सहारा इंडिया अपने एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों को अपना कर्मचारी नहीं मानता!

sahara 640x480

सहारा इंडिया के चेयरमैन सुब्रत रॉय

एक बड़ी खबर सहारा इंडिया कंपनी से आ रही है. कंपने कोर्ट में यह लिखकर दे दिया है कि उसका अपने कमीशन एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों से कोई संबंध नहीं है. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सुब्रत राय ये पैसा अपने पास से दे रहे हैं या गरीबों से वसूली गयी रकम से?

चिटफंडिये, मीडिया और मोदी सरकार, जवाबदेही किसकी…. : देश के गरीबों का पैसा मारने वाले चिटफंडियों के मसीहा बन चुके सुब्रत राय सहाराश्री जेल के बाहर हैं. रिहाई के बदले सहाराश्री से सुप्रीम कोर्ट सैकड़ों करोड़ जमा कराते जा रही है. बड़ा सवाल है कि ये पैसा क्या सुब्रत राय सहाराश्री अपने पास से दे रहे हैं या फिर गरीबों से ही नये तरीके से वसूली जा रही रकम में से ही एक हिस्सा जमा कराई जा रही है. बेल पर बाहर सहाराश्री फिर से अपना जाल बिछाने में लग गये हैं. जिसके लिए कई राज्यों की राजधानी में ग्लैमर शो आयोजित किये जा रहे हैं. नेताओं और अधिकारियों को इसमें मेहमान बनाया जा रहा है. खुलेआम ये खेल उस मोदी सरकार के नाक के नीचे चल रहा है, जो दावा करती है कि ना खायेंगे ना खाने देंगे. मोदी सरकार अदालतों को दोषी ठहरा कर पल्ला नहीं झाड़ सकती क्योंकि निचली से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की अदालतें चिटफंडियों को अब जमानत पर रिहा नहीं होने देती हैं.

चिटफंडिये गरीबों का पैसा सीधे अंदर करने के लिए सरकारी पॉलिसी की खामी, सत्ता और प्रशासन के घटिया चरित्र का फायदा उठाते हैं. उदाहरण के लिए अपने कामकाज के पाक-साफ बताने के लिए कुछ सालों से चिटफंडिये कोऑपरेटिव सोसायटी के तहत रजिस्ट्रेशन कराकर, चंद कागजी खानापूर्ति के जरिए देश के दूर-दराज के अंचलों में गरीबों से अरबों-खरबों की वसूली कर रहे हैं. शिकायत होने पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाती है क्योंकि कोऑपरेटिव सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कृषि मंत्रालय में होता है. घपले होने की शिकायत पर कृषि मंत्रालय सीमित कार्रवाई ही कर सकती है, जिसके चलते चिटफंडिये बेखौफ हैं. कृषि मंत्रालय के अधिकारी भी सबकुछ जानते हुए भी सहारा जैसी कंपनियों के दोहन पर कोई सख्त कदम नहीं उठा रहा हैं. जो अलग-अलग नामों से कार्यरत है. जिसके कारण सत्ताधीशों पर भी सवाल खड़े होते हैं.

स्थानीय स्तर पर कार्रवाई और दबावों से बचने के लिए चिटपंडिये लंबे समय से मीडिया में भी पैसा लगा लगा रहे हैं, जिसकी कायदे से शुरुआत सुब्रत राय सहाराश्री ने की. यानि जो पत्रकार ऐसे चिटफंडियों को बेनकाब करता अब ऐसी कंपनियों का कर्मचारी बन गया. सही गलत दलील देकर अपने पेट पालने वाली सैलरी को बचाने की जुगाड़ में लग गया. चिटफंडियों ने पत्रकारों को तनख्वाह की लालच देकर पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया. सत्ताधारी भी कुंद होती जा रही पत्रकारिता में ऐसे चिटफंडियों को जमकर सपोर्ट किया. इन चिटफंडियों के कार्यक्रमों में हिस्सा बने. गरीब को लूटने वाले केवल सुब्रत राय सहारा ही नहीं, वो राजनेता भी कसूरवार हैं जो इन चिटफंडियों के जरिए चुनावों में अरबों रूपये कैश में पाते हैं और पानी की तरह बहाते हैं.

कानूनी दांवपेंचों और खामियों का सहारा लेकर चिटफंडिये गरीब आदमी के पैसों का दोहन करने के लिए कई रास्तों का सहारा लेते हैं. इनके निशाने पर हमेशा गरीब आदमी ही होता है, जो अपने खून-पसीने की कमाई के चंद हजार रूपयों को वापस पाने के लिए कोर्ट-कचहरी तक नहीं पहुंच पाता. चिटफंडिये देश भर में एजेंटों का जाल बिछाकर लाखों-करोड़ों गरीबों से पैसे एजेंटों के माध्यम से लूटते रहते हैं. एजेंट भी स्थानीय निवासी होते हैं, जो कुछ हजार की सैलरी की लालच में अपने करीबी लोगों को बहकाकर पैसा जमा कराते रहते हैं.

2014 तक चली केंद्र की कांग्रेस सरकार को इस बात का श्रेय देना होगा कि उसने सभी बड़े चिटफंडियों को सलाखों के पीछे भेजकर इस तरह के धंधे पर लगाम कस दी थी. लेकिन चिटफंडियों के सरताज की रिहाई के लिए किसी हद तक मोदी सरकार की अबतक की अनदेखी जिम्मेदार है. चिटफंडियों ने गरीबों के दोहन के लिए नये-नये तरीकों को ईजाद कर लिया है. कानूनी एजेंसियां और सरकार भी चिटफंडियों के वसूली के नये-नये तरीकों को बखूबी जानती है. लेकिन कार्रवाई तब होती है जब पानी नाक के ऊपर जाने लगता है. तो सुनो सरकार जी! पानी अब नाक के ऊपर आ गया है.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: