पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयों, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए!

: आईबीएन सेवन से पंकज श्रीवास्तव की बर्खास्तगी को लेकर मीडिया में चल रही बतकही के बीच :  ”बंद हैं तो और भी खोजेंगे हम, रास्ते हैं कम नहीं तादाद में” …ये पंक्तियाँ ही कहीं गूँज रही थीं पंकज भाई की बर्खास्तगी की खबर के बाद। … बनारस आने के बाद न जाने कितनी बार उनके साथ इन पंक्तियों को दुहराया होगा। …”हम लोग कोरस वाले थे दरअसल” .… इरफ़ान भाई के ब्लॉग पर आज उसी आवाज को फिर से सुनना बढ़िया लगा. कल प्रेस क्लब में थोड़ी देर के लिए मुलाकात भी हुई कई लोगों से.…

कई सन्दर्भों में पुराने दिनों की याद आई। विश्वविद्यालय में आने और छात्र राजनीति में शामिल होने के बाद सामाजिक-राजनीतिक बदलाव के सपने संजोये, नव-स्फूर्ति और ऊर्जा से भरे हम किसी ऐसी राह पर चल रहे थे जिसके पड़ावों-मुकामों के बारे में ठीक-ठीक मालूम तो न था लेकिन ये जरूर था कि एक बेहतर समाज को गढने की दिशा में अपनी भूमिका जरूर समझ में आती थी…लोग कई बार कहते थे कि तुमलोग छात्र हो, यहां पढने आए हो राजनीति करने नहीं … लेकिन हम कहते कि हमारा नारा भी तो यही है … लडो पढाई करने को, पढो समाज बदलने को, यह सबके लिए मुकम्मल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार हासिल करने और प्रगतिशील, वैज्ञानिक एवं समता के मूल्यों पर आधारित समाज को रचने की जद्दोजहद थी। हममें से अधिकांश इसी भावना के तहत छात्र राजनीति में स्वतःस्फूर्त तरीके से सक्रिय हुए थे। और आज तक भी मुझे ये बात नहीं समझ में आई कि कोई भी पढाई-लिखाई करने वाला सचेतन, संवेदनशील मनुष्य बाकी समाज के दुख-दर्द से कटकर कैसे रह सकता है? खैर, समय के साथ लोगों की भूमिकाएं और प्राथमिकताएं भी बदलीं और जिंदगी जीने की जद्दोजहद में लोगों ने पार्टी होलटाइमरी से लेकर नौकरी के विभिन्न रास्ते अख्तियार कर लिए। लेकिन, जिन लोगों ने नौकरियां कर लीं क्या उन सबके एक खास समय के योगदान को भुला दिया जाना चाहिए?

बहरहाल, मैं ये बातें सिर्फ इस संदर्भ में कह रहा हूं कि पिछले 2 दिनों से कई लोग ”भड़ास” निकालने में लगे हुए हैं कि पंकज ने कभी अपने से नीचे वालों के लिए आवाज नहीं उठाई पर आज खुद निकाले जाने पर विलाप कर रहे हैं। कोई कह रहा है कि वे एक ”डील” के हिस्सा हैं जिसके तहत ये सब किया गया तो कोई कह रहा है कि उन्होंने काफी माल इकट्ठा कर रखा है और अब प्रेस वार्ता के जरिये खुद को शहीद घोषित कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि वे बिलकुल नाकारा हो गये थे और सिर्फ फेसबुक और बातों में वक्त गुजारते थे जिसकी सजा पहले संजीव पालीवाल को और अब पंकज को मिली। मुझे नहीं मालूम कि एक चैनल के मुलाजिम के बतौर खुद पंकज जी की हैसियत किसी को निकालने-रखने में कितनी रही होगी। 1997 में सांगठनिक जिम्मेदारियों व सक्रिय राजनीती से मुक्त होने के बाद, अपनी पैतृक संपत्ति के बल पर कुछ करने के आसान रास्ते और घर से बुलावे के बावजूद उन्होंने मुसीबतों से भरी कठिन डगर चुनी थी. अमर उजाला में छोटी-सी नौकरी मिलने के बाद उत्साह से लबरेज पंकज-मनीषा का बनारस में साकेत नगर स्थित हमारे छोटे-से ठिकाने पर उनका आना आज भी याद है. मुफलिसी के दौर में अमर उजाला की दो हजार की नौकरी पकडने से लेकर तकरीबन 17 साल बाद अब आइबीएन सेवन के लाख रूपये के पैकेज तक पहुंचने में उन्होंने क्या गैर-वाजिब समझौते किये होंगे ये भी नहीं मालूम। लेकिन नौकरी करने के लिए कुछ समझौते जरूरी होते हैं ये सबको पता है जो विभिन्न नौकरियों में लगे हैं। समझौते किस हद तक ये एक अलग, किंतु जरूरी मसला है। यह भी शोध का विषय है कि अखबारी पत्रकारिता से चैनल पत्रकारिता में आने के क्रम में विगत १७ बरस में आज लाख रूपये माहवार की नौकरी तक पहुंचना क्या बहुत ज्यादा है। और क्या पंकज अपने पेशागत प्रभावों का उपयोग कर, राजनीतिक दांव-पेंच खेल कर, चैनल की तनख्वाह से इतर पैसे उगाहने का काम भी कर रहे थे जो उनके पास काफी माल-मत्ता इकट्ठा हो जाने पर मुहर लगाता हो। कम-से-कम मेरी जानकारी में तो नहीं है।

कुछ लोगों की अदालत में ये भी आरोप है उनपर कि उन्होंने कई कामरेडों की जिंदगियां बर्बाद कर दीं और उन्हें नौकरी दिलाने में मदद न कर सके। और ये कि उनसे काबिल कई कामरेड छोटे-छोटे काम करते हुए जिंदगी गुजार रहे हैं। ये एक अहम सवाल है मेरे हिसाब से। जरा बताइए कि क्या उन कामरेडों के पास अपनी कोई दृष्टि, सोच-समझ नहीं थी या किसी कमांडर के कहने पर लाचार-मजबूर सेना की तरह सबकुछ छोड़कर सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की कार्रवाइयों में कूद गये थे, ये सोच कर कि कम्युनिस्ट संगठन और पार्टी का नेतृत्व उनकी रोजी-रोटी व भविष्य का प्रबंध करेगा जबकि पार्टी अपने संसाधन जुटाने के सवाल आज तक हल न कर पाई हो और आम तौर पर वो जनसाधारण के चंदों से ही चलती हो। उन कॉमरेडों के खुद के सपने क्या थे? क्या उस वक्त वे खुद भी सामाजिक बदलाव की राजनीति का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे जिसके पीछे उनके आदर्शवादी मूल्य रहे हों या सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा। मुझे वाकई याद नहीं आ रहा कि पंकज ने किसी छात्र को छलावे में लेकर अपनी राजनीति की हो। उनकी छवि एक सौम्य, मृदुभाषी, सांस्कृतिक नेता की ही तरह थी जो मन के तारों को झकझोर देने वाली बुलंद आवाज में क्रांतिकारी गीत सुनाता था, कवितायेँ लिखता-पढता था, फिर राजनीती की बात करता था।  सबसे बड़ी बात कि वो अपने साथियों की परेशानियों का हमेशा ख्याल रखता था. उनके फ़ेलोशिप/वजीफे की रकम आने की खुशी और इंतजार उनसे ज्यादा साथियों को हुआ करती थी.उनके साथ रहने पर मनमानी किताबें खरीदी जा सकती थीं, बढ़िया खाना खाया जा सकता था और शायद न रहने पर साथियों की फीस भी भरी जा सकती थी. ये वो दिन थे.

तो  फिर उन पर लगाए जाने वाले ये आरोप किस कामरेड के हैं भाई? अगर हम अपने करियर में कोई अपेक्षित मुकाम हासिल न कर सके तो क्या हमारी आर्थिक दुर्दशा/बेहतरी के लिए पार्टी या संगठन जिम्मेदार है? क्या ऐसे कामरेडों ने यूपीएससी / एसएससी / बैंकिंग / सीए / पत्रकार / शिक्षक / प्रोफेसर बनने के ध्येय से कोचिंग लेने के लिए संगठन ज्वाइन किया था? तब तो वाकई ऐसे कामरेडों की समझ और दृष्टि पर तरस आता है। जो लोग अपने नेतृत्वकर्ता साथियों और संगठन को प्लेसमेंट एजेंसी की तरह देखते हैं उनके लिए ये बात सही हो सकती है लेकिन तब क्या उस दृष्टि का समर्थन हम भी करने लगेंगे? संगठन और पार्टी के भीतर कई कमियां हो सकती हैं जिनकी चर्चा होनी चाहिए, उन्हें सुधारा जाना चाहिए लेकिन अपनी काहिली, गतिशीलता में कमी, क्षमता का ठीक इस्तेमाल न कर पाने या अन्य परिस्थितिजन्य परिणामों के कारण उपजी जिंदगी की दुश्वारियों का ठीकरा संगठन या व्यक्तियों पर फोडकर हमें खुद सारी जिम्मेदारियों से ‘मुक्त’ हो जाना चाहिए।

असल सवाल ये है कि क्या पंकज वाकई नाकारा हो गये थे या चैनल की भाजपा समर्थक नीतियों व लाबी के वर्चस्च की खिलाफत के लिए उन्हें निकालना प्रबंधन की मजबूरी बन गई थी। 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाकर और हिंदू-मुस्लिम नफरत की सियासत में समाज को झोंककर देश की राजनीति में अपना कद बढाने वाली सांप्रदायिक शक्तियों के नये उभार के इस स्वर्णिम दौर में दक्षिणपंथी राजनीति के खिलाफ सोशल मीडिया में आ रही पंकज की टीपें, उनकी कविताएं, उनका तल्ख स्वर क्या उनके दिनों-दिन नाकारा होते जाने के सबूत हैं? और उनके नाकारा होने की शुरुआत क्या अचानक से 16 मई, 2014 के बाद शुरू हो गई? ये सवाल उठाने वाले किसकी राजनीति का पक्षपोषण कर रहे हैं? दक्षिणपंथियों का या करवट बदल कर अपने राजनीतिक आकाओं की गोद में बैठने वाले कारपोरेट प्रबंधन का? इसमें कोई शक नहीं कि आईबीएन से निकाले गये तमाम पत्रकारों, कलमकर्मियों का मसला बेहद अहम था और है।  आइबीएन ही क्यों ऐसी हर छंटनी का विरोध होना चाहिए। लेकिन, पत्रकारिता संस्थानों व मीडिया के भीतर लगातार बढते जा रहे तानाशाही के दौर में अगर इस अवसर का उपयोग कतिपय कारणों से  कुछ कलमवीर अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने में करना चाहते हैं तो संकेत खतरनाक हैं। ये हद-से-हद यही साबित करता है कि दक्षिणपंथ अपने राजनीतिक एजेंडे में सफलता की राह पर है- घरवापसी, दंगों, स्वच्छता अभियान व श्रम-कानून में सुधारों जैसे उछाले गए भ्रामक एजेंडों की तरह। तो पंकज जी की बर्खास्तगी का उत्सव मनाने वाले भाइयो, गुजारिश है कि साथ में भाजपाई एजेंडों की जीत का जश्न भी मनाते जाइए।

लेखक मित्ररंजन कामरेड रह चुके हैं और इन दिनों एक एनजीओ से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क mitraaranjan@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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एसएमएस, इस्तीफा, सोशल मीडिया, प्रेस कांफ्रेंस और प्रेस रिलीज… हिप्पोक्रेसी जारी आहे….

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पंकज श्रीवास्तव की प्रेस कांफ्रेंस के लिए केजरीवाल ने जुटा दी मीडिया वालों की भीड़!

अगर फिक्सिंग होती है तो हर कदम पर दिखने लगती है. नाकारापन और अकर्मण्यता के आरोपों में आईबीएन7 से निकाले गए पंकज श्रीवास्तव ने तयशुदा रणनीति के तहत अपने संपादक को एक मैसेज भेजा. उस मैसेज का स्क्रीनशाट लिया. उसे क्रांतिकारी भाषण के साथ फेसबुक पर लगा दिया. ‘आप’ वालों ने फेसबुक और ट्विटर पर पंकज को शहीद बताते हुए उनके मसले को वायरल करना शुरू किया. ‘आप’ नेता आशुतोष, जो कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं, ने पंकज के मसले को जोरशोर से सोशल मीडिया पर उठाया.

पंकज ने आज चार बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की. इसके पहले केजरीवाल ने आज दिन में दो बजे प्रेस क्लब आफ इंडिया में प्रेस कांफ्रेंस करने की घोषणा की थी. लेकिन केजरीवाल ने ऐन वक्त, जब मीडिया के लोग प्रेस क्लब में जुट गए थे, अपनी प्रेस कांफ्रेंस रद्द कर दी. इस तरह सारे मीडिया वालों के सामने पंकज श्रीवास्तव नमूदार हुए. आशुतोष भी आ गए. इनने अपनी-अपनी भड़ास निकाली. लंबे लंबे सिद्धांत पेले. देखते जाइए, चुनाव भर शहीद बनते घूमने के बाद पंकज श्रीवास्तव चुनाव बाद आम आदमी पार्टी के साथ सक्रिय हो जाएंगे और 2017 के यूपी विधानसभा इलेक्शन में विधायक का चुनाव लड़ जाएंगे.

इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर उर्फ समर अनार्या ने फेसबुक पर कुछ लिखा है, जो इस तरह है….

Samar Anarya : आप नेता आशुतोष आईबीएन7 से पंकज श्रीवास्तव भाई की बर्खास्तगी पर मार लालपीले हो रहे हैं. बाकी इनके अपने मैनेजर काल में 200 (पूरे समूह से 350) लोग निकाले गए थे तब भाई कुछ नहीं बोले थे! इधर वाली जनता अभी मोदिया नहीं हुई है आशुतोष भाई.

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Samar Anarya : पंकज श्रीवास्तव की आईबीएन 7 के एसो.एडिटर पद से बर्खास्तगी दुखद है, पर न जाने क्यों इसी आईबीएन 7 (और नेटवर्क 7 समूह के बाकी चैनलों) से अगस्त 2013 में 320 से ज्यादा पत्रकारों को एक साथ निकाल दिया जाना याद आ गया.(अब) आप नेता आशुतोष के गुस्से भरे ट्वीट देखते हुए उनका इतनी बड़ी छंटनी के बाद सड़क पर आ गये पत्रकारों के बीच ऐम्बीअन्स मॉल में मद्रास कैफ़े का ‘प्रीव्यू’ देखना भी. ये मुट्ठियाँ तब भिंची होतीं तो शायद बात यहाँ तक न पंहुचती. अपने ऊपर न होने तक हमलों पर भी क्रांतिकारिता जागती तो बात यहाँ तक न पंहुचती, शायद. खैर, जब भी शुरू हो, लड़ाई में साथ देना बनता है. पर बहुत कुछ याद रख के. उस दौर के दो स्टेटस लगा रहा हूँ. ताकि सनद रहे वाले अंदाज में-
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201740504700560
https://www.facebook.com/samar79/posts/10201728758446911

पूरी कहानी जानने के लिए इस मूल पोस्ट को पढ़ें….

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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पेंदी रहित पंकज परवेज उर्फ पंकज श्रीवास्तव के विलाप के पीछे की कुछ कहानियां

साथ मिलेगा…भरपूर मिलेगा पंकज श्रीवास्तव उर्फ ‘पंकज परवेज’। आप बस जाकर मुट्ठी ताने रहिए मुट्ठीगंज में….सॉरी कर्नलगंज में। सुना है आप सीपीआई-एमएल (लिबरेशन) में होल टाइमर थे। कब थे ये तो नहीं पता लेकिन “लाल फरेरे तेरी कसम, इस जुल्म का बदला हम लेंगे”…। लेकिन परवेज भाई अभी तो कुछ ही महीनों पहले आपने फेसबुक पर अपना नाम बदल लिया था, पंकज श्रीवास्तव से ‘श्रीवास्तव’ हटाकर ‘परवेज’ रख लिया था। आज देख रहा हूं कि बर्खास्तगी विलाप में आप ‘परवेज’ नाम को हटाकर दोबारा ‘वास्तव में श्री’ हो गए हैं। खैर मजाक छोड़िए अब तो हम आपको परवेज भाई ही कहेंगे।

लेकिन परवेज भाई हम आपकी कातर पुकार सुनकर मदद को दौड़े उससे पहले कुछ सवाल हैं जिनका जवाब अगर आप दे सकें तो कुछ गलतफहमियां दूर हो जाएं। पहला सवाल तो ये कि आपके ही वामपंथी छात्र संगठन के लिए अपना भविष्य चौपट कर देने वाले लोग लगातार आईबीएन-7 और तमाम दूसरे चैनलों में प्रताड़ना और छंटनी के शिकार हुए तब आपने क्या उनका साथ दिया ? आप ही के समकालीन और ‘आईसा’ में अपनी ऐसी-तैसी कराने वाले अधेड़ होते नौजवानों ने नौकरी पाने के लिए आपसे मदद की गुजारिश की, लेकिन आपने मदद तो दूर उनका फोन भी उठाना गंवारा नहीं समझा। माना कि नौकरी के लिए सिफारिश करना आपके सैद्धांतिक तेवर के खिलाफ था, तो क्या आपने अपने संस्थान में रिक्रूटमेंट के लिए परमस्वार्थी, आत्मकेंद्रित, कौवारोरकला निपुण चूतरचालाक आशुतोष जी के साथ मिलकर कोई पारदर्शी सिस्टम बनाया ? क्या आपने खुद पैरवी के जरिए अमर उजाला, स्टार न्यूज और आईबीएन-7 में जगह नहीं हथियाई ? कहिए तो नाम बता दूं…लेकिन जाने दीजिए आपके चक्कर में उन भले लोगों की इज्जत का कीमा क्यों बनाया जाय।

पंकज भाई न जाने कितने लोग आए दिन मक्कारों की मंडी मीडिया में नौकरी से निकाले जाते हैं। कई लोग तो सच में सीपीआई-एमएल में होलटाइमर रह चुके हैं लेकिन वो लोग इस कदर बर्खास्तगी विलाप तो नहीं करते। मैंने देखा है उन लोगों को भूखे रहकर दिन गुजारते लेकिन क्या मजाल कि दीनता उनके पास फटक भी जाए। क्या मजाल कि मजबूरी उन्हें किसी के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर सके। आपको नहीं पता लेकिन आपसे बहुत काबिल कई कॉमरेड अनुवाद और घोस्ट राइटिंग जैसे दोयम दर्जे के काम करते हुए इसी दिल्ली में गुजर-बसर कर रहे हैं। वही लोग जिनका बौद्धिक पंगु पालीवाल, अकर्मण्य-अहंकारी आशुतोष और पेंदी रहित पंकज परवेज ने अनुराग जैसे अंधभक्तों को शिखंडी बनाकर बध कर डाला। लेकिन वो लोग तो नहीं गए प्रेस क्लब के दरवाजे पर पेट्रोल की शीशी लेकर ‘आत्मदाद’ लेने।

शर्म कीजिए पंकज भाई सात-आठ सालों में ठीक-ठाक मालमत्ता बना लिया हैं, काहे नौटंकी कर पब्लिक के सामने खुद को नंगा कर रहे हैं। होलटाइमर रहे हैं और अब कोई आर्थिक संकट भी नहीं है, तो क्यों नहीं किसी कायदे के काम में लग जाते। आप कह रहे हैं कि मित्रों की प्रतिक्रिया देखकर हौसला बढ़ा है। कमाल करते हैं अपने चैनल के चेहरे पर ‘हौसला’ चिपकाकर उसका हौसला तो पस्त कर दिया और अब चले हैं खुद का हौसला बढ़ाने। 

लेखक के. गोपाल से संपर्क anujjoshi1969@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.


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आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

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तब पंकज श्रीवास्तव की तनी हुई मुट्ठियां लाखों के पैकेज में विश्राम कर रही थीं!

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आशुतोष से फिक्सिंग के बाद ‘बागी’ बने पंकज श्रीवास्तव, 2017 में ‘आप’ के टिकट से यूपी में लड़ेंगे चुनाव!

एसोसिएट एडिटर पंकज श्रीवास्तव को नान-परफारमेंस में खुद की बर्खास्तगी का एहसास पहले से था. इसी कारण उन्होंने कभी आईबीएन7 के मैनेजिंग एडिटर रहे और आजकल ‘आप’ के खास नेता बने घूम रहे आशुतोष से संपर्क साधा. आशुतोष के जमाने में ही पंकज श्रीवास्तव की भर्ती हुई थी. आशुतोष और पंकज की डील हुई. इसी डील के तहत यह तय हुआ कि ऐन चरम चुनावी प्रक्रिया के बीच पंकज श्रीवास्तव अपने नए मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्थी को ‘आप’ और केजरीवाल को लेकर एक मैसेज करेंगे. सबको पता है कि टीवी में इस तरह के आंतरिक मैसेज का अंजाम क्या होता है. पंकज श्रीवास्तव को समय से पहले यानि चुनाव बाद तय बर्खास्तगी से पहले ही बर्खास्त कर दिया गया.

पंकज ने बर्खास्त होते ही पहले से तय रणनीति के तहत सुमित अवस्थी को भेजे गए मैसेज का स्क्रीनशाट फेसबुक पर लगा दिया और साथ ही बेहद क्रांतिकारी जोशीला भाषण लिख डाला. जो पंकज श्रीवास्तव अपने फेसबुक वॉल पर किसी भी पोस्ट के लिए अपने फ्रेंड्सलिस्ट से बाहर के लोगों के लिए कमेंट बाक्स बंद रखते हों, उन पंकज श्रीवास्तव की ये क्रांतिकारी पोस्ट देखते ही देखते सैकड़ों बाहर शेयर हो गई. इसके पीछे ‘आप’ नेता आशुतोष का हाथ था. उनके इशारे पर ‘आप’ की आईटी विंग ने धड़ाधड़ शेयर करना शुरू कर दिया.

पंकज श्रीवास्तव के मसले पर ‘आप’ नेता आशुतोष ने खेलना शुरू कर दिया, ट्विटर के जरिए, ताकि इस बर्खास्तगी का फायदा ‘आप’ को मिल सके और ‘भाजपा’ को डैमेज किया जा सके. आशुतोष ने जो फटाफट तीन ट्वीट किए हैं पंकज के मसले पर, उससे साफ जाहिर होता है कि उन्हें सब कुछ पता था और सब कुछ उनकी सहमति से हुआ.  आशुतोष के ट्वीट को आम आदमी पार्टी की तरफ से रीट्वीट किया गया और देखते ही देखते पूरा मामला वायरल हो गया. आशुतोष के तीन ट्वीट इस तरह हैं…

ashutosh ‏@ashutosh83B
IBN7 is owned by Reliance. Sacking of Pankaj shows BJP and Reliance can go to any extent to stop AAP in Delhi .

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj wrote an SMS to his editor at 8pm, his services was terminated by 1030. Editor Umesh Upadhaya is brother of Satish Upadhaya , cont..

ashutosh ‏@ashutosh83B
Pankaj Srivastav, associate Editor in IBN7 was sacked because he objected blackout of AAP and Kejriwal on channel . Cont…

चर्चा है कि पंकज श्रीवास्तव की आशुतोष से जो डील हुई है, उसके तहत पंकज 2017 के यूपी के विधानसभा चुनाव में अपने गृह जनपद रायबरेली से ‘आप’ पार्टी के टिकट पर विधायक का चुनाव लड़ेंगे. इसी की पृष्ठभूमि के तहत पंकज को दिल्ली चुनाव से ठीक पहले शहीद की तरह पेश करने का फैसला लिया गया. अब जो कुछ हो रहा है उसी के तहत हो रहा है. पंकज श्रीवास्तव पहले से तय एजेंडे के तहत अब दिल्ली प्रेस क्लब में प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे हैं और आम आदमी पार्टी इस प्रेस कांफ्रेंस व इस मामले को तूल पकड़ाने की तैयारी कर रही है. पंकज पूरे चुनाव तक यूं ही खुद को शहीद बनाकर घूमते बोलते बतियाते दिखेंगे.

ज्ञात हो कि जब आईबीएन7 में सैकड़ों कर्मचारियों को निकाला गया तब न तो आशुतोष एक शब्द बोले थे और न ही पंकज श्रीवास्तव. तब दोनों ही लाखों की सेलरी और अपनी अपनी कुर्सी के कारण चुप बैठे रहे. जब आईबीएन7 को अंबानी ने खरीद लिया तब भी पंकज श्रीवास्तव चुप बैठे रहे थे. एंकर तनु शर्मा के मसले पर जब फिल्म सिटी में प्रदर्शन हुआ तो पंकज श्रीवास्तव को इसमें शरीक होने के लिए इनकी कम्युनिस्ट पार्टी के साथियों ने मैसेज भेजा था, तब भी पंकज श्रीवास्तव आफिस से बाहर नहीं निकले थे. अब जब उनका आगे का करियर (राजनीति में) सेट हो गया है तो एक बार फिर हुंकार भरकर क्रांतिकारी बन गए हैं. क्या यह क्रांतिकारिता की फिक्सिंग नहीं है. जब इच्छा करे तब करियरिस्ट बनकर क्रांति पर चुप्पी साधे रहो और जब मौका अवसर दिखे राजनीति में पांव जमाने की तो क्रांतिकारी बनकर हुंकार भरने लगो. अंततः है तो मामला करियर और पापी पेट का ही.

इस पूरे मामले पर युवा और तेजतर्रार पत्रकार राहुल पांडेय कहते हैं: ”जब शहादत कला बन जाती है तो शहीदों पे बड़ी हंसी आती है।”

आईबीएन7 में काम कर चुके Kishor Joshi कहते हैं: ”दुःख तब होता है जब अपने पर आ पड़ती है, आपने तो एकतरफा खबरों को दिखाने का मुद्दा उठाया और चैनल को वो गलत लगान और suspend कर दिया लेकिन कभी सोचा जब 300 लोग बिना गलती के एक साथ निकाले गए थे तब आपने कुछ कहा या विरोध जताया? अब जब अपने पर आ पड़ी तो आप शहीद का श्रेय लेने में चूक नहीं रहे हैं।”

अन्य जानकारियों के लिए इस मामले की मूल खबर को पढ़ सकते हैं, जिसका शीर्षक नीचे है…

आईबीएन7 में कचरा हटाओ अभियान जारी, अबकी पंकज श्रीवास्तव हुए बर्खास्त

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कल्पतरु एक्सप्रेस ने 40 को बाहर का रास्ता दिखाया, नाराज कर्मचारी न्यायालय की शरण लेंगे

दिवाली पर अपने कर्मचारियों को बोनस देकर खुश करने वाले आगरा, मथुरा और लखनऊ से प्रकाशित होने वाले दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस ने दिवाली के एक पखवारे के भीतर ही अपने 40 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। अचानक इतने व्यापक पैमाने पर हुई छंटनी से कर्मचारियों में रोष है। हटाये गये कुछ कर्मचारियों ने न्यायालय की शरण लेने का भी मन बनाया है।  बताया जाता है कि दैनिक ने आर्थिक तंगी का बहाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर कर्मचारियों की छंटनी की है। हटाए गये अधिकतर कर्मचारी सम्पादकीय विभाग के हैं। आगरा और मथुरा से 32 और लखनऊ से आठ कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है।

यह छंटनी इतनी जल्दी में की गयी है कि कर्मचारियों को कुछ सोचने-समझने का मौका ही नहीं मिला है। बिना नोटिस के और बिना कोई उपयुक्त कारण बताये इन कर्मचारियों को हटाया गया है। प्रबन्धन के छंटनी के निर्देश पर विभिन्न संस्करणों में उच्च पदों पर कार्यरत लोगों ने बहती गंगा में अपनी दुश्मनी भी साध ली है। छंटनी में ज्यादातर एेसे पत्रकारों को निशाना बनाया गया है जो काम में तो मजबूत हैं लेकिन प्रबन्धकों की चापलूसी नहीं करते हैं। इसके उलट प्रबन्धन की चाटुकारिता करने वाले मगर काम से कमजोर कर्मचारी इस मार से बचा लिये गये हैं।

हटाये गये कर्मचारियों में नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि हटाए जाने के पहले न ही उन्हें कोई नोटिस दी गयी है और न ही नियमानुसार उन्हें तीन माह का वेतन दिये जाने की बात की जा रही है। एेसे कर्मचारियों को अचानक कार्यालय बुलाया गया और धमकाने के अन्दाज में काम पर न आने का आदेश सुना दिया गया। एेसे कर्मचारियों को केवल बकाया वेतन के जल्द भुगतान का आश्वासन दिया गया है। आगरा कार्यालय से हटाए गये एेसे कई कर्मचारियों ने न्यायालय जाने का मन बनाया है।

इसके आगे की कथा पढ़िए….

बेटा गंवाया, मां गंवायी, ऊंगली कटायी, नौकरी भी गयी

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‘पी7न्यूज’ में रमन पांडेय समेत कई वरिष्ठों की नो इंट्री, चैनल की कमान उदय सिन्हा को

जब लुटिया डूबती है तो हर कोई इसके आगोश में आ जाता है।  कुछ ऐसा हाल इन दिनों पर्ल्स ग्रुप के चैनल “पी7” का है। खिसयानी बिल्ली खम्बा नोचे वाली कहावत के तहत पी7 चैनल का मैनेजमेंट अपने कर्मचारियों के साथ बदतमीजी पर उतारू है। आउटपुट हेड रमन पांडेय समेत कई लोगों की चैनल में नो एंट्री कर दी गयी है। पीएसीएल ग्रुप सेबी के शिकंजे में जबसे फंसा है तबसे इसके मीडिया वेंचर का बुरा हाल है। चैनल की आर्थिक स्थिति कई महीनों से खराब है और लगातार बिगड़ती जा रही है।  वक्त से सैलरी न मिल पाने के कारण चैनल के साथ जी जान से काम करने वाले कर्मचारी परेशान हैं।

जुलाई से सैलरी की दिक्कत से जूझ रहे कर्मचारी अपनी हक़ की लड़ाई के लिए लेबर कमिश्नर तक पहुंच गए हैं। लेबर कमिश्नर की दखलंदाज़ी के बाद लोगों की अगस्त तक की तो सैलरी तो दे दी गयी लेकिन सितम्बर और अक्टूबर की सैलरी का पता नहीं है। कर्मचारी जब अपनी समस्या को लेकर लेबर कमिश्नर तक पहुंचे तो चैनल के मैनेजमेंट और कुछ चम्पुओं को ये बात नागवार गुजरी। इसके बाद अब मीडियाकर्मियों को निशाना बनाने के लिए एचआर द्वारा रोज कोई न कोई नया रूल बनाया जा रहा है। कर्मचारियों को इसलिए परेशान किया जा रहा है क्योंकि उन्होंने अपनी सैलरी की लड़ाई को लेबर कोर्ट तक पहुंचा दिया है।

लेबर कमिश्नर की लगातार लताड़ से प्रबंधन काफी परेशान है। लेबर कमिश्नर ने नोटिस भेजा है कि अगर प्रबंधन सैलरी देने में असमर्थ है तो उसके खिलाफ रिकवरी की कार्रवाई क्यों न की जाए।  असिस्टेंट लेबर कमिश्नर शमीम अख्तर की तरफ से चैनल को हिदायत दी गयी कि जब तक सबकी सैलरी नहीं दी जाती तब तक प्रबंधन किसी भी कर्मचारी को परेशान ना करे या उसको नहीं निकाले। इसके बावजूद रूल4 का उल्लंघन करते हुए चैनल ने तुगलकी फरमान जारी रखा और कई लोगों की चैनल के गेट पर नो एंट्री लगा दी है। उन सभी से ये बोला गया है कि वो अपना इस्तीफा दे दें।  इनमें आउटपुट हेड रमन पांडेय समेत कुल 7 लोगों को नो एंट्री का फरमान सुनाया गया है।  गार्ड्स को इन सभी को रोकने के लिए बोला गया है। मतलब साफ है कि किसी तरह इनको परेशान कर इनसे इस्तीफा माँग लो।  वहीं अब चैनल का सारा काम-काज लगभग उदय सिन्हा को सौंप दिया गया है। इनपुट, आउटपुट और पीसीआर डिपार्टमेंट का हेड फिलहाल कोई नहीं है। सारा कुछ उदय सिन्हा के निर्देशन में हो रहा है। बताया जा रहा है कि करीब 50 लोगों की लिस्ट प्रबंधन ने तैयार कर ली है जिनको अब बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।  खासकर मोटी सैलरी वालों को प्रबंधन निकालना चाहता है।

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जनसंदेश टाइम्स बनारस तालाबंदी की ओर, संपादक आशीष बागची ने डेढ़ दर्जन लोगों को निकाला

खबर है कि जनसंदेश टाइम्स, बनारस अब तालाबंदी के मुहाने पर है। सिर्फ घोषणा ही बाकी है। मालिकों ने हिटलरशाही रवैया अपनाते हुए एक नवंबर को डेढ़ दर्जन से अधिक कर्मचारियों को कार्यालय आने से मना कर दिया। इन कर्मचारियों का कई माह का वेतन भी बकाया है, जिसे मालिकानों ने देना गवारा नहीं समझा। इसके साथ ही अखबार के संस्करण भी सिमटा दिये गये। सिटी और डाक दो ही संस्कदर अब रह गये। पहले सभी जिलों के अलग-अलग संस्करण छपते थे। अब दो ही संस्करण में सभी जिलों को समेट दिया गया है।

ये हालात तब हैं जब काशी पत्रकार संघ के अध्याक्ष-कोषाध्यक्ष समेत कई महत्वकपूर्ण पदाधिकारी जनसंदेश टाइम्सज के ही है, लेकिन उन्होंने अपने साथियों के मनमाने तरीके से निकाले जाने पर चूं करने तक की जहमत नहीं उठायी। कई निकाले गये कर्मी तो यह आरोप लगाते घूम रहे थे कि इस खेल में पत्रकार संघ के पदाधिकारी भी शामिल हैं। मालिकानों ने उन्हें सेट कर लिया है। जो निकाले गये हैं उनमे संपादकीय विभाग के डीएनई वशिष्ठर नारायण सिंह, रतन सिंह संदीप त्रिपाठी, रमेश श्रीवास्तव, अशोक यादव, राजकुमार यादव, संजय श्रीवास्तव, सौरभ बनर्जी आदि शामिल हैं।

निकाले गये किसी भी कर्मचारी को कुछ भी लिखित में नहीं दिया गया है। उन्हें संपादक आशीष बागची ने 31 अक्टूबर की रात में मौखिक रूप से फरमान सुना दिया कि आप लोगों को कल से नहीं आना है। इन कर्मियों को नियमानुसार दो माह का अतिरिक्त वेतन दिया जाना तो दूर उनका कई माह का बकाया वेतन भी नहीं दिया गया। एक नवंबर को ये सभी कर्मी जब अपना हिसाब लेने आफिस पहुंचे तो कोई सीधे मुंह बात करने को तैयार नहीं हुआ। एचआर कर्मियों ने उन्हें पन्द्रह दिन बाद आफिस आने को कहा।

साभार- क्लाउन टाइम्स, वाराणसी.

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