Maloy Jain का उपन्यास ‘ढाक के तीन पात’ : कितनी ही बार पढ़ो, पुरानी नहीं लगती

Hareprakash Upadhyay : कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें कितनी ही बार पढ़ो, पुरानी नहीं लगतीं, बल्कि हर बार पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे पहली ही बार पढ़ रहे हों। वही रोमांच, वही उत्सुकता, वही नवीनता। ऐसी ही एक किताब कल रात दुबारा पढ़ा। Maloy Jain का उपन्यास ‘ढाक के तीन पात’। राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास को साल भर पहले इसी महीने में पढ़ा था। अब तो इसका दूसरा संस्करण भी आ गया है, पर जैसी यह किताब है, इसके अभी कई संस्करण आएंगे। है तो यह मलय जैन की पहली ही कृति, मगर इतनी परिपक्व रचना है कि इस पहले ही उपन्यास से वह हिन्दी के श्रेष्ठ उपन्यासकारों की श्रेणि में आ विराजे हैं। मगर मुझे नहीं लगता कि रेवड़ी बाँटने वाले अंधे हिंदी आलोचकों की नजर इस उपन्यास पर गयी है। इसे पाठकों ने जरूर हाथोंहाथ लिया है। वैसे भी हिंदी में हाल यह है कि जिस कृति को आलोचक हाथोंहाथ लेते हैं, उसे पाठक हाथ नहीं लगाते और जो कृति पाठकों के हाथों में होती है, उसे देखकर आलोचक नाक चढ़ाये बैठे रहते हैं, पर अंतत: पाठक ही तय करते हैं और विवश आलोचक कुछ वर्षों बाद झख मारकर उस कृति की व्याख्या के लिए विवश हो जाता है। खैर।

‘मंतव्य’ मैग्जीन के बाद हरे प्रकाश उपाध्याय ने शुरू किया ‘मंतव्य प्रकाशन’, राजेश्वर वशिष्ठ बने संपादक

Hareprakash Upadhyay : बहुत सारे मित्रों और शुभचिंतकों का यह काफी समय से निरंतर दबाव और आग्रह है कि मंतव्य अपनी रचनात्मक गतिविधियों का विस्तार करे। ‘मंतव्य’ की अपनी एक सीमा है, यह एक अनियतकालीन पत्रिका है और इसका एक निश्चित फार्मेट है, जिसके कारण बहुत सारे लेखकों को हम चाहते हुए भी अवसर या मंच उपलब्ध नहीं करा पाते, जबकि इधर हिन्दी में प्रतिभाशाली नवलेखन का विस्फोट दिखाई पड़ रहा है, रचनात्मक आयाम की दिशाएं निरंतर बढ़ रही हैं, इन सबकी जरूरत को परखते हुए और मित्रों के आग्रहों का मान रखते हुए ‘मंतव्य’ ने पुस्तक प्रकाशन की दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लिया है, जिसके तहत हम नवलेखन को भरपूर प्रोत्साहन देंगे।

प्रधान संपादक के बतौर सुभाष राय चार माह से सेलरी न पाने वालों के लिए क्या कर रहे हैं?

Hareprakash Upadhyay : संस्थान छोड़ने का किस्सा यह है कि मुझे बहुत जरूरी कारणों से अचानक दो दिन के लिए गाँव जाना पड़ा और उसके बाद मुझे ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार लेने दिल्ली जाना था। मैंने इसके लिए संपादक को मैसेज कर छुट्टी की दरख्वास्त की। उन्होंने प्रबंधन के माध्यम से मुझे एक मैसेज कराया कि आपकी छुट्टी रद्द की जाती है। एक तो कई महीनों से लगातार वेतन नहीं मिल रहा था, दूसरे छुट्टी भी न मिलने से खफा होकर मैंने उस मैसेज का जवाब यह लिखकर दिया कि अगर छुट्टी नहीं दे सकते तो मेरा हिसाब किताब कर दिया जाय। यह 27 अगस्त की घटना है। उस मैसेज का तत्काल मुझे जवाब मिला कि आप आयें और अपना बकाया ले जाएं। मैं पुरस्कार लेकर लौटा तो अखबार के जीएम विनित मौर्या से मिला, उन्होंने कहा कि आधे घंटे में आपका चेक बना दिया जाएगा, आप संपादक से मिल लें।

हरेप्रकाशजी अब गाली-गलौज की भाषा पर उतर आये हैं : सुभाष राय

Subhash Rai हरेप्रकाशजी अब गाली-गलौज की भाषा पर उतर आये हैं। यही उनकी मेधा की सीमा है। यह उनकी मूल भूमि है। ऊपर उठकर भी वे इसी में बार-बार गिरते हैं। वे खुद अपनी फेसबुक वाल पर घोषणा करते हैं कि उन्हें 15 सितंबर तक उनका पैसा देने का आश्वासन दिया गया है और 15 तक भी इंतजार नहीं करते। समय पूरा होने के एक हफ्ते पहले ही मुझे मेसेज भेजकर धमकी देते हैं कि जल्द मेरा हिसाब कर दें, मैं विवाद नहीं चाहता, इस मामले को कहीं और नहीं ले जाना चाहता, मैं नहीं चाहता कि शहर में कोई नाटकीय परिस्थिति पैदा हो। यह चालाकी है, धमकी है या मतिभ्रम है, मेरी समझ में नहीं आता। शायद आप सब समझ सकें। वे मोबाइल पर इस्तीफा देते हैं, फेसबुक पर हिसाब मांगते हैं। उन्हें मालूम होना चाहिए कि हिसाब-किताब की एक प्रक्रिया होती है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि नौकरी एक मेसेज देकर नहीं छोड़ी जाती है, उसके लिए संस्थान को एक माह पहले सूचना देनी होती है। वे कुछ भी नहीं जानते हों, ऐसा नहीं है। कम से कम उन्हें मेरे इशारे की अहमियत तो मालूम है।

अपना नंबर बढ़वाने के लिए सुभाष राय जी अपने सहयोगियों के साथ प्रबंधन की ज्यादती को शह दे रहे हैं : हरेप्रकाश उपाध्याय

Hareprakash Upadhyay : जनसंदेश टाइम्स की ओर से मेरा बकाया वेतन 15 सितंबर से पहले देने का भरोसा दिलाया गया था, पर वह दिन भी गुजर गया। अब वहाँ के महाप्रबंधक विनित मौर्या ने फोन बंद कर लिया है या जो मेरे पास नंबर है, उसे बदल लिया है। एचआर का काम देखने वाला लड़का मेरा फोन नहीं उठा रहा। दफ्तर के बेसिक नंबर पर बात करने की कोशिश की, तो बहुत देर फोन होल्ड कराने के बाद कह दिया गया कि जीएम सीट पर नहीं हैं। एक अखबार चलाने वाली कंपनी इतनी नीचता पर उतर आएगी, आप कल्पना भी नहीं कर सकते। बताया जा रहा है कि यह सब कुछ संपादक सुभाष राय के इशारे पर हो रहा है। जिस दिन मैंने अखबार छोड़ा था, उस दिन विनित मौर्या ने कहा भी था कि संपादक के कहने के बाद आपका चेक बना दिया जाएगा। मुझे अब क्या करना चाहिये….

हरे प्रकाश उपाध्याय ने ‘जनसंदेश टाइम्स’ छोड़ने का ऐलान किया, चार महीने की सेलरी दाबे बैठा है प्रबंधन

एनआरएचएम घोटालेबाज बाबूलाल कुशवाहा के संरक्षण में कुछ बरस पहले यूपी में जोरशोर से शुरू किया गया हिंदी दैनिक ‘जनसंदेस टाइम्स’ दम तोड़ने की कगार पर है. सेलरी संकट इस कदर है कि अब इस अखबार में कोई काम नहीं करना चाह रहा. वही इसमें टिके बसे रुके हैं जिन्हें अभी कहीं कोई अच्छा विकल्प नहीं मिल रहा.

“मंतव्य” पत्रिका ने हिंदी साहित्य जगत में धमाकेदार एंट्री की है

Ramesh Prajapati : हरे प्रकाश उपाध्याय के संपादन में लखनऊ से निकली “मंतव्य” पत्रिका ने हिंदी साहित्य जगत में बड़े ही धमाकेदार एंट्री की है। हरे प्रकाश जी ने रचनाओं के चुनाव में धैर्य और निष्पक्षता से काम लिया है। पत्रिका का कवर पेज़ ही आज के वीभत्स समय पर चोट करता है। कथा खंड में काला पहाड़ और रेत जैसे उपन्यासों के रचयिता भगवानदास मोरवाल के आने वाले उपन्यास “नरक मसीहा” का अंश आम आदमी की विवशताओं को अभिव्यक्त करता है। तेजिन्दर के उपन्यास “डरा हुआ आदमी” बाज़ार की चक्की में पीसते व्यक्ति की जद्दोजहद को चित्रित करता है।

‘मंतव्य’ के जरिए हरे प्रकाश उपाध्याय ने साहित्य में मफियावाद को कड़ी चुनौती दी है

Daya Sagar : राजेन्द्र यादवजी के जाने के बाद साहित्यिक पत्रिकाएं पढ़ना छूट ही गया था। लखनऊ की डाक से अभी ‘मंतव्य’ का पहला अंक मिला। सबसे पहले किताबनुमा पत्रिका को बीच से खोल कर मैं छपे हुए शब्दों की स्याही की खुशबू अपने भीतर तक ले गया। नई किताब हाथ में आने के बाद मैं अक्सर ऐसा करता हूं। हर नई किताब या पत्रिका का अपनी अलग खुशबू होती है। कवर पेज पर लगी बेहतरीन और विचारोत्तेजक तस्वीर को काफी देर तक देखता रहा। रस्सी पर चल रहा नट अपने कंधे पर एक गधा ढो रहा है। गधे के आंख पर पट्टी बंधी हैं और नट के पांव में घुंघरू। सोचने लगा नट ने गंधे की आंख पर पट्टी क्यों बांधी होगी?