अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

अखबार मालिक ही नहीं मालिक का एजेंट संपादक भी यही सवाल दाग देता है कि अखबार निकालने में करोड़ों खर्च होते हैं कोई करोड़ों रुपए समाजसेवा पर क्यों खर्च करेगा। बस यही से शुरू होता है खेल। पहले विज्ञापन के नाम पर या आड़ में होता था अब पेड न्यूज जैसी तमाम चीजें शामिल हो गई है। इन्ही तमाम चीजों में एक है लठैती। मीडिया धीरे-धीरे ही सही पेशेवर लठैत होता जा रहा है। एक कहावत है कि,” पूत के पांव हमेशा पालने में ही नहीं रहते”। विज्ञापन के मायाजाल से ही इसने केंचुल बदलना शुरू किया। पाठकों को सूचना देना, गरीबों-मजलूमों की आवाज बनने के बजाए मालिकों, नेताओं की ढाल बनने लगा। अब यह ढाल वार रोकने तक ही सीमित नहीं वह प्रहार भी करने लगा। यह प्रहार गरीब निरीह जनता के लिए नहीं मालिकों और नेताओं के लिए होने लगी। यानी मीडिया लठैत हो गया। सामंतयुगीन व्यवस्था में लठैत अपने मालिक के लिए ” कुछ भी” करने को तैयार रहते थे वो भी सेवाभाव से। आज मीडिया भी तैयार रहता है सेवाभाव से। आज का मीडिया लाठी लिये मालिक के धंधों को हांकता रहता है।

आज एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है वह है कारपोरेट मीडिया। अब ये काँपोरेट मीडिया क्या है अपुन अभी तक नहीं समझ पाये हैं। जब बड़े घराने मीडिया के “धंधे” में आये तो मोटामोटी एक ही बात भेजे में घुसेड़ी जाती थी कि, ये अपने अन्य धंधों की रक्षा के लिए अखबार (तब टीवी चैनल नहीं थे) निकालते हैं। अपने अन्य धंधों के होने वाले मुनाफे का कुछ प्रतिशत अखबार को दे दें तो वह चाहे घाटे में रहे या फायदे में कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बिड़ला के हिंदुस्तान अखबार को ही ले लें। बिड़ला जी के पचासों धंधे थे उसके मुनाफे से कुछ फीसद अखबार को दे दिया तो अखबार चाहे जैसे चले कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे घाटे में ही रहे। लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि बंटवारे के बाद एक पारिवारिक सदस्य को सिर्फ अखबार ही मिला है।

बात लठैत की। हाल के चुनावों व उसके मीडिया की भूमिका किसी लठैत से कम नहीं रही। लठैत की सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि वह अपने मालिक के इशारों को अच्छी तरह से समझता है। मीडिया भी समझने लगा है। मसलन कब उसे किसे कितना महत्व देना है। किसकी रैली, रोड शो या जनसभा को कितना कवर करना है। बसपा का एक नारा था, ”जिसकी जितनी आबादी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”। मीडिया भी पार्टी प्रचारकों की लाइव कवरेज भी कुछ इसी आधार पर करता रहा। भाजपा का सबसे ज्यादा, बाकी में कांग्रेस, सपा और बसपा ही होते थे जबकि चुनाव में आरएलडी, जेडयू, राजद, यूकेडी, अकाली और वामपंथी भी थे। नेताओं के साथ विशेष कवरेज भी विशेष तक ही सीमित रही। गोया अन्य दलों के प्रमुख गाजर-मूली हैं।

ये तो रही चुनाव के आगे-पीछे की कवरेज। उसके बाद भी मीडिया की भूमिका लठैत की ही होती है। वह कौन सा अखबार और चैनल है जो अपने मालिक के खिलाफ एक लाइन भी लिख दे। दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन के खिलाफ कभी एक लाइन छपा है। राष्ट्रीय सहारा के सहारा श्री लखनऊ में गिरफ्तार हुए किसी संस्करण में एक लाइन खबर नहीं थी, क्यों। क्योंकि लठैत कि यह भी खूबी होती है कि वह मालिक के आगे शीश नवाये रखता है। मालिक तो मालिक के करीबी के खिलाफ भी तब तक खबर नहीं छपती जब तक की वह बुरी तरह से फंस न जाए। रामदेव के करीबी बाल कृष्ण फर्जी डिग्री के मामले में देहरादून में गिरफ्तार हुए। राष्ट्रीय सहारा के अन्य  संस्करण की जाने दीजिए देहरादून में भी एक लाइन खबर नहीं छपी। हां इंदौर से रामदेव का खंडन हर अंक के पहले पेज पर छपा। (अखबार की फाइल गवाह है)

यही लठैत कभी भी विज्ञापन देने वाले पर तब तक खबर नहीं लिखते जब तक वह बुरी तरह से घिर न जाए या मालिक हरी झंडी न दे दे। विज्ञापन देने वाले इनके लिए पार्टी होते हैं। आजकल एक नया रिवाज शुरू हो गया है। स्क्रीन पर एक ही नेता की दो-दो फोटो वो भी एक साथ। मसलन, विज्ञापन की जगह एल बैंड के रूप में आदित्य नाथ और समाचार में भी वो भी एक ही समय में। आने वाले दिनों में दांये-बांये, ऊपर नीचे भी हो सकती है। अखबार का मास्टहेड एक ही दिन तीन-तीन होता है यानी  पहले पेज की तरह तीन तो कभी चार पेजों पर अखबार का नाम होता है।

यह भी एक तरह से मीडिया की लठैती ही है। कभी मीडिया की लाठी कमजोरों के लिए, उत्पीड़ितों के लिए उठती थी अब किसके लिए उठती है और क्यों उठती है सब जान गये हैं। भाजपा से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने वाले जी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के खिलाफ जीटीवी की लाठी जीटीवी के लठैत उठा सकते हैं क्या?

अरुण श्रीवास्तव
07017748031
08881544420

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बॉस का बिस्तर गर्म कर हुई हो सफल!

मेरी घड़ी में सुबह के 9 बजकर 4 मिनट हो रहे थे। देश के दिल नई दिल्ली से मेरे दोस्त अखिल का फोन आया। प्यार से मैं उसे अक्की कहता हूं। वे इस समय एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल में बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहा है। Continue reading

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मोदी का रोड शो और प्रसारण के अड्डों पर कब्जा

Uday Prakash : अभी सारे चैनलों में बनारस के रोड शो की कवरेज़ देख रहा था. जैसा इतालो काल्विनो ने कहा था कि सत्ताधारी हमेशा इस भ्रम में रहते हैं कि अगर उन्होंने सूचना-संचार माध्यमों के ‘प्रसारण के अड्डे’ (ट्रांसमिटिंग पॉइंट) पर कब्ज़ा जमा लिया है और अपने मन मुताबिक़ समाचार या सूचनाएं अपने जरखरीद मीडिया कर्मचारियों से प्रसारित-प्रचारित करवा रहे हैं, तो इससे ‘प्रसारण के लक्ष्य समूहों (यानी दर्शक, श्रोता) के दिमाग को प्रभावित और नियंत्रित कर रहे हैं।

यानी सारा भरोसा मीडिया और प्रचार तंत्र पर. जब कि बार-बार प्रमाणित होता आया है कि यह ‘भरोसा’ कुछ अरसे तक भले कामयाब लगे, और यह अरसा बहुत सीमित और अनिश्चित होता है, पर बहुत जल्द ऐसी कोशिश उलटा काम करने लगती है. (काउंटरप्रोडकटिव) होती है. इसकी वजह यह कि दर्शक-श्रोता-पाठक या ‘जनता’ का दिमाग़ कोई कूड़ेदान नहीं होता। जनता सूचना का ग्राहक और उपभोक्ता होती है और जल्द ही वह सूचनाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को अपने विवेक की चलनी में छानना शुरू कर देती है.

और ऐसे फैसले ज़ाहिर करती है जिसका अंदेशा सत्ताधारी हुक्मरानों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया के ‘प्रसारण अड्डों’ को नहीं हो पाता। आज जब मैं कई चैनलों में बनारस में (पूर्वी उत्तरप्रदेश) की चुनावी रैलियों या रोड शो की रिपोर्टिंग देख रहा था, रिमोट से एक से दूसरे और तीसरे-चौथे चैनलों पर आते-जाते हुए तो कुछ बातें लगीं, जो मैं आप दोस्तों से कहना चाहता हूँ :

पहला यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोड शो सिर्फ टीवी के लिए आयोजित ‘स्क्रीन शो’ था. शायद इसके लिए पहले से कोई कानूनी अनुमति नहीं ली गयी थी. यह चुनाव आयोग की नियम-संहिताओं का उल्लंघन था. यह गैर कानूनी था.

दूसरा, यह रोड शो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से शुरू हो कर कुछ ही दूर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर तक और फिर भैरव मंदिर तक , शिव के पूजन-अर्चन तक जा कर समाप्त हो गया था. सूचना यह भी है कि इस रोड शो में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के वी.सी. गिरीशचंद्र त्रिपाठी, जो संघ के कार्यकर्ता भी रहे हैं, भी एबीपी के छात्रों के साथ सम्मिलित रहे हैं. यह भी नियमों का उल्लंघन ही है. फिर जैसा उर्मिलेश उर्मिल जी ने सवाल उठाया है, यह चुनाव के दौरान धार्मिक-जातिवादी आस्थाओं के गैर-कानूनी इस्तेमाल का भी तथ्य बनता है.
इसके मुकाबले अखिलेश-राहुल के रोड शो ने 12 किलोमीटर तक की खासी लम्बी दूरी तय की और यह सच भी खुल कर सामने आया कि इस रैली में शामिल लोगों की संख्या कहीं अधिक थी.

मुझे जो एक सूचना बहुत मानीखेज लगती है वह यह है कि जहां प्रधानमंत्री मोदी जी का रोड शो बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के कहे जाने वाले संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की मूर्ती के माल्यार्पण से शुरू हुआ और मंदिरों तक जा कर ख़त्म हो गया , वहीं अखिलेश -राहुल का 12 किलोमीटर का रोड शो बाबा साहब भीमराव आंबेडकर पार्क से शुरू हो कर उसी बनारस हिन्दू वि.वि. तक आकर समाप्त हुआ, जो मोदी-रोड शो का प्रस्थान बिंदु था.

इस प्रारम्भ और अंत के बिंदु का गहरा सामाजिक अर्थ है. यही सपा और भाजपा-संघ के बीच के फर्क का भी, फिलहाल, संकेत देता है.

लेकिन, सूचना यह भी है कि एक तीसरी रैली भी इसी समय आयोजित हुई , जो मीडिया के कैमरों से तो दूर रही , लेकिन उस रैली या चुनाव सभा में पांच लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। और यह रैली , इन दोनों रोड शो से बहुत बड़ी थी. यह बसप की रैली थी. मायावती की चुनावी सभा, जिसमें बाबा साहब आंबेडकर के बैनर और पोस्टर चारों ओर छाए हुए थे.

मैं नहीं जानता, सैफोलोजिस्ट या टीवी -ज्योतिषी नहीं हूँ कि यह दावा करूं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की ४९ सीटों पर कौन-सी पार्टी जीतेगी या बहुमत बनायेगी, लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि सवर्ण-हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक सत्ता के कमज़ोर होने की यह शुरुआत है. ‘मोदी-मोहभंग’ की पहली बड़ी सूचना.

वैसे अधिक खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि राजनीतिक हार-जीत से सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर असली प्रभुत्वशाली ताकतें पराजित नहीं होतीं. वे और अधिक आक्रामक या चतुर हो कर अपनी पकड़ सत्ता पर मज़बूत करेंगी और देश के संविधान की मूल प्रतिज्ञाओं के अनुरूप समाज और राजनीति को बनाने का संघर्ष और कठिन होगा। चुनाव आयोग को निष्पक्ष हो कर जांच करनी चाहिए कि किसने रोड शो के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट का उललंघन किया है. चाहे वह कोइ भी हो.

हाँ, इस बार भी जब मोदी जी ने शिव पूजन किया, इंडिया आस्ट्रेलिया के खिलाफ बंगलूर के टेस्ट मैच में सिर्फ १८९ रन बना सकी और शर्मनाक हार की आशंका में धकेल दी गयी. याद होगा दोस्तों, मैंने पिछली बार भी कहा था कि जिस रोज़ मोदी जी ने ईशा फाउंडेशन वाले ‘त्रिपुंड-विहीन त्रिपुरारी शिव’ का शिवरात्रि के दिन पूजन अभिषेक किया था, उस दिन भी उन्नीस बार लगातार अपराजित रहने वाली ‘इंडिया’ पुणे में आस्ट्रेलिया के हाथों बुरी तरह से हारी थी.

शिव जी बहुत प्रसन्न नहीं लग रहे.

हम तो यही चाहेंगे कि सियासी चुनाव में कोई भी जीते, इंडिया पराजित न हो।  🙂

(इस व्यक्तिगत टिप्पणी के लिए क्षमा दोस्तों )

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.

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वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे!

Ajay Prakash : मीडिया कहती है हम काउंटर व्यू छापते हैं। बगैर उसके कोई रिपोर्ट नहीं छापते। कल आपने विकास दर की रिपोर्ट पर कोई काउंटर व्यू देखा। क्या देश के सभी अर्थशास्त्री मुजरा देखने गए थे? या संपादकों को रतौंधी हो गयी थी? या संपादकों को ‘शार्ट मीमोरी लॉस’ की समस्या है, जो ‘एंटायर पॉलि​टिक्स का विद्यार्थी’, ‘वैश्विक अर्थशास्त्र’ का जानकार बना घूम रहा है और संपादक मुनीमों की तरह राम—राम एक, राम—राम दो लिख और लिखवा रहे हैं।

हालत देखिए कि संपादकों की मुनीमगीरी से मिले साहस में वह विद्यार्थी अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों का मखौल उड़ा रहा है और हम पत्रकारिता के युवा हैं जो पेट भरपाई के एवज में जादुई आंकड़ों के कट—पेस्ट को सही साबित करने में एड़ी से चोटी लगा रहे हैं।

सवाल है कि क्या इन संपादकों को अपने ही अखबारों में छपी रपटें और टीवी का फुटेज नहीं दिखा? लगातार दो महीने जिससे अखबार भरे रहे, टीवी चैनलों का बहुतायत समय नोटबंदी की समस्याओं पर केंद्रित रहा, वह समस्या क्या एकाएक जादुई ढंग से दुरुस्त हो गयी। आईएमएफ की रिपोर्ट, एनआरआई द्वारा देश से ले जाया गया 12 लाख करोड़ रुपया, 13 लाख लोगों की बेरोजगारी, 60 प्रतिशत नरेगा मजदूरों की बढ़त सब बेमानी साबित हो गए। और एकाएक विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया।

क्या तथ्य, आंकड़े, शोध, समझदारी, साहस संपादकों के लिए ‘चूरन’ वाली नोट हो गए हैं कि जब जैसा मन किया तब तैसा छाप दिया। या सत्ता के दबाव में वह इतने रीढ़विहिन हो गए हैं जो सत्ता के बयान को जनता के मन की बात मान लेने की ‘मजबूर जिद’ के शिकार हैं? या फिर पत्रका​रिता इंदिरा गांधी के उस दौर से गुजर रही है, जब बैठने के लिए कहने पर संपादक लेटने के लिए दरी साथ लिए घुमते थे।

सामान्य ज्ञान से भी आप सोचें तो जिन दिनों में देश ठप था, रुपए की आवाजाही मामूली थी, मानव संसाधन का बहुतायत पंक्तियों में खड़ा था, चाय और पान की दुकानों तक पर बिक्री के लाले पड़े थे, उन दिनों में विकास दर कैसे बढ़ सकती है?

और नहीं बढ़ सकती तो अगर उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के बाद मोदी और उनकी पार्टी के अध्यक्ष ​अमित शाह बढ़ी विकास दर को नया चुनावी जुमला बोल दें फिर आप कहां के रह जाएंगे ?

क्या आप नहीं मानते कि वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे?

सोशल मीडिया पर बेबाक टिप्पणी के लिए चर्चित पत्रकार अजय प्रकाश की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टटेस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Zeeshan Akhtar एक राष्ट्रीय अखबार ने छापा कि देश बल्ले बल्ले कर रहा है…
Bhanwar Meghwanshi शानदार टिप्पणी अजय जी। बधाई
Arvind Shekhar जीडीपी बढ़ने की वजह है आधार वर्ष बदला गया है सांख्यिकी के विशेषज्ञ से बात करके देखें। सच सामने आ जाएगा।
Vishnu Rajgadia समय इनका भी सच बताएगा। जो संपादक अपने वर्गीकृत विज्ञापनों के जरिये बेरोजगार युवाओं को “धनी महिलाओं से दोस्ती करके पैसे कमाने” की जुगुप्सा जगाकर ठगते हैं, उनसे आप क्या उम्मीद करते हैं भाई?
Puspendra Kumar एक्सपोर्ट और एग्री प्राडक्शन ग्रोथ का सहारा ले रही सरकार। कल एक खबर में पढ़ा था कि पिछले साल वाले बेस को (रिविजन से) घटाकर ग्रोथ को पंप किया गया है। ऐसे में दुनिया ग्रास जीडीपी माडल पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है।

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पत्रकारिता का मौजूदा दौर और एक्सक्लूसिव खबरों का खेल

एक्सप्रेस ने छापे इस सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत तो हिन्दू ने छापे पिछले सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत

Sanjaya Kumar Singh : खोजी पत्रकारिता भी दरअसल पौधा रोपण या प्लांटेशन की पत्रकारिता ही है। जब इसकी शुरुआत हुई थी तो ढूंढ़-ढांढ़ कर जनहित की खबरें लाई जाती थीं जो आमतौर पर सरकार और शासकों के खिलाफ होती थीं। मीडिया को नियंत्रित करने की सरकार की कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ऐसी खबरों की जगह कम होती गई और फिर पेड न्यूज शुरू हुआ। अब तो ज्यादातर अखबार के लगभग सारे पन्ने पेड न्यूज होते हैं या यूं कहिए कि चाटुकारिता वाले होते हैं। बदले में विज्ञापन मिलता है। नहीं तो विज्ञापन बंद कर देने की धमकी। अब जब खोजी पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता से गायब हो चली है तो आइए खोजी पत्रकारिता को याद करें। श्रद्धांजलि दें। वैसे यह भी सच है कि ज्यादातर मामलों में खोजी खबरें भी आखिर कोई नाराज ही “लीक” करता है। उद्देश्य उस गड़बड़ी को ठीक करना होता है।

आपने पिछले दिनों पढ़ा होगा कि ठाणे में अवैध ढंग से चल रहे एक कॉल सेंटर के कर्मचारियों ने ही पुलिस को उसकी सूचना दी थी और पुलिस ने कारर्वाई की तो पता चला कि कॉलसेंटर अमेरिकी नागरिकों से अवैध वसूली करने वालों का संगठित गिरोह था। पहले इस तरह की खबरें मीडिया में छपवाई जाती थीं और पुलिस कार्रवाई करने को मजबूर होती थी। अब ऐसी खबरें छपती नहीं हैं और पुलिस के पास जो पहुंचती होंगी उनमें से सब पर कार्रवाई होती होगी यह मानना बेवकूफी है। अभी तक होता यह था कि ऐसी लीक को जो छाप दें या जिसकी साख हो उसके पास ऐसी खबरें आती रहेंगी, दुनिया इसे खोजी पत्रकारिता मानती रहेगी।

अब भक्ति पत्रकारिता शुरू हुई है। इसमें बुरी बात यही है कि स्वतंत्र या निष्पक्ष दिखने के लिए एक भी खबर सरकार के खिलाफ गई तो सारी भक्ति बेकार चली जाएगी। जबकि विरोध वाली पत्रकारिता में प्लांटेशन के अलवा अपनी इच्छा से भी खबरें करने की स्वतंत्रता रहती है। इसीलिए वहां पत्रकारिता करने की संभवना ज्यादा है और उसे भक्ति पत्रकारिता की तरह बुरा नहीं माना जाता। अगर आप किसी दबाव या लालच में भक्ति की खबरें देते हैं तो स्वेच्छा से भी भक्ति की ही खबरें देनी होगी। खोजी पत्रकारिता इस मायने में भक्ति से काफी अलग है।

अरुण शौरी लिख चुके हैं कि एक्सप्रेस के रीसेप्शन पर लोग पूरी फाइल छोड़ जाते थे और फोन करके बता देते थे कि फाइल रख आया हूं। ऐसे में जब राजीव गांधी के खिलाफ बोफर्स घोटाला चल रहा था और एक्सप्रेस रोज नई-नई खबरें (लीक) छाप रहा था तो सरकार के खिलाफ उसकी खबरें वैसे ही देखी जाती थीं जैसे आज सरकार की भक्ति की खबरें देखी जाती हैं। खबर लीक करने वालों का मकसद और लक्ष्य होता है। इसलिए वह चाहता है कि लीक को गंभीरता से लिया जाए। मुझे याद है बोफर्स की तमाम खबरें एक्सप्रेस में छपती थीं और एकाध चेन्नई के एक अखबार में। उन दिनों हमलोग हिन्दू में बोफर्स की एक्सक्लूसिव खबरों के बारे में यही राय रखते थे।

अब जब एक्सप्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भक्ति वाली रिपोर्टिंग की है तो पुराना जमाना याद आ रहा है। खिलाफ खबरें छापने के लिए भी किसी साख वाले (संतुलित माने जाने वाले) अखबार को चुना गया था। ऐसे में सरकार ने अपने समर्थन में खबर छपवाने के लिए टीवी चैनलों की साख के मद्देनजर एक्सप्रेस की साख का उपयोग किया। यह भी संभव है कि एक्सप्रेस ने अपनी यह निशुल्क सेवा स्वेच्छा से उपलब्ध कराई हो पर अभी यह चर्चा का विषय नहीं है। और जैसी उम्मीद थी भक्तगण एक्सप्रेस की साख के हवाले से कहने लगे, एक्सप्रेस में छपी है खबर !! कहने का मतलब, खबर सरकार के खिलाफ हो या पक्ष में, छपवाने (फैलाने) वालों के खेल के नियम हैं और वे साख तलाशते हैं या उपयोग करते हैं। मीडिया ने जिस तेजी से अपनी साख कोई है उसमें इस खेल का क्या होगा?

हो सकता है, कुछ समय में मीडिया की साख बनाने के लिए सरकार के खिलाफ खबरें छापने-छपवाने का खेल शुरू हो। करोड़ों का धंधा करने वाला यह चौथा स्तंभ यूं ही नहीं चलता रहेगा। ताकत है तो उसका उपयोग-प्रदर्शन भी होगा ही। फिलहाल, एक्सप्रेस ने जो क्रांतिकारी खबर छापी है वह भारत में खोजी पत्रकारिता के इतिहास में ‘बेमिसाल’ साबित हो सकता है। दिल्ली डेटलाइन से छपी खबर पढ़ने पर समझ में आता है कि सारा मामला आईडिया का है। किसी सर जी ने एन्क्रिप्टेड चैट सिस्टम से लिखित सवाल भेजकर अनजाने आम निवासियों का इंटरव्यू किया। तमाम हस्तियां सवाल पहले लिखकर मांगती हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने आम आदमी को भी यह सुविधा दी। सुधीर चौधरी को पत्रकारिता के लिए पुरस्कृत करने के बाद इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकारिता में यही बाकी रह गया था।

जहां तक भाजपा की राष्ट्रवादी सरकार के राज में मीडिया की भक्ति की बात है, मीडिया ऐसे तमाम मुद्दे उछाल देता है जो मुद्दा होते ही नहीं हैं। दूसरी ओर, ऐसे तमाम मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है जिनपर चर्चा होनी चाहिए। इसी क्रम में सर्जिकल स्ट्राइक से संबंधित सबूत का मुद्दा भी है। अव्वल तो सर्जिकल स्ट्राइक ही मुद्दा नहीं है। पर हम इसके सबूतों की चर्चा कर रहे हैं। इसमें मीडिया को जो मुद्दे उठाने चाहिए वे छूट जा रहे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक ढिंढोरा पीटने की चीज नहीं है। जब सार्वजनिक चर्चा होगी तो सवाल भी उठने शुरू हुए। जब यह दावा सामने आया कि पहले भी स्ट्राइक हुए हैं औऱ पुरानी सरकारों ने इसका श्रेय लेने की कोशिश नहीं की तो यह कहा जाने लगा कि पहले स्ट्राइक हुए थे इसका क्या सबूत है। ऐसे में अगर एक्सप्रेस ने लीक से हटकर यह साबित करने की कोशिश की कि कुछ तो हुआ था तो आज हिन्दू ने छापा है कि पहले भी कुछ-कुछ होता रहा है।

जनसत्ता अखबार में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से. ANUVAAD COMMUNICATION के हेड Sanjaya से संपर्क 9810143426 के जरिए किया जा सकता है.

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