जल्दी नहीं थमा तो इनके सितारे गर्दिश में जा सकते हैं।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. एक जमाने में माया मैग्जीन के यूपी ब्यूरो चीफ हुआ करते थे. चौथी दुनिया समेत कई अखबारों से जुड़े हुए हैं और नियमित स्तंभ लेखन करते हैं.

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