जि‍न हालातों में इस वक्‍त देश भर के भाषाई पत्रकार हैं, अगर वह भ्रष्‍ट नहीं हैं तो वह अधर्मी हैं!

Rohini Gupte : मेरे एक मि‍त्र सहारनपुर में पत्रकार हुए। सहारनपुर के नहीं थे, मगर नौकरी खींच ले गई। तनख्‍वाह तय हुई साढ़े पांच हजार रुपए महीना, साढ़े तीन सौ रुपए मोबाइल और साढ़े छह सौ रुपए पेट्रोल। मित्र महोदय खुश कि चलो फ्रीलांसि‍ंग से तो पांच हजार का भी जुगाड़ नहीं हो पाता था, यहां कम से कम साढ़े छह मिलेंगे। दि‍ल्‍ली से घर बार बीवी लेकर सहारनपुर पहुंचे और ढाई हजार रुपए में एक कमरा कि‍राए पर लि‍या। आठ दस साल पहले की बात है, ‘सस्‍ते’ का जमाना था। साथ में एक साथी पत्रकार काम करते थे, जि‍नका सहारनपुर में ही गांव था। वो गांव से आने वाली आलू प्‍याज में एक हि‍स्‍सा इन्‍हें भी देते, सो बेसि‍क सब्‍जी का भी खर्च कम हो गया। फि‍र भी बचते बचते महीने की बीस तारीख तक वो पैसे खत्‍म हो जाते, जो लाला हर महीने सात दि‍न देर से देता।

नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

नागरिक करे तो जागरूकता, पत्रकार करे तो धौंस

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। फेसबुक की एक छोटी मगर बहुत प्यारी पोस्ट के जिक्र के साथ बात शुरू करेंगे। पोस्ट ये कि एक दुकानदार ने वस्तु का मूल्य अधिक लिया। ग्राहक ने उलाहना देते हुए वीडियो शूट किया। दुकानदार ने सॉरी करना ही था। हर क्षेत्र मेँ जागरूकता जरूरी है। बधाई, उस जागरूक ग्राहक को। तारीफ के काबिल है वो। लेकिन अगर यही काम किसी पत्रकार ने किया होता मौके पर हँगामा  हो जाता। लोग पत्रकार कि वीडियो बनाते। सोशल मीडिया पर बहुत से व्यक्ति ये लिखते, पत्रकार है, इसलिए धौंस दिखा रहा है। पत्रकारिता की आड़ लेकर दुकानदार को धमका रहा है। चाहे उस पत्रकार को कितने का भी नुकसान हुआ होता। पत्रकार के रूप मेँ किसी की पहचान उसके लिए मान सम्मान के साथ दुविधा, उलझन, कठिनाई भी लेकर आती है। क्योंकि हर सिक्के दो पहलू होते हैं। एक उदाहरण तो ऊपर दे दिया। आगे बढ़ते हैं।

विश्व संवाद केंद्र भोपाल ने महर्षि नारद जी का सम्मान किया या अपमान?

आज के पत्रिका और कुछ अन्य समाचार पत्रों में खबर पढ़ी कि विश्व संवाद केंद्र भोपाल ने आदि पत्रकार महर्षि नारद जी की जयंती के अवसर पर कुछ पत्रकारों को सम्मानित किया। मुझे सम्मानित किये गये पत्रकारों की सूची में एक ऐसे पत्रकार का नाम पढ़कर बहुत ताज्जुब हुआ जो पत्रकार से अधिक ब्लैकमेलर के रूप में जाना जाता है। जिसे पत्रकारिता के आधारभूत सिद्धांतों और मूल्यों का भी ज्ञान नहीं है।