चीखने-चिल्लाने के मामले में एंकर अमीश देवगन का देसी वर्जन मिल गया… देखें वीडियो

सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब शेयर हो रहा है जिसमें एक पत्रकार कुछ ग्रामीणों से उनकी पीड़ा के बारे में बात कर रहा है. पहले तो शुरुआत में ही बिना जाने यह पत्रकार ऐलान कर देता है कि यह जो स्त्री खड़ी है, उसका पति मर गया है. तब गांव वाले करेक्ट करते हैं कि मरा नहीं है इसका पति. उसके बाद चीख चीख कर पत्रकार ग्रामीणों की समस्या के बारे में बताता है. Continue reading

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अमीश देवगन ने दोबारा गालियां सुनीं या कहिए जो पहले सुनी थीं, उन्हें कंफर्म करा लिया, देखें वीडियो

Sanjaya Kumar Singh : अमीश देवगन ने दोबारा गालियां सुनीं या कहिए जो पहले सुनी थीं उन्हें कंफर्म करा लिया। अब पत्रकार ऐसे ही गाली सुनेंगे, माफी मांगने का मौका देने के बाद भी कोई माफी नहीं मांगेगा और ये प्रसारित करने को मजबूर होंगे। हिन्दू-मुस्लिम पर चर्चा करेंगे और किन विषयों पर चर्चा नहीं करते हैं वो भी सुनिए कांग्रेस प्रवक्ता से …. हालांकि पकौड़े बेचना और ऑटो चलाना रोजगार है तो पत्रकारिता पर कहां सवाल है? दलाली और भड़वा होना तो जमाने से चला आ रहा रोजगार है। Continue reading

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अमीश देवगन जैसे स्टार एंकर से मज़बूत तो साप्ताहिक झपट्टा टाइम्स का पत्रकार है!

Naved Shikoh : छोटे अखबार के पत्रकार को ‘भड़वा’ तो दूर कोई ‘कड़वा’ बोल दे तो विरोध की आंधी आ जाये… चकाचौंध वाले देश के टॉप क्लास बड़े-बड़े न्यूज चैनल्स के नामी-गिरामी स्टार मीडिया कर्मियों से कहीं ज्यादा ताकतवर और एकजुट हैं हम। हमारे लखनऊ के छोटे से छोटे पत्रकार की फटफटिया के हैंडिल पर ट्राफिक पुलिस का सिपाही हाथ भी रख देता है तो हम लोग सिपाही को निलंबित करने का ज्ञापन लेकर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह या प्रमुख सचिव सूचना के कमरे में धावा बोल देते हैं। Continue reading

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कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी ने एंकर अमीश देवगन को ‘दलाल’ और ‘भड़वा’ कह दिया!

कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी ने न्यूज18 चैनल पर डिबेट के दौरान लाइव शो में एंकर अमीश देवगन को भड़वा और दलाल कह दिया. एंकर के एक सवाल के जवाब में राजीव त्यागी ने कहा कि ”हमने पांच सौ चैनल खोल कर रख दिए और तुम जैसे लोग पत्रकार बन गए, इसलिए मुल्क भोग रहा है.” Continue reading

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‘मेरा दिमाग ही मेरा दुश्मन है’ लिख कर महिला एंकर ने किया सुसाइड

भारत में एक महिला एंकर यह लिखकर सुसाइड कर लेती है कि- ”मेरा दिमाग ही मेरा दुश्मन है”.  आत्महत्या करने वाली यह महिला एंकर अपने पति से तलाक के बाद डिप्रेशन में चल रही थी. मामला आंध्र प्रदेश का है.   Continue reading

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संबित पात्रा ‘आजतक’ न्यूज चैनल में एंकर बन गए… मुझे तो शर्म आई… आपको?

आजतक के मालिक साहब अरुण पुरी जी कहते हैं कि लोकतंत्र खतरे में हैं और मीडिया पर हमले हो रहे हैं… दूसरी तरफ वे अपने ही चैनल में एंकर की कुर्सी पर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को बिठा देते हैं. कैसा दौर आ गया है जब मीडिया वालों को टीआरपी के कारण सिर के बल चलना पड़ रहा है. टीवी वाले तो वैसे भी सत्ताधारियों और नेताओं के रहमोकरम पर जीते-खाते हैं लेकिन वे शर्म हया बेच कर नेताओं-प्रवक्ताओं को ही एंकर बनाने लगेंगे, भले ही गेस्ट एंकर के नाम पर तो, इनकी बची-खुची साख वैसे ही खत्म हो जाएगी.

गेस्ट एंकर बनाना ही था तो किसी आर्टिस्ट को बनाते, किसी डाक्टर को बनाते, किसी बेरोजगार युवक को बनाते, किसी स्त्री को बनाते, किसी ग्रामीण को बनाते… किसी खिलाड़ी को बनाते… किसी संगीतकार को बनाते… किसी साहित्यकार को बनाते… किसी रंगकर्मी को बनाते…. अपनी रचनात्मकता और बौद्धिकता के बल पर दुनिया में नाम रोशन करने वाले किसी भी भारतीय को बना लेते… नासिक से मुंबई मार्च कर रहे किसानों में से किसी एक को बना लेते… जनांदोलनों से जुड़े किसी शख्स को बना लेते…

लंबा चौड़ा स्कोप था गेस्ट एंकर बनाने के लिए… लेकिन मोदी भक्ति में लीन न्यूज चैनलों को असल में कुछ भी दिखना बंद हो गया है… उनकी सारी रचनात्मकता अब किसी भी तरह भाजपा को ओबलाइज करते रहने की हो गई है… वे जज लोया कांड पर विशेष स्टोरी नहीं बनाएंगे… कोई सिरीज नहीं चलाएंगे… वे पीएनबी बैंक स्कैम के आरोपियों से मोदी जी के रिश्ते को लेकर पड़ताल नहीं करेंगे…

वे इन सब पर बुरी तरह चुप्पी साध जाएंगे लेकिन जब अगर तेल लगाने की बात आएगी तो भांति भांति तरीके से बीजेपी वालों को तेल लगाते रहेंगे… गाना गा गा के तेल लगाएंगे… अपना मंच उनके हवाले करके तेल लगाएंगे… जियो मेरे न्यूज चैनलों के छम्मकछल्लो….

किसी भी नेता को गेस्ट एंकर बनाने की इस खतरनाक प्रथा का मैं कड़ी निंदा करते हुए अपना विरोध दर्ज कराता हूं….

वैसे, आजतक को मेरी एडवांस सलाह है कि अपने दिवालियापन को विस्तार देते हुए अगले गेस्ट एंकर के तौर पर वह मोदी जी के दो खास उद्योगपतियों में मुकेश अंबानी जी या गौतम अडानी जी में से किसी एक को बुला लें… या चाहें तो क्रमश: दोनों को मौका दे दें…  पत्रकारिता सदा अरुण पुरी एंड कंपनी की एहसानमंद रहेगी…

भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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रोहित सरदाना के समर्थन में उतरा बीईए, धमकी दिए जाने की निंदा की

ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन यानि बीईए यानि टीवी चैनल्स के संपादकों की संस्था ने आजतक चैनल के एंकर रोहित सरदाना के समर्थन में एक बयान जारी कर उन्हें धमकाए जाने की निंदा की. बीईए प्रेसीडेंट सुप्रिय प्रसाद ने इस बारे में जो बयान जारी किया है, वह इस प्रकार है-

”BEA condemned vicious threats issued to Aajtak anchor Rohit Sardana for his tweets questioning bias over freedom of expression. He was slammed with life-threatening calls and msgs.The BEA urges the law-enforcement agencies to ensure safety and protection of Rohit n his family. such acts of intolerance in the world’s largest democracy that is constitutionally bound to protect free speech”.

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महिला एंकर ने घूंघट ओढ़े डिबेट शो की शुरुआत कर हरियाणा सरकार की तुच्छ मानसिकता को मारा तमाचा (देखें तस्वीरें और वीडियो)

आपने तरह-तरह के लाईव शो, डिबेट, बुलेटिन देखा होगा. लेकिन यदि आप अपना टीवी सेट आन करते हैं और सामने टीवी की एंकर घूंघट कर लाईव डिबेट करती नजर आए तो आप जरुर चौंक जाएंगे. ऐसा ही कुछ हुआ STV HARYANA NEWS में. हरियाणा के इस रीजनल न्यूज चैनल की एग्जीक्यूटिव एडिटर और एंकर प्रतिमा दत्ता ने लाईव शो की शुरुआत घूंघट ओढ़कर की.

इसके पीछे वजह है हरियाणा सरकार की वह हरकत जिसमें घूंघट को महिलाओं के लिए आन बान शान बताया गया है. हरियाणा सरकार की ‘कृषि संवाद’ नामक पत्रिका में घूंघट वाली महिला की तस्वीर छपी है. महिला अपने सिर पर चारा लेकर जा रही है. इसमें कैप्शन में लिखा है- ”घूंघट की आन-बान, म्हारे हरियाणा की पहचान”. इसको लेकर हरियाणा सरकार घिर गई है.

जहां एक तरफ हरियाणा की बहू बेटियों ने घूंघट से बाहर निकलकर देश-प्रदेश का नाम रोशन किया. वहीं हरियाणा सरकार द्वारा घूंघट को हरियाणा की पहचान बनाना और बताना बेहद छोटी सोच का उदाहरण है. हरियाणा सरकार की इसी ‘तुच्छ सोच’ के खिलाफ प्रतिमा दत्ता ने महिलाओं का पैनल बिठा कर घूंघट में लाईव डिबेट की शुरुआत की और प्रदेश सरकार की आंख खोलने की कोशिश की. उन्होंने अपने इस शो के जरिए बता दिया की अब बहू–बेटियां घूंघट से बाहर निकलकर बहुत आगे निकल चुकी हैं और पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, इसलिए इन्हें फिर से घूंघट में न कैद किया जाए.

इस चर्चिच डिबेट शो को देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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सईद अंसारी यानि एक अद्भुत एंकर, एक बेजोड़ इंसान

Vikas Mishra : सईद अंसारी…नाम तो सुना होगा..। जितने बढ़िया एंकर, उतने ही बेहतरीन इंसान भी। हमेशा हंसते हुए और गर्मजोशी के साथ मिलते हैं। हर किसी की मदद के लिए तैयार, पक्के यारबाज। मुझे नहीं लगता कि दुनिया में कोई ऐसा भी इंसान होगा, जिसने कभी ये शिकायत की हो कि सईद अंसारी ने मुझसे कोई गलत बात की, तल्ख आवाज में बात की। जमीन से बिल्कुल जुड़े हुए, बिल्कुल इगोलेस, कमाल के इंसान। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अगर किसी एंकर का कोई स्लॉट तय है तो वो कभी भी बर्दाश्त नहीं कर सकता कि उस स्लॉट में कोई और एंकरिंग करे, लेकिन सईद भाई इस नियम से परे हैं।

न्यूज 24 में जब मैं शाम साढ़े सात बजे का न्यूज स्पेशल बनाता था, तब उसके एंकर एक रोज सईद भाई होते थे, अगले रोज अंजना। अगर कोई हल्का फुल्का या फिर किसी फिल्मी मसालेदार सब्जेक्ट पर शो होता था तो मैं सईद भाई से कह देता कि ये सब्जेक्ट आप लायक नहीं है, आप हमारे मुख्य एंकर हैं, तो मैं इसे किसी नए एंकर से करवा लेता हूं। सईद भाई बिल्कुल तैयार। बोलते-जी हां विकास भाई आप सही कह रहे हैं। सईद के इस दरियादिली में न्यूज 24 में कई नए एंकर भी तैयार हो गए। कई बार उनके साथ एंकरिंग में मैंने कुछ प्रयोग भी किए, सईद भाई हर बात के लिए तैयार मिलते।

सईद अंसारी के साथ बहुत सी खूबियां जुड़ी हैं। ये कुल दो- ढाई मिनट में कोट-टाई पहनकर तैयार हो जाते हैं। चलते कम हैं, दौड़ते ज्यादा हैं। न्यूजरूम में भी दौड़ते ही रहते हैं। हमेशा इनके चेहरे पर आपको ताजगी दिखेगी। सईद भाई तो स्टार न्यूज में लगातार 18 घंटे बिना ब्रेक के लाइव एंकरिंग करके वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना चुके हैं। जिसे लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में बाकायदा दर्ज किया गया है। काम के जुनून का एक मजेदार वाकया सुनिए। न्यूज 24 में सईद भाई घंटों से एंकरिंग कर रहे थे। कोई बड़ी घटना हो गई थी। उस वक्त चैनल पर विजुअल चल रहे थे, पीछे सईद अंसारी की आवाज आ रही थी। अचानक उनकी आवाज के साथ, वॉशरूम में फ्लश चलने की हल्की सी आवाज आई। दस सेकेंड में बंद भी हो गई। दरअसल हुआ ये था कि सईद भाई को जोरों से वाशरूम जाने की तलब लगी हुई थी, लेकिन वो मौका नहीं ढूंढ पाए थे। ईपी (इयरफोन) उनके कान में था, पैनल को उन्होंने इशारे में बता भी दिया था। वो मुतमईन थे कि इस दौरान उन्हें स्क्रीन पर दिखाया नहीं जाएगा, इस बीच वो वाशरूम चले गए, खबर के बारे में बोलते रहे, और वाशरूम से फारिग होकर लौट भी आए।

साल 2009 की बात है, तब मैं जब न्यूज 24 में था। मोटरसाइकिल छोड़कर कार खरीदने का मूड बना रहा था। कई बार मीटिंग में भी मेरी कार का मुद्दा उठ गया। मेरे सामने सवाल कुछ पेशगी की रकम का था, क्योंकि मेरे अकाउंट में कभी पैसे अमूमन न पहले रहे, न उस वक्त रहे, न आज रहते हैं। खैर, एक रोज मेरे मोबाइल में बैंक से एक मैसेज आया, जिसके मुताबिक मेर खाते में 60 हजार रुपये आए थे। मैं परेशान कि ये पैसे कहां से आए। मैंने चैनल की मीटिंग में भी कहा कि न जाने कहां से खाते में 60 हजार रुपये आए हैं, कहीं तनख्वाह दो बार तो नहीं आ गई। सईद भाई बोले-अरे विकास भाई, पैसे आ गए तो सोचिए मत, अब कार खरीद लीजिए। शाम को मेरी परेशानी भांपते हुए सईद भाई ने बताया-विकास भाई आपका अकाउंट नंबर पता करके ये मैंने ही भेजा है, अब कार खरीदिए। खैर, उस वक्त मैंने वैगन आर कार खरीदी, जिसे प्यार से मेरे घर में वैगू नाम दिया गया। कार आ गई, पैसे चुक गए। मजे की बात ये थी कि कई बार न्यूजरूम में जब सईद तेजी से पास से गुजरते तो मैं जोर से उनसे कहता-सईद भाई मुझसे पैसा उधार लिए हैं क्या जो नजर बचाकर निकल रहे हैं। सईद झेंप जाते, क्योंकि उन्होंने सख्ती से मना कर रखा था कि उनसे पैसे लेने वाली बात मैं किसी से न कहूं।

सईद भाई को बच्चों से बहुत प्यार है। किसी पार्टी वगैरह में जाते हैं तो सभी बच्चों का मजमा जुटा लेते हैं। उन्हें बाकी लोगों से मिलना जुलना उतना रास नहीं आता, जितना बच्चों के बीच वो रमते हैं। हमारे वरिष्ठ साथी कहते हैं-सईद अंसारी ही अगला चाचा नेहरू बनेगा। जो बच्चा सईद भाई से एक बार मिल ले, फिर उनका फैन हो जाता है। कोई भी सईद भाई को न्योता दे, सईद भाई पहुंचते जरूर हैं, हालांकि वो अक्सर पार्टी में पहुंचने वाले और पार्टी से जाने वाले सबसे आखिरी सदस्य होते हैं।

2009 में सईद भाई ने नई नई स्कॉर्पियो खऱीदी थी। न्यूज 24 की छत पर एक रोज यूं ही बातचीत में मैंने उनसे कहा कि इस बार गांव जाऊंगा तो आपकी स्कॉर्पियो ले जाऊंगा। सईद भाई ने चाबी जेब से निकाली, बोले-अभी लीजिए। मैंने कहा-जब जाऊंगा तो ले लूंगा। सईद बोले नहीं, अभी लीजिए, मैं आपकी वैगन आर ले लूंगा। संयोग देखिए, जब हम लोग छत पर रात में ये बातचीत कर ही रहे थे, उसी रात उनकी नई नवेली स्कॉर्पियो चोरी हो गई। सईद के चेहरे पर इसका मलाल नहीं था। वो पहले जैसे ही मस्त नजर आते रहे।
सईद एंकर हैं, उनके हजारों फैन हैं, जब वो चैनल की वेबसाइट पर फेसबुक लाइव में आते हैं तो पल भर में हजारों लाइक्स, शेयर और कमेंट आ जाते हैं। जब सईद बाहर जाते हैं, उनके साथ फोटो खिंचवाने और सेल्फी लेने वालों में होड़ मच जाती है।

सईद किसी को निराश भी नहीं करते। सईद जैसे हैं, वैसे ही रहना और दिखना चाहते हैं, किसी शोहरत की उन्हें दरकार नहीं, शायद यही वजह है कि लोगों के लाख कहने के बावजूद सईद ने न तो फेसबुक पर अपना अकाउंट बनाया और न ही ट्विटर पर। सईद से आप कभी किसी बड़े ओहदेदार से दोस्ती या रिश्तों का जिक्र नहीं सुनेंगे ( हालांकि उनके ऐसे कई लोगों से अच्छे रिश्ते हैं), लेकिन दफ्तर के गार्ड, हाउस ब्वाय, पैनल के स्टाफ, स्विचर और तमाम कनिष्ठ साथियों से सईद के हमेशा अच्छे रिश्ते रहते हैं। सईद रोजाना सबका हाल चाल पूछते हैं। सभी गार्ड्स से उनके अच्छे रिश्ते हैं, यही वजह है कि दफ्तर में उनकी गाड़ी के लिए कभी पार्किंग फुल नहीं होती। ऊंचाई पर पहुंचकर भी किस तरह इंसान विनम्रता बनाए रखे, ये पाठ सईद अंसारी अपने व्यक्तित्व से हमें रोज पढ़ाते रहते हैं।

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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यूपी के मुसलमान, आजतक चैनल और एंकर अंजना कश्यप

Arun Maheshwari : यूपी के मुसलमान और ‘आज तक’… ‘आजतक’ चैनल की एक एंकर है अंजना कश्यप। हमेशा वीर रस वाले भाव बोध में रहने वाली -‘दुर्गा वाहिनी’ वालों का तेवर लिये हुए। आज वे यूपी की राजनीति में मुसलमानों के बारे में एक रिपोर्ट पेश कर रही थी। मुसलमान देश के अन्य सभी तबक़ों से कितने पिछड़ गये हैं, इसके तमाम आँकड़े रख रही थी।

जैसे प्रधानमंत्री मोदी यूपी वालों की चर्चा करते हैं तो उनमें एक अजीब सा हिक़ारत का भाव छा जाता है। आपको लगेगा कि जैसे यूपी के लोगों जितना अधम प्राणी इस धरती पर कोई नहीं है! ये गुंडे हैं, हत्यारें और बलात्कारी हैं। हर लिहाज से पिछड़े हुए- ख़ास तौर पर उनके गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान से तो बुरी तरह पिछड़े हुए! प्रधानमंत्री का यूपी के लोगों के साथ खेला जा रहा यह एक अनोखा मनोवैज्ञानिक खेल है। पहले आदमी को हीनता-ग्रंथी में डालो और फिर उस दबे हुए आदमी पर शासन करो।

‘आज तक’ चैनल पर अंजना जी का तेवर भी ऐसा ही था। इन्हीं अंजना जी को आप अक्सर मुस्लिम तुष्टीकरण के लिये सेकुलर पार्टियों को लताड़ते हुए देख सकते हैं। इसी से पता चलता है कि मुसलमानों की दुर्दशा से इनके मन में उनके प्रति कोई सहानुभूति पैदा नहीं होती है और न ही व्यवस्था के प्रति कोई ग़ुस्सा। इनका उद्देश्य सिर्फ मुसलमानों की छवि को बदतर दिखाने का होता है।

ईमानदारी का तक़ाज़ा तो यह है कि मुसलमानों की इस बुरी दशा को देख कर उन्हें मुस्लिम तुष्टीकरण की तरह की बात करने वालों को कठघरे में खड़ा करना चाहिए। माँग करनी चाहिए कि अल्प-संख्यकों के उत्थान की विशेष योजनाएँ बने। उन्हें सांप्रदायिक उपद्रवियों के खौफ से पूरी तरह मुक्त किया जाए। सांप्रदायिक ज़हर फैलाने वालों को दंडित किया जाए। लेकिन ये तो उल्टे ‘तुष्टीकरण’ का राग अलापने वालों की सेवा में लगी रहती है!

साहित्यकार अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Uday Prakash किसी चेहरे पर जब ऐसी छपी हुई सतत हिक़ारत हो और आवाज़ के भीतर हर पल कौंधती आग, वह चेहरा किसी मनुष्य का तो लगता नहीं। स्त्री, पुरुष, हिंदू-मुसलमान, पत्रकार-पुलिस, संघी या कम्युनिस्ट, ब्राह्मण या दलित तो बहुत दूर की बात है।

Vasudev Sharma आपको हर ऐसे गैरे पर शब्दों की पूंजी नहीं लुटानी चाहिए. मीडिया में अंजना जैसों की बडी जमात है जिन्हें कुछ भी कहलवाने के लिए तैनात किया गया. अंजना के साथ एक और हैं श्वेताजी. कभी कभी इन दोनों में होड़ भी होती गिरने की

Ish Ish इन बिके हुए पत्रकारों का लगातार भंडाफोड़ करते रहने की जरूरत है.

Suresh Swapnil ‘ब्राह्मण की बेटी’ है, भाई जी। चैनल के मालिकान को भी आजकल अपनी ब्रह्म-ग्रंथि याद आने लगी है।

Vidya Sagar Singh पूण्य प्रसून वाजपेयी के बारे में क्या ख्याल है? आपलोग विरोधी बातो को क्यों नहीं स्वीकार कर पाते हैं। आपको क्यों लगता है कि सारे एंकर रवीश कुमार और वाजपेयी की भाषा बोलेंगे?

Arun Maheshwari नहीं। हर किसी को अपनी राय रखने का पूरा हक़ है। हमें भी हर किसी के बारे में अपनी राय बनाने का हक़ है।

Asghar Wajahat दरअसल इन लोगों का उद्देश्य समस्या का समाधान नहीं बल्कि लोगों को भड़का कर दंगा फसाद की स्थिति पैदा करना है यह समझते हैं की इनका भला उसी में है

Devendra Yadav चैनल की खासियत है कि वह प्रधान सेवक के खिलाफ बोल सुनना बर्दाश्त नहीं कर पाता. बोलने वाले के सामने से चोंगा तुरन्त हटा लिया जाता है.

Ajay Kumar यही नहीं और चैनल व पत्रकार हैं ज़िन्हें सुनकर ही लोग बता देते हैं कि ये राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने वाली पार्टी का विज्ञापन कर रहे है वही इन्हे लगता है कि आम जन मानस इनको बहुत बुद्धिमान समझ रहा है लेकिन इन्हे लोग सत्ता का एजेंट कहते है. इन लोगों ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को खोखला कर दिया है.

Subhas Chandra Ganguly कई चैनल सत्ता पक्ष का माउथपीस बन गया है। यह चैनल भी मैंने देखना बंद कर दिया है।

Obaid Nasir सर अजीब ज़माना है जो जितना बदतमीज़ वह उतना ही कामयाब

Kailash Manhar पतंजलि से प्रायोजित कार्यक्रम में यह सब करना जरूरी है

Omendra Jaipur आप चिंता ना करें ये हार रहे हैं, चोकीदार इसीलिए बोखला रहा है जी

Mahesh Saraswat संघी मानसिकता वाले चेनल्स के मुसंघी एंकर

Rajesh Kamaal मुस्लिमों का रोना रोने वालों ने कौनसा भला किया है.

Vaibhav Maheshwari बड़ी चिल्लाने वाली महिला है ये, पत्रकार की खाल में। मेरा 6 साल का बेटा एक दिन बोला कि प्लीज़ चैनल बदल दो, ये फालतू में चीखती बहुत है।

Subhash Singathiya Arun jee! Anjana jee ke baare mein aapkee raay bilkul durust hai jee, vaise bhee ye mahodaya pricharcha pesh karte samay anchor kam aur BJB kee pravakta jyada lagti hain jee. khair..

DrSushil Chaudhary सर आजकल उसे देखता ही नहीं हूँ । एक प्रोग्राम में जो नेता थे उसे बोल रही थी लोग भी क्या सोच रहे होंगे किस पागलों को देख रहा हूँ ।

Giriraj Kishore kal PM ki latad congress ke liye hi nahi thi, sab samajh len, dabang agaya hai, Anjnaj i samajhdar haun.

Arvind Varun मोदी सरकार इनके पति को क्रीम पोस्टिंग दे चुकी है।

Ashutosh Tripathi मै तो वीर रस वालों को देखता सुनता ही नही। वीर रस वाले मीडिया कर्मी न तो देश का भला कर रहे है और न अपने पेशे का।

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आजतक पर श्वेता की यह क्या खबू एंकरिंग है!

Jaishankar Gupta : क्या ऐंकरिंग है। खुद को नंबर एक कहने और सबसे आगे रहनेवाले टीवी चैनल पर यूपी में पहले चरण के मतदान पर चर्चा के दौरान 4.12 बजे ऐंकर द्वारा मथुरा में मौजूद रिपोर्टर संजय शर्मा से मतदाताओं की प्रतिक्रिया पूछने और रिपोर्टर द्वारा एक मतदाता के हवाले यह बताने पर कि युवा बड़े उत्साह के साथ भाजपा के पक्ष में मतदान कर रहे हैं, बड़े चाव के साथ दिखाया गया। संजय ने वरिष्ठ पत्रकार शशिशेखर के पूछने पर भी बताया कि गोलबंदी भाजपा के पक्ष में साफ दिख रही।

उनकी यह टिप्पणी भी श्वेता को नहीं अखरी।

लेकिन जब बालकृष्ण ने मुजफ्फरनगर से बताना शुरू किया कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान करनेवाले जाट किसान इस बार उसके विरोध में और रालोद के पक्ष में मतदान कर रहे हैं, यह चिंता किए बगैर कि उसका उम्मीदवार हारे या जीते। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक सपा कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में एक तरफा मतदान कर रहे हैं। बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार भी उनके मतों में विभाजन नहीं कर पा रहे, यह सुनते ही श्वेता के जैसे कान खड़े हो गये। उन्हें इलहाम हुआ कि मतदान जारी रहते कोई आचार संहिता भी होती है। उन्होंने बालकृष्ण और फिर अन्य संवाददाताओं से भी कहा कि किसी दल का नाम न लें और ना ही किसी मतदाता को भी यह बताने को कहें कि उसने किस दल को वोट दिया है। अब भी मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Nadeem Ahmad Kazmi Sir..journalist are becoming party to their political leanings…dangerous trend. you may have your leanings but it should not be as open as these anchors do.

Suraj Kumar Singh सर…..मीडिया संस्थान में हमें पढ़ाया गया था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एजेंडा सेटर है इसलिए इनका सब माफ़। अब ये अलग बात है कि वह किसका एजेंडा सेट कर रहा है और क्यों कर रहा है। रही बात आचार संहिता और चुनाव आयोग की तो परिवर्तन के नाम पर वर्तमान भारत में अच्छे-अच्छे संस्थान का ढांचा बदल दिया गया है तो तो फिर? वैसे एंकर को पता है कि यूपी चुनाव में किसका एजेंडा सेट करना है। पार्टी हार गई तो भी चैनल की चित और हार गयी तो भी चित।

Rajkeshwar Singh जयशंकर जी, सब तो नहीं लेकिन एक तबक़ा अब यह ठीक से परखने लगा है कि किस मीडिया की आस्था किस पार्टी में है। देश में चैनल पर ज़ोर ज़ोर से एंकर के चिल्लाने की परंपरा शुरू करने वाले पत्रकार के बताए रास्ते पर कई नए एंकर चल पड़े हैं और ‘nation wants to know’ पर वे वैसे डटे हैं जैसे उनकी आस्था है। एक मित्र व 30 साल से सक्रिय पत्रकार का ताज़ा आंकलन इस चुनाव में एक गठबंधन को 65-70 सीट से ज़्यादा नहीं मिलेगी– दूसरे पत्रकार मित्र 20 दिन से फ़ील्ड पर हैं, उनका आंकलन उस गठबंधन को 230 तक सीटें मिल सकती हैं।

Ghanshyam Dubey दरअसल ये संवाददाता रेनकोट पहन लर रिपोर्टिंग कर रहे थे। एंकरिन ने कोट पहना, फिर नाम न लेने को कहा। यानी काम कर दिया बस!

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डेढ़ घंटे माथा फोड़ने के बाद एंकर अजय कुमार ने जाना- ये बाबा पागल है!

न्यूज नेशन के पराक्रमी एडिटर अजय कुमार को डेढ़ घंटे माथा फोड़ने के बाद पता चला कि उनके बाबा बवाली यानी ओम बाबा उर्फ स्वामी ओम का मानसिक संतुलन हिल गया है और उसे इलाज की जरूरत है. अजय कुमार को बहुत पहले जब ‘आजतक’ के साथ थे, देखा था और उन्हें बाकी पत्रकारों के मुकाबले थोड़ा संजीदा पत्रकार समझता था. लेकिन बीच के समय में कभी-कभार ही दर्शन मिले. कल उनका एक कार्यक्रम न्यूज नेशन पर देखा ‘बवाली बाबा’. देखकर लगा कि टीआरपी की हवस पत्रकार को क्या से क्या बना देती है.

जिस बाबा से कोई दो मिनट बात न करे, उसे आजकल टीवी वाले एक-एक, दो-दो घंटे टीवी स्टूडियो में बिठाए रखते हैं. उठ-उठकर चल देता है, पकड़-पकड़कर फिर बिठा दिया जाता है. एंकर-एंकराइन और बाबा ये ही तीन लोग बोलते रहते हैं. बाकी गेस्ट में जो समझदार हैं, खामोश रहते हैं. कुछ पूछने पर ही बोलते हैं, अन्यथा नहीं. कुछ जो टीआरपी के लिए लालायित हैं, बीच-बीच में टोक-टाककर बात पूरी होने ही नहीं देते. आसाराम-राधे मां आदि-आदि के बाद अच्छा ‘भगवाधारी’ मिला है टीवीवालों को….

एंकराइन महोदया तो और दो कदम आगे….अजय कुमार गरज रहे थे, तो वे बरस रही थीं. बवाली बावा की गालीगलौज पर अजय कुमार ने उन्हें टोका कि उनका चैनल राष्ट्रीय है और उनका शो पारिवारिक है, जो पांच साल का बच्चा भी देखता है, लेकिन वहां उनसे कोई पूछने वाला नहीं था कि जिस विषय पर वे चर्चा कर रहे थे और जिसमें सनी लियोनी को बार-बार दिखाकर वे सवाल कर रहे थे, अश्लील, किसी महिला को छूने वगैरह-वगैरह के मुद्दे पर बाबा को घेर रहे थे, वो शब्द क्या पांच साल के बच्चे के कान में नहीं जाएंगे?

हद तो तब हो गई जब अजय कुमार को बीच-बीच में बाबा से फरमाइश करते सुना कि एक बार वही वाला नागिन डांस हो जाए…. अच्छा आप बाबा हैं तो हनुमान चालीसा पढ़कर सुना दीजिए…. अच्छा, ये बताइए कि सलमान खान को थप्पड़ कैसे मारा? ये कैसा शो है भाई…. क्या बेचना चाहते हो? कोई घिनौना काम करके आए बंदे को स्टूडियो में बिठाकर उससे घंटों यही पूछते रहते हो- कैसे किया घिनौना काम? क्यों किया? करके बताओ? करते वक्त क्या था दिमाग में?… और अंत में बैलेंस करने के लिए- तुम्हें शर्म नहीं आई ऐसा घिनौना काम करते? उफ्फ… पूरे शो में  चीखना-चिल्लाना, शोरगुल और अंत में हाथापाई…. हां, इन लोगों ने बड़ी कामयाबी से शो खत्म होते-होते हाथापाई और मारपीट भी करवा ही दी. फिर कहते रहे, हम किसी हिंसा में विश्वास नहीं करते. बहुत ही फूहड़ और भौंडा….

आजकल इसका भी चलन निकला है. चौक-चौराहे से लेकर स्टूडियो तक में हंगामा-बवाल करवा दो. आप कार्यक्रम कर रहे हैं या तमाशा? दर्शकों पर आपका कोई कंट्रोल नहीं है…. कोई महिला दर्शक दीर्घा से उठती है, बवाली बाबा की ओर बढ़ती है ऐसे, जैसे अभी पीट देगी. बहस सुनते-सुनते, देखते-देखते वह खुद को ही जज समझने लग जाती है. उत्तेजना हावी हो जाती है… सही-गलत का फैसला लगे हाथ… खुद अजय कुमार और दो-चार लोग बीच-बचाव करते हैं, मजमा जुटता है, खींचतान, गालीगलौज, हाथापाई और मारपीट….. हो गया भाई हो गया, शो हिट हो गया… तालियां… जिसने गलत किया, उसे गालियां… और जो उस गलत को दिखाकर, उसमें मिर्च-मसाला लगाकर, उसे बेच गया, उसके लिए तालियां…..

एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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लाइव शो के दौरान एंकर नरेश सोनी पर स्वामी ओम ने पानी फेंका, जान से मारने की धमकी दी (देखें वीडियो)

इन दिनों एक स्वयंभू बाबा मीडिया में खूब छाया हुआ है, नाम है विवेकानंद झा, जिसे बिगबॉस 10 के घर ने स्वामी ओम के नाम से हर घर में पहुंचा दिया है। अब क्योंकि चैनलों की मजबूरी है कि जो लोग देखना चाहते हैं वो हमें दिखाना भी पड़ता है। यही सोचकर बुधवार को हमने स्वामी ओम और प्रियंका जग्गा को एक डिबेट शो के लिए बुलाया। अब क्योंकि स्वामि ओम कई बार अनर्गल बकना शुरू करते हैं, तो एहतियातन हमने इस शो को लाइव नहीं करके, रिकॉर्ड किया, ताकि एडिट की गुंजाइश रहे। लेकिन शो के दौरान जो इसने किया वो अविश्वसनीय है।

मैं ही इस शो को एंकर कर रहा था, पहले तो शो के दौरान इसने मुझे जान से मारने की धमकी दी, बाद में अपना आपा खोकर मुझपर पानी फेंक दिया। पहले हमें लगा कि अब इस शो को ऑन-एयर ना किया जाए, लेकिन बाद में इसलिए इस शो को ऑन-एयर किया गया ताकि लोग जानें कि ये बाबा अपने होशोहवास खो चुका है। एक निजी चैनल पर थप्पड़ कांड की बदौलत बिगबॉस के घर तक पहुंचने वाले स्वामी ओम को लगता है कि ऐसी ही कोई हरकत, या उससे भी गंभीर और निंदनीय हरकत करके वो फिर से सुर्खियां बटोर सकता है। मेरी गुज़ारिश है कि इस बाबा की हकीकत सबको बताई जाए, और मीडिया इसका सामूहिक बहिष्कार करे, वरना राम ही जाने उसका अगला पागलपन क्या होगा।

करियर के दौरान ऐसे कई मौके आते हैं, जब समझ में नहीं आता कि जो किया वो सही था या गलत। जब बिग बॉस 10 के स्वामी ओम और प्रियंका जग्गा के साथ शो करने का प्रस्ताव आया तो excited था, लेकिन शो के दौरान स्वामी ने जो किया वो अविश्वसनीय है। स्वामी ने शो के दौरान ना सिर्फ मुझे जान से मारने की धमकी दी बल्कि बहस के दौरान ही मुझपर ग्लास से पानी फेंक दिया। अब मिलीजुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, ज्यादातर लोगों का मानना है कि मैंने स्वामी ओम को पलट कर क्यों नहीं मारा, तो कई मानते हैं कि उसे बुलाना ही नहीं चाहिए था। दूसरी बात से कुछ हद तक सहमत हूं, उसे नहीं बुलाना चाहिए था। जहां तक पहली बात का सवाल है – इसका जवाब भी एक सवाल है – क्या मुझे भी स्वामी का जवाब देने के लिए स्वामी जैसी हरकत करनी चाहिए थी?

आप भी ये वीडियो देखिए और तय कीजिए- https://www.youtube.com/watch?v=1V81JZr39ew   

Naresh Soni
Assistant Executive Editor
News World India

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दर्जन भर से ज्यादा छोटे बड़े एंकर्स को ग्रुप मेल भेजकर जस्टिस काटजू ने यह दी सलाह

अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए चर्चित जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने दर्जन भर से ज्यादा छोटे बड़े न्यूज चैनल एंकर्स Ravish Kumar, Barkha, Arnab Goswami, Rahul Kanwal, Bhupendra Chaubey, Nidhi Razdan, Karan Thapar, Rajdeep Sardesai, Sagarika Ghose आदि को ग्रुप मेल भेज कर यह सलाह दी है-

Most anchors on Indian TV channels nowadays are partisan, and cut short participants expressing opinions contrary to their own,or mock such speakers,while giving much time to those expressing their own views.

This is highly improper and unfair. An anchor should be neutral, like a referee in a football match who neither plays nor advises players how to play, but only blows the whistle when the ball goes out of play or a foul is committed.

Justice Katju

mark_katju@yahoo.co.in

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आजतक वाली श्वेता सिंह की मूर्खता का वीडियो सोशल मीडिया पर हुआ वायरल, आप भी देखें

टीवी जर्नलिस्ट कई बार ऐसी मूर्खता कर जाते हैं कि उसे देख गुस्सा के साथ साथ जोरदार हंसी भी आती है. ताजा मामला श्वेता सिंह का है जो आजतक न्यूज चैनल की एंकर और रिपोर्टर हैं. खुद को बेहद काबिल मानने वाली इस महिला एंकर ने ऐसी मूर्खता की है कि लोग खूब मजे ले लेकर वीडियो देख रहे हैं और हंस रहे हैं. कायदे से आजतक प्रबंधन को इस गल्ती के लिए श्वेता सिंह को बर्खास्त कर देना चाहिए, साथ ही उस रिपोर्टर को भी जिसने ये फर्जी सूचनाएं श्वेता तक पहुंचाईं.

वैसे आजकल जिस तरह से आजतक विशुद्ध भगवा रंग में रंगा हुआ है, वह बहुतों को चिंतित कर रहा है. लगता है चैनल के मालिक अरुण पुरी को ठीकठाक सरकारी डोज दे दी गई है या चैनल के प्रबंध संपादक सुप्रिय प्रसाद को मोदी सरकार ने कायदे से ओबलाइज कर दिया है जिसके कारण वह भी अर्णव गोस्वामी के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और पूरे चैनल को भगवा रंग में रंगने लगे हैं. तभी तो आजतक चैनल को नोटबंदी के कारण बैंककर्मियों की पीड़ा तो खूब दिखाई दे रही है लेकिन आम जन की पीड़ा कतई नहीं दिखाई दे रही.

आजतक की एक महिला एंकर अंजना ओम कश्यप तो भाजपा प्रवक्ता की तरह बार बार कहती रहती हैं लाइव कि बस कुछ दिन और इंतजार कर लें, सब ठीक हो जाएगा. वे नोटबंदी के दिन से ही इस निर्णय के पक्ष में अटल अडिग दिख रही हैं और अपने पूर्वाग्रह को केंद्र में रखकर बहस विमर्श संचालित करती हैं जिससे पूरा शो मोदी परस्त हो जाता है. यहां तक कि दूसरे पार्टियों के लोगों को इसी चैनल पर लाइव कहते देखा गया है कि आजतक भगवा रंग में रंग चुका है.

लगता है जैसे आजतक के सभी एंकरों की ट्रेनिंग खुद मोदी ने ली हो. अगर इन पत्रकारों में थोड़ी भी पत्रकारिता जिंदा हो तो एक बार फिर से पत्रकारिता की किताबें पढ़कर समझ लेना चाहिए कि आखिर पत्रकारिता किसके लिए की जाती है, सत्ता भी भाषा बोलने के लिए ये आम जनता की पीड़ा दिखाने बताने के लिए. सोशल मीडिया पर वायरल श्वेता सिंह के वीडियो को डाउनलोड कर भड़ास के एफबी पेज पर अपलोड कर दिया गया है. इसे देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

https://www.facebook.com/bhadasmedia/videos/1070955059669585

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अतुल अग्रवाल फिर सुर्खियों में, अबकी उन्हीं के वेब चैनल के पत्रकार ने दी जमकर गालियां (सुनें टेप)

अतुल अग्रवाल अपने कर्मों से अक्सर सुर्खियों में रहते हैं. ताजा मामला ठगी और गाली खाने का है. अपने वेब न्यूज चैनल हिंदी खबर में अतुल अग्रवाल ने यूपी का स्थानीय संपादक अमितेश श्रीवास्तव को बनाया था. अमितेश ने अतुल के कहने पर पैसे भी चैनल में लगाए. अतुल अग्रवाल की फितरत है कि वह इस्तेमाल करने के बाद आदमी को किनारे कर देते हैं और दूसरे को पकड़ लेते हैं. इसी क्रम में उन्होंने आजतक चैनल से निकाले गए अनूप श्रीवास्तव को हिंदी खबर यूपी का स्थानीय संपादक बना दिया और अमितेश को साइ़डलाइन कर दिया.

जो अमितेश कभी ‘समाचार प्लस’ न्यूज चैनल में ठीकठाक हैसियत में हुआ करते थे, अतुल अग्रवाल के कहने पर उनके नए चैनल में आए और तन मन धन से काम किया. लेकिन जब अतुल ने अमितेश के साथ ठगी, धोखाधड़ी और विश्वासघात कर दिया तो अमितेश आग बबूला हो गए. उन्होंने अतुल अग्रवाल को जमकर गालियां दी. इस पूरे टेप में खास बात है दो पत्रकारों की गाली-गलौज की भाषा.

बात तो सामान्य और शिष्ट तरीके से भी हो सकती है लेकिन हिंदी पट्टी के सामंती चेतना वाले पत्रकार या तो पैर पूजन जानते हैं या फिर माकानाका करना. बीच में रेशनल / डेमोक्रेटिक होकर जीना बतियाना कतई नहीं जानते. अतुल अग्रवाल पर हिंदी खबर चैनल चलाने के दौरान कई किस्म के आरोप कई लोगों ने लगाए जिसमें उगाही से लेकर सेक्सुअल एब्यूज तक के मामले हैं. माना जा रहा है कि अमितेश श्रीवास्तव अब उमेश कुमार और प्रवीण साहनी वाले चैनल समाचार प्लस में लौट सकते हैं, यह इन टेपों में बातचीत से भी जाहिर है. फिलहाल तो ये गालीगलौज भरा टेप सुनिए. नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें :

पार्ट 1

https://www.youtube.com/watch?v=CsCrWsxR6uw

पार्ट 2

https://www.youtube.com/watch?v=vQG1_JOUoGg

अतुल अग्रवाल के बारे में ज्यादा जानने के लिए इसे भी पढ़ सकते हैं…

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कल के हॉकर ही आज के टीवी ऐंकर हैं!

खबरिया चैनलों के ऐंकरों को मामूली से मामूली खबर पर गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते देखता-सुनता हूँ, तो बरबस चालीस साल पहले के एक न्यूजपेपर हॉकर की याद ताजा हो जाती है। वह अखबार लेकर गोरखपुर शहर की गलियों-मुहल्लों में साइकिल पर सवार होकर घूमता रहता था। ठीक आजकल के टीवी ऐंकरों की तरह किसी खबर का ऐसे बेहूदे ढंग से हल्ला मचाता था कि सुनने वाले को लगता था कि जरूर कहीं कोई अनर्थकारी घटना हो गयी है। कौतूहल और उत्सुकता के मारे लोग उसे रोकने थे और न चाहते हुए भी अखबार की एक प्रति खरीद लेते थे।

वह कहता था– बाबू जी, अखबार नहीं बिकता, खबर भी नहीं बिकती, बल्कि हेडिंग बिकती है। और वह भी तब जब हेडिंग तोड़-मरोड़ कर बेची जाती है। नहीं जानता कि परदेसी अब कहॉं और किस हाल में है। वह हाईस्कूल या इंटरमीडिएट तक पढ़ा भी था। और उसका नाम शायद परदेसी ही था। लोगों को चूतिया बना कर खबर की हेडिंग बेचने की यह बुद्धि उसकी अपनी थी और यह पूरा का पूरा आइडिया भी उसका अपना था। यह सब न तो उसने किसी से सीखा था और न ही किसी ने उसे सिखाया था। उसकी इन बेढंगी हरकतों से बहुत से लोग उसे पागल मानने लगे थे तो बहुत से लोग उसे प्यार भी करने लगे थे।

कुल मिला कर कह सकते हैं कि जीने-खाने का उसने अपने तरीके का एक रास्ता खोज लिया था। और कमाल देखिये– वह साइकिल के कैरियर पर जितना अखबार लेकर निकलता था, दो-चार घंटे में सब बिक जाता था। अब उसकी कला पर आते हैं। मान लीजिए अखबार में चोर पकड़े जाने की खबर छपी है और चोर का नाम राजेश है। बस, उसकी कला जाग जाती थी। वह हल्ला मचाता था– राजेश खन्ना चोरी करते पकड़े गये। जो लोग उसकी मंशा जान चुके थे, वे समझ जाते थे कि माजरा क्या है। लेकिन कोई नया पंछी उसके झॉंसे में जरूर आ जाता था। वैसे, सब कुछ जानते हुए भी बहुत सारे लोग मौज के लिए अथवा इस भाव से कि गरीब की मदद हो जाएगी, अखबार खरीद लेते थे। मुझे लगता है कि आजकल  खबरिया चैनलों के ऐंकर परदेसी नाम के उस हॉकर की ही भूमिका निभा रहे हैं। ये पत्रकार तो कहीं से नहीं लगते।

लेखक विनय श्रीकार वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं. उनसे संपर्क shrikar.vinay@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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निखिल वागले ने प्राइम टाइम डिबेट के दौरान सनातन संस्था के अभय वर्तक को लाइव शो से निकाल बाहर किया

मुंबई : वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले महाराष्ट्र01 न्यूज़ चैनल पर प्राइम टाइम की एंकरिंग कर रहे थे. डिबेट का विषय विवादित और संवेदनशील था. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान विवादित बयान दिया था- “धर्मसत्ता राजसत्ता से बड़ी होती है।’ इस बयान से लोगों ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. मुख्यमंत्री के इस बयान को सीधा संघ नीति से जोड़ा गया. निखिल वागले ने प्राइम टाइम में इसी विषय पर डिबेट रखा.

डिबेट में कई गणमान्य वक्ताओं ने शिरकत की. कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत, सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक आदि. गरमा गरम बहस चल रही थी. लाइव शो के दरम्यान सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक ने एक विवादित स्टेटमेंट दिया. इस पर निखिल वागले आग बबूला हो गए. लाइव शो के दरम्यान सनातन संस्था के प्रवक्ता अभय वर्तक को वागले ने शो से तुरंत निकल जाने को कह दिया. वागले ने कहा कि आप नहीं गए शो से तो मेरे आदमी आकर आप को यहाँ से उठा कर लेकर जाएंगे.

निखिल वागले बार बार चिल्लाकर कह रहे थे अभय वर्तक आप दंगा करवाना चाहते हैं, जल्दी से निकल जाइये, नहीं तो मुझे गेट आउट कहना पड़ेगा. अभय वर्तक शो से निकल गए. निखिल वागले ने लाइव शो के दरम्यान घोषणा कर दी कि इसके बाद मेरे शो में कभी भी सनातन संस्था का कोई नुमाइंदा नहीं आएगा. मालूम हो कि अभय वर्तक एक विवादित शख्सियत हैं.

पुणे से सुजीत ठमके की रिपोर्ट. संपर्क : sthamke35@gmail.com

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महिला एंकर को डिप्रेशन में जाने और इस्तीफा देने तक परेशान किया गया, पढ़िए चिट्ठी

सर

मैंने 5 अप्रैल 2016 को नेशनल वॉयस चैनल में बतौर एंकर / प्रोडयूसर ज्वाइन किया था. शुरुआत काफी अच्छी रही लेकिन पिछले दो महीने से लगातार मुझे आफिस में बेवजह कोई ना कोई मुददा बनाकर परेशान किया जा रहा है. मुझे इतना परेशान किया गया था कि मैं डिप्रेशन में आ गई थी. इसके बाद ऑफिस में ही मेरी तबियत खराब हो गई. मैं कई दिन तक अस्पताल में रही. ठीक होने के बाद जब मैंने ऑफिस ज्वाइन किया तो भी मेरे सीनियर का रवैया नहीं बदला. उसके बाद भी वो लगातार मुझे मानसिक रुप से प्रताड़ित करते रहे.

मुझे कहा गया कि मेरा चेहरा अच्छा नहीं है. कभी कुछ तो कभी कुछ कहा जाता रहा. सर, जो लोग मेरे चेहरे को लेकर सवाल कर रहे हैं कि मेरा चेहरा स्क्रीन पर अच्छा नहीं लग रहा, मुझे लगता है कि पहले उन लोगों को खुद आईना देखना चाहिए. जिनके सिर पर चार बाल नहीं वो दूसरों के चेहरे पर सवाल उठाते हैं. अपराध के शो करते-करते लोगों की सोच भी आपराधिक प्रवृत्ति की हो गई है. सर हाल ही में मेरे पापा की तबीयत खराब हो गई थी. इसके बाद मैंने एचआर को मेल करके जानकारी दी थी. साथ ही अपने सीनियर को फोन करके सूचना दे दी थी. लेकिन मेरे सीनियर ने ऑफिस में झूठी अफवाह फैलाई और ये कहा कि मैं इस्तीफा देकर चली गई हूं. मेरे सीनियर को ये मालूम होना चाहिए कि इस्तीफा मेल से दिया जाता है, मुंह से बोलकर नहीं.

मैंने इस्तीफा नहीं दिया था और मेरे सीनियर ने सभी को गुमराह किया, क्योंकि वो चाहते हैं कि ऑफिस में मेकअप रुम से लेकर आउटपुट, इनपुट, प्रोग्रामिंग, आईटी हर जगह उनके ही लोग हों, जो उनकी हां में हां और ना में ना कर सकें. पर मेरे साथ ऐसा नहीं है कि मै सीनियर की हर गलत बात का साथ दूं. मैंने ऑफिस में 14 से 15 घंटे तक भी काम किया है. उन लोगों में से नहीं जो ऑफिस टाइम में रात को दारु पीने पार्क चले जाते हैं और आकर आउट डालकर ये दिखाते हैं कि हमने कितने घंटे काम किया है.

सर बातें तो और भी बहुत हैं लेकिन फिलहाल मैं इस माहौल को देखते हुए ऑफिस नहीं आ सकती. सर नोटिस देकर काम करने पर भी मुझे परेशान ही किया जाएगा, इसलिए अपनी सारी परेशानी बताते हुए मैं ऑफिस से इस्तीफा दे रही हूं. मेरे पापा की तबीयत अबी भी ठीक नहीं है और मैं खुद बहुत डिप्रेशन में हूं कि ऑफिस में मेरे खिलाफ किस तरीके से षडयंत्र रचा गया. सर आपसे विनती है कि मेरे पिछले महीने की सैलरी और अभी तक की सारी छुट्टियां एडजस्ट करा कर कल तक मेरे बैंक खाते में मेरे पैसे जमा करा दें. मुझे काफी जरूरत है. एमडी सर का जाते जाते शुक्रिया करना चाहती हूं कि आपने मुझ पर भरोसा किया और अपने संस्थान में काम करने का मौका दिया. 

रेशू त्यागी
एंकर

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पाक कलाकारों के खिलाफ जहर उगलने वाला यह एंकर खुद पैसे देता है पाकिस्तानियों को!

Vinod Sharma : A formidable TV anchor is running a relentless campaign against Pakistani artistes who act and deliver dialogues written by their Indian script writers in settings decided by their directors in Bollywood films. But it just struck me that the same anchor is the provider of regular income (running into hundreds of USD) for Pakistani security experts and retired generals who are a regular fixture on his shows. And unlike Pakistani actors they don’t read out from written scripts They make arguments about which they aren’t surely informing the anchor in advance. For in the show they match derision for derision.

So what’s this duplicity all about dear anchor? You have the freedom to caste Pakistanis to make your talk show a hit. But not our film makers who are as much Indian and no less patriotic then you are. Moreover, they contribute immensely to India’s soft power image that is priceless and unavailable to many military powers. Think of it! Rashtra bhakti must start from home–like charity.That is, if the purpose isn’t to whip up jingoism; a war hysteria.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा की एफबी वॉल से.

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…आन एयर बाल-टाई दुरुस्त करने में जुट गए ईटीवी वाले ब्रजेश मिश्रा! (देखें वीडियो)

लखनऊ एयरपोर्ट पर अगर आपका आना जाना हुआ है तो देखा होगा कि वहां न्यूज चैनल के नाम पर सिर्फ ईटीवी उत्तर प्रदेश के विज्ञापन लगे हैं, वह भी काफी भारी भरकम ताकि नजर जरूर जाए. साथ ही इस विज्ञापन में ईटीवी यूपी के संपादक ब्रजेश मिश्र का लंबा चौड़ा फोटो है. टाटा स्काई ने पिछले दिनों अपने यहां चैनलों की नंबरिंग में काफी बदलाव किया. इससे कई सारे मेरे फेवरिट चैनल इधर-उधर हो गए. कैसे कैसे कर के नेशनल न्यूज चैनलों का नंबर फिर याद करने लगा लेकिन इस प्रक्रिया में ईटीवी यूपी उत्तराखंड चैनल कहीं खो गया था.

लखनऊ से कल दिल्ली रवाना होने से पहले करीब आधे घंटे तक लखनऊ एयरपोर्ट घूमता टहलता रहा तो बार-बार मेरी निगाह लंबे चौड़े ईटीवी यूपी और ब्रजेश मिश्र से टकरा जाती. साथ ही नीचे लिखे विभिन्न प्लेटफार्म्स पर ईटीवी यूपी की उपलब्धता की डिटेलिंग देखने लगता. इसमें सबसे पहले टाटा स्काई का जिक्र था जिसमें 1104 नंबर पर ईटीवी यूपी उत्तराखंड चैनल आता है. बार बार देखने के कारण ये नंबर मुझे याद हो गया था.

घर आकर रात में टाटा स्काई पर 1104 लगाया तो ब्रजेश जी के आठ बजे वाले प्राइम टाइम का रिपीट टेलीकास्ट हो रहा था. मुद्दा बड़ा जोरदार था. नेता लोग वैसे तो विचारधारा, वोट, जाति आदि को लेकर आपस में लट्ठ बजाते रहते हैं लेकिन जब उनकी खुद की सुख सुविधा का मामला सामने आता है तो सभी एक हो जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लखनऊ में जो पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम पर बंगाल कब्जाए गए हैं, उन्हें खाली करो. इस आदेश को अनडू यानि निष्प्रभावी बनाने के लिए सारे पूर्व मुख्यमंत्री यानि हर दल के नेता मिलकर एक हो गए लगते हैं और नया कानून बनाने वाले हैं ताकि इनसे बंगला खाली न कराया जा सके. इस डिबेट में पत्रकारों द्वारा मकान कब्जाने का भी जिक्र आया.

लेकिन सबसे जोरदार बात जो मुझे लगी, जिसके लिए इतनी लंबी चौड़ी भूमिका बनानी पड़ी वो ये कि प्राइम टाइम शुरू होने के तत्काल बाद ब्रजेश भाई आन एयर ही अपना बाल ठीक करने लगते हैं, साथ ही टाई भी. आमतौर पर ऐसे कृत्य एंकर तब करते हैं जब कैमरा उनकी तरफ मुखातिब न हो. लेकिन ये क्या, ब्रजेश जी इस प्राइम टाइम शो शुरू करने के दौरान तो खुद को टीवी पर देखने के बाद अपना बाल टाई ठीक करने में जुटे हैं, वह भी करोड़ों दर्शकों के सामने. मुझसे रहा न गया. ब्रजेश जी को फोन घुमा दिया. और, जैसा कि हमेशा होता है अति रिस्पांसिव ब्रजेश जी ने बिना देर किए खट से फोन उठा लिया.

मैंने सीधा सवाल दागा- ”अरे आप तो गजबे करते हैं महराज, आन एयर बाल टाई ठीक कर रहे हैं”. ब्रजेश भाई का हंसते हुए जवाब आया- ”यशवंत भाई, आदमी को नेचुरल रहना चाहिए. क्या छिपाना. आज जब प्राइम टाइम शो शुरू करने के बाद खुद को टीवी पर देखा तो लगा कि बाल थोड़े उखड़े बिखरे हैं, और टाई खिसकी-सी है, तो तुरंत दुरुस्त कर लिया. हमारे दर्शकों को लगना चाहिए कि शो बिलकुल बनवाटी नहीं है, सब कुछ नेचुरल है, लाइव है.”

मेरे मुंह से बस इतना निकला- ”वाह, क्या बात है”.

नीचे वो वीडियो लिंक है जिसमें ब्रजेश मिश्रा अपना बाल टाई आन एयर दुरुस्त कर रहे हैं. पूरा प्राइम टाइम देखेंगे तो आप को लगेगा कि ऐसी जोरदार बहसें तो नेशनल हिंदी न्यूज चैनलों तक पर नहीं होती. क्या खरी-खरी भाषा. क्या खूब तेवर. पूरी डिबेट के दौरान बृजेश जी हमलावर और व्यंग्यात्मक रुख अपनाए रहते हैं. प्राइम टाइम के मकान कब्जाऊ टापिक के दायरे में पत्रकारों तक को ले आया गया है ताकि बहस एकांगी यानि नेताओं तक सीमित न रहे. अफसरों की भी चर्चा आई है कि कैसे ये अफसर दिल्ली लखनऊ दोनों जगह सरकारी आवास कब्जाए रहते हैं. मेरी तरफ से मस्ट सी प्राइम टाइम है. आप भी जरूर देखिए. लिंक ये है: https://youtu.be/CyBCHgsUkW0

भड़ास के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से.

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महिला एंकर को लाइव शो में देह ढकने के लिए दिया गया कपड़ा, देखें तस्वीरें और वीडियो

अमेरिका के एक न्यूज चैनल पर मौसम की जानकारी देने के लाइव शो के दौरान साथी महिला एंकर को स्वेटर देना पुरुष एंकर को काफी महंगा पड़ गया है। सोशल मीडिया पर इसे लेकर खूब चर्चा हो रही है और आलोचनाएं भी हो रही हैं। अमेरिका के लॉस एंजेलिस के स्थानीय टीवी स्टेशन कीएलटीए में एक पुरुष एंकर ने अपनी साथी महिला एंकर को एक काले रंग का स्वेटर दिया, ताकि वह अपनी बांह ढक सकें। उस समय महिला साथी सुबह आठ बजे मौसम की जानकारी दे रही थीं।

साथी एंकर क्रिस ब्रूअस की तरफ से महिला एंकर लिबर्टा को स्वेटर दिए जाने पर वह भड़क गईं और नाराजगी भरे अंदाज में पूछा ये क्या हो रहा है? इस पर क्रिस ब्रूअस ने कहा कि उन्हें कई लोगों के ईमेल आ रहे हैं, जिसमें कहा जा रहा है कि अपनी साथी महिला एंकर को हाथ ढकने के लिए कुछ दे दें। क्रिस ब्रूअस की इस प्रतिक्रिया पर महिला एंकर लिबर्टा चेन को गुस्सा आ गया और वह शो छोड़कर चली गईं। इसके बाद सोशल मीडिया पर घमासान मच गया और लोग चैनल से इस हरकत के लिए माफी मांगने को कहने लगे। हालांकि, लिबर्टा चेन ने ट्वीट करके कहा कि उनके मन में चैनल के लिए कोई नाराजगी नहीं हैं। साथ ही उन्होंने अपने ब्लॉग पर भी लिखा कि केटीएलए के साथ उनका कोई विवाद नहीं है।

संबंधित वीडियो के लिए यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें…. https://www.youtube.com/watch?v=qvNceODVNmM

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नक्षत्र न्यूज रांची से छह लोग बाहर किए गए

नक्षत्र न्यूज रांची से खबर है कि अनुशासनहीनता और दुर्व्यवहार के आरोप में आउटपुट हेड समीर रंजन और बुलेटिन प्रोड्यूसर सत्यशरण मिश्रा, पवन कुमार (एंकर) और आकांक्षा कुमारी (MCR आपरेटर) को एक महीने का वेतन देकर चैनल से निकाल दिया गया है… दो वीडियो एडिटर नवाज़ और प्रमोद भी कर्तव्यहीनता के आरोप में निकाल दिए गए हैं…

अब आउटपुट संभालने की जिमेवारी वरिष्ठ पत्रकार वेसाल आज़म को दिया गया है जो ईटीवी से आये हैं और मीडिया जगत में उन्होंने लंबी पारी खेली है… नक्षत्र न्यूज़ चैनल को यह सब इसलिए करना पड़ा कि उसकी साख खराब हो रही थी… दरअसल नक्षत्र न्यूज़ चैनल का जो पुराना मालिक था वह पूर्व आईएएस अधिकारी था जिसकी पत्नी झारखण्ड में डीजी रही हैं, जिसके रुतबे की बदौलत उसने चैनल को रसातल में भेज दिया… अब टेक ओवर होने के बाद चैनल के सीईओ अमरेन्द्र कुमार बनाए गए हैं जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय से एमबीए पास हैं और उन्हें मीडिया का अनुभव है…  चैनल के CMD रामजी यादव झारखण्ड में कई शिक्षण संस्थान चलाते हैं…

नक्षत्र न्यूज, रांची के एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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महिषासुर मुद्दे पर डिबेट करने वाली इस न्यूज एडिटर और एंकर को गंदी गंदी गालियां मिलीं

Kavita Krishnan : A woman news anchor in Kerala gets abusive messages branding her a slut etc for moderating a debate on Mahishasura Diwas. The irony, the irony! They falsely claim Durga was called a slut, then in revenge they brand women who moderate debates on Mahishasura, sluts!

It’s fine to say even alternate anti Brahmicical mythology should not fall back into patriarchal slut shaming, since even slut shaming Durga has real consequences for living women, just as branding indigenous people or Dalit icons as asuras and rakshasas has real consequences those peoples. But what the Sanghis believe in is, to slut shame real live women in the name of defending and avenging goddesses!

सीपीआईएमएल लिबरेशन की नेता कविता कृष्णन के फेसबुक वॉल से.


संबंधित एंकर की पूरी खबर Thenewsminute.com पर है, जो इस प्रकार है :

Threatened and termed a sex worker after Mahishashura debate : Asianet News editor Sindhu

All Sindhu did was to moderate a discussion on whether Mahishashura Jayanthi could be considered treason on Asianet News Hour.

Chintha Mary Anil| Monday, February 29, 2016 – 12:29

On Friday when Asianet News Chief Coordinating Editor Sindhu Sooryakumar moderated a discussion on whether celebrating Mahishashura Jayanthi could be considered an act of treason, little did she know that she would be subject to a barrage of torrential abuse from both within the country and abroad.

As the anchor of the show, all Sindhu did was pose this query to a panel comprising Congress MP Anto Antony, CPI(M) MP MB Rajesh and Kerala BJP spokesperson VV Rajesh.

Speaking to The News Minute, Sindhu said that almost 98% of the people who called her up and abused her had actually not seen the discussion on television.

Apparently someone had spread the rumour on social media that Sindhu had found no fault with Durga being termed a sex-worker.

The alleged messages on Whatsapp and Facebook reportedly circulated Sindhu’s mobile number too and exhorted one and all to call Sindhu and shower her with the choicest abuses for her supposed act of treason.

Sindhu shudders at the thought of how people could subject her to such verbal sexual abuse without even verifying the truth of such blatant rumours.

She said, “Even now while I’m speaking to you, I’m getting call alerts. Since Friday night, I’ve been threatened with beatings, even death with most calling me a sex-worker. I guess I must have had almost 2000 calls till now with people even calling me from abroad.”

When the calls became unbearable, Sindhu filed a complaint on Saturday with the Thiruvanathapuram Commissioner of Police who registered an FIR. She gave them around 20 telephone numbers too. “The police can verify my mobile call list for any documentary evidence needed,” she added.

Sindhu is a very popular face on Asianet News with a huge fan base for her mature and hard-hitting presentation style.

VV Rajesh who had taken part in the said debate as the BJP representative had got in touch with her on Saturday morning and assured her of his full support and coperation. Sindhu asked him to make his statement of support public but Rajesh said that he would first need BJP state president Kummanam Rajasekharan’s clearance for the same.

“I am yet to hear from that quarter. VV Rajesh says that since Kummanam is currently out of station and will reach Thiruvananthapuram by Monday, only then can any formal announcement can be made by the party exonerating me from all such cooked-up and completely baseless charges.”

SIndhu has posted the link of that particular discussion on Facebook. “Anyone who actually takes the trouble to watch the entire debate cannot ever blame me for having made any derogatory remarks against Durga. It was VV Rajesh himself who repeatedly quoted from the pamphlets allegedly circulated in the JNU campus and which was produced in Parliament by Union HRD Minister Smrithi Irani as evidence of sedition against the JNU students. All I did was ask how the act of celebrating Mahashishura Jayanthi could be considered treason against the nation?” she elaborates.

She has also forwarded copies of her complaint to Kummanam as well as CPI(M) leaders VS Achuthanandan, Pinarayi Vijayan and Kodiyeri Balakrishnan and also KPCC president VM Sudheeran.

CPI(M) state secretary Kodiyeri Balakrishnan promptly issued a media statement of the party’s unconditional support to Sindhu in this regard.

You can view the discussion which triggered off the present controversy here:

http://www.asianetnews.tv/news/kerala/Threat-to-life-against-Sindhu-Sooryakumar-55020

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ऐन मौके पर महिला एंकर को चक्कर आ गया!

भोपाल : भोपाल दूरदर्शन का समाचार विभाग पिछले कुछ महीनों लगातार चर्चाओं में है. कुछ दिन पहले पीएम नरेन्द्र मोदी के मध्यप्रदेश दौरे के न्यूज़ कवरेज को नहीं दिखा कर एक बार फिर अपनी लचर कार्यप्रणाली को उजागर कर दिया. दिलचस्प तथ्य यह है कि राष्ट्रीय चैनल डीडी न्यूज़ पर उसका प्रसारण हुआ लेकिन भोपाल दूरदर्शन पर नहीं. बताया गया है कि प्रदेश के दर्शक दूरदर्शन के विभागीय समन्वय के अभाव की वजह से पीएम मोदी को देखने से वंचित रह गए. प्रधानमन्त्री के कार्यक्रमों को लेकर इस तरह की उदासीनता निश्चित ही विचारणीय प्रश्न के दायरे में आता है. पीएम के न्यूज़ कवरेज को लेकर यह लापरवाही गंभीर मुद्दा है.

भोपाल दूरदर्शन समाचारों को छोड़कर राजनीतिक दांव-पेंच का अखाड़ा बन चुका है. दो डायरेक्टरों के अंदरूनी खींचतान के अलावे रोज कार्यप्रणाली के नित्य नए किस्से का गढ़ है. इतना ही नहीं अफसरों के मनमानीपूर्ण व्यवहारों के कारण प्रदेश में फैले संवाददाताओं का कामकाज पर से विश्वास खत्म हो चुका है. दूरदर्शन समाचारों की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले रिपोर्टरों का मनोबल इस कदर टूट चुका कि वे संशय की हालत में हैं. दो दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मध्यप्रदेश आगमन पर जहाँ एक डायरेक्टर ने अपनी उपलब्धि फेसबुक और सोशल मीडिया पर कुछ यूं व्यक्त किया…

”प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी कल 18 फरवरी 2016 को अपनी मध्यप्रदेश यात्रा के दौरान राजधानी भोपाल से लगे सीहोर जिले के ग्राम शेरपुर में किसान महासम्मेलन को संबोधित करेंगे। दूरदर्शन मध्यप्रदेश ने कार्यक्रम के लाइव कवरेज के लिए व्यापक प्रबंध किये हैं। सीधे प्रसारण के लिए बैंगलोर तथा हैदराबाद से डीएसएनजी वैन पहुँच गई हैं। संवाददाता आदित्य श्रीवास्तव के साथ ईएनजी टीम ने आज विभिन्न बुलेटिनों के लिए कार्यक्रम स्थल से तैयारियों का न्यूज़ कवरेज किया।”

सिर्फ इतना ही नहीं, लगातार अपडेट भी देते रहे, कुछ इस तरह “सीहोर जिले के शेरपुर में आयोजित किसान महा सम्मेलन में अपार भीड़ उमड़ी। भोपाल इंदौर मार्ग पर 10 कि.मी. से भी अधिक लंबा अभूतपूर्व ट्रैफिक जाम लगा। फोर लेन पर हज़ारों वाहन फंसे।“

कहा तो यह जा रहा है कि भोपाल मे बैठे को-ओर्डीनेटर डिप्टी डायरेक्टर ने मध्यप्रदेश दूरदर्शन पर अपने प्रतिरोध स्वरुप यह खबर ही नही दिखाई. मध्यप्रदेश दूरदर्शन पर पीएम का दौरा जो लाईव दिखाया जाना था वह दिखाई ही नहीं गई. दिल्ली दूरदर्शन ने अपने  बेहतर तालमेल संयोजन से उस खबर को लाईव कर दिखाया और मध्यप्रदेश के समाचार एकांश ने लगातार अपने प्रदर्शन को स्वाभाविक बनाये हुए तकनीकी त्रुटियों को कारण बताते हुए प्रसारित नही किया. पिछले दिनों आकाशवाणी इन्दौर के विविध भारती पर रोज सुबह 10.30 बजे प्रसारित होने वाला बुलेटिन भी प्रसारित नहीं हो पाया था. जिम्मेदार अधिकारी का कहना था कि ऐन मौके पर महिला एंकर को चक्कर आ गया. जबकि वजह कुछ और थी. इस बारे में मध्य प्रदेश के अखबारों में छपी खबर देख सकते हैं.

भोपाल से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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एंकरों ने एमआरआईयू में एंकरिंग की टिप्स दी

फरीदाबाद : एंकर बनने की इच्छा के साथ जर्नलिज्म कोर्स की पढ़ाई करने वाले स्टूडेंट्स को इलैक्ट्रोनिक मीडिया इंडस्ट्री के दिगगजों के रू-ब-रू होने का मौका मिला। मानव रचना इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी में लाइव इंडिया के एंकर प्रवीण तिवारी व अर्चना तिवारी के द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘न्यूज एंकर – द फेस ऑफ द न्यूज’ का लॉन्च मीडिया के दिग्गजों के द्वारा किया गया। इस मौके पर मीडिया जगत के जाने माने एंकरों ने स्टूडेंट्स के साथ अपने अनुभवों को बांटा व एंकरिंग से जुड़ी गहराइयों के बारे में बताया। कार्यक्रम का आयोजन मानव रचना इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ मीडिया स्टडीज के द्वारा आयोजित किया गया था।

कार्यक्रम में स्टूडेंट्स को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे रिलायंस मीडिया के प्रेसिडेंट व जी न्यूज एवं जनमत के पूर्व संपादक श्री उमेश उपाध्याय ने कहा कि एंकरिंग का फील्ड तकनीकी विकास के साथ सीमित हो रहा है, क्योंकि आज के समय में फेसबुक, यूट्यूब से लेकर ट्विटर पर लोग खुद एंकर बन रहे हैं। लेकिन एंकरिंग के बेसिक टीवी एंकर से लेकर फेसबुक एंकर तक के लिए एक समान है। प्रवीण तिवारी के द्वारा लिखी गई इस बुक के माध्यम से स्टूडेंट्स को एंकरिंग से जुड़े हर पहलु के बारे में पता चलेगा।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में पहुंचे कुशाभाव ठाकरे यूनिवर्सिटी के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. मानसिंह परमार ने कहा कि एक सफल एंकर स्पष्ट व संक्षिप्त होता है। वह कम शब्दों में साफ तरीके से अपनी बात कहता है। उन्होंने कम्यूनिकेशन पर जोर देते हुए कहा कि आज के समय में हर चीज कम्यूनिकेशन के साथ शुरू होती है। ऐेसे में उन्होंने स्टूडेंट्स को बेहतर एंकर बनने के लिए बेहतर कम्यूनिकेशन पर फोकस करने को कहा।

कार्यक्रम में सभी का स्वागत करते हुए मानव रचना इंटरनैशनल यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. एन.सी.वाधवा ने कहा कि यह संस्थान के लिए गर्व की बात है कि आज मीडिया जगत के जाने माने नाम स्टूडेंट्स को संबोधित कर रहे हैं। उन्होंने स्टूडेंट्स से आग्रह किया कि इन दिगगजों की बातों को जीवन का मूल बनाकर आगे बढ़े। उन्होंने प्रवीण तिवारी की बुक को स्टूडेंट्स के लिए लाभकारी बताया।

कार्यक्रम में पहुंचे सनसनी के एंकर श्रीवर्धन त्रिवेदी को देख स्टूडेंट्स खासे उत्सुक दिखाई दिए। उन्होंने स्टूडेंट्स को ऊंची सोच के साथ आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित किया।  प्रवीण तिवारी ने बुक लॉन्च के लिए पहुंचे सभी अतिथियों का धन्यवाद अर्पण करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।  कार्यक्रम में वीएचपी के प्रवक्ता श्री विजय शंकर, आजतक के एंकर सईद अनसारी, वरिष्ठ पत्रकार संजय पांडे, आईबीएन 7 के एंकर आकाश सोनी, इंडिया टीवी की एंकर अर्चना सिंह, न्यूज वर्ल्ड इंडिया के एंकर नरेश सोनी, लोकसभा टीवी के एंकर अनुराग पुनेठा वरिष्ठ पत्रकार रासबिहारी आदि गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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एंकरों की टोली टीवी पर त्रिनेत्र खोल देती है, तांडव करने लगते हैं : रवीश कुमार

जनमत एक प्रोडक्ट है और दर्शक उपभोक्ता

आत्मकथाओं के लिए इतना सारा मीडिया हो गया है फिर भी लोग अलग से आत्मकथाएँ छाप रहे हैं । सोशल मीडिया पर रोज़ आत्मकथाएँ लिखी जा रही हैं । खाने से लेकर मिलने और नहाने तक की आत्मकथा। फूलों की तस्वीरों के साथ गुडमार्निंग के संदेश भेजने वाले बीमार लोगों का मक़सद ध्यान खींचना है या वाक़ई फूलों की खुश्बू से भर देना है ? हलो और नमस्कार लिखने वाले लोग क्या चाहते हैं पता नहीं चलता । इनबाक्स मनोविकारों का बक्सा है । तो सोचा कि मैं अपनी व्यथा की कथा कैसे कहूँ । पहले एक कविता सुनने का बोझ आप पर डालना चाहता हूँ । ये कविता is written by me but how come I have not twitted yet!

खुली हुई खिड़कियाँ हैं, बस दिमाग़ बंद हैं
आँखें भभक रही हैं और जुबान लहक रही है
एक टीवी है और शोर भरी शांति है
वो जो सबके बीच में बैठा है,
तूफान पैदा करता है सवालों से
नावों को हिलाडुला देता है
थ्री डी होती हमारी कल्पनाओं में रोमांच पैदा करता है
जनमत को डूबने के लिए अकेला छोड़
वो नावों की डोर से खेलता है
कुछ को डुबा देता है कुछ को बचा लेता है
ताकि डरा सके हमारी कल्पनाओं को, डूबने की दहशत के बीच
डरे हुए लोगों में खीझ पैदा हो और खुजलाहट भी,
पैदा हो हैशटैग और ट्वीट भी
एंकर माई बाप, एंकर ही सरकार है
सरकारों का एंकर है या नावों का
इस सवाल का मतलब नहीं है
क्योंकि सरकारों को सवाल पसंद नहीं है
टीवी की खिड़कियों पर कबूतर चहक रहे हैं
सुना है मुर्दा लोग भी जागरूक हो रहे हैं
प्राइम टाइमीय रात के अंधेरों में
काल कपाल, महाकंकाल चिल्लाने वालों ने
अपना भभूत बदल लिया है
जवाबदेही की वर्चुअल रियालिटी का दौर है ये
कोई मोबाइल ऐप बनाया जाए, किसी रोते हुए बच्चे को हँसाने के लिए
किसी एंकर को बुलाया जाए, सारे जवाबों के लिए
WWF का मैच चल रहा है
XYZ बुलाये जा रहे हैं, ABCD EFGH उगलवाये जा रहे हैं
अल्फाबेट की बेल्ट कमर में बाँध लीजिए
जनमत की फ्लाइट कोहरा छँटते ही उड़ने वाली है

जब FARCE, FACT बन जाए,  जब movement के सवाल EVENT में बदल जायें और जागरूकता की जगह AD Campaign लेने लगे तो हमें उसका उत्सव मनाना चाहिए। शहर को सुंदर बनाने के लिए हम ट्रैफिक और पार्किंग नियमों का पालन नहीं करते लेकिन पता नहीं कहीं से पाँच बजे सुबह दस हज़ार लोग दौड़ने आ जाते हैं। कम फ़ॉर अजमेर से लेकर रन फ़ॉर रोहतास तक होने लगा है । छोटे शहरों के मैराथन की तस्वीरों में कलक्टर और एस पी की मौजूदगी बताती है कि वो भी अभिशप्त हैं इन अभियानों में हिस्सा लेने के लिए। रोज़ दफ्तर के रास्ते में कचरे के ढेर को देखने की उनकी सहनशीलता कार के शीशे पर लगे पर्दे से ढंक जाती है। कार में पर्दा टांगने का आइडिया भारतीय नौकरशाही की मौलिक देन है। इन मैराथनों में सिर्फ शहर को साफ करने के लिए ठेके पर रखे गए सफाईकर्मी नहीं होते हैं । शिल्पा और प्रियंका के होते हुए भी विजेता अक्सर दक्षिण अफ्रीका का धावक निकल आता है। जागरूकता से लेकर स्वास्थ्य और सफाई सब एक ही साथ प्रमोट हो जाते हैं।

आप अगर FARCE के उत्सव में शामिल नहीं है तो कोई बात नहीं । हमारे एंकरों ने उत्सव मनाना शुरू कर दिया है। वे जान गए हैं कि कुछ हो नहीं सकता। प्रवक्ताओं से सवाल पूछते पूछते वे योगी बन जाते हैं । TRANS में चले जाते हैं और झूमने लगते हैं। चीखने लगते हैं। बकने लगते हैं। दूसरा बकता है तो उसे रोक कर तीसरे को बकने बोल देते हैं। पैनलों में कुछ लोग बुदबुदाते, हाथ उठाते दिख जाते हैं। मैंने खुद एक दिन अपने हाथों की हरकत देखी, लगा कत्थक की मुद्रायें है। एंकरों की टोली टीवी पर त्रिनेत्र खोल देती है। तांडव करने लगते हैं। सवालों का महामृत्युंजय जाप हो रहा है। प्रवक्ता भी उनके साथ ट्रांस में चले जाते हैं। जनमत की ecstasy बन जाती है। ऐसी तैसी डेमोक्रेसी हो जाती है।

चैनलों की रातें डेमोक्रेसी की फंतासी रचती हैं । सब अपनी अपनी फंतासियां रच रहे हैं। बातों का मल्लयुद्ध चल रहा है। तथ्य नहीं है। धारणा की तलवार से धारणा काटी जा रही है। वास्तविकता का ऐसा वर्चुअल संसार बनता है जैसे हम देवलोक में पहुंच गए हों और वहां मृत्युलोक से आ रही आवाज़ों से दिल बहला रहे हों। आप जानते हैं कि मैं फंतासियों के लोकतंत्र का एक सच्चा नागरिक हूं। जवाबदेही का ऐसा वर्चुअल लोकतांत्रिकरण कभी नहीं हुआ था। मैदान से आने वाली खबरों की जगह मंच पर बोली जाने वाली बातों ने ले ली है। जनमत अब एक उत्पाद है। कोई ईवेंट कंपनी किसी कैंपेन के ज़रिये जनमत पैदा कर देती है। रोज़ रात ओपिनियन के तलबगार टीवी के सामने बैठ जाते हैं । Opinion is new Opium . Anchor is new Acharya.

ये मेरा मौलिक कथन है मगर लौकिक है । पत्रकारिता में हमने डेवलपमेंट जर्नलिज्म के बारे में सुना था। उस जर्नलिज़्म का डेवलपमेंट रूक गया है। पहले से रूका हुआ था। प्रिंट और आनलाइन में तो है लेकिन चैनलों में उसका ग्रोथ रेट काफी खराब है। दूसरी तरफ़ राजनीति में विकास काफी दौड़ रहा है। आजकल ये इतना पोपुलर है कि हर चुनाव में विकास जनमत का पासवर्ड बन जाता है। सब उसी पासवर्ड से लोगों के दिलो दिमाग में लॉग इन करते रहते हैं।

विकास की राजनीति का असर ये हुआ है कि निवेश सम्मेलनों का ग्रोथ रेट काफी बढ़ गया है। हर राज्य की राजधानी में निवेश को लेकर शिखर सम्मेलन होने लगा है। उन सम्मेलनों में कोई आए या न आए, उस राज्य का अगर कोई अमरीका या आस्ट्रेलिया में उद्योगपति बन गया है तो वो ज़रूर आता है. एन आर आई एक फिक्स श्रेणी है। एन आर आई ही नहीं आया तो निवेश सम्मेलन पूरा नहीं हो सकता। कोई पटना से गए पाठक जी होंगे तो कोई सूरत से गए पटेल जी । पहले NRI विदेशों में भारत का दूत बताया गया अब उस पर राज्यों ने दावेदारी कर दी है । गुजरात के NRI गुजरात समिट के काम आ रहे हैं तो पंजाब वाले सिर्फ पंजाब के । जल्दी ही इन NRI का ज़िलों के हिसाब से बँटवारा होने वाला है।

इन सम्मेलनों का दिल्ली के अखबारों में विज्ञापन ज़रूर आता है। निवेश को लेकर होने वाले इन शिखर सम्मेलनों में हज़ार करोड़ की जगह हमेशा लाख करोड़ की घोषणा होती है। कितना खर्च होता है। कितने निवेश लागू हुए और क्या नतीजा निकला इसकी कहीं कोई आडिट नहीं होती है। कहीं किसी का रिसर्जेंट हो रहा है तो कहीं कोई वाइब्रेंट हो रहा है कहीं ride the growth है तो कहीं invest Madhya Pradesh , credible chhatisgarh , UP at Double Digit Growth है । IMF भारत सहित दुनिया भर का ग्रोथ रेट घटा देता है लेकिन राज्यों का ग्रोथ रेट कभी कम नहीं होता ।ये गिरावट प्रूफ़ है । वॉटर प्रूफ़ की तरह।

हर राज्य में ग्लोबल इंवेस्टर समिट एक नियमित कैलेंडर हो चुका है। निवेश सम्मेलन विकास की राजनीति के शॉप विंडो हैं। विकास होता है ये सवाल नहीं है। ये उम्मीद महत्वपूर्ण है कि विकास होगा। होने वाला है। होगा होगा होगा । बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं । प्रेमी का निवेदन जब प्रतिवेदन बन जाए तो प्रेमिका कहने के लिए हाँ कह देती है । मुझे पता नहीं केंद्र के वित्त मंत्री जब निवेश का आंकड़ा देते हैं तो इन सम्मेलनों के ज़रिये होने वाले लाखों करोड़ों के निवेश के एलान को शामिल करते हैं या नहीं।

विकास क्या है? मुझे तो ये ग़रीबी हटाओ स्लोगन का विंडो 10 वर्ज़न है। ये जब भी होता है प्रतिशत में होता है । शुरूआत इसकी कुछ प्रतिशत से होती है, बाद में इसे शत प्रतिशत किया जाने लगता है। आजकल कई योजनाएँ शत प्रतिशत वाली लाँच हो रही हैं । इतना कुछ मिल रहा है ऐसा लगता है कि लेने के लिए लोग नहीं हैं। पहले मज़दूरों से मालिक बनाने का सपना दिखाया गया, कुछ बने भी, फिर मालिकों ने मैनेजर की तादाद बढ़ानी शुरू कर दी, अब फिर से मज़दूर बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं। मज़दूर बनाए रखने के लिए श्रम सुधार हो रहे हैं। जैसे कंपनियों का बंद होना आसान हो रहा है, मज़दूरों को निकालना आसान हो रहा है। न्यूनतम मज़दूरी पर काम करने वाले अधिकतम मज़दूर पैदा किये जाएँगे । शायद इसी से दुनिया कुछ बेहतर हो जाए और बराबर हो जाए।

हम सब विकास की प्रशंसा और आलोचना की खबरें पढ़ते रहते हैं। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी के पास कोई नया मॉडल नहीं है। कांग्रेस चाहती है कि बीजेपी जाये ताकि बाकी बचे खंभों पर एल ई डी वो लगवाए, बीजेपी चाहती है कि कांग्रेस न आए ताकि हर घर में शौचालय वो लगवाए। यही काम दूसरे दल भी कर रहे हैं। एक ही काम को सब पूरा कर रहे हैं। इससे कुछ बदलाव तो आएगा। आ भी रहा है। लेकिन ऐसा कैसे हैं कि किसी दल के पास दूसरे से अलग कोई मॉडल नहीं है। नोट्स कल्चर की तरह विकास कल्चर आ गया है। पीपल के पेड़ के नीचे वाले फोटोकापी से सब फोटोस्टेट करा रहे हैं। एक ही नोट्स से पढ़कर कई छात्रों को प्रथम श्रेणी मिल जा रही है।

एक ही ईंजन क्षमता पर डिज़ाइन बदल बदल कर कितनी कारें बेचेंगे । पहले कारे छिपकली से प्रेरित होकर सेडान बनीं अब मेंढक से प्रेरित होकर एस यू वी लगती हैं । आपने किसी बेंग को बैठे हुए देखा है, छलाँग मारने से ठीक पहले,क्या SUV के कुछ मॉडल वैसे नहीं दिखते।

उसी समय में जब अभिव्यक्ति की आज़ादी के इतने माध्यम आ गए हैं, हमारी अभिव्यक्तियों पर इतना संकट क्यों हैं । हर कोई वक्ता खोज रहा है। वक्ता है कि प्रवक्ता भेज दे रहा है। किसी को शोध करना चाहिए कि क्या हम बोलने के मामले में पहले से बेहतर हुए हैं। स्पेस में ही आजाद हुए हैं या कंटेंट के हिसाब से । हमारी अभिव्यक्तियाँ पारिवारिक, नोस्ताल्जिक मामलों में बेहतर हुई हों लेकिन क्या वो ईमानदार और बोल्ड भी है ?  क्या हम राजनीतिक मामलों में बेहतर हुए हैं। साहसिक हुए हैं। इन माध्यमों से यथास्थिति मज़बूत हुई है या समाज में वाकई कोई क्रांतिकारी बदलाव हुआ है।

अभिव्यक्ति के इन माध्यमों के दौर में लोकतंत्र ख़तरे में क्यों दिखाई देता है? पर क्या वो पहले से संकटग्रस्त नहीं है। क्या हमारी अभिव्यक्तियाँ सुरक्षित हैं ? क्या पहले थीं ? तो आज हम इतने घबराये से क्यों लगते हैं ? क्या सत्ता को वैकल्पिक नज़रों से देखने वालों का आत्मविश्वास कमज़ोर हो रहा है? सत्ता का संकट ज्यादा है या उनका आत्म संदेह गहरा गया है ? ऐसा नहीं है कि लोग बोल नहीं रहे हैं। बिल्कुल बोल रहे हैं। क्या हमारे बुद्धिजीवी वर्ग का आत्मविश्वास कमज़ोर हुआ है । सारे प्रतिरोध प्रतिकात्मक क्यों हैं। इन सब सवालों पर विचार करने का स्वर्णिम दौर है। अभिव्यक्ति का यह स्वर्ण काल है । अब अभिव्यक्तियाँ शिकायत नहीं कर सकती हैं कि कहने को बहुत कुछ था मगर कहाँ और कैसे कहें पता नहीं है।

मैं विकास के विषय से भटका नहीं हूँ । कई राज्यों की आपसी प्रतियोगिता कई मामलों में बेहतर नतीजे दे रही है । कई मामलों में बेहतर नतीजा नहीं मिल पा रहा है । लेकिन बुनियादी बदलाव कहीं नहीं है। संस्थाएं उसी तरह से जेबी बनी हुई हैं। उनमें पेशेवरपन का विकास नहीं हो पा रहा है। हम इंडिकेटर के हिसाब से बदल रहे हैं मगर उस हिसाब से लोकतंत्र के इंस्टिट्यूशन क्यों नहीं बना पा रहे हैं। सारी संस्थाएं डरपोक हो गईं हैं। वो विचारों से डरने लगी हैं। कोई दूसरा विचार आता है तो डरकर मेज़ से कापी उठाकर छिपकली भगाने लगती हैं। किसी संस्था में दम नहीं है कि वो विकास के किसी मॉडल को खारिज कर दे। समीक्षा कर बंद करने का सुझाव दे दे। सब चल रहा है। अच्छा भी और बुरा भी। राजनीतिक पटल पर वैचारिक बोरियत है। इसलिए सारा ज़ोर धरना प्रदर्शनों के नए नए रूपों को गढ़ने और खोजने में किया जा रहा है। तरह तरह के प्रोटेस्ट लांच हो रहे हैं। प्रोटेस्ट क्रिएटिव होने लगे हैं।

विकास को बिना बीमा के नहीं समझ सकते हैं। हम जिस विकास के मॉडल में जी रहे हैं उसमें बीमा ही सुपर मॉडल है। एक तरह से विकास नाम के साफ्टवेयर का ये एप्पल वर्जन है । बीमा का नाम लेते ही विकास टच स्क्रीन सा फ़ील देता है । खाता में धन नहीं लेकिन नाम जनधन है। कवि की तरह सोचता हूँ तो लटपटा जाता हूँ । समर्थक की निगाह से देखता हूँ तो आश्वस्त हो जाता हूँ । हर गरीब बैंक से जुड़ा होगा । हर अमीर का क़र्ज़ा माफ होगा । न गरीब के पास धन होगा न अमीर के पास कोई कर्ज होगा ।

सरकारी स्कूल बंद कर दो, पेंशन ख़त्म कर दो, दवाएँ महँगी कर दो, मरीज़ को आई सी यू में डालकर पैसे वसूलों, ग़रीबों को अस्पताल से दूर कर दो, मिडिल क्लास है जो सरकार से माँगता है, वो कहीं अस्पताल न मांग दे इसलिए उसे बीमा पकड़ा दो । क्योंकि उसे अपनी वाली सरकार तो पसंद है मगर उस सरकार का बनाया अस्पताल नहीं ! किसी भी सरकार के सबसे मुखर समर्थक को उसके सरकारी अस्तपाल में भर्ती करा आइये। खासकर फिल्म जगत वालों को। मुझे यकीन है कि वे बिल्कुल उसी तरह चादर की रस्सी बनाकर खिड़की के रास्ते भाग जायेंगे जैसा उनके किसी स्क्रिप्ट राइटर ने किसी फिल्म में सीन क्रिएट किया होगा।

खैर जैसे जैसे बीमा का विकास होगा मानव समाज का विकास होता चला जाएगा । हर चीज़ का बीमा है। बीमा ही हमारा भगवान है। मैं हैरान हूं कि किसी ने अभी तक बीमा भगवान का आश्रम क्यों नहीं बनाया है। अगर बीमा हमारी सुरक्षा है तो एक दिन लोग ग़रीबी भुखमरी और बेकारी से अपनी सुरक्षा के लिए बीमा की सरकार चुनेंगे । हर पब्लिक संस्थाओं का विकल्प बीमा हो जाएगा। कोई सरकार ऐसी होगी जो हर बात का बीमा देगी। मैं एक नया बीमा शुरू करना चाहता हूं। बोलने पर आप पिट जाएं या कहीं से निकाल दिये जाएं तो आपको ‘डेमोक्रेसी बीमा’ के तहत एक लाख रुपये मिलेंगे। जो सरकारें व्हीसल ब्लोअर एक्ट कमज़ोर करना चाहती हैं वो डेमोक्रेसी बीमा का लाभ दे सकती हैं। आप बीमा के भरोसे जी लेना । अगर आपके पास बीमा नहीं है तो कुपोषण और ग़रीबी से उबरने का कोई फायदा नहीं । ” stay there don’t come out of your poverty unless you have an insurance. ” ये डानल्ड ट्रंप का नहीं मेरा कोट है।

विकास का एक नया रोल मॉडल है। स्मार्ट। फोन से लेकर शहर तक स्मार्ट होने जा रहे हैं। स्मार्ट विकास के युग का नया व्हाईट है। सोचिये शहर स्मार्ट हो गया, फोन हो गया, कार हो गई और आप स्मार्ट नहीं हुए तो क्या आप अपमानित महसूस नहीं करेंगे। क्या आपको उस स्मार्ट जगत में नागरिकता मिलेगी। किसी ने सोचा नहीं कि अंडे वाला, बादाम वाला अपनी रेहड़ी कहां लगाएगा। पटना में वसीम स्मार्ट कट सैलून में वसीम मियाँ बाल धीरे धीरे काटते थे । इतनी देर कर देते थे कि गर्दन में दर्द होने लगता था । आँसू निकल आते थे । जब सर उठाकर देखता था तो इस उम्मीद में चला आता था कि अगली बार स्मार्ट कट हो ही जाएगा।

हमारे राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं है लेकिन लोकतंत्र के सबसे बड़े ठेकेदार वही हैं । लोकतंत्र का अंतिम पड़ाव क्या सिर्फ दल हैं ? पार्टियों के भीतर लोकतंत्र का अंतिम पड़ाव क्या है ? भीतर कोई चुनाव नहीं है । चयन है और मनोनयन है । उनके भीतर की संस्थाओं में कोई लोकतंत्र नहीं है। बाहर की संस्थाओं का इतना बुरा हाल क्यों है ? यह सवाल महत्वपूर्ण क्यों नहीं है ? मैनेज करने के लिए बाहर से मैनजर बुलाये जा रहे हैं । ये मैनजर डबल सिम की तरह काम करते हैं। चुनाव भी जीता देते हैं और मैनेजर विकास का फ़ार्मूला बना रहे हैं । ऐसा फ़ार्मूला जिसमें विकास होता हुआ से ज़्यादा बंटता हुआ दिखे। स्कूली बच्चों को जूता बाँटने की योजना कहीं लाँच हुई है।

विकास का एक दोस्त है सुधार । रिफार्म । बिना सुधार के विकास नहीं आता और बिना विकास के सुधार नहीं आता । हम सबको शोले इसीलिए तो पसंद है । बाद में पता चलेगा कि सिक्के में दोनों तरफ हेड ही लिखा है । टेल की बारी कभी आएगी नहीं । पर हम गा सकते हैं । वो सुबह कभी तो आएगी।

(ये भाषण मुंबई के TISS के छात्रों के लिए लिखा था। कुछ देख कर पढ़ा और कुछ पढ़ते पढ़ते जोड़ गया। नया नया चश्मा लगाने के कारण कुछ दिखा कुछ रह गया। खैर लिखा हुआ यहाँ छाप रहा हूँ। टीवी पर कविता मेरी है और मौलिक है!)

जाने माने टीवी पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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क्लीवेज दिखाना एंकर को पड़ा महंगा, चैनल ने किया सस्पेंड

अल्‍बीनिया में एक टीवी रिपोर्टर को न्‍यूज प्रजेंट करते समय क्‍लीवेज दिखाना और प्‍लेब्‍वॉय मैग्जीन ज्‍वाइन करना काफी महंगा पड़ गया। चैनल के नाराज अधिकारियों ने उसे तुरंत ही सस्‍पेंड कर दिया। साथ ही उसे अभी अपनी पढा़ई और जर्नलिज्‍म पर ध्‍यान देने की नसीहत दी। टीवी रिपोर्टर ने जिस समय ऐसा हाटॅ शूट दिया उस समय वह अंतरराष्‍ट्रीय खबरें पढ़ रही थी। अल्‍बीनिया में एक समाचार चैनल के लिए 21 साल की एन्‍की ब्रैकाज इंटरनेशनल लेवल की न्‍यूज पढ़ रही थीं, लेकिन अपने इस काम के दौरान उसने कुछ ऐसा कर दिया कि बाकी सभी लोग सन्न रह गए।

एन्‍की ब्रैकाज ने अपने सीनियर को इंप्रेस करने के लिए व अचानक से खुद को हाईलाइट करने के लिए अपने दोनों स्तन के काफी हिस्से उघाड़ दिए। काफी खुले हुए आउट फिट्स पहनने के कारण स्तन का अधिकांश हिस्सा दिख रहा था। वह अपने स्‍क्रीन टेस्‍ट को प्रभावशाली बनाना चा रही थी। उसका सपना था वर्ल्‍ड न्‍यूज चैनल में धमाकेदार एंट्री करने का। हुआ भी ऐसा ही। एंकर को प्‍लेब्‍वॉय फोटोशूट का ऑफर मिल गया और उन्‍होंने इसे ज्‍वाइन कर लिया। उसे और भी कई धमाकेदार ऑफर मिले।

एन्‍की ब्रैकाज इस बात से काफी खुश है कि एक स्‍क्रीन टेस्‍ट में वह क्‍लीवेज दिखाकर अचानक से पूरे अल्‍बीनिया में छा गई। सोशल साइट्स पर भी उसकी चर्चा होने लगी। मेललाइन को उसने बताया कि उसे लगता है कि टीवी की दुनिया में जर्नलिस्‍ट के लिए जॉब मिलना काफी रिस्‍की है। ऐसे में उसे अचानक से फेमस होने का यही रास्‍ता नजर आया। यह काफी असान और लोगो के बीच छाने का चांस था। हालांकि उनके इस ऑडीशन से टीवी चैनल के अधिकारी उनसे काफी नाराज हो गए। चैनल हेड ने रिपोर्टर की इस हरकत पर उसे काफी डांट लगाई। इसके बाद उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। इस दौरान उन्‍होंने उसे अपनी पढाई पर ध्‍यान देने और जर्नलिज्‍म के एथिक्‍स पढने की भी सलाह दी।

चैनल हेड का कहना है कि वह अल्‍बीनिया में एक लोकल चैनल जजार चला रहे हैं। इसके लिए उन्‍होंने कुछ दिन पहले एन्‍की ब्रैकाज की कुछ पिक्‍स वगैरह देखी तो वह उन्‍हें काफी ठीक लगी। उन्‍हें कैमरे के सामने जिस फेस की जरूरत थी वह उसके हिसाब से फिट बैठ रही थी। सबसे खास बात तो यह है कि अल्‍बीनिया की राजधानी तिराना की रहने वाली एन्‍की ब्रैकाज पब्‍लिस रिलेशन की पढाई यूनिवर्सिटी से कर रही है। इस पर उन्‍होंने उसे न्‍यूज पढ़ने का आफॅर दे दिया, लेकिन उसने प्रोफेशन की सीमाएं तोड़ दी। ज्ञात हो कि अल्‍बीनिया में लगभग 60 फीसदी मुस्‍लिम कम्‍युनिटी है इसलिए यहां नंगापन को काफी बुरा माना जाता है।

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बेलगाम एंकर अंजना ओम कश्यप

अभी-अभी आजतक बंद किया है। देख रहा था, इंडिया 360 डिग्री। होस्ट कर रही थीं बेलगाम एंकर अंजना ओम कश्यप। एक खबर आई। ब्रेकिंग न्यूज में। खबर थी, नीतीश का स्टेटमेंट। नीतीश कुमार ने कहीं स्टेटमेंट दिया था कि मैं अहंकारी हूं परंतु शिष्टाचार नहीं भूलता। जाहिर तौर पर नीतीश के तीर पर मोदी ही थे। यह सब चल ही रहा है। कई दिनों से। लेकिन एक पत्रकार होने के नाते अंजना ओम कश्यप से जो उम्मीदें थी, उसे उन्होंने न सिर्फ तोड़ दिया बल्कि मेरे मन में अपने लिए और ज्यादा नफरत भी पैदा कर दिया। अंजना ने पंच मारा-कितनी बेमानी हैं ये बातें। बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, सड़कें नहीं हैं और इस किस्म की बातें…लड़ाई, झगड़ा, चोरी और डकैती वहां पर हो रही है….यह सब कहते-कहते उनके चेहरे पर बेहद घटिया किस्म के भाव आए थे। आप लोग इसकी रिकार्डिंग मंगवा सकते हैं। आज तक से।

देश का कौन सा शहर है ऐसा जहां इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा हो? दिल्ली में है? गुजरात में है? गोवा में है? महाराष्ट्रा में है? भाजपा शासित किस प्रदेश में है? मैं अपना जीवन उन सज्जन की चाकरी में बीता दूंगा जो साबित कर दें कि देश के किसी भी सूबे में पूरा का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर हो। भाजपा ही नहीं, कांग्रेस नीत सरकार वाले भी किसी सूबे में पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। तो, बिहार को बदनाम क्यों कर रही हैं अंजना? नीतीश का नाम लेते हुए उनका मुंह कसैला क्यों हो जाता है? ये पत्रकारिता नहीं कर रही हैं। ये हम पत्रकारों को बदनाम करने का दुष्कर्म कर रही हैं। इन्हें कितने विषयों की जानकारी है, भगवान जानें। एक बार सामना हो जाए तो मजा आ जाएगा।

अंजना ने कहा कि बिहार में चोरी होती है, मार-धाड़ होता है, डकैती होती है। मेरा प्रतिप्रश्न हैः दिल्ली, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड….किस राज्य में अपराध नहीं होते? यूपी में नहीं होता? महाराष्ट्र में नहीं होता? कहां नहीं होता?? हर जगह होता है। उसके लिए पुलिस है। पुलिस वाले ड्यूटी ईमानदारी से करते हैं या नहीं, यह अलग विषय है पर चुनाव के इस मौसम में इस तरह प्रधानमंत्री की तरफदारी करने वाली रिपोर्टिंग क्यों और वह भी आजतक जैसे मंच से???

मैं 24 साल से पत्रकारिता कर रहा हूं। बिहार, झारखंड, असम, महाराष्ट्रा, यूपी, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में पत्रकारिता कर चुका हूं। कहीं रामराज्य नहीं है। 100 फीसदी इंफ्रास्ट्रक्चर भी कहीं डेवलेप नहीं है। गांधीनगर की गलियों में भी घूम चुका हूं। कहीं रामराज्य नहीं है। फिर अंजना बिहार पर तंज क्यों कस रही हैं? आप जानती ही कितना हैं बिहार को? बीते 10 साल में बिहार जिस तेजी से बदला है उसे महसूस करने के लिए आपको बिहार की यात्रा करनी चाहिए। आप जाइए गांवों में, शहरों में। देखिए तो कि बिहार कहां से कहां पहुंच गया है? बिना केंद्र सरकार के समर्थन के 10 फीसदी का विकास दर हासिल करना हंसी ठट्ठा नहीं है। आप इसे मजाक न बनाएं अंजना जी। कोई हक नहीं है आपको। आप पत्रकारिता कीजिए न। किसने रोका है आपको। सत्ता की दलाली मत कीजिए। हम लोगों की विश्वसनीयता पर संकट मत खड़ा कीजिए। यही आपसे निवेदन है। अगर आप ऐसी ही उल-जुलूल टिप्पणियां करेंगी तो हम जैसे समर्थ पत्रकार आपके खिलाफ ही मोर्चा खोल देंगे। इसे बढ़िया से समझ लीजिए।

लेखक आनंद सिंह कई बड़े अखबारों में काम कर चुके हैं और इन दिनों अपने गृह जनपद गोरखपुर में रहते हुए पत्रकारिता के कुछ नए प्रयोगों में जुटे हुए हैं. आनंद से संपर्क 08400536116 या 08004678523 के जरिए किया जा सकता है.


इस पुरानी पोस्ट को भी पढ़ सकते हैं:

परम अहंकारी अंजना ओम कश्यप को अनिश्चित काल के लिए फोर्स लीव पर भेज देना चाहिए

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एंकर अर्चना शर्मा के निष्कासन पर स्पीकर सुमित्रा महाजन की खामोशी चिंताजनक

जी हाँ, ये सच है कि पिछले एक अरसे से लोक सभा टीवी की एंकर अर्चना शर्मा चैनल में महिला कर्मचारियों की सुरक्षा के मुद्दे को लेकर अपनी बात रखती रही हैं। कभी चैनल की मुख्य कार्यकारी एवं मुख्य  संपादक सीमा गुप्ता के समकक्ष तो कभी उनके उच्चाधिकारी लोक सभा सचिव श्रीमान भल्ला जी  के समक्ष, लेकिन इस समस्या को बताने के बाद भी जमीन पर कुछ नहीं बदला,  बदस्तूर लोक सभा टीवी में महिलाकर्मियों की ड्यूटी देर रात तक बिना किसी सुरक्षा के लगाईं जा रही थी और इस अहम मुद्दे की लिखित शिकायत करने का खामियाज़ा अर्चना शर्मा को भुगतना पड़ा। उन्हें 28 जुलाई को बुलाकर कहा गया कि आप कल से ऑफिस न आयें। सीमा जी ने आपका कार्यकाल नहीं बढ़ाया है। 

ये सुनकर अर्चना शर्मा ने पूछा कि आप मुझे मौखिक कैसे बोल सकती हैं? कुछ लिखित में तो दीजिये तो जवाब मिला कि मुझे यही कहा गया है। अब आपको संस्थान में रखने का अंतिम निर्णय स्पीकर ही लेंगी। लिहाज़ा अर्चना शर्मा अपनी बात रखने स्पीकर के समक्ष पहुंचीं। इस वक़्त संसद का मॉनसून  सत्र चल रहा  हैं। इसलिए स्पीकर से मिलना इतना आसान नहीं, ये बात अर्चना शर्मा जानती थीं। इसलिए अर्चना ने उनसे मिलने की कोशिशें जारी रखीं और ये कोशिश रंग लाई। 

स्पीकर अर्चना शर्मा समेत लोक सभा टीवी की कई महिला कर्मचारियों से अवकाश (रविवार ) के दिन मिलीं। अर्चना ने स्पीकर को रात में काम करने वाली महिलाकर्मी की  सुरक्षा से जुड़े कुछ ख़ास दस्तावेज़ व अपने कार्यकाल को सीमा जी द्वारा नहीं बढ़ाने के कुछ कारण भी बताए। स्पीकर सुमित्रा महाजन ने कहा कि इस विषय पर तुरंत ध्यान दिया जाएगा और साथ ही ये भी आश्वासन दिया कि लोक सभा टीवी में भी सब कुछ ठीक हो जाएगा।  सभी खुश थे और अर्चना शर्मा भी कि शायद स्पीकर उनके कार्यकाल को बढ़ाने के लिए लोक सभा टीवी की प्रमुख सीमा गुप्ता को जरूर  लिखेंगी। 

दिनाँक 4 /8 /15  को महाजन ने लोक सभा की बेव साइट पर लोक सभा टीवी की महिला कर्मचारियों के देर रात में घर जाने की सुरक्षा को लेकर प्रेस रिलीज़ जारी करा दी। इस प्रेस रिलीज़ में महिलाकर्मीयों की सुरक्षा के लिए ख़ास कदम उठाने के निर्देश दिए गए लेकिन दूसरी तरफ 5 अगस्त 2015 को अर्चना शर्मा को टर्मिनेशन लेटर भी थमा दिया गया। 

ऐसे में सवाल ये उठते हैं कि अगर एंकर अर्चना शर्मा द्वारा उठाया जा रहा मुद्दा गलत है  तो स्पीकर ने तुरंत संज्ञान लेते हुए प्रेस रिलीज़ क्यों जारी कराई? क्यों अर्चना के कार्यकाल को बढ़ाने के मामले में स्पीकर ने अपनी भूमिका शून्य रखी ? क्या उसका एक कारण सीमा जी की ऊँची पहुँच थी ? जैसाकि  हाल ही में देखने को मिला था, सीमा अपने अधीनस्थ अधिकारी धीरज सिह को केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली और राज्यवर्धन सिंह राठौर की धमकी दी थी, वो भी लिखित में।

गौर करने वाली बात है कि अर्चना शर्मा के अप्रेजल फॉर्म में उनके रिपोर्टिंग अधिकारियों द्वारा उनके कार्य प्रदर्शन को बेहतर मानने के बाद भी उनका कार्यकाल क्यों नहीं बढ़ाया गया ? क्या अर्चना शर्मा के टर्मिनेशन के बाद अब सीमा गुप्ता ही लोक सभा टीवी में सब कुछ हैं, वो जो कहेंगी, वही होगा, उनकी तानाशाही पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं? पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार “राम नाथ गोयनका ” और चार  बार लाड़ली मीडिया अवॉर्ड पाने वाली अर्चना शर्मा के अंदर लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को क्योँ कोई काबिलियत नहीं दिखाई दी ? क्या अर्चना शर्मा ने इतने अहम मुद्दे को उठा कर गलत किया जिसकी कीमत उन्हें अपनी नौकरी देकर चुकानी पड़ी? जिस संस्थान को  अर्चना ने अपने जीवन के बहुमूल्य 9 साल दिए, उस संस्थान ने उन्हें निकालने में 9 मिनट भी नहीं लगाए। 

फिलहाल अर्चना शर्मा लोक सभा टीवी में नहीं हैं  लेकिन महिला सुरक्षा की उनकी  ये मुहिम  रंग लायी, जिसके फलस्वरूप पहली बार किसी लोक सभा अध्यक्ष को महिला सुरक्षा को लेकर लोक सभा टीवी के लिए नियम कानून बनाने को बाध्य होना पड़ा। ज़रा सोचिये। 

एक टीवी पत्रकार द्वारा प्रेषित पत्र पर आधारित

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