ऐसी-ऐसी खबरें गढ़ी जा रहीं जिनका कोई वजूद नहीं!

श्रीगंगानगर। समझ से परे है कि मीडिया/मीडिया कर्मियों को हुआ क्या है! ऐसी-ऐसी खबरें जिनका कोई वजूद नहीं! इसमें कोई शक नहीं कि कुछ खबरें होती हैं और कुछ वक्त की मांग के अनुसार गढ़ी भी जाती हैं, यूं कहिये की गढ़नी भी पढ़ती हैं, लेकिन गढ़ाई गढ़ाई जैसी तो हो! ये क्या कि सिर कहीं और पैर कहीं। बाबा गुरमीत सिंह राम रहीम और मंत्री परिषद के पुनर्गठन विषय पर मीडिया ने जो कुछ कहा, उसमें कब कितना सच था, सब सामने आ गया। झूठ, कोरे कयास और गढ़ाई सच की तरह परोसी जाती रही। आम जन के पास ऐसा कोई जरिया होता नहीं जो सच को जान सके। उसके  लिए तो मीडिया और मीडिया कर्मी ही भगवान होते हैं, ऐसे गरमा गरम विषयों पर।

बाबा के उत्तराधिकारी के संदर्भ मेँ क्या क्या ना छपा मीडिया मेँ और क्या नहीं दिखाया गया। गुप्त बैठक मेँ क्या हुआ, यह तक बता दिया। बैठक की जानकारी किसी को नहीं है, लेकिन मीडिया ने ये भी बता दिया कि उसमें हुआ क्या! कभी मुंह बोली बेटी को उत्तराधिकारी बताया तो कभी बेटे को। सभी कयास लगा लिए। सभी प्रकार की संभावना जता दी। सच के निकट एक भी नहीं। चूंकि बाबा के नाम पर आज के दिन हर खबर पढ़ी और देखी जाती है, इसलिए आने दो जो आ रहा है। जाने दो जो हवा मेँ जा रहा है। आखिर डेरा की ओर से आए वीडियो ने सच बता दिया कि ऐसा  कुछ भी नहीं है। जिसका जिक्र कहीं ना था, उसको खूब अधिकार थे।

बात यहाँ तक कि उत्तराधिकारी बनाने का कोई प्रस्ताव तक नहीं है। खैर! ये तो उस डेरे की बात है, जिसका मुखिया रेप के मामले मेँ सजा काट रहा है। अब बात नरेंद्र मोदी मंत्री परिषद के पुनर्गठन की। जबसे सरकार के  मुखिया ने पुनर्गठन के संकेत दिये, मीडिया मेँ सूत्रों का काम शुरू हो गया। पता नहीं कौन-कौन जानकारी देने के नाम पर मीडिया का मज़ाक बनाता  रहा, मज़ाक उड़ाता रहा। ये सच है कि मीडिया को अपने सूत्रों पर भरोसा करना पड़ता है, किन्तु ये भी तो देखो कि नरेंद्र मोदी हर बार अपने निर्णय से मीडिया को ही नहीं देश भर को चौंकाते रहे हैं, ऐसी स्थिति मेँ अपने सूत्र द्वारा दी गई जानकारी को क्रॉस चैक करने मेँ हर्ज क्या! किसी के मन मेँ क्या है, ये जान लेना असंभव है।

राजनीति मेँ किसी का अगला कदम क्या होगा, ये बता पाना नामुमकिन है। इसलिए कयास लगते रहे। संभावित नामों की घोषणा होती रही। बात वही, जो संभावित नाम मीडिया बता रहा था उसमें से इक्का दुक्का ही मोदी जी की असली लिस्ट मेँ थे। संभावित मंत्रियों के नामों वाली लिस्ट मेँ उन व्यक्तियों और नेताओं के नाम थे, जिनके आस पास तक भी मीडिया के कयास नहीं पहुँच पाए। ऐसा तो नहीं कि  मोदी जी मीडिया से कोई खेल ही खेल रहे हों, जो मीडिया कहे उसके अलग हट के किया जाए। राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव मेँ भी सेम टू सेम हुआ था। नए नाम। वो नाम, जिनके बारे मेँ मोदी जी के अलावा किसी ने सोचा तक नहीं होगा।

हरियाणा मेँ सीएम मनोहर लाल खट्टर होंगे, किसने बताया! कहीं एक लाइन भी ना तो बोली गई और प्रकाशित हुई थी। कितने ही उदाहरण है। इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति की हर खबर जन जन की पसंद होती है, किन्तु इसका मतलब ये तो नहीं कि इस पसंद के लिए वह परोस दिया जाए जो सच के आस पास ही ना हो। जनता मीडिया मेँ परोसे गई ऐसी खबरों को हर हाल मेँ सच मानती है, क्योंकि उसकी नजर मेँ मीडिया का हर शब्द सच के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। पता नहीं मीडिया और इस पवित्र काम से जुड़े व्यक्ति व्यक्तियों की किसी के प्रति कोई जवाबदेही भी होती है या नहीं। किसी और से नहीं तो खुद से तो होती ही होगी। भाई, किसी को बुरा लगा हो तो सॉरी। मगर इतना तो कहना ही पड़ेगा कि सच नहीं तो आधा सच तो हो। आधा सच नहीं तो कम से कम सच के निकट तो हो। दो लाइन पढ़ो-

उसकी आँखें जो गीली रहती है
कुछ ना कुछ तो जरूर कहती है।

लेखक गोविंद गोयल श्रीगंगानगर, राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क gg.ganganagar@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है.

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न्यूज़ चैनल ‘महाराष्ट्र वन’ के मुख्य संपादक बने निखिल वागले

आईबीएन-लोकमत के पूर्व संपादक निखिल वागले नए मराठी न्यूज़ चैनल महाराष्ट्र वन के संपादकीय प्रमुख होंगे। वह 1 सितंबर से अपना नया कार्यभार संभाल लेंगे। अक्टूबर तक महाराष्ट्र वन लॉन्च हो सकता है। उनके कई पूर्व सहयोगियों ने आईबीएन लोकमत से इस्तीफा दे दिया है और वे सितंबर के पहले सप्ताह से उनके साथ जुड़ जाएंगे। बताया गया है कि एबीपी माझा और ज़ी 24 तास से भी कई पत्रकार वागले के सहयोगी हो सकते हैं। 

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बेलगाम न्यूज चैनल : आतंकी से यारी, पड़ेगी भारी !

आतंकी याकूब मेनन की फाँसी की रात कुछ इलेक्ट्रानिक मीडिया की कवरेज वाकई आपत्तिजनक थी ! अब केंद्र सरकार ने कुछ चैनलो को नोटिस देकर जवाब माँगा है ! इसमें आज तक, ए बी पी न्यूज़ और एनडी टीवी शामिल है !

मेरा भी मत यही है कि उस दिन चैनल रास्ते से भटक गए और वो एक एक्टिविस्ट की भूमिका में आ गए ! चैनल उस दिन ऐसी भूमिका निभा रहे थे, जिससे देश में झगड़े फसाद हों ! इसलिए खास समय पर कैसे कवरेज हो, इस पर सरकार को एक गाइड लाइन बनानी ही चाहिए ! 

उस दिन नासमझ चैनल वालों ने भारत रत्न कलाम साहब की कोई बात ही नहीं की, याकूब को लेकर आँसू बहाते रहे ! BEA एक टाइम पास संस्था है , जब चैनल फंसते हैं तो सब जमा हो जाते हैं !

प्रधानमंत्री जी दोषी चैनल के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए !

आजकल किसी राधे माँ की टाँगे दिखा रहे हैं ! क्या संदेश देना चाहते हैं ? इन्हें जिम्मेदार बनाने के लिए लगाम कसने का बिलकुल सही समय है !

महेंद्र कुमार श्रीवास्तव के एफबी वाल से

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वाह- वाह : ‘हिंदुस्तान’ की कसम, खबरें रिपीट करेंगे हम !

लगता है कि दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान ने पुराना मैटर रिपीट करने की कसम खा रखी है। हिन्दुस्तान के 31 जुलाई के अंक के पेज नंबर 11 (हेल्थ तरक्की) में जो सुडोकू 3503 नंबर से प्रकाशित किया गया है, वही सुडोकू 27 जुलाई के पेज नंबर 11 (जीने की राह) पर 3499 नंबर से पहले ही प्रकाशित किया जा चुका है। इतना ही नहीं सुडोकू नं. 3499 का जो उत्तर 28 जुलाई के पेज नं. 11 (धर्मक्षेत्रे) पर छपा है, वही उत्तर 01 अगस्त के पेज नं 11 (मनोरंजन) पर 3503 नंबर से प्रकाशित किया गया है।

हिन्दुस्तान में मैटर रिपीट करने का यह कोई पहला केस नहीं है। इससे पहले भी सुडोकू रिपीट हो चुका है। मार्च 2015 में भी हिन्दुस्तान एस्टेट सप्लीमेंट में 2013 में छपा एक पूरा का पूरा पेज ज्यों का त्यों छाप दिया गया था। इस संदर्भ में दो लोगों का नाम सामने आया था, हिन्दुस्तान एस्टेट पेज के प्रभारी विजय मिश्रा और उनको मैटर सप्लाई करने वाले विभाग के ही एक पत्रकार राजीव रंजन। 

इसकी सजा के तौर पर हिन्दुस्तान के प्रधान संपादक आदरणीय श्री शशि शेखर जी ने दो पत्रकारों को रिजाइन करने के लिए मजबूर कर दिया था, पर श्रीमान राजीव रंजन फीचर विभाग की प्रभारी की कृपा दृष्टि के चलते साफ-साफ बच गए थे। बाद में इन्हीं राजीव रंजन साहब को प्रमोशन दे कर चीफ सब एडिटर भी बना दिया गया। 

ज्ञात हो कि हिन्दुस्तान फीचर विभाग की प्रभारी जयंति रंगनाथन हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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ये है जागरण के पत्रकार की राजनीतिक समझ का तकाजा

दैनिक जागरण के दिल्ली ब्यूरो का ज्ञान भी अजीब है. चा अगस्त के अंक में ‘पी एम ने विपक्ष की ओर बढ़ाया हाथ’ न्यूज़ में एक छोटी न्यूज़ लगी है.”पुराना रहा है निलंबन का इतिहास”. इसमें 1989 में लोक सभा का स्पीकर एच के एल भगत को बताया गया है.

गौरतलब है कि एच के एल भगत कभी स्पीकर नहीं रहे. हां बलिराम भगत जरूर स्पीकर रहे 15 जनवरी 76  से 25 मार्च  77 तक. वर्ष 1989 में बलराम जाखड़ स्पीकर थे. भारत का नंबर एक अख़बार कहलाने वाले दैनिक जागरण प्रबंधन को इन सब त्रुटियों को हलके में नहीं लेना चाहिए . कम्पटीशन की तैयारी कर रहे छात्र इस अख़बार से क्या सीखेंगे?

कुलदीप सिद्धू के एफबी वाल से

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देहरादून में वरिष्ठ पत्रकार अशोक पांडेय का मकान ढहाया गया

देहरादून : उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के निजी सचिव आईएएस मोहम्मद शाहिद का स्टिंग ऑपरेशन करने वाले पत्रकार अशोक पांडेय का घर मंगलवार को मसूरी-देहरादून डिवेलपमेंट अथॉरिटी ने ढहा दिया। स्टिंग में शाहिद राज्य में शराब की बिक्री संबंधी नीतियों को बदलने के लिए रिश्वत की मांग करते दिखाए गए थे।

शासकीय सूत्रों के मुताबिक अशोक पांडेय ने अवैध तरीके से अपने मकान का निर्माण कराया था। उनको वर्ष 2012 में इस बारे में अवगत करा दिया गया था। मकान के अवैध हिस्से को पुलिस और संबंधित अधिकारियों के सामने तोड़ा गया।

गौरतलब है कि अशोक पांडेय दैनिक जागरण और अमर उजाला में लंबे समय तक शीर्ष पद पर रहे हैं। मकान को तोड़ने का आदेश 10 जुलाई को जारी किया गया और नियमों के मुताबिक पांडेय को बताया भी गया था। स्टिंग के बाद अशोक पांडेय ने अपनी जान का खतरा बताया था। पांडेय का कहना है कि स्टिंग के कारण ही उनका मकान तोड़ा गया है। 

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कलाम और याकूब की खबरों के साथ खिलवाड़ की आलोचना

याकूब मेमन की फांसी और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम के निधन से जुड़ी खबरों पर इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया के रवैये को लेकर देश के बौद्धिक जगत में जमकर आलोचना का सिलसिला सोशल मीडिया पर अभी थमा नहीं है। 

 

आलोचना इस बात की रही कि उस दिन की खबरों में उन्हें प्राथमिकता की दृष्टि से किसे महत्व दिया। ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ ने अपने फर्स्ट पेज पर याकूब मेमन को टॉप न्यूज का स्थान दिया था और कलाम की खबर को मामूली स्थान दिया था। इंडियन एक्‍सप्रेस ने याकूब की खबर को लीड प्रजेंटेशन दिया और कलाम की खबर को अन्य पेज पर महत्व दिया था। 

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ये तुमने क्या कर दिया ‘द ट्रिब्यून’

यक़ीनन अंग्रेजी अख़बार द ट्रिब्यून विश्वसनीय अख़बार है, लेकिन कितना ? प्रतियोगिता की इस अंधी होड़ में द ट्रिब्यून भी बिना परखे सुनी सुनाई खबरें लगा रहा है। द ट्रिब्यून ने सोमवार को लुधियाना एडिशन में खबर प्रकाशित की कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष जत्थेदार अवतार सिंह मक्कड़ के बारे में आपत्तिजनक मैसेज भेजने पर अकाली पार्षद कंवलजीत सिंह कड़वल पर पुलिस ने एफ.आई.आर दर्ज की है।

 

ट्रिब्यून ने लिखा कि इस बारे में काफी कोशिश करने के बावजूद न तो कड़वल से बात हो पाई न ही मक्कड़ से। अगले दिन पता चला कि कड़वल पर कोई एफ.आई.आर दर्ज ही नहीं हुई है। ट्रिब्यून जिस खबर को अपनी एक्सक्लूसिव मान रहा था, उसी खबर के कारण उसकी किरकरी हुई और कड़वल ने ट्रिब्यून के दफ्तर में जा कर जो खरी खोटी सुनाई वो अलग। अगले दिन खबर दुरुस्त करके लगाई गयी।

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सीएम के जिले में थानेदार की गुंडई, कोर्ट का आदेश ठेंगे पर रखकर पत्रकार की जमीन पर कब्जा करा दिया

नालंदा (बिहार) जिले का नगरनौसा-चंडी अंचल क्षेत्र सुशासन बाबू के नाम से मशहूर बिहार के सीएम नीतिश कुमार के गृह जिले की राजनीति का एक प्रभावशाली अंग माना जाता है लेकिन यहां सुशासन का जो ताजा दृश्य सामने है, वह आम जनता की अंतरात्मा को अंदर तक झकझोर जाता है। एक गुंडा थाना प्रभारी ने कोर्ट के आदेश को परे रखकर पत्रकार की जमीन पर कब्जा करा दिया। 

ऐसे तो सुशासन के ढोल की पोल खोलने वाले सैकड़ों उदाहरण हैं लेकिन वरिष्ठ वेब पत्रकार मुकेश भारतीय से जुड़े ताजा मामले ने सीधे सुशासन बाबू पर ही सवाल खड़ा कर जाता है क्योंकि भारतीय द्वारा सीएम नीतिश कुमार से कई बार हर संभव माध्यमों द्वारा शिकायत भेजी गई लेकिन फोनिक आश्वासनों के सिवा कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इन दिनों झारखंड की राजधानी रांची में रह रहे भारतीय ने नगरनौसा अंचल के तात्कालीन सीओ दिव्या आलोक को लिखित आवेदन दिया। आवेदन में उन्होंने गांव के असामजिक तत्वों द्वारा उनकी पैत्रिक जमीन पर अतिक्रमण किये जाने की शिकायत करते हुए जमीन मापी करा कर सीमाकंन की मांग की लेकिन इधर जैसे ही सीओ की मापी प्रक्रिया शुरु हुई, उधर विरोधियों ने भूमि के एक हिस्से पर पक्का निर्माण कार्य शुरु कर दिया। इस दौरान भारतीय ने सीओ को बिना नापी के निर्माण कार्य होने की सूचना दी। हर बार सीओ संबंधित चंडी थाना प्रभारी धर्मेन्द्र कुमार को मापी होने तक वस्तुस्थिति कायम रखने के निर्देश देते रहे और थाना प्रभारी उस हर निर्देश को रद्दी की टोकरी में फेंकते रहे।

करीब ती माह तक यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान उक्त भूमि पर  मकान की पक्की दीवार उठा ली गई। प्रथम एवं अन्य पक्षों के नीजी अमीनों की मौजूदगी में सरकारी अमीन की नापी के सीओ ने सीमांकन की कार्यवाही की गई। उसके बाद एसडीओ, हिलसा कोर्ट में शिकायत की गई। एसडीओ ने मामले की सुनवाई करते हुए उक्त भूमि पर धारा 144 लगा दी और चंडी थाना प्रभारी को फैसला होने तक वस्तुस्थिति बनाये रखने के निर्देश दिए। एसडीओ के इस आदेश का पालन भी थाना प्रभारी ने नहीं किया और उसके हस्ताक्षर से कोर्ट को यह सूचना भेजी गई कि वहां 144 जैसी कोई स्थिति नहीं है और विवादित स्थल पर कोई निर्माण कार्य नहीं किया गया है। जबकि सच्चाई यह है कि धारा 144 लागू होने के दौरान विरोधी पक्ष ने चंडी थाना पुलिस के खुली संरक्षण और गांव के असमाजिक तत्वों की मदद से उक्त भूमि पर पक्का मकान की ढलाई कर ली गई।

उसके बाद भारतीय ने हिलसा एसडीओ कोर्ट में पुलिस की रिपोर्ट को मनगढ़ंत और झूठी होने की चुनौती दी। उसके बाद हिलसा एसडीओ ने चंडी के सीओ राजीव रंजन को घटनास्थल पर जाकर त्वरित जांच रिपोर्ट देने को कहा। चंडी सीओ ने न सिर्फ उक्त मकान पर धारा 144 के दौरान पक्का मकान बना डालने की पुष्टि की बल्कि मौके पर निर्माण कार्य कर रहे कई राजमिस्त्रियों और मजदूरों को भी पकड़ा और उन्हें बतौर गवाह रिपोर्ट दर्ज की।

चंडी, सीओ के इस रिपोर्ट के बाद विवादित स्थल पर दो चौकीदार तैनात कर दिए गए। फिर भी उक्त स्थल से छेड़छाड़ होती रही। कई काम किए गए। चंडी सीओ के जांच के नव ढली मकान में सेंटिंग के पटरे लगे थे, जिसे थाना प्रभारी ने वगैर किसी लिखित आदेश के अचानक चौकीदार को हटा कर दिनदहाड़े खुलवा दिया। थाना प्रभारी के खुला संरक्षण का आलम यह है कि तमाम आदेश-निर्देश के बावजूद समाचार प्रेषण तक उक्त जमीन की बोरिंग पर दबंगों द्वारा अवैध बिजली के सहारे चोरी के मोटर पम्प चलाए जा रहे हैं।

अब देखना हैं कि नालंदा के डीएम, एसपी से लेकर सीएम तक की इस मामले पर बरती गई उदासीनता की चपेट में सुशासन और मुकेश भारतीय के मामले का आलम क्या होता है। फिलहाल, एक तरफ इस प्रक्ररण में एसडीओ कोर्ट से तारीख पर तारीख मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ जातीयता के चरम पर एक चंडी थाना प्रभारी की गुंडागर्दी सर चढ़कर बोल रहा है।  

पत्रकार मुकेश भारतीय से संपर्क : nidhinews1@gmail.com

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हर ख़बर को दूसरी ख़बर से जोड़कर बुलेटिन बनाने के आदती हैं पुण्य प्रसून बाजपेयी

टीवी चैनलों में लिंक न्‍यूज़ का प्रयोग Punya Prasun Bajpai ने किया था। उनकी आदत है कि हर ख़बर को दूसरी ख़बर के साथ जोड़कर बुलेटिन बनाते हैं ताकि एक परिप्रेक्ष्‍य निर्मित हो सके। इसीलिए आज सुबह जब वे रामेश्‍वरम और मुंबई को अलग-अलग दिखा रहे थे, तब मैंने उन्‍हें एक एसएमएस किया कि क्‍यों न दो विंडो में रामेश्‍वरम और मुंबई को एक साथ दिखाया जाए और याकूब व कलाम की मौत को लिंक कर के बात की जाए।

उनका जवाब तो नहीं आया, लेकिन ‘डेलीओ’ नाम की वेबसाइट पर नदीम असरार का एक यह बेहतरीन लेकिन छोटा सा लेख ज़रूर दिख गया, जिसमें ऐसी कुछ कोशिश है। मुझे लगता है कि आज देश में मनाई जा रही दो मौतों को एक साथ रखकर देखा जाना चाहिए। जल्‍दबाज़ी में किया गया तर्जुमा है, लेकिन मौका निकाल कर ज़रूर पढ़ें।

एक आततायी भीड़ का शोकगान (नदीम असरार) : आज भारत के सामने नैतिक रूप से दो परस्‍पर विरोधाभासी घटनाएं घट रही हैं : पहली, 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के दोषी याकूब मेनन को उसके 54वें जन्‍मदिवस पर दी गई फांसी; और दूसरी, कुछ घंटों बाद मिसाइल मैन व पीपुल्‍स प्रेसिडेंट एपीजे अब्‍दुल कलाम की राजकीय सम्‍मान के साथ अंत्‍येष्टि, जो किसी भी राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेता के मामले में की गई एक दुर्लभ व अभूतपूर्व खुशामद है।  

एक ही दिन सजे मौत के ये दो रंगमंच एक ऐसे देश के लिए संभवत: बड़े सूक्ष्‍म रूपक का काम करते हैं जहां एक विशिष्‍ट ताकत के सत्‍ता में आने में के बाद उभरा एक विशिष्‍ट विमर्श अब पर्याप्‍त ज़मीन नाप चुका है। कलाम और मेमन नाम के इन दो भारतीय मुसलमानों का सफ़र और उनकी मौत एक ऐसा आईना है जिसमें हम भारतीय धर्मनिरपेक्षता की चारखानेदार चाल के कई अक्‍स एक साथ आसानी से देख सकते हैं।

हिंदुत्‍व के निर्मम और अनवरत हमले के बोध से घिरे तमाम भारतीयों को अब दोनों पर सवाल खड़ा करने से रोकना मुश्किल जान पड़ रहा है- एक, कलाम का राजकीय सम्‍मान और दूसरा, मेमन की राजकीय हत्‍या।

मिसाइल वैज्ञानिक कलाम को अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने राष्‍ट्रपति पद के लिए चुना था। वे उस राष्‍ट्रवादी सत्‍ता के लिए आदर्श चुनाव थे जिसका लक्ष्‍य आक्रामक तरीके से सैन्‍य एजेंडे को हासिल करना था। चूंकि वे एक ऐसे तमिल मुसलमान थे जिनकी छवि अपनी धार्मिकता को खारिज करने से बनी थी और उस तत्‍व को प्रदर्शित करने पर टिकी थी जिसे उनके चाहने वाले दक्षिणपंथी लोग ”भारतीय” जीवनशैली करार देते हैं, लिहाजा उनको चुना जाना बीजेपी के लिए मददगार ही साबित हुआ।

कलाम को जुलाई 2002 में भारत का राष्‍ट्रपति चुना गया था। यह गुजरात के नरसंहार के महज कुछ महीने बाद की बात है। मौजूदा प्रधानमंत्री के राज में उस वक्‍त तक राज्‍य में नफ़रत की आग फैली हुई थी। अपेक्षया समृद्ध गुजरात के बीचोबीच खड़े तमाम राहत शिविर लगातार आंखों में गड़ रहे थे और नरसंहार के शिकार लोग अब भी गुजरात और बाहर की अदालतों के दरवाजे खटखटा रहे थे।

गुजरात ने वाजपेयी की छवि को भी काफी नुकसान पहुंचाया था क्‍योंकि वे तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ कोई कार्रवाई कर पाने में नाकाम रहे थे। इतना ही नहीं, नरसंहार के कुछ महीने बाद गोवा में एक कुख्‍यात भाषण में उन्‍होंने हिंसा को जायज़ तक ठहरा दिया था। उन्‍हें अपना रेचन करने की जरूरत थी। कलाम इसके काम आए। अगले दो साल तक जब तक वाजपेयी सत्‍ता में रहे, कलाम ने अपना किरदार हॉलीवुड के क्‍लासिक ”ब्‍लैक साइडकिक” की तर्ज़ पर बखूबी निभाया।

बाकी की कहानी इतिहास है। इसके बाद यह शख्‍स अपने व्‍याख्‍यानों, पुस्‍तकों और प्रेरक उद्धरणों के सहारे चौतरफा रॉकस्‍टार बन गया, जिसका निशाना खासकर युवा आबादी थी। इस प्रक्रिया में कलाम ने अधिकांश मौकों पर उन तमाम जातिगत और वर्गीय संघर्षों की ओर से अपनी आंखें मूंदे रखीं जिनका सामना इस देश के युवा कर रहे थे।

चाहे जो भी रहा हो, लेकिन रामेश्‍वरम से लेकर रायसीना तक कलाम का शानदार उभार इसके बावजूद एक समावेशी भारतीय किरदार का उदाहरण बन ही गया, जैसा कि सोशल और मुख्‍यधारा के मीडिया में उनकी मौत पर गाए जा रहे सामूहिक शोकगान से ज़ाहिर होता है।   

बिलकुल इसी बिंदु पर याकूब मेनन की विशिष्‍टता उतनी ही मर्मस्‍पर्शी बन जाती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो राज्‍य को हत्‍याओं और सामूहिक हत्‍याओं में फर्क बरतने की सहूलियत देती है। एक ऐसी विशिष्‍टता, जो हमारी राष्‍ट्रीय चेतना में अपने और पराये की धारणा को स्‍थापित करती है।

आज के भारत में मौत की सज़ा का विरोध करना उदारवादियों का एक प्रोजेक्‍ट बन चुका है। (और उदारवादियों पर हमेशा ही उनके भारत-विरोधी षडयंत्रों के लिए संदेह किया जाता रहा है।)

इससे भी बुरा हालांकि यह है कि राजकीय हत्‍याएं हमेशा उन विवरणों से प्रेरित होती हैं जिनका उस मुकदमे से कोई लेना-देना नहीं होता जिसके तहत दोषी को लटकाया जाता है। प्रत्‍येक हत्‍या एक संदेश होती है, और हर मामले का विवरण इतना मामूली बना दिया जाता है कि उस पर कोई कान नहीं देता।

यही वजह है कि आततायियों की जो भीड़ नागपुर में मेमन को लटकाए जाने का इंतज़ार भी नहीं कर पा रही थी, वह उस हिंसा और नाइंसाफी को संज्ञान में लेने तक को तैयार नहीं है जिसने मेमन को पहले पहल पैदा किया। उनकी आवाज़ें इतनी दहला देने वाली हैं कि उसमें मुसलमानों (और उदारवादियों) के निहायत ज़रूरी सवाल दब गए हैं: 

”आखिर 1992-93 के मुंबई दंगों का क्‍या हुआ?”

”क्‍या श्रीकृष्‍ण आयोग की रिपोर्ट को लागू किया गया?”

”मुंबई में हुई 900 से ज्‍यादा मौतों के लिए क्‍या राज्‍य ने बाल ठाकरे और उनकी शिव सेना पर मुकदमा चलाया?”

”मुकदमा?” वे मज़ाक उड़ाते हुए कहते हैं, ”हमने तो पूरे राजकीय सम्‍मान के साथ ठाकरे को विदाई दी थी।”  

”अच्‍छा, क्‍या वही सलाम जो अब कलाम को मिलने वाले हैं?”

चुप…।  

अभिषेक श्रीवास्‍तव के एफबी वाल से 

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‘यूएसए टुडे’ की वो खबर, जिससे पूरे देश की धड़कनें तेज

‘यूएसए टुडे’ की वो खबर, जिसने पूरे भारत की धड़कनें तेज कर दी हैं। दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवाद संगठन इस्लामी स्टेट (आईएस) भारत पर हमले की साजिश रच रहा है। संगठन के एक दस्तावेज के मुताबिक अमेरिका को आर-पार की जंग के लिए उकसाने के मकसद से वह ऐसा कर रहा है। आईएस पाकिस्तान और अफगान तालिबान के दर्जनों धड़ों को मिलाकर एक नई सेना बनाने में जुटा है। उसके 32 पेज के दस्तावेज के आधार पर यूएसए टुडे अखबार में मंगलवार को प्रकाशित खबर इस समय दुनिया भर के मीडिया में तैर रही है। दस्तावेज से पता चला है कि अगर अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर हमला करने की कोशिश करता है तो उससे मुसलमान एकजुट होंगे।

‘यूएसए टुडे’ में ‘Islamic State recruitment document seeks to provoke ‘end of the world’ शीर्षक से प्रकाशित खबर की फोटो साभार

‘यूएसए टुडे’ में कहा गया है कि तीन अमेरिकी खुफिया अफसरों ने दस्तावेज की समीक्षा की है। उनका मानना है कि दस्तावेज असली हैं। इसमें खास तथ्यों और नेताओं का विवरण देने में इस्तेमाल की गई जुबान, लेखन शैली और ऐसे धार्मिक शब्द हैं जो आईएस के अन्य दस्तावेजों से पूरी तरह मेल खाते हैं।

‘यूएसए टुडे’ में प्रकाशित पूरी खबर अंग्रेजी में इस प्रकार है – 

Islamic State recruitment document seeks to provoke ‘end of the world’

An apparent Islamic State recruitment document found in Pakistan’s lawless tribal lands reveals that the extremist group has grand ambitions of building a new terrorist army in Afghanistan and Pakistan, and triggering a war in India to provoke an Armageddon-like “end of the world.”

The 32-page Urdu-language document obtained by American Media Institute (AMI) and reviewed by USA TODAY details a plot to attack U.S. soldiers as they withdraw from Afghanistan and target American diplomats and Pakistani officials.

AMI obtained the document from a Pakistani citizen with connections inside the Pakistani Taliban and had it independently translated from Urdu by Harvard researcher and translator Mustafa Samdani. The Pakistani’s identity was shared with USA TODAY, which has agreed not to identify him publicly because of concerns for his safety.

The document was reviewed by three U.S. intelligence officials, who said they believe the document is authentic based on its unique markings and the fact that language used to describe leaders, the writing style and religious wording match other documents from the Islamic State, also known as ISIL and ISIS. They asked to remain anonymous because they are not authorized to discuss the matter publicly.

The undated document, titled “A Brief History of the Islamic State Caliphate (ISC), The Caliphate According to the Prophet,” seeks to unite dozens of factions of the Pakistani and Afghan Taliban into a single army of terror.  It includes a never-before-seen history of the Islamic State, details chilling future battle plans, urges al-Qaeda to join the group and says the Islamic State’s leader should be recognized as the sole ruler of the world’s 1 billion Muslims under a religious empire called a “caliphate.”

“Accept the fact that this caliphate will survive and prosper until it takes over the entire world and beheads every last person that rebels against Allah,” it proclaims. “This is the bitter truth, swallow it.”

Retired Defense Intelligence Agency Director Lt. Gen. Michael Flynn, who also reviewed the document, said it “represents the Islamic State’s campaign plan and is something, as an intelligence officer, I would not only want to capture, but fully exploit. It lays out their intent, their goals and objectives, a red flag to which we must pay attention.”

Alistair Baskey, deputy spokesman for the White House’s National Security Council, told AMI, “we are aware of the presence of ISIL-affiliated militants in Afghanistan, and we are monitoring closely to see whether their emergence will have a meaningful impact on the threat environment in the region.”

The Taliban is another radical Islamic group that ruled Afghanistan until ousted during the U.S. invasion in 2001. It continues fighting the current Afghan government and also trying to thwart the Islamic State’s expansion into Afghanistan.

The document warns that “preparations” for an attack in India are underway and predicts that an attack will provoke an apocalyptic confrontation with America: “Even if the U.S tries to attack with all its allies, which undoubtedly it will, the ummah will be united, resulting in the final battle.” The word “ummah” refers to the entire global community of Muslims.

Striking in India would magnify the Islamic State’s stature and threaten the stability of the region, said Bruce Riedel, a senior fellow with the Brookings Institution who served more than 30 years in the CIA. “Attacking in India is the Holy Grail of South Asian jihadists.”

Pakistan Foreign Secretary Aizaz Chaudhry said the Islamic State threat in Pakistan was discussed with White House, State Department and Pentagon officials in June. He told reporters at the Pakistani Embassy in June that successful allied military operations have scattered the Pakistani Taliban.

Chaudhry denied there is an Islamic State presence in Pakistan. It could be “a potential threat for the whole world, for our region too, for our country too,” he said. “We believe that all countries need to cooperate, and Pakistan, yes.”

Unlike al-Qaeda, which has targeted terror attacks on the United States and other western nations, the document said Islamic State leaders believe that’s the wrong strategic goal. “Instead of wasting energy in a direct confrontation with the U.S., we should focus on an armed uprising in the Arab world for the establishment of the caliphate,” the document said.

So far, the U.S. strategy has been limited to fighting the militant group in Iraq and Syria, ordering limited airstrikes and deploying trainers to strengthen Iraqi security forces.

Meanwhile, the Islamic State has recruited tens of thousands of fighters and sympathizers from around the world.

The failure to target the radical Islamic ideas behind the group has given its fighters the opportunity to spread, Flynn said. “If I were in their shoes, I would say,’We are winning, we are achieving our objectives,’” Flynn said. “They have demonstrated an incredible level of resiliency and they will not be defeated by military means alone.”

‘USA TODAY’ से साभार

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पंजाब में आतंकी अटैक के लाइव टीवी प्रसारण पर सूचना मंत्रालय ने दी कार्रवाई की चेतावनी

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने न्यूज और करेंट अफेयर्स चैनलों को आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन की कवरेज के संबंध में जारी एक तात्कालिक हिदायत में कहा है कि आज पंजाब के गुरदासपुर में आतंकवाद विरोधी अभियान का कुछ न्यूज और करेंट अफेयर्स चैनलों ने प्रसारण किया। यह प्रसारण वहां नियुक्त अधिकारी के अनुमति के बिना उस समय प्रसारित किया गया, जब ऑपरेशन उस समय चल रहा था।   

गौरतलब है कि केबल टेलिविजन नेटवर्क (संशोधन) नियम, 2015 में कहा गया है कि सुरक्षा बलों द्वारा यदि किसी आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन को अंजाम दिया जा रहा हो तो उसकी लाइव मीडिया कवरेज नहीं की जाएगी बल्कि टेलिविजन चैनल सिर्फ अभियान की समाप्ति के बाद सरकार की तरफ से नियुक्त अधिकारी द्वारा समय-समय पर दी जाने वाली जानकारी को ही दिखा सकते हैं।

मंत्रालय ने कहा है कि इस तरह का प्रसारण केबल टेलिविजन नेटवर्क (संशोधन) नियम, 2015 का स्पष्ट उल्लंघन है। इस आधार पर ये कार्रवाई के लिए उत्तरदायी है। मंत्रालय ने चैनलों से इस तरह की हरकतों को तुरंत प्रभाव से बंद करने को कहा है।

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इतनी घटिया हरकत से भी बाज नहीं आ रहा घबराया हुआ जागरण प्रबंधन

जागरण कर्मियों की एकजुटता से घबराया हुआ प्रबंधन कितनी गिरी हुई हरकत कर सकता है। इसका एक सटीक उदाहरण हाल ही में सामने आया है। 

दैनिक जागरण ने दिल्‍ली यूनिट की रजत जयंती के अवसर पर 17 जुलाई की शाम को संस्‍थान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। प्रबंधन के रवैये से नाराज ज्‍यादातर कर्मियों ने इस कार्यक्रम का स्‍वेच्‍छा से बहिष्‍कार किया था। तब प्रबंधन ने आननफानन में 25 साल पूरा कर चुके कर्मियों को 1100 रुपये से सम्‍मानित करने की घोषणा की, जिसे लेने के लिए भी कर्मी नहीं गए।

इसके अगले दिन इस पुरस्‍कार राशि को बांटने की जिम्‍मेदारी लेखा विभाग को सौंप दी गई। जागरण के एक साथी जिन्‍हें यह राशि मिलनी थी, ने लेखा विभाग के अधिकारी से फोन पर बातचीत के दौरान इसका सदुपयोग लंबे समय से टूटी रही टायलेट शीट को ठीक करवाने के लिए कर दिया। उनके इस अनुरोध को अभद्र व्‍यवहार मानते हुए पसर्नल विभाग ने नोटिस जारी कर दिया। जागरण कर्मियों का कहना है कि यहां का शौचालय और उसकी कैंटीन ही बयां कर दे देती है कि प्रबंधन उनका कितना ध्‍यान रखता है।

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विधायक के खिलाफ खबर को हजम कर गया पंजाब केसरी का ब्यूरो चीफ

भिवानी (हरियाणा) : सुबह-सुबह चाय की प्याली के साथ सच दिखाते हैं हम, लेकिन खबर नहीं दिखाते। विधायक के खिलाफ खबर को ही हजम कर गया ब्यूरो चीफ। पत्रकारों व राजनीतिज्ञों का चोली दामन का साथ रहा है लेकिन अपने स्वार्थ के लिए पत्रकार राजनेताओं का यस मैन बन जाए और वहीं खबर प्रकाशित करें जोकि उसको सजती हो तो इसे क्या कहेंगे। 

भिवानी में भी एक ऐसा मामला देखने को मिला जब पंजाब केसरी अखबार ने एक ऐसी खबर की एक लाईन भी छापना उचित नहीं समझा जोकि उससे ज्यादा प्रसार संख्या के अखबार भास्कर, जागरण, अमर उजाला व हरिभूमि ने अपने लोकल संस्करण की लीड बनाई हो। भिवानी जनपद के गांव नौरंगाबाद में हलका विधायक घनश्याम सर्राफ से नाराज होकर ग्रामीणों ने भिवानी-दिल्ली मार्ग पर जाम लगा दिया था। 

इस खबर को भास्कर, जागरण, अमर उजाला व हरिभूमि ने अपने लोकल संस्करण में लीड पर छापा जबकि विधायक प्रेम में वशीभूत अखबार के ब्यूरो चीफ ने खबर छापना तो दूर बल्कि एक लाईन भी इस प्रमुख खबर पर नहीं लिखी। चर्चाएं हैं कि अखबार का रिपोर्टर विधायक का अघोषित पी.आर.ओ है। विधायक की खबरें भेजने से प्रकाशित करवाने तक का सारा ठेका इस ब्यूरो चीफ के पास है तथा इसकी एवज में उसे मानदेय भी मिलता है। बताया जा रहा है कि इसी के चलते ब्यूरो चीफ ने यह खबर भेजने से गुरेज किया। 

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पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा टाइम्स ऑफ इंडिया!

दो-चार दिनों से बहुत परेशान हूं। वजह है अखबारों की समझ, अदा, शैली और उनकी संवेदनशीलता। लगातार मनन-चिन्‍तन के बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अब बोलना जरूरी है। यह है लखनऊ से प्रकाशित अखबार टाइम्‍स ऑफ इण्डिया। विश्‍वविख्‍यात है, और अंग्रेजी-दां लोगों का पसन्‍दीदा भी। पांच महिलाओं की लाश की जगह एक महिला से जुड़ी हस्तमैथुन की खबर को तूल दे रहा है ये अखबार।

दिल्‍ली की एक खबर इस अखबार में दो पन्‍नों में अलग-अलग छापी है। मजमून यह है कि दिल्‍ली में जब एक युवती को साथ लेकर एक टैक्‍सी-ड्राइवर जा रहा था, अचानक उसने उस युवती की ओर कामुक मुस्‍कुराहट फेंकते हुए हस्‍त-मैथुन करना शुरू कर दिया। इस पर इस युवती ने विरोध किया और गाड़ी रुकवा कर चली गयी। बाद में उसने सोशल साइट्स पर हल्‍ला मचाया तो टैक्‍सी-मालिक ने उस ड्राइवर को बर्खास्‍त कर दिया। हैरत की बात है कि इस युवती ने अब तक पुलिस को इसकी सूचना देने की जरूरत नहीं समझी। 

मेरी समझ में नहीं आता है कि लखनऊ में मोहनलालगंज में एक साल पहले बरामद हुई रक्‍तरंजित युवती की लाश और उसके बाद ताबड़-तोड़ पांच अन्‍य युवतियों की लाश पर अपनी चिन्‍ता जताने के बजाय इस अखबार ने दिल्‍ली में हस्‍तमै‍थुन की घटना को इतना तूल क्‍यों दिया। क्‍या इसलिए कि लखनऊ में बरामद हुई युवतियों की लाशें बेहद गरीब परिवार की थीं और जो ड्राइवर के हस्‍तमैथुन और उसकी मुस्‍कुराहट से तिलमिला गयी थी, वह कम से कम एक हजार रूपये टैक्‍सी वाले को देने वाली थी।

मुझे खुद पर शर्म आ रही है कि मैं इस समय महिला-अस्मिता के आर्थिक मूल्‍यांकन जैसा घटिया काम कर रहा हूं। लेकिन टाइम्‍स ऑफ इण्डिया क्‍या कर रहा है दोस्‍तों

कुमार सौवीर के एफबी वाल से

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पांच दिनो की हड़ताल का बहाना लेकर सहारा के वकील सिब्बल पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, नोएडा में मंगलवार शाम तक तनाव बरकरार

दिल्ली : एक तरफ कर्मचारियों को छह-छह महीने से तनख्वाह नहीं, दूसरी तरफ अथाह दौलत में खेलते मालिकान और ऊंची सैलरी से ऐशो आराम का जीवन जी रहे कंपनी के आला अधिकारियों का मीडिया तमाशा पांच दिनो की हड़ताल से अब लड़खड़ाने लगा है। कंपनी के सर्वेसर्वा दिल्ली के तिहाड़ जेल से अपना अंपायर चला रहे हैं। ऐसी विडंबनापूर्ण स्थिति शायद ही दुनिया भर में किसी भी मीडिया घराने की होगी। उधर, सहारा के वकील एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में सहारा में तालाबंदी का हवाला देते हुए हलफनामा दे दिया है। कोर्ट को बताया गया है कि मीडिया हाउस पर तालाबंदी पहले से है और इससे कर्मचारी गुस्से में हैं। संभवतः कोर्ट में कानूनी खेल खेलने के उद्देश्य से ऐसा कहा गया है। इससे ये भी अंदेशा लगाया जा रहा है कि प्रेसर बनाकर ये कही सेबी के देय से मुक्त होने और सुब्रत रॉय को मुक्त कराने का षड्यंत्र तो नहीं है। मंगलवार को दिल्ली में सहारा प्रबंधन और कर्मियों से वार्ता हुई है। सहमति पर मतैक्य नहीं हो सका है। 

नोएडा मुख्यालय में हड़ताल और लखनऊ, देहरादून, पटना, वाराणसी यूनिटों में मीडिया कर्मियों के बहिष्कार का अब साफ असर सहारा के मीडिया तंत्र पर गहराने लगा है। समूह इन दिनो गर्दिश के दौर से गुजर रहा है। अखबार के अलावा न्यूज चैनलों पर भी सिर्फ पुराने फीचर प्रसारित हो रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी 11 जुलाई से अपडेट होना बंद हो चुका है। कर्मचारियों को जो आधा-तीहा सैलरी दी भी जा रही है, समय से नहीं। इससे उनका गुस्सा अब आसमान पर है। वे आरपार की लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में हैं। 

गौरतलब है कि नोएडा मुख्यालय से अखबार के प्रमुख पेज अन्य यूनिटों में भेजे जाते हैं तो उनमें स्थानीय खबरों के पन्ने संलग्न कर पेपर प्रकाशित किया जाता रहा है। नोएडा में पूरी तरह प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक सेक्शन हड़ताल पर चले जाने से समूह की बाकी यूनिटों को प्रमुख पेज मिलने बंद हैं। वहां के मीडिया कर्मियों का कहना है कि जब नोएडा से पन्ने ही नहीं आ रहे तो वे अखबार कैसे बनाएं। इस तरह गत शनिवार से कानपुर अथवा पटना में जो मास्टर एडिशन प्रकाशित हुए भी हैं, वे पाठकों के किसी काम के न होने से इसका सहारा समूह के बाजार पर गंभीर असर पड़ा है। उसका पूरा मीडिया बाजार जैसे उजड़ता जा रहा है। 

सहारा वन मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट के शेयर दिन भर के कारोबार के दौरान 3 फीसदी टूटकर 71 रुपए पर बंद हुआ। इसके अतिरिक्त समूह हिंदी में पांच समाचार चैनलों का परिचालन करता था, जो सहारा समय ब्रैंड के तहत उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान की क्षेत्रीय खबरों का प्रसारण करते थे। इसके अतिरिक्त समूह आलमी समय नाम से उर्दू चैनल का भी परिचालन करता था। समूह की वेबसाइट के अनुसार उसके  प्रमुख हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के 43 संस्करण थे और इसका प्रकाशन 7 केंद्रों से होता था। समूह रोजनामा राष्ट्रीय सहारा नाम से दैनिक उर्दू समाचार पत्र का भी प्रकाशन करता था, जिसके 15 संस्करण थे। उसका पूरा काम अस्तव्यस्त हो चुका है। 

उधर, सेबी मामले में सुब्रत रॉय का तिहाड़ में लंबे समय से कैद रह जाना भी समूह के विनाश का कारण बन चुका है। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ के मुताबिक सहारा के वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया है कि ग्रुप के टेलिविजन नेटवर्क व प्रेस बंद हो गए हैं और कर्मचारी समूह छोड़कर जा रहे हैं। सेबी को बकाया नहीं चुकाने के कारण रॉय पिछले साल मार्च से तिहाड़ जेल में बंद हैं। मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी। 

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प्रभात के बारे में भड़ास पर प्रकाशित खबर गलत, कृपया तथ्यों को दुरुस्त करें

संपादक, भड़ास4मीडिया, आपके न्यूज पोर्टल पर “प्रभात और मनोज पहुंचे दैनिक जागरण” नाम से एक खबर प्रकाशित हुई है । गलत तथ्यों पर आधारित यह खबर भ्रामक स्थिति पैदा करने वाली है। इस खबर में ज़िक्र है कि संपादक के बेहूदापूर्ण व्यवहार से नाराज होकर प्रभात ने जागरण ज्वाइन कर लिया है। यह सत्य है कि मैंने जागरण ज्वाइन कर लिया है। पर किसी के व्यवहार से नाराज होकर नहीं किया है।

मैंने अपनी बेहतरी और भविष्य को देखते हुए दैनिक जागरण को चुना है। मैं आईआईएमसी का छात्र रहा हूं और अपने करियर की शुरुआत ‘हिन्दुस्तान’ से की थी। इस संस्थान में मैंने पत्रकारिता की एबीसीडी सीखी है। दो सालों के दौरान सभी से मेरा मित्रवत व्यवहार रहा है।  सहयोगियों से बहुत कुछ सीखने को मिला और हमेशा आगे बढ़ने का मौका मिला अपेक्षा है कि इस खबर के तथ्यों को आप दुरुस्त करेंगे।

-प्रभात की तरफ से भेजे गए मेल पर आधारित.

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खबर का खंडन छापने के बाद हिंदुस्तान के रिपोर्टर ने माफी भी मांगी

पाकुड़ (झारखण्ड): पाकुड़ में हिन्दुस्तान समाचार पत्र के ब्यूरो चीफ कार्तिक कुमार रजक ने पहले तो गलत खबर छापी लेकिन, खबर गलत होने के बाद वकील द्वारा प्लीडर नोटिस मिलते ही रिपोर्टर महोदय ने न सिर्फ खबर का खंडन निकाला बल्कि हाथ से लिख कर माफ़ी भी मांगी ।

वकील को इतने से संतोष न हुआ तो रिपोर्टर महोदय से टाइप करके माफ़ी मंगवाई । दरअसल, पत्रकार को लगा कि ये खबर छापकर पार्टी पर दबाव बनाकर उनसे कुछ जमीन की ब्लैकमेलिंग करेंगे लेकिन बात कुछ उल्टी हो गई । अब हिन्दुस्तान के ये पत्रकार महोदय खबर छापने के रोज हाथ-पांव जोड़ रहे हैं और रहम की भीख मांग रहे हैं ।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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अविनाश : डीडी न्यूज़ अफसरों के तो घड़ियाली आंसू भी सूखे

सोमवार 4.30 बजे डीडी न्यूज़ की चौथी मंजिल पर कमरा संख्या 227 में दूरदर्शन समाचार के स्पेशल सेल में कार्यरत कुमार अविनाश की शनिवार 27 जून 2015 की रात हुई अचानक मौत पर शोक सभा का आयोजन किया गया था। ऑफिस के सभी अनुबंधित कर्मचारी और अधिकारी उपस्थित हुए। डीडी न्यूज़ के निदेशक सतीश नम्बूंदरीपाद ने शोक सभा का आरंभ करते हुए दो मिनट का मौन धारण कराया। दो मिनट के मौनधारण के दौरान खडे अवस्था में ही कुछ बिन बोले सभी अधिकारी चलते बने। सभी उपस्थित अनुबंधित कर्मचारी अधिकारियों के इस रवैये से अवाक रह गए और एक सुर में उनका विरोध शुरु हो गया। 

इसके बाद अशोक श्रीवास्तव के साथ कुछ और साथी डीडी न्यूज़ के डीजी वीणा जैन से मिलकर इस घटना पर रोष व्यक्त किया और फिर से शोक सभा में चलने को कहा। वीणा जैन और एडीजी दूरदर्शन मनोज पांडे ने आकर अनुबंधित कर्मचारियों से बात कर सफाई दी और समस्याएं सुनीं। क्रोधित अनुबंधित कर्मचारियों ने अपनी समस्याओं से न सिर्फ डीजी वीणा जैन को अवगत कराया बल्कि उन्हें वर्षों से चली आ रही एचआर पॉलिसी न बनने की वजह भी जाननी चाही। वीणा जैन ने कहा कि उन्होंने अभी ज्वॉइन किया है। भरोसा कीजिए, सब कुछ ठीक कर लिया जाएगा।

कुमार अविनाश सन् 2008 से दूरदर्शन समाचार में कार्यरत थे। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि दूरदर्शन न्यूज में एच आर पॉलिसी न होने की वजह से अनुबंधित कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा मय्यसर नहीं हो पाती। इसी से समय-समय पर अनुबंध खत्म करने की धमकी प्रशासन की ओर से मिलती रहती है। पिछले लगभग तीन सालों से दूरदर्शन के अनुबंधित कर्मचारी बिना किसी अनुबंध पत्र के काम कर रहे हैं। बीते छह माह से दूरदर्शन समाचार में अनुबंधित कर्मचारियों की छंटनी की धमकी प्रशासन की ओर से मिलती रही है। जिससे अधिकतर अनुबंधित कर्मचारी तनाव से ग्रसित हैं। उनमें से एक नाम कुमार अविनाश का भी था।

इन सारी परिस्थितियों के बीच अनुबंधित कर्मचारिंयों ने एक प्रस्ताव पारित कर कुमार अविनाश के परिवार के लिए आर्थिक सहायता और उनकी पत्नी को संस्थान में उनकी शैक्षिणिक योग्यता के मुताबिक नौकरी के लिए प्रशासन से गुजारिश की। पत्र शोक सभा के दौरान ही डीजी डीडी न्यूज़ को देना चाहते थे, जिसकी भनक उनको पहले ही लग चुकी थी। इससे बचने के लिए डीजी, एडीजी और अधिकारियों ने शोक सभा में अपेक्षित समय नहीं दिया और वहां से चलते बने। इस तरह की प्रशासन की संवेदनहीनता शायद ही देश के किसी संस्थान में सुनने को मिली हो।    

लेखक अरविंद शर्मा से संपर्क : arvind9th@gmail.com

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पढ़ते रहें भड़ास, लामबंद हो अब उत्पीड़ित-वंचित मीडिया बिरादरी

हम किसी भी कीमत पर इस कारपोरेट मीडिया के तिलिस्म को किरचों में बिखेरना चाहते हैं। मजीठिया के नाम पर धोखाधड़ी से जिन्हें संशोधित वेतनमान के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और अपने अपने दफ्तरों में गुलामों जैसी जिनकी जिंदगी है, बेड़ियां उतार फेंकने की चुनौती वे अब स्वीकार करें। 

 

पांचवां स्तंभ बनाना असंभव नहीं है और असंभव नहीं है चुप्पियां तोड़ना भी। अपनी कलम और उंगलियों के एटम बम को फटने दो और देखते रहो कि मेहनतकशों के खून पसीने से सजे ताश के महल कैसे भरभराकर गिरते हैं। इसी सिलसिले में भड़ास की भूमिका अभूतपूर्व है, जहां मीडिया का रोजनामचा दर्ज होता रहता है राउंड द क्लाक। हमारे युवा साथी यशवंत सिंह ने यह करिश्मा कर दिखाया है।

लेकिन यथार्थ का खुलासा काफी नहीं होता है दोस्तों, इस यथार्थ को बदलने के लिए एक मुकम्मल लड़ाई जरुरी है। अब रोज रोज पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। जान माल के खतरे बढ़े हैं।क्योंकि हमारी क्रांति सिर्फ आपबीती सुनाने की है। हमें अपने सिवाय किसी की परवाह होती नहीं है।

दावानल इस सीमेंट के जंगल में भी भयंकर है और इस दावानल में वे भी नहीं बचेंगे जो स्वीमिंग पूल में मदिरापान करके मजे ले रहे हैं। आग के पंख होते हैं और फन भी होते हैं आग के। बेहतर हो कि झुलसने से पहले इस कारपोरेट तंत्र को तहस नहस करने की कोई जुगत बनायें। साथी हाथ बढ़ाना। हाथों में हों हाथ, हम सब हो साथ साथ तो देख लेंगे कातिल बाजुओं में आखिर दम कितना है कि हममें से हर किसी का सर कलम कर दें।

इस देश में प्रकृति और मनुष्य के विरुद्ध जो जनसंहारी अश्वमेध हैं, उसके सिपाहसालार वे तमाम चेहरे हैं, जो मीडियाकर्मियों के खून पसीने से तरोताजा हैं। इस जनसंहार संस्कृति के खिलाफ इस तिलिस्म में कैद जनगण को जगाना तब तक नामुमकिन है, जब हमारी एटम बम बिरादरी कुंभकर्णी नींद से जागती नहीं। जागो दोस्तों। बहरहाल अब हम अपने ब्लागों में मौका मिलते रहने पर भड़ास की खबरों के लिंक भी शेयर करते रहेंगे ताकि कोई बंदा अलग थलग मरे नहीं बेमौत।

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ललित मोदी से मिला, खबर से न समझौता होना था और न हुआ

मुझे याद है, राजस्थान में संपादकी कर रहा था। चैंपियंस ट्रॉफी से ठीक पहले हमारे अखबार की वजह से तिरंगा कांड हुआ और ललित मोदी के साथ शहर के एसपी के खिलाफ वारंट जारी हो गया। ललित ने मिलना चाहा और अपन मिलने से मना करने को लोकतंत्र विरोधी मानते हैं। ललित से छोटी सी मुलाकात रामबाग पैलेस होटेल के स्यूट में हुई, साफ था, खबर से ना समझौता होना था और ना हुआ। लेकिन जब और पड़ताल हुई तो शहर कलेक्टर के बारे में लोगों ने बताया किलैंड यूज चेंज के खेल में ललित के साथ कलेक्टर साहेब ने भी करीब 1200 करोड़ कमा लिए। 

इत्तेफाक से कलेक्टर मेरे सहपाठी रह चुके थे, सीधी बात की तो पता चला..लैंड यूज की फाइलों का फरमान ललित साहेब के यहां से आता है और कलेक्टर साहेब सिर्फ सरकारी खानापूरी करते हैं। बदले में अधेला भी नहीं मिलता। मामले का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रहा हूं ताकि आप भी समझ सकें, कारोबारियों ने किस तरह से भारत की संपदा और कानून का कारोबारी इस्तमाल किया है और कर रहे हैं…और ज्यादातर मामलों में चेहरा बने अधिकारी तोहमत का शिकार होते हैं।

फाइल खुलती है तो फंदे में अधिकारी ही आते हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि सारे आईएएस चोर हैं, पर ईमानदार भी हैं। कलेक्टर मित्र की मानूं तो उस वक्त लैंड यूज चेंज के खेल में 1200 करोड़ रुपए महज पांच साल में बटोरे गए। सो, अभी जो आंकड़ा सामने आया है, वो ब्रेड का छोटा सा टुकड़ा भी नहीं है।

सुमंत भट्टाचार्य के एफबी वाल से

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‘न्यूज नेशन’ उगाही कथा (2) : This channel, its reporters and stingers are extorting money

To, 

Chairperson, 

News Broadcasting Standard Authority

Sub:- Complaint against News Nation channel, 8TH Floor, Plot no 14,Sectror 126, Noida-201301, its Owners, Editors and reporters for manipulating and telecasting false and fabricated “sting operation” on 7th May 2015 with the sole intention to malign the Medical profession in a planned manner to increase their TRP and to instigate and mislead the masses and make them hostile towards the medical fraternity.

Sir,

We are filling this complaint against this news channel and others for deliberately indulging in telecasting false and fabricated programme against doctors and diagnostics centers. Please take note that on 7th May at 8 pm this channel telecasted this program called “JONK 2” with the malafide intention to increase its TRP by airing false sting operation maligning the image of doctors and the medical fraternity as a whole. It is stated that this channel has done this act having failed to extort money from the doctors.

A perusal of the programme shall show that the telecast only indulged in mudslinging & distortion of facts so that the doctors and diagnostic centers shown in the sting operation are put to harm and injury to their reputation, loss of business etc. The anchor of the programme was snubbing, cutting short replies of the doctors invited as panellist. He was shouting and repeating same lines, an approach which is becoming unique to Indian electronic media. A careful analysis of even the alleged sting operation shall show that the doctor and diagnostic centers had done no wrong but the anchor gave a new story line which was his version alone.

We now have conclusive proof in the form of documentary evidence that this channel, its reporters and agents are extorting money from doctors and diagnostic centers. An FIR has already been registered in December itself much before this telecast. A copy of the FIR which is self explanatory is attached herewith. Not only do they extort money but they also give a cover to their channel by potraying the name of other famous and reputed channel “INDIA TV” managed by Sh.Rajat Sharma, the noted and respected Senior journalist.

The anchor had the adocity to compare 2,50,000 plus medical professionals with God and then verbally maligned their image by calling them names only with a view to increase their TRP that also when they failed to extort money from the doctors allegedly shown in the sting operation.

It may be pertinent here to mention that “Health Sector” is the largest service industry in country and a need for every India. With advancement of medical science, the service has taken a shape of industry and provides employment to nearly millions of people.

This channel on the pretext of showing concern for public had merely instigated people by showing false and fabricated video clippings, levelled absolutely false allegations against the doctors and diagnostic centers and added fuel to already increased incidence of violence at health places.

This Channel needs to be booked for deliberately inciting violence by airing false, fabricated and tailor made sting operation that too when it failed in its real intent i.e. to extort money from doctors and diagnostic centres.

Flood of channels have come up in recent years and are vying for TRP for increasing their revenue but have dearth of facts and efforts at ground level. It seems that they are relying and colluded with small time operators/agents who claim to be “stingers”. According to information received by us these persons in active collusion, support and connivance of the news channel make some video’s of business men, thereafter edit and distort the video to show as if the business men are indulging in illegal activities. Once they prepare such false videos they approach the business for extorting money under the fear of telecasting the false videos on their news channel. These persons indulge in hard negotiations for extorting money and in case of refusal of payment, these persons telecast the false videos of their channel. This was a well known fact during the sting against the DELHI POLICE and in public domain now.

During the telecast one can clearly actually see guerrilla war tactic of shoot and scoot by the channel and its editor. They level an allegation but don’t allow the panellist to answer. This modus operandi is highly deplorable and a channel and its anchor must allow the invited panellist to give their independent opinion on the subject concerned. A panellist has every right to even differ and defend such unsubstantiated allegations. The genuine industry persons need to sit back and find a solution to this.

This particular telecast was scheduled for 6th May i.e. Wednesday and a message to this effect was sent to DMA president inviting him to the studio for panel discussion. However due to “Salman Khan” judgement this programme was immediately cancelled for Wednesday and its telecasting date was changed to next day i.e. 7th May for not being able to cover Salman’s story which again would have effected the TRP significantly.

Not only this we are submitting documentary evidence to show that the anchor Mr Ajay was himself in touch with Dr.Sandeep Sharma on this issue. However the anchor having failed in his dubious attempt to extort money, deliberately and with the malafide intention to malign and defame the doctor did not call or confront him on his show.

In view of facts, submissions made herein above and in light of documentary proof being submitted , DMA demands that :

a. This channel should be suspended with immediate effect.

b. An open inquiry be ordered immediately with public participation and take final decision to ban or close this channel.

Its also stated that the Broadcasting association needs to be proactive in controlling these channels and the Nepal episode has been an eye-opener & needs a lot of introspection.

Neither any person nor a news channel how so ever rich and powerful it may be, be allowed to exploit and to illegal activities under the garb of doing reporting.

Your good office is requested to immediately seize the telecast version and also the un edited recording of cameras.

This channel needs to be made an example. Media should try to increase its rating by positive and innovative approach. There is enough happening in this society.

You need to devise rules for open debates. It should be monitored by neutral persons. Concept of Independent stingers needs to be checked. Reporters need to be trained and should do the home work before attacking any settled practice.

This channel has flouted the basic rules of impartiality and objective reporting as displayed on your site. It has harmed the image of medical profession.

संबंधित खबर- ‘न्यूज नेशन’ चैनल पर स्टिंग ‘आपरेशन जोक’ के नाम पर उगाही का आरोप : https://bhadas4media.com/tv/5799-nn-ugaahi

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‘घी न्यूज़’ पर दलाल न्यूज़ एजेंट (डीएनए ) नामक भांड टाइप कार्यक्रम

कल रात ‘घी न्यूज़’ पर दलाल न्यूज़ एजेंट (डीएनए ) नामक भांड टाइप कार्यक्रम देख रहा था… घी टीवी का नामकरण संस्कार हमारे ज्येष्ठ भ्राता श्री Sheetal P Singh जी ने किया है… कार्यक्रम का एक सूत्रीय एजेंडा था दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलना चाहिए । इसके लिए घी टीवी पर दिए जा रहे तर्क निम्नलिखित हैं ।

1- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गया तो अरविन्द केजरीवाल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घर का पानी बिजली काट देंगे ।

2- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल यहाँ दूसरे राज्यों से आने वाले राज्यों के मंत्रियों विधायकों को गिरफ़्तार कर लेंगे ।

3- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल यहाँ दूसरे राष्ट्रों से आने वाले प्रतिनिधियों के विमान दिल्ली में नहीं उतरने देंगे ।

4- अगर दिल्ली पूर्ण राज्य बन गयी तो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली स्थित तमाम विदेशी दूतावासों के अधिकारीयों और कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लेंगे ।

5- अगर दिल्ली पूर्णराज्य का दर्जा हासिल कर लेती है तो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लेंगे।

आप निष्पक्ष होकर बताईये क्या इनमें से एक भी तर्क ऐसा है जो दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा ना देने की बात को मजबूत करता हो। दरअसल अपनी राज्यसभा की सीट पक्की करने की जुगत में लगे घी न्यूज़ के मालिक बीजेपी के घोषणा पत्र में दिल्ली की अवाम से किये गए सबसे बड़े वादे को पूरा ना करने के लिए बहाने निकाल कर ला रहे हैं… लेकिन मैं हैरान इस बात को लेकर हूँ कि क्या बीजेपी में वैचारिक शून्यता इस हद तक बढ़ गयी है कि अपने चाटुकारों की बेवकूफियां भी नज़र आनी बंद हो गयी हैं।

अरे भाई अरविन्द केजरीवाल को समझ कर क्या रखा है ? भला क्यों अरविन्द राष्ट्रपति भवन और पीएम हाउस की बिजली पानी बंद करेंगे ? क्यों अरविन्द केजरीवाल दूसरे राज्यों के विधायकों और मंत्रियों को जेल भेज देंगे । कम से कम एक तर्क तो सही दे दिया होता भाई ।

खैर जयहिंद

शगुन त्यागी के एफबी वॉल से

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भास्कर, पत्रिका में खबरें बासी और चोरी की मगर दावा नंबर एक होने का

अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने मे भोपाल के दो हिन्दी दैनिक अखबारों दैनिक भास्कर और पत्रिका का कोई मुक़ाबला नहीं है। हर दो तीन महीने में पूरे और आधे पेज के विज्ञापन खुद के अखबार में छाप कर दोनों अपने अपने को नंबर एक होने का ऐलान कर देते हैं। भारी-भरकम आंकड़ों से पाठकों का ब्रेन वाश किया जाता है। भास्कर ने तो अपने मत्थे पर ही उद्घोषणा कर रखी है कि आप देश का सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 अखबार पढ़ रहे हैं। नंबर-1 होने के दावे पर यकीन कर भी लें पर दूसरा दावा थोथा ही लगता है। 

दोनों ही अखबारों को सरकार विरोधी खबरों से परहेज ही है। इसके अलावा दोनों अक्सर दिल्ली के अखबारों मे छप चुकी खबरों अगले दिन अपने अखबार में छाप देते हैं। ज़्यादातर इंडियन एक्सप्रेस से खबरें टीप कर छापी जाती हैं पर दोनों इतने नाशुक्राने हैं कि भूले से भी इसका जिक्र नहीं करते हैं। जबकि पत्रकारिता की मान्य परंपरा है कि इसका साभार उल्लेख जरूर किया जाता है। दो उदाहरण प्रस्तुत हैं..! 

रविवार 17 मई को दैनिक भास्कर में पहले पन्ने पर अलीगढ़ की जांबाज लड़की असमां जावेद की हत्या की खबर संवाददाता के नाम से फोटो सहित छपी है। यह खबर 15 और 16 मई के इंडियन एक्सप्रेस में चार कालम में फोटो सहित विस्तार से छप चुकी है। यह माना जा सकता है कि असमां जावेद की शख्सियत ऐसी थी जिससे पाठकों को उनके बारे में बताना जरूरी था, पर इसके लिए खबर के बजाय और बेहतर तरीके से उसे प्रस्तुत किया जा सकता था। पहले पन्ने पर दो दिन पुरानी बासी खबर परोसने से आपकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना लाज़मी है, जिसका आप रोज डंका पीटते हैं। पत्रिका का भी यही ट्रेंड है। कुछ दिन पहले इंडियन एक्सप्रेस ने शेहला मसूद हत्या  में नया खुलासा किया था। खबर के मुताबिक बेहद अहम सबूत 25 पेन ड्राइव में से दो सीबीआई के अधिकारियों द्वारा गायब कर दी गईं। पत्रिका ने अगले दिन इसे पहले पेज पर लीड खबर के बतौर पेश किया, पर  एक्सप्रेस का दूर-दूर तक नाम नहीं था।

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ऐसी ही करतूतों के कारण मीडिया को कहा जाता है प्रेस्टीट्यूट

प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए राज्य सरकार ने कलेक्टर को नोटिस दिया और राज्य सरकार को खुश करने के लिए एक अखबार ने अमित कटारिया के खिलाफ पत्नी को जिन्दल का पायलट बनाने की खबर छाप दी। और खूब प्रमुखता से रंग-रोगन व फोटो के साथ छापी गई। अखबार लिखता है- ‘सलमान स्टाइल में प्रधानमंत्री की अगवानी करने के बाद सुर्खियों में आए जगदलपुर कलक्टर अमित कटारिया के बारे में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।’

सवाल यह उठता है कि अखबार की खबर के अनुसार अमित कटारिया दोषी हैं तो यह खबर पहले क्यों नहीं छपी थी। मैं अमित कटारिया को नहीं जानता और ना इस बात की चर्चा कर रहा हूं कि खबर किस अखबार में छपी है – मुद्दा सिर्फ यह है 2011 की खबर छापकर अखबार क्या बताना और कहना चाहता है। यही नहीं – “पुरस्कार तो नहीं पायलट की नौकरी” शीर्षक से एक बॉक्स भी है। इस बॉक्स और शीर्षक से अखबार ने अपनी ही खबर को शक के घेरे में डाल दिया है। और यह पैंतरा आज का नहीं, बहुत पुराना है। अगर मुकदमा हो जाए तो अखबार यह दलील देगा कि हमने तो सवाल उठाया था, शंका जताई थी। 

दूसरी ओर, पाठकों ने इस कटिंग को जहां-तहां खूब चिपकाया। जनता यह नहीं पूछती है कि यह खबर अचानक अब क्यों। कटारिया ने अगर विमान उड़ा सकने वाली अपनी पत्नी को जिन्दल के यहां नौकरी दिला ही दी तो यह कोई अपराध नहीं है और अगर है तो खबर अब तक क्यों नहीं छपी। इसीलिए ना कि अमित कटारिया एक दंबग अफसर हैं और पहले डर लग रहा था। अब जब राज्य सरकार ने उन्हें नोटिस जारी कर दिया है और इसके लिए राज्य सरकार की थू-थू हो रही है तो चले आए सहारा बनकर। कुछ नहीं तो राज्य सरकार का विज्ञापन मिलता रहे। 

एक सज्जन बता रहे थे कि राज्य सरकार के खिलाफ (छत्तीसगढ़ नहीं) एक खबर छपी तो विज्ञापन बंद हो गए। बगैर किसी घोषणा सूचना के। मामला निपटने तक कुछ करोड़ के विज्ञापन छूट चुके थे क्योंकि अखबार तो रोज छपना ही था। अब यह अखबार की मजबूरी है और इस मजबूरी का फायदा राज्य सरकार तो उठाती ही है। अखबारे वाले भी झुकने के लिए कहने पर रेंगने तो तैयार रहते हैं। इसमें सही गलत कुछ नहीं होता सिर्फ अपना फायदा देखा जाता है।

संजय कुमार सिंह के एफबी वॉल से 

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जान लेने के लिए हैवान ने रिपोर्टर को खिलाया शीशा और सिंदूर

भले ही मकसद किसी बात के प्रतिशोध का भी क्यों न हो, सोचकर हैरत होती है कि क्या कोई इस हद तक नीच हो सकता है ! मेरठ में ‘इंडिया न्यूज’ के रिपोर्टर रजनीश चौहान के साथ जितनी क्रूरतापूर्ण घिनौनी हरकत हुई है, वह किसी भी जानने-सुनने वाले को झकझोर सकती है। वह इन दिनो किसी नीच व्यक्ति की दी हुई असहनीय पीड़ा से कराह रहे हैं। कुछ समय पहले उसने किसी दिन शातिराना तरीके से चुपचाप खाद्य पदार्थ में पीसा हुआ शीशा और सिंदूर मिलाकर राजेश को खिला दिया था। उन्हें खुद नहीं मालूम कि उनके साथ ये हरकत कब, किसने कर डाली। 

हफ्ते-पंद्रह दिन तो राजेश को इस हरकत का आभास तक नहीं हुआ। एक दिन अपने बीमार बच्चे को दिखाने के लिए जब डॉक्टर के पास पहुंचे तो अपनी गले की अनजान दिक्कत से भी डॉक्टर को अवगत कराया। उस समय बच्चे के अलावा राजेश के साथ उनकी पत्नी भी थीं। मामला गंभीर था, इसलिए डॉक्टर ने उनसे कहा कि आप जल्द अकेले में मिलें। वह पत्नी-बच्चे को घर छोड़ कर पुनः डॉक्टर के यहां पहुंचे तो अपने गले के जख्म की वजह जानकर हैरत में पड़ गए। उसके बाद वह दवा के साथ रामदेव की औषधि से गरारे भी करते रहे। 

इतने के बावजूद उन्होंने काफी हिम्मत से काम लिया। उनके गले से धीमी भी आवाज आनी बंद हो गई थी। संयोग से मिले पूर्वपरिचित कुशल चिकित्सक ने बेहतर इलाज ही नहीं शुरु कर दिया, हिम्मत से काम लेने की दिलासा भी दी। पिछले एक-डेढ़ माह से उनका इलाज जारी है। भड़ास4मीडिया को उन्होंने बताया कि हरकत करने वाले किसी व्यक्ति पर उन्हें संदेह नहीं है, न ही वह उसे जानना चाहते हैं। उनका उद्देश्य तो इतना भर है कि स्वस्थ हो जाएं और अपने मीडिया संस्थान का दायित्व फिर से निभाने लगें। संस्थान ने उन्हें हर तरह की मदद का आश्वासन दिया है, लेकिन वह इस मुश्किल में किसी का भी कृपापात्र नहीं बनना चाहते हैं।  

राजेश बताते हैं कि गले में गंभीर तकलीफ के दौरान कई दिनो तक वह इंडिया न्यूज को किसी तरह खबरें तो भेजते रहे लेकिन फोनो अटेंड न कर पा रहे थे। इस पर संस्थान के सीनियर कर्मियों को अंदेशा हुआ। जानने के लिए उन्होंने पूछा कि आप बोल क्यों नहीं रहे हैं? उन्हें क्या पता था कि राजेश ने तो अपने परिजनों, यहां तक कि पत्नी को भी आपबीती अभी छिपा रखी है। बार बार पूछने पर उन्हें इंडिया न्यूज के संपादकीय प्रमुख को घटना से अवगत कराना पड़ा। 

आज भी राजेश चौहान चुपचाप पूरी दृढ़ता से अपने स्वास्थ्य-संकट का सामना कर रहे हैं। पुलिस कप्तान ने भी उनसे किसी संदिग्ध आरोपी के संबंध में जानकारी प्राप्त कर कार्रवाई में मदद करनी चाही, लेकिन वह उस दुष्ट आत्मा के बारे में जानें, तब तो कुछ बताएं। वैसे उनका कहना है कि मैंने किसी का बुरा नहीं किया है। घर परिवार चलाने के लिए पढ़ाई लिखाई के बाद मीडिया की राह चुनी लेकिन मुझे क्या पता था कि कोई इस तरह मेरी जान ले लेना चाहेगा। अंदेशा तो यही है कि आरोपी का मकसद राजेश की जान से खेलना रहा होगा। अब वह धीरे धीरे स्वस्थ हो रहे हैं। रुक-रुक कर दो चार शब्द बोल पा रहे हैं। 

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ये सब तो खबरें हैं ही नहीं… ख़बरें हैं सिर्फ, क्रिकेट, सिनेमा और केजरीवाल की धुलाई

रिलायंस को 4G प्रकरण में क़रीब ३३०० करोड़ का अवैध लाभ पहुँचाने पर “कैग” का आकलन आल इंडिया रेडियो पर है पर बाकी मीडिया (टी वी ) के लिये संभव नहीं !

इंडिया संवाद पोर्टल ने पर्दाफ़ाश किया है कि पी एम के साथ विदेशी दौरों में उनके बग़ल के कमरे में ठहरने वाले व्यवसाई गौतम अडानी के बिल पी एम ओ ने भरे। यह तो मीडिया में संध्या बहस या दिन भर का campaign हो ही नहीं सकता !

जसोदा बेन” को उनकी RTI के जवाब नहीं दिये जा रहे । दो तीन दिन पहले ही उन्होंने दुबारा अपने स्टेटस के बारे में RTI डाली है। यह भी “मीडिया” में कवर किये जाने या बहस किये जाने से एकदम बाहर है !

गुजरात” तो ख़बर है ही नहीं, वहाँ दुनिया का सबसे बड़ा अवैध शराब का सिंडीकेट चलता है जारी है जारी रहेगा , जबकि वह ड्राई स्टेट है, यह तो ख़बर है ही नहीं !

एक घोटाला बरसों से जारी है म० प्र० में, नाम है व्यापम । आठ गवाह मारे जा चुके हैं । गवर्नर, मुख्यमंत्री समेत सारा शीर्ष कटघरे में है। यह संध्या बहस की विषय सूची से ग़ायब है!ग़रीब किसान अकलियत तो ख़ैर दायरे से बाहर के लोग हैं ही ! सिर्फ क्रिकेट, सिनेमा और केजरीवाल की धुलाई ही ख़बर है !

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

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भूकंप पर संवेदनाएं बेच रहा चोर और झूठा भास्कर इस खबर में तो पकड़ा गया !

दैनिक भास्कर ने न सिर्फ़ चोरी की फोटो छापी, बल्कि ख़बर भी झूठी छाप डाली। भूकंप पर बकैती कर रहा है और संवेदनाओं को बेच रहा है ये अख़बार। 

दैनिक भास्कर ने गतांक में एक तो वियतनाम की फोटो को नेपाल का बताकर पेश कर दिया, ऊपर से देखिए ज़रा कि इस फ़ोटो का क्या कैप्शन दिया है- “वायुसेना अधिकारी सनिका नेपाल के थामेल गांव में रेस्क्यू मिशन पर थीं। उन्होंने इन दो बच्चों को रोते देखा। बिस्किट और पानी दिया तो बच्चों ने पूछ लिया- ‘मेरे मां-बापू कहां हैं?’ 

इस खबर की हकीकत जानने के लिए सनिका ने जब खोजबीन शुरू की तो पता चला कि ये दोनों तो मारे जा चुके हैं।”

दिलीप खान के एफबी वॉल से

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चूरन न्यूज़ बेच रहे ‘टीवी मीडिया’ ने तो दिमाग़ का दही कर डाला

‘TV मीडिया’ जिसने दिल दिमाग़ का दही कर दिया है और ‘मीडिया’ नाम पर जूतों का हार चढ़वा दिया है दरअसल मीडिया है भी और नहीं भी है पर इसने ज़बरन “प्रिंट” से सरेंडर करा लिया है ।

ये ‘ओपन पेड न्यूज़’ का सिनेमाघर है जिसे आसाराम एम डी एच रामदेव टाइप कोई भी न सिर्फ अपने अल्लम गल्लम प्रोडक्ट के लिये बल्कि अपने ख़ुद के लिये/अपने अमूल्य सुविचारों/कुविचारों के लिये खुली भंड़ैती के साथ सर पीटते समाज पर लेप सकता है ।

प्रिंट का एक हिस्सा अपने विकास के अन्त में यह सब शुरू कर चुका था पर उसका ढाँचा ऐसा था कि हर हाल में 60% से ज़्यादा उसे समाचारों को जगह देनी पड़ती थी । यहाँ एकदम उलट । २४x७x३६५ आपको अल्प शिक्षित ‘क्वैक’ से मेडिकल साइंस, फिलासफी, अर्थशास्त्र, धर्म, संस्कृति और इतिहास पर अल्लम गल्लम झेलना पड़ेगा और स्क्रोल करने से कोई मुक्ति नहीं , उनका पैकेज हर चैनल(एक को छोड़ ) पर तय है ।

जब जब इनके गडबडझाले पर आवाज़ उठी इन्होंने तुरंत “मीडिया” वाली वर्दी टाँग ली और लोकतंत्र पर ख़तरे के कालम में छिप गये और बला टलते ही फिर चूरन (न्यूज़ ) बेचने लगे ।

अब आलम यह है कि इस धन्धे का हर नया entrant निश्चित अपराधी है । सहारा श्री,मतंग सिंह,श्रद्धा चिटफ़ंड तो विभिन्न जेलों में साक्षात विराज रहे हैं बाक़ी कुछ मीडिया हाउसों को छोड़ या तो बिल्डर या चिटफ़ंडी चैनलों के मालिक हैं । ये सब हज़ारों करोड पब्लिक मनी हड़पे बैठे हैं और तन्त्र को डरवाने के लिये (कार्रवाई से बचने के लिये ) मीडिया बन गये हैं।

लगभग सब सवर्ण हिन्दू हैं सो सारा एडीटोरियल नितांत जातिवादी सांप्रदायिक पहले दर्जे के घटिया पाजी लोगों से अटा पड़ा है । सारी कंटेंट अवैज्ञानिक कुतरकी गढंत और बिकी हुई होती है ।

तो मित्रों देश के बहुमत समाज गाँव ग़रीब दलित पिछड़े अकलियत एवेंई इनके द्वारा उपेक्षित नहीं हैं ये इनके डी एन ए की प्राबलम है , ग़रीब कहलाने वाले नेपाल ने अकारण ही इन्हे सनद नहीं दी है , ये उसके पात्र हैं ये कुपात्र हैं !

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

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वाराणसी में जनसंदेश की खबरें चुरा रहे जागरण और आईनेक्स्ट, शर्म उनको मगर नहीं आती

वाराणसी : जागरण और आईनेक्स्ट के मालिक एक हैं। बनारस में ये दोनों ही अखबार जनसंदेश टाइम्स में छपी खबरों की धड़ल्ले से चोरी कर रहे हैं। ये अखबार न सिर्फ खबरों की एंगिल चुरा रहे हैं, बल्कि तथ्य भी चोरी कर रहे हैं। 

जनसंदेश की खबरों को टीपने का जागरण का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन शर्म इन्हें नहीं आती। दरअसल, बनारस में काम करने वाले रिपोर्टर से लेकर संपादकीय प्रभारी तक अपनी नाक ऊंची करने के लिए आए दिन जनसंदेश की खबरें चोरी करते और कराते रहे हैं। खबरों को चोरी करने का ताजातरीन उदाहरण दो मई (शनिवार) का अखबार है। 

जागरण में पृष्ठ संख्या आठ पर बनारसी तुलसी की रिपोर्ट छपी है। यही खबर 28 अप्रैल को जनसंदेश के वाराणसी संस्करण में मुख्य उप संवाददाता जितेंद्र श्रीवास्तव के नाम से छप चुकी है। दो मई को ही आईनेक्स्ट के पेज नंबर सात पर नेपाल त्रासदी से जुड़ी चाइना बाजार की खबर छपी है। यह खबर 29 अप्रैल को जनसंदेश टाइम्स के वाराणसी संस्करण में छप चुकी है। यह रिपोर्ट भी मुख्य उप संवाददाता जितेंद्र श्रीवास्तव के नाम से छपी है। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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