आज पहली अप्रैल फूल्स-डे पर (कपिल) ‘सिब्बल्स-डे’ का आयोजन

: राजघाट, सुबह 11 से शाम 5 बजे : इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ हमारे अभियान के तहत इस रविवार 1 अप्रैल को राजघाट पर सूचना प्रसारण मंत्री कपिल सिब्बल के साथ हम सिब्बल्स डे मना रहे हैं. पिछले एक साल में मंत्री महोदय के प्री-सेंसरशिप पर दिये गए बयान सारी दुनिया में हंसी का विषय बन गए. आईटी एक्ट में 2011 में किये गए संशोधनों के बाद दुनिया के बीच भारत की छवि एक डेमोक्रेटिक देश की न होकर तानाशाह की हो गई है और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि माननीय कपिल सिब्बल जी ही हैं. यह हम नहीं जर्नलिस्ट्स के अंतर्राष्ट्रीय संगठन ‘रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर्स’ का कहना है. संगठन ने हाल ही में दुनिया भर के उन देशों की सूची तैयार की थी जहां इंटरनेट पर सेंसरशिप लगाई गई है और भारत को ‘एनिमीज आफ द इंटरनेट’ की लिस्ट में आब्जर्वेशन के लिए रखा गया.

मूर्खता से भरपूर रहेगा यह कार्यक्रम : देश से आई टी एक्ट को हटाने और इंटरनेट पर सरकार के सकारात्मक रवैये की मांग करते हुए दिल्ली के तमाम ब्लागर्स, इंटरनेट यूजर्स, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता रविवार को राजघाट परिसर में एकत्र हो रहे हैं. जोकर टोपी (जिसमें ‘मैं हूं सिब्बल’ लिखा होगा) पहने हुए हाथों में सीटी लेकर हम सभी लोग गांधीवादी तरीके से राजघाट पर मूर्खता के गीत गाएंगे और एक दूसरे को मूर्खता पूर्ण तरीकों से गिफ्ट देकर और केक काट कर फूल्स डे विश करेंगे. इस दौरान भारत में इंटरनेट को मूर्खता पूर्ण तरीकों से सेंसर किये जाने की पुरानी घटनाओं को याद कर ठहाके भी लगाए जाएंगें.

आपके लिये हमारा स्पेशल गिफ्ट हैम्पर : आपके लिये हमने एक स्पेशल गिफ्ट हैम्पर भी तैयार कर रखा है जिसमें एक सिब्बल कैप (जोकर कैप), सींटी, चुटकुलों की किताब, कुछ गुब्बारे, सांप सीठी और लूडो शामिल है. कृपया इसे लेना न भूलें.  संपर्क करें- वेबसाइट- www.saveyourvoice.in फेसबुक- www.facebook.com/saveyourvoice मोबाइल- 9810659060, 9717900302, 8287460630, 09336505530, 07499219770

प्रेस रिलीज

मीडिया में एससी, एसटी का प्रतिनिधित्व हो : प्रो. जेफरी

नई दिल्ली। मीडिया मामलों के प्रमुख हस्ती प्रोफेसर राबिन जेफरी ने कहा कि भारतीय मीडिया में अनुसूचित जाति और अनुसूचिज जनजाति के लोगों का प्रतिनिधित्व दिये जाने की जरूरत है। जेफरी ने कहा कि प्रसारण स्टूडियो में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कम है। उन्होंने कहा कि लम्बे समय से दलित और आदिवासी मुख्यधारा से कटे रहे हैं और यह समस्या अभी भी बरकरार है। जेफरी ने कहा कि भारतीयों को उस मार्ग पर चलना चाहिए जिसपर अमेरिकी समाचारपत्र सोसाइटी 35 वर्ष पहले चली थी।

मतदान की रिपोटिंग में ट्विटर और फेसबुक की मदद लेंगे म्यांमार के पत्रकार

यांगून। म्यांमाक के पत्रकार होने वाले उपचुनावों में प्रेस पर लगी पाबंदी को मात देते हुए ‘ब्रेकिंग न्यूज’ के लिए ट्विटर और फेसबुक की मदद लेंगे। कुछ पत्रकारों के लिए कल के उपचुनाव उनके करियर के लिए सबसे बड़ी खबर होगी। म्यांमार में लंबे समय से मीडिया पर जारी सेंसरशिप के कारण मीडियाकर्मियों के लिए मतदान की रिपोटिंग करना बड़ी चुनौती है। यह पहली बार है जब विपक्षी नेता आंग सान सू ची चुनाव लड़ रही हैं। सभी निजी समाचारपत्र साप्ताहिक हैं और जो समाचारपत्र चुनाव अगले दिन प्रकाशित नहीं होंगे, उन्होंने पूरे दिन की कवरेज सोशल मीडिया पेजों पर करने की तैयारी कर ली है।

जय प्रकाश नारायण के अनछुए पहलुओं पर नई किताब

नई दिल्ली। भारतीय इतिहास के विख्यात पुरूष जय प्रकाश नारायण के जीवन के कई अनछुए पहलुओं को नयी किताब ''जेपी-जैसा मैंने देखा'' में उजागर किया गया है। अमलेश राजू द्वारा संपादित इस पुस्तक में 53 व्यक्तियों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। इनमें से कई व्यक्ति आज हमारे बीच नहीं हैं। डायमंड प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक के बारे में अमलेश ने बताया कि इसे तैयार करने में मुझे एक दशक से अधिक का समय लगा है। इसके लिए मैं कई लोगों से मिला और काफी मेहनत की। इस पुस्तक का गांधी शांति प्रतिष्ठान में विमोचन किया गया। किताब में जेपी आंदोलन में शामिल ऐसे व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है जिन्हें लोग शायद भूल चुके हैं। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रवण गर्ग थे। समारोह में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन, प्रोफेसर प्रेम सिंह सहित कई व्यक्ति मौजूद थे।

प्रतापगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार उमेश श्रीवास्तव नहीं रहे

प्रतापगढ़। जिले के वरिष्ठ पत्रकार एवं अधिवक्ता उमेश श्रीवास्तव का संक्षिप्त बीमारी के बाद आज यहां निधन हो गया। वे 62 वर्ष के थे। उमेश श्रीवास्तव काफी समय पीटीआई न्यूज एजेंसी में अंशकालिक पत्रकार के रुप में कार्यरत थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके निधन पर प्रतापगढ़ में पत्रकार कल्याण परिषद एवं अधिवक्ताओं की एक बैठक हुई जिसमें उनके निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गयी।
 

मुझे खुदकुशी के लिए मजबूर नहीं करो : काजमी

नई दिल्ली। दिल्ली में इस्राइली दूतावास की कार पर हुए बम हमले के आरोप में गिरफ्तार किए गए पत्रकार सैयद मोहम्मद अहमद काजमी ने आज जमानत की गुहार लगाते हुए कहा कि उन्हें खुदकुशी के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट विनोद यादव के समक्ष काजमी के वकील गजिंदर कुमार ने कहा, ‘‘काजमी को उस स्थिति में जाने के लिए विवश नहीं करना चाहिए कि वह खुदकुशी कर लें।’’

कुमार ने कहा कि उनके मुवक्किल को कैद में रखकर उस अपराध की सजा दी जा रही है, जो उसने किया ही नहीं। उन्होंने कहा कि काजमी को पुलिस ने पकड़ा क्योंकि वह कुछ मुद्दों और राजनीतिक मामलों पर खुलकर बोल रहे थे। कुमार ने कहा, ‘‘कुछ मुद्दों पर काजमी के विचार के लिए उन्हें अपराध का षण्यंत्रकारी नहीं बनाया जा सकता।’’ काजमी के वकील ने कहा कि जांच एजेंसी ने जांच पूरी कर ली है और उसने उनके मुवक्किल की हिरासत की मियाद 27 मार्च को पूरा होने से दो दिन पहले अदालत का रुख कर लिया और ऐसे में आगे की पूछताछ की जरूरत नहीं है।

अमर उजाला से चेतन गुरुंग का इस्‍तीफा

अमर उजाला, देहरादून में वरिष्‍ठ पर पर कार्यरत रहे पत्रकार चेतन गुरुंग ने अमर उजाला से इस्‍तीफा दे दिया है. चेतन के खिलाफ भ्रष्‍टाचार की शिकायतों की जांच चल रही थी. बताया जा रहा है कि उनका तबादला भी देहरादून से बाहर कर दिया गया था. चेतन ने अपनी नई पारी की शुरुआत देहरादून में ही शाह टाइम्‍स से की है. चेतन को पूर्व मुख्‍यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का करीबी माना जाता रहा है. उन्‍होंने शाह टाइम्‍स में वरिष्‍ठ पद पर ज्‍वाइन किया है. उल्‍लेखनीय है कि शाह टाइम्‍स का प्रकाशन नोएडा समेत कई स्‍थानों से होता है.

 

 

नीतीश सरकार से घबराए पत्रकार कल होटल पाटलीपुत्र अशोक पहुंचे

: बिहार में प्रेस काउंसिल की टीम शुरू करेगी जांच : बिहार में अघोषित रूप से प्रेस की स्‍वतंत्रता पर सेंसरशिप लागू होने के आरोपों के बीच प्रेस काउंसिल के अध्‍यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा गठित तीन सदस्‍यीय समिति 1 अप्रैल यानी कल से इस मामले में अपनी जांच शुरू करेगी. अपना बयान दर्ज कराने वाले पत्रकार राजीव रंजन नाग की अध्‍यक्षता वाली समिति से पटना के होटल पाटलीपुत्र अशोक में मुलाकात कर सकते हैं. तीन सदस्‍यी समिति में नाग के अलावा अरुण कुमार और कल्‍याण बरुआ शामिल हैं.

उल्‍लेखनीय है कि जस्टिस काटजू ने अपने बिहार के दौर पर नीतीश सरकार पर पत्रकारिता को दबाने के लेकर सवाल खड़े किए थे, जिसके बाद बिहार की पत्रकारिता दो भागों में बंट गई थी. जस्टिस काटजू के इस बयान पर बिहार एवं बिहार से बाहर भी काफी हो हल्‍ला मचा था. इसी दौरान काटजू ने स्‍वयं संज्ञान लेते हुए बिहार में पत्रकारिता की स्‍वतंत्रता की स्थिति का पता लगाने के लिए तीन सदस्‍यी समिति गठित करने की घोषणा की थी.

 

 

होशंगाबाद में गुलाब कोठारी, निहार कोठारी, भुवनेश जैन समेत सात के विरुद्ध मुकदमा

मध्‍य प्रदेश में पत्रिका के सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है. होशंगाबाद मुख्‍य न्‍यायिक दंडाधिकारी के न्‍यायालय में अखबार के प्रधान संपादक समेत सात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 500 तथा 501 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है. होशंगाबाद के डा. पीसी करुण ने न्‍यायालय में परिवाद दायर किया है कि अखबार ने उनके खिलाफ जानबूझकर गलत तथा छवि धूमिल करने वाली खबरें छापी.

डा. पीसी करुण की तरफ से अधिवक्‍ता एलएन वर्मा और मनोज चौरे ने परिवाद दायर कर के अखबार के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी, प्रबंध संपादक निहार कोठारी, मुद्रक एवं प्रकाशक हनुमान प्रसाद तिवाड़ी, स्‍थानीय संपादक विनोद पुरोहित, स्‍टेट संपादक भुवनेश जैन, होशंगाबाद के ब्‍यूरोचीफ आशीष विल्‍लोरे तथा संवाददाता जितेंद्र वर्मा के खिलाफ छवि खराब करने का आरोप दर्ज कराया है.

 

 

अमर उजाला, जम्‍मू के जीएम बने राजीव श्रीवास्‍तव, पुष्‍पेंद्र एवं विशाल का तबादला

अमर उजाला, बनारस से खबर है कि राजीव श्रीवास्‍तव का तबादला जम्‍मू के लिए कर दिया गया है. वे यहां पर विज्ञापन मैनेजर थे. मूल रूप से  आजमगढ़ के रहने वाले राजीव को जम्‍मू में जीएम बनाकर भेजा गया है. वे काफी समय से अमर उजाला से जुड़े हुए थे. मृदुभाषी राजीव का लम्‍बा समय कानपुर में बीता है. 

संध्‍या टाइम्‍स, दिल्‍ली से खबर है कि वरिष्‍ठ क्राइम रिपोर्टर पुष्‍पेंद्र चौहान को नवभारत टाइम्‍स में भेज दिया गया है. वे नोएडा में अखबार को अपनी सेवाएं देंगे. नोएडा में क्राइम की जिम्‍मेदारी संभाल रहे स्‍टाफ रिपोर्टर विशाल आनंद को पुष्‍पेंद्र की जगह संध्‍या टाइम्‍स को अपनी सेवाएं देंगे.

 

 

अमर उजाला में कई यूनिटों के जीएम बदले गए

अमर उजाला में कई यूनिटों के हेडों का तबादला कर दिया है. ये तबादले कुछ दिन पहले किए गए हैं परन्‍तु ये लोग अब अपना पदभार संभाल रहे हैं. अमर उजाला, बनारस के जीएम मनीष तिवारी का तबादला मेरठ यूनिट के लिए कर दिया गया है. मेरठ में जीएम रहे भवानी शर्मा को कानपुर भेज दिया गया है. कानपुर के जीएम रहे भूपेंद्र दुबे को प्रमोट करके कलस्‍टर हेड बना दिया गया है.

इसी तरह अमर उजाला, देहरादून के जीएम संजय शर्मा को इलाहाबाद भेज दिया गया है. संजय शर्मा की जगह दैनिक भास्‍कर, इंदौर से मुदित गुलाटी को लाया गया है. इलाहाबाद के जीएम चतुर्वेदी जी का तबादला कहां किया गया है इसकी जानकारी नहीं हो पाई है. बनारस में भी अभी तक किसी जीएम की नियुक्ति नहीं की गई है. उल्‍लेखनीय है कि अमर उजाला प्रबंधन ने अपनी नई नीति के तहत यूनिटों के जीएम के पास से मार्केटिंग का अधिकार ले लिया है. सभी यूनिटों के मार्केटिंग मैनेजर सीधे कलस्‍टर हेडों के संपर्क में रहेंगे. प्रत्‍येक कलस्‍टर हेड के जिम्‍मे चार से पांच यूनिट रहेगी.

 

 

फर्जी कार्ड पर यात्रा मामला : कई और पत्रकार संदेह के घेरे में

लखनऊ। फर्जी मान्यता प्राप्त पत्रकार का प्रेसकार्ड बना कर रेलवे की आंखों में धूल झोंकने वाले चारों पत्रकार अब अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फंस गये है। उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन ने बुधवार को फर्जी पत्रकारों पर और शिंकजा कस दिया है। सूचना विभाग की रिपोर्ट मिलने के बाद रेलवे की ओर से चारों के खिलाफ जीआरपी चारबाग में धोखाधड़ी व फर्जी कागजातों से लाभ प्राप्त करने के मामले में नामजद प्राथमिकी दर्ज करायी है। इस रैकेट में शामिल दर्जनों पत्रकार संदेहे के घेर में आ गये है। इसको लेकर रेलवे ने चारबाग रेलवे स्टेशन से जारी किये गये ‘संवाददाता कार्ड’ की जांच-पड़ताल शुरू करा दी है।

उल्लेखनीय है कि जालसाजों ने फर्जी मान्यता प्राप्त पत्रकार का परिचय पत्र बनवा कर रेलवे से ‘संवाददाता कार्ड’ जारी करा लिया था। इस कार्ड पर फर्जी पत्रकारों ने लाखों रुपये की रेल यात्रा कर डाली। चारबाग रेलवे स्टेशन पर इसका खुलासा होने के बाद रेल अधिकारियों में बैचेनी बढ़ गयी थी और इनका सत्यापन कराने के लिए सूचना विभाग को पत्र लिखा था। उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक नीरज शर्मा ने बताया कि रेलवे ने चारों फर्जी पत्रकारों की मान्यता के बारे में सूचना विभाग से सत्यापन के लिए पत्र लिखा था। सूचना निदेशालय व जिला सूचना कार्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए चारों पत्रकारों की मान्यता प्राप्त प्रेसकार्ड की जांच कराया।

विभाग ने बुधवार को रेलवे को भेजी गयी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि मुख्यालय व जिला सूचना कार्यालय के अभिलेखों में चारों पत्रकारों का नाम ही नहीं है। इन लोगों ने फर्जी प्रेसकार्ड बनवाकर रेलवे से संवाददाता कार्ड जारी करा लिया। उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए चारों फर्जी पत्रकारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने का निर्देश दिया। चारबाग रेलवे स्टेशन के मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक विजय राकेश चन्द्रा ने बुधवार की शाम जीआरपी चारबाग में फर्जी पत्रकार महेन्द्र प्रताप, परिचय पत्र संख्या 211, ऊर्जा टाइम्स, सुधांशु विश्वकर्मा, परिचय पत्र संख्या 641, जनजागरण, अरविन्द कुमार श्रीवास्तव, परिचय पत्र संख्या 642, जंग लहर और अब्दुल करीम, परिचय पत्र संख्या 1010, लहर टाइम्स के खिलाफ धोखाधड़ी व व फर्जी कागजातों से लाभ प्राप्त करने के मामले में नामजद प्राथमिकी दर्ज करायी है। इस रैकेट में शामिल दर्जनों फर्जी पत्रकार संदेह के घेरे में आ गये है। बहरहाल, उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन फर्जी पत्रकारों के रैकेट का पर्दाफाश कराने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन से जारी किये गये संवाददाता कार्डों की जांच शुरू करा दी है।

               फर्जी पत्रकारों का मामला भेजा जाएगा उत्तर रेलवे मुख्यालय

लखनऊ। मान्यता प्राप्त पत्रकार का फर्जी प्रेसकार्ड बनाकर आधे किराये में रेलवे का सफर करने वाले चारों जालसाजों के मामले को उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन ने गंभीरता से लिया है। जालसाजों पर अंकुश लगाने के लिए पूरे प्रकरण की रिपोर्ट उत्तर रेलवे मुख्यालय (दिल्ली) भेजी जा रही है, वहीं लखनऊ व वाराणसी स्टेशनों के बुकिंग पर्यवेक्षकों को गहन जांच के बाद ही संवाददाता कार्ड जारी करने के निर्देश दिये गये हैं। दूसरी ओर पुलिस अधीक्षक रेलवे ज्ञानेश्वर तिवारी ने जालसाजों की शीघ्र गिरफ्तारी के निर्देश दिये हैं।

उल्लेखनीय है कि जालसाजों ने फर्जी मान्यता प्राप्त पत्रकार का परिचय पत्र बनवा कर रेलवे से ‘संवाददाता कार्ड’ जारी करा आधे किराये में ट्रेनों में सफर किया है। सूचना विभाग ने जांच के बाद चारों पत्रकारों को फर्जी बताया। इसके बाद चारबाग स्टेशन के मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक ने इन जालसाजों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट जीआरपी चारबाग में दर्ज करायी। उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल के वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक नीरज शर्मा ने बताया कि जालसाजी के इस मामले को गंभीरता से लिया गया। जालसाजों पर अंकुश लगाने के लिए पूरे प्रकरण की रिपोर्ट उत्तर रेलवे मुख्यालय (दिल्ली) भेजी जा रही है, ताकि रेलवे से जारी होने वाले ‘संवाददाता कार्ड’ पर फर्जीवाड़ा रोकने के लिए ठोस कदम उठाया जा सके। उन्होंने बताया कि चारबाग व वाराणसी रेलवे स्टेशनों के मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षकों निर्देश दिया गया है कि गहन जांच के बाद संवाददाता कार्ड जारी किये जाएं। संदेह होने पर सूचना विभाग से प्रेसकार्ड का सत्यापन कराने के बाद ही संवाददाता कार्ड जारी करें। साभार : रास

 

 

चार फर्जी पत्रकारों ने रेलवे को लगाई लाखों की चपत

लखनऊ। ट्रेनों में आधे किराये में सफर करने का जालसाजों ने नया तरीका खोज निकाला है। रेलवे के जारी ‘संवाददाता कार्ड’ पर फर्जी पत्रकारों ने लाखों रुपये की रेल यात्रा कर ली है। इसका खुलासा उत्तर रेलवे लखनऊ मंडल प्रशासन ने चारबाग रेलवे स्टेशन पर किया है। यहां से जारी किये संवाददाता कार्ड में जो मान्यता प्राप्त पत्रकार का परिचय पत्र लगाया गया है, वह फर्जी पाया गया है। यह फर्जीवाड़ा कब से चल रहा है और रेलवे को कितनी आर्थिक क्षति हुई है, इसकी जांच के आदेश दिये हैं।

चारबाग रेलवे स्टेशन के स्टेशन प्रबंधक अमिताभ कुमार गत दिनों मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक कार्यालय का निरीक्षण कर रहे थे, उसी दौरान मान्यता प्राप्त पत्रकारों के जारी होने वाले संवाददाता कार्ड रजिस्टर पर नजर पड़ी तो कुछ पत्रकारों के विवरण पर शक हुआ। उन्होंने मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक को चार मान्यता प्राप्त पत्रकारों के कार्डों का सत्यापन कराने का निर्देश दिया। मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक ने चार मान्यता प्राप्त पत्रकारों महेन्द्र प्रताप, परिचय पत्र संख्या 211, ऊर्जा टाइम्स, सुधांशु विकर्मा, परिचय पत्र संख्या 641, जनजागरण, अरविन्द कुमार श्रीवास्तव, परिचय पत्र संख्या 642, जंग लहर और अब्दुल करीम, परिचय पत्र संख्या 1010, लहर टाइम्स सत्यापन कराने के लिए सूचना निदेशालय व जिला सूचना कार्यालय को लिखित पत्र दिया।

जांच में खुलासा हुआ है कि चारों मान्यता पत्रकारों के प्रेसकार्ड न तो जिला सूचना कार्यालय व न सूचना निदेशालय से जारी किया गया है। मुख्यालय व जिला सूचना कार्यालय के अभिलेख में चारों पत्रकारों का नाम ही नहीं है। फर्जी प्रेसकार्ड में पीछे की ओर नवीनीकरण के लिए कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि असली प्रेसकार्ड में इसका उल्लेख होता है। जालसाज ओरिजनल कार्ड की तरह कार्ड छपवा लेते हैं या फिर किसी कार्ड का स्कैन कराकर अपनी फोटो चिपका देते है। जिला सूचना अधिकारी की मुहर लगाकर कार्ड को एकदम पुख्ता बना लेते है। इसी कार्ड के आधार पर रेलवे से संवाददाता कार्ड जारी कराकर जालसाज ट्रेनों में आधे किराये पर सफर कर रहे हैं।

लखनऊ मंडल के वरिष्ठ मंडल वाणिज्य प्रबंधक नीरज शर्मा ने बताया कि सूचना विभाग से लिखित रिपोर्ट मिलने के बाद फर्जी पत्रकारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी जाएगी। रेलवे में प्रेसकार्ड जांच की कोई व्यवस्था नहीं रेलवे में मान्यता प्राप्त पत्रकारों के प्रेसकार्ड की जांच की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में हेराफेरी की आशंका ज्यादा रहती है। सूचना विभाग से जारी होने वाले मान्यता प्राप्त प्रेसकार्ड के आधार पर रेलवे संवाददाताओं के लिए प्रेस संवाददाता कार्ड जारी करता है। बाद में कार्ड में दिये गये नम्बर को कम्प्यूटरीकृत आरक्षण प्रणाली में फीड कर दिया जाता है। इसके बाद पत्रकारों को यात्रा के दौरान आरक्षित व अनारक्षित टिकटों में मूल किराये में पचास फीसदी की छूट दी जाती है। साभार : रास

 

 

अमर उजाला से सूर्यकांत द्विवेदी का इस्‍तीफा, हिंदुस्‍तान, मेरठ का संपादक बनने की चर्चा

अमर उजाला से खबर है कि सीनियर जर्नलिस्‍ट सूर्यकांत द्विवेदी ने इस्‍तीफा दे दिया है. सूर्यकांत नोएडा ऑफिस में कार्यरत थे. सूर्यकांत लम्‍बे समय तक अमर उजाला, मेरठ के संपादक भी रह चुके थे. पिछले साल हुए कई संपादकों के बदलाव में उन्‍हें नोएडा में कॉरपोरेट ऑफिस से अटैच कर दिया गया था, जबकि उनकी जगह शंभूनाथ शुक्‍ल को मेरठ का संपादक बना दिया गया था. सूर्यकांत लम्‍बे समय से पत्रकारिता में सक्रिय रहे हैं.

उनको लेकर चर्चा है कि वे हिंदुस्‍तान से जुड़ने जा रहे हैं. उनके इस्‍तीफे के बाद इन चर्चाओं को और अधिक बल मिला है. कहा जा रहा है कि सूर्यकांत हिंदुस्‍तान, मेरठ के संपादक बनाए जाएंगे तथा अभी संपादक की जिम्‍मेदारी निभा रहे पुष्‍पेंद्र शर्मा की कार्यक्षमता को देखते हुए प्रबंधन उन्‍हें प्रमोट करके नोएडा बुला सकता है. हालांकि इस खबर की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है, परन्‍तु मेरठ की मीडिया में इस बात की जोरशोर से चर्चा है. इन चर्चाओं को लेकर सूर्यकांत द्विवेदी से बात करने की कोशिश की गई परन्‍तु उन्‍होंने फोन पिक नहीं किया.

 

 

टीवी9 की प्रीति सोमपुरा को मिला एनटी अवार्ड

टीवी9 के एसोसिएट एडिटर प्रीति सोमपुरा को प्रतिष्ठित एनटी अवार्ड से सम्‍मानित किया गया है. प्रीति को यह अवार्ड बेस्‍ट इनवेस्‍टीगेटिव फीचर स्‍टोरी की श्रेणी में दिया गया है. उनको यह अवार्ड आफ‍ाग‍ानिस्‍तान पर बनाई गई स्‍टोरी – अफीम, आफगान और तालिबान के लिए दिया गया है. पिछले साल सितम्‍बर महीने में प्रीति आफगानिस्‍तान गई थीं. आफगानिस्‍तान जाकर रिपोर्टिंग करने वाली वे पश्चिम भारत की पहली महिला टेलीविजन पत्रकार हैं.

प्रीति ने आफगानिस्‍तान में तालिबान के आंतक, अफीम और आफगानिस्‍तान में हिंदुओं की स्थिति, आफगानिस्‍तान में बॉलीवुड, बदलता आफगानिस्‍तान और भारत सरकार की आफगानिस्‍तान में भूमिका जैसी कई खबरें की थी. इसके पहले भी प्रीति को पत्रकारिता के लिए कई अवार्ड मिल चुके हैं. पिछले दिनों वो इजराइल में रिपोर्टिंग करने गई थीं.

प्रीति की स्‍टोरी देखने के लिए नीचे के लिंकों पर क्लिक कर सकते हैं –

http://www.youtube.com/watch?v=k-0kU6YMVO0

http://www.youtube.com/watch?v=3uiAhad3Fs4

 

 

दैनिक जागरण में कई वरिष्‍ठों का तबादला

दैनिक जागरण में कई फेरबदल हुए हैं. लखनऊ तथा कानुपर से कुछ लोगों को इधर उधर किया गया है. बताया जा रहा है कि आज प्रबंधन की कानपुर में मीटिंग होने वाली है, जिसमें कुछ और तबादले संभावित हैं. साथ ही तबादले की जद में आए लोगों को लेटर भी पकड़ाया जा सकता है. बताया जा रहा है कि कानपुर में डीएनई जितेंद्र त्रिपाठी, जो आउटपुट की जिम्‍मेदारी संभाल रहे थे उन्‍हें नोएडा भेजा जा रहा है. वहीं इनपुट हेड के रूप में जिम्‍मेदारी संभाल रहे संजीव मिश्र को लखनऊ भेजे जाने की संभावना है. हालांकि संजीव ने इस तरह की कोई जानकारी होने से इनकार किया है.

लखनऊ में आशुतोष शुक्‍ल को बनारस भेजे जाने के बाद दो तबादले किए गए हैं. सीनियर रिपोर्टर प्रेम सिंह का तबादला जम्‍मू के लिए कर दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि बहुत कम संभावना है कि प्रेम सिंह जम्‍मू जाएंगे. हालांकि यह सूचना भी मिली है कि तबादला से नाराज होकर उन्‍होंने इस्‍तीफा दे दिया है, परन्‍तु यह बात पुष्‍ट नहीं हो पाई है. वहीं राजेंद्र कुमार का तबादला रांची के लिए कर दिया गया है. संभावना जताई जा रही है कि वे अपना पद भार जल्‍द ही ग्रहण कर लेंगे. इन दोनों लोगों की गिनती जारगण, लखनऊ के तेजतर्रार पत्रकारों में होती रही है. जागरण, कानपुर में तैनात विनोद शील के भी तबादले की चर्चाएं हैं. उल्‍लेखनीय है कि बनारस के संपादकीय प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा का तबादला भी कानपुर के लिए कर दिया गया है. संभावना है कि एक दो दिन में सभी को तबादले का पत्र थमा दिया जाएगा.

 

 

अमर उजाला के कई संपादक होंगे इधर से उधर

अमर उजाला में बड़े पैमाने पर संपादकों के तबादला होने की संभावना है. इस फेरबदल में कई संपादकों के इधर उधर होने की संभावना है. जिन यूनिटों के संपादकों का तबादला होना तय माना जा रहा है उसमें कानपुर, मरेठ, बरेली, बनारस और इलाहाबाद यूनिट शामिल हैं. खबर है कि प्रबंधन इन यूनिटों के संपादकों को नोएडा तलब किया है तथा उनसे बातचीत कर रहा है. समझा जा रहा है कि 2 अप्रैल तक संपादकों के तबादला की लिस्‍ट जारी हो जाएगी.

सूत्रों का कहना है कि कानपुर, मेरठ तथा बरेली में संपादकों का तबादला तय माना जा रहा है.  मेरठ यूनिट पर कुछ आरोप लगे हैं. सूर्यकांत द्विवेदी की जगह भेजे गए शंभूनाथ शुक्‍ल भी प्रबंधन का विश्‍वास जीतने में पूरे सफल नहीं हो पाए हैं. हालांकि कहा जा रहा है कि उन्‍हें प्रबंधन और मौका दे सकता है. वहीं बरेली में प्रबंधन प्रभात सिंह के कामकाज को लेकर खुश नहीं है. प्रभात सिंह को पूरा मौका मिलने के बाद भी अखबार को उस जगह नहीं खड़ा कर पाए, जिसकी उम्‍मीद प्रबंधन उनसे कर रखा था.

बताया जा रहा है कि शंभूनाथ शुक्‍ल की जगह निशीथ जोशी को संपादक बनाए जाने की चर्चा है. निशीथ इसके पहले अमर उजाला, देहरादून के संपादक रह चुके हैं. विजय त्रिपाठी के देहरादून का संपादक बनने के बाद उन्‍हें नोएडा कारपोरेट ऑफिस अटैच कर दिया गया था. दूसरी तरफ सूत्रों का कहना है कि प्रबंधन बनारस तथा इलाहाबाद में अखबार की स्थिति से संतुष्‍ट है. बनारस के संपादक डा. तीरविजय सिंह तथा इलाहाबाद के संपादक मनोज मिश्र का तबादला रुटीन के तहत किया जा रहा है. इन संपादकों को कहां भेजा जाएगा अभी पता नहीं चल पाया है.

इन तबादलों को लेकर अमर उजाला के अंदर मामला पूरा सरगर्म हो गया है. कयास लगाए जा रहे हैं आगे कुछ और संपादकों को भी इधर उधर किया जा सकता है. हालांकि अभी तक निशीथ जोशी को छोड़कर किसी का डेस्‍टीनेशन तय नहीं माना जा रहा है. पर संभावना जताई जा रही है कि इन संपादकों के इन्‍हीं पांच यूनिटों में इधर-उधर किया जाएगा और जिन लोगों के परफारमेंस से प्रबंधन खुश नहीं है उन्‍हें बुलाकर कारपोरेट ऑफिस में डम्‍प किया जाएगा. राजुल माहेश्‍वरी के तेवर को देखकर अमर उजाला के दूसरे यूनिटों के संपादक भी इन तबादलों पर अपनी नजर गड़ाए हुए हैं. 

 

 

काटजू कहिन : CREATING A FRANKENSTEIN

I had been keeping silent throughout the Anna Hazare Movement for creating a Lokpal (Janlokpal) because the media (particularly electronic media) had so much hyped the issue and generated such an emotional storm that anyone who would have raised some logical questions would have immediately been branded as a ‘deshdrohi’ or ‘gaddar’. Anna Hazare was depicted as a modern messiah, who, like Moses, had come to rescue his chosen people and lead them to a land of honey and milk.

Now that the brouhaha and hullabaloo has subsided it is time to make a cool, dispassionate, logical assessment of Mr. Hazare and his movement. I have no doubt that Anna Hazare is an honest man, but my point is that the problems facing the country (and corruption is certainly one of them) are so massive that they can only be solved by a rational, scientific approach, not by emotional outbursts.  Honesty alone is not enough. So far as I could gather, Anna Hazare has no scientific ideas. Consider two of his statements:

1- His solution to alcoholism is to tie alcoholics to a pole and whip them. Is this a rational solution? Most poor people who drink liquor in this country drink cheap country liquor, not scotch. They drink to get some temporary relief from their miserable lives. To abolish alcoholism among them would be possible only by abolishing poverty, and that can be done by raising their standard of living and giving them decent lives. This is a gigantic task, and cannot be solved by flogging them in public.

  2- Anna Hazare demands a right to recall elected representatives. But how is that possible within the system? Supposing a law is made that a motion can be moved for recall of an M.L.A. or M.P. signed by 10,000 voters. But for getting this motion passed there will have to be voting by all the voters in the constituency. This would mean another election. Is this feasible? An election entails a huge amount of expenditure, can a poor country like ours have repeated elections? I think the idea is totally impractical.

Now coming to the Lokpal Bill, whether Janlokpal Bill or Sarkari Lokpal Bill, it envisages overseeing the work of some 55 lac government employees in the country (of which 13 lacs are in the Railways alone), from Prime Minister to peon. Surely one person cannot enquire into the lacs of complaints which are bound to pour in. It will require thousands of Lokpals, may be 50,000 of them to do this. All these have to be provided salaries and other amenities, housing, offices, staff etc. And then where is the guarantee that these will not themselves become corrupt? In fact considering the low level of morality prevailing in India, we can be fairly certain that a large number of them will become blackmailers.  In my opinion, the Lokpal Bill will create a parallel bureaucracy, which will turn into a Frankenstein monster. Instead of curtailing corruption, in all probability at a stroke it will double or triple corruption in the country.

I regret to say that the implications of creating such an apparatus were not rationally thought out, and instead some people thought that all problems of corruption will be solved by shouting ‘Bharat Mata Ki Jai’ or ‘Inquilaab Zindadbad’ from Jantar Mantar or Ram Lila Ground. 

I may clarify that I am not against any kind of Lokpal. Justice Hegde did a fantastic job in exposing the corruption of the mining mafia in Karnataka. But the type of Lokpal envisaged in the Janlokpal Bill or Government Lokpal Bill are clearly impractical and unworkable.

I would therefore respectfully urge Parliament to defer consideration of the Bill before it and refer the matter to a Standing Committee (as Shri Lalu Yadav has suggested) where experts from various fields in

the country and outside be invited to give their views, and only then a workable Lokpal machinery can be created. Passing Bills in a hurry and under pressure of some people having their own agenda will only add to the huge problems facing the country. 

लेखक जस्टिस मार्कंडेय काटजू  प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन हैं.

 

 

13 अप्रैल को लांच होगा दैनिक ‘भास्‍कर भूमि’

राजनंदगांव : शहर में शीघ्र ही रंगीन दैनिक अखबार "भास्कर भूमि "का प्रकाशन होने जा रहा है. इस समाचार पत्र में नगर के वरिष्ट पत्रकारों के जुड़ जाने से मीडिया जगत में हलचल मच गयी है. यहाँ तक कि ६० साल पुराने एक अखबार के संपादक को पत्रकारों एवं कर्मचारियों का वेतन दुगना करना पड़ा. इस अखबार का परिचय अंक २३ मार्च को निकला. बाज़ार में इसकी प्रतियाँ पहुंचते ही हलचल मच गयी.

फिलहाल अखबार की डमी निकली है. इस अखबार का नियमित प्रकाशन 13 अप्रैल से किया जाएगा. इस अखबार के परिचय अंक को पाठकों का अच्‍छा रिस्‍पांस मिला है. प्रबंधन का कहना है कि अखबार आमजन की उम्‍मीद पर खरा उतरेगा. इस अखबार के मालिक जनरैल सिंह भाटिया और अजीत सिंह भाटिया हैं. अखबार के संपादक अतुल श्रीवास्‍तव हैं. आशीष शर्मा, मनमोहन शर्मा, विमल कुमार, ज्‍योति साहू, कुलदीप बाजपेयी, धर्मेश आनंद इस अखबार से पत्रकार के रूप में जुड़े हैं.

 

 

शेहला मसूद हत्‍याकांड : डेंजर की पत्‍नी ने सीबीआई पर लगाया प्रताड़ना का आरोप

: ताबिश गुनाह कबूलना चाहता है : इंदौर। चर्चित शेहला मसूद हत्याकांड में आरोपी साकिब अली उर्फ डेंजर की पत्नी ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि वह उसके परिवार को प्रताड़ित कर रही है और उन्हें झूठे इल्जाम में फंसाने की धमकी दे रही है जिस पर सीबीआई से जवाब तलब किया गया है। वहीं सीबीआई ने जेल जाकर तीन आरोपियों के आवाज के नमूने ले लिए है जिन्हें मिलान के लिए प्रयोगशाला में भेजा गया है। जबकि शुक्रवार को एक अन्य शूटर ताबिश खान ने कहा कि वह अपना गुनाह कबूलना चाहता है। इससे पहले मुख्य शूटर इरफान ने सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बंद कमरे में बयान दर्ज कराएं थे।

डेंजर की पत्नी नूरजहां निवासी 27, हीला जमालपुरा, भोपाल ने सीबीआई की स्पेशल मजिस्‍ट्रेट डा. शुभ्रासिंह की अदालत में एक अर्जी देकर सीबीआई पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है। अर्जी में कहा गया है कि उसके दो पुत्र ताजबर अली (18 साल) व शेफ अली (16 साल) है जो क्रमश: 12वीं व 10वीं में पढ़ते है। उसके बड़े पुत्र की परीक्षा शुरू हो गई है, सीबीआई अनुसंधान के नाम उन्हें प्रताड़ित कर रही है और कहा जा रहा है कि उसके किसी भी पुत्र को कभी भी पुलिस थाने ले जाया जा सकता है। सीबीआई इसके पूर्व उसके देवर शाजिद अली को भी ले गई थी। सीबीआई उन्हें झूठे इल्जाम में फंसाने की धमकी दे रही है। इस पर मजिस्ट्रेट ने सीबीआई से 3 अप्रैल को जवाब देने को कहा है।

इधर, हत्याकांड के शूटर ताबिश खान निवासी कानपुर का रिमांड खत्म होने पर सीबीआई ने उसे शुक्रवार को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया। सीबीआई द्वारा पुन: रिमांड नहीं मांगने पर उसे 11 अप्रैल तक जिला जेल भेजने के आदेश दिए गए। वह 20 मार्च से रिमांड पर सीबीआई के हवाले था। इस दौरान सीबीआई के एएसपी ए.जी. कौल ने एक अर्जी देकर कहा कि ताबिश धारा 164 के तहत अपना गुनाह कोर्ट के समक्ष कबूलना चाहता है इस पर मजिस्ट्रेट ने एकांत में ताबिश से बात कर उसे 164 के बयान की अहमियत व उसके दुष्परिणाम भी बताएं तब भी ताबिश ने अपनी इच्छा से गुनाह कबूलने की मंशा जताई। चूंकि ताबिश को सीबीआई की हिरासत में भोपाल से लाया गया था, लिहाजा उसे 2 अप्रैल तक जेल में अलग सेल में रखने के निर्देश दिए गए ताकि वह फिर से अपने इरादे पर विचार कर सके। उसे उस दिन सुबह 11 बजे पुन: कोर्ट में हाजिर करने के निर्देश जारी किए है।

 

 

भूपेंद्र सिंह हुड्डा कल करेंगे एनसीआर लुक की लांचिंग

हरियाणा के पलवल जिले से एक नई मैगजीन लांच होने जा रही है. इस मासिक मैगजीन की लांचिंग एक अप्रैल को हरियाणा में मुख्‍यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा करेंगे. एनसीआर लुक नामक इस मैगजीन के संपादक रामवीर सिंह हैं. इनपुट हेड उदय शंकर खावरे को बनाया गया है. फीचर हेड शिखा शर्मा हैं जबकि बिजनेस की जिम्‍मेदारी दीपक सिंह देखेंगे. मैगजीन को जल्‍द ही  बड़े पैमाने पर विस्‍तारित किए जाने की योजना है.

लांचिंग के बाद इस मैगजीन का विस्‍तार यूपी, बिहार, झारखंड, एमपी, राजस्‍थान, छत्‍तीसगढ़, उत्‍तराखंड समेत कई हिंदी भाषा राज्‍यों में किया जाएगा. मैगजीन के बिहार-झारखंड हेड मुन्‍नु प्रसाद को बनाया गया है. वेस्‍ट बंगाल के प्रभारी जितेन्‍द्र मिश्रा हैं. मैगजीन की संपादकीय सलाहकार रंजना राठौर हैं. जल्‍द ही अन्‍य राज्‍यों में भी संवाददाताओं तथा प्रमुखों की नियुक्ति की जाने वाली है. यह मैगजीन पूर्ण रूप से पॉलिटिकल होगा. इसमें हरियाणा, यूपी, झारखंड, बिहार, राजस्‍थान के राजनीतिक उठापटक की खबरें प्रकाशित की जाएंगी. साथ ही कुछ पन्‍ने अन्‍य सेगमेंटों के लिए भी होंगे.

 

 

ईटीवी उत्‍तराखंड के ब्‍यूरोचीफ बने मनीष, सलीम की नई पारी

ईटीवी प्रबंधन ने आगरा के ब्‍यूरो चीफ मनीष कुमार को अहम जिम्‍मेदारी सौंपी है। मनीष को अस्‍थाई रूप से उत्‍तराखंड राज्‍य के ब्‍यूरो चीफ का अतिरिक्‍त प्रभार दिया गया है। उन्‍हें पिछले सप्‍ताह ही देहरादून भेजा गया है। उत्‍तराखंड में राजनीतिक सरगर्मी लगातार बनी हुई है, जिसमें ईटीवी प्रबंधन को अपने यूपी-उत्‍तराखंड चैनल के लिए तेजतर्रार पत्रकार की जरूरत थी, इसे देखते हुए मनीष को वहां भेजा गया है। इससे पहले भी मनीष को आगरा आपात स्थिति में भेजा गया था, जहां से पिछले चार सालों से अपनी जिम्‍मेदारी निभा रहे हैं। आगरा से पहले वे फैजाबाद में थे।

डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट से खबर है कि सलीम अहमद ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे अपनी नई पारी जनसंदेश टाइम्‍स के साथ शुरू कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि सलीम वेतन विसंगतियों के चलते नाराज थे.

 

 

जिन अमर उजालाइटों को लखनऊ जाना है आवेदन करें

अमर उजाला, लखनऊ में पत्रकारों का टोटा पड़ा हुआ है. पत्रकारों का अभाव अखबार के सेहत पर प्रभाव डाल रहा है. आंतरिक विवादों, तनाव के माहौल के चलते पिछले कुछ समय में कई पत्रकार दूसरे संस्‍थानों में चले गए या फिर अपना तबादला करवा लिया, जबकि खाली हुए स्‍थानों को भरने में उतनी तत्‍परता नहीं दिखाई गई. स्‍थानीय संपादक के व्‍यवहार को जानते सुनते हुए दूसरे संस्‍थानों के पत्रकारों ने भी अमर उजाला से जुड़ने में दिलचस्‍पी नहीं दिखाई.

अब इसका असर अखबार पर पड़ रहा है. सर्कुलेशन भी घट रहा है. इसलिए अब प्रबंधन ने इस यूनिट के लिए नई भर्तियां करने की बजाय लखनऊ जाने में दिलचस्‍पी रखने वाले अमर उजालाइटों से ही आवेदन मांगा है. सब एडिटर एवं सीनियर सब एडिटरों से कहा गया है कि अगर वे लखनऊ यूनिट जाना चाहते हैं तो अपना आवेदन एचआर के पास corporatehr@del.amarujala.com पर पांच अप्रैल से पहले भेज दें.

उल्‍लेखनीय है कि पिछले कुछ समय में अमर उजाला, लखनऊ से रोहित तिवारी, देवेश त्रिपाठी, सुषमा पाठक, प्रद्युम्‍न तिवारी, डा. सुबोध समेत कई अन्‍य पत्रकार दूसरे संस्‍थानों में चले गए या उनका तबादला कर दिया गया. कई अन्‍य ने संपादक के व्‍यवहार से खफा होकर अखबार छोड़ दिया. अब आंतरिक तौर पर आवेदन मांग कर प्रबंधन ने लखनऊ यूनिट में पत्रकारों की कमी को पूरा करने का प्रयास कर रहा है.

 

 

पत्रकार काजमी ने कोर्ट में अर्जी देकर मांगी जमानत

नई दिल्ली : इजरायली राजनयिक की कार में बम विस्फोट मामले में गिरफ्तार पत्रकार मोहम्मद अहमद काजमी ने तीसहजारी कोर्ट में शुक्रवार को अपनी जमानत अर्जी दायर की है, जिस पर अदालत शनिवार यानी आज सुनवाई करेगी। काजमी ने अर्जी में कहा है कि उनकी पुलिस हिरासत 27 मार्च तक थी, पर पुलिस ने अपनी जांच पूरी होने की बात कहकर 23 मार्च को ही उन्‍हें कोर्ट में पेश कर दिया, जिसके बाद से वे न्‍यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल में हैं, इसलिए उनका जमानत मंजूर किया जाए।

गौरतलबल हो कि औरंगजेब रोड पर इसी साल 13 फरवरी को इजरायली राजनयिक की इनोवा कार में विस्‍फोट हुआ था। पुलिस ने इस मामले में स्‍वतंत्र पत्रकार मोहम्‍मद अहमद काजमी को गिरफ्तार किया था। काजमी एक इरानी न्‍यूज एजेंसी को अपनी सेवाएं दे रहे थे। जांच के दौरान काजमी तथा उनकी पत्‍नी के खाते में इरान से 22 लाख रुपये आने की जानकारी भी मिली थी, जिसकी जांच ईडी कर रहा है।

 

 

खनन माफियाओं ने पत्रकार पर किया जानलेवा हमला

राजस्थान के टोंक जिले के निवाई क्षेत्र में वनकर्मियों की मिलीभगत से धड़ल्ले से हो रहे अवैध खनन की गत दिनों पंजाब केसरी सहित अन्य समाचार पत्रों में छपी खबरों की जांच करने शुक्रवार को आए विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी में 20-25 खनन माफियाओं ने पंजाब केसरी पत्रकार निर्भयराम मीणा पर जानलेवा हमला कर दिया, जिससे यह पत्रकार गंभीर रुप से घायल हो गया। हमलावारों ने पत्रकार का फोटो कैमरा भी तोड़ दिया तथा उसकी जेब में रखे 14 हजार रुपए भी छीनकर ले गए।

उल्लेखनीय होगा कि निवाई के रक्तांचल पर्वत में लम्बे समय से बडे़ स्तर पर किए जा रहे अवैध खनन की पंजाब केसरी सहित कुछ समाचार पत्रों में कई बार खबरें प्रकाशित हुई थी, जिसकी जांच के लिए शुक्रवार 30 मार्च को करीब 2 बजे वन विभाग के कई विभागीय अधिकारी आए थे। उनकी लाल-नीली बत्‍ती की गाडिय़ा देख लोगों ने पत्रकार को सूचित किया। इस पर समाचार व फोटो

कवरेज के लिए पहुंचे निर्भयराम मौके मौजूद अधिकारियों व लोगों की फोटो खिंच ही रहे थे कि वनकर्मी एवं अवैध खनन माफिया ने पत्रकार को जाति सूचक शब्‍दों से अपमानित करते हुए मारपीट शुरु कर दी तथा मौके पर वनकर्मियों को झूठी गवाही देने आए खनन माफियाओं ने भी पत्रकार पर ताबड-तोड़ जानलेवा हमला कर दिया।

हमलावरों पत्रकार का फोटो कैमरा भी तोड़ दिया तथा जेब में रखे 14 हजार रुपए भी छीन ले गए। हमलावारों ने पत्रकार को मरा समझकर बीच सड़क पर डालने के बाद फरार हो गए, जबकि विभागीय एसीएफ व डीएफओ ने पत्रकार के साथ मारपीट के वन कर्मी को अपनी सरकारी कार में बिठाकर मौके से भाग छूटे। पत्रकार पर जानलेवा हमले की खबर लगते ही समूचे जिले के पत्रकारों में भारी रोष व्याप्त हो गया। घटना की सूचना पत्रकार संघ जार के जिलाध्यक्ष भगवान सहाय शर्मा ने पुलिस अधीक्षक भूपेन्द्र साहू एवं जिला कलेक्टर डा. आरुषि अजेय मलिक को सूचना दी। इस निवाई पुलिस ने पीडि़त पत्रकार की ओर से मामला दर्ज कर जांच पुलिस वृत्‍ताधिकारी जीवनराम विश्रोई के सुपूर्द की गई।

 

 

दैनिक जागरण, बनारस के प्रभारी राघवेंद्र चड्ढा पर गिरी गाज

: आशुतोष शुक्‍ला नए प्रभारी बनाए गए : दैनिक जागरण, बनारस से खबर है कि संपादकीय प्रभारी के रूप में लंबे समय से कार्यरत राघवेंद्र चड्ढा का तबादला कानपुर यूनिट के लिए कर दिया गया है. राघवेंद्र पर पिछले दिनों एनएचआरएम घोटाले में शामिल अपने परिजनों को संरक्षण देने का आरोप लगा था. कानपुर में राघवेंद्र की हैसियत क्या होगी, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है पर सूत्रों का कहना है कि राघवेंद्र को वहां पनिशमेंट पोस्टिंग के बतौर भेजा जा रहा है. यह भी स्पष्ट नहीं है कि राघवेंद्र कानपुर जाएंगे या नहीं क्योंकि उनका सारा साम्राज्य बनारस और आसपास के जिलों में केंद्रित है.

राघवेंद्र ने अपने करियर की शुरुआत दैनिक जागरण के साथ की. वे अपनी प्रतिभा और संघर्ष के बल पर आगे बढ़ते गए और संपादकीय प्रभारी बन गए. वे करीब डेढ़ दशक से ज्‍यादा समय से दैनिक जागरण अखबार से जुड़े हुए हैं.  खबर है कि राघवेंद्र की जगह दैनिक जागरण, लखनऊ से आशुतोष शुक्‍ला को संपादकीय प्रभारी बनाकर बनारस भेजा जा रहा है. आशुतोष भी लम्‍बे समय से जागरण से जुड़े हुए हैं. समझा जा रहा है कि जल्‍द ही दोनों लोग अपना प्रभार ग्रहण कर लेंगे. इस फेरबदल के बारे में बातचीत के लिए जब राघवेंद्र चड्ढा को फोन किया गया तो उनका फोन स्विचआफ मिला. सूत्रों का कहना है कि राघवेंद्र के जाने के बाद बनारस यूनिट और इससे संबद्ध जिलों में भी फेरबदल हो सकता है.

 

 

उपेंद्र राय के आते ही सहारा में कई संपादक और यूनिट हेड बदले

हालांकि इन बदलावों के लिए जो पत्र जारी हुआ है उस पर हस्ताक्षर स्वतंत्र मिश्रा के हैं लेकिन माना यही जा रहा है कि यह सब कुछ उपेंद्र राय के इशारे पर किया गया है. सबसे बड़ा फेरबदल लखनऊ में हुआ है जहां रेजीडेंट एडिटर के पद पर अनिल कुमार पांडेय को बिठा दिया गया है. पांडेय जी काफी पहले से सहारा की सेवा में हैं. लखनऊ वाले मनोज तोमर को अब बनारस का संपादक बनाया गया है और बनारस दो दिन पहले संपादक बनाकर भेजे गए दयाशंकर राय को नोएडा भेजा गया है, हिंदी डिपार्टमेंट का एडिटोरियल हेड बनाकर.

हिंदी डिपार्टमेंट के एडिटोरियल हेड बनाए जाने से लोग कनफ्यूज हैं कि आखिर ये कौन सा पद है. वे नोएडा में सहारा के अखबार के आरई के नीचे काम करेंगे या उपर, यह तय नहीं हो पाया है. अमर सिंह को कानपुर से हटाकर बनारस का यूनिट हेड बनाया गया है. रमेश अवस्थी को कानपुर का यूनिट हेड बना दिया गया है. अजय शर्मा को नोएडा का यूनिट हेड बनाया गया है. सोपान कुमार दास को नोएडा में एचआर का एडमिनिस्ट्रेटिव इंचार्ज बनाया गया है. हरदीप सिंह को सहारा मीडिया (प्रिंट व टीवी सभी सेक्शन) का फाइनेंस-एकाउंट हेड बनाया गया है. सुनील शर्मा को फाइनेंस-एकाउंट, नोएडा का हेड बनाया गया है. बनारस के यूनिट हेड महेश चंद्र लोहानी को फायनेंस-एकाउंट डिपार्टमेंट नोएडा भेजा गया है.

डीआईजी साहब, एटूजेड चैनल का पूर्व सेल्‍स हेड मुझे फंसाने की धमकी दे रहा है

सेवा में, डीआईजी/एसएसपी लखनऊ, उत्‍तर प्रदेश। महोदय, मैं सतीश आर्य, एटूजेड न्‍यूज चैनल में सीतापुर जिले का संवाददाता हूँ और ग्राम गोडापुरवा थाना हरगांव जिला सीतापुर का निवासी हूं। गत १२ मार्च २०१२ को, खुद को ए2जेड न्‍यूज चैनल चैनल उत्‍तर प्रदेश का सेल्‍स हेड बताने वाले धनंजय सिंह का मेल मेरी ई मेल luvisgodsatish.0327@gmail पर आया, जिसमें उन्होंने मुझे टर्मिनेट करने की धमकी देते हुये लखनऊ कार्यालय (401 पिंकी अर्पाटमेन्‍ट, 4 तल लखनऊ) बुलाया।

सण्‍डे दिनांक 25/0/2012 को वहां जाने पर मुझसे विज्ञापन का 40,000 रुपये मांगने लगे। मैंने कहा कि जब मैंने चैनल पर विज्ञापन भेजा ही नहीं तो रुपये किस बात के। इस पर उक्‍त धनंजय ने मेरा फ़ोन छीन लिया और तीन-चार तमाचे मारे व जान से मारने की धमकी दी और जबरदस्‍ती मेरे बैग की तलाशी लेने लगे और उसमें रखे 2000 रुपये व चेक बुक निकाल ली। मेरे मना करने और यह बताने पर कि उक्‍त चेक बुक बन्‍द हो चुके एकाउन्‍ट की है, के बावजूद जबरन मुझसे अपने नाम पर 10000 और 30000 के चेक कटवाये व जातिसूचक शब्‍दों से अपमानित किया। इस घटना की सूचना हेड आफिस को देने पर मुझे पता चला कि धनंजय सिंह को चैनल से निकाल दिया गया है।

उक्‍त धनंजय सिंह मुझे चेक के आधार पर केस दर्ज करवाने की धमकी दे रहे हैं। आगामी 14 अप्रैल को मेरा विवाह होना है धनंजय सिंह यह जानते हैं और लगातार फोन व ई-मेल से धमकी दे रहे हैं कि मुझे शादी नहीं करने देगा और मेरी बीबी को शादी के पहले ही विधवा करवा देगा। आपसे विनम्र अनुरोध है कि उक्‍त प्रकरण में हस्‍तक्षेप कर आरोपी धनंजय सिंह के खिलाफ समुचित धाराओं में मुकदमा पंजीकृत करके कार्रवाई कराने की कृपा करें। आपकी महान दया होगी।

धन्‍यवाद

भवदीय

सतीश आर्या

ग्राम गोडापुरवा थाना हरगांव
जिला सीतापुर
 मो0 -9452526972

 

 

श्रवणजी, अब आपसे सीखने को और ज्‍यादा मिलेगा

श्रवण गर्ग जी से कभी मिलना नहीं हुआ, केवल उनका लिखा हुआ पढ़ता रहा हूँ. और आज जब उनके भास्कर परिवार से जाने का पता लगा तो निराशा हुई. नई दुनिया का सिमटना, भास्कर से श्रवण जी का जाना, किस ओर संकेत करते हैं और इन तथ्यों का विश्लेषण क्या दिशा दिखा रहा है? हरियाणा की राजनीति के गढ़ नरवाना में जब भास्कर में करियर शुरू करने का मौका मिला तो लगता था कि ब्यूरो चीफ अमरजीत मधोक जी ही सख्त है, जागरण वाले प्रेस रिलीज पर भी बायलाइन देते हैं तो भास्कर में उस स्टोरी पर भी नाम नहीं आता जिस की सारा जिला तारीफ करता था, लेकिन भास्कर ने जो सिखाया, कहीं और, शायद ही सीख सकता था.

जो प्रतिष्ठा और रुतबा भास्कर का और भास्कर से जुड़े होने वाले हर व्यक्ति का था, जो सर्कुलेशन भास्कर का था, भास्कर लॉन्च होने के बाद कभी किसी का नहीं हुआ. दिल्ली आकर समझ में आया कि इस सब का आधार समूह संपादक नाम का व्यक्ति, उसकी सोच, अनुभव, तौर तरीके, व्यक्तित्व होता है, जो कैसे उस समूह से जुड़े एक-एक व्यक्ति के काम, व्यक्तित्व को निखारता है. भास्कर जब हरियाणा में लॉन्च हुआ तो दर-दर जाकर बुकिंग करने का काम किया था, 70 रुपए रोज मिलते थे पार्ट टाईम के, जब पत्रकार बना तो सवा दो रुपए कॉलम, सेंटीमीटर और 20 रुपए फोटो की दर से दस हजार का चेक भी लिया.

एक-एक खबर, हेडिंग, हर चीज के तौर-तरीके चाहे वो अमरजीत मधोक जी, जितेंद्र सहारण ने सिखाया, अजय पुरुषोतम जी ने या हर महीने होने वाली बैठक में श्री अशोक पांडे जी ने सिखाया, कहीं न कहीं उस सब में थोड़ा-बहुत श्रवण गर्ग जी का प्रभाव रहा. बेशक, सारी उम्र श्रवण जी भास्कर के साथ रहते तो यह असर निरंतर बना रहता, यह असर ही नहीं श्रवण जी से जुड़ा एक-एक तत्व कायम रखना भास्कर के लिए चुनौती जरूर है. श्रवण जी, बेशक आपके खर्चे ज्यादा न हो, आप संतुष्ट हों लेकि न हमें प्रतीक्षा रहेगी कि आप अब क्या और कैसे करते हैं, अब आप से सीखने को और ज्यादा मिलेगा. लेकिन दुख इस बात का है हम हिंदी वाले कब ब्रांडिंग और ब्रांड एंबसेडर का महत्व समझेंगे, यशवंत जी समझाते रहिएगा, कभी न कभी जब बाजार की जरूरत के रूप में समझ आएगा, शायद तब समझ पाएं.

लेखक धीरज तागरा ऑन लाइन हिंदी अपैरल में डिप्‍टी एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. इनसे संपर्क 09873335506 के जरिए किया जा सकता है.


इन खबरों को भी पढ़ सकते हैं – समूह संपादक श्रवण गर्ग का दैनिक भास्कर समूह से इस्तीफा

श्रवण गर्ग का जाना दैनिक भास्कर को महंगा पड़ेगा

 

 

सपा विधायक आबिद रजा का अखबार है हिंदुस्‍तान!

कलमकार कुछ भी कर सकता है, इसीलिए कलमकार को महान कहा जाता है। कलम सकारात्मक चल जाये तो कलमकार की महानता के किस्से सदियों तक याद किये जाते हैं और अगर वही कलम नकारात्मक चल जाये तो घनघोर निंदा भी सहनी पड़ जाती है, जो भी हो, पर एक कलमकार को दाद तो देनी ही पड़ेगी, क्योंकि अपने स्वार्थ के अनुसार शब्दों का चुनाव कर के वरिष्ठों से खबर प्रकाशित करा लेना बहुत बड़ी बात है।

हिंदुस्तान बदायूं कार्यालय आज कल ऐसी खबरों के लिए व्यापक स्तर पर कुख्यात हो गया है। हाल-फिलहाल शहर क्षेत्र के हिस्ट्रीशीटर सपा विधायक आबिद रजा को लेकर हिंदुस्तान की खासी फजीहत हो रही है। एक सप्ताह पूर्व विधायक की नाजायज मांग पर एसएसपी नवनीत राणा ने विधायक को कार्यालय में आड़े हाथों ले लिया था। विधायक की मांग थी कि डग्गामार वाहन चालक के साथ बदतमीजी करने वाले एसपी सिटी परेश पांडेय के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की जाये, जिसे एसएसपी ने नहीं माना। विधायक एसएसपी से मिलने पत्रकारों को बता कर गये थे, इसलिए पत्रकार विधायक से पहले ही पहुंच गये, पर पत्रकारों के सामने ही एसएसपी ने विधायक की काफी फजीहत कर दी। फजीहत होने के बाद भी इस प्रकरण की खबर को अधिकांश अखबारों ने विधायक और एसएसपी के बीच गरमा-गरमी दिखाते हुए छापा।

इसके बाद सपा सरकार ने प्रदेश के अधिकांश आईपीएस अधिकारियों की तबादला सूची जारी की। तबादले सामान्य तौर पर ही किये गये, लेकिन हिंदुस्तान अखबार ने खबर छापी कि जाना पड़ा एसएसपी राणा को, इस खबर में विधायक का जमकर गुणगान किया गया। एसएसपी का कार्याकाल बदायूं में ठीक रहा है, जिससे इस खबर को लेकर अधिकांश पाठक नाराज हैं। हालांकि बदायूं के ही पत्रकार बीपी गौतम से दैनिक जागरण के छायाकार के साथ हुई घटना को लेकर तीखी नोंकझोंक हुई थी, जिसकी बीपी गौतम ने शासन व प्रेस परिषद में शिकायत की थी। एसएसपी से स्पष्टीकरण मांगा गया है, लेकिन एसएसपी के बाकी पत्रकारों के साथ जनता से भी बेहतर संबंध रहे, तभी हिंदुस्तान की रिपोर्टिंग को लेकर अधिकांश लोग दु:खी हैं।

हिंदुस्तान अखबार की एकतरफा रिपोर्टिंग करने का सिलसिला यहीं नहीं रुका। विधायक बनने के बाद आबिद रजा स्वयं को गृहमंत्री समझ रहे हैं और लगभग हर दिन किसी न किसी कार्यालय में औचक निरीक्षण करने पहुंच जाते हैं। संबंधित विभाग के मुखिया की कुर्सी पर बैठकर पत्रकारों के सामने अधिकारियों-कर्मचारियों को जमकर हडक़ाते भी हैं, जिसकी लंबी-चौड़ी खबर छापी जाती है। ब्लाक सालारपुर के कार्यालय में निरीक्षण के ही समय एक प्रधान को विधायक ने जमकर हडक़ाया था। पीडि़त प्रधान के प्रार्थना पत्र पर सीजेएम पवन प्रताप सिंह ने विधायक व बीडीओ के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया हैं, जिसका हिंदुस्तान अखबार में एक भी शब्द नहीं छपा है है, जबकि अन्य अखबारों में यह खबर है, जिससे हिंदुस्तान को आबिद रजा का अखबार कहा जाने लगा है। प्रतिदिन आबिद रजा द्वारा प्लांट खबर लगाये जाने पर प्रबंधन ने शीघ्र ही ध्यान नहीं दिया तो हो सकता है कि आने वाले दिनों में पाठक अखबार के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दें या सामूहिक रूप से बहिष्कार कर दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

शुभम वार्ष्‍णेय के फेसबुक वाल से साभार

 

 

पिंकसिटी प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष बने किशोर शर्मा, राधारमण महासचिव

पिंकसिटी प्रेस क्‍लब, जयपुर के लिए हुए चुनाव में किशोर शर्मा अध्‍यक्ष निर्वाचित हुए हैं. किशोर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 74 मतों के अंतर से हराया. किशोर इसके पहले एक बार प्रेस क्‍लब के महासचिव भी रह चुके हैं. राधारमण महासचिव चुने गए हैं. राधारमण अभी तक प्रेस क्‍लब के उपाध्‍यक्ष थे. विकास शर्मा और भगीरथ को क्‍लब का उपाध्‍यक्ष चुना गया है. रोशन शर्मा कोषाध्‍यक्ष चयनित हुए हैं. रोशन इसके पहले भी एक बार कोषाध्‍यक्ष रह चुके हैं.

इसके अलावा प्रेस क्‍लब के लिए दस सदस्‍यीय कार्यकारिणी का भी चुनाव हुआ, जिसमें मुकेश चौधरी, डीसी जैन, यशपाल भाटी, निखलेश शर्मा, राहुल गौतम, टिक्‍कू राणा, परमेश्‍वर शर्मा, रघुवीर, महेश विकल और देवेन्‍द्र सिंह चयनित हुए.

 

 

मां को अपमानित करने वाले आईपीएस रवि कुमार लोकू को प्रमोशन

मायावती के शासनकाल में तत्कालीन डीजीपी बृजलाल और गाजीपुर के एसपी के रूप में पदस्थ रवि कुमार लोकू तक गुहार लगाई गई कि मेरी मां को गाजीपुर में नंदगंज थाने की पुलिस ने बिना किसी कारण थाने में बिठा रखा है, उन्हें छुड़वाया जाए, पर किसी ने कुछ भी सुनने से इनकार कर दिया. लखनऊ के पत्रकारों ने बृजलाल को फोन किया, एसएमएस भेजे, पर बृजलाल कान में तेल डाले बैठे रहे. रवि कुमार लोकू को गाजीपुर के पत्रकारों ने कहा लेकिन इस शख्स ने भी नहीं सुना, अपनी अंकड़ में अंकड़ा रहा. शायद इन दोनों की मां या पत्नियां थाने में नहीं बिठाई गई थीं, इसलिए ये दोनों निश्चिंत-निर्विकार बने रहे.

बिना किसी आरोप थाने में बिठाई गई महिलाओं के वीडियो फुटेज व बयान हैं. मानवाधिकार के लिहाज से ये गंभीर मामला है. इसकी शिकायत राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग से मैंने खुद की. रवि कुमार लोकू को गाजीपुर के एसपी पद से हटाकर पीएसी में भेज दिया गया और थोड़े दिन गुजरने के बाद उन्हें प्रमोट करके आजमगढ़ में डीआईजी बना दिया गया. शुरुआती जांच वगैरह के दिखावे के बाद सब कुछ शांत पड़ गया. सपा की सरकार आने के बाद ये उम्मीद थी कि रवि कुमार लोकू को उनकी करनी का दंड मिलेगा और उन्हें फील्ड की पोस्टिंग से हटा दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रवि कुमार लोकू को तोहफे के रूप में आजमगढ़ के डीआईजी पद से हटाकर इलाहाबाद जैसे इलाके का डीआईजी बना दिया गया है.


-पढ़ें-

लुच्चा लोकू, बेइमान बृजलाल

मां के पांव छुओ बृजलाल


मुख्यमंत्री अखिलेश के शासनकाल में सिर्फ उन आईपीएस अफसरों को महत्वहीन पदों पर भेजा गया है जिनसे खुद अखिलेश के पापा, चाचा, भाई, भतीजों आदि परिजनों का पंगा था या फिर उन अफसरों को जो मायावती के बहुत करीबी अफसरों की लिस्ट में शुमार थे. बाकी उन अफसरों को, जो जनता के उत्पीड़न, मानवाधिकार के हनन, अन्याय को संरक्षित करने के आरोपी रहे हैं, उनका कुछ नहीं बिगड़ा इस शासनकाल में. उन सभी ने सेटिंग गेटिंग करके अच्छी अच्छी पोस्टिंग पा ली है. मेरी मांग है कि मां के साथ अन्याय प्रकरण की जांच नए सिरे से शुरू हो और जांच पूरी होने तक इन दोनों आईपीएस अफसरों बृजलाल और रवि कुमार लोकू को सस्पेंड कर देना चाहिए. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

इस प्रकरण को विस्तार से समझने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं….

jusitce for मां

…इन्हें भी पढ़ सकते हैं…

http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6969-2010-10-16-11-26-00.html

http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6980-2010-10-17-09-05-00.html

http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6981-legal-provision-arrest-detention.html

http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/6982-2010-10-17-09-56-04.html

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http://bhadas4media.com/article-comment/6992-2010-10-18-10-30-20.html

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http://bhadas4media.com/article-comment/6993-2010-10-18-10-46-56.html

http://bhadas4media.com/article-comment/6994-2010-10-18-11-15-58.html

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http://bhadas4media.com/vividh/6996-2010-10-18-12-40-42.html

http://bhadas4media.com/dukh-dard/6999-justice-for-mother-part3.html

http://bhadas4media.com/print/7000-justice-for-mother-part4.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7001-2010-10-19-12-10-44.html

http://bhadas4media.com/vividh/7003-2010-10-19-12-32-44.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7006-2010-10-19-14-09-59.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7008-2010-10-19-14-47-19.html

http://bhadas4media.com/dukh-dard/7010-mother-amar-ujala-fake-reporting.html

http://bhadas4media.com/vividh/7011-jusitce-for-mother-ayodhya-pc.html

http://bhadas4media.com/vividh/7012-justice-for-mother-upsacc-part5.html

http://bhadas4media.com/vividh/7014-2010-10-19-16-59-05.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7015-use-rti-in-this-matter.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7016-day-1-day-2-day-3-day-4.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7017-2010-10-20-06-07-13.html

http://bhadas4media.com/tv/7021-2010-10-20-09-04-08.html

http://bhadas4media.com/vividh/7022-2010-10-20-09-16-02.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7029-2010-10-20-11-06-51.html

http://bhadas4media.com/article-comment/7034-2010-10-20-12-15-29.html

http://bhadas4media.com/print/7036-2010-10-22-05-36-47.html

http://bhadas4media.com/dukh-dard/7037-2010-10-22-05-59-33.html

http://bhadas4media.com/vividh/7043-2010-10-23-16-51-08.html

http://bhadas4media.com/print/7044-2010-10-23-18-36-20.html

http://bhadas4media.com/dukh-dard/7048-2010-10-23-19-49-14.html

http://www.bhadas4media.com/vividh/7073-2010-10-26-04-56-15.html

http://www.bhadas4media.com/article-comment/7075-2010-10-26-05-32-11.html

http://www.bhadas4media.com/print/7078-2010-10-26-06-11-27.html

http://www.bhadas4media.com/vividh/7080-2010-10-26-06-30-27.html

http://www.bhadas4media.com/dukh-dard/7094-2010-10-26-14-27-42.html

नकल कवर करने गए टीवी जर्नलिस्टों पर छात्रों ने कर दिया हमला

मुरादाबाद से खबर है कि परीक्षा केंद्र पर खबर के संकलन के लिए गये पत्रकारों पर जानलेवा हमला किया गया. जानकारी के अनुसार बृहस्पतिवार को मुरादाबाद के पत्रकारों को सूचना मिली कि डिलारी थाना क्षेत्र के सहसपूरी में किसान शिक्षा निकेतन इंटर कालेज में इंटरमीडिएट की परीक्षा के दौरान नकल कराई जा रही है. इस पर स्कूल की तरफ चल पड़े मुरादाबाद के ईटीवी पत्रकार भुवन चन्द्र और रफ़्तार चैनल के आलोक कुमार.

मौके पर पहुंचने के बाद वहां मौजूद छात्रों ने ही पत्रकारों के उपर धावा बोल दिया. पत्रकार जिस कार से गए थे, उसे तोड़ने के साथ ही उनके कैमरे भी तोड़ दिए गए. बड़ी मुश्किल से इन पत्रकारों ने मोबाइल पर पुलिस अधीक्षक को फोन कर सूचना दी जिसके बाद इन्हें बचाया जा सका. इस जानलेवा हमले में वहीं के एक शिक्षक का भी हाथ होने की आशंका है.

श्रवण गर्ग का जाना दैनिक भास्कर को महंगा पड़ेगा

दैनिक भास्कर के लिए ब्रांड अंबेसडर बन चुके थे श्रवण गर्ग. न्यूज चैनलों पर, सेमिनारों में, छात्रों के बीच श्रवण गर्ग जब होते हैं तो वे दैनिक भास्कर के ग्रुप एडिटर के रूप में जाने जाते हैं. और, इस पहचान के कारण दैनिक भास्कर की अरबों-खरबों की ब्रांडिंग फ्री में होती थी. वे दैनिक भास्कर के समूह संपादक बने रहते या संपादकीय निदेशक बना दिए जाते और केवल यही काम करते (चैनलों, सभाओं, सेमिनारों आदि में शिरकत करना) तो दैनिक भास्कर के लिए काफी फायदेमंद रहता.

पर अपने हिंदी पट्टी के मीडिया हाउसों के मालिकों की मेंटलटी बनियागिरी से उपर नहीं उठ सकी है, भले वे कारपोरेट होने की बात करने लगे हों. इसी कारण वे एक एक आदमी के दाम काम की गिनती करते रहते हैं. कई बार कोई आदमी आपको सीधे सीधे कंप्यूटर पर बैठकर भले काम करता न दिखे लेकिन वह आपके लिए कई वजहों से काफी फायदेमंद होता है. वह आपका चेहरा बन चुका होता है, वह आपके कंटेंट को रिप्रजेंट करता है, वह आपके ब्रांड का प्रतिनिधित्व करने लगता है. ऐसे लोग खोजे नहीं मिलते. पर हिंदी पट्टी के मीडिया हाउस यह सब नहीं देखते. उन्हें तो बस ज्यादा से ज्यादा मुनाफा के चक्कर में पड़ना है और मुनाफा दिलाओ अभियान में जो डायरेक्ट सहभागी बनता हुआ दिखता है, उसे ही प्रमोट करना है और उसे ही लाना है. बाकी लोग चाहे जितने काम के हों, अगर वे मुनाफा न दिला रहे हों तो उन्हें कमतर करते हुए एक दिन जाने के लिए मजबूर कर देना है.

श्रवण गर्ग ने खुद इस्तीफा दिया या मालिकों के कहने पर दिया या मालिकों से उनकी सहमति बनी व दोनों पक्षों की सहमति से ये हुआ, यह तो नहीं पता लेकिन इतना पता है कि दैनिक भास्कर के मालिकों ने श्रवण गर्ग के इस्तीफा देने को स्वीकार कर लिया है तो यह उनके लिए महंगा सौदा है. ये सच है कि श्रवण गर्ग आज जहां हैं, वहां पहुंचाने में भास्कर समूह की बड़ी भूमिका है. लेकिन यह भी सच है कि दैनिक भास्कर आज जहां है, वहां तक उसे पहुंचाने में श्रवण गर्ग की काफी बड़ी भूमिका है. वे चट्टान की तरह दैनिक भास्कर के साथ खड़े रहे और सारी बुराइयों, मुश्किलों, चुनौतियों को खुद पर लेते हुए इसे झेलते बढ़ाते रहे. ऐसे कर्मठ और त्यागी संपादक कम होते हैं.

हर शख्स एक समय बाद रिटायर या विदा होता है लेकिन प्रभाष जोशी, हरिवंश, श्रवण गर्ग जैसे लोग इसके अपवाद होते हैं. प्रभाष जोशी को जनसत्ता ने उनके जीते जी जोड़े रखा, भले ही सलाहकार के रूप में. उसी तरह भास्कर को करना चाहिए था. उसे श्रवण गर्ग को संपादकीय निदेशक या समूह संपादकीय सलाहकार बनाकर अपने पास रखे रखना चाहिए था. दैनिक भास्कर से श्रवण गर्ग के जाने का नुकसान श्रवण गर्ग को नहीं होगा. उनके लिए तो अच्छा हुआ. वे आजाद पंछी हो गए. उनके पास करने के लिए पूरा जहां भर का काम होगा. नुकसान हुआ है दैनिक भास्कर का. उसने अपना एक फेस, ब्रांड अंबेसडर, वरिष्ठतम थिंक टैंक खो दिया है.

आज भले भास्कर के मालिकों को न समझ में आए, बाद में उन्हें महसूस होगा कि श्रवण गर्ग के इस्तीफा देने को स्वीकार करना उनके लिए अच्छा नहीं था. पावर गेम में तेजी से सक्रिय भास्कर के लिए पुराने लोग त्याज्य नहीं होने चाहिए. उनका बेहतरीन इस्तेमाल करने की कला आनी चाहिए. दैनिक जागरण ने अपनी तरफ से आज तक कोई बड़ा नामी संपादक नहीं पैदा किया क्योंकि वहां किसी एक को इतना राइट दिया ही नहीं जाता, वहां मालिक ही महान संपादक और महान मार्केटियर बनने की रेस में रहते हैं. पर दैनिक भास्कर ने श्रवण गर्ग जैसा संपादक हिंदी पत्रकारिता को दिया, यह कहा जा सकता है. देर से ही सही, भास्कर को महसूस होगा कि उनसे गलती हो गई है. फिलहाल हम सभी श्रवण गर्ग को जीवन व करियर की नई पारी के लिए शुभकामनाएं व बधाइयां देते हैं.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया (yashwant@bhadas4media.com)


मूल खबर ये है- दैनिक भास्कर से समूह संपादक श्रवण गर्ग का इस्तीफा

समूह संपादक श्रवण गर्ग का दैनिक भास्कर समूह से इस्तीफा

कई दशक तक दैनिक भास्कर के पर्याय बने रहे श्रवण गर्ग का भास्कर समूह से रिश्ता खत्म होने जा रहा है. 31 मार्च यानि कल श्रवण गर्ग का दैनिक भास्कर में आखिरी दिन होगा. काफी समय से श्रवण गर्ग के दैनिक भास्कर से रिटायरमेंट या इस्तीफे की चर्चा फैली हुई थी लेकिन इसकी पुष्टि कोई नहीं कर पा रहा था. लेकिन अब दैनिक भास्कर से अपने इस्तीफे की पुष्टि खुद श्रवण गर्ग ने कर दी है.

भड़ास4मीडिया से बातचीत में श्रवण गर्ग ने कहा कि हां, यह सच है कि कल मेरा दैनिक भास्कर में आखिरी दिन होगा. यह पूछे जाने पर कि दैनिक भास्कर से विदा लेते समय कैसा लग रहा है, श्रवण गर्ग बोले- दैनिक भास्कर के साथ रहकर मैंने बहुत कुछ सीखा है, ढेर सारे लोगों से मिलना जुलना, बहुत कुछ लिखना पढ़ना हुआ. कई यूनिटों की लांचिंग का मौका मिला. लेकिन हर आदमी के लिए हर जगह एक वक्त मुकर्रर होता है. मेरा वक्त दैनिक भास्कर के साथ अब पूरा हो चुका है.

आगे की पारी के बाबत श्रवण गर्ग ने कहा कि अभी कुछ तय नहीं किया है. लेकिन दोस्तों मित्रों का सहयोग व प्यार बना रहा तो पत्रकारिता की दुनिया में कुछ नया किया जाएगा. श्रवण गर्ग ने बताया कि वे लखनऊ गए हुए थे और वहां से वे अब सीधे चेन्नई आए हुए हैं. कुछ दिनों बाद दिल्ली लौटेंगे तो फिर आगे के बारे में सोचेंगे. ज्ञात हो कि श्रवण गर्ग हिंदी पत्रकारिता के जाने माने और शीर्षस्थ नामों में से एक हैं. वे अपनी प्रतिभा और संघर्ष की बदौलत शून्य से शिखर तक पहुंचे. उन्होंने अपने करियर व संघर्ष का खुलासा भड़ास4मीडिया के साथ एक बातचीत के जरिए की थी. उस बातचीत को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं….

श्रवण गर्ग इंटरव्यू

http://old.bhadas4media.com/interview/8387-shravan-garg-interview.html

अगर आपने श्रवण गर्ग के साथ काम किया है, उनसे सीखा है, उनके प्रति आपके मन में कृतज्ञता है तो इसका इजहार आप भड़ास4मीडिया के माध्यम से कर सकते हैं. आप भड़ास तक अपनी बात bhadas4media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकते हैं.

पीके शाही ने किया सुबोध के ‘बिहार के मेले’ का विमोचन

युवा पत्रकार व लेखकर सुबोध कुमार नंदन की दूसरी पु‍स्‍तक 'बिहार के मेले' का विमोचन सूबे के शिक्षा मंत्री पीके शाही व ऊर्जा मंत्री विजेंद्र यादव ने पटना पुस्‍तक मेले में किया. इस मौके पर शिक्षा मंत्री पीके शाही ने कहा कि यह पुस्‍तक खासकर हमारी युवा पीढ़ी के लिए उपयोगी साबित होगी. क्‍योंकि सूबे के कई लोकप्रिय और प्राचीन मेलों का अस्तित्‍व समाप्‍त हो चुका है. वैसी स्थिति में उन मेलों की जानकारी उपलब्‍ध हो रही है तो यह काफी सराहनीय कार्य है.

उन्‍होंने कहा कि यह पुस्‍तक वैसे समय में बाजार में आई है जब सूबे का शताब्‍दी समारोह मनाया जा रहा है. इससे इस पुस्‍तक की सार्थकता और बढ़ गई है. ऊर्जा मंत्री विजेंद्र यादव ने कहा कि 'बिहार के मेले' पुस्‍तक एक धरोहर के रूप में सामने आई है. श्री यादव ने कहा कि इस पुस्‍तक में कई ऐसे मेले का उल्‍लेख किया गया है जिनसे मैं स्‍वयं अवगत नहीं था. सांसद अली अनवर ने कहा कि सांस्‍कृतिक व आर्थिक महत्‍व के साथ-साथ हर मेले का अपना अपना इतिहास है, अपनी अपनी संस्‍कृति और अपनी अपनी परम्‍पराएं भी हैं. लेकिन बदलते समय में खासकर ग्रामीण मेलों का अस्तित्‍व खतरे में है. वैसी स्थिति में यह पुस्‍तक नई पीढ़ी के लिए मील का पत्‍थर साबित होगी.

इस पुस्‍तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन, नई दिल्‍ली ने किया है. 127 पृष्‍ठों की इस पुस्‍तक में सूबे के 122 मेलों की जानकारियां देने का प्रया किया गया है. पुस्‍तक को पांच अध्‍यायों में बांटा गया है। पहले अध्‍याय में मगध, दूसरे अध्‍याय में बज्जिकांचल, तीसरे अध्‍याय में भोजपुरी, चौथे अध्‍याय में मिथिलांचल तथा पांचवें व अंतिम अध्‍याय में अंग क्षेत्र को रखा गया है. हर खंड में मेले की जानकारी देने से पहले एक नजर के तहत वहां की भाषा, कला, संस्‍कृति, कहावत, लोकगाथा, लोकसंगीत, लोकनृत्‍य, रीति-रिवाज, खानपान, पर्व-त्‍योहार आदि की संक्षिप्‍त जानकारी देने की कोशिश की गई है. उल्‍लेखनीय है कि गत वर्ष सुबोध कुमार नंदन लिखित पहली पुस्‍तक 'बिहार के पर्यटन स्‍थल और सांस्‍कृतिक धरोहर' पुस्‍तक का विमोचन मुख्‍यमंत्री नीतीश्‍ा कुमार ने किया था. इस पुस्‍तक को राहुल सांकृत्‍यायन राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार भी मिला था.

 

 

एक जल रहा, दो बुझा रहे, तेरह फोटो खींच रहे… मनुवादी मीडिया का विरोध करो

Aftab Fazil : जंतर मंतर पर एक तिब्बती जलता रहा और मीडिया के लोग खबर बनाने के लिए फोटो खींचने में लगे रहे, उसे बचाने से ज्यादा आप तक खबर पहुंचाना था शायद मकसद. सिर्फ दो लोग ही उसे बचाने की कोशिश करते रहे. गिर चुकी इस मनुवादी मीडिया का मैं विरोध करता हूं.

   

     Mobashshir Ehsan Jis midia ke dil se manvta khatam hogai ho us midia par kya bharosa ki wo real news dikha raheh.
         
        Hasan Jawed burbak sala jalne k lye hi gaya tha wahan.. dikhaya to bura kya kiya
         
        Yasir Shaikh Azmi bura isliye kiya kiu ki manawta kisi ko marne k liye nahi chhodh sakti
         
        Shakir Ali Mr Jawed Bahot hi ghatiya sonch k maalik dikhte ho aap….Insaniyat k naam pe ek dhabbe jaisi baat kar rahe ho…If possible kindly try to correct urself…
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed bhai ओह आप भी तो पत्रकार हैं आपको तो अपने सत्यों कि तरफदारी करनी ही पड़ेगी कही इनमे से कोई एक आप तो नही थे …….?
         
        Hasan Jawed tasveer m saaf dikh rhi h.. bachane wale kitne hn.. issue jayaz h lekin kuch cheezen capture krna b zaruri h.. baki log kya kr rhe the.. khud tibetan kya kr rhe the… sawal nhn kya…
         
        Aftab Fazil ‎Mobashshir Ehsan भाई आपसे अलग कमेन्ट एक पत्रकार का ही आप खुद अंदाज़ा लगाये
         
        Yasir Shaikh Azmi shamless indian media ya u kahe world wid media i hate these tip of people
         
        Rahil Hasi Media walo ki maa bahen ka agar rape ho to bhi ye pahle Live telecast dikhayenge aur tab tak rokenge nahi jab tak TRP kam na ho jaye
         
        Usama Anwar maaf kerna, apn bhi yehe kerte.papi pet ka jo sawal he.
         
        Shariq Khan SHAME
         
        Shakir Ali ‎@Rahil Hasi Bitter but very true….Money matters…for them much….
         
        Hasan Jawed ‎Aftab Fazil sb..PROTEST KRNE WALE S AAP SAWAL KYU NHN KR RHE HN.. media n dono kam kya h lekin unfortunate situation h..
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई लेकन पर्दर्शन करने वाले में से कोई फोटो नही खीच रहा हे ये काम सिर्फ पत्रकार कर रहे है
         
        Khursheed Lko ye galtiya government ki hai
         
        Zeeshan Warsi shame on media….
         
        Hasan Jawed aap log lakh bolte rhenge kuch nhn hoga.. jo khud ko aag laga sakta h.. uska malik khuda h… media or police nhn.. aise bhut sare wakia maine b dekhe hn jab apbi gadi m bitha kr logon ko hospital pahunchya h.. khoon dya h.. aap n b kya h.. lekin.. khudkushi krne wale k kya kr sakte hnn/// fashion ban gaya h
         
        Yasir Shaikh Azmi to koi marne ja raha thha kya ap use rok nahi sakte thhe media akhir us marne waali ki baat uske marne se pahle bhi uski baate parshashan tk pahucha sakti thhi lekin use to us admi k marjaane par zyada fayda dikha is liye use mar jane diya agar bachaane me fayeda dikhta to bacha lete media ko bas paiso se matlab hai ap is baat ko mante hai ki nahi bhaaiiii
         
        Aftab Fazil ‎Khursheed Lko भाई आप सही कह रहे हैं इसमें सरकार का हाथ हे सरकार ने ही पत्रकारों क हाथ बांध दिये थे और कहा था कि कोई नही बचायेगा इसे जलने दो
         
        Raja Sonkar dikhane se jyada jaroori bachana hota hai,shameless media
         
        Hasan Jawed tel k aag ko aap aasani s kaise rok sakte hn.. jab tak aap sochenge tab tak….
         
        Khursheed Lko hasan sahab ap bhol rhe hai ki ap indian culture me ji rhe hai
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई ऐसा फैशन …..?
        Hasan Jawed aap log lakh bolte rhenge kuch nhn hoga.. jo khud ko aag laga sakta h.. uska malik khuda h… media or police nhn.. aise bhut sare wakia maine b dekhe hn jab apbi gadi m bitha kr logon ko hospital pahunchya h.. khoon dya h.. aap n b kya h.. lekin.. khudkushi krne wale k kya kr sakte hnn/// fashion ban gaya h
         
        Hasan Jawed Tasveer bol rhi h..dono pehlu aap k samne h..
         
        Hasan Jawed Haan Aftab sb… ye fashion h.. warna kya wajah thi jo khud ko aag k hawale kya.. jawab h aap k pass
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई तेल भी तो सभी के सामने डाला होगा उसने …..? किसी ने रोका क्यों नही
 
        Hasan Jawed Duniya m khud ko tibetan h aag laga rhe hn.. wo b doosre mulk m reh kr.. apne mulk kyu nhn jate hn… yahan hungama krne k kya wajah h
 
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई उसने गुस्से में विरोध में आग लगायी लेकिन इन फोटो खिचने वालो का इंसानियत से कोई लेना देना हे या नही …?
   
        Adil Hossain well I am searching for an article…which was about the celebrated picture of self immolation of Tibetian Monk Tich Quang Duch in the 1970's taken by a great photographer Malcom Browne …it is about the duty of a media person at the site of an event like this..he has the greater responsibility to report the event to the world for a greater good to the community as the self-immolation was committed to attract the attention and sympathy of the world audience to a certain cause..and there was a life at stake which need to be protected..the media persons has to confront this dilemma..but without thinking on their role..you cant straightaway criticize it.
     
        Hasan Jawed Khabar yehi h jis pr aap charcha kr rhe hn.. insaniyat b yehi h jis pr aap bahas kr rhe hn
      
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई आप तो मरने वले के चार लात फालतू मारते होगे आपकी बात से येही लग रहा हे
       
        Hasan Jawed khudkushi krne walon k lye koi sympathy nhn
        
        Aftab Fazil मेरे कमेन्ट को रिपोर्ट कोन कर रहा हे ………….?
         
        Hasan Jawed jo log apne koh m bachche ko mar dete hn.. media is issue ko samne lati hn.. kabhi aisa nhn hua k aap is khabar ko seriously len.. in Tibetan kamino n Indians k jeena muhal kr dya h.. inke lye hamdardi kyu h.. sab se zyada Crisis m Indian rehte hn lekin kitne log jantar mantar pr aag lagate hn.. in issues pr kyu nhn sochte hn… hamdardi k aap k anokha drama h.. jo khud marna chahta h.. kamine ko bal bachche k parwah nhn h… uske lye sympathy bilkul farzi h
         
        Hasan Jawed AFTAB FAZIL K FARZI HAMDARDI— KHABRA HR KEEMAT PR— Bura na mane.. maut pr dukh zaroor h.. lekin yahan dharam sankat ek issue h.. mazburi h..
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed bhai ,उझे कम से कम हमदर्दी तो हे आपको तो वो भी नही पता नही तिब्बती पके देश और धर्म पर केसे हमला कर रहे हैं जो आपको उसका जल कर मारना वो भी मीडिया के सामने अच्छा लगा
         
        Hasan Jawed in Tibetan k hr ek hill stations pr kabza.. aam Indian in ilakon m nhn ja pa rha h.. is issue pr baat nhn krte.. Mysore k joint district h mandya.. wahan kai lakh tibetan hn.. local women bilkul unsafe h.. jab pure karnatka m women safe h.. inke khilaaf case b kro to koi action nhn.. in muddon pr kaun sochega Aftab sb.. khana kha k sirf ek issue pr jugali krne s nhn hoga.. INSANIYAT idhar b dikhaye
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई अगर अच्छा नही सोक सकते तो बुर अभी सोचने से बचिए किसी कि जान गयी और आपको मज़ा आ रहा हे
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed भाई ये फर्जी कहानी कहाँ से उठा लाए हैं आप अपनी बात को उसके मरने पर फोटो खिचने को सही साबित करने के लिए
         
        Hasan Jawed aap mujhe kuch bkeh sakte hn.. lekin khudkushi krne walon k lye mn sympathy nhn rakhta.. mauka milne pr zaroor bachayenge… khoon daan krenge.. insaniyat k sabhi wasool ko pura karne k koshish krenge.. lekin khabar miss nhn krenge.. apna dhandha yehi h.. jaise bank cashier k h
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed मुझे लगता हे आप चीन के समर्थक हैं इसलिए ही आपको तिब्बतियों से इतनी नफरत हैं
         
        TheRoyal Majestic Baboosahab ‎//इस मनुवादी मीडिया का मैं विरोध करता हू//——-> AUR AISI MEDIA KE MUHH PAR THHOOK KAR MAI APNE JUTEY KE NEECHEY RAKHTA HUN……. This Stupid Media-my foot….
         
        Jimmy Rock fuck medeia
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed इसका मतलब ये हुआ कि अगर कोई आपके सामने जल कर मरता हे तो आप पहले उसकी विडियो बनायेंगे फिर अगर वो बच गया तो लोगो से कहेंगे विडियो बन गया अब इसे देखो बचा हो तो अस्पताल पंहुचा देना
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed पत्रकार महोदय आपका धर्म इंसानियत हे पत्रकारिता नही एस अमुझे लगता हे बाकि फैसला आपको करना हे
         
        Hasan Jawed Media ko kuch b kaho.. is k begair saans lena mushkil h itna b jaan lo… agar aisa nhn h to gb pr kya kr rhe ho.. bewakuf
         
        Ashraf Azmi hasan jawed bhai ap kahna kiya chahte hai ???
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed ऐसी मीडिया और उसके कर्मियों कि देश को ज़रूरत नही जो इंसानियत कि जगह फोटोग्राफी को धर्म समझते हैं
         
        Rahil Hasi Hasan Jawad@ es bande ki jagah aapka koi apna hota to pic lete ya aag bujhate pic me saaf dikh raha hai reporter kya kar rahe hai waha
         
        Hasan Jawed ‎Aftab Fazil video banane wale unit lekar chalte hn atleast 3/5 log team m hote hn.. ab aap samajh sakte hn in m koi na koi madad k lye haath badhayega , doosra apna kaam b kr sakta h…
         
        Ashraf Azmi hasan jawed ji zuban sambhal kar bat karo bewqoof kisko kahte hai????
         
        Amir Shaikh Azmi jawed bhai apke bhai bahen bhi kisi wajah se marenge jal kar to ham use faishion kahenge kya ab jaan dekar bhi haq ki baat karna faishion ho gaya hai
         
        Hasan Jawed Roya Majestic ko bewakuf kaha h
         
        Amir Shaikh Azmi Hasan Jawed Media ko kuch b kaho.. is k begair saans lena mushkil h itna b jaan lo… agar aisa nhn h to gb pr kya kr rhe ho.. bewakuf

        bewaqoof kaon hai
 
        Hasan Jawed Rahil Hasi.. aise situation bachane k koshish rehti h.. lekin kuch aise log hote hn jo apna kaam bkrte hn.. baad m visual share kr lete hn.. jo censor or blurr ho kr aap k pass aata h
 
        Ashraf Azmi hasan jawed RSS ke chamcha angrez ke dalal lagte ho tum mujhe kiya sach hai yeh ??????
   
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed किसी कि जान बचाने से जादा उसका विडियो बनाना जादा ज़रुरी हे
    
        Amir Shaikh Azmi bhai apki maa aise hi kisi wajah se jaan de to ham bhi kahenge ki waaaak kya faishion hai
     
        Rahil Hasi haal he me Noaida me Blatkar ke ek case me police officer ne galti se ladki ka naam le liye aur media ne uska prachaar kar diya aur doshi officer ko kaha gaya ye hai media
      
        Rahil Hasi Hasan Jwed@ es pic me saaf dikh raha hai kitne log bacha rahe hai aur kitne log video bana rahe hai aur pic le rahe hai
       
        Amir Shaikh Azmi bhai us ladki ko bhi balatkaar karwaane ka fashion raha hoga q jawed bhai
        
        Hasan Jawed Ashraf Azmi.. irrelevant sawal h… is s andaza hota h k aap kitne serious talk rk rhe hn.. maine sabhi pehlu pr charcha k h.. aap koi b rai bana sakte hn.. maine admit b kya h insaniyat first h lekin ye musibaat k aag lagne k waqt mahool kuch alag hota h.. islye jaan bacha pana mushkil hota h
         
        Ashraf Azmi are rahil hasi bhai hasan jawed ak RSS ka dalal hai auer angrezo ka dalal hai
         
        Amir Shaikh Azmi Hasan Jawed Ashraf Azmi.. irrelevant sawal h… is s andaza hota h k aap kitne serious talk rk rhe hn.. maine sabhi pehlu pr charcha k h.. aap koi b rai bana sakte hn.. maine admit b kya h insaniyat first h lekin ye musibaat k aag lagne k waqt mahool kuch alag hota h.. islye jaan bacha pana mushkil hota h

        aur pic aur video bananma bahut asaan hota hai q jawed bhai
 
        Amir Shaikh Azmi yeh to aisi baat kar rahe jaise ulta chor kotwaal ko daate
 
        A.r. Bhutta Raj एसा तो कोई ईन्सान नही कर सकता, अगर कोई मर रहा है और आप खबर बनाने मे लगे है, बजाय उसको बचाने कि, आप वीडीयो बनाने मे लगे है ,, तो आप को ईन्सान कहलाने का कोई हक़ नही !
   
        Rahil Hasi Hasan Jawed@ media ko kisi ke marne jine kisi ki izzat se koi lena dena nahi hota use bus TRP chaiye ye ek sach hai jo aap bhi jante hai
    
        Ashraf Azmi hasan jawed ji india ki midia auer india ki pulic dono musalamano ke leye kiyo zulm jayadte karte hai wo bata do tum to bahut bade ho wo ho na ????
     
        Ashraf Azmi hasan jawed tum angrezo auer RSS walo ki sooch rakhte ho tum dalal ho is leye aisa bol rahe ho ki marne do ok auer ise ki jagah tumhara bhai tumhara bap tumhare ma hote to kiya tum bhi wahi karte ????
       
        Aftab Fazil ‎Rahil Hasi भाई आपने सही कहा Hasan Jawed इतनी देर से येही साबित करवा रहे हैं
        Rahil Hasi Hasan Jawed@ media ko kisi ke marne jine kisi ki izzat se koi lena dena nahi hota use bus TRP chaiye ye ek sach hai jo aap bhi jante hai
        
        Amir Shaikh Azmi
        kuch haal hamari media ka aur hamara hai hamre zariye hi media ka karobaar chalta hai ham hi kisi channel ko dekh kar uski trp badha dete hai ksi ki ghata dete hai aisa hame lagta hai lekin dar asal aisa hota nahi hai hamne news report aur …See more
         
        Hasan Jawed Ashraf Azmi.. baton m dum nhn h.. irrelevant sawal k jawab nhn Aftab sb k tarah post kro hr mudde pr aap k saath bahas m hissa lenge.. shab-o=kher
       
        Rahil Hasi Hasan Jawed@ what abt my comment,s bro
        
        Aftab Fazil ‎Amir Shaikh Azmi भाई आपके कमेन्ट से सहमत हू मीडिया एक व्यापार हे इसलये ही इस इंसान कि मौत को भी लाइव दिखाया गया
         
        Hasan Jawed Rahil Hasi.. Aap k last comments blnc h.. islye is pr koi jawab nhn.. finally khabar har keemat pr..
         
        Amir Shaikh Azmi hasan bhai jab apki bahen ka balatkaar ho raha hoga tab bhi khabar hi chaapte rahna q dosto hahahha
         
        Rahil Hasi Hasan Jawed@ wo kimat kisi ki jaan he kyu na ho 🙁
         
        Aftab Fazil ‎Hasan Jawed खबर हर कीमत पर कीमत चाहे किसी कि जान ही क्यों न हो सही कहा न
         
        Ashraf Azmi
        hasan jawed to kiya bahas karega to RSS auer angrezo ki dalali kar ham musalamano se bahs karne chala aya hai kabhi unse bhi bahs karle jo pura guzrat jala kar rakh deya tha ?????jo pure musalamano ko atankawade bata kar jelo toswa deya ?…See more
         
        Atif Altruist shame on media –mar gaii insaniyat zinda raha media
         
        Rahil Hasi Aftab Fazil Hasan Jawed खबर हर कीमत पर कीमत चाहे किसी कि जान ही क्यों न हो सही कहा न/Rahil Hasi Hasan Jawed@ wo kimat kisi ki jaan he kyu na ho 🙁

        ek he baat do logo ne kahi sayad ab enke pass jawab na ho
 
        Amir Shaikh Azmi hahhhamere wale coment ka kaya khayaal hai rahil bhiya
 
        Jelly Mohitpuri SHAME SHAME
   
        Rahil Hasi ‎Amir Shaikh Azmi@ Khabar har kimat par 🙂
    
        Jagmalsingh Rajpurohit Modran midiya vepar ho gya hai tab aese ho rha hai
     
        Amir Shaikh Azmi hahahahha bhaiya tab to balatkaar ho jayega ek bahen ka bhaai k samne
      
        Ashraf Azmi hasan jawed dekhte rahna vidio caimra lekar khade rahna jub hoga tumhare parevar ke sath kuch to ok
       
        Jabir Khan Churimiyan Jalne wale ki kurbani aur kamyab ho jati agar wo Inme se 2-4 ko jala deta
        
        Niyaz Farooqui mai bhi aap ke baat se sehmat hoon
         
        Toushir Ali ‎?????…..
         
        Ramesh Bhangi the media was waiting to shoot this moment—-shame on media
         
        Shahnawaz Shamsi kya hoga is desh ka
        Sena k pas ladne ko barud nai aatankwadyon k paas barud ki kami nai midya k paas dikhane ko lhabar nai aur sadak par insan jal k mare ja rahe h
         
        Mohammad Sheeraz Anwar agar thodi samajhdari se kaam leya jata to ak insaan ki jaan bach sakti the…..bht afsos ki baat hai…..media k alawa bhi aur log zimmedar hai is baat k leye…..
         
        Gaurav Bharti SHAME…
         
        Gaurav Bharti Share it as much ….to protest.
         
        Tarsem Singh Bains यह मीडिया वाले सभी , ………….. "मनुवादी" सोच के शिकार हैं, ……. इनसे कोई अच्छी ……. ख़बरों की आशा ना रखना // क्योंकि ये लोग , अफवाहें ज्यादा फैलाते हैं, …………तथा समाचार बहुत कम देते हैं //
         
        Yogeshwar Dubey Dear Aftab Fazil, ये व्यावसायिकता का ज़हर हमें कदम-कदम पर पीना पड़ रहा है, टेग करके इस हकीक़त से रूबरू कराने के लिये, बहुत-बहुत शुक्रिया मेरे आलिम
फ़ाज़िल…!!!
 
        Ajay Kumar media ko photo chiya jo milgya .desh ko apne jajana hogo……..hiiiy hamari media
 
        Mohammad Anwar Khan aadmi jale ga nahi to yhe news kesay banaye ge sham on u
   
        Sajid Saifi very true!
    
        Sujat Chabukswar Is manu vadi media ne jo 4tha stamb hone ka jo gaurav hasel kiya tha. Vo aab tut chuka hai. I have manuvadi channels.
     
        Gautam Kumar Inka to saloagn hi yehi hai, khabar kisi keemat par, phir woh chahe, kisi aadmi ko jalte hue dikhaye, kisi ko dubte hue, kisi ko gaddhhe mein. Agar yehi media apne saamne kisi aisi baat ko dekh kar use bacha legi, to uski khabar kaise banegi, woh bhi har keemat par. Zameer ki baat aajkal kaun karta hai.
      
        Ahmad Ishaque vaisay tau media ko 4 pillar kaha jata hai, lekin india kai ziyyadater media fourth class hai….., inkko tau sirf news milni chahiyye…
       
        Mohd Hashim media ko koi fark nhi pdta na vo kisi commen men ke sathn hai vo only publicity ke sath hai agr yhi police wale hote to media tamasha khada kr deti ki delhi police dekhti rhi ab ye khud dekhte rhe uska kya aur vo police wala jo usko bacha rha uska pic kisi ne nhi liya hoga
         
        Bhai Tej Singh ‎…because the dieing person was a Buddhist!
         
        Ihro Bulandshahr very shamfull desh ki media sharam karo hum sab insaan hain video photo se jyada insaan ki jaan kimti hai
         
        Abdul Hameed Qalb Media ek" DHANDA" ho chuka aur is Dhande mein sab nahin lekin bahut se gande log aa gae hain .
         
        Shakti Singh Nayak मीडिया का मैं विरोध करता हू.
         
        Talha Nizami I also….
         
        Kashif Salim abe media waloon TRP ke alawah bhi kuch dikhta hain tum logon ko,insaaf aur help ke jagar lambi batein aur harasment hi dete ho tumlog………apna asli kaam karo media walom…..ye ek tamacha hai tum logon par……….j
 
        Mudit Gupta SHAME ON MEDIA.
 
Abid Anwar hindustani media corprate media he jahan pese ki ahmiyat he insan ki nahi
 
Kashif Husain अगर आपको याद हो तो कुछ साल पहले पटियाला के एक व्यापारी नेता गोपाल कृष्ण कश्यप के आत्मदाह की घटना को चैनलों ने जिस उत्साह से कवर किया था उससे किसी भी मीडिया कर्मी का सिर शर्म से झुक जाता है। मीडिया के लिए यह घटना किसी तमाचे से कम नहीं रही थी । कई टीवी चैनल धड़ाधड़ उसका आत्मदाह करना शूट करते रहे और वह आदमी जलता मरता रहा। किसी भी पत्रकार ने उसे बचाने का प्रयास नहीं किया। किसी भी चैनल ने उस पीड़ा का बयान नहीं किया जिसके नाते उसे आत्मदाह का ऐलान करना पड़ा था। ऐसा किया गया होता तो गोपाल कृष्ण की समस्या का निदान हो जाता और उसे चिता पर बैठने की जरूरत ही न पड़ती पर इस कांड में मीडिया ने क्रूरता दिखायी और इसी नाते लोगों ने अगर कहा कि इसे टीवी चैनलों ने मार दिया तो गलत कहां था? आत्मदाह का लाइव प्रसारण बड़े उत्साह से चौबीस घंटे किया गया था और किसी को शर्म नहीं आयी.

फेसबुक से साभार

पत्रकार व लेखक जरनैल सिंह के नेतृत्व में हजारों लोग सड़क पर उतरे

Yesterday Night, there were more than 5000 people who have participated against hanging of balwant singh raajoana which was organised by Jarnail Singh, (Writer) journalist. Jarnail Singh, Writer of "I accuse- Anti Sikh violence of 1984" has demanded magistrial inquiry of police firing in phagwarha (Punjab) where 2 Sikhs have got killed. They were trying to stop a communal organization from burning of balwant singh raajoana's effigy.

Jarnail Singh said everyone has right to protest But, Police should restrain from opening fire. They could apply other methods to maintain law and order. Police officers who are involved in this police firing should get suspended immediately. Yesterday South Delhi witnessed a huge protest march of Sikhs to save balwant singh raajoana from hanging. After 4 hour long march they staged a dharna in front of CBI headquarter with candles in their hands. Jarnail Singh said: Main Purpose of the protest march was to create pressure on CBI to play its role honestly in 1984 cases. After the shoe incident CBI has filed a case against sajjan kumar and now he wants to keep positive pressure on CBI.

आई-नेक्स्ट बरेली की सेकेंड एनीवर्सरी पर आफिस में कटा केक

जागरण समूह के बच्चा अखबार आई-नेक्स्ट का बरेली में पिछले दिनों सेकेंड एनीवर्सरी मनाया गया. पूरी टीम के लोगों ने इकट्ठा होकर केक काटा और एक दूसरे को खिलाया. संपादकीय प्रभारी कुणाल वर्मा ने केक काटने के मौके की कुछ तस्वीरें फेसबुक पर शेयर की हैं. उन्होंने लिखा है- ''Today i am celebrating second anniversary of i-next Bareilly with my team.''

कुणाल द्वारा शेयर की गई तस्वीरों में से एक नीचे है. बाकी तस्वीरों के लिए आप इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं…. inext bly pic

छोटे शहरों के पत्रकारों के लिए कोई एवार्ड नहीं

दिल्ली में आईटी अवार्ड समारोह हुआ. देख कर अच्छा लगा पर कई सवाल भी मन को कचोटने लगे. क्या छोटे शहरों के पत्रकारों के लिए कोई अवार्ड नहीं है, क्या स्ट्रिंगर, रीटेनेर या स्टाफ रिपोर्टर जो कि राज्यों, जिलो में, कस्बों में, रात दिन मेहनत करके मीडिया में धमाके करते हैं उनका कोई सम्मान नहीं है? इलेक्ट्रानिक मीडिया में कस्बों से बहुत सी ऐसी खबरें ब्रेक होती हैं उन पर बड़ी स्टोरीज बनती हैं. उनके नाम को, उनकी स्टोरी को, क्यूँ नहीं इंडियन टीवी अवार्ड, रामनाथ गोयनका, गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान के लिए भेजा जाता?

क्या दिल्ली में बैठ करके ही सम्मान पाया जा सकता है? क्या पदम् श्री, पदम् भूषण पाने का हक केवल दिल्‍ली के बड़े पत्रकारों को ही है? क्या दिल्ली मीडिया को घर बैठे ये मालूम चल जाता है कि देश के कोने-कोने में क्या खबर है? वो स्थानीय सूत्र का सहारा लिए बगैर खबर बना सकते हैं? क्या दिल्ली मीडिया अपने सूत्र को, पैसे के अलावा कोई और सम्मान दिलाता है? क्या वो प्रिंट मीडिया में अपने नाम के साथ अपने सहयोगी सूत्र का नाम प्रिंट लाइन में देता है या टीवी मीडिया में सहयोगी के नाम का उल्लेख किया जाता है? क्या दिल्ली डेस्क में बैठे संपादक महोदय लोग इस विषय की गंभीरता को समझते हैं?

हाल में कई कस्बाई पत्रकारों की इस तरह की पीड़ा सामने आई है. इलाहाबाद के एक पत्रकार ने खबर पर मेहनत की, खबर ब्रेक की, शाट्स भेजे, शाम को देखा अंग्रेजी चैनल की एक रिपोर्टर उस पर पीटूसी कर रही थी. जबलपुर के एक पत्रकार ने खबर ब्रेक की. वो शाट्स किसी और चैनल के रिपोर्टर ने ऍफ़टीपी से चुरा लिए और दिल्ली में पीटूसी कर दी. यूपी के एक पत्रकार ने तो स्टोरी आइडिया ही ऑफिस भेजना बंद कर दिया. क्यूँ कि दिल्ली से रिपोर्टर उसे उड़ा लेते हैं. थोड़ा वक्त बीत जाने के बाद वो उसे अपना प्रोजेक्ट बना लेते हैं.

ऐसे कई मिसालें हैं जो कि छोटे शहरों के मीडिया कर्मियों की पीड़ा बया करती है. हकीकत तो तब सामने आती है, जब दिल्ली रिपोर्टर्स के पास शाट्स नहीं होते और वो फिर लोकल रिपोर्टर की खुशामद करते हैं. बाद में काम निकल जाने के बाद उन्हें भूल

जाते हैं. यानी उन्हें उनका सम्मान भी नहीं देते. क्या ये विषय बहस का मुद्दा हो सकता है? ये विषय भड़ास का भी हो सकता है. बरहाल उन मीडिया कर्मियों को बधाई जिन्होंने आईटी अवार्ड जीते.. अपना नाम और चैनल का नाम रोशन किया.

लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.

 

 

फोटो जर्नलिस्ट गगन की किताब, तस्वीरों के जरिए त्रासदी का बयान

हिंदुस्तान टाइम्स, भोपाल के सीनियर फोटोजर्नलिस्ट गगन नायर की एक किताब आई है. इस किताब में शब्द नहीं, तस्वीरें हैं. कहते हैं न कि लाख शब्द पर एक तस्वीर भारी है. बुंदेलखंड की गरीबी व त्रासदी को लेकर जाने कितने लेख वगैरह लिखे जा चुके हैं. लेकिन पहली बार कोई किताब ऐसी आई है जिसमें बुंदेलखंड की कहानी तस्वीरों की जुबानी बयान की गई है. 'बुंदेलखंड का पलायन' (Migrating Bundelkhabd) नामक किताब में तस्वीरों के माध्यम से बुंदेलखंड के पलायन के स्याह चेहरे की कहानी सामने आती है.

फोटो जर्नलिस्ट Gagan Nayar को उनकी इस उपलब्धि के लिए ढेर सारी शुभकामनायें उनके चाहने वालों ने फेसबुक पर दी है. फेसबुक पर गगन नायर के पास इस लिंक के जरिए पहुंच सकते हैं… http://www.facebook.com/gagan.nayar

अगर आपने भी समाज सरोकार सम्मान किताब यात्रा संस्मरण आदि के लिहाज से कुछ काम किया है तो भड़ास को जरूर बताएं ताकि इसे पूरे मीडिया जगत तक पहुंचाया जा सके. भड़ास से संपर्क करने का पता bhadas4media@gmail.com है.

आलोक मेहता ने साबित किया वे आधुनिक युग के असली संपादक हैं, बधाई

नई दुनिया का सूर्यास्त हो गया… मुझ जैसे पत्रकारों का इससे ज्यादा मतलब नहीं है… यह सब धनकुबेरों के पैसे का खेल है… क्योंकि अब जूता फैक्ट्री खोलने और अखबार की फैक्ट्री खोलने में कोई फर्क नहीं है और यह दोनों धंधा पूंजीपतियों के लिए एक ही बात हो गयी है. खैर… जब से नई दुनिया के दिल्ली संस्करण के बंद होने की खबरें बाजार में आई तभी से मुझे इस बात की चिंता थी कि देशभर के उन हजारों पत्रकारों में अब बंद होने वाले नईदुनिया के पत्रकार व गैर पत्रकार भी जुड़ जायेंगे, जिन्हें अब रसोई के बजट की चिंता घेर लेगी.

मेरी चिंता तब और बढ़ गयी जब मेरे घर आये 29 मार्च के नई दुनिया अखबार के एक कोने में अखबार के संस्करण को स्थगित करने की छोटी सी खबर आई… पर 30 मार्च की सुबह मैं बेहद रोमांचित हो गया, जब मेरे हाकर ने नई दुनिया की जगह मेरे घर में नेशनल दुनिया की कापी डाली… एक दम नये कलेवर में…. प्रधान सम्पादक के नाम की जगह आलोक मेहता का नाम देखा व उनका छोटा सा सम्पादकीय भी… जिसमें पुरानी टीम से ही नया अखबार निकालने की बात कही गई थी… पढ़कर संतोष मिला कि अब कम से कम बंद हुए नई दुनिया के पत्रकारों को रसोई की चिंता नहीं सतायेगी.

आज जब सड़क पर जूते घिसने वाला एक पत्रकार सम्पादक की कुर्सी पर बैठते ही अपने कुछ हजार के इंक्रीमेंट के लिए अपने साथियों गला रेतने के लिए छूरी घूमता हो ऐसे में आलोक जी द्वारा अपने लोगों की नौकरी न जाने देना और एक नया अखबार ही निकाल देना बेहद सराहनीय काम है. इस परिप्रेक्ष्‍य में मैं अपने अनुभव यहाँ बताना भी जरूरी समझता हूँ. मैंने  हिन्दुस्तान में 23 साल तक पत्रकारिता की और मुझे कई संपादकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला… जिसमें आलोक मेहता भी एक थे. अंतिम समय में तो एक अतिउत्साही सम्पादक ने तो हिन्दुस्तान के पत्रकारों का ऐसा कत्लेआम मचाया कि लोग दंग रह गए.

इसने तो एक ऐसी होनहार महिला पत्रकार की नौकरी खाई, जो गर्ववती थी और कुछ दिन का अवकाश चाहती थी…. इस होनहार सम्पादक के बारे में (अब सड़क पर है) बता दूं कि इसे आलोक जी ही हिन्दुस्तान में छोटे से पद शायद वरिष्ठ उप सम्पादक के लिए लाये थे… आलोक जी बदले तो अजय उपाध्याय जी सम्पादक बनकर आये… तब तक हिन्दुस्तान टाईम्स  एम्प्लाईज यूनियन बेहद मजबूत यूनियन मानी जाती थी. मैं तब यूनियन में हिन्दुस्तान से प्रतिनिधि था. हम कुछ लोग अजय जी के पास बैठे थे… बेहद शालीन मिजाज के अजय जी बोले…. ये सज्जन क्या करते हैं… पता नहीं… इनकी शायद जरूरत नहीं है. इस पर मैंने कहा – सर रहने दीजिये…. बिरला जी की धर्मशाला में एक और जीव पल जाए तो क्या बुरा है, और फिर एक शरीफ पहाड़ी आपका क्या बिगाड़ लेगा??

खैर, इस सज्जन की नौकरी जारी रही… अजय जी के जाने व मृणाल पांडे के प्रधान सम्पादक बनते ही इस महाशय ने ऐसी कुलाचे भरी कि… असली सम्पादक बन बैठा… फिर तो हिन्दुस्तान पत्रकारों का कत्लगाह बन गया… तब एक चर्चा आम होती थी कि इस सज्जन को यदि ठीक से नमस्ते नहीं किया तो समझो नौकरी गयी!! जब हिन्दुस्तान में ऐसे हालात थे तब यहाँ से दो सौ गज की दूरी कनाट प्लेस से नई दुनिया का प्रकाशन शुरू हुआ… और हिन्दुतान के हमारे ऐसे काफी वरिष्ठ साथियों ने आलोक जी के नेतृत्व में नई दुनिया ज्वाइन कर ली… जिन पर हिन्दुस्तान के इस सम्पादक का चंगेजखानी फरसा बस चलने ही वाला था. और मेरा मेरे हिन्दुस्तानी महान सम्पादक ने बेरिया-विस्तार शिमला के लिए समेट दिया.

जितने लोग आलोक जी के साथ गए… वे हिन्दुस्तान के दिनों में उनके ख़ास थे… मैंने भी जाने का प्रयास किया पर मेरे हिन्दुस्तान के दिनों में आलोक जी के साथ हुए यूनियनी नोंक-झोंक आड़े आई. खैर, इस महान सम्पादक का जिक्र प्रशंगवस आ गया. नहीं तो ये बेचारे तो शायद याद भी नहीं आते!! नेशनल दुनिया… यानी नये अखबार के पीछे कौन है… यह ज्यादा मायने नहीं रखता… पर आलोक जी ने एक नया उदारहण पेश किया कि जब एक पूंजीपति अपनी दुकान बंदकर उसमें काम करने वाले गरीब मजदूरों को अनाथ छोड़ रहा था, ऐसे में मजदूरों के मुखिया ने वहीं से नई दुकान शुरू कर सराहनीय काम किया है. आलोक जी को इसके लिए बधाई और आपको मेरे रूप में आपके अखबार का एक नियमित पाठक मिल गया… क्योंकि आपने देश की चिंता करने वाले कुछ पत्रकारों को रसोई की चिंता से मुक्त किया.

लेखक विजेंद्र रावत वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

 

 

आशीष व्यास के खिलाफ भड़ास पर खबर किसी चोर ने प्लांट कराई है

: समर्पण और ईमानदारी की मिसाल हैं आशीष व्यास : भारत में प्राचीन काल से ही परंपरा रही है, कि पंच जिस बात को कह देते हैं उसे पूरा समाज स्वीकार करता है, लेकिन भारत का यह भी सौभाग्य रहा है, कि न्याय की कसौटी पर खरा उतरने के कारण पंचों को परमेश्वर की उपाधि से नवाज़ा जाता था। उसी भारत में आज पंचों की तो बात ही छोड़िए, निन्यानवे चोर मिलकर एक ईमानदार को ठग, चोर, लापरवाह और भी न जाने क्या-क्या सिद्ध कर देते हैं, और इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात यह है, कि समाज उन निन्यानवे चोरों की बात संख्या बल के आधार पर स्वीकार कर लेता है।

इस भूमिका के पीछे भड़ास पर प्रकाशित एक खबर ‘हिंदुस्तान, बरेली की लुटिया डुबो दी आशीष व्यास ने, सर्कुलेशन हुआ आधा’ है। यह खबर निन्यानवे में से ही किसी एक चोर ने प्लांट कारवाई है, क्योंकि आशीष व्यास जैसा संपादक होना तो बहुत बड़ी बात है, उन जैसा इंसान ही होना काफी है। पत्रकारिता अथवा समाज में व्यक्ति के लिए अगर कोई मानक होते होंगे तो वह समस्त मानकों पर अक्षरशः खरा उतरने वाले इंसान हैं। उनकी ईमानदारी, व्यावहारिकता, कर्तव्यपरायणता, निष्ठा, समर्पण आदि की चोरों को छोड़कर हर इंसान प्रशंसा करता है। वह रिपोर्टरों से कमीशन नहीं लेते, ब्यूरोचीफ़ पैसे लेकर नहीं बनाते, यही बात इन चोरों को परेशान किए हुए है। वह बहुत ही उदार व्यक्ति हैं तभी सभी चोरों को बेरोजगार नहीं कर पा रहे हैं।

सिटी इंचार्ज संजीव द्विवेदी को भी वह पानी सिर से ऊपर न जाता तो नहीं निकाल पाते, पर उनके कुकृत्य जब आम चर्चा का विषय हो गए तो उनकी संजीव द्विवेदी को हटाने की मजबूरी ही हो गयी थी और इस संजीव द्विवेदी को हटाने की समूचे रूहेलखण्ड क्षेत्र में व्यापक प्रशंसा हुई थी। रही सर्कुलेशन आधा होने की बात, तो अखबार की दुनिया में विज्ञापन, प्रसार, संपादकीय, तीनों विभाग अलग-अलग काम करते हैं। हिंदुस्तान अखबार में इस विभाजन का और भी अधिक कड़ाई से पालन होता है। संपादक सर्कुलेशन के आदमी से बात तक नहीं करता। ऐसे में वह सीधे और एकमात्र दोषी कैसे हो सकते हैं? यशवंत जी, आशीष व्यास जैसे व्यक्ति या संपादक राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता कराने के बाद अंगुलियों पर गिनने लायक ही मिलेंगे, ऐसे में उनकी बेवजह निंदा करना पत्रकारिता के साथ-साथ समूचे समाज को नुकसान पहुंचाना ही है, पर मुझे आशा है, कि भड़ास चोरों के मंसूबे कभी भी पूरे नहीं होने देगा।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आगरा से लांच होगा ‘मिड डे पॉवर’, श्‍याम अनजान बने संपादक

मीडिया हब बनते जा रहे आगरा से एक और अखबार लांच होने को तैयार है. यह अखबार साप्‍ताहिक होगा तथा इसे लांच करने की जिम्‍मेदारी उठाई है आगरा के वरिष्‍ठ पत्रकार श्‍याम अनजान ने. इस अखबार को अम्‍बेडकर जयंती यानी 14 अप्रैल को लांच करने की योजना है. 16 रंगीन पेज के इस साप्‍ताहिक टैबलाइड का नाम रखा गया है 'मिड डे पॉवर'. प्रबंधन की योजना एक छोटी टीम के साथ इसको निकालने की है. अखबार के प्रकाशक रतन प्रकाश हैं, जो कई समाचार पत्र, मैगजीन और लोकल चैनलों में काम कर चुके हैं.

अखबार के संपादक श्‍याम अनजान पिछले पांच दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे राजस्‍थान पत्रिका और दैनिक नवज्‍योति को लम्‍बे समय तक अपनी सेवाएं दी हैं. इसके अलावा वे सैनिक, विकासशील भारत, अमर उजाला और अमर भारती में भी वरिष्‍ठ पदों पर रहे हैं. नए साप्‍ताहिक अखबार के बारे में श्‍याम अनजान ने बताया कि हम इस अखबार को आम आवाज बनाने के लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखकर लांच कर रहे हैं. आज आम आदमी की आवाज मीडिया से बाहर होती जा रही है, हम उस स्‍पेस को भरने की कोशिश करेंगे.

 

 

नईदुनिया की जमीन पर आलोक मेहता का नेशनल दुनिया लांच

दिल्‍ली-एनसीआर से नईदुनिया बंद होने के साथ ही नेशनल दुनिया का प्रकाशन शुरू हो गया है. न कोई शोर-शराबा और ना कोई प्रचार-प्रसार. चुपचाप अखबार का प्रकाशन शुरू कर दिया गया. नईदुनिया से मिलते-जुलते ले आउट के चलते हॉकर भी दुविधा में हैं. बताया जा रहा है कि वे नईदुनिया के जाने और नेशनल दुनिया के आने की खबरों से इतर इसे अपने पाठकों तक नईदुनिया समझकर ही पहुंचा रहा है.

यानी आलोक मेहता एंड कंपनी ने बिना अतिरिक्‍त प्रयास किए नईदुनिया की जमीन पर नेशनल दुनिया की नींव रख दी है. अखबार का मूल्‍य साढ़े तीन रुपये रखा गया है. संपादक आलोक मेहता ने पहले पन्‍ने पर संपादकीय भी लिखी है, जिसका शीर्षक है – वही हैं हम, वही है दुनिया. अखबार के पहले अंक में लखनऊ से योगेश मिश्र, दिल्‍ली से विनोद अग्निहोत्री, रास बिहार, शिशिधर पाठक, प्रतिभा ज्‍योति ने बाइलाइन खबरें लिखी हैं.

 

 

मीडियाकर्मियों पर हमला का मामला : आज से अनशन करेंगे वर्द्धमान के पत्रकार

व‌र्द्धमान : व‌र्द्धमान मेडिकल कॉलेज अस्पताल के जूनियर चिकित्सकों द्वारा बुधवार को मीडिया कर्मियों की बेरहमी से की गई पिटाई के मामले ने तूल पकड़ लिया है। इस घटना के विरोध में मीडिया कर्मियों ने गुरुवार को जिला शासक कार्यालय के समक्ष धरना देकर आरोपी चिकित्‍सकों की गिरफ्तारी की मांग की। पत्रकारों ने डीएम को ज्ञापन भी सौंपा। इस मामले में अभी तक किसी आरोपी डॉक्‍टर की गिरफ्तारी नहीं हुई है। पत्रकारों ने कहा है कि अगर आरोपियों पर कार्रवाई नहीं होती तो वे शुक्रवार से अनशन करेंगे।

उल्‍लेखनीय है कि बुधवार को व‌र्द्धमान मेडिकल कॉलेज अस्पताल में कुछ पत्रकार खबर संकलन करने गए थे। उस दौरान दर्जनों जूनियर चिकित्सकों ने मीडियाकर्मियों के ऊपर लाठी, डंडा से हमला कर दिया, जिसमें एक दर्जन से ज्‍यादा मीडिया कर्मी जख्मी हुए। इनमें उदित सिन्हा, मुकुल, रहमान सहित कई मीडियाकर्मियों की हालत गंभीर है। उनका इलाज चल रहा है। इस घटना के बाद पत्रकारों ने थाने में इस मामले की शिकायत की थी, इसके बाद भी पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।

पुलिस ने इस मामले में अब तक किसी को गिरफ्तार नहीं किया है। नाराज मीडियाकर्मियों ने डीएम कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया तथा शुक्रवार यानी आज से अनशन करने की चेतावनी दी है। मीडियाकर्मियों ने कहा है कि अगर उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो आंदोलन का रास्‍ता अख्तियार करने को मजबूर होंगे। धरना-प्रदर्शन के दौरान दर्जनों की संख्‍या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे।

 

 

ममता सरकार के तुगलकी फरमान के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका

कोलकाता। सरकारी पुस्तकालयों में चुनिंदा समाचार पत्र रखने का मामला राजनीतिक तौर पर तूल पकड़ लिया है, वहीं इस मामले को कलकत्ता हाई कोर्ट में भी चुनौती दी गई है। गुरुवार को हाई कोर्ट में अधिवक्ता वासवी रायचौधरी ने पीआईएल (जनहित याचिका) दायर करके सरकार के फैसले को अनैतिक और द्वेषपूर्ण बताया है तथा कोर्ट से इसे खारिज करने की मांग की है। संभावना है कि कोर्ट जल्‍द ही इस याचिका पर सुनवाई कर सकती है।

रायचौधरी ने अपनी याचिका में राज्य सरकार के पुस्तकालयों में सिर्फ सरकारी पसंद के अखबार मंगाए जाने के निर्णय को संविधान विरोध तथा आम लोगों के हक के खिलाफ बताया है। उन्‍होंने कहा है कि सरकार के इस कदम से संविधान में उल्लेखित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कमजोर होगा तथा पेड न्यूज की शिकायतें बढ़ेंगी। याचिका में यह भी बताया गया है कि सरकारी पुस्‍कालयों में जिन अखबारों को मंगाने का निर्णय सरकार ने लिया है, उनमें से कई के मालिक सत्‍ता पक्ष के करीबी हैं तथा कई राज्‍य सभा में पार्टी से सांसद भी हैं।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल सरकार के जनसूचना विभाग की ओर से जारी अधिसूचना में पुस्तकालयों को मात्र आठ अखबार ही खरीदने का आदेश दिया था, जिसका जमकर विरोध हुआ। विरोध को देखते हुए पांच और अखबार सरकार ने बढ़ाए हैं, लेकिन प्रसार वाले अखबारों को इससे अब भी बाहर रखा गया है। वहीं ममता बनर्जी का कहना है कि सरकार के इस फैसले के खिलाफ साजिश करके उसे बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। विधानसभा में भी इस मामले को लेकर वाम मोर्चा तथा कांग्रेस मुखर हैं।

 

 

रीयल लाइफ में एक फिल्मी डायलाग बोलने में इरफान की फटी

बुधवार को मैं ऑफिस में नहीं था..बाहर की दुनिया देख रहा था..चार प्रसंग शेयर कर रहा हूं। जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में अभिनेता इर्रफान (IRRFAN को हिंदी में ऐसे ही लिखेंने ना…) खान छात्रों से बात कर रहे थे। इर्रफान दो घंटे तक छात्रों के हर सवाल का जवाब देते रहे, सिनेमा और जीवन के हर पहलू पर बात की। छात्रों ने पान सिंह तोमर का डॉयलाग 'बीहड़ में बागी रहते हैं…डकैत पलते हैं पार्लियामेंट में' बोलने का उनसे कई बार आग्रह किया लेकिन इर्रफान पर्दे के बाहर इस डॉयलाग को बोलने की हिम्मत नहीं दिखा सके।

जेएनयू से लौट रहा था। आनंद विहार बस अड्डे पर विपिन नाम के एक बच्चे से बात। 14 साल का विपिन शाहजहांपुर से यहां आया है और बस अड्डे से निकलते ही फ्लाइओवर के नीचे प्राइम स्पेस पर वो साइकिल पर कचौड़ी बेचता है। विपिन ने बताया वो रोजाना करीब पांच सौ रुपए कमाता है और महीने में करीब दस हजार घर भेज देता है। चौंकिए मत…ये तो वो अपने लिए कमाता हैं जरा सोचिए वो मालिक जो ऐसे ही करीब 200 बच्चों से ठेके पर कचौड़ी बिकवाता है कितना कमाता होगा? खैर…भारत में कमाने का सभी को हक है…भले ही वो बच्चों से माल बिकवाकर कमाए…असल बात यह है कि वो यहां साइकिल खड़ी करने के रोजाना 50 रुपए चौकी पर तैनात सिपाही को देता है। रोजाना के 50 यानि महीने के 1500 और साल भर के गिनों तो 18000। यानि वो 18 हजार सालाना 'टैक्स' चुकाता है अपना कचौड़ियां बेचने के लिए। ये अलग बात है कि यह टैक्स ब्लैक मनी के रूप में पुलिस और नेताओं के पास पहुंचता है जिसका कोई हिसाब नहीं है…..। (वैसे आप कितना टैक्स चुकाते हैं? )

विपिन से बात करके थोड़ा और आगे बढ़ा…आनंद विहार से इंदिरापुरम आने के लिए। एक ऑटो में बैठ गया रात के करीब दस बज चुके थे। ऑटो में बैठे हुए दस मिनट हो चुके थे, लेकिन ऑटो चलने का नाम नहीं ले रहा था। 6 सवारियां उसमें पहले से बैठी थी मैं सातवां था। ऑटो ड्राइवर का कहना था कि वो दस सवारियां बिठाने से पहले नहीं चलेगा। हम इंतेजार करते रहे। पांच मिनट और बीते कि एक मजदूर अपनी पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ वहां पहुंचा। ड्राइवर ने कहा बैठ जाओ। वो नहीं बैठा…एक खाली ऑटो आया वो उसमा बैठा ही था कि हमारे ऑटो का ड्राइवर और बाकी दो तिन ऑटो के ड्राइवर और उसे ऑटो से बाहर खींचने लगे। बोले…इसमें ही बैठोगे…भले ही आधा शरीर ऑटो से बाहर निकालकर लटकना पड़े।

बेचारा मजदूर कहता रहा कि उसके साथ बच्चे हैं और वो खाली ऑटो में ही जाएगा भले ही कितनी भी देर बाद में जाए। अब ड्राइवर का गुस्सा बढ़ा और वो उसे ऑटे से बाहर खींचने लगा। यह सब मेरी बर्दाश्त से भी बाहर था…नीचे उतरा…गुस्से में (इतना गुस्सा मुझे कभी-कभी ही आता है) अपने ऑटो के ड्राइवर को खींचकर दूर किया और चिल्लाते हुए कहा कि यदि अब तुमने इसे जाने नहीं दिया तो मेरे हाथ से पिट जाओगे। दूसरा ऑटो मजदूर और उसके परिवार को लेकर आगे चला गया…। लेकिन हमारे वाले ऑटो ने सभी सवारियों को नीचे उतार दिया बोला न मैं जाउंगा और न किसी और को ही यहां से जाने दूंगा…। खैर मुझे और गुस्सा आता इससे पहले ही एक अन्य आटो आया और उसने हमें इंदिरापुरम छोड़ दिया। इसे भी बाकी ड्राइवरों ने चलने से रोकने की कोशिश की…मेरे पुलिस को बुलाने की बात कहने पर ही हमें आगे जाने दिया…। रास्ते में ड्राइवर ने बताया कि आंनद विहार से चलने वाले प्रत्येक ऑटो को हर चक्कर पर बीस रुपए यहां के माफिया को देने होते हैं। पुलिस ने ही यहां कुछ गुर्गे तैनात कर रखे हैं जो प्रत्येक ऑटो वाले से पैसा वसूलते हैं और शाम को अपना हिस्सा लेकर बाकी रकम पहुंचा देते हैं…। वसूली का आंकड़ा भी आपको चौंका देगा। प्रत्येक ऑटो से हर चक्कर पर 20 रुपए लिए जाते हैं। यानी 6 एक्स्ट्रा सवारियां बैठती हैं उनमें से दो का किराया सीधे माफिया की जेब में जाता है। जिस ऑटो में कायदे से अधिक से अधिक 6 सवारियां बैठनी चाहिए वो 12 भरकर क्यों चलता है यह मेरी समझ में आ रहा था।

खैर…जैसे तैसे घर पहुंचा। मोबाइल चैक किया तो भोपाल से एक संदेश मिला। भ्रष्टाचार पर सवाल करने से बौखलाए एक अफसर ने हमारे साथी पत्रकार जाहिद मीर का कैमरा तोड़ दिया। यही नहीं उन्हें तीन घंटे थाने में भी बिठाया गया और उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला भी दर्ज किया गया। हालांकि पत्रकारों के दवाब में अफसर के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। यह अफसर आदिम जाति कल्याण विभाग में तैनात है।

इन चारों प्रसंगों के बाद मेरा मन देश के नेताओं और संसद को दिल खोलकर गाली देने का कर रहा था। लेकिन मैंने नहीं दी। मैंने किसी नेता को मोटी चमड़ी का सूअर नहीं कहा। न ही मैंने यह कहा कि देश की संसद में सबसे बड़े लूटेरे बैठे हैं। मैंने यह भी नहीं कहा कि नेता अब संगठित गिरोह के सरगना के तौर पर काम करते हैं जिनका मूल काम वसूली रह गया है। मेरी हिम्मत ही नहीं हुई की मैं यह कह सकूं कि रोजाना मेरी जेब से करीब दस प्रतिशत पैसा इन लुटेरे नेताओं की जेब में पहुंच जाता है। अरे भई मैं ये कैसे कह सकता था। जब इर्रफान खान जैसा हीरो फिल्म का डॉयलाग नहीं बोल सकता, जाहिद मीर जैसे बेबाक और बेकौफ पत्रकार का कैमरा तोड़ा जा सकता है तो फिर मैं तो….।

लेखक दिलनवाज पाशा युवा और तेजतर्रार पत्रकार हैं. उन्होंने अपनी यह बात अपने फेसबुक वॉल पर प्रकाशित की है. लिंक है- http://www.facebook.com/dilnawazpasha/posts/3580560311172

नईदुनिया के सभी कर्मचारियों से मांगे गए इस्‍तीफे

नईदुनिया से खबर है कि प्रबंधन ने दिल्‍ली-एनसीआर में कार्यरत अपने सभी पत्रकार तथा गैर पत्रकार कर्मचारियों से इस्‍तीफा देने को कह दिया है. प्रबंधन से सबसे 31 के पहले तक इस्‍तीफा देने को कह दिया है. अब लगभग पूरी तरह तय हो चुका है कि जागरण समूह ने इस अखबार का लगभग अधिग्रहण कर लिया है. सूत्रों का कहना है कि जागरण ने नईदुनिया का टेकओवर लगभग तीन सौ करोड़ में किया है.

कर्मचारियों से इस्‍तीफा मांगे जाने के बाद यह पूरी तरह सच हो गया कि अब 31 के बाद नईदुनिया अखबार का प्रकाशन नहीं होगा. सूत्रों का कहना है कि जागरण समूह नईदुनिया को अधिग्रहण से पहले नईदुनिया प्रबंधन को सारा मामला खुद निपटाने को कहा है इस‍के चलते ही तमाम छंटनी की जा रही है और इस्‍तीफे मांगे जा रहे हैं.

 

 

‘पूर्वांचल आजकल’ में आपसी खींचतान, मंगलवार को नहीं छपा अखबार

बनारस से कुछ समय पहले ही लांच हुआ सांध्‍य दैनिक 'पूर्वांचल आजकल' को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं. बताया जा रहा है कि प्रबंधन में आपसी टकराव शुरू हो चुका है. इसी के चलते मंगलवार को इस अखबार का प्रकाशन नहीं हुआ. बताया जा रहा है कि पैसे को लेकर तनातनी शुरू हो गई है. हालांकि अखबार के प्रकाशन न होने का कारण बाहर तकनीकी खराबी बताया गया, परन्‍तु बताया जा रहा है कि अब पैसे और हिस्‍सेदारी को लेकर संघर्ष शुरू हो चुका है.

उल्‍लेखनीय है कि इस अखबार के संपादक गांडीव से कई दशकों तक जुड़े रहे वरिष्‍ठ पत्रकार डा. राधारमण चित्रांशी हैं. इस अखबार में अत्रि भारद्वाज की भी हिस्‍सेदारी बताई जा रही है. खबर है कि इन लोगों के बीच तनाव तथा एक दूसरे को सबक सिखाने की कोशिशों के चलते ही अखबार का प्रकाशन नहीं हो पाया था. 

 

 

पहले से भी ज्यादा मजबूत होकर लौटे हैं उपेंद्र राय

सहाराश्री सुब्रत राय सहारा के हस्ताक्षर से युक्त सर्कुलर सहारा मीडिया के आफिसों में चस्पा हो चुका है. आज की ही तारीख इस सर्कुलर पर दर्ज है. सर्कुलर के कंटेंट से जाहिर है कि उपेंद्र राय पहले से ज्यादा मजबूत होकर लौटे हैं. उन्हें सहारा मीडिया का सर्वेसर्वा (एडिटोरियल, एडमिनिस्ट्रेटिव एंडर अदर) तो बनाया ही गया है, उन्हें यह अधिकार भी दिया गया है कि वह अगर समूह के हित में जरूरी समझते हैं तो हास्पिटेलिटी, हाउसिंग, सर्विस आदि दूसरे डिवीजन में भी हस्तक्षेप कर सकते हैं.

सुब्रत राय ने अपनी तरफ से यह अधिकार उपेंद्र राय को दिया है. उपेंद्र राय सीधे सहाराश्री सुब्रत राय को रिपोर्ट करेंगे. इस सर्कुलर से स्पष्ट है कि सहारा मीडिया में अब सिर्फ और सिर्फ उपेंद्र राय के निर्देश पर काम होगा. उपेंद्र राय की वापसी के बाद ये माना जा रहा है कि उनके जो करीबी लोग स्वतंत्र मिश्रा के समय में साइडलाइन कर दिए गए थे, उन्हें फेर से मेनस्ट्रीम में लाया जाएगा. उदाहरण के तौर पर सहारा के न्यूज चैनलों का हेड रजनीकांत सिंह को बनाया जा सकता है. विजय राय, रमेश अवस्थी आदि की एक एक कर पहले ही वापसी हो चुकी है और उन्हें अधिकार संपन्न किया जा चुका है.

मूल खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें- उपेंद्र राय फिर बने सहारा मीडिया के सर्वेसर्वा, सर्कुलर जारी

नईदुनिया को तीन सौ करोड़ रुपये में खरीद रहा है जागरण ग्रुप

नईदुनिया की बिक्री को लेकर अब तस्वीर साफ होती जा रही है. कई वेबसाइटों पर इससे संबंधित खबरें आने लगी हैं. एएफक्यूएस वेबसाइट ने खबर प्रकाशित कर खुलासा किया है कि करीब तीन सौ करोड़ रुपये में नई दुनिया को जागरण खरीद रहा है. पूरी खबर इस प्रकार है– The Jagran group that publishes the country's most widely read Hindi newspaper, Dainik Jagran, is close to buying out Nai Dunia, the Indore-based Hindi daily promoted by Vinay Chhajlani. According to sources familiar with the development, the talks have been on for a while and the deal size is expected to be around Rs 300 crore.

Mahendra Mohan Gupta, chairman and managing director, Jagran Prakashan, did not respond to calls and text messages. Chhajlani, when contacted on the talks, said he was busy in a meeting. He did not take calls later on or respond to messages.

Nai Dunia was started in 1947 and is published from Indore, Gwalior and Jabalpur in Madhya Pradesh and from Bilaspur and Raipur in Chhattisgarh. If the deal goes through, Dainik Jagran would get an avenue to expand in Madhya Pradesh and central India. Currently, the Kanpur-based newspaper group has two editions in Madhya Pradesh, at Bhopal and Rewa. It is published from Uttar Pradesh, Uttarakhand, Punjab, Bihar, Delhi, Haryana, Jharkhand, Madhya Pradesh and parts of Rajasthan. It has 37 editions.

According to The Indian Readership Survey (IRS) Q4 report, released by the Media Research Users Council (MRUC) and Hansa Research, Dainik Jagran has average issue readership of 16.41 million, making it the most read publication across the country, while Nai Dunia has average readership of 1.64 million.

The 2012 Ficci- KPMG report on the media and entertainment industry says Hindi language dailies have a highly competitive market. Five of the country's top 10 dailies are published in Hindi. The non-English press contributes 60 per cent of the industry's revenue and caters to 89 per cent of readers. For the December quarter, Jagran posted a net profit of Rs 41.3 crore, with revenue of Rs 324 crore. On Tuesday, the scrip closed at Rs 97.4, down two per cent on the Bombay Stock Exchange.

In 2010, Jagran bought Mid Day, the afternoon tabloid based in Mumbai, from Tariq Ansari for Rs 200 crore in an all-stock transaction. The deal also included Sunday Mid-Day, Gujarati Mid-Day and the Urdu newspaper Inquilab, along with its website, mid-day.com.

The Blackstone Group, a private equity firm, holds an estimated 12 per cent of Jagran Media Network Investment Pvt Ltd, the holding company of Jagran Prakashan. It had invested Rs 225 crore in the company, which was used for expansion and acquisitions in print. Last year, it launched Punjabi Jagran and also extended the Urdu daily, Inquilab, to four new cities – Lucknow, Kanpur, Delhi and Bareilly.

Apart from Dainik Jagran, the group also publishes other newspapers, I-Next and City Plus. Chhajlani, a printing technologist by profession, started his foray into business by setting up a software company, Suvi Information Systems. In 2009, a group of investors and he bought NewsX, an English news channel, from INX Media, promoted by former STAR India CEO Peter Mukherjea and his wife, Indrani. He is also believed to be in talks with Subhash Chandra's Zee Network to sell his stake in NewsX, though the two have denied any talks.

There has also been speculation that Mukesh Ambani has invested in Nai Dunia, as well as his software company, in his independent capacity, a speculation the group has denied. Courtesy : Afaqs

 

 

उपेंद्र राय फिर बने सहारा मीडिया के सर्वेसर्वा, सर्कुलर जारी

सहारा से बड़ी खबर है. पता चला है कि सहारा मीडिया के शीर्षस्थ पद पर उपेंद्र राय की फिर से वापसी हो गई है. सूत्रों के मुताबिक सहारा मीडिया के प्रत्येक विंग के प्रभारियों को मेल जारी करके कह दिया गया है कि वे अब सीधे उपेंद्र राय को रिपोर्ट करें. इस बदलाव के बाबत आंतरिक सर्कुलर जारी होने की सूचना है. ज्ञात हो कि उपेंद्र राय को ग्लोबल हेड का पद देकर साइडलाइन किए जाने के बाद सहारा मीडिया का सर्वेसर्वा स्वतंत्र मिश्रा को बनाया गया लेकिन उनका राज महीने भर पहले ही खत्म कर दिया गया था.

उनके उपर वंदना भार्गव को बिठा दिया गया था. अब उपेंद्र राय को फिर से सहारा मीडिया का हेड बनाकर प्रबंधन ने स्वतंत्र मिश्रा को पूरी तरह फिर से किनारे कर दिया है. उपेंद्र राय की वापसी के बाद तरह तरह की चर्चाएं सहारा समूह में शुरू हो गई हैं. कुछ लोगों का कहना है कि एक बार फिर आंतरिक उठापटक तेज होने के आसार हैं. वहीं, कुछ का कहना है कि उपेंद्र राय को कुछ समय के लिए जानबूझ कर किनारे किया गया था ताकि सुप्रीम कोर्ट व प्रवर्तन निदेशालय आदि को संतुष्ट किया जा सके. स्वतंत्र मिश्रा को कुछ समय के लिए लाया गया था. अब जब सब कुछ नार्मल हो गया है, प्रबंधन ने फिर से उपेंद्र राय को मुख्य धारा में पहले जितने पावर के साथ ला दिया है.

कुछ पुरानी खबरें यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं-

सहारा मीडिया

सहारा उठापटक

फूल्स डे कंपेन की खबर वाल स्ट्रीट जरनल में प्रकाशित

Several days in the Indian calendar already commemorate famed politicians. The birth anniversary of Former Prime Minister Jawaharlal Nehru, for instance, is celebrated as children’s day, while that of former President Sarvepalli Radhakrishnan marks India’s teacher’s day.

Now, Save Your Voice, a non-profit advocating free speech on the Web is lobbying for a “special day” to be dedicated to Kapil Sibal, the country’s telecom and communications minister. The day they picked? April Fools’ Day. “Mr. Sibal has represented the fools across the globe by his imprudent attempts to censor the Web,” says Aseem Trivedi, founder of Save Your Voice. “We strongly feel that April Fools’ Day should honor the reckless antics of our noble minister,” he adds.

In recent months, the government’s demand for Internet firms to remove content deemed objectionable from their sites has angered those who say this amounts to censorship. While renaming April Fools’ Day in honor of Mr. Sibal is unlikely to take off, there may be uncomfortable days ahead for India’s IT minister.

This week, the non-profit plans to stage demonstrations near prominent locations including Parliament and the IT ministry with dummies of Mr. Sibal. “The aam admi,” or common man, “can support our cause by adorning (Mr. Sibal’s) dummies with a joker’s hat, a plastic whistle and a bunch of flowers.” The clown-like attire, Mr. Trivedi says, is an “attempt to expose the foolish avatar” of the minister.

“After a week of heartiest wishes from the common man, an extravagant demonstration will mark Sibal Divas or April Fools’ Day at Rajghat,” he adds. Rajghat, the place where Mahatma Gandhi’s ashes are kept, is a popular site for protests in New Delhi.

Mr. Trivedi, a cartoonist by profession, decided to launch a battle advocating free speech of the Internet after his website was suspended in January by law enforcement authorities in Mumbai on grounds that it showcased “ugly and obscene” content mocking the Indian Constitution.

“No prior notice or guidelines were offered by authorities on what they deemed offensive,” he adds, referring to his case. The ultimate goal of his April Fools’ Day campaign is to rally public support in defense of free speech on the Web: “Our campaign is a voice for those who are victims of this government-led propaganda.”

A spokesman for the Ministry of Communications and IT declined to comment on Mr. Trivedi’s campaign. He added that Mr. Sibal was unavailable and “extremely preoccupied” with Delhi’s upcoming local elections. He reiterated his ministry’s position saying that they have “no intention to censor the Internet,” explaining their aim is only to ensure that “content deemed objectionable under law is screened.”

Rashid Alvi, a spokesman of the ruling Congress party, told India Real Time that he does “not wish to comment on a campaign or an organization that is not known to anybody.” Although Save Your Voice is relatively small, it is gaining popularity on social media.

“Best wishes to Kapil Sibal on April Fools’ Day. You are truly ‘superman’ for the foolish,” a user commented in Hindi on the non-profit’s website.

“Great initiative. Now Mamata Banerjee should pester PM to declare April Fools’ Day as a national holiday,” another user commented. West Bengal Chief Minister Ms. Banerjee has reportedly written to the Prime Minister four times demanding that birth anniversaries of famed Bengalis be declared national holidays. Courtesy :The Wall Street Journal

 

 

समाजवादी लोकतांत्रीकरण की राह पर अखिलेश

: अदना से अदना आदमी भी मुख्यमंत्री तक पहुंच सकता है, अपना दर्द बयाँ कर सकता है : लखनऊ। अखिलेश युवा हैं, उनकी पढ़ाई-लिखाई में प्रोफेशनलिज्म का बहुत महत्व रहा है। जिसे जो काम करना है, ठीक से करे, ईमानदारी से करे, निष्ठा से करे, काम को अपना काम समझ कर करे। यही प्रोफेशनल तरीका है। वह कार्यशैली में हाईटेक हो, पर व्यवहार में पारंपरिक हिंदुस्तानी। सबके प्रति आदर का भाव। अफसरी नहीं। कोई भी किसी दफ्तर में अपना काम लेकर जाय, तो उसका अपनेपन केसाथ स्वागत हो, उसे दुत्कारा न जाय, अफसरी न झाड़ी जाय। आफ्टर आल सभी जनता की सेवा के लिए हैं, कर्मचारी, अफसर और सरकार भी। जनता सबसे ऊपर है, आम आदमी सबसे ज्यादा ध्यान दिये जाने योग्य व्यक्ति है। अखिलेश कुछ ऐसी ही कार्य संस्कृति चाहते हैं। लगे कि सरकार कोई तोप चीज नहीं है, वह जनता के द्वारा, जनता की और जनता के लिए है।

वे जानते हैं कि पूरे तंत्र में पांच साल से एक अजीब तरह की जड़ता और असंवेदनशीलता घर कर गयी है। इसको बदलने के लिए, इसे ज्यादा से ज्यादा जनसंवेदनशील बनाने के लिए स्वयं भी वैसा ही व्यवहार करना पड़ेगा। महात्मा गांधी और डा. राम मनोहर लोहिया का मानना था कि नेता को विशिष्ट नहीं होना चाहिए, उसे जनता से अलग नहीं दिखना चाहिए। आम आदमी जिस तरह का जीवन व्यतीत कर रहा है, वही जीवन नेता को भी अपने लिए चुनना चाहिए, तभी वह व्यापक स्तर पर लोगों के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकेगा, तभी वह लोगों की समस्याओं को समझ सकेगा और केवल तभी वह उनके समाधान की दिशा में कदम बढ़ा सकेगा। इतिहास गवाह है कि जो नेता जनता से दूर गये, उनको लोगों ने सत्ता से उतार दिया, समय की कब्र में दफ्न कर दिया।

अखिलेश को पता है कि यह फासला नहीं होना चाहिए। इसीलिए वे नयी सरकार की कार्यसंस्कृति में आम जनता को केंद्र में रखकर चल रहे हैं। आप को याद होगा, पहले जब मुख्यमंत्री का काफिला सड़क पर निकलता था तो राजशाही अंदाज में। सारी सड़कें बंद हो जाती थीं, जनता जाय भाड़ में। कितना भी जरूरी काम है, रुको और इंतजार करो या फिर ज्यादा उछल-कूद की तो डंडे खाओ। लोग सोचते थे, ये कैसे जनता के नेता हैं, जिनको जनता की तकलीफों का ही ध्यान नहीं है। कई बार लोग गालियाँ भी देते थे। लेकिन अब अखिलेश के साथ ऐसा नहीं है। कोई ताम-झाम नहीं, कोई काफिला नहीं, किसी को कोई परेशानी नहीं। मुख्यमंत्री निकल जाते हैं, आम लोगों को पता ही नहीं चलता है, उनका रास्ता नहीं रुकता है, उन्हें कोई कठिनाई नहीं होती है।

इतना ही नहीं किसी को भी मुख्यमंत्री से मिलना है तो रास्ते खुले हुए हैं। ज्यादा छानबीन नहीं, रोक-टोक नहीं। कोई अदना से अदना आदमी भी पहुंच सकता है, अपनी बात कह सकता है, अपना दुख बयान कर सकता है। यह मुख्यमंत्री का नहीं जनता का दरबार है और अपने ही दरबार में  आखिर जनता को क्यों कोई दिक्कत होगी। मुख्यमंत्री की शैली है, लोगों के पास होने की। बहुत सहज है कि वे अफसरों से भी ऐसी ही उम्मीद करेंगे। जनता ने तो अपना काम कर दिया है, अब सरकार की बारी है। जिस उम्मीद से, जिस सपने से लोगों ने समाजवादी पार्टी को सत्ता तक पहुंचाया है, वे उम्मीदें, वे सपने टूटने नहीं चाहिए। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को मुख्यमंत्री का यह साफ संदेश है। कोई लिखा हुआ नहीं, उनके व्यवहार से, उनकी अपनी कार्यशैली से। समय से कार्यालय आइये, जनता की पीड़ा कम करने के लिए जितना कर सकें, करिये।

यह सच्चे अर्थों में समाजवादी जनतांत्रीकरण की ओर मुख्यमंत्री अखिलेश के बढ़ते कदम हैं। केवल जनतंत्र कई बार अराजक और सीमित तानाशाही का शिकार हो जाता है। जैसा मायावती के काल में हुआ। सरकार तक जनता की पहुंच ही नहीं थी, सारे रास्ते बंद थे। पर समाजवाद राजनीति की एक जनोन्मुख धारा है। जनता से फासला भी हो और समाजवाद भी हो, यह संभव नहीं है। मुख्यमंत्री इसी समाजवादी लोकतंत्र के सपने को साकार करना चाहते हैं। इसीलिए वे अपने निर्णयों में जनता को शामिल होते देखना चाहते हैं, अपने व्यवहार में जनता के बीच के आदमी की तरह प्रस्तुत होते दिखना चाहते हैं। यह बदलाव की दुधारी तलवार है लेकिन एक युवा नेता इस रास्ते पर चलने की हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ रहा है तो हम सबको उसे थोड़ा वक्त देना चाहिए, उसकी मदद करनी चाहिए। अगर लोग इतना कर पाये तो मुख्यमंत्री अखिलेश इससे बहुत ज्यादा वापस लौटा सकेंगे, ऐसा भरोसा बने रहना यकीनन बहुत जरूरी है।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से

प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है

 

 

‘जस्टिस फॉर एसपी राहुल शर्मा’ करेगा 2 अप्रैल को अनशन

बिलासपुर : दिवंगत एसपी राहुल शर्मा द्वारा की गयी आत्महत्या के लगभग एक पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी सुसाइड नोट में जिम्मेदार ठहराए गए लोगों के खिलाफ प्रशासन द्वारा एफआईआर न किये जाने के विरोध स्वरुप 'जस्टिस फॉर एसपी राहुल शर्मा' द्वारा एक बैठक का आयोजन स्थानीय कम्पनी गार्डेन में मंगलवार शाम 4 बजे किया गया. बैठक में शहर के कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं बुद्धिजीवी मौजूद थे.

बैठक का संचालन करते हुए आनंद मिश्र ने कहा कि नियमानुसार मृत्यु के बाद ही एफआईआर हो जानी चाहिए थी, जिसके नहीं होने से प्रशासन पर सवालिया निशान उठता है. इसके साथ ही उन्होंने आगामी दिनों में इस सम्बन्ध में जाँच करवाने की मांग उठाई और स्व. शर्मा के परिवार के साथ-साथ शहर को न्याय दिलाने की मांग की गई. इस अवसर पर सभी उपस्थितों ने एक-एक कर अपने विचार रखे. उन्होंने बताया की विगत 10 दिनों से सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर बिलासपुर के नागरिकों द्वारा लगातार जांच की मांग उठाई जा रही है. इसके साथ ही बैठक में आगामी 2 अप्रेल को नेहरु चौक पर एक दिवसीय अनशन करने का निर्णय लिया गया. बैठक में वरिष्ठ पत्रकार अलोक प्रकाश पुतुल, यशवंत गोहिल, रूद्र अवस्थी, संजीव पाण्डेय, वीरेन्द्र, सुनील शर्मा, अटल श्रीवास्तव, श्री तिवारी सहित कई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं नागरिक उपस्थित थे.

 

 

हिंदुस्‍तान, बरेली की लुटिया डुबो दी आशीष व्‍यास ने, सर्कुलेशन हुआ आधा

यशवंतजी, अक्‍टूबर 2009 में जब हिंदुस्‍तान, बरेली लांच हुआ था तो बुकिंग के कारण उसका सर्कुलेशन 90 हजार कापियों से शुरू हुआ था. संपादक अनिल भास्‍कर के स्‍थान पर जब अमर उजाला से केके उपाध्‍याय ने हिंदुस्‍तान ज्‍वाइन किया तो उनके साथ अमर उजाला की बड़ी टीम भी आ गई. और सर्कुलेशन बढ़कर एक लाख 18 हजार को पार कर गया. इसमें बरेली सिटी में तो 54 हजार का रिकार्ड बना.

फरवरी 2011 में केके उपाध्‍याय प्रमोशन पर आगरा चले गए और दैनिक भास्‍कर, अजमेर से अपने पुराने शिष्‍य आशीष व्‍यास को लाकर बरेली का संपादक बना दिया. उसी दिन से बरेली में हिंदुस्‍तान की उल्‍टी गिनती शुरू हो गई. यहां तक की सिटी इंचार्ज डीएनई संजीव द्विवेदी ने भी इस्‍तीफा दे दिया. अब हालात यह है कि आशीष व्‍यास के एक साल के कार्यकाल में बरेली संस्‍करण का सर्कुलेशन घटकर मात्र 58 हजार रह गया है. उसमें सिटी का सर्कुलेशन मात्र 31 हजार रह गया है. खबरें रिपीट हो रही हैं और पुरानी खबरें फेरबदल के साथ छापी जा रही हैं.

आपको बता दूं कि फतेहपुर के फोटो तक बरेली में बाइलाइन छापे जा रहे हैं. तीन महीने बाद भी नया सिटी इंचार्ज नहीं नियुक्‍त किया जा सका है. एनई का हस्‍तक्षेप भी सिटी में अनावश्‍यक बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते सिटी की टीम परेशान तो है ही, डेस्‍क वाले भी बहुत परेशान हैं. सर्कुलेशन को और गिरने से रोकने के लिए हिंदुस्‍तान ने अब संडे टू संडे प्राइज स्‍कीम शुरू की है, जिसमें हर संडे को बाइक और वाशिंग मशीन जैसे गिफ्ट दिए जा रहे हैं. संपादकीय टीम सर्कुलेशन गिरने का कारण योगेंद्र सिंह के तबादले के बाद आए नए प्रसार मैनेजर पराग शर्मा की नीतियों को बता रहे हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 

खबर पक्‍की, नेशनल दुनिया लांच करेंगे आलोक मेहता

नईदुनिया में दिल्‍ली एडिशन का आखिरी अंक 31 मार्च को प्रकाशित होगा. यह अखबार इसके बाद दैनिक जागरण प्रबंधन के हवाले हो जाएगा यह भी लगभग फाइनल हो चुका है. पर जिस बिल्डिंग में आलोक मेहता एंड कंपनी नईदुनिया के सहारे अपनी दुनिया चला रही है, उसमें चहल-पहल कम नहीं होगी. इस बिल्डिंग से नईदुनिया का अंत होगा तो एक नया अखबार नेशनल दुनिया इसमें जन्‍म लेगा. और इसे धरातल पर लाएंगे आलोक मेहता. पैसा और फाइनेंसर जैसी दिक्‍कतें तो आलोक मेहता को कभी नहीं रही हैं. अखबार भले ही भाड़ में जाए पर ये लोग कभी इससे प्रभावित नहीं हुए.

आलोक मेहता की गिनती ऐसे ही बड़े संपादकों या कांग्रेस के अघोषित प्रवक्‍ता के रूप में नहीं की जाती है, बल्कि इसके पीछे कारण भी है. चाहे कोई अखबार चले या बंद हो, उससे आलोक मेहता और उनके चेले-चपाटियों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. वे बेरोजगार नहीं होने वाले हैं. आलोक मेहता को लेकर पीछे भी कई खबरें आ रही थीं कि वे नवजीवन को जीवन दे सकते हैं या अपना अखबार निकाल सकते हैं. अब दूसरी वाली बात सच होती दिख रही है. अब खबर है कि वे नया अखबार नेशनल दुनिया लेकर आ रहे हैं. 28 को इस अखबार का वेरि‍फिकेशन भी आरएनआई से हो चुका है.

नेशनल दुनिया के मालिक खुद आलोक मेहता होंगे. और इस अखबार का टाइटिल कोड होगा DELHIN/27202. आरएनआई की तरफ से होने वाली लगभग सारी प्रक्रियाएं पूरी कर ली गई हैं. सूत्र बताते हैं कि इस अखबार में पैसा ग्‍वालियर के शराब माफिया भदौरिया (जिसे कांग्रेस का नजदीकी माना जाता है), राजस्‍थान के सीएम अशोक गहलोत और मध्‍य प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह लगा रहे हैं. यह अखबार एक तरह से कांग्रेस का मुख पत्र होगा. दोनों दिग्‍गज कांग्रेसियों अशोक गहलोत और दिग्विजय के निवेश करने के बारे में कहा जा रहा है कि ये दोनों नेता आगामी विधानसभा चुनाव को ध्‍यान में रखकर एक भोंपू तैयार करना चाह रहे हैं.

सूत्रों ने बताया कि आलोक मेहता ने नई‍दुनिया के अपने साथियों की मीटिंग लेकर कह भी दिया है कि उन्‍हें घबराने की कोई जरूरत नहीं है. नईदुनिया बंद होने के बाद भी उनकी नौकरी नहीं जाएगी क्‍योंकि नईदुनिया से आगे उनको नेशनल दुनिया में काम करना है. बताया जा रहा है कि इस खबर के बाद बुझे-बुझे से रहने वाले नईदुनिया के कर्मचारियों में जोश लौट आया है. हालांकि निष्‍पक्ष पत्रकारिता के लिहाज से यह भले ही उतनी अच्‍छी खबर ना हो परन्‍तु पत्रकारों के लिहाज से यह खबर बढि़या हैं, कम से कम वे बेरोजगार होने से तो बच गए. भले ही उन्‍हें कांग्रेस के अघोषित मुखपत्र जैसे अखबार में ही काम क्‍यों ना करना पड़े.

 

 

सरकार के दबाव में जागरण के प्रबंधकों ने ली नवीन गौतम की बलि

दैनिक जागरण, देश का नम्‍बर एक अखबार, सबसे ज्‍यादा प्रसारित अखबार. पर इस अखबार का नाम लेते ही दिमाग में एक ऐसे अखबार की छवि बनने लगती है, जो अपनी सुविधानुसार कुछ भी कर सकता है. थूक कर चाट भी सकता है. इस अखबार के लिए जान की बाजी लगाकर काम करने वाले पत्रकारों को भी कभी भी दूध की मक्‍खी की तरह निकाल कर फेंक सकता है. यानी हर वो रास्‍ता अपना सकता है जिससे इस अखबार को किसी भी प्रकार की तकलीफ ना हो.

इस अखबार से जनसरोकार की खबरों की उम्‍मीद करना तो बेकार है पर यह अपने फायदे के लिए अपनों की भी बलि ले सकता है, यह एक बार फिर साबित हो गया है. घिन्‍न आती है दैनिक जागरण की ऐसी पत्रकारिता देखकर. पैसे के लिए यह अखबार कितना भी नीचे गिर सकता है. ऐसा ही हुआ है जागरण के एक तेजतर्रार रिपोर्टर नवीन गौतम के साथ. नवीन की पत्रकारिता पर खुश होने के बजाय चाटुकारिता पसंद मैनेजमेंट ने नवीन गौतम को रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्‍क पर भेज दिया है.

आइए अब आपको बताते हैं पूरा मामला. कल नवीन गौतम की एक बाइलाइन खबर छपी थी, जिसका शीर्षक था – गरीबी रेखा के नीचे बसर करते हैं राहुल गांधी! इस खबर में बताया गया था कि किस तरह से गुडगांव में राशन कार्डों में फर्जीवाड़ा हो रहा है. और ऐसा ज्‍यादातर राज्‍यों में होता है कि पैसा देकर आप कुछ भी, किसी के भी नाम से जारी करवा सकते हैं. कुछ समय पहले तक तो राशन कार्डों के साथ फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस तक जारी हो जाते थे, पर अब नई तकनीक आने के बाद कम से कम डीएल में यह फर्जीवाड़ा रूकी है.     

तो बात हो रही थी, राशन कार्डों की. नवीन को राहुल गांधी और सीएम भूपेंद्र सिंह हुडडा के सांसद पुत्र दीपेंद्र हुडडा के फर्जी राशन कार्ड मिले, जिसमें उनको गरीबी रेखा से नीचे का राशन कार्ड जारी किया गया था. इस खबर ने हरियाणा में चल रहे राशन विभाग के भ्रष्‍टाचार तथा फर्जीवाड़े की पोल खोलकर रख दी थी. बताया जा रहा है कि इस खबर पर अखबार के वरिष्‍ठों ने नवीन की पीठ भी थपथपाई थी. इस खबर को तानकर छापा गया था, यहां तक कि इसे राष्‍ट्रीय संस्‍करण में भी प्रमुखता से स्‍थान दिया गया था.

पर अचानक चौबीस घंटे के भीतर ऐसा क्‍या हो गया कि प्रबंधन ने नवीन गौतम को रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्‍क पर बैठा दिया. आइए अब बताते हैं इसके पीछे का खेल. हरियाणा में भी बिहार जैसा मीडिया पर अघोषित सेंसरशिप है. यहां भी मीडिया वैसे ही मैनेज होती है, जैसे बिहार में नीतीश कुमार करते हैं. इस खबर के छपने के बार हरियाणा सरकार की अच्‍छी खासी किरकिरी हुई. बताया जा रहा है कि इसके बाद सीएम के चहेते सक्रिय हो गए. दैनिक जागरण के प्रबंधन को धमकाया गया कि अगर ऐसे ही रहा तो विज्ञापन बंद कर दिया जाएगा. और भी काफी कुछ सुनाया गया.

विज्ञापन बंद होने की धमकी मिलते ही दैनिक जागरण का चाटुकार प्रबंधन हरकत में आया. और आनन-फानन में मुख्‍यमंत्री के नजदीकी लोगों से संपर्क साधा. फिर बात खंडन छापने पर आई. बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने इस मामले में सरकार की पोल खोलने की बजाय अपने हथियार डालते हुए सीएम के पैरों तले लोटने लगा. त्राहि माम त्राहि माम किया जाने लगा. नवीन गौतम के पक्ष में खड़ा होने की बजाय सरकारी इशारा मिलने के बाद उन्‍हें ही रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्‍क पर भेज दिया गया. साथ अखबार ने इस बारे में खंडन भी छापा कि यह उन डिपो मालिकों की शरारत का हिस्‍सा है, जिनका डिपो निरस्‍त कर दिया गया था. 

तो सवाल यह उठता है कि आखिर डिपो मालिकों के पास यह राशन कार्ड पहुंचा कैसे. जब सारे राशनकार्डों पर नम्‍बरिंग होती है, उसको जारी करने वाले अथारिटी का सिग्‍नेचर होता है, मुहर लगता है, जांच होती है, इसके बाद भी इन राशन कार्डों का गलत तरीके से डिपो मालिकों ने कैसे बना डाला. जाहिर है कि इसमें गलती सिर्फ डिपो मालिकों की नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारियों की भी है. भ्रष्‍टाचारियों की भी है. ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय जब सत्‍ता और मीडिया की जुगलबंदी हो गई तो सच को तो मरना ही है. और इस बार सच को मार डाला एक अखबार ने. दैनिक जागरण ने.

नीचे मूल खबर :


                         गरीबी रेखा के नीचे बसर करते हैं राहुल गांधी!

नवीन गौतम

गुड़गांव : कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी गुड़गांव की अर्जुन नगर कालोनी में रहते हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सुपुत्र व रोहतक के सांसद दीपेंद्र हुड्डा राजेंद्र पार्क कॉलोनी के निवासी हैं। इन राजनीतिक हस्तियों के अलावा अंडरव‌र्ल्ड के कई बादशाह भी इसी शहर के बाशिंदे हैं। इनकी आर्थिक स्थित भी इतनी खराब है कि वे गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर बीपीएल राशन कार्ड पर राशन ले रहे हैं। यह सब जानकर आप तो हैरान होंगे ही, जिनके नाम ले रहे वे भी चौंक जाएंगे। लेकिन यह गुड़गांव में राशन कार्ड को लेकर चल रहे फर्जीवाड़े की हकीकत है। कुछ विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से राशन माफिया गरीबों के हक पर सरेआम डाका डाल रहा है। इसे फर्जीवाडे़ को हाथ लगे दस्तावेज व राशन कार्ड के सहारे दैनिक जागरण उजागर कर रहा है। यह कारनामा राशन विभाग के कुछ अधिकारियों ने कर दिखाया है। इनके ऊपर लोग अक्सर आरोप लगाते है कि उन्हें राशन नहीं मिल रहा है और मिट्टी का तेल तो डिपो में पहुंचने से पहले ही गायब हो जाता है। अधिकारी हर बार इससे इंकार कर देते हैं और कभी दबाव की बात आती है तो जांच करवा रहे हैं कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। जनता पेट के लिए चिल्लाती है और कई सालों से जमे यहां कुछ अधिकारी कोठी बनाओ का खेल खेलते हैं। राशन विभाग में भ्रष्टाचार की बानगी देखिए। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी के नाम से राशन कार्ड संख्या 821481 बना है। उनका पता दिया गया है मकान नंबर 14, अर्जुन नगर जो कि वार्ड 14 में दर्शाया गया है। इसमे वितरण क्षेत्र का नाम गुड़गांव है और परिवार के मुखिया के तौर पर उनके पिता स्व. राजीव गांधी का ही नाम है। राशन विभाग के अधिकारियों ने रोहतक से सांसद दीपेन्द्र हुड्डा को भी नहीं बख्शा है। उनके नाम से 039095 पंजीकरण संख्या के तहत मकान 1530/30 राजेन्द्र पार्क पर राशन कार्ड बनाया गया है। इसमें पिता का नाम भूपेंद्र हुडा दिया गया है और दीपेंद्र की फोटो भी इस कार्ड के ऊपर लगी है। बताया जाता है कि राशन विभाग के अधिकारियों ने इनको बनाने के लिए तीन सौ से पांच सौ रुपये की रिश्वत ली और कार्ड जारी कर दिए। इन राजनेताओं के अलावा अंडरव‌र्ल्ड से जुड़े अनेक लोगों के कार्ड भी गुड़गांव के राशन विभाग के अधिकारियों द्वारा जारी किए गए हैं। इन फर्जी राशन कार्ड के नाम का राशन तो खुले बाजार में बेच ही दिया जाता है साथ ही सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है। फर्जी कार्ड बनवा विभाग की हकीकत को सामने लाने वाले व्यक्ति का दावा है कि वह तीन सौ रुपये में किसी भी व्यक्ति राशन कार्ड बनवा सकता है। जिला उपायुक्त पी.सी. मीणा ने कहा कि यह किसी ने मजाक किया होगा। ऐसी चूक संभव नहीं हैं। फिर भी वह इस बात की तहकीकात कराएंगे कि जो कार्ड जारी किए गए हैं, वह रजिस्टर में चढ़े हैं या नहीं।


 

दैनिक जागरण में दूसरे से प्रकाशित खंडन की खबर :


                          डिपोधारकों की साजिश का शिकार थे राहुल-दीपेंद्र

चंडीगढ़ : खाद्य एवं आपूर्ति विभाग की प्राथमिक जांच में खुलासा हुआ है कि राहुल गांधी व दीपेंद्र सिंह हुड्डा के नाम से बीपीएल के फर्जी राशनकार्ड उन डिपो मालिकों की शरारत का हिस्सा हैं जिनके राशन डिपो अनियमितताओं के चलते हाल ही में रद्द किए गए हैं। विभागीय जांच के दौरान उजागर हुआ कि गुड़गांव प्रशासन की बीपीएल सूची में राहुल गांधी और दीपेंद्र हुड्डा के नाम से कोई राशनकार्ड नहीं हैं। खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के महानिदेशक अरुण गुप्ता ने बताया कि इस पूरे मामले की जांच उप निदेशक स्तर का अधिकारी करेगा। महानिदेशक के निर्देश पर गुड़गांव के जिला प्रशासन तथा खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के अधिकारियों ने पूरे मामले की पड़ताल भी की।


 

 

 

कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस से कन्‍हैया और बबलू का इस्‍तीफा

कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस, मथुरा से खबर है कन्‍हैया उपाध्‍याय ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर डेस्‍क इंचार्ज के पद पर कार्यरत थे. कन्‍हैया ने अपनी नई पारी सी एक्‍सप्रेस के साथ शुरू की है. उन्‍हें मथुरा का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. बताया जा रहा है कि कन्‍हैया ने अपने ब्‍यूरोचीफ से नाराज होकर इस्‍तीफा दिया है. कन्‍हैया के साथ कल्‍पतरु एक्‍सप्रेस में फोटोग्राफर बबलू ने भी इस्‍तीफा दे दिया है. वे भी सी एक्‍सप्रेस से जुड़ गए हैं.

 

 

पुण्य प्रसून बाजपेयी ने दिवंगत शाहू जी को यूं याद किया

प्रसून जी गुड मॉर्निंग..लोकमत समाचार में आज छपा विश्लेषण "गडकरी का बीजेपी खेल" अच्छा है, पर सवाल यह है कि बीजेपी ही कोई पहली बार "कांग्रेस की लीक"पर नहीं चल रही, कांग्रेस भी यही करती रही है। बाबरी मस्जिद के समय नरसिंह राव ने जो किया वह भाजपाई कदम ही था और मुसलमानों के सामने इस "एतिहासिक चूक" को धोने की कोशिश कांग्रेस लगातार कर रही है। एक "सांपनाथ" तो दूसरा "नागनाथ" हमेशा रहे हैं। बीजेपी को हमेशा व्यापारियों की पार्टी कहा जाता है। आपने संचेती, अंशुमान जैसे उद्योगपतियों ने नाम तो गिनाये लेकिन पूर्ती उद्योग समूह के मालिक गडकरी कैसे कम हैं। और यह वैश्वविक पूंजी है जो संघ और कांग्रेस दोनों की राजनीति तय करेगी।

महज 4 दिन पहले 22 मार्च की सुबह सुबह यह पहला एसएमएस जगदीश शाहू का था। जिसे पढ़कर जाना कि लोकमत समाचार ने मेरा आलेख छपा है और हमेशा की तरह शाहू जी के भीतर कुलबुलाहट बात करने को मचल रही है। जाहिर है उठते ही फोन किया और उधर से चिरपरिचित अंदाज में शाहू जी बोल पड़े, सो रहे थे बबुआ। मेरे लिखे-कहे शब्दों को लेकर शाहू जी के भीतर की कुलबुलाहट और मुझे सोने से जगाने की बबुआ कह कर उठाने की फितरत कोई आज की नहीं है। करीब 22 बरस पहले 1989-90 के दौर में भी अक्सर नागपुर के विवेकानंद सोसायटी के मेरे कमरे में सुबह सुबह शाहू जी दस्तक देकर पूछते-सो रहे हो बबुआ। काली चाय नहीं पिलाओगे। दिल्ली में जेएनयू छोड़ नागपुर में काली चाय से लेकर जाम और खबरों को कांटने-छापने की संपादकीय मजबूरी को लेकर मेरे हर आक्रोश को बहस में बदल देने वाले शाहू जी के भीतर कमाल का ठहराव था।

इस ठहराव को 22 बरस पहले महसूस इसलिये नहीं कर सकता था क्योंकि मैं भी उस वक्त को जी रहा था। चाहे दलित संघर्ष हो या नक्सलियों की विदर्भ में आहट या फिर आरएसएस के हिन्दुत्व की प्रयोगशाला और नागपुर से चार सौ किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश {अब छत्तीसगढ} के दल्ली राजहरा में शंकरगुहा नियोगी का संघर्ष। मैं रोजमर्रा की खबरों से इतर विकल्प की तरह खुद को पेश करती खबरों को पकड़ना चाहता और शाहू जी सरलता से विकल्प शब्द पर ही यह कहकर बहस छेड़ देते कि इन्हें विकल्प कहने से पहले इनके दायरे में घुस कर इन्हें समझना चाहिये। और शाहू जी की वह सरलता मेरे लिये एक चैलेंज बन जाती। क्योंकि खबरों के बीच घुसकर पत्रकार एक्टिविस्ट हुये बगैर भी पत्रकार रह सकता है और खबर निचोड़ सकता है, यह मुझे बार-बार लगता और शाहू जी इसे ही नहीं मानते।

दलित के भीतर आक्रोश को समझने के लिये दलित रंगभूमि चलाते संजय जीवने से जुड़ा। उसे खंगाला। जनसत्ता में एक बड़ा लेख लिखा। 6 दिसबंर 1992 की आहट में संघ मुख्यालय का चक्कर लगाते हुये सरसंघचालक देवरस से कई बार बातचीत की। उसे जनसत्ता ने छापा। नक्सलियों की विदर्भ में आहट को सामाजिक संदर्भ में देखते-देखते चन्द्रपुर-गढ़चिरौली के जंगलों से लेकर नागपुर में आईजी रैंक के पहले नक्सलविरोधी कैंप में पहले आईजी कृष्णन के साथ लंबी बहस की। और दिल्ली से निकलते संडे आब्जर्वर, संडे मेल और जनसत्ता में लेख लिखकर खामोश हो गया। लेकिन जिस दिन शंकर गुहा नियोगी की हत्या हुई और एक पूरा पेज लोकमत समाचार में मैंने खुद लिखकर निकाला, उस सुबह शाहू जी ने बिना दस्तक दिये ही मुझे सोये हुये ही गले से लगाकर बोले-"कमाल है। बबुआ कमाल का लिखा है। लगता ही नहीं है कि नागपुर का अखबार है। मैं आज ही विजय बाबू से बात करता हूं कि जो आप दिल्ली-मुबंई के अखबारों में लिखते है, उसे लोकमत समाचार में क्यों नहीं छापा जा सकता।"

अरे-अरे आप ऐसा ना करिये। मेरी रईसी तो रहने दीजिये। दिल्ली से जो पैसा आता है वह बंद हो गया तो फिर "प्रिंस {हमारा प्रिय बार प्रिंस}" कौन जायेगा। तो शर्त है बबुआ सोइए नहीं। यह भी मत सोचिये कि एक बार विषय को जान-समझ कर लिख दिया बस काम खत्म। लिखने का वोमिट करना छोड़िये। आपको जूझना होगा खबरों के लिये नहीं बल्कि विकल्प नजर आने वाली खबरों को खबर बनाने के लिये। आज ही मैं पत्नी से आपके लिये हरी मिर्च का डिब्बे भर आचार बनवाता हूं। सादी ब्रेड में हरी मिर्च के आचार को रख खाकर जीने का सुकून मेरे भीतर कितना है और इसके जरिये मैं खबरों को टोटलने निकल सकता हूं। यह शाहू जी को बखूबी पता था कि खाने की जद्दजहोद अगर आसान हो जाये तो मेरी लिये 24 घंटे सिर्फ पत्रकारिता के हैं।

और शाहू जी टीस थी कि बच्चों के बड़े होने से पहले अगर झोपड़ीनुमा कच्चा मकान पक्का हो जाये तो जिन्दगी पत्रकारिता और लेखन के जरिये कैसे भी काटी जा सकती है। ट्रैक्टर भर ईंट और बालू की कीमत क्या है। नल और पाइप की कीमत क्या है। मजदूर रोज की दिहाड़ी कितनी लेते हैं। सबकुछ 1990-93 के बीच मैं जानता रहा और शाहू जी का घर पक्का होना शुरु हुआ। एक दिन सुबह सुबह हरी मिर्च का डिब्बे भर आचार लेकर पहुंचे और बड़े गर्व से बोले आज बबुआ नहीं… प्रसून जी घर का एक कमरा पक्का हो गया और बाकी के हिस्से में ढलाई का काम शुरु हो गया। अब बरसात में भीगेंगे नहीं। और तुरंत पूछ बैठे आपका मेधा पाटकर के आंदोलन को लेकर क्या सोचना है। यह रास्ता ठीक है या फिर अनुराधा गांधी का। शाहूजी मेधा पाटकर और अनुराधा को क्यों मिला रहे हैं। इसलिये क्योंकि एक का रास्ता घर छोड़ कर हथियार के जरिये संघर्ष का है तो दूसरा लोगों के बीच उनके घरों को बचाने का प्रयास है।

शाहू जी आप घर का मसला छोड़िये और यह देखिये कि दोनों ही संघर्ष सरकार से कर रही हैं, जिसका पहला काम आम लोगों का घर ना उजड़ने देने का भी है और हक दिलाना भी है। तो आप बतायेंगे नहीं। इसमें बताने जैसा कुछ नहीं है, यह वैसा ही है कि जैसे विनोद जी आपका लिखा छाप देते है और मेरे लिखे को रोक देते हैं। जबकि मैंने तो अमरावती में कुपोषण से मरे बच्चों की पूरी सूची ही दे दी थी। अरे बबुआ अपनी पत्रकारिता में संपादक को क्यों देखते हैं, यह बताइये ढाई सौ रुपये हैं। आज गिट्टी गिरवानी है। अरे शाहू जी हो जायेगा। रात में दे देंगे। कमोवेश हर रात और हर दिन साइकिल से नागपुर को मापते शाहूजी। कभी आंदोलनों को लेकर छटपटाहट तो कभी अनुवाद से लेकर कोई भी लेखन की खोज, जिससे चंद रुपयों का जुगाड़ हो सके। और कभी सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रिपोर्टिंग करने की धुन।

और इसी धुन के बीच बीते 22 बरस से जवाहललालजी दर्डा से लेकर विजय दर्डा और एसएन विनोद से लेकर अच्युतानंदन होते हुये गिरीश जी के जरिये लोकमत समाचार की यादों के आसरे कैसे जीने की आदत शाहू जी ने मेरी भी बना दी, इसको देखने समझने के लिये हम दोनों ने 24 अप्रैल 2012 की तारीख तय की थी। इस दिन शाहू जी के सबसे छोटे बेटे कुंदन की शादी रामटेक में होनी तय हुई। शाहू जी ने कहा विजय बाबू से लेकर हर किसी को इस शादी का न्यौता दे रहे हैं। जो हमारे नागपुर में अतीत के साझे ऑक्सीजन रहे हैं। लेकिन जिन्दगी की त्रासदी देखिये जो 22 बरस से बबुआ सो रहे हो कहकर जगाता रहा, उसके ही लाडले ने 27 मार्च को सुबह सुबह फोन पर कहा कि पिताजी नहीं रहे।

 

 

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी चर्चित और वरिष्ठ पत्रकार हैं. जी न्यूज से जुड़े हुए हैं. बेबाक बोलने और लिखने के लिए जाने जाते हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

 

 

हमवतन को मिला बेस्‍ट वीकली न्‍यूजपेपर ऑफ द ईयर का अवार्ड

राजधानी दिल्ली के फिक्की सभागार में 24 मार्च की शाम एक भव्य रंगारंग कार्यक्रम के बीच मीडिया फेडरेशन आफ इंडिया की ओर से आयोजित छठे एक्सीलेंस अवार्ड समारोह में राष्ट्रीय हिंदी साप्ताहिक ‘हमवतन’ को ‘बेस्ट वीकली न्यूजपेपर आफ द ईयर अवार्ड’ से नवाजा गया। यह पुरस्कार समाचार पत्र के प्रधान संपादक निर्मलेंदु साहा ने ग्रहण किया। हिंदी की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ से शुरुआत करने वाले और देश के प्रमुख हिंदी दैनिक नवभारत टाइम्स में दो बार ‘इंद्रधनुष’ तथा ‘हैलो दिल्ली’ मैगजीन का संपादन कर चुके श्री साहा ने इस मौके पर अपने पत्रकारीय अनुभव साझा करते हुए बताया कि पत्रकारिता को नए आयाम देने वाले स्व. एसपी सिंह और प्रख्यात पत्रकार एमजे अकबर के साथ रहकर बहुत कुछ सीखा और समझा।

निर्मलेंदु साहा को हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुडडा के सलाहकार शिव कुमार भाटिया और मध्य प्रदेश से आए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मानवेंद्र सिंह ने पुरस्कार प्रदान किया। समारोह में विभिन्न मीडिया समूहों से जुड़े कुल 38 पत्रकारों को सम्मानित किया गया। करीब दो घंटे चले इस भव्य समारोह में सभी विजेताओं को प्रतीक चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए। पुरस्कार वितरण समारोह की शुरुआत मीडिया फेडरेशन आफ इंडिया के अध्यक्ष अरुण शर्मा और उपाध्यक्ष प्रकाश अस्थाना ने की।

अरुण शर्मा ने कहा कि पत्रकारिता से जुड़ा हर व्यक्ति सम्मान का हकदार है, वह समाज को आईना दिखाने का काम करता है। हम सभी को सम्मानित तो नहीं कर सकते, पर उनमें जो बेहतर कार्य कर रहे हैं, उन्हें सम्मानित करने का प्रयास जरूर करते हैं। उपाध्यक्ष प्रकाश अस्थाना ने इस मौके पर मीडिया फेडरेशन की परिकल्पना और छह वर्षों के सफर को उपस्थितजनों के साथ साझा किया। उन्होंने कहा कि संगठन के साथ हर साल देश-विदेश के पत्रकार जुड़ते आ रहे हैं और मिलकर काम करने की पेशकश भी मिल रही है। हम उम्मीद करते हैं कि इस साल के अंत तक न्यू जर्सी (अमेरिका), स्लोवानिया (यूरोप), इराक और कुछ अन्य देशों में भी फेडरेशन की शाखाएं काम करने लगेंगी।

इस मौके पर मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री  मानवेंद्र सिंह, हरियाणा सरकार में मुख्यमंत्री के सलाहकार शिव भाटिया ने बेस्ट चैनल हेड आफ द ईयर का सम्मान एसआईटीवी के हेड मनोज मनु को प्रदान किया। बेस्ट न्यूज प्रोग्राम आफ द ईयर का सम्मान एसआईटीवी के ग्रुप प्रोग्रामिंग हेड संतोष राज को कार्यक्रम ‘सबसे बड़ी बहस’ के लिए प्रदान किया गया। बेस्ट ब्यूरो चीफ आफ द ईयर के खिताब से सहारा एनसीआर की इंचार्ज पूनम मेहता द्विवेदी को नवाजा गया। सहारा समय की एंकर व प्रोड्यूसर चित्रा त्रिपाठी को बेस्ट न्यूज कास्टर तथा बेस्ट एंकर आफ द ईयर पुरस्कार सहारा समय की एंकर रंजना शर्मा को मिला। सहारा समय के रंजन कुमार को बेस्ट प्रोड्यूसर का सम्मान प्रदान किया गया।

इसके अलावा सम्मानित होने वालों में बेस्ट बिजनेस कॉरस्पोंडेंट आफ द ईयर का सम्मान जनसत्ता के फैजल इमाम, बेस्ट स्पेशल कॉरस्पोंडेंट का सम्मान एनडीटीवी के उमा शंकर सिंह, बेस्ट जर्नलिस्ट प्रेस क्लब के जनरल सेक्रेटरी अनिल आनंद, बेस्ट मीडिया यंग इंटरप्रेनियर का सम्मान चैनल एटूजेड के चेयरमैन दीपक गुप्ता को मिला। इस वर्ष दो बुजुर्गों को लाइफ टाइम एचीवमेंट आफ द ईयर का सम्मान ‘जज्‍बात’ भोपाल के संपादक, कवि और सामाजिक नेता शंकर लाल साबू और हिमायती के संपादक डा. सोहनलाल सुमनाक्षर को दिया गया। पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान राजस्थान से आए हाजी लंगा एंड पार्टी ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किया, जिसे खूब सराहा गया।

 

 

सिद्धार्थनगर प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष बने संतोष श्रीवास्‍तव, सलमान महामंत्री

सिद्धार्थनगर प्रेस क्लब के चुनाव में मठाधीशों के मंसूबे ध्वस्त हो गए. पत्रकारिता के नाम पर ठेकेदारी और दुकानदारी करने वाले करारी हार के शिकार हुए. दैनिक जागरण का जलवा इस बार भी कायम हुया. चुनाव में दैनिक जागरण के संतोष श्रीवास्तव अध्यक्ष बने. अन्य अखबारों से संतोष पांडेय वरिष्ठ उपाध्यक्ष, सलमान आमिर महामंत्री, अरुण कुमार वरिष्ठ संगठन मंत्री निर्वाचित घोषित किए गए, जबकि चार पदों पर निर्वाचन निर्विरोध हुआ.

जिला सूचना कार्यालय में बुधवार को हुए सिद्धार्थनगर प्रेस क्लब के चुनाव में अध्यक्ष पद पर संतोष श्रीवास्तव को सर्वाधिक 87 मत मिला, जिन्हें निर्वाचित घोषित किया गया. जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी आशुतोष श्रीवास्तव को 71 मत से ही संतोष करना पड़ा. वरिष्ठ उपाध्यक्ष पद पर संतोष कुमार पांडेय 111 मत पाकर निर्वाचित होने में सफल रहे, जबकि राजेश शर्मा को 81 व साजिद

अली 65 मत पा सके. महामंत्री पद पर सलमान आमिर सर्वाधिक 190 मत पाकर विजयी हुए. उनके एकमात्र निकटतम प्रतिद्वंद्वी अख्तर हुसैन अख्तर को सिर्फ 62 मतों पर ही संतोष करना पड़ा. वरिष्ठ संगठन मंत्री पद पर अरुण कुमार 166 वोट पाकर निर्वाचित होने में सफल रहे.

उपरोक्त के अलावा जिन पदों पर निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं, उनमें हरपाल सिंह भाटिया कनिष्ठ उपाध्यक्ष, दिलीप श्रीवास्तव कनिष्ठ संगठन मंत्री, घनश्याम दास गुप्ता सम्प्रेक्षक तथा नसीम फलाही कोषाध्यक्ष शामिल हैं. इस अवसर पर पर्यवेक्षक वीपी त्रिपाठी व सुनील मिश्रा की उपस्थिति में चुनाव अधिकारी रवि प्रकाश पांडेय व इनामुर्रहमान सिद्दीकी ने संयुक्त रूप से सभी नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को प्रमाण पत्र निर्गत किया. चुनाव परिणाम आते ही मठाधीश हार का गम मिटाने के लिए दारु का सहारा लिए. दरअसल मठाधीश एक ठेकेदार और एक साप्ताहिक अखबार के तथाकथित पत्रकार को अध्‍यक्ष बनाना चाहते थे.

 

 

भंवरी की स्टोरी न भेजे जाने से खफा श्रीपाल एंप्लोई आफ द इयर बनने से खुश

पी7न्‍यूज के राजस्‍थान हेड श्रीपाल शक्‍तावत को चैनल ने 'एम्‍पलॉई ऑफ द ईयर 2011' के अवार्ड से नवाजा है. कंपनी ने श्रीपाल के काम को देखते हुए उन्‍हें इस सम्‍मान के लिए चयन किया है. वैसे चैनल की आंतरिक राजनीति के चलते वरिष्‍ठों ने श्रीपाल की भंवरी देवी वाली रिपोर्ट एनटीए अवार्ड के इनवेस्‍टीगेटिव जर्नलिज्‍म के लिए नहीं भेजी थी. बताया जा रहा है कि इनपुट-आउटपुट के लोगों की इन कारगुजारियों से श्रीपाल काफी खफा थे.

बताया जा रहा है कि श्रीपाल को इस पुरस्‍कार स्‍वरूप कंपनी ने अच्‍छी खासी रकम भी प्रदान की है. श्रीपाल ने इसके बारे में फेसबुक पर भी कमेंट किया है-

कुछ खट्टा, कुछ मीठा!

मन उदास भी है और थोडा सा खुश भी. उदास इसलिए क्योंकि हमारी खबरों की अक्सर ऐसी तैसी करने वाले इनपुट आउट पुट के कई भाई लोगों के न चाहते हुए भी चैनल ने "एम्प्लोयी ऑफ़ द ईयर-2011 "का सम्मान दिया है. इन भाई लोगों ने ही एनटीए अवार्ड के लिए सोची समझी रणनीति के तहत इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म में भंवरी देवी की स्टोरी नहीं भेजी थी. और ऐसा कर वे इतने खुश थे कि उन्हें सुकून में देख कर मुझे भी अच्छा लगा. लेकिन चैनल ने "एम्प्लोयी ऑफ़ द ईयर-2011" देकर उनकी ख़ुशी को इस कदर छीन सा लिया कि मन उदास सा है. फिर भी थोडा खुश इसलिए हूँ क्योंकि तमगे के साथ मिली ठीक ठाक रकम से नए सेशन के लिए बच्चों की फीस चुकाना और गर्मी की छुट्टियों में भ्रमण आसान हो जायेगा.

 

 

देर आए दुरुस्त आये, उदय शंकर जी धन्यवाद

स्टार सीजे अलाइव चैनल से ऑर्डर किये गये प्रिंटर की कार्टरेज, डाटा केबल और पॉवर कॉर्ड आखिरकार एक महीने से ज्यादा वक्त के इंतज़ार के बाद मुझे मिल ही गई। मैंने फरवरी महीने में एक कैनन का प्रिंटर स्टार सीजे चैनल से मंगाया था, जिसके साथ मुझे ये तीन चीज़े नहीं मिली थीं। मैंने कई बार चैनल की हेल्पलाइन पर फोन किया था लेकिन हर बार मुझे ढांक के तीन पात बताए जा रहे थे। हारकर मैंने स्टार इंडिया के सीईओ श्री उदय शंकर जी को ईमेल कर अपनी व्यथा सुनाई और फौरी कार्रवाई के तौर पर उनके पर्सनल ऑफिस से मुझे फोन आया और लगातार स्टार सीजे वाले मेरे संपर्क में रहे और आखिरकार आज मुझे ये सारा सामान डिलीवर कर दिया गया।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि मैं एक पत्रकार हूं, जिसको इस बात की जानकारी थी कि स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर जी हैं और उनकी ईमेल आईडी प्राप्त कर मैंने उन्हें ईमेल कर दिया। ज्यादा होता तो मैं उनका मोबाइल नंबर भी प्राप्त कर उस पर भी संपर्क कर लेता, लेकिन अगर यही वाकया किसी ऐसे व्यक्ति के साथ हुआ होता जो 10 से 6 की नौकरी करता है, जिसके परिवार में उसकी जानकारी के बगैर किसी ने टीवी पर देखकर कोई सामान ऑर्डर कर दिया होता और डिलीवरी करने वाला आकर यह कहता कि पहले पैसे दीजिए उसके बाद सामान खोलकर देखियेगा। और हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है और जब उसके सामान में कोई कमी-बेशी होती तो उसके सामने शायद अपना सिर दीवार में देकर मारने के अलावा कोई और चारा नहीं होता।

इसलिए ज़रुरत इस बात की भी है कि पहले इस तरह की कंपनियां ये सुनिश्चित करें कि जो सामान डिलीवर किया जा रहा है डिलीवरी करते वक्त डिलीवरी ब्वॉय आर्डर करने को वाले को पूरी तरह संतुष्ट करे और उसके बाद बिल देने की बात करे, क्योंकि मुझे पूरा यकीन है कि जो वाकया मेरे साथ हुआ वो इस देश में कई और लोगों के साथ हुआ होगा। और उन्होंने सिर्फ अपना सिर दिवार में मारा होगा और कुछ नहीं किया होगा। पहले तो मुझे भी ऐसा लगा था कि मुझे अब घंटा नहीं मिलने वाला और मैंने अपने एक वकील मित्र से कन्ज़्यूमर कोर्ट में जाने की सलाह भी ले ली थी, लेकिन चलिए देर आए दुरुस्त आये। आखिरकार मुझे मेरे प्रिंटर का सामान मिल गया।

वीर चौहान

veer.chauhan78@gmail.com

इस पूरे मामले को जानने के लिए पढ़ेंस्टार सीजे चैनल ने मुझे लूट लिया, उदय शंकर जी कुछ करो

 

 

इंडिया न्‍यूज के बेचारे

हर तरफ अंधी सियासत है/ बताओं क्या करें/ रेहन में पूरी रियासत है/ बताओ क्या करें/ झुंड पागल हाथियों का/ रौंदता है शहर को/ और अंकुश में महावत है/ बताओ क्या करें। इन पक्तियों जैसे ही रवीन ठुकराल दुबारा जब से इंडिया न्यूज के हेड बन कर आये तो उनके चम्‍मचों और चम्‍मचियों के चेहरे पर चमक लौट आई और आये भी क्यों न, आखिर में ठुकराल और ज्यादा ताकतवर बन कर लौटे और वो उनके अंकुश में पहले से ही हैं।

ठुकराल ने आते ही आज समाज से राहुल देव और उनकी टीम को रुखसत किया। पहले ठुकराल गये तो थे कैप्टन को पंजाब का मुख्यमंत्री बनवाने, लेकिन पंजाब की हकीकत को देखते हुए पहले ही उधर से खिसक लिये। और एक बार फिर से विनोद शर्मा का दामन थामकर इंडिया न्यूज की कमान संभाल ली। ठुकराल के कमान संभालने की देर थी कि फिर से रीजनल चैनल नम्बर एक होने लगे, और पार्टियों का दौर शुरु। ये नम्बर वन कैसे होते हैं, पूरे मीडिया जगत को इसकी खबर है। परन्‍तु बेचारे रिपोर्टर, कैमरामैन, ओबी स्टाफ, को तो इन पार्टियों की भनक भी नहीं दी जाती। क्योंकि प्रबंधन की नजर में रीजलन चैनल को नम्बर 1 बनाने में ठुकराल के मानस पुत्र रोहित कुमार, रामकुमार, इसरार शेख, धर्मेन्द्र कुमार, चोटी मेहरा का ही हाथ होता है और किसी का नहीं। इसीलिये गिनती के इन लोगों की सेलरी साल में 2-2 बार बढ़ाई जाती है और फील्ड में काम करने वाले 80 प्रतिशत स्टाफ की सेलरी 4 साल से बढ़ाई ही नहीं जाती।

दुनिया जहान की संवेदनाओं की बात करने वाले ठुकराल और उनकी टीम ने कभी फील्ड में काम करने वाले स्टाफ से उनकी संवेदनाओं और उनकी समस्याओं के बारे में जानने का, उनको हल करने के लिये कोई पहल की? क्या एक ग्रुप के हेड के तौर पर उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या केवल कुछ लोगों की ही मेहनत होती है, जो केबिन में आकर मिजाजपुर्सी करते हैं, जिससे चैनल की टीआरपी बढ़ जाती है? क्या बिना किसी रिपोर्टर के, कैमरामैन, ओबी स्टाफ या फिर ड्राइवर की मेहनत के बगैर खबर न्यूज रूम में डम्प हो जाती है? क्या ठुकराल या उनके चाहने वाले कभी इंडिया न्यूज की पहचान बन गई साक्षात मौत रूपी मर्सीडीज में बैठे हैं?

और ऊपर से मजे की बात ये है कि केवल 100 रुपये उन मर्सीडीज की गैस के लिये दिये जाते हैं और कहा जाता है कि पूरे दिन इससे ही काम चलाओ। लेकिन एसी केबिन में बैठकर सबकी मां-बहन एक करने वाले इस दर्द को क्या जानें। उनको तो बस हर बेफिक्री को धुएं में उड़ाना आता है। आज जितने भी बड़े चैनल हैं, वो अपने फील्ड में काम करने वाले स्टाफ का सम्मान करते हैं। ऐसा नहीं है कि आउटपुट या दूसरे लोग काम नहीं करते लेकिन एक चैनल की पहचान उसके रिपोर्टर से ही होती है और इस बात को किसी भी प्रतिष्ठित चैनल की कार्यशैली से समझा जा सकता है। पता नहीं ये छोटी सी बात चैनल प्रबंधन को कब समझ में आयेगी।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 

‘बुक्‍स ओ सांसद’ में जुटे दिग्‍गज सांसद व पत्रकार

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में बुधवार की शाम आयोजित कार्यक्रम 'बुक्स ओ सांसद' के दौरान जनोक्ति.कॉम द्वारा कराई गयी परिचर्चा में कई दिग्गज पत्रकार और नामी सांसद शामिल हुए। कार्यक्रम में वरिष्ठ संसद लालकृष्णा आडवाणी, सतपाल महाराज, शशि थरूर, केन्द्रीय मंत्री केबी थॉमस, केन्द्रीय राज्य मंत्री डॉक्टर राज कुमार वेरका, मंगनि लाल मंडल, तरुण मंडल, वीरेंदर कश्यप, राजेंद्र भाई राणा, असरारुल हक, मोइनुल हसन, अनु टंडन, गोपाल व्यास, चौधरी लाल सिंह, अनिरुध्द संपत, एन के सिंह सहित पचास से अधिक सांसद  शामिल हुए।

दृष्टि क्रिएटिव के कार्य्रक्रम में सांसदों द्वारा लिखी गयी किताबों की प्रदर्शनी भी लगाई गयी थी। आयोजकों के अनुसार पिछले कुछ समय में सांसदों के प्रति आम जनमानस में नकारात्मक भाव पैदा हुआ है। राजनीति और राजनेताओं को एक ही डंडे से हांकने की कवायद में संसद का बौद्धिक और रचनात्मक पक्ष पीछे छूट रहा है। ऐसे वातावरण में ‘बुक्स ओ सांसद‘ कार्यक्रम के माध्यम से हमने जनप्रतिनिधियों के सकारात्मक पक्ष को देश-दुनिया के सामने लाने की पहल की है।

भारत की संसद (राज्य सभा/लोक सभा) में मौजूद विभिन्न संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित, मनोनीत संसद सदस्य केवल राजनीति के जानकार भर नहीं है। राजनीति से इतर सामाजिक जीवन के अन्य दूसरी विधाओं में भी सांसदों की दखल है। एक ऐसी ही विधा का नाम है पुस्तक लेखन और इस विधा में वर्तमान संसद में मौजूद 15 फीसदी भारतीय सांसदों की न केवल दिलचस्पी है, बल्कि उन्होंने विविध विषयों पर किताबें लिखी भी है। धर्म, अध्यात्म, विज्ञान, इतिहास, दर्शन, साहित्य, कथा, कविता, अनुभव, यात्रा वृतांत, राजनीति, अर्थनीति जैसे दर्जनों विषयों पर केन्द्रित सांसदों के पुस्तकों की सामूहिक, सार्वजनिक प्रदर्शनी के द्वारा आम लोगों में यह सन्देश देने की कोशिश की गयी है कि संसद में बहुत बड़ा वर्ग बौद्धिक है।

जनोक्ति डॉट कॉम द्वारा ‘संसद और मीडिया : जबाबदेही व अपेक्षाएं‘ विषय पर आयोजित परिचर्चा में एलके आडवाणी, राजीव मिश्र (लोकसभा टीवी), अनुरंजन झा (वरिष्ठ पत्रकार), मंगनीलाल मंडल (संसद), सतपाल महाराज (सांसद), गोपाल अग्रवाल (आर्थिक प्रकोष्ठ भाजपा के संयोजक), निसार अहमद (आईसीएसआई के अध्यक्ष) समेत कई दिग्गज वक्ताओं ने अपनी-अपनी बात रखी। सभी ने एक स्वर में सांसद और मीडिया को अपनी जवाबदेही समझने और उस पर अमल करने की बात कही। 

'बुक्स ओ संसद’ के आयोजन में दृष्टि के कुंदन कुमार झा, जनोक्ति के जयराम विप्लव, अमिताभ भूषण और विशाल तिवारी, अनुरंजन झा, वंदन सिंह, अनित सिंह, भवेश नंदन झा, के अरविन्द, संतोष कुमार, अनिमेष आनंद, सोनू मिश्रा आदि सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 

 

 

दारुकुट्टई और उपहारउठाई के दौर में दीदी की सेंसरशिप

किस नपुंसक समय में जिंदा रहने के लिए मुर्दा बने हुए हैं हम। आपातकाल और बिहार प्रेस विधेयक के वक्त पत्रकारिता का जो तेवर दिखा था,​​ आज वह प्रेस क्लबों में दारुकुट्टई और बाजार से मुफ्त कूपन और उपहार बीनने की औकात में समाहित हो गया है। बंगाल से तीन पत्रकार दीदी की कृपा से इस बार सांसद बन गये हैं तो इसका अंजाम यह हुआ कि उन्होंने पाठकों पर ही सेंसर लगा दी। दिल्ली में रेल मंत्री बदलने गयी दीदी ने पत्रकारों को​ वेतन सिफारिशें लागू करने की मांग कर दी तो प्रेस इतना कृतज्ञ हो गया कि कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं है। वाह!

महाश्वेता दी से हमारे संबंध तीन दशक पुराने हैं। जेएनयू में हमारे मित्र उर्मिलेश झारखंड घूमने गये थे। धनबाद में वे कवि मदन कश्यप के वहां​​ ठहरे। मदनजी तब दैनिक आवाज में थे। आवाज के मालिक बंकिम बाबू ने उनसे आवाज में काम करने के लिए कहा तो उन्होंने मेरे नाम की​​ सिफारिश कर दी। अब दिल्ली में बड़े पत्रकार उर्मिलेश की तब पत्रकारिता में कोई रुचि नहीं थी। मेरी भी नहीं थी। लेकिन उत्तराखंडी होने के कारण झारखंड आंदोलन का हम समर्थन करते थे। हमारे मित्रों का मानना था कि भारतीय अर्थ व्यवस्था को समझना हो तो झारखंड जरूर जानना चाहिए।​ और हम पहुंच गये। महाश्वेता दी से जब हम मिले, तब हम कोयला खानों और खान दुर्घटनाओं पर काम कर रहे थे। हमने आवाज के जरिये​ महाश्वेता दी के आदिवासी केंद्रित साहित्य को आदिवासी समाज के सामने पेश करने का मुहिम भी चलाया हुए थे।

कोलकाता आकर हम उनके भाषा बंधन में भी शामिल हुए। फिर २००१ में जब उत्तराखंड के बंगाली शरणार्थी आंदालन कर रहे थे, तब बुद्धदेव और उनकी सरकार, माकपा और दूसरे राजनीतिक दल और मीडिया ने हमारे आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। बंगाली सुशील समाज से हमारा तालमेल होने लगा था। हम सिंगुर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान भी साथ साथ थे। चूंकि हम माकपा की पूंजीपरस्त किसान विरोधी नीतियों का विरोध कर रहे थे। इसी दर्म्यान भाषा बंधन और महाश्वेता दी से संपर्क टूटता रहा क्योंकि बार-बार आग्रह के बावजूद उन्होंने बंगाली अछूत शरणार्थियों की समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं ली। ऩ भाषा बंधन में देशभर में छितराये हमारे लोगों के लिए कोई जगह थी। पर बाकी देश की तरह हम महाश्वेता दी को ही लेखक समाज की नेता मानते रहे और उन्हें साहित्य अकादमी अध्यक्ष बनाने के मुहिम में भी सक्रिय रहे। लेकिन ऐन लोकसभा चुनाव के वक्त महाश्वेता दी की अगुवाई में समूचे सुशील समाज के तृणमूल के जिताने की मुहिम में हम शामिल न हो सकें।

लोकसभा चुनाव के बाद दीदी ने बुद्धजीवियों को पालतू बनाने का खेल शुरू किया अपने रेल महकमे के जरिए। अनेक सम्मानित लोग रेलवे महकमे की विभिन्न समितियों के वेतनभोगी होकर रह गये। नन्दीग्राम आंदोलन के दौरान ही हमने पुस्तकमेला, रवीन्द्र सदन, बांग्ला अकादमी और नंदन जाना बंद कर दिया था। अब वहां जाने की दरकार ही नहीं होती।​​ ​बंगाल का सुशील समाज और बंगाल के पत्रकारों के पिट्ठू बनते जाने की रामकहानी यही है। पर बाकी देश के लेखक पत्रकारों को क्या हुआ बिहार प्रेस विधेयक तो बिहार का ही मामला था, लेकिन आंदलन तो देशभर में चला था। आज क्या हमारे लोग बाकी राज्यों में भी ममता दीदी का नुस्खा आजमाये जाने का इंतजार कर रहे हैं?

हुआ यह कि ​ममता सरकार ने राज्य के सरकारी मदद पाने वाले पुस्तकालयों को एक सर्कुलर भेजकर वहां मंगाये जाने वाले अखबारों की सूची ​​बना दी और सूची से बाहर के अखबार मंगाने पर मदद रोक देने का निर्देश जारी कर दिया। मालूम हो कि डा. जगन्नाथ मिश्रा ने कभी आर्यावर्त को सबक सीकाने के मकसद से बागी अखबारों को विज्ञापन बंद करने की गरज से १९८३ में बिहार प्रेस विधेयक लाने का दुस्साहस किया था। तब इतना बवाल मचा कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल की खबरों और सरकारी बयानों को लीड बनाने का रिवाज ही खत्म हो गया। बहरहाल बंगाल की सूची में पुस्कालयों के पाठकों के लिए बंगाल का कोई बड़ा अखबार नहीं है। न आनन्द बाजार और न ही ममता को सत्ता में लाने में सबसे अहम भूमिका निभाने वाला वर्तमान। बंगाल के महज पांच सरकार समर्थक अखबार इस सूची में हैं। हिंदी से एकमात्र दैनिक सन्मार्ग। उर्दू से दो अखबार अखबार-ए-मशरीक और आजाद हिंद। मजे की बात तो यह है कि इस सूची में कोई अंग्रेजी अखबार शामिल नहीं है।

जाहिर है कि बंगाल के पुस्तकालयों में अब सरकार के पिट्ठू अखबारों को ही लोग पढ़ने को बाध्य होंगे। पुस्तकालय अपनी मर्जी से अब अखबार नहीं ले सकते हैं। अधिसूचना में कहा गया है कि ये अखबार विकास में महत्वपूर्ण योगदान है तथा पुस्तकालय में जानेवालों को ये स्वतंत्र सोच की ओर ले जाते हैं। 14 मार्च को ही यह अधिसूचना जारी हुई थी। आठ से ज्यादा अखबार नहीं लेने का साफ़ निर्देश दिया गया है। बांग्ला के प्रतिदिन, सकाल बेला, एक दिन, खबर 365, दैनिक स्टेट्समैन, हिंदी में सन्मार्ग व उर्दू के आजाद हिंद व अखबार-ए- मशरीक शामिल हैं। साथ ही यह साफ़ तौर पर कह दिया गया है कि इसके अलावा किसी अन्य अखबारों की खरीद पर सरकार एक भी रुपया खर्च नहीं करेगी। इन आठ अखबार की सूची अधिसूचना में दे दी गयी है। किसी अन्य अखबार की खरीद पर रोक लगा दी गयी है।

वाम शासनकाल में पुस्तकालयों में माकपा का मुखपत्र गणशक्ति रखना जरूर अनिवार्य था पर इसके लिए दूसरे अखबारों पर रोक नहीं थी। जब सारे के सारे अखबार और टीवी चैनल माकपा के खिलाफ हो गये, तब भी वाम शासकों ने ऐसा दुस्साहस करने की जुर्रत नहीं की। सरकारी सूची में जिस अखबार का नाम सबसे ऊपर है, वह है दैनिक प्रतिदिन जिसके सम्पादक और एसोसिएट संपादक दोनों तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। सन्मार्ग और अखबार-ए- मशरीक के संपादक भी पत्रकारों पर दीदी की खास कृपा के तहत इस बार राज्यसभा में पहुंच चुके हैं। सूची में शामिल बांग्ला अखबार सकाल बेला और उर्दू अखबार आजाद हिंद के सीईओ संयोग से प्रतिदिन के ही एसोससिएट संपादक ही हुए।

गौरतलब है कि इन्हीं तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले दिनों नई दिल्ली में मजीठिया वेतनबोर्ड की सिफारिशें लागू करने की पत्रकारों की मांग का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि उनकी पार्टी के सांसद जल्द ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करके अखबारों और समाचार एजेंसियों के पत्रकार गैर पत्रकार कर्मचारियों की इस मांग को लागू कराने को कहेंगे। ममता नई दिल्ली में श्रम मंत्रालय के मुख्यालय श्रमशक्ति भवन पर पत्रकार एवं गैर पत्रकार कर्मिर्यों की एक सभा को संबोधित कर रही थीं। ये कर्मचारी कन्फेडरेशन आफ आल इंडिया न्यूजपेपर्स एण्ड न्यूज एजेंसीज एम्पलाइज आर्गनाइजेशन्स के झंडे तले वेतन बोर्ड को लागू करने में आनाकानी के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे। ममता ने कहा कि तृणमूल के सदस्य इस मामले को संसद में भी उठाएंगे और वह दूसरी पार्टियों के नेताओं से भी कहेंगी कि वे इस मुद्दे पर अखबारी कर्मचारियों का समर्थन करें। जाहिर है कि दीदी ने ऐसा पत्रकारों को पटाने की कोशिश में किया होगा। वरना दिल्ली में पत्रकारों का समर्थन और कोलकाता में प्रेस पर अंकुश, ​​यह विरोधाभास समझ से परे है।

इस मुद्दे को लेकर बंगाल और बाकी देश का प्रेस अभी खामोश है, खामोश है बंगाल का बहुप्रचारित सुशील समाज भी। पर वामपंथी दलों ने विरोध करना शुरु कर दिया है। सरकार द्वारा कुछ चुनिंदा अखबार को राज्य के सरकारी अनुदान प्राप्त पुस्तकालयों में रखने के लिए जारी कई गई विज्ञप्ति को लेकर तृणमूल सहयोगी कांग्रेस ने सोमवार को विधानसभा में मुद्दा को उठाया और तत्काल इस विज्ञप्ति को वापस लेने की मांग की। सरकार में शामिल कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक असीत मित्रा ने यह मुद्दा विधानसभा में उठाया और कहा कि सरकार का यह कदम अलोकतांत्रिक है। मित्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अक्सर कहती है कि मीडिया अपनी नीति के अनुसार काम करने के लिए स्वतंत्र है। उन्होंने मुख्यमंत्री से पुस्तकालयों के लिए अखबारों की खरीद में कटौती का निर्णय वापस लेने की मांग की। दूसरी ओर विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्रा ने कहा कि इमरजेंसी के समय भी ऐसा नहीं देखा गया था। गणतंत्र की दुहाई देनेवाली सरकार ने हद कर दी है। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। इस फ़ैसले को सरकार को वापस लेना चाहिए। राज्य में पूरी तरह से तानाशाही चल रही है। मीडिया पर इस तरह से आक्रमण उचित नहीं माना जा सकता है।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

 

 
 

 

आलोक मेहता निकालेंगे नेशनल दुनिया!

: कानाफूसी : नई दिल्ली में नई दुनिया के बंद होने के बाद अब आलोक मेहता खुद का अखबार निकालने की तैयारी कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार ३१ मार्च को नई दुनिया का अंतिम संस्करण प्रकाशित होगा, जिसके बाद अगले दिन उसी बिल्डिंग से आलोक मेहता एक नया अखबार निकालेंगे। इसका नाम नेशनल दुनिया रखे जाने की सूचना है। बताया जा रहा है कि यह कदम नई दुनिया के मैनेजमेंट को सबक सिखाने के साथ ही अगले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर उठाया गया है।

सूत्रों के अनुसार, नए अखबार में ग्वालियर के शराब माफिया भदौरिया, जो कि कांग्रेस के करीबी हैं, के अलावा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और दिग्विजय सिंह के भी निवेश करने की बात सामने आ रही है। अगले कुछेक सालों में राजस्थान और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में कांग्रेस के इन लोगों को अपना अखबार चाहिए होगा, इसी के मद्देनजर इस अखबार को निकाले जाने की योजना बनाई जा रही है।

 

 
 

 

‘हरियाणा न्यूज’ के सही रास्ते पर आने से ‘टोटल टीवी’ व ‘इंडिया न्यूज हरियाणा’ में खलबली

जो 'हरियाणा न्यूज' कुछ वक्त पहले अंदरुनी राजनीति में बिग बॉस का भी बाप हुआ करता था, उसने आजकल कई चैनलों का बैंड बजा दिया है। हरियाणा से जुड़े कई चैनलों का दम निकल गया है। टोटल टीवी के कई पत्रकार और टैक्निकल स्टाफ हरियाणा न्यूज पहुंच गए हैं। टोटल में हरियाणा देखने वाले प्रवीण गौतम, आउटपुट के अनुभवी सीनियर पत्रकार ओम सिंह और अमित शुक्ला, एंकर कुमकुम बिनवाल और प्रोड्यूसर अमित सिंह जैसे कई पत्रकार हरियाणा न्यूज के साथ जुड़ गए हैं।

साथ ही टोटल टीवी में रहे उमेश जोशी ही हरियाणा न्यूज के प्रधान संपादक हैं। इतना ही नहीं हरियाणा न्यूज के न्यूज डायरेक्टर राजेश शर्मा भी कुछ वक्त पहले टोटल में ही हुआ करते थे। उनके हरियाणा न्यूज की कमान संभालने के बाद चैनल के कन्टेंट और लुक में जबरदस्त बदलाव आया है। इसकी एक बड़ी वजह चैनल की मजबूत आर्थिक स्थिति भी है क्योंकि चैनल और एसटीवी ग्रुप के मालिक हरियाणा के गृह राज्य मंत्री गोपाल कांडा हैं, जिन्होंने हरियाणा न्यूज में सुधार के लिए जमकर पैसा खर्च किया है।

हरियाणा न्यूज में नई टीम के कमान संभालने के बाद इंडिया न्यूज हरियाणा भी सकते में है। इंडिया न्यूज हरियाणा का प्रबंधन हरियाणा न्यूज से मुकाबले को ध्यान में रखकर रिपोर्टरों और स्टिंगरो पर खबरों के लिए दबाव बनाने लगा है क्योंकि मुकाबला अब कड़ा हो गया है। हिसार चुनाव में हरियाणा न्यूज की जो भद्द पिटी थी कि ये कांग्रेस का चैनल है, अब उस छवि को भी बदलने की कोशिश की जा रही है। चैनल के प्रोग्राम 'विकास यात्रा' में कांग्रेस सरकार के कई मंत्रियों की जमकर धुनाई की गई है।

हरियाणा सरकार में मंत्री सतपाल सांगवान, राव नरेंद्र राव, दान सिंह, अनीता यादव जैसे नेताओं के विकास कार्यों की हरियाणा न्यूज पर पोल खोली गई है। इस तरह प्रतीत हो रहा है कि चैनल की सोच में बदलाव आया है। लोगों का कहना है कि इस सब बदलाव के पीछे राजेश शर्मा का हाथ है जो बेहतर तरीके से चैनल को संचालित करा रहे हैं।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 

रामदेव का सहयोगी बालकृष्‍ण एक पत्रकार पर भड़का

विवादों में रहने वाला बाबा रामदेव का सहयोगी आचार्य बालकृष्‍ण फिर बौखला गया है. कर चोरी के आरोप में पूछे गए सवाल पर बालकृष्‍ण ने एक पत्रकार को भला-बुरा कह डाला. मामला वाणिज्‍य कर अफसरों द्वारा रामदेव की कंपनी के दवाओं को ले जाते ट्रक को पकड़े जाने का था. एक पत्रकार ने जब बालकृष्‍ण से पूछा कि बाबा की कंपनी की दवाओं से लदे ट्रक के साथ काई रसीद क्‍यों नहीं थी तो बालकृष्‍ण ने कहा कि तुम मेरे वकील नहीं हो. उसने पत्रकार को और भी खरी-खोटी सुनाई.

उल्‍लेखनीय है कि हरिद्वार में वाणिज्‍य कर विभाग के अफसरों ने यूके08 सीए 1740 नम्‍बर का एक ट्रक पकड़ा, जिसमें बाबा रामदेव की कंपनी के लगभग 12 लाख 66 रुपये मूल्‍य की दवाएं थीं. अधिकारियों ने आरोप लगाया कि ये दवाएं बिना रसीद के बाहर ले जाई जा रही थीं और कर चोरी का प्रयास किया जा रहा था. हालांकि बालकृष्‍ण ने कहा है कि सरकार उन लोगों के खिलाफ साजिश कर रही है और वे मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे.

एडिशनल डाइरेक्‍टर ने डीबी स्‍टॉर के पत्रकारों से की बदतमीजी, कैमरा भी तोड़ा

एक खबर में अधिकारी का पक्ष लेना डीबी स्‍टार, भोपाल के फोटो जर्नलिस्‍ट और रिपोर्टर को भारी पड़ गया. भ्रष्‍टाचार के मामले में पूछा गया सवाल उस अधिकारी को इतना नागवार गुजरा कि उसने इन दोनों लोगों से बदतमीजी तो की ही, कैमरा भी तोड़ दिया. उसने टूटा हुआ कैमरा भी अपने पास रख लिया. काफी हो हुज्‍जत के बाद पुलिस ने इस अधिकारी के खिलाफ मामला दर्ज किया है, परन्‍तु अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. 

जानकारी के अनुसार डीबी स्‍टार के फोटो जर्नलिस्‍ट जाहिद मीर तथा रिपोर्टर श्‍याम सुंदर गोयल बुधवार की शाम न्‍यूज कवरेज के लिए भोपाल में सतपुड़ा भवन में आदिवासी विकास के आदिम क्षेत्रीय विकास योजना संचालानालय गए थे. यहां पर भ्रष्‍टाचार के एक मामले को लेकर एडिशनल डाइरेक्‍टर सुरेंद्र सिंह भंडारी से मिले तथा उनसे कुछ सवाल किए. भ्रष्‍टाचार के सवालों से बौखलाए भंडारी अचानक उग्र हो गए तथा फोटो खींच रहे जाहिद के हाथ से कैमरा छीनकर जमीन पर पटक दिया. इसके बाद दोनों से धक्‍का-मुक्‍की करते हुए गरियाने लगे.

दोनों मीडियाकर्मियों से उलझने के बाद एडिशनल डाइरेक्‍टर टूटा हुआ कैमरा उठाया तथा वहां से निकल गए. घटना से हतप्रभ दोनों कर्मी अपने वरिष्‍ठों को इस बदतमीजी की जानकारी दी तथा लिखित शिकायत लेकर जहांगीराबाद थाना पहुंच गए. पुलिस ने मामला लिखने में आनाकानी शुरू कर दी. पुलिस ने इन दोनों मीडियाकर्मियों को तीन घंटे तक झेलाने के बाद भी मुकदमा दर्ज नहीं किया. बाद में वरिष्‍ठ अधिकारियों से इस संदर्भ में बात करने के बाद उनके निर्देश पर पुलिस ने एडिशनल डाइरेक्‍टर के खिलाफ मामला दर्ज किया.

 

 
 

 

समस्‍तीपुर का जिला सूचना अधिकारी पत्रकारों से कर रहा भेदभाव, मंत्री को लिखा पत्र

बिहार के समस्‍तीपुर जिले के पत्रकार जिला सूचना जन संपर्क अधिकारी दिलीप कुमार देव के रवैये से परेशान हैं. जिले दस पत्रकारों ने राज्‍य के सूचना मंत्री को पत्र भेजकर सूचना अधिकारी के खिलाफ जांच कराने की मांग की गई है. पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि दिलीप कुमार की वजह से पत्रकारों को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है. सूचना अधिकारी फर्जी पत्रकारों तथा हत्‍या के आरोपियों को एग्रीडेशन कार्ड देकर उसका दुरुपयोग कर रहा है, जबकि असली पत्रकारों से भेदभाव किया जा रहा है. 

पत्रकारों ने आरोप लगाया है कि जिला सूचना अधिकारी ने बिहार शताब्‍दी समारोह में भी दागी पत्रकारों को प्रमुखता दिया जबकि उन लोगों को आयोजन से दूर रखा गया. इन पत्रकारों ने सूचना मंत्री से इस मामले की जांच कराकर उक्‍त सूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. 

 

 
 

 

कौशाम्‍बी में चार पत्रकार एवं मजिस्‍ट्रेट पर मुकदमा

कौशाम्बी : परीक्षा केंद्र में नकल कराने के मामले में स्टेटिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ बलवा व हरिजन उत्पीड़न का मुकदमा कायम किया गया जबकि मजिस्ट्रेट की तहरीर पर इलेक्ट्रानिक चैनल के चार पत्रकारों के खिलाफ मारपीट, बलवा व सरकारी कार्य में बाधा डालने का मुकदमा दर्ज हुआ। सिराथू तहसील के तुलसीपुर स्थित एक परीक्षा केंद्र पर बोल-बोलकर नकल कराया जा रहा था। इलेक्ट्रानिक चैनल के कुछ रिपोर्टरों ने इस खबर को कवर किया तो वहां रहे स्टेटिक मजिस्ट्रेट ने उनसे दु‌र्व्यवहार किया।

कालेज प्रशासन के लोगों ने भी इस कार्य में मजिस्ट्रेट का साथ दिया। दोनों पक्ष एक-दूसरे के ऊपर आरोप लगाते रहे लेकिन प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की। चैनल के पत्रकारों ने मंगलवार को मुख्यालय पर धरना देते हुए चक्काजाम कर दिया तो प्रशासन ने चार नामजद पत्रकारों सहित दोनों पक्षों की तरफ से मुकदमा दर्ज कर लिया।

 

 
 

 

पुस्‍तकालयों में पढ़ने होंगे ममता की मर्जी के अखबार

: हिंदी का केवल एक समाचार पत्र : पश्चिम बंगाल में अखबार वही जो ममता बनर्जी की सरकार पढ़ाए. जी हां, राज्य में अब सरकार तय कर रही है कि सरकारी पुस्तकालयों में लोग कौन सा अखबार पढ़ेंगे और कौन सा नहीं. पश्चिम बंगाल सरकार ने एक सर्कुलर जारी कर कहा है कि सरकारी या सरकार से सहायताप्राप्त पुस्तकालयों में कोलकाता से छपने वाले महज आठ अखबार ही खरीदे जाएंगे. इनके इतर दूसरा अखबार खरीदने पर उसके पैसे नहीं दिए जाएँगे. इन अखबारों की सूची में बांग्ला के पांच, हिंदी का एक और उर्दू के दो अखबार हैं. यह तमाम अखबार वही हैं जो ममता सरकार के साथ खड़े रहे हैं.

इनमें से कइयों के मालिकों को ममता राज्यसभा भेज चुकी हैं. दिलचस्प बात यह है कि इन अखबारों में अंग्रेजी का कोई अखबार शामिल नहीं है. सरकार के इस फैसले की काफी आलोचना हो रही है. राज्य में लगभग ढाई हजार सरकारी या सरकारी सहायताप्राप्त पुस्तकालय हैं. इनमें अब पाठकों को महज वही आठ अखबार पढ़ने को मिलेंगे जिनकी सूची सरकार ने जारी की है. इनमें बांग्ला का सबसे ज्यादा बिकने वाले दैनिक का नाम नहीं हैं.

सरकारी अधिसूचना में कहा गया है, पाठकों के हित में सरकारी पैसे से ऐसा कोई अखबार नहीं खरीदा जाएगा जो प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर किसी राजनीतिक दल की सहायता से छपता हो. यानी इस सूची में शामिल अखबारों के अलावा बाकी तमाम अखबार सरकार की नजर में किसी न किसी राजनीतिक दल से सहायता हासिल करते हैं. कोलकाता से हिंदी के आठ अखबार निकलते हैं. लेकिन सरकारी सूची में वही इकलौता अखबार शामिल है जिसके मालिक को ममता ने इसी सप्ताह तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा में भेजा है.

वैसे, वाममोर्चा के शासनकाल में तमाम सरकारी पुस्तकालयों में बाकी अखबारों के अलावा माकपा का मुखपत्र गणशक्ति खरीदना अनिवार्य था. लेकिन उसके लिए कोई लिखित निर्देश जारी नहीं किया गया था. अब सरकार जिन अखबारों को साफ-सुथरा और निष्पक्ष मानती है उनमें से ज्यादातर को तृणमूल कांग्रेस का समर्थक माना जाता है. सरकार की इस सूची में सबसे पहला नाम बांग्ला दैनिक संवाद प्रतिदिन का है. उसके संपादक और सहायक संपादक दोनों तृणमूल के टिकट पर राज्यसभा सांसद हैं. दूसरे अखबारों का भी ममता और तृणमूल कांग्रेस के प्रति लगाव जगजाहिर है.

सरकार के ताजा निर्देश से पुस्तकालय के कर्मचारी भी सांसत में हैं. उनको आम पाठकों की नाराजगी का डर सताने लगा है. पश्चिम बंगाल पुस्तकालय कर्मचारी समिति के महासचिव रंजीत सरकार कहते हैं कि वाममोर्चा के शासनकाल में माकपा का मुखपत्र खरीदने का कभी कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया गया था. लेकिन अब हमारे सामने आंदोलन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है. पाठकों के सवालों से आखिर हम लोगों को ही जूझना पड़ेगा.  इस मुद्दे पर उभरे विवाद के बावजूद पुस्तकालय मंत्री अब्दुल करीम चौधरी ने अब तक मीडिया के सामने कोई टिप्पणी नहीं की है. सरकार अब इससे हुए नुकसान की भरपाई में जुट गई है.

गौरतलब है कि पुस्तकालय विभाग की ओर से हाल में एक अधिसूचना जारी की गयी जिसमें कहा गया है कि सरकारी पुस्तकालयों में बांग्ला में संवाद प्रतिदिन, सकाल बेला, एक दिन, खबर 365, दैनिक स्टेटसमैन, हिंदी में सन्मार्ग, उर्दू में आजाद हिंद व अखबार-ए-मशरीक ही रखे जायेंगे. दिलचस्‍प बात यह है कि ये अखबार किसी न किसी रूप से तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए हैं या उनके समर्थक हैं. संवाद प्रतिदिन के संपादक सृजय बोस व सह संपादक कुणाल घोष दोनों ही तृणमूल कांग्रेस से राज्यसभा के सांसद हैं. सन्मार्ग के मुख्य कर्ता विवेक गुप्ता व अखबार-ए-मशरीक के नदीमुल हक कुछ दिन पहले ही तृणमूल कांग्रेस के टिकट से राज्यसभा के सांसद बने हैं. इस सूची से कोलकाता के बांग्ला, अंगरेजी व हिंदी के लगभग सभी प्रतिष्ठित अखबारों को अलग रखा गया है.

सरकार के इस फरमान का चौतरफा आलोचना शुरू हो गई है. विपक्ष के नेता तथा साहित्‍यकार भी ममता बनर्जी के इस फैसले के खिलाफ मुखर हो उठे हैं. विस में विपक्ष के नेता सूर्यकांत मिश्र और कांग्रेस विधायक असित मित्र ने यह मुद्दा उठाया है. इन लोगों ने कहा है कि पश्चिम बंगाल सरकार लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था की नींव कमजोर करने का प्रयास कर रही है. यह उचित एवं व्‍यवहारिक कदम नहीं है. यह लोकतंत्र पर कुठाराघात है. वहीं वुद्धिजीवी वर्ग भी ममता के इस फैसले से खासा नाराज है. इस वर्ग का कहना है कि आम पाठक वही नहीं पढ़ना चाहेगा, जिसे सरकार पढ़ाएगी. (इनपुट : बीबीसी)

 

 
 

 

अब नईदुनिया, रायपुर में भी छंटनी शुरू

दैनिक जागरण समूह द्वारा नईदुनिया को खरीदने की मिल रही खबरों को रायुपर एडिशन से छंटनी आदेश जारी होने के साथ ही बल मिलने लगा है। नईदुनिया रायपुर एडिशन से सभी ब्यूरो के लिए छंटनी आदेश जारी कर दिया गया है। सभी ब्यूरो का काम को सीधे रायपुर कार्यालय से जोड़ दिया गया है। विभागीय सूत्रों की माने तो रायपुर एडिशन से सभी ब्यूरो सहित लगभग 30 लोगों को तीन महीने की सेलरी देकर घर बैठने को कह दिया गया है।

रायपुर एडिशन से सीनियर फोटोग्राफर विनय शर्मा तथा कार्टूनिस्ट असीम हिरवानी को तीन महीने की सेलरी के साथ विदाई दे दी गई है। मार्केटिंग टीम से भी कइयों को निकाला जा रहा है। रायपुर कार्यालय में हो रही इस उठापठक के चलते सभी अधिकारी-कर्मचारी अपने भविष्‍य को लेकर चिंतित हैं। कई ने तो अपनी जगह तलाशनी भी शुरू कर दी है। सिटी एडिशन के कई रिपोर्टर भास्कर और पत्रिका के संपर्क में हैं। वहीं कुछ संतोषी किस्म के लोगों को उम्मीद है कि नई दुनिया के उपर मंडरा रहे संकट के बादल जल्द ही छंट जाएंगे।

 

 
 

 

जस्टिस काटजू के सामने लखनऊ के पत्रकारों ने खोली एक दूसरे की दलाली की पोल

: आपस में ही भिड़ गए हिसाम और अनिल : शर्मसार हुई पत्रकारिता : प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मारकंडेय काटजू के सामने लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकारों ने जो शर्मनाक हरकत की उससे पूरे प्रदेश में पत्रकारों की खासी फजीहत हो रही है। एनेक्सी के मीडिया सेंटर में काटजू के सामने ही पत्रकारों ने न सिर्फ अभद्र भाषा का प्रयोग किया बल्कि मारपीट तक उतारू हो गए। राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष हिसामुल सिद्दीकी की जितनी फजीहत सार्वजनिक रूप से हुई उतनी शायद उनके पत्रकारिता के जीवन में कभी नहीं हुई होगी। काटजू सहित प्रेस काउंसिल के बाकी सदस्यों ने कहा कि इस आचरण की वह कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

काटजू की प्रेस कांफ्रेंस में कक्ष खचा-खच भरा हुआ था। होना तो यह चहिए था कि काटजू से प्रेस काउंसिल से सम्बन्धित सवाल ही पूछे जाने चाहिए थे। मगर कुछ ऐसे पत्रकार जो पत्रकारिता में कम और बाकी धंधों में ज्यादा लिप्त रहते हैं, उन्होंने काटजू से उनके सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों से सम्बन्धित सवाल पूछना शुरू कर दिए, जिससे बाकी पत्रकारों में नाराजगी भी हुई और लोगों ने कहा भी कि प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष से पत्रकारिता और पत्रकारों से संबंधित सवाल ही पूछे जाने चाहिए। काटजू की इस संबंध में कुछ पत्रकारों से तीखी बहस भी हुई। काटजू अपने साथ सूचना निदेशक बादल चटर्जी को भी लेकर आए थे।

मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष हिसामुल सिद्दीकी ने जब मायावती और उनके अफसरों पर कुछ तीखे सवाल किये और सूचना निदेशक बादल चटर्जी को भी इसमें लपेटा तो बादल चटर्जी भी आपा खो बैठे और उन्होंने काटजू के बराबर में डायस पर बैठे-बैठे हिसामुल सिद्दीकी से कहा कि मेरा मुंह मत खुलवाइये वरना स्थिति खराब हो जायेगी। इतना सुनते ही हिसामुल सिद्दीकी के चेहरे की हवाइयां उड़ गई। इस पर कुछ पत्रकारों ने चटर्जी से कहा कि पत्रकारों को ब्लैकमेल मत करिए और जो कहना है खुलेआम कहिए। इस पर बादल चटर्जी ने हिसामुल सिद्दीकी से कहा कि आप लखनऊ, दिल्ली और मुम्बई तीन जगह से अखबार निकालते हैं और तीनों जगहों पर खबरें एक जैसी होती हैं और तीनों अखबारों के लिए विज्ञापन अलग-अलग लेते हैं, तो यह धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?

चटर्जी के इतना कहते ही हिसामुल की हवाइयां उड़ गयीं और वह कहने लगे कि वह तो मायावती के शीर्ष अफसरों के लिए कह रहे थे। चटर्जी ने गलत तरीके से यह बात अपने उपर समझ ली। इसके बाद पत्रकारों ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सूचना विभाग मात्र पत्रकारों का उत्पीडऩ कर रहा है। पहली बार पत्रकारों के मान्यता कार्ड सिर्फ छह महीनों के लिए नवीनीकरण किए गए। विज्ञापन मनमर्जी तरीके से कुछ चुंनिदा अखबारों को दिए जाते हैं। बड़ी प्रेस कांफ्रेंस आदि में सभी अखबार के प्रतिनिधियों को नहीं बुलाया जाता। इस पर काटजू ने बादल चटर्जी को निर्देश दिए कि तत्काल पत्रकारों की मान्यता समिति और विज्ञापन समिति बनाई जाय, जिसमें अध्यक्ष किसी पत्रकार को बनाया जाए और सचिव किसी नौकरशाह को और इसमें भी अधिकतर संख्या पत्रकारों की ही होनी चाहिए।

इस सुझाव के बाद पत्रकार अनिल त्रिपाठी ने कहा कि इससे पहले इस तरह की समिति में ऐसे लोग नामित कर दिए गए थे, जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं था और वह शराब की पेटी और दस हजार रुपये लेकर मान्यता दे दिया करते थे। बड़ी संख्या में पत्रकारों ने इस बात का समर्थन किया कि पत्रकारों में भी इस तरह के दलाल लोग आ गए हैं, जो पत्रकारिता के नाम पर बाकी सब तो करते हैं मगर पत्रकारिता नहीं करते। इस पर हिसामुल सिद्दीकी ने कहा कि लगता है बादल चटर्जी श्री त्रिपाठी को समझाकर लाए हैं। इस पर अनिल त्रिपाठी और प्रभात आग बबूला हो गए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से हिसामुल सिद्दीकी पर दलाली करने और गुंडा गर्दी करने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिसाम का पिछला सारा इतिहास चेक कर लिया जाए तो पता चल जायेगा कि कौन दिल्ली की दलाली करता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन पत्रकारों का भी आचरण देखा जाए जो खुद तो सरकारी मकान में रहते हैं और सरकार को झूठा शपथ पत्र दिया है कि उनके पास कोई मकान नहीं है और अपना मकान किराए पर उठाकर खुद सरकारी मकान का फायदा उठाते हैं।

इस बात पर इतना हंगामा मच गया कि लगा कि अब इस कक्ष में मारपीट ही हो जाएगी। यह हंगामा लगभग दस मिनट तक चलता रहा और काटजू तथा उनकी टीम हतप्रभ होकर यह देखती रही कि क्या यही राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं, जिनका आचरण सड़क के छुटभइये गुंडों जैसा लग रहा है। बाद में कई वरिष्ठों के समझाने पर मामला जैसे-तैसे शान्त हुआ। वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार ने काटजू से क्षमा मांगते हुए कहा कि हम तो यह सुनने आये थे कि आपने दो दिन में लखनऊ में पत्रकारों के हित में क्या किया, मगर यहां तो हम लोग आपस में ही उलझ गए। उन्होंने कहा कि वह चालीस वर्ष से पत्रकारिता कर रहे हैं मगर इतना शर्मनाक वाक्या अभी तक उनके सामने नहीं आया। इस घटनाक्रम से पत्रकारों की राजनीति का छिछोरापन सबके सामने आ गया है, जो पत्रकार वास्तव में पत्रकारिता करते हैं उनका कहना है कि या तो मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति ही खत्म कर दी जाय वरना इसमें ऐसे ही लोग चुने जाएं, जिनका सार्वजनिक जीवन में कोई दागदार रिकार्ड न हो। इस बीच पत्रकारों ने यह भी कहा कि मौजूदा समिति का कार्यकाल खत्म हो गया है, इसलिए तत्काल इसका भी चुनाव करवाया जाना चाहिए।

साधना में न्‍यूज कोआर्डिनेटर बने संजय समर, प्रीति तिवारी अंजन टीवी पहुंची

साधना न्‍यूज से खबर है कि वरिष्‍ठ पत्रकार संजय समर ने झारखंड में स्‍टेट न्‍यूज कोआर्डिनेटर के पद पर ज्‍वाइन किया है. संजय पिछले दो दशक से बिहार, झारखंड और असम की पत्रकारिता में सक्रिय रहे हैं. संजय जेवीजी टाइम्‍स, पायनियर, हिंदुस्‍तान, अमर उजाला, जनसत्‍ता जैसे अखबारों में काम कर चुके हैं. झारखंड की पत्रकारिता में उनकी अच्‍छी पकड़ है. संजय इन दिनों मिशन इंडिया अखबार से जुड़े हुए थे. 

महुआ न्‍यूज से खबर है कि प्रीति तिवारी ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर एंकर कम रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थीं. प्रीति ने अपनी नई पारी अपकमिंग हेल्‍थ एवं लाइफ स्‍टाइल चैनल अंजन टीवी से शुरू की है. उन्‍हें यहां पर एंकर कम प्रोड्यूसर बनाया गया है. इन चैनल का फोकस यूपी और बिहार-झारखंड पर रहेगा. प्रीति ने अपने करियर की शुरुआत 2006 में जनमत के साथ की थी. इसके बाद उसके बाद वे हमार टीवी से जुड़ गईं. वहां से इस्‍तीफा देने के बाद वे ए2जेड से जुड़ी. इसके बाद महुआ न्‍यूज ज्‍वाइन कर लिया था. प्रीति की गिनती तेजतर्रार एंकरों में की जाती है.

 

 
 

 

महुआ के स्ट्रिंगरों के पैसे से मिला कर्मचारियों को इक्रीमेंट

अभी कुछ ही दिन पहले महुआ न्यूज के कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का तोहफा मिला। मगर यह जानकर ताज्जुब होगा कि यह इंक्रीमेंट स्ट्रिंगरों की बदौलत है। जी हां, निरीह स्ट्रिंगरों के पैसे में कटौती और घपले करके सेलरी बेस्ड कर्मचारियों को इंक्रीमेंट दिया गया। यह बात सही है कि इसमें ग्रुप एडिटर राणा यशवंत की खास भूमिका है। उनके द्वारा ही स्ट्रिंगरों के पेट पर लात मारने जैसी हरकत महुआ ग्रुप में किया गया है। रही बात पुराने स्टाफ को 3 से 5 हजार का इंक्रीमेंट देने की, तो यह गलत है। महुआ में लांचिंग के समय से जुडे कर्मचारियों में से कुछ एक को ही 1 से 2 हजार का इंक्रीमेंट मिल पाया है। 3 से 5 हजार की बढ़ोतरी महुआ के बडे़ अधिकारियों के चापलूसों के लिए हुई है।

अब हम  आपको बताते हैं कि आखिर इंक्रीमेंट के पैसे का इंतजाम किस शातिरपना तरीके से किया गया, जबकि पीके तिवारी ने महीनों से चैनल को खर्चे देना बंद कर दिया है। महुआ न्यूज ग्रुप के पास विज्ञापनों की भारी कमी है। महुआ एंटरटेंमेंट का सारा प्राफिट पीके तिवारी ले लेते हैं। ऐसे में राणा जी को पैसे इंतेजाम करने का एक ही उपाय सूझा, वो है निरीह, बेबस, सबकी गाली सुनने वाले स्ट्रिंगरों की कमाई में सेंध लगाना। जहां पहले महुआ में स्ट्रिंगरों को 500 रुपए प्रति खबर दी जाती थी, वहीं अब उन्हें दो से ढाई सौ में ही संतोष करना पड़ रहा है।

इतना ही नहीं, जब किसी परिश्रमी स्ट्रिंगर की कमाई 3 से 5 हजार होने की नौबत आती है तो बिना किसी बात के उसकी खबरें ड्राप कर दी जाती हैं। उसके हिसाब में घपला करके उसे कम रुपए ही भेजे जाते हैं। न्यूज चैनलों के इतिहास में महुआ रिकार्ड बनाने को तुला है कि वह अपने स्ट्रिंगरों को सबसे कम पैसे देने वाला पहला चैनल है। आपको जानकर ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि महीने में 25 से 30 खबर भेजने के बावजूद भी यूपी के अधिकांश स्ट्रिंगरों को कई महीनों से 250 से 1200 रुपए की ही पेमेंट की गई है। हिसाब मांगने पर स्ट्रिंगरों को यही जबाव मिलता है कि उपर से आदेश है।

ऐसे तमाम घपले करके जमा पूंजी इंक्रीमेंट के रूप में कर्मचारियों को दी गई है। जहां कर्मचारियों की सेलरी 2 दिन भी लेट हो जाती है तो पूरे आफिस में बवाल हो जाता है, वहीं बेचारे स्ट्रिंगर 6-6 महीनों से पेमेंट की बाट जोह रहे हैं। स्ट्रिंगरों की तरफ से चेनल हेड समेत महुआ के तमाम आकाओं को चैलेंज है कि आज एक स्ट्रिंगर को जितना मेहनताना दिया जा रहा है उसमें वो सिर्फ एक सप्ताह काम करके दिखा दें तो समझ में आए। अरे पत्थरदिल आकाओं सोचो आखिर 200 रुपए में स्ट्रिंगर खबर कैसे करेगा, जब 70 रुपए लीटर पट्रोल हो गया है साथ ही मोबाइल और अन्‍य खर्च भी अलग हैं। आकाओं, तुम्हारी इस हरकत पर स्ट्रिंगरों का सिर्फ आंसू ही निकलता है। इसकी आह से तुम सब बच नहीं पाओगे।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
 

 

जब संपादक दलाल बन गए हैं तो अखबार में गालियां तो छपेंगी ही!

आज दोपहर को अचानक वाराणसी से मेरे एक पत्रकार मित्र का फोन आया, मैं अपनी पत्रिका को अंतिम ले आउट देने में लगा था, फिर भी फोन रिसीव किया. उसने कहा यार भड़ास साइट आज देखी क्या? मैंने कहा क्यू…कहा की देखो…सहारा में मायावती के खिलाफ गाली लिखी है..बड़ा बवाल हो रहा है.. मैंने सोचा कि माननीय यशवंत जी सिर्फ बवाल ही करवाते हैं.. सारे अखबार वालों ने इनकी साइट बंद करके रखी…फिर भी भास्कर वालों की पञ्च लाइन ….जिद करो..आगे बढ़ो..का फार्मूला अपनाये हुए है. अपने ऑफिस में मैंने इसकी चर्चा की..संपादक लेबल के कुछ बड़े अखबारों के पत्रकार भी बैठे थे… सबने कहा कि जागरण वाला मामला फिर सामने आया है.

खैर… अब सवाल ये उठता है कि इसमें आरई कहां से दोषी है? डेस्क हेड कैसे दोषी है? प्रूफ रीडर का पद किसने समाप्त किया… अखबार वालों के मालिकों को जिन कथित बड़े महानुभाव संपादकों ने मल्टी संस्करण निकलने की सलाह दी.. क्या उन्हें ये नहीं पता था की इसमें उतने ही जानकार लोगों की जरुरत होगी.. मेरा ये दुर्भाग्य है कि अपने पत्रकारिता के शुरुआती दौर में जिन संपादकों को मैं जानत था, आज उसमें से ज्यादातर दलाल बने हुए हैं…कुछ जाति को लेकर पद पर बैठे हैं तो कुछ सेटिंग की बदौलत.. कभी-कभी इन संपादकों से मैं नौकरी भी मांगता हूँ, पर ये अपने साथ होटल में खिलाते तो है, साथ बैठाते तो हैं, पर नौकरी नहीं देते. इसका कारण है कि ये पांच-आठ हजार में आदमी खोजते हैं, ट्रेनी मिल जाये तो फिर क्या कहना.

अब बताओ. पांच हजार में जो डेस्क पर काम करेगा… उसकी मानसिकता क्या होगी.. किस लेबल का वो आदमी होगा और उससे कैसी पत्रकारिता अथवा डेस्क पर काम की उम्मीद की जा सकती है. दुःख इस बात का लगता है कि जिन बड़े संपादकों की बातें बड़ी होती हैं उनका काम बड़ा नहीं होता.. क्या वे संपादक इस बात को नहीं जानते हैं कि डेस्क पर उसी आदमी की नियुक्ति होती है, जो फील्ड में काफी अनुभव रखता है. ताकि जब फील्ड से खबर आये तो उसे पता होना चाहिए कि इस खबर की आत्मा क्या है? लेकिन अब ऐसा नहीं है. प्रूफ रीडर, सब एडिटर ख़तम… अब सम्पादक जी कहते हैं कि पेज बनाना आता है? अगर कहा की नहीं….तो फिर बस हो गयी नौकरी… इन्हें पत्रकारिता वाले आदमी नहीं चाहिए, इन्हें ऑपरेटर चाहिए. और इन्हीं किसी ऑपरेटर नें मायावती को गाली लिख दी.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि पूरी दुनिया में कोई भी ऐसा पत्रकार नहीं होगा जो अगर डेस्क पर काम कर रहा होगा तो वह गाली लिख देगा. अब बताओ गाली लिखने वालों को नौकरी किसने दी.. अखबार के मालिक ने, इसके लिए प्रबंधन दोषी है….नहीं.. इसके लिए सभी बड़े अखबारों के प्रधान संपादक दोषी हैं. इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा. खुद बड़ी सेलरी लेने के चक्कर में ये लोग समाज को बर्बाद कर रहे हैं. और भाषा ऐसी बोलेंगे कि लगेगा की आपका बाप दुश्मन हो सकता है लेकिन ये संपादक जी कभी आपके दुश्मन नहीं होंगे.. आलोक तोमर जी तो नहीं रहे, प्रभाष जोशी भी अब इस दुनिया में नहीं है. कुछ गिने-चुने अच्छे संपादक हैं, तो वो या तो हाशिये पर हैं या फिर ढलती उम्र में घर पर बैठे हैं.. दलाल लोग राज कर रहे हैं.. और 98 प्रतिशत अखबारों में आज संपादक योग्यता के आधार पर नहीं, कुछ और आधार पर तय किये जाते हैं. इसके लिए भी कहीं भी अखबार का मालिक या फिर बड़ा प्रबंधन दोषी नहीं है. दोष सिर्फ उन पत्रकारों का है जो अब कथित बड़े संपादक बन गए हैं और राज्य सभा में जाने के लिए तड़प रहे हैं.

अगर मैं इस साइट पर दो-चार संपादकों के नाम लिख दूं कि इन्हें किस आधार पर संपादक बनाया गया तो बवाल हो जायेगा.. फिर हमको भी बिहार और झारखण्ड में नौकरी नहीं मिलेगी, वैसे ही जैसे यशवंत जी की साइट पर अपने अख़बारों के विरोध में खबर चलने के बाद तुरंत उससे प्रतिक्रया तो आती है लेकिन उस अखबार के दफ्तर में भड़ास देखने की सख्त मनाही है. इसलिए कभी इस मामले को लेकर आगे बात बनती है तो फिर नाम लिखा जायेगा, लेकिन फिलहाल यहाँ जिस आरई व डेस्क वालों को हटाया गया, वो गलत है. इसमें सिर्फ जांच करके एक आदमी को हटाना था और हटाना ही नहीं बल्कि उस पर मुकदमा भी दर्ज करवाना था, लेकिन फिर वही बात. ऊपर बैठे बड़े संपादक नीचे के छोटे संपादकों की कुर्सी ले ली..साला पूरा अंग्रेजी राज है रे भैया.. ऊपर के अधिकारी को कुछ नहीं होगा.. नीचे वालों की तो ऐसी की तैसी.

लेखक उदय शंकर खवाड़े अपकमिंग मैगजीन एनसीआर लुक के इनपुट हेड हैं.

 

 
 

 

सड़क दुर्घटना में लोकमत के पत्रकार की मौत

सांगली : महाराष्ट्र के सांगली जिले के कुंदाल फाटा के समीप पुलिस वैन और कार की टक्कर में दैनिक समाचार पत्र लोकमत के एक पत्रकार की मौत हो गयी, जबकि तीन लोग घायल हो गये। जानकारी के अनुसार लोकमत के पत्रकार बाबा धोंड्रम वीरकर (30 वर्ष) कार से अपने दो अन्य साथियों के साथ सतारा जिले के मासवद से कोल्हापुर जा रहे थे। वे लोग कुंदाल फाटा के समीप पहुंचे ही थे कि दूसरी तरफ से आ रही पुलिस वैन ने कार को टक्कर मार दी।

इस हादसे में वीरकर की घटनास्‍थल पर ही मौत हो गई, जबकि कार में बैठे नागनाथ डोबे (35 वर्ष) और किशोर सोनवने (38 वर्ष) भी घायल हो गए। इस टक्‍कर में पास में खड़े सुमन वसंत रणभरे भी इसकी चपेट में आ गए तथा गंभीर रूप से घायल हो गए. सभी घायलों को अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने वैन चालक 51 वर्षीय विजय श्रीपाल चौगुले को लापरवाही से वाहन चलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है।

 

 
 

 

ये है दिल्‍ली पुलिस का असली घिनौना चेहरा

 दिल्‍ली। 'दिल्‍ली पुलिस सदैव आपके साथ' का नारा देने वाली पुलिस की तस्‍वीर कुछ अलग ही हैं, हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं। हुआ यूं आज दिनांक 27 मार्च, 2012 को करीब सुबह 10:55 पर गोल मार्केट सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के सामने सड़क की पटरी पर खड़े मारुती सुजुकी कार, जिसका नंबर डीएल 5सीएच 6160 था, के पास कूड़े के ढेर के में आग लग गई।

धीरे-धीरे कूड़े के ढेर में सुलगती आग ऐसी दशा में पहुंच गयी कि वो कार के बीच का हिस्‍सा अपने चपेट में लेने लगी, कि इतने में किसी की नजर आग पर पड़ गयी, बहुत से दुकानदारों ने पानी की बाल्‍टी लेकर आग को बुझाया मगर फिर भी आग पूरी तरह बुझ नहीं पायी। कार के नीचे से धुंआ निकलना बंद नहीं हुआ। वहीं पर नौकरी कर रहे आरके गुप्‍ता ने वहां खड़ी पुलिस की जिप्‍सी जिसका नं. डीएल आईसीजे 4714 था, से मिन्‍नतें की कि थोड़ी आप मदद कर दें, जिससे आग पर काबू पाया जा सके तो पुलिस जिप्‍सी के ड्राइवर ने कहा कि हम क्‍या मदद करें क्‍या हम पानी लेकर बुझायें, ड्राइवर के बगल में बैठा पुलिस भी किसी तरह की मदद करने से इनकार कर दिया।

जरा सोचें कि दिल्‍ली पुलिस किस तरह की असंवेदनशील है यदि कार में आग लग जाती तो आस-पास के कार भी इसके चपेट में आ जाते, जिससे भारी क्षति हो सकती थी मगर भला हो वहां के दुकानदारों का जिनकी मदद से आग को बुझाया गया। बाद में स्‍थानिय पुलिस भी आ गई, मगर इस जिप्‍सी पर सवार पुलिसकर्मियों के कान पर जैसे कोई जूं ही नहीं रेंगा हो। जिस देश की पुलिस ऐसी हो भला वो देश कैसे आगे बढ़ेगा। पुलिस के नाते न सही मानवता के नाते वे कुछ तो सक्रिय हो ही सकते थे, मगर उन्‍होंने ऐसा नहीं किया।

राजीव कुमार

दिल्‍ली

 

 
 

 

बिहार में दैनिक भास्‍कर की लांचिंग ठंडे बस्‍ते में

: अर्थवस्‍था में सुधार के बाद कंपनी लांच करेगी प्रोजेक्‍ट : टेलीवीजन न्यूज चैनल और इंटरनेट पर खबरों की शीघ्र पहुंच ने अखबारों की दुनिया को कहीं ना कहीं बड़ा धक्का दिया है। खबरों के आधुनिकीकरण के इस दौर में प्रिंट मीडिया संस्थान पीछे छूटते नजर आ रहे हैं, तो ऐसे भी कई संस्थान देखे गए जिन्होंने खबरों की इस दौड़ में पीछे छूटने की वजह से अपने संस्थानों पर ताला लटका दिया।

लेकिन ऐसे मुश्किल दौर में डीबी कॉर्प एक मात्र ऐसी प्रिंट मीडिया कंपनी है जो पूरी सफलता के साथ अपना कारोबार चलाने का दावा करती है। हालांकि कंपनी ने बिहार में अपने अखबार की लॉन्चिंग को कमजोर अर्थव्यवस्था का हवाला देते हुए फिलहाल टाल दिया है। प्रिंट मीडिया के मुश्किल हालातों में डीबी कॉर्प कैसे कर रही है अपने कारोबार का संचालन बता रहे हैं कंपनी के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल –

डीबी कॉर्प के डायरेक्टर गिरीश अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा दौर में डीबी कॉर्प भारत में एक मात्र ऐसी कंपनी है जो प्रिंट मीडिया कारोबार का सफलतापूर्वक संचालन कर रही है। वहीं अखबरों के साथ-साथ कंपनी की अच्छी पकड़ एफएम चैनल और इंटरनेट मीडिया में भी है।

गिरीश अग्रवाल का कहना है कि प्रिंट मीडिया कंपनी का मुख्य कारोबार है और कंपनी की आय का 97 फीसदी हिस्सा अखबारों से आता है, जबकि करीब 3 फीसदी की आय माय एपएम रेडियो चैनल से होती है। वहीं दैनिक भास्कर कंपनी का प्रमुख हिंदी अखबार है। इसके अलावा कंपनी 13 राज्यों में 7 भाषाओं में अखबार निकालती है। दैनिक भास्कर के अलावा दिव्य भास्कर, बिजनेस भास्कर, दिव्य मराठी, डीबी स्टार, सौराष्ट्र समाचार ऐसे दैनिक अखबार हैं जिनका संचालन कंपनी करती है।

गिरीश अग्रवाल का मानना है कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में कंपनी के कारोबार की अच्छी पकड़ है। वहीं हिंदी और गुजराती में कंपनी के अखबार नंबर 1 हैं, जबकि महाराष्ट्र के औरंगाबाद में दिव्य मराठी सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार है। गिरीश अग्रवाल के कहना है कि नंबर 1 की कुर्सी पर बैठने से विज्ञापन आय जुटाने में अच्छी मदद मिलती है।

गिरीश अग्रवाल के मुताबिक महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में लॉन्च से कंपनी को फायदा हुआ है। वहीं 31 मार्च को कंपनी महाराष्ट्र के शोलापूर में दिव्य मराठी का पांचवां संस्करण लॉन्च करेगी। हालांकि कंपनी ने बिहार के लॉन्च को फिलहाल टाला है, कंपनी अर्थव्यवस्था में सुधार के बाद ही बिहार में अपना अखबार लॉन्च करेगी। साभार : मनी कंट्रोल

 

 
 

 

पत्रकार के पुत्र का अपहरण, एसओजी जांच में जुटी

छिबरामऊ : अपहृत पत्रकार के पुत्र की तलाश में एसओजी टीम जुट गई है। शासन के निर्देश पर मामले के खुलासे के लिये पुलिस अधीक्षक ने एसओजी टीम को मास्टर माइंड अभय सिंह को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी सौंपी है। अभी तक युवक का कोई पता नहीं चल सका है। सोमवार को एसओजी प्रभारी सुदीप मिश्रा की टीम सौरिख रोड स्थित पत्रकार देवेंद्र चतुर्वेदी के घर पहुंची जहां उन्होंने अपहृत पुत्र विकास चतुर्वेदी की मोबाइल काल डिटेल का अवलोकन किया। इसके अलावा उन्होंने मामले की मास्टर माइंड अभय सिंह के बारे में भी जानकारी हासिल की।

पत्रकार देवेंद्र चतुर्वेदी ने टीम को बताया कि अभय सिंह पहले भी कई बार विकास के साथ देखा जा चुका है, और उसी ने घटना को अंजाम दिया है। पहले उसके ऊपर शक किया जाता रहा, लेकिन पुष्टि तब हो गई जब उसने मोबाइल से पांच लाख रुपये की फिरौती की मांग की। उन्होंने बताया कि पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर एसओजी टीम को मामले के खुलासे के निर्देश दिये गये हैं। अब उसके आधार पर पुलिस अभय की तलाश में दबिश दे रही है। हालांकि, रविवार को कोतवाली पुलिस ने अभय की ससुराल ग्राम मलपुरा में दबिश देकर उसके साले और एक युवक को हिरासत में लिया था। पुलिस उसके संभावित ठिकानों पर भी दबिश दे रही है। दो दिन से मास्टर माइंड अभय सिंह ने अपना मोबाइल भी बंद कर लिया है। जिससे पुलिस को सर्विलांस के जरिये उसकी लोकेशन नहीं मिल पा रही है। साभार : जागरण 

 

 
 

 

सहारा के मीडियाकर्मी को बदमाशों ने अगवा कर लूटा

: नशे का इंजेक्‍शन भी लगाया : नोएडा में 'सहारा' के आगरा विज्ञापन प्रतिनिधि पंकज राठौर को कुछ बदमाशों ने नोएडा स्टेडियम के पास से एसेंट कार में अगवा कर लिया. बदमाशों ने उनके साथ कार में जमकर मारपीट की तथा उन्‍हें नशे का इंजेक्‍शन लगा दिया. बदमाश पंकज को करीब ढाई घंटे तक कार में ही बैठाकर सड़कों पर घुमाते रहे. बाद में उन्‍हें दिल्‍ली के खिचड़ीपुर इलाके में कार से नीचे फेंक दिया तथा फरार हो गए.

पंकज को घायल अवस्‍था में नोएडा के कैलाश हास्‍पीटल में भर्ती कराया गया है, जहां वे आईसीयू में भर्ती हैं. जानकारी के अनुसार पंकज रात को करीब साढ़े नौ बजे नोएडा स्थित सहारा के कार्यालय से निकले तथा आगरा के बस पकड़ने जा रहे थे. स्‍टेडियम के पास बस अड्डे जाने के लिए किसी वाहन के इंतजार में खड़े थे.तभी एसेंट कार में आए बदमाशों ने उन्हें पकड़ लिया बदमाशों ने हथियार की नोंक पर पंकज का एटीएम कार्ड छीन लिया. इससे उन्‍होंने पैसे भी निकाले. पुलिस को शिकायत कर दी गई है. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है.

 

 
 

 

सपा नेता की धमकी- नकल की खबरें छापी तो हाथ काट लूंगा

दो पत्रकारों ने दो सूचनाएं भड़ास4मीडिया के पास भेजी हैं. धर्मवीर सिंह चौहान ने बताया है कि बोर्ड परीक्षा में ठेके पर होने वाली नकल के खिलाफ खबरें छपवाने वाले पत्रकारो को धमकाया गया है. मिर्जापुर थाने में खुद को दबंग सपा नेता बताने वाले स्कूल प्रबंधक ने पत्रकारों के हाथ काट लेने व जान से मारने की धमकी दी है. इससे भयभीत होकर पत्रकारों ने तहसील मुख्यालय जाकर सीओ व एसङीएम जलालाबाद को ज्ञापन देकर उक्त स्कूल प्रबधंक के खिलाफ कार्रवाई कर सुरक्षा मुहैया कराने की मांग की है. एसङीएम व सीओ जलालाबाद ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है.

दूसरी सूचना शाहिद मोहम्मद ने दी है. इन्होंने बताया है कि उत्तर प्रदेश में नवनिर्मित जिला पंचशील नगर में इलेक्ट्रानिक मीडिया एसोशियन का चुनाव सम्पन्न हुआ. चुनाव में न्यूज24 के पत्रकार मौ. शाहिद को र्निविरोध अध्यक्ष और सुशील कर्दम को सचिव चुना गया.

 

 
 

 

नईदुनिया में चला छंटनी का चाबुक, सैकड़ों लोगों की छुट्टी

बड़ी दुखद खबर है. सैकड़ों मीडियाकर्मियों को सड़क पर आना पड़ा है. नईदुनिया के जागरण के हाथों बिकने की कवायद के क्रम में छंटनी का काम किया जा रहा है. इस क्रम में मध्य प्रदेश और दिल्ली की यूनिटों के सैकड़ों लोगों को तीन-तीन महीने का चेक थमा कर पहली अप्रैल से घर बैठने के लिए बोल दिया गया है. दिल्ली में दिनेश सेठिया आए हुए थे. उन्होंने दिल्ली वाले पत्रकारों को बुलाकर बताया कि आप सभी के लिए तीन तीन महीने का चेक लेकर आया हूं, इसे थाम लीजिए और इस माह के आखिरी तारीख को विदा ले लीजिए.

उधर, जागरण में मर्जर की खबर के बीच प्रबंधन के बुलावे पर इंदौर पहुंचे नईदुनिया के सभी एडीशन के यूनिट हेड और संपादक प्रबंधन की घुट्टी पीने के बाद अपने-अपने एडीशन में वापस लौट चुके हैं और इसके साथ ही नईदुनिया में छंटनी का चाबुक चलने लगा है. अकेले ग्वालियर एडिशन में 20 लोगों को नवदुर्गा के मौके पर तीन-तीन माह की सैलरी देकर घर बैठा दिया गया है. इनसे यूनिट हेड और संपादक ने अपने सामने बैठकर इस्तीफे लिखवाए. इनमें से अधिकांश लोग तो ऐसे हैं जो ग्वालियर में नईदुनिया की लॉचिंग से जुड़े हुए थे. जिन बीस लोगों को घर बैठाया गया है उनमें सभी लोग लो सैलरी वाले हैं. इसमें चपरासी भी हैं और ड्राइवर भी हैं. डीटीपी ऑपरेटर भी हैं तो प्रूफ रीडर भी. मार्केटिंग से जुड़े लोग भी छंटनी के दायरे में आने वाले लोगों में शामिल हैं. जो लोग संपादक के अधीन थे, उन्हें राकेश पाठक ने अपने कक्ष में बैठाया और रोनी सी सूरत में प्रबंधन का फरमान सुनाते हुए कहा कि आप सभी को तीन-तीन माह की सैलरी देकर संस्थान के दायित्वों से आज से ही मुक्त किया जाता है. वैसे आप चाहें तो अपनी सेवाएं आप 31 मार्च तक दे सकते हैं. जिन 20 लोगों को तीन-तीन माह की सैलरी के लिफाफे थमाए गए उन्होंने भी इस्तीफा मांगने वाले राकेश पाठक को टका से जवाब देते हुए कह दिया कि यदि ऐसे ही लो सैलरी वालों को निपटाया जाएगा. बलि ली जाएगी तो फिर नईदुनिया के लिए सफेद हाथी (ऊंची कुर्सी पर बैठने वाले) बन गए लोग भी नहीं बच पाएंगे. ऐसे लोगों से आने वाला प्रबंधन हिसाब-किताब लेगा और इसके साथ ही इन लोगों ने सैलरी का लिफाफा लेने के साथ ही संस्थान को अलविदा कह दिया. यहां बताना जरूरी है कि जब से नईदुनिया की कमान जागरण वालों के हाथों में जाने की खबर चली है तभी से नईदुनिया में छंटनी जारी है. ग्वालियर एडीशन से अभी तक 23 लोगों को बाहर किया जा चुका है. यदि नईदुनिया के खबरियों की मानें तो जागरण प्रबंधन ने नईदुनिया प्रबंधन से कह दिया है कि हमें संस्थान पर बोझ बन चुके लोग नहीं चाहिए, इसलिए निचले स्तर पर छंटनी करके आप ही दीजिए, ऊपरी स्तर के लोगों से निपटने के लिए हमारे पास कई एडीशन हैं. हम इन एडीशन में भेजने के लिए ऐसे लोगों के लिए दरवाजे खोलकर रखेंगे. जिन 20 लोगों को घर बैठाया गया है उसमें से एक की भर्ती तो प्लांट के लिए हुई थी. बाद में उससे कंप्यूटर ऑपरेटर का काम लिए जाने लगा और जब उसे निकाला गया तो वजह बताई गई कि उसने दो साल से कोई बिजनिस संस्थान को नहीं दिया है. इसलिए उसे मार्केटिंग टीम से बाहर किया जाता है. जाहिर है यह व्यक्ति संपादक के अहम की भेंट चढ़ गया क्योंकि यह संभव ही नहीं कि एक व्यक्ति संस्थान में फुटबॉल बना एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमता रहे और उसके काम की खबर किसी को न हो. इसके अलावा अधिकांश लोग ऐसे भी हैं जो अकेले ही अपने घर में कमाने वाले थे. नईदुनिया में चल रहे छंटनी के हंटर से लोगों के चेहरों की हंसी गायब है. सभी के चेहरे लटके हुए हैं और मानकर चल रहे हैं कि आज नहीं तो कल हमारी बारी है. इस पूरे मामले में प्रबंधन के मौन ने मामले को और भी गंभीर बना दिया है.

दिल्ली और ग्वालियर से मिली सूचनाओं पर आधारित. नई दुनिया से जुड़ी कोई सूचना अगर आपके पास भी है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

 

 
 

 

लखनऊ में काटजू बोले- डीएनए लगातार हैरेसमेंट का शिकार होता रहा है

: काटजू की अदा, बातें कम और फैसले ज्यादा : डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के मामले में लगातार उत्पीड़ित करने वाले अधिकारियों के बारे में ताजा ऐप्लिकेशन मांगी : लखनऊ। न्यायमूर्ति मार्कंडेय काटजू को विवादों में रहना शायद पसंद है। वे किसी भी मुद्दे पर खुलकर बोलते हैं, अपनी स्थापनाओं के साथ। यह तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने जब से प्रेस परिषद के अध्यक्ष का काम संभाला है, परिषद में सक्रियता आयी है लेकिन प्रेस की या प्रेस के खिलाफ शिकायतें सुनते समय वे पूरे अरिस्टोक्रेट के अंदाज में रहते हैं। ज्यादा सुनना नहीं चाहते, फैसला सुनाने की जल्दी में रहते हैं, बिल्कुल अपने अदालती अंदाज में। खुद को बार-बार उद्धृत करने में भी शायद उन्हें आनंद मिलता है। लेकिन कई बार वे काम की चीजें होती हैं। जाहिर है, एक न्यायाधीश के रूप में  उन्होंने बहुत सारे फैसले दिये होंगे और उनमें लोकहित के तत्व जरूर होंगे।

सोमवार को प्रेस कौंसिल ने प्रेस, अखबारों और प्रशासन या पुलिस से संबंधित तीन दर्जन से ज्यादा मामलों की सुनवाई की। वैसे तो कौंसिल को बहुत अधिकार नहीं हैं लेकिन उसके निर्देशों की नैतिक मान्यता होती है, इस नाते बहुत सारे ऐसे लोग जो प्रेस से पीड़ित होते हैं या जिनसे प्रेस पीड़ित होता है, अपनी शिकायतें प्रेस कौंसिल तक पहुंचाते हैं। लेकिन ज्यादातर शिकायतें यूं ही कर दी जाती हैं। जहां सामान्य तौर पर कानून मदद कर सकता है, वहाँ भी कानूनों की जानकारी के अभाव में लोग प्रेस कौंसिल चले जाते हैं। काटजू ने ऐसे कई मामलों में शिकायतकर्ताओं को नयी जानकारियाँ दीं। कइयों को अपने ही फैसलों से मिल सकने वाले कानूनी फायदों केप्रति सचेत भी किया। सुनवाई केदौरान उन्होंने बार-बार अपने को कोट किया। लगा कि अभी भी उनका न्यायाधीश पूरी शिद्दत से उनके भीतर सक्रिय है।

मामलों को निबटाने में काटजू साहब बहुत देर नहीं लगा रहे थे। बहुत फास्ट। पर दो बहुत महत्वपूर्ण मामले सोमवार की सुनवाई के दौरान कौंसिल के सामने थे। एक डेली न्यूज ऐक्टिविस्ट के खिलाफ उत्तर प्रदेश अल्पसंख्यक वित्त एवं विकास निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक रहे विमल चंद श्रीवास्तव की शिकायत और दूसरी दिल्ली के एक अंग्रेजी अखबार के खिलाफ महिला आयोग की शिकायत। डीएनए के खिलाफ शिकायत करने वाले सज्जन अनुपस्थित थे। आनन-फानन में काटजू साहब ने कहा कि जब शिकायत करने वाले को ही चिंता नहीं है तो मामला खारिज करते हैं। पर डीएनए की ओर से इसका शालीन प्रतिवाद करते हुए जब कहा गया कि यह कोई मामूली शिकायत नहीं है, जब आप ने बुलाया है तो बात तो सुनिये, तो वे थोड़ा ठहरे। डीएनए की ओर से कहा गया कि ठीक है, आप को मामला खारिज करना है तो कर दीजिये लेकिन असली बात समझ लीजिए। डीएनए को लगातार चार वर्षों से बसपा सरकार द्वारा सताया जा रहा था, इसका पंजीकरण तक नहीं होने दिया गया, नियमानुसार घोषणापत्र दाखिल किये जाने के बाद भी आथेंटिकेशन में जानबूझकर बाधाएं डाली गयीं। यहां तक कि हाई कोर्ट और प्रेस ऐंड रजिस्ट्रेशन अपीलेट बोर्ड के निर्देशों को भी ताक पर रख दिया गया। हर कोशिश की गयी कि अखबार को बंद करा दिया जाये। वे सफल हो जाते तो सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर आ जाते।

कहना न होगा कि मामला खारिज करने जा रहे काटजू साहब ने ध्यान से सारी बातें सुनी, फिर कहा, भाई उस सरकार को तो जनता ने दंडित कर दिया है, अब आप को नयी सरकार से कोई शिकायत तो नहीं है। उन्हें बताया गया कि सरकार के जाने से प्रश्न खत्म नहीं हो जाता, क्योंकि प्रेस कौंसिल को उन अफसरों के खिलाफ क्यों नहीं कार्रवाई करनी चाहिए, जिन्होंने अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर सारे नियम-कानून तोड़े, उनका उल्लंघन किया और मनमानी की। जस्टिस काटजू ने कहा कि उनके खिलाफ फ्रेश ऐप्लिकेशन भिजवाइये, देखा जायेगा। लेकिन इस बातचीत का असर यह हुआ कि उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए इस मामले में एक अदभुत आदेश किया, जिसमें यह लिखा गया कि डीएनए लगातार हैरेसमेंट का शिकार होता रहा है। विस्तृत आदेश बाद में उपलब्ध हो पायेगा।

दूसरा खास मामला एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित एक तस्वीर को लेकर था। महिला आयोग की तरफ से शिकायत की गयी थी कि तस्वीर अश्लील है, इसे प्रकाशित करके अखबार ने ठीक नहीं किया है। इस पर काटजू थोड़े दार्शनिक अंदाज में आ गये। श्लीलता और अश्लीलता की सीमा रेखा बहुत स्पष्ट नहीं होती। कई कलाकृतियाँ अश्लीलता की सीमा को लांघते हुए भी अश्लील नहीं मानी जातीं। इस पर फैसला करना कठिन था फिर भी काटजू ने अपनी भाषा में एक आदेश दर्ज कराया।

न्यायमूर्ति काटजू के प्रेस परिषद में काम संभालने केबाद परिषद की सक्रियता तो बढ़ी ही है, उनके असाधारण और विवादास्पद बयानों केकारण भी परिषद और उसके अध्यक्ष लगातार चर्चाओं में बने हुए हैं। उनकी कुछ बातें सटीक भी लगती हैं, लेकिन लगता है कभी-कभी वे चर्चा में बने रहने केलिए कुछ विवाद भी  पैदा करने में यकीन रखते हैं। हाल में अखिलेश यादव को लेकर कुछ चैनल्स पर की जा रही टिप्पणियों के बारे में उनके बयान का स्वागत होना चाहिए। काटजू ने कहा कि युवा हैं, बाहर से पढ़े-लिखे हैं, अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें कुछ समय तो दीजिये। एक-दो साल बाद उनके काम का मूल्यांकन कीजिए। अभी क्यों चिल्ला रहे हैं कि गुंडाराज वापस आ गया है। इस तरह अखिलेश का मनोबल न घटाइये।

माना जाता है कि काटजू मीडिया के सख्त आलोचक हैं। वे अन्ना के बारे में अपनी धारणा बताते हुए कहते हैं कि मीडिया तो मुझे राक्षस समझता है, इसलिए मैं अन्ना के बारेमें कुछ कहने से बचता रहा हूं। इसमें कोई शक नहीं कि अन्ना इमानदार हैं पर भ्रष्टाचार मिटाने का कोई वैज्ञानिक सोच उनके पास नहीं है। खाली इंकलाब जिंदाबाद और भारत माता की जय के नारे लगाने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। भीड़ से क्या मतलब, लोग भ्रष्टाचार से नाराज हैं, जुट जाते हैं, फिर घर लौटकर पहले जैसे हो जाते हैं। अन्ना का अल्कोहलिज्म पर नजरिया भी बड़ा बेकार है। शराब छुड़ानी है तो शराबी को पेड़ में बांधकर पीटो। अरे भाई, गरीब आदमी देसी दारू इसलिए पीता है कि वह कुछ देर अपनी तकलीफें भूले रहता है। शराब कम हो, इसके लिए उनका रहन-सहन का स्तर ऊपर उठाइये, पीटने से क्या होगा। मीडिया को लेकर उनकी बहुत अच्छी राय नहीं है लेकिन एलेक्ट्रानिक मीडिया को लेकर। भाषायी मीडिया से वह बहुत परिचित नहीं हैं। वे कहते हैं कि मीडिया तो 90 प्रतिशत समय मनोरंजन, सचिन के महाशतक और द्रविड़ के संन्यास जैसी बिना बात की बात पर खर्च करता है, इस देश में बेरोजगारी है, कुपोषण है, गरीबी है, उनके लिए मीडिया के पास समय नहीं है।

डेली न्यूज एक्टिविस्ट उर्फ डीएनए के एडिटर इन चीफ सुभाष राय की रिपोर्ट.

 

 
 

 

दिल्ली की वरिष्ठ महिला पत्रकारों के साथ महाराष्ट्र में हुआ दुर्व्यवहार

: महाराष्‍ट्र की संत्रास यात्रा की कहानी, वरिष्ठ पत्रकार इरा झा की जुबानी : यह सम्मान था या संत्रास ? महाराष्‍ट्र सरकार प्रायोजित पुणे से मुंबई तक दस दिनों की बेतरतीब यात्रा से लौटे महिला पत्रकारों के जत्थे को तो यही अहसास हुआ है. दिल्ली की महिला पत्रकारों को महाराष्‍ट्र सरकार की नजरों में अपनी असल औकात का अहसास लंबी, थकाऊ और अनियोजित यात्रा के बाद मुंबई स्टेशन पहुंचने पर हुआ. वहां पता लगा कि पांच करोड़ लोगों की सरकार अपने करीब दर्जन भर मेहमानों का ट्रेन रिजर्वेशन ही कंफर्म नहीं करा पाई जबकि दिल्ली में रेल भवन में पत्रकारों के टिकट यूं भी कंफर्म हो जाते हैं. इंतिहा सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कांबडे का दुर्व्‍यवहार रहा.

तभी हम लोग यह समझे कि महाराष्‍ट्र दोयम क्यों रह गया.  ऐसी भीषण अपमानजनक, अव्यवस्थित सरकार प्रायोजित यात्रा इस पत्रकार को अपने तीस वर्षीय करियर में कभी नहीं झेलनी पडी. शायद महाराष्‍ट्र में मीडिया की यात्रा का कोई प्रोटोकोल नहीं है.

सर मुंडाते ओले पड़े : महाराष्‍ट्र के प्रमुख नेताओं-शरद पवार, सुशील कुमार शिंदे, नारायण राणे, और महाराष्‍ट्र के संस्थापक वाई बी चव्हाण के जिलों की राज्य सरकार प्रायोजित यात्रा पर राजधानी दिल्ली की नौ महिला पत्रकारों का जत्था 16 मार्च की सुबह 22 घंटे लंबी ट्रेन यात्रा करके पुणे पहुंचा. वहां महिला पत्रकारों का ड्राइवरों के कमरे में ठहराने का इंतजाम था. काले तकिए, चीकट चादरें और बोसीदा गुसलखाने. जाहिर है कि पत्रकारों की थकान मिटना तो दूर नींद उड़ गई. इसका विरोध करने पर जवाब मिला-आपकी एक्सपेक्टेशंस बहुत ज्यादा हैं, मानों खैरात दे रहे हों. इस नाचीज ने वरिष्ठतम और अनुभवी होने के नाते इस पर एतराज किया तो हर जगह अलग से कमरा देकर खुश करने की कोशिश की गई. मना करने और सब को एक सी सुविधा देने की मांग करने पर दल में ही फूट डालने के बीज बो दिए गए. यह तो सिर्फ बानगी है.
 
न खुदा ही मिला न विसाले सनम : दिल्ली से ले जाते समय यह सब्जबाग दिखाए गए कि बारामती में शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले और मुंबई में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा खुद राजधानी की महिला पत्रकारों से बात करना तय है. दिल्ली में महाराष्‍ट्र सरकार की मीडिया कोऑर्डिनेटर अमर ज्योति अरोरा ने तय कार्यक्रम के बावजूद न सुले से मिलवाया और न ही मुख्यमंत्री से. मुंबई में जबरन अतिरिक्त एक दिन रोकने के बावजूद मुख्यमंत्री को हमसे मुखातिब नहीं किया गया. बहाना- सुप्रिया संसद के सत्र में और मुख्यमंत्री विधान सभा में व्यस्त हैं. कम से कम संसद और विधान सभा सत्र से तो ज्‍योति बखूबी वाकिफ रही होंगी. आखिर वह पिछले दस साल से दिल्ली में महाराष्‍ट्र सूचना केंद्र में काबिज हैं. फिर शायद इस बात की घबराहट भी होगी कि कहीं पत्रकार बदइंतजामी की पोल मुख्यमंत्री से न खोल दें.

बारामती में तो शरद पवार खुद मौजूद थे, मगर सूचना विभाग ने हमें उनसे नहीं मिलवाया. फिर शरद पवार के भतीजे अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा से मुलाकात का कार्यक्रम बना और टांय-टांय फिस्स हो गया. शायद सूचना विभाग यहीं से बिना तैयारी के हम पत्रकारों को घर की मुर्गी दाल बराबर समझ कर साथ ले गया था. अनाथों को सहारा देने वाली सिंधु ताई सपकाल से मिलाने जब उनके गांव सासवण पहुंचे तो पता चला कि वह हैं नहीं और उनकी बेटी ममता पुणे में हमारा इंतजार कर रहीं हैं, क्योंकि वहीं पर मुलाकात तय थी. लिहाजा बच्चों से तो मिले मगर उनकी सरपरस्त का संघर्ष जानने से वंचित रह गए. पुणे में महिला सहकार की आदर्श परियोजना लिज्जत पापड़ गृह उद्योग का दौरा यहीं से प्रस्तावित था. वहां पहुंच कर हम लोगों को महाराष्‍ट्र की आदिवासी औरतों की कामयाबी की उस गाथा से भी वंचित कर दिया गया. पूछने पर मिली टालमटोल.

मराठा गौरव पूर्व उप्रपधानमंत्री और महाराष्‍ट्र के पहले मुख्यमंत्री यशवंत राव बलवंत राव चव्हाण की समाधि पर दोपहर के बजाय रात के अंधेरे में ले जाया गया. उस समय उनके बारे में न तो कराड़ के लोगों से कोई बात हो पाई और न ही वहां मौजूद देश की दो प्रमुख नदियों कृष्णा और कोयना का संगम हम लोग देख पाए. रात के घुप अंधेरे में कराड़ की मलकापुर नगर पंचायत में जलापूर्ति परियोजना दिखाई गई. बद्इंतजामी आधी रात के बाद कोल्हापुर पहुंचे और आशियाने की तलाश में ही घंटा भर भटकते रहे. सूचना विभाग के पांच-पांच अधिकारियों के पास किसी का स्थानीय फोन नंबर भी नहीं था. पूछते-गछते सर्किट हाउस पहुंचे तो 42 डिग्री गर्मी और नींद से बेहाल पत्रकारों को समुचित ठंडक वाले कमरे भी नहीं दिए गए. बताया गया कि सारे कमरे वैसे ही हैं. फिर वही एतराज और कहा-सुनी का दौर चला तो दौड़धूप हुई और और तड़के ढाई बजे जाकर सबको ठंडक वाले कमरे मिल पाए. क्या मेहमाननवाजी है?

संत्रास की इंतिहा तो सिंधुदुर्ग में हुई. वहां के पहाड़ी घुमावदार रास्ते से चक्कर खाती, उलटी करती, महिला पत्रकारों को रात के साढ़े ग्यारह बजे कहीं आरामदेह जगह ठहराने के बजाए नारायण राणे के महिला विकास केंद्र पर ले जाकर पटक दिया गया. फिर एतराज और पस्त हालत की दुहाई दी गई तो आधी रात के बाद राणे के होटल में ही शरण दिलाई गई. ऐसा लगा मानो जान बची और लाखों पाए. गनीमत हम तो अगले दिन की ट्रेन से एसी थ्री टायर में आठ टिकटों पर दर्जन भर लोग लदकर दिल्ली लौट आए हैं पर भाऊ लोगों आप ये रिस्क मत लेना. महाराष्‍ट्र सरकार का न्यौता आपको कहीं हमसे भी भारी न पड़ जाए.

लेखिका इरा झा वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.

 

 
 

 

यूपी में सौ से ज्यादा आईपीएस अफसर बदले, ये है लिस्ट

उत्तर प्रदेश सरकार ने सोमवार मध्यरात्रि के बाद पुलिस प्रशासन में बडा़ फेरबदल करते हुए भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के 112 अधिकारियों का तबादला कर दिया। पुलिस महानिदेशक पीएसी देवराज नागर को वर्तमान पद के साथ-साथ उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पुलिस महानिदेशक (मानवाधिकार) आयोग बीएम सारस्वत को पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण मुख्यालय नियुक्त किया गया है।

अरुण कुमार गुप्ता पुलिस महानिदेशक एसीओ उत्तर प्रदेश लखनऊ एवं महानिदेशक-चेयरमैन पुलिस आवास निगम लिमिटेड को वर्तमान पद के साथ पुलिस आवास निगम के प्रबंध निदेशक का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पुलिस महानिदेशक तकनीकी सेवाएं सुब्रत त्रिपाठी को पुलिस महानिदेशक कार्यालय से सम्बद्ध किया गया है।

एएल बनर्जी को अपर पुलिस महानिदेशक प्रशिक्षण मुख्यालय लखनऊ एवं अपर पुलिस महानिदेशक एसआईटी लखनऊ को अतिरिक्त कार्यभार के अलावा अपर पुलिस महानिदेशक आर्थिक अपराध संगठन शाखा लखनऊ के साथ, अपर पुलिस महानिदेशक भ्रष्टाचार निवारण संगठन के पद का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद में तैनात सुलखान सिंह को अपर पुलिस महानिदेशक पीटीएस उन्नाव भेजा गया है।

सतर्कता अधिष्ठान मुख्यालय पर तैनात अपर पुलिस महानिदेशक विपिन कुमार को पावर कारपोरेशन में अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर भेजा गया है जबकि विजय कुमार गुप्ता अपर पुलिस महानिदेशक कारागार की अपर पुलिस महानिदेशक मानवाधिकारी आयोग के पद पर तैनाती की गई है। अपर पुलिस महानिदेशक यातायात के पद पर तैनात सूर्य कुमार को इसी पद पर उ.प्र. पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद भेजा गया है जबकि ईओ डब्ल्यू विभाग में तैनात अपर पुलिस महानिदेशक आर.एन.सिंह को निदेशक अभियोजन नियुक्त किया गया है। अपर पुलिस महानिदेशक फायर सर्विस के.एल.मीना को अपर पुलिस महानिदेशक कारागार बनाया गया है।

अपर पुलिस महानिदेशक सुरक्षा रजनी कांत मिश्रा को वर्तमान पद के साथ अपर पुलिस महानिदेशक ,अग्निशमन सेवा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पीएसी मध्य जोन के पुलिस महानिरीक्षक मो. जावेद अख्तर को गोरखपुर जोन का पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है जबकि एसटीएफ के पुलिस महानिरीक्षक देवेन्द्र सिंह चौहान को बरेली जोन का पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है। सतर्कता अधिष्ठान मुख्यालय पर तैनात अपर पुलिस महानिदेशक विपिन कुमार को पावर कारपोरेशन में अपर पुलिस महानिदेशक के पद पर भेजा गया है जबकि विजय कुमार गुप्ता अपर पुलिस महानिदेशक कारागार की अपर पुलिस महानिदेशक मानवाधिकारी आयोग के पद पर तैनाती की गई है।

अपर पुलिस महानिदेशक यातायात के पद पर तैनात सूर्य कुमार को इसी पद पर उ.प्र. पुलिस मुख्यालय इलाहाबाद भेजा गया है जबकि ईओ डब्ल्यू विभाग में तैनात अपर पुलिस महानिदेशक आर.एन.सिंह को निदेशक अभियोजन नियुक्त किया गया है। अपर पुलिस महानिदेशक फायर सर्विस के.एल.मीना को अपर पुलिस महानिदेशक कारागार बनाया गया है।

अपर पुलिस महानिदेशक सुरक्षा रजनी कांत मिश्रा को वर्तमान पद के साथ अपर पुलिस महानिदेशक , अग्निशमन सेवा का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है। पीएसी मध्य जोन के पुलिस महानिरीक्षक मो. जावेद अख्तर को गोरखपुर जोन का पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है जबकि एसटीएफ के पुलिस महानिरीक्षक देवेन्द्र सिंह चौहान को बरेली जोन का पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है।

देवीपाटन परिक्षेत्र गोंडा में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक एस.के. माथुर को इसी पद पर सहारनपुर परिक्षेत्र भेजा गया है जबकि अभिसूचना मुख्यालय लखनऊ में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक पी.के.श्रीवास्तव को चित्रकूट धाम परिक्षेत्र भेजा गया है। गोरखपुर में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मुकेश शुक्ला को मिर्जापुर परिक्षेत्र का पुलिस उपमहानिरीक्षक बनाया गया है जबकि सहारनपुर परिक्षेत्र में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक जय नारायण सिंह को डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध किया गया है।

मेरठ में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक एवं वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिराम शर्मा को डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध किया गया है जबकि इलाहाबाद में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रकाश डी को अलीगढ़ परिक्षेत्र का पुलिस उपमहानिरीक्षक बनाया गया है। पीएसी बरेली सेक्टर में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक एल.वी.एंटनी देवकुमार को बरेली परिक्षेत्र का पुलिस महानिरीक्षक बनाया गया है।

आजमगढ़ परिक्षेत्र में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक रवि कुमार लोक्कू को इसी पद पर इलाहाबाद परिक्षेत्र भेजा गया है जबकि चित्रकूट परिक्षेत्र बांदा में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक मूथा अशोक जैन को इसी पद पर गोरखपुर भेजा गया है। डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध भानु भाष्कर को फैजाबाद परिक्षेत्र का उपमहानिरीक्षक बनाया गया है।

सतर्कता अधिष्ठान लखनऊ में तैनात पुलिस उपमहानिरीक्षक -पुलिस अधीक्षक डां0 एन.रवीन्द्र को झांसी परिक्षेत्र का पुलिस उपमहानिरीक्षक बनाया गया है जबकि झांसी परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक अनिल कुमार को पुलिस महानिरीक्षक डीजीपी कार्यालय सम्बद्ध किया गया है। ए.सतीश गणेश, झांसी के पुलिस उपमहानिरीक्षक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं 33वीं वाहिनीं पीएसी झांसी के अतिरिक्त प्रभार को वाराणसी क्षेत्र का पुलिस उपमहानिरीक्षक बनाया गया है जबकि अलीगढ़ परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक बी.पी.तित्राठी को देवीपाटन परिक्षेत्र भेजा गया है।

वाराणसी के पुलिस उपमहानिरीक्षक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रामकुमार को आजमगढ़ परिक्षेत्र भेजा गया है जबकि बस्ती परिक्षेत्र के पुलिस उपमहानिरीक्षक प्रमोद कुमार मिश्रा को डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध किया गया है।

डां0 बी आर अम्बेडकर पुलिस अकादमी मुरादाबाद में तैनात पुलिस अधीक्षक सुनील कुमार गुप्ता को मुरादाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि 32वीं वाहिनी पीएसी लखनऊ में तैनात सेनानायक नवीन अरोरा को इलाहाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। सोनभद्र के पुलिस अधीक्षक मोहित अग्रवाल की तैनाती कुम्भ मेला इलाहाबाद पुलिस अधीक्षक के रुप में की गई है। 35वीं वाहिनीं पीएसी लखनऊ में तैनात सेनानायक टीसी मिश्रा को सहारनपुर का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक रमित शर्मा को फैजाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। सीतापुर के पुलिस अधीक्षक की तैनाती अलीगढ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के रुप में की गई है जबकि मिर्जापुर के पुलिस अधीक्षक के.सत्यनारायण को मेरठ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है।

प्रशिक्षण एवं सुरक्षा लखनऊ में तैनात पुलिस अधीक्षक डा.संजीव गुप्ता को बरेली का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि 47वीं वाहिनी पीएसी गाजियाबाद में तैनात सेनानायक एम डी कर्णधार को बस्ती का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि सीबीसीआईडी मुख्यालय पर तैनात पुलिस अधीक्षक प्रकाश त्रिपाठी को बांदा भेजा गया।

उन्नाव में तैनात पुलिस अधीक्षक प्रशान्त कुमार द्वितीय को वाराणसी का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि 30वीं वाहिनीं पीएसी गोंडा में तैनात सेनानायक जितेन्द्र प्रताप सिंह को पीलीभीत का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। बदायूं के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नवनीत कुमार राणा को जालौन भेजा गया है जबकि 44वीं वाहिनी पीएसी मेरठ में तैनात सेनानायक रामशंकर को बहराईच का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है।

सिद्धार्थनगर के पुलिस अधीक्षक डी.के.राय को बाराबंकी भेजा गया है जबकि 28वीं वाहिनीं पीएसी इटावा में तैनात सेनानायक शैलेन्द्र पति त्रिपाठी को झांसी का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बनाया गया है। ईओडब्ल्यू वाराणसी में तैनात पुलिस अधीक्षक गुलाब सिंह को बुलंदशहर का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि रायबरेली के पुलिस अधीक्षक लक्ष्मीनारायण को डीजीपी कार्यालय से सम्बद्ध किया गया है।

एटा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक राकेश प्रधान को रमाबाईनगर का पुलिस अधीक्षक बनाया गया है जबकि 20वीं वाहिनी पीएसी आजमगढ़ में तैनात सेनानायक सुरेश चन्द्र पाण्डेय को मिर्जापुर का पुलिस अधीक्षक तैनात किया गया है। लखनऊ से पुलिस अधीक्षक (एसीओ) अरुण कुमार सिंह को ललितपुर भेजा गया है जबकि ईओडब्लू लखनऊ में तैनात पुलिस अधीक्षक मदन गोपाल सिंह को इसी पद पर सिद्धार्थनगर भेजा गया है।

 

 
 

 

इंडिया प्राइम को मिला मीडिया एक्‍सीलेंसी अवार्ड

राजस्थान जयपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र इंडिया प्राइम को दिल्ली में मीडिया फडरेशन आँफ इंडिया की ओर से 6ठा मीडिया एक्‍सीलेंसी अवार्ड प्रदान किया गया. ये आवार्ड बेस्ट स्माल न्यूज पेपर की श्रेणी में हिन्दी भाषी क्षेत्र में अखबार के उल्लेखनीय कार्यो के चलते प्रदान किया गया है. इंडिया प्राइम की ओर से उनके सम्पादकीय प्रतिनिधि और राजस्थान के जाने माने टीवी पत्रकार देवेद्र सिंह ने अवार्ड प्राप्त किया.

मीडिया फडरेशन आँफ इंडिया की से दिल्ली के फिक्की आँडिटोरियम में रविवार शाम को आयोजित समारोह में 38 कैटेगिरी में एनडीटीवी, सहारा, जी न्यूज और कई चैनलों के पत्रकारों को उल्लेखनीय योगदान के लिए पुरस्‍कार प्रदान किए गए. पिछले साल पद्रह अगस्त को जयपुर से शुरु इंडिया प्राइम इस समय देश के हिन्दी भाषी राज्यों में एलिट क्लास में जाना माना नाम है. पिछले कुछ महीनों के दौरान इंडिया प्राइम ने अकेले राजस्थान में ही अपने सर्कुलेशन में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है. राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार और यूपी में एक दर्जन शहरों में प्रतिनिधि जुडे हैं. इनमें ज्यादातर टीवी और प्रिंट के जाने माने नाम जुडे हैं. समारोह में मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व जनसम्पर्क मंत्री माधवेंद्र सिंह समेत कई जाने माने पत्रकार आनंद पाल तोमर और प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे. प्रेस रिलीज

 

 
 

 

‘बुक्‍स ओ सांसद’ का आयोजन 28 मार्च को, परिचर्चा में जुटेंगे दिग्‍गज पत्रकार व सांसद

पिछले कुछ समय में सांसदों के प्रति आम जनमानस में नकारात्मक भाव पैदा हुआ है। राजनीति और राजनेताओं को एक ही डंडे से हांकने की कवायद में संसद का बौद्धिक और रचनात्मक पक्ष पीछे छूट रहा है। ऐसे वातावरण में 'बुक्स ओ सांसद' कार्यक्रम के माध्यम से जनप्रतिनिधियों के सकारात्मक पक्ष को देश-दुनिया के सामने लाने की पहल की जा रही है। भारत की संसद (राज्य सभा/लोक सभा) में मौजूद विभिन्न संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित, मनोनीत संसद सदस्य केवल राजनीति के जानकार भर नहीं हैं। राजनीति से इतर सामाजिक जीवन के अन्य  दूसरी विधाओं में भी सांसदों की दखल है।

एक ऐसी ही विधा का नाम है पुस्तक लेखन और इस विधा में वर्तमान संसद में मौजूद 15 फीसदी भारतीय सांसदों की न केवल दिलचस्पी है बल्कि उन्होंने विविध विषयों पर किताबें लिखी भी हैं। धर्म, अध्यात्म, विज्ञान, इतिहास, दर्शन, साहित्य, कथा, कविता, अनुभव, यात्रा वृतांत, राजनीति, अर्थनीति जैसे दर्जनों विषयों पर केन्द्रित सांसदों के पुस्तकों की सामूहिक, सार्वजनिक  प्रदर्शनी के सकारात्मक प्रयास का नाम है बुक्स ओ संसद। दृष्टि क्रिएटिव के आयोजन बुक्स ओ सांसद का मकसद भारतीय संसद/सांसद के एक सराहनीय सार्थक और सकारात्मक पक्षों  को सार्वजनिक करना साथ ही संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए विषय आधारित संवाद, बहस करना है।

इसी कड़ी में पिछली बार की तरह इस बार लेकिन बड़े स्तर पर आगामी २८ मार्च को दिल्ली स्थित तालकटोरा इनडोर स्टेडियम में 'बुक्स ओ संसद' का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान Janokti.com द्वारा 'मीडिया और संसद : जबाबदेही व अपेक्षाएं' विषय पर सार्थक परिचर्चा भी रखी गयी है। परिचर्चा में देश के जाने-माने पत्रकार अरविन्द मोहन, एनके सिंह, राजीव मिश्र (लोकसभा टीवी), अरविन्द कुमार सिंह (राज्यसभा टेलीविजन) और संसद का प्रतिनिधित्व कर रहे विभिन्न दलों के अनुभवी सांसद व पूर्व सांसदों में रशीद अल्वी, केसी त्यागी, शिवानंद तिवारी, हुकुमदेव नारायण यादव, अनु टंडन समेत कई दिग्गज राजनेता भाग लेंगे।

इंडिया बुक रिकार्ड के लिए इस वर्ष नामित 'बुक्स ओ संसद' में तक़रीबन आधे दर्जन से अधिक केन्द्रीय मंत्री और सौ से अधिक सांसदों की उपस्थिति रहेगी। बुक्स ओ संसद के दौरान  दिल्ली के संगीत प्रेमियों के लिए पद्म श्री उदित नारायण के लाइव शो का भी आयोजन किया गया है। 'बुक्स ओ संसद' की कल्पना और उसकी जबाबदेही दृष्टि के कुंदन कुमार झा, जनोक्ति के जयराम विप्लव, अमिताभ भूषण और विशाल तिवारी, वंदन सिंह, अनित सिंह, भवेश नंदन झा, के. अरविन्द, संतोष कुमार, अनिमेष आनंद, सोनू मिश्रा आदि समूह सदस्यों के जिम्मे है।

 

 
 

 

Spinelessness of media, iron-handedness of Nitish govt, questioned once again

Patna : Noted social activists and journalists have decried the role of media in general and during the three-day Bihar Diwas celebrations in particular. They questioned as to how the media can ignore some very important news at the cost of the government-sponsored function, in which such a huge amount of money was spent.

Taking part in a discussion on “Changing Relationship Between Media and Power” organized by the Bihar Press Freedom Movement at Patna Book Fair on Saturday evening noted journalist and BBC’s Bihar correspondent, Manikant Thakur, asked as to why is media silent on the Income Tax raids on the business and residential premises of a very close aide of chief minister Nitish Kumar. While the same media would highlight the opening of school in the house of confiscated property of any officer why nobody is today questioning from where had Vinay Kumar Sinha amassed Rs 4.5 crore and purchased 51 flats.

Sinha has been the treasurer of the Samata Party and Janata Dal (United) for the last 16 years and Nitish Kumar, before becoming the chief minister of Bihar, used to stay at one of his house which too was raided on March 21-22.

Manikant wondered as to what had happened to media houses in Bihar. They are busy highlighting the Bihar Diwas festival and totally ignoring the other issues and hardship related to the common men and women.

Pointing towards the state-sponsored extravaganza he said he is not justifying what had happened in the past, but he is just asking what would have been the media’s response if the same thing would have happened seven years back.

Speaking on the occasion, Nirala, of Tehelka (Hindi) asked as to why the media has not given coverage to the farmers of Nabinagar who have been sitting on dharna for the last 22 days on the spot where power plant is to come up at Nabinagar in Aurangabad district. Among other things they are demanding suitable compensation for the land acquired for the plant. He regretted that the media had seriously let down the society.

Anil Prakash, social activist and one-time close associate of Nitish Kumar lamented as to how a man who had gone to jail during Emergency and received lathi blows in 1983 while opposing the Press Bill had now imposed an undeclared censorship. Anil Prakash said he had been conveying this question to chief minister through friends but Nitish is not paying any heed. He narrated how a senior Editor “personally approached me with a request to convey to Nitish Kumar that in the long run such Press censorship would prove counterproductive and he would not be able to know the shortcomings of his own government.”

He said how maize crop in two lakh acres were destroyed a couple of years back due to seed-testing, yet the media ignored the news. He personally asked the mediapersons to visit the site of the dam on river Bagmati and see the havoc caused by it. More than 75 per cent of cattle have perished.

The Janata Dal (United) Rajya Sabha MP, Ali Anwar, arrived at the function, while Anil Prakash was speaking. The social activist greeted his old friend from the world of journalism. But sensing that he had landed in some strange place, Ali Anwar, soon left the venue.

Another activist Ashok Yadav said as to how the media, both print and electronic, covered the news of the Kosi flood of 2008. The shots would show rising water of the river and the cattle swept away by the water but hardly any mention was made about the number of people who died. He said Nobel Laureate Amartya Sen argues that there would be no starvation death in democracy because the media is free. But what is happening in the Kosi belt in democratic Bihar. Where is the media when people are starving, he asked.

Noted Hindi writer Alok Dhanwa, who was presiding over the discussion, said that he had always been stating that those who get overwhelming majority had the tendency to become autocrat and tyrant. He said those working in the media are youngsters of the same society, yet they are helpless and become victim of the onslaught of the global capitalism, which is playing havoc with the people of India.

Incidentally, the role of media came under scrutiny one way or the other in at least three discussions held in Patna Book Fair. While on the occasion of the release of Ashutosh’s (of IBN-7) book on Anna Hazare on March 18 the role of media was highlighted by the author and Editor-in-chief of Hindustan, Shashi Shekar, yet questions were raised by the people over the role the same media is playing in Bihar. The speakers appeared to be on the backfoot on this count.

On March 22, while taking part in the function organized by Sunita Tripathi of monthly Gaon Samaj, all the speakers came down heavily on the Press censorship in the media. Apart from Alok Dhanwa and Anil Prakash senior journalist, Anand S T Das of Asian Age, also spoke on that occasion.

On the same day the All India Students’ Association organized a seminar on the role of media in IMA Hall. Apart from others Dipankar Bhattacharya, the CPI ML general secretary, and Ajay Kumar of BiharTimes spoke on the occasion.

On March 24 discussion in Book Fair once again the role of media and the autocratic way of the government have been questioned. This programme was conducted by Hindi scribe and reporter of Tehelka magazine, Irshad-ul-Haque. Courtesy : Bihar Times

 

 
 

 

महुआ न्‍यूज के कर्मचारियों को मिला इंक्रीमेंट का तोहफा

महुआ ग्रुप के अलसाए माहौल में एक खबर ताजा हवा के झोंके की तरह आई है. अर्से बाद कर्मचारियों में उत्‍साह का संचार हुआ है. कंपनी ने लांचिंग के समय से जुड़े तथा एक औसत से नीचे वेतन पाने वालों की सेलरी में इंक्रीमेंट किया है. सूत्रों का कहना है कि ग्रुप हेड राणा यशवंत के प्रसास की बदौलत दस हजार के आसपास सेलरी पाने वाले सभी कर्मचारियों को इंक्रीमेंट का तोहफा मिला है. अब उनकी सेलरी थोड़ी सम्‍मानजनक हो गई है.

उल्‍लेखनीय है कि चैनल की लांचिंग के समय ही काफी लोग आठ से दस हजार रुपये या इससे थोड़ी ऊपर नीचे के वेतन पर रखे गए थे. इस दौरान कई बदलाव हुए. महुआ में कई आंधियां आईं, कई राजा धराशाई हुए कई वजीर राजा बने परन्‍तु रूट लेबल पर काम करने वाले इन कर्मचारियों की तरफ किसी का ध्‍यान नहीं गया. ये पिछले तीन से चार साल से एक ही वेतन पर काम कर रहे थे. फील्‍ड की अनिश्चितता और मौकों के अभाव के चलते ये लोग चाहकर भी महुआ से रहने का नशा नहीं छोड़ पा रहे थे. प्रबंधन को गरियाते-अपने को तसल्‍ली देते काम करते चले जा रहे थे.

देर से ही सही पर ग्रुप हेड के प्रयास से इन लोगों के चेहरे पर लम्बे अर्से बाद मुस्‍कान की लकीरें देखने को मिली हैं. बताया जा रहा है कि ज्‍यादातर लोगों की सेलरी में तीन से पांच हजार तक का इंक्रीमेंट दिया गया है. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि अगर सब कुछ सही रहा तो अन्‍य लोगों को भी इंक्रीमेंट का तोहफा मिल सकता है. खैर, इंक्रीमेंट का असर काम पर भी देखने को मिल रहा है. कर्मचारियों में उत्‍साह है. उनके निराश हो चुके मन में आशा का संचार हुआ है. वहां काम करने वाले एक पत्रकार ने बताया कि राणा यशवंत के प्रयास से ही हमलोगों की गरीबी थोड़ी दूर हुई है, अन्‍यथा हमलोगों ने तो उम्‍मीदें ही छोड़ दी थी.

हालांकि अभी वरिष्‍ठ लेबल पर इंक्रीमेंट नहीं हुआ है. गौरतलब है कि महुआ ग्रुप पिछले कुछ समय में काफी उठा-पटक के दौर से गुजरा है. अच्‍छा खासा चल रहा चैनल प्रबंधन की अपनी ही राजनीति का शिकार हो गया. राजाओं को आए दिन मोहरों की तरह फेंटने के चलते यहां का माहौल खराब हो गया था, परन्‍तु आजतक जैसे चैनल से राणा यशवंत के जुड़ने के बाद इसमें थोड़ी सुधार देखने को मिलने लगा. कई अन्‍य वरिष्‍ठ तथा जाने-माने पत्रकार भी महुआ से जुड़े, जिससे इस चैनल का प्रजेंटेशन भी ठीक हुआ है. पर कहा जा रहा है कि इसकी स्थिति तभी तक ठीक होगी जब‍तक पीके तिवारी एंड कंपनी की राजनीति बंद रहेगी.

 

 
 

 

गाजीपुर से भेजी गई खबर में गाली नहीं थी, बनारस में किसी ने जोड़ा!

राष्ट्रीय सहारा अखबार में मायावती को मां की गाली प्रकाशित हो जाने के प्रकरण में ताजी जानकारी ये है कि गाली लिखने का काम बनारस आफिस में किसी ने किया. गाजीपुर आफिस से जो खबर भेजी गई, उसमें गाली नहीं थी. यह जानकारी राष्ट्रीय सहारा से जुड़े एक जिम्मेदार शख्स ने दी. नाम न छापने की शर्त पर इन्होंने बताया कि गाजीपुर से जो खबर गई थी, वह बिलकुल ठीक थी. उसमें कहीं कोई गाली नहीं थी. इस खबर में गाली को जोड़ने का काम बनारस आफिस के किसी शख्स ने किया. प्रत्येक ब्यूरो अपनी खबर अपने डेस्क इंचार्ज के पास भेजता है.

गाजीपुर से खबर बनारस गई तो वहां गाजीपुर डेस्क के इंचार्ज ने इसे चेक किया. फिर इस खबर को पेज आपरेटर ने पेज पर लगाया. इसी दरम्यान किसी ने गाली जोड़ दिया. फिलहाल सहारा प्रबंधन ने इस प्रकरण में बनारस के स्थानीय संपादक, डेस्क इंचार्ज और पेज आपरेटर को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए बर्खास्त कर दिया है. स्थानीय संपादक का पद बड़ा होता है, इसलिए उन्हें तत्काल बर्खास्त करने की जगह लखनऊ आफिस में एचआर से अटैच कर दिया गया है. देर सबेर उन्हें जांच के बाद बर्खास्त कर दिया जाएगा. उधर, सहारा की दिल्ली की एक जांच टीम बनारस पहुंच चुकी है और जांच का काम शुरू कर दिया है. यह टीम अपनी जांच रिपोर्ट तैयार करके प्रबंधन को देगी और उस जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.

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मायावती को मां की गाली छपने के बाद सहारा ने अपने स्थानीय संपादक को हटाया

राष्ट्रीय सहारा अखबार की खबर में मायावती को मां की गाली

दयाशंकर राय होंगे राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस के नए आरई

 

 
 

 

मायावती को मां की गाली छपने के बाद सहारा ने अपने स्थानीय संपादक को हटाया

राष्ट्रीय सहारा हिंदी दैनिक के बनारस एडिशन के अधीन गाजीपुर ब्यूरो के अखबार में मायावती को मां की गाली प्रकाशित हो जाने के बाद सहारा मीडिया में हड़कंप मच गया है. प्रबंधन ने जानकारी मिलते ही डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू कर दी. गाजीपुर में भेजे गए अखबार की प्रतियों को वापस लौटाने की कोशिश शुरू हुई लेकिन काफी अखबार बंट चुका था. उधर, इस गलती को अक्षम्य मानते हुए सहारा प्रबंधन ने बनारस के स्थानीय संपादक स्नेह रंजन को लखनऊ मुख्यालय से अटैच कर दिया है. उनकी जगह दयाशंकर राय को नया स्थानीय संपादक बनाकर बनारस भेजा गया है.

इस बीच, जानकारी मिली है कि बसपा नेताओं ने मायावती को मां की गाली लिखे जाने के मुद्दे को गंभीरता से लिया है और अखबार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने का तय किया है. कुछ लोगों ने छपे हुए अखबार को मायावती तक भी पहुंचा दिया है. एक बार ऐसा ही प्रकरण दैनिक जागरण, नोएडा में हुआ था जिसमें मायावती के नाम के साथ जातिसूचक शब्द लिखकर गाली का प्रकाशन कर दिया गया था. उस प्रकरण से मायावती बेहद नाराज हुईं थी और जागरण के मालिकों को मायावती को शांत करने में पसीने आ गए थे. बाद में मायावती ने इसका बदला जागरण के मालिकों को कानपुर में एक पुलिस अधिकारी के हाथों पिटवाकर और बेइज्जत कराकर लिया था.

राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें- सहारा में माया को मां की गाली

 

 
 

 

अगर यही मीडि‍या है तो, नि‍:संदेह मीडि‍या भटक गया है : काटजू

सिर्फ नाम ही काफी है..कुछ ऐसा ही है जस्‍टि‍स मार्कण्‍डेय काटजू के साथ..। लोगों से बहुत सुना था और पढ़ा था उनके बारे में.. कल पहली बार उनको सुनने का मौका मि‍ला। कॉलेज के अवॉर्ड फंक्‍शन का सबसे अच्‍छा पक्ष यही था। मीडि‍या पर जमकर बोले.. और अच्‍छा ये कि‍ वि‍द्वता का प्रदर्शन करने के लि‍ए नहीं बल्‍कि‍ समझाने और समझने के लि‍ए बोले। अमूमन कॉलेज के अवॉर्ड फंक्‍शन में स्‍पीच देने वालों के आते ही स्‍टूडेंट रि‍क्‍वेस्‍ट करने लग जाते हैं कि‍ यार ये जल्‍दी जाए.. लेकि‍न काटजू ने बोलना शुरू कि‍या तो हॉल का सन्‍नाटा तालि‍यों की गूंज के साथ ही टूटा।

शुरुआत में ही ये स्‍पष्‍ट कर दि‍या कि‍ मैं मीडि‍या का जि‍तना पक्षधर हूं उतना ही बड़ा आलोचक भी….। ऐति‍हासि‍क दौर से शुरुआत करते हुए वर्तमान तक की बात की..। अपने वक्‍तव्‍य में काटजू ने कहा कि‍ वर्तमान ट्रांजि‍क्‍शन पीरि‍यड है, जहां कोई गरीब नहीं रहना चाहता, अपने-अपने स्‍तर पर हर कोई प्रयास कर रहा है कि आगे बढ़े.. कुछ करे। जि‍सके चलते वैल्‍यूज़ बदल रहे हैं.. ट्रेंड बदल रहे हैं, समाज बदल रहा है.. और जि‍सके लि‍ए काफी हद तक हमारा मीडि‍या जि‍म्‍मेदार है। लेकि‍न आज का मीडि‍या नब्‍बे फीसदी मनोरंजन परोस रहा है, जबकि‍ हमारे देश की असली समस्‍या गरीबी है..। आप खुद ही सोचि‍ये जि‍स इंसान के पेट में दो दि‍न से खाना नहीं होगा वो रोटी के लि‍ए सोचना पसंद करेगा या ये जानने के लि‍ए इच्‍छुक होगा कि‍ ऐश की बेटी का क्‍या नाम है.. अपने देश की मीडि‍या को सचि‍न का शतक न बनना समस्‍या लगता है, राहुल का संन्‍यास लेना प्राब्‍लम लगता है लेकि‍न गरीबी नहीं…भारत-पाकि‍स्‍तान के मैच को कुछ इस तरह से प्रस्‍तुत कि‍या जाता है जैसे कौरव-पांडव के बीच महाभारत हो..।

ऐश्‍वर्या की प्रेग्‍नेंसी फ्रंट पेज की न्‍यूज है वो भी बोल्‍ड लैटर्स में..क्‍यों…? जबकि‍ हमारे देश में शि‍क्षा से लेकर रोजगार तक की समस्‍या है.. पोस्‍ट ग्रैजुएशन करने वाले चपरासी की नौकरी के लि‍ए घूस देते हैं…. लेकि‍न मीडि‍या इन्‍हें खबर मानता ही नहीं है क्‍योंकि‍ न तो इससे सर्कुलेशन बढ़ता है और ना ही टीआरपी। आज फेयर इज फाउल एंड फाउल इज फेयर का वक्‍त हो गया है… आज का जर्नलि‍स्‍ट तो खुलेआम कहता है कि‍ वो बि‍सनेसमैन है, जि‍सके लि‍ए वि‍ज्ञापन पहले और खबर बाद में है..। बि‍हार दौरे का जि‍क्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि‍ पेपर दि‍खता है, टीवी ब्रॉडकास्‍ट करता है कि‍ बि‍हार तरक्‍की कर रहा है पर मेरे दौरे में तो मुझे वहां न तो कोई बदलाव नजर आया और ना ही वि‍कास.. अलबत्‍ता कुछ पत्रकारों ने ये जरूर कहा कि‍ अगर वो सरकार के खि‍लाफ लि‍खते हैं तो या तो नौकरी से नि‍काल दि‍या जाता है या फि‍र उनका ट्रांसफर बंजर इलाकों में कर दि‍या जाता है..।

अपने देश के 47 फीसद बच्‍चे कुपोषण के शि‍कार हैं… पर मीडि‍या को करीना की शादी की चिंता है.. अगर यही मीडि‍या है तो, नि‍:संदेह मीडि‍या भटक गया है.. मीडि‍या में आना एक जि‍म्‍मेदारी है.. जि‍से गंभीरता से नि‍भाना ही एक पत्रकार का दायि‍त्‍व होना चाहि‍ए..। काटजू के इस पूरे वक्‍तव्‍य को सुनकर दिमाग में सबसे पहले केवल एक बात आई कि‍ शायद जो कुछ पढ़ाया गया था उसे कोई तो है जो वास्‍तवि‍क तौर पर मानता भी है.. वरना जि‍स दि‍न जर्नलि‍स्‍म की क्‍लासेज खत्‍म हुईं ये सारे वि‍चार उसी दि‍न छोड़ने को कह दि‍या गया.. क्‍योंकि शायद सच्‍चाई इन आदर्शों से परे है.. लेकि‍न कहीं न कहीं ये फि‍लॉसफी भी हमारी ही बनायी हुई है कि‍ आदर्श पर चलकर कुछ नहीं मि‍लेगा.. पर शायद हम कभी चले ही नहीं… बस मानकर बैठ गए..। पर जस्‍टि‍स काटजू को सुनकर अच्‍छा लगा कि‍ कम से कम हमारे प्रेस की हेड अथॉर्टी तो कहीं न कहीं इन आदर्शों को सच मानती है..।

युवा पत्रकार भूमिका राय के ब्लाग बतकुचनी से साभार. भूमिका दैनिक अमर भारती और ईटीवी में काम कर चुकी हैं. इन दिनों दैनिक जागरण के साथ जुड़ी हुई हैं.

 

 
 

 

‘समाचार प्लस’ ब्रांड के छह रीजनल चैनल खुलेंगे, प्रवीण साहनी और श्वेता रंजन जुड़े

नोएडा : रीज़नल मार्केट के ख़बरिया चैनलों की दुनिया में एक और बड़ा नाम एन्ट्री कर रहा है. ये नाम है ‘समाचार प्लस’. पैरेंटल कंपनी "बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के बैनर तले "समाचार प्लस" ब्रांड की लॉन्चिग की जा रही है. इसके तहत 6 रीज़नल चैनल खोले जाएंगे. सबसे पहला चैनल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के दर्शकों के लिए होगा. इसके बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़, फिर बिहार-झारखंड के लिए अलग-अलग चैनल्स लाए जाएंगे. सेकेन्ड फेज़ में पंजाब-हिमाचल-हरियाणा और दिल्ली-NCR के दर्शकों के लिए क्षेत्रीय चैनल खोले जाएंगे.

"समाचार प्लस" का हेड ऑफिस H-174, सेक्टर-63, नोएडा में है. "बेस्ट न्यूज कंपनी प्राइवेट लिमिटेड" के डायरेक्टर हैं उमेश कुमार, जो न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया (NNI) के मैनेजिंग डायरेक्टर भी हैं. उमेश जी 'समाचार प्लस' के एडिटर-इन-चीफ और सीईओ का कार्यभार भी संभाल रहे हैं. टोटल टीवी के हेड रह चुके वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने मैनेजिंग एडिटर के रूप में काम करना शुरू कर दिया है. टीवी की दुनिया का बड़ा नाम श्वेता रंजन और तेज़-तर्रार टीवी एंकर अतुल अग्रवाल एक्ज़ीक्यूटिव एडिटर के तौर पर ज़िम्मेदारी निभाएंगे. स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव टीम (SIT) को प्रवीण साहनी हेड करेंगे. प्रवीण ग्रुप के वेब पोर्टलों समेत दूसरी परियोजनाओं को भी लीड करेंगे.

चैनल की भावी योजनाओं के बारे में सीईओ उमेश कुमार ने कहा, 'चैनल लाने के बारे में तो हमने एक साल पहले ही फैसला कर लिया था लेकिन हम काफी दिनों से मार्केट रिसर्च और प्लानिंग कर रहे थे. हम मार्केट का ट्रेंड परख रहे थे और ये समझने की कोशिश कर रहे थे कि दर्शकों की सभी ज़रूरतों को पूरा करने वाला चैनल कैसा हो, जो सबसे अलग भी हो. हमारी कोर टीम ने दिन-रात मेहनत करके ठोस गाइडलाइंस तैयार की हैं. हिन्दी भाषा के सभी रीज़नल चैनलों की तुलना में हमारा सेट-अप संभवत:

उमेश कुमार

सबसे बड़ा और अत्याधुनिक उपकरणों से लैस है. हमारा पहला चैनल उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के सभी हिस्सों में उच्चतम गुणवत्ता के साथ देखा जा सकेगा. आने वाले दिनों में राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय चैनलों को छोड़ कर कई सिद्ध-हस्त युवा पत्रकार, तकनीकी विशेषज्ञ और मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स 'समाचार प्लस' ग्रुप के साथ जुड़ेंगे.'

उमेश कुमार ने कंपनी की ह्यूमन वेल-फेअर पॉलिसी के बारे में बताते हुए कहा, 'हमारा उद्देश्य बिलकुल सीधा सा है. हमारे लोग हमारे लिए सबसे पहले हैं, टीआरपी और बाकी चीज़ें बाद में. उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं, समान प्रोत्साहन सुविधाएं, प्रतियोगी माहौल, परिवार के सदस्यों के लिए अहम योजनाएं इत्यादि के ज़रिए हम अपने साथियों को परिवार जैसा वातावरण दे रहे हैं. स्पोर्ट्स एक्टिविटीज़ जैसे क्रिकेट, बैडमिंटन, लॉन-टेनिस, पूल-बिलियर्ड टेबल, कैरम बोर्ड टेबल, साफ-सुथरा कैंटीन एरिया से लेकर वो सारी सुविधाएं दी जा रही हैं जो उन्हे खुश रख सके.'

कुल मिलाकर, आने वाले दिनों में 'समाचार प्लस' चैनल पर नज़र बनाए रखनी होगी और ये देखना वाकई दिलचस्प होगा कि ये चैनल कैसा प्रदर्शन कर पाता है. लेकिन इतना तो तय है कि आने वाले दिनों में ये संस्थान दर्ज़नों पत्रकारों और तकनीकी विशेषज्ञों को जीविका और बेहतर माहौल ज़रूर मुहैया करवाएगा.

 

 
 

 

राष्ट्रीय सहारा अखबार की खबर में मायावती को मां की गाली

सहारा समूह में काम करने वालों के बारे में कहा जाता था कि वे सरकारी नौकरी करते हैं. उनकी नौकरी जानी मुश्किल है. इसी दौर में इस संस्‍थान में ऐसे लोग भर गए जो काम कम राजनीति ज्‍यादा करते हैं. और दुर्भाग्‍य से ये सहारा के किसी एक यूनिट का नहीं सभी का ऐसा ही हाल है. फिलहाल अभी खबर राष्‍ट्रीय सहारा बनारस की. बनारस यूनिट में तो लग रहा है कि भांग घोल दिया गया है, हर कोई नशे में लग रहा है, तभी तो अखबार में क्‍या जा रहा है क्‍या नहीं जा रहा है, इसे देखने वाला कोई नहीं है.

ताजा मामला गाजीपुर एडिशन का है. अखबार में प्रकाशित एक खबर में पूर्व मुख्‍यमंत्री मायावती के लिए गाली लिखा गया है. अब सवाल यह है कि यह खबर कई स्‍तरों पर, कई नजरों से होकर गुजरी होगी, फिर भी इतनी बड़ी गलती पकड़ में क्‍यों नहीं आई. कंपोजर ने टाइप किया होगा, खबर देखने वाले ने खबर देखी होगी, पेज तैयार करने वाले ने भी खबर देखी होगी, फिर कैसे यह गलती अखबार में रह गई. इस खबर के बाद से बसपाई इस अखबार के खिलाफ प्रदर्शन करने की तैयारी कर रहे हैं.

मायावती को गाली छपने के बाद से प्रबंधन में भी हड़कम्‍प मचा हुआ है. इसी गाली वाली खबर का असर है कि राष्‍ट्रीय सहारा के स्‍थानीय संपादक स्‍नेह रंजन की विदाई होने जा रही है. लखनऊ से दयाशंकर राय को नया आरई बनाकर लाया जा रहा है. राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस के सूत्रों का कहना है कि यह गड़बड़ी यूनिट से हुई है. जांच में गाजीपुर से खबर ठीक आई थी, यहां पर ही किसी ने खबर से छेड़छाड़ की है. यानी एक दूसरे को सबक सिखाने के लिए अखबार को ही मोहरा बना दिया गया. डाक एडिशन विनोद शर्मा के जिम्‍मे था. सूत्रों का कहना है कि उन पर भी कार्रवाई की तलवार लटक रही है.

गाजीपुर एडिशन में प्रकाशित इस खबर के बारे में बनारस के एक पत्रकार ने भड़ास को पत्र भेजकर सूचित किया है, जो इस प्रकार है…

''सच कहने की हिम्मत का नारा देने वाले अखबार राष्ट्रीय सहारा ने 26 मार्च यानी आज के अंक में एक इतिहास रच दिया है। वाराणसी संस्करण के गाजीपुर डाक वाले अखबार में एक खबर ऐसी लगी है, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को गालियां लिखी गई हैं। खबर की हेडिंग है संस्कृत शिक्षकों को युवा मुख्यमंत्री से उम्मीदें, इसके बाद अंदर खबर में पहले वाक्य के बाद भोजपुरिया अंदाज में मायावती को गालियां लिख मारी गई हैं। खबर सैदपुर डेटलाइन से लगाई गई है। मां की गालियां देते हुए लिखा गया कि उन्होंने संस्कृत शिक्षकों का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। खबर में गाली-ग्‍लौज का पता चलते ही सहारा प्रबंधन ने डैमेज कंट्रोल के लिए मार्केट से दोपहर बाद अखबार वापस समेटना शुरू किया, लेकिन कुछ सौ कापियां ही वापस ले जा पाए।''

 

 
 

 

दयाशंकर राय होंगे राष्‍ट्रीय सहारा, बनारस के नए आरई

: स्‍नेह रंजन को हटाया जाएगा : सहारा समूह की रीति नीति को समझना भगवान के लिए भी आसान नहीं है. यहां की दुनिया हर पल रंग बदलती रहती है. हालांकि सहारा की रंग बदलती दुनिया में साफ दिखने लगा है कि स्‍वतंत्र मिश्रा के दिन अब लदते जा रहे हैं. अभी तक उपेंद्र राय के पॉवर में आने की आधिकारिक सूचना नहीं है, पर पिछले दिनों जिस तरीके से बदलाव हुए हैं, उसको देखकर लग रहा है कि अब पर्दे के पीछे से वे सक्रिय हो चुके हैं.

ताजा खबर है कि राष्‍ट्रीय सहारा, लखनऊ में नेक्‍स्‍ट टू आरई तैनात दयाशंकर राय को बनारस का नया आरई बनाया जा रहा है. दयाशंकर इसके पहले लखनऊ यूनिट के आरई रह चुके हैं, परन्‍तु स्‍वतंत्र मिश्रा के स्‍वर्णिमकाल में उनकी जगह मनोज तोमर को आरई बना दिया गया था. हालांकि दयाशंकर से पहले मनोज तोमर ही लखनऊ में स्‍थानीय संपादक थे, परन्‍तु उपेंद्र राय ने उन्‍हें गोरखपुर की जिम्‍मेदारी सौंप दी थी. जब सत्‍ता पलटी तो स्‍वतंत्र मिश्रा उन्‍हें वापस ले आए और दयाशंकर को नेक्‍स्‍ट टू आरई तैनात कर दिया. 

खबर है कि प्रबंधन बनारस के स्‍थानीय संपादक स्‍नेह रंजन के कार्यों से संतुष्‍ट नहीं है. तमाम उपाय के बाद राष्‍ट्रीय सहारा बनारस शहर और जिलों में अपनी पहचान कायम नहीं कर पाया है. दयाशंकर को भेजकर अब अखबार को तेवर देने की कोशिश की जा रही है. स्‍नेह रंजन के बारे में खबर है कि उनको हटाया जाएगा. वैसे कहा जा रहा है कि ये बदलाव अखबार के गा‍जीपुर एडिशन में मुख्‍यमंत्री मायावती को बारे में गाली छप जाने के चलते हो रहा है.

 

 
 

 

डीएम के तुगलकी फरमान पर सूचना विभाग सख्‍त, कहा – पत्रकारों से समन्‍वय बनाएं

बिहार के कटिहार के डीएम के महुआ न्‍यूज और इंडिया न्‍यूज के रिपोर्टरों से किसी अधिकारी के बात न करने के तुगलकी फरमान को बिहार राज्‍य सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने गंभीरता से लिया है. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रधान सचिव राजेश भूषण ने कटिहार के डीएम को कड़ा पत्र लिखा है तथा कहा है कि वे पत्रकारों से समन्‍वय बनाएं क्‍योंकि सरकार के कार्यों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया सशक्‍त माध्‍यम है.

राजेश भूषण ने लिखा है कि अगर मीडिया कोई भ्रामक/असत्‍य समाचार प्रकाशित-प्रसारित करता है तो उसके खंडन-प्रकाशनार्थ के लिए तत्‍काल जानकारी ब्‍यूरो प्रमुख/संपादक को भेजी जाए. इसके बाद भी अगर ससमय खंडन/प्रकाशन नहीं होता है तो इसकी सूचना उन्‍हें दी जाए ताकि उसके संबंध में मीडिया हाउस के खिलाफ भारतीय प्रेस परिषद, नई दिल्‍ली को समुचित कार्रवाई हेतु लिखा जाए.

नीचे सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के प्रधान सचिव द्वारा जिलाधिकारी को लिखा गया पत्र –

इस खबर के बारे में जानने के लिए क्लिक करें –   बिहार के एक डीएम का आदेश- महुआ न्यूज और इंडिया न्यूज के रिपोर्टरों से कोई अफसर बात न करे

 

 
 

 

अमर उजाला के फोटो जर्नलिस्‍ट ने दिखाई दिलेरी, धरा गया स्‍नैचर

लखनऊ मे मुख्यमंत्री कार्यालय के बाहर रविवार दोपहर अमर उजाला के फोटो जर्नलिस्ट की दिलेरी से एक वृद्ध महिला से चेन लूटकर भाग रहा बदमाश पकड़ लिया गया. हालांकि बाइरक पर सवार स्नेचर का दूसरा साथी फरार होने में सफल रहा. पुलिस उसकी तलाश कर रही है. पकड़ा गया बदमाश कानपुर का निवासी है. महिला ने बदमाश के खिलाफ कोई रिपोर्ट नहीं लिखाई है.

जानकारी के अनुसार लखनऊ कैंट के तेलीबाग निवासी साठ वर्षीय सावित्री देवी रविवार की दोपहर पैदल ही माल एवेन्‍यू में अपने रिश्‍तेदार से मिलने जा रही थीं. मुख्‍यमंत्री कार्यालय के बाहर रास्‍ते में बाइक पर सवार दो स्‍नैचरों ने वृद्धा के गले में पड़ी सोने की चेन छीननी चाही, परन्‍तु हाथ नहीं पहुंच पाने से चेन झपटने में असफल रहे. इसके बाद एक लुटेरा बाइक से उतरा और वृ‍द्धा के गले से दोबारा चेन झपट लिया. किन्‍तु इस छीना-झपटी में चेन टूटकर सड़क पर गिर गया.

अभी स्‍नैचर चेन उठाने की कोशिश कर ही रहा था कि अमर उजाला के फोटो जर्नलिस्‍ट अमित सिंह अपनी बाइक पर उधर से आ निकले. वृद्धा के चिल्‍लाने पर अमित ने ललकारते हुए लुटेरे का पीछा किया. माजरे को देखकर वहां से गुजर रहे अन्‍य बाइक सवार तथा राहगीरों ने बदमाश का रास्‍ता रोक लिया. इस पर बदमाश वापस सचिवालय की ओर भागने लगा तो अमित ने उसे पैर से मारकर नीचे गिरा दिया. इसी बीच मुख्‍यमंत्री कार्यालय में तैनात सुरक्षाकर्मी मौक पर पहुंच गया था उसे दबोच लिया.

हालांकि मोटरसाइकिल चला रहा स्‍नैचर मौका देखकर फरार हो गया. पकड़े गए लुटेरे ने अपना नाम इरशान तथा फरार साथी का नाम नाजिर बताया है. वे कानपुर के परेड इलाके का रहने वाला है. पुलिस पकड़े गए आरोपी से अन्‍य वारदातों के बारे में भी पूछताछ कर रही है. दूसरी तरफ वृद्धा ने अपनी चेन मिल जाने के बाद उक्‍त बदमाश के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने से मना कर दिया. हालांकि वृद्धा ने फोटो जर्नलिस्‍ट अमित सिंह की सराहना की.

 

 
 

 

हॉकर बन गया क्षेत्रीय फिल्‍मों का हीरो

धनबाद : अखबार बेचते-बेचते धनबाद का एक छोरा क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों का हीरो बन गया है। नया बाजार निवासी समाचार पत्र विक्रेता जयश्री राम का सुपुत्र करमदेव उर्फ केडी एलबम और फिल्मों के चर्चित सितारे के रूप में उभर रहा है। मौजूदा समय में केडी, राज द्वारा निर्देशित फिल्म जूरी हिजवा में बतौर हीरो काम कर रहे हैं। केडी की आनेवाली भोजपुरी फिल्म प्रेम बंधन है।

केडी ने अपने करियर की शुरुआत अखबार बेचने से की। कला गुरुकुल डांस एकेडमी के साथ जुड़ने के बाद केडी ने एक्टिंग की ओर रुख किया। केडी हम जिहली शान से, अंगूठा छाप फुर्र फार, मन करे बन जाई मोबाइल, लव के साइड इफेक्ट्स आदि एलबम में काम कर चुके हैं। केडी का नया एलबम दे दे दिल है। केडी अपने पिता जयश्री राम का नाम रोशन करना चाहते हैं। साभार : जागरण

 

 
 

 

फोकस टीवी से भूपेंद्र, तरूणा और अजीत का इस्‍तीफा

: कंचन व सारिका जुड़ीं : फोकस टीवी से खबर है कि आंतरिक परिस्थितियों से तंग आकर तीन पत्रकारों ने इस्‍तीफा दे दिया है. ये लोग चैनल की लांचिंग के समय से ही जुड़े हुए थे. जिन लोगों ने इस्‍तीफा दिया है उनमें एसोसिएट प्रोड्यूसर भूपेन्‍द्र सिंह, रिपोर्टर तरूणा भाटी तथा प्रोड्क्‍शन एसोसिएट अजीत कुमार सिंह शामिल हैं. ये लोग अपनी नई पारी कहां से शुरू करने जा रहे हैं इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. बताया जा रहा है कि चैनल के अंदर राजनीति और अनियमित वेतन मिलने के चलते इस्‍तीफा दिया है.

दूसरी तरफ खबर है कि पी7 न्‍यूज से इस्‍तीफा देकर कंचन ने फोकस टीवी ज्‍वाइन किया है. वे एंकर के रूप में चैनल से जुड़ी हैं. पी7 न्‍यूज में भी वे एंकरिंग की जिम्‍मेदारी संभाल रही थीं. बताया जा रहा है कि चैनल हेड माधुरी सिंह के बुलावे पर कंचन फोकस टीवी से जुड़ी हैं. वहीं लाइव इंडिया के खराब हालतों से परेशान सारिका ने भी वहां से इस्‍तीफा देकर फोकस टीवी ज्‍वाइन किया है.

 

 
 

 

सन् 2025 : कुछ लोक भाषाएं भी हुआ करती थीं

बाजार के दबाव में तिल-तिल कर मरती हुई भोजपुरी भाषा की दुर्दशा को लेकर मैं ने कुछ समय पहले एक उपन्यास लिखा – लोक कवि अब गाते नहीं। इंडिया टुडे में इस उपन्यास की समीक्षा लिखते हुए प्रसिद्ध भाषाविद अरविंद कुमार ने तारीफों के पुल बाँधते हुए एक सवाल भी लिख दिया कि अगर लेखक को भोजपुरी से इतना ही लगाव है और भोजपुरी कि उसे इतनी ही चिंता है तो यह उपन्यास भोजपुरी में ही क्यों नहीं लिखा? हिंदी में क्यों लिखा?

यह मुझ पर सवाल नहीं तमाचा था। पर सवाल यह था कि अगर मैं यह उपन्यास भोजपुरी में लिखता तो उसे पढ़ता भी भला कौन? इससे भी बड़ा प्रश्न था कि उसे छापता भी भला कौन और क्यों? मैं ने उन्हें यह बात बताते हुए बड़ी तकलीफ से लिखा कि घबराइए नहीं, शायद वह दिन भी ज्यादा दूर नही् है जब हिंदी की दुर्दशा को लेकर कोई उपन्यास अंगरेजी में लिखा जाए। तो फिर आप पूछेंगे कि यह हिंदी में क्यों नहीं लिखा गया? अरविंदजी ने मेरी तकलीफ को समझा और माना कि ये तो है!

ऐसे में सवाल बड़ा गूढ़ है कि वर्ष २०२५ में भारतीय लोक भाषाओं की स्थिति क्या होगी? लेकिन शायद यह दूसरा सवाल है। पहला सवाल तो यह है कि वर्ष २०२५ में हिंदी की स्थिति क्या होगी? और फिर उसकी हैसियत क्या होगी? अभी तो आलम यह है कि हर छठवें मिनट में एक हिंदी भाषी अंगरेजी बोलने लगता है। यह चौंकाने वाली बात एंथ्रोपोलिजकल सर्वे आफ इंडिया ने अपनी ताजी रिपोर्ट में बताई है। संतोष की बात है कि इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हर पांचवे सेकेंड में हिंदी बोलने वाला एक बच्चा पैदा हो जाता है। गरज यह कि हिंदी बची रहेगी। पर सवाल यह है कि उसकी हैसियत क्या होगी? क्योंकि यह रिपोर्ट इस बात की तसल्ली तो देती है कि हिंदी भाषियों की आबादी हर पांच सेकेंड में बढ़ रही है। लेकिन साथ ही यह भी चुगली खाती है कि हिंदी भाषियों की आबादी बेतहाशा बढ़ रही है। और जिस परिवार की जनसंख्या ज्यादा होती है, उसकी दुर्दशा कैसे और कितनी होती है यह भी हम सभी जानते हैं। आज की तारीख में दावा है कि २० करोड़ से अधिक लोग भोजपुरी बोलते हैं। लेकिन यह आंकड़ा है। जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर है। हकीकत यह है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में तमाम माँग के बावजूद भोजपुरी नहीं आ सकी है। जब कि दो-ढाई लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली डोगरी या कुछ लाख लोगों द्वारा बोली जाने वाली नेपाली भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में हैं।

आज गाँवों में ही भोजपुरी और अवधी जैसी भाषाएं विलुप्त हो रहीं हैं। लोग अंगरेजी मिश्रित खड़ी बोली बोल रहे हैं। "दो साल तक टॉक टाइम फ्री" तथा "लाइफ टाइम प्रीपेड" जैसे विज्ञापन गाँवों में भी लहालोट हैं। एक साथ अंगरेजी और बाजार का दबाव इतना ज्यादा है कि लोक भाषाएं तो क्या हिंदी जैसी विशाल भाषा भी अपने आप को बचा ले जाए, यही बहुत है। हालांकि बाजार पर एक नजर डालें और अखबारी रिपोर्टों पर गौर करें तो पता चलता है कि इन दिनों मुंबई तक में भोजपुरी फिल्मों की बहार है। भोजपुरी सीडी और कैससेट से बाजार अटे पड़े हैं। लेकिन अश्लीलता, फूहड़ता और लंपटई की सारी हदें तोड़ती यह फिल्में, कैसेट और सीडी भोजपुरी को कलंकित करते हुए उसे बेमौत मार रही हें। हालांकि अमिताभ बच्चन जैसे लोग भी भोजपुरी फिल्मों में काम करेंगे यह बताया जा रहा है। अमिताभ बच्चन की कुछ फिल्में भोजपुरी में डब भी की गई है। लेकिन भोजपुरी की यह बाजारु छवि है। सच्‍चाई यह है कि भोजपुरी अवधी समेत तमाम लोक भाषाएं इस कदर उपेक्षित हैं कि अगर इनकी तुलना करनी ही हो तो कहूंगा कि ज्यादातर मध्यवर्गीय घरों में जैसे वृद्ध उपेक्षित और अपमानित एक कोने में खांसते-खंखारते बोझ बने पड़े रहते हैं, हमारी लोक भाषाएं भी उसी गति को प्राप्त हैं। जैसे अशक्त वृद्धों को अपनी मौत का हर क्षण इंतजार होता है। हमारी लोक भाषाओं का भी यही बुरा हश्र है। क्या पता २०२५ से पहले ही हमारी लोकभाषाएं एक-एक कर अपने प्राण छोड़ती जाएं। और हमारी सरकारें उन्हें बचाने के लिए परियोजनाएं बनाती दीखें। जैसे कि पाली और संस्कृत भाषाओं के साथ हुआ है।

लेकिन परियोजनाएं क्या भाषाएं बचा पाती हैं? और कि क्या सरकारी आश्रय से भाषाएं बच पाती हैं? अगर बच पातीं तो उर्दू कब की बच गई होती। सच यह है कि कोई भाषा बचती है तो सिर्फ इस लिए कि उसका बाजार क्या है? उसकी जरूरत क्या है? और कि उसकी माँग कहाँ है? वह रोजगार दे सकती है क्या? अगर नहीं तो किसी भी भाषा को हम आप क्या कोई भी नहीं बचा सकता। संस्कृत, पाली और उर्दू जैसी भाषाएं अगर बेमौत मरी हैं तो सिर्फ इसलिए कि वह रोजगार और बाजार की भाषाएं नहीं बन सकीं. चाहे उर्दू हो, संस्कृत हो या पाली जब तक वह कुछ रोजगार दे सकती थीं, चली। लेकिन पाली का तो अब कोई नामलेवा ही नहीं है। बहुतेरे लोग तो यह भी नहीं जानते कि पाली कोई भाषा भी थी। इतिहास के पन्नों की बात हो गई पाली. लेकिन संस्कृत? वह पंडितों की भाषा मान ली गई. और जन बहिष्कृत हो गई। इस लिए भी कि वह बाजार में न पहले थी और न अब कोई संभावना है। उर्दू एक समय देश की मुगलिया सल्तनत में सिर चढ़ कर बोलती थी। उसके बिना कोई नौकरी मिलनी मुश्किल थी। जैसे आज रोजगार और बाजार में अंगरेजी की धमक है तब वही धमक उर्दू की होती थी। बड़े-बड़े पंडित तक तब उर्दू पढ़ते-पढ़ाते थे। मुगलों के बाद अंगरेज आए तो उर्दू धीरे-धीरे हाशिए पर चली गई। फिर जैसे संस्कृत पंडितों की भाषा मान ली गई थी, वैसे ही उर्दू मुसलमानों की भाषा मान ली गई। आज की तारीख में उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में राजनीतिक कारणों से वोट बैंक के फेर में उर्दू दूसरी राजभाषा का दर्जा भले ही पाई हुई हो लेकिन रोजगार की भाषा अब वह नहीं है। और न ही बाजार की भाषा है। सो, उर्दू भी अब इतिहास में समाती जाती दिखाई देती है। उर्दू को बचाने के लिए भी राजनेता और भाषाविद योजना-परियोजना की बतकही करते रहते हैं। पुलिस थानों तथा कुछ स्कूलों में भी मूंगफली की तरह उर्दू-उर्दू हुआ। पर यह नाकाफी है और मौत से भी बदतर है।

हां, हिंदी ने इधर होश संभाला है और होशियारी दिखाई है1 रोजगार की भाषा आज अंगरेजी भले हो पर बाजार की भाषा तो आज हिंदी ही है। और लगता है आगे भी रहेगी क्या, दौड़ेगी भी। कारण यह है कि हिंदी ने विश्वविद्यालीय हिंदी के खूंटे से अपना पिंड छुड़ा लिया है। शास्त्रीय हदों को तोड़ते हुए हिंदी ने अपने को बाजार में उतार लिया है। और हम विज्ञापन देख रहे हैं कि दो साल तक टॉक टाइम फ्री। लाइफ टाइम प्रीपेड। दिल माँगे मोर हम कहने ही लगे हैं। इतना ही नहीं अंगरेजी अखबार अब हिंदी शब्दों को रोमन में लिख कर अपनी अंगरेजी हेडिंग बनाने लगे हैं. अरविंद कुमार जैसे भाषाविद कहने लगे हैं कि विद्वान भाषा नहीं बनाते। भाषा बाजार बनाती है। भाषा व्यापार और संपर्क से बनती है। हिन्दी ने बहुत सारे अंगरेजी, पंजाबी, कन्नड़, तमिल आदि शब्दों को अपना बना लिया है। इस लिए हिंदी के बचे रहने के आसार तो दिखते हैं। लेकिन लोक भाषाओं ने यह लचीलापन अबतक तो नहीं दिखाया है। गोस्वामी तुलसीदास ने अवधी में अगर रामचरित मानस न लिखा होता तो मैं पूछता हूं कि अवधी आज होती कहाँ? इसी तरह अगर भिखारी ठाकुर ने भोजपुरी में बिदेसिया और आरा हिले बलिया हिले छपरा हिले ला, हमरी लचके जब कमरिया सारा जिला हिले ला, जैसे कुछ लोक गीत न लिखे होते तो भोजपुरी कहाँ होती? भोजपुरी, अवधी, ब्रज, बुंदेलखंडी, मैथिली, मगही, वज्जिका, अंगिका, कन्नौजी, कुमाऊंनि, गढ़वाली, छत्तीसगढ़ी आदि तमाम लोक भाषाएं तेजी से विलुप्ति के कगार पर हैं।

आज तो आलम यह है कि लोक भाषाओं की जो सबसे बड़ी थाती थी वह थी संस्कार गीत और श्रम गीत। आज हमसे संस्कार गीत भी बिला गए हैं। शादी ब्याह में, मुंडन निकासन में तमाम और सारे मौकों पर गाए जाने वाले संस्कार गीतों की जगह अब फिल्मी पैरोडियों ने ले ली है। लेडीज संगीत ने ले ली है। भजनों और देवी गीतों की जगह अश्लील फिल्मी पैरोडियों वाले भजन और देवी गीत सुनाई देने लगे हैं। श्रम गीत तो कब के विदा हो चुके हैं। गरज यह कि सारा लोक और लोक भाषा लोगों के ठेंगे पर आ गया हैं। तो ऐसे में अचरज क्या कि २०२५ तक लोक भाषाएं अपने संरक्षण के लिए भीख मांगने लगें! निश्चित ही यह हमारी और हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी होगी। ठीक वैसे ही जैसे कोई बहुत पढ़ा लिखा कैरियर प्रेमी लड़का अपनी माँ को माँ कहने से कतराए। क्या तो उसकी माँ पढ़ी-लिखी नहीं है, उसकी फिगर ठीक नहीं है, वह लोगों में उठने बैठने लायक नहीं है। तो जैसे अगर कोई कैरियर प्रेमी लड़का इन कारणों से अपनी माँ को माँ नहीं कहता है और शर्म खाता है। ठीक वैसे ही क्या हम सब भी अपनी मातृभाषा के साथ आज यही नहीं कर रहे? मातृभाषा जो हमारी लोक भाषाएं ही हैं। जिन्हें बोलने बरतने से हम शरमा रहे हैं। जीते जी उन्हें हम मार रहे हैं। इस पर हमें सोचना ही चाहिए कि आखिर हम ऐसा क्यों कर रहे हैं? अपनी माँ के प्राण क्यों ले रहे हैं?

लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उपन्‍यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है. इनका यह लेख इनके ब्‍लॉग सरोकारनामा पर भी प्रकाशित हो चुका है.

 

 
 

 

प्रतिभा, मेहनत और अध्‍ययन के सहारे शिखर पर पहुंचे थे आलोक तोमर : प्रदीप सिंह

: आलोक तोमर परम्‍परापीठ ने आयोजित की व्‍याख्‍यानमाला : ग्वालियर : देश के जाने-माने हिंदी पत्रकार प्रदीप सिंह ने कहा कि सरल और संतुलित भाषा, खबर की समझ और ख़बरों का फ़ॉलो-अप करने के प्रति आतुर रहना, यही गुण है जो किसी पत्रकार को निखारते हैं और इसके लिए सबसे जरूरी चीज है निरंतर अध्ययनशील रहने की प्रवृति। खबर से समझौता न करने का माद्दा, चाहे वह किसी को भी प्रभावित करती हो। यही बातें हैं जो किसी पत्रकार को शिखर पर पहुंचाती हैं।

श्री सिंह ने यह बात रविवार को कलावीथिका में "आलोक तोमर परमपरापीठ" द्वारा उनकी पहली पुण्यतिथि पर आयोजित व्याख्यान माला में मुख्यवक्ता के रूप में कही। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार और स्वदेश के पूर्व संपादक जय किशन शर्मा ने की। विशिष्ठ अतिथि के रूप में स्व. आलोक तोमर की पत्नी श्रीमती सुप्रिया रॉय तोमर, मध्यप्रदेश के जनसंपर्क आयुक्त राकेश श्रीवास्तव, उच्च न्यायालय ग्वालियर खंडपीठ के अतिरिक्त महाधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी मौजूद थे।

कार्यक्रम की शुरुआत स्व. तोमर के चित्र पर पुष्पांजलि के साथ हुई। इसके बाद पीठ से जुड़े लोगों भगवान सिंह तोमर, अरुण सिंह तोमर, देव श्रीमाली, अशोक सिंह, शरद श्रीवास्तव, डॉ. अयूब खान, सुरेन्द्र शर्मा, रमन अग्रवाल ने अतिथियों को पुष्प गुच्छ भेंट कर स्वागत किया। पीठ के सदस्य और मध्य प्रदेश राज्य सहकारी संघ के अध्यक्ष अरुण सिंह तोमर ने आयोजन की रूपरेखा रखी और वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली ने अतिथियों का परिचय कराया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री सिंह ने कहा कि अपने प्रोफेशन के प्रति कमिटमेंट होना बहुत जरूरी है। यह कमिटमेंट लगातार अध्ययन से आता है। आलोक तोमर से बात करके ही लगता था कि वे कम उम्र में कितना पढ़ चुके थे। श्री सिंह ने साफ़ कहा- लगातार ना पढ़ने वाला कभी ज्यादा नहीं लिख सकता। पत्रकारिता में सफलता के लिए सिर्फ प्रतिभा ही नहीं मेहनत की भी जरूरत होती है। एक अध्ययनशील पत्रकार ही समाज में विश्वसनीयता पैदा कर सकता है और आलोक तोमर में यह गुण विद्यमान थे। इसे की बदौलत वे हिंदी पत्रकरिता के शिखर पर पहुंचे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार जय किशन शर्मा ने कहा कि आलोक तोमर में जबरदस्त उर्जा थी और एक बार जिम्मेदारी मिल जाने पर वे उसकी तह तक जाते थे। वे मूलत क्राईम रिपोर्टर थे लेकिन जब मैंने उन्हें तानसेन समारोह कवर करने का जिम्मा सौंपा तो कुछ ही दिनों में वे संगीत के इतने जानकार बन गये कि हम सब दंग थे। अपनी पढ़ने और समझने की भूख ने ही आलोक को हर क्षेत्र में लिखने का अधिकार दिया। वे साहित्य पर जितना अच्छा लिखते थे उतना ही अच्छा क्रिकेट पर भी, जबकि क्रिकेट खेलना तो दूर उन्हें देखना भी पसंद नहीं थी।

श्री शर्मा ने स्व. तोमर के जुड़े अन्तरंग पलों को साझा करते हुए कहा कि आलोक तोमर जैसा परिश्रमी पत्रकार मैंने अपने जीवन में दूसरा नहीं देखा। जिस पान सिंह तोमर की फिल्म की आज धूम है, उन पान सिंह तोमर का यह पक्ष आलोक तोमर ने ही समाज के सामने उजागर किया था। पान सिंह तोमर के साक्षात्कार को लेकर जब मैंने उसे टोका तो उसने विनम्रता से कहा- एक पत्रकार के नाते मेरी जो जिम्मेदारी है वह मुझे करने दें।

इस मौके पर आलोक तोमर की पत्नी और पत्रकार श्रीमती सुप्रिया रॉय तोमर ने कहा कि स्व. आलोक किसी भी बिषम परिस्थिति में भी विचलित नहीं होते थे और निरंतर अध्ययन और लेखन इससे कभी प्रभावित नहीं होता था। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद उन्होंने न लिखना कम किया और पढ़ना। अंतिम समय तक उन्होंने लिखा। गर्दिशों के दौरान भी मैंने कभी उन्हें बिचलित नहीं देखा। कैंसर पर उन्होंने अनेक लेख लिखे और इसको लेकर होने वाली धन्धेबाजी पर भी खूब लिखकर लोगों का ध्यान खींचा।

इस कार्यक्रम का संचालन जय सिंह तोमर तथा आभार प्रदर्शन शरद श्रीवास्तव ने किया। इस कार्यक्रम में ग्वालियर प्रेस क्लब के सचिव राकेश अचल, वरिष्ठ पत्रकार अवध आनंद, डॉ. सुरेश सम्राट, स्वदेश के संपादक लोकेन्द्र पाराशर, कमल माखीजानी, राजेश शर्मा, जीतेंद्र जादौन, ब्रज मोहन सिंह परिहार, राज देव पाण्डेय, पुष्पेन्द्र सिंह तोमर, संजय तोमर, लाजपत अग्रवाल, सुनील पाठक, नासिर गौरी, रविकांत सैनी, जनसंपर्क विभाग के संयुक्त संचालक एचएल चौधरी, सहायक संचालक संजीव पाठक, सहायक सूचना अधिकारी हितेंद्र सिंह भदौरिया समेत सैकड़ों की संख्या में पत्रकार, बुद्दिजीवी, साहित्यकार, समाजसेवी और राजनीति से जुडी हस्तियाँ शामिल हुईं।

 

 
 

 

आईबीएन7 से इस्‍तीफा देकर जयप्रकाश सिंह इंडिया टीवी पहुंचे

: श्‍याम शरण ने दैनिक जागरण ज्‍वाइन किया : आईबीएन7, मुंबई से सूचना है कि जयप्रकाश सिंह उर्फ जेपी ने संस्‍थान से इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर सीनियर रिपोर्टर के पद पर कार्यरत थे. जेपी ने अपनी नई पारी इंडिया टीवी के साथ शुरू की है. उन्‍हें चैनल में मुंबई का ब्‍यूरोचीफ बनाया गया है. जेपी लम्‍बे अरसे से आईबीएन7 को अपनी सेवाएं दे रहे थे. वे बीएजी और सहारा समय से भी जुड़े रहे हैं. जेपी की गिनती मायानगरी के तेजतर्रार पत्रकारों में की जाती है.

प्रभात खबर, मुजफ्फरपुर से श्‍याम शरण ने इस्‍तीफा दे दिया है. वे यहां पर पीपी प्रभारी थे. श्‍याम ने अपनी नई पारी की शुरुआत दैनिक जागरण, रांची के साथ की है. उन्‍हें यहां असिस्‍टेंट मैनेजर बनाया गया है. श्‍याम लम्‍बे समय तक प्रभात खबर से जुड़े रहे हैं.

 

 
 

 

सपा नेता ने झांसी में बीडीओ को गोली मारी, हालत गंभीर

: आरोपी के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं : यूपी में सपा को बहुमत मिलने के बाद से शुरू गुंडागर्दी अब भी चालू है. मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के दावों के इतर सपाई अपनी गुंडई-दबंगई छोड़ने को तैयार नहीं हैं. आज सपा के पूर्व ब्‍लाक प्रमुख के पति ने एक बीडीओ को गोली मार दी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है. पुलिस ने अब तक आरोपी सपाई पर कोई कार्रवाई नहीं की है.

जानकारी के अनुसार झांसी जिले के चिरगांव के पूर्व ब्‍लाक प्रमुख कल्‍याणी देवी के पति डा. भरत यादव की बीडीओ सुशील कुमार से डेढ़ साल पहले किसी बात को लेकर नोंकझोंक हुई थी. बसपा के शासनकाल में भरत की नहीं चली, वे तभी से बीडीओ से खफा थे. बताया जा रहा है कि इसी रंजिश का बदला लेने के लिए भरत यादव बीडीओ सुशील कुमार के घर पहुंचे तथा उन पर गोलियां चला दीं. गोली लगते ही सुशील कुमार नीचे गिर गए. भरत मौके से भाग निकले.

गोली की आवाज सुनकर बाहर निकले परिजन तथा आसपास के लोगों ने उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया है. बीडीओ की हालत चिंताजनक बताई जा रही है. पुलिस ने अभी तक आरोपी सपाई भरत यादव को गिरफ्तार नहीं किया है. अभी कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई है. प्रशासन के आला अधिकारी भी मामला एक सपा नेता से जुड़ा होने के चलते अपना मुंह खोलने से बच रहे हैं. झांसी में इसके पहले सपाइयों ने मतगणना वाले दिन पत्रकारों पर हमला किया था. उस मामले में भी पुलिस ने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है.

मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले तथा सत्‍ता संभालने के बाद कहा था कि उनके कार्यकर्ता गुंडई नहीं करेंगे साथ ही उन्‍होंने कार्यकर्ताओं को भी चेताया था कि वो कानून के दायरे में रहें, परन्‍तु सारी चेतावनियों को नजरअंदाज कर सपा कार्यकर्ता अपनी गुंडई फिर से शुरू कर चुके हैं. अभी सत्‍ता संभाले एक महीना भी नहीं हुआ और जिस तरह से सपाई गुंडई कर रहे हैं उससे जाहिर हो रहा है कि फिर एक बार सपा के गुंडाराज की वापसी होने जा रही है.

 

 
 

 

बिहार में मीडिया पर दबाव : सूचना निदेशक ने लिखा पत्र संतुष्‍ट नहीं हैं सूचना मंत्री

जस्टिस मार्कंडेय काटजू का बयान गलत नहीं है कि बिहार में मीडिया की आजादी पर पहरा है. बिहार में सरकार के खिलाफ खबर लिखने वालों को परेशान किया जाता है. अर्से से यहां के पत्रकार कहते चले आ रहे हैं कि नीतीश सरकार ने मीडिया को पंगु बना रखा है. जो पत्रकार या अखबार इन लोगों के खिलाफ आवाज उठाता है उसके तरीके से निपटा दिया जाता है. प्रबंधन पर दबाव डालकर पत्रकार को हटवा दिया जाता है या फिर उसका तबादला ऐसी जगह करवा दिया जाता है, जो उसके लिए काला पानी की सजा जैसा होता है.

अखबारों के विज्ञापन भी रोकने के आरोप सामने आए हैं. इन सभी आरोपों की बुनियाद पर ही जस्टिस काटजू ने कहा था कि बिहार में मीडिया पर अघोषित सेंसर लगा हुआ है. उन्‍होंने इसके लिए तीन सदस्‍यीय जांच कमेटी की गठित की है. बिहार में मीडिया पर सरकार दबाव की बात एक बार फिर साबित हो गई है. बिहार सरकार के सूचना निदेशक ने शिवकपूर सिन्‍हा ने पटना के सभी अखबारों एवं इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के वरिष्‍ठों को पत्र भेजकर सरकारी प्रेस विज्ञप्ति को प्रमुखता से प्रसारित-प्रकाशित न किए जाने पर नाराजगी जताई है.

शिवकपूर ने अपने पत्र में लिखा है कि सभी अखबार एवं इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के लोग सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा भेजी गई विज्ञप्तियों तथा फोटो को प्रमुखता से नहीं छाप रहे हैं. इससे राज्‍य के सूचना मंत्री भी संतुष्‍ट नहीं हैं. अब आप इशारों ही इशारों में समझ सकते हैं कि सूचना मंत्री असंतुष्‍ट हैं तो क्‍या-क्‍या कर सकते हैं. अब सूचना विभाग के निदेशक तय करवाएंगे कि उनकी खबरों प्रकाशित करना है या नहीं. यह पत्र ही बता रहा है कि बिहार में मीडिया पर कितना दबाव है.

एक तरीके से निदेशक द्वारा भेजा गया पत्र शिकायती नहीं बल्कि अपरोक्ष रूप से धमकी ही है कि उनके द्वारा सरकारी खबरों को प्रमुखता नहीं दी जा रही है. उन्‍हें प्रमुखता दी जाए नहीं तो भविष्‍य में कुछ भी हो सकता है क्‍योंकि सूचना मंत्री असंतोष व्‍यक्‍त कर रहे हैं. जस्टिस काटजू द्वारा गठित समिति को इस मामले को भी संज्ञान में लेना चाहिए. नीचे राज्‍य के सूचना निदेशक द्वारा सभी संस्‍थानों को भेजा गया पत्र. 

 

 
 

 

साधना न्‍यूज एमपी-सीजी के स्ट्रिंगरों को नहीं मिला छह महीने से पैसा

साधना न्यूज एमपी-सीजी अपने स्ट्रिंगरो को बेवकूफ़ बना रहा है. जुलाई 2011 के बाद स्टोरी का कोई पैसा नहीं मिला है. दिसम्बर माह में एमपी के सभी ब्यूरो पर स्ट्रिंगरों की मीटिंग की गई. इस मीटिंग में भोपाल ब्यूरो के संजीव श्रीवास्तव आये थे. बड़े-बड़े सपने दिखाते हुए बड़ी-बड़ी बातें की गई और कहा गया कि जनवरी माह से आप सभी को नियमित रूप से भुगतान मिलेगा और सभी को रिपोर्टर बना कर फिक्स सेलरी दी जाएगी, लेकिन मार्च माह ख़तम होने को है कुछ भी आज तक नहीं मिला.

और जिस तरह की स्थिति है आने वाले समय में कुछ मिलता दिखाई नहीं पड़ रहा है. न्यूज़ चैनल वाले यह भूल जाते हैं कि स्ट्रिंगर न्यूज नही भेजेंगे तो चैनल क्या दिखायेगा? स्ट्रिंगर किसी भी न्यूज़ चैनल की महत्वपूर्ण कड़ी हैं और जब भुगतान की बात आती है तो यह न्यूज़ चैनल वाले इस महत्वपूर्ण कड़ी स्ट्रिंगरों को भूल जाते हैं. क्‍या यह रूट लेबल पर मेहनत करने वाले स्ट्रिंगरों के साथ उचित व्‍यवहार है.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र.

इस संदर्भ में पूछे जाने पर भोपाल ब्‍यूरो चीफ अजय त्रिपाठी ने बताया कि यह बिल्‍कुल गलत है. जनवरी तक तो सभी स्ट्रिंगरों के पेमेंट दे दिए गए हैं. उन्‍होंने बताया कि सिर्फ उन स्ट्रिंगरों के पेमेंट रूके होंगे, जिनके उपर विज्ञापन का बकाया होगा. कंपनी कई स्‍थानों पर एजेंसी की सेवाएं लेते है, लिहाजा एजेंसी के पैसे क्‍लीयर नहीं होने के चलते उनका पेमेंट नहीं हुआ होगा. वैसे भी कंपनी के वरिष्‍ठों ने जनवरी से फिक्‍स एमाउंट का फार्मेट तैयार कर रखा है, स्ट्रिंगरों को न्‍यूनतम स्‍टोरी लिमिट बता दी जाएगी और उन्‍हें फिक्‍स सेलरी दी जाएगी. जिनके यहां कंपनी का बकाया है, उनका बकाया पूरा होने पर ही पेमेंट किया जाएगा. 

 

 
 

 

बनारस में लखनऊ का आरएनआई नम्‍बर प्रकाशित कर रहा है जनसंदेश टाइम्‍स

क्या यह संभव है कि बनारस से प्रकाशित किसी अख़बार की प्रिंट लाइन में आरएनआई नंबर व डाक पंजीयन नंबर लखनऊ का डाला जाये और वह भी भूलवश किसी एक दिन नहीं बल्कि अपने प्रकाशन के पहले दिन से ही। जी हाँ, जनसंदेश टाइम्स बनारस की प्रिंट लाइन में लगभग डेढ़ महीने पहले से लगातार लखनऊ का आरएनआई नंबर यूपीएचआईएन/ 2010/32745 व डाक पंजीयन नंबर जीपीओएलडब्ल्यू/एनपी -78/2011-13 प्रकाशित किया जा रहा है।

जनसंदेश टाइम्स का प्रकाशन लखनऊ के अलावा कानपुर, गोरखपुर व बनारस से भी होता है तथा अभी तक केवल लखनऊ को आरएनआई नंबर मिल सका है। कानपुर, गोरखपुर व बनारस को अभी तक आरएनआई नंबर नहीं मिला है। इस अख़बार का यह हाल तब है जब इसी प्रिंट लाइन में प्रधान संपादक ज्ञानेंद्र शर्मा (पूर्व सूचना आयुक्त उ.प्र.) व स्थानीय संपादक में वरिष्ठ पत्रकार आशीष बागची का नाम प्रकाशित होता है। पता नहीं आज तक इन वरिष्ठों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया?

इस सम्बन्ध में जनसंदेश टाइम्स, लखनऊ के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार से बात की तो उनका जवाब तो और भी मजेदार था। उनका कहना था कि ये तो कुछ नहीं है कभी-कभी तो एक संस्करण क़ी प्रिंट लाइन दूसरे संस्करण में प्रकाशित हो जाती है। विगत 23 मार्च को गोरखपुर में कानपुर क़ी प्रिंट लाइन प्रकाशित हुई थी। शुरुआती दौर में गोरखपुर संस्करण में भी लखनऊ का आरएनआई नंबर जाता था, जिसे बाद में सुधारा गया था और तो और 1 मार्च को कानपुर संस्करण में प्रकाशित होने वाला फार्म 4ए लखनऊ संस्करण का ही प्रकाशित हो गया था। 

इस ओर जब प्रबंधकों का ध्यान दिलाया गया तो गलती सुधारने क़ी बजाय उस तारीख के अख़बार को ही अपनी वेबसाइट से हटा दिया। बताया जाता है कि आजकल प्रबंधन का ध्यान एनआरएचएम घोटाले में फंसे पूर्व एमडी सौरभ जैन (जेल में बंद) व वर्तमान एमडी अनुज पोद्दार से सीबीआई द्वारा की जा रही पूछताछ पर लगा हुआ है, इसलिए इन गलतियों की ओर किसी का भी ध्यान नहीं है। पता नहीं किन कारणों से बीच अखबार के पन्‍ने भी कम कर दिए गए थे।  

राजेंद्र गुप्‍ता  

कानपुर 

 

 
 

 

प्रभात खबर में पहले पन्‍ने पर प्रकाशित हुई थी आयकर छापेमारी की खबर

मनीष द्वारा लिखा गया लेख 'बिहार में किस्‍सा वही दोहराया गया, नीतीश से जुड़ी निगेटिव खबर को दबाया गया' न सिर्फ आधा-अधूरा सत्‍य है बल्कि यह पूरी तरह से भ्रामक भी है. मनीष बिना अखबार को पढ़े या तथ्‍यों को जाने-समझे लिखा है कि नीतीश को बचाने के लिए कुछ अखबारों ने खबर प्रकाशित नहीं की है जबकि हिंदुस्‍तान और प्रभात खबर ने इसे अंदर के पन्‍नों पर लिया है. खबर से लग रहा है कि मनीष या तो अखबार पढ़ते नहीं या किसी दुर्भावना से ग्रसित होकर उन्‍होंने यह लेख लिखा है.

मनीष लिखते हैं कि विनय कुमार सिन्‍हा के संस्‍थानों पर छापेमारी की खबर को प्रभात खबर ने 23 मार्च शुक्रवार को अपने नौंवें पन्‍ने पर प्रकाशित किया, परन्‍तु लग रहा है कि लेखक 22 मार्च का अखबार पढ़ना भूल गए. प्रभात खबर ने विनय कुमार सिन्‍हा तथा अन्‍य लोगों के ठिकानों पर आयकर की छापमारी की खबर को 22 मार्च गुरुवार को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया, वो भी अपने पहले पन्‍ने तथा टॉप पर.

 

 
 

 

अंबाला भास्कर में लीड हेडिंग- अम्बाला शहर में सम्पूर्ण इलैक्ट्रोनिक्स शौरूम सरगम का उदघाटन कल….

जी हां. बात दैनिक भास्कर की हो रही है. अंबाला में लोकल पेज अंबाला भास्कर के नाम से निकलते हैं. लोकल के पहले पेज पर लीड हेडिंग आठ कालम में है- अम्बाला शहर में सम्पूर्ण इलैक्ट्रोनिक्स शौरूम सरगम का उदघाटन कल…. इसके नीचे दो चार हेडिंग और हैं. एक हेडिंग है- 1 घंटे रूकी रही सदा ए सरहद. यह हेडिंग चार कालम में है. सिटी और कैंट में 41 केंद्रों पर सिविल सेवा परीक्षा आज. यह सिंगल कालम है. बलजिंद्र के हत्यारोपियों को पनाह देने वाला काबू. यह हेडिंग दो कालम में है. शुरुआती पहले कालम में नवरात्रि के तृतीय चंद्रघंटा के बारे में वर्णन है.

ये सभी नीचे की चारों हेडिंग व इससे संबंधित खबरें तो समझ में आ रही हैं, क्योंकि इनका विस्तार भी दिया गया है. लेकिन जो पहली लीड हेडिंग है वह समझ से परे है. 'अंबाला शहर में संपूर्ण इलेक्ट्रोनिक्स शोरूम सरगम का उदघाटन कल' शीर्षक के अलावा इसका कोई विस्तार नीचे नहीं है. जाहिर है. यह लीड खबर नहीं है. यह विज्ञापन है. जिसे लीड खबर के अंदाज में हेडिंग बनाकर दिया गया है. लेकिन कहीं विज्ञापन नहीं लिखा गया है. यानि सौ फीसदी यह पेड न्यूज सरीखा है. पाठकों को चीट करने वाला है, पाठकों से धोखा करने वाला है, पाठकों के प्रति अन्याय करने वाला है. क्या पैसे लेकर इस तरह की हेडिंग लगाकर पाठकों को ठगने के धंधे का कोई तोड़ है? सुन रहे हैं जस्टिस काटजू. सिर्फ बात करने से नहीं, इन माफिया मीडिया घरानों के खिलाफ एक्शन लेने से बात बनेगी. अंबाला भास्कर के पहले पेज को देखिए…

अँबाला के एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

 

 
 

 

स्टार न्यूज वालों, तुम किस चीज से सहमत हो, लिस्ट जारी कर दो

लोकसभा में लोकपाल बिल पर शरद यादव के संबोधन की पुरानी क्लीपिंग आज जब जंतर मंतर पर दिखाई गई तो आखिर में टीम अन्ना के मनीष सिसोदिया ने नारा लगाया- इसे कहते हैं चोर की दाढ़ी में… और जनता ने इस मुहावरे को समवेत स्वर में पूरा किया-… तिनका. बस, टीवी वालों को मिल गया मसाला. स्टार न्यूज वालों ने तो हद कर दी. वे डिस्क्लेमर दिखाने के बाद इस खबर को दिखा रहे हैं. डिस्क्लेमर के दौरान स्टार न्यूज की तरफ से कहा जाता है कि हम टीम अन्ना के बयानों से सहमत नहीं हैं, हम सिर्फ ये खबर रिपोर्ट कर रहे हैं, हम सांसदों का सम्मान करते हैं. कुछ इसी टाइप की बात कहने के बाद स्टार न्यूज पर शरद यादव – मनीष सिसोदिया नारेबाजी प्रकरण को दिखाया जा रहा है.

कई लोगों को आश्चर्य है कि आज अचानक स्टार न्यूज को क्या हुआ जो वह डिस्क्लेमर के साथ यह खबर दिखाने लगा. इससे तो पता चला कि इस खबर में एक पक्ष द्वारा दिए गए बयान से स्टार न्यूज सहमत नहीं है लेकिन बाकी खबरों पर स्टार न्यूज क्यों नहीं बताता कि वह किस पक्ष की बात से असहमत या सहमत है. कायदे से उसे हर खबर में एक डिस्क्लेमर दिखा देना चाहिए कि इस खबर पर स्टार न्यूज का स्टैंड क्या है. और, ज्यादा अच्छा होगा कि स्टार न्यूज हर आधे घंटे बाद अपने यहां जरूर दिखा दे कि वह किन किन बातों से सहमत है.. एक पूरी लिस्ट जारी कर दे.

टीम अन्ना के लोगों ने क्या गलत कहा. संसद में डकैत बैठते हैं, चंबल में तो बाकी रहते हैं.. वाला पान सिंह तोमर फिल्म का डायलाग अरविंद केजरीवाल ने फिल्म का जिक्र करते हुए उद्धृत किया, क्या गलत किया. मनीष सिसौदिया ने अगर चोर की दाढ़ी में तिनका वाला मुहावरा बोला तो क्या गलत बोला. अन्ना हजारे ने लालू यादव के कमेंट पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि जो लोग दस दस बच्चे पैदा करते हैं उन्हें क्या पता कि ब्रह्मचर्य की ताकत क्या है, तो यह बयान देकर अन्ना ने क्या गलत किया. दरअसल, समस्या की जड़ में न जाकर ये चैनल वाले भ्रष्ट नेताओं की कतार में खड़ा होकर नान इशू को इशू बना रहे हैं. मुद्दा ये है कि चरम पर पहुंचे भ्रष्टाचार से देश की जनता पक चुकी है, सिस्टम में सड़े और गले लोगों के नेतृत्व से जनता आजिज आ चुकी है और जनता की आवाज को आवाज व मंच दे रहे हैं अन्ना व उनके लोग. अगर नेता लोग, खासकर कांग्रेसी अगर अब भी नहीं चेते तो 2014 के लोकसभा चुनाव में रामदेव और अन्ना के लोग इनकी जड़ खोद देंगे. और, यह करना जरूरी भी है क्योंकि ये कांग्रेसी खुद को भाग्य विधाता समझ बैठे हैं. लगातार करप्शन हो रहा है और करप्शन करने वालों को सत्ता का पूरा संरक्षण मिल रहा है. टीम अन्ना ने 14 भ्रष्टाचारी मंत्रियों को जेल भेजने वाली जो बात कही है, वह सबसे बड़ा मुद्दा है. इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए. आईबीएन7 पर यही मुद्दा मुख्य मुद्दा बना और इसी कारण आज आईबीएन7 सबसे अच्छे तरीके से पूरे मामले को प्रस्तुत करते दिखा.

भड़ास के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट.

 

 
 

 

चंडीगढ़ प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष बने सुखबीर सिंह बाजवा, नलिन आर्चाय महासचिव

प्रतिष्ठित चंडीगढ़ प्रेस क्‍लब के लिए हुए चुनाव में सुखबीर सिंह बाजवा ने अध्‍यक्ष पद पर अपना परचम फहराया है. सुखबीर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी विनय मलिक को 233 मतों से पराजित किया. विनय को मात्र 52 वोट ही प्राप्‍त हुए. बाकी पदों पर निर्विरोध चयन हुआ. सीनियर वाइस प्रेसिडेंड पद पर मानवीर सिंह सैनी, वाइस प्रेसिडेंट (रिजर्व) पर निशा शर्मा,  वाइस प्रेसिडेंट द्वितीय पर जसवंत सिंह राना चुने गए.

महासचिव पद पर भी नलिन आचार्य का निर्विरोध चयन हुआ. सचिव अवतार सिंह, संयुक्‍त सचिव द्वितीय पर रमेश हांडा तथा कोषाध्‍यक्ष पद पर विक्रांत परमार भी निर्विरोध चुने गए. रिटर्निंग ऑफिसर शाम सिंह ने सभी विजय प्रत्‍याशियों के नामों की घोषणा की.

 

 
 

 

प्रभात खबर की पत्रकार अलमास फातमी को एसपी सिंह पुरस्‍कार मिला

प्रभात खबर, पटना की महिला पत्रकार अलमास फातमी को एसपी सिंह पुरस्‍कार से नवाजा गया. शनिवार को पटना पुस्‍तक मेले में आयोजित कार्यक्रम में कवि अशोक वाजपेयी ने प्रदान किया. अलमास को यह पुरस्‍कार पत्रकारिता में उनके द्वारा किए गए योगदान के लिए दिया गया है. उनके अलावा विद्यापति साहित्‍य पुरस्‍कार भोजपुर के युवा साहित्‍यकार समालोचक अभिषेक अवतंस को तथा भिखारी ठाकुर रंगकर्म पुरस्‍कार पटना के रंगकर्मी उदय कुमार को दिया गया. 

अभिषेक एवं उदय को यह पुरस्‍कार साहित्‍य एवं रंगकर्म में उनके योगदान के लिए दिया गया. इस दौरान काफी संख्‍या में लोग उपस्थित रहे. उल्‍लेखनीय है कि इन पुरस्‍कारों की घोषणा पहले ही कर दी गई थी.

 

 
 

 

मीडिया से देश को खतरा!

ये बात जो लोग मीडिया में हैं उन्हें अटपटा सा लगे, या वो मानने को तैयार न हो, पर सच्चाई यहीं हैं कि आज मीडिया से देश को खतरा उत्पन्न हो गया हैं, ऐसे में जरुरी हैं कि सरकार मीडिया पर लगाम लगाये, उन्हें नियंत्रित करे अथवा कुछ ऐसे उपाय ढूंढे ताकि देश व समाज को मीडिया की खतरों से बचाया जाये। मीडिया से देश व समाज को कैसे खतरा उत्पन्न हो गया हैं। उसका एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिस पर मीडिया के लोगों को ही खुद आत्ममंथन करने की जरुरत हैं।

ज्वलंत उदाहरण — आज ज्यादातर राष्ट्रीय चैनल, अपनी महत्वाकांक्षा को पाने के लिए, एकमात्र लक्ष्य रुपये कमाने के लिए आधे घंटे का या रुपये पर जितना मन चाहे, उतने घंटे का स्लॉट बेच दे रहे हैं और इन स्लॉटों में क्या होता हैं। आप खुद देखिये। एक ठग आता हैं। अपने को बाबा कहता हैं। और ठग विद्या द्वारा पूरे देश में अपना जादू चलाकर, खुद को प्रतिष्ठित कर लेता हैं। यानी कल तक जिस व्यक्ति को कोई नहीं जानता हैं, वो व्यक्ति पल भर में ही, पूरे देश में इस प्रकार अपनी धर्मसत्ता स्थापित कर लेता हैं कि इन राष्ट्रीय चैनलों को मुंहमांगी रकम देकर, वो बाबा अपनी जयजयकार करवाता हैं। फिलहाल देश में दो बाबाओं ने ऐसी कमाल दिखायी हैं कि एक बाबा तो बनिये की दुकान से लेकर, चैनल और दवाओं की दुकान तक खोल दी हैं, जबकि दूसरा बाबा अपना थर्ड आई खोलकर, पल भर में अनारक्षित रेलवे टिकट को कन्फर्म तक करा देता हैं, यहीं नहीं खानेवाले बिस्कुट का कारोबार करने वाले व्यक्ति को वो सोने का बिस्कुट का कारोबार तक करनेवाला बनाने का दावा कर देता हैं, यहीं नहीं इस बाबा ने तो हद कर दी हैं… हर प्रश्न का उटपुटांग जवाब देकर, स्वयं को प्रतिष्ठित कर देता हैं।

ऐसे में इन बाबाओं को देख, गोस्वामी तुलसीदास की वो पंक्ति याद आ जाती हैं, वो पंक्ति जो श्रीरामचरितमानस में लिखा हैं — पंडित वो ही सो गाल बजावा। यानी कलयुग में जो जितना गाल बजायेगा, वो उतना बड़ा ज्ञानी कहलायेगा। एक नहीं कई चैनल हैं — जो इस प्रकार के गोरखधंधे में शामिल हैं, पर सरकार इन पर कार्रवाई नहीं करती। कमाल हैं इन बाबाओं ने इन चैनलों की टीआरपी भी बढ़ा दी हैं, यानी एक पंथ दो काज। पहला की बाबा से रुपये भी मिल गये और टीआरपी भी मिल गयी। जबकि ये चैनल, रजिस्ट्रेशन कराने के समय़ सिर्फ न्यूज चलाने की बात करते हैं, पर न्यूज के नाम पर ये क्या कर रहे हैं, सभी को पता हैं। आज देश के विभिन्न गांवों और शहरों में देश के महान संत — कबीर, नानक, रविदास, नामदेव, तुकाराम, तुलसीदास, मीराबाई, नरसीमेहता, सुरदास, रसखान आदि के चित्र नहीं बिकते या इन्हें जाननेवाले लोगों की संख्या नगण्य हैं, पर टीवी वाले ठग बाबा के फोटो खुलेआम बिक रहे हैं, उन्हें लोग जानते हैं। हमारे देश में जितने भी संत हुए, उन्होंने देश को सिर्फ दिया, क्योंकि संत केवल देता हैं, वो देश से लेता नहीं। ठीक उसी प्रकार जैसे गंगा बहती रहती हैं, वो हमेशा उपकार करती हैं, चाहे लोग उसमें मैला बहाये अथवा उससे खुद को तृप्त करने का कार्य करें। ऐसे होते हैं संत। पर आज के संत को देखिये, बाबाओं को देखिये।

ये बाबा टेंट – मर्चेंट के कारोबारियों से शादी में लगनेवाले एक कुर्सी पर बैठता हैं, तीन तसिया का जो खेल होता