यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए…

Surendra Kishore : बहुत दिनों से मैं सोच रहा था कि आपको अपने बारे में एक खास बात बताऊं। यह भी कि वह खास बात किस तरह मेरे जीवन में बड़े काम की साबित हुई। मैंने 1977 में एक बजुर्ग पत्रकार की नेक सलाह मान कर अपने जीवन में एक खास दिशा तय की। उसका मुझे अपार लाभ मिला। मैंने फरवरी 1977 में अंशकालीन संवाददाता के रूप में दैनिक ‘आज’ का पटना आफिस ज्वाइन किया था। हमारे ब्यूरो चीफ थे पारस नाथ सिंह। उससे पहले वे ‘आज’ के कानपुर संस्करण के स्थानीय संपादक थे। वे ‘आज’ के नई दिल्ली ब्यूरो में भी वर्षों तक काम कर चुके थे। पटना जिले के तारण पुर गांव के प्रतिष्ठित राजपूत परिवार में उनका जन्म हुआ था। वे बाबूराव विष्णु पराड़कर की यशस्वी धारा के पत्रकार थे। विद्वता और शालीनता से भरपूर।

इधर मैं लोहियावादी समाजवादी पृष्ठभूमि से निकला था। पिछड़ों के लिए आरक्षण का प्रबल समर्थक। सक्रिय राजनीति से निराश होकर पत्रकारिता की तरफ बढ़ा ही था कि देश में आपातकाल लग गया। पहले छोटी-मोटी पत्रिकाओं में काम शुरू किया था। उन पत्रिकाओं में नई दिल्ली से प्रकाशित चर्चित साप्ताहिक ‘प्रतिपक्ष’ भी था। उसके प्रधान संपादक जार्ज फर्नांडिस और संपादक कमलेश थे। गिरधर राठी और मंगलेश डबराल भी प्रतिपक्ष में थे। भोपाल के आज के मशहूर पत्रकार एन.के.सिंह भी कुछ दिनों के लिए ‘प्रतिपक्ष’ में थे।  पर वह जार्ज के दल का मुखपत्र नहीं था। वह ब्लिट्ज और दिनमान का मिश्रण था। आपातकाल में मैं फरार था। बड़ौदा डायनामाइट केस के सिलसिले में सी.बी.आई.मुझे बेचैनी से खोज रही थी कि मैं मेघालय भाग गया।

जब आपातकाल की सख्ती कम हुई तो में पटना लौट आया और ‘आज’ ज्वाइन कर लिया। मैंने अपनी पृष्ठभूमि इसलिए बताई ताकि आगे की बात समझने में सुविधा हो। आज ज्वाइन करते ही मैंने देखा के ‘आज’ में हर जगह ब्राह्मण भरे हुए हैं। मैंने पारस बाबू से इस संबंध में पूछा और सामाजिक न्याय की चर्चा की। उन्होंने जो कुछ कहा, उसका मेरे जीवन पर भारी असर पड़ा। ऋषितुल्य पारस बाबू ने कहा कि आप जिस पृष्ठभूमि से आए हैं, उसमें यह सवाल स्वाभाविक है। पर यह कोई लोहियावादी पार्टी का दफ्तर नहीं है। यदि यहां ब्राह्मण भरे पड़े हैं तो यह अकारण नहीं हैं। ब्राह्मण विनयी और विद्या व्यसनी होते हैं। ये बातें पत्रकारिता के पेशे के अनुकूल हैं। यदि आपको पत्रकारिता में रहना हो तो ब्राह्मणों के इन गुणों को अपने आप में विकसित कीजिए। अन्यथा, पहले आप जो करते थे, फिर वही करिए।

मैंने पारस बाबू की बातों की गांठ बांध ली। उसके अनुसार चलने की आज भी कोशिश करता रहता हूं। उसमें मेहनत, लगन और ध्यान केंद्रण अपनी ओर से जोड़ा। यदि 1977 के बाद के शुरूआती वर्षों में पत्रकारिता के बीच के अनेक ब्राह्मणों ने मुझे शंका की दृष्टि से देखा,वह स्वाभाविक ही था।उन्हें लगा कि पता नहीं मैं अपने काम में सफल हो पाऊंगा या नहीं। पर पारस बाबू की शिक्षा मेरे जीवन में रंग दिखा चुकी थी। नतीजतन मेरे पत्रकारीय जीवन में एक समय ऐसा आया जबकि देश के करीब आध दर्जन जिन प्रधान संपादकों ने मुझे स्थानीय संपादक बनाने की दिल से कोशिश की, उनमें पांच ब्राह्मण ही थे।उनमें से एक -दो तो अब भी हमारे बीच हैं। मैं इसलिए नहीं बना क्योंकि मैं खुद को उस जिम्मेदारी के योग्य नहीं पाता। पर, आज भी मेरे पास लिखने-पढ़ने के जितने काम हैं ,वे मेरी क्षमता से अधिक हैं। पैसे के मामले में भी संतुष्टि है। नौकरी में रहते हुए जितने पैसे मुझे मिलते थे, उससे अधिक अब भी मिल जाते हैं। मूल्य वृद्धि को ध्यान में रखने के बावजूद। यह सब पारस बाबू के गुरू मंत्र का कमाल है। मैंने तो अपने जीवन में ‘आरक्षण’ का विकल्प ढूंढ लिया। वैसे यह बता दूं कि मैं अनारक्षित श्रेणी वाले समाज से आता हूं।

वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों, जरा ये भी सुनो

Ashwini Kumar Srivastava : हिन्दू राज की आड़ लेकर ऊंच-नीच, छुआ-छूत वाली वर्णव्यवस्था को लाकर भारत को तलवारों/तीरों और राजा-सामंतों के युग सरीखी मानसिकता में वापस ले जाने में लगे बुद्धिमानों… क्या तुम्हें यह भी पता है कि नासा के जरिये अमेरिका इन दिनों बहुत ही जोरों शोरों से इस संसार में सबसे तेज चलने वाले प्रकाश यानी लाइट से भी तेज गति से चलने वाले रॉकेट बनाने में जुटा हुआ है?

वार्प इंजन की मदद से चलने वाले इस राकेट से स्पेस-टाइम में हलचल पैदा करके अमेरिका अब इंसानी सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी रुकावट को आइंस्टाइन के सापेक्षवाद के सिद्धान्त के जरिये दूर करने में लगा हुआ है। इससे पहले भी जब हम जातीय अहंकार और भेदभाव में डूबकर तीर-तलवार में ही अपनी वीरता और धार्मिक ग्रंथों में विज्ञान खोजने में लगे थे तो पश्चिमी-इस्लामी सभ्यता तोप-बंदूकें लाकर हमें कीड़े मकोड़ों की तरह कुचलने और गुलाम बनाने में कामयाब रही थी।

आज जब हमारा इसरो दुनिया के बाकी देशों से मुकाबले में आगे चल रहा है तो हम अपने ही इतिहास में दफ़न अपने जातीय अहंकार की कब्रें खोदकर हिन्दू गौरव के कागजी महल बनाने में लगे हुए हैं… क्षत्रिय राज करेगा, ब्राह्मण पुरोहिती करेगा, कायस्थ प्रशासनिक लिखापढ़ी करेगा, पिछड़ा वर्ग खेती करेगा, वैश्य व्यापार करेगा, शूद्र सेवा करेगा… तो नासा या इसरो जैसे वैज्ञानिक कहाँ से लाओगे? आज हमारे इसरो में क्या सिर्फ ब्राह्मण, कायस्थ ही वैज्ञानिक हैं? वहां मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पिछड़ा, दलित सभी मौजूद हैं… और जो सवर्ण हैं भी, वे धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर या गुरुकुल से नहीं निकले हैं। उन्होंने भी वही पढ़ाई पढ़ी है, जिसको पढ़कर बाकी सभी जाति-धर्म के लोग उनके जैसे काबिल वैज्ञानिक बने हैं।

योगी के रूप में हिन्दू राज लौटने से कबीलाई नृत्य कर रहे सवर्णों को क्या यह नहीं पता है कि क्षत्रिय के डीएनए में अगर राज करना लिखा भी हो तो क्या यह जितनी आसानी से यूपी में सत्ता पा गए, क्या उतनी ही आसानी से दुनियाभर के बेमिसाल वैज्ञानिकों और उनकी बेजोड़ वैज्ञानिक खोजों-हथियारों से लैस अमेरिका-चीन जैसी ताकतवर फौजों के सैनिकों के सामने ये क्षत्रिय क्या सिर्फ अपनी जाति बताकर ही युद्ध जीत लेंगे?

बाकी जातियों को कायर, सेवक, पुरोहित बनाकर या करार देकर महज क्षत्रियों के प्राचीन युद्ध कौशल के भरोसे दुनिया से मुकाबला करके क्या हम फिर उसी तरह गुलाम नहीं हो जायेंगे, जैसे कि हजारों बरस से पहले भी रह चुके हैं?

दुनिया आगे बढ़ रही है। पश्चिमी सभ्यता का हर देश, हर समाज अपने यहाँ बराबरी ला रहा है। हालांकि उनके यहाँ कभी भी हमारे यहाँ जैसे वर्ण व्यवस्था का शोषणकारी सिस्टम रहा भी नहीं। फिर भी वे अपने यहाँ हर किसी को समान अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, सबको न्याय, संसाधनों का समान बंटवारा, राजनीति-प्रशासन-सेना-पुलिस में बराबरी की भागीदारी दे रहे हैं… कोई वर्ग, क्षेत्र या समूह अगर उनके विकास के कार्यक्रम से छूट जाता है तो वे एड़ी-चोटी का जोर लगाकर उन्हें अपने बराबर लाते हैं।

यहां तो सरकार ही इस लालच में बन रही है कि हमारी जाति सबसे आगे निकल जाए। हमारी जाति ही सब कुछ ज्यादा से ज्यादा हड़प ले।

जिस समाज में बराबरी नहीं होती, और ज्यादा से ज्यादा संसाधन हड़पने की लूट होती है, वह समाज इसी तरह अतीत के पन्नों में जीता है… और गुलाम होकर या लड़ झगड़ कर ख़त्म हो जाता है। जबकि बराबरी वाले समाज पश्चिमी समाज की ही तरह आकाश-पाताल-जमीन-अंतरिक्ष-समुद्र… हर कहीं अपना कब्जा कर लेते हैं…तभी तो दुनिया का हर देश आज पश्चिमी सभ्यता के ही दिए अविष्कारों-उपकरणों, राजनीतिक- वैज्ञानिक सिद्धान्तों के नक़्शे कदम पर चलने को मजबूर है।

इतना कुछ करने के बाद भी आज भी पश्चिमी सभ्यता दुनिया को हर रोज चौंकाने में लगी है। फिलहाल वार्प इंजन के जरिये लाइट से भी तेज रफ़्तार पाने की कोशिश करने में अगर अमेरिका को कामयाबी मिल गयी तो इसके सैनिक-असैनिक नतीजे कल्पना से परे होंगे।

पलक झपकते ही का मुहावरा फिर अमेरिका विकास और विनाश, दोनों में ही चरितार्थ करने में सक्षम हो जाएगा।

सकारात्मक पहलू देखें तो सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात तो यह होगी कि अंतरिक्ष में भी इंसानी सभ्यता वहां भी जा सकेगी, जहाँ जा पाना मौजूद तकनीक की सीमाओं के कारण सैकड़ों बरसों में ही संभव हो पाता।

मसलन, हमारे सौरमंडल के सबसे नजदीकी तारा मंडल अल्फ़ा सेंटोरी, जो कि 4.3 प्रकाश वर्ष दूर है, वहां भी इस इंजन के जरिये महज दो हफ्ते में ही पहुंचा जा सकता है। हमारे सूर्य, बुध, शुक्र, बृहस्पति तो फिर कुछ मिनटों की ही दूरी पर रह जाएंगे।

चलिये हटाइये, इस फ़ालतू की बात को… आप तो यह बताइये कि योगी के राज में हिन्दू राज तो आ गया… अब सवर्णों के दिन बहुरेंगे या नहीं? म्लेच्छ-शूद्र तो अब फिर से औकात में आ ही जायेंगे… है न? तो फिर लगाइये नारा… योगी योगी योगी

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पत्रकार की जाति : राजदीप सरदेसाई और प्रभाष जोशी तक अपने ब्राह्मण नस्ल का महिमामंडन कर चुके हैं!

Mukesh Kumar : ये अच्छी बात है कि पत्रकारों ने अपने जातीय गर्व को सरे आम प्रकट करना शुरू कर दिया है और उसे उन्हीं की बिरादरी से चैलेंज भी किया जा रहा है। इससे मीडिया में जातिवाद की परतें खुलेंगी। लोगों को पता चलेगा कि पत्रकारों में जातीय अहंकार किस-किस रूप में मौजूद है और वह कंटेंट के निर्माण में किस तरह से काम करता होगा।  हम सब जानते हैं कि मीडिया भी इसी जातिवादी समाज का हिस्सा है, इसलिए उसी रूप में जातिवाद भी वहाँ मौजूद है, मगर उसे मानने से हम इंकार भी करते रहे हैं। मीडिया को ऐसी पवित्र गाय की तरह पेश करते रहे हैं कि मानो वह जाति, धर्म और दूसरे विभाजनों से ऊपर है और अगर समतावाद कहीं है तो मीडिया में ही।

कुछ समय पहले राजदीप सरदेसाई ने अपने गौड़ सारस्वत ब्राम्हण होने का सार्वजनिक इज़हार किया था। उससे भी पहले स्वर्गीय प्रभाष जोशी ने ब्राम्हण नस्ल का महिमामंडन करके जताया था कि संपादकों के स्तर पर भी ये किस हद तक मौजूद है।  तो आइए महानुभावों अब देर न कीजिए।, वे सब जिन्हें अपनी जातियों पर गर्व है और इस वजह से श्रेष्ठताबोध से भरे हुए हैं, घोषित करें कि वे क्या हैं-ब्राम्हण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या कुछ और? ये छिपाने का नहीं बताने का समय है, क्योंकि बहुत सारे लाभ इसी आधार पर बँटते आए हैं और अब तो खूब बँट रहे हैं। जाति बताइए, प्रसाद पाइए (छोटी जातियों के लिए दंड तो मनु बाबा ही तय कर गए हैं)। लेकिन ज़ाहिर है कि एकाध फ़ीसदी लोग ऐसे भी होंगे जो इनसे सचमुच में मुक्त हैं या मुक्त होने की ईमानदार कोशिशों में लगे हुए हैं। वे बचे हुए लोग डंके की चोट पर कहें कि मैं पत्रकार हूँ, केवल पत्रकार।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के इस एफबी पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख पठनीय कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Sunil Kumar जी, मैं सिर्फ पत्रकार हूं। लेकिन इसी प्रसंग में एक बड़े मीडिया संस्थान की बात कहता हूं। 2007 में मैं एक बड़े संस्थान में इंटरव्यू देने गया था। वहां मुझसे पहले सवाल पूछा गया कि सुनील जी, आपका पूरा नाम क्या है? मैंने कहा सुनील कुमार। उस सज्जन ने एचआर महोदया के सामने फिर से पूछा—नहीं, सुनील कुमार के बाद क्या? मैंने कहा- जी सिर्फ सुनील कुमार। फिर उन्होंने मेरे पिताजी का नाम देखा, उसमें भी उन्हें टाइटिल नहीं मिला, तो वहां भी पूछ दिया कि अच्छा आपके परिवार में कौन-कौन हैं, उनका क्या नाम है, क्या पेशा है, कुल मिलाकर वो मेरी जाति पूछना चाहते थे। चिढ़कर मैंने ही कहा, कि साब, सीधे-सीधे कहिए कि आप मेरी जाति जानना चाहते हैं, जो वह हड़बड़ा गये। कहा- नहीं, नहीं सुनील जी, ऐसी बात नहीं है। बहरहाल मैं उठकर चला आया। आपने लिखा परते खुलेंगी, मुझे नहीं लगता सर, क्योंकि इनके सिरमौर इतने घाघ है कि वो नये-नवेलों को तो पता तक नहीं चलने देते। यह जातिवाद स्पष्ट तौर पर दिखता है सर, खासतौर पर ब्राह्मणवाद और भूमिहारवाद। इससे एक बार फिर सामना हुआ अभी पिछले दिनों। जातिवादी चश्मे से सबको देखने वाला यह वर्ग हर चीज को सिर्फ उसी चश्मे से देखता है। पिछले दिनों एक संपादकजी से मुलाकात हुई, उन्होंने पूछा आजकल क्या कर रहे हैं, मैंने कहा सर, लोक कला परंपरा में दलितों की भूमिका पर रिसर्च कर रहा हूं। उन्होंने कुछ जानकारिया लीं और फिर उसी जानी-पहचानी लीक पर उतर गये कि सारी परंपराएं ब्राह्मणों द्वारा विकसित हैं और लोक तो उनका अनुकरण मात्र करता है। बहरहाल, मीडिया संस्थानों में जातीय पूर्वाग्रह किस प्रकार है, यह मैं क्या लिखूंगा सर, इस क्षेत्र में आपका लंबा अनुभव है और आप भली-भांति परिचित है।

Umesh Chaturvedi भाई साहब, आपकी आक्रामकता कड़वी है और अहम भी..लेकिन आप जिस जातिवाद के बहाने जिस वर्ग को उजागर कर रहे हैं..वह भी एकतरफा ही है..एक सज्जन हैं..काफी क्रांतिकारी पत्रकार हैं..फेसबुक पर भी आक्रामकता से ऐसे विमर्श उजागर करते रहते हैं..जैसा कि मेरे नाम से ही जाहिर है..जातिगत स्तर पर उनसे उंचा ही है ..एक दौर में उस सज्जन के टूटहे स्कूटर पर उनके अलावा मैं ही बैठता था..इससे भ्रम हो गया कि हम दोनों दोस्त हैं..इसलिए जब एक अच्छी जगह के वे प्रभारी बने और मेरे दुर्दिन थे तो मैं उनसे नौकरी मांगने गया..उन्होंने बढिया सी चाय पिलाई और टाल दिया…रही बात मीडिया की जातिवाद की तो भाई साहब, मुझे तो आजतक इसका फायदा नहीं मिला..ना तो मेरे जातिवालों ने मुझे उचित मौका दिया और ना ही कथित क्रांतिकारी-जातिविरोधियों ने..और यह कम से कम अब मैं नहीं मानता कि मैं मलाई खा रहे गधों की तुलना में अयोग्य हूं..हां छात्र जीवन में जातिविरोधी पढ़ाई के बाद विकसित सोच के चलते मानता था कि मैं ही अयोग्य रहा हूंगा जो मौका नहीं मिला..इसलिए एकतरफा आक्रामकता को छोड़िए और दूसरे तरफ के जातिविमर्श पर भी हमला बोलिए…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सोशल मीडिया पर भारी पड़ेगी जाति-धर्म पर गलत टिप्पणी, रासुका लगेगा

लखनऊ : सोशल मीडिया पर धर्म, सम्प्रदाय व जाति विशेष पर भड़काऊ कमेंट करने वालों पर रासुका के तहत कार्रवाई होगी। इतना ही नहीं आपत्तिजनक पोस्ट पर कमेंट, लाइक व शेयर करने वालों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई होगी। 

डीजीपी एके जैन ने साइबर क्राइम के खिलाफ कड़ा रूख दिखाया है। डीजीपी ने बताया कि डीआईजी मेरठ के नेतृत्व में विशेष सेल गठित किया गया है। यह सेल सोशल मीडिया पर निगरानी रखेगा। किसी तरह की फोटो, वीडियो या कमेंट से माहौल बिगाड़ने की कोशिश करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। 

डीजीपी एके जैन ने शनिवार की रात को फैजाबाद में हुई घटना का जिक्र किया। फैजाबाद में चौक स्थित टाटशाह मस्जिद में तारावीह पढ़ रहे लोगों को फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट की जानकारी हुई। इससे उग्र सम्प्रदाय विशेष के लोगों ने घण्टाघर पर जमा होकर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने दंगा नियंत्रण वाहन पर पत्थर बरसाए थे। 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी समर्थक क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है

Sheetal P Singh : BJP के हाथियों के दंगल में पैदल सेना की बड़ी दुर्गति है. बीजेपी की पैदल सेना मुख्यत:दरिद्र सवर्णो की रुग्णशाला से आती है। रुग्णशाला का मतलब यहाँ उन प्रतिभागियों से है जो आर्थिक शैक्षिक शारीरिक मोर्चों पर दोयम दर्जा रखते हैं पर मनु महाराज की अनुकम्पा से उन्हे अपने से बुरे हाल में सड़ रहे ग़रीब नसीब हैं, जिन्हें देखकर उन्हे ख़ुद के “बड़े” होने का एक झूठा अहसास तरावट देता रहता है. तो यह पैदल सेना अपनी दो हज़ार से बीस हज़ार के मध्य झूलती सामुदायिक विपन्नता के दौर में अरबों ख़रबों के वारे न्यारे करने वाले फ़ैसलों /विवादों के पैरवीकारों के रूप में अपने आप को पाकर समझ ही नहीं पाती कि बैटिंग किधर करनी है. इंतज़ार करती है कि कुछ ऊपर से ज्ञान छिड़का जाय तो वह भी लोकल बघारे.

मसलन आप सोशल मीडिया के गट्ठर के गट्ठर अकाउंट देख आइये. एक भी शायद ही मिले जिसने KG6 basin प्रसंग पर ख़ुद से कुछ लिखा हो? आयरन ओर के गोरखधंधे पर एक हर्फ़ दरज कराया हो? अडानी के बारे में कुछ गहरी जानकारी प्रकट की हो? अब यकायक उसे ललित मोदी/सुषमा स्वराज की मानवीय रिश्तेदारी पर डिफ़ेंस खड़ा करना है. काफ़ी मीमांसा के बाद मैंने पाया कि कम से कम सोशल मीडिया में मौजूद मोदी/बीजेपी समर्थकों का ९९% आज के क्रोनी कैपिटल के ऐतिहासिक साइज़ के प्रपंच से दयनीय स्तर तक अनभिज्ञ है. वह दरअसल मुसलमानों से लड़ रहा है, ईसाइयों से लड़ रहा है, औरतों को क़ाबू (उसकी समझ में मर्यादा) में रखने में लगा है, कश्मीर में तैनाती चाहता है, लाहौर पे क़ब्ज़ा, चीन को सबक़ और विश्व गुरू/हिन्दू /संस्कृत …

सब गड्ड मड्ड. वो बहस नहीं कर सकता. ख़ाली डब्बा है. सो गालियों में जीता है. इसी वजह से इसकी सारी सर्किल मर्दों की है. कुछ नकली महिला प्रोफ़ाइल्स छोड़कर. मैं दस साल बाद का दृश्य अपने हिसाब से जैसा देख पा रहा हूँ कि “खेती सेठों की हो चुकी होगी और बेरोज़गारों के झुंड तमाम तरह की लम्पट सेनायें बनाकर एक दूसरे से निबटने/निबटाने में लगे होंगे. सरकारी फौजफाटा/पुलिस अपनी लूटपाट अराजकता में. सांप्रदायिक बँटवारा नई चुनौतियों को पेश कर रहा होगा. बुज़ुर्ग औरतें बच्चे और बीमार सबसे ज़्यादा वलनरेबल होंगे. है तो बहुत बुरा सा स्वप्न पर… 

शीतल पी सिंह के एफबी वॉल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अब बताइए, कितने जूते मारेंगे आप समाज में जातिवाद का जहर घोलने वालो को !

मीडिया अब दलाली का दूसरा नाम है। यहाँ फर्जी खबरें भी बनायी जा रही हैं, दलितों और पिछड़ों पर झूठी एफआईआर करवाने की तो फर्जी न्यूज़ छप रही है, मेधा और मेरिट को लेकर!

फोटो को गौर से देखिये। कल यूपी के सभी अखबारों में एक “मेधावी ” लड़की की आत्महत्या करने की खबर खूब डिटेल में छपी थी, कारण आरक्षण को बताया गया। दोषी अखिलेश यादव को कहा गया। मगर हुजूर वो मेधावी तो इतना भी नहीं पढ़ सकी कि पुलिस भर्ती में महिला सामान्य की मेरिट महिला पिछड़ी जाति से बहुत कम गयी है !

अब आप क्या कहेंगे ? क्या यह खबर उस मेधावी की आत्महत्या के नाते छपी या फिर उसकी जाति के नाते जबरदस्ती पिछड़ों के अधिकारों पर हमला बोलने का बहाना बना कर मीडिया ने प्रदेश में शांति व्यवस्था भंग करने की साजिश की है?

सुनील यादव के एफबी वॉल से

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पांडे, तिवारी और बोधिसत्व का बाभनावतार… तीनों एकसाथ गालियां बक रहे हैं : अनिल कुमार सिंह

Anil Kumar Singh : उदय प्रकाश जी को गरियाते -गरियाते खूंखार जातिवादी और सांप्रदायिक भेडियों का झुण्ड मुझ पर टूट पड़ा है. ये दुष्प्रचारक अपने झूठ की गटर में मुझे भी घसीट लेना चाहते हैं. दो कौड़ी के साम्प्रदायिकता और अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले टी वी सीरियलों का घटिया लेखक मुझे गुंडा बता रहा है. ये परम दर्जे का झूठा है और अपने घटिया कारनामों के लिए शिवमूर्ति जैसे सरल और निश्छल लेखक को ढाल बनाता रहा है. इसे मेरी भाषा पर आपत्ति है. कोई बताओ कि ऐसे गिरे व्यक्ति के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाय. और, आमना -सामना होने पर इससे कैसा व्यवहार किया जाय.

मैंने इलाहाबाद वि वि के यूनियन हाल पर तो इससे विनम्र भाईचारे का व्यवहार किया था जिसे इसने अपनी जाति-विरादरी में मेरे द्वारा धमकाने का प्रचार किया था. तब शायद इसे अपनी जरायम महत्वाकांक्षी योजनावों के लिए अपनी ब्राह्मण बिरादरी की सहानुभूति और गोलबंदी की जरूरत रही होगी. लेकिन अब तो इसका जरायम पेशा फल फूल चूका है. अब शायद यह आदतन ऐसा घटियापन कर रहा है. जातिवादी भेडियों तुम्हारी ताक़त और एकजुटता का मुझे खूब अनुभव है. मैं जानता हूँ गिरोहबंदी और दुष्प्रचार ही तुम्हारी ताक़त है. मैं कैसे कहूं कि मुझे तुमसे डर नहीं लगता? पांडे, तिवारी और बोधिसत्व का बाभनावतार… तीनों एकसाथ गालियां बक रहे हैं.

फैजाबाद के सोशल एक्टिविस्ट अनिल कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: