मोदी पर मिमिक्री दिखाने में क्यों फटती है टीवी चैनलों की?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने प्रेस क्लब आफ इंडिया में पत्रकार विनोद वर्मा की छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की गई अवैधानिक गिरफ्तारी के खिलाफ बोलते हुए खुलासा किया कि टीवी चैनलों पर मोदी की मिमिक्री दिखाने पर पाबंदी है. इस वीडियो को सुनिए विस्तार से, जानिए पूरा प्रकरण क्या है…

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राज्यसभा की मीडिया एडवाइजरी समिति में जयशंकर गुप्त नामित

Jaishankar Gupta : उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी साहेब एवं राज्यसभा सचिवालय का तहे दिल से शुक्रिया। मुझे उन्होंने अगले कार्यकाल यानी 2017-18 के लिए राज्यसभा की मीडिया एडवाइजरी समिति का सदस्य मनोनीत किया है। हमारी कोशिश उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने की होगी जिन्हें सामने रखकर मेरा चयन किया गया है।

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से.

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प्रेस एसोसिएशन चुनाव में राजीव रंजन नाग को मिली करारी हार, जयशंकर गुप्त पैनल प्रचंड मतों से जीता (देखें लिस्ट)

राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकारों के प्रतिष्ठित संगठन प्रेस एसोसिएशन के चुनाव में अध्यक्ष पद पर वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त विजयी हुए हैं. जयशंकर गुप्त को कुल 203 मत मिले. अध्यक्ष पद के लिए इरा झा और राजीव शर्मा भी मैदान में थे जिन्हें क्रमश: 62 और 76 मत मिले. उपाध्यक्ष चुने गए हैं शिशिर सोनी. उन्हें 126 मत मिले. उनके मुकाबले खड़े थे जावेद रहमानी (47 वोट), ओपी पाल (94 वोट) और श्रीकांत भाटिया (47 वोट). जनरल सेक्रेट्री पद पर सीके नायक की जीत हुई जिन्हें 185 मत मिले. उनसे मुकाबिल थे अरविंद कुमार शर्मा (67 वोट) और राजीव रंजन नाग (80 वोट).

ज्वाइंट सेक्रेट्री के लिए सबसे ज्यादा 129 वोट पाकर आनंद मिश्रा विजयी हुए. कल्याण बरुआ को 107 और प्रिय रंजन दास को 80 वोट मिले. कोषाध्यक्ष बने जेसी वर्मा जिन्हें 126 वोट मिले. संदीप ठाकुर को 98 और शाहिद फरीदी को 111 वोट मिले. एक्जीक्यूटिव कमेटी सदस्य के लिए जो पांच लोग निर्वाचित हुए हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-  अनिल दुबे (129), Kay Benedict (123), संतोष ठाकुर (142), श्रीनंद झा (108) और विवेक सक्सेना (115).

अध्यक्ष पद पर चुने गए वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त ने अपने पैनल को प्रचंड विजय दिलाने के लिए अपने सभी मित्रों और शुभचिंतकों का तहे दिल से आभार जताया है और शुक्रिया कहा. उन्होंने कहा कि इस जीत से जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी, लेकिन हमारी कोशिश सबको साथ लेकर उन पर खरा उतरने की होगी, सहयोग, शुभकामनाएं बनाए रखें।

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आजतक पर श्वेता की यह क्या खबू एंकरिंग है!

Jaishankar Gupta : क्या ऐंकरिंग है। खुद को नंबर एक कहने और सबसे आगे रहनेवाले टीवी चैनल पर यूपी में पहले चरण के मतदान पर चर्चा के दौरान 4.12 बजे ऐंकर द्वारा मथुरा में मौजूद रिपोर्टर संजय शर्मा से मतदाताओं की प्रतिक्रिया पूछने और रिपोर्टर द्वारा एक मतदाता के हवाले यह बताने पर कि युवा बड़े उत्साह के साथ भाजपा के पक्ष में मतदान कर रहे हैं, बड़े चाव के साथ दिखाया गया। संजय ने वरिष्ठ पत्रकार शशिशेखर के पूछने पर भी बताया कि गोलबंदी भाजपा के पक्ष में साफ दिख रही।

उनकी यह टिप्पणी भी श्वेता को नहीं अखरी।

लेकिन जब बालकृष्ण ने मुजफ्फरनगर से बताना शुरू किया कि लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान करनेवाले जाट किसान इस बार उसके विरोध में और रालोद के पक्ष में मतदान कर रहे हैं, यह चिंता किए बगैर कि उसका उम्मीदवार हारे या जीते। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक सपा कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में एक तरफा मतदान कर रहे हैं। बसपा के मुस्लिम उम्मीदवार भी उनके मतों में विभाजन नहीं कर पा रहे, यह सुनते ही श्वेता के जैसे कान खड़े हो गये। उन्हें इलहाम हुआ कि मतदान जारी रहते कोई आचार संहिता भी होती है। उन्होंने बालकृष्ण और फिर अन्य संवाददाताओं से भी कहा कि किसी दल का नाम न लें और ना ही किसी मतदाता को भी यह बताने को कहें कि उसने किस दल को वोट दिया है। अब भी मीडिया की निष्पक्षता पर कोई सवाल?

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कई कमेंट्स में से कुछ प्रमुख यूं हैं :

Nadeem Ahmad Kazmi Sir..journalist are becoming party to their political leanings…dangerous trend. you may have your leanings but it should not be as open as these anchors do.

Suraj Kumar Singh सर…..मीडिया संस्थान में हमें पढ़ाया गया था कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एजेंडा सेटर है इसलिए इनका सब माफ़। अब ये अलग बात है कि वह किसका एजेंडा सेट कर रहा है और क्यों कर रहा है। रही बात आचार संहिता और चुनाव आयोग की तो परिवर्तन के नाम पर वर्तमान भारत में अच्छे-अच्छे संस्थान का ढांचा बदल दिया गया है तो तो फिर? वैसे एंकर को पता है कि यूपी चुनाव में किसका एजेंडा सेट करना है। पार्टी हार गई तो भी चैनल की चित और हार गयी तो भी चित।

Rajkeshwar Singh जयशंकर जी, सब तो नहीं लेकिन एक तबक़ा अब यह ठीक से परखने लगा है कि किस मीडिया की आस्था किस पार्टी में है। देश में चैनल पर ज़ोर ज़ोर से एंकर के चिल्लाने की परंपरा शुरू करने वाले पत्रकार के बताए रास्ते पर कई नए एंकर चल पड़े हैं और ‘nation wants to know’ पर वे वैसे डटे हैं जैसे उनकी आस्था है। एक मित्र व 30 साल से सक्रिय पत्रकार का ताज़ा आंकलन इस चुनाव में एक गठबंधन को 65-70 सीट से ज़्यादा नहीं मिलेगी– दूसरे पत्रकार मित्र 20 दिन से फ़ील्ड पर हैं, उनका आंकलन उस गठबंधन को 230 तक सीटें मिल सकती हैं।

Ghanshyam Dubey दरअसल ये संवाददाता रेनकोट पहन लर रिपोर्टिंग कर रहे थे। एंकरिन ने कोट पहना, फिर नाम न लेने को कहा। यानी काम कर दिया बस!

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जब भैरोंसिंह शेखावत ने पत्रकार जयशंकर गुप्ता से पूछा था- ‘मैं स्वयं भी तो संघ का ही स्वयंसेवक हूं, आप लोग हममें भेद कैसे कर सकते हैं’

Jaishankar Gupta : बात पुरानी है, तब की जब हम इंडिया टुडे के साथ थे और पूर्व उप राष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री। हमारा राजस्थान में आना जाना और ठाकर साहब (भैरोंसिंह शेखावत) से मिलना जुलना लगा रहता था। उस समय भाजपा में एक लाबी खासतौर से संघ से जुडे कुछ नेताओं की मंडली लगातार उनके विरुद्ध सक्रिय रहती थी। एक दिन भोजन पर हम ठाकर साहब के साथ थे। बात बात में उन्होंने पूछ लिया ”आप लोग अक्सर लिखते रहते हैं मेरे विरुद्ध संघ की लॉबी सक्रिय है। मैं स्वयं भी तो संघ का ही स्वयंसेवक हूं। आप लोग हममें भेद कैसे कर सकते हैं।”

सवाल गूढ था मगर मैंने कुछ ज्यादा सोचे बगैर कहा कि बात पब्लिक परसेप्शन यानी जन छवि की है। अटल जी और आडवाणी जी, दोनों संघ की वैचारिक पाठशाला से ही निकले हैं लेकिन अगर कहीं सांप्रदायिक दंगा हो जाए और अटल जी वहां गए हों, भले ही वहां उनकी भूमिका चाहे जो भी रही, लोग यही कहेंगे कि अटल जी वहां आग बुझाने गए होंगे। उन्होंने किसी को मारा नहीं, बचाया होगा लेकिन यही बात आडवाणी जी के बारे में नहीं कही जा सकती। ठीक इसी तरह की छवि का भेद जनता के बीच आपकी और पार्टी में आपके विरोधियों-ललित चतुर्वेदी, हरिशंकर भाभडा और घनश्याम तिवाडी के बीच बन गया है। अगर आप दंगा ग्रस्त इलाकों में किसी को मारकर भी आ रहे होंगे तो कोई मानेगा नहीं, मुसलमान भी कहेंगे कि आप ने वहां लोगों की जानें बचाई होंगी। लेकिन इसके उलट अगर चतुर्वेदी, भाभडा और तिवाडी जी ने वहां किसी को बचाया भी होगा तो लोग मानेंगे नहीं और कहेंगे कि जरूर इन लोगों ने सांप्रदायिक दंगे की आग में घी डाला होगा।

यह सुनकर शेखावत जी ने कहा था, अच्छा तो आप लोग ऐसा सोचते होंगे! फिर जोर का ठहाका लगा था। शेखावत जी वाकई राजनेता (स्टेट्समैन) थे। अटल जी के वह सच्चे उत्तराधिकारी होते लेकिन न जाने क्या सोचकर और किस योजना के तहत उन्हें मुख्यधारा की राजनीति से अलग कर उपराष्ट्रपति भवन में बिठा दिया गया। एक बात और। आज शेखावत जी के जन्म दिन पर पर उनकी उस छवि और उनसे जुडी स्मृतियों को प्रणाम करने के साथ ही बडी ईमानदारी से कहना चाहूंगा कि कट्टर छवि के जिन नेताओं का जिक्र हमने ऊपर किया, अगर आज उनकी तुलना संघ अथवा उसकी पाठशाला से निकले मौजूदा प्रभावशाली नेताओं से करनी हो तो आडवाणी, चतुर्वेदी, भाभडा और तिवाडी जी भी इनके मुकाबले सहिष्णु और नरमपंथी लगेंगे।

वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्ता के फेसबुक वॉल से.

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ये हार बहुत भीषण है म्हराज!

Sheetal P Singh : पिछले दो दिनों में दिल्ली के सारे अख़बारों में पहले पेज पर छापे गये मोदी जी + बेदी जी के विज्ञापन का कुल बिल है क़रीब चौबीस करोड़ रुपये। आउटडोर विज्ञापन एजेंसियों को होर्डिंग / पोस्टर / पैम्फलेट / बैनर / स्टेशनरी / अन्य चुनावी सामग्री के बिल इससे अलग हैं। इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों द्वारा प्रधानमंत्री और अन्य हैवीवेट सभाओं के (कुल दो सौ के क़रीब)इंतज़ाम तथा टेलिविज़न / रेडियो विज्ञापन और क़रीब दो लाख के क़रीब आयातित कार्यकर्ताओं के रख रखाव का ख़र्च श्रद्धानुसार जोड़ लें। आम आदमी पार्टी के पास कुल चुनाव चंदा क़रीब चौदह करोड़ आया। बीस करोड़ का लक्ष्य था। कुछ उधार रह गया होगा। औसतन दोनों दलों के ख़र्च में कोई दस गुने का अंतर है और नतीजे (exit poll) बता रहे हैं कि तिस पर भी “आप” दो गुने से ज़्यादा सीटें जीतने जा रही है! ये हार बहुत भीषण है म्हराज! ध्यान दें, ”आप” बनारस में पहले ही एक माफ़िया के समर्थन की कोशिश ठुकरा चुकी थी, आज उसने “बुख़ारी” के चालाकी भरे समर्थन को लात मार कर बीजेपी की चालबाज़ी की हवा निकाल दी।

Om Thanvi : तमाम एग्जिट पोल नतीजों के समान रुख से उन लोगों के मुंह बंद हुए (जो बचे उनके असल नतीजे के रोज हो जाएंगे) जो लोगों के चेहरों को नहीं पढ़ना चाहते, न हवा में तैरती गंध भांप पाते हैं। आज कई चैनलों पर जाना हुआ, कई पत्रकार मित्रों से मुलाकात हुई; यह सुनना अच्छा लगा कि जनता के बदलते मानस का हमें बेहतर अंदाजा हुआ और उसे उसी भाव में निरंतर हमने कहा भी। इस जोखिम के बावजूद कि पक्षपात और बिकाऊ हो जाने जैसे आरोप झेलने होंगे। सच्चाई यह है कि इस समर में केंद्र की विराट ताकत की हार, दिग्गज नेताओं की फौज के पराभव, पूंजीपतियों की थैलियों की निरर्थकता और जाति-धर्म आदि जैसे अनेक ध्रुवों के मिथक टूटने की सम्भावना कदम-कदम पर जाहिर थी। बहरहाल, ‘आप’ पार्टी के समर्थन में उमड़ा जन-सैलाब दिल्ली प्रदेश में ही नहीं, केंद्र की राजनीति के लिए भी नया आगाज है – यह बदलाव राजनीति के समूचे ढर्रे को प्रभावित करेगा। कुछ ज्यादा कह दिया क्या? इंतजार कीजिए और देखते रहिए। देश की राजनीति का रंग और तेवर अब बदलना ही चाहिए। क्या कांग्रेस, भाजपा और अन्य दल नए संदेश और निहितार्थ समझ रहे हैं? और मोदीजी, आपके लिए डॉ लोहिया का संदेश — सुधरो या टूटो। इससे पहले कि संघ – और प्रकारांतर से पार्टी – अपनी ताकत फिर दिखाने लगे। ‘गुड गवर्नेन्स’ का झांसा नारे की शक्ल में बहुत ज्यादा खिंचेगा नहीं, जब लोग दिल्ली के छोटे-से शासन तंत्र से उसे जोड़कर देखने लगेंगे। ये केजरीवाल, जो सुबह हजामत करवाकर बैठा है, बड़ी जालिम चीज है!

Sanjaya Kumar Singh : एक्जिट पॉल के नतीजे देखने के बाद मुझे भाजपा के विज्ञापन याद आ रहे हैं। मैने सब लिख रखे हैं आज ये देखिए, “मैं किरण बेदी। दिल्ली में जब विकास की बात चली तो हमारे लोकप्रिय जननायक श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इसकी कमान मेरे हाथों में दी और कहा, दिल्ली से आप पिछले 40 सालों से जुड़ी हैं अब थोड़ी सेवा और करनी है। मेरा ये मानना है कि दिल्ली में विकास का ये काम हम मिलजुल कर ही कर सकते हैं। इसलिए इस बार हमें भाजपा को पूर्ण बहुमत से जीताना है। मेरा दिल्ली वालों से वादा है कि हम आपको एक सुरक्षित और भ्रष्टाचार मुक्त राजधानी देंगे।” चलो चलें मोदी के साथ, अबकी बार मोदी सरकार और घर-घर में मोदी के बाद इस विज्ञापन में खुद किरण बेदी कहती हैं, “विकास का ये काम मिल-जुल कर ही कर सकते हैं।” सवाल ये उठता है कि मिल-जुल कर ही विकास करना था तो दिल्ली भाजपा के पुराने, अनुभवी नेताओं के साथ मिलजुल कर जीतने की कोशिश क्यों नहीं की गई। और मिल-जुल कर ही करना था तो दिल्ली में मोदी जी को किरण या क्रेन सेतु की जरूरत क्यों पड़ी। ना पार्टी ने स्पष्ट किया ना मतदाताओं को समझ में आया। मतदान के बाद किरण बेदी ने भाजपा के प्रति जो कृतज्ञता दिखाई उससे भी लगा कि भाजपा चुनाव जीतने के लिए नहीं, किरण बेदी को बनाने के लिए ज्यादा जोर लगा रही थी। वरना क्या कारण है कि मास्टर स्ट्रोक इस तरह फिस्स हो गया। देखिए, चुनाव परिणाम अगर एक्जिट पॉल जैसे ही रहे तो भाजपा शायद इसपर विचार करे और कुछ समझ में आए। मै समझ रहा था कि भाजपा अगर दिल्ली में हार भी गई तो किरण बेदी का राज्यपाल बनना तय है। पर किरण बेदी 40 साल दिल्ली में ही रही हैं, बाहर तो वो टिक ही नहीं पाईं – चंडीगढ़ भी नहीं। गवरनर कहां की बनाई जाएंगी। कोई अनुमान?

Jaishankar Gupta : हमने दिसंबर 2013 के विधानसभा चुनाव के समय भी तमाम ओपीनियन और एक्जिट पोल्स को खारिज करते सार्वजनिक तौर पर, एक टीवी चैनल पर वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों के साथ चुनावी चर्चा में कहा था कि आप को 30 से कम सीटें नहीं मिलेंगी। तब कोई मानने को तैयार न था। इस बार भी शुरू से हमारा मानना रहा है कि आप को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा, लेकिन केजरीवाल के बारे में प्रधानमंत्री मोदी जी और उनकी पार्टी के बौने हो गए बडे नेताओं के मुंह से ‘सुभाषित’ झरने लगे, बौखलाहट में भाजपा की चुनावी राजनीति के चाणक्य और खासतौर से लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के सूत्रधार स्वनामधन्य अमित शाह जी ने मतदान से दो दिन पहले अपना रणनीतिक ज्ञान बांटा कि विदेश में जमा कालाधन लाकर र भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रु. जमा करने का वादा चुनावी जुमला भर था और यह भी कि दिल्ली का यह चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के कामकाज पर रेफरेंडम नहीं माना जाना चाहिए, उसके बाद हमने कहना शुरू किया कि ‘आप’ को 40 से अधिक सीटें मिल सकती हैं। पता नहीं सीटों का आंकडा कहां जाकर फीट बैठेगा। दस फरवरी को सब पता चल जाएगा।

Mukesh Kumar : सारे एक्जिट पोल आम आदमी पार्टी की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। हालाँकि अंतिम परिणाम आने बाक़ी हैं लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दस लाख का सूट पहनकर अपनी हार स्वीकार करने की तैयारी नहीं कर लेनी चाहिए। उन्होंने अपने विज्ञापनों में कहा था कि जो देश सोच रहा है वह दिल्ली सोचती है, तो देश ने दिल्ली के ज़रिए संदेश दे दिया है कि उन्हें न तो उनका अंदाज़ रास आ रहा है और न ही उनकी सरकार का चाल-चलन। अपने परिवार के कुकर्मों पर चुप्पी साधे रहने और कुछ न करने का उनका अंदाज भी उनके पाप के घड़े को भर रहा है। क्या वे चेतेंगे? उनके महारणनीतिकार और बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह समाज को तोड़-फोड़ कर जिस तरह की राजनीतिक बिसात बिछाकर विजय हासिल करने का नुस्खा आजमाते रहे हैं, उनके लिए भी इस हार में संदेश छिपा है। ओबामा की मत सुनिए मगर दिल्ली और देश की आवाज़ तो सुन लीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, ओम थानवी, संजय कुमार सिंह, जयशंकर गुप्त और मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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