सेक्स स्कैंडल में फंसे बीजेपी के बड़े नेता, देखें इस महिला के वीडियो

बॉबी नामक महिला के दो वीडियो वायरल हुए हैं जिसमें वह बीजेपी के कई नेताओं के नाम लेकर उन पर गंभीर आरोप लगा रही है. वीडियो देखने पर ऐसा लगता है, महिला को यह बिलकुल पता नहीं था कि वह जो कुछ बोल रही है उसे रिकार्ड भी किया जा रहा है. यह वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया और वेबसाइटों पर छाया हुआ है. कुछ लोगों का कहना है कि पीएनबी स्कैम से ध्यान बंटाने के लिए जानबूझ कर सत्ताधारी दल के नेताओं की ओर से इस वीडियो को लीक कराया गया है ताकि सबका ध्यान इस सेक्स स्कैंडल की तरफ चला जाएगा.

वरिष्ठ पत्रकार और आम आदमी पार्टी के नेता शीतल पी सिंह इस बारे में फेसबुक पर लिखते हैं :

‘बाबी’ नाम हमेशा भारत में चर्चित बना रहा है। राजकपूर की मशहूर फ़िल्म से शुरू हुआ यह नाम दशकों पहले हुए पटना के सेक्स स्कैंडल के बाद लगता है अब दिल्ली हिलाएगा। बाबी अब नये अवतार में बीजेपी है और यह चुनाव वर्ष है! छोटी वेबसाइटों ने इस मामले को दहका दिया है और ट्विटर / फेसबुक में यह शब्द अंधड़ में बदल रहा है! मोदी कैंप भी नीरव मोदी की गलफांस से सटकने के लिये इसका इस्तेमाल कर सकता है! कुल मिलाकर देश का सबसे बड़ा सेक्स स्कैंडल खुल सकता है जिसमे BJP के बड़े-बड़े नेता जैसे नितिन गडकरी, विजय गोयल समेत कई बड़े नेता फंसेंगे… 

देखें वीडियो…

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सृजन घोटाले में नेताओं-अफसरों की गिरफ्तारी के लिए वारंट मांगने वाले सीबीआई अधिकारी पर गिरी गाज

नाम है एसके मलिक. सीबीआई में एएसपी हैं. ये बिहार के सृजन घोटाले की जांच करने वाली बीस सदस्यीय सीबीआई टीम के अगुवा हैं. सृजन घोटाला पंद्रह सौ करोड़ रुपये का है और इसमें नेता, अफसर, पत्रकार सब शामिल हैं. कहा जा रहा है कि यह घोटाला चारा घोटाले से भी बड़ा है. इस घाटाले की तह तक जा चुके सीबीआई आफिसर एसके मलिक ने पुख्ता प्रमाण जुटाने और पूछताछ के वास्ते जब सीबीआई कोर्ट से घोटाले में शामिल कुछ नेताओं व अफसरों की गिरफ्तारी के लिए वारंट मांगा तो फौरन उन पर कार्रवाई हो गई. उनका तबादला कर दिया गया.

उन्हें दिल्ली बुलाकर सीबीआई मुख्यालय से अटैच कर दिया गया. उनकी जगह सीबीआई अधिकारी एन. महतो को भेजा गया है. इस सृजन घोटाले में चार बड़े नेता सीबीआई के राडार पर हैं जिनमें से एक केंद्रीय मंत्री है. दूसरा बीजेपी का झारखंड से लोकसभा सदस्य है. तीसरा एक पूर्व भाजपा सांसद है. चौथा जनता दल यूनाइटेड का एक नेता है जो इस स्कैम में शामिल होने की चर्चा के बाद अब पार्टी से सस्पेंड किया जा चुका है. इसी तरह कुल पांच आईएएस अधिकारी इस घोटाले में शामिल हैं जिन पर सीबीआई की निगाह है. ये सारे आईएएस अफसर भागलपुर में जिला मजिस्ट्रेट रह चुके हैं. इनमें से एक ने वीआरएस लेकर 2014 का लोकसभा चुनाव जद यू के टिकट पर लड़ा और हार गया.

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सहारा के पत्रकार रमेश अवस्थी और उनके बेटे सचिन अवस्थी ने किया पुरस्‍कार घोटाला!

बाप-बेटे ने नेशनल मीडिया क्‍लब नामक संगठन के माध्यम से पत्रकारिता दिवस के मौके पर योगी के नाम की आड़ लेकर उन लोगों को भी सम्मानित बता दिया जो सम्मान लेने गए ही नहीं…

लखनऊ में नेशनल मीडिया क्लब नाम की एक संस्‍था ने ऐन हिंदी पत्रकारिता दिवस के दिन उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के नाम का इस्‍तेमाल करते हुए कुछ वरिष्‍ठ पत्रकारों को बदनाम करने का काम किया है। इस संस्‍था ने 30 मई को एक ऐसा भयंकर पुरस्‍कार घोटाला किया है जिसमें 60 साल की उम्र पार कर चुके ऐसे पत्रकारों को पुरस्‍कार दिलवा दिया गया जिन्‍हें न तो अब तक पुरस्‍कार मिलने की ख़बर है, न ही वे वहां सशरीर मौजूद थे और जिन्‍होंने पुरस्‍कार की पेशकश पर अपनी सहमति तक नहीं दी थी।

सबसे ज्‍यादा आश्‍चर्य की बात यह है कि ‘मीडिया रत्‍न’ नाम का यह पुरस्‍कार विधानसभा अध्‍यक्ष हृदयनारायण दीक्षित और उपमुख्‍यमंत्री दिनेश शर्मा ने कुछ पत्रकारों को दिया जब मुख्‍यमंत्री कार्यक्रम से जा चुके थे, लेकिन कार्यक्रम में मुख्‍यमंत्री के मुख्‍य अतिथि होने के नाते इसके प्रचार और प्रेस रिलीज़ आदि में मुख्‍यमंत्री के नाम से पुरस्‍कार दिए जाने की बात कही गई। क्‍लब द्वारा जारी सूची में कुल 38 पत्रकारों का नाम शामिल है और क्‍लब का दावा है कि सभी वहां मौजूद थे, लेकिन छानबीन में पता चला है कि यह सरासर झूठ है।

जब इस बारे में नेशनल मीडिया क्‍लब के न्‍योते में दिए मोबाइल नंबर 8285002222 पर बात की गई तो पहले वहां से पुरस्‍कारों की पुष्टि करते हुए एक प्रेस रिलीज़ भेजी गई जिसमें 38 पत्रकारों के नाम शामिल थे। दूसरी बार फोन लगाकर जब यह पूछा गया कि क्‍या ये सभी पत्रकार वहां उपस्थित थे पुरस्‍कार लेने के लिए, तो क्‍लब के प्रतिनिधि ने इसका हां में जवाब दिया जो कि सरासर झूठ था। सच्‍चाई का पता चार पत्रकारों से सीधे और दूसरे माध्‍यमों से बात कर के चला। पुरस्‍कृत पत्रकारों की सूची में शामिल वरिष्‍ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर, रामकृपाल सिंह, कमलेश त्रिपाठी और अनिल शुक्‍ला वहां न तो मौजूद थे, न ही इन्‍हें ख़बर थी कि इनके नाम पर कोई पुरस्‍कार दिया गया है।

नवभारत टाइम्‍स के पूर्व कार्यकारी संपादक रामकृपाल सिंह का कहना है- ”मुझे तो पता ही नहीं। मेरे पास दिनेश श्रीवास्‍तव का फोन आया था तो मैंने मना कर दिया था कि मैं उस दिन शहर में नहीं रहूंगा। मेरा पुरस्‍कार आदि से क्‍या लेना देना है।” मीडियाविजिल के आग्रह पर जब एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने वीरेंद्र सेंगर से योगी आदित्‍यनाथ के हाथों पुरस्‍कार लेने की बात पूछी, तो वे चौंकते हुए बोले, ”सवाल ही नहीं उठता।” अनिल शुक्‍ला भी कार्यक्रम में मौजूद नहीं थे। उनके पास बेशक पुरस्‍कार से संबंधित एक चिट्ठी आई थी लेकिन उन्‍होंने उसका कोई जवाब ही नहीं दिया। सहमति ज़ाहिर करने की तो बात ही दूर की है।

नेशनल मीडिया क्‍लब को रमेश अवस्‍थी नाम के एक सज्‍जन चलाते हैं और कार्यक्रम के आयोजन व प्रचार में उनके बेटे सचिन अवस्‍थी का नाम बार-बार आया है। रमेश अवस्थी सहारा समूह में बड़े पद पर हैं। जब एक पत्रकार ने रमेश अवस्‍थी से मुख्‍यमंत्री के हाथों पुरस्‍कार दिए जाने की बाबत पूछा कि वहां तो तमाम पत्रकार गए ही नहीं थे जिनके नाम से उन्‍होंने विज्ञप्ति जारी की है, तो वे बचाव की मुद्रा में आ गए और उन्‍होंने माना कि कुछ गलती हो गई है। उन्‍होंने उसे तुरंत दुरुस्‍त करने की बात कही।

इसकी ख़बर हालांकि प्रेस रिलीज की मार्फत कुछ जगहों पर पहले ही छप चुकी है और यह बात प्रचारित कर दी गई है कि तमाम वरिष्‍ठ पत्रकारों ने योगी आदित्‍यनाथ के हाथों पुरस्‍कार ले लिया है। हकीकत यह है कि योगी उस कार्यक्रम में मुख्‍य अतिथि अवश्‍य थे, लेकिन पत्रकारों को पुरस्‍कारों की घोषणा होने से पहले वहां से निकल चुके थे। क्‍लब द्वारा जारी प्रेस रिलीज़ कहती है, ”​पत्रकारिता दिवस के अवसर पर मीडिया रत्न सम्मान के साथ स्वच्छता सम्मान देने के लिये नेशनल मीडिया क्लब की सराहना करते हुये सकारात्मक खबरों को प्रमुखता दिये जाने पर मुख्यमंत्री योगी ने जोर दिया।” प्रेस रिलीज़ में सम्‍मानित पत्रकारों की संख्‍या कुल 38 है।

फिलहाल तो केवल चार मामले पता चले हैं जो इस सूची को फर्जी साबित करते हैं और यह बात साफ़ हो जाती है कि पत्रकारिता दिवस पर पत्रकारिता पुरस्‍कारों के नाम पर लखनऊ में भारी घोटाला हुआ है। मुख्‍यमंत्री के नाम की आड़ लेकर न केवल विश्‍वसनीय और वरिष्‍ठ पत्रकारों के साथ छल किया गया है, बल्कि पत्रकारिता के पेशे को भी कलंकित किया गया है।

अभिषेक श्रीवास्तव तेजतर्रार पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं. वे मीडिया विजिल डाट काम के प्रधान संपादक भी हैं.

मूल खबर…

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अखबार में फर्जी विज्ञापन देकर लाखों रुपये की ठगी करने वाले हुए गिरफ्तार (देखें वीडियो)

अखबारों में लुभावने विज्ञापन देकर लोन कराने के नाम पर ठगी करने वाले गिरोह का आगरा की पुलिस ने भंडाफोड़ किया है। इस गिरोह का खुलासा करते हुए आगरा पुलिस ने चार लोगों को हिरासत में लिया। इन आरोपियों के पास एक 99 लाख का फर्जी डीडी और एसबीआई का फर्जी आई कार्ड भी बरामद हुआ। पुलिस ने चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

मुन्नीदेवी नामक पीड़िता ने पुलिस को बताया कि उन्होंने अख़बार में पढ़कर लोन के लिए अप्लाई किया। उन्होंने विज्ञापन में दिए गए नंबर से गिरोह के सरगना सागर शर्मा से भगवती सेवा समिति हल्द्वानी के लिए 1 करोड़ रूपए कर्जा लेने हेतु संपर्क किया था। आरोपियों ने पीड़िता को अपने को बैंक कर्मी बताया। आरोपियों ने पीड़ितों को बताया गया कि एक करोड़ का लोन लेने पर दस लाख रुपए कमीशन के देने होंगे।

पीड़िता ने आरोपियों के झांसे में आकर उनके बैंक खातों में 6 लाख रुपए डलवा दिए। जब पीड़िता को मालूम पड़ा कि यह आरोपी बैंक कर्मी नहीं है तो उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और मुकदमा लिखवा दिया। आरोपियों ने पीड़िता को 99 लाख का डीडी देने के लिए आगरा बुलाया। एएसपी श्लोक कुमार ने बताया कि पीड़िता की निशानदेही पर आरोपियों को हरिपर्वत थाना क्षेत्र से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद आरोपियों से पूछताछ के दौरान पता चला कि यह लोग महाराष्ट्र उत्तराखंड छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तथा यूपी के अलीगढ़ से अपना फर्जी लोन नेटवर्क चलाते हैं। पुलिस ने चारों आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। फरार सरगना सागर शर्मा की तलाश शुरू कर दी है।

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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Vastu Vihar Scam (4) : पटना में भी भाजपा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ दर्ज हो चुकी है एफआईआर

वास्तु विहार घोटाले में अलग-अलग जगहों पर मुकदमों का क्रम साल भर पहले से शुरू हो गया लेकिन इस घोटाले पर मीडिया वाले रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं. इस स्कैम का सबसे पहले भड़ास ने खुलासा किया. किसी भी मुख्यधारा के अखबार और चैनल ने वास्तु विहार घाटाले पर एक लाइन नहीं छापा न दिखाया. ऐसा माना जा रहा है कि मीडिया वाले भाजपा के शीर्ष नेताओं और केंद्र-राज्य की सरकारों के दबाव / प्रलोभन के कारण मनोज तिवारी के खिलाफ कुछ नहीं छाप रहे हैं. मनोज तिवारी की जगह अगर यही आरोप आम आदमी पार्टी के किसी नेता पर लगा होता तो सारे चैनल पूरे दिन इसी घोटाले के गड़े मुर्दे खोदते रहते. इसे ही कहते हैं मीडिया का नंगा और दोगला चेहरा.

दरभंगा में भाजपा नेता मनोज तिवारी के खिलाफ चीटिंग व फ्राड का केस फाइल होने के पहले भी एक एफआईआर दर्ज हो चुकी है. यह एफआईआर पटना साल भर पहले मनोज तिवारी के खिलाफ दर्ज हुई. पटना वाले एफआईआर में मनोज तिवारी समेत कुल नौ लोगों के नाम हैं जो आरोपी वास्तु विहार कंपनी से संबद्ध हैं. मुकदमा एक वकील की पत्नी ने दर्ज कराया जिसने वास्तु विहार कंपनी से एक प्लाट बुक कराया था लेकिन कंपनी अपने अन्य कस्टमर्स की तरह इस महिला को भी न तो प्लाट दे रही और न ही पैसे लौटा रही है.

पटना के गांधी मैदान पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में शिकायतकर्ता रानी देवी ने कहा है कि उसने 2013 में वास्तु विहार कंपनी में 7.86 लाख रुपये निवेश कर दो हजार स्क्वायर फीट का एक प्लाट बुक कराया. उसने यह कदम मनोज तिवारी द्वारा वास्तु विहार कंपनी के ब्रांड एंबेसडर होने और इनके द्वारा वास्तु विहार कंपनी के प्रोजेक्ट का प्रचार प्रसार किए जाने के कारण उठाया. कंपनी ने प्लाट की रजिस्ट्री तो की लेकिन कभी भी प्लाट हैंडओवर नहीं किया. उन्होंने पैसा भी नहीं लौटाया. रानी देवी, जो खुद शिक्षिका हैं और एक वकील की पत्नी हैं, ने बताया कि मनोज तिवारी का नाम एफआईआर में इसलिए डाला गया क्योंकि उन्होंने एक फ्राड कंपनी को प्रमोट किया जिसके कारण हजारों निर्दोष लोगों का पैसा फंस गया.

बनारस से सुजीत सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

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Vastu Vihar Scam (3) : भाजपा सांसद मनोज तिवारी के खिलाफ फ्राड और चीटिंग का केस दर्ज

वाराणसी : जनता के अरबों रुपये लेकर चंपत होने वाली कंपनी वास्तु विहार के ब्रांड अंबेसडर रहे मनोज तिवारी, जो सांसद तो हैं ही, भाजपा दिल्ली के अध्यक्ष भी हैं, के खिलाफ फ्रॉड और चीटिंग का केस दर्ज कर लिया गया है. यह केस एक पीड़ित उपभोक्ता ने बिहार के दरभंगा जिले में दर्ज कराया है.

दरभंगा के चीफ मजिस्ट्रेट विद्यासागर पांडेय की अदालत में मुन्ना चौधरी नामक एक व्यक्ति ने मनोज तिवारी पर चीटिंग और फ्राड का केस दर्ज कराया है. मुन्ना चौधरी का कहना है कि उसने वास्तु विहार कंपनी से एक फ्लैट बुक कराया था लेकिन उसे न तो फ्लैट मिला और न ही कंपनी पैसे वापस दे रही है. मुन्ना चौधरी ने शिकायत में कहा है कि मनोज तिवारी वास्तु विहार कंपनी के ब्रांड अंबेसडर रहे हैं और उनकी शकल देखकर ही उन लोगों ने पैसा लगाया. अगर मनोज तिवारी जैसा शख्स इस प्रोजेक्ट से न जुड़ा होता और फ्लैट बुक करने की अपील न करता तो वो इस प्रोजेक्ट में निवेश नहीं करते.

पीड़ित मुन्ना चौधरी के मुताबिक मनोज तिवारी का चेहरा सामने होने के कारण वह वास्तु विहार कंपनी पर भरोसा कर बैठे और यह मान लिया कि यह कंपनी धोखाधड़ी इसलिए नहीं करेगी क्योंकि इसमें मनोज तिवारी की इज्जत भी दांव पर है. पर ऐसा हुआ नहीं. कंपनी ने न सिर्फ धोखा दिया बल्कि मनोज तिवारी भी चुप्पी साध गए हैं और इस प्रोजेक्ट से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं जबकि सभी को पता है कि कई राज्यों में वास्तु विहार घोटाले को फलने-फूलने का पूरा काम मनोज तिवारी के चेहरे को आगे रखकर किया गया है.

मुन्ना चौधरी ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2013 में वास्तु विहार कंपनी से फ्लैट बुक कराया. कंपनी ने एक साल में फ्लैट देने का वादा किया था. इसके बदले उसने आठ लाख रुपये लिए. अभी तक न तो कंपनी ने पैसा लौटाया और न ही फ्लैट बनाकर दिया. अब जब वो कंपनी से अपना मूल धन वापस मांग रहे हैं तो कंपनी के लोग नए नए बहाने कर रहे हैं.

ज्ञात हो कि वास्तु विहार घोटाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में भी खूब फला फूला है. यहां भी सैकड़ों लोग करोड़ों रुपये गंवा कर बैठे हैं और कंपनी से अपना मूल धन वापस पाने के लिए लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें न तो मीडिया का समर्थन मिल रहा है और न ही पुलिस प्रशासन कोई सहयोग दे रहा क्योंकि हर जगह भाजपा का राज है और मनोज तिवारी इन दिनों भाजपा के चर्चित चेहरों में से एक हैं.

बनारस से सुजीत सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071

पूरे प्रकरण को विस्तार से जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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Vastu Vihar Scam (2) : ठगी का यह कारोबार भाजपा सांसद मनोज तिवारी के संरक्षण में फला-फूला!

वाराणसी : भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनोज तिवारी के नाम पर वास्तु विहार कंस्ट्रक्शन कंपनी लगातार ठगी का खेल जनता के साथ खेल रही है… लोग मनोज तिवारी का चेहरा देखकर फंस रहे हैं और ठग कंपनी मालामाल होती जा रही है.. आपको बता दें उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत देश के कई हिस्सों में इस ठग कंपनी ने अपना जाल बिछा रखा है और लगातार भोले भाले लोगों को शिकार बनाया जा रहा है.

मिली जानकारी के मुताबिक विनय तिवारी के स्वामित्व वाली इस ठग कंपनी ‘वास्तु विहार कंस्ट्रक्शन’ ने 10 अलग-अलग जगहों पर अपना दफ्तर खोलकर लोगों की मेहनत की कमाई पर डाका डाला है. कंपनी कम कीमत पर फ्लैट देने का झांसा देकर उगाही का खेल खेलती है लेकिन तय वक्त गुजर जाने के बाद भी किसी को आशियाना नसीब नहीं हुआ.. पीड़ित जनता जब फ्लैट मांगने या फिर अपनी जमा रकम पाने के लिए कंपनी के दफ्तर पर पहुंचती भी है तो उन्हें झूठे आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिलता है..

इस फ्रॉड कंपनी के झांसे में आने वाले कहते हैं कि वो तो कंपनी के ब्रांड एंबेस्डर मनोज तिवारी के लगे पोस्टर और उनके नाम-शोहरत को देखकर एक अदद आशियाने की आस में धोखे का शिकार हो गए.. असल में शिकार हुए लोग मनोज तिवारी को ही वास्तुविहार का मालिक समझ बैठे और विनय तिवारी की इस ठग कंपनी का छलावा देखिए कि ये महज एक रुपये में ही बुकिंग का दावा करती है.. लोग कहते हैं कि भले ही विनय तिवारी कंपनी चला रहे हों लेकिन कंपनी में जरूर अघोषित हिस्सा मनोज तिवारी का है. तभी तो वह तन मन से कंपनी के हर काम में शामिल रहते हैं और इसके दस्तावेजी प्रमाण भी हैं.. उदाहरण के तौर पर मनोज तिवारी के द्वारा बकायदा भूमि पूजन भी कराया जाता है.. भूमिपूजन उस तस्वीर को कंपनी अपने पोर्टल पर शेयर करती है…

मनोज तिवारी ने खुद को आगे करके वास्तु विहार कंस्ट्रक्शन को अरबों-खरबों दिलाए लेकिन जो निवेशक फ्लैट मांगने जाता है या पैसा वापस चाहता है तो उसे टका सा जवाब मिलता है और इंतजार करने को कहा जाता है. ऐसे में वह ठगा सा निवेश सोचता है कि उसे मनोज तिवारी और उनके गुर्गों ने लूट लिया… इस कंपनी में कोई निवेशक जब फंस जाता है तो वह कंपनी का शिकार हो चुका होता है… जब शिकार फंस जाता है तो उसके पास तिल-तिल घुटने के सिवाय कोई और चारा नहीं बचता है..

इस संदर्भ में जब भी पीड़ित कंपनी के सीएमडी विनय तिवारी को पीड़ित फोन करते हैं तो वे फोन तक नहीं उठाते हैं.. मान लीजिए अगर कभी गल्ती से फोन उठा भी लें तो झूठा भरोसा देकर फोन काट देते हैं.. वैसे वास्तुविहार की धोखाधड़ी के शिकार लोगों ने मनोज तिवारी से भी कई बार संपर्क किया तो वो अब ये कह कर पल्ला झाड़ गए कि कंपनी उनकी नहीं है, वो तो सिर्फ ब्रांड एंबेस्डर हैं.. लेकिन सवाल उठता है कि अगर कोई कंपनी उनके नाम का इस्तेमाल कर मजबूरों को ठग रही है, वे खुद कंपनी के भूमिपूजन में शामिल हो रहे हैं और उसकी तस्वीर कंपनी अपने पोर्टल से लेकर होर्डिंग तक में प्रकाशित कर रही है तो वो कैसे किनारा कर सकते हैं.. कैसे वो अपने नाम का इस्तेमाल करने दे रहे हैं…

क्या भ्रष्टाचार मुक्त देश का दावा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के वादे का वो माखौल नहीं उड़ा रहे हैं… या वो खुद को सबसे उपर समझ रहे हैं… सवाल उठता है कि यदि उनके नाम का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है तो वो खुद को बेदाग कैसे कह सकते हैं… आखिर तिवारी अपनी नैतिक जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं… उन्होंने कंपनी से अपना नाता क्यों नहीं तोड़ा और छले गए निवेशकों को फ्लैट या पैसे क्यों नहीं दिला रहे हैं… अभी हाल में ही मोदी सरकार ने संसद में कानून पारित किया है जिसमें विज्ञापन करने वालों को भी ठगी के दायरे में मानने की बात कही गई है… तो क्या मनोज तिवारी एक तरह से ठगों के संरक्षक के रूप में नजर नहीं आ रहे हैं…

बनारस के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे बीएचयू के पढ़े हैं और मनोज तिवारी का पोस्टर देखकर मान लिया कि यह प्रोजेक्ट ठीकठाक रहेगा, इसलिए निवेश कर दिया. उनका काफी पैसा फंस गया है… वे जब कंपनी से फ्लैट देने या पैसे लौटाने की बात करते हैं तो वे लोग टालते रहते हैं… उन्होंने भड़ास4मीडिया टीम से अपील की कि पूरे प्रकरण को मनोज तिवारी के समक्ष ले जाया जाए ताकि वे पीड़ित निवेशकों को न्याय दिला सकें.

देखिए कुछ तस्वीरें…

बनारस से सुजीत सिंह प्रिंस की रिपोर्ट. संपर्क : 9451677071


अगर आप भी वास्तु विहार कंस्ट्रक्शन कंपनी और इसके प्रवर्तकों / संरक्षकों द्वारा ठगे गए हैं तो पूरी जानकारी bhadas4media@gmail.com पर मेल कर दें. आपके अनुरोध करने पर आपका नाम पहचान पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा. -संपादक, भड़ास4मीडिया

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यादव सिंह को बहाल कर प्रमोशन देने वाले भ्रष्टाचारी आईएएस रमा रमण का बाल भी बांका नहीं हुआ

Surya Pratap Singh :   ‘भ्रष्टाचारों’ पर मज़े की बात… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे अथॉरिटिज़…. वर्तमान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए किए जा रहे ‘अश्वमेघ यज्ञ’ के असली (भ्रष्ट) घोड़ों को कौन पकड़ेगा… इन घोड़ों ने प्रदेश की अस्मिता को रौंदा है…. जेल की ऊँची दीवारें व बेड़ियाँ प्रतिक्षरत हैं…… सीबीआइ की गिरफ्त में भ्रष्ट इंजीनियर यादव सिंह इन दिनों सीबीआइ का मुजरिम हैं और जेल में निरुद्ध हैं। जिस रमा रमण आईएएस ने यादव सिंह का निलम्बन बहाल किया और प्बिना डिग्री प्रोन्नति देकर तीनों नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में इंजीनियर-इन-चीफ़ बनाया, उसका बाल भी बाँका नहीं।

सीबीआई की जाँच के अंतर्गत यादव सिंह द्वारा सम्पादित 229 अनुबंधों लागत रु. 433 करोड़ के स्वीकृति/ अधिकार प्रतिनिधायन किसने किया? रामा रमण ने ….यह महाशय इतना बड़ा मैनेजर निकला कि उच्च न्यायालय व सीबीआई को ऐसे मैनेज किया है कि वह न केवल जेल से बाहर है अपितु वर्तमान सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों को भी मैनज करने की जुगत लगा रहा है ताकि पिछली सपा-बसपा सरकारों की तरह इस सरकार में भी नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा/यमुना इक्स्प्रेस्वे में क़ाबिज़ रह सके।

यादव सिंह पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा तथा यमुना एक्सप्रेस अथारिटी में तैनाती के दौरान अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं। उसने विभिन्न प्रोजेक्ट्स के 229 अनुबंधों पर 433 करोड़ का कार्य संपादित करवाया, जिसमे बड़े पैमाने पर रिश्वतखोरी होने का इल्जाम लगा है… 1.5 किलो हीरों का मालिक है ये… इसका असली मुलाजिम अर्थात यादव सिंह को सभी अधिकार देने वाला स्वीकृतिकर्ता तो रामा रमण ही है …इसके अलावा बिना टेंडर प्लॉट आवंटन, बिल्डर्ज़ जो नॉएडा इक्स्टेन्शन में दिए लाभ, ब्याज/दंड माफ़ी, नक़्शा पारित करने की अनिमितताएँ, ठेका/टेंडर के घपले, IAS फ़ार्म घोटाला, निर्माण कार्य घोटाले तमाम मामले तभी सामने आएँगे जब नॉएडा के मठाधीश ‘रमा रमण’ को वहाँ से रुख़सत किया जाएगा….

यादव सिंह प्रकरण में सीबीआई द्वारा इन बिंदुओं पर जांच आवश्यक है:

– विभिन्न स्तरों पर यादव की पदोन्नतियों में निर्धारित प्रक्रिया व मापदंडों का पालन हुआ है या नहीं।

– विनिर्माण से संबंधित दिए गए ठेकों में निर्धारित प्रक्रिया और मापदंडो का अनुपालन हुआ या नहीं।

– नॉएडा के अन्य बड़े भ्रष्टाचार और वहाँ तैनात रहे आईएएस अधिकारियों के आचरण की जांच।

नयी सरकार के लिए पिछली दो सरकारों में भ्रष्टाचार के प्रतीक मठाधीश १५ अधिकारियों को तत्काल हटा कर उनकी जाँच आवश्यक है …

वरिष्ठ और चर्चित आईएएस अधिकारी रहे सूर्य प्रताप सिंह की फेसबुक वॉल से.

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हिन्दुस्तान अखबार ने किया पीएफ-डीए घोटाला, पीएम से शिकायत

हिन्दुस्तान अपने हजारों कर्मचारियों को महंगाई भत्ता न देकर पीएफ के अपने हिस्से के करोड़ों रुपये डकार गया। कर्मचारियों के पीएफ का जो बाजिब पैसा उसे भविष्यनिधि खाते में जमा होने चाहिए, वह आज तक हिन्दुस्तान अख़बार के प्रबंधन ने जमा ही नहीं किया है। केंद्र सरकार को ठेंगा दिखाकर हिन्दुस्तान अखबार अपने किसी भी कर्मचारी को डीए(महंगाई भत्ता) नहीं दे रहा है। ताकि पीएफ का पैसा पूरा न देना पड़े, इस घोटाले का खुलासा मजीठिया के योद्धा हिन्दुस्तान बरेली के चीफ रिपोर्टर पंकज मिश्रा, सीनियर कॉपी एडिटर मनोज शर्मा, सीनियर सब एडिटर निर्मल कान्त शुक्ला, सीनियर कॉपी एडिटर राजेश्वर विश्वकर्मा ने किया है।

चारों कर्मचारियों ने हिन्दुस्तान के सभी कर्मचारियों व केंद्र सरकार के साथ खुल्लमखुल्ला धोखाधड़ी का मामला बताकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के केन्द्रीय भविष्य निधि आयुक्त दिल्ली को वेतन पर्ची के साथ शिकायत भेजकर मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर दोषियों को जेल भेजने और कर्मचारियों को उनका वाजिब हक़ दिलाने की मांग की है।                   

हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड द्वारा वेतनमान में हेराफेरी के संबंध में भेजी गई शिकायत में कहा गया कि हिन्दुस्तान दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित करने वाली कंपनी हिन्दुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड ने भविष्य निधि अंशदान बचाने के लिए लगातार वेतनमान मनमाने ढंग से निर्धारित किए। किसी भी कर्मचारी को डीए नहीं दिया जाता है, जो नियमतः दिया जाना अनिवार्य है।

पंकज मिश्रा ने शिकायत में  कहा कि उनकी नियुक्ति हिन्दुस्तान मीडिया वेचर्स लिमिटेड के दैनिक समाचार हिन्दुस्तान की बरेली यूनिट में 22 मार्च, 2010 को वरिष्ठ संवाददाता के पद पर हुई थी। इस दौरान प्रार्थी को बेसिक भुगतान के रूप में रू. 5,667 मासिक का भुगतान किया गया। इसी दौरान रू. 9,081 मासिक स्पेशल एलाउंस के रूप में भुगतान किए गए। बेसिक सेलरी घटाकर स्पेशल एलाउंस के रूप में प्रति माह रू. 9,081 का भुगतान करके प्रबंधन ने सेलरी को मैनेज करने की कोशिश की, जिससे कि उन्हें भविष्य निधि अंशदान अधिक न देना पड़े। शिकायत में आगे कहा गया कि प्रबंधन स्पेशल एलाउंस देकर उनको लंबे समय तक भ्रम में रखकर भविष्य निधि में हेरफेर करता रहा। उल्लेखनीय यह है कि इस दौरान किसी भी तरह का डीए उनको भुगतान नहीं किया गया। डीए न देने से उनको भविष्य निधि के साथ बड़ा नुकसान हुआ है।

पंकज ने शिकायत में कहा कि वर्ष 2016 में प्रबंधन ने स्पेशल एलाउंस की जगह पर्सनल पे के रूप में रू. 16043 का भुगतान मासिक करने लगा जबकि पर्सनल पे की कोई वजह ही नहीं बनती थी। इस दौरान बेसिक पे के रूप में रू. 7376 मासिक भुगतान किया जबकि डीए के रूप में कोई भुगतान नहीं किया गया।

मनोज शर्मा, निर्मल कान्त शुक्ला, राजेश्वर विश्वकर्मा ने शिकायत में कहा कि हिन्दुस्तान मीडिया वेचर्स लिमिटेड बरेली ने डीए न देकर उन लोगों का नुकसान किया है और भविष्य निधि अंशदान में भी गलत तरीके से कटौती की है। इन लोगों ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि प्रकरण में जांच कराके उचित कार्यवाही की जाए और शिकायतकर्ताओं के हित में भुगतान कराया जाए।

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आईएएस रमा रमण के कार्यकाल में नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरणों में हुए घपले-घोटालों की जांच की मांग

Yashwant Singh : चर्चित आईएएस सूर्य प्रताप सिंह अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं :

”कोई ताज़िन्दगी येनकेन प्रकारेण नॉएडा / ग्रेटर नॉएडा में ही रहना चाहता है.. उसने मायावती व अखिलेश यादव/रामगोपाल को ख़ूब खिलाया और ख़ुद ‘ऐड़ा-बनके-पेड़ा’ खाया… नॉएडा/ग्रेटर नॉएडा में पिछले १० वर्षों के commercial, industrial व housing प्राजेक्ट्स के लैंड आवंटन घोटाले की जांच हो…. भू उपयोग परिवर्तन, builders के रु. 15,000 करोड़ के ब्याज माफ़ी की जांच हो… नॉएडा इक्स्टेन्शन में बिल्डर्स को भू आवंटन व नियमों में दी गयी छूट की जांच हो… ग्रीन बेल्ट आवंटन की जांच हो…. निर्माण कार्यों के घोटाले की जांच हो… DND टोल घोटाला, बिल्डर्र्स पर लम्बित बकायों की माफ़ी की भी जांच हो… बिल्डर्ज़ द्वारा आवंटीयों के साथ नॉएडा अथॉरिटी से मिलकर की गयी धोखाधड़ी की जांच हो… भू अधिकरण व मुआवजों का पेमेंट घोटाला जो करीब रु.५०,००० करोड़ का घोटाले अनुमानित है, की जांच हो… IAS अधिकारियों को farm आवंटन की लोक आयुक्त द्वारा की गयी जाँच में लीपापोती की भी जांच हो…”

जाहिर है यह सारा घोटाला रमारमण के नेतृत्व में हुआ जो नोएडा और ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण पर लगातार कब्जा जमाए हैं और मायावती से लेकर अखिलेश तक के कार्यकाल में अपने हुनर के दम पर कुर्सी से चिपके रहे हैं…यही नहीं जब यमुना एक्सप्रेसवे विकास प्राधिकरण बनाया गया तो भी इसका शीर्ष अफसर रमा रमण को ही बनाया गया. सवाल है कि क्या योगी सरकार इच्छा शक्ति दिखाते हुए रमा रमण के कार्यकाल के सारे फैसलों की जांच कराएगी और सूर्यप्रताप सिंह द्वारा उल्लखित उपरोक्त घोटालों-गड़बड़ियों की जांच कराएगी?

(IAS Rama Raman)

अगर यह जांच नहीं हुई तो माना जाएगा कि सत्ता में चाहें जो विचारधारा आ जाए, वह असली खेल भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने में ही होता है. हां, ये हो सकता है कि वह भ्रष्टाचारी अपनी विचारधारा के ढूंढ ले. लेकिन बदलता कुछ नहीं है. उम्मीद करते हैं कि योगी आदित्यनाथ बड़े भ्रष्टाचिरयों को जेल भेजेंगे. अन्यथा उनके और अखिलेश-मायावती के कार्यकाल में कोई खास अंतर नहीं रह पाएगा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रमा रमण की लगातार तैनाती को लेकर गंभीर टिप्पणी की थी और इस अफसर को हटाने के लिए आदेश भी दिया था जिसकी खबरें उन दिनों मीडिया में आई थीं. लेकिन बाद में सब कुछ लीप पोत के बराबर कर दिया गया. देखिए वो खबर जिसमें हाईकोर्ट ने इस शख्स को तीनों प्राधिकरणों नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे से हटाने से संबंधित आदेश दिया था…

HC questions SP, BSP’s clemency on Noida Authority chairman Rama Raman; restricts IAS officer of duties… Allahabad HC has seized all the powers of UP’s IAS officer Rama Raman. The court has come down strictly on the chairman of the Noida authority. This order came down as a shocker not only for the Akhilesh Yadav government in the state but also for the IAS officer. Rama Raman is the chairman of Noida, Greater Noida and Yamuna Development Authority for the past seven years. The court in its order has asked the UP government to take the decision on the transfer of the IAS officer within 2 weeks. The court’s order comes as a result of a PIL filed by Jitin Goel in Allahabad HC. Also, the court has demanded the state government to give an answer as to why did they make Rama Raman the chairman of three authorities. Raman faces corruption charges. Rama Raman was also the chairman of these various authorities during the chief ministerial ship of BSP Supremo Mayawati. The IAS office has been restricted of his duties and power by the court.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Vastu Vihar Scam (1) : भाजपा सांसद मनोज तिवारी के ‘संरक्षण’ में एक ठग कंपनी ने जनता से की अरबों की लूट

Yashwant Singh : बीजेपी दिल्ली के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने किस तरह अपने खास लोगों को वास्तुविहार कंस्ट्रक्शन कंपनी के जरिए जनता को लूटने की छूट दी, किस तरह वे लूट के इस खेल में अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल रहे, इसका खुलासा जल्द भड़ास पर होगा. मनोज तिवारी द्वारा ‘संरक्षित’ वास्तुविहार कंस्ट्रक्शन कंपनी के जाल में लोग मनोज तिवारी का चेहरा देखकर फंस रहे हैं और ठग कंपनी मालामाल होती जा रही है.

इस ठग कंपनी ने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड समेत देश के कई हिस्सों में जाल बिछा रखा है और लगातार भोले भाले लोगों को शिकार बनाया जा रहा है. अगर आपके संपर्क में भी किसी व्यक्ति का धन इस कंपनी में डूबा हो तो कृपया सामने आएं. डिटेल लिख कर bhadas4media@gmail.com पर भेज दें, उसे भी भड़ास पर आने वाली खबर में शामिल किया जाएगा.

याद रखिए, इस खुलासे को कोई चैनल या अखबार नहीं दिखाएगा… वजह आप खुद जानते होंगे… लगभग सारे चैनल और लगभग सारे अखबार जब धंधा बिजनेस लाभ स्वार्थ के लिए भगवा रंग में हर हर हो चुके हों तो सच्चाई सामने लाने का काम सोशल मीडिया और वेब माध्यमों को ही करना पड़ेगा… खोजी पत्रकारों के लिए बनारस की वास्तु विहार कांस्ट्रक्शन कंपनी और वास्तु विहार प्रोजेक्ट शोध का विषय है.. लग जाएं…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण का खुलासा पढ़ने के लिए नीचे दिए शीर्षकों पर क्लिक करें :

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डीएवीपी विज्ञापनों के लिए फर्जीवाड़ा, दिल्ली-लखनऊ के 277 पब्लिकेशन फंसे

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सरकारी विज्ञापनों के लिए आवंटित राशि हासिल करने की खातिर कथित तौर पर ‘फर्जीवाड़े और गबन’ में शामिल होने को लेकर 277 प्रकाशनों के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज कराने और कानूनी कार्रवाई शुरु करने का फैसला किया है. विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) द्वारा मौके पर की गयी जांच में प्रकाशन एवं प्रसार संबंधी आंकड़ों में व्यापक अनियमितताएं मिलने के बाद लखनऊ और दिल्ली के करीब 277 प्रकाशन मंत्रालय के निशाने पर हैं.

एक आधिकारिक सूत्र ने बताया कि यह जांच दिल्ली और लखनऊ में की गयी तथा पता लगा कि इन प्रकाशनों द्वारा मुहैया कराए गए ब्यौरे बड़े स्तर पर गुमराह करने वाले हैं. उन्होंने कहा कि मंत्रालय का मानना है कि ये 277 प्रकाशन सरकारी राशि के गबन और धोखाधड़ी में शामिल हैं. सूत्रों ने कहा कि दिलचस्प है कि मंत्रालय के निशाने पर जो 277 प्रकाशन हैं उनमें से 70 एक ही प्रिंटिंग प्रेस से प्रकाशित होते हैं.

उन्होंने कहा कि इस बात की पूरी आशंका है कि इन प्रकाशनों ने डीएवीपी से सरकारी विज्ञापनों की राशि हासिल करने के लिए अनुचित तरीकों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और उन प्रकाशनों से राशि वसूलने के प्रयास किए जाएंगे. सूत्रों ने कहा कि इसके साथ ही, जांच के आधार पर इन प्रकाशनों के स्वामियों, मुद्रकों और प्रकाशकों के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज कराने के लिए डीएवीपी को भी निर्देश दिए गए हैं.

समझा जाता है कि सरकारी विज्ञापनों के प्रचार के लिए 2015-16 में इन प्रकाशनों को करीब 1.95 करोड़ रुपए दिए गए जबकि 2016-17 में करीब 1.19 करोड़ रुपए दिए गए.

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