आईआईटी का ये प्रोफेसर नौकरी छोड़ एक दिन चल पड़ा जंगल की ओर…

Rana Yashwant : आज एक स्टोरी आई. स्क्रिप्ट पढते ही मैं चौंक गया. कहा- कल इसको ठीक से करेंगे. अभी वही खबर दिख गई तो सोचा आपसे साझा कर लूं. शहाबुद्दीन जैसे लोगों के लिये सैकड़ों गाड़ियों का काफिला और हजारों की भीड़ चुटकियों में खड़ा हो जाते हैं, लेकिन एक आदमी इस देश की सेवा की बेहतरीन मिसाल खड़ी कर गया और हम उसको जानते तक नहीं. आलोक सागर, आईआईटी में प्रोफेसर हुआ करते थे. उनके छात्रों में रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी हैं.

एक दिन आलोक सागर को लगा कि सिर्फ पढाना, खाना, कमाना ही जीवन नहीं है, वह कुछ और भी है. इस आदमी ने आईआईटी की प्रोफेसरी छोड़ी और वे मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके में चले गए. बैतूल और होशंगाबाद में आलोक सागर ने आदिवासियों के बीच काम करना शुरु किया. पिछले २६ साल से यह आदमी एक ऐसे गांव में रहता है, जहां ना तो बिजली है और ना ही सड़क. वे अबतक पचास हजार से ज्यादा पेड़ लगा चुके हैं. उनको लोग बीज बांटते और पौधा बांटते ही देखते हैं. मैने सोचा कि एक बार सुन लूं कि यह आदमी कह क्या रहा है और सुना तो देर तक सोचता रहा कि इतना जीवट और ऐसी सोच आम इंसान की हो ही नहीं सकती.

आलोक कह रहे थे कि हम बस डिग्री दिखाने और अपनी काबलियत साबित करने में ही रह जाते हैं, हमने लोगों के लिए किया ही क्या- यह सोचते ही नहीं. सच तो यह है कि देश की सेवा जमीन पर उतरकर ही बेहतर तरीके से की जा सकती है. अब इससे भी बड़ी बात सुनिए. हाल में जब स्थानीय चुनाव हुए तो बैतूल के अधिकारियों ने कहा कि भाई आप ऐसे ही बीज बांटते, पेड़ लगाते रहते हैं- आपके बारे में लोग कम जानते हैं, सो फिलहाल आप जिले से बाहर जाइए, चुनाव है. तब उन्होंने अपनी डिग्री दिखाई और अपने बारे में बताया.

अधिकारियों ने जांच करवाई और सारी बातें सही पाई गईं. जो आदमी तीन कुर्ते और एक साइकिल पर जीवन काटता हो, कई भाषाएं फर्राटेदार बोलता हो , आदिवासियों का जीवन बेहतर करने में अपना जीवन खपाता हो, आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की हो और ह्यूस्टन से पीजी और पीेएचडी किए हुए हो वह कितना महान है, एक बार ठीक से सोचिएगा. आलोक सागर से मिलना ज़रूर है और वह भी जल्द.

इंडिया न्यूज चैनल के मैनेजिंग एडिटर राणा यशवंत की एफबी वॉल से.

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आईआईटी पर बरसा आरएसएस का मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइजर’

आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर ने अब आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान को भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों का केंद्र करार दिया है। कुछ आईआईएम द्वारा सरकार के कदमों के विरोध के पीछे राजनीतिक उद्देश्य होने का जिक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि वामदल और कांग्रेस अभी भी प्रतिष्ठित संस्थाओं पर नियंत्रण किये हुए हैं और दोनों दल संचालक मंडल और निदेशकों के जरिये एक संस्थान पर ‘वैचारिक नियंत्रण’ के संचालक (मास्टर) हैं।

मुखपत्र में प्रकाशित लेख में आईआईटी बम्बई के संचालक मंडल के अध्यक्ष और जाने माने परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोदकर और आईआईएम अहमदाबाद के अध्यक्ष ए एम नाइक की विभिन्न मुद्दों पर चुटकी ली गई है।

इसमें हरिद्वार के पवित्र शहर में आईआईटी रूड़की के छात्रों को सामिस भोजन परोसे जाने और राउरकेला में एनआईटी में छात्रों को सामुदायिक हाल में पूजा आयोजित करने से रोके जाने का दावा किया गया है और दोनों संप्रग सरकार के दौरान होने की बात कही गई है। इसमें कहा गया है कि करदाताओं के पैसों से पोषित संस्थान भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों के स्थान बन गए हैं।

आएसएस के मुखपत्र में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि निम्न मनोबल वाले संकाय के लोग छात्रों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। ऐसी गतिविधियां या तो संचालक मंडल के संज्ञान में नहीं आती या इन्हें नजरंदाज किया जाता है… संचालक मंडल को इन संस्थाओं में भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

सप्ताहिक में प्रकाशित लेख में काकोदकर पर चुटकी लेते हुए कहा गया है कि वह मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी पर निदेशकों की नियुक्ति को लापरवाही से लेने का आरोप लगाते हैं लेकिन आईआईटी मुम्बई द्वारा शिक्षकों एवं छात्रों के लिए ‘किस ऑफ लव’ मनाने पर एक शब्द भी नहीं कहते।

इसमें शिक्षा क्षेत्र में सरकार से बदलाव लाने का आग्रह किया गया है और इसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों की विचारधारा समाहित करने का जिक्र किया गया है।

जनसत्ता से साभार

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आईआईटी मद्रास के छात्रों के ग्रुप पर पाबंदी लगाना फासीवादी कार्रवाई : ‘दिशा’

हाल ही में आई.आई.टी छात्रों द्वारा चलाये जा रहे अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल पर आई.आई.टी मद्रास के प्रबंधन द्वारा लगाया गया प्रतिबन्ध विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है। दिशा छात्र संगठन ने इस प्रतिबन्ध की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। 

प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत बढ़काने के कोशिश करने के आरोप में आई.आई.टी के प्रबंधन ने यह प्रतिबन्ध लगाया है। एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा एम.एच.आर.डी को लिखी गयी एक चिट्ठी के बाद यह कदम उठाया गया है। अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल द्वारा वितरित किये गए जिस पर्चे का हवाला देते हुए यह बताया जा रहा है कि छात्रों का यह ग्रुप प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत को हवा दे रहा है अगर एक बार उस पर्चे की विषय वस्तु पढ़ ली जाए तो उससे साफ हो जाएगा कि यह प्रतिबन्ध नफरत फैलाने के लिए नहीं बल्कि इस सरकार की आर्थिक-राजनितिक नीतियों के बारे में आलोचना करने के लिए लगाया गया है। 

सबसे ज़रूरी और अहम बात यह है कि एक लोकतंत्र में आलोचना, वाद विवाद और अपनी बात कहने का हक़ सबको इस देश का संविधान देता है, तो फिर क्यों इतनी बेशर्मी के साथ उन विद्यार्थियों से यह हक़ छिना जा रहा है। सिर्फ इसिलए क्योंकि सरकार नहीं चाहती की देश  की युवा पीढ़ी उनके द्वारा जारी किये फतवों (नीतियों) की आलोचना करे। यहीं है वह अच्छे दिन जिनका वादा कर यह पार्टी सत्ता में आई थी। वोल्टेयर ने बिलकुल ठीक कहा था कि यह जानने के लिए की तुम पर कौन राज करता इसका पता लगा लो की तुम किसकी आलोचना नहीं कर सकते। किस लिहाज़ से किसी सरकार की नीतियों के बारे में वाद विवाद करना या आलोचना करना उस सरकार के प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत बढ़ाना है, यह तो केवल सत्ता में बैठे लोग ही समझ सकते हैं। 

ऐसे प्रतिबन्ध एक तानाशाह द्वारा अपने खि़लाफ़ हर उस आवाज को चुप कराने की कोशिश है जो उनकी राजनीति पर सवाल खड़ा करती है। यह प्रतिबन्ध कोई पहला नहीं है। मोदी सरकार छात्रों और आम नागरिकों से उनके सांविधानिक हकों को किसी न किसी नाम पर छिनती रही है। अगर सरकार को नफ़रत फैलाने वालों से इतना परहेज़ है तो पहले वो साध्वी निरंजन ज्योति जैसे लोगों के खि़लाफ़ कोई कदम क्यों नहीं उठाती। भगवा ब्रिगेड जो कभी लव जिहाद, कभी गौ मांस पर प्रतिबन्ध, या घर वापसी की मुहीम के ज़रिये देश के लोगों के बीच नफ़रत के बीज बो रही है उनके खि़लाफ कोई कार्यवाही करने से क्यों कतराती हैं। क्यों वह आर.एस.एस  जो अपनी शाखाओं में खुलेआम साम्प्रदायिक ज़हर उगलता है, उस पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। 

बात साफ है ‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे‘ की तर्ज पर यह सरकार अब देश की जनता और युवाओं को यह चेतावनी देना चाहती है कि अगर उनके खि़लाफ कुछ भी कहा तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। इस सरकार का असली फ़ासीवादी चेहरा सामने आ रहा है। और फासीवाद का मुहतोड़ जवाब देने के लिए इस देश के सभी युवाओं को एक साथ मिलकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा। दिशा छात्र संगठन की वारुणी ने कहा ‘‘दिशा छात्र संगठन इस प्रतिबन्ध की कड़ी निंदा करता है और देश के तमाम न्यायप्रिय युवाओं से यह अपील करता है कि इस प्रतिबन्ध के खि़लाफ़ आवाज उठायें, क्योंकि साफ ज़ाहिर है कि यह सरकार तर्क और बहस से कितना डरती है। हमे अपने संवैधानिक हक़ों को इतनी आसानी से इन्हे कुचलने नहीं देंगे।‘‘

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

Ban on IIT madras student group : Death of democracy and dawn of the ‘aache din’

The recent ban by the authorities of IIT madras on the Ambedkar periyar study circle run by the students of  IIT-madras is a slap in the face of the democratic values so ardently professed by the largest democracy in the world. Disha Student organization condemns the ban in the strongest words possible. The reason putforth by the authorities of IIT for the ban is that the group is using the platform to spread ‘hatred’ against the Prime Minister. This ban took place after an anonymous letter to MHRD claimed that the pamphlets being circulated by the student group incite hatred against the PM. But if one looks at the content of the pamphlets in question here it would become clear why the group was banned. It was not inciting hatred by inviting a healthy discussion on the policies being implemented by the Government. The right to dissent and criticism are an integral part of a democracy and in no way criticising a government’s policies tantamounts to spreading hatred. Such bans are a threat to the freedom of expression and the right to free speech. This is not the first incident where there has been ban on students group or students being arrested on similar grounds. The farcicial democracy that we live in will only provide you space to speak up untill you are not questioning what is right and what is wrong as voltaire had said to learn who rules over you simply find out whom you are not allowed to criticise. With the new regime in power with its hindutva agenda at spearhead there are too many holy cows that we are supposed to not talk about. The message being given to the youth of the rest of the country is that keep quiet or else you bear consequences. We the students of this country have every right to debate, discuss and dissent on matters of socio-political importance, taking away that very right from us is implementing a dictatorial regime. This government is leaving no stone unturned to ensure that freedom  of expression is curbed if the point being expressed is not to their liking. Why is the governmnet not taking any action against Sadvi Niranjan jyoti for inciting hatred, why is the government so tolerant against the Saffron brigades attempt to polarize the people of this country in the name of Ghar wapasi, beef ban, love jihad. Why is the government not banning the R.S.S which in its shakas openly spews the venom of communal hatred.These are the real issues that Government needs to be addresing rather than jumping around and telling people who are asking pertinent questions to keep silent. These are the ‘acche din’ that were promised to us. The real facsict character of this regime is coming out in the open and it is not long when the mask would slip. The rise of such facsist powers is resistible but we the students and youth have to join our hands and work towards a society where free speech is not threatened. These are the real issues that Government needs to be addresing rather than jumping around and telling people who are asking pertinent questions to keep silent. These are the ‘acche din’ that were promised to us. Varuni from Disha Student organization said “We strongly condemn this ban and urge every conscientitous citizen of this country to raise their voice against this ban.”

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तो IIT दिल्ली के प्रमुख रघुनाथ शिवगाँवकर ने इसलिए दिया इस्तीफा

Satyendra Ps : भाजपा और संघ के लुटेरे किसी भी सही आदमी को रहने नहीं देंगे। सुब्रहमन्यम स्वामी 1972 और 1991 के बीच पढाए का मेहनताना 70 लाख रुपये देने के लिए IIT दिल्ली के प्रमुख रघुनाथ शिवगाँवकर पर दबाव बनाए हुए थे। पढ़ाते क्या होंगे पता नहीं लेकिन केन्द्रीय संस्थानों में भुगतान को लेकर कोई दिक्कत नहीं होती, सब जानते हैं! साथ ही रघुनाथ से कहा जा रहा था कि सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट अकादमी खोलने के लिए iit कैम्पस में जगह दी जाए!

पढ़ाने का सबूत देने पर iit भुगतान देने को तैयार भी था! सबूत न दिखाने पर डायरेक्टर को कैग पकड़ता! iit परिसर में तेंदुलकर के गिल्ली डंडा को iit डायरेक्टर बिलकुल राजी न थे! आखिरकार उन्होंने इस्तीफा दे दिया। अब आज कच्छा बनियान गिरोह आरोप लगा रहा है कि विदेश में अवैध कैम्पस खोल रहे थे iit डायरेक्टर! ये गिरोह सोचता था कि गीदड़ भभकी देकर रघुनाथ से 70 लाख रूपये ऐंठ लेगा लेकिन उन्होंने इस्तीफा दे दिया!

अब स्वामी मानव संसाधन विकास मंत्री बन सकते हैं। वजह ये कि एम्स में दवा की दलाली पर अंकुश लगाने वाले संजीव को दवा कम्पनियों के दलाल (ब्रोकर या डीलर कहें सम्मान में) जेपी नद्धा के कहने पर हटाया गया। फिर नद्धा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने। अब स्वामी की बारी है! देखते जाएं कि ये आरएसएस सरकार 5 साल में आम लोगों और उनके संस्थानों की क्या गति करती है!

अब तेंदुलकर कह रहे हैं कि मैंने कोई क्रिकेट अकादमी खोलने का प्रस्ताव नहीं किया! अगर iit जमीन दे देता तो महीन मुस्कुराते चले आते! आरएसएस भी चितपावन दबंगई दिखाने में कामयाब हो जाता! बहुत शातिर हैं सब।! संघी जो तर्क दे रहे हैं लचर है। अगर iit निदेशक चोर है और बचने के लिए इस्तीफा दिया तो क्या कच्छा बनियान गिरोह सरकार इस्तीफे के बाद जांच नहीं कराएगी? लेकिन भक्ति का चश्मा मोटा होता है।

पत्रकार सत्येंद्र प्रताप सिंह के फेसबुक वॉल से.

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